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ब्रह्मा, विष्णु और भगवान शिव हैं बलात्कारी: इस्लामिक सेंटर के प्रवक्ता ने हिंदू समुदाय के ख़िलाफ़ उगला ज़हर

जहाँ एक तरफ कनाडा में चुने हुए नेतागण पीछे की तरफ झुकते हुए अपनी ‘इस्लामोफोबिया विरोधी’ सोच को प्रस्तुत करने में ज़ोर-शोर से लगे हुए थे, टोरंटो में स्थित इस्लामिक सेंटर ‘हिन्दफोबिया’ के आरोपों का सामना कर रहा था। ये आरोप कनाडा में रहने वाले उन हिन्दुओं की तरफ से लगाए गए जो आमतौर पर राजनीति में रूचि नहीं रखते। उनका गुस्सा नूर कल्चरल सेंटर पर फूट रहा था, जिसके द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम का शीर्षक कुछ इस प्रकार था: “भारत में मुस्लिमों और दलितों का उत्पीड़न”। यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब कुछ ही दिनों बाद भारत में आम चुनाव होने हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूरे ज़ोर-शोर से चुनाव में उतर चुके हैं।

अगर इस कार्यक्रम में भारतीय राजनीतिक विचारधारा के सभी पक्षों के वक्ताओं को बुलाया जाता तो शायद लोगों द्वारा लगाए जा रहे आरोपों का शायद ही कोई आधार होता लेकिन इसमें जो भी वक्ता शामिल हुए थे, पीएम मोदी के प्रति उनका द्वेषभाव किसी से छिपा नहीं था। इस विवाद ने तब विकराल रूप धारण कर लिया जब एक के बाद एक कई इमेल्स लीक हुए। ये सारे ईमेल नूर सेंटर के खदीजा कांजी द्वारा टोरंटो के इंटर-फेथ परिषद को भेजे गए थे।

ईमेल में नाइजीरियाई बोको हरम द्वारा लड़कियों के अपहरण और बलात्कार करने की प्रथा की चर्चा करते हुए कांजी ने अरब आक्रमणकारी मोहम्मद बिन कासिम द्वारा भारत पर इस्लामी हमले का बचाव करता दिखा। वही कासिम, जिसने हिंदू महिलाओं का बलात्कार किया और हज़ारों लोगों को अरब में दास के रूप में बेच दिया। कांजी ने इन लीक हुए इमेल्स में दावा किया कि यह “उस समय के मानकों के अनुरूप था।” अपने तर्क को साबित करने के लिए कांजी ने लिखा:

“सभ्यतागत मान्यताओं में बहुत से ऐसे बड़े लोग हैं जो हिंसा या अपराध में लिप्त हैं, जैसे- [हिंदू] देवताओं से ब्रह्मा, शिव और विष्णु (जिन्होंने अनसूया का बलात्कार किया था) और कई अन्य लोगों के अलावा क्रिस्टोफर कोलंबस, रिचर्ड लायनहार्ट।”

मैंने जब मिसेज कांजी से उनके इस घृणित बयान के बारे में पूछा तो जवाब मिला कि उन्होंने चर्चाओं के सन्दर्भ में हिन्दू देवताओं का उदाहरण दिया था। एक अलग ईमेल भेजकर उन्होंने मुझे अपने तर्कों को समझाते हुए लिखा:

“हिन्दू धर्म के बारे में इस तरह से बात करना ठीक नहीं है। जैसे हिन्दुओं में आप एक दो ऐतिहासिक या धार्मिक कहानी या किदार उठाकर पूरे समाज को नहीं लपेट सकते, ऐसे ही मुस्लिमों को लेकर भी किया जाना चाहिए।”

सोशल मीडिया पर हिन्दू हैरान थे। रागिनी शर्मा (यॉर्क विश्वविद्यालय से पीएचडी) नूर सेंटर इवेंट के खिलाफ अभियान का नेतृत्व कर रही थीं। इसे हिंदूफोबिक के रूप में लेबल करते हुए शर्मा ने मुझे बताया:

“इस ईमेल में भारत, हिंदुओं और हिन्दू धर्म के प्रति खदिजा ने जो घृणा व्यक्त की है, उससे मैं काफ़ी स्तब्ध और आहात हूँ। अगर घृणा से भरे उनके इस बयान की छानबीन करें तो पता चलता है कि यह एक गहरे पूर्वाग्रह से ग्रस्त है, यह उनकी मानसिकता को दर्शाता है।

उन्होंने कहा:

‘बलात्कारियों के संदर्भ में ब्रह्मा,शिव और विष्णु का उल्लेख करना हिंदुओं को गहरा दु:ख देना है। कंजी ने दर्शाया है कि उन्होंने इस्लामी चश्मे को पहनकर हिंदु धर्म की पौराणिक कथाओं को समझने के दौरान हिन्दुत्व को पूर्ण रूप से नकारा है’।

शर्मा ने माँग की है कि नूर केंद्र को टोरंटो में रह रहे भारतीयों और हिंदू समुदाय के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि हम इस पर ग़ौर करेंगे, कनाडा जैसे बहुसांस्कृतिक समाज में नफ़रत फैलाने वालों के लिए कोई जगह नहीं हैं।

इसके अलावा विध्या धर जिन्होंने सन् 1990 में अपने बचपन में कश्मीर में हिंदुओं का नरसंहार देखा है। उन्होंने भी इस वाकये पर गहरा दु:ख जताया है। बतौर हिंदू, मुझे यह पढ़कर बहुत हैरानी हुई कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव ब्रह्मंड को संचालित करने वाली त्रिदेव की शक्तियाँ हैं। हमारे भगवान को क्रिस्टोफर कोलंबस से तुलना करना लेखक की हिन्दुओं के प्रति घृणा दिखाता है।

आयोजन में बातचीत के दौरान, मुस्लिम प्रवक्ता सनोबर उमर ने ‘हिंदू अधिकारों’ पर आरोप लगाया कि वह अमेरिकी श्वेत अतिवादियों के समकक्ष हैं। इसके बाद उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी पत्नी को छोड़ने के लिए उन्हें जेल भेजने की माँग की।

