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शबनम-सलीम की वो प्रेम कहानी जिसने एक ही परिवार के 7 लोगों की जान ले ली

शिक्षा एक ऐसा साधन है जो किसी इंसान की ज़िन्दगी बदलने की ताक़त रखता है, उसकी शक्लोसूरत बदल देता है, उसे एक नई पहचान देता है और उसका भविष्य उज्ज्वल बनाता है। जो जितने ज़्यादा शिक्षित होते हैं, जिनके पास जितनी ज़्यादा डिग्रियाँ होती है – उनसे उतनी ही ज़्यादा शालीनता की उम्मीद की जाती है, उनसे राष्ट्र-निर्माण में भागीदारी की कामना की जाती है। अशिक्षित होना पाप नहीं है क्योंकि कोई व्यक्ति जब अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाता तब हो सकता है उसे उचित साधन न मिले हों। लेकिन शिक्षित होकर भी अपराधी बन जाना, आतंकवादी बन जाना, अपने देश-समाज को बदनाम करना – महापाप है, गुनाह है और अस्वीकार्य है।

ऐसी ही एक कहानी है शबनम की। शबनम एक ऐसा नाम है जिसकी कहानी सुन कर लोग अपनी बच्ची का नाम शबनम न रखें। शबनम एक ऐसी स्त्री है- जिसके कुकृत्यों की दास्तान सुन कर किसी की भी रूह काँप जाए। कहते हैं, एक स्त्री की समाज के निर्माण में और परिवार की संरचना में वो भूमिका होती है जो किसी और के बस की बात नहीं। एक शिक्षित स्त्री दो या उस से अधिक परिवारों का भविष्य बदलने की ताक़त रखती है। इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी भी कहते हैं– “बालिकाओं की शिक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए। एक लड़की की शिक्षा से दो परिवार शिक्षित होते हैं।”

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक जिला है- अमरोहा। अमरोहा के हसनपुर तहसील में एक गाँव है- बावनखेड़ी। 14-15 अप्रैल की रात को ये गाँव एक ऐसी घटना की निशानी बना जिसे याद कर उस इलाक़े के लोग आज भी सिहर उठते हैं। उस रात एक लड़की के परिवार के सभी सात लोगों की हत्या कर दी गई। बिलखते-बिलखते उसने आसपास के लोगों को जानकारी दी। क्षेत्र के लोग उस लड़की से सहानुभूति जता रहे थे क्योंकि उसके पिता, माँ, बड़ा भाई, छोटा भाई, भाभी, कजिन और बड़े भाई का 10 महीने का बेटा आर्ष- इन सबकी हत्या कर दी गई थी। लोग उस लड़की के भाग्य को कोस करे थे और कामना कर रहे थे कि भगवान ऐसी नियति किसी को भी न दे।

पुलिस ने करवाई शुरू की। इस पूरी घटना की एक ही गवाह थी- वही लड़की जो अब अपने भरे-पूरे परिवार की इकलौती जीवित व्यक्ति थी। पुलिस को औपचारिकता पूरी करनी थी और मामले की तह तक भी जाना था- ये सब कैसे हुआ, किसने किया और क्यों किया। पुलिस से पूछताछ में उस लड़की ने बताया कि कैसे लुटेरे छत के रास्ते से घर में घुसे और उसके परिवार के लोगों की निर्दयतापूर्वक हत्या कर दी। एक बुज़ुर्ग पड़ोसी ने बताया कि जब उसने उस लड़की के चिल्लाने की आवाज सुनी, तब उन्हें लगा कि उसके घर में डकैती हो गई है।

बुज़ुर्ग पड़ोसी और उनके बेटों ने कुछ अन्य पड़ोसियों के साथ दीवार फाँदकर देखा कि वो लड़की पहली मज़िल के बालकॉनी में खड़ी हो कर चिल्ला रही थी। उन्होंने उसे नीचे आने को कहा लेकिन वो रोती रही। रोते-रोते उसने पड़ोसियों को बताया कि ‘वो’ उसे भी मार देंगे। पड़ोसियों द्वारा बार-बार दिलासे देने के बाद उसने नीचे उतर कर मेन गेट का दरवाज़ा खोला। जब वो घर के अंदर घुसे तो उन्हें जो दृश्य दिखा वो भयावह ही नहीं बल्कि वीभत्स भी था। मास्टर साहब (लड़की के पिता) और उनके पूरे परिवार की लाशें खून से लथपथ पड़ी हुई थी।

उस लड़की के चाचा सत्तार अली वहाँ जाने वाले लोगों को अभी भी खून के निशान दिखाते हुए बताते हैं कि यही वो जगह है जहाँ उन्होंने अपने भाई की लाश पड़ी देखी थी। बुज़ुर्ग पडोसी ने उस रोती-बिलखती लड़की को सांत्वना दी और अपने घर ले कर गए। पुलिस ने तहक़ीक़ात शुरू की। पुलिस को उस लड़की ने बताया कि वो रोज़ अपनी माँ के साथ ही सोती थी लेकिन उस रात उसने गर्मी ज्यादा होने की वज़ह से छत पर सोना ज्यादा उचित समझा। फिर रात को अचानक से बारिश शुरू हो गई और मज़बूरन उसे नीचे आना पड़ा। नीचे घर में आने पर उसे पूरे परिवार की लाशें दिखी।

