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मध्यप्रदेश में जंगलराज: दो बच्चों की फिरौती लेने के बाद नृशंस हत्या

12 फरवरी को सतना जिले के चित्रकूट से दो जुड़वाँ भाइयों, श्रेयांश और प्रियांश, को अपराधियों ने अगवा कर लिया था। परिवार वालों से ₹20 लाख की माँग की गई, जो उन्होंने दे दी। ख़बरों में यह भी कहा जा रहा है कि अपहरण करने वाले अपराधियों ने एक करोड़ रुपए फिरौती में माँगे थे।

हालाँकि, अपराधियों ने शनिवार को दोनों भाइयों की हत्या कर दी जिनके हाथ बंधे शवों को उत्तरप्रदेश के बांदा में नदी के पास पाया गया। बच्चों के शव बरामद होने के बाद चित्रकूट में कुछ जगहों पर हिंसा की भी खबरें हैं। 

मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार के सत्ता में आते ही राजनैतिक हत्याओं का सिलसिला शुरु हो गया था। भाजपा के कई कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई थी जिस पर सरकार ‘आपसी रंजिश’ बताकर मुँह बचाती रही।

सरकार के निकम्मेपन और बेकार के बयानों का आलम यह है कि मध्यप्रदेश के जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा इस अपराध के लिए उत्तर प्रदेश की पूरी सरकार का इस्तीफा माँग रहे हैं, “बच्चों की तलाश में उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश पुलिस का संयुक्त अभियान चल रहा था। अपराध उत्तर प्रदेश में हुआ है। यह वहाँ की भाजपा सरकार की नाकामी है। छह लोग गिरफ्तार किए गए हैं। मामला फास्टट्रैक कोर्ट में चलाया जाएगा। उत्तर प्रदेश सरकार को इस्तीफा दे देना चाहिए।”

लोगों में रोष, कई जगह विरोध प्रदर्शन

कानून व्यवस्था बद से बदतर होती जा रही है। आम जनता सोशल मीडिया के माध्यम से अपना रोष प्रकट कर रही है। साथ ही, कई जगहों पर सरकार की इस नाकामी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हो रहे हैं। पुलिस के 1500 जवान चित्रकूट में तैनात हैं।

जनता में सरकार के निकम्मेपन को लेकर सोशल मीडिया में भी लोग लिख रहे हैं। ग्वालियर के अरविन्द शर्मा का कहना है कि मध्यप्रदेश में भाजपा-शिवराज के शासन में शायद ही कोई ऐसा ह्रदय विदारक वाकया हुआ हो, लेकिन वर्तमान सरकार ने जब से सत्ता संभाली है अराजकता की स्थिति निर्मित हो गई है।

उन्होंने राजनैतिक स्थिति से अवगत कराते हुए कहा, “यहाँ के मंत्री जनता की नहीं बल्कि अपने-अपने आकाओं की खुशामद में लगे हुए हैं। सीएम कमलनाथ हैं लेकिन ड्राइविंग सीट पर दिग्विजय बैठे हुए हैं। दिग्विजय सिंह जो कि सरकार में किसी पद पर नहीं हैं, मंत्रियों के विधानसभा में दिए जाने वाले जवाबों को सार्वजनिक रूप से खारिज कर देते हैं।”

कमलनाथ सीएम बनने के बाद से हज़ारों अधिकारियों और कर्मचारियों को इधर से उधर कर चुके हैं। ट्रांसफर उद्योग अपने चरम पर है, हर रोज कई ट्रांसफर हो रहे हैं, कई अधिकारियों का तो इस दौरान दो-दो बार ट्रांसफर का ऑर्डर थमाया जा चुका है।

नतीजतन जिन अधिकारियों को लोगों के जान-माल की हिफाजत के कार्य में जुटना चाहिए था, वे अपना ट्रांसफर करवाने या रुकवाने की भागदौड़ में लगे हुए हैं, और यही कारण है कि यह नकारा सरकार इन दो मासूमों की जान भी नहीं बचा सकी।

पुलवामा जैसे IED से पूरे शहर को उड़ाने की साज़िश; 3 माओवादी आतंकी ढेर, 17 IED, 200 डेटोनेटर ज़ब्त

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में हुए आत्मघाती हमले में जिस IED का इस्तेमाल किया गया था, उसी विस्फोटक का इस्तेमाल करके झारखंड को भी दहलाने की साज़िश रची जा रही थी। इस साज़िश को पुलिस और सशस्त्र सीमा बल (SSB) ने मिलकर नाकाम कर दिया है।

रविवार (फ़रवरी 24, 2019) तड़के गुमला में सुरक्षाबलों ने एक एनकाउंटर में तीन माओवादी आतंकियों को मार गिराया। इसके अलावा घटनास्थल से 2 AK-47 राइफ़ल भी बरामद की गई हैं। पुलिस टीम ने 17 IED जैसा ख़तरनाक विस्फोटक और 200 से अधिक डोटोनेटर बरामद किए हैं। इतने विस्फोटक से पूरे शहर को दहला देने की साज़िश थी।

बता दें कि पूरे इलाक़े में सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है क्योंकि वहाँ और भी आतंकवादियों के छिपे होने की संभावना है। पुलिस ने बताया कि उन्हें गुमला के कामडार थाना क्षेत्र में कुछ और माओवादी आतंकियों के छिपे होने की सूचना मिली है।

ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि इन माओवादियों का इरादा किसी बड़ी घटना को अंजाम देने का था। सुरक्षा इंतज़ाम को कड़ा करते हुए पूरे इलाक़े की घेराबंदी की गई है जिससे इन माओवादियों के भागने का मौक़ा न मिल सके। घेराबंदी से बौखलाए माओवादियों ने जवाबी गोलीबारी भी की। इसी गोलीबारी में तीन माओवादियों को मार गिराया गया।

