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अल्पेश ठाकोर समेत 3 कॉन्ग्रेस MLA का पार्टी से इस्तीफा, कभी करते थे कॉन्ग्रेस का धुँआधार प्रचार

आम चुनाव के मतदान की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी हैं, लेकिन कॉन्ग्रेस की मुश्किलें हर दिन बढ़ती हुई ही नजर आ रही है। इस बार पार्टी के युवा चेहरे अल्पेश ठाकोर ने हाथ का साथ छोड़ दिया है। गुजरात के विधायक अल्पेश ठाकुर और 2 अन्य विधायकों ने कॉन्ग्रेस से इस्तीफा दे दिया है। इस्तीफ़ा देने वाले अल्पेश के अलावा, धवल सिंह ठाकोर और भरतजी ठाकोर जैसे नाम शामिल हैं। अल्पेश पाटन जिले की राधानपुर सीट से विधायक हैं।

ठाकोर समेत तीनों विधायक 2017 के विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस के टिकट पर चुनकर आए थे। बीते कुछ समय से लोकसभा चुनाव में टिकट वितरण को लेकर अल्पेश ठाकोर की कॉन्ग्रेस नेतृत्व से तनातनी चल रही थी। कई दिनों से वो कॉन्ग्रेस पार्टी छोड़ने का भी इशारा कर रहे थे। ऐसा माना जा रहा था कि वो जल्दी ही भाजपा में शामिल हो सकते हैं लेकीन अल्पेश ने भाजपा ज्वाइन करने से इंकार कर दिया है। अल्पेश ने कहा है कि वो सभी MLA के तौर पर 5 साल का अपना कार्यकाल पूरा करेंगे।

मनपसंद टिकट नहीं मिलना है वजह

बताया जा रहा है कि लोकसभा चुनाव में अल्पेश और उनका संगठन ठाकोर सेना कुछ सीटों पर अपनी पसंद के प्रत्याशी चाहते थे, जिस पर कॉन्ग्रेस पदाधिकारियों ने ध्यान नहीं दिया। अल्पेश द्वारा खुद के लिए पाटन लोकसभा सीट से टिकट माँगने की बात भी सामने आई थी। कॉन्ग्रेस ने यहाँ से पूर्व सांसद जगदीश ठाकोर को कैंडिडेट बनाया है। वहीं, मेहसाणा और बनासकांठा सीट पर भी अल्पेश के पसंदीदा उम्मीदवार को टिकट नहीं मिल पाया।

ठाकोर और OBC जातियों पर है पकड़

अल्पेश ठाकोर गुजरात के 2017 के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक तौर पर उभर कर सामने आए थे। उन्होंने कॉन्ग्रेस के लिए जमकर प्रचार किया था। उनका ठाकोर और कई OBC जातियों में प्रभाव माना जाता है। बीते काफी समय से उनके भाजपा में जाने की अटकलें लगातार लगाई जा रही हैं।

ठाकोर क्षत्रिय सेना ने कहा था अल्पेश से पार्टी छोड़ने को

अल्पेश ठाकोर के ही बनाए संगठन ने ठाकोर क्षत्रिय सेना ने मंगलवार देर रात बैठक के बाद अल्पेश को कॉन्ग्रेस से नाता तोड़ने को कहा था। सेना ने अल्पेश ठाकोर से 24 घंटे के भीतर कॉन्ग्रेस से इस्तीफा देने या फिर ठाकोर सेना छोड़ने को कहा था और अल्पेश ने कॉन्ग्रेस का हाथ छोड़ कर अपना निर्णय दे दिया।

60 साल तक ‘न्याय’ न देने वालों के मुँह से ‘NYAY’ की बात अच्छी नहीं लगती

लोकसभा चुनाव के महासंग्राम में सियासी घमासान तेज़ी से बढ़ता जा रहा है। इसमें राजनीतिक पार्टियाँ तो अपना दम-खम लगा ही रही हैं, साथ ही सिनेमा जगत भी इससे पीछे नहीं रहा। कुछ दिनों पहले, 600 से अधिक थिएटर कलाकारों और मशहूर हस्तियों ने एक संयुक्त बयान जारी कर लोगों को आगामी लोकसभा चुनावों में सत्ता से बाहर कट्टरता, घृणा और उदासीनता को वोट करने के लिए कहा था। हस्ताक्षरकर्ताओं ने दावा किया कि संविधान और विभिन्न संस्थान निरंतर ख़तरे में हैं और वर्तमान स्थिति के तहत उनका दम घुट गया है।

बता दें कि इस बयान पर हस्ताक्षर करने वाले कुछ प्रमुख व्यक्तित्वों में अमोल पालेकर, अनुराग कश्यप, डॉली ठाकोर, लिलेट दुबे, नसीरुद्दीन शाह, अभिषेक मजुमदार, अनमोल हकर, नवतेज जोहर, एमके रैना, महेश दत्तानी, कोंकणा सेन शर्मा, रथ पाठक पाठक और संजना कपूर जैसे नाम शामिल हैं।

इसके अलावा कॉन्ग्रेस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से भी एक ऐसा वीडियो शेयर किया गया जिसमें फ़िल्मी हस्तियों ने जनता से वोट डालने की अपील की गई थी। कहने को तो इस वीडियो में फ़िल्मी हस्तियों ने जनता से वोट डालने की अपील की थी, लेकिन बढ़ती असहिष्णुता, फासीवाद और घृणा जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर वो मोदी विरोधी ज़हर उगलने की गुप्त चाल भी चल रहे थे।

एक तरफ, फ़िल्म जगत में ऐसे लोग हैं जो नफ़रत फैलाकर अप्रत्यक्ष रूप से कॉन्ग्रेस का प्रचार कर रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ इनका जवाब देने के लिए रणवीर शौरी जैसे अभिनेता भी हैं जो भ्रमित कर देने वाले वीडियो का खुलकर विरोध करते हैं। आज उन्होंने ट्विटर पर एक वीडियो अपलोड किया, जिसमें उन्होंने कॉन्ग्रेस के 60 साल शासन पर कटाक्ष किया और जनता से सोच-समझकर वोट डालने की अपील की।

