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‘राजीव गाँधी के कातिलों को छोड़ना है, जनता की है यही माँग… राज्यपाल को भेज दिया है प्रस्ताव’

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के पलानिस्वामी ने राजीव गाँधी के कत्ल के आरोप में उम्रकैद की सजा काट रहे कातिलों को रिहा करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। साथ ही यह भी कहा है कि यही तमिलनाडु की जनता की माँग है, और उन्होंने इसके लिए राज्यपाल को प्रस्ताव भेज दिया है। अब गेंद राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित के पाले में ही है और दहशतगर्दों की आजादी में केवल वही अंतिम रुकावट हैं।

तमिल जनता का एक बड़ा धड़ा, विपक्ष भी साथ

पलानिस्वामी का यह बयान बयान उस समय आया है जब विपक्ष के अलावा तमिलनाडु की जनता का एक बड़ा धड़ा भी इस माँग के समर्थन में है। 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री और पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राजीव गाँधी की आत्मघाती हमलावर ने मानव बम का इस्तेमाल कर हत्या कर दी थी। हमले में श्री गाँधी और हमलावर तेनमोली राजरत्नम के अतिरिक्त 13 और लोगों की भी मृत्यु हो गई थी। उस समय वह तमिलनाडु के ही श्रीपेरुम्बुदुर में लोकसभा निर्वाचन के लिए प्रचार कर रहे थे।

मामले के षड्यंत्रकारियों के खिलाफ टाडा एक्ट के तहत मुकदमा चला था। सभी 26 आरोपियों को चेन्नै की टाडा अदालत ने 1998 में मृत्युदंड दिया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट में केवल चार मुख्य आरोपियों को मृत्युदंड कायम रखा गया। उनमें से भी नलिनी नामक महिला आरोपी को कॉन्ग्रेस की पूर्व अध्यक्षा और राजीव गाँधी की विधवा श्रीमती सोनिया गाँधी की पैरवी पर मृत्युदंड की बजाय उम्रकैद की सजा सुना दी गई। बाकी तीन आरोपियों के मृत्युदंड पर 2011 में मद्रास हाईकोर्ट ने आठ हफ़्तों की रोक लगा दी

पिछले सितंबर से ही राज्यपाल के पास प्रस्ताव लंबित

तमिलनाडु के कैबिनेट ने पिछले सितंबर में ही इस मामले में जेल में बंद सात आतंकियों मुरुगन, संतन, पेरारिवालन, जयकुमार, रविचंद्रन, रॉबर्ट पायस और नलिनी को रिहा करने के लिए प्रस्ताव पारित कर दिया था। पत्रकारों से बात करते हुए पलानिस्वामी ने यह कहा कि वह प्रस्ताव आम जनता की भावनाओं के अनुरूप ही था। उन्होंने आगे का निर्णय राज्यपाल के द्वारा लिए जाने की भी बात कही। राजीव गाँधी की हत्या की बरसी कल 21 मई को ही है।

साक्षरता और शिक्षा के बीच का फ़र्क़ भूल ‘सबसे बड़े दलित नेता’ ने BJP के वोटरों को कहा अशिक्षित

भाजपा से कॉन्ग्रेस में गए नार्थ-वेस्ट दिल्ली के सांसद उदित राज ने नया राग छेड़ा है। भाजपा द्वारा उनका टिकट काटने के पीछे का एक कारण यह भी था कि वह ग़लतबयानी को लेकर मशहूर हो चुके थे। अपने ही पार्टी के बड़े नेता योगी आदित्यनाथ पर निशाना साधने से लेकर भाजपा के विरोध में आयोजित रैली का हिस्सा बनने तक, ख़ुद को देश का सबसे बड़ा दलित नेता बताने वाले उदित राज को भाजपा ने भाव देना बंद कर दिया और अंततः उन्हें पार्टी छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। उदित राज के जाने से भाजपा को कोई नुकसान नहीं हुआ क्योंकि शायद ही किसी क्षेत्र में उनका जनाधार हो। लेकिन हाँ, इससे कॉन्ग्रेस को सिद्धू के अलावा एक नया बयानवीर ज़रूर मिल गया। उदित राज ने अब फिर से बिना सिर-पैर वाली बात की है।

उन्होंने ट्विटर पर लिखा कि केरल में भाजपा आज तक एक भी सीट इसीलिए नहीं जीत पाई क्योंकि वहाँ के लोग अंधभक्त न होकर शिक्षित हैं। ऐसे अजीबोग़रीब कारण देने के साथ ही उदित राज ने यह भी साबित कर दिया कि उन्हें साक्षरता (Literacy) और शिक्षा (Education) के बीच का कोई अंतर पता नहीं है। अर्थात, किसे शिक्षित कहा जाता है और किसे साक्षर, इस बारे में उन्हें कुछ नहीं पता। सबसे पहले उन्हें इन दोनों का अर्थ समझना चाहिए, उसके बाद हम उनके इस बिना सिर-पैर वाले बयान के दूसरे पहलुओं की चर्चा करेंगे। असल में राजनीति में लगभग अप्रासंगिक हो चुके उदित राज ने राजनाथ सिंह से भाजपा का टिकट पाने के लिए पैरवी भी की थी लेकिन वो असफल रहे। अगर जेएनयू से पढ़ कर ऐसे बयान देना शिक्षित होने की पहचान है तो उदित राज जैसी शिक्षा किसी को न मिले।

उदित राज अब शिक्षित हो गए हैं। फरवरी 2014 से लेकर अप्रैल 2019 तक वह अशिक्षित थे। जी हाँ, आपने बिलकुल सही सुना। शिक्षा की उदित राज वाली परिभाषा के अनुसार वे अब कॉन्ग्रेस में जाकर शिक्षित हुए हैं। अगर भाजपा को वोट भर देने वाला व्यक्ति अशिक्षित है तो फिर भाजपा में पाँच वर्ष रह कर मलाई चाँपने वाले को क्या कहा जाए? क्या उदित राज अपनी परिभाषा में ख़ुद को फिट करते हुए स्वयं को सबसे बड़ा मूर्ख, अज्ञानी और अशिक्षित समझते हैं? साक्षरता दर को शिक्षा और शिक्षित से जोड़ कर कन्फ्यूजन के पुजारी बन चुके उदित राज का ये ट्वीट उनके बड़बोलेपन के सिवा और कुछ नहीं।

