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सेंट्रल रजिस्ट्रेशन सिस्टम में बड़ी सेंध, 2 महीने में बने 1 लाख फर्जी जन्म प्रमाण पत्र: बीजेपी नेता किरीट सोमैया ने किया बड़ा दावा

बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद किरीट सोमैया ने मंगलवार (20 जनवरी 2026) को सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (CRS) पोर्टल में एक बहुत बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा किया है। सोमैया ने दावा किया कि नवंबर और दिसंबर 2025 के दौरान, महज दो महीनों के भीतर इस पोर्टल के जरिए एक लाख से भी ज्यादा फर्जी जन्म प्रमाण पत्र (बर्थ सर्टिफिकेट) जारी किए गए हैं।

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए सोमैया ने कहा कि यह घोटाला सिर्फ भ्रष्टाचार का साधारण मामला नहीं है। उन्होंने इस पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि इतनी बड़ी तादाद में फर्जी दस्तावेज तैयार करना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है। उनके अनुसार, सरकारी सिस्टम में सेंधमारी कर इस तरह के फर्जीवाड़े को अंजाम देना बेहद चौंकाने वाला है।

किरीट सोमैया ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार के CRS पोर्टल को हैक करके और सरकारी रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ कर इस बड़े घोटाले को अंजाम दिया गया है। उन्होंने कुछ बेहद हैरान करने वाले आँकड़े पेश करते हुए बताया कि महाराष्ट्र के जलगाँव, पारोला और यवतमाल के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के रायबरेली और अलीगढ़ जिलों में बड़ी गड़बड़ियाँ मिली हैं।

किरीट सोमैया के मुताबिक, कई ऐसे गाँव हैं जिनकी कुल आबादी तो केवल 1,000 से 1,500 के बीच है, लेकिन वहाँ के रिकॉर्ड में 10,000 से लेकर 27,000 तक जन्म पंजीकरण (बर्थ रजिस्ट्रेशन) पाए गए हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से लगभग 99 प्रतिशत रजिस्ट्रेशन 20 से 60 साल की उम्र के लोगों के लिए किए गए हैं, जो इस पूरे मामले को बेहद संदेहास्पद और गंभीर बनाता है।

अंतरराज्यीय गिरोह का पर्दाफाश, कई गिरफ्तारियाँ

किरीट सोमैया के अनुसार, इस मामले की जाँच में अब तक एक अंतरराज्यीय गिरोह से जुड़े आठ लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इस घोटाले का मुख्य आरोपित अवधेश कुमार दुबे बताया जा रहा है, जिसने कथित तौर पर कंप्यूटर सिस्टम का इस्तेमाल कर सरकारी एंट्रीज़ में हेरफेर की और फर्जी रिकॉर्ड तैयार किए।

सोमैया ने बताया कि उन्होंने इस गंभीर विषय पर महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक (DGP) सदानंद दाते से मुलाकात की है और अब वे इस मामले को नई दिल्ली में केंद्र सरकार के पास ले जाने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने गंभीर आरोप लगाया कि इन फर्जी जन्म प्रमाण पत्रों का इस्तेमाल घुसपैठियों को भारतीय पहचान पत्र दिलाने और उन्हें ‘वैध नागरिक’ बनाने के लिए किया जा रहा था।

मुंबई में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों पर एक्शन: फुटपाथों से हटाए गए हॉकर

किरीट सोमैया ने कथित सर्टिफिकेट घोटाले को अवैध घुसपैठ से जोड़ते हुए दावा किया कि मुंबई की सड़कों पर हजारों बांग्लादेशी नागरिक बिना किसी कानूनी अनुमति के हॉकर (फेरीवाले) के रूप में काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि मुंबई पुलिस कमिश्नर और नगर निगम कमिश्नर के सहयोग से एक कड़ा अभियान चलाया गया, जिसके तहत मुलुंड रेलवे स्टेशन क्षेत्र सहित कई इलाकों से अतिक्रमण हटा दिया गया है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सोमैया ने शिव सेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे पर भी राजनीतिक हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी बहुत ज्यादा है, वहाँ वोटर्स ने MIM का समर्थन किया, जबकि जिन क्षेत्रों में 15 से 20 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं, वहाँ समर्थन ठाकरे की पार्टी की ओर झुक गया। सोमैया ने दावा किया कि जो राजनीतिक नेता अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करते हैं, वे ही इस कानूनी कार्रवाई में बाधा डालने की कोशिश कर रहे हैं।

उन्होंने आगे ज़ोर देते हुए कहा कि मुंबई के तथाकथित ‘हरियालीकरण’ (ग्रीनिंग) की वकालत करने वालों को 2026 में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में भाजपा की ओर से ‘मुँहतोड़ जवाब’ मिलेगा।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से इंग्लिश में जिनित जैन ने लिखी है। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

छोटे उद्योगों को मिलेगा लाभ, युवाओं के लिए बढ़ेगा रोजगार: मोदी सरकार ने अब SIDBI के लिए मंजूर किया ₹5000 करोड़ का फंड, जानिए कैसे मजबूत होगा MSME सेक्टर

केंद्र सरकार ने MSME सेक्टर को और मजबूत बनाने के लिए एक बड़ा फैसला लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार (21 जनवरी 2026) को भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक यानी SIDBI को 5,000 करोड़ रुपए की इक्विटी सहायता देने को मंजूरी दे दी। इस कदम का मकसद SIDBI की वित्तीय स्थिति को मजबूत करना और इसके जरिए देशभर के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों तक आसान और सस्ता कर्ज पहुँचाना है, ताकि रोजगार के नए मौके पैदा हो सकें।

इस फैसले की जानकारी खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा की। पीएम मोदी ने लिखा कि SIDBI को इक्विटी सपोर्ट देने का कैबिनेट का यह फैसला अनगिनत MSME को फायदा पहुँचाएगा और ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में मदद करेगा।

सरकार की ओर से मंजूर की गई यह 5,000 करोड़ रुपए की इक्विटी पूंजी वित्तीय सेवा विभाग (DFS) के जरिए SIDBI में लगाई जाएगी। यह निवेश एक साथ नहीं, बल्कि तीन चरणों में किया जाएगा। वित्त वर्ष 2025–26 में पहले चरण में 3,000 करोड़ रुपए, जबकि 2026–27 और 2027–28 में अगले दो चरणों में 1,000–1,000 करोड़ रुपए का निवेश होगा। यह पूंजी SIDBI की बुक वैल्यू के आधार पर डाली जाएगी, जिससे बैंक की इक्विटी मजबूत होगी और भविष्य की जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा।

MSME सेक्टर को सीधा फायदा, दायरा होगा बड़ा

इस इक्विटी सपोर्ट का सबसे बड़ा फायदा MSME सेक्टर को मिलने वाला है। आने वाले वर्षों में SIDBI से वित्तीय सहायता पाने वाले MSME की संख्या में अच्छी-खासी बढ़ोतरी होने की उम्मीद है। अभी जहाँ यह संख्या करीब साढ़े सात करोड़ के आसपास है, वहीं 2027–28 तक इसमें करीब 25 लाख से ज्यादा नए MSME जुड़ सकते हैं। इससे छोटे उद्यमियों तक औपचारिक बैंकिंग और फाइनेंस की पहुँच और मजबूत होगी।

रोजगार सृजन को मिलेगी रफ्तार

MSME सेक्टर पहले ही देश में रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत माना जाता है। आँकड़ों के मुताबिक, एक MSME औसतन चार से पाँच लोगों को रोजगार देता है। इसी आधार पर अनुमान है कि जब करीब 25.74 लाख नए MSME लाभार्थी जुड़ेंगे, तो इससे लगभग 1.12 करोड़ नए रोजगार पैदा हो सकते हैं। यानी यह फैसला लाखों युवाओं के लिए नौकरी के नए दरवाजे खोल सकता है।

SIDBI की बैलेंस शीट और CRAR होगी मजबूत

आने वाले समय में SIDBI का कर्ज पोर्टफोलियो तेजी से बढ़ने वाला है, खासकर निर्देशित ऋण, डिजिटल लोन और स्टार्टअप्स को दिए जाने वाले उद्यम ऋण के चलते। इससे जोखिम-भारित परिसंपत्तियों में भी इजाफा होगा। ऐसे में पूंजी-जोखिम भारित परिसंपत्ति अनुपात यानी CRAR को मजबूत बनाए रखना जरूरी है। अतिरिक्त इक्विटी पूंजी SIDBI को इस चुनौती से निपटने में मदद करेगी।

बेहतर क्रेडिट रेटिंग, MSME को सस्ता कर्ज

इस फैसले से SIDBI की क्रेडिट रेटिंग मजबूत होगी, जिससे उसे बाजार से कम ब्याज दर पर फंड जुटाने में आसानी होगी। इसका सीधा फायदा MSME को मिलेगा, क्योंकि उन्हें भी कम ब्याज पर कर्ज मिल सकेगा। सरकार का मानना है कि चरणबद्ध इक्विटी निवेश से SIDBI अगले तीन वर्षों तक दबाव वाले हालात में भी अपने पूंजी अनुपात को सुरक्षित स्तर से ऊपर बनाए रख सकेगा।

कुल मिलाकर, SIDBI को दी गई यह 5,000 करोड़ रुपए की इक्विटी मदद सरकार की उस बड़ी रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत MSME सेक्टर को देश की आर्थिक ग्रोथ की मजबूत रीढ़ बनाया जा रहा है। यह फैसला न सिर्फ उद्योगों को ताकत देगा, बल्कि रोजगार सृजन के जरिए ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को भी नई गति देगा।

‘अब उपद्रव नहीं, यहाँ उत्सव होते हैं’: UP दिवस से पहले CM योगी ने जनता के नाम लिखी ‘पाती’, कहा- 6 करोड़ लोगों को निकाला गरीबी से बाहर

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गुरुवार (22 जनवरी 2025) को प्रदेश की जनता के नाम ‘योगी की पाती’ शीर्षक के साथ भावनात्मक पत्र लिखा। इस पत्र के माध्यम से मुख्यमंत्री ने बीते वर्षों में उत्तर प्रदेश में आए व्यापक बदलावों, सरकार की नीतियों, विकास की उपलब्धियों और भविष्य के संकल्पों को विस्तार से साझा किया।

उन्होंने प्रदेश की उस यात्रा का वर्णन किया, जिसमें उत्तर प्रदेश ने एक समय की बीमारू राज्य की छवि को पीछे छोड़ते हुए आज देश के विकास के प्रमुख ग्रोथ इंजन के रूप में अपनी पहचान बनाई है। पत्र में सुशासन, कानून व्यवस्था, आर्थिक प्रगति, सामाजिक सशक्तिकरण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण जैसे विषय प्रमुख रूप से उभरकर सामने आते हैं।

सुशासन और कानून व्यवस्था से बदली प्रदेश की तस्वीर

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने पत्र में सबसे पहले प्रदेश में स्थापित कानून और सुशासन की चर्चा की। उन्होंने लिखा कि दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति और स्पष्ट नीतियों के चलते उत्तर प्रदेश में कानून का राज स्थापित हुआ है। पहले जहाँ माफिया और अपराधियों को सत्ता का संरक्षण मिलता था, वहीं अब उनके अवैध साम्राज्यों पर कठोर कार्रवाई की गई है।

उन्होंने लिखा कि बेहतर कानून व्यवस्था के कारण प्रदेश में निवेश का माहौल बदला है। जो निवेशक पहले उत्तर प्रदेश से दूरी बनाते थे, वे अब यहाँ निवेश के लिए उत्सुक हैं। सरकार की पारदर्शी नीतियों और सुरक्षा के भरोसे ने प्रदेश को उद्योग और व्यापार के लिए आकर्षक गंतव्य बना दिया है।

आर्थिक विकास, कृषि और रोजगार की नई दिशा

‘योगी की पाती’ में सीएम ने आर्थिक प्रगति और रोजगार सृजन को विशेष स्थान दिया है। मुख्यमंत्री ने बताया कि कृषि क्षेत्र में उत्तर प्रदेश देश की खाद्य और आय सुरक्षा का मजबूत आधार बना है। ‘बीज से बाजार तक’ की व्यवस्था और सीधे बैंक खातों में भुगतान (DBT) से किसानों की आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

औद्योगिक विकास के चलते प्रदेश में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं। लेबर रिफॉर्म, डी-रेगुलेशन, एमएसएमई को बढ़ावा, कौशल विकास, स्टार्टअप संस्कृति और ODOP (वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट) जैसी योजनाओं ने स्थानीय उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाई है। बेरोजगारी की समस्या के समाधान की दिशा में प्रदेश तेजी से आगे बढ़ रहा है।

सामाजिक सशक्तिकरण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण

मुख्यमंत्री ने पत्र में समाज के हर वर्ग के सशक्तिकरण पर भी जोर दिया। महिलाओं की श्रमबल में भागीदारी बढ़ने, बेटियों के जन्म से विवाह तक आर्थिक सहायता, निराश्रित महिलाओं, वृद्धों और दिव्यांगजनों के लिए पेंशन योजनाओं का उल्लेख किया गया।

