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भगोड़े नीरव मोदी को नहीं मिली जमानत, गवाह को दी जान से मारने की धमकी, था भागने की फ़िराक़ में

पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) घोटाले के मुख्य आरोपित भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी की जमानत याचिका पर सुनवाई शुरू हुई। लंदन की वेस्टमिंस्टर कोर्ट में नीरव मोदी की जमानत पर सुनवाई लम्बे समय तक चली। अभी कोर्ट ने उसकी जमानत रद्द कर दी है।

टोबी कैडमैन ने अदालत में कहा कि नीरव मोदी भारतीय एजेंसियों के साथ सहयोग नहीं कर रहा है और उसके भाग जाने का डर है। टोबी ने कहा कि इस बात का डर भी है कि वह गवाहों को बरगला सकता है और सबूत नष्ट कर सकता है। कैडमैन ने अदालत में कहा कि नीरव मोदी ने एक गवाह आशीष को बुलाया और उसे जान से मारने की धमकी दी। 

भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी दूसरी बार जमानत याचिका लेकर लंदन की वेस्टमिंस्टर की मजिस्ट्रेट अदालत के सामने पेश हुआ। अदालत में भारतीय जाँच एजेंसियों की ओर से पेश हुई क्राउन प्रोसेक्यूशन सर्विस ने कोर्ट में कहा कि नीरव मोदी ने गवाहों को धमकाते हुए एक गवाह को जान से मारने की धमकी दी है। क्राउन सर्विस ने PNB घोटाला केस के गवाह आशीष लड के फोन कॉल डिटेल्स के जरिए यह खुलासा किया है।

नीरव मोदी ने आशीष को फोन करके धमकी दी है कि अगर वह कोर्ट में उसके खिलाफ गवाही देगा तो जान से हाथ धो बैठेगा। नीरव की जमानत का विरोध करते हुए अभियोजन पक्ष ने कहा कि वह कोर्ट में गवाही से पहले गवाहों को प्रभावित कर सकता है। साथ ही, क्राउस एजेंसी ने कोर्ट के बताया कि नीरव कई मुल्कों की यात्रा कर चुका है। क्राउन एजेंसी ने कोर्ट को बताया कि नीरव मोदी उन देशों में निवेश करके नागरिकता लेना चाहता है, जिनके साथ भारत की प्रत्यर्पण संधि नहीं है।

इससे पहले लंदन के वेस्टमिंस्टर मजिस्ट्रेट की अदालत में भारतीय अधिकारियों की ओर से अभियोजन का प्रतिनिधित्व करने वाले टोबी कैडमैन ने समाचार एजेंसी ANI को बताया था कि नीरव मोदी को जमानत मिलने पर वो इसके खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील करेंगे। उन्होंने विश्वास दिलाया कि वह सब कुछ करेंगे जिससे वह रिहा न हो सके।

भारतीय एजेंसियों का पक्ष रख रहे क्राउन प्रोसेक्यूशन सर्विस ने पहली सुनवाई के दौरान कहा था कि नीरव मोदी करीब 2 अरब डॉलर के मनी लॉड्रिंग और धोखाधड़ी के मामले में वॉन्टेड है। शुक्रवार (मार्च 29, 2019) की सुनवाई में क्राउन प्रोसेक्यूशन सर्विस का सहयोग सीबीआई और प्रत्यर्पण निदेशालय (ED) की एक टीम कर रही है।

55 साल ‘करेंगे’ की जुमलेबाजी बनाम 55 महीने का ‘कर दिया’ वाला काम

इधर, 55 महीने में गरीबों, वंचितों, पिछड़ों, किसानों, युवाओं और महिलाओं सहित देश के नागरिकों को आर्थिक सशक्तिकरण के साथ सामाजिक न्याय दिलाकर सशक्त व समृद्ध भारत न्यू इंडिया बनाने का दावा करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार का हिसाब है, उधर 55 साल से कभी न पूरे होने वाले कॉन्ग्रेस के वादों की झड़ी है और विपक्ष के जुमलों की लड़ी है।

चुनावी माहौल आते ही जुमलेबाजी की रफ्तार बढ़ चुकी है। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी अपने परनाना जवाहर लाल नेहरू, दादी इंदिरा गाँधी, पिता राजीव गाँधी और माँ सोनिया गाँधी की तरह ही फिर से ‘गरीबी हटाओ’ का राग अलापने लगे हैं। अपने पुरखों की तरह ही उन्होंने भी गरीबी हटाओ की एक हवा-हवाई अव्यवहारिक स्कीम ‘न्याय’ का शिगूफा छोड़ा है।

यह अलग बात है कि छह दशक तक न्याय की दुहाई देकर सत्ता पर कब्जा करने वाला गाँधी परिवार व कॉन्ग्रेस जनता को न्याय तो न दे सकी, हाँ… भ्रष्टाचार, वंशवाद, परिवारवाद, लोकतंत्र की हत्या करने वाला आपातकाल, आतंकवाद, नक्सलवाद, अलगाववाद, उग्रवाद, भारतीय भूभाग कश्मीर के एक हिस्से पर चीन व पाकिस्तान का कब्जा कराना, तिब्बत को चीन को सौंप देना, सिंधु जल बंटवारा करके भारत के लोगों का हक अन्यायपूर्ण तरीके से पाकिस्तान को दे देना, रक्षा सौदों में दलाली, बोफोर्स रिश्वत कांड (1987), जीप घोटाला (1948), आयल घोटाला, साइकिल घोटाला (1951), मुंधा घोटाला (1958), इंदिरा गांधी की संदिग्ध भूमिका वाला मारुति कार घोटाला, आयल घोटाला (1976), पनडुब्बी घोटाला (1987), स्टॉक मार्केट घोटाला, (1992), सिक्योरिटी घोटाला, एयरबस घोटाला, यूरिया घोटाला, स्टाम्प पेपर घोटाला, सत्यम घोटाला, 1 लाख 76 हजार करोड़ का 2 जी मामला, कॉमनवेल्थ घोटाला, देवास एंट्रिक्स घोटाला, हेलीकॉप्टर खरीद में गांधी परिवार को रिश्वत घोटाला, कांग्रेस की पूर्व अध्यक्षा सोनिया गांधी और वर्तमान अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा नेशनल हेराल्ड की 5000 करोड़ रुपए की संपत्ति का गमन मामला, प्रियंका वाड्रा के पति राबर्ट वाड्रा के लिये देशभर में हजारों एकड़ जमीन पर कब्जा मामला, असुरक्षित सीमाएँ, हथियारों व साजोसामान से वंचित सेना, निर्दोषों को फँसाकर हिंदू आतंकवाद की थियरी गढ़ना, विजय माल्या, नीरव सहित गाँधी परिवार के करीबी अनेक बेईमानों को जनता का हजारों करोड़ रुपए लुटा देना आदि जरूर दिया।