साक्षर होने का अर्थ होता है लिखने एवं पढ़ने की क्षमता होना। अर्थात, अगर मैं अपनी भाषा में लिखने और पढ़ने की क्षमता रखता हूँ, तो मैं साक्षर कहलाऊँगा। वहीं दूसरी तरफ़ शिक्षित होने का अर्थ है कि किसी व्यक्ति के पास कौन-सा स्किल है और उसने किस कक्षा या कोर्स की पढ़ाई कहाँ तक की है। इसका मतलब यह हुआ कि हर शिक्षित व्यक्ति साक्षर होता है लेकिन ज़रूरी नहीं है कि प्रत्येक साक्षर व्यक्ति शिक्षित हो ही हो। केरल साक्षरता के मामले में पूरे भारत में पहले स्थान पर आता है, शिक्षा के मामले में नहीं। उच्च शिक्षा के मामले में केरल टॉप पर नहीं आता।

अगर उच्च शिक्षा में ग्रॉस एनरोलमेन्ट रेश्यो (Gross Enrollment Ratio) की बात करें तो तमिलनाडु पूरे देश में नंबर एक पर आता है। इसके बाद दिल्ली और चंडीगढ़ का स्थान आता है। दिल्ली में अभी लोकसभा की सातों सीटों पर भाजपा काबिज़ है, यहाँ भाजपा की सरकार भी रही है और चंडीगढ़ में भी भाजपा की सांसद हैं। लेकिन, क्या किसी पार्टी के जीतने या न जीतने का यही पैमाना होता है क्या? अगर उदित राज की ही परिभाषा चुनें तो हम कह सकते हैं कि उच्च शिक्षा प्राप्त लोग भाजपा को पसंद करते हैं। लेकिन नहीं, ये परिभाषा ही ग़लत है। अगर साक्षरता की भी बात करें तो केरल के बाद टॉप पाँच में आने वाले राज्य जैसे कि गोवा और त्रिपुरा में भाजपा की सरकार है। शीर्ष पाँच में एक अन्य राज्य मिजोरम में राजग की सरकार है।

केरल की साक्षरता को भाजपा द्वारा वहाँ विफल रहने को जोड़ने उदित राज की राजनीतिक नासमझी के साथ-साथ साक्षरता और शिक्षा के बीच अंतर न समझ पाने की क्षमता का भी परिचायक है। दिल्ली में तो लोगों ने भाजपा के टिकट पर उन्हें जीत दिलाई, इसका अर्थ उन्हें वोट करने वाली जनता शिक्षित नहीं थी क्या? उदित राज ने यह नहीं लिखा कि केरल के लोग ज्यादा शिक्षित हैं और न ही ये लिखा कि वहाँ साक्षरता दर ज्यादा है, उन्होंने लिखा कि ‘केरल के लोग शिक्षित हैं’। तो क्या उनका इशारा यह था कि बाकी भारत के लोग अशिक्षित हैं? अगर भाजपा को वोट करने वाले अशिक्षित हैं तो पूरे भारत की जनता ही उनकी नज़र में अशिक्षित हो गई?

भारत में एक बड़ी आबादी अभी भी साक्षरता से दूर है, शिक्षा से दूर है, उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाती है। ख़ुद को दलित नेता बताने वाले उदित राज को उनका मज़ाक नहीं उड़ाना चाहिए। इसमें एक बड़ी संख्या दलितों की है। अगर वह ख़ुद को सबसे बड़ा दलित नेता मानते हैं तो उनके भले के लिए, उनके लिए चल रही योजनाओं के लिए आवाज़ उठानी चाहिए। अशिक्षा को भाजपा व किसी पार्टी से जोड़ने से पहले उन्हें जानना चाहिए कि व्यक्ति शिक्षित हो या अशिक्षित, उसे अपनी समझ के आधार पर किसी भी पार्टी को वोट देने का अधिकार है। हो सकता है कि किसी निरक्षर या व्यक्ति को बरगला लिया जाए लेकिन ऐसी भी कोई रिसर्च सामने नहीं आई है जहाँ ये लिखा हो कि साक्षर व्यक्ति पैसे लेकर वोट नहीं करता।

साक्षरता से पढ़ने और लिखने की क्षमता आती है, शिक्षा से समझ आती है। आज उदित राज भले ही अशिक्षा को भाजपा से जोड़ रहे हों लेकिन ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने आतंकवाद और नक्सलवाद को भी अशिक्षा से जोड़ा है। जब उन्हें दुनिया भर के शीर्ष आतंकियों की डिग्रियों और अकादमिक रिकॉर्ड्स के बारे में बताया जाता है तो उनकी घिग्घी बंध जाती है। अगर उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति भी आतंक का रुख कर सकता है तो क्या ये कहना सही है कि अशिक्षा के कारण आतंकवाद फ़ैल रहा है। ठीक इसी तरह, अगर कोई मतदाता भाजपा को वोट देता है तो वह शिक्षित है या अशिक्षित, इस बात का पता कैसे लगाया जा सकता है?

अगर केरल में साक्षरता दर सबसे ज्यादा है तो खूँखार वैश्विक आतंकी संगठन आईएसआईएस से जुडी गतिविधियाँ भी इसी राज्य में सबसे ज्यादा देखी जा रही हैं। अगर केरल की साक्षरता दर सबसे ज्यादा है तो भारत में आईएसआईएस में शामिल होने वालों की संख्या भी इसी राज्य से सबसे ज्यादा है। 2016 में राज्य के 21 लोग आतंकी बन गए थे, जिनमें से 5 आईएस के लिए लड़ते हुए मारे गए। क्या साक्षरता दर से इन समस्याओं का समाधान हो जाता है? क्या भाजपा को वोट देने या न देने से इसका कोई सम्बन्ध है?

