नई दिल्ली से वाराणसी के बीच चलने के लिए तैयार देश की सबसे तेज गति वाली सेमी स्पीड ट्रेन ‘वन्दे भारत एक्सप्रेस’ का किराया घटा दिया गया है। बता दें कि 15 फरवरी को प्रधानमंत्री मोदी इस ट्रेन का उद्घाटन करने वाले हैं।
सोमवार (फ़रवरी 11, 2019) को वन्दे भारत एक्सप्रेस के किराए को लेकर ख़बर आई थी कि इसके चेयर कार का किराया शताब्दी एक्सप्रेस के मुकाबले 1.5 गुना और एग्जीक्यूटिव क्लास का 1.4 गुना ज़्यादा था। अब इस ट्रेन का किराया और घटा दिया गया है।
दिल्ली से वाराणसी के बीच चलने वाली इस ट्रेन का प्रस्तावित किराया चेयर कार के लिए 1850 रुपए से घटाकर 1760 रुपए और एक्जीक्यूटिव क्लास के लिए 3520 से घटाकर 3310 रुपए कर दिया गया है। यह आदेश भारतीय रेलवे ने दिया है।
वापसी में वाराणसी से दिल्ली आते वक़्त चेयर कार की दर 1795 से घटाकर 1700 रुपए और एग्जीक्यूटिव क्लास का टिकेट 3470 से कम कर 3260 रुपए तय की गई है। सेमी हाई स्पीड ट्रेन का किराया शताब्दी से थोड़ा ही ज़्यादा है।
चेयरकार और एग्जीक्यूटिव क्लास में सुबह का चाय, नाश्ता और लंच की दर दोनों श्रेणियों के लिए अलग-अलग है। दिल्ली से वाराणसी की यात्रा में एग्जीक्यूटिव क्लास के लिए यह 399 रुपए है जबकि चेयर कार के लिए यह 344 रुपए। वाराणसी से नई दिल्ली की यात्रा में यह दर घट कर 349 रुपए और 288 रुपए ही है। कम दूरी की यात्रा जैसे नई दिल्ली से कानपुर और प्रयागराज तक के लिए यह दर क्रमशः 155 रुपए और 122 रुपए है। उपरोक्त सभी दरें किराए में शामिल हैं।
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बीकानेर जिले में जमीन घोटाले के संबंध में मंगलवार (फरवरी 12, 2019) को जमानत पर चल रहे कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के बहनोई रॉबर्ट वाड्रा और उनकी माँ मौरीन वाड्रा से पूछताछ की। रॉबर्ट वाड्रा से यह पूछताछ करीब 3 घंटे तक चली, जबकि उनकी माँ मौरीन करीब डेढ़ घंटे में ही ईडी कार्यालय से बाहर आ गई थीं। वाड्रा अपनी माँ मौरीन के साथ सुबह ही ईडी के क्षेत्रीय कार्यालय पहुँचे।
ईडी कार्यालय द्वारा चल रही पूछताछ के कारण प्रियंका गाँधी के पति रॉबर्ट वाड्रा इन दिनों काफी भावुक नजर आ रहे हैं। अपनी पत्नी ‘P’ के नाम अश्रुपूरित पोस्ट लिखने के बाद ही लगातार दूसरे दिन भी उन्होंने फेसबुक पर बेहद इमोशनल पोस्ट किया है। यह पोस्ट उन्होंने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के सामने अपनी माँ मौरीन वाड्रा के साथ पूछताछ के लिए पेश होने से पहले किया। वाड्रा ने इस पोस्ट में अपनी माँ के साथ एक फोटो भी पोस्ट की।
रॉबर्ट वाड्रा ने फेसबुक पर अपनी बुर्जुग माँ के साथ फोटो साझा करते हुए पोस्ट में लिखा, “मैं अपनी 75 वर्षीय माँ के साथ जयपुर में ईडी के समक्ष पेश होने के लिए आया हूँ। समझ में नहीं आ रहा कि सरकार क्यों एक वरिष्ठ नागरिक के साथ बदले की भावना से काम कर रही है। उस महिला के साथ, जिसने अपने परिवार के तीन-तीन लोगों को खोया है। कार दुर्घटना में उनकी बहन की और डाइबिटीज से उनके भाई और पिता की मौत हुई। इसके बाद से मैं अपनी माँ को अपने साथ रखता हूँ, ताकि उनकी देखभाल कर सकूँ और साथ रहकर उनका दर्द बाँट सकूँ। इसी वजह से उनकी माँ भी अभियुक्त बना दी गई हैं। मेरे साथ रहने के लिए माँ को भी पूछताछ के लिए बुलाया जा रहा है।”
इसके साथ ही रॉबर्ट वाड्रा ने मोदी सरकार और प्रवर्तन निदेशालय की मंशा पर सवाल उठाते हुए लिखा, “मुझसे लगातार 3 दिन दिल्ली में ईडी के हेडक्वार्टर में पूछताछ हो चुकी है। यदि कोई मामला बनता है तो आम चुनाव का प्रचार शुरू होने से ठीक 1 महीने पहले पूछताछ के लिए बुलाने में सरकार को 4 साल 8 महीने क्यों लगे? क्या वे सोचते हैं कि देश के लोग इसे चुनावों से जोड़कर नहीं देखते हैं?”