इस्लामिक केंद्र के बाहर, कनाडा में रह रहे कुछ हिंदु अपने हाथ में हिंदूफोबिया और भारत उन्मादी गतिविधियों को कनाडा से खत्म करने के लिए तख्तियाँ लिए खड़े हैं।

खास बात यह है कि इस आयोजन पर वहाँ के किसी अखबार ने खबर छापने की कोशिश नहीं कि कहीं इस्लामियों को किसी तरह का दु:ख न पहुँच जाए। जिससे यह सवाल उठता है कि जब भारत की साख और लोकतंत्र में निहित तत्वों को इस्लामवादियों द्वारा रौंदा जा रहा था तो भारतीय राजनयिक वहाँ बैठकर क्या कर रहे हैं।

फैक्ट चेक: ‘मोदी को वोट नहीं देंगी मुस्लिम औरतें’ – ‘आज तक’ का फर्जीवाड़ा पकड़ा गया

आज तक ग्रुप का यूट्यूब चैनल ‘UP तक’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में खुलेआम फेक न्यूज़ फैलाता पकड़ा गया है। उत्तर प्रदेश के देवबंद में मुस्लिम महिलाओं और पुरुषों के इस इंटरव्यू का शीर्षक है, ‘मोदी ने काम तो बहुत किया पर वोट नहीं दे सकते!, क्यों ऐसा बोल रहीं हैं देवबंद की मुस्लिम महिलाएँ?: UP Tak

वीडियो का यह शीर्षक वीडियो की सामग्री के लिहाज से पूरी तरह झूठ है। वीडियो के अन्दर मुस्लिम महिलाएँ न केवल मोदी के द्वारा कराए गए विकास कार्यों की तारीफ़ करतीं हैं और कई योजनाओं का लाभार्थी खुद होने की बात स्वीकारतीं हैं, बल्कि उनमें से एक महिला साफ-साफ कहतीं हैं कि अगर मोदी से उन्हें फायदा हो रहा है तो बिलकुल उन्हें ही वोट देंगी। उनके खुद के शब्दों में, ‘देखो… हम तो बाहर निकलते नहीं हैं… हमें कोई मालूम नहीं है… जहाँ जैसा कोई कहेगा कर देंगे…  भाई, जहाँ से हमें कोई फायदा होगा (परिप्रेक्ष्य में यह विकास कार्यों के फायदे की ओर इंगित करता है), वहाँ अपना लगा देंगे (निशान, मत चिह्न), (अस्पष्ट) भेज देंगे।’ इस कथन को वीडियो में 1:51 के आस-पास से सुना जा सकता है।

चार से की बात, एक ने भी नहीं की मोदी की बुराई  

यूपी तक के वीडियो में चार मुस्लिम समुदाय की महिलाओं से बात की गई है, जिनमें से तीन से मोदी को वोट देने को लेकर सवाल ही नहीं पूछा गया है। एक से सवाल पूछा गया तो उन्होंने उपरोक्त उत्तर दिया। बाकी तीनों का भी मोदी को लेकर नजरिया सकारात्मक ही रहा। यही नहीं, एक मुस्लिम महिला ने तो मोदी ही नहीं, प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भी बात अपनी तरफ से जोड़ कर उनकी तारीफ़ कर दी।

अब जबकि तीन महिलाओं से पूछा ही नहीं कि आप मोदी को वोट देंगी या नहीं, वे मोदी के काम से खुश हैं, और जिस एक से पूछा उसने भी मोदी को वोट देने से इंकार नहीं किया, तो किस आधार पर आज तक ग्रुप के इस चैनल ने लिख दिया कि विकास कार्य होने के बावजूद देवबंद की मुस्लिम महिलाएँ मोदी को वोट नहीं देंगी?  

फेक न्यूज़ फ़ैलाने के खुद में गंभीर कृत्य के साथ ही जगह का चुनाव भी महत्वपूर्ण है। देवबंद का इस्लामी जगत में बहुत प्रभाव है। यहाँ के रुढ़िवादी-से-रुढ़िवादी फतवे तक अंतरराष्ट्रीय धमक रखते हैं। ऐसे में यदि यह सन्देश देवबंद के मुस्लिमों ‘की ओर से’ प्रसारित हो कि मोदी चाहे जो विकास कर ले, उसे वोट नहीं देना है तो देश का कोई ऐसा हिस्सा नहीं, जहाँ का मुस्लिम वोट नहीं प्रभावित होगा। और वीडियो देख कर यह साफ़ पता चलता है कि यह सन्देश फर्जी होगा।

क्या यह फ़ेक न्यूज़ फ़ैलाने के साथ-साथ धारा 171[G] के अंतर्गत चुनावों को अवैध रूप से (चुनावों के सम्बन्ध में झूठ बोलकर) प्रभावित करने का अपराध नहीं है ?

कमलनाथ के बेटे नकुल नाथ ने चुनावी हलफ़नामे में ₹600 करोड़ से अधिक की संपत्ति की घोषणा की

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के पुत्र नकुल नाथ ने अपने चुनावी हलफ़नामे में ₹600 करोड़ से अधिक की संपत्ति घोषित की है। नकुल मध्य प्रदेश में छिंदवाड़ा लोकसभा सीट से कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार हैं।

उनके नामांकन पत्र के अनुसार, नकुल के पास ₹615,93,17,741 की चल संपत्ति है, जबकि उनकी पत्नी के पास कुल ₹2,30,31,907 हैं। इसके अलावा, नकुल के पास लगभग ₹41.77 करोड़ (मौजूदा बाजार मूल्य) से अधिक की अचल संपत्ति है।