स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार और हेल्थ-टेक के जरिए सुविधाएँ आमजन तक पहुँची हैं। जल, थल और नभ कनेक्टिविटी के विकास से व्यापार, पर्यटन और निवेश को नई गति मिली है। साथ ही अयोध्या, काशी, मथुरा से लेकर संभल तक सांस्कृतिक चेतना और परंपराओं का पुनर्जागरण हो रहा है।

मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि जीरो पॉवर्टी के लक्ष्य के साथ करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला गया है। उन्होंने लिखा, “हमने जीरो पॉवटी लक्ष्य के साथ 6 करोड़ से अधिक लोगों को गरीबी से बाहर निकाला है। डबल इंजन सरकार ने प्रदेश को ‘बॉटलनेक से ब्रेक’, ‘रेवेन्यू डेफिसिट से रेवेन्यू सरप्लस’ एवं ‘उपद्रव से उत्सव की ओर अग्रसर किया है।”

अंत में उन्होंने 24 जनवरी को मनाए जाने वाले उत्तर प्रदेश दिवस के अवसर पर विकसित उत्तर प्रदेश के संकल्प को दोहराते हुए प्रदेशवासियों को शुभकामनाएँ दीं।

बता दें कि साल 2026 में उत्तर प्रदेश 77 साल पूरे होने का जश्न मनाएगा। 24 जनवरी 1950 को संयुक्त प्रांत का नाम अधिकारिक तौर पर बदलकर ‘उत्तर प्रदेश’ कर दिया गया था। इस दिन को प्रदेशवासी ‘उत्तर प्रदेश दिवस’ के रूप में मनाते हैं। पहली बार इसे आधिकारिक रूप से प्रदेश में BJP सरकार आने के बाद जनवरी 2018 में मनाया गया था।

‘इसको बताना है… अंजाम क्या होता है’: उमेश कोल्हे की हत्या में यूसुफ खान को जमानत देने से बॉम्बे HC का इनकार, कहा- समाज को आतंकित करना चाहते थे

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंगलवार (20 जनवरी 2026) को अमरावती के केमिस्ट उमेश कोल्हे की हत्या के मामले में आरोपित पशु चिकित्सक यूसुफ खान को जमानत देने से इनकार कर दिया। उमेश कोल्हे की 2022 में हत्या इसलिए की गई थी क्योंकि उन्होंने बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा के समर्थन में वॉट्सऐप पर एक संदेश भेजा था। जमानत खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि पहली नजर में यह मामला सिर्फ हत्या का नहीं बल्कि एक आतंकी गिरोह बनाने का है। अदालत के अनुसार, नूपुर शर्मा के बयान को लेकर आरोपियों ने अपने मजहब का अपमान मानते हुए बदला लेने की साजिश रची और आम लोगों में डर फैलाने के मकसद से यह हत्या की गई।

जस्टिस ए.एस. गडकरी और जस्टिस श्याम सी. चांडक की पीठ ने कहा कि NIA द्वारा पेश सबूत यह दिखाते हैं कि यह न तो साधारण आपराधिक साजिश थी और न ही कोई अकेली हिंसक घटना। हत्या की योजना, तरीका और मंशा समाज की व्यवस्था और सामूहिक चेतना को झकझोरने वाली है। इसी वजह से UAPA कानून के तहत आरोपित को जेल में रखना सही ठहराया गया।

यूसुफ खान के वकील ने दलील दी कि यह मामला सिर्फ व्यापारिक विवाद का है लेकिन अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पूरे घटनाक्रम को देखें तो आरोपित ने जानबूझकर उकसाया, पीड़ित की पहचान उजागर की और ऐसी घटनाओं की कड़ी में शामिल रहा, जिसका अंत एक निर्मम हत्या में हुआ ताकि समाज में डर का संदेश दिया जा सके।

उमेश कोल्हे की हत्या की पृष्ठभूमि

उमेश कोल्हे, महाराष्ट्र के अमरावती में दवाइयों की दुकान चलाते थे। 21 जून 2022 की रात दुकान बंद कर घर लौटते समय उनकी हत्या कर दी गई। यह हत्या नूपुर शर्मा के बयान को लेकर हुई हिंसा की पृष्ठभूमि में हुई थी। कोल्हे ने 14 जून 2022 को एक व्हाट्सएप ग्रुप में नूपुर शर्मा के समर्थन में फोटो और संदेश साझा किया था। ऐसे ही पोस्ट करने वाले कई लोगों को माफी मांगने के लिए मजबूर किया गया लेकिन कोल्हे को जानबूझकर निशाना बनाया गया। अभियोजन के अनुसार यह हत्या अचानक नहीं बल्कि सोच-समझकर की गई साजिश का नतीजा थी।

यूसुफ खान की भूमिका और ‘व्यापारिक रंजिश’ वाली दलील क्यों हुई खारिज

कोर्ट ने यूसुफ खान को इस हत्या की छोटी कड़ी या संयोगवश जुड़ा व्यक्ति नहीं माना। यूसुफ खान एक पशु चिकित्सक है और उमेश कोल्हे को पहले से जानता था। वह नियमित रूप से कोल्हे की दुकान से दवाइयाँ खरीदता था। दोनों एक वॉट्सऐप ग्रुप ‘ब्लैक फ्रीडम’ के सदस्य थे, जिसमें वेटरनरी केमिस्ट और मेडिकल प्रतिनिधि थे। इस ग्रुप में यूसुफ खान अकेला मुस्लिम सदस्य था।

कोर्ट ने कहा कि खान नूपुर शर्मा के समर्थन में कोल्हे की पोस्ट से आहत था। उसका दावा था कि वह सिर्फ कोल्हे के कारोबार का बहिष्कार कराना चाहता था। हालाँकि, हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के आधार पर इस दलील को अविश्वसनीय बताया।

कोर्ट ने कहा कि अगर मकसद सिर्फ व्यापार रोकना होता तो यह संदेश केवल ग्राहकों तक सीमित रहता। खान ने वह पोस्ट कई वॉट्सऐप ग्रुपों और ऐसे लोगों तक फैलाया जिनका कोल्हे से कोई कारोबारी संबंध नहीं था। इससे साफ पता चला कि उसका उद्देश्य आर्थिक दबाव नहीं बल्कि उकसाना और निशाना बनाना था।

कोर्ट ने यह भी कहा कि खान पढ़ा-लिखा और पेशेवर व्यक्ति था और उस समय के संवेदनशील माहौल को समझ सकता था। इसके बावजूद उसने हालात शांत करने के बजाय भड़काऊ संदेश फैलाया। यही बात जमानत के समय उसके खिलाफ गई।

वॉट्सऐप संदेश, मोबाइल नंबर में बदलाव और मंशा कैसे साबित हुई

कोर्ट के फैसले में यूसुफ खान द्वारा भेजे गए व्हाट्सएप संदेश को बेहद अहम माना गया। कोर्ट ने पाया कि उमेश कोल्हे की पोस्ट का स्क्रीनशॉट लेने से पहले खान ने जानबूझकर कोल्हे के मोबाइल नंबर में हेर-फेर की और नंबर दोबारा सेव किया ताकि उसकी पहचान और संपर्क जानकारी ज्यादा लोगों तक पहुँचे।

इसके बाद यूसुफ खान ने हिंदी में भड़काऊ संदेश लिखकर लोगों से कहा कि कोल्हे को ‘सबक’ सिखाया जाए। इस मेसेज में लिखा था, “अमित मेडिकल प्रभात ताकीज तहसील के सामने इसको बताना है कि जिन लोगों के भरोसे कमाई की उनसे ही दुश्मनी का अंजाम क्या होता है, इस मेसेज को ज्यादा से ज्यादा ग्रुप में सेंड करें।”

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि खान ने संदेश सिर्फ एक बार नहीं बल्कि कई प्लेटफॉर्म पर फैलाया और इसके तुरंत बाद एक अन्य आरोपित (आरोपित नंबर-5) से मुलाकात की। अदालत के अनुसार, यह घटनाक्रम उकसावे से साजिश तक की साफ कड़ी दिखाता है, न कि कोई भावनात्मक या अचानक की गई हरकत।

फोन रिकॉर्ड, बैठकें और पर्दे के पीछे की भूमिका पर अदालत की टिप्पणी

कोर्ट ने जमानत खारिज करते हुए यूसुफ खान और आरोपित नंबर-5 के बीच हुई फोन बातचीत को अहम माना। रिकॉर्ड के अनुसार, हत्या से पहले और बाद में दोनों के बीच 25 फोन कॉल हुए। गवाहों के बयान और लोकेशन डेटा के साथ इन कॉल्स को साजिश में शामिल होने का मजबूत सबूत माना गया।

अभियोजन ने कहा कि आरोपित नंबर-5, खान और अन्य आरोपियों के बीच कड़ी की तरह काम कर रहा था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि साजिश में शामिल होने के लिए हर बैठक में मौजूद रहना जरूरी नहीं होता।

कोर्ट ने यह भी पाया कि 9 जून 2022 को खान की लोकेशन रोशन हॉल के पास थी, जहाँ नूपुर शर्मा के बयान के खिलाफ FIR को लेकर बैठक हुई थी। इसके बाद उसकी लगातार बातचीत और सह-आरोपितों से संपर्क से यह साबित हुआ कि वह शुरू से ही योजना का हिस्सा था। अदालत ने कहा कि खान ने भड़काऊ संदेश फैलाने के बाद खुद को हत्या की सीधी कार्रवाई से दूर रखा लेकिन पर्दे के पीछे रहकर साजिश को आगे बढ़ा रहा था।

अदालत ने साजिश को कैसे समझा और UAPA क्यों लगा

अदालत ने इस साजिश को अलग-अलग घटनाओं के बजाय पूरी घटनाक्रम की कड़ी के रूप में समझा। अभियोजन के अनुसार, यूसुफ खान का भड़काऊ संदेश इस साजिश की शुरुआत था। इसके बाद उसने आरोपित नंबर-5 से मुलाकात की, जो कोल्हे की पोस्ट से नाराज था। फिर आरोपित नंबर-5 अन्य आरोपितों से गौसिया हॉल में मिला जहाँ उमेश कोल्हे की सोशल मीडिया पोस्ट पर विस्तार से चर्चा हुई है।

कोर्ट ने बताया कि 19 जून 2022 को हुई बैठक में यह तय किया गया कि कोल्हे को उनके धर्म का अपमान करने की ‘सजा’ के तौर पर मारा जाएगा और हत्या का तरीका भी तय हुआ। 20 जून को पहली कोशिश नाकाम रही क्योंकि दुकान बंद थी। 21 जून की रात रेकी के बाद कोल्हे पर गर्दन पर चाकू से हमला कर हत्या कर दी गई।

हाईकोर्ट ने कहा कि साजिश को सीधे सबूतों से नहीं बल्कि व्यवहार, बातचीत और हालात से साबित किया जा सकता है। खान के मामले में रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से साजिश में उसकी सहमति साफ दिखती है।

कोर्ट ने आरोपियों को ‘आतंकी गिरोह’ बताते हुए कहा कि यह हत्या निजी बदले के लिए नहीं बल्कि समाज में डर फैलाने के लिए की गई थी। अदालत ने माना कि यह संदेश देना मकसद था कि कुछ विचारों का समर्थन करने पर हिंसक अंजाम भुगतना पड़ेगा। इसी वजह से UAPA की धाराएँ लागू की गईं और जमानत से इनकार किया गया।

यूसुफ खान की जमानत खारिज करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने साफ संदेश दिया कि विचारधारा से प्रेरित हिंसा, चाहे वह डिजिटल उकसावे से ही क्यों न शुरू हुई हो उसे हल्के में नहीं लिया जाएगा। अदालत ने कहा कि बोलने की आजादी को ‘सजा’ देने और पूरे समाज को डराने के लिए की गई लक्षित हत्याओं को निजी रंजिश या व्यापारिक विवाद बताकर कमजोर नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि साजिश हर चरण में दिखने वाली नहीं होती। कोई व्यक्ति अंतिम वार से दूर रहकर भी चुपचाप और सोच-समझकर भूमिका निभा सकता है और तब भी उसकी आपराधिक जिम्मेदारी बनी रहती है। अदालत ने कहा कि जब हिंसा का मकसद केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि समाज में डर फैलाना और दूसरों की आवाज दबाना हो, तो UAPA लागू होता है। खान की जमानत खारिज करना सजा नहीं बल्कि अपराध की गंभीरता और शुरुआती सबूतों का कानूनी नतीजा है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है विस्तार से पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

ये हरा-हरा देखने की तलब है या गजवा-ए-हिंद की चाह… सहर के ‘जहर’ के मायने समझते हैं क्या आप?

