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वन्स ओनली डेटा, सिंगल विंडो सर्विस और पेपरलेस शासन: जानें- क्या है ‘गुजरात यूनिफाइड डिजिटल स्टैक’, जिसके लिए बजट में ₹100 करोड़ किए गए आवंटित

21वीं सदी डेटा और प्रौद्योगिकी की सदी है। जहाँ भारत ‘डिजिटल इंडिया’ के माध्यम से विश्व में अपनी पहचान बना रहा है, वहीं गुजरात भी देश में विकास के एक आदर्श के रूप में उभर रहा है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए, राज्य सरकार ने ‘गुजरात यूनिफाइड डिजिटल स्टैक’ (GUDS) के माध्यम से डिजिटल शासन के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक पहल की है।

इस महत्वाकांक्षी परियोजना की औपचारिक घोषणा मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने 11 दिसंबर 2025 को की थी। इस घोषणा को साकार करने के लिए राज्य के 2026 के बजट में 100 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है। यह कदम गुजरात को न केवल एक ‘डिजिटल राज्य’ बल्कि ‘डेटा-संचालित शासन’ में विश्व स्तरीय बुनियादी ढाँचा प्रदान करने वाला राज्य भी बनाएगा।

‘गुजरात यूनिफाइड डिजिटल स्टैक’ (GUDS) कोई साधारण ऐप या वेबसाइट नहीं है बल्कि एक अत्यंत शक्तिशाली तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र है। गुजरात यूनिफाइड डिजिटल स्टैक एक ऐसी प्रणाली है जो राज्य सरकार के सभी विभागों, स्वायत्त निकायों और नागरिक सेवाओं के डेटा और प्रक्रियाओं को एक सुरक्षित डिजिटल बुनियादी ढाँचे में जोड़ती है।

इसे एक ‘डिजिटल आधार’ माना जा सकता है जिस पर सरकार अपनी सभी सेवाओं (जैसे राशन कार्ड, भूमि अभिलेख, छात्रवृत्ति, स्वास्थ्य कार्ड आदि) को इस प्रकार व्यवस्थित करेगी कि वे एक दूसरे से जुड़ी रहें।

‘स्टैक’ शब्द का अर्थ और इसकी परतें

प्रौद्योगिकी में, ‘स्टैक’ का अर्थ है एक के ऊपर एक व्यवस्थित परतें यानी लेयर्स। GUDS मुख्य रूप से तीन परतों में विभाजित है।

पहचान स्तर: यह पहला स्तर है जहाँ नागरिक की पहचान स्थापित की जाती है (उदाहरण के लिए आधार या राज्य का अपना एकल साइन-ऑन आईडी)।

भुगतान और लेनदेन स्तर: यह स्तर सरकारी शुल्कों के भुगतान या सब्सिडी के प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) को सँभालता है।

डेटा एक्सचेंज लेयर: यह सबसे महत्वपूर्ण लेयर है। यह एक ‘पाइपलाइन’ की तरह विभिन्न विभागों के बीच डेटा को जोड़ती है।

‘यूनिफाइड’ होने का क्या अर्थ है?

अब तक स्थिति ‘अलग-थलग’ जैसी थी। यानी अगर आपने राजस्व विभाग को कोई जानकारी दी है, तो शिक्षा विभाग को उसकी जानकारी नहीं होती थी। अब ‘एकीकरण’ के साथ ये बदलाव आएँगे:

निर्बाध अनुभव: जब कोई नागरिक किसी पोर्टल में लॉग इन करता है, तो उसे इस बात का एहसास भी नहीं होगा कि बाद में पाँच अलग-अलग विभागों से डेटा प्राप्त किया जा रहा है।

डेटा का एकीकरण: राज्य के सभी नागरिकों के लिए ‘सिंगल सोर्स ऑफ ट्रूथ’ डेटाबेस होगा।

एक बार ही जानकारी देने का सिद्धांत: किसी नागरिक को अपने बारे में कोई भी जानकारी (जैसे जन्मतिथि या पता) सरकार को केवल एक बार ही देनी होगी। उसके बाद, सभी विभाग उसी डेटा का उपयोग करेंगे।

यह तकनीक किस प्रकार भिन्न है?

यह स्टैक सिर्फ डेटा स्टोर नहीं करता, बल्कि ‘ओपन स्टैंडर्ड’ पर आधारित है । जिस तरह आप UPI के जरिए किसी भी बैंक से किसी को भी पैसे भेज सकते हैं, उसी तरह इस स्टैक के तहत एक विभाग एपीआई (एप्लिकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस) के जरिए दूसरे विभाग से सुरक्षित रूप से डेटा का अनुरोध कर सकेगा।

अगर आज 100 सेवाएँ हैं और कल 1000 और सेवाएँ जोड़नी पड़ें, तो यह फ्रेमवर्क इसे आसानी से संभाल लेगा। इसके अलावा जब सरकार के नए नियम या योजनाएँ आती हैं, तो महीनों तक सॉफ्टवेयर कोडिंग करने के बजाय, सिस्टम को तुरंत अपडेट किया जा सकता है।

इस पहल का मुख्य उद्देश्य

इस प्रणाली का मुख्य उद्देश्य एक ‘अदृश्य सरकार’ का निर्माण करना है। यानी नागरिक को सरकार के पास जाने की आवश्यकता नहीं होगी, बल्कि सिस्टम स्वचालित रूप से नागरिक को आवश्यकता पड़ने पर सेवा प्रदान करेगा।

उदाहरण के लिए, यदि कोई बच्चा 18 वर्ष का हो जाता है, तो सिस्टम स्वचालित रूप से उसे सूचना भेज देगा या मतदाता सूची में उसका नाम दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू कर देगा। बजट में आवंटित 100 करोड़ रुपये का उपयोग मुख्य रूप से इस जटिल ‘डेटा एक्सचेंज लेयर’ और ‘उच्च-सुरक्षा क्लाउड’ के निर्माण में किया जाएगा।

यह कैसे काम करती है?

GUDS एक साझा डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना है जो राज्य के सभी सरकारी विभागों, स्थानीय निकायों और एजेंसियों के अलग-अलग डेटाबेस को एकीकृत करती है। इस स्टैक की तकनीकी संरचना मॉड्यूलर, ओपन आर्किटेक्चर और एपीआई-आधारित है, ताकि भविष्य में इसे आसानी से विस्तारित और अपग्रेड किया जा सके।

इस परियोजना का कार्यान्वयन गुजरात इन्फॉर्मेटिक्स लिमिटेड (GIAL) द्वारा किया जा रहा है और इसके विस्तृत डिजाइन और कार्यान्वयन के लिए एक परियोजना प्रबंधन सलाहकार (PMC) के चयन हेतु एक आरएफपी (प्रस्ताव के लिए अनुरोध) जारी किया गया है।

GUDS की तकनीकी संरचना मुख्य रूप से चार मुख्य परतों या घटकों पर आधारित है, जो एक दूसरे के साथ मिलकर काम करते हैं:

डेटा एकीकरण परत

यह लेयर GUDS का दिल मानी जाती है। अभी क्या होता है कि राज्य के अलग-अलग विभाग जैसे राजस्व (Revenue), स्वास्थ्य (Health), शिक्षा (Education), कृषि (Agriculture), सामाजिक न्याय (Social Justice) आदि के अपने-अपने अलग डेटाबेस और एप्लिकेशन होते हैं। इन सबका डेटा अलग-अलग जगह पर बंद रहता है और एक-दूसरे से जुड़ा नहीं होता।

GUDS इस दीवार को तोड़ता है और सभी विभागों को Open APIs (एप्लिकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस) के जरिए आपस में जोड़ देता है। ये APIs माइक्रोसर्विस आर्किटेक्चर पर आधारित होती हैं। इसका मतलब है कि हर सेवा या डेटा एक्सेस को एक अलग मॉड्यूल के रूप में डिजाइन किया जाता है ताकि सिस्टम ज्यादा व्यवस्थित और लचीला बने।

इस लेयर में रियल-टाइम डेटा का आदान-प्रदान होता है। यानी जब कोई नागरिक आवेदन करता है तो उसकी सत्यापित जानकारी (जैसे- पहचान, पता, आय, जमीन का रिकॉर्ड) अपने-आप दूसरे विभागों से ली जा सकती है।

यह पूरी प्रक्रिया इवेंट-ड्रिवन और असिंक्रोनस होती है यानी जैसे ही कोई काम शुरू होता है तो सिस्टम तुरंत सक्रिय हो जाता है और अलग-अलग हिस्से एक साथ काम करते हैं। इससे सिस्टम तेज, भरोसेमंद और प्रभावी बना रहता है।

आइडेंटिटी और वेरिफिकेशन लेयर

यह लेयर आधार, डिजिलॉकर और राज्य के अन्य पहचान प्रणालियों से जुड़ी होती है। जब किसी नागरिक की पहचान सत्यापित हो जाती है, तो उसकी डिजिटल प्रोफाइल सुरक्षित तरीके से सिस्टम में संग्रहीत कर ली जाती है। इस डिजिटल प्रोफाइल में जन्म तिथि, निवास स्थान, जाति, आय, जमीन के रिकॉर्ड, शैक्षणिक प्रमाण पत्र जैसी महत्वपूर्ण जानकारियाँ शामिल होती हैं।

यह लेयर ‘कंसेंट-बेस्ड’ यानी सहमति आधारित तरीके से काम करती है। इसका मतलब है कि नागरिक की स्पष्ट अनुमति के बिना उसका कोई भी डेटा साझा नहीं किया जाता। इसके लिए एक ‘कंसेंट मैनेजर’ टूल का उपयोग किया जाता है, जो नागरिक को यह नियंत्रण देता है कि उसका डेटा कब, किसके साथ और किस उद्देश्य के लिए साझा किया जाए।

पहचान सत्यापन (Authentication) के लिए यह लेयर OAuth 2.0 और OpenID Connect जैसे मानक प्रोटोकॉल का इस्तेमाल करती है, जिससे प्रक्रिया सुरक्षित और भरोसेमंद बनी रहती है।

सुरक्षा और गोपनीयता स्तर

GUDS में डेटा सुरक्षा सर्वोपरि है। यह लेयर एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन (TLS 1.3), स्टेट-टाइम डेटा एन्क्रिप्शन (AES-256) और टोकनाइजेशन जैसी तकनीकों का उपयोग करती है। प्रत्येक डेटा एक्सेस को लॉग किया जाता है, ताकि ऑडिट ट्रेल उपलब्ध हो सके।

यह लेयर डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP अधिनियम) और आईटी अधिनियम का पूर्णतया अनुपालन करती है। इसमें जीरो ट्रस्ट आर्किटेक्चर अपनाया गया है, जिसका अर्थ है कि किसी भी उपयोगकर्ता या सिस्टम पर सीधे तौर पर भरोसा नहीं किया जाता, प्रत्येक अनुरोध का सत्यापन किया जाता है।

आवश्यकता पड़ने पर ब्लॉकचेन-आधारित लॉगिंग या डेटा फ्यूजन केंद्रों का भी उपयोग किया जा सकता है।

फ्रंट-एंड डिलीवरी और यूजर इंटरफेस लेयर

यह लेयर नागरिकों के लिए एक सिंगल इंटरफेस है, जैसे डिजिटल गुजरात पोर्टल का उन्नत संस्करण या कोई नया मोबाइल ऐप। यह इंटरफेस मोबाइल-फर्स्ट और बहुभाषी (गुजराती, हिंदी, अंग्रेजी) होगा। यह लेयर माइक्रोफ्रंटएंड और प्रोग्रेसिव वेब ऐप (PWA) तकनीक का उपयोग कर सकती है, ताकि यह कम इंटरनेट स्पीड पर भी काम कर सके।

शिकायत निवारण, योजना पात्रता जाँच और दस्तावेज सत्यापन जैसी सुविधाएँ गुजरात AI स्टैक के टूल्स जैसे योजना पात्रता सत्यापन, शिकायत वर्गीकरण और दस्तावेज निष्कर्षण के साथ एकीकृत की जाएँगी। योजना पात्रता सत्यापन से यह सुनिश्चित होगा कि किस नागरिक को किस सरकारी योजना का लाभ मिलना चाहिए।

अब तक यह प्रक्रिया अधिकारियों द्वारा मैन्युअल रूप से की जाती थी, जिसमें काफी समय लगता था। सरकार को प्रतिदिन हजारों शिकायतें प्राप्त होती हैं। प्रत्येक शिकायत को पढ़ना और उसे संबंधित विभाग को सौंपना एक बड़ा काम है। यह कार्य ‘AI-आधारित शिकायत वर्गीकरणकर्ता’ द्वारा किया जाएगा।

अक्सर नागरिक पुराने दस्तावेज या हस्तलिखित आवेदन अपलोड करते हैं। उनसे डेटा निकालना कठिन होता है। एक्सट्रैक्टर के साथ एकीकृत मॉड्यूल इस समस्या का समाधान करता है।

गुजरात यूनिफाइड डिजिटल स्टैक की कार्यप्रणाली (चरण-दर-चरण प्रक्रिया)

नागरिकों को अब दर्जनों वेबसाइटों को याद रखने की आवश्यकता नहीं है। वे बस एक ही पोर्टल पर जाएँगे। आइए इस प्रक्रिया को एक उदाहरण के रूप में लें, एक छात्र छात्रवृत्ति के लिए आवेदन कर रहा है।

  • छात्र आधार OTP या डिजिलॉकर के माध्यम से लॉगिन करेगा। इससे यह साबित होता है कि आवेदन करने वाला व्यक्ति वास्तविक है।
  • सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नागरिक एक चेकबॉक्स पर क्लिक करके अनुमति देगा।
  • परंपरागत रूप से, छात्र को आय प्रमाण पत्र और परिणाम की एक प्रति अपलोड करनी होती थी। GUDS बाद में (बैकएंड) राजस्व विभाग के डेटाबेस से आय प्रमाण पत्र और शिक्षा बोर्ड के डेटाबेस से मार्कशीट स्वचालित रूप से प्राप्त कर लेगा।
  • यदि कोई ऐसा दस्तावेज है जो डेटाबेस में मौजूद नहीं है (उदाहरण के लिए किसी निजी संगठन का प्रमाण पत्र), तो AI टूल उसे स्कैन करेगा और उससे आवश्यक विवरण पढ़ लेगा।
  • यह सिस्टम कुछ ही सेकंडों में यह निर्धारित कर लेगा कि नागरिक की आय निर्धारित सीमा के भीतर है या नहीं। यदि सब कुछ सही पाया जाता है, तो इसे ‘अनुमोदन’ के लिए आगे भेज दिया जाएगा।
  • यह सिस्टम इस बात का रिकॉर्ड रखेगा कि किस अधिकारी ने कब डेटा देखा। इससे डेटा के दुरुपयोग की संभावना समाप्त हो जाती है।
  • 2025 के ‘गुजरात क्लाउड एडॉप्शन गाइडलाइंस’ के अनुसार, यह डेटा एक अत्यंत सुरक्षित राज्य डेटा सेंटर में रखा जाएगा, जो किसी भी मात्रा के ट्रैफिक को संभालने में सक्षम होगा।

ये सभी प्रक्रियाएँ क्लाउड-आधारित हैं (गुजरात क्लाउड एडॉप्शन गाइडलाइंस 2025 के अनुसार), जिससे ये स्केलेबल और सुरक्षित बन जाती हैं। पायलट चरण का परीक्षण कुछ विभागों में किया जाएगा और फिर इसे सभी विभागों में विस्तारित किया जाएगा।

यह प्रौद्योगिकी ढाँचा इंडिया स्टैक मॉडल का अनुसरण करता है, जिसमें ओपन API, इंटरऑपरेबिलिटी और नागरिक-केंद्रित डिजाइन पर जोर दिया गया है। लेकिन इसे गुजरात की स्थानीय जरूरतों और एआई एकीकरण के अनुरूप और भी बेहतर बनाया गया है।