जानकारी के अनुसार, पिछले महीने झारखंड के सिंहभूमि ज़िले में सुरक्षा बलों ने पाँच माओवादियों का ख़ात्मा किया था। झारखंड के 19 ज़िले उग्रवाद से प्रभावित हैं और इनमें भी 13 ऐसे ज़िले हैं जो अति उग्रवाद से प्रभावित हैं।

हम भारत को $10 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनाने को तत्पर हैं: मोदी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज इकोनोमिक टाइम्स वैश्विक व्यवसाय सम्मेलन को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि 2013-14 की तुलना में, जब भारत विकराल महँगाई, उच्च राजकोषीय घाटे तथा नीतिगत अपंगता से घिरा हुआ था, आज स्पष्ट बदलाव दृष्टिगोचर हो रहा है। 

उन्होंने कहा कि हिचकिचाहटों की जगह उम्मीदों ने ले ली है और बाधाओं की जगह आशावादिता ने ले ली है। प्रधानमंत्री ने कहा कि 2014 से भारत में लगभग सभी अंतर्राष्ट्रीय रैंकिंग एवं सूचकांकों में उल्लेखनीय सुधार आया है। 

उन्होंने कहा कि रैंकिंग अधिकतर पश्चतासूचक होते हैं जो तभी बदलते हैं जब जमीनी स्तर पर बदलाव आता है। इस संदर्भ में उन्होंने व्यवसाय की सुगमता का उल्लेख किया जिसके कई मानकों में स्पष्ट रूप से सुधार आया है। 

उन्होंने कहा कि वैश्विक नवोन्मेषण सूचकांक 2014 के 76 से सुधरकर 2018 में 57 तक आ चुका है जिससे नवोन्मेषण में तेज बदलाव स्पष्ट रुप से दिख रहा है। प्रधानमंत्री ने अभी एवं 2014 से पहले के बीच प्रतिस्पर्धा के विभिन्न रुपों के बीच एक अंतर रेखांकित किया। 

उन्होंने कहा कि अब प्रतिस्पर्धा विकास पर है और कुल स्वच्छता, या कुल विद्युतीकरण, या उच्च निवेश जैसे आकांक्षापूर्ण लक्ष्यों को अर्जित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इसके विपरीत, पहले स्पष्ट प्रतिस्पर्धा देरी एवं भ्रष्टाचार को लेकर प्रतीत होती थी। 

प्रधानमंत्री ने इस प्रकार के ‘वर्णन’ की जोरदार आलोचना की कि कुछ चीजें भारत में बिल्कुल असंभव हैं।

उन्होंने घोषणा की कि असंभव अब संभव है और उन्होंने भारत को स्वच्छ एवं भ्रष्टाचार मुक्त बनाने, गरीबों द्वारा प्रौद्योगिकी की ताकत का उपयोग करने, एवं नीति निर्माण में स्वनिर्णय तथा मनमानेपन को हटाने की दिशा में की गई प्रगति की चर्चा की। 

उन्होंने कहा कि पहले इस प्रकार की धारणा बनाई गई थी कि सरकारें एक ही समय विकासोन्मुखी तथा गरीबोन्मुखी नहीं हो सकतीं, लेकिन भारत के लोग अब इसे संभव बना रहे हैं।

उन्होंने कहा कि 2014 से 2019 के बीच देश 7.4 प्रतिशत की औसत से विकास दर्ज कराएगा और औसत मुद्रास्फीति 4.5 प्रतिशत से कम रहेगी। उन्होंने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के बाद से किसी भी सरकार की अवधि के दौरान यह औसत विकास की सर्वाधिक दर और औसत मुद्रा स्फीति की न्यूनतम दर होगी।

प्रधानमंत्री ने कहा कि पिछले 4 वर्षों के दौरान देश में प्राप्त विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की राशि लगभग उतनी ही है जितनी 2014 से पहले के सात वर्षों के दौरान प्राप्त हुई थी। उन्होंने कहा कि इसे अर्जित करने के लिए भारत को रुपांतरण हेतु सुधारों की आवश्यकता थी। प्रधानमंत्री ने कहा कि दिवालियापन कोड, जीएसटी, रियल एस्टेट अधिनियम के जरिए दशकों के उच्चतर विकास के लिए एक ठोस बुनियाद रख दी गई है। 

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत 130 करोड़ आकांक्षाओं का देश है और विकास तथा प्रगति के लिए कभी भी एक विजन नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि ‘नवीन भारत का हमारा विजन आर्थिक रूपरेखा, जाति, वर्ण, भाषा एवं धर्म से परे, समाज के सभी वर्गों की आवश्यकताओं का ध्यान रखता है।’

श्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि, ‘नवीन भारत के हमारे विजन में भविष्य की चुनौतियों पर ध्यान देना तथा अतीत की समस्याओं का समाधान करना शामिल है।’ इस संदर्भ में उन्होंने निम्नलिखित उदाहरण दिएः

  • जहां भारत ने अपनी सबसे तेज गति से चलने वाली रेलगाड़ी का निर्माण किया है, इसने सभी मानव-रहित रेलवे क्रांसिंगों को भी समाप्त कर दिया है।
  • जहां भारत तेज गति से आईआईटी एवं एम्स का निर्माण कर रहा है वहीं, इसने देशभर में सभी विद्यालयों में शौचालयों का भी निर्माण किया है।
  • जहां भारत देश भर में 100 स्मार्ट सिटियों का निर्माण कर रहा है, यह 100 से अधिक आकांक्षापूर्ण जिलों में तेज प्रगति भी सुनिश्चित कर रहा है।
  • जहां भारत बिजली का एक शुद्ध निर्यातक देश बन गया है इसने यह भी सुनिश्चित किया है कि ऐसे करोड़ों घरों, जो आजादी के समय से ही अंधेरे में थे, को बिजली मिल सके।