महाराष्ट्र में ठाणे जिले के मुंब्रा वार्ड में ‘हिजाब वाली’ सहर यूनुस शेख ने नगर निगम चुनाव जीता है। AIMIM के टिकट से नई पार्षद बनीं। 22 साल की सहर शेख ने जीत के बाद विक्टरी स्पीच दी, जो कोई आम भाषण तो बिल्कुल भी नहीं था। मंच से सहर शेख ने कहा कि पूरे मुंब्रा को ‘ग्रीन’ (हरा) रंग से रंगना है। सहर की इस स्पीच का वीडियो वायरल हो रहा है।

सोशल मीडिया में चर्चा पर बने हुए इस वायरल वीडियो में सहर शेख कहती है, “आने वाले 5 साल बाद भी जब चुनाव होंगे, तो उस चुनाव में भी विरोधियों को मुँहतोड़ जवाब देना है। पूरे मुंब्रा को ग्रीन कलर से ऐसे रंगना है कि इन लोगों को यहाँ से बुरी तरह से पछाड़कर भेजना है। हर एक उम्मीदवार सिर्फ AIMIM का आएगा।”

AIMIM पार्षद सहर शेख के इस बयान को लेकर जहाँ एक तरफ बहस छिड़ी हुई है। वहीं इस बयान के कई मायने भी निकाले जा रहे हैं। खासकर यहाँ ‘ग्रीन’ शब्द को किस संदर्भ में इस्तेमाल किया गया है, यह अब भी सवालों के घेरे में ही है। इस ग्रीन का मतलब क्या लोगों को इस्लाम से जोड़ना है, क्या यहाँ धर्म परिवर्तन की बात हो रही है? क्या मुंब्रा की नई पार्षद सिर्फ हरा-हरा देखना चाहती हैं? जवाब जानने के लिए लोग इसके क्या मायने निकाल रहे हैं, यह जानना जरूरी है।

सोशल मीडिया पर सहर शेख के ‘ग्रीन’ बयान पर प्रतिक्रिया

सहर शेख के इस बयान को सोशल मीडिया पर कुछ लोग हिंदुओं का नामोनिशान हटाने की चेतावनी बता रहे हैं, कोई मुंब्रा को मुस्लिम बहुल इलाका बनने पर चिंता व्यक्त कर रहा है, तो कोई यहाँ ‘ग्रीन’ का मतलब इस्लाम के ‘हरे’ रंग से जोड़कर देख रहा है।

इस बयान पर शिवसेना नेता शाइना एनसी ने कहा है, “सहर शेख युवा नेत्री हैं, वे मुंब्रा में कहती हैं कि वह मुंब्रा को हरा कर देंगी। आपको यह साफ करना चाहिए कि आप पर्यावरण की बात कर रही हैं, जहाँ आप हरा-भरा, साफ-सुथरा माहौल चाहती हैं। अगर ऐसा है, तो आपका बयान स्वीकार्य है। लेकिन अगर आप धर्म, जाति और संस्कृति के आधार पर लोगों को बांट रही हैं, तो यह बहुत दुख की बात है।”

एक्स यूजर हार्दिक कहते हैं, “डेमोग्राफी तेजी से बदल रही है। इनका एजेंडा बिल्कुल साफ है।” वे हिंदुओं को एकजुट होने के लिए कहते हैं, “असली खतरा हमे किससे है वे कोई नहीं देख पा रहा। हिंदुओं अपने धर्म, संस्कृति, धरोहर और विचारधारा का संरक्षण करना है तो समय रहते एक हो जाइए।”

एक और यूजर अभय प्रताप लिखते हैं, “मैडम साहिबा का एजेंडा एकदम से क्लियर है। नगरसेवक का चुनाव जीता है और पूरे क्षेत्र को हरा बना देना है। और ओवैसी के अनुसार एक हिजाबी PM बनेगी तो क्या करेगी?”

बाला नाम के एक्स यूजर ने कहा, “मिलिए 22 साल की AIMIM पार्षद सहर शेख से। ये वो ‘भटके हुए युवा’ नहीं है, इन्हें इस्लाम की अच्छी समझ है। दुख की बात है कि हिंदू अभी तक इस्लाम को नहीं जानते।”

एक और एक्स यूजर दीपा मुखर्जी कहती हैं, “अगर आपको हर चीज को हरा ही करना है, तो जाकर अपने बुजुर्गों की छोड़ी हुई विरासत- पाकिस्तान और बांग्लादेश को ही हरा कर दीजिए। वहाँ पहले से ही हर तरफ हरियाली फैली है, उसे और डुबो दीजिए। भारत को केसरिया ही रहने दीजिए। हमें आप लोगों की यहाँ जरा भी दखलअंदाजी नहीं चाहिए।”

ऑस अबाउट इंडियन नाम से एक्स यूजर कहते हैं, “मिस्टर ओवैसी एक हिजाब पहनने वाली प्रधानमंत्री चाहते थे। लेकिन हम पहले ही देख चुके हैं कि हिजाब पहनने वाली नेता स्थानीय पार्षद बनने पर कैसा व्यवहार करती हैं।”

लोगों की प्रतिक्रियाओं से साफ होता है कि सहर शेख के ‘ग्रीन’ के मायने कुछ भी हों, लेकिन लोग इसे कुछ सकारात्मक तरीके से तो देख नहीं ही रहे हैं। बल्कि यहाँ सहर शेख का मुंब्रा को ‘ग्रीन’ करने का मकसद जरूर जाहिर हो रहा है। सहर शेख ने यह बयान देकर AIMIM में तो अपनी जगह पक्की कर ली है, लेकिन इससे गैर-हिंदू लोग जरूर चिंता में पढ़ गए हैं। ऐसे में पार्टी के ‘नवाब’ असदुद्दीन ओवैसी देश में ‘हिजाब पहनने वाली’ प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देख रहे हैं।

सोशल मीडिया पर ‘ग्रीन’ कलर के मायने

सोशल मीडिया पर सहर शेख के ‘ग्रीन’ शब्द के जो मायने निकाले जा रहे हैं, वे अचानक से नहीं हैं। तमाम खबरें ऐसी आती रही हैं जब इस तरह के बयान देकर नफरत फैलाने के काम सरेआम हुए हैं और जब सवाल उठे तो कह दिया गया- कहने का मतलब कुछ और था।

आपको याद होगा असदुद्दीन ओवैसी के भाई अकबरुद्दीन ओवैसी ने खुलेआम 15 मिनट पुलिस हटाने की बात कही थी और तब उसने साफ कहा था, “हिंदुस्तान में हम 25 करोड़ हैं, तुम 100 करोड़ है ना, ठीक है तुम तो हमसे इतने ज्यादा हो, 15 मिनट पुलिस को हटा लो हम बता देंगे कि किसमें कितना दम है।”

आज ओवैसी ये बोल दें कि उनके भाई के इस बयान में 25 करोड़ का मतलब मुस्लिमों से नहीं था, तो क्या ये बातें बदल जाएँगी? क्या नहीं माना जाएगा कि ये सीधे तौर पर देश में रहने वाले 100 करोड़ हिंदुओं को धमकाने के लिए कहा गया था?

सहर शेख ने आज ओवैसी वाला जहर ही उगला है। बस बात ये है कि वो शब्द नहीं बदल पा रहीं, तो उसके मायने को तोड़-मरोड़ रही हैं। खुद को सेकुलर भी इसीलिए बताया जा रहै है क्योंकि लोग उस बयान का असल मतलब समझकर उनसे सवाल कर रहे हैं। वरना ‘ग्रीन’ रंग से उनकी मंशा क्या थी ये साफ उनके हाव-भाव में पता चल रहा है। अब वो इस हाव-भाव को छिपाने के लिए कुछ भी गढ़ें इससे जनता को क्या… उन्हें जरूरत है उस बयान को याद रखने की जो उन्होंने जीत के नशे में चूर होकर मंच से दिया है।

देखा जाए तो सहर मात्र 22 साल की युवती हैं, लेकिन उनके मुँह से निकला ये जहर हैरान करने वाला नहीं है। इसी सोशल मीडिया पर ऐसे तमाम वीडियो आपको वायरल होते हुए दिखेंगे, जहाँ छोटे-छोटे मुस्लिम बच्चों के मन में गजवा-ए-हिंद का मकसद भर दिया जाता है, वे सरेआम हिंदुस्तान को गाली देते हैं, पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं और इसी देश के बहुसंख्यकों को काफिर कहकर जहर उगलते हैं।

सहर शेख के ‘ग्रीन’ कलर के असल मायने

अब सहर शेख के विक्टरी स्पीच पर सवाल उठ रहे हैं तो उन्होंने सफाई दी है कि उन्होंने तो सिर्फ ‘ग्रीन’ शब्द का इस्तेमाल रंग के तौर पर किया था, लेकिन यहीं अगर कोई इस्लामी पैरोकार बैठा होगा तो ये निश्चित है कि उनके सामने ये मायने बदल जाएँगे। उसकी मजहबी सोच के अनुसार, इसके मायने मजहबी सोच का खुला ऐलान है।

भले ही सहर शेख समझा रही हैं कि वो सेकुलर है लेकिन ये इस्लामी पैरोकार लोग ग्रीन को इस्लामी पहचान से जोड़कर देख रहे हैं, और देख रहे हैं उस मुस्लिम पार्टी AIMIM की सोच से, जो आए दिन भड़काऊ बयान देकर कट्टरवादी पैदा करने में लगी रहती है। यहाँ ये लोग सहर शेख को सिर्फ अपना पार्षद मान रहे है, न कि पूरे मुंब्रा क्षेत्र का।

उधर, सहर शेख के इस बयान पर चिंता जाहिर करने वाले वह मुंब्रा के वह लोग हैं, जिन्होंने विकास के मुद्दे पर पार्षद चुना था। वे इस उम्मीद से वोट देने पहुँचे थे कि उनका पार्षद खराब सड़कें ठीक करवाएगा, पानी की समस्या सुलझाएगा, नगर में विकास होगा, लेकिन जीत के बाद स्पीच में उन्हें जरूर अपने नए पार्षद की स्पीच सुनकर मायूसी हाथ लगी होगी। जो मुंब्रा को विकास से नहीं, बल्कि ‘ग्रीन’ कलर की मजहबी सोच से रंगना चाहती हैं।

यह वही मानसिकता है, जो AIMIM की राजनीति की पहचान है। जहाँ असदुद्दीन ओवैसी मंच से भड़काऊ भाषण देने से नहीं चूकते, वहीं अब उनकी पार्टी में नए एडमिशन लेने वाले युवा भी उसी राह पर चल पड़े हैं। इससे साफ जाहिर है कि असदुद्दीन के लोकतंत्र और संविधान की बड़ी-बड़ी बातें करने का मतलब सिर्फ मजहब और एक ही सोच को आगे बढ़ाना है। और यही नतीजा है कि उनकी ‘हिजाब पहनने वाली’ सहर शेख पूरे शहर को ‘ग्रीन’ कलर में रंगना चाहती हैं।

खतरनाक सैन्य ठिकानों में तैनाती के लिए सेना ने FF BOT को बेड़े में किया शामिल, जानें- कितना अहम है यह स्वदेशी रोबोट जो बनेगा जवानों की ढाल

आग और तबाही के खतरनाक हालात में भी अपने जवानों की जान की कीमत से कोई समझौता न करते हुए भारतीय सेना ने एक ऐतिहासिक और निर्णायक कदम उठाया है। जवानों को सीधे आग के मोर्चे पर उतारने के बजाय अब तकनीक को आगे कर दिया गया है। इसी कड़ी में 13 जनवरी 2026 को सेना के डायरेक्टोरेट ऑफ कैपेबिलिटी डेवलपमेंट ने एक स्वदेशी कंपनी के साथ समझौता किया, जिसके तहत भारतीय सेना 18 अत्याधुनिक फायर फाइटिंग रोबोट (FF BOT) को अपने बेड़े में शामिल करने जा रही है।

इस सौदे की कुल कीमत 62 करोड़ रुपए तय की गई है। यह अहम फैसला ऐसे समय पर लिया गया है, जब सैन्य ठिकानों पर आग लगने की घटनाओं को लेकर खतरे और चिंताएँ लगातार बढ़ती जा रही हैं, खासकर गोला-बारूद और ईंधन भंडारण जैसे बेहद संवेदनशील और उच्च जोखिम वाले इलाकों में।

दिसंबर 2025 में विजय दिवस समारोह के दौरान आर्मी हाउस में FF BOT को सार्वजनिक रूप से पेश किया गया था। यह एक स्टैटिक डिस्प्ले था, जिसका उद्देश्य रोबोट की वास्तविक फायर फाइटिंग क्षमता का प्रदर्शन करना नहीं बल्कि उसके आधुनिक डिजाइन, प्रस्तावित भूमिका और ऑपरेशनल कॉन्सेप्ट को स्पष्ट करना था। इस दौरान सेना का जोर इस बात पर था कि किस तरह ऐसी अनमैन्ड तकनीकें बेहद खतरनाक परिस्थितियों में मानव उपस्थिति की जरूरत को कम कर सकती हैं और जवानों की सुरक्षा को कहीं अधिक मजबूत बना सकती हैं।

FF BOT क्या है और इसे क्यों माना जा रहा है खास?

