Home Blog Page 5879

सैफई में गोबर के कंडे उठाने वाले अब ₹5 करोड़ की गाड़ियों से घूम रहे हैं: वरुण गाँधी

भाजपा नेता वरुण गाँधी ने उत्तर प्रदेश के मुलायम परिवार पर करारा निशाना साधा है। उन्होंने शनिवार (मई 4, 2019) को अपने संसदीय क्षेत्र में अपनी माँ और केंद्रीय मंत्री मेनका गाँधी के लिए चुनाव प्रचार करने के दौरान कहा कि जो लोग आज से 20 साल पहले सैफई में गोबर के कंडे उठाया करते थे, वो आज पाँच करोड़ रुपयों की गाड़ी से चल रहे हैं। वरुण ने इस दौरान इमोशनल अपील करते हुए कहा कि वो माँ के लिए वोट माँगने आए हैं। वरुण ने कहा कि वो भारत माँ के लिए वोट माँग रहे हैं। वरुण ने कहा कि आज भारत माँ आपकी तरफ देखकर आपसे पूछ रही है कि क्या आप उनके साथ हैं जिन्होंने मेरे सीने को चीरने-फाड़ने का काम किया है, यहाँ आप नरेंद्र मोदी का साथ देंगे जिसने पाकिस्तान को अपने जूते के नीचे मसलने का काम किया है।

बता दें कि वरुण गाँधी सुल्तानपुर से सांसद हैं जबकि उनकी माँ मेनका गाँधी पीलीभीत से सांसद हैं। ये दोनों ही सीटें उत्तर प्रदेश में आती हैं। इस चुनाव में भाजपा ने दोनों की सीटों को एक दूसरे से बदल दिया है। वरुण गाँधी इस बार पीलीभीत से ताल ठोक रहे हैं, वहीं मेनका गाँधी सुल्तानपुर से चुनावी मैदान में हैं। वरुण पीलीभीत से 2009 में लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं। मेनका गाँधी अभी केंद्र में महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं। इससे पहले उत्तर प्रदेश के प्रमुख नेता की तरफ इशारा करते हुए वरुण ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था:

“अगर आपने गठबंधन को जिता दिया तो यह लोग तो पाकिस्तान के आदमी हैं। किसने रामभक्तों पर गोलियाँ चलवाईं और 500 लोगों को मारा? इसलिए उनको श्राप लगा और उनके बेटे ने उन्हें जूते मारकर घर से निकाल दिया और अब पब्लिक उन्हें जूते मारकर बाहर निकालेगी।”

यादव परिवार द्वारा महँगी गाड़ियाँ प्रयोग किए जाने को लेकर वरुण ने पूछा कि क्या ये पब्लिक का पैसा नहीं है? उन्होंने पूछा कि क्या ये इनके दादा का पैसा है? वरुण ने कहा कि ये लोग देश पर कब्ज़ा कर के अपनी जेबें भरने वाली सोच रखते हैं। उन्होंने जनता से पूरे समाज को एक करने और समाज में राष्ट्रभक्ति की गूँज सुनाने को कहा, ताकि देश का झंडा नीचे नहीं हो। मेनका गाँधी के बारे में बात करते हुए वरुण ने कहा कि उनके 35 वर्ष के राजनीतिक करियर के दौरान उनपर आज तक एक भी दाग नहीं लगा।

गौतम गंभीर को दिल्ली इलेक्शन में नीचा दिखाने के लिए स्पाइन वाली मीडिया पाकिस्तान पहुँच गई

आज कल एक नए किस्म का जर्नलिज्म चला है, स्पाइन वाला जर्नलिज्म। इस तरह के जर्नलिज्म के
दो साधारण से नियम है- पहला, यदि आप मोदी से प्रश्न पूछ रहे हैं तो बिल्कुल कड़ा सवाल पूछिए। क्या खाते हैं, क्या पहनते हैं या क्या पसंद है? इस तरह के सवालों का इसमें कोई गुंजाइश नहीं है। दूसरा, यदि आप राहुल गाँधी, केजरीवाल, ममता बनर्जी से सवाल पूछ रहे हैं तो कोई भी जवाब, समाज शास्त्र, भूगोल, इतिहास और गणित सबमें चलेगा। यानी कि 12000 x 60 = 3,60,000 भी सही है, बंगाल में बूथ लूटना भी गलत नहीं है और दिल्ली-पंजाब के दलितों में भेदभाव भी चलता है।

अक्षय कुमार ने मोदी से आम पर चार सवाल पूछ लिया तो पूरा लुटियंस लंका की तरह सात दिन तक जलता रहा। रवीश कुमार दिल्ली के किसी भी गली मोहल्ले में घुसकर ठेले से आम उठा रहे थे और “ये आम है खीं खीं खीं, वो लहसून है, हें हें हें” बोल कर मोदी के इंटरव्यू का मजाक उड़ा रहे थे| मीडिया में बैठे प्यादों से लेकर वज़ीर तक हर इंसान ये समझा रहा है कि इलेक्शन के समय अक्षय कुमार आम पर सवाल पूछ कर लोकतंत्र को कैसे मूर्छित कर गए।

कुछ ज्यादा स्पाइन वाले दिग्गज जर्नलिस्ट्स तो अक्षय कुमार की नागरिकता पर अटक गए। जिन्होंने आज तक ग्लोबल जर्नलिज्म और फ़्रीडम ऑफ़ स्पीच पर ज्ञान चक्षु खोला है, उन्हें अक्षय कुमार के नागरिकता के कारण वह होस्ट के रूप में ही ओड चॉइस दिखने लगे।

वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता, जो कि एडिटर्स गिल्ड के अध्यक्ष और ‘द प्रिंट’ के प्रधान संपादक भी हैं उन्हें भी आम से अक्षय कुमार की नागरिकता एवं निष्ठा याद आ गई। ग़ौरतलब है कि अक्षय कुमार ने साफ़-साफ़ कहा था कि ये इंटरव्यू राजनीतिक नहीं है।

तमाम भारत को तानाशाही से बचाने वाले और इलेक्शन के समय देश में ज्ञान की रौशनी फ़ैलाने वाले इसी ‘द प्रिंट’ को दिल्ली इलेक्शन के समय शाहिद अफरीदी का गौतम गंभीर पर दिया गया बयान याद आ जाता है। शाहिद अफरीदी ने एक किताब प्रकाशित की है, जिसमें उन्होंने भारतीय खिलाडियों के बारे में लिखा है। द प्रिंट को इन सब में गंभीर के बारे में लिखी गयी बातें इतनी पसंद आ गयी कि इन्होंने उसे हेडलाइन ही बना दिया।


गौतम गंभीर के रिकॉर्ड पर लिखने और बोलने वाले ये लोग 2011 के वर्ल्ड कप के समय शायद फ़ीफ़ा देख रहे थे या वो मेमोरी लॉस के शिकार हैं। जहाँ तक शेखर जी की बात है, वो तो बहुत वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्हें ये भी मालूम है कि इलेक्शन के समय क्या-क्या नहीं लिखना चाहिए। वैसे, ये तो सारे स्पाइन वाले पत्रकारों को मालूम है।

ख़ैर, गौतम गंभीर का रिकॉर्ड अफरीदी, आतिशी मर्लेना, अरविन्द केजरीवाल और प्रिंट सब को पता है। उन्हें ये भी पता है कि गंभीर बोलते कम और प्रहार ज्यादा करते हैं।

राहुल गाँधी को ‘पप्पू’ न मानने वाले सैम पित्रोदा को गुजरात में क्यों नहीं दिखता विकास!

