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आँख पर छिड़का फायर एक्सटिंग्विशर, डंडे-चाकू-पत्थर लेकर की छात्रों की पिटाई: JNU में वामपंथी गुंडों के बवाल मचाने की Videos सामने आई, कई ABVP कार्यकर्ता बुरी तरह घायल

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) परिसर में रविवार (22 फरवरी 2026) की देर रात हिंसक झड़प की गंभीर घटना सामने आई है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने आरोप लगाया है कि वामपंथी संगठनों से जुड़े तत्वों ने उनके कार्यकर्ताओं और छात्रों पर सुनियोजित हमला किया, जिसमें कई छात्र गंभीर रूप से घायल हो गए। ABVP के मुताबिक, यह हिंसा बीते एक सप्ताह से चल रही वामपंथी संगठनों की हड़ताल के बाद भड़की, जिसने पूरे कैंपस में भय और अराजकता का माहौल पैदा कर दिया।

सोशल साइंसेज स्कूल में बायोटेक छात्र पर जानलेवा हमला

ABVP ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जानकारी देते हुए बताया कि स्कूल ऑफ बायोटेक्नोलॉजी के छात्र प्रतीक भारद्वाज पर स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज परिसर के भीतर हमला किया गया। आरोप है कि पहले प्रतीक की आँख में फायर एक्सटिंग्विशर पाउडर छिड़का और फिर बेरहमी से पीटा गया।

इतना ही नहीं हमले के दौरान एक सिलेंडर खोलकर उसका भी इस्तेमाल किए जाने का दावा किया गया है। इस बर्बर हमले में प्रतीक गंभीर रूप से घायल हो गया। प्रतीक को अस्पताल में भर्ती कराया गया और उनकी हालत नाजुक बनी हुई है। छात्र ने खुद बताया है कि कैसे डंडे और चाकू लेकर उस पर हमला किया गया और वह बचने के लिए वॉशरुम में छिपा हुआ है।

X पर ABVP ने घायल छात्र का एक और वीडियो शेयर किया है, जिसमें उसे सहारा देकर अस्पताल ले जाया जा रहा है। वीडियो में दिख रहा है कि छात्र बुरी तरह घायल है, उसे उल्टियाँ हो रही हैं और वो ठीक से चल भी नहीं पा रहा है। वीडियो को शेयर कर ABVP ने तुरंत कार्रवाई की माँग की है।

प्रतीक की ही तरह ABVP के एक कार्यकर्ता विजय जायसवाल पर भी हमला किया गया। छात्र ने इंस्टाग्राम पर वीडियो शेयर कर इसकी जानकारी दी। वीडियो में विजय ने दिखाया कि वामपंथी गुट किस तरह मार्च को छोड़ कर अचानक स्टूडेंट्स पर हमला करना शुरू कर दिया और जानबूझकर कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने लगे।

ABVP ने सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर कर लिखा, “वीडियो में देखिए किस प्रकार वामपंथी संगठन के लोग हाथ में पत्थर लाठी ले कर घूम रहे है और जब हम वीडियो रिकॉर्ड करने लगे तो वहाँ से भागना शुरू कर दिए। वामपंथियों का हमेशा से यही फसाना है, जब खुद से क्रांति नहीं होती है तो जबरदस्ती अपनी क्रांति छात्रों पर लादना शुरू कर देते है।”

पोस्ट में आगे लिखा, “आज जब वामपंथी संगठन के स्कूल में ताला बंद करने लगे तो वहाँ रीडिंग रूम्स में पढ़ने वाले छात्रों ने उसका विरोध किया और उन्हें मारना शुरू कर दिया जिसको लेकर हम बात करने गए तो हमारे ऊपर भी पत्थरबाजी शुरू कर दी।”

रातभर आतंक का माहौल, सैकड़ों नकाबपोशों ने फैलाई हिंसा

JNU छात्र संघ के संयुक्त सचिव और ABVP नेता वैभव मीणा ने इस पूरी घटना को ‘आतंक की रात’ करार दिया। उन्होंने कहा कि पिछले 7-8 दिनों से वामपंथी संगठनों की हड़ताल चल रही थी और इसी की आड़ में सैकड़ों नकाबपोश हमलावरों ने कैंपस में बवाल मचाया।

मीणा के अनुसार, “300 से 400 नकाबपोश लोगों की भीड़ ने लाइब्रेरी और रीडिंग रूम में पढ़ रहे छात्रों को खदेड़ दिया और उनके साथ मारपीट की।” उन्होंने यह भी गंभीर आरोप लगाया कि विजय नाम के एक छात्र को 100 से 150 लोगों की भीड़ ने बेरहमी से पीटा। उन्होंने इस घटना को ‘मॉब लिंचिंग’ बताया।

मीणा ने दिल्ली पुलिस पर निष्क्रियता का आरोप लगाते हुए कहा कि पूरी रात हिंसा होती रही, लेकिन पुलिस ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।

#LeftAttacksJNUAgain अभियान, सख्त कार्रवाई की माँग

ABVP ने इस घटना के विरोध में सोशल मीडिया पर #LeftAttacksJNUAgain अभियान शुरू किया और दिल्ली पुलिस से तत्काल कार्रवाई की माँग की। संगठन ने कहा कि यह छात्र राजनीति नहीं, बल्कि सुनियोजित और ठंडे दिमाग से की गई हिंसा है, जिसमें सिर्फ पढ़ाई कर रहे छात्रों को निशाना बनाया गया।

ABVP ने आरोप लगाया कि केंद्रीय विश्वविद्यालय के परिसर को युद्धक्षेत्र में बदल दिया गया है और छात्रों की जान खतरे में डाल दी गई है। संगठन ने दोषियों की तत्काल गिरफ्तारी और सख्त कार्रवाई की माँग करते हुए कहा कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो स्थिति और भयावह हो सकती है।

फिलहाल वामपंथी संगठनों की ओर से इन आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं पूरे घटनाक्रम के बाद JNU परिसर में तनाव का माहौल बना हुआ है और छात्र सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

क्या पहले से हो रही थी तैयारी?

बता दें कि 22 फरवरी की रात जेएनयू में जो हमला हुआ है वो कोई अचानक घटी घटना नहीं है। पिछले कुछ दिनों से JNU में लगातार ऐसा माहौल बनाया जा रहा था जिससे ये साफ था कि ऐसी कोई घटना कभी भी हो सकती है। इसी हफ्ते चेतावनी रैली में ब्राह्मणविरोधी नारेबाजी सुनी गई थी। इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री के खिलाफ अभद्र नारे लगाए गए थे।

AI इम्पैक्ट समिट 2026 का समापन, घोषणापत्र पर 88 देशों के हस्ताक्षर: PM मोदी की मानव केंद्रित AI नीति को मिला वैश्विक समर्थन, समझें- ये क्यों है भारत की बड़ी सफलता

दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित AI इम्पैक्ट समिट 2026 का समापन एक ऐतिहासिक वैश्विक सहमति के साथ हुआ। इस शिखर सम्मेलन में 88 देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने ‘इंडिया AI इम्पैक्ट समिट’ के घोषणापत्र पर साइन किया। यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में सहयोग, समानता और भरोसे पर आधारित एक साझा वैश्विक विजन को आगे बढ़ाती है।

अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, रूस, फ्रांस, जर्मनी, जापान, कनाडा जैसे प्रमुख देशों की भागीदारी ने इस सम्मेलन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद महत्वपूर्ण बना दिया। केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इसे भारत की AI नीति और वैश्विक नेतृत्व की बड़ी सफलता बताया।

मानव-केंद्रित AI और ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ की भावना

इस सम्मेलन का मूल आधार भारतीय दर्शन के उस सिद्धांत पर रखा गया, जिसमें कहा गया है कि विकास का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुँचे। ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ की भावना से प्रेरित यह घोषणा इस बात पर जोर देती है कि AI केवल आर्थिक लाभ तक सीमित न रहे, बल्कि सामाजिक भलाई, समान अवसर और मानव कल्याण का माध्यम बने।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मानव-केंद्रित AI की सोच को वैश्विक स्तर पर व्यापक समर्थन मिला। सभी देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि AI संसाधन, सेवाएँ और तकनीक समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचें और विकास का रास्ता समावेशी बने।

सात स्तंभों पर टिका वैश्विक AI सहयोग का ढाँचा

नई दिल्ली घोषणा को सात मुख्य स्तंभों पर आधारित किया गया है, जो आने वाले वर्षों में वैश्विक AI सहयोग की दिशा तय करेंगे। इनमें AI संसाधनों का लोकतंत्रीकरण, आर्थिक विकास के साथ सामाजिक भलाई, सुरक्षित और भरोसेमंद AI, विज्ञान के लिए AI का उपयोग, सामाजिक सशक्तिकरण के लिए तकनीक तक पहुँच, मानव पूँजी का विकास और लचीली व कुशल AI प्रणालियों का निर्माण शामिल है। इन स्तंभों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि AI का विकास संतुलित, जिम्मेदार और मानवता के हित में हो।

इस समिट में AI से जुड़े बुनियादी ढाँचे के लिए 250 अरब डॉलर से अधिक के निवेश को लेकर सहमति बनी, जो भविष्य में तकनीकी विकास और नवाचार को नई गति देगा। सम्मेलन में दुनिया भर से आए नीति-निर्माताओं, वैज्ञानिकों, उद्यमियों और स्टार्टअप्स ने भाग लिया।

करीब पाँच लाख लोगों की सहभागिता ने यह दिखाया कि भारत की AI पहल को घरेलू और वैश्विक स्तर पर जबरदस्त समर्थन मिल रहा है। इस मंच से दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को बढ़ावा मिला, जिससे AI को आर्थिक विकास का एक प्रमुख इंजन बनाने की दिशा में ठोस कदम बढ़े।

वैश्विक सहयोग से भविष्य की दिशा तय करता भारत

घोषणा में यह स्पष्ट किया गया कि AI का विकास केवल तेजी से तकनीकी प्रगति तक सीमित न रहे, बल्कि उसमें सुरक्षा, भरोसा और सामाजिक संतुलन भी केंद्र में हों। सुरक्षित और भरोसेमंद AI सिस्टम विकसित करने, ऊर्जा-कुशल ढाँचे को बढ़ावा देने और ओपन-सोर्स व सुलभ AI इकोसिस्टम बनाने पर विशेष ध्यान दिया गया।

साथ ही AI आधारित शिक्षा, कौशल विकास और री-स्किलिंग कार्यक्रमों के जरिए मानव संसाधन को भविष्य की जरूरतों के लिए तैयार करने पर भी सहमति बनी। AI इम्पैक्ट समिट 2026 ने भारत को वैश्विक AI विमर्श के केंद्र में स्थापित कर दिया है।