प्रधानमंत्री ने सामाजिक क्षेत्र में सकारात्मक उपायों की चर्चा करते हुए कहा कि सरकार प्रत्येक वर्ष 6000 रुपए की सहायता उपलब्ध कराने के जरिए 12 करोड़ छोटे एवं सीमांत किसानों तक पहुंच रही है। उन्होंने कहा कि यह अगले 10 वर्षों में हमारे किसानों को 7.5 लाख करोड़ रुपए या लगभग 100 बिलियन डॉलर हस्तांतरित करेगा।

प्रधानमंत्री ने कहा कि डिजिटल इंडिया, स्टार्ट-अप इंडिया, मेक इन इंडिया और इनोवेट इंडिया पर हमारे फोकस से बेहतर लाभांश सामने आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत में पंजीकृत स्टार्ट-अप के 44 प्रतिशत द्वितीय एवं तृतीय श्रेणी शहरों से हैं। उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी निर्धनों एवं धनी व्यक्तियों के बीच के अंतर को पाट रही है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार भारत को एक 10 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने, ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों की दिशा में वैश्विक अभियान का नेतृत्व करने एवं भारत को बिजली के वाहनों तथा ऊर्जा भंडारण उपकरणों में विश्व का अग्रणी देश बनाने के लिए तत्पर है।

क्यों है वाराणसी का यह स्टेशन चर्चा में? तस्वीरें देखिए और स्वयं जानिए

रेलमंत्री पीयूष गोयल ने हाल ही में अपने ट्विटर हैंडल से एक विडियो शेयर करते हुए लिखा था, “वाराणसी का मंडुआडीह स्टेशन विश्वस्तरीय सुविधाओं के साथ अपनी स्वच्छता और सौंदर्यीकरण से यात्रियों को एक नया अनुभव प्रदान कर रहा है। काशी के प्राचीन वैभव को पुनः जीवित करता यह स्टेशन देश के सबसे सुंदर स्टेशनों में से एक बनने जा रहा है।”

आइए एक नज़र दौड़ाते हैं स्टेशन की कुछ तस्वीरों पर


खत्म किया जा सकता है 35A, श्रीनगर क़िले में तब्दील

श्रीनगर की सड़कों पर अचानक से हलचल बढ़ गई है और अर्ध सैनिक बलों की 100 टुकड़ियों को जम्मू-कश्मीर में उतारने का आदेश गृह मंत्रालय ने दे दिया है। इसमें CRPF की 45, BSF की 35, SSB की 10 and ITBP की 10 टुकड़ियाँ बुलाई गई हैं। लोग इसे सोमवार को धारा 35A पर होने वाली सुनवाई से जोड़ कर देख रहे हैं। कई ख़बरों में सरकार द्वारा इस पर अध्यादेश लानेवाले की बातें भी हो रही हैं।

शनिवार (फरवरी 23, 2019) को घाटी से लगभग 150 अलगाववादियों को गिरफ़्तार कर लिया गया। इसमें से अधिकतर जमात-ए-इस्लामी जम्मू-कश्मीर से संबंध रखते थे। इस पर महबूबा मुफ़्ती समेत कई नेताओं ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि सरकार का यह फ़ैसला गलत है। 

मुफ़्ती ने ट्वीट करते हुए पूछा है कि सरकार ने किस कानून के तहत हुर्रियत नेताओं और जमात के कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया है? उन्होंने यह भी कहा कि आप विचारों को क़ैद नहीं कर सकते। 

पुलिस ने इसे एक सामान्य कार्रवाई कहा है। पुलिस का कहना है कि आने वाले समय में राज्य में पत्थरबाज़ी की घटना न हो, इसके लिए कदम उठाए जा रहे हैं। 

क्या है 35-ए, जिस पर सुप्रीम कोर्ट में शुरू होगी सुनवाई?

  • दूसरे राज्य का कोई भी व्यक्ति जम्मू-कश्मीर का स्थाई निवासी नहीं बन सकता है।
  • जम्मू-कश्मीर के बाहर का कोई भी व्यक्ति यहाँ पर अचल संपत्ति नहीं खरीद सकता।
  • इस राज्य की लड़की अगर किसी बाहरी लड़के से शादी करती है, तो उसके सारे प्राप्त अधिकार समाप्त कर दिए जाएँगे।
  • राज्य में रहते हुए जिनके पास स्थायी निवास प्रमाणपत्र नहीं हैं, वे लोकसभा चुनाव में मतदान कर सकते हैं लेकिन स्थानीय निकाय चुनाव में वोट नहीं कर सकते हैं।
  • इस अनुच्छेद के तहत यहाँ का नागरिक सिर्फ़ वहीं माना जाता है जो 14 मई 1954 से पहले के 10 वर्षों से राज्य में रह रहा हो या फिर इस बीच में यहाँ उसकी पहले से कोई संपत्ति हो।

इससे पहले जम्मू-कश्मीर लिबरल फ्रंट के अध्यक्ष यासीन मलिक को बीते शुक्रवार (फरवरी 22, 2019) की रात मायसूमा स्थित आवास से हिरासत में लिया । इसके बाद यासीन को पहले कोठीबाग ले जाया गया और फिर वहाँ से सेंट्रल जेल में भेज दिया गया।

पुलिस को आशंका है कि पुलवामा हमले के बाद अलगाववादी कश्मीर के माहौल को और भी खराब कर सकते हैं। इसलिए एहतियात बरतते हुए यासीन को गिरफ्तार किया गया है। हालाँकि अभी किसी अन्य नेता को हिरासत में लिए जाने की ख़बर सामने नहीं आई है।