हलफ़नामे में, नकुल ने पिछले 5 वित्तीय वर्षों के दौरान दर्शाए गए अपने आयकर रिटर्न में उन्होंने अपनी वार्षिक आय घोषित की है। 2013-14 में, उनकी आय ₹98 लाख से बढ़कर अगले वित्तीय वर्ष के अंत तक ₹3.37 करोड़ हो गई। वित्तीय वर्ष 2016-17 में सबसे अधिक वृद्धि हुई, जहाँ उनकी आय ₹1.50 करोड़ से ₹13.34 करोड़ हो गई। नकुल की आय अगले वर्ष (2018) ₹2.76 करोड़ गिर गई। ध्यान देने वाली बात यह है कि जब नकुल ने आय में वृद्धि की सूचना दी थी उसी वित्तीय वर्ष में विमुद्रीकरण हुआ था।

नकुल की पत्नी, प्रिया नाथ ने वित्तीय वर्ष 2017-18 में अपने पति की आय में भारी उछाल की सूचना दी। 2018 में उनके पिछले साल की आय जो कि ₹22.63 लाख थी वो बढ़कर ₹4 करोड़ से अधिक हो गई।

कॉन्ग्रेस उम्मीदवार के पास TV-18 ब्रॉडकास्ट लिमिटेड के ₹3.52 लाख के शेयर हैं जिसके द्वारा CNBC-TV-18, CNBC आवाज, CNBC-टीवी 18 प्राइम HD, CNN-न्यूज 18, न्यूज 18 इंडिया और IBN लोकमत जैसे विभिन्न समाचार चैनल चलाए जाते हैं। दूसरी ओर, उनकी पत्नी ने रिलायंस इंडस्ट्रीज में निवेश किया है।

हाल के दिनों में मध्य प्रदेश में आयकर विभाग द्वारा 50 ठिकानों पर छापेमारी के दौरान नकुल के पिता, कमलनाथ की काफ़ी किरकिरी हो चुकी है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के ओएसडी, रतुल पुरी (कमलनाथ का भतीजा), अमीरा समूह और मोजर बेयर के स्थानों पर तलाशी ली गई। भोपाल, इंदौर, गोवा और दिल्ली में 35 स्थानों पर भी तलाशी ली गई।

आयकर विभाग ने सोमवार को कहा कि उसने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनके अन्य करीबी सहयोगियों के ठिकानों पर छापेमारी के दौरान लगभग ₹281 करोड़ की बेहिसाब नकदी के रैकेट का पता लगाया।

इजराइल में Right Wing की सरकार, रिकॉर्ड 5वीं बार PM बनेंगे मोदी के ‘बीबी’

इजराइल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाली गठबंधन की जीत हुई है। उनकी दक्षिणपंथी ‘Likud Party’ को 35 सीटें मिली हैं। हालाँकि, उनके प्रतिद्वंदी बेनी गांट्ज़ की पार्टी को भी इतनी ही सीटें मिली है लेकिन अन्य दक्षिणपंथी पार्टियों के सहयोग से 69 वर्षीय बेंजामिन नेतन्याहू एक बार फिर से अपने ‘शक्तिशाली’ देश का नेतृत्व करने को तैयार हैं। बेनी इजराइली सेना के प्रमुख रहे हैं। 120 सदस्यीय ‘Knesset में’ बहुमत के लिए 61 सीटों की ज़रूरत होती है। नेतन्याहू की पार्टी को 2014 में हुए चुनाव से इस बार 5 सीटें अधिक मिली है। सभी दक्षिणपथी पार्टियों के गठबंधन को मिला दें तो उनकी सीटों की संख्या 65 पहुँच जाती है।

इसके साथ ही इस साल के अंत तक नेतन्याहू इजराइल के सबसे लम्बे कार्यकाल वाले प्रधानमंत्री हो जाएँगे। वो इजराइल के संस्थापक पितृपुरुष डेविड बेन-गुरियन को पीछे छोड़ देंगे। नेतन्याहू पर हाल के दिनों में भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे थे लेकिन उनकी जीत से पता चलता है कि जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता कम नहीं हुई है। नेतन्याहू ने जीत की ख़ुशी में समर्थकों को सम्बोधित करते हुए कहा कि भले ही ये दक्षिणपंथी सरकार है लेकिन वो सभी के प्रधानमंत्री होंगे। उन्होंने कहा कि वो राइट, लेफ्ट, Jews, Non-Jews- इन सभी के पीएम होंगे। उन्होंने पिछले चुनाव से भी ज्यादा सीटें देने के लिए इजराइल की जनता का धन्यवाद किया।

शुरुआती एग्जिट पोल्स में सेंटर-लेफ्ट बेनी की जीत की सम्भावना दिख रही थी लेकिन चुनाव परिणाम आने पर पता चला की ये काँटे की टक्कर थी। नेतन्याहू को दक्षिणपंथी, राष्ट्रवादी व धार्मिक पार्टियों का समर्थन मिला है। नेतन्याहू को प्यार से वहाँ की जनता उनके निकनेम ‘बीबी’ से पुकारती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उन्हें ट्विटर पर बीबी कहकर ही सम्बोधित करते हैं। जब पीएम मोदी 2017 में इजराइल गए थे तो पीएम नेतन्याहू ने कहा था कि उन्होंने इसके लिए 70 वर्ष का बहुत लम्बा इंतजार किया है। बता दें कि मोदी इजराइल का दौरा करने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं।

नेतन्याहू ने सुरक्षा के मुद्दे पर चुनाव लड़ा था और ये जनता के बीच प्रमुख मुद्दा बनकर उभरा। वहीं उनके प्रतिद्वंद्वी लेफ्टिनेंट जनरल बेनी गांट्ज़ ने नवंबर ब्लू वाइट पार्टी का गठन किया था। पूर्व सेना प्रमुख ने कहा था कि इजराइल रास्ता भटक चुका है और वो देश में फिर से एकता स्थापित करेंगे। नेतन्याहू ने अपने चुनावी प्रतिद्वंद्वियों को ‘कमज़ोर लेफ्टिस्ट्स’ बताया था। उनके ख़िलाफ़ तीन पूर्व सेना प्रमुखों का गुट था। उन्होंने विपक्ष और मीडिया द्वारा अपने ख़िलाफ़ लगाए भ्रष्टाचार के आरोपों को ‘Witch Hunt’ बताया था। जनता ने ‘किंग बीबी’ के नारे लगाकर उनकी जीत का उत्सव मनाया।