यह भी संदेश गया कि भारत न केवल तकनीकी नवाचार में अग्रणी बनना चाहता है, बल्कि वह AI को मानवता की भलाई, समान विकास और वैश्विक सहयोग का माध्यम भी बनाना चाहता है। 88 देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की एकजुटता इस बात का प्रमाण है कि AI के भविष्य को लेकर दुनिया एक साझा, भरोसेमंद और समावेशी रास्ते पर आगे बढ़ने को तैयार है।

एयर स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान-अफगानिस्तान में तनाव, क्या डूरंड लाइन पर फिर होगा कत्लेआम: समझें- तालिबान की चेतावनी के मायने

पाकिस्तान ने अफगानिस्तान की सीमा के अंदर 7 जगहों पर एयर स्ट्राइक किया है। इसमें 18 लोगों के मौत की पुष्टि हुई है। इस पर अफगानिस्तान की तालिबान प्रशासन ने कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि वह वक्त आने पर जवाबी कार्रवाई करेगा। दोनों देशों के बीच अक्टूबर 2025 में सीजफायर को लेकर कई बैठकें हुई थी। हालाँकि नवंबर 2025 में शांति वार्ता टूट गई थी, लेकिन युद्धविराम जारी था। ताजा हमले से दोनों देशों के बीच तनाव एक बार फिर चरम पर पहुँच गई है।

पाकिस्तान का अफगानिस्तान में हमले को लेकर बयान

हमले को लेकर पाकिस्तान के सूचना मंत्रालय ने कहा है कि सीमा पार 7 पाकिस्तानी तालिबान यानी टीटीपी के ठिकानों को निशाना बनाया गया। पाकिस्तान का कहना है कि यहाँ इस्लामिक स्टेट खोरासान यानी आईएसकेपी के लोग भी मौजूद थे। पाकिस्तान टीटीपी को हाल में हुए इस्लामाबाद की इमान बारगाह, बाजौर और बन्नू में हुए आत्मघाती हमलों का जिम्मेदार बताता रहा है।

रमजान में पाकिस्तानी स्टाइक पर अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने कहा है कि सही समय आने पर वो इसका जवाब देंगे। अफगानिस्तान के रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि ये राष्ट्रीय संप्रभुता, इंटरनेशनल कानून, अच्छे पड़ोसी के सिद्धांतों और इस्लामिक मूल्यों का उल्लंघन है।

स्ट्राइक रिहायशी इलाकों में किया गया और लोगों के घरों को निशाना बनाया गया। मंत्रालय ने कहा कि ये हमले पूर्वी अफगान प्रांतों नांगरहार और पक्तिका के इलाकों में हुआ। इसमें एक मदरसे को भी निशाना बनाया गया।

रक्षा मंत्रालय ने कहा कि पाकिस्तान में जो हमले हुए, जिसमें आम लोगों और धार्मिक केंद्रों को निशाना बनाया गया, वह पाकिस्तानी सेना की खुफिया और सुरक्षा नाकामियों का सबूत हैं। उन्होंने कहा कि बार-बार होने वाले हमले पाकिस्तानी जनरल की नाकामियों को ही दर्शाते हैं, जो खुद के घर को सुरक्षित नहीं कर पा रहे।

पाकिस्तान ने दावा किया है कि उसके पास इस्लामाबाद में हुए हमलों को लेकर ‘पक्के सबूत’ हैं। ये हमला अफगानिस्तान की शह पर टीटीपी ने करवाया है। पाकिस्तान के मुताबिक, हमले की जिम्मेदारी भी टीटीपी और आईएसकेपी ने ली थी।

पाकिस्तान को जवाब देने की तैयारी कर रहा अफगानिस्तान

नंगरहार के एक सीनियर पुलिस अधिकारी सैयद तैयब हमाद ने अफगान सरकारी टेलीविज़न पर बताया कि मारे गए 18 लोगों में औरतें और बच्चे भी शामिल हैं। सरकारी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रविवार सुबह भी पीड़ितों की लाशें मलबे के नीचे से निकाली जा रही थीं।

अफगानिस्तान फिलहाल हमले में हुए नुकसान का आकलन कर रहा है। इसके बाद तालिबानी नेतृत्व ने संकेत दिए हैं कि जवाबी कार्रवाई की जाएगी। तालिबान का साफ मानना है कि पाकिस्तान ने अफगानी सीमा का उल्लंघन किया है और अफगानिस्तान को जवाबी कार्रवाई करने का अधिकार है। सही समय आने पर हमला किया जाएगा।

आगे की रणनीति पर लगातार काबूल और कांधार में तालिबानी आलाधिकारी चर्चा कर रहे हैं। जानकारी के मुताबिक, तालिबान का मानना है कि पाकिस्तानी हमलों पर तुरंत में कुछ भी करना जल्दीबाजी होगी, लेकिन अफगानिस्तान जरूर बदला लेगा।

पाकिस्तान का दावा है कि ये एयरस्ट्राइक पाकिस्तान में एक महीने से चल रहे जानलेवा हमलों के बाद हुए हैं। हाल ही में पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम में हिस्से में एक लेफ्टिनेंट कर्नल समेत दो फौजियों की हत्या की गई थी।

इस महीने की शुरुआत में, पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में एक शिया मस्जिद में हुए सुसाइड ब्लास्ट में दर्जनों लोग मारे गए थे।

पाकिस्तान के इन्फॉर्मेशन मिनिस्ट्री ने रविवार (22 फरवरी 2026) को कहा कि देश के पास ‘पक्के सबूत’ हैं कि फरवरी के हमले टीटीपी ने अपने अफगानिस्तान में मौजूद नेता और हैंडलर्स के कहने पर किए थे।

पिछले साल 7-8 अक्टूबर की रात पाकिस्तान ने ओकरजई क्षेत्र में कार्रवाई की थी। इस दौरान पाकिस्तान ने 19 विद्रोहियों को मार गिराने का दावा किया। इसके बाद अफगानिस्तान ने डूरंड लाइन पार कर पाकिस्तान में घुसकर चौकियों पर हमला किया था। पाकिस्तानी एयरस्टारइक के खिलाफ टीटीपी ने पाकिस्तान की कई सैन्य चौकियों पर कब्जा कर लिया था। पाकिस्तानी फौजी चौकियों पर तालिबान लड़ाकों के कब्जे के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल भी हुए थे।

डूरंड रेखा और अफगानिस्तान- पाकिस्तान विवाद

डूरंड रेखा अफ़ग़निस्तान और पाकिस्तान के बीच लगभग 2,600 किलोमीटर लंबी सीमा है जो 1893 में ब्रिटिश भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच स्थापित की गई थी। अंग्रेजों के बनाए इस सीमा रेखा को अफगानिस्तान नहीं मानता है। इस सीमा रेखा के एक ओर अफगानिस्तान के 12 प्रांत हैं जबकि दूसरी ओर पाकिस्तान के खैबर पखतूनख्वा, बलूचिस्तान और गिलगित-बाल्टिस्तान। दोनों देशों के लोग इस खुली सीमा के आर-पार आते जाते हैं और परंपरागत रूप से जुड़े हुए हैं।

धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर काफी समानताएँ हैं। यही वजह है कि खैबर पखतूनख्वा, बलूचिस्तान और गिलगित जैसे इलाकों में पाकिस्तानी फौज के खिलाफ लोग विद्रोह कर रहे हैं। यहाँ पाकिस्तानी फौज का जुर्म सुर्खियों में भी रहा है। महिलाओं- बच्चों के साथ अमानवीय हरकत, पुरुषों का लगातार गायब होने को लेकर लोग पाकिस्तान के फौज को जिम्मेदार मानते हैं।

अफगानिस्तान के लिए यह एक संवेदनशील मामला है। यहाँ कोई भी शासन में आ जाए, वह डूरंड रेखा को नहीं मानेगा, क्योंकि ये भावनाओं से जुड़ा है। अफगानिस्तान ने पश्तून प्रभाव वाले क्षेत्र खैबर पख्तूनख्वाह को पश्तूनिस्तान बनाने का भी समर्थन किया है।

पाकिस्तान ने जब पख्तूनख्वाह सीमा पर वीजा और पासपोर्ट अनिवार्य कर दिया, तो पख्तूनों ने जबरदस्त प्रदर्शन किया।

ब्रिटिश विदेश सचिव सर मोर्टिमर डूरंड ने 1893 में अफगानिस्तान और भारत के बीच सीमा की स्थापना की थी और पख्तून प्रांत को अलग कर दिया था। दोनों देशों के बीच फैली हुई लंबी डूरंड रेखा पख्तून जनजातीय क्षेत्रों से होकर गुजरती है और उन्हें दो अलग-अलग मुल्कों में विभाजित करती है। पाकिस्तान बनने के बाद डूरंड रेखा उसे विरासत में मिली, लेकिन इस पर कोई औपचारिक समझौता या मान्यता नहीं है।

पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) के उपाध्यक्ष काशिफ पानेजई के मुताबिक, सीमा पर जो इलाका बँटा हुआ है, वह सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं है, वह उनका घर है। उन्होंने कहा, “डूरंड रेखा कई गाँवों को आधे में विभाजित करती है और कई लोगों को उनके कृषि वाली भूमि से विभाजित करती है। यह जनजातियों और अन्य समूहों को बीच से बाँटता है।”

डूरंड रेखा के बावजूद कई इलाके ऐसे भी हैं, जहाँ पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच की रेखा अस्पष्ट है। ये दुर्गम और सुलेमान पर्वत श्रृंखला वाला इलाका है। ओरकजई, स्पिन बोल्डक से गजनी तक कई क्षेत्र ऐसे हैं। इसको लेकर भी दोनों देशों में तनाव रहता है।

1994 के प्रण से 2026 की हुंकार तक: अखंड भारत के लिए देश मनाता है ‘POJK संकल्प दिवस’, पढ़ें ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और सामरिक महत्व

22 फरवरी को POJK संकल्प दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो 1994 में भारतीय संसद द्वारा सर्वसम्मति से पारित ऐतिहासिक संकल्प की याद दिलाता है। इस संकल्प में संसद ने स्पष्ट घोषणा की कि जम्मू-कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है, रहा है और रहेगा। पाकिस्तान द्वारा अवैध रूप से कब्जा किए गए क्षेत्रों को खाली करने की माँग की गई तथा किसी भी अलगाववादी प्रयास का सभी आवश्यक साधनों से विरोध करने की दृढ़ प्रतिबद्धता जताई गई।

यह संकल्प मात्र राजनीतिक दस्तावेज नहीं, बल्कि राष्ट्र की प्रभुसत्ता, एकता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा का जीवंत प्रमाण है। भारत सरकार का आधिकारिक पक्ष स्पष्ट है- POJK (पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर) और गिलगित-बाल्टिस्तान भारत के अभिन्न अंग हैं। गृह मंत्री अमित शाह ने 2019 में संसद में कहा था, “जब मैं जम्मू-कश्मीर की बात करता हूँ, तो इसमें POJK और अक्साई चिन शामिल हैं। इस क्षेत्र के लिए हम जीवन देने को तैयार हैं।”