वाड्रा का कहना है कि वह कानून का सम्मान करते हैं और सच जरूर सामने आएगा। उन्होंने इसके आगे लिखा, “मैं कानून को मानने वाले एक अनुशासित व्यक्ति हूँ। मैं घंटों की पूछताछ का सामना करने का दम रखता हूँ क्योंकि मेरे पास छिपाने के लिए कुछ भी नहीं है। मैं सवाल का सम्मान के साथ जवाब देने के लिए तैयार हूँ। यह वक्त भी जल्द ही खत्म हो जाएगा, लेकिन जाते-जाते मुझे मजबूत कर जाएगा। आखिरकार सच सामने आ ही जाएगा, ईश्वर हमारे साथ हैं।”
क्या है मामला:
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) रॉबर्ट वाड्रा की कंपनियों द्वारा बीकानेर के महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में जमीन खरीद मामले में पूछताछ कर रही है। बीकानेर महाजन फील्ड फायरिंग रेंज की जमीनों की खरीदी के मामले में प्रवर्तन निदेशालय द्वारा की गई जाँच में कई अनियमितताएँ सामने आई हैं। ईडी द्वारा की गई जाँच के बाद जमीनों की सौदेबाजी में दलाल रहे जयप्रकाश को भी गिरफ्तार भी किया गया था। दलाल जयप्रकाश की गिरफ्तारी और जमीनों की सौदेबाजी में सामने आई अनियमितताओं के बाद ईडी ने इन संपत्तियों को जब्त कर लिया है।
हिजबुल के आतंकवादी हिलाल अहमद राठेर को जम्मू-कश्मीर पुलिस ने मंगलवार (फरवरी 12, 2019) को मार गिराया है। इस एन्काउंटर की जानकारी देते हुए अधिकारियों ने बताया कि दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले के रत्नीपोरा में मुठभेड़ के दौरान सेना का एक जवान भी शहीद हुआ है।
इस बात की जानकारी पुलिस महानिरिक्षक स्वयं प्रकाश पाणि ने कहा है कि पिछले साल लश्कर-ए-तैयबा के ख़तरनाक आतंकवादी नवीद जट को श्रीनगर के अस्पताल से भगाने की साजिश में हिलाल मुख्य आरोपित था।
बता दें कि नवीद जट की ट्रेनिंग अजमल कसाब के साथ हुई थी। वो पाकिस्तान के मुल्तान का निवासी था, साथ ही लश्कर-ए-तैयबा का कमांडर भी था। जम्मू-कश्मीर में नवीद का खौफ बहुत ज़्यादा था, वह बेहद क्रूर था, मात्र 16 साल की उम्र में उसने कश्मीर में घुसपैठ के बाद से ही दक्षिण कश्मीर में उसने कई छोटे बच्चों के गले रेते थे।
साथ ही वो कई अन्य लोगों की हत्याओं का भी मुख्य आरोपित था। शुजरात बुखारी हत्याकांड का मास्टरमाइंड भी नवीद को बताया जाता है। 28 नवंबर 2018 को हुई मुठभेड़ में नवीद जट मारा गया।
लोकसभा चुनाव से पहले बंगाल में TMC कार्यकर्ताओं द्वारा लगातार भाजपा नेताओं पर हमले की ख़बर आ रही है। मंगलवार को पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता मुकुल राय ने गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मिलकर सुरक्षा देने की माँग की है। मुकुल राय ने गृहमंत्री से मिलकर यह आरोप लगाया है कि टीएमसी कार्यकर्ताओं से उनकी जान को खतरा है।
जानकारी के लिए बता दें कि चुनाव नजदीक आते ही प्रदेश में टीएमसी कार्यकर्ताओं द्वारा भाजपा समेत विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के पर हमले की घटनाएँ सामने आ रही हैं।