बता दें कि अभी आर्थिक और रक्षा क्षेत्र में भारत और इजराइल के सम्बन्ध काफ़ी अच्छे हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा व्यापार बढ़कर क़रीब 9 बिलियन डॉलर हो गया है। मिडिल ईस्ट में भी भारत अपना अहम किरदार निभाने के लिए तैयार है और इसके लिए इजराइल से उनके अच्छे संबंधों का फ़ायदा मिल सकता है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संसद में कहा था कि इजराइल और भारत के अच्छे संबंधों को फिलीस्तीन अपने लिए फ़ायदे के तौर पर देखता है।

EC ने PM मोदी की बायोपिक पर लगाई रोक, आम चुनाव ख़त्म होने तक नहीं रिलीज होगी फ़िल्म

चुनाव आयोग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक की रिलीज पर रोक लगा दी है। बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आधारित फ़िल्म 12 अप्रैल को रिलीज होने वाली थी। इसमें अभिनेता विवेक ओबेरॉय पीएम मोदी के किरदार में नज़र आने वाले हैं। इसमें नरेंद्र मोदी के बचपन से लेकर प्रधानमंत्री बनने तक के सफ़र को दर्शाया गया है। फ़िल्म के ट्रेलर को वीडियो स्ट्रीमिंग वेबसाइट यूट्यूब पर क़रीब ढाई करोड़ लोगों द्वारा देखा जा चुका है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर सेंसर बोर्ड फ़िल्म को पास कर देती है तो इसके रिलीज में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन लगातार मिल रही शिकायतों के मद्देनज़र आयोग ने फ़िल्म की रिलीज रोक दी है।

सुरेश ओबेरॉय द्वारा प्रोड्यूस की गई इस फ़िल्म का फर्स्ट लुक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस द्वारा जारी किया गया था। विपक्षी दल लगातार कहते रहे हैं कि ये फ़िल्म चुनाव को प्रभावित करने के लिए रिलीज की जा रही है लेकिन विवेक ओबेरॉय ने विपक्षी दलों के इन आरोपों को खारिज कर दिया था। आयोग ने कहा कि जबतक आम चुनाव ख़त्म नहीं हो जाते, तबतक ये फ़िल्म रिलीज नहीं होगी।

अभिनेता विवेक ओबेरॉय ने एक साक्षात्कार में इस बात को स्वीकार किया था कि वो पीएम नरेंद्र मोदी पर विश्वास करते हैं और आज के समय में देश को उनके जैसे नेता की ही आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा था कि मोदी के चाय वाले बनने से लेकर एक विश्व नेता बनने तक की कहानी हर दूसरे वैश्विक नेता के लिए प्रेरणादायक है। फ़िल्म ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ की अवधि 2 घंटे 10 मिनट और 53 सेकेंड है। मंगलवार (अप्रैल 9, 2019) को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने रिलीज पर रोक लगाने वाली याचिका को खारिज कर दी थी। फिल्म को सुप्रीम कोर्ट और सेंसर बोर्ड दोनों ही संस्थाओं से हरी झंडी मिल गई थी।

कॉन्ग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीवन पर आधारित फिल्म ‘पीएम नरेंद्र’ मोदी को लेकर कटाक्ष करते हुए कहा कि ‘फ्लॉप आदमी’ के जीवन पर बनी फिल्म में ‘फ्लॉप हीरो’ ने काम किया है। कॉन्ग्रेस पार्टी के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने यह भी दावा किया कि फिल्म ‘जीरो’ साबित होने वाली है।

पूर्व चुनाव आयुक्त का नाम ही है वोटर लिस्ट से गायब, कल देना है वोट

कल यानी बृहस्पतिवार को देश में आम चुनावों का पहला चरण का मतदान होना है। मतदान के लिए चुनाव आयोग काफी समय पहले से तैयारी शुरु कर देता है, जिनमें वोटर लिस्ट तैयार की जाती है और आवश्यक भूल-चूक में सुधार किया जाता है। गाजियाबाद के कौशांबी में इस मामले में बड़ी चूक देखने को मिली है। मामला यह है कि कौशांबी में रहने वाले पूर्व चुनाव आयुक्त का नाम ही वोटर लिस्ट से गायब है।

भारत के पूर्व चुनाव आयुक्त जीवीजी कृष्णमूर्ति कौशांबी के मलयगिरी टावर में बीते 27 वर्षों से रह रहे हैं। NBT की एक खबर के अनुसार, बीते 8 सालों से विधानसभा चुनाव हो या फिर नगर निगम के चुनाव हर बार जीवीजी कृष्णमूर्ति का नाम वोटर लिस्ट से गायब रहता है।

इस बात की शिकायत के बाद कृष्णमूर्ति का नाम वोटर लिस्ट में शामिल कर लिया जाता था। लेकिन इस बार इस गलती में सुधार होने की संभावना कम नजर आ रही है। आम चुनाव से सिर्फ 2 दिन पहले इस इलाके की वोटर लिस्ट जारी की गई है। ऐसे में इतने कम समय में गलती में सुधार हो पाना अब मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन काम नजर आ रहा है। प्रशासन द्वारा एक BLO को पूर्व चुनाव आयुक्त के घर भेजा गया है। जीवीजी कृष्णमूर्ति इन दिनों बीमार चल रहे हैं।

अन्य लोगों के नाम भी हैं लिस्ट से गायब

कौशांबी में रहने वाले लोगों का आरोप है कि इलाके के 60% लोगों का नाम या तो वोटर लिस्ट से गायब है या फिर उनमें कोई गड़बड़ी है। कौशांबी में करीब 9800 मतदाता हैं, जिनमें से 4500 के नाम वोटर लिस्ट में या तो गलत हैं या फिर काटे गए हैं। मंगलवार (अप्रैल 09, 2019) को जारी वोटर लिस्ट में इस गलती का पता चला है। इसके बाद स्थानीय लोगों ने जिलाधिकारी से मिलकर इसकी शिकायत की।