इससे पहले भी एक ख़बर फैलाई गई थी कि फ़िल्म उद्योग से जुड़ी 100 से अधिक हस्तियों द्वारा मोदी सरकार के ख़िलाफ़ वोट देने संबंधी एक संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर किए गए थे। संयुक्त बयान की यह लिस्ट आर्टिस्ट यूनाइटेड इंडिया नाम की वेबसाइट पर जारी की गई थी। इस फेक लिस्ट का पता तब चला जब अभिनेत्री और फ़िल्म निर्माता आरती पटेल ने इस ऐसे किसी भी प्रकार के बयान पर हस्ताक्षर न किए जाने की बात का ख़ुलासा किया। बता दें कि आरती पटेल का नाम लिस्ट में दूसरे नंबर पर दर्ज था। पूरा मामला पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

कहना होगा कि जनता को भरमाने का काम चारों तरफ से जारी है। कोई फ़िल्मी डॉयलाग का इस्तेमाल करता है, तो कोई चुनावी जुमलेबाजी करता दिखता है। कोई पैसा बाँटने के नाम पर ठगने का प्रयास करता है, तो कोई पीएम मोदी पर सीधा निशाना साधकर उन पर व्यक्तिगत टीका-टिप्पणी करता है। अपनी हद पार करते हुए कॉन्ग्रेस अपने चेले-चपाटों के ज़रिए ऐसा कोई पैंतरा बाक़ी नहीं छोड़ती जिससे पीएम मोदी को घेरा न जा सके। विरोध की इस बयार में फ़िल्म जगत भी अछूता नहीं रहा।

जो कॉन्ग्रेस अपनी सबसे लंबी पारी में देश की जड़ें केवल खोखली करती आई, वो जब NYAY की बात करती है, तो आश्चर्य होता है। अच्छा होता अगर मोदी सरकार का विरोध करते इन नामी चेहरों ने कॉन्ग्रेस का प्रचार करने के बजाए देश को एकजुट करने की बात कही होती, असहिष्णुता की जगह भारत की जनता को एकसूत्र में बाँधने की कोशिश की होती। कॉन्ग्रेस की परिवारवाद की छवि से जनता को अवगत कराया होता तो बेहतर होता।

आज इन हस्तियों को अपने ही देश में ऐसा दुष्प्रचार करते देखना बेहद दु:खद एहसास है। काश! कि ये नामी चेहरे विकास के नाम पर अगर कुछ बात कर लेते तो थोड़ा देशहित का काम ही हो जाता और जनता को अपने मतदान का सही इस्तेमाल करने में कुछ मदद मिल जाती। जनता को मतदान करने की नसीहत देने वालों से अगर पूछा जाए कि जिस कॉन्ग्रेस का वो छिपकर समर्थन कर रहे हैं उसके शासनकाल में कौन-से चार चाँद लग गए थे, जो मोदी सरकार में नहीं लगे। पिछले पाँच सालों में देश का ऐसा कौन-सा अहित हो गया जिससे तरक्की की राह में रोड़े पैदा हो गए। जबकि यह जगज़ाहिर है कि देश ने बीते पाँच वर्षों में तरक्की की नई बुलंदियों को छुआ है। अब यह बात अलग है कि कॉन्ग्रेस के इन चहेतों को गाँधी-वाड्रा परिवार के घोटाले नहीं दिखाई देते।

60 सालों तक राज करने वाली पार्टी की मजबूरी है कि वो सत्ता से दूर है, और यह दूरी रात-दिन बढ़ती जा रही है। सत्ता पाने की यही लालसा उससे नए-नए हथकंडे आजमाने का दुष्चक्र चलवाती है। लेकिन जब बड़े और नामी चेहरे भी इस धूर्तता का हिस्सा बनने लगते हैं तो अफ़सोस होता है कि आख़िर कैसे देश को इन चालबाज़ो से बचाया जाए।

शरद पवार के बुरे दिन: आते ही रैली से उठकर जाने लगे लोग

जिस महाराष्ट्र में शरद पवार की तूती बोलती थी, कल वहाँ वे अधभरे मैदानों में रैलियाँ संबोधित कर रहे थे। उल्हासनगर में राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी के सुप्रीमो शरद पवार मंगलवार को एक चुनावी रैली को आधे ही भरे मैदान में संबोधित करते पाए गए।

पहुँचे थे 3 घन्टे देरी से, जनता ने कहा ‘टाटा’

दरअसल शरद पवार को रैली के लिए शाम 6 बजे पहुँचना था, और लोग बड़ी संख्या में उन्हें सुनने के लिए एकत्र भी हुए थे। भीड़ में एक बड़ी संख्या स्थानीय लोगों और कामगारों की भी थी। पर पवार सभास्थल पर 3 घंटे देरी से, यानी रात के 9 बजे, पहुँचे। तब तक जनता का धैर्य चुक गया था और लोग उठ कर जा चुके थे।

यहाँ तक कि पवार के पहुँचने के बाद भी लोगों के जाने का सिलसिला नहीं थमा। उनके सामने से भी उठ-उठकर लोग बाहर जाते रहे। पर इन सबसे अविचलित महाराष्ट्र के क्षत्रप ने अपना भाषण जारी रखा।

मोदी पर हमला

पवार ने मोदी के उस हमले पर जवाबी हमला बोला जो प्रधानमंत्री ने शरद पवार के नेशनल कांफ्रेंस से हाथ मिला लेने पर किया था। उन्होंने मोदी को यह याद दिलाया कि अतीत में भाजपा भी फारूख अब्दुल्ला से हाथ मिला चुकी है।

पवार और मोदी में परस्पर हमले का यह सिलसिला तब शुरू हुआ था जब प्रधानमंत्री ने वर्धा की एक चुनावी सभा में 1 अप्रैल को पवार के आगामी लोकसभा चुनाव न लड़ने पर चुटकी ली थी। मोदी ने कहा था कि पवार ने यह निर्णय चुनावी मुश्किलों को देखते हुए लिया था। उन्होंने यह भी कहा था कि राकांपा आन्तरिक संघर्ष में फँसी है और पवार के हाथों से पार्टी की कमान फिसलती जा रही है।

महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस-राकांपा गठबंधन के लिए पवार का चुनावों में न उतरना बहुत बड़ा झटका माना जा रहा है। इसके अलावा संप्रग गठबंधन को एक और झटका तब लगा था जब महाराष्ट्र विधानसभा के नेता विपक्ष राधाकृष्ण विखे पाटिल ने चुनाव प्रचार करने से मना कर दिया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि पवार ने उनके परिवार का अपमान किया था। इसके अलावा उनके बेटे पहले ही भाजपा में शामिल हो चुके हैं।