इससे गुजरात का शासन तेज, अधिक पारदर्शी और समावेशी बनेगा। अधिक तकनीकी जानकारी के लिए आप GIAL के RFP और आधिकारिक अपडेट देखें।

GUDS की घोषणा और बजट आवंटन

गौरतलब है कि 18 फरवरी 2026 को वित्त मंत्री कनुभाई देसाई ने गुजरात विधानसभा में 2026-27 का बजट पेश किया। इस बजट में डिजिटल गवर्नेंस डेवलपमेंट सिस्टम (GUDS) के लिए 100 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। इस राशि का उपयोग डिजाइन, कार्यान्वयन, बुनियादी ढाँचे और पायलट परियोजनाओं के लिए किया जाएगा।

इसके अलावा AI और डिजिटल गवर्नेंस के लिए 850 करोड़ रुपए से अधिक का प्रावधान है, जिसमें डेटा फ्यूजन सेंटर और पुलिसिंग में AI के लिए उत्कृष्टता केंद्र भी शामिल है।

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने पिछले वर्ष 11 दिसंबर 2025 को महात्मा मंदिर में आयोजित क्षेत्रीय AI इम्पैक्ट समिट में GUDS को कार्यान्वित करने की अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की थी। यह सम्मेलन भारत AI मिशन और गुजरात सरकार के सहयोग से आयोजित किया गया था, जहाँ गुजरात AI स्टैक भी लॉन्च किया गया था

व्यक्तिगत लाभ और नागरिकों का सशक्तिकरण

किसी भी तकनीक की सफलता का असली पैमाना यह है कि वह आम आदमी के जीवन को कितना आसान बनाती है। ‘गुजरात यूनिफाइड डिजिटल स्टैक’ केवल इंजीनियरों या आईटी विशेषज्ञों के लिए एक मॉडल नहीं है, बल्कि यह गुजरात के करोड़ों नागरिकों की दैनिक प्रशासनिक समस्याओं का एक स्थायी समाधान है।

अब तक नागरिकों के लिए ‘सरकार’ का मतलब अलग-अलग विभाग, अलग-अलग काउंटर और दस्तावेजों की लंबी प्रक्रिया थी। लेकिन इस एकीकृत प्रणाली के साथ, सरकार अब नागरिकों के लिए ‘एकल विंडो’ बन जाएगी। इस प्रणाली से आम आदमी को न केवल प्रक्रियात्मक लाभ मिलेंगे, बल्कि इससे उसका समय, ऊर्जा और पैसा भी बचेगा।

एक बार डेटा जमा करना: वर्तमान में, किसी भी सरकारी काम के लिए नागरिक को हर बार आधार कार्ड, आय प्रमाण या निवास प्रमाण जमा करना पड़ता है। GUDS योजना के तहत, नागरिक को सरकार को केवल एक बार ही अपनी जानकारी देनी होगी।

इसके बाद जब भी वह किसी नई योजना (जैसे राशन कार्ड या छात्रवृत्ति) के लिए आवेदन करेगा, सिस्टम स्वचालित रूप से पुरानी जानकारी से विवरण ले लेगा। इससे उसे फोटोकॉपी और फाइलों की झंझट से मुक्ति मिलेगी।

शून्य प्रतीक्षा अवधि: परंपरागत रूप से, सरकारी फाइलें एक विभाग से दूसरे विभाग तक जाने में कई दिन लगा देती हैं। यह प्रणाली ‘मशीन-से-मशीन’ डेटा हस्तांतरण पर काम करती है। यानी, पात्रता जाँच कुछ ही सेकंड में हो जाती है। कई सेवाओं को आवेदन के तुरंत बाद या कुछ ही घंटों के भीतर मंजूरी मिल जाएगी।

सक्रिय शासन: GUDS का सबसे बड़ा पहलू यह है कि सरकार नागरिकों की जरूरतों को पहले से ही समझ सकेगी । उदाहरण के लिए यदि कोई बच्चा 18 वर्ष का हो जाता है, तो सिस्टम में उसका डेटा पहले से ही मौजूद होगा। सरकार उसे ‘वोटर कार्ड’ के लिए संदेश भेजेगी या वृद्धावस्था में पहुँचने पर उसे पेंशन योजना के बारे में सूचित करेगी।

नागरिक को योजना ढूँढने की जरूरत नहीं पड़ेगी, योजना खुद नागरिक तक पहुँचेगी।

भ्रष्टाचार मुक्त और पारदर्शी व्यवस्था: जब भी नागरिक और सरकारी अधिकारी के बीच सीधा संपर्क कम होता है, भ्रष्टाचार की संभावना नगण्य हो जाती है। व्यवस्था में मानवीय हस्तक्षेप कम होने के कारण कोई भी अधिकारी किसी भी फाइल को रोक नहीं पाएगा। प्रत्येक आवेदन का एक ‘डिजिटल फुटप्रिंट’ होगा, जिसके माध्यम से आप जान सकेंगे कि आपका आवेदन वर्तमान में किस चरण में है।

सिंगल विंडो सुविधा: वर्तमान में अलग-अलग कामों के लिए अलग-अलग कार्यालयों (मामलतदार कार्यालय, पंचायत, नगर निगम) में जाना पड़ता है। ‘सिंगल साइन-ऑन’ (SSO) के कारण, नागरिक घर बैठे ही एक आईडी से राज्य की सभी सेवाओं का लाभ उठा सकेंगे। इससे किराए और यात्रा खर्चों में भी बचत होगी।

अंतिम व्यक्ति तक पहुँचना: ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यालय दूर-दूर होते हैं और बार-बार जाना मुश्किल हो जाता है। ऑनलाइन आवेदन और GUDS के साथ डिजिटल सत्यापन से बार-बार जाना कम हो जाएगा। गुजरात सरकार ने हाल ही में स्टारलिंक के साथ एक अनुबंध पर हस्ताक्षर किए हैं ताकि दूरस्थ, सीमावर्ती और जनजातीय क्षेत्रों में हाई-स्पीड सैटेलाइट इंटरनेट पहुँचाया जा सके और डिजिटल सेवाएँ इन क्षेत्रों तक आसानी से पहुँच सकें।

कल्याणकारी योजनाएँ लाभार्थियों तक तेजी से और सीधे पहुँचेंगी: लाभार्थियों की पात्रता की जाँच स्वचालित रूप से (गुजरात AI स्टैक के योजना पात्रता सत्यापन उपकरण के माध्यम से) की जाएगी, ताकि पीएम किसान, राज्य की विभिन्न कल्याणकारी योजनाएँ, स्वास्थ्य सहायता या शिक्षा सहायता जैसी योजनाएँ लाभार्थियों तक तेजी से पहुँच सकें। इससे लाभ में कमी और देरी कम होगी और अधिक से अधिक लोगों को समय पर लाभ मिलेगा।

सरकार को मिलने वाले लाभ

सरकारी कामकाज में, एक ही डेटा को अलग-अलग विभागों में बार-बार जाँचा जाता है, जिससे समय और मानव संसाधन की बर्बादी होती है। GUDS में एक बार सत्यापित डेटा का पुनः उपयोग किया जा सकेगा, जिससे प्रक्रिया तेज और अधिक कुशल हो जाएगी।

इसके अलावा कागजी कार्रवाई, भौतिक सत्यापन, मैनुअल प्रोसेसिंग और बार-बार होने वाली प्रक्रियाओं में कमी के कारण सरकारी खर्चों में भी बचत होगी। इंडिया स्टैक जैसी राष्ट्रीय पहलों ने दिखाया है कि ऐसी प्रणालियों से अरबों रुपये की बचत हुई है।

इसके अलावा एकीकृत डेटा सरकार को योजनाओं की प्रभावशीलता मापने, जरूरतमंद क्षेत्रों की पहचान करने और तत्काल नीतिगत समायोजन करने के लिए वास्तविक समय का डेटा प्रदान करेगा। इससे योजनाएँ अधिक लक्षित और प्रभावी बनेंगी। डिजिटल सत्यापन और पारदर्शी डेटा साझाकरण से फर्जी लाभार्थियों, डुप्लिकेट प्रविष्टियों और बिचौलियों में कमी आएगी।

इससे कल्याणकारी निधियों का प्रत्यक्ष और सुरक्षित उपयोग सुनिश्चित होगा। यह उल्लेखनीय है कि ‘गुजरात यूनिफाइड डिजिटल स्टैक’ (GUDS) केवल एक तकनीकी परियोजना नहीं है, बल्कि यह गुजरात की प्रशासनिक संरचना में एक बड़ा बदलाव है। बजट में आवंटित 100 करोड़ रुपए की राशि इस बात का प्रमाण है कि राज्य सरकार ‘डिजिटल परिवर्तन’ को प्राथमिकता दे रही है।

इस प्रणाली से सरकार के कामकाज में जो गति, पारदर्शिता और सटीकता आएगी, उससे समाज के सबसे निचले तबके के लोगों को सीधा लाभ होगा। जब प्रशासन में डेटा साइंस और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को एकीकृत किया जाएगा, तो मानवीय त्रुटियाँऔर देरी अतीत की बात हो जाएँगी।

नागरिकों के लिए सरकार अब कोई कार्यालय या खिड़की नहीं, बल्कि उनके स्मार्टफोन में उपलब्ध एक ऐसी सेवा होगी जो उनकी जरूरतों को समझती है।

संक्षेप में GUDS के माध्यम से गुजरात ‘विकसित गुजरात 2047’ के सपने को साकार करने के लिए एक मजबूत डिजिटल नींव रख रहा है। इस व्यवस्था से गुजरात न केवल देश के लिए बल्कि पूरे विश्व के लिए एक आदर्श डिजिटल राज्य के रूप में उभरेगा, जहाँ प्रौद्योगिकी का उपयोग लोगों के जीवन को आसान, सुरक्षित और समृद्ध बनाने के लिए किया जाएगा।

यह रिपोर्ट मूल रुप से गुजराती में प्रार्थना अमीन ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

जन-जन के मन में बसा मोदी-शाह का UP-YOGI अस्त्र, इसलिए हिंदुओं को बाँटने के लिए गढ़ी जा रही ‘मनोहर कहानियाँ’

2017 में जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे आए और BJP को बंपर जीत मिली तो कई ‘बुद्धिजीवियों’ को यह भरोसा नहीं था कि पार्टी सांसद योगी आदित्यनाथ को प्रदेश का मुख्यमंत्री बना सकती है। हालाँकि, कई ‘बुद्धिजीवियों’ का सपना टूट गया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन BJP प्रमुख अमित शाह ने योगी को UP की कमान देने का फैसला कर लिया क्योंकि वो सर्वे में लोगों के बीच सबसे लोकप्रिय थे। आज तक भी ऐसे ‘बुद्धिजीवियों’ का वर्ग PM मोदी, CM योगी और गृह मंत्री शाह के बीच फूट दिखाने की कोशिश करता है लेकिन ये खयाली पुलाव सच से कोसों दूर हैं।

PM मोदी और CM योगी के बीच मतभेद की मनगढ़ंत खबरें फैलाने वाले भूल जाते हैं कि योगी, प्रधानमंत्री मोदी की पसंद से ही राज्य के मुख्यमंत्री हैं। उनका CM योगी को पूरा समर्थन है और रैलियों-सभाओं में जिस तरह वो योगी सरकार के कामकाज की तारीफ करते हैं उसमें यह साफ नजर आता है। 2024 में अलीगढ़ में एक रैली के दौरान पीएम मोदी ने योगी आदित्यनाथ को अपना साथी बताते हुए कहा था, ‘मैं गर्व की अनुभूति करता हूँ कि मेरे पास ऐसे साथी हैं।’ क्या वाकई मतभेद होने पर इस तरह से कोई सार्वजनिक मंच से तारीफ करेगा लेकिन इतनी सी यह बात इन बुद्धिजीवियों को समझ नहीं आती है।

वो प्रधानमंत्री मोदी ही हैं जिन्होंने मंच से ‘यूपी प्लस योगी (UP+Yogi), जो बहुत है उपयोगी’ जैसा नारा दिया था। योगी सरकार में जिस तरह उत्तर प्रदेश विकास के पथ पर बढ़ा है, एक्सप्रेसवे से लेकर इन्वेस्टमेंट तक और शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य तक, जिस तरह यूपी में विकास हुआ है उसकी तारीफ प्रधानमंत्री हर मंच से करते हैं। यूपी की कानून व्यवस्था हो या बेटियों की सुरक्षा, प्रधानमंत्री ने अलग-अलग मंचों से दर्जनों बार योगी सरकार के कामकाज की तारीफ की है। खुद इन ‘बुद्धिजीवियों’ को कभी ऐसा मौका नहीं मिला जहाँ PM मोदी ने मुख्यमंत्री के बारे में कुछ आलोचनात्मक जैसा भी बोला हो फिर भी ये खयाली पुलाव पकाते रहते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी के अलावा सीएम योगी का शाह से भी 36 का आँकड़ा दिखाने की कोशिश की जाती है। इन तथाकथित ‘बुद्धिजीवियों’ ने इसके लिए एक कहानी भी रच ली है कि शाह और योगी के बीच प्रधानमंत्री पद को लेकर लड़ाई है। प्रधानमंत्री मोदी के पद पर होते हुए भी यह कहानी परोसने की कोशिश की जाती है क्योंकि इसके अलावा इनके पास दोनों के बीच भेद दिखाने का कोई ठोस तर्क नहीं है। हालाँकि, जिस तरह खुद शाह CM योगी और उनकी सरकार की जमकर तारीफ करते हैं उससे भी इनकी दाल गलती नहीं लगती है।

प्रधानमंत्री मोदी के अलावा सीएम योगी का शाह से भी 36 का आँकड़ा दिखाने की कोशिश की जाती है। इन तथाकथित ‘बुद्धिजीवियों’ ने इसके लिए एक कहानी भी रच ली है कि शाह और योगी के बीच प्रधानमंत्री पद को लेकर लड़ाई है। प्रधानमंत्री मोदी के पद पर होते हुए भी यह कहानी परोसने की कोशिश की जाती है क्योंकि इसके अलावा इनके पास दोनों के बीच भेद दिखाने का कोई ठोस तर्क नहीं है। हालाँकि, जिस तरह खुद शाह CM योगी और उनकी सरकार की जमकर तारीफ करते हैं उससे भी इनकी दाल गलती नहीं लगती है।

2019 में लखनऊ में निवेश समिट के दौरान अमित शाह ने एक किस्सा सुनाया था। शाह ने योगी को मुख्यमंत्री बनाए जाने को लेकर कहा था, “कई लोगों के फोन आए, उन्होंने कहा कि जो कभी मंत्री नहीं रहा, नगर निगम तक में कोई जिम्मेदारी नहीं निभाई, योगी जी संन्यासी आदमी, उन्हें आप इतने बड़े राज्य की कमान सौंपने जा रहे हो। पार्टी ने उन्हें यह जिम्मेदारी दी और योगी जी ने अपनी नियुक्ति को सही ठहराया है।” अगस्त 2022 में भोपाल में मध्य क्षेत्रीय परिषद की एक बैठक में अमित शाह ने कहा था, “लंबे अरसे बाद UP में कानून व्यवस्था लागू की गई थी।”

मई 2024 में अमित शाह ने CM योगी की तारीफ करते हुए कहा था कि ‘योगी ने स्वच्छता अभियान से मच्छरों को समाप्त किया। यह उनका स्टाइल है। इसी स्टाइल से उन्होंने माफिया भी खत्म कर दिए’। अभी कुछ दिनों पहले जनवरी 2026 में भी शाह ने योगी सरकार की जमकर तारीफ की थी। उन्होंने कहा था कि ‘केंद्र में प्रधानमंत्री मोदी और प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी के नेतृत्व में उल्लेखनीय कार्य हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश तेजी से विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है। राज्य में विभिन्न विकास परियोजनाओं को निरंतर रफ्तार दी जा रही है’।

2017 से 2016 तक कोई ऐसा मंच आपको नहीं दिखेगा, जहाँ पीएम मोदी या अमित शाह, CM योगी के नेतृत्व पर शंका करते भी दिखें। योगी आदित्यनाथ ने भी केंद्रीय नेतृत्व पर पूरा भरोसा जाताय है और उनकी उम्मीदों पर चलते हुए यूपी को एक नए रफ्तार दी है। जो सुरक्षित है, संवदेनशील है और विकास की दौड़ में सरपट भाग रहा है। मोदी, योगी और शाह के बीच की यह दूरी मनगढ़ंत है जो केवल कुछ ‘बुद्धिजीवियों’ के मन में है।

क्यों मोदी-शाह-योगी के बीच दरार डालना चाहते हैं बुद्धिजीवी?