वामपंथी मानसिकता में जकड़े बॉलीवुड के विरुद्ध राष्ट्रवाद की जलती हुई मशाल है कंगना रानौत

ख़ान लॉबी, तथाकथित प्रगतिशील वामपंथी निर्देशकों का समूह जो कॉन्ग्रेस के पालने में झूला झूलता है एवं वंशवाद की मजबूत पकड़ में जकड़े बॉलीवुड में यकायक ऐसी अभिनेत्री का बोलबाला हो जाता है, जो उपरोक्त तीनों योग्यताओं में तो फिट नहीं नज़र आती है, किंतु उसे अदाकारी भरपूर आती है। इस अभिनेत्री का नाम है कंगना रानौत।

कंगना रानौत आज किसी परिचय की मोहताज़ नहीं हैं। सदियों से बॉलीवुड में विद्ध्यमान ‘नेपोटिज़्म’ की परंपरा को नकारते हुए, अपने दम पर फ़िल्म को सुपरहिट कराने का दमखम रखने वाली चंद अभिनेत्रियों के समूह में वो शीर्ष पर हैं। ‘क्वीन’ फ़िल्म में की गई अपनी अदाकारी से कंगना ने साबित कर दिया कि बॉलीवुड में सफलता के लिए ‘धर्मा प्रोडक्शन’ जैसे बड़े बैनर या ख़ान बंधुओ की दुमछल्ली बनने की ज़रूरत नहीं है, बल्कि परदे पर जीवंत और दर्शकों को बाँधकर रखने वाले शाहकार अभिनय की जरूरत है।

‘तनु वेड्स मनु’ और इसकी सीक्वल फ़िल्म ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ में की गई कंगना रानौत की अदाकारी ने उन्हें भारत के आम सिनेमा प्रेमी के दिलों की धड़कन बना दिया। उनका निभाया गया ‘तनु’ का क़िरदार मानस में इतना मानीखेज़ है कि लोगबाग उसके 3-3 मिनट के वीडियोज़ को यूट्यूब पर जब-तब स्व-स्थिति की तरोताजगी के बनिस्बत देखा करते है।

पर्दे से इतर आम ज़िंदगी में भी कंगना अतिविद्रोही स्वभाव की है, जो एकदम मुँहफट होकर वो सब कुछ कह देती है, जिसने कभी उनको क्षुब्ध किया है। फिर चाहे वो इंडिया टीवी के शो में ऋतिक रोशन के ख़िलाफ़ अपने गुस्से का इज़हार हो या फ़िर वंशवाद की बेल पर बुलंदी छूने वाले धर्मा प्रोडक्शन के सर्वे-सर्वा करण जौहर के खिलाफ़ यलगार करना हो।

मणिकर्णिका फ़िल्म के रिलीज़ के समय दर्शक इसकी सफलता को लेकर बेहद सशंकित थे। तथाकथित फ़िल्मी समालोचकों ने भी इसे ख़राब रेटिंग दी थी और फ़िल्म को न देखने की सलाह दी थी। लेकिन कंगना ने अपने जबरदस्त अभिनय, व्यक्तिगत प्रचार के दम पर और दर्शकों के अपार स्नेह के दम पर इसे भी सुपरहिट करवा दिया।

आज वहीं कंगना रानौत जब राष्ट्रवाद पर एकदम खुलकर बोलती है और पाकिस्तान को जोरदार तरीके से धकियाती है तो फ़िर तथाकथित वामी-प्रगतिशील समूह के पेट में मरोड़ उठने लगती है। उनको लगता है कि नायिका की स्थिति तो फिल्मों में सिर्फ़ शो-पीस सरीखी होती है, उसे नायक की दुमछल्ली ही होना चाहिए, यहाँ तक कि उसे किसी मुद्दे पर अपने विचार रखने से बचना भी चाहिए। अग़र वो ट्वीट करें या फ़िर मुँह खोले तो सिर्फ़ और सिर्फ़ सौंदर्य उत्पादों के लिए।

पुलवामा हमले के बाद कंगना ने पाकिस्तान की ज़ोरदार मुख़ालफ़त करते हुए कहा कि इस समय पर जो भी लोग शांति और अहिंसा की बात करें उनका मुँह काला करके उन्हें गधे पर बिठाकर सरेआम सड़क पर घुमाना चाहिए। अब ये बात वामपंथियों को इतना नागवार गुजरी कि वो कंगना के मणिकर्णिका फ़िल्म में इस्तेमाल किए गए नक़ली घोड़े पर सवाल उठाने लगे कि जो नकली घोड़े पर बैठकर शूटिंग करता है, उसका राष्ट्रवाद नकली है।

अरे मियाँ जुम्मन! फ़िल्म में नकली घोड़े का न इस्तेमाल किया जाएगा तो क्या अरब के घोड़े मँगाकर उन पर ‘टिगड़ीक-टिगड़ीक’ किया जाएगा। फ़िल्मो के अधिकांश दृश्य विजुअल ग्राफ़िक के जरिए ही फ़िल्माए जाते हैं। अब कल को साँप के किसी दृश्य में किंग कोबरा या फ़िर एनाकोंडा का उपयोग न किए जाने पर भी ये खंडित मस्तिष्क वाले लोग सवाल उठा सकते हैं। कैफ़ी आज़मी की याद में कराची में होने वाले शो के लिए शबाना आज़मी की देशभक्ति पर सवाल उठाने वाली कंगना को ट्रोल करने से पहले जावेद अख़्तर-शबाना आज़मी से वहाँ होने वाले शो के लिए हामी भरने के बरक्स भी सवाल पूछा जाना चाहिए।