15 अप्रैल को इस केस की जाँच की जिम्मेदारी SHO आरपी गुप्ता के हाथों में गई। उन्होंने जब तहक़ीक़ात शुरू की तो उन्हें घर में Biopose के 10 टेबलेट्स मिले। घर के अंदर से नशीली गोलियों का मिलना संदेह खड़ा कर रहा था। जब लाशों को पोस्टमॉर्टेम के लिए भेजा गया तब गुप्ता ने डॉक्टर को इस बारे में बताया। उनका अंदेशा सही निकला और सभी लाशों के पेट लाल थी। इसका सीधा मतलब यह था कि उन सभी को सोने से पहले कोई नशीला ड्रग खिलाया गया है जिस कारण सब अचेत हो गए। पुलिस ने सोचा कि अगर खाने के साथ इन्हे ड्रग दिया गया तो फिर उस लड़की पर इसका असर क्यों नहीं हुआ, जबकि बाकी सब अचेत हो गए।

पहले पुलिस ने डकैती के एंगल से जाँच शुरू की थी लेकिन उसे लुटेरों के घर में घुसने के कोई निशान नहीं मिले। जमीन और घर की ऊँचाई 14 फुट की थी। पुलिस को सीढ़ी लगाने के भी कोई निशाँ नहीं मिले। हर एक कदम पर पुलिस का ये शक और पुख़्ता होता जा रहा था कि ये काम किसी बाहर वाले ने नहीं, बल्कि घर के अंदर रहने वाले किसी व्यक्ति ने किया है। जब पुलिस ने परिवार में एकमात्र ज़िन्दा बची उस लड़की का मोबाइल फोन खँगाला तो उसे पता चला कि इस काण्ड के पहले उस फोन से किसी व्यक्ति को एक ही दिन में 50 से भी अधिक कॉल किए गए थे।

यहीं से इस कहानी में ऐसा मोड़ आया जिसने सभी को हिला कर रख दिया। परिवार में एकमात्र ज़िंदा बची उस लड़की का नाम शबनम था। वही शबनम, जो आज मुरादाबाद जेल में बैठ कर अपने बेटे को पत्र लिखती रहती है। जिस व्यक्ति को वो उस दिन बार-बार कॉल कर रही थी, उसका नाम था सलीम- शबनम का प्रेमी। सलीम भी पहले उसी जेल में था लेकिन बाद में उसे कहीं और स्थानांतरित कर दिया गया। सलीम पाँचवी पास था और रोज़ाना आमदनी के जुगाड़ में मजदूरी करता था जबकि शबनम डबल MA थी। उसने अंग्रेजी के साथ-साथ भूगोल में भी मास्टर्स की डिग्री पा ली थी। लेकिन इतनी शिक्षित होने के बाद भी उसने जो किया, उसकी जितनी निंदा की जाए कम है।

कोर्ट में पुलिस ने बताया कि परिवार के लोग शबनम और सलीम के रिश्ते से खुश नहीं थे क्योंकि दोनों अलग-अलग बिरादरी से आते थे। शबनम ने रात को सोने से पहले खाने या चाय के साथ अपने परिवार के सभी लोगों को नशीली दवाइयाँ खिला दी। सोने के बाद वो सभी अचेत हो गए जिसके बाद सलीम वहाँ आया और उसने शबनम की मदद से सबकी हत्या कर दी। शबनम ने सभी के बाल पकड़े और सलीम ने सबका गला काट दिया। 10 महीने के बच्चे तक को उन्होंने नहीं छोड़ा और उसका भी गला घोंट दिया गया। इस प्रेम कहानी का खून से सना यह एक ऐसा अध्याय था, जो वीभत्सता की सारी हदें पार कर जाता है।

अदालत ने उन दोनों को मौत की सज़ा सुनाई। उन्होंने राष्ट्रपति को दया याचिका भी दी लेकिन उसे अस्वीकृत कर दिया गया। अदालत ने पुलिस को इस मामले की तह तक पहुँचने के लिए बधाई भी दी। अगर पुलिस ने समय रहते इसका पर्दाफ़ाश नहीं किया होता तो शायद आज शबनम मायावती के घोषणानुसार पाँच लाख का मुआवज़ा लेकर सज़ा से बच जाती और हो सकता था किसी निर्दोष को सज़ा हो जाती। लेकिन पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए बिना ज़्यादा समय लिए जाँच निपटाया।

शबनम जब जेल गई तब वो सात महीने की गर्भवती थी। उसे एक बेटा हुआ जिसका पालन-पोषण एक पत्रकार और उनकी पत्नी कर रहे हैं। इस्लाम में गोद लेने का कोई आधिकारिक कांसेप्ट नहीं है, इसीलिए अगर शबनम कभी जेल से निकलती है तो उसे उसका बेटा वापस मिल जाएगा।

एक महीने बाद मेघालय की कोयला खदान से निकाला गया पहला शव, 14 मज़दूरों की तलाश जारी