अब जब सरकार के कामकाज पर सवाल नहीं उठा सकते, विकास के नाम पर नहीं घेर सकते, सरकारी स्तर पर भ्रष्टाचार लगभग खत्म हो चुका है, महिलाएँ पहले ही कहीं अधिक सुरक्षित हैं और माफिया राज से आगे बढ़कर UP भारत का ग्रोथ इंजन बन रहा है तो ऐसे में कपोल कल्पनाओं के जरिए लोगों के मन में शंकाएँ पैदा करने की कोशिश की जाती है।

उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय राजनीति की धुरी है। यहाँ की राजनीतिक स्थिरता या अस्थिरता का सीधा प्रभाव केंद्र की राजनीति पर पड़ता है। इसलिए राज्य सरकार की छवि को कमजोर करने की कोशिश के तौर पर बस योगी आदित्यनाथ पर अविश्वास की कहानियाँ ही बचती हैं, जो ये बुद्धिजीवी लिए फिरते हैं।

इसमें एक पक्ष प्रदेश के विकास से जुड़ा भी है। पिछले वर्षों में एक्सप्रेसवे, डिफेंस कॉरिडोर, मेडिकल कॉलेजों का विस्तार, निवेश सम्मेलनों और कानून-व्यवस्था में बदलाव जैसे कदमों को सरकार अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती रही है। इन पहलों के बीच सामाजिक या राजनीतिक असंतोष का वातावरण पैदा करने की कोशिश की जाती है ताकि नैरेटिव के जरिए इसे किसी तरह बाधित किया जा सके। जिस रफ्तार से यूपी विकास की पटरी पर दौड़ रहा है उसे रोका जा सके या उसमें अड़चन पैदा की जा सके।

हजारों कल्पनाओं, कहानियों के बीच ना तो यूपी का विकास रुका है, ना योगी सरकार की रफ्तार। ना केंद्र का भरोसा योगी के नेतृत्व पर हिलता भी दिखा है। प्रधानमंत्री मोदी के विकसित भारत के लक्ष्य को गति देने में योगी सबसे आगे हैं, शाह के देश को सुरक्षित बनाने के मिशन में यूपी आगे बढ़कर गुंडाराज को खत्म कर रहा है।

अंग्रेजों वाली साजिश रच रहा विपक्ष

योगी आदित्यनाथ का चेहरा किसी एक जाति या वर्ग का नहीं बल्कि पूरे हिंदू समाज को जोड़ने का प्रतीक है। जब कोई व्यक्ति संत का जीवन अपनाता है, तो वह अपनी जातिगत पहचान को पीछे छोड़ देता है। फिर भी विपक्ष द्वारा बार-बार उन्हें ‘ठाकुर’ या ‘बिष्ट’ कहकर संबोधित करना एक तरह से उनकी पुरानी पहचान को उभारना है, जिसे वे बहुत पहले त्याग चुके थे। ऐसा विपक्ष और वामपंथी लॉबी द्वारा जानबूझकर किया जाता है ताकि हिंदू समाज के भीतर जाति के आधार पर दूरी पैदा की जा सके।

जिस पहचान को CM योगी पीछे छोड़ चुके हैं उसे बार-बार उभारकर, बार-बार उनकी जातिगत पहचान को सामने लाकर वहीं कोशिश की जाती है जो अंग्रेज करते थे। यानी हिंदुओं को ‘बाँटो और राज करो’। योगी आदित्यनाथ, नरेंद्र मोदी और अमित शाह हिंदू समाज को एकजुट करने की बात करते हैं, इसलिए उनके विरोधी जातिगत पहचान को मुद्दा बनाकर एकता में दरार डालने की कोशिश करते हैं। ऐसी इसलिए भी है क्योंकि विकास या कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर योगी सरकार को घेरना मुश्किल है तो जाति का मुद्दा उठाकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की जाती है।

अखिलेश की सरकार के समय कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब थी। महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सवाल उठते थे, विकास कार्य ठप पड़े थे और सरकारी भर्तियों से लेकर सरकारी महकमों में जमकर भ्रष्टाचार के आरोप लगते थे। ऐसे में मौजूदा योगी सरकार ने इन क्षेत्रों में सुधार किया है, इसलिए अब विपक्ष के पास सीधे मुद्दों पर हमला करने की गुंजाइश कम है। इस वजह से वे सामाजिक विभाजन की राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं।

अगर इस विभाजन की कोशिश से हिंदू बँटता है, तो फिर वही स्थिति होगी। सरकार अगर बदलेगी तो दलितों के उत्पीड़न से लेकर महिलाओं की असुरक्षा जैसी स्थिति बन जाएगी। विकास की जिस रफ्तार पर यूपी आगे बढ़ रहा है वो फिर ठप हो जाएगी। हालाँकि, लोग भी इन ‘बुद्धिजीवियों’ के इस नैरेटिव को समझते हैं, उन्होंने योगी सरकार पर भरोसा दिखाया है और अब जब आगे वो अपने लिए नेतृत्व का चयन करेंगे तो इन सभी बातों का खयाल भी उनके मन में रहेगा।

रमजान शुरू होते ही फिर कट्टरपंथियों के निशाने पर हिंदू, 3 राज्यों में शोभायात्राओं में चलाए पत्थर-जूते-चप्पल: पहले भी लव जिहाद-हत्या-धर्मांतरण और मंदिरों पर हमलों का रहा इतिहास

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में, जहाँ ‘सर्वधर्म समभाव’ को संविधान की आत्मा माना गया है, वहाँ एक बेहद डरावना और सुनियोजित ‘पैटर्न’ उभरकर सामने आता है। यह विचार आज करोड़ों हिंदुओं के मन में घर कर रहा है कि क्या उनके त्यौहार और महापुरुषों की जयंतियाँ अब कट्टरपंथियों की दया पर निर्भर हैं? विडंबना देखिए कि जैसे ही रमजान का महीना शुरू होता है, देश के विभिन्न हिस्सों से हिंदुओं पर हमलों की खबरें बाढ़ की तरह आने लगती हैं।

चाहे वह छत्रपति शिवाजी महाराज की शोभायात्रा हो, मर्यादा पुरुषोत्तम राम की नवमी हो या सावन की पावन काँवड़ यात्रा… इन सभी पर होने वाली पत्थरबाजी और हिंसा महज कोई ‘तात्कालिक गुस्सा’ नहीं है। यह हिंदुओं के प्रति गहरी घृणा और उनके नागरिक अधिकारों को कुचलने की एक दीर्घकालिक और खतरनाक साजिश का हिस्सा है। कट्टरपंथियों की यह मानसिकता कि ‘मस्जिद के सामने से हिंदू जुलूस नहीं निकल सकता’, भारत के लोकतंत्र और अखंडता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।

कर्नाटक में शिवाजी जयंती पर पथराव: जब रक्षक ही बना निशाना

कर्नाटक के बागलकोट से आई खबरें और भी भयावह हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती के अवसर पर निकाले गए जुलूस पर तब हमला किया गया जब वह पंका मस्जिद के सामने से गुजर रहा था। कट्टरपंथियों ने मस्जिद की ओर से चप्पलें और पत्थर बरसाए

इस हमले की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिले के पुलिस अधीक्षक (SP) सिद्धार्थ गोयल के सिर और गर्दन पर चोट आई। उनकी वर्दी पर खून के धब्बे इस बात के गवाह थे कि कट्टरपंथियों के मन में कानून और व्यवस्था का कोई डर शेष नहीं रहा है।

बागलकोट की इस घटना में यह आरोप लगाया गया कि मस्जिद के बाहर डीजे की आवाज तेज थी। क्या डीजे की आवाज का समाधान पत्थरबाजी है? पुलिस के अनुसार, जुलूस जब मस्जिद के पास रुका, तभी विवाद बढ़ा और मस्जिद के भीतर से पत्थर फेंके गए। बाद में उग्र माहौल में कुछ ठेलों में आग भी लगा दी गई।

यह पूरी घटना दिखाती है कि कैसे एक ऐतिहासिक महापुरुष के सम्मान में निकाले जा रहे जुलूस को ‘संवेदनशील इलाके’ के नाम पर निशाना बनाया जाता है। जब पुलिस का सबसे बड़ा अधिकारी ही सुरक्षित नहीं है, तो आम हिंदू श्रद्धालु की सुरक्षा की कल्पना करना कठिन है।

मध्य प्रदेश: दुर्गा मंदिर पर प्रहार और जबलपुर का तनाव

जबलपुर के संवेदनशील सिहोरा तहसील में जो हुआ, वह कट्टरपंथी मानसिकता का एक ज्वलंत उदाहरण है। गुरुवार (19 फरवरी) की रात जब हिंदू समाज अपनी परंपरा के अनुसार दुर्गा मंदिर में शाम की आरती कर रहा था, उसी समय पास की मस्जिद में नमाज का समय भी था।

विवाद तब शुरू हुआ जब एक युवक ने कथित तौर पर मंदिर की ग्रिल को नुकसान पहुँचाया। यह घटना केवल संपत्ति के नुकसान की नहीं थी, बल्कि यह हिंदुओं की श्रद्धा पर सीधा हमला था। जब स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया, तो देखते ही देखते कट्टरपंथी समूह ने पत्थरबाजी शुरू कर दी, जिससे पूरा इलाका सांप्रदायिक तनाव की आग में झुलस गया।

जिला प्रशासन और पुलिस को स्थिति संभालने के लिए हल्का बल प्रयोग करना पड़ा और भारी सुरक्षा बल तैनात करना पड़ा। पुलिस ने 20 उपद्रवियों को हिरासत में लिया है, लेकिन सवाल वही खड़ा है… क्या एक ही समय पर आरती और नमाज का होना हिंसा का बहाना बन सकता है?

यह घटना दर्शाती है कि कैसे कट्टरपंथी तत्व हिंदुओं की धार्मिक गतिविधियों को बर्दाश्त करने के बजाय उसे विवाद का रूप देकर हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। मंदिर की ग्रिल तोड़ना और फिर संगठित होकर पत्थरबाजी करना एक डराने वाले भविष्य की ओर इशारा करता है।

आंध्र प्रदेश और हैदराबाद: ‘मंदिर बनाएँगे’ के नारों पर कट्टरपंथियों का बवाल

हैदराबाद के अंबरपेट इलाके में भी शिवाजी जयंती के जुलूस के दौरान कट्टरपंथियों ने मोर्चा खोल दिया। जब जुलूस एक मस्जिद के पास से गुजर रहा था, तब वहाँ मौजूद लोगों ने संगीत और ‘मंदिर बनाएँगे’ जैसे गानों पर कड़ी आपत्ति जताई।

आपत्ति धीरे-धीरे तीखी बहस और धक्का-मुक्की में बदल गई। कट्टरपंथी तत्वों का यह दावा कि हिंदू गानों से उनकी प्रार्थना में खलल पड़ता है, अक्सर हिंदू सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को दबाने का एक जरिया बन जाता है।

इस घटना के बाद शहर में तनाव इतना बढ़ गया कि प्रशासन को अगले चार दिनों के लिए धारा 144 लागू करनी पड़ी और 8 लोगों को गिरफ्तार किया गया। यह विडंबना ही है कि जिस देश में हजारों लाउडस्पीकरों से दिन में पाँच बार आवाजें गूँजती हैं, वहाँ साल में एक बार निकलने वाले हिंदू जुलूस के डीजे और गानों पर इतना बवाल खड़ा कर दिया जाता है। यह कट्टरपंथियों की उस मानसिकता को उजागर करता है जो सार्वजनिक स्थानों पर केवल अपनी धार्मिक प्रधानता चाहती है और दूसरे धर्म के प्रतीकों को बर्दाश्त नहीं कर पाती।

रमजान 2025 का काला इतिहास: 70 घटनाओं का खूनी लेखा-जोखा

पुरानी रिपोर्टों और आँकड़ों पर नजर डालें तो रमजान के महीने में कट्टरपंथियों का असली चेहरा और भी भयावह होकर सामने आता है। मार्च 2025 के दौरान भारत और बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ अपराधों की एक लंबी फेहरिस्त तैयार हुई, जो कट्टरपंथियों की अटूट नफरत को दर्शाती है।

हत्या और मॉब लिंचिंग: बिहार के सारण में राकेश कुमार (18) की वकील शाह और शकील ने चाकू मारकर हत्या कर दी। दिल्ली के वजीरपुर में 65 साल के राधेश्याम को इरशाद ने मौत के घाट उतार दिया। यहाँ तक कि नागपुर में 1000 से ज्यादा की भीड़ ने केवल ‘अफवाह’ पर हिंदुओं के घरों और 40 गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया।

होली और कीर्तन पर प्रहार: मुरादाबाद में मंदिर में कीर्तन कर रहे हिंदुओं पर असलम और शरीफ जैसे लोगों ने हमला किया। होली के पावन अवसर पर वाराणसी, गिरिडीह और लुधियाना में कट्टरपंथियों ने डीजे और गुलाल का विरोध करते हुए पत्थर और बोतल बमों से हमला किया। यह दर्शाता है कि हिंदुओं के हर त्यौहार को ‘अपराध’ की तरह देखा जाता है।

इन घटनाओं में एक बात सामान्य है ‘साजिश’। चाहे वह मुजफ्फरनगर में हिंदू लड़के का जबरन खतना कराना हो या नागपुर में सुनियोजित तरीके से दंगा भड़काना, कट्टरपंथी कभी अपनी मानसिकता नहीं बदलते। वे हर उस अवसर का लाभ उठाते हैं जहाँ वे हिंदू समाज को चोट पहुँचा सकें।

‘लव जिहाद’ और महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराध

हिंदुओं के खिलाफ चल रही इस साजिश का एक सबसे घिनौना हिस्सा ‘लव जिहाद’ है। रमजान के दौरान भी कट्टरपंथियों ने हिंदू बेटियों को अपना शिकार बनाने का धंधा जारी रखते हैं। दिल्ली के सीमापुरी में आसिफ ने कोमल की हत्या कर दी, तो बाराबंकी और बरेली में हिंदू लड़कियों को अगवा कर धर्मांतरण के लिए मजबूर किया गया। देहरादून में नदीम ने ‘नवीन’ बनकर हिंदू लड़की से शादी की और धोखा दिया। ये घटनाएँ साबित करती हैं कि पहचान छिपाकर हिंदू समाज की जड़ों को खोखला करने का काम युद्ध स्तर पर चल रहा है।

इतना ही नहीं, बच्चों और बुजुर्गों को भी नहीं बख्शा गया। बिहार के गोपालगंज में 80 साल की बुजुर्ग महिला के साथ सैय्यद अली और उसके साथियों ने जो दरिंदगी की, उसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया। नवी मुंबई में मोहम्मद अंसारी ने दो मासूम बच्चियों की हत्या कर दी। कट्टरपंथियों की यह घृणा इतनी गहरी है कि वे अब मासूमों के खून से भी परहेज नहीं कर रहे हैं। स्कूलों में हिंदू छात्राओं से छेड़खानी (सूरजपुर मामला) और धर्मांतरण का दबाव (भोपाल और झाँसी मामले) यह बताने के लिए काफी है कि हिंदू समाज के खिलाफ चौतरफा मोर्चा खोला गया है।

मंदिरों को अपवित्र करने और रेल पलटाने की साजिशें

कट्टरपंथ की यह आग केवल सड़कों तक सीमित नहीं है, यह हिंदुओं के आराध्य और सार्वजनिक सुरक्षा तक पहुँच चुकी है। कर्नाटक के बेलगावी में याशिर ने केवल इसलिए मंदिर पर पत्थर फेंके क्योंकि उसे ‘मंदिर देखकर गुस्सा‘ आता था। पश्चिम बंगाल में शीतला मंदिर में आगजनी और मूर्तियों को तोड़ना अब एक आम घटना बनती जा रही है। ये हमले केवल ईंट-पत्थर के ढाँचे पर नहीं, बल्कि हिंदू मानबिंदुओं पर चोट करने के लिए किए जाते हैं।

सबसे खतरनाक बात यह है कि कट्टरपंथी अब ‘जिहाद’ के नए तरीके अपनाते हैं। गाजियाबाद में शावेज और इस्रार जैसे लोग जागरण और होटलों में रोटियों पर थूकते पकड़े गए। यह केवल घृणा नहीं, बल्कि हिंदुओं की आस्था को भ्रष्ट करने का निकृष्टतम प्रयास है। यहाँ तक कि उत्तर प्रदेश के हरदोई में इबादुल्लाह और अनवारुल जैसे किशोरों ने रेल की पटरी पर बोल्ट रखकर ट्रेन पलटाने की कोशिश की। यह साफ़ संकेत है कि कट्टरपंथ अब केवल मजहबी नहीं रहा, बल्कि यह सीधे-सीधे देश के खिलाफ युद्ध (Terrrorism) के स्तर पर पहुँच चुका है।

क्या हिंदू अपने ही देश में ‘दोयम दर्जे’ का नागरिक है?