आज, जब कि तथाकथित उदारवाद की ओढ़नी पहने बहुसंख्यक बॉलीवुडिया समाज बैठा है, ऐसे में कंगना रानौत का मुखर होकर देशहित और राष्ट्रवाद के पक्ष में अपनी आवाज़ उठाना इस बात का शुभ संकेत है कि अब कला और संस्कृति से जुड़े लोग भी घनघोर राष्ट्र्वादी हो गए हैं, जिनको अभी तक वामपंथी अपनी बपौती मानते थे।

पाकिस्तान ने जिस मंच से भारत का किया अपमान उसमें अब गेस्ट ऑफ़ ऑनर होंगी सुषमा स्वराज

मुस्लिम बहुल देशों के संगठन Organisation of Islamic Cooperation के कार्यक्रम में भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज गेस्ट ऑफ़ ऑनर बनेंगी। इस बात की पुष्टि विदेश मंत्रालय द्वारा शनिवार (23 फरवरी, 2019) को की। जानकारी के मुताबिक़, ऑर्गनाइजेशन ऑफ़ इस्लामिक कॉपरेशन (ओआईसी) में भारत को गेस्ट ऑफ़ ऑनर बनने के लिए आमंत्रित किया गया है।

भारत को इसके लिए आमंत्रित करना सम्मान की बात तो है ही साथ में यह पाकिस्तान को झटका देने का काम भी करेगा। यह पहला अवसर होगा जब विदेश मंत्री सुषमा स्वराज इस कार्यक्रम में देश का प्रतिनिधित्व करेंगी। बता दें कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज 1 मार्च 2019 को इस कार्यक्रम के उद्घाटन समारोह में भाषण देंगी।

भारत इस आमंत्रण को इस नज़रिए से भी देख रहा है कि इससे भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के द्विपक्षीय रिश्तों को मज़बूती मिलेगी। ख़बर के अनुसार OIC की पहचान मुस्लिम देशों की आवाज़ और उनके हितों की रक्षा करने के लिए दुनिया भर में विख्यात है। इसके अलावा बता दें कि संयुक्त राष्ट्र (यूएन) और यूरोपीय संघ (ईयू) में इसके स्थाई सदस्य भी हैं।

पूर्व राजनयिक तलमीज अहमद ने बताया कि इस कार्यक्रम पर भारत को बतौर गेस्ट ऑफ़ ऑनर के रूप में आमंत्रित करना, पाकिस्तान के लिए किसी तगड़े झटके से कम नहीं है। इससे पहले पाकिस्तान ने अनेकों बार भारत का अपमान करने के लिए इस मंच का दुरुपयोग किया है। पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान की छवि देश और दुनिया में धूमिल हो चुकी है और सऊदी अरब समेत अन्य मुस्लिम देश भी पाकिस्तान की आतंकवादी गतिविधियों को अच्छी तरह से जान चुके हैं। इसलिए उन्होंने पाकिस्तान को दरकिनार करने का पूरा मन बना लिया है।

‘तेरे प्यार में क्या-क्या न बना मीना..’ राहुल गाँधी का नया नारा

राहुल गाँधी की हार न मानने की क़ाबिलियत का मैं व्यक्तिगत रूप से फ़ैन होता जा रहा हूँ। आप ख़ुद देखिए कि मोदी सरकार को घेरने के लिए वो दिन-रात एक कर के सबूत जुटाने के प्रयास कर रहे हैं। उनका जब हर किस्सा झूठा साबित होता है तब भी राहुल गाँधी राफ़ेल डील पर अड़े रहते हैं। लेकिन लगातार अपने भगीरथ प्रयासों के बावजूद भी राफ़ेल डील को घोटाला साबित न कर पाने की निराशा राहुल गाँधी के चेहरे से कहीं भी नहीं झलकती है।

अब राहुल गाँधी को आख़िरकार आठ महीने बाद ये पता चल गया है कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संसद में गले आख़िर क्यों लगाया था। दुनिया के सामने यह खुलासा करने के लिए उन्होंने जो देश, काल और वातावरण चुना, वो है JNU!

राहुल गाँधी ने कल ही JNU में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गले लगाने वाले क़िस्से का ज़िक्र करते हुए कहा, “जब मैंने संसद में पीएम मोदी को गले लगाया, तो मैं महसूस कर सकता था कि वह हैरान हैं, वह समझ नहीं पाए कि क्या हुआ। मुझे लगा कि उनके जीवन में प्यार की कमी है।”

इसके साथ ही राहुल गाँधी ने लगे हाथ एक बार फिर याद दिलाते हुए कहा कि उन्होंने परिवार के 2 लोगों को खोया है, जिस वजह से वो प्यार का महत्त्व समझते हैं। चुनाव जीतने के लिए फोटोशॉप से लेकर कॉन्ग्रेसी आई टी सेल के कुकर्मों पर निर्भर हो चुके राहुल गाँधी ने अब परिवार के दिवंगत सदस्यों को भी मैदान में उतार लिया है।

‘विक्टिम कार्ड’ खेलकर चुनाव जीतना और मुद्दों को भुनाना कॉन्ग्रेस पार्टी का बहुत पुराना शौक रहा है। अब प्रियंका गाँधी के बयान आते हैं कि वो अपने पति रॉबर्ट वाड्रा के साथ हर समय खड़ी रहेंगी।

वोटर से ज़्यादा ‘डेली सोप’ अब कॉन्ग्रेस के नेता देखने और समझने लगे हैं। लेकिन वर्तमान में हालात बदल चुके हैं। अब जनता के हाथों में वो कम्प्यूटर नहीं है जो राजीव गाँधी उनको सौंप कर गए थे, ना ही अब भावनाओं को बेचकर वोट कमा लेने का समय है। फिर भी राष्ट्रवाद और मानवीय भावनाओं में वोट बैंक तलाशने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी अब ऐसे तथ्य मीडिया के सामने लाती है जिनसे वोटर की भावनाओं से खिलवाड़ किया जा सके।