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कई बार दोहराया कि POJK भारत का था, है और रहेगा, तथा इसके लोग जल्द भारत के साथ जुड़ना चाहेंगे। 2025-2026 में भी ये बयान दोहराए गए, जहाँ राजनाथ सिंह ने कहा कि POJK के लोग पाकिस्तान की दमनकारी नीतियों से मुक्ति चाहते हैं और भारत उन्हें अपना मानता है।

यह दावा केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, कानूनी और सामरिक रूप से मजबूत है। 1947 के अधिमिलन से POJK भारत का हिस्सा है और पाकिस्तान का कब्जा अवैध है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 1947 का आक्रमण और जम्मू-कश्मीर का भारत में मिलन

1947 में जम्मू-कश्मीर रियासत के महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर को भारत के साथ अधिमिलन किया। लेकिन पाकिस्तानी फौज ने अक्टूबर 1947 में बड़े पैमाने पर आक्रमण किया। भारतीय सेना ने श्रीनगर घाटी मुक्त कराई, लेकिन संयुक्त राष्ट्र के युद्धविराम प्रस्ताव के कारण आगे की कार्रवाई रुक गई। परिणामस्वरूप, मीरपुर, पुंछ, मुजफ्फराबाद और गिलगित-बाल्टिस्तान पाकिस्तान के अवैध कब्जे में चले गए।

यह कब्जा आज तक जारी है। यूएन ने पाकिस्तान को आक्रमणकारी माना और क्षेत्र खाली करने का आदेश दिया, लेकिन पाकिस्तान ने अनदेखा किया। भारत का पक्ष स्पष्ट है- POJK अवैध कब्जा है और इसे वापस लेना राष्ट्रीय दायित्व है।

POJK की वर्तमान स्थिति: क्षेत्रीय विभाजन और कब्जे के आँकड़े

POJK को तीन भागों में वर्गीकृत किया जाता है-

  • पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर (POJK): मीरपुर-मुजफ्फराबाद क्षेत्र (13,297 वर्ग किमी)।
  • पाकिस्तान अधिक्रांत लद्दाख (POTL): गिलगित-बाल्टिस्तान (67,791 वर्ग किमी)।
  • चीन अधिक्रांत लद्दाख (COTL): अक्साईचिन और शक्सगाम घाटी (42,735 वर्ग किमी, जिसमें 1963 का सिनो-पाक समझौता शामिल)।

जम्मू-कश्मीर रियासत के मूल 2,22,236 वर्ग किमी में से 54.4% (1,21,000 वर्ग किमी) अवैध कब्जे में है। 2019 के नए मानचित्र में इन क्षेत्रों को भारत का हिस्सा दिखाया गया।

1947-48 में हिंदू-सिख समुदाय पर नरसंहार हुए: मुजफ्फराबाद में हजारों मारे गए, मीरपुर में 20,000+ हत्याएँ, महिलाओं का अपहरण। लाखों विस्थापित आज भी पीड़ित हैं। सांस्कृतिक स्थल जैसे शारदापीठ, रघुनाथ मंदिर खंडहर हैं।

सामरिक महत्व: भारत की सुरक्षा और भू-राजनीति

POJK भारत के लिए सामरिक केंद्र है। गिलगित-बाल्टिस्तान मध्य एशिया का प्रवेश द्वार है, जहाँ पाकिस्तान, चीन, अफगानिस्तान की सीमाएँ मिलती हैं। CPEC (चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा) इसी से गुजरता है, जो काराकोरम राजमार्ग से चीन को पाकिस्तान जोड़ता है।

यह भारत के लिए खतरा है-

दो मोर्चों की चुनौती: चीन (अक्साईचिन) और पाकिस्तान (POJK) का गठजोड़ भारत को घेरता है।
आतंकवाद का केंद्र: POJK में आतंकी शिविर भारत में घुसपैठ के लिए इस्तेमाल होते हैं।
सीमा सुरक्षा: LOC पर तनाव बढ़ता है, और CPEC से सैन्य गतिविधियाँ तेज होती हैं।

POJK वापस लेना भारत की सुरक्षा के लिए जरूरी है क्योंकि यह क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखेगा और चीन-पाक गठजोड़ को कमजोर करेगा।

जल संसाधनों का महत्व: सिंधु नदी तंत्र और पानी की सुरक्षा

POJK सिंधु नदी तंत्र का स्रोत है। इंडस, झेलम और चेनाब नदियाँ यहाँ से निकलती हैं। सिंधु जल समझौता (1960) पाकिस्तान को इन नदियों का बड़ा हिस्सा देता है, लेकिन POJK पर कब्जा पाकिस्तान को भारत पर पानी का दबाव बनाने की क्षमता देता है।

भारत के लिए: POJK वापस लेने से जल सुरक्षा मजबूत होगी, सिंचाई और बिजली उत्पादन बढ़ेगा।
पाकिस्तान के लिए: यह क्षेत्र उसकी 80% पानी आपूर्ति का आधार है।

जलवायु परिवर्तन से पानी की कमी बढ़ रही है, इसलिए POJK नियंत्रण भारत के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है।

आर्थिक महत्व: खनिज संसाधन और व्यापारिक हित

POJK दुनिया के सबसे खनिज-समृद्ध क्षेत्रों में से एक है। गिलगित-बाल्टिस्तान में-

  • 1,480+ सोने की खदानें (कई अफ्रीका से बेहतर गुणवत्ता)।
  • यूरेनियम, लौह अयस्क, उच्च गुणवत्ता वाला संगमरमर, ग्रेनाइट, रत्न (एमराल्ड, रूबी)।
  • मूल्य: अरबों डॉलर का अनुमानित भंडार।

पाकिस्तान और चीन इनका शोषण कर रहे हैं, लेकिन स्थानीय लोगों को लाभ नहीं। POJK वापस लेने से भारत को खनिज संपदा मिलेगी, जो अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगी। व्यापारिक मार्ग (मध्य एशिया तक) खुलेंगे। CPEC जैसी परियोजनाओं पर नियंत्रण से भारत की व्यापारिक स्थिति मजबूत होगी। यह क्षेत्र भारत के ऊर्जा और औद्योगिक हितों से जुड़ा है।

भारत सरकार का स्पष्ट पक्ष और वर्तमान प्रयास

भारत का पक्ष अटल है- POJK भारत का अभिन्न अंग है। अनुच्छेद 370 हटने के बाद नया मानचित्र और वक्तव्य मजबूत संकेत हैं। राजनाथ सिंह ने 2025 में कहा कि POJK के लोग पाकिस्तान से मुक्ति चाहते हैं और भारत उन्हें अपना मानता है। अमित शाह ने जीवन बलिदान की बात कही।

POJK वापस लेना जरूरी है क्योंकि यह अखंड भारत का हिस्सा पूरा करेगा। लाखों विस्थापितों की न्यायिक पुण्यभूमि लौटेगी। इससे सामरिक संतुलन बनेगा और आर्थिक संसाधन भारत के होंगे।

मुक्ति का संकल्प और जनजागरण

POJK संकल्प दिवस हमें याद दिलाता है कि 1947 का अधूरा एजेंडा पूरा होना बाकी है। संसद का 1994 संकल्प, वर्तमान सरकार के बयान और राष्ट्र की इच्छाशक्ति से मुक्ति संभव है। जनजागरण से वह दिन आएगा जब POJK भारत में शामिल होगा, अखंड भारत साकार होगा और क्षेत्रीय शांति स्थापित होगी।

PM मोदी की राह चले CM योगी, भगवा वस्त्र में विदेश दौरा कर लाएँगे UP के लिए निवेश: सांस्कृतिक कूटनीति से साधेंगे दुनिया, समझें- क्यों अहम है उनका ये कदम

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ रविवार (22 फरवरी 2026) से पाँच दिन के जापान और सिंगापुर दौरे पर जा रहे हैं। यह दौरा सिर्फ निवेश लाने का नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान को दुनिया के सामने गर्व से पेश करने का भी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब विदेश दौरे करके राज्य के लिए अरबों डॉलर का निवेश लाते थे। ठीक उसी राह पर चलते हुए योगी आदित्यनाथ अब उत्तर प्रदेश को 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए जापान और सिंगापुर से बड़े-बड़े सौदे लाने जा रहे हैं।

सबसे खास बात ये है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सिंगापुर और जापान के पूरे दौरे पर अपना पारंपरिक भगवा कुर्ता-चोला पहनकर जाएँगे। यह पहला मौका होगा जब कोई संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति विदेश में सरकारी प्रतिनिधि के रूप में भगवा वस्त्र में जाएगा।

यह दौरा सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक कूटनीति का भी बड़ा उदाहरण बनने वाला है। भगवा रंग हिंदुत्व और नाथ संप्रदाय की पहचान है। जापान जैसे देश में जहाँ बौद्ध धर्म की गहरी जड़ें हैं और आध्यात्मिक मूल्य बहुत महत्व रखते हैं, वहाँ भगवा वस्त्र में सीएम योगी का जाना भारतीय संस्कृति की शक्ति को नई ऊँचाई देगा। लोग कह रहे हैं कि यह ‘डेवलपमेंट प्लस हिंदुत्व’ का मॉडल है, जो विकास के साथ अपनी जड़ों को भी मजबूत रखना जानता है।

PM मोदी की राह पर CM योगी, गुजरात मॉडल को यूपी में दोहरा रहे

पीएम मोदी जब 2001 से 2014 तक गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने विदेश दौरे को राज्य की प्रगति का हथियार बनाया था। उन्होंने जापान, सिंगापुर, चीन, अमेरिका जैसे देशों में बार-बार जाकर ‘वाइब्रेंट गुजरात’ समिट के जरिए हजारों करोड़ का निवेश लाया। उनकी कोशिशों से मारुति-सुजुकी, होंडा, टोयोटा जैसी जापानी कंपनियाँ गुजरात में आईं। सिंगापुर से शहरी विकास के मॉडल लिए गए। सीएम रहते हुए नरेंद्र मोदी ने कहा था, “मैं गुजरात का चेहरा बनकर विदेश जाता हूँ, राज्य के लिए निवेश लेकर आता हूँ।”

अब योगी आदित्यनाथ ठीक वही कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश को 2027-30 तक 1 ट्रिलियन डॉलर (करीब ₹83 लाख करोड़) की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य है। पिछले 8 साल में यूपी ने इज ऑफ डूइंग बिजनेस में टॉप पर आने, एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, इंडस्ट्रियल कॉरिडोर बनाने का कमाल किया है। लेकिन और तेज विकास के लिए विदेशी निवेश जरूरी है। इसलिए सीएम योगी ने जापान और सिंगापुर को चुना, क्योंकि दोनों देश तकनीक, इंफ्रास्ट्रक्चर और कैपिटल के मामले में दुनिया के टॉप पर हैं।