मेघालय के पूर्वी जयंतिया पर्वतीय ज़िले की एक कोयला खदान में 13 दिसंबर 2018 को 15 मज़दूर लितेन नदी का पानी भर जाने की वजह से वहीं फँस गए थे। इस घटना के बाद से ही एनडीआरएफ, भारतीय नौसेना और वायुसेना के जवान बचाव कार्य में जुटे हुए हैं।

इस घटना के 34 दिन बीतने के बाद बचाव एवं राहत कार्यों में जुटे बलों को 200 फीट की गहराई में एक मज़दूर का शव बरामद हुआ है। इससे मज़दूरों को जीवित निकालने की उम्मीद में चलाए जा रहे बचाव अभियान को झटका लगा है। इस शव के मिलने के बाद खदान में फँसे बाकी मज़दूरों के जीवित होने में भी संदेह की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

इस पूरे बचाव अभियान में भारतीय वायु सेना, भारतीय नौसेना के गोताख़ोर और एनडीआरएफ (नैशनल डि़जास्टर रिस्पांस फोर्स) की टीम कार्य पर जुटी हुई है। इस पूरे अभियान में ओडिशा फायर सेफ्टी टीम के साथ पंप और ज़रूरत की वस्तुओं का इंतज़ाम कराने वाली एक निजी कंपनी किर्लोस्कर की टीम भी मौके पर काम कर रही है।

गत सप्ताह इस मामले पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मेघालय सरकार से कहा कि अवैध कोयला खदान में फँसे हुए मज़दूरों को बचाने के लिए किए जा रहे प्रयास बिलकुल भी संतोषजनक नहीं हैं। आपको बता दें कि जिस खदान में ये मज़दूर काम कर रहे थे वो रैट होल माइनिंग की प्रक्रिया से अवैध रूप से खनन की जाने वाली खदान थी जिस पर मेघालय में प्रतिबंध लगा हुआ है।

मेघालय की जयंतिया पहाड़ियों में बहुत सी कोयला खदानों में गैरकानूनी रूप से खनन हो रहा है। पहाड़ी इलाके पर होने की वजह से यहाँ तक मशीनों को ले जाने से बचा जाता है और मज़दूरो की मदद से कोयला निकाला जाता है। इस प्रक्रिया को रैट होल माइनिंग का नाम दिया जाता है क्योंकि जिस तरह चूहे ज़मीन में गड्ढा करते हैं उसी तरह इन खदानों में काम करने के लिए मज़दूर लेट कर घुसते हैं। ऐसे कार्यों के लिए बच्चों को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है जिसकी वजह से कई NGO ऐसे कार्य करवाने वालों के ऊपर बाल मज़दूरी का भी आरोप लगा चुके हैं।

चिकन और फ्राइड राइस के ज़रिए चीन सुधारेगा अपनी आर्थिक मंदी

चीन और अमरीका के बीच व्यापारिक विवाद आज भी थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। इसकी वजह से चीन की आर्थिक स्थिति ख़राब होने की कग़ार पर है। ख़राब आर्थिक स्थिति का असर चीन के रोज़गार पर भी पड़ा है, नतीजतन चीन को अपने आर्थिक संकट को दूर करने के लिए तरह-तरह के तरीक़े अख़्तियार करने पड़ रहे हैं।

बता दें कि वर्ष 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट के बाद चीन इस समय अपने सबसे बुरे दौर में है। इस बुरे दौर से निपटने के लिए चीन रेस्तरांओं को देर तक खोले रखने को मज़बूर है ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग रेस्तरांओं में आएँ और फ्राइड राइस और चिकन का सेवन करें। इससे ग्राहकों की आवक बढ़ेगी और आमदनी में कुछ इज़ाफ़ा हो सकेगा। इस तरीक़े से चीन अपनी सुस्त आर्थिक स्थिति को गति देने की कोशिश में है।

चीन रेस्तरांओं को देर तक खोलने के लिए अलावा भी अन्य तरक़ीबों को अमल में लाने की कोशिश कर रहा है। चीन की नज़र में फ़िलहाल इतना है कि कैसे देश में रोज़गार को सृजित किया जा सके। जानकारी के अनुसार, चीन अपने यहाँ के चिकन और फ्राइड राइस को और बेहतर बनाने की कोशिश में जुटा हुआ है। इस कोशिश में बड़ी संख्या में शेफ़ को प्रशिक्षण देना भी शामिल है। ज़ाहिर सी बात है यदि अधिक प्रशिक्षित लोग होंगे तो कार्य क्षमता भी अधिक  होगी जिसका असर निश्चित तौर पर रोज़गार पर पड़ेगा।

हॉन्गकॉन्ग की सीमा से जुड़ा गुआंगडोंग क्षेत्र चीन की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में विख्यात है। चीन का यह प्रयास है कि यहाँ पर अधिक से अधिक लोगों को प्रशिक्षित कर रोज़गार की स्थिति को बेहतर किया जाए। चीन द्वारा ऐसी पहल से एक तरफ तो लोगों को रोज़गार मुहैया हो सकेगा और दूसरी तरफ चीन अपनी बिगड़ी आर्थिक स्थिति को पटरी पर ला सकेगा। चीन द्वारा 2022 तक लगभग तीन लाख रोज़गार सृजन करने का लक्ष्य रखा गया है।

