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सड़कों पर नमाज पढ़ने की जिद: मजबूरी या मजहब की आड़ में ताकत का मुजाहिरा

एक हफ्ते में ईद है, कहने को तो ये शांति और भाईचारे का दिन है लेकिन कट्टरपंथियों के एक बड़े तबके के लिए यह शक्ति प्रदर्शन का भी दिन भी होता है। हमारे ऐसा कहने के पीछे कि कई वजह हैं और उनमें से एक प्रमुख वजह है- ‘सड़क बंद कर नमाज पढ़ने की जिद’। ये कोई गढ़ी हुई थ्योरी नहीं है बल्कि यही हकीकत है। अभी से सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो वायरल होने लगे हैं जिनमें मुस्लिमों को सड़कों पर उतरने के लिए उकसाया जाने लगा है।

इन दिनों सैयद अयूब नाम के एक मुस्लिम इन्फ्लुएंसर का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है। अयूब इस वायरल वीडियो में कह रहा है, “संभल नहीं पूरे हिंदुस्तान में रोड पर नमाज अता की जाएगी। किसी की माँ जनी तो इंशाअल्लाह मुसलमानों को रोककर दिखाए।” अयूब ने आगे कहा, “रोड पर नमाज पढ़ने नहीं देंगे, रोड पर नमाज पढ़ेंगे तो हम केस करेंगे, हम जेलों में डालेंगे। ये धमकियाँ दूसरों को देना, मुस्लिम इससे डरने वाला नहीं है।”

यह इकलौते अयूब की धमकी नहीं है, यह जिद एक बड़े तबके की है। सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करते हुए सैकड़ों ऐसे वीडियो आपको नजर आ जाएँगे। सवाल उठते है कि क्या यह केवल मजहबी क्रिया है या बात इससे आगे की है। यह जिद और धमकी सुनकर साफ समझ आता है कि बात इससे आगे की ही है। इसके पीछे एक गहरा संदेश छिपा हुआ है और वो संदेश है ‘शक्ति प्रदर्शन’ का।

जब किसी शहर की व्यस्त सड़क, चौराहे या सार्वजनिक स्थान पर बड़ी संख्या में लोग एकत्र होकर नमाज पढ़ते हैं और उस कारण ट्रैफिक रुक जाता है, आम लोगों की आवाजाही बाधित होती है और पूरा इलाका ठहर जाता है यानि एक अघोषित ‘बंद’ जैसी स्थिति बन जाती है। यह एक प्रतीकात्मक संदेश देने की कोशिश है कि हम यहाँ इतने हैं, हमारी संख्या इतनी अधिक है और हम सार्वजनिक जगहों पर भी अपने तरीके से व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं।

इस मानसिकता के पीछे भीड़तंत्र वाली सोच है। यह कोई कल शुरू हुई प्रथा नहीं है, दशकों से यही चल रहा है और अब तो दायरा बढ़ने लगा है। अब शुक्रवार को जुमे की नमाज के लिए सड़कों और सार्वजनिक जगहों पर कब्जा जमाया जाने लगा है।

भारत में मुस्लिम आबादी 16-17% है लेकिन मस्जिदों की संख्या लाखों में है। वक्फ बोर्ड के पास लाखों एकड़ जमीन है, जहाँ नई मस्जिदें बन सकती हैं। फिर क्यों सड़कें? क्योंकि यह मजबूरी नहीं बल्कि इरादतन किया जाने वाला काम है। यह दिखावा है कि ‘हम जहाँ चाहें, वहाँ कब्जा कर सकते हैं’।

सड़कों पर नमाज का यह तमाशा मजहबी नहीं है बल्कि एक सुनियोजित धमकी और शक्ति प्रदर्शन है। मुसलमानों की यह आदत सालों से चल रही है जहाँ वे जानबूझकर सड़कों को ब्लॉक करके, ट्रैफिक को ठप करके और आम लोगों को परेशान करके यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि वे बहुमत में आकर क्या-क्या कर सकते हैं। यह प्रदर्शन कहता है कि ‘देखो, हम सड़क पर नमाज पढ़ सकते हैं तो कल हम और बड़े पैमाने पर निकलेंगे और तुम क्या कर लोगे?’। यह जिहादी मानसिकता है जो हिंदू बहुल भारत में बहुसंख्यकों को चुनौती देती है।

कौन है हैदराबाद का ‘मुल्ला’ सैयद अयूब, जो सड़कों को नमाज पढ़ने के लिए मुस्लिमों को उकसा रहा: 2024 में अवैध फंडिंग और धोखाधड़ी के लिए हो चुका है गिरफ्तार, 20 लाख से ज्यादा हैं फॉलोअर्स

ईद से कुछ ही दिन पहले हैदराबाद के ‘मुल्ला’ सैयद अयूब का एक विवादित वीडियो सामने आया है। वीडियो में उन्होंने मुसलमानों से सड़कों पर नमाज पढ़ने की अपील की है। रविवार यानी 15 मार्च 2026 को यह वीडियो पोस्ट किया गया था। NGO ‘हैदराबाद यूथ करेज’ का खुद को ऑर्गनाइजर बताने वाले सैयद अयूब के इंस्टाग्राम पर करीब 20 लाख फॉलोअर्स हैं।

वीडियो में देखा जा सकता है कि अयूब मुसलमानों से सड़कों पर नमाज पढ़ने की अपील कर रहा है। यह अपील सिर्फ संभल के मुस्लिमों से ही नहीं की जा रही है, बल्कि पूरे देश से की जा रही है। उसने कहा, “सिर्फ संभल में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में सड़कों पर नमाज़ पढ़ी जाएगी, इंशाअल्लाह। अगर ईद की जमातें बड़ी होती हैं, तो मुसलमान बाहर निकल कर सड़कों पर नमाज पढ़ेंगे।”

उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों को भी चुनौती दी, जिन्होंने सड़कों पर नमाज़ पढ़ने को लेकर चेतावनी दी थी। वीडियो में उन्होंने कहा, “अगर किसी को लगता है कि वे मुसलमानों को सड़क पर नमाज पढ़ने से रोक सकते हैं, तो वे कोशिश करके देख लें। मुस्लिम मुकदमों या जेल भेजने की धमकियों से नहीं डरते।”

अयूब ने UP के सीएम योगी आदित्यनाथ के लिए अपमानजनक शब्द का भी इस्तेमाल किया। योगी सरकार की आलोचना करते हुए उसने कहा कि मुस्लिमों पर बेवजह पाबंदियाँ लगाई जा रही है। उनका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और राज्य के कई हिस्सों में सड़कों पर नमाज पढ़ने को लेकर बहस छेड़ गई।

क्या है संभल का मामला ?

यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब संभल प्रशासन ने ईद और जुमे की नमाज के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने को लेकर पहले ही सख्त चेतावनी जारी कर दी है।

गुरुवार (12 मार्च 2026) को संभल में तैनात पुलिस अधिकारी कुलदीप कुमार ने ‘पीस समिति’ की एक बैठक बुलाई। इस बैठक में यह साफ कर दिया गया कि सार्वजनिक सड़कों पर नमाज पढ़ने की इजाजत नहीं होगी। बैठक के दौरान दिए गए उनके बयान का वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया गया।

बैठक में उन्होंने कहा कि ईद से पहले प्रशासन पूरी तरह से सतर्क है और शांति तथा कानून-व्यवस्था बनाए रखना उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि जो लोग मस्जिदों के बाहर सार्वजनिक सड़कों पर नमाज पढ़ते हुए पाए जाएँगे, उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

उन्होंने आगे कहा, “अगर कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक सड़कों पर नमाज पढ़ते हुए पाया गया, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। अगर जरूरी हुआ, तो लोगों को जेल भी भेजा जा सकता है।”

उन्होंने क्षेत्र में शांति बनाए रखने को लेकर कहा कि अगर लोग दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हो रही घटनाओं से भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं, तो वे उन जगहों पर जाने के लिए आजाद हैं, लेकिन भारत में अशांति फैलाने की इजाजत नहीं दी जाएगी।

स्थानीय प्रशासन के अनुसार, सड़कों पर धार्मिक सभाओं की इजाजत देने से अक्सर ट्रैफिक की समस्या पैदा होती है। लोगों की आवाजाही में रुकावट आती है, इसलिए पाबंदियाँ लगाई जाती हैं।

गाजा के लिए अयूब का रमजान प्रोजेक्ट

अपनी विवादित टिप्पणियों के अलावा सैयद अयूब एक और अभियान में शामिल हैं। वह युद्धग्रस्त गाजा के लोगों को अपने ‘हैदराबाद यूथ करेज’ एनजीओ के माध्यम से इफ्तार का खाना और पीने का पानी पहुँचा रहे हैं।

अयूब अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर इस अभियान से जुड़े अपडेट शेयर करते रहते हैं और अपने फॉलोअर्स से इस पहल के लिए दान करने की अपील करते हैं।

हाल ही में सैयद अयूब को दिल्ली के उत्तम नगर में देखा गया। वह हिन्दू युवक तरुण कुमार की हत्या के आरोपितों में शामिल मुस्लिम महिला और उसके परिवार से मिलने आया था। तरुण कुमार की हत्या इस्लामी भीड़ ने की थी।

2024 में अवैध उगाही और धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तारी

सैयद अयूब को पहले भी कानूनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। अप्रैल 2024 में उसे हैदराबाद पुलिस ने उसे धोखाधड़ी और अवैध धन उगाही के आरोप में शिकायत दर्ज की थी। रिपोर्ट के मुताबिक, उस पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग कर गाजा संकट का हवाला देकर धन जुटाने और उस धन के उपयोग को लेकर जनता को गुमराह करने का आरोप है।

यह शिकायत वकील पी. साई किशोर ने हैदराबाद के सैदाबाद पुलिस स्टेशन में दर्ज कराई थी। IPC की धारा 420 के तहत दर्ज FIR के अनुसार, अयूब ने ऑनलाइन चंदा यह दावा करते हुए इकट्ठा किया था कि वे खुद गाजा जाकर राहत सामग्री पहुँचाएँगे।

शिकायत में कहा गया था कि उन्होंने सोशल मीडिया पर अपने निजी बैंक खाते की जानकारी साझा की थी। इसके अलावा, उन्होंने हैदराबाद हवाई अड्डे से और बाद में मिस्र से तस्वीरें पोस्ट की, ताकि लोगों को लगे कि वह राहत सामग्री लेकर गाजा जा रहा है।

शिकायतकर्ता के मुताबिक, पोस्ट लोगों को गुमराह करने के लिए डाले गए थे, क्योंकि हालात को देखते हुए सड़क मार्ग से गाजा तक सहायता भेजना लगभग असंभव था। अयूब पर दानदाताओं को गुमराह करने और झूठे वादे कर फंड जमा करने का भी आरोप लगाया गया था।

शिकायत में उनके NGO के खिलाफ कार्रवाई की भी माँग की गई और अनुरोध किया गया कि ‘हैदराबाद यूथ करेज’ के सोशल मीडिया पेजों को ब्लॉक कर दिया जाए।

2020 में फंड के दुरुपयोग के आरोप में सैयद अयूब की गिरफ्तारी

यह पहली बार नहीं था जब अयूब को गिरफ्तार किया गया था। साल 2020 में, हैदराबाद टास्क फोर्स पुलिस ने उन्हें उसी NGO के अध्यक्ष सलमान खान के साथ गिरफ्तार किया था।

पुलिस ने बताया कि दोनों ने गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों की मदद के लिए आमलोगों से फंड जमा किए और इसका दुरुपयोग किया।