वोटर लिस्ट में इस गड़बड़ी पर कौशांबी के पार्षद मनोज गोयल ने जिला प्रशासन के खिलाफ नाराजगी भी जताई है। उन्होंने बताया कि उनकी शिकायत पर प्रशासन ध्यान नहीं दे रहा है।

20 राज्यों की 91 सीटों पर कल मतदान: चुनाव प्रचार का हल्ला शांत

लोकसभा चुनावों में मतदान के पहले चरण में अब 24 घण्टे से भी कम का समय बाकी बचा है। कल 11 अप्रैल को 20 राज्यों  की 91 सीटों पर मतदान होंगे। निर्वाचन नियमों के अनुसार मतदान प्रक्रिया खत्म होने के 48 घंटे पहले चुनाव प्रचार रुक जाता है। जिसके मुताबिक इन 20 राज्यों में प्रचार का हल्ला अब शांत हो चुका है। अब देखना है कि प्रत्याशियों द्वारा की मेहनत का जनता उन्हें 23 मई को क्या परिणाम सौंपती है।

कल (अप्रैल 11, 2019) को जिन 20 राज्यों की 91 सीटों पर मतदान होना है। उनमें आंध्र प्रदेश की 25, तेलंगाना की 17, उत्तर प्रदेश की 8, महाराष्ट्र की 7, उत्तराखंड की 5, असम की 5, बिहार की 4, ओडिशा की 4, अरुणाचल प्रदेश की 2, पश्चिम बंगाल की 2, जम्मू कश्मीर की 2, छत्तीसगढ़ की 1, मेघालय की 1, मिजोरम की 1, मणिपुर की 1, नगालैंड की 1, सिक्किम की 1, त्रिपुरा की 1, लक्षद्वीप की 1, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह की 1 सीटें शामिल हैं।

बताते चलें कि यूपी की 8 सीटों के लिए 16633 मतदान केंद्रों पर 96 उम्मीदवार एक-दूसरे को टक्कर देने के लिए खड़े हैं। यहाँ पर मुख्य मुकाबला भाजपा, कॉन्ग्रेस और बसपा-सपा तथा-रालोद के महागठबंधन के बीच होगा।

वहीं उत्तराखंड में भी 5 सीटों पर 52 उम्मीदवार के बीच चुनावी संग्राम होगा। यहाँ पर मुख्य मुकाबला भाजपा, कॉन्ग्रेस और बसपा के मध्य 11235 मतदान केंद्रों पर होगा। बंगाल की 2 सीटों पर 18 उम्मीदवार चुनावी अखाड़े में हैं। यहाँ भाजपा, कॉन्ग्रेस, टीएमसी के अलावा मुख्य मुकाबले में वाम दल भी शामिल है। छत्तीसगढ़ में 1 सीट पर 7 उम्मीदवार मैदान में हैं। यहाँ पर कॉन्ग्रेस, भाजपा और बसपा के बीच मुख्य लड़ाई है।

बिहार की 4 सीटों पर 44 उम्मीदवार खड़े हैं। यहाँ पर मुख्य दलों में भाजपा जेडीयू और कॉन्ग्रेस-राजद का गठबंधन है। वहीं जम्मू कश्मीर में 2 सीटों पर 33 प्रत्याशी जीत की आस लगाए बैठे हैं। यहाँ पर पीडीपी, कॉन्ग्रेस और जेकेएनसी का गठबंधन है।

BJP की टोपी और मुस्लिम लड़की कॉलेज से सस्पेंड: टाइम्स ऑफ इंडिया ने चलाई फर्जी खबर, घटिया प्रोपेगेंडा

Times Of India, देश के प्रमुख प्रकाशनों में से एक है, जिसे अक्सर फेक न्यूज़ फैलाते पाया गया है। एक बार फिर ऐसा ही कुछ हुआ जिसमें एक ख़बर को ग़लत तरीके से प्रचारित करने का प्रयास किया गया। मेरठ लॉ स्कूल की एक 22 वर्षीया छात्रा के संबंध में टाइम्स ने अपनी ख़बर में फिर से आधी-अधूरी जानकारी दी।

Times Of India के पत्रकार पीयूष राय ने मेरठ लॉ स्टूडेंट की एक ख़बर की जिसमें बताया गया कि बीजेपी की टोपी पहनने से मना करने के बाद एक छात्रा को कॉलेज से निलंबित कर दिया गया। अपनी इस झूठी ख़बर के ज़रिए पत्रकार ने भाजपा को निशाना बनाने को कोशिश की। उन्होंने आगे दावा किया कि जिन ‘कथित’ छात्रों ने उमाम खानम को कथित तौर पर ‘बीजेपी की टोपी पहनने से मना’ किया था, उन्हें भी निष्कासित कर दिया गया।

The Times Of India report

हालाँकि, Times Of India के पत्रकार द्वारा किए गए सभी दावे पूरी तरह से झूठे हैं। पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा ने इस बात की सच्चाई जानने के लिए कॉलेज का दौरा किया, जहाँ उन्होंने साथी सहपाठियों और कॉलेज के छात्रों से केवल यह जानने का प्रयास किया कि पत्रकार पीयूष राय द्वारा किए गए दावे जिनमें दोनों छात्रों के निष्कासन की बात कही गई थी वो कितने सच्चे और कितने झूठे हैं।

अपनी ‘धर्मनिरपेक्ष’ पत्रकारिता को आगे बढ़ाने की कोशिश में, पत्रकार पीयूष ने आगे आरोप लगाया कि 22 वर्षीया उमाम खानम को कॉलेज द्वारा निलंबित कर दिया गया, क्योंकि उसने कॉलेज ट्रिप में भाजपा की टोपी पहनने से इनकार कर दिया था जिसके लिए उसे अन्य छात्रों द्वारा परेशान भी किया गया। पीयूष राय के झूठे आरोपों को उस समय मुँह की खानी पड़ी जब ट्रिप पर गए अन्य छात्रों के साथ-साथ टीचर्स ने पत्रकार के दावों का खंडन किया और यह स्पष्ट रूप से कहा कि न तो बस में मौजूद छात्र शराब के प्रभाव में थे और न ही कोई भाजपा की टोपी पहने हुए थे।