गाँधी परिवार के क़रीबी सैम पित्रोदा आए दिन अपनी टीका-टिप्पणियों के लिए विवादों में रहते हैं। एक बार फिर उन्होंने गाँधी परिवार के प्रति अपनी भक्ति दिखाते हुए राहुल गाँधी के पक्ष में बयान दिया है। अपने इस बयान के लिए उन्होंने बाक़ायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और संंवाददाताओं के सामने यह ‘ख़ुलासा’ किया कि राहुल गाँधी ‘पप्पू’ नहीं हैं, वो ‘बहुत शिक्षित और इंटेलीजेंट’ हैं।

कॉन्फ्रेन्स में पित्रोदा ने ये भी कहा कि उन्होंने राहुल के साथ एक लंबा समय व्यतीत किया है, जिसके दम पर वो ये बात कह सकते हैं कि वो पप्पू नहीं हैं। केंद्र सरकार पर हमला बोलते हुए पित्रोदा ने पीएम मोदी को भी ख़ूब कोसा। उन्होंने पीएम मोदी द्वारा राजीव गाँधी को ‘भ्रष्टाचारी नम्बर-1’ कहने पर भी कड़ी आपत्ति दर्ज की। इस पर सवालिया होते हुए उन्होंने पूछा कि राहुल गाँधी के पिता राजीव गाँधी को भष्टाचार नम्बर-1 कहने के पीछे आख़िर क्या वजह थी?

ख़ुद को गुजराती बताते हुए पित्रोदा ने पीएम मोदी को घेरते हुए कहा कि उन्होंने (मोदी) राज्य के विकास के लिए कुछ नहीं किया और केवल झूठ ही फैलाया। बीजेपी पर अपना हमलावर रुख़ क़ायम रखते हुए पित्रोदा ने नौकरी, किसानों की डबल इनकम और काले धन को भी मुद्दा बनाया।

ये बड़े दुर्भाग्य की बात है कि पित्रोदा गुजरात से हैं और उन्हें वहाँ विकास के नाम पर कुछ नहीं दिखाई देता। सम्पूर्ण विश्व में गुजरात के विकास मॉडल की चर्चा है। गुजरात में विकास को आम जनता की सहभागिता से एक विस्तृत रूप दिया गया है। गुजरात की विकास यात्रा जनता को सहभागी होने के साथ ही समावेशी भी बनाती है। हाल के वर्षों में गुजरात की उल्लेखनीय सफलता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत किया गया है। साथ ही बड़े वैचारिक समूहों एवं संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी गुजरात के विकास की सरहाना की है। इससे अधिक गुजरात के विकास पर जानने के लिए यहाँ क्लिक करें

आपको बता दें कि पित्रोदा इससे पहले भी कॉन्ग्रेस के प्रति अपनी भक्ति प्रमाणित कर चुके हैं, जब पुलवामा हमले के शिकार हुए भारतीय जवानों की बजाए उनका प्रेम पाकिस्तान पर ही उमड़ा था। जहाँ एक तरफ पुलवामा हमले की चौतरफा निंदा हो रही थी, वहीं पित्रोदा ने यहाँ तक कह दिया था कि इस हमले के लिए पूरे पाकिस्तान को दोषी ठहराना ग़लत है।

इसके अलावा मुंबई हमले (26/11) पर भी उन्होंने कहा था कि मात्र 8 लोगों ने इस हमले को अंजाम दिया था जिसके लिए पूरे देश (पाकिस्तान) पर आरोप नहीं लगाना चाहिए।

पाकिस्तान के प्रति उनका यह लगाव, उनकी सच्ची देश-भक्ति को दर्शाता है जो जगज़ाहिर है। अब वो बात अलग है कि ऐसे कितने लोग हैं जो उनकी इस देश-भक्ति को देखने में पूरी तरह से सक्षम हैं, जो यह देख सकें कि पित्रोदा का दिल किस देश के लिए सही मायनों में धड़कता है। कम से कम सोशल मीडिया पर तो इसे बड़ी ही सरलता से देखा जा सकता है।

राहुल गाँधी की ‘न्याय योजना’ को सफल बनाने के लिए भी सैम पित्रोदा ही आगे आए थे और कहा था कि मध्यम वर्ग को ज़्यादा टैक्स देने के लिए तैयार रहने की ज़रूरत है। क्योंकि उस टैक्स का इस्तेमाल न्याय योजना के लिए आर्थिक बंदोबस्त करने में लगेगा। बाद में ‘न्याय योजना’ ख़ुद ही तमाम सवालों में घिरी दिखी

इसके अलावा एक और बात सामने आई थी कि इंडियन ओवरसीज कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा को मोबाइल चलाते भारतीय भी नहीं भाते, क्योंकि उनका कहना है कि मोबाइल चलाने वाला हर भारतीय बन्दर है

यह कहना ग़लत नहीं होगा कि कॉन्ग्रेस और उनके चहेतों को मोदी राज में केवल ख़ामियाँ ही नज़र आती हैं। जबकि गाँधी-वाड्रा परिवार के अनेकों घोटाले अब सामने आ चुके हैं। भष्ट्राचार में लिप्त कॉन्ग्रेस का नाता देश में हुए लगभग हर घोटाले से है। बावजूद इसके पित्रोदा जैसे लोग जब कॉन्ग्रेस के बचाव में उतरतें हैं तो बड़ा अफ़सोस होता है। ऐसा करने से उनकी जिस इंटेलीजेंसी का पता चलता है, वो किसी से छिपी नहीं है।

अपनी धुर विरोधी पार्टी बीजेपी के ख़िलाफ़ कोई मुद्दा ना मिलता देख केवल इसी ताक में रहना कि कब मोदी क्या कह दें और उसे एक मौक़ा समझकर ये सारे लपक लें, और फिर शुरू हो जाए अनरगल बातों का दौर। मेरी नज़र में ये स्थिति बेहद हास्यास्पद है कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को पप्पू न समझने के लिए पित्रोदा जैसे समझदार व्यक्ति को प्रेस कॉन्फ़्रेंस तक करनी पड़ गई, इसी से पता चलता है कि वाकई देश में ‘पप्पू’ की कमी नहीं है।

मेरा कार्यकाल जाँच के लिए खुला था, मोदी ने युवाओं, व्यापारियों, किसानों को किया तबाह: मनमोहन

पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल को युवाओं, व्यापारियों व किसानों के लिए तबाही वाला बताया है। नरेंद्र मोदी सरकार के पाँच वर्षों का विश्लेषण करते हुए मनमोहन ने कहा कि भाजपा सरकार चलाने और जवाबदेही में विफल साबित हुई है। उन्होंने कहा कि भाजपा हर रोज एक नया नैरेटिव गढ़ रही है, यह दिखाता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर उनके पास कोई विजन ही नहीं है। उन्होंने अपने कार्यकाल की बात करते हुए कहा कि उनकी सरकार छानबीन व जाँच के लिए एकदम खुली थी लेकिन नरेंद्र मोदी की सरकार अपने ऊपर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर ख़ुद को अनुत्तरदायी मानती है।

मनमोहन सिंह ने कहा कि मोदी सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था को बुरी स्थिति में ला दिया है, इसीलिए देश आर्थिक मंदी की ओर अग्रसर है। हिंदुस्तान टाइम्स को दिए इंटरव्यू में पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा कि ऐसी सरकार को बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए। मोदी की पाकिस्तान नीति पर सवाल खड़े करते हुए उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को लेकर उनकी पॉलिसी फ्लिप-फ्लॉप पर आधारित थी। उन्होंने कहा कि मोदी पाकिस्तान तो गए ही, साथ ही उन्होंने आईएसआई को पठानकोट में निमंत्रण दिया।

डॉक्टर सिंह ने आर्थिक भगोड़ों विजय माल्या और नीरव मोदी की तरफ इशारा करते हुए कहा कि सत्ता में बैठे लोग और देश छोड़ कर भागने वालों के बीच मिलीभगत थी। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार के प्रति लोगों में भारी गुस्सा है। इससे पहले पीएम मोदी ने मनमोहन सिंह पर हमला बोलते हुए उन्हें वाचमैन और एक्टिंग पीएम बताया था। मोदी ने मनमोहन सिंह पर निशाना साधते हुए कहा था:

क्रिकेट में दिन का खेल पूरा होने का समय आख़िरी ओवर बाकी हो और एक-दो और कोई आउट होता है तो जो आखिरी नंबर का होता है उसे लाया जाता है, वह नाइट वॉचमैन का काम करता है। नाइट वॉचमैन को भेजते हैं, जो अच्छे खिलाड़ी हैं, उन्हें नहीं भेजते। कॉन्ग्रेस को 2004 में उन्होंने सोचा नहीं था, अचानक मौका मिल गया तो राजकुमार की संभालने की स्थिति नहीं थी, ख़ुद परिवार को राजकुमार पर भरोसा नहीं था। कॉन्ग्रेस को भरोसा नहीं था तो राजकुमार के तैयार होने तक परिवार का वफादार वॉचमैन बैठाने की योजना बनी। उन्होंने सोचा कि राजकुमार आज सीखेगा, कल सीखेगा, सब इंतजार करते रहे, भरपूर ट्रेनिंग देने की कोशिश भी की गई लेकिन सबकुछ बेकार हो गया।

भारत ने 20 बांग्लादेशी घुसपैठियों को असम सरकार के सहयोग से वापस भेजा

असम सरकार ने बांग्लादेश के अवैध रूप से भारत में प्रवेश करने वाले और बस जाने वाले 20 बांग्लादेशी नागरिकों को देश से निकाल दिया है। उन्हें भारत-बांग्लादेश सीमा पर बांग्लादेश के हवाले कर दिया गया है। निर्वासित होने वालों में एक महिला भी शामिल है।

सुतरकाण्डी-शेओला सीमा पर आदान-प्रदान

बॉर्डर विंग के पुलिस इन्स्पेक्टर उत्पल शर्मा ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि सुतरकाण्डी, करीमगंज (भारत)-शेओला (बांग्लादेश) की चेक पोस्ट पर इन बीस लोगों को बांग्लादेश के हवाले कर दिया गया। इन सभी पर पासपोर्ट एक्ट या फॉरेनर्स एक्ट या फिर इन दोनों के उल्लंघन का आरोप साबित हुआ था। आरोपी सिलचर जेल में बंदी था। एनडीटीवी से हुई शर्मा की बातचीत के अनुसार इनमें से अधिकाँश लोग अपने रिश्तेदारों से भेंट करने या नौकरी ढूँढ़ने आए थे।

बांग्लादेश के सिलहट और नोआखली जिलों से ताल्लुक रखने वाले इन अवैध प्रवासियों ने निर्वासन प्रक्रिया का कोई विरोध नहीं किया है। करीमगंज के एसपी मानबेन्द्र देव रॉय ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस से फोन पर बात करते हुए यह जानकारी दी। उन्होंने यह भी बताया कि जहाँ कुछ 2014 से ही भारत में हैं, वहीं अधिकाँश लोग 2015-18 के बीच आए हैं।

श्रीलंका आतंकी की हिंदू पत्नी का धर्मांतरण कर आतंक के लिए उकसाया, बनाया आतंकी

श्रीलंकाई आत्मघाती हमलावर मोहम्मद हस्थून की बेगम, पुलस्थिनी महेंद्रन (कुछ रिपोर्टों में पुलस्थिनी राजेंद्रन के रूप में भी इसका उल्लेख किया गया है) उर्फ सारा, जिसे हाल ही में श्रीलंकाई बम विस्फोटों में एक सक्रिय भागीदार माना जाता है। जो एक हिंदू निम्न मध्यम वर्ग परिवार में पैदा हुई थी और उसे धर्मांतरित कर इस्लाम कबूल कराया गया और कट्टरपंथी तालीम दी गई। ऐसा लोकप्रिय तमिल चैनल IBC तमीज़ की एक रिपोर्ट से पता चला है।

रिपोर्ट के अनुसार, पुलस्थिनी का जन्म श्रीलंका के पूर्वी प्रांत में बट्टिकलोआ जिले में स्थित थेटातिवु में एक मध्यमवर्गीय हिंदू परिवार में हुआ था और कथित तौर पर उसका अपहरण कर लिया गया था, जिसके बाद उसे धर्मान्तरित कर इस्लाम कबूल कराया गया और इस्लामी समूहों ने उसे इस कदर कट्टरपंथी बना दिया।

IBC तमीज़ का उसकी माँ कविता महेन्द्रन के साथ साक्षात्कार बताता है कि पुलस्थिनी एक होनहार छात्रा थी जो मेडिकल की पढ़ाई कर रही थी। वह स्कूल में पारंपरिक तमिल और हिंदू धार्मिक अध्ययन भी करती थी। इसी दौरान, अब्दुल रज़िक ने पुलस्थिनी का अपहरण कर लिया जब वह एक छात्रा ही थी।

कविता का दावा है कि उसने अपनी बेटी को वापस लाने की बहुत कोशिश की, लेकिन रज़िक  ने जोर देकर कहा कि पुलस्तिनी खुश है और उसने अपना निर्णय स्वयं लिया है। कुछ महीने बाद, रज़िक ने कविता को फोन करके बताया कि उसकी बेटी ने इस्लाम कबूल कर लिया है और उसकी शादी एक आदमी से कर दी गई। उसका पति मोहम्मद हस्थून को माना जाता है, जो ईस्टर संडे को सेंट सेबेस्टियन चर्च में बम विस्फोट करते हुए कैमरे में कैद हुआ था।

यहीं से कविता ने अपनी बेटी के साथ खुद को सभी संबंधों से अलग कर लिया। इसके एक महीने बाद, कविता का दावा है कि उसे अपनी परेशान बेटी का फोन आया जिसने कहा कि वह जीवन में बहुत दुखी है और वह पूरी तरह टूट चुकी थी। हालाँकि, इस फोन कॉल के बाद, पुलस्थिनी से कोई संपर्क नहीं हुआ।

ईस्टर संडे के हमलों के लगभग दो हफ्ते पहले, कविता ने एक अज्ञात व्यक्ति का दावा किया, जिसने खुद की पहचान श्रीलंकाई खुफिया अधिकारी के रूप में देते हुए बताया कि वह पुलस्थिनी की तलाश में आया था, इसके आलावा उसने कोई जानकारी नहीं दी।

IBC की रिपोर्ट बताती है कि अबुल रज़िक वास्तव में एक कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन, श्रीलंकाई तोहिद जमाथ (SLTJ) का नेता है, जिसका तमिलनाडु के तोहिद जमाथ के साथ वैचारिक संबंध है।

बता दें कि आईएसआईएस ने पिछले महीने श्रीलंका में हुए सिलसिलेवार विस्फोटों की जिम्मेदारी ली थी, जिसमें 300 से अधिक लोगों की जान जाने का दावा किया गया था। इस आत्मघाती हमले में सबसे अमीर और राजनीतिक रूप से अच्छी-खासी दखल रखने वाले व्यक्ति के 2 बेटे आत्मघाती हमलावर पाए गए। बम विस्फोट करने वालों में से एक की पत्नी द्वारा कोलम्बो में रहने वाले पुलिसकर्मियों को मारने के लिए आत्मघाती विस्फोट के बाद उसके परिवार से पूछताछ चल रही है।

कॉमरेड चंदू से लेकर कन्हैया कुमार तक: जेएनयू के कपटी कम्युनिस्टों की कहानी, भाग-1

फिलहाल जो कॉन्ग्रेस सहित तमाम तथाकथित सेकुलर जमात की आँखों का तारा बना हुआ है, वह कन्हैया उस वक्त 8-10 वर्षों का होगा, जब मैं जेएनयू पहुँचा था। सन 1997 का वह मॉनसून आँसुओं से भरा हुआ था। कॉमरेड चंद्रशेखर की हत्या को भले ही चार माह बीत चुके थे, पर जेएनयू की फिजाओं में उनकी ही चर्चा और आंदोलन की बातें तारी थीं। मैं आखिरी दिन एडमिशन लेनेवाला छात्र था, क्योंकि बिहार में लालू प्रसाद के जंगलराज में मेरे प्रोफेसर पिता को तनख्वाह मिलनी बंद हो चुकी थी। हम बाढ़ को चीरते हुए जेएनयू पहुंचे थे।