जाँच में पता चला कि NGO ने अपने फेसबुक पेज का इस्तेमाल आर्थिक तंगी से जूझ रहे मरीजों के वीडियो पोस्ट करने के लिए किए और जनता से उनके इलाज के लिए पैसे देने की अपील की।

इस दौरान एक पुरानी बीमारी से पीड़ित महिला का फोटो पोस्ट किया गया और इलाज के लिए चंदा इकट्ठा किये गए। लेकिन कुछ ही दिनों में अच्छी खासी रकम आरोपितों के बैंक खातों में ट्रांसफर कर दिए गए।

पुलिस ने बताया कि ₹15 लाख सलमान खान के बैंक खाते में और ₹15 लाख सैयद अयूब के एक रिश्तेदार के खाते में ट्रांसफर किए गए। शेष रकम एक दूसरे खाते में ही पड़ी रही।

दानदाताओं ने जब शिकायत की, तो पुलिस ने धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया। बाद में, टास्क फोर्स ने हैदराबाद से अयूब और सलमान खान को गिरफ्तार कर लिया। कार्रवाई के दौरान उनके मोबाइल फोन जब्त कर लिए गए।

सड़कों पर नमाज पढ़ने को लेकर चल रही बड़ी बहस

सड़कों पर नमाज पढ़ने का मुद्दा सिर्फ संभल तक ही सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश समेत देश के कई हिस्सों में सड़कों पर नमाज पढ़ने पर पाबंदी लगा दी गई है, क्योंकि इससे ट्रैफिक जाम हो सकता है और आम लोगों को परेशानी हो सकती है।

अगर बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर इकट्ठा होकर नमाज पढ़ते हैं, तो इससे ट्रैफिक जाम हो सकता है और वहाँ रहने वाले लोगों को दिक्कतें पेश आ सकती हैं। इसलिए पुलिस लोगों से कह रही है कि सड़कों के बजाय मस्जिदों, ईदगाहों या नमाज के लिए तय की गई दूसरी जगहों पर ही अपनी नमाज अदा करें।

अधिकारियों ने साफ किया कि ये पाबंदियाँ किसी भी धार्मिक गतिविधि को रोकने के लिए नहीं लगाई गई हैं, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए लगाई गई हैं कि सार्वजनिक जगहों पर सभी लोगों की पहुँच बनी रहे।

मेरठ में भी पाबंदियाँ

मेरठ पुलिस ने रविवार (15 मार्च 2026) को ईद से पहले एक चेतावनी जारी की थी। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अविनाश पांडे ने चेतावनी दी कि सड़कों पर नमाज पढ़ने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

उन्होंने कहा कि नियमों का उल्लंघन करने वालों को पुलिस जाँच का सामना करना पड़ सकता है। यदि कानून-व्यवस्था का गंभीर उल्लंघन पाया गया, तो इसका असर पासपोर्ट जैसे सरकारी दस्तावेजों पर भी पड़ सकता है। बाद में, उन्होंने स्पष्ट किया कि सड़क पर नमाज पढ़ने और पासपोर्ट रद्द होने के बीच कोई सीधा कानूनी नियम नहीं है, लेकिन यदि जाँच में किसी आपराधिक संलिप्तता या बार-बार नियमों के उल्लंघन का पता चलता है, तो अधिकारी मौजूदा कानूनों के तहत आगे की कार्रवाई कर सकते हैं।

(मुूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

USCIRF की रिपोर्ट में RSS पर बैन की सिफारिश, वामपंथी-कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम और इस्लामी गैंग… सब हो गए खुश: जानें इस अमेरिकी आयोग का भारत-विरोधी इतिहास

अमेरिका के एक सरकारी आयोग ने एक बार फिर भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने की कोशिश की है। अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) ने अपनी ताजी रिपोर्ट में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की है। आयोग का दावा है कि यह संगठन हिंदू राष्ट्रवाद का प्रमुख केंद्र है और इसके कारण भारत में मुस्लिम, ईसाई, सिख, दलित और आदिवासी समुदाय भय के माहौल में जी रहे हैं।

हालाँकि यह पहली बार नहीं है जब USCIRF ने भारत और हिंदू संगठनों को निशाने पर लिया हो। पिछले कई वर्षों से यह आयोग लगातार ऐसी रिपोर्टें जारी करता रहा है जिनमें भारत को ‘धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करने वाला देश’ बताया जाता है। भारत सरकार हर बार इन रिपोर्टों को ‘पक्षपाती और राजनीतिक एजेंडे से प्रेरित’ बताकर खारिज करती रही है।

दिलचस्प बात यह है कि USCIRF की इस सिफारिश के सामने आते ही भारत में वामपंथी मीडिया, कॉन्ग्रेसी नेता और कई इस्लामी संगठनों से जुड़े लोग खुलकर खुश होते दिखाई दिए। सोशल मीडिया पर ऐसे लोगों ने इसे ‘सच्चाई सामने आने’ जैसा बताने की कोशिश की। इसमें ये बात जोड़ना अहम है कि कई मौकों पर खुद अमेरिकी सरकार ने भी इसकी सिफारिशों को स्वीकार नहीं किया। भारत के मामले में 2020 की रिपोर्ट भी खारिज कर दी गई थी। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर यह आयोग कितना प्रभावशाली है, इसकी रिपोर्टों की विश्वसनीयता क्या है और क्यों बार-बार भारत इसकी रिपोर्ट्स के केंद्र में होता है।

USCIRF क्या है और इसकी रिपोर्टें क्यों विवादों में रहती हैं

USCIRF यानी अमेरिका का अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) एक अमेरिकी संघीय आयोग है जिसे 1998 में बनाए गए International Religious Freedom Act के तहत स्थापित किया गया था। इसका घोषित उद्देश्य दुनिया के विभिन्न देशों में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति की निगरानी करना और अमेरिकी सरकार को सलाह देना है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह आयोग अक्सर निष्पक्ष मूल्यांकन करने के बजाय राजनीतिक एजेंडे के तहत रिपोर्ट जारी करता है। इसकी रिपोर्टें अक्सर उन्हीं देशों के खिलाफ अधिक कठोर होती हैं जो अमेरिका की विदेश नीति से पूरी तरह सहमत नहीं होते।

भारत जैसे देशों को लेकर USCIRF की रिपोर्टों पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। भारत सरकार कई बार कह चुकी है कि यह आयोग भारत की जटिल सामाजिक संरचना और संवैधानिक व्यवस्था को समझने में पूरी तरह विफल है। भारत के विदेश मंत्रालय ने 2024 में USCIRF की रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा था कि यह संगठन ‘पूर्वाग्रह से भरा और राजनीतिक एजेंडे वाला’ है।

RSS पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश, रिपोर्ट में क्या कहा गया?

USCIRF की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) भारत में हिंदू राष्ट्रवाद का प्रमुख संगठन है और इसके प्रभाव के कारण धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति खराब हुई है। आयोग ने अमेरिकी सरकार से सिफारिश की है कि वह इस संगठन पर प्रतिबंध लगाने या प्रतिबंध जैसी कार्रवाई पर विचार करे। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत में पिछले कुछ वर्षों में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति बिगड़ी है। इसमें भाजपा सरकार, नागरिकता संशोधन कानून (CAA), धर्मांतरण विरोधी कानून और गौ-संरक्षण कानूनों को भी निशाना बनाया गया है।

रिपोर्ट में कहा गया, “व्यक्तियों और संस्थाओं पर लक्षित प्रतिबंध लगाए जाएँ, जैसे भारत की रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R&AW) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), क्योंकि वे धार्मिक स्वतंत्रता के गंभीर उल्लंघनों के लिए जिम्मेदार हैं और उन्हें सहन करते हैं। यह प्रतिबंध उन व्यक्तियों या संस्थाओं की संपत्तियों को फ्रीज करके और/या उन्हें संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रवेश करने से रोककर लागू किया जाए।”

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन से कहा है कि भारत के आरएसएस के साथ ही रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R&AW) पर भी बैन लगाना चाहिए। आयोग ने रिपोर्ट में आरएसएस और रॉ के कामकाज के तरीके पर सवाल उठाए हैं।

USCIRF की रिपोर्ट में RSS पर बैन की सिफारिश(फोटो साभार: Report)

राम मंदिर-बाबरी विवाद-बुलडोजर एक्शन, दिल्ली दंगे और भी बहुत कुछ

रिपोर्ट में राम मंदिर के निर्माण और बाबारी मस्जिद के विध्वंस को लेकर कई बातें लिखी गई हैं। इसमें लिखा है कि साल 2024 में भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति बिगड़ गई। हालाँकि भारत ने इन आरोपों को पहले भी पक्षपातपूर्ण बताया है। रिपोर्ट में 1992 में बाबरी मस्जिद को ढहाने से राम मंदिर को जोड़ा गया है। बाबरी विध्वंस की वही पुरानी कहानी लिखी गई है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का बस जरा सा जिक्र कर उसे किनारे कर दिया गया है।

रिपोर्ट में ‘एंटी कन्वर्जन लॉ’ का भी जिक्र किया गया है। लिखा गया है कि साल भर में, 28 में से 12 राज्यों ने नए धर्मांतरण-विरोधी कानून लागू करने या मौजूदा कानूनों को और सख्त बनाने की कोशिश की।

इसमें छत्तीसगढ़ के ईसाई पादरी द्वारा जबरन हिंदुओं का धर्म परिवर्तन, असम सरकार ने असम हीलिंग (प्रिवेंशन ऑफ ईविल) प्रैक्टिसेज बिल, राजस्थान में लव जिहाद के लिए नया कानून और गुजरात फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट समेत अन्य मामलों का जिक्र किया गया।

रिपोर्ट में पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह पर भी निशाना साधा गया है। लिखा गया है कि जून चुनावों से पहले मुसलमानों के खिलाफ नफरती भाषण और भेदभावपूर्ण बयानबाजी की गई।

USCIRF की रिपोर्ट, भारत पर लिखे हिस्से की कॉपी

खुशी से झूम उठे वामपंथी मीडिया, कॉन्ग्रसी इकोसिस्टम और इस्लामी गैंग से जुड़े लोग

USCIRF की रिपोर्ट सामने आने के बाद भारत में एक खास तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिली। वामपंथी मीडिया संस्थान, कुछ कॉन्ग्रेसी नेता और कई स्वयंभू एक्टिविस्ट सोशल मीडिया पर इसे ‘भारत में हिंदुत्व की पोल खुलना’ बताने लगे।

कॉन्ग्रेस की प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने भी सोशल मीडिया पर USCIRF की रिपोर्ट को साझा करते हुए भाजपा सरकार पर निशाना साधने की कोशिश की।

सुप्रिया श्रीनेत ने एक्स पर लिखा, “आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। यह सिफारिश अमेरिकी सरकार के आयोग यूएससीआईआरएफ ने ट्रंप प्रशासन को दी है। महात्मा गाँधी की हत्या के बाद सरदार पटेल द्वारा आरएसएस पर प्रतिबंध लगाना बिना किसी कारण के नहीं था। यह कट्टरता को बढ़ावा देता है, सांप्रदायिक तनाव को भड़काता है और भारत को वैश्विक स्तर पर शर्मिंदा करता है।”

USCIRF की रिपोर्ट सामने आने के बाद भारत में एक खास तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिली। वामपंथी मीडिया संस्थान, कुछ कॉन्ग्रेसी नेता और कई स्वयंभू एक्टिविस्ट सोशल मीडिया पर इसे ‘भारत में हिंदुत्व की पोल खुलना’ बताने लगे। कई वामपंथी पत्रकारों और एक्टिविस्टों ने भी इसे भारत के खिलाफ एक अंतरराष्ट्रीय ‘सत्यापन’ की तरह पेश किया।