गाय की पूजा करने वाले लोगों की भावनाओं को आहत करने के लिए सड़कों पर खुले आम गाय काटकर जश्न मनाने वाली पार्टी के अध्यक्ष कल ही लटकती धोती सँभालते-सँभालते तिरुमला में भगवान वेंकटेश्वर के मंदिर भी पहुँच गए।

राफ़ेल डील पर सस्ते और घटिया सबूत जुटाकर रोजाना मीडिया को इकठ्ठा कर लेने वाले राहुल गाँधी अब पहले से ज़्यादा आत्मविश्वास में नज़र आ रहे हैं। ये राहुल गाँधी आस्तीन चढ़ाकर एक ‘महान अर्थशास्त्री’ के सुझाए अध्यादेश को गुस्से में जनता के सामने फाड़कर फेंकने वाले से अलग है।

ये वो गाँधी है, जो नफ़रत को मोहब्बत से जीतने का सन्देश देता नज़र आ रहा है। ये राहुल गाँधी जनेऊ पहनता है, धोती पहनने लगा है, मंदिर में पूजा-पाठ करने लगा है, चाहे स्वप्न में ही सही, लेकिन अमरनाथ यात्रा भी करने लगा है, इससे पता चलता है कि राहुल गाँधी की नई PR टीम उन्हें सही दिशा में ट्रेनिंग दे रही है। लेकिन धोती पहनना और उसे पहनकर चलना सीखना अभी भी बाक़ी है। धोती पहनना सीखना और फिर पहनकर चलना, ये सब इतना कठिन कार्य होता है कि इतने में कम से कम 2 पंचवर्षीय योजनाएँ निकल जाएँगी।  

अब जब राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस गौमाता, हिंदुत्व और भगवान की शरण में पहुँचकर वोट बैंक तलाश रही है, तो वो ख़ुद अपने कट्टर वोट बैंक के लिए पहेली बनते जा रहे हैं। ख़ैर जो भी है, ये राहुल गाँधी का प्यार बाँटने और धोती में लिपटने का क़िस्सा श्री सत्यनारायण कथा के उस हिस्से की ही तरह है, जिसमें तमाम ज़िन्दगी भगवान का नाम ना लेने वाले व्यक्ति के मरते समय सिर्फ़ एक बार ‘नारायण’ जप लेने मात्र से उसे नरक के बदले बैकुंठ लोक प्राप्त हो जाता है।  

मैं तो यही सलाह दूँगा कि राहुल गाँधी अभी धोती और त्रिपुण्ड पर ध्यान न देकर प्यार मोहब्बत वाले भाषण देकर जनता का दिल जीतने पर फोकस करें। वरना अभी धोती सँभालते रह गए तो बाद में EVM से छेड़छाड़ वाले बयानों का ही सहारा बाक़ी रह जाएगा।

आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में पूर्व कॉन्ग्रेसी CM वीरभद्र सिंह के ख़िलाफ़ चलेगा मुक़दमा

हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की मुसीबतें बढ़ गई हैं। दिल्ली की एक अदालत ने सीबीआई द्वारा सौंपी गई 500 पन्नों की चार्जशीट के आधार पर उनके ख़िलाफ़ आरोप तय किए हैं। इसके साथ ही प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भी मनी लॉन्ड्रिंग मामले में अदालत में उनके ख़िलाफ़ चार्जशीट पेश की है।

सीबीआई की चार्जशीट में 9 लोगों के ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 109 और धारा 465 के तहत आरोप लगाए गए थे। यह सभी आरोप 225 गवाहों द्वारा दिए गए बयानों और 442 दस्तावेज़ों के सबूतों पर आधारित थे।

बता दें कि अदालत ने पिछले साल 10 दिसंबर को कॉन्ग्रेस नेता के ख़िलाफ़ आपराधिक कसूरवार और 10 करोड़ रुपये की अप्रमाणित सम्पत्ति इकट्ठा करने के आरोप तय करने का आदेश दिया था। जालसाज़ी के आरोपों के लिए अदालत ने कहा कि सिंह को कसूरवार ठहराने के लिए धारा 13 (2) और धारा 13 (ई) के तहत उनकी कुल आय से 192% अधिक सम्पत्ति पर कार्रवाई की जा सकती है।

विशेष जज अरुण भारद्वाज ने आरोप तय करने के बाद मुक़दमे में अभियोजन की गवाही के लिए 3, 4 और 5 अप्रैल की तारीख तय की है। वहीं अदालत ने वीरभद्र और उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह की अर्ज़ी पर सीबीआई से जवाब माँगा है। 

दोनों ने मुक़दमे की सुनवाई के दौरान पेशी से स्थायी छूट माँगी है। दूसरी तरफ, ED ने इसी मामले में वीरभद्र के ख़िलाफ़ मनी लॉन्ड्रिंग क़ानून के तहत पूरक आरोप दाखिल कर दिया। जाँच एजेंसी का कहना है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री ने काले धन का इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग में किया था। इस पर अदालत 18 मार्च को इस पर सुनवाई करेगी।

दूसरों के दान और आतंक की खेती पर ज़िंदा पाकिस्तान युद्ध की बात करे तो तुग़लक़ याद आता है!