इन तमाम घटनाओं और रिपोर्टों पर अगर निष्पक्ष रूप से विचार किया जाए, तो एक डरावनी सच्चाई सामने आती है। भारत में एक ऐसा ‘इको-सिस्टम’ खड़ा हो गया है जो हिंदुओं को उनके ही घर में असुरक्षित महसूस कराने के लिए दिन-रात काम कर रहा है। कट्टरपंथियों की मानसिकता सदियों से नहीं बदली है। वे आज भी उसी मध्यकालीन सोच में जी रहे हैं जहाँ ‘काफिरों’ के त्यौहारों को रोकना वे अपना मजहबी कर्तव्य समझते हैं। रमजान के दौरान शांति और इबादत की दुहाई दी जाती है, लेकिन उसी महीने में हिंदुओं का खून सबसे ज्यादा बहाया जाता है।

यह हिंदुओं के खिलाफ एक गहरी और स्थायी साजिश है। कट्टरपंथी जानते हैं कि वे संगठित हैं और उन्हें ‘सेक्युलर’ राजनीति का संरक्षण प्राप्त है। जब शिवाजी महाराज की जयंती पर पत्थर चलते हैं, तो यह केवल एक जुलूस पर हमला नहीं है, बल्कि यह भारत के शौर्य और इतिहास पर हमला है। जब काँवड़ यात्रा को रोका जाता है, तो यह करोड़ों हिंदुओं की आस्था का अपमान है। प्रशासन को अब यह समझना होगा कि ‘तुष्टीकरण’ की नीति ने कट्टरपंथियों के हौसले इतने बढ़ा दिए हैं कि वे अब पुलिस अधिकारियों पर हमला करने से भी नहीं हिचकिचाते।

अगर आज हिंदू समाज अपनी सुरक्षा और सम्मान के लिए खड़ा नहीं हुआ, तो आने वाले समय में अपने त्यौहारों को मनाना भी दूभर हो जाएगा। कट्टरपंथियों की यह मानसिकता बदलने वाली नहीं है। उन्हें केवल ‘कानून के डंडे’ से ही सुधारा जा सकता है। यह देश का दुर्भाग्य है कि जहाँ दीपावली पर प्रदूषण की बात होती है, वहीं रमजान के दौरान होने वाली सरेआम हिंसा पर कथित बुद्धिजीवी मौन धारण कर लेते हैं। अब समय आ गया है कि इन कट्टरपंथी साजिशों का पर्दाफाश किया जाए और हिंदुओं को उनके अपने ही देश में गरिमा के साथ जीने का अधिकार सुनिश्चित किया जाए।

‘मुद्दाहीन नंगपन का प्रदर्शन’: AI समिट में शर्टलेस प्रदर्शन पर यूथ कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं को लोगों ने पीटा, नेताओं से लेकर नेटिजन्स ने जमकर लगाई क्लास

दिल्ली के भारत मंडप में चल रहे इंडिया AI इम्पैक्ट समिट में यूथ कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं के प्रदर्शन को लेकर हंगामा हो रहा है। BJP से लेकर आम लोग और नेटिजन्स तक यूथ कॉन्ग्रेस की इस हरकत पर भड़के हुए हैं। वहीं, पुलिस ने इस मामले में कुछ कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया है और उनके खिलाफ कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। कुछ वीडियोज में दावा किया जा रहा है कि मौके पर मौजूद आम लोगों ने भी यूथ कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं को आड़े हाथ लिया है।

यूथ कॉन्ग्रेस का शर्टलेस हंगामा

कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद यूथ कॉन्ग्रेस के कुछ कार्यकर्ता AI समिट में प्रवेश करने में सफल रहे। शुक्रवार (20 फरवरी 2026) दोपहर करीब 12:30 बजे हुई इस घटना में प्रदर्शनकारियों ने पहले क्यूआर कोड के माध्यम से रजिस्ट्रेशन कराया और इसके बाद कार्यक्रम स्थल के भीतर पहुँच गए। वे स्वेटर और जैकेट पहनकर अंदर आए थे, जिससे उन पर किसी का विशेष ध्यान नहीं गया।

हाल नंबर 5 के लॉबी क्षेत्र में पहुंचने के बाद उन्होंने अपने स्वेटर और जैकेट उतार दिए और टी-शर्ट हटाकर अचानक प्रदर्शन करना शुरू कर दिया। स्थिति को भांपते हुए सुरक्षा कर्मियों ने तुरंत हस्तक्षेप किया, प्रदर्शनकारियों को काबू में लिया और हालात को सामान्य कर दिया।

हिरासत में लिए गए यूथ कॉन्ग्रेस के नेता

यूथ कॉन्ग्रेस के इस हंगामे के बाद संगठन से जुड़े कुछ लोगों को हिरासत में लिया गया है और अन्य लोगों को पहचान की जा रही है। नई दिल्ली जिले के पुलिस उपायुक्त देवेश कुमार महला ने बताया कि हिरासत में लिए गए लोगों में बिहार के 35 वर्षीय कृष्णा शामिल हैं, जो इंडियन यूथ कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय सचिव हैं। उनके साथ बिहार के ही 33 वर्षीय कुंदन यादव, जो प्रदेश सचिव हैं, को भी पकड़ा गया है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के अजय कुमार, जो प्रदेश उपाध्यक्ष हैं, और तेलंगाना के महबूबनगर से नरसिम्हा यादव, जो राष्ट्रीय समन्वयक हैं, भी हिरासत में लिए गए हैं।

BJP ने बोला तीखा हमला

इस प्रदर्शन पर बीजेपी ने तीखा हमला बोला है। कई केंद्रीय मंत्रियों से लेकर बीजेपी प्रवक्ताओं ने यूथ कॉन्ग्रेस से लेकर राहुल गाँधी तक को आड़े हाथों लिया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इसे भारत की प्रतिष्ठा को धूमिल करने का प्रयास बताया है। उन्होंने X पर एक पोस्ट में लिखा, “कॉन्ग्रेस ने देश का सम्मान बढ़ाने के बजाय आयोजन में व्यवधान उत्पन्न करने का रास्ता चुना है। यूथ कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा जिस शर्मनाक तरीके से कार्यक्रम स्थल पर अनुचित व्यवहार करते हुए हंगामा किया गया है वह न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि भारत की प्रतिष्ठा को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर धूमिल करने का प्रयास भी है।मैं कॉन्ग्रेस के इस कृत्य की भर्त्सना करता हूँ।”

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी कॉन्ग्रेस पर तीखा हमला बोला है। शिवराज सिंह ने कहा, “कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने एआई समिट में सिर्फ अपनी शर्ट ही नहीं उतारी, बल्कि यह भी दिखा दिया कि कॉन्ग्रेस देश के खिलाफ सोच रखती है। यह देशद्रोह है। यह हमारे देश की छवि के साथ खिलवाड़ है।” उन्होंने आगे कहा, “मैं सोनिया गाँधी जी और मल्लिकार्जुन खरगे जी से पूछना चाहता हूँ कि क्या उनके लिए राजनीति देश से बड़ी है? क्या उन्होंने देश की प्रतिष्ठा से खेलने के लिए कोई गुप्त समझौता किया है? क्या यही कॉन्ग्रेस का असली चेहरा है? जनता इसे कभी माफ नहीं करेगी।”

यूथ कॉन्ग्रेस के प्रदर्शन पर बीजेपी सांसद संबित पात्रा ने कहा, “राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस पार्टी सबसे बड़े देशद्रोही हैं। जब भी देश आगे बढ़ता है, जब भी देश में खुशी का माहौल होता है, ये उसे बिगाड़ने का काम करते हैं। ये लोग देश के गद्दार हैं। कॉन्ग्रेस के लिए मेरे पास सिर्फ तीन शब्द हैं – टॉपलेस, ब्रेनलेस, शेमलेस।” उन्होंने कहा कि इस प्रदर्शन की साजिश राहुल गाँधी, सोनिया गाँधी और प्रियंका गाँधी की मौजूदगी में, राहुल गाँधी के निवास स्थान पर रची गई थी।

मुद्दाहीन नंगपन का प्रदर्शन: कुमार विश्वास

कवि कुमार विश्वास ने इस प्रदर्शन पर कॉन्ग्रेस पर हमला बोला है। कुमार विश्वास ने X पर लिखा, “एक अंतराष्ट्रीय मंच पर जहाँ विश्व भर के सबसे महनीय मेहमानों के सामने देश अपनी तकनीकी-शक्ति को सिद्ध करने पर जुटा पड़ा है, वहाँ देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ ये नंगा प्रदर्शन वस्तुतः विपक्ष के मुद्दाहीन नंगपन का प्रदर्शन है। दुःखद है कि कॉन्ग्रेस जैसी पुरानी व वैचारिक रूप से पकी हुई पार्टी में मुद्दों का इतना भीषण अकाल आ पड़ा है, आपसे न हो पाएगा भाई।”

आम लोगों ने यूथ कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं को पीटा

इस दौरान समिट में मौजूद लोगों से भी यूथ कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं की झड़प हो गई और सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही वीडियो में दावा किया जा रहा है कि लोगों ने यूथ कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं की पिटाई भी की है।

सामने आए एक वीडियो में कुछ लोग कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं के साथ हाथापाई करते और मारपीट करते नजर आ रहे हैं।

नेटिजन्स और लोगों ने भी लगाई कॉन्ग्रेस की क्लास

नेटिजन्स ने भी कॉन्ग्रेस के इस हरकत पर जमकर गुस्सा निकाला है। X यूजर्स ने इस हरकत को बेशर्म और वैश्विक मंच पर देश का अपमान करने की कोशिश बताया है। एक X यूजर ने लिखा, “ऋषियों की यज्ञ अग्नि में मांस फेंकते राक्षस”। एक अन्य ने लिखा, “देश के युवाओं को तकनीक, नवाचार और अवसर चाहिए न कि राजनीतिक स्टंट। भारत AI में आगे बढ़ रहा है और यही भविष्य है। यूथ कॉन्ग्रेस एक देशद्रोही संगठन है, नीचता की हद होती है।”

एक अन्य यूजर ने लिखा, “तुम जैसे गद्दारों को शर्म आनी चाहिए। देश को बदनाम करने की राजनीति करने वालों को शर्म आनी चाहिए। हर मंच पर भारत की उपलब्धियों को छोटा दिखाना, दुनिया के सामने अपने ही देश की छवि खराब करना। ये स्वस्थ विपक्ष नहीं, राष्ट्र के साथ अन्याय है। इतना अहंकार? शर्म आनी चाहिए।”

कार्यक्रम में शामिल और प्रदर्शन के प्रत्यक्षदर्शी रहे लोगों ने भी यूथ कॉन्ग्रेस को आड़े हाथों लिया है। एक प्रत्यक्षदर्शी ने कहा, “एक विजिटर के रूप में मुझे लगता है कि इस तरह का प्रदर्शन करने के लिए यह सही जगह नहीं है। इससे देश की छवि खराब होती है। जहाँ भारत एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम की मेजबानी कर रहा हो और AI जैसे विषय पर चर्चा हो रही हो, वहाँ विरोध करना ठीक नहीं है। ऐसा प्रदर्शन नहीं होना चाहिए।”

एक अन्य ने कहा, “यह विरोध करने का मंच नहीं है। AI भारत और उसके भविष्य के लिए है। उन्हें यहाँ प्रदर्शन नहीं करना चाहिए था। उन्हें इस मंच की गरिमा को समझना चाहिए।”

विरोध का हक लेकिन क्या ये तरीका सही?

AI समिट जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम में यूथ कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया प्रदर्शन कई मायनों में गलत और दुर्भाग्यपूर्ण है। सबसे पहली बात यह कार्यक्रम किसी एक राजनीतिक दल का नहीं था बल्कि देश और दुनिया से जुड़े विशेषज्ञों, उद्यमियों और प्रतिनिधियों का मंच था। ऐसे मंच पर हंगामा करना न सिर्फ आयोजन की गरिमा को ठेस पहुँचाता है बल्कि देश की छवि पर भी नकारात्मक असर डालता है।

लोकतंत्र में विरोध करना हर नागरिक और राजनीतिक दल का अधिकार है। लेकिन विरोध का भी एक तरीका और स्थान होता है। यदि किसी मुद्दे पर असहमति है, तो उसके लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस, शांतिपूर्ण धरना या ज्ञापन जैसे कई वैधानिक और सभ्य रास्ते उपलब्ध हैं। किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजन के बीच अचानक इस तरह प्रदर्शन करना अनुशासनहीनता को दर्शाता है।

इस घटना से सुरक्षा पर भी सवाल उठते हैं। जब कड़ी सुरक्षा के बावजूद लोग अंदर जाकर प्रदर्शन कर दें तो यह चिंता की बात है। इससे आगे होने वाले ऐसे कार्यक्रमों की व्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है। राजनीति में मतभेद होना सामान्य बात है। अलग-अलग विचार होना लोकतंत्र का हिस्सा है लेकिन हर मंच राजनीति के लिए नहीं होता। AI समिट जैसे कार्यक्रम देश की तरक्की और दुनिया के साथ सहयोग बढ़ाने के लिए होते हैं। ऐसे मौके पर विरोध करना अच्छा संदेश नहीं देता।

भारत ने US नेतृत्व वाले Pax Silica ग्रुप में ली एंट्री, सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में घटेगी चीनी निर्भरता: समझिए- कैसे खुद को भविष्य के लिए तैयार कर रहा हिंदुस्तान

वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के इस दौर में तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर और क्रिटिकल मिनरल्स किसी भी देश की ताकत का आधार बन चुके हैं। 21वीं सदी में जिस देश के पास मजबूत और सुरक्षित तकनीकी सप्लाई चेन होगी, वही आर्थिक, सामरिक और रणनीतिक रूप से आगे रहेगा।

इसी सोच के तहत अमेरिका के नेतृत्व में एक नया रणनीतिक गठबंधन खड़ा किया गया है, जिसका नाम है ‘पैक्स सिलिका (Pax Silica)’। इस पहल का मकसद है दुनिया भर में सिलिकॉन आधारित तकनीकों, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और जरूरी खनिजों की एक सुरक्षित, भरोसेमंद और मजबूत सप्लाई चेन तैयार करना।

अब भारत भी इस महत्वपूर्ण वैश्विक पहल का हिस्सा बन गया है। भारत शुक्रवार (20 फरवरी 2026) को अमेरिका के नेतृत्व वाले पैक्स सिलिका अलायंस में शामिल हुआ। दिल्ली में चल रही AI इम्पैक्ट समिट के दौरान भारत और अमेरिका ने घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए। भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भारत के प्रवेश को एक रणनीतिक घटनाक्रम बताया।

वहीं माइक्रोन टेक्नोलॉजी के CEO संजय मेहरोत्रा ​​ने कहा, “पैक्स सिलिका पहल US और भारत के बीच टेक्नोलॉजी कोलेबोरेशन को और करीब लाएगी।”

यह कदम भारत-अमेरिका संबंधों में नई मजबूती लाएगा और भारत को वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा में एक अहम खिलाड़ी बना देगा। इस फैसले का असर सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे भारत की अर्थव्यवस्था, तकनीकी विकास, सेमीकंडक्टर उद्योग और AI मिशन को भी जबरदस्त बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

क्या है ‘पैक्स सिलिका’ और इसकी पृष्ठभूमि?