दौरे का पूरा कार्यक्रम और बड़े-बड़े प्लान

योगी आदित्यनाथ रविवार (22 फरवरी 2026) की शाम सिंगापुर रवाना होंगे। वहाँ वो 24 फरवरी तक रहेंगे। सिंगापुर में वे शहरी विकास, स्मार्ट सिटी, वॉटर मैनेजमेंट, स्किल डेवलपमेंट पर फोकस करेंगे। भारतीय डायस्पोरा (खासकर यूपी के लोग) से मुलाकात करेंगे। इन्वेस्टर रोडशो होंगे जहाँ यूपी को निवेश का हब बताया जाएगा। सिंगापुर चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (SICCI) और FICCI के साथ एमओयू साइन हो सकते हैं।

इसके बाद वो 24 फरवरी 2026 को जापान पहुँचेंगे और 27 फरवरी 2026 तक वहाँ रहेंगे। जापान में टोक्यो, यामानाशी, ओसाका और क्योटो जाएँगे। टोक्यो के इंपीरियल होटल में ‘जापान-उत्तर प्रदेश पार्टनरशिप फॉर मैन्युफैक्चरिंग, मोबिलिटी एंड टेक्नोलॉजी’ नाम से बड़ा कॉन्फ्रेंस होगा। यहाँ जापानी कंपनियों के टॉप एक्जीक्यूटिव्स से मुलाकात होगी, जिसमें ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रिक व्हीकल, इलेक्ट्रॉनिक्स, रेलवे, केमिकल, लॉजिस्टिक्स सेक्टर की कंपनियों के दिग्गज मौजूद रहेंगे।

सबसे रोमांचक प्लान ये है कि सीएम योगी जापान की 600 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड वाली मैग्लेव (मैग्नेटिक लेविटेशन) ट्रेन में 100 किलोमीटर की ट्रायल राइड करेंगे। यह ट्रेन बिना ट्रैक छुए चुंबकीय शक्ति से चलती है। चूँकि सीएम योगी यूपी में हाई-स्पीड रेल और आधुनिक ट्रांसपोर्ट के लिए इस टेक्नोलॉजी को लाना चाहते हैं, ऐसे में उनकी राइड काफी अहम साबित होगी। ये एक तरह से डेमो भी होगा।

जापान सिटी और सिंगापुर सिटी, यूपी में बनेगा नया जापान और सिंगापुर

दौरे की सबसे बड़ी उपलब्धि बन सकती है ‘जापान सिटी’ और ‘सिंगापुर सिटी। यमुना एक्सप्रेसवे इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी (YEIDA) ने प्रस्ताव तैयार किया है। ग्रेटर नोएडा के सेक्टर 5ए में 500 एकड़ में जापान सिटी और सेक्टर 7 में 500 एकड़ में सिंगापुर सिटी बनेगी।

इन शहरों में कम से कम 70% जमीन इंडस्ट्री के लिए, 12% रेजिडेंशियल, 13% कमर्शियल और 5% इंस्टीट्यूशनल होगी। इसका विकास ईपीसी मोड में किया जाएगा। जापानी और सिंगापुरी सरकारों के विजन के हिसाब से ये शहर बनेंगे। कंपनियों को यहाँ जमीन ऑफर की जाएगी। इससे लाखों रोजगार पैदा होंगे और यूपी की इकोनॉमी को जबरदस्त बूस्ट मिलेगा।

भगवा वस्त्र का ऐतिहासिक महत्व और सांस्कृतिक असर

योगी आदित्यनाथ हमेशा भगवा कुर्ता-चोला पहनते हैं। यह उनका व्यक्तिगत और धार्मिक पहनावा है क्योंकि वे नाथ संप्रदाय के महंत हैं। लेकिन विदेश दौरे पर सरकारी प्रतिनिधि के रूप में भगवा पहनना यह पहला मौका होगा। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि इससे भारत की सांस्कृतिक गरिमा दुनिया को दिखेगी।

जापान में बौद्ध मंदिरों की भरमार है। यामानाशी प्रांत के साथ यूपी का पहले से एमओयू है। बौद्ध सर्किट, योग, आयुर्वेद पर चर्चा होगी। एक रिपोर्ट के मुताबिक सीएम योगी आदित्यनाथ जापान की राजधानी टोक्यो से 45 किमी दूर एक शांत मंदिर (संभवतः हनुमान या हिंदू मंदिर) भी जाएँगे। भगवा वस्त्र में वहाँ जाना जापान के लोगों को भारत की आध्यात्मिक शक्ति याद दिलाएगा।

सांस्कृतिक कूटनीति यही है, जिसमें सिर्फ व्यापार ही नहीं, दिलों का जुड़ाव भी होता है। भगवा रंग देखकर जापानी लोग सोचेंगे कि यह भारत का सच्चा चेहरा है जो प्राचीन संस्कृति को आधुनिक विकास के साथ जोड़ता है। विपक्ष इसे ‘प्रतीकात्मक राजनीति’ कह सकता है, लेकिन समर्थक कहते हैं कि यह ‘कल्चरल सॉफ्ट पावर’ है। जैसे पीएम मोदी ने ‘नमस्ते’ और योग दिवस से दुनिया में भारतीयता का परचम लहराया, वैसे ही सीएम योगी भगवा से भारतीयता का संदेश देंगे।

यूपी की प्रगति और दौरे का मकसद

योगी सरकार ने यूपी को बदल दिया है। एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, डिफेंस कॉरिडोर, फूड प्रोसेसिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स सिटी बन रही हैं। इज ऑफ डूइंग बिजनेस में यूपी टॉप-3 में है। लेकिन 23 करोड़ जनसंख्या वाले राज्य को और तेज गति चाहिए। जापान से सेमीकंडक्टर, ईवी, हाई-स्पीड रेल, क्लीन एनर्जी आएगी। सिंगापुर से स्मार्ट सिटी, वॉटर ट्रीटमेंट, लॉजिस्टिक्स पार्क आएगा।

क्या होगा सांस्कृतिक असर?

जब कोई सीएम भगवा पहनकर विदेश जाता है तो मीडिया हाइलाइट करता है। जापान के अखबारों में फोटो छपेगी – ‘भारत का भगवा सीएम जापान में’। इससे युवा पीढ़ी को गर्व होगा। स्कूलों में, सोशल मीडिया पर चर्चा होगी कि हमारी संस्कृति कितनी मजबूत है। बौद्ध तीर्थयात्रियों के लिए यूपी के बौद्ध स्थल (सारनाथ, कुशीनगर) और जापान के मंदिर जुड़ेंगे। टूरिज्म बढ़ेगा। योग और आयुर्वेद के सेंटर खुलेंगे। यह दौरा बताता है कि विकास और संस्कृति साथ चल सकते हैं। PM मोदीने गुजरात में यह दिखाया, CM योगी अब UP में दिखा रहे हैं।

जब योगी आदित्यनाथ भगवा वस्त्र में प्लेन में चढ़ेंगे तो पूरा यूपी और भारत देख रहा होगा। यह दौरा अगर सफल रहा तो यूपी में जापानी और सिंगापुरी कंपनियों के प्लांट लगेंगे, लाखों नौकरियाँ आएंगी, इकोनॉमी उछलेगी। साथ ही दुनिया देखेगी कि भारत अब सिर्फ सस्ता बाजार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी आत्मविश्वासी है।

‘बेटी दे दो वरना SC-ST एक्ट में सड़ा दूँगा’, UP के बस्ती में ‘कानूनी कवच’ बना हथियार: छेड़खानी का विरोध करने पर भाई का फोड़ा सिर, आरोपितों ने ही दर्ज कराई क्रॉस FIR

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से एक ऐसी रूह कंपा देने वाली और सिस्टम को आइना दिखाने वाली खबर सामने आई है, जहाँ बाबा साहेब के दिए गए ‘संवैधानिक सुरक्षा कवच’ को सरेआम ‘अपराध का हथियार’ बना लिया गया है। मामला मुंडेरवा थाना क्षेत्र का है, जहाँ एक परिवार अपनी बेटी की इज्जत और बेटे की जान बचाने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है।

आरोप है कि एक सिरफिरा आशिक पिछले 6 साल से एक छात्रा को परेशान कर रहा है और जब परिवार ने विरोध किया, तो उसे सरेआम धमकी दी गई, “या तो अपनी बेटी मुझे दे दो, या फिर पूरा खानदान SC-ST एक्ट के फर्जी मुकदमे में जेल के अंदर सड़ेगा।”

इस मामले ने उस वक्त हिंसक मोड़ ले लिया जब 18 फरवरी को हमलावरों की एक भीड़ ने छात्रा के भाई पर जानलेवा हमला कर उसका सिर फाड़ दिया। ताज्जुब की बात यह है कि हमला करने वाले आरोपित अब खुद को पीड़ित बताकर क्रॉस FIR दर्ज करा चुके हैं।

6 साल का टॉर्चर और ‘SC-ST एक्ट’ का खौफ: FIR की कॉपी

घटना की FIR की कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है, जो इस पूरी कहानी की भयावहता को बयाँ करती है। पीड़िता के पिता द्वारा दर्ज कराई गई पहली शिकायत (FIR No. 1) के मुताबिक, उनकी बेटी महर्षि वशिष्ठ मेडिकल कॉलेज, बस्ती में पैरामेडिकल का कोर्स कर रही है।

आरोपित मंगेश (पुत्र ओमप्रकाश), जो परसा बोधी का रहने वाला है, पिछले 6 साल से उसे फोन पर और रास्ते में आते-जाते प्रताड़ित कर रहा है। शिकायत में पिता ने साफ लिखा है कि जब भी उन्होंने मंगेश को समझाने की कोशिश की, उसने अपनी जाति का हवाला देते हुए धमकी दी।

18 फरवरी की शाम 5 बजे, जब छात्रा का भाई चौराहे पर जा रहा था, तब मंगेश अपने साथ 20-25 अज्ञात गुंडों को लेकर पहुँचा। आरोप है कि इन लोगों ने लाठी-डंडों और धारदार हथियारों से उस पर हमला कर दिया। युवक का सिर बुरी तरह फट गया और वह लहूलुहान होकर किसी तरह घर भागा।

क्रॉस केस का खेल: हमलावर ही बने ‘फरियादी’

हैरानी तब हुई जब घटना के अगले ही दिन 19 फरवरी को दूसरे पक्ष यानी लव कुमार (पुत्र राम नरेश) की ओर से भी एक FIR दर्ज कराई गई। इस दूसरी शिकायत में कहानी को पूरी तरह पलट दिया गया है। लव कुमार का आरोप है कि अनिल दूबे के बेटों (अंशू और विकास दूबे) ने उनके साथ गाली-गलौज की और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए मारपीट की।

हकीकत और साजिश के बीच की यह जंग अब बस्ती पुलिस के पास है। एक तरफ वह परिवार है जिसकी बेटी 6 साल से छेड़खानी झेल रही है और जिसका बेटा अस्पताल के बिस्तर पर है, तो दूसरी तरफ वह पक्ष है जिस पर छेड़खानी और जानलेवा हमले का आरोप है, लेकिन वह ‘जातिसूचक गाली’ का ढाल लेकर खड़ा है।

ग्राउंड जीरो का सच: क्या प्रशासन सो रहा है?