सेना-भाजपा ने निपटाए झगड़े  

महाराष्ट्र कुछ समय पहले तक भाजपा-नीत राजग के लिए सबसे बड़ा खतरा माना जा रहा था। मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस द्वारा विकास कार्यों में कोताही न बरतने के बावजूद आशंका जताई जा रही थी कि शिवसेना-भाजपा की दरार और शनि शिगनापुर के अधिग्रहण जैसे मसलों से भाजपा का कोर हिन्दुत्ववादी वोटर बंट या उदासीन हो सकता है। पर चुनाव आते-आते 2014 में क्रमशः 23 और 18 सीटें जीतने वाली भाजपा और शिवसेना ने सारे मसले निपटा कर 25-23 के फार्मूले से प्रदेश की 48 सीटों पर लड़ने की घोषणा कर दी।

महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव 4 चरणों में होंगे और तारीखें 11, 18, 23, और 29 अप्रैल की होंगी। चुनाव आयोग की योजना 23 मई को मतगणना कर उसी दिन नतीजों की घोषणा की है।

सुधीर ‘तेंदुलकर’ गौतम बने दुनिया के सबसे बड़े क्रिकेट फैन, मिला ग्लोबल फैन अवार्ड

सचिन तेंदुलकर क्रिकेट से संन्यास ले चुके हैं और आज क्रीज पर खेलते हुए नहीं दिखते हैं, लेकिन सचिन के सबसे बड़े फैन सुधीर गौतम भारत का हर मैच आज भी देखने और भारत को चियर-अप करने स्टेडियम में जरुर आते हैं। भारतीय टीम विश्व के किसी भी देश में खेल रही हो सुधीर वह जरुर जाते हैं और लोगों को भूलने नहीं देते हैं कि सचिन तेंदुलकर अब क्रिकेट से संन्यास ले चुके हैं।

2019 आईसीसी विश्व कप में क्रिकेट के डाई-हार्ड प्रशंसकों को पहचान देने और सम्मानित कर रही है। भारत की ही इंडियन स्पोर्ट्स फैन (ISF) कम्यूनिटी वर्ल्ड कप 2019 के दौरान ग्लोबल स्पोर्ट्स फैंस अवॉर्ड्स कार्यक्रम में विश्व के सबसे बड़े फैंस का सम्मानित किया जा रहा है और इन सबसे बड़े फैंस की लिस्ट में भारत के सुधीर गौतम भी शामिल हैं।

कार्यक्रम में कुल 5 फैंस का सम्मान होगा, उनमें से एक सुधीर कुमार गौतम को चुन लिया गया है। सचिन तेंदुलकर ने अपने ट्विटर एकाउंट से इसकी सूचना दी। सचिन तेंदुलकर ने ट्वीट में, “हमारे फैंस ही हमें वो बनाते हैं, जो हम हैं। स्पेशल फैन सुधीर गौतम को पहला ISF अवार्ड जितने पर बधाइयाँ। भारत का झंडा हमेशा इसी तरह ऊँचा रखना।”

सुधीर गौतम ने दर्शक के रूप में अपने जीवन में अब तक कुल 319 वनडे, 66 टेस्ट, 73 टी-20, 68 आईपीएल और 3 रणजी ट्रॉफी के मैचों में हिस्सा लिया हैं। सुधीर पिछले 18 सालों से भारतीय क्रिकेट के फैन बने हुए हैं और सचिन तेंदुलकर के दीवाने हैं।

ISF अवार्ड

यह ऐतिहासिक ISF पुरस्कार समारोह उन प्रशंसकों के खेल में व्यक्तिगत योगदान को पहचान दिलाता है, जिन्होंने अपनी पसंदीदा टीमों की सेवा करने में एक दशक से अधिक समय बिताया है।

विश्वभर के चुनिन्दा फैन्स में से एक भारतीय को अवॉर्ड मिलना गौरव की बात है। सुधीर गौतम आज भी मैच के दौरान अपने शरीर पर तिरंगे के साथ ‘मिस यू तेंदुलकर’ लिखवाकर आते हैं। यह जोश और जूनून उन्हें फैन्स से अलग बनाता है और यही वजह है कि उन्हें यह सम्मान मिला है।

राफेल से जुड़े आधे-अधूरे तथ्यों को सार्वजनिक करना राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़: रक्षा मंत्रालय

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का उत्तर दे दिया है जिसमें कोर्ट ने तीन विवादास्पद दस्तावेजों को राफेल मामले में दाखिल पुनर्विचार याचिका में साक्ष्य के तौर पर स्वीकार कर लिया है। समाचार एजेंसी एएनआई ने इस आशय से ट्वीट किया है।

एक प्रेस विज्ञप्ति में रक्षा मंत्रालय ने दोहराया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा पेश किए जा रहे दस्तावेज़ न केवल ‘चुराए’ हुए हैं बल्कि उनका इस्तेमाल रक्षा व राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामले में अधूरी और भ्रामक छवि प्रस्तुत करने के लिए किया जा रहा है।

‘याचिकाकर्ताओं द्वारा पेश दस्तावेज यह नहीं दिखाते कि कैसे मुद्दों का समाधान किया गया था और उचित अधिकारियों से अनुमति ली गई थी। यह सुविधाजनक तरीके से हिस्से चुनकर तथ्यों और अभिलेखों का आधा-अधूरा प्रदर्शन करने का प्रयास है।’

‘जरूरी दस्तावेज़ हम पहले ही दे चुके हैं’

रक्षा मंत्रालय ने इस पर भी जोर दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने जो-जो दस्तावेज़ माँगे थे वे उसे पहले ही दिए जा चुके हैं। यही नहीं, कैग को भी सरकार ने सभी फाइलें और अभिलेख उपलब्ध कराए थे। ‘हमारी मुख्य चिंता इस बारे में है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी संवेदनशील और क्लासिफाइड जानकारी सार्वजानिक हो जाएगी।’ रक्षा मंत्रालय ने अपने कथन में कहा।

