Home Blog Page 108

गुजरात में देश के पहले सेमीकंडक्टर प्लांट से उत्पादन शुरू, PM मोदी ने किया उद्घाटन: जानें- मेक इन इंडिया को कैसे मिल रही गति

आज भारत की तकनीकी यात्रा में एक ऐतिहासिक अध्याय जुड़ गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के साणंद में अमेरिकी कंपनी माइक्रोन टेक्नोलॉजी द्वारा 22,516 करोड़ रुपए की लागत से स्थापित देश के पहले सेमीकंडक्टर एटीएमपी (ATMP) संयंत्र का उद्घाटन किया। यह परियोजना केवल गुजरात ही नहीं, बल्कि ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के लिए भी एक ऐतिहासिक मील का पत्थर मानी जा रही है।

उद्घाटन से पहले प्रधानमंत्री ने सानंद में रोड शो किया और बाद में समारोह को संबोधित करते हुए इसे भारत के सेमीकंडक्टर सपने की बड़ी उपलब्धि बताया। इस अत्याधुनिक संयंत्र में दुनिया के सबसे बड़े रेज़्ड-फ्लोर क्लीनरूम में से एक बनाया गया है, जो लगभग 5 लाख वर्ग फुट क्षेत्र में फैला है।

वर्तमान में यहाँ करीब 2000 कर्मचारी कार्यरत हैं। संयंत्र के पूर्ण क्षमता से संचालित होने पर लगभग 5000 प्रत्यक्ष रोजगार के अवसर सृजित होंगे, जिनमें दिव्यांगजनों के लिए विशेष प्रावधान शामिल हैं। इसके अलावा, लॉजिस्टिक्स, आपूर्ति श्रृंखला और सहायक उद्योगों के माध्यम से लगभग 15000 अप्रत्यक्ष रोजगार भी पैदा होने की संभावना है।

सेमीकंडक्टर संयंत्र की नींव: ATMP क्या है?

सेमीकंडक्टर (चिप्स) के निर्माण की पूरी प्रक्रिया को मुख्यतः दो बड़े चरणों में बांटा जाता है। इस संयंत्र की वास्तविक भूमिका और महत्व को समझने के लिए इन दोनों चरणों को जानना बेहद जरूरी है।

1 फ्रंट-एंड (फैब्रिकेशन/वेफर फैब्रिकेशन):  यह चरण सेमीकंडक्टर निर्माण का सबसे जटिल, महंगा और अत्याधुनिक हिस्सा माना जाता है। इसमें शुद्ध सिलिकॉन के पिंडों (इंगॉट) से बेहद पतले वेफर तैयार किए जाते हैं। इन वेफर्स पर नैनोमीटर स्तर (जैसे 3nm, 5nm) पर फोटोलिथोग्राफी, एचिंग, डोपिंग और डिपोजिशन जैसी उन्नत तकनीकों की मदद से सूक्ष्म ट्रांजिस्टर, सर्किट और अन्य इलेक्ट्रॉनिक घटक बनाए जाते हैं।

यह उच्च तकनीकी निर्माण प्रक्रिया विश्व की अग्रणी कंपनियां जैसे TSMC (ताइवान), इंटेल (अमेरिका) और सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स (दक्षिण कोरिया) संचालित करती हैं। इस चरण में अरबों डॉलर का निवेश, अत्यंत नियंत्रित और स्वच्छ क्लीनरूम वातावरण, तथा अत्याधुनिक मशीनरी की आवश्यकता होती है।

2 बैक – एंड ( ATMP / असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग, पैकेजिंग – OSAT): सेमीकंडक्टर निर्माण का दूसरा प्रमुख चरण ‘असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग और पैकेजिंग’ (ATMP) है। इसमें वेफर से अलग किए गए सूक्ष्म चिप्स (डाई) को सावधानीपूर्वक असेंबल किया जाता है, उनकी गुणवत्ता और प्रदर्शन की कठोर जांच (टेस्टिंग) की जाती है, फिर उन्हें मार्क कर सुरक्षित पैकेजिंग के माध्यम से अंतिम उत्पाद के रूप में तैयार किया जाता है।

यह चरण पूरी वैल्यू चेन का लगभग 30–40% हिस्सा माना जाता है। इसके लिए कुशल तकनीकी जनशक्ति, अत्याधुनिक स्वचालित परीक्षण प्रणाली और उन्नत पैकेजिंग तकनीकों की आवश्यकता होती है।

उल्लेखनीय है कि माइक्रोन टेक्नोलॉजी के सानंद स्थित संयंत्र में वेफर निर्माण (फैब्रिकेशन) नहीं होता। यहां माइक्रोन के वैश्विक निर्माण केंद्रों अमेरिका, सिंगापुर, ताइवान आदि में तैयार उन्नत DRAM (डायनेमिक रैंडम एक्सेस मेमोरी) और NAND (फ्लैश मेमोरी) वेफर्स को प्रोसेस कर अंतिम मेमोरी उत्पादों में बदला जाता है।

यह संयंत्र AI, हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग, डेटा सेंटर, स्मार्टफोन, सर्वर, ऑटोमोबाइल और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए अत्याधुनिक मेमोरी और स्टोरेज समाधान तैयार करेगा, जिससे भारत की तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला को वैश्विक स्तर पर मजबूती मिलेगी।

ATMP कार्यप्रणाली:

जब सिलिकॉन वेफर किसी फैक्ट्री में बनकर तैयार होता है, तो उसे सीधे किसी मशीन या डिवाइस में नहीं लगाया जा सकता। वह उस समय सिर्फ कच्चे माल की तरह होता है। ATMP प्लांट में इसके बाद चार मुख्य प्रक्रियाएँ की जाती हैं।

1 संयोजन : एक बड़ी सिलिकॉन वेफर को डायमंड : एक खास मशीन (सॉ) की मदद से वेफर को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है, जिन्हें चिप या डाई कहा जाता है। इस पूरी प्रक्रिया को डाइसिंग कहते हैं। इसके बाद इन चिप्स को एक सुरक्षित बेस (सब्सट्रेट) पर लगाया जाता है, ताकि उन्हें आसानी से इलेक्ट्रॉनिक सर्किट से जोड़ा जा सके।

2 परीक्षण : प्रत्येक चिप की कार्य क्षमता इसके बाद चिप की जाँच की जाती है। देखा जाता है कि क्या यह ज्यादा तापमान सहन कर सकती है? क्या इसकी डेटा स्पीड सही और पर्याप्त है?

अगर चिप में कोई भी सामान्य खराबी या कमी मिलती है, तो उसे तुरंत रिजेक्ट कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया का मकसद यही होता है कि ग्राहकों तक सिर्फ अच्छी और बेहतरीन क्वालिटी वाली चिप्स ही पहुँचें।

3 मार्किंग: जो चिप्स टेस्ट में पास हो जाती हैं, उन पर लेजर की मदद से कंपनी का नाम (जैसे माइक्रोन), बैच नंबर और बाकी जरूरी तकनीकी जानकारी लिखी जाती है।

4 पैकेजिंग : यह आखिरी चरण होता है। चिप बहुत नाजुक और संवेदनशील होती है, इसलिए उसे नमी, धूल और दूसरी बाहरी चीजों से बचाने के लिए प्लास्टिक, सिरेमिक या एपॉक्सी रेजिन की परत में अच्छी तरह सील कर दिया जाता है। इसके बाद यही तैयार चिप हमें मोबाइल या लैपटॉप के मदरबोर्ड पर लगी हुई दिखाई देती है।

‘मेड इन इंडिया’ का कानूनी और कमर्शियल आधार

भारत में ‘मेड इन इंडिया‘ का कोई एक तय और सभी पर लागू होने वाला कानून नहीं है। अलग-अलग सेक्टर और सरकारी योजनाओं के हिसाब से इसके नियम तय किए जाते हैं।

सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में यह तय करने के लिए कि कोई उत्पाद ‘मेड इन इंडिया’ है या नहीं, कुछ खास मानकों और शर्तों के आधार पर वर्गीकरण किया जाता है।

इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) और संशोधित ATMP/ओसैट योजना:

इस परियोजना को इस योजना के तहत मंजूरी मिल चुकी है। योजना में साफ कहा गया है कि ATMP और आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्ट (ओसैट) जैसी सुविधाएँ भी सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम का अहम हिस्सा हैं।

इस योजना के तहत मंजूर परियोजनाओं को केंद्र सरकार से 50% तक वित्तीय मदद मिलती है और राज्य सरकार की तरफ से अलग से प्रोत्साहन दिया जाता है (जैसे गुजरात में 20%)। यह आर्थिक सहायता तभी मिलती है जब परियोजना भारत में लगाई जाए और उसका उत्पादन स्वदेशी यानी देश में बना हुआ माना जाए।

वैल्यू एडिशनऔर मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस का स्थान: सेमीकंडक्टर की पूरी वैल्यू चेन में ATMP/OSAT चरण करीब 30–40% तक वैल्यू एड करता है। इसी स्टेज पर असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग और पैकेजिंग जैसे अहम काम होते हैं। इसके लिए खास तकनीकी विशेषज्ञता, एडवांस टेस्टिंग सिस्टम और क्लीनरूम जैसी आधुनिक सुविधाओं की जरूरत होती है।

माइक्रोन के मामले में ये सभी प्रक्रियाएँ भारत में की जाती हैं, इसलिए तैयार प्रोडक्ट को भारतीय उत्पाद माना जाता है। भले ही वेफर विदेश से आते हों, लेकिन अंतिम उत्पाद जैसे SSD या DRAM मॉड्यूल पर मुख्य और महत्वपूर्ण काम भारत में ही होता है।

सरकारी योजनाओं में वर्गीकरण: ATMP/OSAT को ISM और सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम के तहत सेमीकंडक्टर निर्माण का ही हिस्सा माना जाता है। जब इस परियोजना को मंजूरी दी गई थी, तब सरकार ने साफ कहा था कि इस प्लांट में बने उत्पादों को ‘मेड इन इंडिया’ के नाम से बेचा और निर्यात किया जाएगा।

प्लांट के उद्घाटन के बाद जारी रिपोर्टों और सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों में भी इसका जिक्र है, जहाँ इसे ‘भारत में बना पहला सेमीकंडक्टर मेमोरी मॉड्यूल’ बताया गया है।

वैश्विक प्रथा और भारतीय नीति: दुनिया के कई देशों में ATMP/OSAT को ही घरेलू उत्पादन माना जाता है। जैसे मलेशिया और वियतनाम में OSAT सुविधाओं को वहीं का मैन्युफैक्चरिंग माना जाता है।

भारत में भी ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य के तहत यह जोर दिया जाता है कि वैल्यू चेन का एक बड़ा और अहम हिस्सा देश के अंदर विकसित हो। भले ही शुरुआती कच्चा माल बाहर से आता हो, लेकिन अगर मुख्य प्रोसेस और वैल्यू एडिशन भारत में हो रहा है, तो उसे घरेलू उत्पादन ही माना जाता है।

बिना किसी मिलावट के भी ‘मेड इन इंडिया’ क्यों?

निर्माण प्रक्रिया के बिना भी महत्वपूर्ण वैल्यू एडिशन : ATMP में बेहद कुशल कर्मचारियों, आधुनिक मशीनों और क्लीनरूम जैसी उन्नत तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रक्रिया से उत्पाद की लागत और उसकी बाजार कीमत दोनों में अच्छा-खासा इजाफा होता है। सरकारी योजनाओं में भी इसे सेमीकंडक्टर निर्माण का अहम और जरूरी हिस्सा माना गया है।

सरकारी प्रोत्साहनों की संरचना: ATMP/OSAT के लिए संशोधित योजना में 50% तक केंद्र सरकार की सहायता और 50% तक राज्य सरकार की मदद का प्रावधान है। इससे साफ पता चलता है कि सरकार इसे स्वदेशी उत्पादन का हिस्सा मानती है। अगर इसे ‘मेड इन इंडिया’ नहीं माना जाता, तो इतनी बड़ी आर्थिक मदद और प्रोत्साहन देने का कोई मतलब ही नहीं बनता।

व्यापार और निर्यात के दृष्टिकोण से: इस प्लांट में बने उत्पादों को भारतीय उत्पाद के तौर पर विदेशों में निर्यात किया जा सकता है, जिससे देश के व्यापार संतुलन को बेहतर करने में मदद मिलती है। इन्हें ‘मेड इन इंडिया’ के रूप में पेश करने से ब्रांड की पहचान मजबूत होती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुँच बनाना भी आसान हो जाता है।

भविष्य की रणनीति: भारत अभी कम निवेश और कम जोखिम वाले ATMP/OSAT सेक्टर पर ध्यान देकर सेमीकंडक्टर की वैल्यू चेन में कदम रख रहा है। इससे आगे चलकर बड़े मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाने की मजबूत नींव तैयार होगी। इसी वजह से सरकार इसे एक पूरा और मान्य उत्पाद मानती है।

माइक्रोन टेक्नोलॉजी का सानंद ATMP प्लांट ‘मेड इन इंडिया‘ माना जाता है, क्योंकि इसमें असेंबली से लेकर पैकेजिंग तक का ज्यादातर वैल्यू एडिशन भारत में ही होता है। यह परियोजना ISM (भारत सेमीकंडक्टर मिशन) के तहत मंजूर है और इसे सरकारी प्रोत्साहन भी मिलते हैं।

यह वर्गीकरण भारत की लंबी रणनीति का हिस्सा है, पहले बैक-एंड क्षमताएँ मजबूत करना और फिर फ्रंट-एंड मैन्युफैक्चरिंग की ओर बढ़ना। इससे देश को आयात कम करने, निर्यात बढ़ाने और आत्मनिर्भर बनने में मदद मिलेगी। यह एक सोच-समझकर उठाया गया व्यावहारिक और रणनीतिक कदम है, जो भारत को भविष्य में वैश्विक सेमीकंडक्टर हब बनाने की दिशा में आगे बढ़ाता है।