FF BOT एक अनमैन्ड ग्राउंड फायर फाइटिंग सिस्टम है, जिसे खास तौर पर उन परिस्थितियों के लिए डिजाइन किया गया है, जहाँ इंसानों का जाना जानलेवा साबित हो सकता है। इस रोबोट को एक भारतीय स्टार्ट-अप एम्प्रेसा प्राइवेट लिमिटेड ने विकसित किया है।

इसका निर्माण रक्षा मंत्रालय की iDEX यानी Innovations for Defence Excellence पहल के तहत किया गया है, जिसका उद्देश्य रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी नवाचार और स्टार्ट-अप्स को बढ़ावा देना है। यह रोबोट उन हालात में काम करने में सक्षम है, जहाँ विस्फोट का खतरा हो, जहरीला धुआँ फैला हो, तापमान बेहद ज्यादा हो या इमारत के ढहने की आशंका हो।

ऐसे हालात में आमतौर पर फायर फाइटर्स को जान जोखिम में डालकर अंदर जाना पड़ता है लेकिन FF BOT की मौजूदगी इस खतरे को काफी हद तक कम कर देती है। हालाँकि, FF BOT को शुरुआत में भारतीय नौसेना के लिए iDEX फ्रेमवर्क के तहत विकसित किया गया था।

इसके सफल परीक्षणों के बाद अब भारतीय सेना ने भी इसे अपने बेड़े में शामिल करने का फैसला किया है। रक्षा मंत्रालय के नियमों के अनुसार, यदि किसी एक सेवा के लिए iDEX के तहत विकसित कोई सिस्टम सफलतापूर्वक परीक्षण पास कर लेता है, तो दूसरी सेवा भी उसे बिना नए विकास चरण के अपना सकती है।

FF BOT को सिंगल स्टेज कॉम्पोजिट ट्रायल के बाद मंजूरी दी गई। इस पूरे प्रोजेक्ट को आर्मी डिजाइन ब्यूरो का भी समर्थन मिला, जो यह दर्शाता है कि सेना स्वदेशी तकनीक और निजी क्षेत्र की भागीदारी को कितनी गंभीरता से ले रही है। यह कदम सीधे तौर पर मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत की सोच से जुड़ा हुआ है।

कहाँ और कैसे होगा FF BOT का इस्तेमाल?

सेना के अनुसार FF BOT को देश के अलग-अलग कैंटोनमेंट्स में तैनात किया जाएगा। खास तौर पर इन्हें गोला-बारूद डिपो, हथियार रखने के केंद्र, ईंधन और तेल के भंडार, सैन्य कारखानों और रिफाइनरी जैसे बेहद संवेदनशील और खतरनाक इलाकों में इस्तेमाल किया जाएगा।

इन जगहों पर अगर आग लगती है तो नुकसान सिर्फ इमारतों या सामान तक सीमित नहीं रहता बल्कि बड़े विस्फोट, सप्लाई सिस्टम के ठप होने और आसपास मौजूद दूसरी सैन्य इकाइयों के लिए भी गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। ऐसे हालात में FF BOT को सबसे पहले अंदर भेजा जाएगा ताकि वह आग की स्थिति को करीब से देख सके और शुरुआत में ही उसे काबू में लाने में मदद करे, जबकि फायर फाइटिंग में लगे जवान सुरक्षित दूरी पर रह सकेंगे।

FF BOT की तकनीकी क्षमताएँ

FF BOT को पूरी तरह रिमोट से ऑपरेट किया जाता है। यानी फायर फाइटर्स इसे खतरे वाले क्षेत्र के बाहर से नियंत्रित कर सकते हैं। इसमें लगे ऑप्टिकल और थर्मल कैमरे ऑपरेटर को लाइव वीडियो फीड भेजते हैं। थर्मल कैमरा खास तौर पर धुएँ के बीच छिपी आग, गर्म हिस्सों और हॉटस्पॉट की पहचान करने में मदद करता है, जो सामान्य आँखों से दिखाई नहीं देते।

इस लाइव और स्पष्ट जानकारी की वजह से फायर फाइटिंग टीम को हालात की बेहतर समझ मिलती है और वे तेजी से सही फैसले ले पाते हैं। कम दृश्यता और अत्यधिक जोखिम वाले माहौल में यह तकनीक बेहद अहम साबित होती है।

पहले भी हो चुका है FF BOT का इस्तेमाल

FF BOT सिर्फ कागजों या परीक्षण तक सीमित नहीं है। इसे पहले भी नागरिक क्षेत्र में आग बुझाने के अभियानों में इस्तेमाल किया जा चुका है। खास तौर पर विशाखापट्टनम रिफाइनरी में लगी भीषण आग के दौरान इस रोबोट की उपयोगिता सामने आई थी।

इस अनुभव ने यह साबित किया कि FF BOT न सिर्फ सैन्य ठिकानों के लिए बल्कि बड़े औद्योगिक हादसों और आपदा प्रबंधन में भी बेहद कारगर हो सकता है। अधिकारियों का कहना है कि भविष्य में इसे पावर स्टेशन, एयरपोर्ट और अन्य संवेदनशील स्थानों पर भी तैनात किया जा सकता है।

समझौते में क्या-क्या है शामिल और क्यों यह कदम है बेहद अहम?

सेना द्वारा किए गए इस समझौते में सिर्फ 18 रोबोट्स की खरीद ही नहीं बल्कि उनका लंबे समय तक रखरखाव भी शामिल है। इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत दो साल की वारंटी और पाँच साल की व्यापक मेंटेनेंस सुविधा दी जाएगी। कुल मिलाकर सात साल तक ऑन-साइट सर्विस सपोर्ट सुनिश्चित किया गया है।

FF BOT की इंडक्शन प्रक्रिया अप्रैल के पहले सप्ताह से शुरू होने वाली है। FF BOT, iDEX SPRINT के DISC-7 के तहत पहला प्रोजेक्ट था, जिसे 2023 में Acceptance of Necessity मिली थी। यह दिखाता है कि कैसे एक भारतीय स्टार्ट-अप द्वारा विकसित तकनीक अब सीधे भारतीय सेना की जरूरतों को पूरा कर रही है।

सेना ने साफ किया है कि FF BOT का उद्देश्य मानव फायर फाइटर्स को हटाना नहीं, बल्कि उन्हें सबसे खतरनाक हालात से बचाना है। रोबोट पहले अंदर जाकर जोखिम उठाएगा, जिससे जवान सुरक्षित रहेंगे और प्रतिक्रिया तेज और प्रभावी होगी। FF BOT की खरीद भारतीय सेना के आधुनिकीकरण, स्वदेशीकरण और जवानों की सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

मदरसों-दरगाहों का नेटवर्क, मस्जिदों में अगवा कर ले जाते हैं हिंदू बच्चियाँ और मुस्लिमों से करवा देते हैं निकाह: पाकिस्तान में जबरन धर्मांतरण पर अदालत-पुलिस मौन

पाकिस्तान के सिंध प्रांत में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के खिलाफ संगठित और सुनियोजित अभियान चलाया जा रहा है। जहाँ नाबालिग लड़कियों का अपहरण किया जाता है, जबरन धर्मांतरण कराया जाता है और फिर निकाह के लिए मजबूर किया जाता है। भील, मेघवार और कोल्ही जैसे बेहद गरीब और सामाजिक रूप से हाशिए पर पड़े हिंदू समुदायों की लड़कियों को निशाना बनाया जाता है क्योंकि ऐसे परिवार न तो लंबी कानूनी लड़ाई लड़ सकते हैं और न ही मीडिया या सत्ता के गलियारों तक उनकी पहुँच होती है।

News18 की रिपोर्ट के मुताबिक, दरगाहों और मदरसों से जुड़े नेटवर्क के जरिए हिंदुओं को निशाना बनाया जा रहा है। पीर सरहिंदी दरगाह से जुड़े लोगों ने दावा किया है कि उनकी जगह पर अब तक करीब 1000 हिंदू लड़कियों का धर्मांतरण किया जा चुका है।

कैसे किया जा रहा है हिंदू युवतियों का उत्पीड़न?

इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत ज्यादातर या तो सीधे अपहरण से होती है या फिर डर और दबाव के जरिए। नाबालिग लड़कियों को शादी, नौकरी या आर्थिक सुरक्षा जैसे झूठे सपने दिखाए जाते हैं। कई बार उन्हें धमकाया जाता है और मजबूरी में घर छोड़ने को कहा जाता है। इसके तुरंत बाद लड़कियों को उनके अपने जिले से बाहर ले जाया जाता है। यह जल्दी किया गया स्थानांतरण इसलिए बहुत जरूरी होता है ताकि लड़की का संपर्क अपने परिवार से टूट जाए, वह किसी वकील या सामाजिक कार्यकर्ता तक न पहुँच सके और स्थानीय मीडिया की नजर भी इस मामले से दूर रहे।

धर्मांतरण आमतौर पर कुछ खास मस्जिदों, दरगाहों या मदरसों से जुड़े ठिकानों पर कराया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में कट्टरपंथी संगठनों से जुड़े नेटवर्क सक्रिय भूमिका निभाते हैं और सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाता है। इस तरीके का एक और गंभीर हिस्सा कागजात में हेरफेर है। फर्जी पहचान पत्र बनाए जाते हैं, जिनमें नाबालिग लड़कियों की उम्र बढ़ाकर उन्हें बालिग दिखाया जाता है।

इन बदले हुए दस्तावेजों का इस्तेमाल सिंध के बाल विवाह कानूनों से बचने के लिए किया जाता है। धर्मांतरण के सिर्फ तीन से चार दिन के भीतर ही लड़की की शादी करा दी जाती है, अक्सर किसी उम्रदराज व्यक्ति से या ऐसे आदमी से जिसकी पहले से शादी हो चुकी होती है। इस तरह पूरा मामला कानूनी दिखाने की कोशिश की जाती है जबकि असलियत में लड़की के पास कोई असली विकल्प नहीं होता है।

पाकिस्तान की अदालतें भी आरोपितों के साथ

अदालत की कार्यवाही इस समस्या को और गंभीर बना देती है। कई बार पीड़ित लड़कियों के बयान दबाव में दर्ज किए जाते हैं लेकिन इसके बावजूद पुलिस और अदालतें अक्सर ‘स्वेच्छा से धर्मांतरण’ के दावों को बिना गहराई से जाँचे ही सही मान लेती हैं। एक बार अदालत धर्मांतरण को मान्यता दे देती है तो उस फैसले को पलटना लगभग नामुमकिन हो जाता है। इसके साथ ही पीड़िता और उसके परिवार के लिए कानूनी रास्ते लगभग बंद हो जाते हैं।

पाकिस्तान में ऐसी व्यवस्था बना दी गई है जहाँ कानूनी खामियाँ हैं, सामाजिक कमजोरियाँ हैं और संस्थाएँ या तो उदासीनता हैं या कट्टरपंथी आरोपितों के पक्ष में ही खड़ी दिखती हैं। इसका नतीजा यह होता है कि अल्पसंख्यक लड़कियाँ एक ऐसे चक्र में फँस जाती हैं, जिससे बाहर निकलना बेहद मुश्किल होता है। इससे भी ज्यादा मुश्किल होता है इससे कानूनी रूप से चुनौती देना। ऐसे केसों की पाकिस्तान में भरमार है।

नाबालिग हिंदू लड़की का धर्मांतरण के बाद 7 बच्चों के अब्बू से निकाह

अक्टूबर 2025 में पाकिस्तान के सिंध प्रांत से ही एक हैरान करने वाली खबर सामने आई थी जहाँ एक 15 साल की नाबालिग हिंदू लड़की का 7 बच्चों के अब्बू से निकाह करा दिया गया था। लड़की मूक-बधिर थी और इसे इस्लाम कबूल कराया जा चुका था। लड़की के पिता ने आरोप लगाया कि उनकी मूक-बधिर बेटी कभी एक ड्रग तस्कर और 7 बच्चों के बाप से निकाह नहीं कर सकती है, उसे मजबूर किया गया है। पाकिस्तान में हिंदुओं और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए काम करने वाले शिव कच्छी ने कहा कि पुलिस ने परिजनों की अपहरण की शिकायत पर कार्रवाई नहीं की।

पढ़ना है तो मुस्लिम बनो: सिंध में हिंदुओं को धमकी

पाकिस्तान में कट्टरता का आलम ऐसा है कि हिंदू लड़कियों को पढ़ाई लिखाई करने के लिए भी स्कूलों के भीतर ही इस्लाम अपनाने का दबाव बनाया जा रहा था। दिसंबर 2025 में सिंध प्रांत में स्थित मीरपुर सकरो के एक सरकारी हाई स्कूल से यह घटना सामने आई थी।

नवंबर के अंत में कुछ हिंदू छात्राओं के माता-पिता ने बताया की स्कूल की प्रिंसिपल ने उनकी बेटियों से पढ़ाई जारी रखने के लिए इस्लाम अपनाने को कहा था। अभिभावकों का यह भी कहना है कि छात्राओं को कलमा पढ़ने के लिए मजबूर किया गया और उनके धर्म का मजाक उड़ाया गया। इंकार करने पर कुछ छात्राओं को स्कूल से घर भेज दिया गया।

12 साल में 14000 हिंदू लड़कियों का अपहरण-धर्मांतरण

सिंध के हिंदुओं की स्थिति इतनी भयावह है कि लोग किसी भी सूरत में पाकिस्तान छोड़ना चाहते थे। भारत का वीजा नहीं मिलने के कारण हिंदू समुदाय के कई लोगों द्वारा आत्महत्या किए जाने का भी मामला सामने आया था। 2023 में सिंध में गड़िया लुहार सहायता कमेटी के चेयरमैन मांजी लुहार उर्फ काका ने बताया था कि पिछले छह माह में उनके चार परिचित हिंदुओं ने आत्महत्या कर ली।