अमरीका और चीन के बीच व्यापारिक विवाद चीन की अर्थव्यवस्था को इस हद तक हानि पहुँचाएगा इसका चीन को अंदेशा नहीं था। आपको बता दें कि चीन के निर्यात में पिछले वर्ष दिसंबर में काफ़ी गिरावट आई थी। जिसकी वजह अमरीका से चीन का व्यापारिक विवाद था। इस विवाद के चलते चीन के आयात और निर्यात दोनों में ही बहुत ख़राब प्रदर्शन रहा। इसी ख़राब प्रदर्शन के चलते फ़िलहाल चीन की अर्थव्यवस्था अपने सबसे बुरे दौर में है। आर्थिक मंदी के इस आलम में चीन की चिंताएँ थमने का नाम नहीं ले रही हैं, जिसके लिए चीन रोज़गार को बढ़ाने की दिशा में अग्रसर है।

‘कॉलेजियम के फ़ैसले ने बढ़ा दी है चिंताएँ, एक साल बाद भी कुछ नहीं बदला’

कॉलेजियम की सिफ़ारिशों पर चल रहे विवाद के बीच दिल्ली हाईकोर्ट के जज संजीव खन्ना और कर्नाटक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दिनेश माहेश्वरी बुधवार (जनवरी 16, 2019) को सुप्रीम कोर्ट के जज नियुक्त किए गए। कॉलेजियम की सिफ़ारिशों पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी हस्ताक्षर किए। बता दें कि कॉलेजियम ने पहले दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र मेनन और राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश प्रदीप नंद्राजोग की पदोन्नति की सिफ़ारिश की थी। बाद में कॉलेजियम ने उन दोनों की जगह जस्टिस माहेश्वरी और जस्टिस खन्ना को प्रमोट करने की सिफ़ारिश की।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस आरएम लोढ़ा ने संजीव खन्ना की पदोन्नति पर सवाल करते हुए कहा कि उन्हें नहीं लगता कि पिछले एक साल में कुछ भी बदला है। जस्टिस लोढ़ा ने क़रीब एक वर्ष पहले हुए चार जजों के प्रेस कॉन्फ्रेंस की बात करते हुए कहा कि उस समय जो चिंताएँ ज़ाहिर की गई थी वो अब भी जस की तस बानी हुई है।

जस्टिस लोढ़ा ने कहा: “12 जनवरी 2018 को चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई ने तब दूसरे सबसे वरिष्ठ जज के तौर पर तत्कालीन चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए थे, उसमें जजों की नियुक्ति का मुद्दा भी शामिल था। चिंताएँ अब भी जस की तस बनी हुई हैं। हाल ही में कॉलेजियम के फ़ैसले ने इसे और बढ़ा दिया है। मुझे नहीं लगता कि एक साल बाद भी कुछ बदला है।”

ज्ञात हो कि सुप्रीम कोर्ट के चार जजों- जस्टिस चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ़ ने जनवरी 2018 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उच्चतम न्यायालय के प्रशासन पर सवाल खड़े किए थे। उन्होंने मुक़दमों के आवंटन और जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा पर सवाल खड़े किए थे। यह भारतीय न्यायिक इतिहास में पहला मामला था जब जजों ने सार्वजनिक तौर पर प्रेस कॉन्फ्रेंस की। जस्टिस गोगोई अब भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) हैं।

जस्टिस लोढ़ा के अलावे और कई रिटायर्ड और कार्यरत जजों ने भी दोनों की नियुक्तियों पर सवाल खड़े किए हैं। सुप्रीम कोर्ट के जज संजय किशन कौल ने CJI रंजन गोगोई को पत्र लिख कर नाराज़गी जताई। वहीं दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज कैलाश गंभीर ने राष्ट्रपति को पत्र लिख कर इन दोनों नियुक्तियों के ख़िलाफ़ अपना विरोध दर्ज़ कराया। बार काउन्सिल ऑफ इंडिया ने भी कॉलेजियम की सिफ़ारिशों पर आपत्ति दर्ज़ कराते हुए चेतावनी दी कि वो सड़क पर उतर कर विरोध प्रदर्शन करेंगे।

आज तक के सूत्रों के मुताबिक़ जस्टिस कौल का मानना है कि इन नियुक्तियों से बार एसोसिएशन और अन्य कार्यरत जजों में अच्छा सन्देश नहीं गया है।

ऑफिस बॉय से लेकर चपरासियों के नाम पर 23 फ़र्ज़ी कंपनियाँ, SC ने दी चेतावनी

कुछ समय पहले एक नामी रियल एस्टेट कंपनी आम्रपाली से फ्लैट ख़रीदने वालों के साथ धोखाधड़ी का मामला सामने आया था जिसकी पूरी जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कुछ ऑडिटर्स को नियुक्त किया था।

इस मामले में हुई जाँच के बाद एक बेहद हैरान करने वाली जानकारी सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त किए गए ऑडिटर्स ने बुधवार (जनवरी 16, 2019) को कोर्ट में जानकारी दी है कि आम्रपाली ने 500 से अधिक लोगों के नाम पर सिर्फ़ 1, 5 और 11 रुपए प्रति वर्ग फुट की दर से फ्लैट बुक किए थे।