पिछले दिनों टीएमसी कार्यकर्ताओं ने मुर्शिदाबाद के बीजेपी जिला अध्यक्ष गौरी शंकर घोष और उनके समर्थकों के साथ मारपीट की। इसी तरह हुगली के आरामबाग में भी एसडीओ ऑफिस के सामने टीएमसी के लोगों ने भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट की। इसी तरह पश्चिम बंगाल के टीएमसी कार्यकर्ताओं ने वीरभूम जिले के भाजपा इंचार्ज के साथ जिला न्यायाधीश दफ्तर में मारपीट की।
जब प्रदेश भर में टीएमसी कार्यकर्ताओं द्वारा गुंडागर्दी की घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है, ऐसे समय में मुकुल राय का डरना जायज़ ही है। आपको बता दें कि मुकुल राय भाजपा में आने से पहले टीएमसी के ही नेता थे।
ममता के हिटलरशाही व्यवहार से तंग आकर भाजपा में शामिल होने के बाद मुकुल राय टीएमसी नेताओं की नजर में आ गए। इसके बाद मुकुल राय को न सिर्फ टीएमसी के लोगों द्वारा धमकी मिल रही हैं बल्कि हत्या जैसे संगीन मामले में भी मुकुल राय को आरोपित भी बनाया गया है।
सन 1947-48 में विश्व का सबसे बड़ा भूराजनैतिक परिवर्तन हो रहा था और इस परिवर्तन की धुरी था भारत का जम्मू कश्मीर राज्य। नवंबर 1948 में पाकिस्तानी फ़ौज की अगुआई में कबाईलियों ने ज़ोजिला दर्रे पर कब्जा कर लिया था जिसके कारण श्रीनगर से कारगिल द्रास होते हुए लेह तक जाने का मार्ग कट गया था। तब भारतीय सेना ने 11,500 फ़ीट की ऊँचाई पर टैंकों की तैनाती की और (तत्कालीन) मेजर जनरल थिमैय्या के नेतृत्व में भीषण युद्ध हुआ जिसे ‘बैटल ऑफ़ ज़ोजिला’ कहा जाता है।
लगभग एक महीने तक चले इस युद्ध को जीतने के बाद ज़ोजिला दर्रे से पाकिस्तानियों को मार भगाया गया और लद्दाख पाकिस्तान के कब्जे में जाने से बच गया। ज़ोजिला की लड़ाई में केवल भारतीय सेना ने ही बलिदान नहीं दिया था अपितु लद्दाख के बौद्ध लामा 19वें कुशोक बकुला रिनपोछे ने युद्ध के समय महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। पाकिस्तानी आक्रमण के समय लद्दाखी जनता घबराई हुई कुशोक बकुला की ओर देख रही थी क्योंकि उसी समय से शेख अब्दुल्ला की मौकापरस्त राजनीति में लद्दाख कहीं नहीं था।
भारतीय सेना को ज़ोजिला की लड़ाई में स्थानीय युवकों की अत्यंत आवश्यकता थी क्योंकि वे लद्दाख के पहाड़ों के दुर्गम रास्तों से परिचित थे। कुशोक बकुला ऐसे समय आगे आए और उन्होंने लद्दाख के युवाओं का एक संगठन बनाया जो नुब्रा गार्ड्स के नाम से प्रसिद्ध हुआ। नुब्रा गार्ड्स के सैनिकों ने पाकिस्तानी तोपें तबाह करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने पाकिस्तानियों को नुब्रा घाटी में आगे बढ़ने से रोके रखा।
इस प्रकार लद्दाख भारत का अंग बना रहा। यही नहीं सन 1962 के युद्ध में कुशोक बकुला ने बौद्ध मठों को भारतीय सेना के लिए अस्पताल बनाने की मंज़ूरी दे दी थी। जब कभी कश्मीर का एक वर्ग अलगाववाद और जनमत संग्रह की बात करता तब कुशोक बकुला उसका विरोध करते और कहते कि लद्दाख पाकिस्तान के साथ कभी नहीं जाएगा।
उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि लद्दाख क्षेत्र का भारत से भौगोलिक ही नहीं सांस्कृतिक जुड़ाव भी गहरा है। किंतु जम्मू कश्मीर राज्य की पूरी राजनीति सदैव कश्मीर केंद्रित रही है जिसका ख़ामियाज़ा लद्दाख को भुगतना पड़ा है। यह स्थिति आज से नहीं बल्कि आधुनिक लद्दाख के निर्माता कहे जाने वाले कुशोक बकुला के समय से है। वास्तव में लद्दाख का क्षेत्रफल कश्मीर से अधिक है किंतु वहाँ की जनसंख्या बहुत कम है। लद्दाख की भौगोलिक स्थिति शेष जम्मू कश्मीर राज्य से भिन्न और अनोखी है इसीलिए उसे अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाने की मांग लंबे समय से चल रही है।
जनसंख्या के आधार पर पूरे जम्मू कश्मीर राज्य को दो डिवीज़न में बाँटा गया था- जम्मू और कश्मीर। पहले लद्दाख के दो ज़िलों- कारगिल और लेह- का प्रशासन भी कश्मीर डिवीज़न द्वारा ही चलाया जाता था। श्रीनगर में बैठे डिविज़नल कमिश्नर मनमानी करते थे और लद्दाख की समस्याओं पर ध्यान नहीं देते थे। सन 2010 में जब बादल फटा था और लद्दाख में बाढ़ आ गई थी तब राहत सामग्री के लिए लेह और कारगिल में बैठे दोनों डिप्टी कमिश्नर तब तक इंतज़ार करते रहे जब तक श्रीनगर से डिविज़नल कमिश्नर का आदेश नहीं आ गया।
दरअसल डिवीज़नल कमिश्नर के पास ही सारे अधिकार होते हैं और जब तक वहाँ से फंड रिलीज़ नहीं होता तब तक डिवीज़न में कोई विकास या राहत कार्य नहीं हो सकता। लद्दाख की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि छह महीने वहाँ बर्फ गिरती है जिसके कारण बाहरी दुनिया से सम्पर्क टूट जाता है। ऐसे में किसी भी प्रशासनिक आदेश के लिए लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ती है।
लद्दाख में रोजगार के अवसर कम हैं क्योंकि यह क्षेत्र शेष कश्मीर से अधिक पिछड़ा हुआ है। यहाँ फंड की कमी है जिसके कारण विकास कार्य बाधित होते हैं। विकास परियोजनाओं की चाभी श्रीनगर में बैठे डिविज़नल कमिश्नर के पास होती है जो कश्मीर घाटी की अलगाववादी राजनीति से प्रभावित होती है।
अब जब लद्दाख को एक अलग डिवीज़न बना दिया गया है तब वहाँ कश्मीर से अलग एक डिविज़नल कमिश्नर होगा, प्रत्येक विभाग का अलग डायरेक्टरेट होगा तथा वरीयता और अन्य मापदंडों के आधार पर प्रोन्नति में बाधा नहीं आएगी। सबसे बड़ी बात कि अब लद्दाख के लोगों को किसी भी प्रशासनिक कार्य के लिए श्रीनगर का मुँह नहीं देखना होगा। पहले श्रीनगर में बैठे अधिकारी अपने हिसाब से लद्दाख का प्रशासनिक कामकाज देखते थे और लद्दाख की समस्याओं की अनदेखी करते थे।
राज्यपाल की मुहर के बाद अब लद्दाख डिविज़न का प्रशासनिक और रेवेन्यू मुख्यालय लेह में होगा जिसके बनने की तैयारी शुरू कर दी गई हैं। अब लेह में एक अलग डिविज़नल कमिश्नर और इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस का पद और कार्यालय होंगे। साथ ही प्रिंसिपल सेक्रेटरी के निगरानी में एक टीम बनायी गई है, जो अन्य प्रशासनिक विभागों के डिविज़नल ऑफिस, उसके अधिकारियों और स्टाफ की नियुक्ति और लागू करने का काम देखेंगे। इससे न सिर्फ लोगों को सुविधा होगी, बल्कि क्षेत्रीय विकास में बढोत्तरी होगी। मुख्यालय खुलने से आसपास बिज़नेस की संभावनाएं भी बढ़ेंगी।
राज्यपाल के लद्दाख को अलग डिवीज़न बनाने के निर्णय के विरुद्ध कश्मीर के नेताओं की बिलबिलाहट भी दिखने लगी है। एक तरफ तो उनका वर्चस्व टूटा है दूसरी तरफ वे इससे खुलकर असहमति भी नहीं जता पा रहे हैं। आनन-फानन में नेताओं और पत्रकारों ने ट्वीट कर बेमन बधाई तो दी लेकिन असली भड़ास इन “किन्तु-परन्तु” और “but” जैसे शब्दों के साथ निकालनी शुरू कर दी गई हैं। अब इन्हें चेनाब और पीर पंजाल की याद भी आने लगी है।