ऐश्वर्या, अभिषेक और सलमान: विवेक ओबरॉय ने तीनों के साथ की छिछोरापंती, जम कर हुए ट्रोल

मतदान का आखिरी चरण सम्पन्न होने के बाद रविवार (19 मई 2019) को हर न्यूज चैनल ने एग्जिट पोल दिखाकर खूब टीआरपी बटोरी। 10 में से 9 एग्जिट पोल ने दोबारा मोदी सरकार के आने का दावा किया। सोशल मीडिया पर यूजर्स ने एग्जिट पोल के अनुमानों पर जमकर डिस्कशन किया। तरह-तरह के मीम बने जो जगह-जगह वायरल हुए। ऐसे में भाजपा के स्टार प्रचारक और नरेंद्र मोदी की बायोपिक में उनकी भूमिका निभाने वाले बॉलीवुड अभिनेता विवेक ओबरॉय ने भी ‘एग्जिट पोल’ के नाम पर कुछ क्रिएटिव करने की कोशिश की, लेकिन ट्विटर पर उन्हें बुरी तरह ट्रोल होना पड़ा। और होते भी क्यों न? हरकत ही उन्होंने इतनी ओछी की।

विवेक ओबरॉय ने एग्जिट पोल आने के एक दिन बाद यानी सोमवार को ट्विटर पर एक मीम शेयर किया। जिसका क्रेडिट उन्होंने पवन सिंह को दिया है। इस मीम को शेयर करके उन्होंने अपनी सह-अभिनेत्री ऐश्वर्या राय के बीते कल को उछालने का प्रयास किया। इस मीम में ऐश्वर्या की तीन तस्वीरें हैं। एक में वो सलमान खान के साथ, दूसरी में विवेक के साथ और तीसरी में अभिषेक बच्चन के साथ हैं।

विवेक द्वारा शेयर इस मीम में सलमान के साथ ऐश्वर्या की तस्वीर को ‘ओपिनियन पोल’ बताया गया, खुद के साथ की तस्वीर को ‘एग्जिट पोल’ बताया गया और अभिषेक के साथ वाली तस्वीर को ‘रिजल्ट’ दर्शाया गया। हालाँकि इस तस्वीर पर लिखा पोस्ट देखकर हम अंदाजा लगा सकते हैं कि उन्होंने अपनी छिछोरी हरकत को बहुत सामान्य समझकर शेयर किया। इस पर उन्होंने “Haha! creative! No politics here….just life” जैसा लाइट कैप्शन भी दिया लेकिन सोशल मीडिया पर मौजूद यूजर्स ने इसे गंभीरता से लिया और इस हरकत के लिए उन्हें आड़े हाथों ले लिया।

एक महिला के बीते कल को लेकर मजाक बनाने पर लोगों ने उन्हें जमकर सुनाया। रोहित जैसवाल नाम के शख्स ने खुद को उनका (विवेक) का फॉलोअर बताते हुए उन्हें समझाया कि वो इस तरह की तस्वीरों को डिलीट कर दें, क्योंकि ऐसा करना वाकई किसी महिला की छवि को बिगाड़ने वाली हरकत के बराबर है।

ट्विटर पर सामाजिक कार्यकर्ताओं से लेकर बड़े पत्रकारों ने विवेक की इस हरकत की आलोचना की। किसी ने उनकी इस हरकत को शर्मसार करने वाला बताया तो किसी का मानना है कि वो अब तक अपने बीते कल से उबर नहीं पाए हैं इसलिए ऐसी हरकतें कर रहे हैं।

मीम का प्रयोग करके किसी की जिंदगी को लेकर निजी भड़ास निकालना विवेक को बहुत भारी पड़ा। लोगों ने उनकी इस हरकत पर यहाँ तक बोल दिया कि ये शर्म की बात है कि उन्होंने माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक में उनका किरदार निभाया है।

मिशन खिचड़ी सरकार: पवार ने दिया नायडू को झटका, मायावती नहीं मिलेंगी सोनिया से

एग्जिट पोल्स के सामने आने के बाद विपक्ष नए सिरे से अपनी रणनीति तैयार करने में लगा हुआ है। जहाँ इससे पहले तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर ख़ासे सक्रिय थे, अब आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू जोड़-तोड़ की कोशिश में दिख रहे हैं। ताज़ा ख़बर के अनुसार, नायडू ने महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री शरद पवार से मुलाक़ात की है। एनसीपी सुप्रीमो ने हालाँकि अपना रुख अस्पष्ट रखा है। उनकी पार्टी यूपीए का हिस्सा ज़रूर है लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन को 48 में से 38 सीटें तक मिलती दिखाई जा रही है, इससे उनकी बेचैनी बढ़ गई है। उनके गढ़ बारामती में अमित शाह के ज़ोरदार प्रचार अभियान ने उन्हें पहले ही चिंतित कर रखा था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, शरद पवार ने फाइनल नतीजों से पहले किसी भी प्रकार की विपक्षी बैठक में हिस्सा न लेने का फ़ैसला लिया है। उन्होंने नायडू से साफ़-साफ़ कह दिया कि वो चुनाव परिणाम आने के बाद ही इस सम्बन्ध में कोई भी निर्णय लेंगे। नायडू अब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाक़ात करेंगे। विपक्षी एकता के सूत्रधार बनने के चक्कर में राज्यों का दौरा कर रहे नायडू ने राहुल गाँधी से भी पिछले 2 दिनों में 2 बार मुलाक़ात की है। यूपीए अध्यक्षा सोनिया गाँधी के साथ उनकी बैठक प्रस्तावित है, जिसमें आगे की रणनीति बनाई जाएगी।

इतना ही नहीं, नायडू ने माकपा नेता सीताराम येचुरी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल से मुलाक़ात की थी। कॉन्ग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी के साथ भी उनकी मुलाक़ात हुई है। एग्जिट पोल्स में आम आदमी पार्टी को शून्य से एक सीटें दी जा रही हैं, ऐसे में अगर नतीजे यही रहे तो पार्टी की नई सरकार बनाने में कोई भूमिका नहीं रहेगी। बीते दिनों में नायडू ने उत्तर प्रदेश के दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों अखिलेश यादव और मायावती से मुलाक़ात की। मायावती के साथ बैठक के बाद उन्हें गिफ्ट में आम मिला था। नायडू की कोशिश है कि नतीजे आने के तुरंत बाद हड़बड़ी न हो, इसीलिए पहले ही बैठक कर के विपक्षी दलों को एक कर लिया जाए।