बस्ती के मुंडेरवा इलाके में इस घटना के बाद से तनाव का माहौल है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब किसी विवाद में SC-ST एक्ट की धमकी का इस्तेमाल कर समझौता करने का दबाव बनाया गया हो। छात्रा के परिवार का कहना है कि वे ब्राह्मण समाज से आते हैं और उनके पास खोने के लिए सिर्फ ‘इज्जत’ है, जिसका फायदा आरोपित उठा रहा है। पीड़ित परिवार ने पुलिस के आला अधिकारियों से माँग की है कि केवल कागजी कार्रवाई न की जाए, बल्कि उस ‘ब्लैकमेलिंग’ की भी जाँच हो जो पिछले 6 सालों से चल रही है।

PDA को लेकर अखिलेश की सपा में घमासान, नेता बोल रहे- हर बार यादव ही क्यों दे कुर्बानी?: जानें- क्यों वायरल हो रहा अफजाल अंसारी का बयान

कभी-कभी एक पुराना बयान भी आग की तरह फैल जाता है। ठीक यही उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों हो रहा है। दरअसल, गाजीपुर के सपा सांसद अफजाल अंसारी का करीब एक साल पुराना भाषण सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। उसमें उन्होंने साफ कहा था कि “सबसे बड़ी कुर्बानी यादव भाइयों को देनी होगी।” अब इस बयान पर पूर्व एमएलसी काशीनाथ यादव ने 9 फरवरी 2026 को जोरदार पलटवार किया है। उन्होंने कहा, “हर बार यादव ही क्यों कुर्बानी दें?” और अफजाल अंसारी को चुनौती दी कि पहले वे अपनी सीट छोड़कर देखें।

यह विवाद सिर्फ दो नेताओं के बीच नहीं है। यह पूरे पीडीए फॉर्मूले की असली परीक्षा है। क्या यादव समाज, जो लंबे समय से समाजवादी पार्टी का सबसे मजबूत स्तंभ रहा है, अब अपनी हिस्सेदारी कम करके अन्य वर्गों को आगे आने देगा? या फिर अंदरूनी खींचतान से पीडीए का सपना चूर-चूर हो जाएगा?

पीडीए फॉर्मूला है क्या और क्यों लाया गया?

समाजवादी पार्टी की जड़ें कथित तौर पर यादव-मुस्लिम वोटबैंट के समीकरण में हैं। मुलायम सिंह यादव ने 1992 में सपा बनाई तो मुख्य आधार यादव और मुस्लिम थे। इसे एमवाई कहा जाता था। यह फॉर्मूला कई बार सरकार भी बना चुका है। लेकिन 2014 से 2022 तक सपा को लगातार झटके लगे। भाजपा ने अपना हिंदुत्व और विकास का नारा देकर यादव-मुस्लिम के अलावा अन्य पिछड़ों और दलितों को अपनी तरफ खींच लिया।

अखिलेश यादव ने 2023 में नया प्लान बनाया- पीडीए यानी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक। इसमें यादव के अलावा लोध, गुर्जर, राजभर, कुर्मी जैसी पिछड़ी जातियाँ, जाटव-पासी जैसे दलित और मुस्लिम-अल्पसंख्यक सब शामिल हैं। अखिलेश का कहना था कि यह 90 प्रतिशत लोगों का गठजोड़ है जो भाजपा के खिलाफ है।

साल 2024 लोकसभा चुनाव में इस फॉर्मूले ने कमाल दिखाया। सपा ने 33 सीटें जीतीं। उनमें से 86 प्रतिशत सांसद पिछड़े, दलित या मुस्लिम वर्ग से थे। टिकट बंटवारे में गैर-यादव पिछड़ों और दलितों को ज्यादा मौका मिला। कई यादव नेताओं ने इस फैसले का स्वागत किया क्योंकि पार्टी की सीटें बढ़ीं। लेकिन कुछ यादव कार्यकर्ता और नेता महसूस करने लगे कि उनकी पुरानी ताकत अब बंट रही है। यहीं से असंतोष की शुरुआत हुई।

अफजाल अंसारी के बयान से खींचतान आई सामने

अफजाल अंसारी गाजीपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं। वे मुस्लिम समुदाय से हैं और सपा में अल्पसंख्यक चेहरा माने जाते हैं। करीब एक साल पहले (2025 में) उन्होंने गाजीपुर में एक बैठक में पीडीए को मजबूत करने की बात करते हुए कहा, “अगर पीडीए को सशक्त बनाना है तो सबसे बड़ी कुर्बानी यादव भाइयों को देनी होगी।”

उनका मतलब साफ था- यादव समाज को पद, टिकट और सत्ता की हिस्सेदारी में पीछे हटना होगा। ताकि अन्य पिछड़े, दलित और मुस्लिम नेताओं को बराबर मौका मिले। उन्होंने कहा कि सिर्फ बैठकें करने से काम नहीं चलेगा, त्याग करना पड़ेगा। यह बयान उस समय भी चर्चा में रहा लेकिन सोशल मीडिया पर अब इतना फैला कि हर कोई इसे देख रहा है।

कई लोग इसे सकारात्मक मानते हैं। वे कहते हैं कि अफजाल अंसारी सही कह रहे हैं। अगर पीडीए को असली मायने में समावेशी बनाना है तो पुराने वर्चस्व वाले वर्ग को त्याग दिखाना होगा। लेकिन यादव समाज के बड़े हिस्से को यह बात नागवार गुजरी। वे पूछते हैं- हमने पार्टी बनाई, संघर्ष किया, जेल गए, तो अब हम ही क्यों पीछे हटें?

काशीनाथ यादव का पलटवार बनी असंतोष की असली आवाज

9 फरवरी 2026 को स्वर्गीय कैलाश यादव की पुण्यतिथि पर गाजीपुर-मऊ क्षेत्र में एक कार्यक्रम था। वहाँ पूर्व एमएलसी काशीनाथ यादव ने मंच से सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा, “हर बार यादव ही क्यों कुर्बानी दें? अफजाल अंसारी पहले अपनी गाजीपुर सीट छोड़कर देखें कि कोई अन्य जाति का व्यक्ति वहाँ जीत पाता है या नहीं।”

काशीनाथ यादव खुद यादव समाज के बड़े नेता हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ नेता समय-समय पर दल बदलते रहते हैं। ऐसे में यादव समाज बार-बार अपना हक क्यों छोड़े? उनका बयान सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं था। कई यादव कार्यकर्ता उनके साथ खड़े दिखे। यह बयान बताता है कि सपा के अंदर यादव वर्ग में गुस्सा पनप रहा है। वे महसूस कर रहे हैं कि उनकी मेहनत का फल दूसरे ले जा रहे हैं।

यादव समाज की भूमिका और कुर्बानी की असली माँग

यादव समाज उत्तर प्रदेश में करीब 9 प्रतिशत आबादी का है। वे ओबीसी में सबसे संगठित और प्रभावशाली हैं। सपा के जन्म से लेकर आज तक हर स्तर पर यादव नेता रहे हैं- जिला पंचायत अध्यक्ष, विधायक, मंत्री, सांसद। मुलायम सिंह यादव यादव थे, अखिलेश यादव यादव हैं। इसलिए यादवों का भावनात्मक लगाव पार्टी से बहुत गहरा है।

अब पीडीए में जब अन्य पिछड़ों को टिकट दिए जा रहे हैं तो यादवों की संख्या कम हो रही है। साल 2024 में कई यादव उम्मीदवारों को टिकट नहीं मिला। यही ‘कुर्बानी’ की बात है जिसका जिक्र अफजाल अंसारी ने किया। लेकिन यादव नेता पूछ रहे हैं- हम त्याग करें तो क्या बदले में हमें सम्मान और सुरक्षा मिलेगी? या फिर हमारी उपेक्षा होगी?

पीडीए के अंदर तीन बड़े टकराव

यादव बनाम अन्य पिछड़े: यादवों को लगता है कि वे सबसे ज्यादा संगठित हैं इसलिए उनकी हिस्सेदारी सबसे ज्यादा होनी चाहिए। लेकिन अन्य पिछड़े जैसे राजभर, निषाद कहते हैं कि हम भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

यादव-मुस्लिम रिश्ता: मुस्लिम 19 प्रतिशत आबादी के हैं। वे 90 प्रतिशत वोट सपा को देते हैं। अफजाल अंसारी मुस्लिम प्रतिनिधि हैं। यादव कहते हैं कि मुस्लिम तो वोट देते हैं लेकिन पद कम लेते हैं। अब जब मुस्लिम नेताओं को ज्यादा जगह दी जा रही है तो टकराव बढ़ रहा है।

दलितों का शामिल होना: दलित 21 प्रतिशत हैं। सपा ने कई दलित नेताओं को जोड़ा है। लेकिन दलितों में अभी भी असंतोष है। वे पूछते हैं कि सपा के शासन में उनके साथ क्या हुआ था? क्या अब वाकई बराबरी मिलेगी?

ये तीनों टकराव पीडीए को कमजोर कर सकते हैं अगर सपा ने इन्हें नहीं संभाला तो। हालाँकि दलितों का बड़ा वोटबैंक अब भी सपा से दूर है। वो परंपरागत तौर पर बीएसपी के लिए वोट करता रहा है और अब गैर-जाटव दलितों का बड़ा वोट बीजेपी को मिलने लगा है।

साल 2027 के चुनावों में क्या असर पड़ेगा?

साल 2027 का विधानसभा चुनाव करीब हैं। सपा पीडीए को अपना सबसे बड़ा हथियार मान रही है। लेकिन अगर यादव कार्यकर्ता नाराज रहे तो वोट ट्रांसफर नहीं होगा। यादव बूथ स्तर पर सबसे ज्यादा काम करते हैं। अगर वे उत्साह नहीं दिखाएँगे तो पूरा समीकरण बिगड़ सकता है।

दूसरी तरफ अगर यादव समाज कुर्बानी दे देता है तो पीडीए और मजबूत हो सकता है। भाजपा इस विवाद को अपना फायदा उठाने की कोशिश कर रही है। भाजपा नेता कह रहे हैं कि सपा में यादव-मुस्लिम की लड़ाई शुरू हो गई है।

अखिलेश यादव की सबसे बड़ी चुनौती

अखिलेश यादव को तीन काम करने होंगे:

  1. यादव समाज को समझाना कि त्याग से पार्टी मजबूत होगी और सबका भला होगा।
  2. अन्य वर्गों को विश्वास दिलाना कि उनकी भागीदारी सिर्फ कागज पर नहीं, हकीकत में है।
  3. पार्टी के अंदर अनुशासन बनाए रखना ताकि बयानबाजी न बढ़े।

अगर वे यह संतुलन साध लेते हैं तो पीडीए 2027 में भाजपा को कड़ी टक्कर दे सकता है। वरना यह नारा सिर्फ भाषणों तक सीमित रह जाएगा।

फिरलहाल तो लोगों के मन में कई सवाल उठ रहे हैं कि क्या यादव समाज वाकई कुर्बानी देने को तैयार है? क्या अफजाल अंसारी जैसे नेता खुद अपनी सीटों पर त्याग दिखाएँगे? क्या अखिलेश यादव इस असंतोष को संभाल पाएंगे?