अब जरा वर्तमान मोदी सरकार का भी हिसाब लिया जाए। विश्व बैंक के ब्रूकिंग्स संस्थान के फ्यूचर डेवलपमेंट की अद्यतन रिपोर्ट ने माना है कि 2016 के बाद भारत में गरीबों की संख्या में स्टीप फाल यानी तीव्र गिरावट आई है। इस रिपोर्ट के अनुसार केवल दो साल जनवरी 16 से मई 18 तक में ही भारत में गरीबों की संख्या 12.30 करोड़ से घटकर लगभग आधी यानी 7.3 करोड़ रह गई और प्रति मिनट 44 व्यक्ति गरीबी रेखा से ऊपर जा रहा है। इसी रिपोर्ट के अनुसार इसी समयावधि में भारत ने चीन की 6.8 प्रतिशत वृद्धि दर को पीछे छोड़कर 7 प्रतिशत से अधिक वृद्धि दर के साथ दुनिया की सबसे तेज विकसित होने वाली अर्थव्यवस्था बन गई।

कॉन्ग्रेस के 55 साल के शासन में देश का हर पाँचवाँ व्यक्ति घोर गरीबी में जीवनयापन कर रहा था। आज देश की जनसंख्या लगभग 130 करोड़ है। पिछले पाँच साल में गरीबी उन्मूलन की सफलता की दर ऐसी रही कि गरीबों की 21.6 करोड़ से घटकर 5 करोड़ के आसपास अर्थात लगभग 3.8 प्रतिशत रह गई है। ब्रूकिंग्स ​रिपोर्ट कहती है कि वर्तमान की मोदी सरकार द्वारा हासिल की गई आर्थिक संवृद्धि दर बनी रही तो 2022 तक शेष 5 करोड़ लोग भी गरीबी के अभिशाप से मुक्त हो जाएँगे यानी भारत गरीबी से मुक्त हो जाएगा।

गरीबी को नारा बनाकर गरीब को बिसराने वाली कॉन्ग्रेस यदि विश्व बैंक के इन प्रमाण को झुठलाकर भ्रम की राजनीति के सहारे चुनाव जीतना चाहती है तो उसे यह जवाब तो देना होगा कि गाँधी परिवार की पाँच पीढ़ियों के गरीबों के हटाओ के नारे देने के बावजूद उनके शासनकाल में देश में गरीबी, अमीर और गरीब के बीच खाई और एक प्रतिशत धनी लोगों के पास देश का 73 प्रतिशत धन कैसे रहा?

दरअसल, देश की राजनीति की दिशा हवा-हवाई नारों और खोखले वादों के दौर से निकलकर पॉलीटिक्स ऑफ परफॉर्मेंस की ओर बढ़ चली है। हाल ही हुए सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी के सर्वे में 64 प्रतिशत लोगों ने माना है कि 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में सरकार बनने के बाद सरकारी स्तर पर भ्रष्टाचार खत्म हुआ है। इस सर्वे के आँकड़े यह भी बताते हैं कि 57 प्रतिशत लोगों का कहना है, मोदी सरकार में आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगी है और जीवन लागत घटी है। जबकि 75 प्रतिशत लोगों की राय है कि सरकार की कार्यशैली व प्रदर्शन उनकी आकांक्षाओं के अनुरूप रहा है। 48 प्रतिशत लोगों का कहना था कि सरकार ने बेरोजगारी की समस्या के समाधान की दिशा में संतोषजनक कार्य किया है। 55 प्रतिशत लोगों ने माना कि मोदी सरकार के कार्यकाल में महिलाओं व बच्चों के विरुद्ध अपराध कम हुए हैं। संसद के कामकाज को लेकर 65 प्रतिशत लोग मोदी सरकार के संसदीय प्रबंधन एवं कार्यों को संतोषप्रद बताया है। बड़ी संख्या में लोगों ने यह भी माना कि इस सरकार में आतंकवाद व सांप्रदायिकता की घटनाएं कम हुई हैं और सरकार ने पाकिस्तान के मामले ठीक से हैंडल किया है।

इस सर्वे में 30 प्रतिशत लोगों ने कहा है कि मोदी सरकार ने उनकी आशाओं और आकांक्षाओं से बढ़कर काम किया है, जबकि 45 प्रतिशत लोगों ने कहा है कि मोदी सरकार उनकी आकांक्षाओं को पूरा कर रही है। इस प्रकार 75 प्रतिशत लोगों ने माना है कि मोदी सरकार पाँच साल के अपने कामों के माध्यम से जनता की आकांक्षाओं पर खरी उतरी है। इस सर्वे में मोदी सरकार द्वारा पिछले पाँच साल में शुरू किये गए मिशनों व कार्यक्रमों जैसे आयकर में कटौती, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिये आरक्षण, स्टार्टअप के लिए एंजल टैक्स, आयुष्मान भारत के माध्यम से जन स्वास्थ्य सुरक्षा आदि के आधार पर नागरिकों से फीडबैक लिया गया।