अमेरिका के इस्लामी संगठन Indian American Muslim Council (IAMC) ने बयान जारी कर कहा कि USCIRF की सिफारिश पर भारत को CPC घोषित किया जाए और Bajrang Dal, VHP जैसे संगठनों पर भी सैंक्शन लगाए जाएँ। Hindus for Human Rights और अन्य विदेशी-फंडेड ग्रुप्स ने भी रिपोर्ट को प्रमाण मानकर भारत पर हमला तेज कर दिया। मुस्लिम मिरर जैसे इस्लामी न्यूज आउटलेट भी इसमें शामिल रहे।

ये वही लोग हैं जो CAA-NRC को ‘मुस्लिम विरोधी’, राम मंदिर को ‘बहुसंख्यकवाद’, Article 370 खत्म करने को ‘कश्मीर पर अत्याचार’ कहते रहे। उनका खुश होना स्वाभाविक है – USCIRF ने उनके एजेंडे को अमेरिकी सरकारी मंच दे दिया। लेकिन हकीकत यह है कि ये गैंग भारत की बढ़ती आर्थिक-रणनीतिक स्वायत्तता (रूस से तेल खरीद, QUAD में स्वतंत्र रुख, आत्मनिर्भर भारत) से चिढ़ता है, न कि किसी काल्पनिक ‘अल्पसंख्यक उत्पीड़न’ से। ये अंतरराष्ट्रीय वामपंथी और इस्लामी लॉबी का हिस्सा हैं, जो भारत को कमजोर करने के लिए USCIRF जैसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं।

साल 2020 से लगातार सीपीसी में डालने की सिफारिश

USCIRF ने 2020 से लगातार भारत को CPC की सूची में डालने की सिफारिश की है। 2020 रिपोर्ट में पहली बार CPC सिफारिश की गई थी, लेकिन अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट ने खारिज करते हुए कहा कि भारत में ये सरकारी स्तर पर नहीं, बल्कि कुछ सामुदायिक घटनाएँ थीं। अमेरिकी राजदूत सैमुएल ब्राउनबैक ने कहा था कि पाकिस्तान में तो सरकार स्तर पर ब्लास्फेमी कानून से अल्पसंख्यक जेलों में हैं, भारत में ऐसा नहीं। लेकिन USCIRF नहीं माना।

हर बार एक ही रोना, 2023-2024 की रिपोर्ट्स में भी एक जैसी बात

USCIRF की रिपोर्ट कोई अलग घटना नहीं है। यह सिर्फ उसी रुझान का अगला हिस्सा है, जो 2023 और 2024 की USCIRF और अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट की रिपोर्टों में भी साफ दिखाई देता है। साल 2024 की रिपोर्ट भी लगभग उसी पैटर्न पर बनी थी। उसमें कहा गया था कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता खराब हो रही है, चुनावों के दौरान नफरत भरे भाषणों के दावे दोहराए गए थे और फिर वही मुद्दे उठाए गए थे, बुलडोजर कार्रवाई, धर्मांतरण-निरोधक कानून और गौ-संरक्षण कानून।

रिपोर्ट में साल 2024 में भी यही सुझाव था कि भारत को ‘Country of Particular Concern (CPC)’ घोषित किया जाए और उस पर प्रतिबंध लगाने पर विचार हो ठीक वही बातें जिन्हें 2025 की रिपोर्ट और ज़ोर देकर दोहराती है। भारत ने उस रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज कर दिया था और कहा था कि USCIRF मानवाधिकारों के नाम पर राजनीतिक एजेंडा चला रही है।

साल 2023 की रिपोर्ट पर भारत का जवाब और भी कड़ा था। जून 2024 में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस रिपोर्ट को ‘गहरी पूर्वाग्रही,’ ‘वोट-बैंक आधारित’ और ‘तथ्यों की चुनिंदा और गलत व्याख्या’ बताया था। उन्होंने कहा था कि रिपोर्ट ने भारत के संवैधानिक प्रावधानों, कानूनों और यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भी सवाल खड़े किए, जो किसी भी संप्रभु लोकतंत्र के लिए अस्वीकार्य है। कुल मिलाकर, 2023, 2024 और 2025 की रिपोर्टें एक ही प्रवृत्ति दिखाती हैं और वो है भारत को बदनाम करना।

USCIRF कमिश्नरों के पाकिस्तान, मिशनरी, सोरोस और एंटी-हिंदू काम के लिंक

USCIRF कमिश्नरों की नियुक्ति अमेरिकी राष्ट्रपति और कॉन्ग्रेस द्वारा होती है। साल 2026 की रिपोर्ट के समय मुख्य कमिश्नर के तौर पर जो नाम सामने हैं, उन सभी का अतीत भारत के खिलाफ आग उगलने वाला, हिंदुत्व के खिलाफ बकवास करने वाला और वामपंथी इकोसिस्टम से जुड़े रहने का है। कोई सोरोस से फंडिंग पाता है, तो किसी ने पाकिस्तान में शिक्षा प्राप्त की है। हमने पिछले साल भी इनके बारे में बताया था। इस बार चेयर के तौर पर पाकिस्तानी आसिफ महमूद की जगह विकी हार्ट्जलर का नाम है, पिछले साल की पोजिशन की दोनों ने अदला-बदली की है।

भारत सरकार बता चुकी है पक्षपाती और राजनीतिक एजेंडा सेट करने वाला

भारत सरकार ने USCIRF की रिपोर्टों को लगातार खारिज किया है। बीते साल भी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा था कि यह आयोग “तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करता है और भारत की बहुलतावादी लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर दिखाने की कोशिश करता है।” उन्होंने यह भी कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है जहाँ लगभग सभी प्रमुख धर्मों के लोग रहते हैं और अपने धर्म का पालन करने की पूरी स्वतंत्रता रखते हैं। भारत सरकार का यह भी कहना है कि USCIRF अक्सर अलग-थलग घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है और भारत की संस्थाओं तथा न्यायिक फैसलों को नजरअंदाज कर देता है।

भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव का हिस्सा है USCIRF रिपोर्ट

अमेरिका के United States Commission on International Religious Freedom की रिपोर्ट ने एक बार फिर भारत को लेकर विवाद खड़ा कर दिया है। इस बार निशाने पर RSS है, जिस पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की गई है। राम मंदिर से लेकर नागरिकता कानून और दिल्ली दंगों तक भारत के लगभग हर बड़े राजनीतिक और सामाजिक मुद्दे को इस आयोग की रिपोर्टों में विवादित तरीके से पेश किया गया है।

सवाल यह है कि क्या किसी विदेशी आयोग को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की जटिल सामाजिक व्यवस्था पर अंतिम फैसला सुनाने का अधिकार होना चाहिए? और क्या इन रिपोर्टों का उद्देश्य सचमुच धार्मिक स्वतंत्रता की चिंता है या फिर भारत के खिलाफ एक वैश्विक नैरेटिव तैयार करना?

सदियों पुरानी परंपरा जब मंदिरों से निकल गाँव में जुटते हैं ‘भगवान’, लगती है देव सभा: जानें- ओडिशा के ‘पंचू डोला मेला’ का इतिहास

होली के रंगोत्सव के बाद ओडिशा में एक और रंगों का पर्व मनाया जाता है। इसे पंचू डोला मेला कहा जाता है। भुवनेश्वर से 15 किलोमीटर दूर खुर्दा जिले के हरिराजपुर गाँव में इसकी शुरुआत डोला पूर्णिमा के कुछ दिनों बाद होती है। राधा- कृष्ण की भक्ति से जुड़े इस त्योहार की धूम से पूरा ओडिशा रंगमय हो जाता है। इसलिए इसे होली-2 भी कहा जाता है। इसमें गुलाल की बौछार, पारंपरिक मिठाईयाँ और ईश्वर के प्रति आस्था का गजब का मेलजोल है।

(साभार-@indiabooms)

इस दौरान फूलों से सजाए गए राधा-कृष्ण की मूर्तियों को झूलों पर रख कर गाँवों में घुमाया गया। फाल्गुन महीने की पूर्णिमा के पाँच दिन बाद शुरू होता है। 2026 में मार्च के दूसरे सप्ताह में ये महोत्सव शुरू हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में भक्त एकत्रित हुए। नृत्य संगीत से साथ उत्साहपूर्वक लोगों ने भव्य यात्रा निकाली।

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देवता जुटते हैं एक जगह

इस उत्सव की खासियत यह है कि भुवनेश्वर के आसपास के कई गाँवों से देवी-देवता भव्य जुलूसों के साथ एकत्र होते हैं। गाँव-गाँव के लोग और इस रंगारंग कार्यक्रम को देखने आये आगंतुक एक साथ जुटते हैं हरिराजपुर में।

यहाँ अधिष्ठाता देवता पश्चिमासंभू सोमनाथ देव का वास है। वे प्रतिकात्मक तौर पर सभी मंदिर के देवताओं को उत्सव में शामिल होने के लिए आमंत्रित करते हैं। राधा-कृष्ण और भगवान शिव की मूर्तियाँ खास तरह से सजाए गए डोला बिमान नाम की खूबसूरत लकड़ी की पालकियों में आती हैं। इन पालकियों की बनावट भी मंदिर की तरह होती है। पालकियों को भक्त प्रणाम कर अपनी श्रद्धा दिखाते हैं।

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जैसे ही हर देवता उत्सव स्थल पर पहुँच जाते हैं। पूरा वातावरण उत्साह से भर उठता है। वैदिक मंत्रोच्चार के साथ शंख की आवाज और ढोल की थाप पर लोग नाचते गाते रंग बिरंगे गुलाल से उनका स्वागत करते हैं। एक- एक कर पालकी कतार में लगाई जाती है। इसके बाद भव्य आध्यात्मिक सभा का आयोजन होता है। इसमें अनेक गाँवों के लोग और उनके देवता मौजूद रहते हैं।

4 शताब्दी पुरानी परंपरा

छोटे से गाँव में आसपास के दर्जनों देवी-देवता इस खास कार्यक्रम में आते हैं, जिससे छोटा सा गाँव भक्तिमय हो जाता है। भक्तों के लिए इन देवताओं का एक साथ मिलन काफी मायने रखता है। इस दृश्य को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जमा होते हैं। इसे अत्यंत शुभ और विकास का प्रतीक माना जाता है।

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शाम होते ही पंचू डोला मेला की दिव्य सभा के पास सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन होता है। कीर्तन और भक्तिगीतों से इलाका गूँज उठता है। गाँव की गलियाँ रोशनी से जगमगा उठती हैं । खाने-पीने के स्टॉल लगते हैं और लोग इसका आनंद उठाते हैं। ढोल और झांझरियाँ की गूँज रातभर सुनाई देती है। स्टॉलों में स्थानीय हस्तशिल्प की वस्तुएँ भी मिलती हैं।

भक्तों और वहाँ पहुँचे मेहमानों के लिए सबसे खास होता है देर रात देवताओं की पालकियों में निकलने वाला जुलूस। ये जुलूस सुबह तक निकलते हैं, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु पालकी के साथ चलते हैं, गीत गाते हैं और मिल कर उत्सव मनाते हैं। खूबसूरत आतिशबाजी से आसमान जगमगा उठता है। गीतों, जयकारों और आतिशबाजी से पूरे वातावरण में जादुई दृश्य छा जाता है।