बुधवार को राफ़ेल मामले में दायर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के उस तर्क को ख़ारिज कर दिया था जिसमें गुप्त दस्तावेजों की साक्ष्य के तौर पर स्वीकार्यता पर आपत्ति की थी। कोर्ट अपने ही पूर्व में (गत 14 दिसंबर, 2018) को दिए गए उस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें उसने फ़्रांस की दसौं से 36 राफ़ेल जेट खरीद के मामले की जाँच के आदेश से इंकार कर दिया था।

ताज़ा सुनवाई में कोर्ट का मुख्य ध्यान ‘चोरी’ किए गए दस्तावेज़ों की स्वीकार्यता और उसके विरुद्ध विशेषाधिकार के सरकार के दावे को लेकर था।

केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे अटॉर्नी-जनरल केके वेणुगोपाल ने तर्क दिया था कि यह पुनर्विचार याचिका सिरे से ख़ारिज कर देनी चाहिए क्योंकि यह जिन दस्तावेजों पर आधारित है वह ‘चोरी’ के हैं

मार्च में वामपंथी और विवादास्पद अधिवक्ता प्रशांत भूषण 8 पन्नों का एक नोट सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रस्तुत करना चाहते थे जोकि तथाकथित रूप से रक्षा मंत्रालय से चुराया हुआ था और बाद में द हिन्दू के एन राम ने प्रकाशित किया था। राफ़ेल समझौते में मूल्य-निर्धारण के लिए बातचीत हेतु अधिकृत भारतीय दल (Indian Negotiation Team) के इस नोट का इस्तेमाल इस आरोप के साक्ष्य के तौर पर हुआ था कि राजग के समय हुआ राफ़ेल समझौता संप्रग के समय के राफ़ेल समझौते, जिसे ख़ारिज कर दिया गया था, से अधिक महँगा है।

‘पकड़े’ गए थे एन. राम

मोदी सरकार को निशाना बनाने के लिए हिन्दू ने अपने पास मौजूद रक्षा मंत्रालय के नोट में क्रॉपिंग और छेड़छाड़ कर यह दावा किया था कि रक्षा मंत्रालय इस नए समझौते के खिलाफ था और केवल प्रधानमंत्री इसके लिए दबाव बना रहे थे। इस आरोप को बल देने के लिए नोट में से तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर की लिखी एक टिप्पणी को हटा दिया गया था।

हिन्दू की खबर छपने के तुरंत बाद एएनआई ने पूरे दस्तावेज़ को छापा जिसने यह साबित कर दिया कि हिन्दू द्वारा मूल नोट के साथ छेड़छाड़ की गई है। इसको लेकर समाचारपत्र को काफ़ी शर्मिंदगी भी झेलनी पड़ी जिसके बाद एक स्पष्टीकरण कर यह दावा करने की कोशिश की गई कि उनके द्वारा छापा गया नोट नकली नहीं, केवल पुराना है, और मनोहर पार्रिकर की टिप्पणी बाद में जोड़ी गई। पर उनका यह दावा भी सवालों के घेरे में आ गया जब रक्षा विश्लेषक अभिजीत अय्यर-मित्रा ने उसमें मनोहर पार्रिकर के नोट के अलावा अन्य चीज़ें भी मिटाए जाने की ओर इंगित किया

100 साल बाद जलियाँवाला नरसंहार पर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने भरी संसद में ऐसे जताया खेद

अप्रैल 13, 2019 को भारतीय इतिहास और ब्रिटिश उपनिवेशवाद के दौरान घटे जलियाँवाला बाग हत्याकांड के काले अध्याय के 100 वर्ष पूरे हो जाएँगे। इससे पहले इस मामले पर एक नई चर्चा ने आजकल जोर पकड़ा है। कल ही ब्रिटेन के विदेश मंत्री मार्क फील्ड ने हाउस ऑफ कॉमन्स कॉम्प्लेक्स के वेस्टमिंस्टर हॉल में जलियाँवाला बाग हत्याकांड पर आयोजित एक बहस में कहा कि इतिहास में यह एक ‘शर्मनाक प्रकरण’ के रूप में दर्ज है। लेकिन, इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान को बार-बार अतीत में खींचने का कोई मतलब नहीं है। उन्होंने कहा कि बार-बार इस घटना के लिए माफी की माँग ब्रिटिश राज से संबंधित कई दूसरी समस्याओं को पैदा करेगा।

इसके बाद आज (अप्रैल 10, 2019) को ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने ब्रिटिश संसद (हाउस ऑफ़ कॉमन्स) में जलियाँवाला बाग हत्याकांड पर खेद व्यक्त किया है। थेरेसा मे ने कहा, “जो भी हुआ था और उससे लोगों को जो पीड़ा हुई, उसका हमें बेहद अफसोस है।” उन्होंने आगे कहा, “1919 की जालियाँवाला बाग त्रासदी ब्रिटिश-भारतीय इतिहास के लिए शर्मनाक धब्बा है। जैसा कि महारानी एलिजाबेथ द्वितीय ने 1997 में जालियाँवाला बाग जाने से पहले कहा था कि यह भारत के साथ हमारे बीते हुए इतिहास का दुखद उदाहरण है।”

ब्रिटेन अक्सर अपने औपनिवेशिक अतीत के इस नरसंहार को लेकर माफ़ी माँगने से बचता रहा है। ब्रिटिश हुकूमत के दौरान, आजादी से पहले के इतिहास में कई ऐसे प्रकरण हैं, जिन पर बात करने में आज तक ब्रिटिश संसद को समय और संसाधनों का दुरुपयोग नजर आता है। ऐसे हालातों में PM थेरेसा द्वारा संसद में जलियाँवाला बाग की घटना पर दुःख प्रकट करना एक पहल मानी जा सकती है।

ब्रिटेन के विदेश कार्यालय के मंत्री मार्क फील्ड ने कल ही एक बयान में कहा, “भारत के साथ समृद्ध संबंधों की पूरी संभावना है और जलियाँवाला बाग पर कोई अलग स्पष्टीकरण इसे विशेष रूप से मजबूती देगा।” जलियाँवाला हत्याकांड दुनिया के सबसे जघन्य नरसंहारों में से एक माना जाता है। इस हत्‍याकांड में करीब 1000 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 1500 से अधिक लोग घायल हो गए थे, ये वो विवादित आँकड़े हैं जिन्हें तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने जारी किया था।