इस जाँच में ये भी मालूम चला कि फ्लैट ख़रीदने वालों के पैसों की हेराफेरी करने के लिए 23 बोगस कंपनियाँ बनाई गई थीं। हैरानी वाली बात ये है कि ये कंपनियाँ सिर्फ़ ऑफिस बॉय, चपरासी और ड्राइवरों के नाम पर बनाई गई थीं।

इस जाँच में दो फॉरेंसिक ऑडिटर्स ने कोर्ट में जानकारी दी है कि उन्होंने 655 ऐसे लोगों को नोटिस भेजा था जिनके नाम पर बेनामी फ्लैट बुक हुए थे लेकिन इन 655 में से 122 स्थान ऐसे थे जहाँ पर उन्हें कोई भी नहीं मिला।

इस पूरे मामले की अंतरिम रिपोर्ट फॉरेंसिक ऑडिटर्स द्वारा जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस यू यू ललित की संयुक्त बेंच को सौंपी गई। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर चंद्र वाधवा के खाते में साल 2018 में ₹ 12 करोड़ थे। 12 करोड़ में से एक करोड़ उन्होंने अपनी पत्नी के अकॉउट में ट्रांसफर किए। इसके बाद 26 अक्टूबर 2018 को पहली बार न्यायालय में पेशी से ठीक एक दिन पहले कुछ अंजान लोगों को ₹4.75 करोड़ ट्रांसफर किए हैं।

वाधवा की इस हरक़त पर न्यायाधीशों की बेंच ने उन्हें अदालत की अवमानना की चेतावनी दी है। बेंच ने कहा कि वाधवा इस पूरी न्याय प्रकिया में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं। कोर्ट ने वाधवा से कहा कि उन्हें पता था कि कोर्ट उनसे इस मामले पर सवाल पूछेगा इसलिए उन्होंने पहले ही पैसे ट्रांसफर कर दिए। बेंच ने कहा कि वो सारे पैसे 7 दिन के अंदर वापस चाहते हैं। इस पूरे मामले की अगली सुनवाई 24 जनवरी को तय की गई है।

IT रिटर्न फाइल करने की प्रक्रिया अब एक ही दिन में हो जाएगी पूरी

केंद्र सरकार के ताज़ा निर्णय के बाद अब इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फ़ाइल करना और आसान हो गया है। बुधवार को कैबिनेट ने इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के इंटीग्रेटेड ई-फाइलिंग और सेंट्रलाइज्ड प्रोसेसिंग सेंटर 2.0 परियोजना के लिए खर्च को मंजूरी दे दी, जिसके बाद अब आपका IT रिटर्न सिर्फ़ एक दिन में प्रोसेस हो जाएगा। इस प्रोजेक्ट को पूरा होने में 18 महीने का समय लग सकता है। इसके बाद तीन महीने की टेस्टिंग होगी, जिसके बाद इसे लागू कर दिया जाएगा।

अभी इनकम टैक्स रिटर्न की प्रोसेसिंग और रिफंड में औसतन 63 दिनों का समय लगता है। इसे कम करने के लिए नया रिटर्न फाइलिंग सिस्टम डेवेलप किया जाना है। इस प्रोजेक्ट की कुल लागत ₹4242 करोड़ होगी। इसे पूरा करने का जिम्मा देश की दूसरी सबसे बड़ी आईटी कम्पनी इनफ़ोसिस को सौंपा गया है। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने बताया कि बिडिंग के बाद इनफ़ोसिस का चयन किया गया।

केंद्रीय मंत्री ने इस बारे में अधिक जानकारी देते हुए मीडिया से कहा:“इनकम टैक्स रिटर्न की मौजूदा प्रक्रिया भी काफी सफल रही है। नई व्यवस्था करदाताओं के लिए और ज्यादा उपयोगी होगी। कैबिनेट ने मौजूदा सेंट्रलाइज्ड प्रोसेसिंग सेंटर (सीपीसी) आईटीआर 1.0 प्रोजेक्ट के लिए भी 1,482.44 करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। यह खर्च वित्तीय वर्ष 2018-19 के लिए है। नई व्यवस्था ज्यादा पारदर्शी होगी।”

आँकड़ों की बात करें तो 30 दिसंबर 2018 तक 6.21 करोड़ इनकम टैक्स रिटर्न फाइल किए गए थे। यह पिछले वर्ष की तुलना में 43 प्रतिशत ज़्यादा है। कुल मिला कर देखें तो चालू वित्त वर्ष में अब तक 1.83 लाख करोड़ रुपये का टैक्स रिफंड किया गया है। इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करने को लेकर लोगों में बढ़ती जागरूकता को सरकार अपनी सफलता के रूप में देख रही है।

सरकार द्वारा नए प्रोजेक्ट को मंजूरी देने के पीछे ये चार प्रमुख उद्देश्य हैं:

  • करदाताओं को तेज़ और सटीक परिणाम उपलब्ध कराना
  • ‘यूजर एक्सपीरियंस’ में सुधार कर उसे और बेहतर बनाना
  • करदाताओं को और जागरूक करना, और
  • वॉलेंटरी टैक्स कंप्लायंस का प्रचार-प्रसार करना।

सरकार के ताजा निर्णय के बाद नागरिकों को आईटी रिटर्न फाइल करने में और आसानी होगी। सरकार द्वारा अपनी टैक्स नीति और अधिक सटीक बनाने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करना एक सुखद बदलाव है।

जानिए कुम्भ को: शंकराचार्य ने संगठित किया, सम्राट हर्षवर्धन ने प्रचारित

हिन्दू तीर्थ परम्परा में कुम्भ एक सर्वाधिक पवित्र पर्व है। करोड़ों महिलाएँ, पुरूष, आध्यात्मिक साधकगण और पर्यटक आस्था एवं विश्वास की दृष्टि से शामिल होते हैं। यह विद्वानों के लिये शोध का विषय है कि कब कुम्भ के बारे में जनश्रुति आरम्भ हुई थी और कब इसने तीर्थयात्रियों को आकर्षित करना आरम्भ किया। किन्तु, यह एक स्थापित सत्य है कि प्रयाग कुम्भ सनातन परम्परा का केन्द्र बिन्दु रहा है और ऐसे विस्तृत पटल पर एक घटना एक दिन में घटित नहीं होती है बल्कि धीरे-धीरे एक लम्बी कालावधि में विकसित होती है।

भारत सदैव से सनातन परम्परा का वाहक रहा है। सनातन परम्परा ही है जिसने भारतीय मनीषियों को ही नहीं बल्कि जो भी यहाँ आया उसे उसके प्रश्नों का समुचित उत्तर मिला। ऐसा कोई इतिहास नहीं मिलता कि सनातन परम्परा में किसी को सवाल पूछने या प्रश्न खड़ा करने के लिए जान से मार दिया गया हो। सत्य की ख़ोज ही सनातन का मूल रहा है।

यहाँ ऋषि-मुनि, साधु-संत और गृहस्थ भी धर्मलाभ के लिए, आत्मिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के लिए हज़ारों-लाखों की सँख्या में पवित्र तीर्थों में निष्पाप होने के लिए जाते रहे हैं। ऐसी स्थिति में मुक्तिप्रद कुम्भयोग में अनगिनत लोगों का समावेश हो, तो ये भारतीयों के लिए कोई अकल्पनीय घटना नहीं है।

कुम्भ मेला कितना प्राचीन है, इस बारे में कोई निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता। कौन इसके प्रथम उद्घोषक थे कौन आयोजक? इसका पता लगाना भी कठिन है। अमृत कुम्भ के बारे में शास्त्रों में विस्तृत चर्चा है। संभवत:, सनातन धर्म जितना पुराना है, उतना ही प्राचीन कुम्भ मेला भी है।

फिर भी इतिहास के आईने में अगर देंखे तो कुम्भ मेला का मूल को 8वीं सदी के महान दार्शनिक शंकर से जुड़ती है। जिन्होंने वाद विवाद एवं विवेचना हेतु विद्वान सन्यासीगण की नियमित सभा परम्परा की शुरुआत की थी। आदिगुरु शंकर कुम्भ मेला के संगठक भी थे।

कहते हैं, बौद्ध धर्म के विस्तृत फैलाव के दौर में जब देश में अनाचार, व्यभिचार, कदाचार तेजी से फैलने लगा। जब वैदिक धर्म-परम्परा को नष्ट करने की पुरज़ोर कोशिश होने लगी तब वैदिक धर्म के मूर्त विग्रह महान प्रणेता श्रीमत शंकराचार्य ने अपनी अपूर्व प्रतिभा तथा आध्यात्मिक शक्ति के बल पर समस्त भारत में वेदांत की विजय पताका फहराई।

आदि शंकराचार्य
आदि शंकराचार्य

उत्तर-दक्षिण-पूर्व-पश्चिम, भारत के चारों दिशाओं में चार मठ स्थापित कर उन्होंने संन्यासी-संघ का उद्घाटन किया। जो आज शंकराचार्य पीठ के नाम से प्रसिद्द है। शंकराचार्य ने ही सनातन धर्म के महात्म्य की पुनर्स्थापना के लिए लोगों को उपस्थित हो शास्त्र चर्चा का आदेश दिया। उसी समय से ही वर्तमान कुम्भ मेला की प्रतिष्ठा मानी जाती है। आगे चलकर धीरे-धीरे सभी संप्रदायों का समागम होकर यह महोत्सव महिमान्वित होकर वर्तमान समय में विराट रूप धारण कर चुका है।

कहा गया है, साधु-महापुरूषों के पदार्पण से ही तीर्थ पवित्रता तथा अपने नाम की योग्यता को प्राप्त करता है। लाखों-करोड़ों की संख्या में साधु-संन्यासी जहाँ उपस्थित होते हैं। वहाँ आकाश-पाताल, जल-वायु, धूलकण से लेकर सभी पञ्च महाभूत तक मुक्तिप्रद और धर्म भाववर्धक बन जाते हैं।