इसके अलावा, कॉलेज के अधिकारियों ने उमाम खानम द्वारा की गई शिकायतों को देखने के लिए एक समिति बनाई। कॉलेज ने उन दो छात्रों को भी तुरंत निलंबित कर दिया, जिन पर कथित उत्पीड़न करने का आरोप लगाया गया था। हालाँकि, घटना के एक सप्ताह बाद भी, समिति द्वारा एक भी बैठक नहीं की जा सकी क्योंकि न तो पीड़िता और न ही अभियुक्त या उनके माता-पिता अपना बयान देने के लिए समिति के सामने उपस्थित हुए। इसलिए, कॉलेज ने 22 वर्षीया छात्रा को अगली सुनवाई तक निलंबित कर दिया।

OpIndia.com ने कॉलेज की एक छात्रा से बात की गई उसके अनुसार, शिक़ायत करने वाली उमाम खानम को कथित रूप से झूठे आरोप लगाने के लिए निलंबित कर दिया गया। सभी सबूत उसके ख़िलाफ़ थे और उसके पास कोई सबूत नहीं था जिससे उसके द्वारा लगाए गए आरोप सही साबित हो सकें।

2 अप्रैल को, उमाम खानम ने एक विवाद शुरू कर दिया था जब उसने अपने साथी छात्रों और अपने फैकल्टी के सदस्यों के ख़िलाफ़ परेशान किए जाने संबंधी गंभीर आरोप लगाए थे। अपने ट्वीट्स में खानम ने दावा किया था कि परेशान करने वाले छात्र शराब के नशे में थे।

खानम ने आरोप लगाया कि छात्रों ने उसे बीजेपी की टोपी पहनने के लिए मजबूर किया। इसी के लिए उसे परेशान किया गया क्योंकि खानम ने वो टोपी पहनने से इनकार कर दिया था। खानम ने अपने ट्वीट में यह भी लिखा कि जब वो छात्र उसे टोपी पहनने के लिए मजबूर कर रहे थे और परेशान कर रहे थे तो वहाँ मौजूद पुरुष अध्यापकों ने इस तथ्य को नज़रअंदाज़ किया।

हालाँकि, छात्रों के साथ ट्रिप पर जाने वाले शिक्षकों ने सभी आरोपों का खंडन किया था और ट्रिप के दौरान ऐसी किसी भी घटना से इनकार किया, जिसके आरोप 22 वर्षीया लॉ स्टूडेंट उमाम खानम ने लगाए थे।

स्वराज्य की पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा की एक ग्राउंड रिपोर्ट में इस घटना से संबंधित एक और रोचक जानकारी सामने आई है क्योंकि लगभग 35 छात्र, जो कथित पीड़िता खानम के सहपाठी भी थे, ने स्पष्ट तथ्यों द्वारा समर्थित कहानी यानी इस घटना पर अपना पक्ष साझा किया।

कई अन्य छात्र भी स्वराज्य के लिए अपनी गवाही देने के लिए आगे आए कि कैसे उमाम एक ‘धार्मिक कट्टरपंथी’ है जिसने ‘शेहला राशिद और अरफा ख़ानम की गुड बुक में शामिल होने के लिए’ ऐसा किया।

उमाम खानम की सहपाठी ने साझा किया था स्क्रीनशॉट

उमाम की सहपाठी ज्योति सिंह ने उमाम खानम के खिलाफ अपने दावों को मजबूत करने के लिए उमाम के सोशल मीडिया पोस्ट के कई स्क्रीनशॉट भी लिए। उमाम ने एक दिन में तीन सौ ट्वीट डिलीट किए। हम उनमें से कई के स्क्रीनशॉट लेने में कामयाब रहे। ज्योति ने होली से जुड़ी एक और घटना साझा की। “अमित और अंकुर ने उस पर रंग लगाया। जब तक रंग सफेद और हरा था, वह ठीक थी। जिस क्षण उन्होंने उस पर केसरिया रंग डाला, और उन्होंने अनजाने में ऐसा किया, उसने कहा कि यह ठीक नहीं किया गया और रोना शुरू कर दिया।

ज्योति ने कहा, “वह हमेशा अपने धर्म के बारे में बात करती रही है। एक बार हमारे एक सीनियर जो कि एक मुस्लिम हैं और बहुत धर्मनिरपेक्ष हैं, ने कहा कि वह किसी भी धर्म में विश्वास नहीं करते, उस दिन उमाम इतना पागल हो गई कि वह वहाँ से बाहर निकल गई और आज तक, वह उनसे बात नहीं करती है।”

स्वराज्य टीम ने घटना के उसके पक्ष को सुनने के लिए उमाम तक पहुँचने की कोशिश की, जिसने कहा कि वह केवल फोन पर बात कर सकती है क्योंकि वह कॉलेज नहीं जाएगी।

जब इस बारे में सवाल किया गया कि कोई चश्मदीद गवाह क्यों नहीं है, तो उमाम ने कहा कि वह अपनी शिकायत पर अडिग है। यह पूछने पर कि उसके सहपाठी उसके खिलाफ अभियान क्यों चला रहे हैं, उमाम ने कहा कि उसके खिलाफ एक साजिश चल रही है। रिपोर्टर ने उमाम के ट्वीट्स और लिखित कम्प्लेन में विसंगति पर सवाल उठाया और पूछा कि लिखित शिकायत कम्प्लेन में उसकी मुस्लिम पहचान का कोई उल्लेख नहीं था, उसने कहा कि वह ऐसा महसूस करती है और अपनी शिकायत पर अडिग है। हालाँकि, उमाम ने यह पता चलने के बाद कॉल काट दिया कि रिपोर्टर स्वराज्य के लिए काम करती है।