सामाजिक कार्यकर्ता रोशन भील का कहना है कि ऐसा हर परिवार अतीत भूलना चाहता है, पर ऐसा होता नहीं है। पाकिस्तान में पिछले 12 सालों में 14,000 हिंदू लड़कियों का अपहरण, जबरन धर्मांतरण और गैंगरेप की घटनाएँ सामने आई हैं।

ChatGPT को जातिवादी बताने वाले विजेंद्र चौहान का प्रोपेगेंडा नया नहीं, UPSC कोचिंग की आड़ में ओझा-दिव्यकीर्ति भी फैला चुके हैं हिंदू घृणा

देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवा, यूपीएससी (UPSC) की तैयारी कराने वाले कोचिंग संस्थान आज शिक्षा के मंदिर कम और ‘ब्रेनवॉशिंग’ के केंद्र ज्यादा नजर आ रहे हैं। हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के प्रोफेसर और ‘दृष्टि IAS’ के चर्चित मुखौटा रहे विजेंद्र सिंह चौहान का एक वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल रहा है। विजेंद्र चौहान ने दावा किया है कि ChatGPT जैसे आधुनिक तकनीक के एल्गोरिदम भी ‘जातिवादी’ हैं और सवर्णों का पक्ष लेते हैं।

विजेंद्र सिंह चौहान का यह केवल एक बयान नहीं है, बल्कि उस गहरे और जहरीले नैरेटिव का हिस्सा है, जिसके तहत भविष्य के नौकरशाहों के मन में हिंदू धर्म, सवर्ण समाज और भारतीय संस्कृति के प्रति नफरत भरी जा रही है। विजेंद्र चौहान, जो ‘कैजुअल’ ड्रेसिंग वाले बयान से वायरल होकर यूट्यूबर बने, अब उसी प्रभाव का इस्तेमाल समाज को बाँटने के लिए कर रहे हैं।

ChatGPT में भी ‘सवर्ण षड्यंत्र’: विजेंद्र चौहान का नया शिगूफा

विजेंद्र सिंह चौहान ने एक पुस्तक विमोचन के दौरान दावा किया कि ChatGPT (Generative Pre-trained Transformer) हिंदू समाज के सवर्णों द्वारा प्रशिक्षित किया गया है, इसका डेटा सवर्णों की तरफ झुका हुआ है क्योंकि इसे ट्रेन करने वाले लोग उसी वर्ग से आते हैं।

विजेंद्र सिंह चौहान ने इसे ‘एल्गोरिदम की लड़ाई’ करार दिया। चौहान का यह तर्क न केवल तकनीकी रूप से हास्यास्पद है, बल्कि समाज में अविश्वास पैदा करने वाला है। विजेंद्र सिंह चौहान के अनुसार, लड़ाई अब केवल मुख्यमंत्रियों या प्रधानमंत्रियों से नहीं, बल्कि मशीनों से भी है क्योंकि वे ‘न्याय’ नहीं कर सकतीं।

इस बयान पर सोशल मीडिया पर उनकी जमकर किरकिरी हुई। जानकारों का कहना है कि यह पूरी तरह से बेतुका और हास्यास्पद तर्क है, क्योंकि AI डेटा पर काम करता है न कि किसी की जाति पर। कुछ ने तंज कसते हुए कहा कि अब शायद ChatGPT में भी ‘आरक्षण’ की माँग की जाएगी। आलोचकों का मानना है कि यह सब केवल अपनी गिरती लोकप्रियता को बचाने और हिंदू समाज को जाति के नाम पर लड़ाने का एक सधा हुआ प्रोपेगेंडा है।

प्रसिद्ध पैरोडी अकाउंट ‘द स्किन डॉक्टर’ ने तंज कसते हुए लिखा कि सैम ऑल्टमैन (OpenAI के CEO) असल में बिहार के समस्तीपुर के ‘मैथिल ब्राह्मण’ हैं, जो दलितों का शोषण करने अमेरिका चले गए थे।

व्यंग्य तो अपनी जगह है, लेकिन गंभीर सवाल यह है कि एक शिक्षक, जो हजारों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शक है, वह तकनीक जैसी तटस्थ चीज में भी जाति का जहर क्यों घोल रहा है? क्या यह उनकी गिरती लोकप्रियता और सोशल मीडिया पर अप्रासंगिक होने की छटपटाहट है, या फिर हिंदू समाज को बाँटने का कोई बड़ा वैश्विक एजेंडा?

कोचिंग के ‘जहरीले’ टीचर: लादेन के मुरीद और राम-सीता के आलोचक

विजेंद्र चौहान अकेले नहीं हैं। UPSC कोचिंग की इस मंडी में कई ऐसे ‘सेलिब्रिटी’ शिक्षक हैं जो खुलेआम हिंदूफोबिया और इस्लामी महिमामंडन का खेल खेल रहे हैं। अवध प्रताप ओझा (ओझा सर) का उदाहरण सामने है, जिन्होंने वैश्विक आतंकी ओसामा बिन लादेन को ‘सपना देखने वाला’ और ‘महान उपलब्धि’ हासिल करने वाला बताया। ओझा सर ने इस्लाम को ‘रोशनी वाला मजहब’ करार दिया और दावा किया कि जब पूरी दुनिया में अँधेरा था, तब मोहम्मद साहब दीया लेकर खड़े थे। वे हिंदू धर्म की सती प्रथा पर प्रहार करते हैं लेकिन इस्लाम की कट्टरता पर मौन रहते हैं।

इसी कड़ी में विकास दिव्यकीर्ति (दृष्टि IAS) का नाम भी आता है, जिन्होंने माता सीता की तुलना ‘कुत्ते द्वारा चाटे गए घी’ से की थी। उन्होंने वाल्मीकि रामायण के संदर्भों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया और भगवान राम को ‘जातिवादी’ साबित करने की कोशिश की। यह वही पैटर्न है जिसके तहत Vision IAS की स्मृति शाह ने भक्ति आंदोलन को ‘लिबरल इस्लाम’ की देन बताया और कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार को जायज ठहराने की कोशिश की। ये शिक्षक क्लास में पढ़ाते समय धीरे-धीरे छात्रों के दिमाग में यह बात बिठा देते हैं कि हिंदू संस्कृति पिछड़ी और शोषक है, जबकि हमलावर और विदेशी विचारधाराएँ महान थीं।

इतिहास का ‘व्हाइटवॉश’ और मुगलों का फर्जी महिमामंडन

इन कोचिंग सेंटरों में इतिहास को इस तरह पेश किया जाता है जैसे मुगल काल ‘स्वर्ण युग’ था। औरंगजेब, जिसने हजारों मंदिर तुड़वाए, उसे इन क्लासों में ‘नैतिकता का प्रतीक’ बताया जाता है। Vision IAS के एक वीडियो में शिक्षक दावा करता है कि औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर इसलिए तुड़वाया क्योंकि वहाँ ‘अवैध गतिविधियाँ’ हो रही थीं।

शाहजहाँ, जिसे प्रेम का पुजारी बताया जाता है, उसके असली वहशीपन को छिपाया जाता है। इतिहास गवाह है कि शाहजहाँ के हरम में 8,000 से ज्यादा महिलाएँ यौन दासी (Sex Slaves) के रूप में रखी गई थीं, जिनमें बड़ी संख्या हिंदू महिलाओं की थी।

इतना ही नहीं, शाहजहाँ ने अपनी ही बेटी जहाँआरा के साथ शारीरिक संबंध बनाए और जब मौलवियों ने सवाल उठाया, तो उन्होंने ‘माली और पेड़’ का हवाला देकर इसे जायज ठहरा दिया। शाहजहाँ ने बनारस के 76 मंदिरों को ध्वस्त किया और हिंदुओं के सामूहिक नरसंहार किए, लेकिन वामपंथी प्रभाव वाले ये शिक्षक उसे एक ‘महान निर्माता’ के रूप में पेश करते हैं।

छात्रों को यह नहीं बताया जाता कि दिल्ली का रेड लाइट एरिया ‘जीबी रोड’ शाहजहाँ की हवस और उसके हरम से निकाली गई महिलाओं के कारण ही बसा था। इतिहास का यह अपराधीकरण केवल हिंदू धर्म को बदनाम करने के लिए किया जाता है।

भावी नौकरशाहों का ‘ब्रेनवॉश’: देश के लिए कितना बड़ा खतरा?

चिंता की बात यह है कि ये संस्थान केवल परीक्षा की तैयारी नहीं करा रहे, बल्कि एक विशेष विचारधारा के ‘सैनिक’ तैयार कर रहे हैं। जब एक अभ्यर्थी क्लास में स्मृति शाह जैसे शिक्षकों से सुनता है कि हिंदू जमींदारों ने मुस्लिम किसानों का शोषण किया, इसलिए कश्मीर में जो हुआ वह ‘क्लास डिस्टिंक्शन’ था, तो वह कश्मीरी हिंदुओं के दर्द के प्रति संवेदनहीन हो जाता है। जब वह विजेंद्र चौहान से सुनता है कि तकनीक भी जातिवादी है, तो वह पूरे सिस्टम को ही शंका की नजर से देखने लगता है।

ये कोचिंग संस्थान अब वैचारिक युद्ध के केंद्र बन चुके हैं जहाँ हिंदू आस्थाओं (नींबू-मिर्ची, नारियल फोड़ना) का मजाक उड़ाना ‘प्रगतिशीलता’ माना जाता है। वहीं दूसरी ओर, बुर्के और हिजाब को ‘सोशल प्राइड’ बताकर डिफेंड किया जाता है। यह ‘भूरी बाल साफ करो” (सवर्णों को खत्म करो) वाली लालू यादव की उस हिंसक राजनीति का नया और परिष्कृत रूप है, जिसे अब एयरकंडीशन्ड कमरों में बैठकर ‘मेंटर्स’ के जरिए फैलाया जा रहा है। अगर यह सिलसिला नहीं रुका, तो भविष्य में देश को ऐसे नौकरशाह मिलेंगे जो अपनी ही जड़ों और धर्म के प्रति घृणा से भरे होंगे।

विकिपीडिया ने TOI इंटरव्यू में कठिन प्रश्नों से बनाई दूरी, वैचारिक झुकाव पर कहा- हम ‘भरोसेमंद सोर्स’ पर निर्भर: जानिए प्रोपेगेंडा-सेंसरशिप की क्या है हकीकत

विकिपीडिया के 25 साल पूरे होने वाले हैं। इस मौके पर ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने 18 जनवरी को विकिमीडिया फाउंडेशन की CEO मारियाना इस्कंदर का एक इंटरव्यू छापा है। इंटरव्यू में इस्कंदर ने प्लेटफॉर्म को निष्पक्ष, वॉलंटियरों द्वारा संचालित इनसाइक्लोपीडिया के तौर पर पेश किया। उसने कहा कि प्लेटफॉर्म पूरी तरह से तथ्यों की सटीकता और अलग-अलग विचारों को तरजीह देता है।

भारत में एंटी हिन्दू सोच को लेकर हो रही आलोचना का जवाब देते हुए, इस्कंदर ने प्लेटफॉर्म का बचाव किया। उन्होंने कहा कि प्लेटफॉर्म ‘भरोसेमंद सोर्स’ से जानकारी लेता है, उसकी पॉलिसी निष्पक्षता पर आधारित है। यहाँ आम सहमति से एडिटिंग किया जाता है।

हालाँकि, अगर विकिपीडिया की अपनी कार्यप्रणाली, एडिटिंग का इतिहास और दर्ज हस्तक्षेपों को ध्यान से देखा जाए तो एक बिल्कुल अलग तस्वीर सामने आती है। न्यूट्रल होने के विकिपीडिया के दावे आइडियोलॉजिकल स्रोतों की छँटनी, अलग राय रखने वाले एडिटर्स को किनारे करने और असहज या असुविधाजनक तथ्यों को बाहर रखने की वजह से सीमित हो जाते हैं, खासकर भारत से जुड़े मुद्दों पर। विकिपीडिया अपनी इस वैचारिक झुकाव को नीतियों, विशेषाधिकारों और ताकत के जरिए आसानी से कायम रख पाता है।

‘भरोसेमंद सोर्स’ बनाम सिस्टम असल में कैसे काम करता है

इस्कंदर ने इंटरव्यू में बार-बार दावा किया कि विकिपीडिया ‘भरोसेमंद सोर्स’ पर निर्भर है। उनके अनुसार, ऐसे सोर्स से जानकारी लेना प्लेटफॉर्म की क्रेडिबिलिटी की बुनियाद है। उन्होंने इस फ्रेमवर्क को एक न्यूट्रल सेफगार्ड के तौर पर पेश किया और तर्क दिया कि विकिपीडिया का कंटेंट ‘तथ्यपरक, निष्पक्ष और भरोसेमंद सोर्स पर आधारित’ है। उन्होंने आगे दावा किया कि कंटेंट को वॉलंटियर्स द्वारा ट्रांसपेरेंट तरीके से मॉडरेट किया जाता है। इस दौरान खुल कर बहस होती है और आम सहमति से गलतियों को ठीक किया जाता है।