‘पैक्स सिलिका’ शब्द दो लैटिन और वैज्ञानिक अवधारणाओं से मिलकर बना है। ‘Pax’ का अर्थ होता है शांति, स्थिरता और दीर्घकालिक समृद्धि, जबकि ‘Silica’ सिलिकॉन से जुड़ा है, जो कंप्यूटर चिप्स, सेमीकंडक्टर और AI तकनीक का मूल तत्व है। यानी यह पहल तकनीकी सप्लाई चेन के जरिए वैश्विक शांति, स्थिरता और आर्थिक समृद्धि सुनिश्चित करने की सोच पर आधारित है।

इस रणनीतिक गठबंधन की शुरुआत दिसंबर 2025 में अमेरिका ने की थी। 12 दिसंबर को वॉशिंगटन में आयोजित ‘पैक्स सिलिका समिट’ में कई देशों ने इस घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए। इसका उद्देश्य था, क्रिटिकल मिनरल्स, सेमीकंडक्टर, AI इंफ्रास्ट्रक्चर और उससे जुड़ी पूरी सप्लाई चेन को सुरक्षित, भरोसेमंद और नवाचार आधारित बनाना।

(फोटो साभार: ईटीवी भारत)

शुरुआत में इस पहल में अमेरिका के साथ ऑस्ट्रेलिया, ग्रीस, इजराइल, जापान, कतर, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात और यूनाइटेड किंगडम जैसे देश शामिल हुए। भारत को पहले चरण में इसमें शामिल नहीं किया गया था, जिससे कई तरह की अटकलें भी लगाई गईं।

हालाँकि पिछले महीने भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने औपचारिक रूप से नई दिल्ली को इस रणनीतिक गठबंधन में शामिल होने का न्योता दिया।

‘पैक्स सिलिका’ का उद्देश्य और वैश्विक महत्व

‘पैक्स सिलिका’ का मुख्य उद्देश्य दुनिया की तकनीकी सप्लाई चेन को किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता से मुक्त करना है। खासकर चीन पर निर्भरता कम करना इस पहल का एक अहम लेकिन अप्रत्यक्ष लक्ष्य माना जा रहा है। वर्तमान में दुनिया के करीब 70 प्रतिशत दुर्लभ खनिज (रेयर अर्थ मिनरल्स) का खनन अकेले चीन करता है।

यही खनिज सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, बैटरी, AI सर्वर और अत्याधुनिक तकनीकों के निर्माण में जरूरी होते हैं। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का मानना है कि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में आर्थिक दबाव, आपूर्ति संकट और राजनीतिक ब्लैकमेल जैसी स्थितियाँ पैदा कर सकती है।

इसलिए ‘पैक्स सिलिका’ के जरिए एक ऐसा नेटवर्क तैयार किया जा रहा है, जिसमें ऊर्जा, क्रिटिकल मिनरल्स, मैन्युफैक्चरिंग, सेमीकंडक्टर, AI मॉडल, डेटा सेंटर और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर तक पूरी सप्लाई चेन को सुरक्षित किया जा सके। इस पहल का एक और महत्वपूर्ण पहलू है भरोसेमंद तकनीक का विकास।

AI को एक परिवर्तनकारी शक्ति माना गया है, जो आने वाले दशकों में पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को नया आकार देगी। ऐसे में यह जरूरी है कि AI सिस्टम सुरक्षित हों, उनके दुरुपयोग की संभावना कम हो और वे किसी शत्रुतापूर्ण ताकत के नियंत्रण में न जाएँ। पैक्स सिलिका इसी सोच के तहत देशों को एक साझा मंच पर लाकर काम करने का अवसर देता है।

भारत की एंट्री का समय और रणनीतिक पृष्ठभूमि

भारत का इस गठबंधन में शामिल होना ऐसे समय पर हो रहा है, जब भारत और अमेरिका के रिश्ते एक बार फिर नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ रहे हैं। पिछले कुछ महीनों में दोनों देशों के बीच व्यापारिक टैरिफ, बाजार पहुँच और तकनीकी सहयोग को लेकर तनाव देखने को मिला था।

खासकर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीतियों के चलते दोनों देशों के रिश्तों में खटास आई थी। हालाँकि हाल के हफ्तों में दोनों पक्षों ने अंतरिम व्यापार समझौते को अंतिम रूप दिया है और कई अन्य रणनीतिक पहलों पर सहमति बनाई है।

इसी क्रम में भारत को ‘पैक्स सिलिका’ में शामिल किया जाना दोनों देशों के रिश्तों को नई ऊँचाई पर ले जाने वाला कदम माना जा रहा है। नई दिल्ली में आयोजित ‘इंडिया AI इम्पैक्ट समिट’ के दौरान इस साझेदारी को औपचारिक रूप दिया जाएगा। इस मौके पर अमेरिका के अंडर सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इकोनॉमिक अफेयर्स जैकब हेलबर्ग भी मौजूद हैं।

उनका साफ कहना है कि 20वीं सदी में दुनिया तेल और स्टील से चलती थी, जबकि 21वीं सदी में दुनिया कंप्यूटर, AI और सेमीकंडक्टर से चलेगी। ऐसे में भारत को इस रणनीतिक ढाँचे में शामिल करना अमेरिका की बड़ी प्राथमिकता है।

चीन फैक्टर और वैश्विक भू-राजनीति में ‘पैक्स सिलिका’ की भूमिका

हालाँकि अमेरिका यह कहता है कि ‘पैक्स सिलिका’ किसी देश के खिलाफ नहीं है, लेकिन वैश्विक विश्लेषकों का मानना है कि यह पहल मुख्य रूप से चीन की तकनीकी और खनिज प्रभुत्व को संतुलित करने के लिए लाई गई है।

चीन न सिर्फ दुर्लभ खनिजों के खनन में अग्रणी है, बल्कि सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स और बैटरी उत्पादन में भी उसकी पकड़ बेहद मजबूत है। इसके अलावा AI हार्डवेयर और सप्लाई चेन में भी चीन की बड़ी हिस्सेदारी है।

अमेरिका और उसके सहयोगी देश इसे ‘कोएर्सिव डिपेंडेंसी’ यानी जबरन निर्भरता मानते हैं। उनका तर्क है कि यदि किसी संकट के समय चीन सप्लाई रोक दे या कीमतें बढ़ा दे, तो पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था हिल सकती है। इसी कारण पैक्स सिलिका के जरिए वैकल्पिक और भरोसेमंद सप्लाई चेन तैयार की जा रही है।

चीन ने इस पहल पर संयमित प्रतिक्रिया दी है, लेकिन उसके सरकारी मीडिया ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने इसे चीन को वैश्विक सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन से अलग करने की कोशिश बताया है और चेतावनी दी है कि इससे लागत बढ़ेगी और वैश्विक बाजार अस्थिर हो सकता है।

भारत को क्या-क्या फायदे होंगे: तकनीक, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा

भारत के लिए ‘पैक्स सिलिका’ में शामिल होना कई स्तरों पर फायदेमंद साबित हो सकता है। सबसे बड़ा लाभ भारत के तेजी से बढ़ते तकनीकी बाजार को मिलेगा। भारत में डिजिटल क्रांति, 5G नेटवर्क, डेटा सेंटर, क्लाउड कंप्यूटिंग और AI आधारित सेवाओं की माँग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में भरोसेमंद और सस्ती सप्लाई चेन तक पहुँच भारत की विकास गति को और तेज कर सकती है।

सेमीकंडक्टर क्षेत्र में भारत अभी शुरुआती दौर में है। सरकार ने ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन’ के तहत देश में चिप मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने की योजना बनाई है। पैक्स सिलिका के जरिए भारत को अत्याधुनिक तकनीक, निवेश और विशेषज्ञता तक पहुँच मिलेगी, जिससे देश में सेमीकंडक्टर फैब्स, पैकेजिंग यूनिट्स और AI हार्डवेयर निर्माण को गति मिलेगी।

AI के क्षेत्र में भी यह साझेदारी भारत के लिए गेम चेंजर साबित हो सकती है। अमेरिकी कंपनियाँ पहले ही भारत में बड़े पैमाने पर निवेश कर रही हैं। गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, ओपनएआई और अन्य दिग्गज कंपनियों की दिलचस्पी भारत में AI इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने में बढ़ रही है।

पैक्स सिलिका के तहत भारत को एडवांस्ड AI चिप्स, डेटा सेंटर टेक्नोलॉजी और अनुसंधान सहयोग मिल सकता है, जिससे भारत वैश्विक AI रेस में तेजी से आगे बढ़ सकेगा।

इसके अलावा चीन पर निर्भरता कम होना भी भारत के लिए एक बड़ा रणनीतिक लाभ है। खासकर टेलीकॉम, इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर पैनल और बैटरी जैसे क्षेत्रों में भारत चीन से आयात पर काफी निर्भर है। पैक्स सिलिका के तहत वैकल्पिक सप्लाई चेन विकसित होने से भारत को आत्मनिर्भर बनने में मदद मिलेगी।

सुरक्षा के लिहाज से भी यह पहल बेहद अहम है। संवेदनशील तकनीकों की सुरक्षा, साइबर इंफ्रास्ट्रक्चर की मजबूती और डिजिटल नेटवर्क की विश्वसनीयता भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे जुड़ी है। इस गठबंधन से भारत को सुरक्षित और भरोसेमंद डिजिटल इकोसिस्टम बनाने में मदद मिलेगी।

भविष्य की दिशा और भारत की भूमिका

पैक्स सिलिका केवल एक तकनीकी गठबंधन नहीं है, बल्कि यह भविष्य की वैश्विक व्यवस्था की नींव रखने की कोशिश है। जिस तरह 20वीं सदी में तेल आधारित गठबंधन वैश्विक राजनीति को प्रभावित करते थे, उसी तरह 21वीं सदी में सिलिकॉन, AI और सेमीकंडक्टर आधारित गठबंधन नई भू-राजनीति को आकार देंगे।

भारत की इसमें भागीदारी उसे सिर्फ उपभोक्ता नहीं, बल्कि एक प्रमुख निर्माता और इनोवेशन हब बनने का अवसर देगी। भारत के पास विशाल मानव संसाधन, मजबूत आईटी सेक्टर, बढ़ता स्टार्टअप इकोसिस्टम और तेजी से विकसित होता डिजिटल बाजार है।

यदि इन सभी ताकतों का सही उपयोग किया गया, तो भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक AI और सेमीकंडक्टर हब बन सकता है।

हालाँकि इसके साथ चुनौतियाँ भी हैं। अन्य देशों की तुलना में भारत के पास अभी सीमित खनिज संसाधन और अत्याधुनिक मैन्युफैक्चरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर है। ऐसे में भारत को अपने हितों की रक्षा करते हुए इस गठबंधन में संतुलित भूमिका निभानी होगी, ताकि वह केवल बाजार न बनकर एक मजबूत उत्पादन और तकनीकी शक्ति के रूप में उभर सके।

भारत का ‘पैक्स सिलिका’ में शामिल होना केवल एक कूटनीतिक कदम नहीं, बल्कि देश के तकनीकी और आर्थिक भविष्य की दिशा तय करने वाला फैसला है। यह पहल भारत को वैश्विक तकनीकी मंच पर मजबूत स्थान दिला सकती है, सेमीकंडक्टर और AI क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना सकती है और चीन पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकती है।

आने वाले वर्षों में यह देखा जाएगा कि भारत इस रणनीतिक साझेदारी का किस तरह उपयोग करता है। यदि नीतिगत स्पष्टता, निवेश प्रोत्साहन और तकनीकी नवाचार पर सही तरीके से काम किया गया, तो पैक्स सिलिका भारत के लिए विकास, सुरक्षा और समृद्धि का एक नया अध्याय खोल सकता है।

ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगाँठ पर समंदर में तीसरा साइलेंट रक्षक उतारेगा भारत, न्यूक्लियर पॉवर से लैस ‘अरिदमन’ करेगा दुश्मन का सफाया: जानें- इसकी असीम ताकत का राज, क्यों है ये खास

ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगाँठ पर भारतीय नौसेना ‘INS अरिदमन’ नाम की तीसरी स्वदेशी परमाणु-शक्ति वाली बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन (SSBN) को अप्रैल-मई 2026 के बीच आधिकारिक रूप से सेवा में शामिल करने की तैयारी कर रही है। इसे भारतीय नौसेना के न्यूक्लियर डेटरेंस फोर्स का अगला बड़ा कदम माना जा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, INS अरिदमन को भारत में ही बनाया गया है और यह पहले से सक्रिय INS अरिहंत और INS अरिघाट के बाद तीसरी ऐसी सबमरीन है, जो समुद्र के भीतर दुश्मन पर शक्तिशाली जवाबी हमले की क्षमता रखती है।

नौसेना के वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि इसी कमीशनिंग से भारत की सेकेंड स्ट्राइक (Second Strike) क्षमता और मजबूत होगी, यानी अग भारत पर पहले परमाणु हमला होता है तो समुद्र में तैनात यह पनडु्ब्बी जवाबी हमला करने के लिए तैयार रहेगी।

INS अरिदमन को विशाखापट्टनम के पास स्थित स्टोरेज और लॉन्च सुविधा, ‘प्रोजेक्ट वर्षा’ से ऑपरेशन के लिए तैनात किया जाएगा। यह सबमरीन पहले दो SSBNs की तुलना में और उन्नत है और इसे भारतीय नौसेना के स्ट्रैटेजिक फोर्स कमांड (SFC) के अंतर्गत चलाया जाएगा।

अधिकारियों के अनुसार, इसके शामिल होने से समुद्री न्यूक्लियर डिटेरेंस को और विश्वसनीय बनाएगा, खासकर हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक संतुलन के लिहाज से। अब जानते हैं INS अरिदमन की मुख्य खासियतें, हथियार और तकनीक के बारे में। यह सब जानना जरूरी है ताकि यह समझा जा सके कि यह सबमरीन क्यों महत्वपूर्ण है और इसे मजबूर हथियारों से लैस क्यों किया गया है।

INS अरिदमन की बनावट और क्षमता

INS अरिदमन लगभग 7000 टन वजन वाली परमाणु सबमरीन है, Advanced Technology Vessel programme के तहत शिप बिल्डिंग सेंटर में बनाया गया है। इसमें 83 मेगावाट क्षमता वाला प्रेसराइज्ड वाटर न्यूक्लियर रिएक्टर लगा है। इसी वजह से यह महीनों तक समुद्र के भीतर रह सकती है और इसे बार-बार सतह पर आने की जरूरत नहीं पड़ती।

इसकी लंबाई करीब 110 मीटर बताई जा रही है और इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह समुद्र के भीतर बेहद कम आवाज के साथ आगे बढ़ सके। सबमरीन में विशेष एनेकोइक कोटिंग लगाई गई है जो ध्वनि को कम करती है और दुश्मन के सोनार से बचने में मदद करती है।

मिसाइल और हथियार प्रणाली

INS अरिदमन में चार वर्टिकल लॉन्च ट्यूब हैं। इनसे यह दो प्रकार की सबमरीन से दागी जाने वाली बैलिस्टिक मिसाइलें ले जा सकती है। पहली है K15 सागरिका मिसाइल, जिसकी मारक दूरी लगभग 750 किलोमीटर है। यह कम दूरी के लक्ष्यों को निशाना बनाने में सक्षम है।

दूसरी ओर अधिक ताकतवर है K4 मिसाइल, जिसकी रेंज करीब 3500 किलोमीटर तक मानी जाती है। K4 की लंबी दूरी भारत को समुद्र में रहते हुए ही दूर स्थित रणनीतिक ठिकानों तक पहुँचने की क्षमता देती है। यह सबमरीन अधिकतम 8 K4 मिसाइलें या 24 K15 मिसइलें ले जा सकती है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसे किस मिशन के लिए तैनात किया गया है।

मिसाइलों को पानी के भीतर से ही दागा जा सकता है। यही इसकी सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत है क्योंकि दुश्मन के लिए यह जान पाना बेहद मुश्किल होता है कि सबमरीन किस जगह पर है। इसके अलावा इसमें आधुनिक सोनार प्रणाली, कम शोर वाला प्रोपल्शन सिस्टम और सुरक्षित कमांड एवं कंट्रोल व्यवस्था मौजूद है।

क्यों अहम है INS अरिदमन?