देश और गुजरात के लिए संभावित लाभ और रणनीतिक महत्व

माइक्रोन टेक्नोलॉजी के सानंद ATMP प्लांट का उद्घाटन भारत के सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम के लिए एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम है। यह प्लांट सिर्फ एक फैक्ट्री नहीं है, बल्कि देश और राज्य दोनों के लिए आर्थिक, औद्योगिक, रोजगार, तकनीकी और रणनीतिक फायदों के नए दरवाजे खोल रहा है।

आर्थिक लाभ

आयात पर निर्भरता में कमी: अभी भारत अपनी जरूरत की लगभग सभी मेमोरी चिप्स जैसे DRAM और NAND पूरी तरह आयात करता है। इनमें से बड़ा हिस्सा चीन, ताइवान, कोरिया और अमेरिका जैसे देशों से आता है।

यह नया प्लांट भारत में ही मेमोरी मॉड्यूल जैसे SSD, DDR5, LPDDR5, HBM और NAND फ्लैश का निर्माण शुरू करेगा। इससे आयात पर निर्भरता काफी कम होगी। नतीजतन, देश का आयात बिल घटेगा, व्यापार घाटा कम होगा और विदेशी मुद्रा की भी बचत होगी।

निर्यात और विदेशी मुद्रा में वृद्धि : इस प्लांट में होने वाला उत्पादन मुख्य रूप से वैश्विक बाजार को ध्यान में रखकर किया जा रहा है। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डेटा सेंटर, क्लाउड कंप्यूटिंग, स्मार्टफोन और ऑटोमोबाइल सेक्टर में हाई-परफॉर्मेंस मेमोरी की माँग तेजी से बढ़ रही है।

माइक्रोन टेक्नोलॉजी के इस प्लांट से बनने वाले उत्पाद विदेशों में निर्यात किए जाएँगे। इससे भारत को विदेशी मुद्रा प्राप्त होगी और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

औद्योगिक गुणक प्रभाव: यह प्लांट सिर्फ अपने भीतर ही रोजगार नहीं देगा, बल्कि इसके आसपास की कई कंपनियों और सेक्टरों को भी काम मिलेगा। जैसे लॉजिस्टिक्स, पैकेजिंग सामग्री सप्लायर, टेस्टिंग उपकरण बनाने वाली कंपनियाँ, क्लीनरूम तकनीक देने वाले सप्लायर, बिजली और जल प्रबंधन से जुड़ी कंपनियाँ। इससे गुजरात और आसपास के इलाकों में नए उद्योग और सेवा क्षेत्र विकसित होंगे, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बड़ा फायदा मिलेगा।

रोजगार और कौशल विकास

प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार: जब यह प्लांट पूरी क्षमता से काम करेगा, तब यहाँ करीब 5000 सीधे रोजगार के मौके बनेंगे। इनमें ऑपरेटर, तकनीशियन, इंजीनियर और क्वालिटी कंट्रोल स्टाफ जैसी नौकरियाँ शामिल होंगी। इनमें से ज्यादातर पद स्थानीय युवाओं के लिए होंगे।

इसके अलावा करीब 15,000 अप्रत्यक्ष रोजगार भी पैदा होंगे, जैसे सप्लाई चेन, ट्रांसपोर्ट, कैंटीन, सुरक्षा और मेंटेनेंस से जुड़े काम। इससे आसपास के इलाके में रोजगार के बड़े अवसर तैयार होंगे।

कौशल विकास और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण : यह प्लांट आधुनिक क्लीनरूम तकनीक, ऑटोमैटिक टेस्टिंग सिस्टम, एडवांस पैकेजिंग और सख्त क्वालिटी कंट्रोल जैसी प्रक्रियाओं में प्रशिक्षण देगा।

इससे हजारों युवाओं को हाई-टेक और उच्च स्तर का कौशल सीखने का मौका मिलेगा। आगे चलकर यही ट्रेनिंग उन्हें दूसरे सेमीकंडक्टर प्लांट्स में काम करने के लिए भी तैयार करेगी।

गुजरात के लिए विशेष लाभ

सेमीकंडक्टर हब के रूप में स्थापना : सानंद अब धीरे-धीरे भारत के सेमीकंडक्टर हब के रूप में पहचान बना रहा है। इससे गुजरात में और भी सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों जैसे फैब्रिकेशन यूनिट्स, डिस्प्ले मैन्युफैक्चरिंग और इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी प्लांट्स के आने की संभावना बढ़ गई है।

औद्योगिक विकास और अवसंरचना : इस प्लांट के आसपास बिजली, पानी, सड़कें, लॉजिस्टिक्स पार्क और क्लीनरूम सप्लायर जैसी सुविधाओं का विकास होगा। इससे आसपास के इलाकों में एक पूरा औद्योगिक क्लस्टर तैयार होगा, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था और उद्योगों के लिए नए अवसर खोलेगा।

राज्य के राजस्व में वृद्धि : इससे राज्य के राजस्व में बढ़ोतरी होगी जैसे GST, कॉरपोरेट टैक्स, रोजगार से और निर्यात से। गुजरात सरकार ने 20% तक का प्रोत्साहन भी दिया है, जिसका लंबी अवधि में फायदा बहुत बड़ा होगा।

सहायक उद्योगों का विकास : तेल के बाद भारत अभी सबसे ज्यादा विदेशी मुद्रा इलेक्ट्रॉनिक्स के आयात पर खर्च करता है। चिप्स की पैकेजिंग अगर देश के भीतर ही होती है, तो स्मार्टफोन, लैपटॉप और इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) जैसी चीजों की उत्पादन लागत घट जाएगी। इससे सीधे तौर पर आम लोगों को भी फायदा मिलेगा।

आज के समय में सेमीकंडक्टर एक बड़ा अवसर बन गया है। जिसके पास चिप्स हैं, वही ताकत रखता है। चीन और ताइवान के बीच बढ़ते तनाव के चलते दुनिया अब एक भरोसेमंद और सुरक्षित सप्लाई चेन की तलाश में है।

माइक्रोन टेक्नोलॉजी का सानंद ATMP प्लांट यह साबित करेगा कि भारत हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग के लिए पूरी तरह तैयार है। इससे भविष्य में एप्पल, टेस्ला और अन्य बड़ी कंपनियों के लिए भारत में निवेश और उत्पादन करना आसान होगा।

सानंद संयंत्र सिर्फ एक फैक्ट्री नहीं है, बल्कि यह भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता, औद्योगिक विकास, रोजगार सृजन, कौशल विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक नई शुरुआत है। यह गुजरात को सेमीकंडक्टर हब के रूप में स्थापित कर रहा है और देश को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे ला रहा है।

यह कदम ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के सपने को हकीकत में बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आने वाले सालों में इस संयंत्र का असर भारत की अर्थव्यवस्था और वैश्विक स्तर पर उसकी स्थिति में साफ नजर आएगा।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजरात में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)








हिंदू घृणा में चूर मृणाल पांडे की ‘द्रौपदी’ की छवि बिगाड़ने की कोशिश, पोल खुलने पर सनातनी विद्वान को किया ब्लॉक: वामपंथी मानसिकता की असलियत आई सामने

कॉन्ग्रेसी नेशनल हेराल्ड की पत्रकार मृणाल पांडे की हिंदू घृणा छिपाए नहीं छिपती, वह बार-बार सामने आ ही जाती है। ताजा मामले में उन्होंने इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करते हुए महाभारत की ‘द्रौपदी’ की छवि बिगाड़ने की कोशिश की। सोशल मीडिया पर जैसे ही उनकी टिप्पणी वायरल हुई, लोगों ने उनके दावे पर सवाल उठाने शुरू कर दिए और पुराणों व महाभारत के संदर्भों के साथ तथ्य सामने रखे।

लेकिन जैसे ही मृणाल पांडे एक्सपोज होने लगी, तो उन्होंने सवाल पूछने वालों को ही ब्लॉक करना शुरू कर दिया। यह वही वामपंथी सोच है जिसमें पहले एकतरफा नैरेटिव गढ़ा जाता है, फिर जब सच सामने आता है तो असहमति की आवाज दबाने की कोशिश की जाती है।

पहले मृणाल पांडे ने रश्मिका के संदर्भ में ‘द्रौपदी’ पर कसा तंज

दरअसल, साउथ एक्ट्रेस रश्मिका मंदाना और एक्टर विजय देवरकोंडा की शादी की फोटो पर एक यूजर ने लिखा था कि यह जोड़ी ‘महाभारत के द्रौपदी और अर्जुन’ जैसी वाइब्स दे रहा है। इसी पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए मृणाल पांडे ने एक तरफ से महाभारत की सभी स्त्रियों को निशाना बनाते हुए कहा, “उम्मीद है कि दुल्हन की किस्मत द्रौपदी, कुंती, गांधारी, तारा, मंदोदरी, अहिल्या से बहुत अलग होगी।”

मृणाल की बात का जवाब देते हुए ‘एक्स’ यूजर नमिता बाल्यान ने महाभारत की इन सभी स्त्रियों के प्रभावशाली व्यक्तित्व की जानकारी दी। नमिता ने कहा, “द्रौपदी, कुंती, गाँधारी, तारा, मंदोदरी और अहिल्या सभी बेहद शक्तिशाली, साहसी, धैर्यवान और अपने समय की बहुत महत्वपूर्ण महिलाएँ थीं। उनका योगदान सिर्फ उनके विवाह या वैवाहिक जीवन तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी मजबूती और समझदारी का परिचय दिया।”

मृणाल को जवाब देते हुए नमिता कहती हैं, “ऐसी महान महिलाओं को केवल उनकी ‘शादी’ के आधार पर आँकना न सिर्फ अधूरी जानकारी दिखाता है, बल्कि उनकी भूमिका को छोटा करने जैसा है। यह सोच खुद में पिछड़ी हुई है, जबकि पोस्ट करने वाला व्यक्ति खुद को प्रगतिशील बताने की कोशिश कर रहा था।”

अहंकारी मृणाल ने द्रौपदी को गलत रूप में किया पेश

मृणाल पांडे का अहंकार ‘द्रौपदी’ का नाम गलत संदर्भ में पेश करने तक भी शांत नहीं हुआ, तो उन्होंने गलत धारणाएँ बनाकर महाभारत और द्रौपदी की छवि को तोड़-मरोड़कर पेश करना शुरू कर दिया है। मृणाल ने द्रौपदी को ‘चिदग्निकुंड सम भूता’ कहा, यानी उनके अनुसार ‘द्रौपदी’ भीतर की प्रचंड अग्नि से उत्पन्न हुई थीं।

नमिता के कमेंट पर जवाब देते हुए मृणाल लिखती हैं, “इसने उनके कीमती और युवा वर्षों को जरूर प्रभावित किया होगा। इतना बड़ा आघात मन पर गहरी छाप छोड़ गया होगा। उदाहरण के तौर पर द्रौपदी को चिदग्निकुंड सम भूता कहा गया है, यानी वह भीतर की प्रचंड अग्नि से उत्पन्न हुई थीं। इसका मतलब है कि उनके व्यक्तित्व में अंदर की आग, आक्रोश और आत्मसम्मान की तीव्र शक्ति दिखाई देती है।”

मृणाल की गलत धारणाओं का सामने आया सच

मृणाल पांडे की महाभारत और द्रौपदी को लेकर तोड़-मरोड़कर पेश किए गए तथ्यों पर जब हिंदू संस्कृत स्कॉलर नित्यानंद मिश्रा ने सच्चाई सामने रखी तो यह उन्हें रास नहीं आया। उन्होंने विस्तार से बताया कि द्रौपदी के बारे में जो दावा किा गया, वह न तो महाभारत के मूल पाठ में मिलता है और न ही उसके प्रामाणिक संस्करणों में।

मिश्रा ने साफ कहा कि महाभारत के क्रिटिकल एडिशन में कहीं भी द्रौपदी को ‘चिदग्निकुण्डसम्भूता’ नहीं कहा गया है। यह शब्द महाभारत का नहीं है। उन्होंने समझाया कि ‘चिदग्निकुण्डसम्भूता’ शब्द दरअसल ‘देवी ललिता’ के लिए आता है, जिसका उल्लेख ललिता सहस्ननाम में मिलता है और जिसे ब्राह्माण्ड पुराण से जोड़ा जाता है। यानी जिस शब्द को द्रौपदी से जोड़कर पेश किया गया, उसका महाभारत से कोई संबंध ही नहीं है।

नित्यानमंद मिश्रा ने यह भी बताया कि इस शब्द का अर्थ भी गलत बताया गया। चित या चिद का अर्थ ‘चेतना’ होता है, न कि भीतर का क्रोध। ‘चिदग्निकुण्डसम्भूता’ का सही अर्थ है चेतना की अग्नि की वेदी से उत्पन्न। इसे भीतर की प्रचंड आक्रोश की आग से जन्मी बताया संस्कृत के मूल अर्थ को बदल देना है।

उन्होंने विद्वानों के अनुवाद और पारंपरिक व्याख्याओं को हवाला देते हुए कहा कि संस्कृत ग्रंथों के शब्दों का अर्थ संदर्भ और परंपरा के आदार पर समझना चाहिए, मनमाने ढंग से नहीं।

यह सच सामने आने के बाद मृणाल पांडे का हिंदुओं और उनके इतिहास को गलत तरीके से पेश करने वाला नैरेटिव नही ढहता नजर आया। इसके बाद अपनी टिप्पणी को सुधारने, माफी माँगने या पोस्ट डिलीट करने के बजाए उन्होंने नित्यानंद मिश्रा को ही ब्लॉक कर दिया।

कंगना से कफील खान तक: मृणाल पांडे की हिंदू-घृणा की लिस्ट

ये वही मृणाल पांडे हैं, जो एक महिला के चुनावी मैदान में उतरने पर गाली देती हैं। जब कंगना रनौत को बीजेपी ने मंडी लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया, तो यही पांडे ने ‘मंडी में सही रेट मिलता है?’ जैसा आपत्तिजनक इशारा कर दिया। खुद को नारीवादी बताने वाली पांडे का नारीवाद बीजेपी को निशाना बनाने के सामने गिर गया और उन्होंने महिला को निशाना बनाना चुना, जो बीजेपी का चेहरा है।

दूसरी तरफ जब गोरखपुर के BRD मेडिकल कॉलेज कांड के आरोपित रहे कफील खान जेल से बाहर आए, तो मृणाल पांडे की खुशी छिपाए नहीं छिपी। उन्होंने खान की तुलना भगवान श्रीकृष्ण से कर डाली। जिस मामले में मासूम बच्चों की मौत हुई, उसमें आरोपी रहे व्यक्ति को भगवान से जोड़ना लोगों को बेहद आपत्तिजनक लगा। तब भी पांडे नहीं हिचकिचाई।

उनकी हिंदू-घृणा यहीं खत्म नहीं होती। कोलकाता पोर्ट का नाम श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नाम पर रखे जाने के बाद भी पांडे ने जहर उगला था। पांडे ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम ‘बंदर‘ से जोड़ा। इतना ही नहीं एक बार महाकाल के दर्शन करने वाले सिख नेता का मजाक उड़ाते हुए पांडे ने कहा कि स्वर्ण मंदिर कब जाओगे?