(साभार-विकिपीडिया)

हालाँकि, इंटरव्यू लेने वाले ने प्लेटफॉर्म की उस बुनियादी खामी पर सवाल ही नहीं उठाया, जो इस पूरे दावे की जड़ में है। विकिपीडिया जिस चीज को ‘विश्वसनीय स्रोत’ मानता है, उसकी परिभाषा खुद वैचारिक रूप से न्यूट्रल नहीं है। यह एक बंद और खुद को ही संदर्भ मानने वाली व्यवस्था है, जिसमें चुनिंदा कुछ पब्लिकेशन को असमान रूप से ज्यादा महत्व दिया जाता है और इनमें से अधिकतर एक ही वैचारिक दिशा में झुके हुए हैं।

(स्रोत-विकिपीडिया)

असल में विकिपीडिया ज्यादातर लेफ्ट-लिबरल या तथाकथित ‘प्रगतिशील’ सोर्स को भरोसेमंद मानता है। लेफ्ट-लिबरल कहानी को चुनौती देने वालों को कम करके आंका जाता है। खास कर जो भारत से आते हैं या नॉन-लेफ्ट विचार को मानते हैं, उन्हें सिरे से खारिज कर दिया जाता है। विकिपीडिया अपने ‘भरोसेमंद सोर्स’ पेज पर कहता है ‘विकिपीडिया के आर्टिकल भरोसेमंद, पब्लिश सोर्स पर आधारित होने चाहिए, यह पक्का करते हुए कि उन सोर्स में आए सभी मेजॉरिटी और जरूरी माइनॉरिटी विचारों को कवर किया जाए।’

इसका मतलब है कि विकिपीडिया जिस भी सोर्स को ‘भरोसेमंद’ मानता है, वह सच बन जाता है, असली सच नहीं। यह आगे कहता है कि अगर जानकारी ‘भरोसेमंद सोर्स’ से नहीं मिलती है, तो विकिपीडिया को ‘उस टॉपिक पर कोई आर्टिकल नहीं देना चाहिए’। यह कोई थ्योरेटिकल चिंता नहीं है बल्कि राजनीतिक रूप से अहम पेजों पर देखा गया एक डॉक्यूमेंटेड पैटर्न है।

विकिपीडिया की सोर्सिंग पॉलिसी इस बात पर आधारित नहीं है कि कोई सोर्स फैक्ट्स पर आधारित जानकारी देता है या सबूतों पर आधारित। यह उन सोर्स पर आधारित है, जिन्हें वह अपने इकोसिस्टम में पहचानता और सहमति देता है। एक बार जब किसी पब्लिकेशन पर ‘भरोसेमंद नहीं’ या ‘आम तौर पर भरोसेमंद नहीं’ का लेबल लग जाता है, तो उसकी रिपोर्टिंग को असल फैक्ट्स की परवाह किए बिना बाहर कर दिया जाता है। इससे एक सर्कुलर अथॉरिटी लूप बनता है, यानी सोर्स भरोसेमंद हैं क्योंकि विकिपीडिया कहता है और विकिपीडिया न्यूट्रल है क्योंकि यह उन्हीं सोर्स पर निर्भर करता है।

दिलचस्प बात यह है कि द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के इंटरव्यू में इस सिस्टम को गलत जानकारी के खिलाफ बचाव के तौर पर बताया गया। हालाँकि, ये बात कहीं सामने नहीं आई कि यह फ्रेमवर्क आइडियोलॉजिकल फिल्टरिंग को ‘एडिटोरियल सावधानी’ के तौर पर पेश करने की इजाजत देता है। जब पॉलिसी लेवल पर सोर्स की पूरी कैटेगरी को बाहर कर दिया जाता है, तो निष्पक्षता संभव नहीं है। इसलिए नहीं कि एडिटर लापरवाह हैं, बल्कि इसलिए कि नियम खुद ही एक्सेप्टेबल फैक्ट्स की रेंज को छोटा कर देते हैं।

न्यूट्रल पॉइंट ऑफ व्यू, बनाम सोर्स

इंटरव्यू के दौरान, इस्कंदर ने पक्षपातपूर्ण रवैये के आरोप को देखते हुए बचाव के तौर पर ‘न्यूट्रल पॉइंट ऑफ व्यू’ पॉलिसी का जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि विकिपीडिया ‘जानकारी देता है, मनाने के लिए बाध्य नहीं करता’, यानी यह किसी खास आइडियोलॉजी को प्रमोट नहीं करता, बल्कि फैक्ट्स, पॉलिसी और भरोसेमंद सोर्सिंग के आस-पास बनी आम सहमति को दिखाता है।

विकिपीडिया पर न्यूट्रैलिटी का मतलब किसी कहानी के सभी पहलुओं को सामने रखना नहीं है। इसका मतलब है कि विकिपीडिया-अप्रूव्ड ‘भरोसेमंद सोर्स’ जो लिखते आ रहे हैं, उसे समराइज करना। यह आधारभूत फर्क है।

विकिपीडिया के ‘न्यूट्रल पॉइंट ऑफ़ व्यू’ पेज पर लिखा है, “विकिपीडिया पर सभी एनसाइक्लोपीडिया कंटेंट न्यूट्रल पॉइंट ऑफ व्यू (NPOV) से लिखा जाना चाहिए, जिसका मतलब है कि किसी टॉपिक पर भरोसेमंद सोर्स से पब्लिश किए गए सभी जरूरी विचारों को सही तरीके से, सही अनुपात में और जहाँ तक हो सके, बिना किसी एडिटोरियल भेदभाव के दिखाना।”

अगर ‘भरोसेमंद सोर्स’ के अलावा दूसरे सोर्स को भी इसमें शामिल होने का मौका मिलता, तो यह एक न्यूट्रल प्लेटफॉर्म हो सकता था। लेकिन जब विकिपीडिया के भरोसेमंद सोर्स एक ही विचारधारा लेफ़्ट-लीनिंग हो, तो कोई कैसे उम्मीद कर सकता है कि वह न्यूट्रल रहेगा?

यहीं से न्यूट्रल होने का दावा कमज़ोर पड़ने लगता है। जब वही आइडियोलॉजिकल इकोसिस्टम यह तय करता है कि कौन से सोर्स भरोसेमंद हैं, वे क्या पब्लिश करते हैं, और उनके नैरेटिव को कितना महत्व मिलता है, तो न्यूट्रल होना इंडिपेंडेंट होने के बजाय डेरिवेटिव हो जाता है। विकिपीडिया घटनाओं का सीधे मूल्यांकन नहीं करता है। यह अपने पसंदीदा सोर्स के वर्ल्डव्यू को दोहराता है, जबकि नतीजे को न्यूट्रल एनसाइक्लोपीडिक नॉलेज के तौर पर पेश करता है।

जबकि द टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने इस सिस्टम को एक ऑब्जेक्टिव सेफगार्ड के तौर पर पेश किया। असल में यह खास तरह के फ़िल्टर की तरह काम करता है। फैक्ट्स, रिबटल्स, और अल्टरनेटिव इंटरप्रिटेशन जो अप्रूव्ड सोर्स पाइपलाइन से नहीं गुज़रते, उन पर मेरिट के आधार पर बहस नहीं की जाती, उन्हें दहलीज पर ही बाहर कर दिया जाता है। एडिटर्स से यह नहीं पूछा जाता कि कौन-सा दावा सही है या काम का है, बल्कि यह पूछा जाता है कि क्या यह उस सोर्स से आया है जिसे विकिपीडिया पहले ही ठीक मान चुका है। इसका भारत में राजनीतिक और सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील विषयों पर सीधा असर पड़ता है।

घटनाओं को सोर्स के नजरिए से दिखाया जाता है, जिनमें से कई की सोच एक जैसी होती है। जब भारतीय संस्थान, सब्जेक्ट मैटर एक्सपर्ट्स, या सीधे तौर पर हिस्सा लेने वाले लोग कहानियों को सही करने या उनका संदर्भ बताने की कोशिश करते हैं, तो उनके इनपुट अक्सर रिजेक्ट कर दिए जाते हैं। इसकी वजह यह नहीं है कि वे गलत हैं, बल्कि इसलिए कि वे विकिपीडिया के कड़े सोर्सिंग क्राइटेरिया को पूरा नहीं करते।

इस्कंदर ने भारत में विकिपीडिया के बड़े कंट्रीब्यूटर बेस पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग तरह के लोगों की हिस्समेदारी से स्वाभाविक रूप से संतुलित और रिप्रेजेंटेटिव कंटेंट मिलता है। उन्होंने कहा कि पेज व्यू और एडिटर की हिस्सेदारी के मामले में भारत टॉप कंट्रीब्यूटर्स में से एक है। यह बात कहकर, उन्होंने पाठकों को भरोसा दिलाने की कोशिश की कि भारत से जुड़े विषय विदेश से नहीं, बल्कि लोकल हैं।

हालाँकि जवाब में जिस बात को नजरअंदाज किया गया, वह कहीं ज़्यादा असहज करने वाली सच्चाई है। भारतीय एडिटर्स के होने का मतलब यह नहीं है कि कवरेज अपने आप सही या देश भर में दिखाने वाली होगी। असल में, कई राजनीतिक और सांप्रदायिक रूप से सेंसिटिव इलाकों में इसका उल्टा असर हुआ है।

जब एडिटिंग पैटर्न, प्रशासनिक कामों और लंबे समय से चल रहे विवादों की जाँच की जाती है, तो पता चलता है कि भारत में रहने वाले विकिपीडिया एडिटर्स का एक वर्ग भारत सरकार, उसके संस्थानों और हिंदू सभ्यता और संस्कृति के खिलाफ राय रखता है। यह प्लेटफॉर्म पर ‘टॉक’ सेक्शन में होने वाली चर्चाओं में साफ दिखता है। ये राय सीधे तौर पर तय करती हैं कि कौन सी जानकारी शामिल की जाए, हटाई जाए, किस पर जोर दिया जाए या किसको खारिज किया जाए।

विकिपीडिया की प्रतिष्ठा लंबे समय से चलने और पॉलिटिकल जानकारी की वजह से है। जो एडिटर इसके मुश्किल नियमों को समझने में सालों लगाते हैं, विवादित पेजों पर उनका बहुत ज़्यादा असर दिखता है । भारत से जुड़े आर्टिकल्स में एडिटर्स का एक छोटा लेकिन मज़बूत ग्रुप सांप्रदायिक हिंसा, राष्ट्रीय सुरक्षा , मीडिया क्रेडिबिलिटी और पॉलिटिकल डेवलपमेंट जैसे टॉपिक पर नैरेटिव पर बहुत ज़्यादा कंट्रोल रखता है।

कई मामलों में, उनके पर्सनल आइडियोलॉजिकल झुकाव आर्टिकल्स में साफ तौर पर दिख जाते हैं। हालाँकि इन्हें नहीं बताना होता है, लेकिन सोर्स चुनने, फ्रेमिंग और चुनिंदा चूक में ये दिख जाते हैं।ब

टाइम्स ऑफ इंडिया ने एडिटर डाइवर्सिटी को मजबूती के तौर पर पेश करने की कोशिश की, लेकिन एडिटोरियल पावर कंसंट्रेशन को बताने में असफल रहा। सभी एडिटर एक जैसे नहीं होते। नए कंट्रीब्यूटर, खासकर जो अलग नजरिया रखते हैं या हावी नैरेटिव को चुनौती देने की कोशिश करते हैं, अक्सर खुद को उन अनुभवी एडिटर्स से कमतर पाते हैं जो एडिट्स को ब्लॉक करने, वापस लेने या बदनाम करने के लिए पॉलिटिकल भाषा का इस्तेमाल करने में माहिर होते हैं। बायस को ठीक करने के बजाय, कई मामलों में लोकल भागीदारी ने इसे और मजबूत कर दिया जाता है।

जो एडिटर विकिपीडिया की ग्लोबल कम्युनिटी की सोच से सहमत होते हैं, उनके लिए आम सहमति बनाना आसान होता है, जबकि अलग राय रखने वाले भारतीय लोगों को अलग-थलग कर दिया जाता है। उन्हें हतोत्साहित किया जाता है या आखिर में बाहर कर दिया जाता है। सिर्फ वही लोग यहाँ एक्टिव रहते हैं, जो एक छोटी सोच वाले दायरे में काम करने को तैयार रहते हैं।

‘आम सहमति’ पर जोर और पेज लॉक करने का नुस्खा

इस्कंदर ने मतभेद होने पर ‘आम सहमति’ को आदर्श स्थिति कहा। उन्होंने सुझाव दिया कि विकिपीडिया के आर्टिकल तभी बदलते हैं जब एडिटर सहमति पर पहुँचते हैं, और यह मिलकर किया जाने वाला प्रोसेस निष्पक्षता, सटीकता और संतुलन पक्का करता है। उनके अनुसार, अगर टेक्स्ट में किसी बदलाव पर आम सहमति नहीं बनती है, तो वह पास नहीं होता है और प्लेटफ़ॉर्म पर पब्लिश नहीं होता है, इस तरह कंटेंट को बचाया जाता है।