एक अन्य छात्र ने यह भी कहा कि उमाम एक धार्मिक कट्टरपंथी है। उन्होंने कहा है कि उमाम बहुत ही रूढ़िवादी है, उसने दाऊद इब्राहिम को भारत के ‘बाप’ के रूप में संदर्भित किया था और चाहती थी कि मोदी को भी लिंच किया जाए। उनके सहपाठियों में से एक ने यह भी कहा कि उमाम ने शरिया कानूनों का समर्थन किया था, गौ-मूत्र पर चुटकुलों का समर्थन किया था और हर किसी को अंध भक्त और हिंदुत्व टाइप कहा था जो उससे असहमत थे।

सत्तारूढ़ भाजपा और हिंदुओं को निशाना बनाने की जल्दबाजी में, टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार ने भाजपा को बदनाम करने के लिए ऐसी घटिया प्रोपेगेंडा का सहारा लिया है कि यात्रा के दौरान किसी तरह की उत्पीड़न की रिपोर्टिंग में बुनियादी पत्रकारिता की नैतिकता का पालन किए बिना या कम से कम दूसरे को सुने बिना ही ऐसी फर्ज़ी कहानी छाप दी।

‘The Tashkent Files की रिलीज रोक रही कॉन्ग्रेस की सुप्रीम फैमिली’, विवेक अग्निहोत्री को नोटिस और धमकी

12 अप्रैल को रिलीज हो रही फ़िल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ को रोकने के लिए कॉन्ग्रेस पूरी जद्दोजहद कर रही है। इसके लिए निर्देशक विवेक अग्निहोत्री को लीगल नोटिस भी भेजा गया है। बता दें कि पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के बेटे अनिल शास्त्री और उनके नाती संजय नाथ सिंह फ़िल्म के समर्थन में खड़े हैं। ट्रेलर लॉन्च के मौके पर संजय नाथ सिंह ने कहा भी था कि लाल बहादुर शास्त्री का पार्थिव शरीर जब दिल्ली लाया गया था तब किसी ने आकर उनके मुँह पर चन्दन मल दिया था। विवेक अग्निहोत्री और उनकी पत्नी अभिनेत्री पल्लवी जोशी ने इस पर कुछ सुलगते हुए सवाल भी दागे थे। विवेक अग्निहोत्री ने ऑपइंडिया को इंटरव्यू देते हुए कई सवालों के जवाब दिए थे। उसमें उन्होंने कहा था कि वामपंथियों को ‘द ताशकंद फाइल्स’ ज़रूर देखनी चाहिए।

ट्रेलर लॉन्च के मौके पर पूर्व पीएम लाल बहादुर शास्त्री के बड़े बेटे अनिल शास्त्री ने अपने पिता की तुलना वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से तुलना की थी। हाल ही में ऑपइंडिया ने ‘द ताशकंद फाइल्स’ का रिव्यु भी प्रकाशित किया था, जिसमें फ़िल्म के सभी आयामों की समीक्षा करते हुए बताया गया था कि ये वास्तविकता पर आधारित फ़िल्म है जिसमें तथ्यों से छेड़छाड़ नहीं की गई है। फ़िल्म में इंदिरा गाँधी का नाम नहीं लिया गया है और तथ्यों को दर्शकों के समक्ष रखते हुए चीजें उनके विवेक पर छोड़ दी गई हैं। लेकिन, बेचैन कॉन्ग्रेस इसकी रिलीज रुकवाने के लिए हरसंभव कोशिश कर रही है। ऊपर आप निर्देशक अग्निहोत्री को भेजी गई लीगल नोटिस को डाउनलोड कर के पढ़ सकते हैं।

लीगल नोटिस मिलने के बाद विवेक अग्निहोत्री ने ऑपइंडिया को एक्सक्लूसिव बयान देते हुए कहा:

“जैसा कि आप जानते हैं, हमारी फ़िल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ 12 अप्रैल को रिलीज होने वाली है। कल रात हमें एक क़ानूनी नोटिस भेजा गया है, जिसमें प्रमुख कॉन्ग्रेस सदस्य और पार्टी के पूर्व सचिव द्वारा फ़िल्म की रिलीज रोकने की माँग की है। नोटिस भेजने वाले कॉन्ग्रेस के सुप्रीम गाँधी परिवार के सहयोगी हैं और रिश्ते में दिवंगत प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पोते हैं। ये आश्चर्य की बात है क्योंकि 7 अप्रैल को पीवीआर में आयोजित फ़िल्म के दिल्ली प्रीमियर में उन्होंने ‘द ताशकंद फाइल्स’ देखी थी और फ़िल्म की प्रशंसा भी की थी।

उन्होंने मेरे से मुलाक़ात कर व्यक्तिगत रूप से फ़िल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ को सराहा था। मुझे पता चला है कि ये सब कॉन्ग्रेस की सुप्रीम फैमिली द्वारा करवाया जा रहा है। उन्हें ऐसा करने के लिए मज़बूर किया जा रहा है। शास्त्रीजी के पोतों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है, शीर्ष परिवार द्वारा। आख़िर कॉन्ग्रेस नेता ऐसा क्यों कर रहे हैं? आख़िर वो क्यों फ़िल्म की रिलीज रोकना चाहते हैं? आख़िर क्यों वो लोग मुझे चुप कराना चाहते हैं?

मुझे लगातार धमकाया जा रहा है। फ़िल्म की रिलीज बाधित करने की धमकी दी जा रही है। यह एक दुर्लभ फ़िल्म है, जिसमें एक युवा पत्रकार ‘Right To Truth’ की चाह में विजेता बनकर उभरती हैं। वो लोग ऐसी फ़िल्म से क्यों डर रहे हैं जो नागरिकों के ‘Right To Truth’ की आवाज़ को उठाती है? मैं सभी पत्रकारों से निवेदन करता हूँ कि आप उन से पूछो कि उनको इस फ़िल्म से क्या दिक्कत है? इस फ़िल्म में ऐसा क्या है, जो वो इतने डरे हुए हैं?”