इधर बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपना दिल्ली दौरा आज रद्द कर दिया। आज उनकी कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी से मुलाक़ात होने की बात कही जा रही थी लेकिन नतीजों को देखते हुए उन्होंने लखनऊ में ही रहने का निर्णय लिया है। बसपा ने साफ़ कर दिया कि उनकी कॉन्ग्रेस के नेताओं से कोई मुलाक़ात नहीं होगी। मायावती ने चुनाव प्रचार अभियान के दौरान भाजपा और कॉन्ग्रेस के साथ समान दूरी बनाए रखने की बात कही थी। उधर तृणमूल प्रमुख ममता ने भी विपक्षी नेताओं से एक रहने की अपील की है। एग्जिट पोल्स की मानें तो राजग को पूर्ण बहुमत मिल रहा है और पूरा विपक्ष एक हो जाए, फिर भी खिचड़ी सरकार की कोई संभावना नहीं बनती।

EVM को सही साबित करने के लिए 3 राज्यों में कॉन्ग्रेस के जीत की रची गई थी साजिश: राशिद अल्वी

कॉन्ग्रेस नेता राशिद ने एग्जिट पोल और चुनाव परिणाम को लेकर एक बयान देते हुए कहा कि अगर एग्जिट पोल के नतीजे सही साबित हुए, तो इसका मतलब ईवीएम में धांधली हुई है। उनका कहना है कि सभी एग्जिट पोल में एकतरफा नतीजे दिखाए जा रहे हैं, इसलिए वो उस पर भरोसा नहीं कर रहे।

इसके साथ ही, उन्होंने कहा कि अगर चुनाव परिणाम एग्जिट पोल की तरह ही आते हैं, तो इसका मतलब पिछले साल तीन राज्यों के चुनाव में कॉन्ग्रेस जहाँ-जहाँ जीती थी, वह एक साजिश थी। यानी कि पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव के दौरान मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कॉन्ग्रेस की जीत को राशिद अल्वी साजिश मानते हैं। उनका मानना है कि तीन राज्यों में कॉन्ग्रेस की जीत के साथ ये भरोसा दिलाने की कोशिश की गई कि ईवीएम सही है, साथ ही उन्होंने ये भी साबित करने की कोशिश की कि सरकार, चुनाव आयोग के मामले में कोई दखलअंदाजी नहीं करती है।

कल (मई 19, 2019) लोकसभा चुनाव संपन्न हो गया। नतीजे 23 मई को आने वाले हैं, लेकिन विपक्ष का ईवीएम को लेकर रोना-धोना शुरू हो गया है। कल मतदान समाप्त होने के बाद कुछ मीडिया संस्थानों द्वारा एग्जिट पोल प्रसारित किया गया, जिसमें भाजपा सरकार के एक बार फिर से बहुमत के साथ सत्ता में आने की संभावना जताई गई। इस एग्जिट पोल के बाद तो विपक्ष का और भी बुरा हाल हो गया।

हालाँकि एग्जिट पोल का चुनाव के नतीजे से कोई लेना-देना नहीं होता है और इस पर विश्वास करना भी मुश्किल होता है, मगर इसके बावजूद ऐसा लग रहा है, जैसे विपक्ष ने इसे ही फाइनल रिजल्ट मान लिया है और हार भी स्वीकार कर ली है। तभी तो अपने आप ही वो हारने की वजह गिनवाने में जुट गई है और पिछली बार की तरह ही एक बार फिर से ईवीएम पर दोषारोपण करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही। चूँकि लगभग हर एग्जिट पोल में एनडीए को बहुमत मिलते हुए दिखाया गया है, तो विपक्ष का इस पर तिलमिलाना भी लाजिमी है।

ABP-Nielsen Exit Poll: BJP की आती ज्यादा सीटें लेकिन… मक्कारी व धूर्तता से ‘संघी’ लोगों को हटाया

जहाँ अधिकांश एग्जिट पोल्स ने भाजपा और एनडीए को स्पष्ट बहुमत और बढ़त दिखाया, वहीं एबीपी न्यूज़-नीलसन का सर्वे उन चुनिंदा सर्वे में है, जिनके नतीजे अलग ही दिशा में जाते दिखे। ABP-नीलसन और NewsX-Neta के अलावा, बाकी सभी के पूर्वानुमानों के मुताबिक, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को स्पष्ट बहुमत मिलता दिख रहा है। जबकि, इन दोनों के द्वारा किए गए एग्जिट पोल में BJP-NDA क्रमशः 267 और 242 पर सिमट रहे हैं।

डूबते को तिनके का सहारा और ग़ालिब के दिल बहलाने वाले ख्वाब की तरह स्वघोषित प्रजाति के बहुत सारे लिबरल्स ABP सर्वे के सहारे उम्मीद लगाए बैठे हैं।

लेकिन, इस सर्वे की सच्चाई कुछ और ही है और यह सच्चाई खुद नीलसन के ही अधिकारी ABP न्यूज़ पर बताते नज़र आए।

‘ज्यादा भाजपा-भाजपा करने वालों को हमने अपने सर्वे में शामिल नहीं किया’

नीलसन में निदेशक पद पर तैनात उमेश झा से जब एंकर ने यह सवाल पूछा कि कैसे उन्हीं के सर्वे में BJP-NDA को बहुमत की कमी पड़ रही है, जबकि बाकी चैनल के एग्जिट पोल्स में तस्वीर बिल्कुल इसके विपरीत है, तो वह बगलें झाँकते नज़र आए। फिर उन्होंने बताया कि वह यह मान कर चल रहे थे कि भाजपा का वोट शेयर तो बढ़ने वाला है ही नहीं- इसलिए उन्होंने उन सभी लोगों के जवाबों को ख़ारिज कर दिया, जिन्होंने यह कहा कि उन्होंने पिछली बार तो भाजपा (या किसी अन्य राजग घटक दल) को वोट नहीं दिया था मगर इस बार दे रहे हैं। उनके मुताबिक, ऐसे लोग ‘डर के मारे’ झूठ बोले, जबकि असल में ऐसा नहीं हुआ होगा। उन्होंने अंदर जाकर EVM पर किसी भाजपा-विरोधी पार्टी का ही बटन दबाया होगा। हालाँकि, वो ये नहीं समझा पाए कि इस नतीजे पर वो किस गणित या फिर चमत्कारित सिद्धांत से पहुँचे?