विवादों के कारण अक्सर चर्चा में रहने वाले शिक्षण संस्थान JNU में नया विवाद सामने आया है। 35 वर्षीय रिसर्च स्कॉलर आशुतोष कुमार रॉय ने दिल्ली हाई कोर्ट की मदद ली है। रिसर्च स्कॉलर ने आरोप लगाया है कि उस पर दबाव बनाया जा रहा है कि वह हिंदी को सांप्रदायिक भाषा बताते हुए उस पर रिसर्च करे। मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस सी हरी शंकर ने विश्वविद्यालय और सह-प्राध्यापक को नोटिस जारी करते हुए इस पर 23 अप्रैल तक जवाब माँगा है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, JNU में इतिहास विषय से पीएचडी कर रहे आशुतोष कुमार रॉय ने अपने वकील के दिब्यांशु पांडे के जरिए आरोप लगाया है कि उनसे जबरन उनका विषय बदलकर हिंदी को सांप्रदायिक बताते हुए रिसर्च करने का दबाव बनाया गया है। रॉय ने संविधान के तहत मौलिक अधिकारों के हनन की दलील देते हुए विश्वविद्यालय से 2019 के शीतकालीन सेमेस्टर के लिए पीएचडी सुपरवाइजर की माँग की है।
दायर की गई याचिका में विश्वविद्यालय द्वारा रजिस्ट्रेशन के लिए मना करने और हिंदी पब्लिक स्फियर(1870-1970) और राष्ट्रवाद पर रिसर्च कर बहस के जरिए हिंदी की छवि खराब करने को लेकर जाँच की माँग की गई है।
याचिका में कहा गया है कि रॉय दिसंबर 2017 से लेकर जून 2018 तक तीन बार नए सुपरवाइजर की नियुक्ति की अपील कर चुके हैं, लेकिन विश्वविद्यालय की तरफ से कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला। रॉय ने खुद अध्ययन करते हुए बिना किसी मदद के जुलाई 2018 में शोध प्रारूप दिया।
रॉय के इस शोध प्रारूप को जब कमेटी ऑफ एडवांस स्टडी एंड रिसर्च में प्रस्तुत किया गया तो प्राध्यापक ने शोध प्रारूप अपने पास रख लिया और कहा, “यहाँ हिंदी के पक्ष में रिसर्च करने के लिए कोई जगह नहीं है, बेहतर होगा आप दिल्ली विश्वविद्यालय चले जाइए और वहाँ जाकर भारतेंदु हरिश्चंद्र का गुणगान कीजिए।”
याचिका में कार्यवाहक सुपरवाइजर और अन्य लोगों पर आरोप है कि उन्होंने रॉय पर दबाव बनाया कि वह हिंदी की छवि खराब करने को लेकर रिसर्च करे, साथ ही हिंदी के दिग्गजों के खिलाफ भी ऐसा ही करे। इतना ही नहीं, रॉय को आगे की पीएचडी भी करने से रोका जा रहा है। याचिकाकर्ता ने इसे अपने मौलिक अधिकारों का हनन बताते हुए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
वर्ष 2012 में JNU आए रॉय ने पुराने रिसर्च सुपरवाइजर के इस्तीफे के बाद बिना देरी के नए रिसर्च सुपरवाइजर की नियुक्ति की माँग की है। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय की तरफ से नया सुपरवाइजर ना मिलने के चलते उनकी पढ़ाई में भी रुकावट आ रही है। विश्वविद्यालय की तरफ से उनकी रिसर्च के लिए रिसर्च एडवाइजरी कमेटी का भी गठन नहीं किया जा रहा है।