झूठ फैलाओ, सवाल उठे तो ब्लॉक करो: वामपंथियों का तय पैटर्न

मृणाल पांडे का ताजा मामला केवल एक बयान का विवाद नहीं है, बल्कि उस सोच की झलक है जो लंबे समय से वामपंथी इकोसिस्टम में देखने को मिलती रही है। पहले आधी अधूरी जानकारी के आधार पर नैरेटिव बनाया जाता है, हिंदू धर्म और परंपराओं पर सवाल खड़े किए जाते हैं और उसे प्रगतिशील बहस का नाम दिया जाता है। लेकिन जैसे ही कोई तथ्य और ग्रंथों के संदर्भ के साथ जवाब देता है, वही लोग असहज हो जाते हैं। बहस करने का दावा करने वाले अचानक संवाद से पीछे हटते नजर आते हैं।

इस पूरे घटनाक्रम में भी यही देखने को मिला। जब तक उनकी बात पर सवाल नहीं उठे, तब तक सोशल मीडिया पर बयान जारी रहे। लेकिन जैसे ही संस्कृत विद्वानों और आम लोगों ने प्रमाणों के साथ गलतियाँ बताई, जवाब देने के बजाए ब्लॉक करने का रास्ता चुना गया। यह वामपंथी विमर्श का पुराना तरीका है। पहले आरोप लगाओ, फिर विरोध होने पर खुद को पीड़ित दिखाओ और आखिर में असहमति की आवाज ही बंद कर दो।

यही वजह है कि इसे प्रतिशोध की राजनीति कहा जाता है। जब तर्क खत्म हो जाते हैं तो बहस भी खत्म कर दी जाती है और सामने को ही गायब कर दिया जाता है। गलत सूचना फैलाने के लिए कोई माफी नहीं, कोई पछतावा नहीं। मृणाल पांडे का मामला भी उसी पैटर्न की एक और मिसाल बन गया, जहाँ सवालों का जवाब देने के बजाए सवाल पूछने वालों को ब्लॉक कर दिया गया। यह दिखाता है कि झूठ फैलाने वाले वामपंथी, असलियत सामने आते ही कितनी आसानी से पीछे हट जाते हैं।

हिंद महासागर में चीन की घेराबंदी की तैयारी कर रहा भारत, अंडमान-निकोबार में ₹15000 करोड़ के प्रोजेक्ट को मंजूरी: जानें- मलक्का स्ट्रेट में कैसे बदलेगा खेल

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में भारत ने बड़े स्तर पर हवाई ढाँचे के विस्तार की योजना शुरू कर दी है। इस योजना का मकसद एक ओर पर्यटन और विकास को बढ़ावा देना है, तो दूसरी ओर हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों का जवाब देना भी है। द्वीप समूह के प्रशासक एडमिरल डीके जोशी ने शुक्रवार (27 फरवरी 2026) को दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान इस पूरी योजना की टाइमलाइन और उद्देश्य को स्पष्ट किया।

ग्रेट निकोबार में बनेगा नया हवाई अड्डा

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह नया हवाई अड्डा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के सबसे दक्षिणी हिस्से ग्रेट निकोबार द्वीप पर बनाया जाएगा। यह स्थान मलक्का जलडमरूमध्य (Malacca Strait) से करीब 40 समुद्री मील (Nautical Miles) की दूरी पर है। मलक्का जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है और यहाँ से वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। चीन के अधिकतर ऊर्जा आयात भी इसी मार्ग से आते हैं।

करीब 15,000 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाला यह हवाई अड्डा 2 रनवे वाला होगा और यहाँ बड़े सैन्य और नागरिक विमान उतर सकेंगे। एडमिरल जोशी ने कहा कि योजना के अनुसार लगभग 3 साल में यहाँ से पहली उड़ान शुरू हो जाएगी। यह परियोजना रक्षा मंत्रालय के मार्गदर्शन में आगे बढ़ाई जा रही है।

2 मौजूदा सैन्य हवाई पट्टियों का होगा विस्तार

नई परियोजना के साथ-साथ द्वीप समूह में मौजूद दो नौसैनिक हवाई अड्डों के रनवे को भी बढ़ाया जा रहा है। इनमें उत्तरी अंडमान द्वीप के डिगलीपुर स्थित INS कोहासा और ग्रेट निकोबार के कैंपबेल बे के पास स्थित INS बाज शामिल हैं। ये दोनों अड्डे द्वीप समूह के उत्तरी और दक्षिणी छोर पर स्थित हैं और लगभग 750 किलोमीटर लंबे क्षेत्र में फैले हुए हैं।

एडमिरल जोशी ने बताया कि इन दोनों हवाई पट्टियों को जल्द ही लगभग 3 किलोमीटर लंबा बना दिया जाएगा ताकि भारी सैन्य विमान भी आसानी से उतर सकें। इनका उपयोग सैन्य और कमर्शियल दोनों तरह की उड़ानों के लिए किया जाएगा।

श्री विजय पुरम एयरपोर्ट का होगा विस्तार

एडमिरल जोशी का कहना है कि द्वीप समूह की राजधानी श्री विजय पुरम (पहले पोर्ट ब्लेयर) के हवाई अड्डे पर अभी कई बाधाएँ हैं। वहाँ अभी केवल एक दिशा से ही विमान उतर और उड़ान भर सकते हैं। इस समस्या को देखते हुए भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण ने मौजूदा हवाई अड्डे के दक्षिण में एक नया स्थान चुना है।

इसमें 2-3 किलोमीटर लंबे रनवे और एक समानांतर टैक्सी ट्रैक बनाया जाएगा। इसके चलते इसकी संचालन क्षमता काफी बढ़ जाएगी। इसके अलावा ग्रेट निकोबार में बनने वाला ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा भी 2 रनवे वाला होगा। हालाँकि, पहले चरण में केवल एक 3 किलोमीटर लंबा रनवे बनाया जाएगा।

पर्यावरणीय और कानूनी पहलू

ग्रेट निकोबार परियोजना एक पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र में स्थित है। चिंगेनह में जहाँ यह हवाई अड्डा विकसित किया जाना है वो उन गाँवों में से एक है जिन्हें 2004 की सुनामी के बाद खाली कराया गया था।

इस परियोजना को लेकर मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) तक पहुँचा था। अधिकरण ने अपने फैसले में कहा कि पर्यावरण मंजूरी की शर्तों में पर्याप्त सुरक्षा उपाय शामिल किए गए हैं और हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं है। इसके बाद परियोजना को स्वीकृति मिल गई थी।

चीन पर काबू पाने में मिलेगी मदद

मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) दुनिया के सबसे व्यस्त और रणनीतिक समुद्री मार्गों में से एक है। यह संकरा समुद्री रास्ता हिंद महासागर को दक्षिण चीन सागर से जोड़ता है और इसी के जरिए एशिया, यूरोप, मध्य-पूर्व और अफ्रीका के बीच बड़े पैमाने पर व्यापार होता है। अनुमान है कि वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग एक तिहाई हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है।

भौगोलिक दृष्टि से यह मलक्का जलडमरूमध्य, मलेशिया, सिंगापुर और इंडोनेशिया के बीच स्थित है। इसकी चौड़ाई कुछ स्थानों पर केवल 2.8 किलोमीटर तक रह जाती है, जिससे यह क्षेत्र सामरिक रूप से बेहद संवेदनशील बन जाता है। यदि किसी कारणवश यह मार्ग अवरुद्ध हो जाए तो पूरी दुनिया की आपूर्ति श्रृंखला पर तत्काल और गहरा प्रभाव पड़ सकता है। इसी वजह से दुनिया की बड़ी शक्तियाँ इस क्षेत्र पर करीबी नजर रखती हैं।

पिछले एक दशक में चीन ने अपनी समुद्री शक्ति में उल्लेखनीय विस्तार किया है। चीन की ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया और अफ्रीका से आता है, जो मलक्का जलडमरूमध्य के रास्ते ही चीन पहुँचता है। इस निर्भरता को कई विश्लेषक ‘मलक्का दुविधा‘ (Malacca Dilemma) के रूप में देखते हैं यानि अगर इस मार्ग पर नियंत्रण या अवरोध हो जाए तो चीन की ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर संकट आ सकता है।

भारत के लिए अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण इसलिए हो जाता है क्योंकि ये द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य की पश्चिमी एंट्री के निकट स्थित हैं। भौगोलिक रूप से देखें तो भारत इन द्वीपों के माध्यम से उस समुद्री मार्ग के बेहद करीब मौजूद है, जहाँ से एशिया का विशाल व्यापारिक यातायात गुजरता है।

भारत ने इन द्वीपों पर पहले से ही त्रि-सेवा कमान (Andaman and Nicobar Command) स्थापित कर रखी है जो सेना, नौसेना और वायुसेना की संयुक्त कमांड है। अब यदि यहाँ हवाई पट्टियों का विस्तार और लॉजिस्टिक सुविधाओं का विकास किया जा रहा तो यह भारत की समुद्री निगरानी क्षमता को कई गुना तक बढ़ा सकता है।

अंडमान-निकोबार में सैन्य ढाँचे के विस्तार से भारत की समुद्री निगरानी, पनडुब्बी-रोधी क्षमता, त्वरित सैन्य प्रतिक्रिया और रणनीतिक प्रतिरोध (Deterrence) की क्षमता में वृद्धि हो सकती है। इससे भारत न केवल चीनी गतिविधियों पर प्रभावी निगरानी रख सकेगा बल्कि हिंद महासागर में अपनी भूमिका को भी अधिक सशक्त और निर्णायक बना पाएगा।

इसके साथ ही, समुद्र के नीचे बिछी कम्युनिकेशन केबलों की सुरक्षा भी मजबूत होगी। अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के लिए भी यह कदम महत्वपूर्ण है क्योंकि वे भारत को क्षेत्र में संतुलन कायम रखने वाली ताकत के रूप में देखते हैं।

हवाई अड्डों के साथ-साथ द्वीप के समग्र विकास की योजना

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में सिर्फ हवाई अड्डे ही नहीं बनाए जा रहे हैं बल्कि पूरे द्वीपों को विकसित करने की बड़ी योजना चल रही है। एडमिरल जोशी ने बताया कि यहाँ बंदरगाहों को बेहतर बनाया जा रहा है, तेल की खोज पर काम हो रहा है, दूरसंचार यानी मोबाइल और इंटरनेट कनेक्शन मजबूत किए जा रहे हैं और पर्यटन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।

इन सभी कामों का मकसद है कि द्वीप आर्थिक रूप से मजबूत बनें और देश की सुरक्षा में भी अहम भूमिका निभा सकें। यहाँ हवाई अड्डों और सैन्य अड्डों का विस्तार भारत की सेना को आधुनिक और मजबूत बनाने की योजना का हिस्सा है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलते हालात को देखते हुए यह कदम भारत की रणनीतिक ताकत बढ़ाने में मदद करेगा।

अगले 3 साल में जब नई उड़ानें शुरू होंगी तो इससे न सिर्फ इलाके का विकास होगा बल्कि देश की सुरक्षा भी और मजबूत होगी। यह परियोजना भविष्य में एक बड़ी उपलब्धि साबित हो सकती है।

जहाँ खामेनेई कर रहे थे शीर्ष अधिकारियों के साथ बैठक, उस जगह की पूरी जानकारी थी इजरायल-अमेरिका के पास: जानें किस तरह की प्लानिंग से उतारा मौत के घाट

28 फरवरी 2026 की सुबह मिडिल ईस्ट के इतिहास में एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज हो गई, जिसने पूरे क्षेत्र की राजनीति, सुरक्षा और शक्ति-संतुलन को हिला दिया। यह हमला किसी सामान्य सैन्य कार्रवाई की तरह नहीं था, न ही यह अचानक लिया गया फैसला था। यह महीनों की खुफिया तैयारी, लगातार निगरानी, सिग्नल इंटरसेप्शन, सैटेलाइट ट्रैकिंग और बेहद गहरी रणनीतिक प्लानिंग का नतीजा था, जिसे मिलकर अंजाम दिया गया था इजरायल और अमेरिका द्वारा। इस ऑपरेशन का असली निशाना ईरान की इमारतें या सैन्य ढाँचे नहीं थे, बल्कि उसकी पूरी शीर्ष नेतृत्व संरचना थी यानी सत्ता का केंद्र, निर्णय लेने वाला दिमाग और कमांड सिस्टम।