ओडिशा का यह उत्सव चार शताब्दियों से मनाया जाता है। शुरुआत में यह एक गाँव में होने वाला उत्सव था, जिसमें धीरे धीरे कई गाँव शामिल हुए और यह ओडिशा का बड़ा महोत्सव बन गया। अनुष्ठानों और उत्सवों के अलग यह एक गहरी भावना को दर्शाता है।

उत्सव के दौरान भक्तिमय वातावरण में लोग प्रार्थना करते हैं, पारंपरिक मिठाइयाँ बाँटते हैं और घर पर मेहमानों को आमंत्रित करते हैं। एक तरह से यह उत्सव पारिवारिक मिलन का भी जरिया बन जाता है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि महोत्सव आस्था, संस्कृति और आनंद का संगम बन जाता है, जो लोगों को उनकी साझा विरासत की याद दिलाता है।

पंचू डोला मेला में जुटने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह एक महज त्योहार नहीं है। यह ओडिशा की परंपराओं का जीवंत उत्सव है, जहाँ भक्ति रंगों से सराबोर हो जाते हैं, संगीत हवा में गूँजता है और पूरा समुदाय उत्सव की खुशी में रंग जाता है।

आरफा जी, स्ट्रैटेजी बदलो, सच नहीं बदल पाएगा- भारत हिंदू राष्ट्र था, है और रहेगा

‘सेकुलरिज्म’ की चादर ओढ़े एक इंसान में कितनी हिंदू घृणा भरी हो सकती है- अगर आपको चरम देखना है तो आप आरफा खानम शेरवानी को देखिए। अभी तक अपनी एकतरफा पत्रकारिता के लिए कुख्यात इस महिला ने अब खुलकर बोला है कि भारत न कभी हिंदू राष्ट्र था और न कभी बनेगा।

अपने ही 2 दिन पुराने ट्वीट पर कमेंट करते हुए आरफा ने ये जहर उगला है। पुराने ट्वीट में इस महिला ने लिखा था- “कोई भी भारत को मुस्लिम मुल्क नहीं बनाना चाहता और भारत न कभी हिंदू राष्ट्र था और न की होगा। हमने एक सेकुलर, लिबरल, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक के लिए लड़ाई लड़ी थी।”

आरफा खानम शेरवानी के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

क्या है आरफा का ‘सेकुलरिज्म’

पहली नजर में आरफा का कथन आपको बड़ा उदारवादी और संवैधानिक मूल्यों की बात करता हुआ लग सकता है, पर सवाल यह है कि असल में आरफा के लिए ‘सेकुलर’, ‘लिबरल’ और ‘डेमोक्रेटिक रिपब्लिक’ का वास्तविक अर्थ क्या है।

खुद को पत्रकार कहने वाली आरफा के पुराने रिकॉर्ड को देखें तो पता चलता है कि उनके लिए ‘सेकुलरिज़्म’ का मतलब साफ है- एक ऐसा तंत्र जहाँ मुस्लिम अपनी मजहबी पहचान के नाम पर चाहे जो मर्जी वो करें… वहीं हिंदू न खुलकर अपनी पहचान बताए, न अपने धर्म की बातें करें, न अपने हक के लिए लड़े और सबसे महत्वपूर्ण चीज- वो न ही उन कट्टरपंथी तत्वों को उजागर करे जो सालों से उन्हें काफिर कहकर खत्म करने का सपना देखते हैं।

आज तमाम खबरें आती हैं जब भारत में इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों और नेटवर्क का खुलासा होता है। उनके पास से बकायदा ऐसे ब्लूप्रिंट मिलते हैं जो बताते हैं कि वो भारत को कैसे 2047 तक इस्लामी मुल्क बनाने की तैयारी में है। उनकी प्लानिंग तक उजागर होती है कि वो धर्मांतरित करके, लव जिहाद के जरिए, घुसपैठ करवाकर डेमोग्राफी बदलना चाहते हैं…।

लेकिन, इन विषयों पर आरफा और कथित सेकुलर बुद्धिजीवियों एक शब्द नहीं बोलते। उलटा वो अपने पाठकों के दिमाग में ये डालते हैं कि कोई भी भारत को मुस्लिम राष्ट्र नहीं बनाना वाला…। क्या ये कहते हुए आरफा जैसे लोग हर आतंकी, हर कट्टरपंथी और हर घुसपैठिए की जिम्मेदारी ले रहे हैं? या ये सिर्फ उनकी बदली स्ट्रैटेजी का एक हिस्सा है।

भारत, सनातन धर्म और हिंदू राष्ट्र

आज भारत में रहकर वो ये बोल पा रही हैं कि भारत न कभी हिंदू राष्ट्र था और न कभी बनेगा। क्यों…? क्योंकि वो यही सोचती हैं कि भारत की नींव ही मुगलों के आने के बाद पड़ी, उनके हिसाब से भारत में उससे पहले कुछ था ही नहीं।

अब आरफा के लिए ये स्वीकारना कितना भी मुश्किल क्यों न हो मगर हकीकत यही है कि भारत की सांस्कृतिक जड़ें और परंपराएँ हजारों वर्षों से सनातन सभ्यता के इर्द-गिर्द विकसित हुई हैं। यह भूभाग वेदों, उपनिषदों, रामायण, महाभारत, अनगिनत धार्मिक स्थलों, तीर्थ परंपराओं और सांस्कृतिक उत्सवों से निर्मित हुआ है।

सेकुलर चाहकर भी इन तथ्यों को नहीं बदल सकते और न ही इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के उन अनेक अध्ययनों को नकार सकते हैं, जो साबित करते हैं कि भारत एक हिंदू राष्ट्र था, है और रहेगा, जिनसे पता चलता है कि मुगल आक्रांताओं के आने के बाद भारत की सभ्यता बनी नहीं, बल्कि नष्ट हुई।

हिंदुओं के आवाज उठाने पर खतरे पर आ जाता है सेकुलरिज्म

आरफा के हिसाब से अगर उत्तम नगर के तरुण के साथ हुई बर्बरता को देखकर हिंदू बच्चा कोई बयान दे देता है तो इसका मतलब ये होता है कि हिंदुओं ने उसे कट्टर बना दिया। किंतु आरफा वो इस्लामी कट्टरपंथ में सने बच्चे नहीं दिखते जो खुलेआम भारत के खिलाफ जंग छेड़ने की बातें कहते हैं। उन्हें उन बच्चों में जहर नहीं दिखता तो जो मोदी-शाह के लिए अपशब्द उगलते हैं, उन्हें गालियाँ देते हैं। उस समय उन्हें सेकुलर, लोकतंत्र, लिबरल जैसे शब्द नहीं याद आते।

इन्हें समस्या तभी होती है जब हिंदू अपने धर्म की बात करें या मुस्लिम समुदाय द्वारा किए गए किसी अपराध पर अपना आक्रोश जाहिर करें। उत्तम नगर मामले के बाद भी यही होता देखा गया। आरफा को बेचैनी इसी बात से हुई कि आखिर वहाँ का हिंदू क्यों महसूस कर रहा है कि वो हिंदू है और किसी हिंदू के मारे जाने पर उसे गुस्सा भी क्यों आ रहा है।

अगर हिंदू तरुण हत्याकांड जैसी घटनाओं में हिंदू परिवार के साथ खड़े होने के बजाय लोग मानव-श्रृंखला बनाकर मुस्लिम आरोपितों को बचाने लगते, तो शायद आरफा के लिए सेकुलरिज्म का अर्थ सच में सार्थक हो जाता। हालाँकि अफसोस, पिछले कुछ वर्षों में अधिकांश हिंदुओं ने ‘मोहम्मद दीपक’ जैसी हरकतें करना छोड़ दिया है। इसलिए अब आरफा को हर समय देश का लोकतंत्र और सेकुलरिज्म खतरे में दिखाई देता है।

आरफा जैसों की स्ट्रैटेजी

दिलचस्प बात यह है कि भारत में रहकर भारत की सभ्यागत पहचान को नकारने की हिम्मत भी आरफा जैसे लोगों को सिर्फ भारत में ही मिलती है। वरना किसी देश की संस्कृति को नकारने या उससे छेड़छाड़ करने पर कोई कट्टर देश क्या करता होगा, इसका उदाहरण चीन है। वहाँ उइगर मुस्लिमों को डिटेंशन कैंपों में इसलिए रखा जाता है, क्योंकि सरकार को लगता है कि वे उसकी सभ्यता के लिए खतरा हैं।

आज स्थिति यह बन गई है कि भारत में कई बार हिंदुओं को अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व व्यक्त करने या अपनी धार्मिक परंपराओं को निभाने पर भी आलोचना का सामना करना पड़ता है। तुरंत उन पर ‘बहुसंख्यकवाद’ या ‘कट्टरवाद’ का आरोप लगा दिया जाता है। वहीं दूसरी ओर, आरफा खानम शेरवानी जैसे लोग खुले मंचों पर मुस्लिम समाज को स्ट्रैटेजी बदलने की सीख देते हैं, उन्हें समझाती हैं कि कैसे इस्लामिक सोसायटी बनने तक उन्हें मुस्लिम बनकर प्रोटेस्ट नहीं करना है… इसके बावजूद उन्हें लेफ्ट लिबरल वर्ग में निष्पक्ष पत्रकार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है है।

हालाँकि, अब ये पैटर्न आगे नहीं बढ़ने वाला, न आरफा जैसों की पुरानी रणनीति काम आने वाली है। अबब हिंदू जान रहे हैं कि भारत का इतिहास क्या है। हिंदू जान रहे हैं कि देश को हिंदू राष्ट्र कहकर वो इतिहास नहीं बदल रहे।

ईरान का वो न्यूक्लियर ठिकाना, जहाँ बंकर बस्टर बमों का पहुँचना भी मुश्किल: जानें- ‘पिकैक्स माउंटेन’ क्यों बनती जा रही युद्ध की दिशा तय करने वाली जगह

ईरान और इजरायल-अमेरिका संघर्ष का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। एक-दूसरे पर जमकर मिसाइलें दागी जा रही हैं। हजारों लोगों की मौत हो गई और मिडिल ईस्ट के कई अन्य देश इससे प्रभावित हैं। एक ओर इजरायल और अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम को स्थायी रूप से खत्म करने की कोशिश में जुटे हैं तो वहीं दूसरी ओर ईरान अपने परमाणु संसाधनों और तकनीक को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें पहले से कहीं अधिक गहराई में छिपाने की रणनीति अपना रहा है।

इसी रणनीति के केंद्र में एक रहस्यमयी जगह है जिसे खुफिया एजेंसियाँ ‘पिकैक्स माउंटेन’ के नाम से पहचानती हैं। यह स्थान अब इस युद्ध की सबसे बड़ी पहेली बन चुका है क्योंकि एक्सपर्ट्स का मानना है कि यदि इस ठिकाने को पूरी तरह नष्ट नहीं किया गया तो ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह खत्म करना लगभग असंभव होगा।

ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर लगी अमेरिकी नजर

अमेरिका पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि युद्ध के दौरान उसकी सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक ईरान की परमाणु हथियार बनाने की क्षमता खत्म करना है। इसी उद्देश्य से अमेरिका और इजरायल पिछले कुछ समय से ईरान के कई परमाणु प्रतिष्ठानों को निशाना बनाते रहे हैं।

पिछले साल जून में अमेरिका ने ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर‘ के तहत ईरान के तीन प्रमुख परमाणु केंद्रों ‘फोर्डो, नतान्ज और इस्फहान’ पर शक्तिशाली बमों से हमला किया था। उस समय अमेरिका और इजरायल ने दावा किया था कि इन हमलों से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को भारी क्षति पहुँची है।