पहले भी आँकड़ों के विवाद में फँस चुकी है नीलसन  

आँकड़ों का ही व्यापार करने वाली नीलसन गलत आँकड़ों के मामले में पहले भी फँस चुकी है। बिहार में 2015 में हुए विधानसभा चुनावों में मतगणना वाले दिन सुबह-सुबह उसने 18 चैनलों को कथित तौर पर गलत आँकड़े दे दिए थे, जिससे भाजपा को आगे दिखाया जाने लगा था। बाद में जब मतगणना पूरी हुई, तो BJP-NDA हार गए और महागठबंधन की जीत हुई। कई न्यूज़ चैनलों को गलत शुरुआती रुझान दिखाने के लिए शर्मिन्दगी का सामना करना पड़ा था। एनडीटीवी के मालिक प्रणय रॉय ने गलत रुझान दिखाने के लिए बिना नाम लिए ठीकरा नीलसन के ही सिर पर फोड़ा था। उस समय भी नीलसन के निदेशक उमेश झा ही थे और अपनी सफाई में उन्होंने कहा था कि टाइम्स नॉउ और डीडी न्यूज़ को छोड़कर बाकी चैनलों ने उनके आँकड़ों के अलावा और भी स्रोतों का इस्तेमाल किया था, इसलिए इस त्रुटि के लिए नीलसन को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता

‘लाडले’ को बचाने के लिए ठीकरा कहाँ-कहाँ फोड़ा जाएगा? Exit Polls के बाद गिरोह तैयार

अगर सारे एग्जिट पोल्स की मानें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में पूर्ण बहुमत के साथ राजग की सरकार बनने जा रही है। एग्जिट पोल को जहाँ विपक्ष एक महज अनुमान बता रहा है, मीडिया के गिरोह विशेष इसको लेकर दो फाड़ हो गए हैं। जहाँ मीडिया का एक धड़ा भाजपा के कथित प्रोपेगेंडे पर विश्वास करने को लेकर जनता को ही गालियाँ देने में लगा हुआ है, वहीं दूसरा धड़ा कॉन्ग्रेस को कड़ी टक्कर न देने के लिए घेर रहा है। उसे अपनों से ही शिकायत है क्योंकि कॉन्ग्रेस ने ‘उस तरह से’ लड़ाई नहीं लड़ी, ‘जिस तरह से’ गिरोह विशेष चाहता था। एग्जिट पोल्स तो आ गए लेकिन मीडिया के गिरोह विशेष के साथ-साथ विपक्ष की तरफ़ से भी कुछ रुझान आ रहे हैं, जिसके आधार पर हम ये तय करने में सक्षम हैं कि इनकी नज़र में हार का कारण क्या होगा।

जैसा कि हमें पता है, मीडिया का गिरोह विशेष और विपक्ष कभी भी मोदी लहर को स्वीकार नहीं करेगा। ये लोग न तो प्रधानमंत्री की लोकप्रियता को मानने को तैयार होंगे और न ही भाजपा की कुशल रणनीतिक व राजनीतिक क्षमता को स्वीकार करेंगे। ईवीएम को लेकर रोना चालू होगा, मणिशंकर अय्यर और सैम पित्रोदा पर बिल फाड़े जाएँगे, मीडिया के उस धड़े को मोदी से ‘कड़े सवाल’ न पूछने के लिए गालियाँ दी जाएँगी और विपक्ष को एकता बनाए रखने में विफल रहने के लिए भी ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा। कुल मिलकर देखें तो पीएम मोदी और भाजपा की प्रशंसा करना छोड़ कर सारी चीजों को मोदी की जीत के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा।

ईवीएम का रोना चालू आहे

ईवीएम को लेकर विपक्ष का रोना तो तभी चालू हो गया था, जब चुनाव शुरू भी नहीं हुए थे। सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग से लेकर जनता तक, विपक्ष ने ईवीएम का बहाना लेकर हर संस्था के बीच अपनी बात रखने की कोशिश की। इनके इस कुप्रचार अभियान से लग रहा था, इस बात का पूरा प्रयास किया गया कि ईवीएम को भाजपा व संघ का कार्यकर्ता ही क्यों न घोषित कर दिया जाए। लंदन में नकाबपोश से प्रेस कॉन्फ्रेंस करवाई गई। तरह-तरह के बहाने लेकर कभी ब्लूटूथ वाई-फाई से ईवीएम हैक करने की बात कही गई। लेकिन अंततः, सुप्रीम कोर्ट से भी इन्हें भाव नहीं मिला। कोर्ट ने प्रति विधानसभा 5 बुथों पर वीवीपैट पर्चियों के मिलान का निर्देश देते हुए विपक्ष की माँग को नकार दिया। चुनाव आयोग पहले भी कहता रहा है कि किसी मशीन में कुछ गड़बड़ियाँ आ जाना और उसे हैक कर लेना, ये दो अलग-अलग चीजें हैं।