जेएनयू में पहला ही दिन सांस्कृतिक आलोड़न और चौंकानेवाला था, जब रैगिंग की जगह सीनियर्स ने पूरा सहयोग दिया, पहली क्लास में टीचर ने सिगरेट पेश की, तो सोचिए दरभंगा से सीधा दिल्ली के मिंटो रोड से होते हुए जेएनयू पहुंचने वाले मुझ बंदे की क्या हालत हुई होगी? बहरहाल, विषय यहाँ वह नहीं है। अगस्त में भी चंद्रशेखर की हत्या और आंदोलन पर कैंपस उबल रहा था। और, मजे़ की बात देखिए। उस वक्त तथाकथित सेकुलरों और प्रगतिशीलों की सरकार थी।

चंद्रशेखर की शहादत के बाद जब जेएनयू के विद्यार्थी आइटीओ से लेकर बिहार भवन और रेसकोर्स रोड तक जाम कर रहे थे, तो सबसे अधिक पिटाई विद्यार्थी परिषद वालों की हुई थी। पूरे आंदोलन को अचानक SFI ने विथड्रॉ किया था क्योंकि केंद्र में संयुक्त मोर्चा की लंगड़ी सरकार थी, जिसमें वामपंथी भी शामिल थे। एक फोन हुआ येचुरी का और जेएनयू में एसएफआइ ने आंदोलन से खुद को अलग कर लिया था।

बिहार भवन पर लालू के साले साधु यादव का सामना करना हो, या आइटीओ पर सड़क जाम करना, विद्यार्थी परिषद के लोग पूरी ताकत से जमे रहे, सबसे अधिक घायल भी हुए। वामपंथियों की धोखेबाज़ी, द्रोह और मक्कारी कोई नई बात नहीं है। मैं इनको वैसे ही ‘व्यभिचारी-वामपंथी’ नहीं कहता। खुद चंदू को जब इन्होंने बेच दिया, उनकी माँ को धोखा दिया, तो मेरे जैसों के लिए नजीब हों या रोहित, इनके नाटक और नौटंकी से कोई अपरिचित नहीं। दुनिया में शायद किसी का भी यकीन कर लिया जाए, लेकिन किसी कम्युनिस्ट पर कभी नहीं।

कन्हैया कुमार भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए झूठे ही हैं। उन्होंने तो खैर, अपने पिता की ही कद्र नहीं की, तो लालू प्रसाद के पैरों में झुकने पर कोई आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए। फिलहाल देश के तमाम छद्म प्रगतिशीलों, सेकुलरों, बुद्धिजीवियों आदि-इत्यादि के अनुसार कन्हैया कुमार के दो सबसे बड़े कारनामे हैं:
1. उसने देशद्रोह का काम नहीं किया है, नारे नहीं लगाए हैं। 
2. उसने सीधे देश की सत्ता को (इसे मोदी पढ़ें) चुनौती दी है। 

ये दोनों ही बातें सिरे से गलत और अहमकाना है, जिसे मैं साबित करूँगा, लेकिन पहले कुछ और बातें जाने लीजिए। मैं जेएनयू की खदान का ही उत्पाद हूँ, इसलिए मुझे न बताया जाए कि वहाँ के कम्युनिस्ट किस हद तक देशद्रोही, उत्पाती और ख़तरनाक हैं? कन्हैया तो कुछ भी नहीं, लेकिन इसके बौद्धिक पितृ-पुरुषों और माताओं से मैं उलझा हूँ, उनकी सोच किस हद तक भारत और हिंदू-विरोधी है, यह मुझे बेहतर पता है।

यह वही कैंपस है, जहां महिषासुर की जयंती मनाई जाने की कोशिश होती है, जहाँ का छात्रसंघ किसी जमाने में बाकायदा प्रस्ताव (रेजोल्यूशन) पारित करता था कि पूरा ‘उत्तर-पूर्व’ भारत के जुल्मो-सितम का शिकार है और उसे अलग होना चाहिए। यह वही जेएनयू है, जहां सीपीआई (माओवादी) की छात्र-शाखा कार्यरत है, यह वही जेएनयू है, जहाँ अफजल गुरु से लेकर गिलानी तक के लिए आँसूपछाड़ कार्यक्रम होते हैं, जहां सीआरपीएफ के जवानों के बलिदान पर हँसी-ठट्ठा होता है, जहां भारत-पाक मुशायरे में भारतीय सेना के उन जवानों के साथ मारपीट होती है, जो तुरंत कारगिल से लौटे होते हैं। ये है वहाँ के कम्युनिस्टों की करतूतें। यह सूची अंतहीन है।

अब, कन्हैया कुमार के बारे में प्रगतिशीलों के भ्रामक प्रचार नंबर एक पर कुछ तथ्य जानिए। उस दिन करीबन 20 कश्मीरी जिहादियों के साथ ही एएमयू और जामिया के लड़कों को भी जमा किया गया था। उन लोगों ने ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ के नारे भी लगाए। जब परिषद के लोगों ने विरोध किया, तो झूमाझटकी हुई, कन्हैया कुमार वहाँ पहुँचा और छात्रसंघ अध्यक्ष होने के बावजूद उसने इसे रोकना तो दूर, उनके साथ मिलकर नारे भी लगाए। यह एक तथ्य है और यह किसी शबाना, अख्तर या भास्कर के चिल्लाने से बदल नहीं जाएगा।

भ्रामक प्रचार नंबर दो पर ज़रा बात कीजिए। उस वक्त को याद कीजिए। कन्हैया कुमार को जिस तरह प्रोजेक्ट किया गया, उसे याद करने की कोशिश कीजिए। कांड के तुरंत बाद डी राजा, केजरीवाल से लेकर राहुल गांधी तक के जेएनयू-भ्रमण और भड़काऊ नारे को याद कीजिए। उस वक्त कांग्रेस के एक बड़े नेता ने लगातार कन्हैया को ग्रूम किया, इतना ही नहीं एक नेताजी ने तो उसके अकाउंट में पैसे भी भेजे। लक्ष्य एक ही था, मोदी के खिलाफ जो भी, जहाँ से भी मिले, उसे ले लो। कांग्रेस और कम्युनिस्ट तो वैसे भी एक सिक्के के दो पहलू हैं ही।

— व्यालोक पाठक
लेख का दूसरा हिस्सा यहाँ पढ़ें।

बुर्क़े की तुलना घूँघट से करने से पहले जरा भारत का इतिहास भी देख लें जावेद ‘ट्रोल’ अख़्तर

जाने-माने गीतकार और स्क्रिप्ट लेखक जावेद अख़्तर ने बुर्क़ा पर कई देशों में लगाए जा रहे प्रतिबंधों के बीच घूँघट पर प्रतिबन्ध लगाने की माँग की है। अब ट्विटर ट्रोल का रूप धारण कर चुके जावेद अख़्तर फ़िल्म इंडस्ट्री के वरिष्ठ सदस्यों में से एक हैं। कई दशकों से बॉलीवुड में काम कर रहे जावेद अख़्तर की इस सोच को देख कर समझा जा सकते है कि उन्होंने जिन तमाम फ़िल्मों का स्क्रिप्ट लेखन किया है, वो फ़िल्में क्या सन्देश देती होंगी? भले ही उनके द्वारा लिखी कई फ़िल्में सुपरहिट साबित हुईं और अमिताभ बच्चन जैसे नायकों को शिखर सम्मान मिला लेकिन ध्यान से देखें तो कहीं न कहीं ऐसी फ़िल्मों के कुछ दृश्यों में भी जावेद अख़्तर की सोच झलक ही जाती है। जैसे, विलेन हमेशा चन्दन-टीका धारी होते थे, ईमानदार दोस्त हमेशा मजहब विशेष वाला होता था और पुजारी हमेशा पाखंडी ही होते थे। यह ट्रेंड आज तक चला ही आ रहा है।