जैश-ए-मोहम्मद, तालिबान, अलक़ायदा, लश्कर-ए-तैयबा, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान, लश्कर-ए-झंग्वी, हिज़्ब-उल-मुज़ाहिदीन के अलावा और भी नमूने हैं जो पहले से ही पाकिस्तान के युवाओं की एक बड़ी संख्या को जन्नत का लालच देकर कश्मीर भेज रहें और भारतीय सेना उन्हें सीधा जहन्नुम। अब पाकिस्तान के नए वज़ीरे आला जनाब इमरान खान साहब नए पाकिस्तान का वादा कर अपने ही युवाओं की खाल में RDX भरवा रहें हैं और वो भी सरकारी तंज़ीमों के साए में।

एक ऐसा देश जो दूसरों के दान और आतंक की खेती पर ज़िंदा है, जहाँ सामान्य जीवन जीना भी दूभर है। जहाँ अगर भारत पानी रोक दे तो लोग प्यास से तड़प उठें। खाने-पीने के सामानों और व्यापार पर आयात शुल्क बढ़ा देने से ही पाकिस्तान की जनता विद्रोह और गृहयुद्ध छेड़ने के मूड में है। वह पाकिस्तान हर बात पर युद्ध की बात करे तो तुग़लक़ याद आता है। इमरान खान साहब फ़िलहाल पाकिस्तान के नए तुग़लक़ ही है।

एक तरफ़ आतंकवाद, चापलूसी, फ़िरकापरस्ती और भिखमंगई का अफ़ीम पीकर पाकिस्तान युद्ध की तैयारियों में व्यस्त नज़र आ रहा है। इसके लिए कहीं अस्पताल खाली करवा रहा है तो कहीं क़मर बाजवा से लम्बी-लम्बी युद्ध की धमकियाँ दिलवा रहा है। ये काफी नहीं लगा तो वहाँ के पत्रकारों को भी स्टूडियो से मोर्चा संभालने के लिए चने की झाड़ पर बैठा दिया गया है। माशाअल्लाह! एक मोहतरमा तो इतनी उतावली हो गई कि स्टूडियों से ही मिसाइल छोड़ने लगीं। पूरे जी जान से पिछली तबाही और इंडियन आर्मी के घर में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक को भूलाकर उन्माद का नया पोस्ता बो रहीं हैं।

अब इन मोहतरमा को कौन याद दिलाए कि 1965, 1971 और 1999 में क्या हुआ था। भूल गई कि कैसे उनके लख्ते-जिगर मुल्क के दो टुकड़े हुए थे। कैसे एक लाख पाकिस्तानी घुटने टेक धूल चाट रहे थे। वो घाव लगे थे कि आज भी जब हवाएँ पाकिस्तान के ख़िलाफ़ चलती हैं तो साँसे फूलने लगती हैं पाकिस्तान की। जिस पाकिस्तान में ज़म्हूरियत कभी-कभार ही कुछ दिनों के लिए ठहरती हो, वो पाकिस्तान अगर लोकतंत्र और ज़म्हूरियत की बात करे तो मुर्दे को भी हँसी आ जाए। पर जहाँ गधों की फ़ौज़ ज़्यादा हो वहाँ ‘लादी’ से ज़्यादा कुछ नज़र भी नहीं आता।

खैर, अब पाकिस्तान का रायता इतना फ़ैल चुका है कि उसके कारनामों पर अब केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया सवाल कर रही है, सबूत बोल रहे हैं कि उरी से लेकर पुलवामा तक, संसद से लेकर पठानकोट तक सबका ज़िम्मेदार सिर्फ़ पाकिस्तान ही है।

लेकिन, अगर बात समझ आ जाए तो तुग़लक़ काहें का, भुखमरी की शिकार जनता को युद्ध का चरस बेचना उनका नया शगल नहीं है। जो दाने-दाने को तरस रहा वो पाकिस्तान करे भी तो क्या?

वैसे पाकिस्तान की सर्जिकल स्ट्राइक से इस कदर जली है कि अभी तक भभा रहा होगा। और अब पुलवामा के बाद इमरान को फिर ये डर सताने लगा कि कहीं भारतीय सेना उनकी लंका न लगा दे। बाहरहाल, ख़ौफ़ इस क़दर हाई है कि बाजवा ख़ुद सीमाओं का दौरा कर रहे हैं और सर्जिकल स्ट्राइक के बाद की तबाही के बाद पाकिस्तान आतंकी संगठनों को कब्ज़े में लेने के नाम पर उन्हें सुरक्षा मुहैया करा रहा है, यहाँ तक कि अपने हाकिमों को वहाँ नियुक्त कर रहा है ताकि किसी तरह से बस ये माहौल ठंडा हो जाए वरना पता नहीं अब उसे और क्या-क्या बेचना पड़े, देश तो पहले से ही गिरवी है चीन के यहाँ।

महाशय इमरान ख़ान आए तो थे ‘नया पाकिस्तान’ का नारा लेकर। चुनाव के दौरान उन्होंने पाकिस्तान द्वारा विदेशी देशों से आर्थिक मदद माँगे जाने को भी मुद्दा बनाया पर कमबख़्त चुनाव बाद ख़ुद ‘कटोरा लेकर भीख माँगने’ तक की नौबत आ गई। हालत तो इतनी पतली हो गई कि रोजमर्रा के ख़र्चे के लिए भी बर्तन-भाड़े, कार-वार, भैंस-बकरी और यहाँ तक कि बालों (हेयर) के साथ गधे भी बेचने पड़े।

और अब गधों की बिक्री से आतंक का पेट भरने वाला पाकिस्तान युद्ध-युद्ध की चिपों-चिपों लगाए हुए है। बात कुछ पच नहीं रही। अमां मियाँ पाकिस्तान युद्ध की सोचने से पहले एक बार अपनी पतलून तो ठीक कर लेते, तुम्हारी नंगई जब पूरे विश्व में साफ दिखने लगी तो बिलबिलाहट और खिसियाहट लाज़मी है पर इसे दूरदर्शिता का नाम दे देश को युद्ध के मोर्चे पर खड़ा कर देना बेवकूफी है।