यह देखकर कहा जा सकता है कि जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं को देश का चौकीदार बताते हैं, उसी तरह जनता भी चौकीदार बनकर बड़ी बारीकी से सरकारों के कामकाज की निगरानी कर रही है और अच्छा या ख़राब का निर्णय स्वयं लेने लगी है। ऐसे में हवा-हवाई और अव्यवहारिक घोषणाएँ करके चुनाव जीतने की घिसी-पिटी राजनीति के चादर में लिपटे दलों का हश्र क्या होगा, यह आगामी 23 मई को सामने आ जाएगा। किंतु एक बात तय है कि अब जनता के निर्णय का पैमाना बदल चुका है और प्रेरक राजनीति और सकारात्मक प्रगतिशील सुशासन इसका आधार बनने लगा है।

प्रियंका गाँधी ने ‘मनरेगा’ पर बोले लगातार झूठ, ये रहे सही आँकड़े

अभी-अभी राजनीति में क़दम रखने वाली प्रियंका गाँधी को राजनीति की इतनी समझ नहीं है जिसका वो दिखावा करती हैं। इसी दिखावे का प्रचार करने आज वो अयोध्या पहुँची जहाँ उन्होंने मोदी सरकार की जमकर आलोचना की।

अयोध्या से अपनी प्रत्याशी निर्मल खत्री के समर्थन में पहुँची प्रियंका ने अपने तंज भरे शब्दों से मोदी सरकार की एक के बाद एक मनगढ़ंत कमियों का बखान किया, इसमें उन्होंने कहा कि ये लोग संविधान, लोकतंत्र और संस्थाओं को नष्ट कर देना चाहते हैं। जबकि संविधान औऱ लोकतंत्र, जनता को मज़बूत बनाते हैं। चूँकि मोदी सरकार काम करने की बजाए सिर्फ़ बातें करती है इसलिए आपको मज़बूत नहीं होने देना चाहते। मोदी सरकार को निशाना बनाते हुए प्रियंका ने कहा कि देश में वर्तमान सरकार से दुर्बल सरकार और कोई सरकार नहीं रही है।

वर्तमान सरकार को दुर्बल सरकार बताने वाली प्रियंका गाँधी अपने इन कथनों से केवल और केवल पीएम मोदी को घेरने का प्रयास करती नज़र आईं। जबकि सच्चाई यह है कि इस समय कॉन्ग्रेस ख़ुद दुर्बलता की कगार तक पहुँच चुकी है। यह कॉन्ग्रेस की लाचारी और बेबसी ही है जो रह-रह कर इस रूप में बाहर आती है।

अपने भाषण में प्रियंका ने कई ऐसे मुद्दे उठाए जिनका सच्चाई से कोई लेना-देना ही नहीं था। अपने भाषण में प्रियंका ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी अपने पाँच साल के कार्यकाल में चीन, अमेरिका, जापान और अफ्रीका समेत बाकी सारी दुनिया का भ्रमण करते हैंं लेकिन अपने संसदीय क्षेत्र और ग्रामीण इलाक़ों में नहीं जाते। इसके पीछे वजह यह है कि गाँव में उन्हें सच्चाई दिखाई देती है।

प्रियंका गाँधी की इस तरह की बचकानी बातों को उनका कोरा ज्ञान ना कहा जाए तो भला और क्या कहा जाए। वाराणसी का कायाकल्प आज की तारीख़ में जगज़ाहिर है। उनके लगभग साढ़े चार साल के कार्यकाल में वहाँ 126 प्रोजेक्ट को पूरा करवाया गया। कुल 4679.79 करोड़ रुपए की लागत से वाराणसी के कायाकल्प में वे सभी आधारभूत सुधार शामिल हैं जिनसे आम जन-जीवन लाभान्वित हुआ।

वाराणसी में विकास के तहत नगर के इंफ्रास्ट्रकचर में ज़बरदस्त सुधार, मंडुआडीह रेलवे स्टेशन का भव्य पुनर्निर्माण, सड़कों का निर्माण, गलियों-चौराहों की बेहतरी, अंडरग्राउंड वायरिंग से बिजली के तारों को व्यवस्थित करना, पेयजल की व्यवस्था, सीवरेज व्यवस्था, नगर पहले से अधिक साफ़-सुथरा है, बीएचयू ट्रामा सेंटर, बुनकरों के लिए ट्रेड फेसिलिटेशन सेंटर, अस्सी घाटों की सफ़ाई, बैटरी रिक्शों का वितरण, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, गंगा सफ़ाई परियोजना, गंगा में सीवर जाना बंद किया गया, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाए गए और वंदे भारत एक्सप्रेस और बिजली व्यवस्था को दुरुस्त करने से लेकर तमाम ढाँचागत परियोजनाओं को समय पर पूरा किया गया।

कॉन्ग्रेस को यह बख़ूबी मालूम है कि पीएम मोदी ने पिछले पाँच साल में न सिर्फ़ अपने संसदीय क्षेत्र में विकास किया बल्कि समूचे भारत में विकास की नींव को मज़बूत भी किया।