महीनों की खुफिया तैयारी और एक ऐतिहासिक मौका

इजरायल और अमेरिका की खुफिया एजेंसियाँ लंबे समय से एक ही मौके की तलाश में थीं, वह क्षण जब ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई, राष्ट्रपति और शीर्ष सैन्य कमांडर एक ही स्थान पर, एक ही मीटिंग में मौजूद हों। यह साधारण जानकारी नहीं थी। इसके लिए हजारों घंटे की निगरानी, लगातार डिजिटल ट्रैकिंग, जासूसी नेटवर्क और अंदरूनी सूत्रों से मिलने वाली सूचनाओं का इस्तेमाल किया गया।

जैसे ही यह पुख्ता सूचना मिली कि तेहरान में एक अत्यंत गोपनीय बैठक होने वाली है, जिसमें ईरान की पूरी शीर्ष नेतृत्व एक साथ मौजूद होगी, उसी पल इस ऑपरेशन को हरी झंडी दे दी गई। रणनीति साफ थी, एक ही वार में पूरी कमांड चेन को तोड़ देना, ताकि ईरान की निर्णय लेने की क्षमता को गहरा झटका लगे। यह सिर्फ लोगों को मारने का ऑपरेशन नहीं था, बल्कि पूरे सिस्टम को अस्थिर करने की योजना थी।

दिन के उजाले में हमला और बदली हुई सैन्य सोच

अब तक इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए ज्यादातर हमले रात के अंधेरे में हुए थे। ईरान की एयर डिफेंस व्यवस्था भी इसी धारणा पर आधारित थी कि हमला हमेशा रात में होगा। लेकिन इस बार रणनीति पूरी तरह बदल दी गई। 28 फरवरी की सुबह करीब 8:15 बजे, दिन की रोशनी में सटीक हवाई हमला किया गया।

इसका कारण बेहद स्पष्ट था, निशाना कोई स्थायी सैन्य ठिकाना नहीं था, बल्कि एक मीटिंग थी, जो कुछ घंटों या मिनटों में खत्म भी हो सकती थी। अगर जरा सी भी देरी होती, तो खामेनेई और अन्य नेता भूमिगत ठिकानों में छिप सकते थे और पूरा ऑपरेशन विफल हो जाता।

इसीलिए इजरायली लड़ाकू विमानों ने सीधे खामेनेई के हाई-सिक्योरिटी कॉम्प्लेक्स पर बमबारी की, जिससे पूरा परिसर तबाह हो गया। यह हमला सैन्य शक्ति से ज्यादा टाइमिंग और सूचना की ताकत का उदाहरण था।

अंदरूनी सेंध: तेहरान की सुरक्षा व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल

इस हमले की सबसे चौंकाने वाली बात यह नहीं थी कि बम गिराए गए, बल्कि यह थी कि इजरायल और अमेरिका को पहले से तीन बेहद संवेदनशील जानकारियाँ मालूम थीं, मीटिंग कहाँ हो रही है, कब हो रही है और उसमें कौन-कौन लोग शामिल होंगे।

इसका सीधा मतलब है कि ईरान की सत्ता और सुरक्षा तंत्र के भीतर कोई ऐसा नेटवर्क मौजूद है, जो सटीक और रियल-टाइम जानकारी बाहर पहुँचा रहा है। यही वजह है कि अब तेहरान  की कोई भी जगह पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानी जा सकती।

इस हमले के बाद ईरान के हर बड़े जनरल, हर आईआरजीसी कमांडर और हर वरिष्ठ अधिकारी के मन में यह डर बैठ गया है कि अगली मीटिंग कहीं मौत का न्योता न बन जाए। यह डर केवल सैन्य नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक स्तर पर ईरान की सत्ता को कमजोर कर रहा है।

एक ही झटके में टूटी ईरान की कमांड व्यवस्था

इस ऑपरेशन में सिर्फ खामेनेई ही नहीं, बल्कि कई शीर्ष सैन्य और सुरक्षा अधिकारी भी मारे गए। इसका असर केवल व्यक्तियों की मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम पर पड़ा है। जहाँ पहले इजरायल अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग जनरलों को निशाना बनाता था, वहाँ इस बार पूरा फोकस एक ही मीटिंग पर था, एक जगह, एक पल और महीनों की तैयारी। यह ब्रूट फोर्स नहीं था, बल्कि सर्जिकल स्ट्राइक थी, जिसे बेहद सटीक योजना के साथ अंजाम दिया गया।

इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव कहीं ज्यादा गहरा है। अब ईरानी नेतृत्व कभी भी खुद को पूरी तरह सुरक्षित महसूस नहीं कर पाएगा, चाहे वह कितनी भी सुरक्षा व्यवस्था क्यों न बना ले। हमले के बाद गुस्से में ईरान ने कई देशों पर एक साथ मिसाइलें दाग दीं। हालाँकि इनमें से ज्यादातर मिसाइलें इंटरसेप्ट कर ली गईं, लेकिन इससे पूरा खाड़ी क्षेत्र युद्ध के मुहाने पर आ खड़ा हुआ।

सऊदी अरब ने साफ कहा कि वह अब ईरान के खिलाफ अपनी पूरी ताकत झोंक देगा। जो क्षेत्रीय गठबंधन पहले बिखरा हुआ था, वह एक ही झटके में एकजुट हो गया, क्योंकि ईरान ने एक साथ कई देशों को निशाना बना दिया। यह हमला सिर्फ सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से पूरे मिडिल ईस्ट की दिशा बदलने वाला कदम था।

मिडिल ईस्ट में एक नया और खतरनाक अध्याय

यह हमला केवल बमों और मिसाइलों का नहीं था, बल्कि डर, मनोवैज्ञानिक दबाव और रणनीतिक वर्चस्व का युद्ध था। इजरायल और अमेरिका ने दिखा दिया कि उनकी खुफिया पहुँच कितनी गहरी है और उनका धैर्य कितना लंबा। एक ही सुबह में ईरान की शीर्ष नेतृत्व संरचना को हिला देना आने वाले वर्षों तक पूरे क्षेत्र की राजनीति, सुरक्षा नीति और गठबंधनों को प्रभावित करेगा। मिडिल ईस्ट अब एक नए, ज्यादा अस्थिर और ज्यादा खतरनाक दौर में प्रवेश कर चुका है, जहाँ युद्ध सिर्फ मैदान में नहीं, बल्कि दिमागों और सूचनाओं के स्तर पर लड़ा जाएगा।

कौन थे ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई, जिन्होंने चार दशक तक इस्लामी मुल्क की सत्ता संभाली: अमेरिका-इजरायल विरोध को बनाया नीति, जानें सब कुछ

ईरान के नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की इजरायल और अमेरिका के संयुक्त हमले में मौत हो गई है। ईरानी की सरकारी मीडिया ने रविवार (1 मार्च 2026) को उनके मौत की पुष्टि की।

खामेनेई की मौत का दावा करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, “इतिहास के सबसे क्रूर लोगों में से एक, खामेनेई, मर चुका है। यह न केवल ईरान के लोगों के लिए न्याय है, बल्कि सभी महान अमेरिकियों और दुनियाभर के उन कई देशों के लोगों के लिए भी न्याय है, जिन्हें खामेनेई और उसके खूनी गुंडों के गिरोह ने मार डाला या क्षत-विक्षत कर दिया।”

खामेनेई की मौत ऐसे समय पर हुई है जब ईरान पहले से ही आर्थिक संकट, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और अंदरूनी विरोध प्रदर्शनों से जूझ रहा था। खामेनेई की मौत 50 साल के इतिहास का सबसे बड़ा सत्ता परिवर्तन माना जा रहा है।

हालाँकि यह साफ नहीं है कि इससे तुरंत शासन परिवर्तन होगा या नहीं। ईरान में राष्ट्रपति चुना हुआ होता है, लेकिन असली ताकत सुप्रीम लीडर के पास ही रहती है। वर्तमान में राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन हैं, पर अंतिम निर्णयों का अधिकार खामेनेई के पास था।

उनके संभावित उत्तराधिकारियों में उनके बेटे मोजतबा खामेनेई का नाम लिया जा रहा है। इससे पहले पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी को उत्तराधिकारी माना जा रहा था, लेकिन 2024 में हेलिकॉप्टर दुर्घटना में उनकी मौत हो गई थी।

कौन थे खामेनेई?

अयातुल्ला अली खामेनेई 1989 से ईरान का सर्वोच्च नेता है। उन्होंने यह पद अयातुल्ला रुहोल्लाह खोमैनी की मौत के बाद संभाला था, जिन्होंने 1979 की इस्लामी क्रांति का नेतृत्व किया था। खामेनेई ने पहले ईरान-इराक युद्ध के दौरान राष्ट्रपति के रूप में देश का नेतृत्व किया। उन्होंने 1999 के छात्र आंदोलनों, 2009 के विवादित चुनावों के बाद हुए बड़े प्रदर्शनों और 2019 के आर्थिक विरोधों का सामना किया। 2022

उनका जन्म 1939 में मशहद में हुआ था। कम उम्र से ही उन्होंने इस्लामी शिक्षा प्राप्त की और शाह के शासन के खिलाफ आंदोलन में शामिल हो गए। उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया। 1981 में एक हमले में उनका दाहिना हाथ बेकार हो गया था।

सुप्रीम लीडर बनने के बाद उन्होंने ईरान की सैन्य और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) को उन्होंने बड़ी ताकत दी, जो बाद में देश की राजनीति और अर्थव्यवस्था में भी प्रभावशाली बन गई।

उनके छह बच्चे बताए जाते हैं, जिनमें मोजतबा खामेनेई को सबसे प्रभावशाली माना जाता है। परिवार के कुछ सदस्य, जिनमें उनकी बहन बद्री भी शामिल हैं, बाद में उनके आलोचक बन गए थे।

शासन, विवाद और क्षेत्रीय रणनीति

खामेनेई के शासन में ईरान ने प्रतिरोध की धुरी यानी मिडिल ईस्ट में अपने सहयोगी समूहों का नेटवर्क मजबूत किया। लेबनान में हिज़्बुल्लाह, गाजा में हमास, यमन में हूती और इराक-सीरिया के कई गुटों को समर्थन दिया गया। इस रणनीति का उद्देश्य अमेरिका और इजरायल के खिलाफ फॉरवर्ड डिफेंस बनाना था।

हालाँकि उनके शासन में कई बार बड़े विरोध प्रदर्शन भी हुए। 2009 के चुनाव विवाद, 2019 में पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी और 2022 में महिलाओं के अधिकारों को लेकर हुए प्रदर्शनों को सुरक्षा बलों ने कड़ी कार्रवाई से दबा दिया। मानवाधिकार संगठनों के अनुसार इन कार्रवाइयों में सैकड़ों लोग मारे गए।

सुरक्षा कारणों से उनकी सार्वजनिक मौजूदगी बेहद सीमित रहती थी। वे कभी विदेश यात्रा पर नहीं गए, सिवाय 1989 में उत्तर कोरिया की आधिकारिक यात्रा के, जहाँ उन्होंने किम इल-सुंग से मुलाकात की थी।

2015 में ईरान ने परमाणु समझौता (JCPOA) किया, लेकिन बाद में अमेरिका के समझौते से हटने के बाद तनाव फिर बढ़ गया। खामेनेई ने परमाणु कार्यक्रम को जारी रखा, हालाँकि उन्होंने परमाणु हथियारों के खिलाफ फतवा भी जारी किया था।

US-इजरायल के हमले के बाद ईरान ने मिडिल ईस्ट में मचाई तबाही, 7 देशों पर दागी मिसाइलें: जानें- कैसे महीनों की तैयारी के बाद तेहरान पर हुआ हमला, क्यों ‘लायन्स रोर’ रखा गया नाम

मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में हालात इस समय बहुत खराब हैं और वहाँ युद्ध जैसे हालात बन गए हैं। इजरायल और ईरान के बीच जो पुरानी दुश्मनी छिपी हुई थी, वह अब खुलकर एक बड़ी लड़ाई के रूप में सबके सामने आ गई है। ईरान ने न केवल इजरायल को निशाना बनाया है, बल्कि उसने दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया है।

ईरान ने एक साथ सात देशों– इजरायल, UAE, सऊदी अरब, कुवैत, जॉर्डन, कतर और बहरीन पर खतरनाक मिसाइलों से हमला किया है, जिससे पूरी दुनिया में डर का माहौल है। ईरान ने अमेरिका के 7 सैन्य अड्डों को अपना निशाना बनाया है और वहाँ ऐसे धमाके हुए हैं जिन्हें देखकर किसी की भी रूह कांप जाए। हर तरफ आग की लपटें और धुआँ ही धुआँ दिखाई दे रहा है।

कैसे शुरू हुई जंग

ईरान और इजरायल के बीच तनाव तो बहुत पहले से था, लेकिन 13 जून 2025 को इनके बीच एक बड़ा और सीधा युद्ध शुरू हुआ, जिसे ‘बारह दिवसीय युद्ध’ कहा जाता है। उस समय इजरायल ने ‘ऑपरेशन राइजिंग लॉयन’ के तहत ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर हमला किया था। इसके बाद से ही दोनों देशों के बीच छिटपुट हमले जारी रहे। ताजा विवाद तब बढ़ा जब शनिवार (28 फरवरी 2026) की सुबह इजरायल ने अमेरिका के साथ मिलकर ईरान की राजधानी तेहरान और कई अन्य शहरों पर हमला कर दिया।