भारतीय मूल के लेबर सांसद वीरेंद्र शर्मा ने ब्रिटिश प्रधान मंत्री थेरेसा मे से औपचारिक माफी मांँगने का आह्वान किया है। अन्य कई लोगों ने इस माँग का समर्थन किया और जलियाँवाला नरसंहार में जान गँवाने वालों की याद में एक भौतिक स्मारक के निर्माण की संभावना जताई।

100 वर्ष पूरे होने पर ब्रिटिश सरकार पर जलियाँवाला नरसंहार के लिए मोदी सरकार द्वारा ब्रिटेन से माफी माँगने का लगातार दबाव बनाया जा रहा था। अब मोदी सरकार के दौरान कूटनीतिक मामलों पर भारत की सबसे बड़ी जीत देखने को मिली है। विदेश संबंधों का स्वर्णिम समय मोदी सरकार के दौरान देखने को मिला है और पुलवामा आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान जैसे देशों का वैश्विक स्तर पर बहिष्कार देखना इसका एक उदाहरण है। यहाँ तक कि आज सुबह ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने बयान दिया कि भारत-पाकिस्तान के बीच सम्बन्ध मोदी सरकार के दौरान ज्यादा बेहतर हो सकते हैं। शायद इसी कारण से ही इमरान खान ने भाजपा को ही वोट देने की अपील कर डाली है।

तेलंगाना में मनरेगा के तहत काम कर रहे 10 मज़दूरों की हुई मौत, 1 घायल

बीते दिनों यूपी में मनरेगा मज़दूरों को लेकर खुशखबरी सुनने को मिली थी कि बजट में उनके वेतन में तीस फीसदी का अधिक इजाफ़ा किया गया है लेकिन आज तेलंगाना में मनरेगा मजदूरों से जुड़ी दिल दुखाने वाली खबर आई है।

यह खबर तेलंगाना के नारायनपेट जिले के मणिकल गाँव से आई है। जहाँ मनरेगा के तहत काम कर रहे मज़दूरों पर एक मिट्टी का टीला भरभराकर गिर गया है। मीडिया खबरों की मानें तो इस हादसे में 10 मज़दूरों की मौत और 1 व्यक्ति के घायल होने की जानकारी है। हादसा आज (अप्रैल 10, 2019) दोपहर का है।

इस हादसे में मरने वालों में महिलाएँ भी शामिल हैं। एएनआई ट्वीट के मुताबिक पुलिस ने बताया है कि मृतकों के शरीर को पोस्टमॉर्टम के लिए लोकल अस्पताल भेजा जा रहा है। साथ ही घायल व्यक्ति को भी अस्पताल में भर्ती किया गया है। मीडिया खबरों के मुताबिक हादसे के समय घटना स्थल पर 15 लोग मौजूद थे। हादसे के बाद से वहाँ राहत और बचाव कार्य जारी है। लोगों को जेसीबी मशीनों की मदद से निकाला जा रहा है।

मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव ने इसपर हादसे पर गहरा दुख प्रकट किया है। इसके साथ ही सीएम ने इस हादसे को दुर्भाग्‍यपूर्ण बताते हुए अफसरों को घायलों और पीड़ित परिवारों को सभी जरूरी मदद मुहैया कराने के निर्देश दिए हैं।

फैक्ट चेक: कंगना ने दिया शबाना के ‘अपमानास्पद’ ट्वीट का जवाब?

शबाना आज़मी और उनके पति जावेद अख़्तर को अक्सर ख़बरों में बने रहने के शौक के लिए हिन्दुओं की भावना आहत करने वाला कोई ना कोई कारनामा करते हुए देखा जाता है। इस बार सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक इन्फोग्राफिक पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए, शबाना ने ट्विटर पर लिखा कि उन्होंने ऐसा कभी नहीं कहा।

वायरल हो रही यह तस्वीर शबाना आज़मी के अंग्रेजी में दिए एक विवादित बयान के हिंदी अनुवाद की है, जिस पर आज़मी को आपत्ति है। शबाना आज़मी ने 2017 ट्वीट में लिखा था, “इस नवरात्रि, मैं अल्लाह से दुआ करती हूँ कि लक्ष्मी को भीख न माँगना पड़े, कोई दुर्गा गर्भ में न मरे, न पार्वती को दहेज देना पड़े, न सरस्वती को शिक्षा से वंचित किया जाए और न ही किसी काली को ‘फेयर एंड लवली’ की ज़रूरत पड़े। इंशाल्लाह!”

सोशल मीडिया पर शबाना आज़मी को उनके इस पुराने बयान को ट्विटर यूज़र्स ने याद दिलाया, लेकिन सोशल मीडिया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर दोनों तरफ काम करता है। इसके सकारात्मक पहलू भी हैं और नकारात्मक पहलू भी, कभी यह आपके पक्ष में काम करता है तो कभी आपके विपक्ष में।

व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी द्वारा जारी शबाना के ‘अपमानास्पद’ बयान पर कंगना के ‘पलटवार’ की वायरल तस्वीर

इस तस्वीर के अनुसार शबाना आज़मी के ‘अपमानास्पद’ बयान पर कंगना रनौत ने पलटवार किया है और बेहद तीखा कटाक्ष करते हुए कहा है, “मैं ईद पर ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि किसी आइशा का 6 साल की उम्र में निकाह ना हो, शाहबानो को ट्रिपल तलाक़ ना मिले, मीनाकुमारी हलाला ना हो। फातिमा को 4 की बीबी ना बनना पड़े, इशरत आतंकवादी ना बने, शेहला को बुरका ना पहनना पड़े। किसी मुमताज को 14 बच्चे पैदा ना करना पड़े! – कंगना रनौत”

क्या है सच्चाई?