आगे बढ़ते हैं और आपको बताते हैं कि प्रियंका गाँधी जब मंच से बोलती हैं तो झूठ बोलने की हद से भी गुज़र जाती हैं। अयोध्या के ही मंच से उन्होंने मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि ग्रामीण इलाक़ों में हर परिवार को 100 दिन के रोज़गार की गारंटी देने वाली मनरेगा योजना को वो ख़त्म कर देना चाहते हैं और साथ ही आरोप लगाया कि पिछले छह महीने से भुगतान नहीं किया जा रहा है। मनरेगा का पैसा ठेकेदारों को दिया जा रहा है और वे ठेकेदार क्षेत्र के ग्रामीणों के बजाय मज़दूरों से काम करा रहे हैं। उनका यह कथन इतना बेबुनियादी है इसका जवाब तो सोशल मीडिया पर लोगों ने खरी-खोटी सुनाकर दिया।

एक यूज़र ने ट्वीट किया कि प्रियंका गाँधी झूठी हैं और 2017-18 में मनरेगा का 85% भुगतान 15 दिनों के भीतर किया गया जबकि कॉन्ग्रेस के शासनकाल में 15 दिनों के भीतर केवल 34% भुगतान किया गया। सवालिया होते हुए लिखा कि मोदी सरकार ने 1 करोड़ फ़र्ज़ी जॉब कार्ड और 3 करोड़ फ़र्ज़ी लाभार्थियों को हटा दिया, आख़िर वो पैसा कौन ले रहा था?

एक अन्य ट्विटर यूज़र ने लिखा कि 2013-14 के बीच 34%, 2017-18 के बीच 85% और 2018-19 के बीच 93% भुगतान किया गया, बावजूद इसके कोई न्यूट्रल पत्रकार गाँधी परिवार से सवाल नहीं करेगा।

ट्विटर पर ही अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करते हुए एक यूज़र ने लिखा कि कॉन्ग्रेस केवल झूठ बोलना जानती है, इससे ज़्यादा की कोई उम्मीद नहीं की जा सकती। 2013-14 के बीच वो (प्रियंका गाँधी) वाड्रा के पैसे गिनने में व्यस्त थीं। इसके जवाब में एक अन्य यूजर ने ट्वीट किया कि प्रियंका गाँधी का भाई झूठ बोलता है, मम्मी झूठ बोलती हैं, उनका पति झूठ बोलता है और वो ख़ुद भी झूठ बोलती हैं…पूरा परिवार झूठा है।

इन सभी प्रतिक्रियाओं से यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि गाँधी-वाड्रा परिवार के कारनामें लोगों को ज़ुबानी याद हैं जिसे वो खुलकर उजागर भी करते हैं। बावजूद इसके कॉन्ग्रेस झूठ की चरस बोने से कभी बाज नहीं आती। यह जानते हुए कि पिछले पाँच वर्षों में मोदी सरकार द्वारा किया गया विकास उसकी सोचने से भी परे है। लेकिन कॉन्ग्रेस की सच से मुँह फ़ेरने की आदत पुरानी है जिसे वो चाहे भी तो भी नहीं छोड़ सकती।

बता दें कि 2014 के बाद से एक आम जन के जीवन में जो सुधार आया है वो पहले लोगों की सोच से भी परे था। देश के भीतर तो तमाम योजनाओं के माध्यम से विकास किया ही गया साथ ही वैश्विक स्तर पर भारत ने अपने संबंधों की बुनियाद को भी मज़बूत  किया गया। लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि कॉन्ग्रेस अपने ख़ुद के दु:खों से पार ही नहीं पा रही है, जिसकी वजह से ले-देकर उसे एक मोदी ही दिखते हैं जिनपर वो अपनी भड़ास निकालकर ख़ुश होने के नए आयाम तलाशती है। सच पूछो तो कॉन्ग्रेस की बेबसी अब किसी से छिपी नहीं है लेकिन सत्ता की भूख और लालसा उसे इस हद तक गिरने पर मजबूर कर रही है, जिसका प्रदर्शन आए दिन इन्हीं मंचो से होता रहता है।

बिहार में शराब बंदी ने दिया है महिलाओं को गरिमामय जीवन जीने का अधिकार

शराब-बंदी और दहेज विरोधी आंदोलनों का भारत में अपना इतिहास रहा है। इन आंदोलनों को आश्चर्यजनक तरीके से भारत में अलग अलग तरीकों से स्त्रियाँ चलाती रही हैं। जिसका एक सिरा समाज सुधार से जुड़ता है तो वहीं दूसरा सिरा नारीवादी आंदोलनों की पृष्ठभूमि को आधार देता है। नारीवादी आंदोलन की पृष्ठभूमि ही स्वतंत्र भारत में महिलाओं की उपेक्षा,शोषण और श्रम में लिंग आधारित भेदभाव को समाप्त करने तथा बराबरी के सिद्धांतों की नीति को लेकर आगे बढ़ा।

जनवरी, 1930 में महात्मा गाँधी ने इर्विन के नाम ग्यारह सूत्री माँग जारी किया था, जिसमें आम तथा खास, सभी प्रकार की माँगें उठाई गईं थीं। इन माँगों में शराब बंदी (पूर्णरूपेण मदिरा निषेध) सबसे सबसे अधिक प्रभावी था। महत्मा गाँधी ने कई स्थलों पर माना है कि शराब बंदी के जरिए ही स्त्री-हिंसा पर बहुत हद तक काबू किया जा सकता है। यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि महात्मा गाँधी स्त्रियों को मुख्यधारा में लाने के सबसे बड़े पैरवीकार थे। हालाँकि, दांडी मार्च की सूची में जब गाँधी ने किसी महिला को शामिल नहीं किया था, तो उस समय राष्ट्रवादी महिलाओं ने गाँधी का मुखर विरोध भी किया था और बाद में महिलाएँ भी इस ऐतिहासिक आंदोलन में शामिल हुई थीं। महिलाओं की जिद और उपेक्षा के कारण ही गाँधी को झुकना पड़ा था। सरल भाषा में कहूँ तो यह वही समय था, जब भारत में महिला आंदोलनकारियों की छवि निर्मित हो रही थी।