इजरायल ने अपने इस नए मिशन का नाम ‘लायन्स रोर‘ (शेर की दहाड़) रखा है। इस हमले में ईरान के खुफिया और रक्षा मंत्रालय को निशाना बनाया गया, जिसके बाद ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई को सुरक्षित जगह पर ले जाना पड़ा। इस हमले में ईरान के मिनाब शहर में एक स्कूल पर मिसाइल गिरने से 24 मासूम छात्राओं की मौत हो गई, जिसने ईरान को बुरी तरह भड़का दिया।

महीनों की सीक्रेट प्लानिंग और ‘सरप्राइज अटैक’ की पूरी कहानी

इजरायल और अमेरिका के बीच इस बड़े हमले की तैयारी कोई रातों-रात नहीं हुई, बल्कि इसके लिए पिछले कई महीनों से पर्दे के पीछे गहरी प्लानिंग चल रही थी। न्यूज एजेंसी रॉयटर्स और इजरायली मीडिया के मुताबिक, इस पूरे ऑपरेशन का खाका वाशिंगटन और इजरायल ने मिलकर बहुत पहले ही तैयार कर लिया था। हमले की तारीख कई हफ्ते पहले ही तय कर ली गई थी, ताकि दोनों देशों की सेनाएँ पूरी तरह तालमेल बिठा सकें। इस मिशन में इजरायल अपनी पूरी ताकत झोंक रहा है और अमेरिका हर कदम पर उसके साथ खड़ा है।

इस हमले की सबसे चौंकाने वाली बात इसका समय था। आमतौर पर ऐसे बड़े सैन्य हमले रात के अंधेरे में किए जाते हैं, लेकिन इजरायल और अमेरिका ने जानबूझकर सुबह का समय चुना। इसके पीछे की सोच यह थी कि ईरानी सेना सुबह के वक्त किसी बड़े हमले की उम्मीद नहीं करेगी, जिससे उन्हें संभलने का मौका न मिले। रिपोर्ट के अनुसार, इस संयुक्त हमले का ‘शुरुआती चरण’ कम से कम चार दिनों तक चलने के लिए डिजाइन किया गया है, जिसमें ईरान के मिसाइल सिस्टम और सैन्य ठिकानों को जड़ से खत्म करने का लक्ष्य रखा गया है।

ईरान का पलटवार और ‘ऑपरेशन फतह-ए-खैबर’

इजरायल और अमेरिका के इस साझा हमले का जवाब देने के लिए ईरान ने ‘ऑपरेशन फतह-ए-खैबर’ शुरू किया। ईरान ने घोषणा की कि वह अमेरिका को विनाशकारी जवाब देगा और उसने एक साथ करीब 400 बैलिस्टिक मिसाइलें दाग दीं। ईरान ने साफ कर दिया कि उसके लिए अब कोई लक्ष्मण रेखा नहीं बची है। ईरान ने न केवल इजरायल की राजधानी तेल-अवीव पर मिसाइलों की बौछार की, बल्कि मध्य पूर्व के उन सभी देशों को निशाना बनाया जहाँ अमेरिका के सैन्य ठिकाने मौजूद हैं।

ईरान की इन मिसाइलों ने इजरायल के साथ-साथ कतर, बहरीन, कुवैत, सऊदी अरब, जॉर्डन और UAE (दुबई और अबू धाबी) में तबाही मचा दी। सायरनों की आवाजें पूरे इलाके में गूँजने लगीं और लोग अपनी जान बचाने के लिए बंकरों की तलाश करने लगे।

अमेरिका के 7 सैन्य अड्डों पर मिसाइल अटैक

ईरान ने अपनी कार्रवाई में सबसे ज्यादा नुकसान अमेरिका को पहुँचाया है। उसने अमेरिका के छह से सात बड़े सैन्य ठिकानों को मिसाइलों से ध्वस्त कर दिया। बहरीन में मौजूद अमेरिकी नौसेना के ‘पाँचवीं फ्लीट’ (5th Fleet) के मुख्यालय पर हुआ हमला सबसे भयानक था, जिससे वह बेस पूरी तरह तबाह नजर आ रहा है।

यह बेस अमेरिका के लिए समुद्री सुरक्षा के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, कतर के ‘अल उदेद’ एयर बेस पर भी हमला हुआ, जहाँ करीब 10,000 अमेरिकी सैनिक तैनात रहते हैं। यह बेस अमेरिकी सेंट्रल कमांड का मुख्य केंद्र है।

UAE के अबू धाबी और दुबई में भी धमाकों की आवाजें सुनी गईं, जहाँ कम से कम एक व्यक्ति की मौत की खबर सामने आई है। ईरान ने कुवैत और जॉर्डन में भी अमेरिकी हेडक्वॉर्टर पर हमला किया, जिससे पूरी दुनिया को यह संकेत मिला कि अगर जंग जारी रही तो कोहराम मच सकता है।

युद्ध के पीछे का असली कारण और विवाद

इस महायुद्ध के पीछे का सबसे बड़ा कारण ईरान का ‘बैलिस्टिक मिसाइल प्रोजेक्ट’ और परमाणु हथियारों को लेकर चल रही खींचतान है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चाहते हैं कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम के साथ-साथ अपने मिसाइल बनाने के काम को भी रोक दे, लेकिन ईरान इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। ईरान इन मिसाइलों को अपनी सुरक्षा के लिए जरूरी मानता है।

ईरान का कहना है कि जब 2025 में इजरायल और अमेरिका ने उसकी परमाणु साइट्स पर हमला किया था, तब इन्हीं मिसाइलों ने उसकी रक्षा की थी। ईरान ने साफ कह दिया है कि वह मिसाइल कार्यक्रम पर कोई समझौता नहीं करेगा। इसी असहमति के कारण बातचीत ठप हो गई और अमेरिका ने इजरायल के साथ मिलकर ईरान को चारों तरफ से घेरकर हमला करना शुरू कर दिया।

ईरान की मिसाइल ताकत और अंडरग्राउंड सिटीज

ईरान के पास इस समय पूरे मध्य पूर्व में मिसाइलों का सबसे बड़ा खजाना है। ईरान के पास ऐसी मिसाइलें हैं जो 2000 से 2500 किलोमीटर की दूरी तक मार कर सकती हैं, यानी वे आसानी से इजरायल तक पहुँच सकती हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ईरान ने जमीन के अंदर कम से कम पाँच ‘मिसाइल शहर’ बना रखे हैं, जहाँ हजारों बैलिस्टिक मिसाइलें छिपी हुई हैं।

इनमें से ‘सेजिल’ नाम की मिसाइल सबसे खतरनाक मानी जाती है, जिसकी रफ्तार 17,000 किलोमीटर प्रति घंटा से भी ज्यादा है। इसके अलावा इमाद, गदर और शहाब-3 जैसी मिसाइलें भी ईरान के शस्त्रागार में शामिल हैं। इन्हीं मिसाइलों के दम पर ईरान अमेरिका और इजरायल जैसी ताकतों को चुनौती दे रहा है।

भारत के लिए चिंता और प्रवासी भारतीयों पर असर

इस बढ़ते संघर्ष ने भारत की भी चिंता बढ़ा दी है क्योंकि खाड़ी देशों में करीब 93 लाख भारतीय रहते हैं। संयुक्त अरब अमीरात में 38.9 लाख और सऊदी अरब में 26.5 लाख भारतीय काम कर रहे हैं। जिन इलाकों में हमले हो रहे हैं, वहाँ बड़ी संख्या में भारतीय मौजूद हैं।

अबू धाबी और दुबई जैसे शहरों में हुए धमाकों से वहाँ रहने वाले प्रवासी भारतीयों के बीच डर का माहौल है। भारत सरकार इस पूरी स्थिति पर करीब से नजर रख रही है क्योंकि अगर युद्ध लंबा खिंचता है, तो वहाँ रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। सरकार आपातकालीन योजनाओं पर काम कर रही है ताकि जरूरत पड़ने पर नागरिकों को सुरक्षित निकाला जा सके।

युद्ध के परिणाम और भविष्य का खतरा

ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच छिड़ी इस जंग ने मध्य पूर्व को एक गहरे संकट में डाल दिया है। कतर जैसे देशों में अमेरिकी नागरिकों को बंकरों में छिपने के आदेश दिए गए हैं और दोहा जैसे मुख्य एयरबेस को बंद करना पड़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस लड़ाई से पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैल जाएगी, जिसका असर दुनियाभर की अर्थव्यवस्था और तेल की कीमतों पर पड़ेगा।

अमेरिका ने ईरान की मिसाइल ताकत को खत्म करने की ठान ली है, वहीं ईरान ने साफ कर दिया है कि वह अपनी रक्षा के लिए किसी भी रेड लाइन को पार कर सकता है। फिलहाल दोनों तरफ से हमले जारी हैं और शांति की कोई गुंजाइश नजर नहीं आ रही है। अगर यह जंग नहीं रुकी, तो यह पूरे विश्व के लिए एक बड़ा खतरा बन सकती है।

PM मोदी ने शुरू किया देशव्यापी HPV वैक्सीनेशन, सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही फेक न्यूज और डरावनी कहानियाँ: जानें क्या है सच्चाई और कैसे ये हमारे हित में है

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी  शनिवार (28 फरवरी 2026) को अजमेर, राजस्थान में किशोरी लड़कियों के लिए देशव्यापी HPV टीकाकरण अभियान का शुरुआत कर रहे हैं। यह पहल भारत के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) द्वारा कैंसर विशेषकर सर्वाइकल कैंसर से बचाव के लिए शुरू की गई एक ऐतिहासिक मुहिम है।

सर्वाइकल कैंसर मुख्य रूप से हाई रिस्क वाले ह्यूमन पैपिलोमावायरस (HPV) स्ट्रेन से लगातार संक्रमण के कारण होता है और यह भारत में महिलाओं में सबसे आम कैंसरों में से एक है। इस अभियान का उद्देश्य किशोरी लड़कियों, विशेषकर 14 साल की उम्र वाली लड़कियों को टीका लगाकर उन्हें वायरल संक्रमण से पहले सुरक्षा प्रदान करना है।

इस देशव्यापी टीकाकरण योजना से सर्वाइकल कैंसर की घटनाओं में महत्वपूर्ण कमी आने की उम्मीद है। वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि HPV वैक्सीन सुरक्षित और प्रभावी है, यदि इसे उस उम्र में लगाया जाए जब लड़कियों के वायरल संक्रमण के जोखिम वाले संपर्क से पहले टीकाकरण हो सके।

इस प्रकार, यह अभियान न केवल भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य की सुरक्षा करेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी HPV संक्रमण और उससे संबंधित कैंसरों के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।

यह उल्लेखनीय है कि आज के इस शुभारंभ के साथ भारत उन 160 से अधिक देशों में शामिल हो जाएगा, जिन्होंने अपने टीकाकरण कार्यक्रमों में HPV वैक्सीन को शामिल किया है। इनमें से 90 से अधिक देश एक डोज HPV वैक्सीन योजना को लागू कर रहे हैं, जिससे कवरेज, उपलब्धता और कार्यक्रम के आयोजन में सुधार हो रहा है।

HPV वैक्सीनेशन ड्राइव के खिलाफ सोशल मीडिया पर गलत जानकारी फैलाई जा रही है

देशव्यापी टीकाकरण अभियान की शुरुआत को मेडिकल कम्युनिटी से काफी सराहना और समर्थन मिला है, लेकिन इसके बावजूद सोशल मीडिया पर गलत सूचना और नकारात्मक प्रचार भी बड़ी मात्रा को देखा जा सकता है। कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि यह वैक्सीन सुरक्षित नहीं है, कि यह दुष्ट बिल गेट्स का प्रोजेक्ट  है या कि सरकार किसी तरह किशोरी लड़कियों को जोखिम में डाल रही है।

इन आरोपों के पीछे सामान्य झूठ और अंधविश्वास, आधुनिक साजिश सिद्धांतों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। कई शिक्षित और सोशल मीडिया यूजर वैक्सीन अभियान के खिलाफ गलत जानकारी फैला रहे हैं, डर पैदा करने के लिए असंबंधित दावे, आधी-अधूरी थ्योरी और बहुत सारी गलत जानकारी का इस्तेमाल कर रहे हैं।

आइए इन झूठे दावों को समझें और वैक्सीन के बारे में कुछ जानकारी पाएँ

कई सोशल मीडिया हैंडल्स ने भारत में किए गए एक अध्ययन के बारे में मीडिया रिपोर्ट्स और दावों का हवाला दिया है, जिसमें दो अलग-अलग वैक्सीन शामिल थीं।

गार्डासिल, जिसे Merck/MSD ने बनाया और सर्वारिक्स, जिसे ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन/GSK ने विकसित किया। यह अध्ययन एक बड़े डेमोन्स्ट्रेशन प्रोजेक्ट के रूप में किया गया था, न कि ‘क्लिनिकल ट्रायल’, क्योंकि दोनों वैक्सीन के ट्रेडिशनल क्लिनिकल ट्रायल पहले ही समाप्त हो चुके थे।

यहाँ ध्यान देने वाली बात ये है कि गार्डासिल और सर्वारिक्स दोनों ही 2008 से भारत में लाइसेंस प्राप्त और कमर्शियल रूप से उपलब्ध थे। PATH अध्ययन का उद्देश्य बड़े पैमाने पर वैक्सीन प्रशासन और बड़े जनसंख्या समूहों के लिए तैयारी का परीक्षण करना था, ताकि भविष्य में संभावित देशव्यापी रोलआउट के लिए तैयारी सुनिश्चित की जा सके।

यह अध्ययन प्रोग्राम फॉर एप्रोप्रियेट टेक्नोलॉजी इन हेल्थ (PATH) ने भारत सरकार, आंध्र प्रदेश और गुजरात राज्य सरकार और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के साथ मिलकर 2009-2010 के बीच किया था।