हालाँकि, बाद में सामने आई सैटेलाइट तस्वीरों और खुफिया रिपोर्टों ने यह संकेत दिया कि ईरान ने अपने परमाणु ढाँचे को पूरी तरह समाप्त नहीं होने दिया बल्कि इन हमलों के बाद उसने अपने कई संवेदनशील कार्यक्रमों को पहले से अधिक गहराई में ट्रांसफर करना शुरू कर दिया था।

‘पिकैक्स माउंटेन’ का रहस्य

अमेरिका के ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नष्ट करने के सपने और परमाणु बम के बीच ‘पिकैक्स माउंटेन’ खड़ा है। यह स्थान ईरान के नतान्ज परमाणु केंद्र के पास जाग्रोस पर्वतमाला में स्थित है और स्थानीय तौर पर इसे ‘कुह-ए कोलांग गाज ला’ के नाम से भी जाना जाता है।

एक्सपर्ट का अनुमान है कि यह सुविधा पहाड़ के भीतर लगभग 330 फीट यानी करीब 100 मीटर की गहराई में बनाई गई है। यह गहराई ईरान के प्रसिद्ध फोर्डो यूरेनियम संवर्धन संयंत्र से भी अधिक बताई जा रही है। यही वजह है कि सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि इस ठिकाने को हवाई हमलों से नष्ट करना बेहद कठिन हो सकता है। यानी यह एक ऐसा ठिकाना है जिसे बंकर बस्टर बम से भी नष्ट करना मुश्किल है।

सैटेलाइट तस्वीरों में इस स्थान पर भारी निर्माण गतिविधियाँ दिखाई दी हैं। पहाड़ के भीतर जाने वाले 2 सुरंगों के दरवाजों को मिट्टी और पत्थरों से और मजबूत किया गया है। इसके अलावा वहाँ खुदाई से निकले मलबे के बड़े ढेर और भारी मशीनरी भी देखी गई है जो इस बात का संकेत देती है कि अंदर अभी भी निर्माण और विस्तार का काम जारी है।

फरवरी 2026 की पिकैक्स माउंटेन की सैटेलाइट तस्वीर

ईरान के एनरिच्ड यूरेनियम का सवाल

अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार ईरान के पास अभी भी 60% तक संवर्धित (एनरिच्ड) यूरेनियम का एक बड़ा भंडार मौजूद है। यह मात्रा लगभग 900 पाउंड बताई जाती है। परमाणु विशेषज्ञों के मुताबिक, इतनी मात्रा में उच्च स्तर तक एनरिच्ड यूरेनियम को यदि और आगे रिफाइन किया जाए तो इससे कई परमाणु बम तैयार किए जा सकते हैं। बताया जाता है कि इतनी मात्रा करीब 11 बम बनाने के लिए पर्याप्त है।

यही कारण है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को चिंता है कि यह सामग्री यदि पूरी तरह सुरक्षित और छिपी रही तो भविष्य में ईरान अपेक्षाकृत कम समय में परमाणु हथियार बनाने की क्षमता हासिल कर सकता है।

खुफिया रिपोर्टों में यह आशंका जताई गई है कि ईरान ने इस यूरेनियम का कुछ हिस्सा फोर्डो संयंत्र और इस्फहान के परमाणु परिसर के बीच विभिन्न अलग-अलग जगहों पर रख दिया था। वहीं, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि युद्ध के बीच यूरेनियम का बड़ा हिस्सा ‘पिकैक्स माउंटेन’ में छिपाया जा रहा है।

‘पिकैक्स माउंटेन’: यूरेनियम संवर्धन से आगे की सोच

अमेरिकी थिंक टैंक ‘फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज’ के विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान नतान्ज के पास एक नया यूरेनियम संवर्धन संयंत्र तैयार करने की कोशिश कर रहा है। यदि ऐसा हुआ तो यह संयंत्र ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लंबे समय तक जीवित रखने में मदद कर सकता है।

कुछ विश्लेषकों का यह भी मानना है कि पिकैक्स माउंटेन केवल यूरेनियम संवर्धन के लिए ही नहीं बल्कि सेंट्रीफ्यूज मशीनों के निर्माण के लिए भी इस्तेमाल हो सकता है। सेंट्रीफ्यूज वे मशीनें होती हैं जिनकी मदद से यूरेनियम को हाई लेवल तक संवर्धित किया जाता है। यदि ईरान इन मशीनों का उत्पादन सुरक्षित स्थान पर जारी रखता है तो किसी भी हमले के बाद वह अपने परमाणु कार्यक्रम को फिर से शुरू कर सकता है।

ईरान की आधिकारिक प्रतिक्रिया

ईरान की सरकार लगातार यह कहती रही है कि उसका न्यूक्लियर प्रोग्राम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। ईरानी अधिकारियों के अनुसार, ‘पिकैक्स माउंटेन’ में कोई परमाणु हथियार कार्यक्रम नहीं चल रहा है। उनका कहना है कि यह स्थान सेंट्रीफ्यूज प्रोडक्शन प्लांट के रूप में विकसित किया जा रहा है।

कुछ समय पहले जब इस स्थान के बारे में सवाल उठाए गए तो ईरान के शीर्ष सुरक्षा अधिकारी अली लारीजानी ने भी इस पर ज्यादा जानकारी देने से इनकार कर दिया। उन्होंने इतना जरूर कहा कि ईरान ने अपने किसी भी परमाणु स्थल को पूरी तरह बंद नहीं किया है और भविष्य में वे जारी भी रह सकते हैं या बंद भी किए जा सकते हैं।

ईरान में जमीनी कार्रवाई करेगा अमेरिका

सैन्य विशेषज्ञों के बीच एक बड़ी बहस इस बात को लेकर चल रही है कि यदि यह फैसिलिटी वास्तव में इतनी गहराई में है तो इसे खत्म करने के लिए केवल हवाई हमले पर्याप्त नहीं होंगे। कई विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के गहरे भूमिगत बंकरों को पूरी तरह निष्क्रिय करने के लिए जमीनी सैनिकों की कार्रवाई जरूरी हो सकती है।

इसका मतलब यह होगा कि यदि अमेरिका या उसके सहयोगी देश ‘पिकैक्स माउंटेन’ को पूरी तरह निष्क्रिय करना चाहते हैं तो उन्हें ईरान की जमीन पर विशेष बलों को भेजना पड़ सकता है। हालाँकि, यह विकल्प बेहद खतरनाक होगा क्योंकि इससे युद्ध का दायरा और अधिक बढ़ सकता है।

युद्ध की दिशा तय करने वाला ठिकाना

अभी तक ‘पिकैक्स माउंटेन’ सिर्फ एक गुप्त भूमिगत ठिकाना माना जा रहा था लेकिन अब इसे ईरान के परमाणु कार्यक्रम का सबसे सुरक्षित ठिकाना समझा जा रहा है। माना जा रहा है कि ईरान ने यहाँ अपने परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी महत्वपूर्ण चीजें और संवर्धित यूरेनियम छिपाकर रखा है।

अगर यह ठिकाना सुरक्षित रहता है और ईरान यहाँ से अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाता रहता है तो अमेरिका और इजरायल के लिए अपना मुख्य लक्ष्य हासिल करना मुश्किल हो जाएगा। वहीं, अगर किसी तरह इस ठिकाने को नष्ट या बंद कर दिया जाता है तो ईरान के परमाणु कार्यक्रम को बहुत बड़ा झटका लग सकता है और उसकी परमाणु क्षमता कई साल पीछे चली जाएगी।

यही कारण है कि ‘पिकैक्स माउंटेन’ अब सिर्फ एक पहाड़ी ठिकाना नहीं बल्कि इस पूरे युद्ध का ऐसा केंद्र बन गया है जिस पर आने वाले समय में बड़े फैसले और रणनीतियां निर्भर कर सकती हैं।

लखनऊ के इमामबाड़े में महिलाओं को सिर ढकने के लिए किया जा रहा मजबूर, मौलाना बोले- बिना हिजाब के रोकेंगे एंट्री: विरोध में उतरे महिला संगठन

लखनऊ के मशहूर इमामबाड़े में अब महिलाएँ बगैर सिर ढके नहीं जा पाएँगी। इमामबाड़ा प्रशासन के इस ड्रेस कोड का विरोध हो रहा है। महिलाओं का कहना है कि मस्जिद में जाने वक्त तो समझ में आता है कि सिर ढक कर जाना चाहिए, लेकिन इमामबाड़ा में मस्जिद के बाहर सैर करने के लिए बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं। ऐसे आदेश से उनका आना कम हो जाएगा। फिर ये ‘स्वतंत्रता के अधिकार’ का भी उल्लंघन है।

शिया समुदाय की माँग को मान गया इमामबाड़ा प्रशासन

लखनऊ के ऐतिहासिक इमामबाड़े में एंट्री के वक्त महिलाओं को सिर ढक कर जाना होगा, वरना प्रवेश नहीं दिया जाएगा। इमामबाड़ा प्रशासन ने शिया समुदाय के माँग को मान लिया है।

शिया समुदाय ने कई सालों से इसकी माँग कर रहा था। हुसैनी टाइगर्स के कार्यकर्ताओं की माँग पर हुसैनबाद ट्रस्ट के सचिव एडीएम पश्चिम एचपी शाही ने मंजूरी दे दी। एसडीएम का कहना है कि बड़ा इमामबाड़ा शिया समुदाय का धार्मिक स्थल है, इसलिए समुदाय की माँग के मुताबिक महिलाओं के लिए सिर ढकना अनिवार्य कर दिया गया है।

अब जो पर्यटक यहाँ घूमने आएँगे उन्हें दुपट्टा उपलब्ध कराया जाएगा। इसके लिए टिकट काउंटर के साथ ही दुपट्टा देने के लिए भी काउंटर बनेगा।प्रवेश के वक्त ही सिर ढकने के लिए कहा जाएगा। जो महिला सिर नहीं ढकेगी, उसे प्रवेश नहीं दिया जाएगा।

इमामबाड़ा प्रशासन के फैसले पर शिया मौलाना कल्बे जव्वाद ने सही कदम करार दिया है। उनका कहना है कि हर धार्मिक स्थल के कानून होते हैं। बिना हिजाब में जाने से रोकने का हमें पूरा हक है। इमामबाड़ा धार्मिक जगह है, वहाँ बिना सिर ढके एंट्री नहीं मिलेगी।

महिलाओं को अंदर जाने से रोका जा रहा है

इमामबाड़ा में मस्जिद के अलावा भी पर्याप्त जगह है जहाँ घूमने हर धर्म-संप्रदाय के लोग जाते हैं। ऐसे में इमामबाड़ा में एक हिन्दू लड़की को प्रवेश करने से रोका गया। लड़की का दावा है कि उसे सिर ढकने के लिए कहा गया। उसे इमामबाड़े में हिजाब पहन कर आने को कहा गया।

इतना ही नहीं इमामबाड़ा घूमने के लिए गई हिन्दू लड़कियों को ‘डेथ टू अमेरिका एंड इजरायल’ लिखी जगह पर लात मारने के लिए कहा गया।

पर्यटकों पर थोपा जा रहा आदेश

कई महिला संगठनों ने इमामबाड़ा प्रशासन और हुसैनाबाद ट्र्स्ट के फैसले पर ऐतराज जताया है। इनका कहना है कि इमामबाड़ा सिर्फ धार्मिक स्थल ही नहीं पर्यटन स्थल भी है। यहाँ मस्जिद के अलावा भी देखने के लिए बहुत कुछ है। पर्यटक इसलिए यहाँ आते हैं। ऐसे में सभी पर अपना रीति-रिवाज नहीं थोप सकते।

आली संस्था की रेनू मिश्रा ने कहा कि राज्य सरकार या हाई कोर्ट को पहल कर इस पर रोक लगानी चाहिए। इस तरह के फैसले महिलाओं को मध्यकालीन युग में ले जाते हैं। भारत का संविधान भी उनको इस बात की इजाजत नहीं देता है।

बज्में ख्वातीन संस्था की शहनाज सिदरत का कहना है कि इस्लाम में कहा गया है कि किसी के ऊपर कोई आदेश नहीं थोपा जा सकता। जो पर्यटक घूमने आते हैं, उन्हें गेट पर ही सिर ढकने के लिए मजबूर करना सही नहीं है। अगर कोई नहीं ढकना चाहता, तो उसकी एंट्री बैन करना गलत है।

महिलाओं का मानना है कि यहाँ दीवारों पर लोग लिख कर खराब करते हैं, उन्हें तो कोई नहीं रोकता। हर जगह गंदगी फैलाने वालों पर तो कोई एक्शन नहीं लेता। पर्यटक जो यहाँ आते हैं, उनमें से बड़ी संख्या गैर मुस्लिम होती है। उन्हें सिर ढकने के लिए मजबूर करना तानाशाही रवैया है। महिलाओं ने यह भी पूछा है कि आखिर महिलाएँ ही सिर ढक कर क्यों जाएँ?