नारीवाद के इस आंदोलन ने आजाद भारत में कई रूपों में अपना विस्तार किया। सत्तर-अस्सी के दशक में इसी आंदोलन ने सरकार से लेकर, न्यायालयों तक को दहेज, बाल-विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों की ओर ध्यान खींचा। सत्तर-अस्सी के दशक में घरेलू-हिंसा, दहेज-हत्या के मामले बढ़ने लगे। पत्र-पत्रिकाओं में इससे संबन्धित मुद्दों पर विचार होने लगे। उस दौर में प्रकाशित ‘इन सर्च ऑफ आंसर्स’ में 6 नवविवाहिताओं की आत्महत्या से पूर्व लिखे पत्रों को छापा गया, जिसमें एक पत्र बहुत भावुक कर देने वाला था। राजनीति के गलियारों से लेकर, चौराहों तक पर इसे पढ़ा गया। इस पत्र ने दहेज विरोधी आंदोलन को एक मुकाम तक पहुँचाया और दहेज-हत्या को लेकर कानून बनवाया।

पत्र का अंश

”मैं बहुत दूर जा रही हूँ। मुझे माफ कर देना….
जब से मैं आपके घर में आई हूँ, आपके परिवार की कठिनाइयाँ बढ़ गई हैं। मेरा आपके घर आना आपके लिए शुभ नहीं है, इसलिए मैं दूर जा रही हूँ। मैं इस बात की पूरी कोशिश कर रही हूँ कि मैं किसी भी हाल में जीवित न बचूँ क्योंकि मेरे जीवित बच जाने से मेरे साथ साथ आपका जीवन भी तबाह हो जाएगा। मुझे इलाज के लिए अस्पताल न ले जाना।
मैं अपने साथ मेरे गर्भ में पलने वाले आपके बच्चे को भी लेकर जा रही हूँ। इसके लिए भी मुझे माफ कर देना। आपकी दुबारा विवाह करने की इच्छा थी, दूसरा विवाह जरूर करना। दहेज में जो कपड़े मैं अपने साथ लाई थी, आप उन्हें या तो जला देना या फिर मेरे माता- पिता को वापस कर देना। जो कपड़े मुझे आपके परिवार की ओर से दिये गए थे, आप उन्हें प्रेस करवा कर नई दुल्हन के लिए रख देना।
नई दुल्हन के आने के बाद उसकी बातों को सुनने की कोशिश करना, उसके साथ झगड़ा मत करना। अगर उसके माँ-बाप आपका ज्यादा ख्याल न रखें तो भी खुश रहना। आपको ऐसी बातों को नजरंदाज करना होगा, वरना उसकी जिंदगी भी बर्बाद हो जाएगी। अगर वह तुमसे अकेले में कोई बात करे, तो उस बात को अपने घर के भीतर किसी अन्य सदस्य को मत बताना।
‘केवल तुम्हारी’

समकालीन नारीवादी आंदोलन में दहेज के विरुद्ध प्रारम्भिक विरोध हैदराबाद में वर्ष 1975 में प्रगतिशील महिला संगठन द्वारा दर्ज करवाया गया था। फिर बाद में नए सिरे से यह आंदोलन दिल्ली में शुरू हुआ, जो देश के कई कोनो तक पहुँचने में सफल रहा। 1979 में दहेज के खातिर दिल्ली में ही तरविंदर कौर ही हत्या कर दी गई, पुलिस ने इसे आत्महत्या बताकर केस को ख़त्म करने की कोशिश की, जिसके प्रतिकार में भयंकर जुलूस निकला और उसके बाद प्रदर्शनों की बाढ़ सी आ गई।

दहेज-विरोधी आंदोलन के एक वर्ष बाद अनेक राज्य सरकारों ने दहेज हत्या के विरुद्ध कानून बनाना शुरू कर दिया। सन 1978 में तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने दहेज के लिए महिलाओं के उत्पीड़न को रोकने के लिए संसद के अगले सत्र में विधेयक प्रस्तुत करने की पहल की। दिल्ली पुलिस ने दहेज से संबन्धित घटनाओं को देखने के लिए अलग समिति बनाई। समाज सुधारकों ने दहेज-लोलुप परिवारों को सामाजिक बहिष्कार की घोषणा की ।

इस प्रकार दहेज को सामाजिक अपराध घोषित करने की परिकल्पना तो मूर्त हो सकी, लेकिन व्यावहारिक तौर पर यह बहुत हद तक अमूर्त ही बना रहा। इसके कई कारण हैं। समाज सुधारकों ने इसे अपना टास्क मान लिया और राजनेताओं ने अपने सुधारवाद को बहुत हद तक सीमित कर लिया। राजनीतिक एजेंडे से धीरे-धीरे यह गायब होता चला गया।

आश्चर्यजनक रूप से यह भी देखा गया कि नारीवादी आंदोलन कई मुद्दों पर बिखर भी गया और अधिकांश नारीवादी महिलाओं ने नारीवाद की पाश्चात्य व्याख्या करनी शुरू कर दी। देहमुक्ति आंदोलन इसी मानसिकता का प्रतिफल है। भारतीय महिलाओं की रोज की दिक्कतों से दूर नारीवाद देहवादी व्याख्या में मशगूल हो गया। उसके एजेंडे से समरसता और सामंजस्य का लोप हुआ और उसने पितृसत्ता की आड़ में अपने निशाने पर पुरुष-समाज को ही ले लिया। बहुत ऐसे संदर्भ भी सामने आए, जहाँ परिवार के बच सकने की संभावनाओं के बाबजूद भी आत्मनिर्भरता की पैरवी करते हुए नारीवादियों ने स्वछंद जीवनशैली को प्रश्रय दिया। यह नारीवादी मुहिम की सीमा है। बहुत जरूरी है इसके आवश्यक संदर्भों के विस्तार की। पार्टीगत राजनीतिक एजेंडे को बढ़ाने के खातिर नारीवाद का सर्वाधिक नुकसान हुआ। प्रगतिशीलता को सामयिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य दिये बगैर उनका मिशन अधूरा रहेगा।