यह विवाद सिर्फ सपा की अंदरूनी बात नहीं है। यह उत्तर प्रदेश की सामाजिक राजनीति की असली तस्वीर है। जहाँ एक तरफ सामाजिक न्याय का सपना है, दूसरी तरफ वास्तविकता में हिस्सेदारी की लड़ाई है। अभी तो समय बताएगा कि पीडीए एकजुट रहता है या आंतरिक खींचतान में बिखर जाता है। लेकिन एक बात तय है कि अखिलेश यादव का चुनावी पीडीए अब बिखरता दिख रहा है।

पालघर में जहाँ हुई साधुओं की हत्या, वहाँ शिक्षा-स्वास्थ्य-आत्मनिर्भरता की रोशनी फैला रहा RSS: पढ़ें- 170+ जनजातीय गाँवों में लोगों का जीवन बदल रहे ‘केशव सृष्टि’ की कहानी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को लेकर अक्सर चर्चा होती है कि संघ करता क्या है? संघ के कामों ना बड़े विज्ञापन दिखते हैं, ना शोर-शराबा होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि संघ ने शोर की कार्यशैली को नहीं अपनाया है। संघ अपने स्वयंसेवकों और विभिन्न संगठनों के माध्यम से जमीन पर काम करता है।

उसका प्रयास रहता है कि समाज में सकारात्मक और स्थायी बदलाव आए, भले ही उसका शोर बाहर कम सुनाई दे। इसी सोच से प्रेरित होकर कई सेवा और विकास से जुड़े प्रकल्प चलाए जाते हैं। ऐसा ही एक महत्वपूर्ण प्रकल्प है- केशव सृष्टि। जो महाराष्ट्र के पालघर जिले में काम कर रहा है और सैकड़ों गाँवों में लोगों के जीवन में बदलाव लाने की दिशा में सक्रिय है।

केशव सृष्टि: ग्राम विकास के मॉडल के साथ जीवन में ला रही बदलाव

केशव सृष्टि की स्थापना वर्ष 1997 में हुई और यह संस्था महाराष्ट्र के उत्तन (भायंदर) स्थित लगभग 200 एकड़ के हरित परिसर से संचालित होती है। शुरुआत में इसका उद्देश्य एक एकीकृत ग्रामीण विकास मॉडल तैयार करना था, जिसमें कृषि महाविद्यालय, गौशाला, आवासीय विद्यालय, अंतरराष्ट्रीय स्कूल, वनौषधि अनुसंधान केंद्र और प्रशिक्षण अकादमी शामिल हों।

समय के साथ संस्था ने समाज की आवश्यकताओं को समझते हुए अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार किया और आज यह शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण, कौशल विकास, महिला सशक्तिकरण और सांस्कृतिक संरक्षण जैसे विविध क्षेत्रों में सक्रिय रूप से कार्य कर रही है। ग्राम विकास आज भी इस संस्था का केंद्र बिंदू है।

ग्राम विकास योजना: समाज परिवर्तन की एक पहल

संस्था की ‘ग्राम विकास योजना’ गाँवों को आत्मनिर्भर बनाने पर केंद्रित है। यह संस्था पालघर के 172 गाँवों को ग्राम विकास योजना के तहत विकसित कर रही है। इसके अंतर्गत कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा और उद्यम इन 4 प्रमुख स्तंभों पर कार्य किया जाता है। संस्था का लक्ष्य ऐसे ‘आदर्श गाँव’ विकसित करना है जहाँ ग्राम समिति सक्रिय हो, स्वयं सहायता समूह मजबूत हों और गाँव कुपोषण मुक्त बने।

कृषि क्षेत्र में संस्था ने सोलर सिंचाई परियोजना के माध्यम से किसानों के खेतों में सौर पंप स्थापित किए हैं, जिससे वर्षभर सिंचाई संभव हो पाती है। इससे किसान एक वर्ष में कई फसलें उगा पा रहे हैं, उनकी आय में वृद्धि हो रही है और शहरों की ओर होने वाला पलायन कम हो रहा है। जहाँ सोलर पंप संभव नहीं हैं, वहाँ कृत्रिम तालाब (फार्म पॉन्ड) बनाए गए हैं। साथ ही फलदार वृक्षारोपण को बढ़ावा देकर किसानों को अतिरिक्त आय का स्रोत उपलब्ध कराया गया है।

जिस गाँव को हम भूल गए, उसे संघ नहीं भूला

जिन गाँवों में पालघर में संस्था ने विकसित किया है उनमें अधिकतर जनजातीय गाँव हैं। जहाँ सरकारी योजनाओं को पहुँचने में शायद वक्त लगे लेकर राष्ट्र प्रथम की भावना के साथ राष्ट्र निर्माण में जुटे स्वयंसेवकों के लिए यहाँ विकास के रास्ते खोलना उनका कर्तव्य सरीखा है। इन्हीं गाँवों में एक गाँव गडचिंचले (Gadchinchale) है। आपकी स्मृतियों में इसकी याद शायद घूमिल हो गई होगी, ये वहीं गाँव है जहाँ दो साधुओं की लिन्चिंग कर दी गई थी। अप्रैल 2020 में कोविड-19 के लॉकडाउन के बीच भीड़ ने साधुओं को चोर समझकर मार डाला था।

यह मुद्दा देशभर में चर्चा का विषय बना, समय बीता तो चर्चा खत्म हो गई। हालाँकि, संघ और उसके स्वयंसेवक इस गाँव को नहीं भूले, वो जुट गए इसमें बदलाव लाने में। यहाँ के लोगों को विकास की उस दौड़ में शामिल करने में जिस रफ्तार से देश दौड़ रहा है।

ग्राम विकास के तहत की जा रहीं कई पहल

ग्राम विकास के तहत कई पहल की जा रही हैं, जिनमें कुछ निम्न हैं:-

MSK- माधव शिक्षण केंद्र
माधव शिक्षण केंद्र (MSK) पहली से पाँचवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों के लिए चलाया जा रहा एक विशेष प्रकल्प है, जो स्कूल की पढ़ाई को और मजबूत बनाने का काम करता है। इसमें बच्चों को भारतीय परंपराओं, संस्कारों और जीवन कौशल की शिक्षा दी जाती है। यह प्रकल्प वर्तमान में 136 गाँवों में संचालित हो रहा है और अब तक 4,875 से अधिक छात्र-छात्राएँ इससे लाभान्वित हो चुके हैं। इस वर्ष इसे 145 गाँवों तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है। इस पहल के सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं जिससे स्कूल में बच्चों की उपस्थिति बढ़ी है, गतिविधि-आधारित कार्यक्रमों से पढ़ाई रोचक बनी है और गणित व अंग्रेजी जैसे विषयों पर बच्चों की पकड़ पहले से बेहतर हुई है।

कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र
कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र का उद्देश्य युवाओं में कंप्यूटर साक्षरता बढ़ाना और उन्हें उच्च शिक्षा तथा रोजगार के लिए तैयार करना है। इस समय कुल 6 मुख्य केंद्र और 2 सैटेलाइट केंद्र संचालित हैं, जहाँ प्रत्येक केंद्र में 15 कंप्यूटर उपलब्ध हैं। अब तक 1200 से अधिक विद्यार्थियों को प्रमाणपत्र दिया जा चुका है। यहाँ MS ऑफिस, टैली, एडवांस एक्सेल, डीटीपी, पायथन प्रोग्रामिंग और वेब डेवलपमेंट जैसे उपयोगी कोर्स कराए जाते हैं। इस पहल से युवाओं में डिजिटल जागरूकता बढ़ी है, रोजगार के अवसर बेहतर हुए हैं और छात्रों के आत्मविश्वास में भी वृद्धि हुई है।

स्वास्थ्य आँकड़ों की मैपिंग
गाँवों के स्वास्थ्य आँकड़ों की व्यवस्थित मैपिंग की जा रही है ताकि हर परिवार की सेहत की सही जानकारी उपलब्ध हो सके। डॉक्टरों और क्लीनिकों की कमी को दूर करने के लिए स्वास्थ्य रक्षक दंपती (SRD) के माध्यम से गाँव-गाँव तक स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाई जा रही हैं। प्रत्येक परिवार का हेल्थ कार्ड तैयार किया जाता है, जिससे बीमारियों का समय रहते पता लगाया जा सके और शुरुआती अवस्था में ही उपचार शुरू हो सके। साथ ही विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा साप्ताहिक वर्चुअल क्लीनिक के माध्यम से टेली-कंसल्टेशन की सुविधा भी दी जाती है। यह कार्यक्रम वर्तमान में 50 गाँवों में चल रहा है और इस वर्ष इसे 63 गाँवों तक पहुँचाने का लक्ष्य है।

इस पहल से अब तक 2525 परिवारों के 14,529 लोगों को लाभ मिला है। 1006 परिवारों को डिजिटल हेल्थ लॉकेट उपलब्ध कराए गए हैं, जिससे उनकी स्वास्थ्य जानकारी सुरक्षित और सुलभ रहती है। स्वास्थ्य रक्षक दंपतियों ने 925 एनीमिया, 308 उच्च रक्तचाप और 285 डायबिटीज के मरीजों की पहचान कर उनका उपचार सुनिश्चित किया है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य जागरूकता और भरोसा दोनों बढ़ा है।

स्वास्थ्य आँकड़े जुटाते स्वयंसेवक

वृक्षारोपण अभियान
वर्ष 2017 में शुरू किया गया वृक्षारोपण अभियान आज एक जनआंदोलन का रूप ले चुका है। अब तक 1,58,000 फलदार पेड़ लगाए जा चुके हैं, जिससे 8,500 किसानों को सीधा लाभ मिला है। इन पेड़ों पर अब फल भी आने लगे हैं, जिससे किसानों और उनके परिवारों को वास्तविक आर्थिक लाभ मिल रहा है। इस पहल ने पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा दिया है, हरियाली बढ़ाई है और किसानों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत तैयार किया है।

फार्म पोंड (कृषि तालाब) पहल
जहाँ पानी का कोई स्थायी स्रोत नहीं है, वहाँ कृत्रिम तालाब बनाकर किसानों को बड़ी राहत दी जा रही है। अब तक 19 स्थानों पर फार्म पोंड का निर्माण किया गया है, जिससे किसानों को सीधा लाभ मिला है। इन तालाबों से सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध हो रहा है और साथ ही मछली पालन को भी बढ़ावा मिल रहा है। यह पहल उन क्षेत्रों में आजीविका को मजबूत कर रही है, जहाँ पानी की कमी के कारण खेती और रोजगार के अवसर सीमित थे।