अब जावेद अख़्तर ने उसी सोच को नई पराकाष्ठा देते हुए लिखा, “देश में बुर्क़ा पहनने पर प्रतिबंध लगाने पर मुझे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन केंद्र सरकार राजस्थान में 6 मई को होने वाले लोकसभा सीटों के लिए मतदान से पहले घूँघट प्रथा पर भी प्रतिबंध लगाए।” जावेद अख्तर के इस बयान के बाद उनके ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया, जिसके बाद उन्होंने ट्विटर पर अपनी सफ़ाई में लिखा, “कुछ लोग मेरे बयानों को तोड़-मोड़ कर पेश कर रहे हैं। मेरे हिसाब से, भले ही श्री लंका में इसे (बुर्क़ा बैन) सुरक्षा कारणों से किया जा रहा है लेकिन महिला सशक्तिकरण के लिए इसकी ज़रूरत है। चेहरे को ढँकना प्रतिबंधित होना चाहिए, चाहे वो बुर्क़ा हो या घूँघट।” डैमेज कंट्रोल में जुटे जावेद अख़्तर ने एक और ग़लती कर दी।

और हाँ, जावेद अख़्तर ने तो कई ऐसे गीत लिखे हैं जिनमें घूँघट को सुंदरता के पर्याय की तरह पेश किया गया है। ‘घूँघट में गोरी है’ से लेकर ‘घूँघट में गोरी क्यूँ जले’ तक, उनकी इन गीतों के वीडियो में नायिका ने घूँघट नहीं रखा है लेकिन गाने में इसका जिक्र है। नायिका की सुंदरता में चार चाँद लगाने वाले माध्यम की तरह घूँघट को पेश करने वाले जावेद अख़्तर को ये अब सामाजिक कुरीति लगती है क्योंकि अब बुर्क़े पर प्रतिबन्ध की माँग हो रही है या लगाई जा रही है। घूँघट तबतक अच्छा था जबतक इससे उनका व्यवसाय चल रहा था, तबतक वो इसमें सुंदरता देखते थे। अब घूँघट एक कुरीति है क्योंकि ‘उनके’ बुर्क़े पर आँच आई है।

जावेद अख़्तर ने घूँघट को न सिर्फ़ महिलाओं के दमन से जोड़कर देखा बल्कि इसे महिला सशक्तिकरण के भी ख़िलाफ़ बताया। यह अचंभित करने वाला है कि अपनी पूरी उम्र फ़िल्मों के गीत और कहानियाँ लिखते हुए बिताने वाले जावेद अख़्तर अपने ही देश की संस्कृति और इतिहास से अनजान हैं। हमनें एक लेख में बताया था कि बुर्क़ा पर अधिकतर देश इसीलिए प्रतिबन्ध लगा रहे हैं क्योंकि कई आतंकी घटनाओं में बुर्क़ा का किरदार सामने आया है। आतंकियों ने चेहरा ढँकने के लिए इसका कितनी बार प्रयोग किया लेकिन इसे प्रतिबंधित करना इतना आसान भी नहीं है। मुस्लिम संगठनों द्वारा विरोध प्रदर्शन किए जाएँगे, विपक्षी नेताओं द्वारा मुस्लिमों को बरगलाया जाएगा कि उनके अधिकार छीने जा रहे हैं और जावेद अख़्तर जैसे बुद्धिजीवी इसे हिन्दू या भारतीय परम्पराओं से जोड़ कर देखेंगे। ये सब शुरू भी हो गया है। ऐसा दुनियाभर में है।

बुर्क़ा और घूँघट के बीच समानता स्थापित करने वाले जावेद अख़्तर को सबसे पहले धार्मिक बुराई और सामाजिक कुरीति के बीच का अंतर समझना चाहिए। बुर्क़ा पहन कर आतंकी हमले की साजिश रचने वाले और ‘अल्लाहु अक़बर’ कह कर लोगों को मारने वाले इस्लामिक आतंकियों को रोकने के लिए बुर्क़ा पर प्रतिबन्ध लगाया जाता है तो तमाम मुस्लिम संगठन इसके विरोध में आ जाते हैं, यह है धार्मिक बुराई। जबकि, घूँघट भारत में एक क्षेत्रीय परम्परा है जो हर क्षेत्र में अलग-अलग कारणों से प्रयोग में आया। अगर किसी क्षेत्र में इसे जबरदस्ती थोपा जा रहा है, तो ये है सामाजिक बुराई। इसका हिन्दू धर्म से कोई लेना-देना नहीं। इसे समझने के लिए भारत के भूगोल को समझना पड़ेगा। तभी यह पता चलेगा कि यह हिन्दू धर्म से जुड़ी कोई बुराई नहीं है, जैसे बुर्क़ा एक सम्पूर्ण इस्लामिक बुराई बन गई है।

सबसे पहले तो जो लोग घूँघट को हिन्दू धर्म से जोड़ कर देखते हैं, उनसे एक सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि क्या उन्होंने कभी किसी हिन्दू देवी को घूँघट में देखा है? क्या लक्ष्मी, दुर्गा या काली का कहीं भी घूँघट में वर्णन है, जहाँ उनका पूरा चेहरा ढँका हुआ हो? इसका जवाब है, नहीं। इसके तार भी इस्लामिक आक्रमणों से जुड़ते हैं। भारत में 11वीं सदी के बाद से जब इस्लामिक आक्रमण तेज़ हो गए, तब हिन्दू महिलाओं पर उनकी ख़ास नज़र थी। देवदत्त पटनायक जैसे कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस्लामी आक्रांताओं से बचने के लिए उत्तर भारत में घूँघट से चेहरा ढँकने का चलन तेज़ हुआ। मुस्लिम आक्रांताओं की महिलाओं पर बुरी नज़र रहती थी। अगर पटनायक की बातों को खंगालने के लिए कुछ घटनाओं को देखें तो समझ में आता है कि आख़िर क्यों भारत में घूँघट का चलन तेज़ हुआ।

जब कई राज्यों के मुस्लिम आक्रांताओं ने मिल कर सम्राट कृष्णदेवराय की मृत्यु के बाद विजयनगर साम्राज्य को तबाह किया, तब विजयनगर जैसे सुन्दर नगर को कचरे में बदल दिया गया। एक अंतरराष्ट्रीय घुमक्कड़ ने विजयनगर की तुलना कभी उस समय दुनिया के सबसे अमीर शहर रोम से की थी। जब विजयनगर तबाह हुआ, तब वहाँ हज़ारों औरतों का बलात्कार किया गया। पुरुषों को मार डाला गया और महिलाओं के साथ सेनापतियों व सेनाओं ने थोक में बलात्कार किया। इसी तरह जब अकबर को दिल्ली का राजा बनाने के लिए युद्ध हुआ, उसके बाद लोगों को मार-मार कर उनकी खोपड़ियों का पहाड़ खड़ा किया गया। उस दौरान भी बैरम खान जैसे आततायी के नेतृत्व में अनगिनत महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, बलात्कार किया गया, उनका उत्पीड़न किया गया। इससे यहाँ के निवासियों में भय व्याप्त हो गया।