INS अरिदमन के शामिल होने के बाद भारत के पास तीन परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन हो जाएँगी। इससे भारत की परमाणु त्रि शक्ति (Nuclear Triad) और संतुलित होगी, जिसमें जमीन से दागी जाने वाली मिसाइलें, हवा से छोड़े जाने वाले हथियार और समुद्र से जवाब देने की क्षमता शामिल है।

समुद्र में छिपी सबमरीन किसी भी देश के लिए सबसे भरोसेमंद जवाबी ताकत मानी जाती है, क्योंकि इसे ढूँढ पाना आसान नहीं होता। खासकर पड़ोसी देशों चीन और पाकिस्तान को मुँहतोड़ जवाब देकर भारत की सुरक्षा रणनीति को और मजबूती देगी।

वेटिकन-मक्का पीछे, अयोध्या जी दुनिया का सबसे बड़ा तीर्थ: एक राम मंदिर से सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अध्याय हुआ भव्य और विशाल

प्रभु राम की नगरी अयोध्या में उनके भव्य मंदिर का निर्माण केवल एक संरचना का निर्माण नहीं है बल्कि सनातन की जीवंत आस्था के पुनर्जागरण का उद्घोष है। प्रभु राम ने अपने मंदिर के लिए 500 वर्षों का लंबा इंतजार किया और जब भव्य मंदिर का निर्माण पूरा हुआ तो यह एक व्यापक सांस्कृतिक, आर्थिक और पूरी नगरी के परिवर्तन का उदाहरण बनकर सामने आया है।

भव्य मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद अयोध्या की पहचान और भी व्यापक हो गई। राम मंदिर के निर्माण ने ना केवल करोड़ों लोगों की आस्था को नई ऊर्जा दी बल्कि अयोध्या को वैश्विक धार्मिक मानचित्र पर मजबूती से स्थापित कर दिया। इसके बाद से हर दिन देश और विदेश से लाखों श्रद्धालु यहाँ पहुँच रहे हैं।

मक्का और वेटिकन से आगे अयोध्या

श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण के निर्णय के बाद जिस तरह ‘डबल इंजन सरकार’ ने अयोध्या को एक वैश्विक आध्यात्मिक नगरी के रूप में विकसित करने का संकल्प लिया उसने अयोध्या को मक्का और वेटिकन जैसे केंद्रों से आगे खड़ा कर दिया है। आज अयोध्या न केवल भारत की बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी तीर्थ नगरी बनने की ओर बढ़ रही है। अनुमान है कि आने वाले वक्त में यहाँ औसतन प्रतिवर्ष 45 से 50 करोड़ श्रद्धालु आएँगे।

श्रद्धालुओं के मामले में अयोध्या ने पहले ही मक्का और वेटिकन को पीछे छोड़ दिया है। IIM लखनऊ की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि अयोध्या में 2024 में 16-18 करोड़ श्रद्धालु पहुँचने का अनुमान था। ईसाईयों के सबसे बड़े तीर्थस्थल वेटिकन में हर साल लगभग 0.9 करोड़ और मुस्लिमों के मक्का में करीब 2 करोड़ लोग पहुँचते हैं। रिपोर्ट में बताया गया कि 2025-26 तक हर साल अयोध्या में टूरिज्म से 100 बिलियन रुपए (₹10000 करोड़) से ज्यादा का रेवेन्यू मिल सकता है।

अयोध्या: सूर्यवंश की राजधानी से ‘मॉडल सिटी’ तक

अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, कांची, अवंतिका (उज्जयिनी) और द्वारका को सनातन परंपरा में सप्त पुरियों में गिना जाता है। इसमें भी अयोध्या को प्रथम माना गया है। माना जाता है कि अयोध्या मानव सभ्यता के प्रथम साम्राज्य की राजधानी थी जिसकी स्थापना वैवस्वत मनु ने की थी। वैवस्वत मनु से ही सूर्यवंश की स्थापना हुई जिसमें आगे चलकर भगवान राम भी हुए। अयोध्या को पहचान सूर्यवंश की राजधानी के तौर पर रही है जिसे अब ‘मॉडल सिटी’ के तौर पर विकसित किया जा रहा है।

मोदी-योगी की डबल इंजन सरकार ने अयोध्या को दुनिया की सबसे बड़ी आध्यात्मिक नगरी के रूप में स्थापित करने के लिए अयोध्या मास्टर प्लान 2031 के तहत ₹85,000 करोड़ से अधिक के निवेश का प्रस्ताव रखा है। इसमें ना केवल भव्य मंदिर बल्कि उसके आसपास के इलाकों को भी विकसित किया जा रहा है। इसके साथ ही शहर में शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा व्यवस्थाओं को भी मजबूत किया जा रहा है। प्रशासन का प्रयास है कि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो और वे सुरक्षित व व्यवस्थित तरीके से दर्शन कर सकें।

इस योजना के तहत शहर को पहले से ज्यादा बेहतर, साफ और व्यवस्थित बनाने का काम किया जा रहा है। नई सड़कों का निर्माण हो रहा है ताकि ट्रैफिक की समस्या कम हो और लोगों को आने-जाने में आसानी हो। बारिश के समय पानी जमा न हो, इसके लिए बेहतर जल निकासी व्यवस्था तैयार की जा रही है। ट्रैफिक को नियंत्रित करने के लिए स्मार्ट सिस्टम लगाए जा रहे हैं और यात्रियों की सुविधा के लिए आधुनिक बस टर्मिनल तथा पर्याप्त पार्किंग जोन बनाए जा रहे हैं।ट

साथ ही शहरी सुविधाओं का भी विस्तार किया जा रहा है। सड़कों के अलावा हवाई अड्डे और रेलवे स्टेशन को भी विकसित किया गया है। कुल मिलाकर, पूरे शहर को योजनाबद्ध तरीके से तैयार किया जा रहा है ताकि आने वाले वर्षों में बढ़ती आबादी और तीर्थयात्रियों को बेहतर और सुगम सुविधाएँ मिल सकें।

सांस्कृतिक पहचान का पुनर्जागरण

अयोध्या केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपरा का प्रतीक भी है। यहाँ आयोजित होने वाले दीपोत्सव, रामलीला और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने शहर की वैश्विक पहचान को नई ऊँचाई दी है। दीपोत्सव के दौरान लाखों दीपकों से जगमगाती अयोध्या की छवि विश्वभर में दिखती है, जो भारतीय संस्कृति की भव्यता को दर्शाती है।

रामायण से जुड़े स्थलों का संरक्षण और विकास भी किया जा रहा है ताकि श्रद्धालु धार्मिक अनुभव के साथ-साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जानकारी भी प्राप्त कर सकें। इससे अयोध्या आध्यात्मिक पर्यटन का एक बड़ा केंद्र बन रही है।

सांस्कृतिक आत्मविश्वास से आकार लेती अयोध्या

राम मंदिर के निर्माण को कई लोग हिंदू समाज के सांस्कृतिक आत्मविश्वास की वापसी के रूप में देखते हैं। लंबे समय तक यह धारणा रही कि भारत की प्राचीन परंपराएँ और आस्थाएँ आधुनिकता के दौर में पीछे छूट रही हैं। लेकिन मंदिर निर्माण के बाद यह संदेश गया कि आधुनिक भारत अपनी जड़ों से कटकर नहीं बल्कि उन्हें साथ लेकर आगे बढ़ना चाहता है।

प्रभु राम ने राजा होते हुए भी नियमों का पालन किया, वनवास स्वीकार किया और वचन की मर्यादा बनाए रखी। राम मंदिर का पुनर्निर्माण इसी मर्यादा, धैर्य और सत्य के मूल्यों की पुनर्स्थापना का प्रतीक है। यह संदेश देता है कि आस्था और आधुनिकता साथ-साथ चल सकती हैं।

प्रभु राम अब अपनी नगरी में विराजमान हैं और अयोध्या में हर ओर मंगल है, जैसा गोस्वामी तुलसीदास जी ने ‘दोहावली‘ में लिखा था-

अनुदिन अवध बधावने, नित नव मंगल मोद।
मुदित मातु-पितु लोग लखि, रघुवर बाल विनोद॥

रोबोडॉग्स क्या हैं और भारत को इनकी सख्त जरूरत क्यों है: इंडिया AI इम्पैक्ट समिट से परे समझिए इन मशीनों को, जो बचा सकते हैं जिंदगियाँ

नई दिल्ली में आयोजित इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 एक बड़ा आयोजन था। इस समिट का मकसद भारत की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बढ़ती ताकत को दुनिया के सामने दिखाना था। लेकिन इस आयोजन के बीच एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया। यह विवाद गलगोटियास यूनिवर्सिटी से जुड़ा था। यूनिवर्सिटी ने अपने स्टॉल पर एक रोबोटिक डॉग यानी रोबोडॉग को प्रदर्शित किया।

यूनिवर्सिटी की एक प्रतिनिधि ने दावा किया कि यह रोबोडॉग उनकी यूनिवर्सिटी ने खुद बनाया है। यह स्वदेशी नवाचार है। लेकिन बाद में पता चला कि यह रोबोडॉग असल में चीन की एक कंपनी यूनिट्री का बना हुआ कमर्शियल प्रोडक्ट था। इसे सिर्फ खरीदा गया था और अपना बताकर पेश किया गया। हालाँकि बाद में यूनिवर्सिटी को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

इसी समिट में एक सकारात्मक पहलू भी सामने आया। बेंगलुरु की एक स्टार्टअप कंपनी जनरल ऑटोनॉमी ने अपना पूरी तरह स्वदेशी रोबोडॉग पेश किया। इसका नाम रखा गया परम। कंपनी ने इसे पेश करते हुए कहा कि अब (पहले की) विवादों को छोड़िए, परम से मिलिए। परम को भारतीय इंजीनियरों ने पूरी तरह डिजाइन और बनाया है। सिर्फ कुछ छोटे पार्ट्स जैसे NVIDIA की चिप और एक्ट्यूएटर्स बाहर से आए हैं। बाकी सब कुछ भारत में बना है। यह दिखाता है कि भारत सचमुच रोबोटिक्स के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है।

आखिर रोबोडॉग्स होते क्या हैं, क्यों है इतनी चर्चा?

यह पूरा विवाद हमें रोबोडॉग्स की तकनीक पर सोचने को मजबूर करता है। आखिर रोबोडॉग्स होते क्या हैं। ये कोई खिलौना नहीं हैं। ये चार पैरों वाले रोबोट हैं जो असली कुत्तों की तरह चलते-फिरते हैं। लेकिन इनमें बहुत उन्नत तकनीक होती है। ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेंसर और मजबूत मोटर्स से लैस होते हैं। इनका डिजाइन ऐसा होता है कि ये ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर आसानी से चल सकते हैं। सीढ़ियाँ चढ़ सकते हैं। कीचड़, रेत या पत्थरों पर भी संतुलन बनाकर आगे बढ़ सकते हैं। जहाँ पहिए वाले रोबोट फंस जाते हैं वहाँ ये आसानी से निकल जाते हैं।

बिना थके काम करने वाली मशीनें

रोबोडॉग्स का मूल विचार ऐसे रोबोट्स के जरिए आया है, जो कुत्तों जैसे दिखे और काम भी करें, लेकिन उसमें किसी जीव का वास न हो। दरअसल, रोबोडॉग्स को इस तरह से बनाया गया है कि वो बिना थके काम कर सकें। इनके हर पैर में सर्वो मोटर्स या हाइड्रॉलिक एक्ट्यूएटर्स लगे होते हैं। ये मोटर्स पैरों को हिलाते हैं जैसे असली मांसपेशियाँ काम करती हैं। इनका दिमाग एक छोटा कंप्यूटर होता है जो हर सेकंड हजारों गणनाएँ करता है ताकि रोबोट गिरे नहीं।

तमाम तरह के सेंसर्स से लैस हो सकते हैं रोबोडॉग्स

इन रोबोडॉग्स में कई तरह के सेंसर लगे होते हैं। जैसे LIDAR जो लेजर किरणों से दूरी नापता है और आसपास का तीन आयामी नक्शा बनाता है। कैमरे जो दिन-रात देख सकते हैं। इन्फ्रारेड सेंसर जो अंधेरे में गर्मी का पता लगाते हैं। जाइरोस्कोप और एक्सेलेरोमीटर जो रोबोट का संतुलन बनाए रखते हैं। ये सभी सेंसर मिलकर रोबोट को पर्यावरण की पूरी जानकारी देते हैं। फिर कृत्रिम बुद्धिमत्ता के एल्गोरिदम फैसला करते हैं कि आगे कैसे चलना है। बाधा से कैसे बचना है।

दुनिया में सबसे मशहूर रोबोडॉग अमेरिकी कंपनी बोस्टन डायनेमिक्स का स्पॉट है। स्पॉट बहुत ताकतवर है। यह चौदह किलो तक वजन उठा सकता है। तीन मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से दौड़ सकता है। नब्बे मिनट तक लगातार काम कर सकता है। इसे कई देशों की सेनाएँ और कंपनियाँ इस्तेमाल कर रही हैं। चीन की यूनिट्री कंपनी भी सस्ते रोबोडॉग बनाती है जो आम लोग भी खरीद सकते हैं। लेकिन असली ताकत स्वदेशी डिजाइन में होती है क्योंकि उसमें अपनी जरूरत के हिसाब से बदलाव किए जा सकते हैं।