इस दौरान दोनों वैक्सीन गार्डासिल (Merck/MSD) और सर्वारिक्स (GSK) के डोज संबंधित कंपनियों ने दान किए थे। इस अध्ययन का मकसद यह देखना था कि बड़े पैमाने पर HPV वैक्सीन देने की योजना कितनी कारगर और स्वीकार्य होगी और इसे भविष्य में सार्वजनिक टीकाकरण कार्यक्रमों में शामिल किया जा सके।

आंध्र प्रदेश में करीब 14000 लड़कियों (जिनकी उम्र 10-14 साल थी) उनको गार्डासिल दी गई और गुजरात में करीब 16000 लड़कियों को सर्वारिक्स दी गई। अध्ययन के बाद कुछ विरोध और विवाद भी सामने आए।

कुछ लोग और समूह, जैसे एंटी-वैक्सीन एक्टिविस्ट, मानवाधिकार और महिला अधिकार समूह और राजनीति से जुड़े लोग इसे गलत साबित करने की कोशिश करने लगे। इनकी शिकायत यह थी कि कॉन्सेंट फॉर्म्स सही तरीके से नहीं लिए गए, कई जगहों पर स्कूल प्रिंसिपल या हॉस्टल वार्डन ने साइन किया, जबकि सही तरीका यह था कि अभिभावक साइन करें।

कुछ लोगों ने इसे राष्ट्रवादी दृष्टि से भी गलत बताया, क्योंकि सरकार पर आरोप लगे कि उन्होंने विदेशी कंपनियों और संगठनों के साथ मिलकर महत्वपूर्ण स्वास्थ्य डेटा साझा किया। विवाद तब और बढ़ा जब यह खबर आई कि 7 लड़कियों (गुजरात में 2 और आंध्र प्रदेश में 5) की वैक्सीन के बाद मौत हुई। इन घटनाओं ने मीडिया और राजनीति में हलचल पैदा की।

इस पूरे मामले की जाँच में संसद की स्थायी समिति स्वास्थ्य और परिवार कल्याण (72वीं रिपोर्ट) ने PATH, ICMR और DCGI की कड़ी आलोचना की और कहा कि PATH ने विदेशी वैक्सीन कंपनियों (Merck और GSK) का सहायक बनकर, UIP में वैक्सीन शामिल कराने की कोशिश की जो कि सिर्फ व्यावसायिक लाभ के लिए था, न कि असली सार्वजनिक स्वास्थ्य उद्देश्य के लिए।

वैक्सीनेशन के बाद मौतों के दावों के पीछे की सच्चाई

ICMR ने इन मौतों के आरोपों को गंभीरता से लिया और सभी दावों की जाँच के लिए इन्वेस्टिगेशन शुरू की। 2011 में ICMR ने अपनी फाइनल रिपोर्ट जमा की। इस रिपोर्ट में हर मौत के ऑटोप्सी, स्वास्थ्य रिकॉर्ड, स्थानीय डेटा और घटनाओं की समय-सीमा की जाँच की गई। नतीजा यह निकला कि इन 7 मौतों में से किसी की भी वैक्सीन से कोई लिंक या कारण नहीं पाया गया।

आंध्र प्रदेश में मौतों के कारण थे, एक 14 साल की लड़की में ऑर्गेनोफॉस्फोरस जहर (संभवतः कीटनाशक) का खाना, 13 साल की लड़की में इसी तरह के पैटर्न की आसंका दिखी, एक केस जिसमें सही मेडिकल डायग्नोसिस स्पष्ट नहीं था लेकिन वैक्सीन कारण नहीं था, एक 14 साल की लड़की की अचानक डूबने से मौत और एक केस मलेरिया और टाइफाइड का वही गुजरात में जहाँ सर्वारिक्स दिया गया था और एक की मौत साँप के काटने से हुई व दूसरी मलेरिया और गंभीर एनीमिया के कारण हुई।

गुजरात और आंध्र प्रदेश में HPV वैक्सीनेशन पर PATH स्टडी की ICMR जाँच
गुजरात और आंध्र प्रदेश में HPV वैक्सीनेशन पर PATH स्टडी की ICMR जाँच

‘नैतिक चूक’ के दावे सही हो सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वैक्सीन खतरनाक या बेअसर थीं

यहाँ ध्यान देने वाली है कि 2013 की संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट ने सरकार की कुछ कमियों पर गंभीर चिंता जताई और आलोचना की थी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वैक्सीन अप्रभावी या खतरनाक हैं।

इसका कारण यह है।

1 जैसा कि ऊपर बताया गया की ICMR के विस्तृत अध्ययन में वैक्सीन और मौतों के बीच कोई संबंध नहीं पाया गया। किसी अध्ययन में सामने आई कुछ  नैतिक या प्रक्रियागत गड़बड़ियों के कारण, जिसमें करीब 30,000 प्राप्तकर्ताओं और दो राज्यों के सैकड़ों स्वास्थ्यकर्मी, NGO और स्टाफ शामिल थे, वैक्सीन को ‘खतरनाक’ कहना वैज्ञानिक या तार्किक तर्क नहीं बनता।

2 उस समय और उसके बाद का वैश्विक और भारतीय डेटा यह दिखाता है कि HPV वैक्सीन का सुरक्षा रिकॉर्ड मजबूत है और दुनिया भर में कहीं भी किसी मौत का कारण वैक्सीन नहीं पाया गया।

3 संसदीय रिपोर्ट की खुद विशेषज्ञों ने आलोचना की है (जैसे लैंसेट ऑन्कोलॉजी) क्योंकि इसमें HPV वैक्सीन की सुरक्षा और प्रभावकारिता पर पहले से मौजूद व्यापक प्रमाणों, जैसे क्लिनिकल ट्रायल और लाइसेंस के बाद की निगरानी (लाइसेंस के बाद निगरानी) को नजरअंदाज किया गया।

4 पिछले 15+ सालों में और दुनिया भर में सैकड़ों मिलियन डोज़ दिए जाने के अनुभव ने दिखाया है कि HPV वैक्सीन, जैसे गार्डासिल, अत्यधिक प्रभावी हैं और 93–100% तक सुरक्षा प्रदान करती हैं उन HPV प्रकारों के खिलाफ जो अधिकांश सर्वाइकल कैंसर के लिए जिम्मेदार हैं।

5 इस वैक्सीन का सुरक्षा रिकॉर्ड शानदार है। इसके दुष्प्रभाव अधिकतर हल्के होते हैं, जैसे टीके की जगह दर्द, और गंभीर घटनाएँ बहुत ही दुर्लभ हैं।

अभी पूरे देश में चल रहे कैंपेन में मर्क द्वारा बनाए गए गार्डासिल का इस्तेमाल क्यों किया जा रहा है?

कुछ लोग पूछ सकते हैं कि जबकि PATH अध्ययन में दोनों वैक्सीन गार्डासिल और सर्वारिक्स का परीक्षण किया गया था, वर्तमान सरकारी देशव्यापी कार्यक्रम में केवल गार्डासिल क्यों इस्तेमाल की जा रही है। इसके मुख्य कारण इस प्रकार हैं।

गार्डासिल के लिए केवल एक ही डोज़ की आवश्यकता होती है, जबकि सर्वारिक्स (GSK) के लिए कई डोज़ लेने पड़ते हैं। एक डोज़ ही डोज प्रभावी है और कई WHO अध्ययन इसे प्रमाणित करते हैं। दुनिया भर में दस वर्षों से अधिक के अनुभव में गार्डासिल का रिकॉर्ड साबित हो चुका है। 2006 से अब तक 500 मिलियन से अधिक डोज़ गार्डासिल की दुनिया भर में दी जा चुकी हैं, इसके सुरक्षा रिकॉर्ड और HPV संक्रमण कम करने में असर भी देखे जा चुके है।

भारत सरकार ने GAVI, वैक्सीन एलायंस के साथ साझेदारी में गार्डासिल की आपूर्ति सुनिश्चित की है, जो पारदर्शी और वैश्विक रूप से समर्थित व्यवस्था के तहत हो रही है। इससे देश भर में इसकी सप्लाइ सुनिश्चित की और डोज़, कोल्ड चेन की सुरक्षा और पर्याप्त भंडारण सुविधाएँ उपलब्ध हैं।

मेड इन इंडिया HPV वैक्सीन भी आ रही है, जिस पर अभी स्टडी चल रही है

यहाँ ध्यान देने योग्य है कि भारत के पास HPV के बड़े पैमाने पर टीकाकरण के लिए विकल्प पहले से मौजूद हैं। सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने सर्वावैक विकसित किया है, जो एक चार गुणों वाला HPV वैक्सीन है।

यह वैक्सीन परीक्षणों में सफल रही है और 2023 से कमर्शियल रूप से उपलब्ध है। हालाँकि, इसे अभी तक देशव्यापी टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल नहीं किया गया, क्योंकि सर्वावैक को भी दो डोज़ की आवश्यकता है। इस समय ICMR एक इम्यूनोब्रिजिंग अध्ययन कर रहा है, जिसमें सर्वावैक (एक डोज) और गार्डासिल की तुलना की जा रही है कि क्या सर्वावैक का प्रभाव कम नहीं है।

जब सर्वावैक इस अध्ययन में सफल हो जाएगा, तो इसे सरकार के अभियान में भी शामिल किए जाने की संभावना है। सर्वावैक की कीमत काफी कम है और यह देश में ही तैयार किया जाता है, जबकि गार्डासिल को बाहर से लाना पड़ता है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि NTAGI ने पहले ही सर्वावैक को राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम (NIP) में शामिल करने की मंजूरी दे दी है (प्रारंभ में दो डोज़ योजना के रूप में) और स्वास्थ्य मंत्रालय और संसद की समितियों ने देशी वैक्सीन जैसे सर्वावैक को तेजी से व्यापक UIP रोलआउट के लिए बढ़ावा देने का आग्रह किया है।

वैक्सीन से जुड़ी गलत जानकारी और डर फैलाना समाज के लिए खतरनाक क्यों है?

HPV संक्रमण लगभग सभी सर्वाइकल कैंसर के मामलों का कारण होता है। इसके अलावा यह कई मामलों में एनल, पेनाइल, वल्वर, वैजाइनल और ओरोफैरिंजियल कैंसर तथा जननांग मस्सों (genital warts) का भी कारण बनता है। भारत में हर साल 1,20,000 से अधिक नए सर्वाइकल कैंसर के मामले सामने आते हैं और करीब 80,000 मौतें होती हैं। ऐसे में टीकाकरण के जरिए रोकथाम करना एक बेहद महत्वपूर्ण और जीवनरक्षक कदम है।

सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही आधी-अधूरी, भ्रामक और गैर-वैज्ञानिक बातें लोगों में डर पैदा करती हैं और माता-पिता को हिचकिचाने पर मजबूर करती हैं, जिससे बच्चे उन बीमारियों के खतरे में पड़ जाते हैं जिन्हें रोका जा सकता है। अक्सर झूठ और गलत जानकारी सबसे तेजी से गरीब और कम शिक्षित परिवारों में फैलती है। जिन लड़कियों को सर्वाइकल कैंसर से बचाव का मौका मिल सकता है, वही सबसे ज्यादा जोखिम में आ जाती हैं।

एक संपन्न परिवार कभी भी अपना फैसला बदलकर अपनी बेटी को बाजार में उपलब्ध वैक्सीन लगवा सकता है। लेकिन यदि गरीब परिवारों की लड़कियाँ सरकार द्वारा मुफ्त दिए जा रहे टीके से वंचित रह जाती हैं, तो उनके लिए बाद में यह मौका मिल पाना बेहद मुश्किल होता है।

क्या बिल गेट्स के खिलाफ आम नेगेटिव भावनाएँ एंटी-HPV वैक्सीनेशन ड्राइव को बढ़ावा दे रही हैं?