चूँकि, उत्तर भारत लगातार बर्बर इस्लामिक आक्रमणों का गवाह बना, यहाँ घूँघट से चेहरे ढँकने की प्रथा तेज़ हो गई। वैसे घूँघट का प्रमाण भारत में सदियों से मिलता है लेकिन इसका अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग कारणों से प्रयोग किया जाता रहा है। पटनायक लिखते हैं कि दक्षिण भारत में घूँघट का चलन नहीं चला। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जिस प्रदेश में इस्लामिक आक्रांताओं का आतंक बढ़ा, वहाँ लोगों ने बहू-बेटियों की सुरक्षा के लिए कुछ नियम बनाए। अब इससे भी पीछे चलते हैं, बहुत पीछे। घूँघट शब्द का जन्म संस्कृत शब्द अवगुण्ठन से हुआ है। प्राचीन काल में महाराज शूद्रक द्वारा लिखी गई पुस्तक मृच्छकटिकम में इसका वर्णन है। इस पुस्तक में शूद्रक ने अवगुंठन के बारे में लिखा है कि महिलाएँ इसका प्रयोग अपने बालों की सुरक्षा के लिए करती थीं।

महाराज शूद्रक लिखते हैं कि महिलाएँ जब किसी कार्यक्रम में जाती थीं तो वो सजती-सँवरती थी और बालों को सँवारने पर उनका विशेष ध्यान होता था। इसी कारण उन्होंने अवगुंठन धारण करना शुरू किया। इससे बाल बंधे और ढँके रहते थे। हवा वगैरह से इसपर कोई नुकसान नहीं पहुँचता था। इसके अलावा राजस्थान के धूल भरे रेगिस्तान में महिलाओं द्वारा घूँघट का प्रयोग धूप द्वारा बचने के लिए भी किया गया। बाद में धीरे-धीरे घूँघट कई क्षेत्रों में या समाज में विवाहित महिलाओं की पहचान बन गई और इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि इसे कई क्षेत्रों में जबरन भी थोपा गया। लेकिन, घूँघट से आजतक किसी को कोई ख़तरा नहीं हुआ। बुर्क़ा पर प्रतिबन्ध सुरक्षा कारणों की वजह से लग रहा है, इस्लामी कुरीति तो यह है ही क्योंकि दुनियाभर में कई देशों में इस्लामिक समाज में इसका इस्तेमाल व्यापक तौर पर होता है।

घूँघट कहीं-कहीं सामाजिक कुरीति ज़रूर बन गई लेकिन जहाँ भी ऐसा हुआ, वहाँ विरोध भी किया गया। बौद्ध कथाओं के अनुसार जब यशोधरा को बड़ों के सामने घूँघट करने को कहा गया तो उन्होंने इनकार कर दिया और दरबार में जाकर इसके पीछे के कारण भी गिनाए। इसी तरह सिख गुरु अमर सिंह ने घूँघट प्रथा को हटाने के लिए अभियान चलाया। लेकिन, राजस्थान जैसे कुछ राज्यों में भौगोलिक व मौसमी परिस्थितियों के कारण आज भी इसका प्रचलन है। जावेद अख़्तर ने एक व्यापक समस्या (बुर्क़ा) की एक ऐसी चीज से तुलना करने की कोशिश की, जो एक प्रचलन है, परंपरा है। बुराइयाँ हर परम्परा, रीति और चलन में तभी आती है जब उसे जबरदस्ती थोपा जाने लगता है। जबतक उसे स्वेच्छा से स्वीकार किया जाता है, उससे किसी को कोई ख़तरा नहीं है, तबतक उसे धार्मिक या सामाजिक बुराई का जबरन रूप दे देना सही नहीं है।

बुराइयाँ हर जगह है। लेकिन, उसकी व्यापकता और उससे समाज को होने वाले ख़तरे को माप कर यह अंदाज़ा लगाया जाता है कि उस बुराई को कितनी जल्दी ख़त्म कर देना चाहिए। घूँघट प्रथा ने अगर कहीं किसी क्षेत्र में, किसी समाज में, अगर बुराई का रूप ले ही लिया है तो इसके सामाजिक अभियान चलाकर ठीक किया जा सकता है। लेकिन, जिस बुर्के का प्रयोग करके नरसंहार किया जा रहा है, वह केवल सामाजिक बुराई नहीं है बल्कि सुरक्षा की दृष्टि से भी ख़तरा है और जिस तरह से इसके समर्थन में मुस्लिम बुद्धिजीवी और संगठन खड़े हो रहे हैं, उससे लगता है कि इसे जल्द से जल्द बैन करना समय की माँग है।

अब आते हैं जावेद अख़्तर के डैमेज कंट्रोल पर। जब जावेद ने देखा कि बुर्क़ा से घूँघट की तुलना करने के लिए उनके पास कोई ख़ास तर्क नहीं हैं, उन्होंने इसे महिला सशक्तिकरण से जोड़ कर बहाने मारना शुरू कर दिया। उनका भाव यह था कि हिन्दू धर्म में इसका भी जबरन इस्तेमाल उतना ही व्यापक है, जैसा दुनियाभर के मुस्लिम समाज में। हिन्दुओं में अधिकतर क्षेत्रों में शादी के दौरान पुरुष भी अपना चेहरा ढँके रहते हैं। फेरे लेने के दौरान वर-वधू दोनों के ही चेहरों पर पर्दा होता है। क्या जावेद अख़्तर इसे भी कुरीति कहेंगे? हाँ, अगर ज़बरन कहीं किसी पुरुष का चेहरा ढक दिया जाता है तो इसे पुरुष सशक्तिकरण से भले देखिए, लेकिन जहाँ ये परम्परा ही है, उसे आप कुरीति कैसे कह सकते हैं? इसीलिए जावेद अख़्तर को समझना चाहिए कि घूँघट बुर्क़ा नहीं है।

मायावती का खुलासा: इस वजह से गठबंधन ने कॉन्ग्रेस के लिए छोड़ी VIP सीट

बसपा सुप्रीमो मायावती ने सपा के साथ गठबंधन के बाद पहली बार अमेठी और रायबरेली से कॉन्ग्रेस के खिलाफ अपने प्रत्याशी नहीं उतारा है। महागठबंधन के द्वारा रायबरेली और अमेठी की सीट कॉन्ग्रेस के लिए छोड़े जाने को लेकर मायावती ने पहली बार बोला है। मायावती ने रविवार (मई 5, 2019) को इसके पीछे का कारण बताते हुए कहा कि उन्होंने देश और जनहित में, खासकर भाजपा-आरएसएस जैसी ताकतों को कमजोर करने के लिए यूपी में अमेठी-रायबरेली लोकसभा सीट कॉन्ग्रेस के लिए छोड़ दी, ताकि इसके दोनों सर्वोच्च नेता इन्हीं सीटों से फिर से चुनाव लड़ें और इन दोनों सीटों में ही उलझ कर ना रह जाएँ। फिर कहीं भाजपा इसका फायदा यूपी के बाहर कुछ ज्यादा ना उठा ले। इसे खास ध्यान में रखकर ही, सपा-बसपा गठबंधन ने दोनों सीटें कॉन्ग्रेस के लिए छोड़ दी थीं। मायावती ने कहा कि उन्हें मुझे पूरी उम्मीद है कि महागठबंधन का एक-एक वोट हर हालत में दोनों कॉन्ग्रेस नेता को मिलने वाला है।

मायावती ने इसके लिए बकायदा महागठबंधन के समर्थकों से अपील की है कि वो लोग 6 मई को रायबरेली और अमेठी लोकसभा सीट पर होने वाले मतदान में कॉन्ग्रेस नेताओं के पक्ष में वोट करें। उन्होंने कहा, “भाजपा और कॉन्ग्रेस दोनों ही पार्टियाँ एक जैसी हैं। हमने कॉन्ग्रेस के साथ कोई समझौता नहीं किया है, लेकिन भाजपा को हराने के लिए रायबरेली और अमेठी सीट पर हमारी पार्टी का वोट कॉन्ग्रेस को मिलेगा।”