मानव जीवन में बेहद उपयोगी साबित हो सकते हैं रोबोडॉग्स

रोबोडॉग्स मानव जीवन में बहुत उपयोगी साबित हो रहे हैं। सबसे पहले औद्योगिक क्षेत्र में। तेल रिफाइनरी, बिजली संयंत्र या खदानों में जहाँ जहरीली गैस या ऊँचाई का खतरा रहता है वहाँ ये रोबोडॉग्स निरीक्षण करते हैं। ये गैस लीक का पता लगा सकते हैं। मशीनों की स्थिति देख सकते हैं। तापमान नाप सकते हैं। इससे इंसानों को खतरनाक जगहों पर जाने की जरूरत नहीं पड़ती।

निर्माण स्थलों पर भी ये बहुत काम आते हैं। भारी सामान एक जगह से दूसरी जगह ले जा सकते हैं। साइट का नक्शा बना सकते हैं। काम की प्रगति की निगरानी कर सकते हैं। इससे समय और पैसा दोनों बचता है। कृषि में भी इनका इस्तेमाल शुरू हो रहा है। बड़े खेतों में फसलों की निगरानी। कीटों का पता लगाना। पशुओं की देखभाल। ये सब काम रोबोडॉग्स आसानी से कर सकते हैं।

शिक्षा और मनोरंजन में भी रोबोडॉग्स की भूमिका बढ़ रही है। स्कूल-कॉलेज में बच्चे इनके जरिए रोबोटिक्स सीखते हैं। ये प्रोग्रामिंग और इंजीनियरिंग की समझ देते हैं। पार्कों या आयोजनों में ये लोगों का मनोरंजन करते हैं। नाच सकते हैं। ट्रिक्स दिखा सकते हैं। बुजुर्गों या अकेले रहने वालों के लिए ये साथी का काम भी कर सकते हैं। बातचीत कर सकते हैं। दवाइयाँ याद दिला सकते हैं।

राहत और बचाव कार्यों में बेहद उपयोगी

अब बात करते हैं सबसे महत्वपूर्ण उपयोग की यानी खतरनाक जगहों पर राहत और बचाव कार्य में। प्राकृतिक आपदाएँ जैसे भूकंप, बाढ़, भूस्खलन या आग लगने पर बचाव कार्य बहुत जोखिम भरे होते हैं। इमारतें गिर जाती हैं। मलबा हर तरफ होता है। बचाव दल के लोग खुद खतरे में पड़ जाते हैं। ऐसे में रोबोडॉग्स आगे जाकर काम करते हैं।

ये मलबे के बीच संकीर्ण जगहों में घुस सकते हैं। थर्मल कैमरे से शरीर की गर्मी का पता लगा सकते हैं। माइक्रोफोन से आवाजें सुन सकते हैं। अगर कोई जिंदा व्यक्ति दबा हुआ है तो उसकी लोकेशन बता सकते हैं। अमेरिका में कई बार बोस्टन डायनेमिक्स के स्पॉट रोबोट का इस्तेमाल भूकंप प्रभावित क्षेत्रों में हुआ है। वहाँ ये जीवित लोगों को खोजने में सफल रहे।

आग लगने की घटनाओं में भी रोबोडॉग्स बहुत उपयोगी हैं। ये आग के बीच जा सकते हैं जहाँ इंसान नहीं जा सकता। पानी की बौछार कर सकते हैं। पीड़ितों तक ऑक्सीजन पहुँचा सकते हैं। रियल टाइम वीडियो भेजकर कमांड सेंटर को पूरी स्थिति की जानकारी देते हैं। इससे बचाव योजना ज्यादा सटीक बनती है। चीन में अग्निशमन विभाग पहले से ही रोबोडॉग्स का इस्तेमाल कर रहा है।

बाढ़ या भूस्खलन में भी ये पानी या कीचड़ में चल सकते हैं। डूबे हुए लोगों की खोज कर सकते हैं। दवाइयाँ या खाना पहुँचा सकते हैं। महामारी के समय जैसे कोविड में ये मरीजों तक दवाई पहुंचाने और निगरानी करने में मदद कर सकते हैं बिना किसी संपर्क के। इस तरह रोबोडॉग्स न सिर्फ समय बचाते हैं बल्कि कई जिंदगियाँ भी बचा लेते हैं।

रोबोडॉग्स इंसानों की रक्षा कई तरीकों से करते हैं। सबसे सीधी रक्षा यह है कि खतरनाक काम खुद करके इंसानों को जोखिम से बचाते हैं। पुलिस और सुरक्षा बलों में ये संदिग्ध वस्तुओं की जाँच करते हैं। अगर कोई बम हो तो उसे दूर से देख सकते हैं। बंधक स्थिति में आगे जाकर जानकारी इकट्ठा करते हैं। इससे पुलिस वाले सुरक्षित रहते हैं।

परमाणु संयंत्रों या रासायनिक कारखानों में रेडिएशन या जहरीली गैस का खतरा रहता है। वहाँ रोबोडॉग्स नियमित जाँच करते हैं। कोई लीकेज हो तो पहले पता लगा लेते हैं। इससे बड़ा हादसा होने से पहले ही रोकथाम हो जाती है। खदानों में भी ये गिरने या गैस भरने का पता लगा सकते हैं। मजदूरों की जान बचाते हैं।

शहरों में सुरक्षा गश्त के लिए भी रोबोडॉग्स इस्तेमाल हो रहे हैं। रात में अंधेरे इलाकों में गश्त लगाते हैं। चोर या संदिग्ध व्यक्ति दिखे तो अलर्ट कर देते हैं। अस्पतालों में ये मरीजों की निगरानी करते हैं। अगर कोई गिर जाए या मदद माँगे तो तुरंत सूचना देते हैं। बुजुर्गों के घर में अकेले रहने वालों की देखभाल करते हैं। इस तरह ये अप्रत्यक्ष रूप से भी इंसानों की रक्षा करते हैं।

आर्मी के लिए बेहद मददगार साबित हो सकते हैं रोबोडॉग्स

अब बात करते हैं सैन्य उपयोग की। भारतीय सेना ने पहले से ही रोबोडॉग्स को अपनी सेवा में शामिल कर लिया है। इनका नाम रखा गया है मल्टी यूटिलिटी लेग्ड इक्विपमेंट यानी MULE। ये रोबोडॉग्स बहुत ताकतवर हैं। पंद्रह किलो तक सामान ढो सकते हैं। ऊँचे-नीचे रास्तों पर आसानी से चल सकते हैं। कड़कड़ाती ठंड या गर्मी में भी काम करते हैं। सीमा पर तैनात सैनिकों तक रसद पहुँचाने में ये बहुत मदद करते हैं। सैनिकों का बोझ कम करते हैं।

सैन्य निगरानी में रोबोडॉग्स दुश्मन के इलाके में चुपके से घुस सकते हैं। हाई डेफिनेशन कैमरे और सेंसर से रियल टाइम जानकारी भेजते हैं। सीमा पर गश्त लगाते हैं। अगर कोई घुसपैठ हो रही हो तो पहले पता लगा लेते हैं। विस्फोटक सामग्री या माइंस का पता लगाने में भी ये बहुत उपयोगी हैं। इससे सैनिकों की जान बचती है।

भारतीय सेना ने हाल ही में इन रोबोडॉग्स को परेड में भी दिखाया। ये सैनिकों के साथ कदम मिलाकर चलते हैं। रिमोट से नियंत्रित होते हैं। भविष्य में ये और उन्नत हो सकते हैं। हथियार ले जा सकते हैं। ड्रोन के साथ मिलकर काम कर सकते हैं। इस तरह भारतीय सेना आधुनिक और तकनीकी रूप से मजबूत बन रही है।

रोबोडॉग्स का स्वदेशी विकास भारत के लिए बहुत जरूरी है। परम जैसे प्रोजेक्ट दिखाते हैं कि हम आयात पर निर्भर नहीं रहना चाहते। गलगोटियास जैसे विवाद हमें सिखाते हैं कि सच्चा नवाचार ही देश को आगे ले जाएगा। आने वाले समय में रोबोडॉग्स हर क्षेत्र में आम हो जाएँगे। ये भारत को आत्मनिर्भर और सुरक्षित बनाएँगे।

सावधानियाँ भी हैं जरूरी, बगावत हुई तो?

अंत में, आप सभी ने सुपरस्टार रजनीकांत की फिल्म एंथिरन (रोबोट) तो देखा ही होगा। यहाँ विज्ञान और तकनीकी के बीच में फिल्मों की बात करना हास्यास्पद लग सकता है, लेकिन आपको समझाने के लिए ये रेफरेंस देना जरूरी लगता है। दरअसल, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की दुनिया में अब वो बहस तेजी से आगे बढ़ चुकी है कि क्या कभी कोई एआई मॉडल बगावत कर सकता है? इससे जुड़े कुछ पहले भी सामने आ चुके हैं, जिसमें इसका जवाब हाँ है। जिसमें एक एआई मॉडल ने लगभग हमलावर रुख अख्तियार कर लिया था। उसने अपनी ही ट्रेनिंग को बाकायदा हैक कर लिया था।

एंथ्रोपिक कंपनी के क्लॉउड ओपस 4 मॉडल की कमजोरियाँ सामने आ चुकी हैं। उसने तो बाकायदा कंपनी को ही बंद करने की धमकी दे दी थी, लेकिन बाद में इसी एंथ्रोपिक कंपनी ने एक रिसर्च पेपर पब्लिश की, जो वाकई डराने वाली है। इसमें ओपन एआई, गूगल, डीपसीक, मेटा और xAI जैसे मॉडल्स पर रिसर्च की गई। जो खास बात कंपनी ने अपनी रिसर्च पेपर में बताया, वो ये था कि एआई मॉडल्स ने अपने ऊपर आए खतरे को भाँपते हुए बाकायदा ब्लैकमेलिंग तक कर दी।

बहरहाल, अब याद करिए रोबोट फिल्म के खलनायक चिट्टी को, वो बागी होने के बाद क्या से क्या करामात दिखाता है। ये खतरा अब सिर्फ फिल्मी या कहानियों तक ही सीमित नहीं रहा है, बल्कि वास्तविक बन चुका है। हालाँकि एआई समिट में पीएम मोदी ने आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को ‘मानव’ कंट्रोल में रखने की लाइन खींची है। यकीनन वैज्ञानिक भी ऐसा ही चाहते हैं, लेकिन क्या होगा, जब कोई एआई मॉडल उस ‘लाइन’ को ही क्रॉस कर दे? ऐसे में रोबोटिक्स का गेम खतरनाक भी हो सकता है।

इंस्टा-फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म बच्चों में बढ़ा रहे डिप्रेशन? अमेरिकी कोर्ट में घिरे जुकरबर्ग, क्या इस पर वैश्विक बैन की हो गई है शुरुआत

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लगातार ये आरोप लग रहे हैं कि ये बच्चों और किशोरों को ऐसी लत लगा देते हैं कि उनके बिना ये रह नहीं पाते। अमेरिका में 6 साल की उम्र से सोशल मीडिया पर एक्टिव कैली की मानसिक हालत ठीक नहीं है। इसको लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग को अमेरिका की कोर्ट में पेश होना पड़ा। आरोप है कि मेटा की प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम बच्चों को जानबूझकर लत लगाती है, उससे उनकी मानसिक स्थिति खराब होती है।

क्या है कैली का मामला

दरअसल केस एक कैलिफॉर्निया में रहने वाली 15 साल की लड़की कैली का है, जिसने 6 साल में यूट्यूब शुरू किया और 9 साल में इंस्टाग्राम, फिर टिकटॉक और स्नैपचैट यूज किया। सोशल मीडिया के बचपन से इस्तेमाल करने की उसे लत लग गई। उसका डिप्रेशन बढ़ा और सुसाइड के ख्याल आने लगे। ऐसे कई केस सिर्फ अमेरिका में ही चल रहे हैं, जिसमें बच्चों के पैरेंट्स ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को ऐसा डिजाइन करने का आरोप लगाया है, जिससे बच्चे इसे देखें और बार-बार उन्हें देखने का मन करे।

घंटों इन पर वक्त बिताने की वजह से बच्चों और टीनएजर्स की शारीरिक और मानसिक सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है।। ये आरोप मेटा के फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हॉट्सअप, गुगल के यूट्यूब पर लगे हैं।

जुकरबर्ग से सवाल-जवाब

जानबूझकर बच्चों को लत लगाने का इंस्टाग्राम पर आरोप लगाते हुए वकील मार्क लेनियर ने जुकरबर्ग से पूछा कि क्या इंस्टाग्राम एडिक्टिव है। इस पर जुकरबर्ग ने कोई सीधा जवाब नहीं दिया, लेकिन कहा कि प्लेटफॉर्म ज्यादा वैल्यू देता है, इसलिए यूजर्स इस पर ज्यादा वक्त बिताते हैं। वकील ने 2018 में जकुरबर्ग और एपल के सीईओ टिम कुक के बीच हुए ईमेल एक्सचेंज को दिखाया। मार्क जुकरबर्ग ने कहा कि यह यूजर्स की भलाई के लिए था।

प्लेटफॉर्म को बेहतर बनाने के लिए एपल के साथ मिलकर काम करने की उन्होंने कोशिश की थी। उन्होंने कहा, “मुझे लगा कि हमारी कंपनी और एपल मिल कर और अच्छा कर सकते हैं, इसलिए मैं टिम से इस बारे में बात करना चाहता था।”

वकील ने लड़की के पुराने दस्तावेज भी दिखाए और जुकरबर्ग से पूछा कि 2015 में जब वह इंस्टाग्राम पर अपना अकाउंट बनाई थी तो उस वक्त 40 लाख यूजर्स 13 साल से कम उम्र के थे और 10-12 साल के 30 फीसदी अमेरिकी बच्चे इंस्टाग्राम का यूज कर रहे थे। उम्र की वैरिफिकेशन कैसे किया जाता है और बच्चों को कैसे अनुमति दी जाती है।

क्या 9 साल का बच्चा उस फाइन प्रिंट को पढ़ेगा जो सावधानी के रूप में लिखे जाते हैं। क्या इन बच्चों को प्लेटफॉर्म ने अनुमति दे दी है। इस पर जुकरबर्ग ने कहा कि कंपनी 13 साल से कम उम्र के बच्चों को अनुमति नहीं देती, लेकिन बच्चे झूठ बोल कर अपना उम्र बढ़ा देते हैं। अगर 13 साल से कम उम्र होती है तो कंपनी अकाउंट हटा देती है। हालाँकि उन्होंने माना कि उम्र का वेरिफिकेशन करना आसान नहीं होता है।

कंपनी इसको लेकर कई बदलाव कर रही है। नए टूल्स ला रही है। इस दौरान तीखे सवालों से झुझला कर जुकरबर्ग ने कहा कि उम्र चेक करने को लेकर कई समस्याएँ आ रही है, जिसके समाधान में कंपनी लगी हुई है।

कैली के मामले में उन्होंने कहा कि बच्ची को मानसिक बीमारी पहले से थी, उसकी वजह इंस्टाग्राम नहीं है। इस मुद्दे पर इंस्टाग्राम के हेड एडम मोसेरी जब कोर्ट में पेश हुए थे तो उन्होंने भी कहा था कि इंस्टाग्राम से वजह से बच्ची की तबियत नहीं बिगड़ी है। माना जा रहा है कि ट्रॉयल मार्च 2026 के अंत तक खत्म हो जाएगा। इसके बाद कोर्ट का फैसला आएगा, जिसका असर कंपनियों के साथ-साथ यूजर्स पर भी पड़ेगा।

कई देशों ने बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट बंद कर दिए

ऑस्ट्रेलिया ने दिसंबर 2025 में 16 साल से छोटे बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन कर दिया है। ऐसा करने वाला ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला देश है। फ्रांस की नेशनल असेंबली ने भी 15 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया पर बैन का समर्थन किया है। ऑस्ट्रेलिया की तर्ज पर ब्रिटेन में भी 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन करने की तैयारी हो चुकी है।