साधु-सम्मेलन ही कुम्भ मेला की जीवनी-शक्ति हैं। यहाँ नर-नारियों का जो विशाल समूह आता है, वह सिर्फ़ तीर्थस्‍थान के निमित्त नहीं आते जितना कि पुन्यात्मा साधु-महात्माओं के दर्शन की लालसा लेकर आते हैं। उनका चरण स्पर्श और आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं।

ये जो करोड़ों की संख्या में सर्वत्यागी, तपस्वी साधु-महात्मा, जो लोग मृत्यु पर जय प्राप्त करने के उपरान्त अमृतत्व की तलाश के व्रती हैं। उनका विराट समावेश जहाँ भी है। वहीं तो अमृत है। कुम्भ स्वयं अमृतवर्षी है। पौराणिक कहानी का रहस्यमय रूपक आज इसी प्रकार वास्तविकता ग्रहण कर चुका है।

कलशस्य मुखे विष्णु कण्ठे रुद्र समाश्रित:।
मूलेतत्रस्‍थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा: स्थिता:।।
कुक्षौ तु सागरा: सर्वे सप्तद्वीपा वसुन्‍धरा।
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेद: सामवेदो ह्यथवर्ण।।
अंगैश्च सहिता: सर्वे कुम्भं तु समाश्रिता:।

सम्राट हर्षवर्धन
सम्राट हर्षवर्धन

ऐतिहासिक साक्ष्य कालनिर्धारण के रूप में इस बात के प्रमाण हैं कि राजा हर्षवर्धन का शासन काल (664 ईसा पूर्व) में कुम्भ मेला को विभिन्न भौगोलिक स्थितियों के मध्य व्यापक मान्यता एवं प्रसिद्धि प्राप्त हो गयी थी। प्रसिद्व यात्री व्हेनसांग ने अपनी यात्रा वृत्तांत में कुम्भ मेला की महानता का उल्लेख किया है। व्हेनसांग का उल्लेख राजा हर्षवर्धन की दानवीरता का सार संक्षेपण भी करती है।

राजा हर्ष प्रयाग की रेत पर एक महान पंचवर्षीय सम्मेलन का आयोजन करते थे, जहाँ पवित्र नदियों का संगम होता है और अपनी धन-सम्पत्ति को सभी वर्गों के गरीब एवं धार्मिक लोगों में बाँट देते थे।

प्रयागराज में कुम्भ मेला को ज्ञान एवं प्रकाश के श्रोत के रूप में सभी कुम्भ पर्वों में व्यापक रूप से सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। सूर्य जो ज्ञान का प्रतीक है, इस पर्व में उनकी अपार महिमा है।

कुम्भ का तात्विक अर्थ

कुम्भ सृष्टि में सभी संस्कृतियों का संगम है। कुम्भ आध्यत्मिक चेतना मानवता, नदियों, वनों एवं ऋषि संस्कृति का प्रवाह है। कुम्भ जीवन की गतिशीलता एवं मानव जीवन का संयोजन है। कुम्भ ऊर्जा का श्रोत एवं आत्मप्रकाश का मार्ग है।

जानिए क्यों प्रयाग को कहा जाता है तीर्थों का राजा

क्या रघुराम राजन कर रहे हैं कॉन्ग्रेस पार्टी का मेनिफ़ेस्टो तैयार?

पूर्व RBI गवर्नर रघुराम राजन को उनके कार्यकाल के दौरान आर्थिक नीति के मुद्दों पर केंद्र सरकार के साथ लगातार असहमति के लिए जाना जाता रहा है। ज्ञात हो कि राजन मोदी सरकार के विमुद्रीकरण (नोटबंदी) के निर्णय की भी आलोचना कर चुके हैं। इसी तरह के बयानों के चलते भाजपा पार्टी सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने रघुराम राजन की देशभक्ति पर भी सवाल उठाए थे, जिस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आपत्ति जताई थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भारत में रोज़गार की स्थिति पर एक विस्तृत रिपोर्ट लिखी है, जिसे चुनाव से पहले कॉन्ग्रेस अपने 2019 लोकसभा चुनावों के ‘विज़न डॉक्यूमेंट’ में शामिल करने वाली है।

रघुराम राजन की विवादित स्थिति में रिजर्व बैंक से विदाई हुई थी। अब रोज़गार के मुद्दे पर कॉन्ग्रेस पार्टी को अपनी रिपोर्ट देने के बाद पूर्व गवर्नर और मशहूर अर्थशास्त्री को लेकर सियासी अटकलें तेज हो गई हैं।

हालाँकि, राजन कॉन्ग्रेस के माध्यम से राजनीति में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रवेश करेंगे या नहीं, इस बारे में अभी कोई स्पष्ट दवा नहीं किया गया है। रघुराम राजन की रिपोर्ट से कॉन्ग्रेस के घोषणापत्र का एक प्रारूप तैयार किया जाएगा, जो रोज़गार की स्थिति को लेकर मोदी सरकार को निशाना बनाने की कोशिश करेगा।