इसके साथ ही मायावती का कहना है कि महागठबंधन को जनता का पूर्ण समर्थन मिल रहा है, जिसकी वजह से भाजपा परेशान हो गई है और गठबंधन को तोड़ने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि यह गठबंधन सिर्फ केंद्र में नया प्रधानमंत्री व नई सरकार बनाने के लिए नहीं है, बल्कि यूपी में भी भाजपा की सरकार को हटाएगा और 23 मई को देश को निरंकुश व अहंकारी शासन से मुक्ति मिल जाएगी।

₹30,000 करोड़ का गणित चिदंबरम और सुरजेवाला से पूछो: राहुल गाँधी का इंडियन एक्सप्रेस को इंटरव्यू

17वीं लोकसभा का निर्वाचन जैसे-जैसे अपनी समाप्ति की ओर बढ़ रहा है, कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ताबड़तोड़ इंटरव्यू दिए जा रहे हैं। एनडीटीवी और इंडिया टुडे के बाद इंडियन एक्सप्रेस से भी उन्होंने बात की और बताया कि कैसे उन पर परिवारवाद का आरोप राजनीतिक प्रोपेगंडा है, मनमोहन सिंह सरकार का अध्यादेश फाड़ तत्कालीन प्रधानमंत्री का अपमान करना उनकी गलती थी, और कैसे वह अनिल अंबानी और मेहुल चोकसी को एक जैसा ‘क्रोनी कैपिटलिस्ट’ मानते हैं। पेश है हर मुद्दे पर उनकी विस्तृत राय और उनके दावे:

जनता का नारा है ‘चौकीदार चोर है’

राहुल गाँधी ने दावा किया कि ‘चौकीदार चोर है’ का नारा उनकी ईजाद नहीं, छत्तीसगढ़ की एक जनसभा में स्वःस्फूर्त उत्पन्न हुआ जनता का उद्गार है। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनके कॉन्ग्रेस अध्यक्ष होकर इसे उठा लेने से खाली इस नारे की जनता में ‘धमक’ (amplification) बढ़ गई है।

हालाँकि जब इंडियन एक्सप्रेस के साक्षात्कारकर्ता ने सवाल उठाया कि खुद राहुल गाँधी और पार्टी प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला के अलावा किसी वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता को इसका प्रयोग करते नहीं सुना गया है तो वह पहले इसे नकारते नज़र आए और बाद में आक्रामक हो साक्षात्कारकर्ता से ही पूछने लगे कि इस सवाल को उठाने से मंतव्य क्या है। इसके अलावा उन्होंने यह भी दावा किया कि शायद उनकी पार्टी के नेता प्रधानमंत्री मोदी द्वारा आगे जाकर इसका ‘बदला लिए जाने’ से डर रहे हैं, पर वह (मोदी) राहुल को नहीं डरा सकते।

₹30,000 करोड़ का गणित चिदंबरम और सुरजेवाला से पूछो

राहुल हर रैली में आजकल यह दोहरा रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ‘मित्र’ अनिल अंबानी को अनुचित लाभ पहुँचाने के लिए वायुसेना के ₹30,000 करोड़ उनके ‘खाते में डाल दिए’। इस राशि पर वह कैसे पहुँचे, इसका सीधा जवाब देने से कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बचते नजर आए। पहले तो जब साक्षात्कारकर्ता ने यह पूछा कि पूरा राफ़ेल सौदा ही ₹60,000 करोड़ का है तो इसकी 50% राशि आखिर किसी एक बिजनेसमैन को कैसे मिल गई तो उन्होंने ‘पर्याप्त दस्तावेज हैं’ का गोलमोल उत्तर दे टालने की कोशिश की।

जब साक्षात्कारकर्ता टस-से-मस नहीं हुआ तो उन्होंने सौदे में ‘प्रक्रियागत गड़बड़ियों’, द हिन्दू के द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट, जेपीसी जाँच की माँग, अनिल अंबानी की तथाकथित रक्षा उत्पादन अनुभवहीनता, उनकी आर्थिक देनदारियों आदि का हवाला देकर मामला घुमाने की कोशिश की। पर जब साक्षात्कारकर्ता ने याद दिलाया कि तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने खुद 2-जी घोटाले में बार-बार ₹2 लाख करोड़ के गणित का मूल पूछा था तो अंत में उन्होंने माना कि उन्हें आकलन बताया गया है। यह कैसे आया इसका हिसाब पूर्व वित्तमंत्री और कॉन्ग्रेस के आर्थिक दिमाग पी चिदंबरम व प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला के ही पास है। उन्होंने एक बार फिर प्रधानमंत्री को इस मुद्दे पर सार्वजनिक बहस के लिए ललकारा।

वरिष्ठ नेताओं को एक हार के लिए निकाल नहीं सकता, अनुभव का सदुपयोग किया  

जब कॉन्ग्रेस अध्यक्ष से पूछा गया कि 2014 में पार्टी इतिहास की सबसे बड़ी हार के बाद भी संगठन में कोई बड़ी तब्दीली नहीं हुई तो राहुल एके एंटनी, अशोक गहलोत जैसे वरिष्ठ नेताओं का बचाव करते नजर आए। उन्होंने विस्तृत अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे कद्दावर और अनुभवी नेताओं को एक हार का ठीकरा उनके सर फोड़कर निकालना अनुचित होता। उसकी बजाय पार्टी ने उनके अनुभव का उपयोग दूसरी नेताओं की पंक्ति को मजबूत करने के लिए किया। उन्होंने मोदी के अपराजेय होने का मिथक तोड़ने का श्रेय भी कॉन्ग्रेस को दिया, और याद दिलाया कि कैसे केवल 44 लोकसभा सदस्यों वाली कॉन्ग्रेस ने मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण बिल का रास्ता रोक लिया था। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें उस वाकये पर गर्व महसूस होता है।

अकेले मोदी ही जिम्मेदार, इसलिए विचारधारा की बजाय उनपर हमला   

राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ही निशाना साधे रखते हुए उन्हें देश की उस स्थिति के लिए जिम्मेदार बताया जिसे वह ‘बदहाल’ कहते हैं। उन्होंने कहा कि इसीलिए वह अपने निशाने पर पूरी भाजपा की बजाय केवल नरेंद्र मोदी को रखे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री रहते हुए अपनी ही सरकार में किसी की नहीं सुनी। उन्होंने प्रधानमंत्री की नोटबंदी को देश की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ रिजर्व बैंक की स्वायत्ता को भी नुकसान पहुँचाने वाला बताया। उन्होंने राफ़ेल के तथाकथित ‘घोटाले’ को भी ‘मोदी की मनमर्जी’ का ही दुष्परिणाम बताया।

मोदी के एक हम ही वैचारिक विरोधी, हम से है संघ को खतरा

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने यह भी दावा किया कि उनकी पार्टी ही संघ की इकलौती वैचारिक विरोधी है, और इसीलिए प्रधानमंत्री ने ‘कॉन्ग्रेस-मुक्त भारत’ का नारा दे रखा है। वह किसी और पार्टी को देश से खत्म नहीं करना चाहते; केवल कॉन्ग्रेस को समाप्त करना चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि 2014 के बाद कॉन्ग्रेस ने आत्म-चिंतन किया और उसके परिणामस्वरूप न केवल जमीन से नए नेताओं की पूरी पौध को लेकर आगे आई बल्कि इन नेताओं ने और इनका नेतृत्व कर रहे राहुल ने 5 साल तक भाजपा के खिलाफ लड़ाई लड़ी है। राहुल गाँधी ने यह भी जोड़ा कि यह उनकी लड़ाई का ही परिणाम है कि 2 वर्ष पहले तक मोदी सरकार को दस साल का न्यूनतम कार्यकाल देने वाले आज मोदी को पूर्ण बहुमत को लेकर भी आश्वस्त नहीं हैं।