रिलायंस (ADA) ग्रुप के चेयरमैन अनिल अम्बानी आज मंगलवार (फरवरी 12, 2019) को सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए। एरिक्सन इंडिया द्वारा दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने उन्हें तलब किया है। एरिक्सन ने आरोप लगाया है कि अनिल अम्बानी ने रिलायंस जिओ को संपत्ति बेचने के बाद कम्पनी की ₹550 करोड़ की राशि का भुगतान नहीं किया। इस मामले में कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल अम्बानी की तरफ से अदालत में पैरवी कर रहे हैं। बता दें कि सिब्बल पहले भी अनिल अम्बानी की तरफ से अदालत में ज़िरह कर चुके हैं।
अम्बानी की तरफ से अदालत में पेश हुए कपिल सिब्बल
सबसे आश्चर्य वाली बात तो यह है कि अदालत में अनिल अम्बानी के लिए पैरवी करने वाले कपिल सिब्बल ने आज ही ट्वीट कर उन पर निशाना साधा है।
It seems Airbus , French Government , Anil Ambani all knew that the PM will sign an MOU on his visit to France between 9th and 11th April , 2015 .
अपने ट्वीट में अनिल अम्बानी के वकील कपिल सिब्बल ने अनिल अम्बानी पर निशाना साधते हुए कहा:
“ऐसा लगता है कि एयरबस, फ्रांस सरकार और अनिल अंबानी को पहले से पता था कि प्रधानमंत्री अपनी फ्रांस यात्रा के दौरान एक MoU साइन करेंगे।’ प्रधानमंत्री मोदी 9-11 अप्रैल, 2015 को फ्रांस के दौरे पर गए थे। इसी दौरान राफेल डील को लेकर MoU साइन हुआ था।”
कपिल सिब्बल के इस विरोधाभासी व्यवहार की सोशल मीडिया में लोगों ने तीखी आलोचना की। लोगों ने कहा कि एक ही दिन में वह एक तरफ अनिल अम्बानी की पैरवी के लिए अदालत में पेश होते हैं तो वहीं दूसरी तरफ अनिल अम्बानी के ख़िलाफ़ ट्वीट भी करते हैं।
बता दें कि राहुल गाँधी ने भी अनिल अम्बानी और पीएम मोदी की ‘नजदीकियों’ को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
Congress President Rahul Gandhi used a fresh media report to allege that PM Narendra Modi had acted as a “middleman” for industrialist Anil Ambani in the Rafale fighter deal and accused him of violating the Official Secrets Act (OSA)
ये सब देखकर हालात कुछ और ही नज़र आ रहे हैं। पीएम मोदी के बजाय कॉन्ग्रेस नेताओं से ही अनिल अम्बानी की नजदीकियाँ सामने आ रही है। इसीलिए हमारी एक रिपोर्ट में कपिल सिब्बल के लिए कहा गया था- ‘येक पे रहना, या घोड़ा बोलो या चतुर बोलो‘।
भूपेन हजारिका के बेटे तेज हजारिका ने अपने फेसबुक पोस्ट के जरिए कहा है कि उन्हें भारत रत्न पुरस्कार लेने के लिए अभी तक कोई निमंत्रण ही नहीं मिला है, ऐसे में इस सम्मान को खारिज करने का सवाल ही नहीं उठता है।
दरअसल पिछले दिनों कई मीडिया हाउस ने ख़बर उड़ाई कि डॉ भूपेन हजारिका के परिवार ने भारत रत्न लेने से इंकार कर दिया है जिसे भारत सरकार ने पिछले महीने भूपेन हज़ारिका को प्रदान करने का फैसला लिया था। 25 जनवरी को भारत सरकार द्वारा यह घोषणा की गई थी कि डॉ हज़ारिका, प्रणब मुखर्जी और नानाजी देशमुख को भारत रत्न से सम्मानित किया जाएगा।
पिछले दिनों ख़बरों के जरिए यह उभर कर आया कि भूपेन हजारिका परिवार के सदस्य तेज हज़ारिका ने इस पुरस्कार को लौटाने की घोषणा की है। अमेरिका में रहने वाले तेज, भूपेन हज़ारिका की एकमात्र संतान हैं। यह बताया गया कि नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध में तेज ने पुरस्कार लेने से इनकार किया है।