वैसे इमरान साहब की दूर की नज़र बहुत तेज़ है, जनाब इतने दूरदर्शी हैं कि सत्ता में आते ही पहले लक्ज़री कारें बेच दी और कमाया 15 करोड़, ख़र्च कर दिए आतंकी लॉन्च पैड बनाने में और अब जब सऊदी अरब के सुल्तान आए तो मियाँ उनके सत्कार के लिए चार दिन के कारों के किराए के रूप में ही 7 करोड़ देने पड़ गए। अब नंगा नहाए क्या निचोड़े क्या, आमदनी अठन्नी ख़र्चा रुपइया वाली बात हे गई। भाई जान इमरान की दूरदर्शिता के कायल तो लोग उसी दिन हो गए थे जब इमरान ने तीन शादियों के बाद भी शादी का मुद्दा उलझाए ही रखा।

मन्ने तो लग रिया, जैसे-जैसे भारत एक-एक कर कड़े क़दम उठाते हुए पाकिस्तान को घेर रहा है- चाहे पहले पाकिस्तान से ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन‘ का दर्जा वापस ले लेना हो या अब सरकार ने अपने हिस्से का रावी, ब्यास और सतलुज के पानी को पाकिस्तान को देने की बजाय उस से यमुना को सींचने की योजना या उसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में घुटने टेकने को मजबूर करना। बेचारा जो पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक संकट के दौर से गुज़र रहा हो, कोई उसकी पूँछ के साथ टेटुआ भी दबा दे तो वह अपनी कराहटों को भी चीत्कार न बनाए तो क्या करे!

कहते हैं ना कुत्ते की पूंछ आसानी से सीधी नहीं होती तो भला पाकिस्तान इतनी आसानी से कैसे सुधर जाए उम्मीद करना भी बेमानी है। पर भारतीय होते बड़े आशावादी हैं पहले हम किसी पर वार नहीं करते पर अगर किसी ने गुस्ताख़ी करने की ज़ुर्रत की तो घर में घुसकर भी ठोक आते हैं। अब पाकिस्तान को सर्जिकल स्ट्राइक के बाद इस बात का कोई सबूत भी नहीं चाहिए।

दोष इसमें पाकिस्तान का नहीं वहाँ के नेताओं का ज़्यादा है जो अभी तक फिदाइन और आतंक पर ही अटके हुए हैं जबकि दुनिया चाँद पर पहुँच गई है। जैसे ही नई पीढ़ी जवान हो शिक्षा, रोज़गार की बात करे, उसे शिक्षा के नाम पर जेहादी तालीम दे, बम बाँधकर जहन्नुम भेज दो उन 72 काल्पनिक हूरों के पास, सिसकने दो उनके परिवारों को, और उन्हें भी ज़ख्म दो यतीम करो जिनका इस पूरे जेहादी व्यापार और आतंक से कुछ लेना-देना नहीं है।

पुलवामा इसी बात का ताज़ा दस्तावेज़ है। जैश-ए-मुहम्मद के सीधे क़बूलनामे के बाद भी, उसके सरगना मसूद अज़हर को संरक्षण जारी है। पहले तो पाकिस्तान ने सोचा की शायद इस बार भी मामला यूँ ही टल जाए तो पहले आनाकानी करता रहा और अब जब लगा कि अब आका चीन भी इस बार कुछ नहीं कर सकता तो पहले से ही हुँआ-हुँआ शुरू कर दिया।

भारतीय शेरों का खौफ़ इतना ज़्यादा है कि उधर पाकिस्तान अपनी भूखी प्यासी जनता में भी हवा भर युद्ध का गुलदस्ता बाँट रहा। शायद भूल गया है कि भारत अगर युद्ध पर आया तो इस बार उसके चड्ढी बनियान भी बिक जाने हैं।

फिर भी जहाँ बचपन से ही जन्नत और ज़ेहाद का बीज बोया जा रहा हो वहाँ यूँ बार-बार खुलेआम युद्ध का उन्माद छेड़ अपनी आवाम की रगों में युद्ध का अफ़ीम बोना कोई नई बात नहीं। आख़िर कब तक 72 हूरों की कहानी और काफ़िरों के गुनाहों की शिक्षा देकर पाकिस्तान में आतंक का खेल यूँ ही चलता रहेगा? कब तक शांति को बनाए रखने वाला इस्लाम लगभग हर आतंकी संगठन का मज़हब होगा? सवाल बड़ा तो है पर सवाल ही रहेगा। युद्ध तो छोड़िए अभी भारत ने कुछ दिनों के लिए मात्र व्यापार रोक दिया तो उधर टमाटर के भी लाले पड़ गए।

जहाँ सेना सत्ता पर हावी हो वहाँ जहन्नम सी ज़िन्दगी को जन्नत के रैपर में ज़्यादा दिन तक बेच पाना संभव नहीं है। फसलों की जगह बंदूके बोने वाला पाकिस्तान कब तक यूँ ही अपने यहाँ के मासूमों की नशों में ज़ेहाद और छद्म युद्ध का ज़हर फूँककर उनकी ज़िन्दगी स्वाहा करता रहेगा, ये उसे कौन समझाए। उम्मीद है कि पाकिस्तान केवल ख़ुद को गीदड़ भभकियों तक ही सीमित रखे वरना इस बार किसी तुग़लक़ की वज़ह से पाकिस्तान कहीं दुनिया के नक्शे से ही न मिट जाए। इंशाल्लाह पाकिस्तान के हुक्मरानों को खुदा इतनी सद्बुद्धि दे। वरना भारत अब एक ऐसे मजबूत हाथों में है जो सेना के मनोबल को टूटने नहीं देगा, खदेड़ के मारेगा और गिनेगा भी नहीं।