हालाँकि विकिपीडिया पर आम सहमति का तरीका ऐसे काम नहीं करता है। विकिपीडिया पर ऑपइंडिया के डॉजियर में इस प्रोसेस को डिटेल में बताया गया है और दिखाया गया है कि सिस्टम में भेदभाव कितनी गहराई तक जड़ें जमा चुकी हैं। खुली बहस को आसान बनाने के बजाय, आम सहमति अक्सर दूसरे विचारों का बाहर करने का रास्ता होता है।

जो एडिटर विकिपीडिया के ‘भरोसेमंद सोर्स’ वाले इकोसिस्टम से अलग सोर्स डालने की कोशिश करते हैं, उन्हें चेतावनी दी जाती है, वापस बुला लिया जाता है या ब्लॉक कर दिया जाता है। ऐसा इसलिए नहीं होता कि जानकारी साफ़ तौर पर गलत है, बल्कि इसलिए होता है क्योंकि यह अंदरूनी सोर्सिंग हायरार्की का उल्लंघन करती है।

दिल्ली दंगों से जुड़ी कवरेज में यह पैटर्न बार-बार देखा गया है, जहाँ एडिटर जो बिना मंज़ूरी वाले पब्लिकेशन या ऑफिशियल जवाबों से मटीरियल जोड़ने की कोशिश करते हैं, उन्हें सजा दी जाती है।

ऐसे मामलों में ‘आम सहमति’ सबूतों पर चर्चा करके नहीं बनती है। यह पहले से तय होती है। इसके अलावा पेज लॉकिंग विकिपीडिया पर एक बड़ा हथियार है। इसका इस्तेमाल ‘असंतुलन’ को ठीक करने के लिए किया जाता है। जब एडिटर कुछ खास फैक्ट्स या नजरियों को शामिल नहीं करते हैं, तो अक्सर आर्टिकल लॉक कर दिए जाते हैं। इसे वेरिफाई नहीं किया जाता कि ये भरोसे लायक है या नहीं।

ऑपइंडिया के डॉजियर में बताया गया है कि कैसे पेज लॉक करना विकिपीडिया के लेफ्ट-लिबरल सोच वाले एडिटर्स के लिए एक टूल बन गया है। उदाहरण के लिए, 2020 के दिल्ली दंगों का पेज भी लॉक है, जिसका मतलब है कि दुनिया भर के हजारों एडिटर्स के पास पेज को एडिट करने का कोई एक्सेस नहीं है। जैसा कि ऑपइंडिया के डॉजियर में बताया गया है, “एक्सटेंडेड कन्फर्म्ड प्रोटेक्शन (ECP) के तहत आर्टिकल्स को सिर्फ एक्सटेंडेड-कन्फर्म्ड अकाउंट्स ही एडिट कर सकते हैं, ऐसे अकाउंट्स जो कम से कम 30 दिनों से रजिस्टर्ड हैं और जिन्होंने कम से कम 500 एडिट किए हैं, या जिन्हें किसी एडमिनिस्ट्रेटर ने मैन्युअली एक्सटेंडेड-कन्फर्म्ड राइट्स दिए हैं।”

इसका असर यह है कि नए एडिटर और असहमति जताने वाले कंट्रीब्यूटर को पूरी तरह से बाहर कर दिया जाता है, जबकि अनुभवी एडिटर के एक छोटे ग्रुप को इस बात पर पूरा कंट्रोल मिल जाता है कि आर्टिकल को कैसे फ्रेम किया जाए और मेंटेन किया जाए।

OpIndia के डॉक्यूमेंटेशन में सबसे खास उदाहरणों में से एक दिल्ली दंगों में ताहिर हुसैन की भूमिका को शामिल करने का बार-बार विरोध है। कोर्ट की कार्रवाई, जांच के डेवलपमेंट और बड़े कवरेज के बावजूद, विकिपीडिया के आर्टिकल में इस पहलू को शामिल करने की कोशिशों में या तो देरी हुई, उन्हें कमज़ोर किया गया, या पूरी तरह से रिजेक्ट कर दिया गया। दूसरे सोर्स का हवाला देने वाले एडिटर को पलटवार और पॉलिसी-बेस्ड ऑब्जेक्शन का सामना करना पड़ा, जबकि आर्टिकल की कोर फ्रेमिंग वैसी ही रही।

दिल्ली दंगों पर विकिपीडिया आर्टिकल की पहली लाइन में ही पक्षपातपूर्ण रवैया देखा जा सकता है। इसमें लिखा है, “2020 के दिल्ली दंगे, या नॉर्थ ईस्ट दिल्ली दंगे, भारत के नॉर्थ ईस्ट दिल्ली में खून-खराबे, प्रॉपर्टी को नुकसान और दंगों की कई लहरें थीं, जो 23 फरवरी 2020 को शुरू हुईं और मुख्य रूप से हिंदुओं द्वारा मुसलमानों पर हमला करने की वजह से हुईं।” यहाँ तक ​​कि कोर्ट ने भी साफ तौर पर कहा है कि दंगे हिंदू विरोधी थे।

(स्रोत- विकिपीडिया)

विकिपीडिया पर ऑपइंडिया के डॉजियर में बताया गया है कि कैसे प्लेटफॉर्म ने चालाकी से दिल्ली दंगों के पीछे हिंदुओं को दिखाया, जबकि असल में इसका उल्टा था। ऑपइंडिया डॉजियर के मुताबिक, विकिपीडिया ने 2020 के दिल्ली दंगों को सिस्टमैटिक तरीके से हिंदुओं को हमलावर के तौर पर दिखाया। जबकि जाँच के नतीजों, कोर्ट के ऑब्जर्वेशन और चश्मदीदों के बयान इसके उलट थे। विकिपीडिया आर्टिकल की पहली ही लाइन में कहा गया कि दंगे ‘मुख्य रूप से हिंदू भीड़ द्वारा मुसलमानों पर हमला करने की वजह से हुए थे’, जिससे एक ऐसा नैरेटिव टोन सेट हुआ जो पूरे पेज पर बना रहा।

(स्रोत-ऑपइंडिया का डोजियर)

डोजियर में बताया गया कि कैसे इस फ्रेमिंग में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा को कम से कम करते हुए मुस्लिम विक्टिम होने को चुनकर बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया। IB अधिकारी अंकित शर्मा और मजदूर दिलबर नेगी समेत हिंदुओं की बेरहमी से की गई हत्याओं को छोड़ दिया गया। देर से कवर किया गया या गोलमोल बातें की गई। यहाँ ‘खुली नालियों में मिली लाशें’ जैसे दावों को विदेशी मीडिया रिपोर्ट्स का इस्तेमाल करके बताया गया, जबकि यह एकमात्र डॉक्यूमेंटेड मामला हिंदू विक्टिम का था।

कोर्ट के रिकॉर्ड और पुलिस जाँच में सामने आया कि मुस्लिम भीड़ ने 23 फरवरी 2020 को पत्थरबाजी शुरू की थी, जिसमें पहली मौत पुलिस कांस्टेबल रतन लाल की हुई थी। इन नतीजों को बार-बार इस आधार पर खारिज कर दिया गया या विकिपीडिया से हटा दिया गया कि दिल्ली पुलिस एक ‘भरोसेमंद सोर्स नहीं’ है, जबकि लेफ्ट-विंग मीडिया की बातों को बिना किसी वैसी जाँच के मान लिया गया।

(स्रोत- ऑपइंडिया)

डोजियर में आगे दिखाया गया कि जब एडिटर्स ने कहानी को सही करने या हिंदू-विरोधी हिंसा वाले सबूत जोड़ने की कोशिश की, तो उन्हें रोक दिया गया। पेज को लंबे समय तक कन्फर्म प्रोटेक्शन में रखा गया, जिससे घटनाओं के गलत विश्लेषण को ‘आम सहमति’ के तौर पर दिखाया जा सके और उसमें सही सुधार को रोका जा सके।

इसी तरह, डोजियर में टेक फॉग जांच के रेफरेंस को पूरी तरह से खारिज किया था, भले ही इसे पब्लिक में काफी चर्चा मिली हो। इसे शामिल करने का विरोध करने वाले एडिटर्स ने सिर्फ इसकी क्रेडिबिलिटी पर ही सवाल नहीं उठाया। उन्होंने इसे पूरी तरह से बाहर करने के लिए विकिपीडिया के सोर्सिंग नियमों का इस्तेमाल किया, जिससे रीडर्स को यह भी नहीं पता चला कि ऐसे आरोप या जाँच हुए हैं। जब द वायर आर्टिकल को लेकर विकिपीडिया के एडिटर्स के बीच विवाद हुआ, तो ऑपइंडिया ने ट्रैक किया कि कैसे विकिपीडिया के लेफ्ट-विंग्ड एडिटर्स ने द वायर का बचाव करने के लिए दखल दिया, जिसे यहां चेक किया जा सकता है।

सबसे बड़ा खुलासा तब हुआ जब द वायर द्वारा पब्लिश एक आर्टिकल के जवाब में एक सीनियर इंडियन नेवी कमोडोर ने जवाब दिया। जैसा कि OpIndia के डॉजियर में बताया गया है, विकिपीडिया के एडिटर्स ने इस आधार पर जवाब मानने से मना कर दिया कि यह फर्स्ट-पर्सन सोर्स है और इसलिए भरोसे के स्टैंडर्ड पर खरा नहीं उतरता। उलझन साफ़ है।

(स्रोत-ऑपइंडिया)

संबंधित व्यक्ति का इंस्टीट्यूशनल तौर पर भरोसेमंद जवाब रिजेक्ट कर दिया गया, जबकि ओरिजिनल मीडिया रिपोर्ट को आर्टिकल में बिना किसी चुनौती के रखा गया। यह विकिपीडिया के आम सहमति मॉडल की सीमाओं को दिखाता है। फर्स्ट-पर्सन अथॉरिटी, भले ही वह किसी सीनियर मिलिट्री अधिकारी की हो, विकिपीडिया के भरोसेमंद फ्रेमवर्क में फिट नहीं हुआ।

फंडिंग और फॉर्मल प्रोजेक्ट्स की भूमिका

इंटरव्यू में एक और बात जो छूट गई, वह थी फंडिंग और फॉर्मल प्रोजेक्ट्स की भूमिका, जो यह तय करती है कि विकिपीडिया ‘भरोसेमंद सोर्स’ को कैसे डिफाइन और लागू करता है। जबकि इस्कंदर ने विकिपीडिया को आम सहमति से चलने वाला एक वॉलंटियर-ड्रिवन प्लेटफॉर्म बताया। लेकिन यह नहीं बताया कि एडिटोरियल हायरार्की और सोर्स प्रेफरेंस को कैसे तेजी से कोडिफाइड, स्टैंडर्डाइज्ड और टेक्नोलॉजिकली लागू किया जा रहा है।

ऐसा ही एक मामला, जैसा कि विकिपीडिया पर ऑपइंडिया के डोजियर में बताया गया है, न्यूज़लिंगर का है, जो एक भारतीय विकिपीडिया एडिटर हैं। खबर है कि उन्हें एक प्रोजेक्ट के लिए विकिमीडिया से जुड़ा ग्रांट मिला था। इसका मकसद सोर्स को कोड करना और एक क्रोम एक्सटेंशन बनाना था, ताकि एडिटर यह पहचान सकें कि कौन से पब्लिकेशन भरोसेमंद हैं और कौन से नहीं। ऊपर से देखने पर, यह एक टेक्निकल मदद लग सकती है जिसे एक जैसा बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। असल में, यह पहले से ही खराब सोर्सिंग इकोसिस्टम को और बेहतर बनाता है। न्यूज़लिंगर को पैसे कैसे मिले और उसने ‘भरोसेमंद सोर्स’ का इकोसिस्टम कैसे बनाया, इसकी जानकारी विकिपीडिया पर ऑपइंडिया के डॉजियर में देखी जा सकती है।

(स्रोत-ऑपइंडिया)

सब्जेक्टिव एडिटोरियल फैसलों को कोडेड टूल्स में अनुवाद करके, विकिपीडिया इनफॉर्मल बायस से स्ट्रक्चरल बायस की ओर बढ़ता है। एडिटर्स को यह बताने की जरूरत नहीं है कि किसी सोर्स पर भरोसा किया जाना चाहिए या नहीं। यह फैसला सिस्टम और गाइडलाइंस में पहले से लोड होता है। इससे एडिटोरियल समझदारी कम हो जाती है और पब्लिकेशन्स के एक तय ग्रुप का दबदबा और मजबूत हो जाता है, जिनमें से कई एक जैसी सोच रखते हैं।

ऐसे फैसलों का कंटेंट पर काफी असर पड़ता है। इस पर सवाल नहीं उठाया जाता, बल्कि इसे एक्सटेंशन, डॉक्यूमेंटेशन और ट्रेनिंग मटीरियल में शामिल कर दिया जाता है, तो अलग राय रखने वाले एडिटर्स को और भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। किसी स्टोरी को चुनौती देना सिर्फ एडिटर्स के साथ असहमति का मामला नहीं है, बल्कि प्लेटफॉर्म के फॉर्मल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए भी एक चुनौती है। इससे राजनीतिक मुद्दों पर बने पेज में सुधार करना और मुश्किल हो जाता है।