पुरस्कार लौटाने के इस ख़बर के कुछ ही समय बाद जब तेज हजारिका की ओर से जारी बयान सामने आया, तो यह स्पष्ट हो गया कि मुख्यधारा की मीडिया से आ रही यह ख़बर फर्जी थी।
दरअसल,फेसबुक पर जारी एक बयान में, तेज ने स्पष्ट रूप से कहा कि पुरस्कार को स्वीकार करने या मना करने का कोई सवाल ही नहीं है, क्योंकि उन्हें सरकार से ऐसा कोई निमंत्रण नहीं मिला है।
उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें सफाई देनी पड़ रही है क्योंकि उन्हें इस संबंध में लगातार मीडिया से सवाल पूछे जा रहे हैं। हालाँकि, तेज हजारिका ने अपने बयान में नागरिकता संशोधन विधेयक के ख़िलाफ़ लिखा है कि उनके पिता का नाम एक अलोकप्रिय बिल पास करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन उन्होंने अपने बयान में हजारिका परिवार द्वारा भारत रत्न पुरस्कार लेने से इनकार करने का जिक्र अपने फेसबुक पोस्ट में नहीं किया है। पुरस्कार वापसी वाली बात का आविष्कार मेन स्ट्रीम मीडिया द्वारा किया गया था।
जानकारी के लिए बता दें कि जब भारत सरकार द्वारा डॉ भूपेन हजारिका के नाम की घोषणा भारत रत्न के लिए की गई थी, तब तेज हजारिका ने इस कदम का स्वागत किया था। उन्होंने कहा था कि उनके पिता को भारत रत्न से सम्मानित करने का निर्णय मानवता, विविधता और देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र की जीत है।
उस समय, उन्होंने इसे नागरिकता संशोधन विधेयक के साथ नहीं जोड़ा था। हालाँकि, इस बिल का राज्य में विरोध हो रहा है, लेकिन बिल का विरोध करने वाले अधिकांश लोगों ने इसे भारत रत्न से नहीं जोड़ा था, केवल कांग्रेस पार्टी के कुछ नेताओं ने ऐसा करने की कोशिश की थी। जिसके लिए कॉन्ग्रेस पार्टी को राज्य में आलोचना का सामना करना पड़ा था।
तेज हजारिक अपने बयान में लिखते हैं कि सरकार ने यह फ़ैसला अपने अल्पकालिक सस्ते लाभ के लिए लिया है। इस तरह तेज हजारिका द्वारा एक अजीबो-गरीब तर्क देकर देश के सम्मानित पुरस्कार का राजनीतिकरण किया जा रहा है।
भूपेन हजारिका के भाई समर हजारिका और भाभी मनीषा हजारिका ने कहा कि तेज हजारिका के विचार उनके अपने हैं और वे पूरे परिवार के विचार नहीं हैं। डॉ भूपेन हजारिका के परिवार के सदस्यों ने कहा है कि वे तेज हजारिका की टिप्पणियों से सहमत नहीं हैं और इस बात पर जोर दिया कि भूपेन हजारिका भारत रत्न के हकदार हैं। उन्होंने कहा कि भूपेन हजारिका को दिए गए इस पुरस्कार को किसी विवाद में नहीं घसीटना चाहिए।
जानकारी के लिए बता दें कि जब भूपेन हजारिका के लिए भारत रत्न की घोषणा की गई, तो पूरे राज्य ने राजनीतिक संबद्धता के बावजूद इस कदम का स्वागत किया गया था। डॉ हजारिका के लिए भारत रत्न की मांग लंबे समय से की जा रही थी, राज्य सरकार ने उनकी मृत्यु के तुरंत बाद केंद्र सरकार को प्रस्ताव दिया था। लेकिन उस समय की यूपीए सरकार ने भूपेन हजारिका को यह सम्मान देने से इनकार कर दिया था। यही नहीं भूपेन हजारिका कॉन्ग्रेस के ख़िलाफ़ भाजपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव भी लड़े थे। डॉ हजारिका को भारत रत्न से सम्मानित करने के हालिया फैसले को देर से लिया गया लेकिन स्वागत योग्य फ़ैसले के रूप में देखा जाना चाहिए।