कॉन्ग्रेस में नहीं है परिवारवाद, शाह भाजपा अध्यक्ष बने मोदी के बल पर

राहुल गाँधी ने कॉन्ग्रेस पर लगने वाले शायद सबसे पुराने आरोप परिवारवाद का भी बचाव किया। उन्होंने राजीव साटव (गुजरात कॉन्ग्रेस प्रभारी, यूथ कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और महाराष्ट्र सांसद), जोतिमणि सेन्नीमलै (करूर लोकसभा प्रत्याशी, कॉन्ग्रेस मीडिया पैनलिस्ट), माणिक टैगोर (विरुधुनगर प्रत्याशी और इसी सीट से 2009 के लोकसभा सदस्य) समेत कई कॉन्ग्रेस सदस्यों का उदाहरण देते हुए परिवारवाद के आरोप को नकारा। इसके अलावा उन्होंने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव (मुलायम सिंह यादव के बेटे) और भाजपा सांसद पंकज सिंह (गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बेटे) का उदाहरण दिया कि हर पार्टी में कुछ नेताओं की संतानें अपने परिवार की राजनीतिक परंपरा में भागीदार होतीं हैं।

जब साक्षात्कारकर्ता ने राहुल गाँधी से सीधे-सीधे पूछा कि उन्हें 5 साल पहले भी पता था कि कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष वही बनेंगे जबकि भाजपा में कभी यह ‘फिक्स’ नहीं होता तो राहुल गाँधी ने इसे भी चुनौती दी। उन्होंने भाजपा में अमित शाह के अध्यक्ष पद पर चुनाव को भी ‘फिक्स्ड’ बताते हुए यह आरोप लगाया कि उन्हें यह पद मोदी की जी-हुजूरी करने से और यही करने के लिए मिला है। उन्होंने अपने खिलाफ वंशवाद के आरोप को प्रपोगंडा बताते हुए सवाल किया कि क्या उनके पिछले 5 साल के संघर्ष को उनके ‘वंश की देन’ बताकर नकारा जा सकता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दा नहीं, बहाना है; हम भय नहीं फैलाते   

राहुल गाँधी ने राष्ट्रीय सुरक्षा को निर्वाचन की राजनीति में मुद्दा मानने से मना करते हुए साफ़ किया कि कॉन्ग्रेस इसे केवल अर्थव्यवस्था, राफेल और बेरोजगारी पर कॉन्ग्रेस के आरोपों का सामना करने से बचने का प्रधानमंत्री का बहाना मानती है। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी जनता के बीच खराब अर्थव्यवस्था, किसानों के खराब हालात और बेरोजगारी के मुद्दे पर है और मोदी उनके सवालों से बचने के लिए राष्ट्रवाद की आड़ लेना चाहते हैं। लोगों में “भाजपा आएगी तो…” का भय फैलाने के आरोप के जवाब में उन्होंने आरोप दोहराए कि भाजपा आई तो संविधान पुनर्लिखित कर दिया जाएगा, प्रधानमंत्री भ्रष्ट हैं और संस्थाओं में ‘एक खास विचारधारा’ (संघ की विचारधारा) के लोगों को भरकर संस्थाएँ बर्बाद कर रहे हैं।

उन्होंने मोदी के किए ‘नुकसान’ की भरपाई के लिए अपनी पार्टी के उपाय भी गिनाए। बकौल कॉन्ग्रेस अध्यक्ष, उनकी पार्टी एक सरल जीएसटी लाएगी। इसके अलावा उन्होंने अपनी विवादास्पद ‘न्याय स्कीम’ को नोटबंदी से हुए तथाकथित नुकसान की भरपाई बताया।

प्रज्ञा ठाकुर, सच्चर पर सवाल टाले

भाजपा की भोपाल प्रत्याशी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के खिलाफ व्यक्तिगत रूप से प्रचार करने के सवाल पर राहुल गाँधी बचते नजर आए। उन्होंने कहा कि ‘हालाँकि’ उन्हें भोपाल में प्रचार करने से कोई परहेज नहीं है, लेकिन प्रज्ञा सिंह वैसे ही भारी अंतर से मुकाबला हार रहीं हैं। इसके अलावा सच्चर समिति की रिपोर्ट का जिक्र अपनी पार्टी के पिछले दो लोकसभा घोषणापत्रों में होने और इस बार गायब होने के बारे में भी कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने कोई सीधी टिप्पणी नहीं की। उन्होंने केवल यह दोहराया कि कॉन्ग्रेस भारत को “सभी का” मानती है और यहाँ तक कि भाजपा को लेकर भी वह “भाजपा मुक्त भारत” जैसी बातें नहीं करते।

मनमोहन केवल सम्मानित नहीं, प्रेम भी करता हूँ  

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में राहुल गाँधी ने कहा कि वह उनका (डॉ. सिंह का) केवल सम्मान ही नहीं करते बल्कि उन्हें दिल से चाहते भी हैं। उन्होंने मनमोहन सरकार के अध्यादेश को सार्वजानिक रूप से फाड़ने को गलती मानते हुए अफ़सोस जताया। साथ में यह भी जोड़ा कि उन्होंने यह लगता है कि मनमोहन सिंह जिस ऊँचे ‘कद’ के व्यक्तित्व हैं, वैसे व्यक्ति का राहुल गाँधी कुछ भी कर लें, असम्मान हो ही नहीं सकता। पर उन्होंने यह भी माना कि उनकी पार्टी ने यह स्वीकारना बंद कर दिया था कि 2012 आते-आते उनकी नीतियाँ स्पष्ट रूप से काम करना बंद कर चुकीं थीं, इसीलिए जनता ने उन्हें दण्डित किया।

हम न राईट, न लेफ़्ट; अनिल अंबानी-मेहुल चोकसी क्रोनी कैपिटलिस्ट   

अपनी पार्टी के चरम-वामपंथी हो जाने के आरोप को भी कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने सिरे से नकार दिया। उन्होंने 1990 के दशक की शुरुआत में नरसिम्हा राव-मनमोहन सिंह के आर्थिक उदारीकरण के कदम का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस लोगों की बातें लगातार सुनती रहती है और किसी भी परिस्थिति के अनुसार उपयुक्त निर्णय लेती है।

कॉर्पोरेट बिजनेसमैनों को नाम लेकर अपमानित करने के मुद्दे पर राहुल गाँधी रक्षात्मक नजर आए। उन्होंने भारतीय कॉर्पोरेट जगत को ईमानदार, मेहनती संस्था बताते हुए अनिल अंबानी, मेहुल चोकसी, विजय माल्या, नीरव मोदी को इनसे अलग ‘क्रोनी कैपिटलिस्ट’ बताया। उन्होंने कहा कि ईमानदार कॉर्पोरेट वालों का वह पूर्ण समर्थन करते हैं।

मतभेद कॉन्ग्रेस का आंतरिक लोकतंत्र; राहुल गाँधी को सबको सुनने वाले के रूप में जानें

पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र के खिलाफ महाभियोग लाने के मामले में निर्णय की जिम्मेदारी लेने से भी राहुल गाँधी बचते नजर आए। उन्होंने मोदी-शाह पर संवैधानिक संस्थाओं को दबाने का आरोप दोहराया। साथ में वह भी जोड़ा कि महाभोयोग का निर्णय पिछले साल की शुरुआत में की गई चार जजों की प्रेस वार्ता में दीपक मिश्र पर लगे आरोपों के द्वारा जनित सार्वजनिक मत के चलते उठाया। गौरतलब है कि उन चार जजों में से एक रंजन गोगोई इस समय भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) हैं।

इस निर्णय के खिलाफ कॉन्ग्रेस में ही उठी आवाजों के बारे में उन्होंने सफाई दी कि यह उनकी पार्टी में जीवंत लोकतंत्र और असहमति की संस्कृति का प्रतीक है। साथ ही यह पूछे जाने पर कि उनमें ऐसी कौन-सी खूबी है जो लोगों को नरेंद्र मोदी की बजाय उन्हें चुनें, उन्होंने कहा कि वह सबकी सुनते हैं, उनके दिल में करुणा है, और वह सचमुच देश के लोगों की मदद करना चाहते हैं