क्या इंडिया टुडे कॉन्कलेव में लॉरा लूमर और राजदीप सरदेसाई की ‘जुबानी जंग’ एक सुनियोजित तमाशा थी?

इंडिया टुडे ग्रुप ने इस हफ्ते ‘इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2026’ का आयोजन किया। इस कार्यक्रम के वक्ताओं की सूची में एक नाम ऐसा था जिसने तुरंत विवाद खड़ा कर दिया। यह नाम था लॉरा लूमर। एक अमेरिकी कमेंटेटर, जो डोनाल्ड ट्रंप के राजनीतिक दायरे और MAGA इकोसिस्टम से जुड़ी मानी जाती हैं। लूमर ने भड़काऊ बयानबाजी और उकसावे के कारण अपनी पहचान बनाई है।

हालाँकि, इस कार्यक्रम में उनका नाम आने पर जो विवाद हुआ, वह सिर्फ उनकी राजनीति की वजह से नहीं था। असली वजह उनकी भारतीयों और भारतीय मूल के लोगों के बारे में नस्लभेदी अपमानजनक टिप्पणियाँ करने को लेकर है। इसी कारण उनके आमंत्रण को लेकर काफी आलोचना और बहस शुरू हो गई।

जब लूमर ने ‘एक्स’ पर पोस्ट करके खुद बताया कि वह कॉन्कलेव में हिस्सा लेने के लिए भारत आ रही हैं, तो भारतीयों ने तुरंत उनके पुराने पोस्ट ढूँढने शुरू कर दिए। सोशल मीडिया पर उनके पुराने पोस्ट के स्क्रीन शॉट तेजी से वायरल होने लगे। उन पोस्ट में लूमर ने भारतीयों को ‘थर्ड वर्ल्ड इवेडर्स’ कहा था, भारत की सफाई व्यवस्था का मजाक उड़ाया था और भारतीयों की बौद्धिक क्षमता पर भी सवाल उठाए थे।

एक और विवादित मामले में लूमर ने भारतीय-अमेरिकी टेक्नोलॉजिस्ट श्रीराम कृष्णन पर तीखा हमला किया था, जब उन्हें व्हाइट हाउस में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के लिए सीनियर पॉलिसी एडवाइजर बनाया गया था। लूमर ने सवाल उठाया था कि अमेरिका में प्रभावशाली पदों पर प्रवासियों को क्यों रखा जाना चाहिए।

लूमर ने पहले भी कमला हैरिस की भारतीय पृष्ठभूमि का मजाक उड़ा चुकी हैं और ‘करी’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए टिप्पणी की थी, जिससे काफी गुस्सा और आलोचना हुई थी। भारत विरोधी बयानों के अलावा लूमर पहले भी कई विवादों में रह चुकी हैं।

उन्होंने 11 सितंबर के हमलों को लेकर साजिश से जुड़ी बातें फैलाने की कोशिश की थी और कोविड-19 महामारी के दौरान भी गलत जानकारी फैलाने के आरोप लगे थे। यहाँ तक कि रिपब्लिकन सीनेटर थॉम टिलिस ने भी एक बार उन्हें ‘पागल साजिश थ्योरी फैलाने वाली’ कहकर खारिज कर दिया था।

लॉरा लूमर की इस पृष्ठभूमि को देखते हुए सोशल मीडिया पर तुरंत एक सवाल उठने लगा। सवाल यह था कि एक बड़ा भारतीय मीडिया मंच ऐसे व्यक्ति को क्यों आमंत्रित करेगा, जिसने बार-बार भारत और भारतीयों का अपमान किया हो?

इस पर लोगों की नाराजगी बहुत तेजी से सामने आई। सोशल मीडिया यूजर्स ने लूमर के पुराने पोस्ट के स्क्रीनशॉट फिर से शेयर करने शुरू कर दिए। इन पोस्ट में वह भारत की सफाई व्यवस्था का मजाक उड़ाती नजर आई थीं, भारतीयों को ‘थर्ड वर्ल्ड इनवेडर्स’ कहती थीं और भारतीय प्रवासियों को ‘हाई-स्किल्ड वर्कर्स’ बताने का भी मजाक बनाती थीं, जबकि भारत में बुनियादी ढाँचे की कमी होने की बात कहती थीं।

आलोचकों ने इस निमंत्रण को हैरान करने वाला और नुकसान पहुँचाने वाला कदम बताया। उनका कहना था कि जिस व्यक्ति का भारत विरोधी बयानों का रिकॉर्ड रहा है, उसे इतना बड़ा मंच देना गलत है। इससे ऐसे नफरत भरे विचारों को मान्यता मिलने का खतरा पैदा होता है, जिनका विरोध करने की बात भारतीय मीडिया संस्थान अक्सर करते हैं।

लेकिन इसके बाद एक नया मोड़ आया। कॉन्क्लेव के सत्र के दौरान वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने लूमर से उनके पुराने बयानों को लेकर सीधा सवाल किया। उन्होंने लूमर के कई विवादित ट्वीट्स का जिक्र किया और पूछा कि क्या उन्हें उन पर पछतावा है। राजदीप ने लूमर से कहा, “आपके बयान खुलकर नस्लभेदी और इस्लामोफोबिक हैं।”

इस पर लूमर ने जवाब देते हुए माना कि उनके कुछ पुराने पोस्ट सच में हद पार कर गए थे। लूमर ने कहा, “दूसरे ट्वीट्स में मैंने जो कुछ बातें लिखी थीं, उनमें से कुछ मुझे नहीं कहना चाहिए थीं।” उन्होंने यह भी कहा कि अगर उनके बयानों से भारतीयों की भावनाएँ आहत हुई हैं तो वह इसके लिए माफी माँगती हैं। लूमर ने एक और चौंकाने वाली बात कही कि भारतीयों को लेकर उनके कुछ ट्वीट्स ‘एक्स’ ने खुद की हटा दिए थे और उनके पास इसे स्वीकार करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था।

साथ ही कुछ मुद्दों पर उन्होंने अपनी बात पर कायम रहने की कोशिश भी की। लूमर ने H-1B वीजा कार्यक्रम के विरोध के लिए माफी माँगने से इनकार कर दिया और कहा कि एक अमेरिकी एक्टिविस्ट के तौर पर उनका काम अमेरिकी कामगारों के हितों की रक्षा करना है। उन्होंने अपनी बात को थोड़ा नरम करते हुए यह भी कहा कि उन्हें भारतीय का हिंदुओं से कोई नफरत नहीं है और वह कट्टर इस्लामी द्वारा हिंदुओं पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ भी बोल चुकी हैं।

दोनों की यह बातचीत बहुत जल्द ही वायरल हो गई। सरदेसाई द्वारा लूमर से सवाल पूछने वाले वीडियो क्लिप्स सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गए। ऑनलाइन दुनिया के कई लोग, चाहे वे इंडियन नेशनल कॉन्ग्रेस के समर्थक हों या खुद को नॉन-लेफ्ट कहने वाले हों, इस पर को पत्रकारिता की जीत बताने लगे।

सरदेसाई को उस पत्रकार के रूप में सराहा गया जिसने ‘एक नस्लभेदी को उसकी जगह दिखाने का साहस किया।’ वहीं लूमर की आंशिक माफी को भी कहानी की जीत यानी नैरेटिव विक्ट्री के रूप में पेश किया गया।

कुछ और लोग भी थे जिन्होंने ऑनलाइन लूमर की भद्दी टिप्पणियों को लेकर उन्हें ‘कॉनफ्रंट’ के लिए राजदीप सरदेसाई को ‘धन्यवाद’ कहा। और बस यहीं से पूरी चर्चा का फोकस बदल गया।

शुरुआत में असली विवाद यह था कि लूमर को आखिर बुलाया ही क्यों गया। लेकिन कुछ ही घंटों में बातचीत इस बात पर आ गई कि मंच पर उनसे कितने प्रभावी तरीके से सवाल पूछे गए।

इंडिया टुडे द्वारा लौरा लूमर को सम्मेलन में आमंत्रित करने पर राजदीप सरदेसाई ने आक्रोश क्यों नहीं जताया?

इस पूरे मामले का एक और पहलू है जो और ज्यादा सवाल खड़े करता है और वह है खुद राजदीप सरदेसाई की भूमिका। अगर सरदेसाई सच में लूमर द्वारा भारत और भारतीयों के बारे में कही गई गंदी बातों से नाराज थे, तो उम्मीद की जाती कि यह नाराजगी कॉन्क्लेव में कैमरे चलने से पहले ही सामने आ जाती।

आखिरकार, सरदेसाई सोशल मीडिया पर सबसे सक्रिय पत्रकारों में से एक माने जाते हैं। ‘एक्स’ पर वह अक्सर ‘स्टोरीज दै कॉट माई आई’ नाम से एक लोकप्रिय थ्रेड चलाते हैं, जिसमें वे उन मुद्दों को सामने लाते हैं कि जिन्हें वे सार्वजनिक चर्चा के लायक मानते हैं। जब भी उन्हें लगता है कि कोई नेता, संस्था या सार्वजनिक व्यक्ति हद पार कर रहा है, तो वह उसकी आलोचना करने से भी पीछे नहीं हटते।

इसी वजह से कॉन्क्लेव से पहले के दिनों में इस मुद्दे पर उनकी चुप्पी कई लोगों को हैरान करने वाली लगती है।

जब लूमर ने बताया कि वह इंडिया टुडे ग्रुप द्वारा आयोजित कॉन्क्लेव में बोलने के लिए भारत आ रही हैं, तो तुरंत ही विरोध शुरू हो गया। भारतीयों का मजाक उड़ाने और अमेरिका में उनकी जगह पर सवाल उठाने वाले उनके पुराने ट्वीट्स के स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर तेजी से फैलने लगे।

लेकिन उस समय सरदेसाई की ओर से कोई सार्वजनिक आपत्ति सामने नहीं आई.