विवेक अग्निहोत्री को भेजे गए लीगल नोटिस का एक अंश

इस पूरे घटनाक्रम को लेकर आज बुधवार (अप्रैल 10, 2019) को निर्देशक विवेक अग्निहोत्री द्वारा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर स्थिति स्पष्ट की जाएगी। फ़िल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ में मिथुन चक्रवर्ती, श्वेता बासु प्रसाद और नसीरुद्दीन शाह सहित कई बड़े अभिनेता-अभिनेत्री हैं। फ़िल्म को समीक्षकों द्वारा भी सराहा गया है।

कॉन्ग्रेस को अस्तित्व में लाने की बहुत कोशिश की… 15 साल तक कोई उम्मीद तो नहीं दिखती: पूर्व कॉन्ग्रेसी नेता

बीते कुछ समय में कॉन्ग्रेस पार्टी की बिगड़ी स्थिति किसी से छिपी नहीं है। एक तरफ जहाँ चुनावों के मद्देनजर आए दिन भाजपा में किसी न किसी नेता के शामिल होने की खबरें आती हैं, वहीं कॉन्ग्रेस पार्टी से बड़े-बड़े नेताओं के पार्टी छोड़ने की खबरें भी सुनने को मिलती है। कॉन्ग्रेस की कमियों के कारण उसका दामन छोड़ने की लिस्ट में कई कद्दावर नेताओं के नाम भी शामिल हैं। इसमें एक नाम आँध्र प्रदेश में तीन बार विधायक रह चुके कोटला जयसूर्या प्रकाश रेड्डी का भी है। जयसूर्या, राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री कोटला विजय भास्कर रेड्डी के बेटे हैं। उन्होंने हाल ही में कॉन्ग्रेस को छोड़ कर टीडीपी का हाथ थामा है। और एक बार फिर वह करनूल से अपनी किस्मत आजमाने को तैयार हैं।

जयसूर्या प्रकाश के इस फैसले के बाद और चुनावों से ठीक पहले उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस को दिए अपने इंटरव्यू में कॉन्ग्रेस छोड़ने के पीछे की वजह बताई। इस साक्षात्कार में जयसूर्या ने बताया कि उन्हें करनूल के किसानों की चिंता है। उन्होंने कहा कॉन्ग्रेस की छोटी-छोटी गलतियों के कारण राज्य में अब पार्टी का कोई अस्तित्व ही नहीं बचा है। जयसूर्या ने कहा कि उन्होंने पार्टी की हालत सुधारने की कोशिश लगभग साढ़े 4 साल तक की। लेकिन जब कोई भी उम्मीद नहीं बची… तब उन्होंने दुखी होकर कॉन्ग्रेस के साथ अपनी राजनीतिक सफर पर विराम लगाने की सोची, साथ ही राजनीति से भी संन्यास लेने का मन बना लिया था। लेकिन लोगों ने उन्हें राजनीति छोड़ने से मना किया। बाद में उन्होंने चंद्र बाबू नायडू से मिलकर टीडीपी जॉइन की।

कॉन्ग्रेस छोड़ने वाले सवाल पर उन्होंने आँध्र प्रदेश के विभाजन का हवाला देते हुए कहा कि राज्य के लोगों को अब भी लगता है कि कॉन्ग्रेस ने आँध्र प्रदेश के साथ अन्याय किया है। लंबे समय से कॉन्ग्रेस से जुड़े रहने के बावजूद जयसूर्या खुद स्वीकारते हैं कि ग्रामीण इलाकों में लोग अब खुलेआम ‘नो कॉन्ग्रेस’ कहते हैं। रेड्डी बताते हैं कि लोग उनकी छवि को हाथ (कॉन्ग्रेस) का पर्याय समझते हैं। जिसकी उन्हें बहुत चिंता है। वो उन्हें समझाने की कोशिश में जुटे हुए हैं कि उन्होंने पार्टी बदल ली है।

इस साक्षात्कार में रेड्डी ने कहा कि कॉन्ग्रेस की नीतियाँ बिल्कुल भी सही नहीं हैं। कॉन्ग्रेस को लगता है कि उन्हें काम करने की क्या जरूरत है। लोग इंतजार करेंगे और 10 साल बाद खुद उनके पास वापस लौट आएँगे।

इस साक्षात्कार में रेड्डी ने पार्टी बदलने के कारण अपने नाम की विश्वसनीयता पर पड़े प्रभाव को लेकर कहा कि जनता बुद्धिमान है। जनता को मालूम है कि उन्होंने टीडीपी इसलिए जॉइन की है ताकि वो किसानों का भला कर सकें। उनका कहना है कि 85 प्रतिशत करनूल के लोग खेती पर आश्रित हैं। उनकी मानें तो उन्होंने ये फैसला अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं से बातचीत के बाद लिया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पार्टी बदलने के सिवा उनके पास कोई विकल्प नहीं था और अब कॉन्ग्रेस के लौटने के चांस नहीं हैं।

जयसूर्या से जब यह पूछा गया कि क्या उन्होंने पिछले साढे़ चार सालों में राहुल गाँधी या सोनिया गाँधी से मिलकर अपनी परेशानी बताने का प्रयास किया? तो जयसूर्या ने बड़ा ही तालमेल बिठा के जवाब देने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि उन्होंने सितंबर 2018 में करनूल में राहुल गाँधी को रैली संबोधित करने के लिए बुलाया था। उन्होंने नेता के रूप में राहुल को और उनके परिवार को अच्छा बताया, लेकिन साथ मे ये बार-बार कहा कि आँध्र प्रदेश के विभाजन के बाद से कुछ ऐसी चीजें हुई हैं, जिसने लोगों को ‘नो कॉन्ग्रेस’ कहने पर मजबूर कर दिया है। उनकी मानें तो कॉन्ग्रेस को आँध्र प्रदेश में लौटने में अब कम से कम 15 साल लगेंगे।

यहाँ बता दें कि साल 2013 में कॉन्ग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने अपने वोट बैंक को मजबूत करने के लिए तेलंगाना को आँध्र प्रदेश से अलग कर दिया था। जिसे लेकर वहाँ के लोगों में खासी नाराजगी है। जयसूर्या का यह इंटरव्यू साबित करता है कि आँध्र प्रदेश में न केवल जनता बल्कि वहाँ के नेता भी पार्टी से असंतुष्ट हैं।