आज प्रगतिशील महिलाओं की चुप्पी बहुत ही बड़ी निराशाजनक और संदेहास्पद है। बिहार में पूर्ण शराबबंदी और दहेज विरोधी कानून के लागू होने के मसले पर बिहार की महिलाएँ खुश हैं। आंदोलन की शुरुआत भले ही बंगाल और दिल्ली से हुई थी, लेकिन उसका सकारात्मक प्रभाव बिहार में ही दिख रहा है।

शराबबंदी और दहेजबंदी दोनों ही मसले एक दूसरे से जुड़कर ही औरतों को समाज में सम्मान दिलवा सकते हैं। आत्मनिर्भर बनाने के लिए हमने औरतों के लिए आरक्षण के प्रावधान किए हैं। हालाँकि, शराब एकमात्र कारण नहीं है, लेकिन निश्चित रूप से एक कारण है, जिसकी वजह से औरतों को केवल देह के रूप में देखने की परिपाटी विकसित हुई। इसी कारण घरेलू-हिंसा को बल मिलता रहा। आज बिहार औरतों की मुक्ति की प्रस्तावना लिखने जा रहा है। यह ‘मौन-क्रांति’ ही है, जो अब किसी भी बिहार की बेटी को दहेज और घरेलू -हिंसा के खातिर आत्महत्या के दहलीज तक नहीं पहुँचने देगी।

महिला सशक्तिकरण के जरिए बिहार के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में बदलाव पर यह समीक्षा बशिष्ठनारायण सिंह जी की फेसबुक वॉल से लिया गया है।

VIDEO: कश्मीर समस्या का हल शिक्षा और नौकरियाँ नहीं हैं – पार्ट 1

इस तीन हिस्से वाली शृंखला में, नितिन गुप्ता (जो कि रिवाल्डो के नाम से भी जाने जाते हैं) कश्मीर समस्या को पुलवामा हमले के आलोक में देख रहे हैं। पहले एपिसोड में वो बता रहे हैं कि ‘शिक्षा की कमी से आतंकवाद फैलता है’ इस सोच का सच क्या है।

किन्नर अखाड़े की भवानी माँ को AAP ने बनाया प्रत्याशी, प्रयागराज से लड़ेंगी चुनाव

दो साल पहले तक शबनम बेगम के नाम से मशहूर किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर भवानी माँ वाल्मिकी अब चुनावी राजनीति का हिस्सा बन चुकी है। दरअसल, आम आदमी पार्टी ने उन्हें प्रयागराज से लोकसभा का टिकट दिया है। यूपी में ‘आप’ की ओर से भवानी माँ के अलावा 3 और प्रत्याशियों को उतारा गया है।

संजय सिंह ने आज (मार्च 29, 2019) इस बात का ऐलान करते हुए बताया कि ‘आप’ पार्टी संभल, लालगंज और कानपुर देहात सीटों से भी चुनाव लड़ेगी।

भवानी माँ को लेकर खबरें हैं कि वह बीजेपी और अन्य दलों के नेताओं से भी टिकट की माँग कर रही थी। लेकिन उन्हें कहीं से भी मौक़ा नहीं मिला। जिसके बाद वह आप पार्टी से जुड़ीं और उन्हें लोकसभा का टिकट मिला।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार 2010 में भवानी नाथ वाल्मिकी ने हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाया था। 2012 में वह हज यात्रा भी गईं। इसके बाद 2015 में हिंदू धर्म में वापसी की। भवानी नाथ 2016 में अखिल भारतीय हिंदू महासभा के किन्नर अखाड़े में धर्मगुरु बनीं। स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने पिछले साल 2017 में उन्हें महामंडलेश्वर की उपाधि दी।

भवानी माँ वाल्मिकी के अलावा ‘आप’ ने लालगंज से इंजीनियर अजीत सोनकर, कानपुर देहात से आशुतोष ब्रह्मचारी और संभल से अंजु सैनी को उम्मीदवार बनाया है। बता दें इससे पहले भी आम आदमी पार्टी ने अपने तीन उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से एक का नामांकन रद्द कर दिया गया था।

कॉन्ग्रेस ने वोट पाने के लिए दिया ‘हिन्दू आतंकवाद’ का नारा, हिन्दू समाज से माँगनी होगी माफ़ी: अरुण जेटली

समझौता ब्लास्ट मामले में चारों आरोपियों– स्वामी असीमानंद, लोकेश शर्मा, कमल चौहान और राजिंदर चौधरी को 20 मार्च को अदालत द्वारा बरी किए जाने के बाद अरुण जेटली ने कॉन्ग्रेस पर जमकर निशाना साधा है। अरुण जेटली ने कॉन्ग्रेस द्वारा ‘हिंदू आतंकवाद’ शब्द के प्रयोग पर सवाल उठाए हैं। वित्त मंत्री का कहना है कि कॉन्ग्रेस द्वारा इस शब्द का प्रयोग केवल वोटों के लिए किया गया था।

आज (मार्च 29, 2019) सुबह हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में ‘हिन्दू आतंकवाद’ नारे पर वित्त मंत्री ने खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि केवल राजनीतिक लाभ के लिए हिंदू समाज को कलंकित किया गया। समाज ये बात जानता है। उन्होंने पूरे हिन्दू समाज से कॉन्ग्रेस को माफी माँगने को कहा। जेटली ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए समाज में हिन्दुओं को आतंकी दर्शाने के लिए यूपीए और कॉन्ग्रेस सरकार को जिम्मेदार ठहराया।