सोशल मीडिया पर शबाना के इस घेराव के बाद फ़ौरन एक दूसरी तस्वीर देखने को मिली, जिसमें बॉलीवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत को शबाना आज़मी की क्लास लगाते हुए देखा गया। इस तस्वीर के ऊपर बड़े अक्षरों में लिखा है, “कंगना के पलटवार से सन्न रह गई शबाना?”
शबाना के ट्वीट को ‘अपमानास्पद’ बताने वाली इस तस्वीर की सच्चाई ये है कि इस तरह की तस्वीरें सिर्फ व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी पर बैठे लोगों, यानी खाली बैठे लोगों द्वारा समय बिताने के लिए बनाई जाती हैं। हालाँकि, इस प्रकार की तस्वीरों में कहीं ना कहीं आहत हुई आस्थाओं का भी योगदान रहता है, वही आस्थाएँ जिन्हें अक्सर शबाना जैसे लोग सिर्फ चर्चा में आने के लिए निशाना बनाती हैं।

कंगना रनौत अक्सर सामाजिक मुद्दों को लेकर मुखर रहती हैं और खुलकर अपनी राय रखने के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने शबाना को पुलवामा हमले के बाद भी जमकर घेरा था। शायद यही कारण है कि जज्बाती समर्थकों ने कंगना के नाम पर ही इस तरह की झूठी तस्वीर ‘वायरल’ करने का निर्णय लिया। कंगना का ट्विटर पर फिलहाल कोई व्यक्तिगत एकाउंट नहीं है और ना ही उन्होंने शबाना को लेकर इस मुद्दे पर इस्लाम के विरोश में कोई बात कही है। इसलिए यह तस्वीर भाषा और वर्तनी से लेकर इस्लाम के अपमान तक एकदम फ़र्ज़ी है।

दरअसल शबाना ने 2017 में दुर्गा अष्टमी के अवसर पर विवादास्पद पोस्ट किया था। शबाना ने ट्वीट किया था, “इस दुर्गा अष्टमी, आइए हम प्रार्थना करें कि किसी दुर्गा का गर्भपात न हो, किसी भी सरस्वती को स्कूल जाने से न रोका जाए, किसी लक्ष्मी को पति से भीख न माँगनी पड़े, किसी भी पार्वती को दहेज के लिए बलि नहीं दी जाए और न ही किसी काली को फेयरनेस क्रीम के ट्यूब की ज़रूरत पड़े।”

शबाना द्वारा 29 सितंबर, 2017 को किया गया यह ट्वीट एक बार दोबारा चर्चा का विषय बना और फिर सोशल मीडिया पर लोगों ने अपने-अपने तरीके से शबाना के इस बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त की।

कॉन्ग्रेस नहीं है Pak को पसंद, शांति के लिए इमरान को मोदी से है उम्मीद: ये डर, दबाव या कुछ और!

चुनाव मतदान का पहला चरण शुरू होने से ठीक पहले एक तरफ़ जहाँ कॉन्ग्रेस पार्टी के कद्दावर नेता भी पार्टी को छोड़कर मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार में अपनी रूचि दिखा रहे हैं, तो वहीं ‘उरी’ और ‘बालाकोट’ जैसे हमलों के बाद भी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान तक कॉन्ग्रेस को भारतीय सत्ता संभालते नहीं देखना चाहते हैं। ऐसा इमरान ने खुद मीडिया को दिए बयान में कहा है।

दरअसल, पाकिस्तान प्रधानमंत्री इमरान खान के बयान के अनुसार लोकसभा 2019 के चुनावों में नरेंद्र मोदी को दोबारा से सत्ता मिलती है तो शांति वार्ता होने की बेहतर उम्मीद है। जबकि इमरान का मानना है कि अगर नरेंद्र मोदी के सिवा कॉन्ग्रेस सरकार सत्ता में आती है तो कश्मीर मुद्दे समेत कई मुद्दों पर बातचीत की राह काफ़ी मुश्किल हो जाएगी।

इमरान खान के इस बयान के बाद हालाँकि विपक्ष ने इस पर अपनी राजनीति साधने का पूरा प्रयास किया। कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने ट्वीट करते हुए कहा है कि पाकिस्तान आधिकारिक तौर पर मोदी के साथ हो गया है। उनकी मानें तो मोदी को वोट करने का पर्याय पाकिस्तान को वोट करना है।

माना जा रहा है कि इमरान खान ने चुनावी माहौल के मद्देनज़र ऐसा बयान दिया है। ट्वीटर पर मोदी विरोधी लोग इस बयान को हथियार समझकर इस्तेमाल करने पर जुटे हुए हैं, विपक्ष लगातार वार करने के लिए प्रयासों में जुटा है। वहीं मोदी समर्थकों का कहना है कि इमरान खान और पाकिस्तान को मालूम चल चुका है कि मोदी सरकार दोबारा सत्ता में आने वाली है, जिसके कारण वह उन्हें मक्खन लगा रहे हैं।

ऐसे में ट्वीटर पर आपस में भिड़े इन दोनों तरह के ‘समर्थकों’ की लड़ाई में उलझने की जगह यह समझना जरूरी है कि इस समय इमरान खान पर और पाकिस्तान पर मोदी के कारण बहुत बड़ा दबाव बना हुआ है। जिसे भारत की कूटनीतिक जीत भी कहा गया है। पुलवामा हमले के बाद पेरिस में एक हफ्ते तक चली बैठक के बाद पाकिस्तान को FATF की ओर से ग्रे लिस्ट में बनाए रखा गया था। यहाँ भारत ने पाकिस्तान पर विशेष नजर रखने और उन्हें दी जाने वाली फंडिंग को रोकने की माँग की थी। जिसके बाद FATF ने उसे ‘ग्रे लिस्ट’ में शामिल रखा था और उससे कहा गया था कि अगर वो खुद में सुधार नहीं करता है तो उसे ब्लैक लिस्ट कर दिया जाएगा। यहाँ पाकिस्तान ने FATF से 200 दिनों की मोहलत माँगी थी।

इसके अलावा न चाहते हुए भी पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय दबाव में आकर मसूद अजहर के मामले में नकेल कसनी पड़ी थी। बता दें कि पुलवामा हमले के बाद संयुक्त राष्ट्र ने हमले को न केवल जघन्य और कायराना बताकर इसकी निंदा ही की थी। बल्कि जोर देकर कहा था कि इस तरह की हरकतों को करने वालों और इन्हें फंडिंग कर देने वालों कटघरे में खड़ा करना चाहिए।

इतना ही नहीं नए साल की शुरूआत के साथ इस बात को सरकार ने साझा किया था कि पाकिस्तान की हिरासत में भारत के 503 मछुआरे हैं। जिसके बाद पाकिस्तान ने इस बात को स्वीकारा कि उसने 483 भारतीय मछुआरों को हिरासत में लिया हुआ है। इस दौरान विदेश राज्य मंत्री वीके सिंह ने बताया था कि 2014 से अनेकों प्रयासों के बाद पाकिस्तान से 1749 भारतीय कैदी रिहा हुए हैं। इसके अलावा अभी हाल ही में पाकिस्तान ने बाघा बॉर्डर के जरिए 100 कैदियों को भारत रिहा किया है। और बाकी के कैदियों को रिहा करने की तारीख़ भी बता दी है।