नॉर्वे में भी सोशल मीडिया पर बैन लगा दिया गया है। इसके लिए पहले 13 साल निश्चित किया गया था, जिसे अब 15 साल किया जा रहा है। ऑस्ट्रिया, पोलेंड, ग्रीस, डेनमार्क आदि देश भी बच्चों पर होने वाले असर की स्टडी कर रहे हैं और उस आधार पर फैसला लेंगे।

फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने पीएम मोदी से की अपील

फ्रांस में 15 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया पर प्रतिबंध की दिशा में आगे बढ़ गया है। एआई इम्पैक्ट समिट में शामिल होने आए फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने प्रधानमंत्री मोदी से बच्चों को लेकर खास अपील की। उन्होंने कहा कि वो चाहते हैं कि भारत में भी 15 साल से कम उम्र के बच्चे के सोशल मीडिया अकाउंट पर बैन हो। उन्होंने कहा कि जिस चीज की इजाजत असल दुनिया में नहीं है, वह बच्चों को इंटरनेट पर भी नहीं दिखनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया और इंटरनेट को बच्चों के लिए सुरक्षित बनाना प्लेटफॉर्म, सरकार और रेगुलेटर की जिम्मेदारी है। पीएम मोदी के सामने मैक्रों ने कहा कि फ्रांस के अलावा ग्रीस, स्पेन जैसे दूसरे देश इस दिशा में आगे बढ़ चुके हैं, भारत से भी उन्हें उम्मीद है कि बच्चों और टीनएजर्स की सुरक्षा के लिए कदम उठाया जाएगा।

भारत के सोशल मीडिया बैन करने की माँग

भारत की एक चौथाई आबादी 14 साल से कम की है। भारतीय पेरेंट्स परेशान है कि उनके बच्चे हमेशा सोशल मीडिया पर लगे रहते हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे फीचर्स जैसे इनफिनिट स्क्रॉल, नोटिफिकेशन, फिल्टर्स इन बच्चों को बाँधे रखते हैं। उन्हें न तो खाने-पीने की चिंता रहती है और न ही कहीं आना-जाना चाहते हैं।

पढ़ना-लिखना, बाहर खेलना, दूसरी एक्टिविटी बंद हो गए हैं। अकेले हाथ में फोन लेकर हँसना, खेलना और बिजी रहना। परिवार के बीच रह कर भी बच्चे परिवार से दूर होते जा रहे हैं। शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर होते जा रहे हैं। जानकारों के मुताबिक, सोशल मीडिया की लत लगने पर बच्चों में डिप्रेशन, गलत कंटेंट देखना, ऑनलाइन गलत संगति में पढ़ना, आत्मविश्वास का कम होगा, साइबर बुलिंग का खतरा रहता है। भारत में भी सोशल मीडिया पर रोक की माँग होने लगी है।

भारत में बच्चों के सोशल मीडिया पर बैन की तैयारी

भारत में भी बच्चों के सोशल मीडिया पर बैन लगाने की तैयारी शुरू हो गई है। आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इसके संकेत दे दिए हैं। उन्होंने कहा है कि उम्र के आधार पर सोशल मीडिया पर पाबंदियों को लेकर उन्होंने सोशल मीडिया कंपनियों से बातचीत की है। 16 साल से कम उम्र के बच्चों को इसके असर से कैसे बचाया जाए, सरकार का ध्यान इस पर है। उन्ह

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, प्लेटफॉर्म को कहा जाना चाहिए कि वह 16 साल से कम उम्र के बच्चों का प्लेटफॉर्म बंद कर दे। लेकिन भारत जैसे देश में इसे उम्र पूछ कर बैन करवाना आसान नहीं है। बच्चे झूठ बोल सकते हैं। आईडी वेरिफिकेशन होता है तो प्राइवेसी और निगरानी का खतरा बढ़ जाता है।

बच्चे वीपीएन का इस्तेमाल कर इसे चला सकते हैं। इसलिए बैन लगाना आसान काम नहीं है। जानकारों के मुताबिक, “प्लेटफॉर्म्स भले ही बैन लागू करें, लेकिन टीनएजर्स वीपीएन का इस्तेमाल करके या अपने से बड़ों के अकाउंट से या फिर नए कम मॉडरेशन वाले ऐप्स से इसे बायपास कर सकते हैं. इससे नुकसान कम नहीं होगा, बल्कि बस अकाउंट बदल जाएँगे। ”

असल जरूरत है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लत लगाने वाले डिजाइन को रेगुलेट किया जाए। उनके फीचर्स बदलें जाएँ, बच्चों की प्रोफाइलिंग रोकी जाए, रिसर्च को फंड किया जाए और एक स्वतंत्र रेगुलेटर को मजबूती दी जाए।

DRDO की ‘स्टील्थ’ क्रूज मिसाइल के आगे S-400 भी माँगेगा पानी, AMCA फाइटर जेट के साथ मिलकर मचाएगी तबाही: जानें- 5वीं पीढ़ी के हथियार की खासियत

भारत रक्षा के क्षेत्र में एक ऐसी ‘सुपर वेपन’ जोड़ी तैयार कर रहा है, जो आधुनिक युद्ध के मैदान को पूरी तरह बदल देगी। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) अब पाँचवीं पीढ़ी (5th Generation) के स्वदेशी लड़ाकू विमान AMCA (एडवांस मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) के लिए एक विशेष लॉन्ग रेंज लैंड अटैक क्रूज मिसाइल (LR-LACM) विकसित कर रहा है।

यह मिसाइल ‘स्टील्थ’ तकनीक से लैस होगी, यानी यह रडार की पकड़ में नहीं आएगी। 600 से 700 किलोमीटर तक मार करने वाली यह मिसाइल दुनिया के सबसे ताकतवर एयर डिफेंस सिस्टम जैसे S-400, THAAD और आयरन डोम को भी चकमा देने में सक्षम होगी। यह प्रोजेक्ट भारत को दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल कर देगा जिनके पास अदृश्य रहकर हमला करने की क्षमता है।

21वीं सदी का युद्ध: अब जमीन पर पैर रखे बिना मचेगी तबाही

21वीं सदी में युद्ध लड़ने के तरीके 20वीं सदी के मुकाबले पूरी तरह बदल चुके हैं। पहले जीत के लिए सेनाओं को दुश्मन की सीमा पार करनी पड़ती थी, लेकिन आज का दौर ‘टेक्नोलॉजी बेस्ड वेपन सिस्टम’ का है। अब युद्ध केवल वीरता से नहीं, बल्कि बेहतर रडार और मिसाइल सिस्टम से जीते जाते हैं। आज के समय में लंबी दूरी की मिसाइलें किसी भी देश में बिना घुसे वहाँ भारी तबाही लाने में सक्षम हैं। भारत इसी तकनीक को अपनाकर अपनी सुरक्षा व्यवस्था को अभेद्य बना रहा है।

स्टील्थ यानी पाँचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान और मिसाइलें रडार सिस्टम को धोखा देने की कला में माहिर होती हैं। अमेरिकी स्टील्थ बॉम्बर्स ने अतीत में ईरान जैसे देशों में भारी तबाही मचाई थी, लेकिन वहाँ के रडार उन्हें देख तक नहीं पाए थे। इसी तरह की ताकत अब भारत अपने बेड़े में शामिल करना चाहता है। पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी देश लगातार अपने रडार और एयर डिफेंस को चीन की मदद से एडवांस कर रहे हैं, ऐसे में भारत की यह नई मिसाइल और फाइटर जेट की जोड़ी उनकी हर तैयारी को नाकाम कर देगी।

AMCA प्रोजेक्ट: भारत का अपना ‘अदृश्य’ लड़ाकू विमान

भारत ने पाँचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट बनाने के लिए AMCA प्रोजेक्ट लॉन्च किया है। यह विमान शुरू से ही स्टील्थ टेक्नोलॉजी पर आधारित है, जिसका मतलब है कि इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि रडार की किरणें इससे टकराकर वापस नहीं जातीं, जिससे रडार इसे पकड़ नहीं पाता। इसकी सबसे बड़ी खूबी इसका ‘इंटरनल वेपन बे’ (आंतरिक हथियार कक्ष) है। सामान्य विमानों में मिसाइलें बाहर की ओर लटकी होती हैं, जो रडार पर सिग्नल भेजती हैं, लेकिन AMCA में हथियार विमान के पेट के अंदर छिपे होंगे।

एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) द्वारा विकसित किया जा रहा यह विमान 2030 के बाद भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल होने की संभावना है। यह विमान दुश्मन के विवादित एयरस्पेस में बिना शोर मचाए घुसने और बाहर आने की क्षमता रखेगा। इसका रडार क्रॉस-सेक्शन इतना छोटा होगा कि आधुनिक रडार के लिए भी इसे पहचानना लगभग असंभव होगा। जब यह विमान अपनी गुप्त मिसाइलों के साथ आसमान में उड़ेगा, तो यह दुश्मन के लिए एक ऐसा अदृश्य काल होगा जिसे वह अपनी स्क्रीन पर देख भी नहीं पाएगा।

स्टील्थ क्रूज मिसाइल: वजन में कम, पर वार में सबसे घातक

DRDO जिस नई क्रूज मिसाइल पर काम कर रहा है, वह सामान्य मिसाइलों से बिल्कुल अलग है। लंबी दूरी की पारंपरिक मिसाइलें (जैसे निर्भय) वजन में 1500 किलोग्राम से ज्यादा होती हैं, जिन्हें विमान के अंदरूनी हिस्से में फिट करना नामुमकिन होता है। इसी चुनौती को देखते हुए वैज्ञानिक इसे 1000 किलोग्राम के दायरे में ला रहे हैं। यह छोटा आकार और कम वजन ही इस मिसाइल की सबसे बड़ी खासियत है, क्योंकि इससे AMCA अपने आंतरिक बे में एक साथ दो मिसाइलें ले जा सकेगा।

यह मिसाइल केवल आकार में छोटी नहीं होगी, बल्कि इसका पूरा ढाँचा ही स्टील्थ-केंद्रित होगा। इसमें ऐसी विशेष सामग्री (Composites) और बनावट का इस्तेमाल किया जा रहा है जो रडार रिफ्लेक्शन को कम से कम कर देती है। जब यह मिसाइल लॉन्च की जाएगी, तो विमान के दरवाजे बहुत कम समय के लिए खुलेंगे, ताकि जेट की अपनी स्टील्थ क्षमता पर कोई असर न पड़े। यह इंजीनियरिंग का एक ऐसा चमत्कार है जो भारत की मारक क्षमता को दोगुना कर देगा।

रडार की आँखों में धूल: S-400 और आयरन डोम का काल

आज की दुनिया में रूस का S-400 और इजरायल का आयरन डोम जैसे एयर डिफेंस सिस्टम सबसे बेहतरीन माने जाते हैं। ये सिस्टम हवा में आने वाली किसी भी चीज को ट्रैक करके नष्ट कर देते हैं। लेकिन भारत की नई मिसाइल इन सुरक्षा चक्रों को भेदने के लिए ही बनाई जा रही है। इसकी रडार को चकमा देने वाली संरचना और कम ऊँचाई पर उड़ने की क्षमता इसे दुश्मन की नजरों से बचाए रखेगी। यह मिसाइल जमीन के करीब उड़ते हुए दुश्मन के बेस तक पहुंच जाएगी और उन्हें पता भी नहीं चलेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि 600 से 700 किलोमीटर की मारक क्षमता सामरिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। यह रेंज दुश्मन के कमांड सेंटर, रडार स्टेशनों, वायु रक्षा प्रणालियों और लॉजिस्टिक केंद्रों को तबाह करने के लिए काफी है। चूँकि AMCA विमान का अपना हमला करने का दायरा 1500 किलोमीटर है, इसलिए यह मिसाइल उसे और भी खतरनाक बना देती है। विमान सीमा के बाहर से ही मिसाइल छोड़ देगा और मिसाइल अपनी अदृश्य शक्ति से लक्ष्य को भेद देगी।

स्वदेशी तकनीक का दम: इंजन से लेकर गाइडेंस तक ‘मेड इन इंडिया’

इस मिसाइल परियोजना की एक और बड़ी ताकत इसकी स्वदेशी तकनीक है। इसमें भारत के अपने छोटे टर्बोफैन इंजन (जैसे मानिक/STFE) का इस्तेमाल किए जाने की संभावना है। यह इंजन मिसाइल को लंबी दूरी तक उड़ने के लिए जरूरी ताकत प्रदान करेगा। इसके अलावा, मिसाइल में अत्याधुनिक गाइडेंस सिस्टम लगा होगा, जो इसे सटीक निशाना लगाने में मदद करेगा। भारत का लक्ष्य अब विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम करके अपनी सुरक्षा खुद सुनिश्चित करना है।

यह प्रोजेक्ट फिलहाल डिजाइन और कॉन्सेप्ट के चरण में है, लेकिन इसका उद्देश्य बहुत स्पष्ट है। 2030 के दशक के मध्य तक भारत चाहता है कि उसके पास पूरी तरह से स्वदेशी और दुनिया के सबसे आधुनिक हथियारों का सेट हो। रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि जब AMCA और यह नई स्टील्थ मिसाइल एक साथ काम करेंगे, तो भारत की वायु शक्ति वैश्विक स्तर पर एक नई प्रतिष्ठा हासिल करेगी। यह न केवल देश की रक्षा करेगा, बल्कि दुनिया को भारत की तकनीकी प्रगति का लोहा भी मनवाएगा।

रणनीतिक बढ़त: भविष्य के युद्धों के लिए भारत की तैयारी

चीन की बढ़ती सैन्य शक्ति और पाकिस्तान की रडार तैनाती को देखते हुए भारत का यह कदम बहुत जरूरी है। चीन अपने एयर डिफेंस सिस्टम को लगातार मजबूत कर रहा है, जिसे भेदने के लिए सामान्य मिसाइलें काफी नहीं होंगी। भारत की नई स्टील्थ क्रूज मिसाइल इसी ‘पावर गैप’ को भरने का काम करेगी। यह तकनीक भारत को ‘फर्स्ट स्ट्राइक’ की क्षमता देगी, यानी दुश्मन के हमला करने से पहले ही उसके महत्वपूर्ण ठिकानों को खत्म कर देना।

यह मिसाइल भविष्य के युद्धक्षेत्र में घातक मारक क्षमता और ‘इनविजिबिलिटी’ (अदृश्यता) का एक शानदार संतुलन है। वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती विमान की स्टील्थ क्षमता को बनाए रखते हुए मिसाइल को लॉन्च करना है। DRDO के वैज्ञानिक इसी बारीक तकनीक पर दिन-रात काम कर रहे हैं। जब यह प्रोजेक्ट पूरा होगा, तो भारतीय वायुसेना के पास वह ताकत होगी जो आज केवल अमेरिका या रूस जैसे देशों के पास है।

बदलती दुनिया में भारत का नया ‘शक्ति कवच’

आज के दौर में शांति तभी बनी रह सकती है जब आप युद्ध के लिए सबसे ज्यादा तैयार हों। भारत की ‘स्टील्थ’ क्रूज मिसाइल और AMCA प्रोजेक्ट इसी विचारधारा का हिस्सा हैं। यह केवल हथियारों की होड़ नहीं है, बल्कि देश की संप्रभुता को सुरक्षित रखने का एक आधुनिक तरीका है।

जिस तरह से युद्ध के मैदान अब रडार की स्क्रीन और डिजिटल सिग्नल्स पर लड़े जा रहे हैं, भारत का यह ‘अदृश्य काल’ आने वाले समय में हमारी सीमाओं की रक्षा का सबसे बड़ा हथियार बनेगा। यह आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता एक ऐसा कदम है, जो दुश्मन के मन में खौफ पैदा करेगा और भारत को एक महाशक्ति के रूप में स्थापित करेगा।