केशव सृष्टि द्वारा विकसित तालाब

माता शबरी महिला उद्योग केंद्र
माता शबरी महिला उद्योग केंद्र के माध्यम से जनजातीय महिलाओं को कपड़े के थैलों की सिलाई का प्रशिक्षण और रोजगार दिया जा रहा है। अब तक 32 गाँवों की 339 महिलाओं को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। मौजूदा समय में 14 गाँवों की 90 जनजातीय महिलाएँ रोज इस कार्य से जुड़ी हुई हैं। यह पहल पुराने कपड़ों का पुनः उपयोग (अपसाइक्लिंग) कर पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देती है और सिंगल यूज प्लास्टिक के उपयोग को कम करने में मदद करती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे आदिवासी महिलाओं को सम्मानजनक आजीविका मिली है।

प्रोजेक्ट ग्रीन गोल्ड
प्रोजेक्ट ग्रीन गोल्ड के तहत ‘बाँस’ के माध्यम से ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा दिया जा रहा है और आदिवासी महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है। इस परियोजना में कंदील, राखी और अन्य सजावटी बाँस उत्पाद तैयार किए जाते हैं। विक्रमगढ़ और जव्हार तालुका के 28 गाँवों में 800 से अधिक आदिवासी महिला-पुरुषों को बाँस उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण दिया गया है। इसी पहल के तहत भारत की पहली पूर्णतः जनजातीय स्वामित्व वाली बाँस कंपनी विक्रमगढ़ बाँस उद्योग प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड (Bamboo First) की स्थापना की गई, जिसमें सभी निदेशक जनजातीय महिलाएँ हैं। अब तक जनजातीय महिलाओं ने 1.8 लाख बाँस राखियाँ, 19,000 दिवाली कंदील और अन्य उत्पाद बनाकर लगभग 1.3 करोड़ रुपए का कारोबार किया है।

इस परियोजना के प्रभाव बेहद सकारात्मक रहे हैं। सैकड़ों आदिवासी परिवारों को रोज़गार मिलने से पलायन रुका है। महिलाएँ मजदूर से उद्यमी बनने की दिशा में आगे बढ़ी हैं। 10 आदिवासी महिलाओं ने SSC परीक्षा पास की है और 5 महिलाएँ सरपंच व उपसरपंच जैसे नेतृत्व पदों पर पहुँची हैं।

केशव सृष्टि इस बात का उदाहरण है कि बिना बड़े-बड़े विज्ञापनों और शोर-शराबे के भी समाज में गहरा परिवर्तन लाया जा सकता है। यह एक ऐसा मॉडल है जो दिखाता है कि अगर नीयत साफ हो और दिशा स्पष्ट हो, तो गाँवों की तस्वीर बदली जा सकती है। 1997 में शुरू हुई यह यात्रा आज भी जारी है चुपचाप लेकिन मजबूत कदमों के साथ।

भीख का कटोरा और बर्बादी का शोर, पाकिस्तान में ‘कंगाली’ का दौर: 6 साल में 7% बढ़ी गरीबी, जानें- क्यों फटेहाल होता जा रहा आतंकिस्तान

दक्षिण एशिया के नक्शे पर एक अजीब विरोधाभास उभर रहा है। जहाँ भारत, बांग्लादेश और नेपाल जैसे देश गरीबी के दलदल से बाहर निकलने के लिए लंबी छलाँग लगा रहे हैं, वहीं पाकिस्तान उसी दलदल में और गहरा धँसता जा रहा है। सरकारी आँकड़ों और रिपोर्ट्स ने पाकिस्तान की कंगाली की जो तस्वीर पेश की है, वह न केवल डरावनी है बल्कि एक राष्ट्र के तौर पर उसकी विफलताओं का कच्चा चिट्ठा भी है। जहाँ दुनिया चाँद पर पहुँचने और डिजिटल इकोनॉमी की बात कर रही है, वहाँ पाकिस्तान की 28.8% आबादी इस बात के लिए संघर्ष कर रही है कि रात को चूल्हा जलेगा या नहीं।

आँकड़ों की गवाही: छह साल में कैसे डूबा पाकिस्तान?

पाकिस्तान में गरीबी का ग्राफ अब केवल एक आर्थिक आँकड़ा नहीं, बल्कि एक मानवीय त्रासदी बन चुका है। साल 2018-19 में यहाँ गरीबी की दर 21.9% थी, जो 2024-25 के सर्वे में बढ़कर 28.8% पर पहुँच गई है।

महज छह सालों के भीतर गरीबी में 6.9% की यह उछाल बताती है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था वेंटिलेटर पर है। फेडरल प्लानिंग मिनिस्टर अहसान इकबाल जल्द ही इन आधिकारिक आँकड़ों को जारी करने वाले हैं, लेकिन सूत्रों ने पहले ही पुष्टि कर दी है कि स्थिति काबू से बाहर है।

यह गिरावट इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि 2005-06 में पाकिस्तान की आधी आबादी गरीब थी, जिसे बड़ी मुश्किल से 2018-19 तक घटाकर 21.9% पर लाया गया था। लेकिन पिछले छह सालों की गलत नीतियों ने उस एक दशक की मेहनत पर पानी फेर दिया।

आज पाकिस्तान में गरीबी का पैमाना यह है कि अगर किसी घर की मासिक खपत प्रति व्यक्ति 3,758 पाकिस्तानी रुपए से कम है, तो उसे गरीब माना जाता है। सोचिए, इस महँगाई के दौर में इतनी कम रकम में एक इंसान कैसे जिंदा रह सकता है?

पड़ोसियों ने मारी बाजी: भारत की उड़ान और पाकिस्तान का पतन

दक्षिण एशिया के बाकी देशों के मुकाबले पाकिस्तान की नाकामी बिल्कुल साफ दिखती है। इसमें सबसे ऊपर भारत का नाम आता है, जिसने गरीबी मिटाने के मामले में पूरी दुनिया के सामने एक अद्भुत मिसाल पेश की है। विश्व बैंक के आँकड़ों के अनुसार, भारत ने पिछले 10 सालों में (मोदी सरकार के कार्यकाल में) करीब 17 करोड़ से ज्यादा लोगों को गरीबी के दलदल से बाहर निकालकर एक चमत्कार कर दिखाया है। भारत की शानदार आर्थिक नीतियों का ही नतीजा है कि जहाँ पहले 16 प्रतिशत से ज्यादा लोग बेहद गरीबी में थे, अब वह आँकड़ा घटकर महज 2.3 प्रतिशत रह गया है, जो भारत की एक बहुत बड़ी जीत है।

वहीं दूसरी ओर, पाकिस्तान के ही पूर्व हिस्से बांग्लादेश ने अपने कपड़ा उद्योग के जरिए सुधार की कोशिश की है, लेकिन पाकिस्तान खुद हर मोर्चे पर पिछड़ गया है। यहाँ तक कि नेपाल और श्रीलंका जैसे देशों ने भी भारी संकट और चुनौतियों के बावजूद खुद को संभाला है और अपनी अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाने में जुटे हैं। इन सभी पड़ोसियों के मुकाबले पाकिस्तान की स्थिति सबसे ज्यादा डराने वाली है, क्योंकि जहाँ बाकी देश तरक्की कर रहे हैं, वहीं पाकिस्तान इकलौता ऐसा मुल्क है जहाँ गरीबी घटने के बजाय और भी तेजी से बढ़ती जा रही है।

कंगाली के विलेन: आखिर क्यों नहीं सुधरे हालात?

पाकिस्तान की इस कंगाली के पीछे उसकी खुद की गलत प्राथमिकताएँ और नाकामियाँ जिम्मेदार हैं। पाकिस्तान ने कभी भी अपनी जनता की भलाई या देश के विकास के लिए नीतियाँ नहीं बनाईं, बल्कि उसका पूरा ध्यान हमेशा ‘भारत से डर’ और जंग की तैयारी पर रहा। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि एक तरफ पाकिस्तान पाई-पाई के लिए कर्ज माँग रहा है, वहीं दूसरी तरफ वह अपने देश के विकास पर पैसा खर्च करने के बजाय आतंकियों को पालने और उन्हें फंडिंग करने में लगा रहता है।

इसी का नतीजा है कि आज वहाँ की आम जनता दाने-दाने को तरस रही है और देश कंगाली के उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नजर नहीं आता। इसके अलावा, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से कर्ज के जाल में फँस चुकी है। पिछले कुछ सालों में उसने बार-बार IMF से भारी लोन लिया, जिसकी कड़ी शर्तों की वजह से वहाँ टैक्स का बोझ बढ़ गया और गरीबों को मिलने वाली सब्सिडी खत्म हो गई।

रही-सही कसर वहाँ फैली भयंकर महँगाई, भ्रष्टाचार और विनाशकारी बाढ़ ने पूरी कर दी। हालात इतने खराब हैं कि वहाँ GDP ग्रोथ सुस्त है और गेहूँ जैसी बुनियादी चीजों के दाम भी आसमान छू रहे हैं। अपनी जनता को रोटी देने के बजाय आतंकियों को पनाह देने और सेना पर बेहिसाब पैसा बहाने की वजह से ही आज पाकिस्तान पूरी दुनिया में हाथ में कटोरा लेकर घूमने को मजबूर है।

प्रांतों का हाल: पंजाब और सिंध में हाहाकार

पाकिस्तान की कंगाली अब उसके उन इलाकों तक भी पहुँच गई है जिन्हें कभी सबसे खुशहाल और अमीर माना जाता था। रिपोर्ट बताती है कि पंजाब और सिंध, जो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाते थे, वहाँ अब गरीबी सबसे तेजी से पैर पसार रही है। वहीं, खैबर पख्तूनख्वा के हालात भी लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। बलूचिस्तान की बात करें तो वहाँ पहले से ही इतनी ज्यादा गरीबी थी कि अब नई बढ़ोतरी के बाद स्थिति और भी ज्यादा भयानक हो गई है।

यह पूरी स्थिति साफ इशारा करती है कि पाकिस्तान का आर्थिक ढाँचा अंदर से पूरी तरह खोखला और बर्बाद हो चुका है। अब यह संकट केवल पिछड़े इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि कंगाली का यह जहर बड़े शहरों से लेकर दूर-दराज के गाँवों तक फैल गया है। देश की गलत नीतियों और भ्रष्टाचार की वजह से आज पाकिस्तान का वह मध्यम वर्ग भी गरीबी की रेखा के नीचे गिर रहा है, जो कभी देश को चलाने की ताकत रखता था।