इस कदम को भले ही पाकिस्तान ने ‘सद्भावना’ के तहत उठाया कदम बताया गया हो, लेकिन सच यही है कि ये पाकिस्तान के भीतर मोदी सरकार का डर है। जिसके कारण वो ज्यादा समय अपनी हठों पर टिकने के लिए नाकाबिल हैं। वो चाहते हुए भी भारत के ख़िलाफ़ कोई कदम नहीं उठा सकता है।

जो इस बात को कह रहे हैं कि मोदी के चुनाव जीतने पर पाकिस्तान में बम फूटेंगे, वो उन्होंने शायद इमरान खान के पूरे बयान को ध्यान से नहीं सुना है। क्योंकि पाकिस्तानी पीएम इमरान खान अपने बयान में मोदी पर कई आरोप भी लगाएँ हैं, जो साबित करते हैं कि भले ही पाकिस्तान कॉन्ग्रेस के सत्ता में आने को लेकर चिंतित है, लेकिन मोदी सरकार की जीत को लेकर फायदा वाली बात कहने का मतलब मोदी को ‘समर्थन’ देना या मोदी का ‘समर्थन’ पाना तो बिलकुल भी नहीं है। लेकिन हाँ, इसे डर जरूर कहा जा सकता है क्योंकि अनेकों शिकायतों और हैरानी होने के बाद भी वो कामना करते हैं कि मोदी की सरकार वापस बने।

तेजस्वी यादव: शेर का बेटा हूँ; सुप्रीम कोर्ट: लालू चोर है; बिहारी: ये लेख पढ़ लो

श्री अमिताभ बच्चन जी की एक फिल्म में कुछ दुष्ट लोगों ने उनके हाथ पर लिख दिया था, “मेरा बाप चोर है।” चोर तो बहुतों के बाप होते हैं, लेकिन बहुत कम के बच्चे ऐसे होते हैं जो बाप के जेल में होने के बावजूद उसके शेर होने का दंभ भरते हैं और पूरी दुनिया को गुंडा बताते हैं। ऐसे ही एक व्यक्ति का नाम है तेजस्वी यादव।

बिहार को गाली बना देने वाले अपराधी का लौंडा आज ट्विटर पर लालटेन टाँग कर लिखता है कि वो शेर का बेटा है, गीदड़ भभकी से नहीं डरता। हालाँकि, इस ट्वीट में अपनी आदत, और लालू-राबड़ी के द्वारा पूरी शिक्षा व्यवस्था की माचिस जला कर डाह देने वाले तेजस्वी ने वर्तनी की कोई गलती नहीं की, जो सराहनीय है। हो सकता है कि उसका ट्विटर कोई ऐसा बिहारी हैंडल कर रहा हो जिसकी पूरी परवरिश उसके बाप के दौर के आतंक के कारण बिहार से बाहर हुई हो।

तेजस्वी का घमंड और ख़ानदानी चोर होने के बावजूद ये कॉन्फ़िडेंस बताता है कि डकैतों और घोटालेबाज़ों की डिक्शनरी में लज्जा शब्द की जगह नहीं होती। वैसे भी लालू परिवार में डिक्शनरी जैसी कोई किताब हो, यह मानने में मुझे संदेह है क्योंकि हो न हो इन लोगों ने बिहार के बच्चों के लिए बनी हर किताब पर लालटेन का किरासन तेल डालकर जाड़े में अलाव जला कर ताप लिया होगा।

इस आदमी की धृष्टता तो देखिए कि बाप जेल में है, सुप्रीम कोर्ट ने आज ही उसे याद दिलाया कि वो अपराधी है, और बेटा गुंडों से लड़ने का ऐलान कर रहा है! अरे भाई, बिहार में गुंडे अब बचे कहाँ, सारे तो तुम्हारी पार्टी के काडर हैं जो पिछले कुछ महीनों से शांत बैठे हैं। तुमने दोबारा सत्ता पाते ही जो अपराध का नंगा नाच शुरू किया था, वो 2015 और 2016 में बिहार को दोबारा दिखने लगा था।

बिहार में पैदा हुआ हूँ, सरकारी स्कूल में पढ़ने की ही क्षमता थी, लेकिन कर्ज लेकर प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाई की क्योंकि सरकारी स्कूलों में न तो शिक्षक आते थे, न मकान थे। मेहनत कर के, घर से दूर रह कर, परीक्षाएँ पास कर के सैनिक स्कूल तिलैया तक पहुँचा और जीवन में कुछ ठीक कर पाया हूँ। दुर्भाग्य से इसका श्रेय भी तुम्हारे ही बाप को जाता है। हर छुट्टी इस ख़ौफ़ में बीतती थी कि कब कोई अपहरण कर लेगा, भले ही अगर अपहरण हो जाता तो मेरे माँ-बाप मुझे छुड़ाने के लिए पैसे कहाँ से लाते, ये कोई नहीं जानता।

और तुम दंभ भरते हो कि तुम बिहार की महान माटी के लाल हो! तुमने उतनी पढ़ाई नहीं की है तेजस्वी यादव कि तुम्हें महान या मिट्टी, दोनों में से एक का भी सही अर्थ मालूम हो। तुम और तुम्हारे परिवार ने बिहार की मिट्टी पर मूत्र विसर्जन और विष्ठा करने के अलावा कुछ नहीं किया है। तुम्हारे बाप ने बिहार को तबाही का वो दौर दिखाया है कि वहाँ से और नीचे गिरने का सवाल ही नहीं था। और तुम दंभ भरते हो कि बिहार की महान माटी के लाल हो!