अरुण जेटली ने कहा कि एनआईए स्वामी असीमानंद और दूसरे आरोपितों के खिलाफ आरोप साबित करने में नाकाम रही। जेटली की मानें तो इस मामले में जिस तरह से 2007 और उसके बाद जाँच प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया, उससे साफ़ होता है कि कुछ निश्चित संगठनों को बदनाम करने की कोशिश की गई । उन्होंने कहा कि पूरी जाँच 2007-08-09 में हुई, और 10 साल तक आरोपितों को जेल में रखा गया। चार्जशीट भी फाईल हुई लेकिन जज ने कहा सबूत नहीं हैं। सवाल उठता है जब सबूत नहीं थे तो फिर केस को उलझाकर क्यों रखा गया।

अरुण जेटली ने बताया कि 2007 के बाद से अमेरिका का स्टेट डिपॉर्टमेंट लगातार इस बात की सूचना दे रहा था कि आखिर आतंकी कौन हैं? लेकिन उस पर जाँच करने की बजाए हिन्दू आतंकवाद के नारे को पूरा करने के लिए नकली सबूतों के आधार पर कहानी बनाई गई।

हार्दिक पटेल को हाई कोर्ट ने दिया बड़ा झटका,नहीं लड़ पाएँगे लोकसभा चुनाव

पाटीदार आंदोलन के नेता और हाल ही में कॉन्ग्रेस पार्टी का दामन थामने वाले हार्दिक पटेल को हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। गुजरात हाईकोर्ट ने हार्दिक पटेल के चुनाव लड़ने के अरमानों पर पानी फेरते हुए उनके खिलाफ फैसला सुनाया है। कोर्ट ने उन्हें चुनाव लड़ने की इजाजत नहीं दी है। हालाँकि, हार्दिक सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकते हैं, लेकिन इसके लिए उनके पास बेहद कम वक्त बचा है।

बता दें कि, हार्दिक ने 8 मार्च को दायर अपनी याचिका में अपील की थी कि उन पर देशद्रोह के मामले में निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा पर रोक लगा दी जाए। मगर हाईकोर्ट ने उनकी यह अपील खारिज करते हुए उनकी सजा पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। जिसके बाद अब हार्दिक पटेल लोकसभा चुनाव नहीं लड़ पाएँगे। गुजरात हाईकोर्ट के इस फैसले से हार्दिक पटेल के साथ-साथ कॉन्ग्रेस को भी बड़ा झटका लगा है, क्योंकि ऐसा कयास लगाया जा रहा था कि 12 मार्च को कॉन्ग्रेस में शामिल हुए हार्दिक पटेल को कॉन्ग्रेस गुजरात के जामनगर से चुनाव में उतारने की तैयारी में थी।

गौरतलब है कि हार्दिक को राज्य के महेसाणा जिले के विसनगर में 23 जुलाई 2015 को एक आरक्षण रैली के दौरान हुई हिंसा और तत्कालीन स्थानीय भाजपा विधायक ऋषिकेश पटेल के कार्यालय पर हमले और तोड़फोड़ के मामले में पिछले साल 25 जुलाई को एक स्थानीय अदालत ने 2 साल के साधारण कारवास की सजा सुनाई थी। उन पर जुर्माना भी लगाया गया था। रिप्रजेंटेशन ऑफ पीपल एक्ट 1951 के मुताबिक अगर किसी शख्स को दो साल की सजा मिली है तो वो चुनाव नहीं लड़ सकता है।

‘न्यूट्रल’ पत्रकार सुप्रिया श्रीनेट द्वारा राहुल गाँधी का समर्थन करने पर मिला पुरस्कार, महाराजगंज सीट से लड़ेंगी चुनाव

‘न्यूट्रल’ पत्रकार सुप्रिया श्रीनेट, ईटी नाउ की कार्यकारी संपादक, शुक्रवार को कॉन्ग्रेस पार्टी में शामिल हो गईं। इस बात का ख़ुलासा कॉन्ग्रेस द्वारा जारी की गई चौथी लिस्ट से हुई। चौथी लिस्ट में पार्टी नेतृत्व ने सुप्रिया को उत्तर प्रदेश के महाराजगंज से तनुश्री त्रिपाठी की जगह चुनाव लड़ने का मौक़ा दिया है।

दिलचस्प बात यह है कि कॉन्ग्रेस पार्टी में शामिल होने वाली सुप्रिया श्रीनेट द्वारा इसी हफ़्ते पत्रकारों की ‘न्यूट्रिलिटी’ और अखंडता पर सवाल उठाए थे। हाल ही में, सुप्रिया श्रीनेट ने RBI के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन का साक्षात्कार लिया था और अपने इसी शो में राहुल गाँधी के NYAY कार्यक्रम का समर्थन भी किया था।

आज यह स्वीकार करना अस्वाभाविक नहीं है कि देश में कई पत्रकार हैं जो एक तरफ तो गाँधी परिवार के प्रति सहानुभूति रखते हैं और दूसरी तरफ जनता में ‘न्यूट्रल’ होने का स्वांग रचते हैं। सुप्रिया श्रीनेट का कॉन्ग्रेस के प्रति यह गहरा लगाव एक दिन में तो नहीं बना होगा बल्कि यह प्रक्रिया बहुत पहले से रही होगी।

सुप्रिया श्रीनेट को लोकसभा चुनाव का उम्मीदवार बनाए जाने से पहले किसी भी राजनीतिक दल की विचारधारा को समझने के लिए अपने टिकट की पैरवी करने या कम से कम निर्णय लेने के लिए पर्याप्त समय लेना चाहिए। अगर सुप्रिया श्रीनेट टिकट की पैरवी कर रही थीं या लंबे समय से कॉन्ग्रेस पार्टी में शामिल होने पर विचार कर रही थीं, तो क्या यह एक पत्रकार के रूप में उनका यह आचरण उन्हें सवालों के घेरे में नहीं घेरता?