आंध्र के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ईवीएम के विरोध में ख़ासी मुखर हैं। दोनों ही अपने-अपने राज्यों को अपना अभेद्द किला मानते थे, और एग्जिट पोल्स के हिसाब से इन दोनों ही राज्यों में इनका किला ध्वस्त होने की कगार पर है। एग्जिट पोल्स के हिसाब से नायडू और रेड्डी में से कोई भी आंध्र का मुख्यमंत्री बन सकता है और जगनमोहन रेड्डी नाकाम भी रहे तो आंध्र की अच्छी-ख़ासी लोकसभा सीटों को जीत कर नायडू के किंगमेकर बनने के सपने को तो ध्वस्त करते दिख ही रहे हैं। राज्य में विधानसभा चुनाव भी साथ में ही संपन्न हुए हैं। वहीं बंगाल में वाम के अप्रासंगिक होने के बाद ममता बनर्जी के गढ़ में भाजपा बड़ी ताक़त बन कर उभरी है और कुछ एग्जिट पोल्स में भाजपा को तृणमूल से भी आगे दिखाया गया।

ईवीएम को लेकर सबसे ज्यादा चिंता में वही लोग हैं, जहाँ राष्ट्रीय मीडिया में ख़बरें फ़िल्टर होकर आती हैं। बंगाल में मीडिया के लोगों कोई ही पिटाई की जाती है, आंध्र में नायडू अधिकतम सीटें जीत कर किंगमेकर बनना चाहते थे। तभी उन्होंने पिछले 2 दिनों में अध्यक्ष राहुल गाँधी से मुलाक़ात की। ईवीएम को लेकर वही परेशान हैं, जिनके दिवास्वप्न धराशायी हो चुके हैं। आम आदमी पार्टी भी ईवीएम के विरोध में ख़ासी मुखर है क्योंकि पार्टी के लिए लोकसभा में अस्तित्व का संकट आ खड़ा हुआ है। एग्जिट पोल्स में पंजाब और दिल्ली में उसे शून्य से 1 सीट दी जा रही है, यानी पार्टी के लिए इस बार खाता खोलना भी मुश्किल है।

मणिशंकर और पित्रोदा पर बिल फाड़ा जाएगा

बुधवार (मई 15,2019) को झारखण्ड के देवघर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक रैली हुई। इस रैली में प्रधानमंत्री ने सैम पित्रोदा और मणिशंकर अय्यर के बयानों को लेकर दोनों ही नेताओं को घेरा। जहाँ अय्यर ने मोदी की नक़ल करते हुए कैमरे के सामने अजीब तरीके से व्यवहार किया वहीं पित्रोदा ने 1984 सिख नरसंहार को लेकर ‘हुआ तो हुआ’ कहा। मोदी ने इस रैली में कहा,

विपक्षी पार्टी ने नामदार को बचाने के लिए दो बल्लेबाज खड़े किए हैं। पार्टी ने चुनाव में ख़राब प्रदर्शन की जिम्मेदारी लेने का काम इन दोनों को सौंपा है। एक 1984 के सिख विरोधी दंगों पर कहता है ‘हुआ तो हुआ’ जबकि दूसरा, गुजरात चुनाव के दौरान मुझे अपशब्द कहने के बाद से पर्दे के पीछे थे। वह अब फिर से मुझ पर हमला कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस बयान के पीछे भाव यह था कि हार की ज़िम्मेदारी राहुल गाँधी को न लेनी पड़े, इसके लिए इन दोनों नेताओं पर ठीकरा फोड़ा जाएगा। अगर ऐसी स्थिति आती है कि राहुल गाँधी को हार की जरा सी भी ज़िम्मेदारी लेनी पड़े (जो कि उन्हें लेनी चाहिए क्योंकि उन्होंने 125 रैलियाँ की हैं), इस स्थिति से बचने के लिए मीडिया का राहुल प्रशंसक धरा और कॉन्ग्रेस पार्टी अय्यर और पित्रोदा को बलि का बकरा बना सकते हैं। कुल मिलाकर कोशिश यह की जाएगी कि राहुल गाँधी पर कोई ऊँगली न उठे और अगले कुछ महीनों में अगर किसी यूनिवर्सिटी चुनाव में कॉन्ग्रेस को थोड़ी-बहुत सीटें आ जाती हैं तो इसे राहुल की वापसी या कमबैक की तरह प्रचारित किया जा सके।

और, यह कार्य करेंगे कौन? साधारण पंचायत और वार्ड चुनाव में भाजपा की हार के लिए सीधे मोदी को ज़िम्मेदार ठहराने वाले कॉन्ग्रेस की हार के लिए उसके अध्यक्ष को ज़िम्मेदार नहीं मानेंगे, भले ही उन्होंने 125 रैलियाँ की हो। अगर इतने बड़े स्तर पर दौरा करने के बावजूद भी उन्हें वोट नहीं मिलते हैं तो ये नहीं कहा जाएगा कि जनता के बीच उनकी अस्वीकार्यता है, इसे भी पित्रोदा और अय्यर के पल्ले डाल दिया जाएगा। मीडिया भी यही कहेगी कि इनके बयानों से कॉन्ग्रेस को नुकसान हुआ है। अगर इन दोनों नेताओं के बयानों से पार्टी को कुछ सीटों का नुकसान हुआ भी है तो बड़े स्तर पर हुए नुकसान की ज़िम्मेदारी किसकी? नहीं, पार्टी अध्यक्ष की नहीं।

मीडिया ने भाजपा की मदद की

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे चुनाव के दौरान कई मीडिया एजेंसियों व सस्थानों को साक्षात्कार दिए। साल की शुरुआत ही एएनआई को दिए गए उनके साक्षात्कार से हुई। इतने सारे इंटरव्यू के अलावा उनका एक ग़ैर-राजनीतिक इंटरव्यू अभिनेता अक्षय कुमार ने भी लिया। क्या किसी को विश्वास हो सकता है कि क़रीब 20 मीडिया संस्थानों ने प्रधानमंत्री का इंटरव्यू लिया हो, और उनसे कड़े सवाल न पूछे गए हों? हिंदुस्तान और नवभारत टाइम्स जैसे अख़बारों से लेकर एबीपी न्यूज़ और न्यूज़ नेशन जैसे टीवी न्यूज़ चैनलों तक, तमान मीडिया संस्थानों ने पीएम के इंटरव्यू लिए और राफेल से लेकर साध्वी प्रज्ञा तक, उनसे हर एक विवाद से लेकर आरोपों तक पर सवाल पूछे गए।