बिहार की मिट्टी से दिनकर जैसे लोग पैदा होते हैं, लालू जैसे घोटालेबाज़ डकैतों को इस मिट्टी से मत जोड़ो। थोड़ी शर्म कर लो यार, बाप जेल में है, इतने समय केस चला और बुढ़ापे में ही सही, सजा तो हुई। लेकिन, बात तो वही है कि अपराध को ग्लैमराइज करके नेतागीरी चमकाने वाले लोग तो इस जेल को बैज ऑफ ऑनर मानते हैं।

यही कारण है कि राबड़ी देवी का ट्विटर अकाउंट है, और वो उससे ग़रीबों के मसीहा और सामाजिक न्याय के पुरोधा लालू के लिए साज़िश और पता नहीं क्या-क्या शब्द बताकर खोते जनाधार को पाने की कोशिश कर रही है। वैसे साज़िश तो लालू-राबड़ी ने बहुत अच्छी रची थी कि किसी भी बिहारी को ढंग की शिक्षा ही न मिले, उसे नकारा बनाए रखो, और गरीबी-निचली जाति-आरक्षण की बातें कह कर उसके वोटों का दोहन करते रहो।

बीस साल तुम्हारे परिवार ने बिहार को तबाह किया। तुम में दो पैसा शर्म होती तो किसी गुमनाम देश की नागरिकता लेकर, मुँह छुपाकर जीवन व्यतीत कर रहे होते। लेकिन जिनके घरों में चोरी ही मेन्स्ट्रीम हो, ईमानदारी एक अवांछित अवगुण, तो शर्म काहे आएगी।

स्कूटर पर भैंस ढोने वाले परिवार की जीनियस संतान आखिर पोस्टरों पर लिखे जयघोषों का सहारा नहीं लेगी तो जाएगी कहाँ! साथ ही, मैं फिर से दावे के साथ कह सकता हूँ कि तेजस्वी यादव की औक़ात नहीं है वो दो वाक्य हिन्दी या भोजपुरी भी सही से लिख ले। ये जो लिखवाया भी होगा तो उसी व्यक्ति से जिसका भविष्य लालू-राबड़ी के अंधकार युग में बर्बाद हो रहा होगा, और उसके घरवालों ने उसे बाहर पढ़ने भेजा होगा।

वैसे मुझे नेताओं के निरक्षर होने पर कोई समस्या नहीं है, लेकिन जिसके बाप के कारण पूरा राज्य अशिक्षा के अंधेरे में जीने को मजबूर हो, उसके ऊपर तंज करने का मुझे पैदाईशी हक है क्योंकि उसके परिवार द्वारा लगाए गए हर अवरोध को पार करने के बाद मैं इस स्तर पर पहुँचा हूँ कि दो लाइन लिख और बोल सकूँ। ये अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।

ये भी बड़ी अच्छी बात है कि इन्होंने अपनी पार्टी का चिह्न भी लालटेन चुना है। आप सोचिए कि जिसका विजन बल्ब तक जा ही ना रहा हो, वो आखिर राज्य का भविष्य कहाँ तक ले जाएगा। बत्ती, किरासन तेल, काँच और उसका कमज़ोर फ़्रेम राजद की राजनीति और विजन के बारे में बहुत कुछ कहता है। ये ऐसे ग़ज़ब के लोग हैं कि अगर इन्हें पानी का स्रोत चुनाव चिह्न में रखना होता तो ये नदी की जगह नाली या सड़के के गड्ढे में जमा पानी को चुन लेते।

खैर, लालू की देन यही है कि बिहारियों को चाणक्य, पतंजलि, आर्यभट्ट, अशोक, चंद्रगुप्त, राजेन्द्र प्रसाद, दिनकर, गौतम बुद्ध, महावीर, गुरु गोविंद सिंह, पार्श्वनाथ, नालंदा, पाटलिपुत्र के गौरवशाली इतिहास को भुलाकर बिहारी होने पर शर्म महसूस करने पर मजबूर कर दिया। उस पाटलिपुत्र और बिहार से संबंध बताने पर झिझक होने लगी जो ऐसी महान विभूतियों की जन्म और कर्मस्थली रही। उस पाटलिपुत्र और बिहार से खुद को जोड़ने पर दो बार सोचना पड़ता था जिसने महानता के अलावा और कुछ देखा ही नहीं था।

और तुम, तेजस्वी यादव तुम, बिहार की महान माटी से खुद को जोड़ रहे हो? शर्म नहीं आई ट्वीट करते हुए? बाप के कारनामे याद नहीं आए? उँगलियाँ नहीं काँपी तुम्हारी टाइप करते हुए? तुम और तुम्हारा परिवार कलंक है बिहार के नाम पर। चुल्लू भर पानी लो और नाक डुबाकर मर जाओ। राजनीति ही है कि तुम्हारे जैसे लोग पब्लिक में आज भी खड़े हो लेते हैं, ट्वीट करते हैं वरना अगर हमारी न्याय व्यवस्था ने थोड़ी और कड़ाई दिखाई होती, सरकारों ने तुम्हारे परिवार के खिलाफ केस को द्रुत गति से आगे किया होता, तो तुम अठारह साल के होते ही जेल में होते, सपरिवार।

इसलिए, लोगों को ठगना बंद करो। नारेबाज़ी और दूसरों से पोस्टर बनवा कर, खुद के महान होने का घमंड मत करो, अपने वृद्ध अपराधी पिता को देखो जो जेल में सजा काट रहा है। जो बोया है, वो काटना पड़ेगा। समय का पहिया घूमता रहता है, भले ही तुम्हारे परिवार के लोग उस पहिए पर किरासन डालकर लालटेन से आग लगाने की बहुत कोशिश कर चुके। समय रुकता नहीं, समय बदलता है।

मैं बिहार से हूँ। किसान का बेटा हूँ। तुम्हारे जैसे लौंडों की दो कौड़ी की राजनीति और बयानबाज़ी आए दिन देखता रहता हूँ जिनकी एक मात्र उपलब्धि किसी का बेटा या बेटी होना है। तुम लालू के बेटे हो इसलिए तुम्हें पार्टी और पद मिला है। वरना, सड़क पर भीख माँगने जाओगे, तो तुम में वो क़ाबिलियत भी नहीं है कि कोई कटोरे में सिक्का डाल दे।

अंत में, एक बात और, अगर बिहार में सच में गुंडे बचे होते, और उनमें थोड़ा भी ज़मीर होता तो तुम्हें सड़क पर पटक कर, तुम्हारी बाँह पर वही गोद देते, जो अमिताभ के हाथ पर किसी ने गोदा था, “मेरा बाप चोर है।”

नोट: बाप शब्द के प्रयोग से जिनको आपत्ति है वो नब्बे के दशक में जन्मे किसी बिहारी से चर्चा कर लें।