एक पत्रकार के रूप में सुप्रिया श्रीनेट की निष्ठा स्पष्ट रूप से संदिग्ध है क्योंकि कॉन्ग्रेस में शामिल होने की उनकी योजना सहज और सरल तो नहीं हो सकती, इसके लिए उन्होंने सोच-विचार कर लंबी योजना बनाई होगी। कॉन्ग्रेस में शामिल होने का रास्ता उन्होंने बहुत पहले से तैयार किया होगा जिसका संबंध हाल में लिए गए साक्षात्कार और राहुल गाँधी की नीतियों का समर्थन करने से नहीं है।

इस बीच, यह जानना भी पेचीदा है कि क्या ईटी नाउ इस तथ्य से अवगत था कि सुप्रिया श्रीनेट का कॉन्ग्रेस पार्टी के प्रति झुकाव था। अगर ईटी नाउ को उनके कॉन्ग्रेस लिंक के बारे में पता था, तो मीडिया संगठन ने जनता में इसका ख़ुलासा क्यों नहीं किया या सुप्रिया को पत्रकारिता की आड़ में ईटी नाउ स्टूडियो से कॉन्ग्रेस का प्रचार करने से दूर रखने की कोशिश क्यों नहीं की?

पत्रकारिता के क्षेत्र में निष्पक्षता एक पहलू है। प्रत्येक पत्रकार अपने स्वयं के राजनीतिक विचारों का हक़दार होता है। ऐसे में सुप्रिया श्रीनेट का ये आचरण उन्हें एक नहीं बल्कि अनेकों सवालों के घेरे में ला खड़ा करता है जो अपने प्रोफेशन की आड़ में राजनीतिक सपने को पूरा करने की जुगत में दिखती हैं।

राहुल गाँधी ने युवाओं के लिए की स्टार्टअप योजना की घोषणा, मोदी सरकार पहले से ही दे रही है ये सुविधा

लोकसभा चुनाव नज़दीक आते ही कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने अपनी प्रचार रणनीति बदल दी है। अब उन्होंने भाजपा पर झूठे आरोप लगाने के साथ ही लोकलुभावने वादे भी करते नज़र आ रहे हैं। न्यूनतम आय गारंटी योजना का वादा करने के बाद, आज कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने स्टार्टअप व्यवसायों के लिए कुछ वादे किए। उन्होंने स्टार्टअप के लिए चार अहम वादे किए। उन्होंने कहा कि किसी भी नए व्यवसाय के पहले 3 वर्षों के लिए किसी भी नियामक अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी। इसके अलावा एंजल टैक्स को खत्म कर दिया जाएगा। इसके साथ ही व्यापार द्वारा उत्पन्न की गई नई नौकरियों के आधार पर प्रोत्साहन और कर क्रेडिट दिया जाएगा और बैंक से आसानी से लोन भी मिलेगा।

कॉन्ग्रेस के समर्थक राहुल गाँधी की इस घोषणा को लेकर ऐसे खुश हो रहे हैं, जैसे उन्होंने कुछ ऐसा कर दिया, जो कि इससे पहले कभी देश में हुआ ही नहीं। इतना ही नहीं, कॉन्ग्रेस समर्थक राहुल गाँधी की इस घोषणा को क्रांतिकारी सोच के तौर पर भी देख रहे हैं। लेकिन हम आपको बता दें कि राहुल गाँधी जो अभी वादा कर रहे हैं, मोदी सरकार पहले ही ये सेवा प्रदान कर चुकी है।

स्टार्टअप इंडिया प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई एक बड़ी पहल थी और राहुल गाँधी ने भी वादा किया है, वो सब पहले से ही इसके दायरे में आते हैं। स्टार्टअप इंडिया में पहले से ही एक व्यवसाय शुरू करने के लिए सिंगल विंडो क्लीयरेंस का प्रावधान है। और इसमें वेब-आधारित पोर्टल और मोबाइल ऐप-आधारित इंटरफ़ेस के माध्यम से विभिन्न श्रम और पर्यावरण कानूनों के अनुपालन के लिए स्व-प्रमाणन की सुविधा उपलब्ध है।

स्टार्टअप इंडिया योजना के तहत, श्रम कानूनों के बारे में पहले तीन वर्षों में कोई निरीक्षण नहीं किया जाता है। नया व्यवसाय शुरू करने के लिए बस एक वेबसाइट पर पंजीकरण की आवश्यकता होती है। इसके लिए प्रपत्रों के पृष्ठों को भरने और सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने की भी आवश्यकता नहीं होती है।

वैसे देखा जाए तो मोदी सरकार न केवल राहुल गाँधी द्वारा किए जा रहे वादों को पहले ही पूरा कर चुकी है, बल्कि स्टार्टअप इंडिया पहल के तहत और जनता को और भी कई लाभ दे रही है। स्टार्टअप व्यवसाय पूर्व अनुभव और न्यूनतम कारोबार की आवश्यकताओं के बिना सरकारी निविदाओं में भाग ले सकते हैं। स्टार्टअप्स को लंबे समय के लिए पूँजीगत लाभ कर से छूट दी जाती है, और ऐसे व्यवसायों के लिए पेटेंट फाइलिंग शुल्क में 80% की कमी का प्रावधान है। इसके साथ ही केवल 90 दिनों में उद्यम को बंद करने के प्रावधान के साथ व्यवसायों को बंद करना भी आसान है।