राफेल पर सुप्रीम कोर्ट से क्लीन चिट मिलने के बावजूद पीएम से सवाल पूछे गए। साध्वी प्रज्ञा के विवादित बयान को लेकर उनसे पूछा गया। विपक्ष के तमाम आरोपों को लेकर उन पर सवालों की बौछाड़ की गई लेकिन रवीश कुमार जैसे कुछ पत्रकार और लिबरल ‘कड़े सवाल-कड़े सवाल’ का रोना रोते रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से किस तरह के सवाल पूछे जाने चाहिए थे, ये किसी ने स्पष्ट नहीं किया। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी तक तमाम नेता मीडिया के सवालों का जवाब देने के लिए मुस्तैद दिखे, करण थापर सरीखों ने गडकरी से कथित ‘मॉब लिंचिंग’ पर सवाल भी पूछे, फिर भी गिरोह विशेष को शिकायत है।

कारण स्पष्ट है। कॉन्ग्रेस की बुरी हार हो रही है और अगर पार्टी को रेस में बने रहना है तो राहुल गाँधी को मीडिया का लाडला बनाए रखना होगा, उन्हें लिबरलों का संरक्षण मिलते रहना चाहिए। अगर नहीं, तो इस गिरोह के लिए कोई अन्य नेता है कहाँ? अरविन्द केजरीवाल तमाम ‘क्रान्तिकारी’ इंटरव्यू और प्रचार के बावजूद लोकसभा में अपनी पार्टी के अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं। गिरोह विशेष दूसरा लाडला लाए भी तो कहाँ से लाए? लाडले को बचाने के लिए हार के अजीब-अजीब कारण गिनाए जाएँगे लेकिन राहुल की ‘इमेज’ पर आँच न आए, इसका ध्यान रखा जाएगा। मोदी की तारीफ़ तो भला करनी ही नहीं है, चाहे उन्हें कितनी ही बड़ी जीत क्यों न मिले।

’22 दिन भी टिकना मुश्किल, MP में अल्पमत में है कमलनाथ सरकार, राज्यपाल बुलाएँ विशेष सत्र’

लोकसभा चुनाव 2019 में मतदान की प्रक्रिया समाप्त हो चुकी है और अब परिणाम का इंतजार है। कल (19 मई) को जहाँ सभी एग्जिट पोल में एनडीए को बहुमत से भी अधिक सीटें मिलने का अनुमान है वहीं कॉन्ग्रेस की हालत पतली दिख रही है।

इसी बीच मध्य प्रदेश से खबर आ रही है कि वहाँ नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने राज्यपाल को चिट्ठी लिखकर विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की माँग की है। मध्य प्रदेश में भाजपा विपक्ष में है और भार्गव के अनुसार कमलनाथ सरकार अल्पमत में आ चुकी है।

भार्गव ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “एग्जिट पोल के अनुसार एक बार फिर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं, वहीं मध्य प्रदेश में कांग्रेस को दो से तीन सीटें मिलने वाली हैं, यह इस बात का संकेत है कि मध्य प्रदेश में वर्तमान सरकार ने जनता का भरोसा खो दिया है।”

भार्गव ने यह भी कहा कि भाजपा कॉन्ग्रेस के विधायकों को खरीदने नहीं जा रही है बल्कि उन्होंने दावा किया कि बहुत से कॉन्ग्रेसी विधायक कमलनाथ से परेशान हो चुके हैं इसलिए वो भाजपा में आना चाहते हैं। इसीलिए उनकी माँग है कि विधान सभा का विशेष सत्र बुलाकर कमलनाथ को सदन में बहुमत साबित करने को कहा जाए।

इससे पहले कैलाश विजयवर्गीय कह चुके हैं कि 23 मई को चुनाव के नतीजे आने के बाद कमलनाथ सरकार 22 दिन भी रह पाएगी इसमें संदेह है। मध्य प्रदेश विधानसभा में कुल 230 सीटें हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव में 114 सीटों के साथ कॉन्ग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। निर्दलीय, सपा और बसपा के समर्थन से कॉन्ग्रेस ने सरकार बनाई थी और सिख दंगों के आरोपी कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाया था। लोकसभा चुनाव 2019 के परिणाम आने के बाद गोपाल भार्गव के दावों में कितनी सच्चाई है यह देखना होगा।

कट्टरपंथी इस्लामी संगठन से चंदा लेने वाले जिग्नेश मेवाणी ने फैलाई फेक न्यूज़, लपेटा PM मोदी को भी

वडगाम के ‘निर्दलीय’ विधायक और कॉन्ग्रेस-कम्युनिस्ट समर्थक जिग्नेश मेवानी आज (20 मई को) दोपहर सोशल मीडिया पर फेक न्यूज़ फैलाते पकड़े गए। किसी बच्चे की निर्मम पिटाई के वीडियो को पहले तो उन्होंने गुजरात के वलसाड स्थित RMVM स्कूल का बताते हुए शेयर किया। प्रधानमंत्री कार्यालय के ट्विटर हैंडल को टैग कर मोदी को लपेटने की कोशिश की और कुछ देर बाद खुद ही लोगों से पूछते नजर आए कि वीडियो हिंदुस्तान का है भी या मिस्र (ईजिप्ट) का है।

वीडियो की जाँच किए बिना शेयर करना जनप्रतिनिधि की गरिमा से नीचे

जिग्नेश मेवानी ने वीडियो शेयर करते हुए पहले लिखा, “मुझे यह संदेश मिला, ‘आप के whatsapp पे जितने भी नंबर एवं ग्रुप हैं एक भी छूटने नहीं चाहिए, ये वीडियो सबको भेजिए ये वलसाड के RMVM SCHOOL का टीचर है, इसको इतना शेयर करो कि ये टीचर और स्कूल दोनों बंद हो जाए।’ @PMOIndia, कृपया हमें बताइए यह क्या हो रहा है।” यानी उन्होंने वीडियो की सत्यता का अप्रत्यक्ष दावा करते हुए सवाल पूछा।

उसके बाद लोगों ने उनके ट्वीट के जवाब में कृत्य की भर्त्सना तो की, पर वीडियो के भारत के होने पर सवाल उठा दिए।

तब अपनी बढ़ती आलोचना पर खिसिया कर जिग्नेश मेवानी ने अपने आरोप और दावे आधे-अधूरे तौर पर वापिस लेते हुए ट्वीट कर पूछा कि यह वीडियो गुजरात की है या इजिप्ट की? विधायक साहब! अगर आपको पता ही नहीं है तो फिर देश के पीएम को संबोधित करते हुए सवाल क्यों दाग दिए थे पिछली ट्वीट में?