‘परमाणु बम’ है पर ‘आटे का ड्रम’ नहीं

पाकिस्तान की त्रासदी यह नहीं है कि वह गरीब है, त्रासदी यह है कि वह गरीब बने रहने का चुनाव खुद करता है। जिस देश की प्राथमिकता अपने पड़ोसी से होड़ करना और छद्म युद्ध (Proxy War) लड़ना हो, वहाँ की जनता का हाल ऐसा ही होता है। आज दुनिया के सामने पाकिस्तान की छवि एक ऐसे मुल्क की है जो एक हाथ में परमाणु बम और दूसरे हाथ में भीख का कटोरा लेकर खड़ा है। 1970 के दशक में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो का वो वाला बयान भी सच होता दिख रहा है, “हम घास या पत्ते खाएँगे, भूखे भी रहेंगे लेकिन हम अपना खुद का बम बनाएँगे।” आज वहीं भूखे रहने की स्थिति साफतौर पर पूरी दुनिया को दिख रही है।

भारत डिजिटल क्रांति और 5 ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी की ओर बढ़ रहा है और पाकिस्तान अभी भी इसी उलझन में है कि उसे IMF से अगली किस्त कब मिलेगी। जब तक पाकिस्तान अपनी ‘भारत केंद्रित’ विदेश नीति और सेना के प्रभुत्व वाली आर्थिक नीतियों को नहीं बदलता, तब तक गरीबी की यह दर 28% से 40% तक पहुँचने में देर नहीं लगेगी। पाकिस्तान के लिए अब भी वक्त है कि वह अपने ‘जंग के जुनून’ को छोड़कर ‘तरक्की के जुनून’ को अपनाए, वरना इतिहास उसे एक ‘विफल राष्ट्र’ (Failed State) के उदाहरण के रूप में याद रखेगा।

अब 40 मिनट में पूरा होगा मेरठ से दिल्ली का सफर, ₹30000 करोड़ की RRTS परियोजना का शुभारंभ करेंगे PM मोदी: मेरठ मेट्रो की भी देंगे सौगात, जानें इसकी खासियत?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविवार (22 फरवरी 2026) को दिल्ली-मेरठ रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम के मेरठ कॉरिडोर का शुभारंभ करेंगे। इस दौरान प्रधानमंत्री दिल्ली से मेरठ की 82 किलोमीटर की दूरी को मात्र 55 मिनट में पूरा करने वाली 160 किमी प्रति घंटा की हाइ स्पीड नमो भारत ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर उद्घाटन करेंगे। इसके तहत मेरठ मेट्रो भी जनता को समर्पित किए जाएँगे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एक दिन के मेरठ दौरे पर प्रधानमंत्री पहले नमो भारत ट्रेन में सफर करेंगे और यात्रियों व स्कूली बच्चों से बातचीत करेंगे। मेरठ कॉरिडोर को हरी झंडी दिखाने के बाद वे मोहिउद्दीनपुर में जनसभा को भी संबोधित करेंगे। प्रधानमंत्री के दौरे की तैयारियाँ अंतिम चरण में पहुँच गई हैं। शनिवार (21 फरवरी 2026) को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मेरठ आकर तैयारियों का जायजा लिया।

क्या है मेरठ कॉरिडोर?

मेरठ कॉरिडोर दिल्ली से मेरठ के बीच बने 82 किलोमीटर लंबे RRTS प्रोजेक्ट का हिस्सा है, जिसकी कुल लागत करीब ₹30 हजार करोड़ से ज्यादा है। इस कॉरिडोर के कहत मेरठ के अंदर लोकल मेट्रो की तरह सेवा मिलेगी और दिल्ली जाने के लिए हाई स्पीड नमो भारत ट्रेन चलेगी, जिसकी अधिकतम रफ्तार 160 किलोमीटर प्रति घंटा है। यानी लोग मेरठ से दिल्ली करीब 40 मिनट में पहुँच सकेंगे।

सीधा बात यह है कि यह सिर्फ एक ट्रेन प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि मेरठ शहर के अंदर सफर को आसान तेज और आरामदायक बनाने की बड़ी योजना है, जिससे जाम कम होगा और रोज सफर करने वालों का समय बचेगा। वैसे ही मेरठ में जाम की समस्या सालों पुरानी है, मेरठ मेट्रो बनने सी इससे राहत मिलेगी। वहीं नमो भारत के चलते मेरठ अब दिल्ली NCR के शहरों से कनेक्ट हो जाएगा।

नमो भारत ट्रेन से दिल्ली से मेरठ की दूरी 40 मिनट में होगी पूरी

दिल्ली मेरठ RRTS कॉरिडोर पर चल रही नमो भारत ट्रेन देश की पहली रीजनल रैपिड रेल सेवा है। यह ट्रेन 82 किलोमीटर लंबे दिल्ली मेरठ कॉरिडोर पर संचालित हो रही है। इसकी अधिकतम रफ्तार 160 किलोमीटर प्रति घंटा है, जबकि परिचालन गति 120 से 140 किलोमीटर प्रति घंटा के बीच रहती है।

इससे दिल्ली से मेरठ के बीच सफर करीब 40 से 45 मिनट में पूरा किया जा सकता है, जो पहले सड़क के रास्ते से 1.5 से दो घंटे तक का समय लगता था। इस प्रोजेक्ट की कुल लागत लगभग 30 हजार करोड़ रुपए से अधिक बताई गई है। इस ट्रेन में सभी कोच में आरामदायक सीटें, मोबाइल चार्जिंग प्वाइंट, LED सूचना स्क्रीन और ऑटोमेटिक दरवाजे लगाए गए हैं।

अब तक नमो भारत ट्रेन मेरठ साउथ से आनंदविहार स्टेशन तक संचालित थी, जो अब विस्तार होकर मोदीपुरम से सराय काले खाँ तक शुरू की जाएगी। यह नमो भारत ट्रेन मेरठ के भीतरी इलाकों से मेरठ मेट्रो के तहत कनेक्टेड है। इससे पश्चिमी यूपी के आर्थिक, सामाजिक और शहरी विकास को भी नई गति मिलेगी।

कई खंडो मे नमों भारत का हुआ संचालन

दिल्ली-मेरठ नमो भारत ट्रेन की आधारशिला 8 मार्च 2019 को प्रधानमंत्री ने रखी थी। यह परियोजना पिछले साल 2018 से विकसित की जा रही है। कोविड-19 के बावजूद परियोजना पूरी होने की गति में कोई असर नहीं पड़ा। लगभग 4 सालों के भीतर पहला सेक्शन तैयार कर लिया गया। 20 अक्टूबर 2023 को साहिबाबाद से दुहाई डिपो के बीच शुरू हुआ।

इसके कुछ महीनों बाद 6 मार्च 2024 को 17 किलोमीटर का खंड मोदीनगर साउथ तक खोला गया, जिसे 18 अगस्त 2024 को मेरठ साउथ तक विस्तारित किया गया। 05 जनवरी 2025 को दिल्ली खंड में साहिबाबाद से न्यू अशोक नगर के बीच 13 किलोमीटर का हिस्सा चालू हुआ, जिससे नमो भारत ट्रेनों का दिल्ली में प्रवेश हुआ और आनंद विहार जैसे प्रमुख मल्डी-मॉडल हब को जोड़ा गया।

अब 22 फरवरी 2026 को न्यू अशोक नगर से सराय काले खाँ तक 5 किलोमीटर और मेरठ साउथ से मोदीपुरम तक 21 किलोमी के अंतिम खंड के शुरू होते ही पूरा 82 किलोमीटर कॉरिडोर का संचालन शुरू हो जाएगा।

दिल्ली-मेरठ कॉरिडोर में नमो भारत के 16 स्टेशन

दिल्ली-मेरठ कॉरिडोर में नमो भारत के 16 स्टेशन हैं, जो मेरठ को दिल्ली से जोड़ते हैं। इनमें जंगपुरा, सराय काले खां, न्यू अशोक नगर, आनंद विहार, साहिबाबाद, गाजियाबाद, गुलधर, दुहाई, मुरादनगर, मोदीनगर साउथ, मोदीनगर नॉर्थ, मेरठ साउथ, शताब्दी नगर, बेगमुपल और मोदीपुर शामिल हैं।

नमो भारत स्टेशनों को दिल्ली मेट्रो, रेलवे स्टेशन, बस टर्मिनल और अन्य सार्वजनिक परिवहन साधनों से जोड़ा गया है। इस सेवा का मकसद दिल्ली एनसीआर और मेरठ के बीच रोजाना यात्रा करने वाले लाखों लोगों को तेज, सुरक्षित और आधुनिक परिवहन विकल्प देना है।

मेरठ की लोकल मेट्रो से सफर होगा आसान

दिल्ली-मेरठ कॉरिडोर का दूसरा हिस्सा मेरठ मे चलने वाली लोकल मेट्रो है, जिसके तहत शहर में 23 किलोमीटर लंबा मेट्रो सेक्शन बनाया गया है। इसे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र परिवहन निगम (NCRTC) ने तैयार किया है। 22 फरवरी 2026 को प्रधानमंत्री मोदी मेरठ मेट्रो को हरी झंगी दिखाएँगे, जिसके बाद सेवा को यात्रियों के लिए उपलब्ध करा दी जाएगी।

मेरठ मेट्रो मेरठ साउथ से मोदीपुरम तक चलेगी। यह सेवा नमो भारत ट्रेन के साथ इंटीग्रेटेड है, जिससे चार प्रमुख स्टेशनों पर यात्री दोनों सेवाओं के बीच आसानी से बदल सकेंगे। इससे लोकल और रीजनल सफर एक साथ आसान हो जाएगा।

इस रूट पर 13 स्टेशन बनाए गए हैं। इनमें 9 एलिवेटेड, 3 भूमिगत और एक डिपो स्टेशन शामिल है। बेगमपुल और मेरठ सेंट्रल जैसे व्यस्त इलाकों में स्टेशन जमीन के नीचे बनाए गए हैं ताकि ट्रैफिक पर असर कम पड़े। मेरठ के भैसाली बस अड्डे पर भी मेट्रो स्टेशन बनाया गया है, जिससे बस यात्रियों को मेरठ के भीतरी इलाकों में जाने के लिए सुविधा होगी।

मेरठ मेट्रो की अधिकतम संचालन रफ्तार लगभग 120 किलोमीटर प्रति घंटा होगी और शहर के एक छोर से दूसरे छोर तक का सफर करीब 30 मिनट में पूरा किया जा सकेगा। इससे रोजाना सफर करने वाले लोगों का समय बचेगा और जाम की समस्या से राहत मिलेगी।

मेट्रो स्टेशनों और ट्रेन के कोचों में आधुनिक सुविधाएँ दी गई हैं, जिनमें लिफ्ट, एस्केलेटर, सीसीटीवी कैमरे, प्लेटफॉर्म स्क्रीन डोर, डिजिटल टिकटिंग और एयर कंडीशनिंग शामिल हैं। इस प्रोजेक्ट का मकसद मेरठ में तेज, सुरक्षित और आधुनिक पब्लिक ट्रांसपोर्ट व्यवस्था उपलब्ध कराना है।