सउदी अरब में एक मासूम का गला उसकी माँ के सामने सिर्फ़ इसलिए काट दिया गया क्योंकि वो शिया समुदाय का था। ये घटना मदीना शहर की है। बच्चे का नाम जकारिया-अल-जबेर था, जिसकी उम्र महज़ छह साल थी।
इस घटना पर शिया मुस्लिमों के एक संगठन ‘शिया राइट्स वॉच’ के अनुसार जबेर अपनी माँ के साथ था, उसकी माँ हज़रत मुहम्मद की कब्र पर टैक्सी से जा रही थी। रास्ते में जाते समय एक जगह ज़बेर की माँ ने कोई दुआ पढ़ी, जिसे खास तौर पर सिर्फ़ ‘शिया’ समुदाय के ही लोग पढ़ते हैं। इसे सुनकर टैक्सी ड्राइवर ने उनसे पूछा कि इस्लाम में किस समुदाय से हैं? जबेर की माँ ने जवाब में ‘शिया’ कहा।
Shia Rights Watch says that “in an unprecedented incident” the 6-year-old boy, Zakaria al-Jaber, was brutally killed in Saudi Arabia after he was confirmed to be a Shia Muslim. #Shiagenocidehttps://t.co/Q29os13CGe
इसके बाद ज़बेर को कुछ खिलाने के लिहाज़ से उसकी माँ ने ड्राइवर से टैक्सी को रोकने के लिए कहा। ड्राइवर ने कार को किनारे पर रोका और बच्चे को कार से खींचकर बाहर निकाल लिया। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, उसनें काँच की एक बोतल फोड़ी और उसी बोतल के टूटे काँच से ज़बेर का गला काट दिया।
यह सब ज़बेर की माँ की मौजूदगी में हुआ। ज़बेर के साथ हुई इस बेरहमी पर वो रोई, चिल्लाई और फ़िर वहीं पर बेहोश हो गई। ये दिल दहला देने वाली घटना दिन के उजाले में हुई लेकिन, कोई भी ज़बेर को बचाने नहीं आया।
बता दें सऊदी गजेट के मुताबिक यह दावा किया गया है कि जिस व्यक्ति ने ज़बेर का बेरहमी से कत्ल किया है वो मानसिक रूप से बीमार है। लेकिन शिया संगठनों का आरोप है कि बच्चे को इसलिए मारा गया क्योंकि वो शिया समुदाय का था। मीडिया में इस ख़बर को हर जगह अलग-अलग एंगल देकर पेश किया जा रहा है। लेकिन सच्चाई यही है कि एक 6 साल के बच्चे को उसकी माँ के सामने बेरहमी से गला काट कर मार दिया गया है।
छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के बाद आए कॉन्ग्रेस के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में राज्य की सभी पूर्ववर्ती योजनाओं का नाम बदलने का खेल शुरू हो गया है। दीनदयाल उपाध्याय के नाम की सभी योजनाओं का नाम बदलकर इंदिरा प्रियदर्शिनी और राजीव गाँधी के नाम कर दिया गया।
शासन ने इन पाँच योजनाओं के नाम परिवर्तन की लिस्ट राज्यपाल को मंजूरी के लिए भेज दी है। जल्द ही ये योजनाएँ बिना परिवर्तन के कॉन्ग्रेस सरकार की योजनाएँ हो जाएँगी।
कॉन्ग्रेस के मुख्यमंत्री बघेल शायद इससे कॉन्ग्रेस के प्रति अपनी भक्ति साबित करना चाहते हैं या कुर्सी पाने की क़ीमत चुकाने का प्रयास कर कर रहे हैं।
कॉन्ग्रेस के योजनाओं के नाम परिवर्तन से देश में लगातार ये साबित करने की कोशिश होती रही कि देश में महापुरुष केवल एक ही परिवार में पैदा होते हैं। इस बात का सबूत आज़ादी के बाद से ही कॉन्ग्रेस जनित सरकारें देती रही हैं।