अरबपति बिल गेट्स, जो बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के प्रमुख रहे हैं, हाल के समय में कई मामलों के दोषी और यौन अपराधी जेफरी एपस्टीन से कथित संबंधों को लेकर आलोचनाओं का सामना कर रहे हैं।

सोशल मीडिया पर बढ़ी हुई एंटी-बिल गेट्स भावनाएँ वैश्विक एंटी-वैक्सीन नैरेटिव को भी हवा दे रही हैं। साजिश सिद्धांतों को बढ़ावा देने वाले लोग एपस्टीन कनेक्शन का हवाला देकर गेट्स को बदनाम करने और फाउंडेशन की वैश्विक स्वास्थ्य पहलों को किसी संदिग्ध कॉरपोरेट एजेंडा की तरह पेश करने की कोशिश कर रहे हैं।

हालाँकि, बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन वैश्विक टीकाकरण अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। 1999-2000 में GAVI की शुरुआत के लिए फाउंडेशन ने 750 मिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 67,916 करोड़ रुपए) की प्रारंभिक फंडिंग दी थी, जिसमें WHO, UNICEF और वर्ल्ड बैंक का सहयोग था।

रिपोर्टों के अनुसार, अब तक फाउंडेशन का GAVI में कुल योगदान 7.7 बिलियन डॉलर (लगभग 69,300 करोड़) से अधिक हो चुका है। GAVI ने दुनिया भर में 1.2 अरब (लगभग 120 करोड़) से अधिक बच्चों का टीकाकरण किया है और 2 करोड़ से ज्यादा मौतों को रोकने में भूमिका निभाई है। फाउंडेशन शोध एवं विकास, आपूर्ति, कीमत निर्धारण और खरीद प्रक्रियाओं में भी सहयोग देता है, ताकि गरीब देशों को वैक्सीन मिल सके।

बिल गेट्स के निजी जीवन और प्रोफेशनल लाइफ पर एपस्टीन से जुड़े मामलों को लेकर जाँच और सवाल उठ रहे हैं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि दुनिया भर की सरकारें और GAVI जैसी संस्थाएँ, जिन्होंने व्यापक टीकाकरण अभियानों से लाखों जानें बचाई हैं, 160 से अधिक देशों की किशोरियों को किसी वैक्सीन एजेंडा के तहत जोखिम में डाल देंगी।

किसी भी वैक्सीन को आम जनता के लिए उपलब्ध कराने से पहले उसे कई प्रक्रिया से गुजरना होता है जिनमें शोध, सुरक्षा परीक्षण और वैज्ञानिक मूल्यांकन से गुजरती है। HPV वैक्सीन का मजबूत वैज्ञानिक रिकॉर्ड और एक रोके जा सकने वाले कैंसर के खिलाफ उसकी प्रभावशीलता को कुछ अप्रमाणित और गैर-वैज्ञानिक साजिश सिद्धांतों के कारण नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

क्यों मनाया जाता है ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस’, एशिया के पहले फिजिक्स के नोबेल विजेता CV रमन से क्या है कनेक्शन: पढ़ें- इस साल की थीम और भारत के लिए क्या है महत्व

भारत में हर साल 28 फरवरी को ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस’ मनाया जाता है। यह दिन केवल एक वैज्ञानिक खोज की याद भर नहीं है बल्कि यह भारत की वैज्ञानिक चेतना, बौद्धिक विरासत, इनोवेशन की परंपरा और भविष्य की दिशा का प्रतीक है।

साल 1928 में इसी दिन महान भारतीय भौतिक विज्ञानी सर चंद्रशेखर वेंकट रमन (सी वी रमन) ने ‘रमन इफेक्ट’ की खोज की थी, जिसने आधुनिक भौतिकी और रसायन विज्ञान की दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव ला दिया।

यही खोज आगे चलकर उन्हें साल 1930 में नोबेल पुरस्कार दिलाने वाली बनी और भारत को वैश्विक वैज्ञानिक मानचित्र पर एक विशेष पहचान मिली। इसी ऐतिहासिक उपलब्धि के सम्मान में भारत सरकार ने 1987 से 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाने की परंपरा शुरू की।

2026 में राष्ट्रीय विज्ञान दिवस ऐसे समय पर मनाया जा रहा है, जब भारत विज्ञान, तकनीक, इनोवेशन, आत्मनिर्भरता और युवा शक्ति के माध्यम से एक विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। यह दिन हमें अतीत की गौरवशाली वैज्ञानिक उपलब्धियों से जोड़ते हुए भविष्य की असीम संभावनाओं की ओर प्रेरित करता है।

क्यों खास है 28 फरवरी: रमन इफेक्ट की ऐतिहासिक खोज

28 फरवरी वह दिन है जब सी वी रमन ने ‘रमन इफेक्ट’ जैसी क्रांतिकारी खोज की थी। सी वी रमन ने पता लगाया कि जब प्रकाश की किरण किसी पारदर्शी चीज जैसे पानी, काँच या हवा से होकर गुजरती है, तो उसका एक छोटा सा हिस्सा अपनी वेवलेंथ बदल लेता है।

इस घटना को बाद में ‘रमन इफेक्ट’ कहा गया। इस खोज से यह साबित हुआ कि प्रकाश और किसी पदार्थ के छोटे-छोटे कणों (मॉलिक्यूल्स) के बीच ऊर्जा का आदान-प्रदान होता है। यानी रोशनी जब किसी पदार्थ से टकराती है, तो वह उससे थोड़ी ऊर्जा ले या दे सकती है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक तरीके से मापा जा सकता है। यही खोज आगे चलकर विज्ञान और तकनीक के कई क्षेत्रों में बहुत काम आई।

फोटो साभार: अमेरिकन केमिकल सोसायटी

यह खोज उस समय विकसित हो रहे क्वांटम सिद्धांत की भी महत्वपूर्ण पुष्टि थी। इससे वैज्ञानिकों को पदार्थ की संरचना को मॉलिक्यूल लेवल पर समझने का एक नया और सटीक तरीका मिला। रमन इफेक्ट के आधार पर विकसित तकनीक, जिसे रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी कहा जाता है, आज विज्ञान और उद्योग के अनेक क्षेत्रों में अत्यंत उपयोगी साबित हो रही है।

1930 में इस असाधारण खोज के लिए सर सी वी रमन को फिजिक्स का नोबेल पुरस्कार मिला। वे विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय और पहले एशियाई वैज्ञानिक बने, यह न केवल भारत बल्कि पूरे एशिया के लिए गर्व का क्षण था।

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस की शुरुआत और उद्देश्य

भारत सरकार ने साल 1986 में राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद की सिफारिश पर 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस घोषित किया। पहली बार यह दिवस 1987 में मनाया गया।

इसके पीछे मुख्य उद्देश्य था समाज में वैज्ञानिक सोच और तर्कशीलता को बढ़ावा देना, लोगों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करना और विज्ञान को केवल प्रयोगशालाओं या पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रखते हुए आम जीवन से जोड़ना।

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वैज्ञानिक ज्ञान केवल विशेषज्ञों तक सीमित न रहे बल्कि आम जनता भी उसे समझे और अपने दैनिक जीवन में उसका इस्तेमाल करे।

इससे अंधविश्वास, रूढ़िवादी सोच और अवैज्ञानिक धारणाओं से छुटकारा पाने में मदद मिलती है। इस दिन को नागरिकों में प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति, तर्क आधारित सोच और प्रमाण पर आधारित निर्णय लेने की आदत विकसित करने का प्रयास है।

रमन इफेक्ट और उसकी आधुनिक उपयोगिता

रमन इफेक्ट से जन्मी ‘रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी’ आज आधुनिक विज्ञान की सबसे महत्वपूर्ण तकनीकों में से एक बन चुकी है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि किसी भी पदार्थ को नुकसान पहुँचाए बिना उसकी रासायनिक संरचना और गुणों का विश्लेषण किया जा सकता है।

यही कारण है कि इसका इस्तेमाल चिकित्सा, रसायन विज्ञान, पर्यावरण अध्ययन, उद्योग और फॉरेंसिक विज्ञान जैसे अनेक क्षेत्रों में व्यापक रूप से किया जा रहा है। चिकित्सा क्षेत्र में इसका उपयोग जैविक नमूनों के विश्लेषण, रोगों की पहचान और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के शुरुआती इलाज में किया जा रहा है।

फॉरेंसिक विज्ञान में क्राइम सीन से मिले सबूतों की जाँच के लिए यह तकनीक सबसे ज्यादा उपयोगी सिद्ध हुई है। रसायन और पदार्थ विज्ञान में इसका उपयोग नए पदार्थों की संरचना और गुणवत्ता जाँचने के लिए किया जाता है, जबकि पर्यावरण विज्ञान में यह तकनीक पोल्यूटेंट्स की पहचान और पर्यावरण में हो रहे बदलावों के अध्ययन में सहायक है। सबसे बड़ी बात ये है कि सर सी वी रमन ने यह महान खोज बहुत साधारण प्रयोगशाला उपकरणों से की थी।

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस 2026 की थीम: विकसित भारत में महिलाओं और युवाओं की भागीदारी

2026 के लिए राष्ट्रीय विज्ञान दिवस की थीम है, ‘महिलाएँ विज्ञान में विकसित भारत की उत्प्रेरक।’ आसान भाषा में कहें तो इसका मतलब है कि देश को आगे बढ़ाने में विज्ञान के क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं की बड़ी और अहम भूमिका है।

इस थीम का मकसद यह दिखाना है कि वैज्ञानिक शोध, नई खोजों, तकनीक और इनोवेशन में महिलाएँ सिर्फ भाग नहीं ले रहीं, बल्कि देश की तरक्की की रफ्तार बढ़ा रही हैं। उनके काम और योगदान को सामने लाना और उन्हें और ज्यादा अवसर देना इस साल की खास प्राथमिकता है।

सरकार और संस्थान चाहते हैं कि भारत विज्ञान और तकनीक के दम पर एक विकसित देश बने। इसके लिए जरूरी है कि महिलाएँ और युवा दोनों मिलकर इस क्षेत्र में आगे आएँ। इसलिए इस बार युवाओं को भी शोध, नई तकनीक, स्टार्टअप शुरू करने और दुनिया के स्तर पर नेतृत्व करने के लिए तैयार करने पर खास जोर दिया जा रहा है।

सीधे तौर पर कहे तो अगर भारत को वैश्विक मंच पर मजबूत और अग्रणी बनना है, तो विज्ञान और तकनीक में महिलाओं और युवाओं की सक्रिय भागीदारी बहुत जरूरी है। यह थीम आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया और स्टार्टअप इंडिया जैसी योजनाओं की सोच से भी जुड़ी हुई है, जिनका लक्ष्य देश को अपने पैरों पर खड़ा करना और दुनिया में नई पहचान दिलाना है।

आज के समय में राष्ट्रीय विज्ञान दिवस का महत्व

आज राष्ट्रीय विज्ञान दिवस का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। यह दिन छात्रों और युवाओं में वैज्ञानिक सोच और तर्क को बढ़ाने, उन्हें शोध और इनोवेशन के लिए प्रेरित करने, भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियों को सामने लाने और विज्ञान व नीति के बीच मजबूत संवाद स्थापित करने का काम करता है।

इसके जरिए समाज में वैज्ञानिक जागरूकता पैदा होती है और लोगों को यह समझ में आता है कि विज्ञान उनका रोजमर्रा का जीवन कैसे प्रभावित करता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस अवसर पर कहा है कि वैज्ञानिक जिज्ञासा, इनोवेशन और अनुसंधान ही भारत की प्रगति की नींव हैं।

उनका मानना है कि विज्ञान और तकनीक के जरिए ही भारत आत्मनिर्भर, सशक्त और वैश्विक नेतृत्वकर्ता बन सकता है। राष्ट्रीय विज्ञान दिवस इसी संकल्प को मजबूत करता है और आने वाली पीढ़ियों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करता है।

विज्ञान से समृद्ध और जिम्मेदार भविष्य की ओर

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस 2026 सिर्फ अतीत की महान खोज का उत्सव नहीं है बल्कि यह भविष्य बनाने का संकल्प भी है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं है बल्कि हमारे जीवन, समाज, अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और नैतिक मूल्यों से गहराई से जुड़ा हुआ है।

सर सी वी रमन की खोज यह सिखाती है कि साधारण संसाधनों में भी असाधारण सोच से विश्व स्तर की उपलब्धियाँ हासिल की जा सकती हैं। अगर भारत को सच में ‘विकसित भारत’ बनाना है।

तो हमें वैज्ञानिक सोच, इनोवेशन, युवाओं और महिलाओं की सक्रिय भागीदारी और नैतिक जिम्मेदारी को साथ-साथ आगे बढ़ाना होगा। राष्ट्रीय विज्ञान दिवस इसी सामूहिक संकल्प का प्रतीक है, जहाँ जिज्ञासा, ज्ञान, विवेक और जिम्मेदारी मिलकर एक बेहतर, संतुलित और उज्ज्वल भविष्य की नींव रखते हैं।

चागोस द्वीप समूह को लेकर बढ़ा तनाव, मॉरीशस ने मालदीव से तोड़े सभी राजनयिक संबंध: जानें क्या है पूरा विवाद, जिसे लेकर भिड़े भारत के 2 मित्र देश

मॉरीशस ने मालदीव के साथ अपने सभी राजनयिक संबंध तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिए हैं। यह फैसला चागोस द्वीप समूह की संप्रभुता को लेकर मालदीव के बदले हुए रुख के बाद लिया गया है। दोनों ही देश भारत के करीबी मित्र माने जाते हैं, ऐसे में यह विवाद क्षेत्रीय राजनीति और सुरक्षा संतुलन के लिहाज से भी अहम हो जाता है। सवाल यह है कि आखिर चागोस द्वीप समूह को लेकर ऐसा क्या हुआ कि दो दोस्त देशों के रिश्ते इतनी तेजी से बिगड़ गए?

चागोस द्वीप समूह: क्यों है इतना रणनीतिक महत्व?