यही वह समय था जब वह अपनी हैरानी या नाराजगी जाहिर कर सकते थे। नेटवर्क के एक वरिष्ठ संपादकीय चेहरे के तौर पर वह आसानी से ‘एक्स’ पर पोस्ट करके सवाल उठा सकते थे कि आखिर कोई मीडिया संस्था ऐसे व्यक्ति को क्यों बुला रही है जिसका रिकॉर्ड भारतीयों का अपमान करने का रहा है।

इसके बजाए, सरदेसाई कॉन्क्लेव में ही मंच पर पहुँचे और वहीं लूमर से उनके बयानों को लेकर सवाल किए। यह बातचीत लगभग एक ‘तैयार पैकेज’ की तरह सामने आई, जिसमें उनके आपत्तिजनक ट्वीट्स पर सवाल पूछे गए, लूमर ने माना कि उनमें से कुछ गलत थे और फिर लाइव दर्शकों के सामने उन्होंने आंशिक माफी भी दे दी।

यह पल जल्दी ही वायरल हो गया।

लेकिन बाद में जब इस पूरे क्रम को देखा जाए, तो यह कम अचानक और ज्यादा पहले से तय किया हुआ लगता है। पहले कोई सार्वजनिक आपत्ति न होना और फिर सही समय पर मंच पर सीधा सामना होना, यह संभावना भी पैदा करता है कि यह बातचीत पहले से ही कैमरों के सामने होने के लिए तय थी, न कि सार्वजनिक बहस की अनिश्चित स्थिति में।

यहीं से हम फिर बड़े सवाल पर लौटते हैं।

क्योंकि घटनाओं का यह कर्म लगभग एक सावधानी से लिखी गई ‘स्क्रिप्ट’ जैसा लगता है। पहले एक ऐसे विवादित व्यक्ति को बुलाना जिसके पुराने बयान आपत्तिजनक रहे हों, फिर जब वे बयान दोबारा सामने आएँ तो गुस्सा बढ़ने देना और उसके बाद कार्यक्रम के दौरान एक नाटकीय टकराव दिखाना।

इस टकराव से वायरल कंटेंट बनता है, मेहमान आंशिक माफी देता है और मेजबान नेटवर्क की छवि अचानक बदल जाती है। अब उसे उस मंच के रूप में नहीं देखा जाता जिसने विवादित आवाज को मंच दिया, बल्कि उस मंच के रूप में दिखाया जाता है जिसने उससे जवाब माँगा।

यहीं से पूरी कहानी बदल जाती है।

‘इंडिया टुडे ने भारत विरोधी नस्लवादी टिप्पणीकार को मंच दिया’ वाली कहानी को ‘देखिए इंडिया टुडे ने उसका सामना कैसे किया’ में कैसे बदल दिया गया?

‘इंडिया टुडे ने ऐसे व्यक्ति को क्यों बुलाया जिसने बार-बार भारतीयों का अपमान किया?’ इस सवाल की जगह कहानी बदलकर ‘देखिए इंडिया टुडे ने उनसे कैसे सवाल किए’ बन जाती है।

असल में पूरे विवाद को एक तरह के दृश्य और तमाशे के जरिए शांत कर दिया जाता है।

इसी वजह से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पूरा मामला, निमंत्रण से लेकर मंच पर टकराव और फिर माफी तक, एक तरह का नैरेटिव डैमेज कंट्रोल था या शायद नैरेटिव लॉन्ड्रिंग भी।

आखिरकार, नतीजा ऐसा दिखाई देता है जिससे इस पूरे मामले में शामिल लगभाग हर पक्ष को फायदा मिलता नजर आता है।

लूमर इस पूरे मामले के बाद ऐसी स्थिति में बाहर आईं जहाँ उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपने कुछ बयानों को थोड़ा नरम किया और भारत के प्रति कम विरोधी छवि दिखाने की कोशिश की। सरदेसाई को सोशल मीडिया पर उनसे सवाल करने के लिए खूब सराहना मिली। वहीं इंडिया टुडे ग्रुप भी बातचीत का फोकस उस असहज सवाल से हटाने में सफल रहा, जिससे शुरुआत में पूरा विवाद शुरू हुआ था।

वायरल वीडियो के इस दौर में जो चीज एक पत्रकार और एक विवादित कमेंटेटर के बीच अचानक हुई बहस जैसी दिख रही थी, वह शायद कुछ और भी हो सकती है। यह एक ऐसा सुविधाजनक नाटक भी हो सकता है जिसने छवि से जुड़े संकट को एक ऐसे पल में बदल दिया, जहाँ सब कुछ पहले से तय तरीके से जवाबदेही दिखाने जैसा लगे।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

‘ब्रेन वॉशिंग’ से लेकर अवैध धर्मांतरण से पैदा हुए बच्चों के धर्म के निर्धारण के नियम: जानिए क्या है महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026, जो लगाएगा ‘लव जिहाद’ पर लगाम

‘महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2026’ महाराष्ट्र विधानसभा में पेश हो चुका है। इसमें लालच, बहला-फुसला कर या झाँसा देकर अवैध तरीके से कराए गए धर्मांतरण को रोकने के लिए सख्ती बरती गई है। ऐसे मामले में 7 साल जेल और 1 लाख से 5 लाख तक जुर्माना का प्रावधान है।

धर्मांतरण से 60 दिन पहले सूचित करने को भी अनिवार्य कर दिया गया है। नाबालिग, महिला, एससी-एसटी और मानसिक रूप से अस्वस्थ्य व्यक्ति के केस में सजा का प्रावधान ज्यादा है। बार-बार ऐसा करने पर आरोपितों को 10 साल सजा दी जा सकती है।

विधेयक में बच्चों के धर्म निर्धारण के प्रावधान

धर्म स्वतंत्रता विधेयक 2026 के मुताबिक, अगर किसी महिला की जबरदस्ती या झाँसे में लेकर शादी कर दी जाती है। ऐसी स्थिति में जो बच्चा पैदा होता है, तो उस बच्चे को माँ के मूल धर्म का माना जाएगा, यानी वह धर्म जो धर्मांतरण से पहले वह अपनाती थी। इस केस में बच्चे को माता-पिता की संपत्ति से भरण-पोषण पाने का अधिकार भी मिलेगा।

कानून में ‘ब्रेनवॉशिंग’ को अपराध माना गया है। बिल में ‘शिक्षा के माध्यम से ब्रेनवॉशिंग’ को अवैध धर्मांतरण का जरिया बताया गया है। इसमें एक धर्म को दूसरे से बेहतर बताना भी ‘लालच’ की श्रेणी में आएगा। साथ ही, किसी धर्म के रीति-रिवाजों को नकारात्मक तरीके से पेश करना ‘अवैध प्रभाव’ की श्रेणी में आएगा।

विधेयक में पुलिस को कार्रवाई की विशेष शक्ति दी गई है। पुलिस को अगर लगता है कि जबरन धर्मांतरण हुआ है या कानून का पालन नहीं किया गया है, तो बिना औपचारिक शिकायत के भी स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई करने कर सकती है।

खास बात है कि विधेयक में ‘प्रलोभन’ का दायरा बढ़ा दिया गया है। शिक्षा के अलावा, पैसा देकर या गिफ्ट देकर, रोजगार की सुविधा मुहैया कराकर या फिर धार्मिक संस्थानों द्वारा मुफ्त शिक्षा देकर धर्मांतरण करना ‘लालच’ की श्रेणी में ही आएगा। किसी गरीब को शादी का वादा कर या दैवी उपचार का झाँसा देकर धर्मांतरण करना भी इस कानून के तहत अपराध है।

विधेयक में संस्थाओं पर कार्रवाई का भी प्रावधान है। यदि कोई संस्था या संगठन इसमें शामिल पाया जाता है, तो उसका पंजीकरण रद्द किया जा सकता है और जिम्मेदार लोगों को 7 साल तक की जेल हो सकती है।

धर्म बदलने से 60 दिन पहले जानकारी देना जरूरी

विधेयक में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करना चाहता है, तो उसे कम से कम 60 दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट को लिखित सूचना देनी होगी। इसमें व्यक्ति का नाम, उम्र, किस धर्म में है, किसे ज्वाइंन करना है- जैसी जानकारी देनी होगी।

इसके बाद स्थानीय जिला प्रशासन इसकी जाँच करेगा कि वह व्यक्ति किसी दबाव में या लालच में धर्मांतरण तो नहीं कर रहा। सारी जाँच के बाद ही उसे धर्मांतरण की अनुमति दी जाएगी। शादी के 25 दिन के अंदर इसका पंजीकरण करना भी जरूरी होगा, वरना इसे मान्यता नहीं दी जाएगी।

अगर कोई कानून का पालन नहीं करता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। धर्म परिवर्तन के नियमों का पालन अगर नहीं किया जाता है, तो धर्मांतरण को अवैध घोषइक किया जाएगा। उसे जेल और जुर्माना या दोनों सजा का सामना करना पड़ सकता है। उसे 7 साल जेल हो सकती है। एक लाख का जुर्माना लगाया जा सकता है। अगर मामला किसी महिला, नाबालिग,एससी, एसटी से जुड़ा होता है, तो 5 लाख तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

मास कन्वर्जन को लेकर सख्ती

दो या दो से अधिक लोगों के एक साथ धर्म परिवर्तन को मास कन्वर्जन माना जाएगा। ऐसे मामलों में आयोजकों और धर्मांतरण से जुड़े लोगों को सख्त सजा देने का प्रावधान है। दोबारा ऐसा ही होता है तो उस व्यक्ति को 7 लाख रुपए तक जुर्माना देने पड़ सकता है।

धर्म परिवर्तन की शिकायत पीड़ित, उसके भाई-बहन, माता-पिता और दूसरे रिश्तेदार भी कर सकते हैं। पुलिस ऐसे मामलों को दर्ज करने में कोताही नहीं बरत सकती। कई बार जबरन धर्मांतरण के शिकार लोगों के पुनर्वास और रहने-खाने की व्यवस्था भी सरकार कर सकती है।

किन-किन राज्यों में लागू है धर्मांतरण कानून

पिछले 8 सालों में बीजेपी शासित कई सरकारों ने इस तरह के धर्मांतऱण को रोकने के लिए कानून बनाए हैं, ताकि किसी व्यक्ति को, खासकर महिलाओं को आसानी से अवैध तरीके से धर्मांतरण नहीं कराया जा सके। इन कानूनों का मकसद लव जिहाद से हिंदू लड़कियों और महिलाओं को छुटकारा दिलाना है। उन्हें जबरदस्ती धर्म-परिवर्तन कराने और शादी कराने से रोकना है।

2017 से 9 राज्यों ने अवैध धर्म-परिवर्तन को रोकने काननू बनाए गए। इनमें 2017 में झारखंड, 2018 में उत्तराखंड , 2019 में हिमाचल प्रदेश, 2020 में उत्तर प्रदेश, गुजरात और मध्य प्रदेश में 2021 में कानून बनाया गया। हरियाणा और कर्नाटक में 2022 जबकि राजस्थान में 2025 में कानून बना।

इन सभी कानूनों का घोषित मकसद जोर-जबरदस्ती, धोखाधड़ी और लालच देकर योजनाबद्ध तरीके से धर्म-परिवर्तन कराने पर लगाम लगाना है। इन सभी जगहों पर धर्मांतरण से पहले स्थानीय प्रशासन से इजाजत लेना जरूरी है। गैर-कानूनी धर्म-परिवर्तन के मामले में आपराधिक मुकदमों में सबूत देने की जिम्मेदारी आरोपित पर होती है।

दरअसल ये कानून देश में हो रहे सुनियोजित तरीके से धर्मांतरण, लव जिहाद, लैंड जिहाद से लोगों को बचाने के लिए जरूरी है। लड़कियों को प्रेम जाल में फँसा कर आए दिन धर्म परिवर्तन कराने की घटनाएँ सामने आ रही हैं।