हमारी जाँच में पता चला कि इसी स्कूल के नाम से एक बार पहले भी पिछले साल फेक न्यूज़ फ़ैलाने की कोशिश हो चुकी है। उस समय लल्लनटॉप और ऑल्ट न्यूज़ ने इसका फैक्ट चेक कर इसे फर्जी करार दिया था। ऐसे में सवाल यह है कि अपने ही राज्य में फेक न्यूज़ और दुष्प्रचार के पहले भी शिकार हो चुके एक स्कूल के खिलाफ कुछ शेयर करने से पहले एक जनप्रतिनिधि होने के नाते मेवानी ने खुद जाँच क्यों नहीं की? या एक्ज़िट पोल के नतीजों से वह इतने सदमे में चले गए हैं कि विधायक की गरिमा और जिम्मेदारी से अब उन्हें कोई वास्ता नहीं बचा है?

आपको याद दिला दें कि जिग्नेश मेवानी ने कट्टरपंथी इस्लामी संगठन से चंदा लेकर राजनीति की पारी शुरू की थी।

अक्षय कुमार की फिल्म ‘Laxmmi Bomb’ से डायरेक्टर हुए अलग, बोला – आत्मसम्मान के लिए!

शनिवार (मई 18, 2019) को अक्षय कुमार की फिल्म ‘लक्ष्मी बम’ का पोस्टर रिलीज किया गया और इसके रिलीज होने के कुछ घंटे बाद ही फिल्म के निर्देशक राघव लॉरेंस ने फिल्म छोड़ने का ऐलान करके सबको चौंका दिया। राघव ने इस फैसले के पीछे कुछ वजह बताई हैं। हालाँकि उन्होंने ये साफ कर दिया है कि उन्हें अक्षय कुमार से कोई दिक्कत नहीं है।

राघव ने फिल्म लक्ष्मी बम को छोड़ने का ऐलान ट्विटर के माध्यम से किया। उन्होंने ट्विटर पर एक नोट लिखकर अपनी बात रखी है। इस नोट से लगता है कि राघव फिल्म के क्रिएटिव फैसलों से खुश नहीं थे। उनका कहना है कि उन्हें बिना बताए फिल्म का फर्स्ट लुक रिलीज कर दिया गया। उन्हें किसी बाहरी व्यक्ति से पता चला कि फिल्म लक्ष्मी बम का पोस्टर जारी किया गया है। राघव ने नोट शेयर करने के साथ कैप्शन में लिखा है कि इस दुनिया में, इंसान के लिए दौलत और शोहरत से ज्यादा जरूरी होता है उसका आत्मसम्मान। इसलिए उन्होंने ‘कंचना’ के हिंदी रीमेक ‘लक्ष्मी बम’ के प्रोजेक्ट से बाहर होने का फैसला किया है।

राघव ने इस नोट की शुरुआत तमिल कहावत से की है। उन्होंने लिखा है, “तमिल में एक कहावत है कि जिस घर में सम्मान ना मिले, उस घर में नहीं जाना चाहिए। इस दुनिया में दौलत और शोहरत से अधिक आत्मसम्मान जरूरी है। इसलिए मैं फिल्म ‘लक्ष्मी बम’ छोड़ रहा हूँ। मैं यहाँ कारण का खुलासा नहीं करना चाहता, क्योंकि कारण एक नहीं, कई हैं। लेकिन, उनमें से एक यह है कि फिल्म का पहला पोस्टर आज मेरी जानकारी के बिना रिलीज कर दिया गया। मुझसे इसके बारे में कोई चर्चा भी नहीं की गई। मुझे किसी तीसरे इंसान ने इसकी सूचना दी। एक निर्देशक के लिए यह बेहद दुखदायी है कि उसकी अपनी फिल्म के फर्स्ट लुक रिलीज के बारे में उसे कोई बाहरी व्यक्ति आकर बताए। मुझे यह बेहद अपमानजनक और निराशाजनक लगता है। एक रचनाशील व्यक्ति होने की वजह से मुझे पोस्टर भी अच्छा नहीं लगा। यह किसी निर्देशक के साथ नहीं होना चाहिए।”

राघव आगे लिखते हैं कि उन्होंने कोई एग्रीमेंट साइन नहीं किया है, इसलिए वो चाहें तो अपनी स्क्रिप्ट वापस ले सकते हैं, लेकिन वो ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि ये प्रोफेशल व्यवहार नहीं होगा। उन्होंने कहा कि वो अपनी स्क्रिप्ट देने के लिए राजी हैं, क्योंकि वो अक्षय कुमार का काफी सम्मान करते हैं। राघव ने कहा कि वो उन्हें हटाकर अपनी इच्छानुसार किसी दूसरे डायरेक्टर को ले सकते हैं। वो जल्द ही अक्षय कुमार से मिलकर उनको स्क्रिप्ट देंगे और फिर प्रोजेक्ट से अलग हो जाएँगे। इसके साथ ही उन्होंने पूरी टीम को शुभकामनाएँ देते हुए फिल्म के सफल होने की कामना भी की।

बता दें कि फिल्म ‘लक्ष्मी बम’ तमिल फिल्म कंचना का ऑफिशियल रीमेक है, जिसे राघव ने ही डायरेक्ट किया था। फिल्म में कियारा आडवाणी फीमेल लीड में हैं। इस फिल्म की कहानी ऐसे शख्स के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसमें एक ट्रांसजेंडर की आत्मा आ जाती है। यह फिल्म अगले साल 5 जून को रिलीज होगी।