चागोस द्वीप समूह हिंद महासागर के मध्य में स्थित 60 से अधिक छोटे द्वीपों का एक समूह है। यह मॉरीशस से लगभग 2,200 किलोमीटर उत्तर-पूर्व और मालदीव के दक्षिण में स्थित है। इसका सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण द्वीप डिएगो गार्सिया है।

भौगोलिक स्थिति के कारण यह इलाका सैन्य और रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम माना जाता है। यहाँ से मध्य पूर्व, दक्षिण एशिया और अफ्रीका के बड़े हिस्से पर नजर रखना आसान हो जाता है। इसी रणनीतिक महत्व के कारण अमेरिका ने शीत युद्ध के दौरान यहाँ अपना एक बड़ा सैन्य अड्डा स्थापित किया।

आज भी डिएगो गार्सिया पर स्थित अमेरिकी सैन्य बेस दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण विदेशी सैन्य ठिकानों में गिना जाता है, जिसका इस्तेमाल कई बड़े सैन्य अभियानों में किया जा चुका है।

1965 का बँटवारा और ब्रिटेन की भूमिका

चागोस द्वीप समूह और मॉरीशस दोनों ही लंबे समय तक ब्रिटेन के उपनिवेश रहे। जब 1968 में मॉरीशस को आजादी मिलने वाली थी, तब उससे तीन साल पहले 1965 में ब्रिटेन ने चागोस द्वीप समूह को मॉरीशस से अलग कर दिया। इसके बाद इस क्षेत्र को ‘ब्रिटिश हिंद महासागर क्षेत्र’ नाम दिया गया।

मॉरीशस का आरोप रहा है कि यह फैसला उस पर दबाव डालकर लिया गया था और यह अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है। ब्रिटेन ने इसके बदले मॉरीशस को मामूली मुआवजा दिया, जिसे मॉरीशस ने कभी भी न्यायसंगत नहीं माना। यहीं से चागोस को लेकर कानूनी और कूटनीतिक लड़ाई की नींव पड़ी।

डिएगो गार्सिया पर सैन्य अड्डा बनाने के लिए अमेरिका की शर्त थी कि वहाँ कोई स्थानीय आबादी नहीं होनी चाहिए। इसके चलते 1967 से 1973 के बीच ब्रिटेन ने चागोस के करीब 1,500 से 2,000 मूल निवासियों को जबरन वहाँ से हटा दिया।

इन लोगों को मॉरीशस और सेशेल्स में बसाया गया, लेकिन उन्हें अपने पैतृक द्वीप पर लौटने की अनुमति नहीं दी गई। यह जबरन विस्थापन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार का गंभीर मुद्दा बन गया। दशकों से चागोस के मूल निवासी अपने घर लौटने की लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन अब तक उन्हें पूर्ण न्याय नहीं मिल पाया है।

अंतरराष्ट्रीय अदालत का फैसला और ब्रिटेन-मॉरीशस समझौता

मॉरीशस ने चागोस पर अपनी संप्रभुता को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। 2019 में अंतरराष्ट्रीय कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि चागोस को मॉरीशस से अलग करना गैर-कानूनी था और ब्रिटेन को इसे जल्द से जल्द वापस करना चाहिए। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी भारी बहुमत से इसी तरह का प्रस्ताव पारित किया।

अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ने के बाद आखिरकार ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच एक समझौता हुआ। इसके तहत ब्रिटेन ने चागोस द्वीप समूह पर मॉरीशस की संप्रभुता को मान्यता देने पर सहमति जताई। हालाँकि डिएगो गार्सिया पर अमेरिकी सैन्य अड्डा लंबी अवधि के पट्टे पर बना रहेगा। यह समझौता मॉरीशस के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत माना गया।

मालदीव का बदला रुख और बढ़ता कूटनीतिक संकट

मालदीव और चागोस के बीच समुद्री सीमा को लेकर पहले से ही विवाद रहा है। अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून न्यायाधिकरण ने इस मामले में मॉरीशस के पक्ष में फैसला दिया था और मालदीव की पिछली सरकार ने भी मॉरीशस के दावे का समर्थन किया था। लेकिन हाल ही में मालदीव सरकार ने अपना रुख बदल लिया।

मालदीव के राष्ट्रपति ने चागोस द्वीप समूह पर मॉरीशस की संप्रभुता को मान्यता देने से इनकार कर दिया और ब्रिटेन-मॉरीशस समझौते पर भी आपत्ति जताई। उनका दावा है कि चागोस पर मालदीव का दावा ज्यादा मजबूत है और यह उसके समुद्री हितों से जुड़ा मामला है। इसी बदले हुए रुख को मॉरीशस ने अपनी संप्रभुता के खिलाफ सीधी चुनौती माना।

इसके जवाब में मॉरीशस की कैबिनेट ने मालदीव के साथ सभी राजनयिक संबंध तत्काल प्रभाव से निलंबित करने का फैसला लिया। इस कदम से दोनों देशों के रिश्तों में तीखा तनाव आ गया है और पूरे हिंद महासागर क्षेत्र में कूटनीतिक हलचल बढ़ गई है।

चागोस द्वीप समूह का विवाद केवल दो देशों के बीच सीमा या संप्रभुता की लड़ाई नहीं है। इसमें अंतरराष्ट्रीय कानून, महाशक्तियों की रणनीति, क्षेत्रीय सुरक्षा और मानवाधिकार जैसे कई जटिल पहलू जुड़े हुए हैं। मालदीव और मॉरीशस के बीच बढ़ता यह टकराव आने वाले समय में हिंद महासागर क्षेत्र की राजनीति को नई दिशा दे सकता है।

कौन हैं पूर्व DGP राजीव कुमार, जिन्हें TMC भेज रही राज्यसभा: शारदा स्कैम में पार्टी को बचाने के आरोप, लेस्बियन को भी टिकट; जानें- चारों उम्मीदवारों की कुंडली

पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) ने 2026 के राज्यसभा चुनावों के लिए अपने चार उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। इन नामों में पूर्व DGP राजीव कुमार, राज्य मंत्री बाबुल सुप्रियो, सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी और अभिनेत्री कोएल मलिक शामिल हैं। राज्यसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों के चयन को लेकर ममता बनर्जी पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं।

यह घोषणा ऐसे समय पर हुई है, जब देश के 10 राज्यों में राज्यसभा की 37 सीटों के लिए चुनाव होने जा रहे हैं और पश्चिम बंगाल से पाँच सीटें खाली हो रही हैं। इन सीटों पर 16 मार्च 2026 को मतदान होगा और उसी दिन शाम को परिणाम घोषित किए जाएँगे। इन नामों की घोषणा ने बंगाल की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है।

खासकर पूर्व DGP राजीव कुमार और वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी को लेकर राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर व्यापक चर्चा हो रही है। यह सिर्फ उम्मीदवारों की सूची नहीं बल्कि प्रशासन, कानून, संस्कृति और राजनीति के अलग-अलग क्षेत्रों से चेहरों को संसद भेजने की रणनीति भी मानी जा रही है।

राजीव कुमार: प्रशासन से संसद तक का विवादों भरा सफर

राजीव कुमार का नाम इस पूरी सूची में सबसे अधिक चर्चा का केंद्र है। वे 1989 बैच के IPS अधिकारी रहे हैं और 31 जनवरी 2026 को पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक (DGP) पद से सेवानिवृत्त हुए। अपने लंबे करियर में उन्होंने कोलकाता पुलिस कमिश्नर, STF प्रमुख और DGP जैसे अहम पदों पर काम किया।

राजीव कुमार कई बड़े विवादों के केंद्र में भी रहे। 2013 में सामने आए शारदा चिटफंड घोटाले के दौरान वे STF प्रमुख थे और शुरुआती जाँच की जिम्मेदारी उनके पास थी। बाद में यह मामला सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर CBI को सौंप दिया गया। 2019 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले CBI की टीम उनसे पूछताछ के लिए उनके कोलकाता स्थित आवास पर पहुँची थी।

उस दौरान राज्य पुलिस और CBI के बीच टकराव हुआ, जिसने देशभर में राजनीतिक हलचल पैदा कर दी। इसी घटनाक्रम के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता के धरनास्थल पर कई दिनों तक प्रदर्शन किया था। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा, जहाँ राजीव कुमार की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए उन्हें जाँच में सहयोग करने का निर्देश दिया गया। इस दौरान TMC में यह माना गया कि राजीव कुमार सरकार और मुख्यमंत्री के लिए एक ढाल साबित हुए हैं।

इसके बाद उनसे शिलॉन्ग में कई दिनों तक पूछताछ की गई। इसके अलावा 2019 के आम चुनाव के दौरान चुनाव आयोग ने उन्हें कोलकाता पुलिस कमिश्नर के पद से हटा दिया था ताकि निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित किए जा सकें। बाद के वर्षों में भी उनका नाम कई संवेदनशील मामलों से जुड़ा रहा, जिनमें कानून-व्यवस्था से जुड़े बड़े संकट और राजनीतिक रूप से संवेदनशील जाँचें शामिल थीं। विपक्षी दल इसे राजनीतिक इनाम और प्रशासन के राजनीतिकरण के तौर पर देख रहे हैं।

बाबुल सुप्रियो: भाजपा से TMC तक की राजनीतिक यात्रा

बाबुल सुप्रियो का राजनीतिक सफर कई मोड़ों से होकर गुजरा है। वे 2014 और 2019 में भाजपा के टिकट पर आसनसोल से लोकसभा सांसद चुने गए थे और नरेंद्र मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री भी रहे। उन्होंने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तथा भारी उद्योग मंत्रालय में राज्य मंत्री के रूप में काम किया।

2021 में अचानक उन्होंने भाजपा छोड़कर तृणमूल कॉन्ग्रेस का दामन थाम लिया, जिसे उस समय बंगाल की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम माना गया। इसके बाद वे बल्लीगंज विधानसभा उपचुनाव जीतकर विधायक बने और ममता सरकार में मंत्री बनाए गए।

उनका राज्यसभा के लिए चयन कई राजनीतिक संकेत देता है। एक ओर यह दिल्ली की राजनीति में उनकी वापसी मानी जा रही है, वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या उन्हें विधानसभा की सक्रिय राजनीति से हटाकर उच्च सदन में भेजने की रणनीति अपनाई गई है।

बाबुल सुप्रियो एक गायक और कलाकार के रूप में भी जाने जाते हैं और उनका जनसंपर्क काफी व्यापक रहा है। लेकिन उनके राजनीतिक रुख में आए बदलाव और अलग-अलग दलों में उनकी भूमिका को लेकर लगातार बहस होती रही है। राज्यसभा में उनकी भूमिका किस दिशा में जाएगी, इस पर सबकी निगाहें टिकी रहेंगी।

मेनका गुरुस्वामी: LGBTQ अधिकारों की मुखर समर्थक

मेनका गुरुस्वामी सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता हैं। उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, हार्वर्ड लॉ स्कूल और नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया से शिक्षा प्राप्त की है। मेनका गुरुस्वामी LGBTQ अधिकारों की मुखर समर्थक रही हैं और अपनी पार्टनर अरुंधति काटजू के साथ सार्वजनिक रूप से अपने रिश्ते को स्वीकार कर चुकी हैं। यूँ भी उनकी छवि विवादित रही है।

भाजपा नेता अमित मालवीय ने एक्स पर लिखा, “ममता बनर्जी ने गैर-बंगाली मेनका गुरुस्वामी को राज्यसभा सीट देकर इनाम दिया है। नजारा हैरान करने वाला है। वह उस समय के कोलकाता पुलिस कमिश्नर विनीत गोयल की तरफ से एक ऐसे मामले में पेश हुई थीं जिसने बंगाल की अंतरात्मा को हिलाकर रख दिया था, वह था आरजी कर मेडिकल कॉलेज रेप और मर्डर केस।”

उन्होंने आगे लिखा, “जाँच कैसे की गई, इस पर गंभीर सवाल उठाए गए। पीड़ित की पहचान उजागर होने से गुस्सा फैल गया। विरोध कर रहे जूनियर डॉक्टरों और मेडिकल बिरादरी के बड़े हिस्से ने जवाबदेही और पारदर्शिता की माँग की। सिस्टम पर से भरोसा बहुत हिल गया था।”

राज्यसभा के लिए उनका चयन इसलिए भी बड़ा माना जा रहा है क्योंकि वे संसद पहुँचने वाली पहली खुले तौर पर LGBTQ पहचान रखने वाली सदस्य बन सकती हैं।

कोएल मलिक: सिनेमा से संसद तक का सफर

कोएल मलिक बंगाली फिल्म इंडस्ट्री की जानी-मानी अभिनेत्री हैं और दिग्गज अभिनेता रंजीत मलिक की बेटी हैं। उन्होंने कई हिट फिल्मों में काम किया है और बंगाल में उनकी लोकप्रियता काफी व्यापक है। उनकी पहचान एक सफल अभिनेत्री के रूप में रही है, खासकर ‘मितिन माशी’ जैसे किरदारों से उन्होंने अलग पहचान बनाई।

राजनीति में उनका यह प्रवेश पहली बार है और इसे TMC की उस रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है, जिसमें पार्टी फिल्म और सांस्कृतिक जगत से जुड़े चर्चित चेहरों को संसद भेजती रही है। इस कदम से पार्टी को युवा और शहरी मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की उम्मीद हो सकती है।

हालाँकि यह भी सवाल उठता है कि क्या लोकप्रियता और पहचान के आधार पर संसद में प्रतिनिधित्व देना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करता है या यह केवल प्रतीकात्मक राजनीति बनकर रह जाता है।

भाजपा ने लगाए ढाल बनने के बदले इनाम देने के आरोप

TMC की इस सूची को लेकर भाजपा ने आरोप लगाए हैं कि पार्टी प्रशासनिक अधिकारियों और सार्वजनिक हस्तियों को राजनीतिक इनाम दे रही है, जिससे संस्थागत निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं। बंगाल बीजेपी ने एक्स पर लिखा, “TMC के 50% उम्मीदवार गैर-बंगाली हैं। क्या ममता को बंगाली नहीं मिले? या वे उन लोगों को इनाम दे रही हैं जो उनके काले राज के गवाह हैं? यह उनकी प्रो-बंगाल छवि का पर्दाफाश है।”

राजीव कुमार और मेनका गुरुस्वामी को लेकर सबसे ज्यादा आलोचना सामने आई है। इसे प्रशासन के राजनीतिकरण और नौकरशाही को राजनीतिक लाभ देने के उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है। वहीं, मेनका गुरुस्वामी के चयन को सामाजिक समावेशन के साथ-साथ राजनीतिक प्रतीकवाद का कदम माना जा रहा है।

देशभर में 10 राज्यों की 37 सीटों के लिए चुनाव हो रहे हैं। इनमें महाराष्ट्र, ओडिशा, तमिलनाडु, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना भी शामिल हैं। चुनाव आयोग ने 26 फरवरी 2026 को नोटिफिकेशन जारी किया, 5 मार्च तक नामांकन, 6 मार्च को स्क्रूटनी, 9 मार्च तक नाम वापसी और 16 मार्च को मतदान की प्रक्रिया तय की है। राज्यसभा चुनाव आमतौर पर कम चर्चा में रहते हैं लेकिन इस बार बंगाल में उम्मीदवारों की सूची और राजनीतिक पृष्ठभूमि के चलते इन चुनावों पर राष्ट्रीय स्तर पर नजर बनी हुई है।