इससे पहले पिछले महीने, केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल ने संकेत देते हुए कहा था कि रघुराम राजन राजनीतिक करियर की तलाश कर रहे थे। राजन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “इन्हें अपने राजनीतिक करियर की घोषणा जल्द कर देनी चाहिए।”

आगामी लोकसभा चुनावों के लिए कॉन्ग्रेस के घोषणापत्र में एक समिति बनाई गई है, जिसमें पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम, केरल के सांसद शशि थरूर और सैम पित्रोदा जैसे नेता शामिल हैं।

यौन शोषण के आरोपी राजकुमार हिरानी के बचाव में उतरे जावेद अख़्तर

#MeToo मामले में फँसे राजकुमार हिरानी के समर्थन में फ़िल्मी दुनिया के मशहूर पटकथा लेखक एवं गीतकार जावेद अख़्तर ने ट्वीट किया है। अपने ट्वीट में जावेद ने लिखा, “मैंने 1965 में फ़िल्म इंडस्ट्री में एंट्री किया है। इतने सालों तक काम करने के बाद यदि कोई मुझसे पूछे कि इन पाँच दशकों में आपको फिल्म इंडस्ट्री में सबसे डिसेंट व्यक्ति कौन लगा। इस सवाल के जवाब में मेरे दिमाग में सबसे पहला नाम राजकुमार हिरानी का आएगा। जी बी शॉ ने कहा था: बहुत अच्छा होना बहुत ख़तरनाक होता है।”

जानकारी के लिए आपको बता दें कि राजकुमार के साथ फिल्म ‘संजू’  में काम करने वाली महिला ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है।

राजकुमार पर यौन शोषण आरोप का पूरा मामला

हफ़्फिंगटन पोस्ट में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार पीड़िता ने राजकुमार पर यह आरोप लगाया है। पीड़िता ने कहा कि पोस्ट प्रोडक्शन के दौरान इस सच को सबके सामने लाने का साहस नहीं कर पाईं क्योंकि राजू हिरानी इंडस्ट्री में एक बड़े नाम हैं और वो उसे बदनाम कर सकते थे। साथ ही हिरानी ने पीड़िता को नौकरी से निकालने तक की धमकी भी दे डाली थी। ये सारे ख़ुलासे नवंबर 3, 2018 को फ़िल्म निर्माता विधु विनोद चोपड़ा को भेजे गए एक ईमेल से हुए हैं।

इस ईमेल में पीड़िता ने कहा था वो अपने से 30 साल बड़े हिरानी को पिता-तुल्य मानती थी लेकिन उन्होंने उनके दिल, दिमाग और शरीर के साथ खिलवाड़ किया। उस महिला ने हिरानी पर अपने ऑफिस में बुला कर बदसलूकी करने का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि वो हिरानी की प्रताड़ना को सिर्फ इसलिए सहती रही क्योंकि उनके पिता गंभीर रोग से पीड़ित थे और वो अपनी नौकरी नहीं छोड़ सकती थी।

ओडिशा में कॉन्ग्रेस को बड़ा झटका, प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष ने दिया इस्तीफ़ा

2019 लोकसभा चुनाव से पहले कॉन्ग्रेस को ओडिशा में जोरदार झटका लगा है। ओडिशा के कॉन्ग्रेस प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष नबा किशोर दास ने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया है। नबा किशोर दास ने कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी को पत्र लिखकर अपना इस्तीफ़ा दिया। अपने इस्तीफ़ा पत्र में दास ने लिखा है, “मेरे क्षेत्र को लोग यह चाहते हैं कि मैं बीजू जनता दल (BJD) की  टिकट पर चुनाव लडूँ। यही वजह है कि मैंने नवीन पटनायक के पार्टी के साथ जाना स्वीकार कर लिया।”

जानकारी के लिए आपको बता दें कि दास वर्तमान समय में ओडिशा के झारसुगुड़ा विधानसभा से विधायक हैं। वो यहीं से बीजेडी प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ सकते हैं।

राज्य में होने वाली है राहुल की रैली

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी 25 फरवरी को ओडिशा में रैली करने वाले हैं। ऐसे में रैली से ठीक पहले एक तरह से कॉन्ग्रेस को बड़ा झटका लगा है। 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष का पार्टी छोड़कर जाना कॉन्ग्रेस के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। दास झारसुगुडा जिले के लोकप्रिय नेता हैं और उन्होंने बीजद उम्मीदवार को 2009 और 2014 के विधानसभा चुनाव में हराया था।  

राहुल के महागठबंधन को पहले भी लग चुका है झटका

2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा के ख़िलाफ़ सभी विरोधी दलों को एक साथ संगठित करने के राहुल के प्रयास को पहले ही झटका लग चुका है। आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह के बयान के बाद अखिलेश यादव और मायावती ने भी महागठबंधन से किनारा कर लिया है।

पिछले दिनों आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने एक इंटरव्यू के दौरान महागठबंधन को ख़ारिज कर दिया था। इस इंटरव्यू में संजय सिंह ने कहा था कि उनकी पार्टी दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और गोवा में किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन नहीं करेगी। इस तरह आम आदमी पार्टी की तरफ से यह बयान आने के बाद महागठबंधन पर संकट के बादल साफ़ दिखने लगे थे।