महाराष्ट्र की 35 सिविल सोसाइटी ने किया विरोध

हालाँकि महाराष्ट्र की 35 सिविल सोसाइटी ने महाराष्ट्र सरकार के प्रस्तावित धर्मांतरण विरोधी कानून का विरोध किया और इसे महिलाओं के अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन बताया। इनलोगों ने सरकार से कानून वापस लेने का आग्रह किया है। इसे साधारण भाषा में ‘लव जिहाद’ कानून कहा जा रहा है।

इन संगठनों को खास कर जिन बिन्दुओं पर आपत्ति हैं उनमें धर्मांतरण से पहले स्थानीय प्रशासन से अनुमति लेना, धर्म परिवर्तन से कम से कम 60 दिन पहले सूचना देना और धर्मांतरण के बाद 25 दिनों के भीतर पंजीकरण कराना शामिल है। ऐसा न करने पर धर्मांतरण को अमान्य घोषित किया जा सकता है।

संगठनों को उन प्रावधानों पर भी आपत्ति है, जिसमें रिश्तेदारों को जबरदस्ती का आरोप लगाते हुए आपराधिक शिकायतें दर्ज करने की अनुमति दी गई है।

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की वकील लारा जेसानी का मानना है कि इस कानून को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाएगा और महिलाओं को अपनी पंसद के साथी से शादी करने या अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन करने से रोकने के लिए किया जाएगा। उन्होंने कहा कि मुस्लिम पुरुषों से शादी करने वाली हिंदू महिलाओं को असमान रूप से निशाना बनाया जाएगा।

ऐसे मामले जिसमें लड़कियाँ अपनी मर्जी से धर्म परिवर्तन करती हैं और शादी करती है, उन्हें 60 दिन पहले बताने में क्या दिक्कत है। उन्हें 25 दिन के अंदर पंजीकरण कराने से भी कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।

दिक्कत तो नाम बदल कर लड़की को प्रेम जाल में फँसा कर अवैध संबंध बनाने में है, क्योंकि इसका मकसद सिर्फ लड़की को प्यार से या दबाव डालकर धर्मांतरण के लिए मजबूर करना है। उससे निकाह कर प्रताड़ित करना है।

ऐसे मामलों में धर्मांतरण और निकाह एक हथियार की तरह इस्तेमाल होते हैं, ताकि लड़की को काबू में रखा जा सके। उसका शोषण किया जा सके। अपने परिजनों की इच्छा के विरुद्ध गई लड़की को सामाजिक मदद भी मिलना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में कहाँ गया उसका व्यक्तिगत अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, जो संविधान के मूलभूत अधिकारों में शामिल हैं और उसे भी मिले हुए हैं।

आत्मरक्षा के लिए उठाई आवाज तो UK में सिख रेस्टोरेंट मालिक गिरफ्तार, इस्लामी और खालिस्तानी कट्टरपंथी बना चुके हैं निशाना: जानें- कौन हैं हरमन सिंह

ब्रिटेन के लंदन में एक सिख समुदाय के रेस्टोरेंट मालिक हरमन सिंह कपूर को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, हरमन सिंह ने अपने रेस्टोरेंट में हलाल मीट बेचने से इनकार किया था। इसके बाद हरमन और उनके परिवार को पाकिस्तानियों की तरफ से जान से मारने की धमकी मिलने लगी। इसे देखते हुए हरमन ने रेस्टोरेंट बंद करने का फैसला लिया था।

हरमन सिंह की गिरफ्तारी की वीडियो भी सामने आई है, जिसमें पुलिस उन्हें उनके ही रेस्टोरेंट से गिरफ्तार कर ले जा रही है। हरमन सिंह ने भी ‘एक्स’ पर एक ट्वीट का जवाब देते हुए अपनी गिरफ्तारी की पुष्टि की। उन्होंने लिखा, “मैंने तो बस अपने परिवार की रक्षा की, फिर भी मुझे ही गिरफ्तार कर लिया गया। हमारी सुरक्षा करने के बजाए पुलिस ने मेरे धर्म को निशाना बनाया। मेरे सिख होने और मेरी आस्था को लेकर मुझे टारगेट किया गया। यह बहुत चिंता की बात है।”

हरमन सिंह को पाकिस्तानियों ने दी धमकी

दरअसल, हरमन सिंह ब्रिटेन के लंदन में 16 साल से ‘रंगरेज रेस्टोरेंट एंड बार’ नाम से रेस्टोरेंट चलाते हैं। रेस्टोरेंट में हरमन सिंह हलाल मीट नहीं बेचते और इसको लेकर गेट पर साइनबोर्ड भी लगाया गया है। वे कहते हैं, “मुझे गर्व है कि मैं हलाल खाना नहीं बेचता। इसी वजह से कुछ लोग नाराज हैं और मेरे रेस्टोरेंट के बार में झूठे रिव्यू डाल रहे हैं। रंगरेज रेस्टोरेंट ऐसे लोगों को खुश करने के लिए जानवरों पर होने वाली क्रूरता का समर्थन नहीं करेगा।”

उन्होंने एक वीडियो भी शेयर किया, जिसमें हथियारबंद कुछ लोगों ने हरमन सिंह के रेस्टोरेंट पर धावा बोल दिया। हरमन सिंह ने दावा किया कि इन मुस्लिम लोगों ने रेस्टोरेंट में हलाल मीट न बेचने का विरोध किया और रेस्टोरेंट के बाहर उत्पात मचाया। इन लोगों ने जबरन रेस्टोरेंट के भीतर घुसने की कोशिश की और गेट ब्लॉक कर नारेबाजी भी की। वीडियो में मौके पर पुलिस भी नजर आ रही है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, हरमन सिंह के रेस्टोरेंट पर हमला करने वाले पाकिस्तानी हैं। कुछ ट्वीट्स में दावा किया गया कि हरमन सिंह और उनके परिवार को लगातार जान से मारने की धमकी मिल रही है। यहाँ तक कि बच्चों उत्पात मचाने वाले लोगों ने हरमन सिंह के बच्चों का वीडियो भी बनाया और रेप की धमकी तक दी।

हरमन सिंह ने आत्मरक्षा के लिए उठाई तलवार

इस मामले को लेकर हरमन सिंह ‘एक्स’ पर लगातार एक्टिव हैं। हरमन ने खुद को मिल रही धमकियों के खिलाफ आत्मरक्षा की ठानी। उन्होंने एक वीडियो भी रिलीज किया, जिसमें हथियार उठाने की बात कही। वहीं हरमन सिंह ने आरोप भी लगाया कि इस मामले में पुलिस उनकी कुछ सहायता नहीं कर रही है।

एक वीडियो पोस्ट करते हुए हरमन सिंह ने कहा, “सब जानते हैं कि मुझे हर दिन कुछ शांतिप्रिय समुदायों द्वारा गंभीर हमलों का सामना करना पड़ता है। पुलिस की मदद अब तक अपर्याप्त रही है। मुझे और मेरे परिवार को हर दिन मानसिक और शारीरिक रूप से धमकियाँ दी जाती हैं। इस वजह से मेरे पास हथियार उठाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।”

उन्होंने आगे कहा, “मैं अपने परिवार की रक्षा खुद करूँगा। मुझे पुलिस पर भरोसा नहीं है। अगर कोई मुझसे भिड़ना चाहे, तो कृपया मरने के लिए तैयार रहें। मुझे अब डर नहीं लगता। कृपया मेरे परिवार के पास न आएँ।”

हरमन ने यह भी कहा, “मेरे धर्म में कहा जाता है: जब शांति बनाए रखने के सभी विकल्प खत्म हो जाते हैं, तब उसे लागू करने के लिए तलवार की आवश्यकता होती है।”

इससे पहले हरमन ने रेस्टोरेंट बंद करने का भी फैसला लिया था, लेकिन कुछ समय बाद इसे दोबारा खोला गया। इसके बाद ही हरमन सिंह की 14 मार्च 2026 को रेस्टोरेंग से ही गिरफ्तारी की गई।

खालिस्तानी और मुस्लिम विरोधी हैं हरमन सिंह कपूर

भारतीय मूल के हरमन सिंह कपूर सिख एक्टिविस्ट हैं, जो खालिस्तानी उग्रवाद के खिलाफ मुखर हैं। हाल के महीनों में वे और उनकी पत्नी खुशी कपूर मुस्लिमों के खिलाफ भी वोकल हो गए थे। यही वजह रही कि हाल कि दिनों में उनके रेस्टोरेंट को निशाना बनाया गया, खासकर हलाल मीट न बेचने को लेकर।

साल 2023 में हरमन सिंह ने दावा किया था कि खालिस्तानी मूवमेंट की आलोचना करने के बाद उनकी कार पर गोली चलाई गई और तोड़फोड़ की गई। उन्होंने खालिस्तानी आतंकवादी द्वारा कनाडा की नैंसी ग्रेवाल की हत्या पर भी काफी ट्वीट्स किए।

एक ट्वीट में हरमन सिंह ने लिखा, “खालिस्तान कोई राष्ट्र हीं, यह एक विचारधारा है, एक बेहद भ्रामक और मूर्खतापूर्ण विचारधारा। इसे जायज ठहराने के लिए कट्टरपंथी जाट हिंसा और धमकियों का सहारा लेते हैं। जो भी इन पर सवाल उठाने की हिम्मत करता है, वह निशाना बन जाता है(मुझ समेत)।” उन्होंने सभी पश्चिमी देशों से यह भी माँग की इन सभी कट्टर खालिस्तानियों को भारत वापस भेज दिया जाए।

रेस्टोरेंट बंद करने से ठीक पहले हरमन सिंह और उनकी पत्नी ने एक वीडियो शेयर किया था, जिसमें उन्होंने ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया में लव जिहाद के मामलों के बारे में पैरेंट्स को चेतावनी दी थी। कपूर ने कहा था कि कई लड़कियों को पाकिस्तानी और बांग्लादेशी लड़कों द्वारा ब्रेनवॉश किया जा रहा है और वे परिवार से संपर्क खो रही हैं और उन्होंने ऐसे में कई केसों की जाँच की थी।

इतना ही नहीं हरमन सिंह ने हाल ही में ईरान की इस्लामिक रिजीम के विरोध में भी ट्वीट किए। यहाँ तक कि ट्रंप के पाकिस्तान को दोस्त कहने पर भी वह नाराज हुए। वे अपने एक्स अकाउंट पर मुस्लिमों के अपराधों को लगातार दुनिया के सामने लाते रहे हैं। खासकर लंदन के मेयर सादिक खान को लेकर कई विरोधी ट्वीट्स भी हरमन सिंह ने किए हैं।

सिख संगठनों की चुप्पी

हरमन सिंह कपूर की गिरफ्तारी के मामले ने सिख समुदाय में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। वे खुद को सिख बताते हैं और लंदन में अपने रेस्टोरेंट को पाकिस्तानी और खालिस्तानी हमलों से बचाने की कोशिश करते रहे, लेकिन अब पुलिस ने उन्हें ही हिरासत में ले लिया।

अब सवाल यह है कि क्या प्रमुख सिख संगठन जैसे SGPC या अकाल तख्त इस पर आवाज उठाएँगे। कपूर ने हमेशा खालिस्तानी उग्रवाद के खिलाफ बोला है, जिससे कुछ सिख गुट उनसे नाराज भी रहे। फिर भी, अगर यह गिरफ्तारी अन्यायपूर्ण साबित हुए तो समुदाय उनका साथ देगा या नहीं।

अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहींया है और यह चुप्पी सोचने पर मजबूर करती है। सिख संगठन अक्सर अपने लोगों के हक में खड़े होते हैं, खासकर विदेशों में हो रहे उत्पीड़न पर। लेकिन इस इतने बड़े विवादास्पद मुद्दे पर कोई बयान अब तक सामने नहीं आया है।