एंटी हिन्दू घटनाओं को कम करके आंका गया, पैटर्न के तौर पर डॉक्यूमेंट किया गया

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के इंटरव्यू में हिन्दू विरोधी दंगों को लेकर कंटेंट पर कहा गया कि ‘भारत में कुछ कमेंटेटर्स’ इसकी आलोचना करते हैं। जबकि ‘हिंदू विरोधी’ शब्द के इस्तेमाल से दूरी बनाई गई है। इसके अलावा जो चीज गायब है, वह है आलोचना के सार के साथ कोई सीरियस जुड़ाव। मुद्दा यह नहीं है कि विकिपीडिया पर आरोप लगे हैं, बल्कि यह है कि ये आरोप कई आर्टिकल्स में और कई सालों से साफ़ और बार-बार होने वाले पैटर्न की ओर इशारा करते हैं।

उदाहरण के लिए, घाटी से कश्मीरी हिंदुओं के पलायन से जुड़े पेज पर, विकिपीडिया मोहिता भाटिया और अलेक्जेंडर इवांस जैसे स्कॉलर्स के कहने के आधार पर इसे नरसंहार कहने से साफ मना कर देता है। ऑपइंडिया ने दोनों स्कॉलर्स के हवाले से बताए गए सोर्स चेक किए और दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने अपनी किताब और आर्टिकल में क्रमशः “नरसंहार” का सिर्फ़ अस्पष्ट रूप से ज़िक्र किया। इवांस ने दावा किया कि उन्होंने जम्मू में कश्मीरी पंडितों का इंटरव्यू लिया था, जिन्होंने पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहराया था, “जो बताता है कि एथनिक क्लींजिंग या नरसंहार का शक गलत है”।

(स्रोत-ऑपइंडिया)

दूसरी तरफ, भाटिया ने लिखा, “जम्मू की मुख्य पॉलिटिक्स, जो ‘हिंदुओं’ को एक जैसा दिखाती है, पंडितों को भी बड़ी ‘हिंदू’ कैटेगरी में रखती है। यह अक्सर उनके माइग्रेशन को समझाने के लिए ‘जेनोसाइड’ या ‘एथनिक क्लींजिंग’ जैसे बहुत ही अग्रेसिव शब्दों का इस्तेमाल करती है और उन्हें कश्मीरी मुसलमानों के सामने खड़ा करती है। BJP ने अपने ‘हिंदू’ वोट बैंक को बढ़ाने के लिए पंडितों की तकलीफों का इस्तेमाल किया है और उन्हें ऐसे विक्टिम के तौर पर पेश किया है जिन्हें मिलिटेंट्स और कश्मीरी मुसलमानों ने अपने वतन से निकाल दिया है।”

एक और उदाहरण 2002 के गुजरात दंगे हैं, जिन्हें “स्कॉलर्स” के कहने के आधार पर ‘मुस्लिम विरोधी दंगा’ बताया गया है। दिलचस्प बात यह है कि जिन स्कॉलर का जिक्र किया गया है, उनमें से एक हर्ष मंदर हैं, जिनका नाम द वायर पर एक आर्टिकल में है। आर्टिकल में यह भी दावा किया गया है कि ट्रेन जलाने की घटना, जिसमें 58 हिंदू मारे गए थे, “असल में एक सुनियोजित ट्रिगर” थी।

(स्रोत-ऑपइंडिया)

यह सिर्फ शब्दों की दिक्कतों या कुछ एडिटर्स के कामों के बारे में नहीं है। यह पैटर्न आर्टिकल्स को कैसे फ्रेम किया जाता है, किस बात पर ज़ोर दिया जाता है और किस पर सवाल उठाए जाते हैं, इसमें दिखता है। हिंदू धार्मिक रीति-रिवाजों, संगठनों और सभ्यता के इतिहास पर अक्सर जाति, कट्टरपंथ या बहुसंख्यकवाद के नज़रिए से चर्चा की जाती है। ऐसी ही जांच अक्सर कहीं और नहीं होती या नरम पड़ जाती है। हिंदुओं के खिलाफ हिंसा को अक्सर कम करके आंका जाता है या फिर उसे नए तरीके से पेश किया जाता है, जबकि हिंदू ग्रुप्स के खिलाफ आरोपों को कड़ी भाषा और बड़े सोर्स के साथ हाईलाइट किया जाता है।

यह पक्षपातपूर्ण रवैया अचानक नहीं आया है। यह सीधे तौर पर पहले से बताए गए सिस्टम से आता है, भरोसेमंद सोर्स की एक छोटी परिभाषा, फर्स्ट-पर्सन या इंस्टीट्यूशनल जवाबों को नकारना, सेंसिटिव टॉपिक्स पर पेज लॉक करना, और एडिटोरियल कंट्रोल जो विचारधारा से जुड़े एडिटर्स के एक छोटे ग्रुप के बीच केंद्रित है। एक बार ये सिस्टम बन जाने के बाद, नतीजे पहले से पता होते हैं।

विकिपीडिया पर ऑपइंडिया के डॉजियर में कई ऐसे मामले दर्ज हैं जहां हिंदू नज़रिए, फैक्ट्स में सुधार या सफाई का विरोध किया गया या उन्हें बाहर रखा गया। इसलिए नहीं कि वे गलत थे, बल्कि इसलिए कि उन्होंने विकिपीडिया के पसंदीदा सोर्स के सपोर्टेड नैरेटिव को चुनौती दी। सुधार या रिव्यू करने के बजाय, ऐसी कोशिशों का अक्सर प्रोसेस से जुड़ी आपत्तियों, पॉलिसी के हवाले या सीधे खारिज कर दिया जाता था।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के इंटरव्यू में विकिपीडिया को एक ट्रांसपेरेंट, खुद को ठीक करने वाला प्लेटफॉर्म बताया गया जो न्यूट्रल पॉलिसी और अपनी मर्ज़ी से आम सहमति से चलता है, लेकिन इसकी सोच छोटी है। विकिपीडिया के सोर्सिंग नियम, न्यूट्रैलिटी का सिद्धांत और एडिटोरियल हायरार्की एक सिस्टम की नाकामी दिखाते हैं, न कि कोई अकेला भेदभाव।

भारत के हिन्दुओं के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित होने के आरोपों का जवाब देते हुए इस्कंदर ने इस बात पर जोर दिया कि विकिपीडिया विश्वस्त स्रोत (reliable sources) से जानकारी लेता है और सर्वसम्मति-आधारित संपादन का पालन करता है। लेकिन जब तक विकिपीडिया की आधारभूत संरचना में बदलाव नहीं किया जाता, तब तक निष्पक्षता सिर्फ कहने के लिए ही रह जाएगी।

विकिपीडिया पर ऑपइंडिया का डोजियर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

नमाज खामोश इबादत है- आरफा तुमने ठीक कहा, क्योंकि इसके बाद शोर तो पत्थरबाजी का होता है: यकीन न हो तो जुमे पर अपने भाईजानों की हिंसा याद कर लो

“नमाज 5 से 15 मिनट में खत्म हो जाती है। कोई शोर शराबा नहीं होता। कोई ढोल नहीं बजता, कोई पड़ोसियों को परेशानी नहीं होती। दुनिया की सबसे खामोश इबादतों में इस नमाज का नाम हैं।”

क्या आप इस बयान से सहमत हैं? अगर आप इस्लामी कट्टरपंथी सोच या एकतरफा नैरेटिव में यकीन रखने वालों में से हैं, तो शायद बिना सवाल किए मान भी गए होंगे। लेकिन सच जानना बहुत जरूरी है। और यह सच आरफा ‘बेगम’ आपको कभी नहीं बताएँगी, क्योंकि उन्होंने आँखों पर पट्टी बाँधी हुई है। ऊपर लिखी गई पंक्तियाँ भी आरफा के बयान की ही हैं, जिन्हें हर जगह मुस्लिम ‘पीड़ित’ दिखता है और ‘पत्रकारिता’ के नाम पर उन्हीं की हक की लड़ाई का ढोंग रचते हुए वे ‘सत्ता का कॉलर’ पकड़ने की धमकी देती फिरती हैं।

‘पत्रकारिता’ के इसी सफर में आरफा को अपने मतलब की खबर मिल जाती है, जिसके जरिए वह हमेशा की तरह ही सरकार को निशाना बना सके और अपने यूट्यूब चैनल की ‘व्यूअरशिप’ भी बढ़ा सकें। खबर बरेली की है, जहाँ एक खाली घर में नमाज पढ़ते कुछ लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया। अब इसी खबर को आधार बनाकर आरफा पूरे देश में अल्पसंख्यकों की आवाज बनने निकल पड़ती हैं।

घटना पर आरफा ने अपने यूट्यूब चैनल पर 10 मिनट की वीडियो पोस्ट की। वीडियो के ट्रेलर में ही आरफा ने ‘सत्ता का कॉलर’ पकड़ने वाले अपने इरादों को पूरा करने की कोशिश की।वीडियो शुरू ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीरों से होती है। जहाँ होटल में बैठकर आरफा खानुम प्रधानमंत्री मोदी के मंदिर दर्शनों की तस्वीरों को गिनती हैं। फिर कहती हैं- “अगर गिनने पर आऊँ कि प्रधानमंत्री ने अपने कार्यकाल में कितने मंदिरों में दर्शन किए, तो शायद सुबह से शाम हो जाए।”

यहीं वीडियो के दर्शक भटक जाते हैं, क्योंकि वह वीडियो की हेडलाइन पढ़कर इस उम्मीद से क्लिक करते हैं कि आरफा बरेली की घटना पर बात करेंगी। लेकिन उन्हें सामने मिलती हैं पीएम मोदी की तस्वीरें। आरफा के यूट्यूब स्ब्सक्राइबर्स, जिनमें से अधिकतर उनकी जैसी ही इस्लामी कट्टरपंथी सोच रखते हैं, यहाँ वह मन में सोचते हैं- “हम तो आरफा के मुँह से इस्लाम की दीन सुनने आए थे और यहाँ आरफा मंदिरों के दर्शन करा रही हैं।” ये बड़ा ही शॉकिंग मोमेंट हो गया होगा, उनके लिए।

खैर, आगे बढ़ते हैं। तो अब आरफा अपने पत्रकारिता के मंसूबे बताने लगती हैं, जो शायद अब तक पूरे देश को समझ आ चुके हैं। वही मंसूबे, जिनसे वह मुस्लिमों को पीड़ित दिखाते हुए ‘सत्ता का कॉलर’ पकड़ना चाहती हैं, लेकिन जब वही मुस्लिम मजहब के नाम पर ‘आतंकवादी’ बनता है तो इससे जुड़े सवाल उनके लिए ‘फनी‘ हो जाते हैं।

इसके बाद अब आती है असल मुद्दे की बारी। बरेली में नमाज पढ़ने पर पुलिस हिरासत वाला मामला। इस मुद्दे पर यूँ तो आरफा का रुख उनके ‘पत्रकारिता के मंसूबों’ से मेल खाता है। लेकिन यहाँ गौर करने वाली बात कुछ और है।

घटना पर सवाल उठाते-उठाते आरफा ‘नमाज’ को दुनिया की सबसे ‘खामोश इबादत’ में से एक घोषित कर देती हैं। अब यह भी एक ‘फनी’ मोमेंट ही है। क्योंकि शायद आरफा यहाँ ‘नमाज’ नाम के किसी व्यक्ति का जिक्र कर रही हैं और उस नमाज को कोई नोबेल पुरस्कार मिला है। क्योंकि इस्लाम मजहब में जो ‘नमाज’ होती है, उसका तो शांति से कोई लेना-देना है नहीं। और यह साबित भी हो चुका है, जब ऐसे मामले सामने आते हैं जिनमें जुमे की नमाज के बाद सांप्रदायिक हिंसा भड़काई गई।

और जब बात दुनिया के सबसे खामोश इबादत ‘नमाज’ की हो रही हो, तो जमीन पर जो हकीकतें सामने आती हैं, वे कतई वैसी नहीं दिखतीं जैसा आरफा अपने वीडियो में पेश करती हैं। याद करें इंदौर को वो वायरल वीडियो जहाँ मुस्लिम भीड़ ने जुमे की नमाज के बाद खुलेआम पूरे शहर को जलाने की धमकी दी। आरफा से सवाल है कि क्या ये विचार ‘खामोश इबादत’ करने के बाद आते हैं?

पूर्व बीजेपी नेता नुपुर शर्मा के ‘पैगंबर’ पर बयान के विरोध में देशभर में जगह-जगह दंगे हुए, उनमें से अधिकतर जुमे की नमाज के बाद ही भड़के थे। इन्हीं में गंगा नगरी प्रयागराज में जुमे की नमाज के बाद दंगे भड़के, पुलिस की गाड़ियों पर पथराव और आगजनी का वो मंजर। उत्तर प्रदेश के इतिहास में ‘काले पन्नों’ में दर्ज संभल हिंसा में भी जुमे की नमाज के बाद भीड़ जुटाई गई थी। और पिछले साल 2025 बरेली में ‘आई लव मोहम्मद’ विवाद पर हिंसा भी जुमे की नमाज के बाद ही भड़की थी।

ये तो कुछ गिने-चुने मामले हैं, लेकिन आए दिन मामले सामने आते हैं कि जुमे की नमाज के बाद मुस्लिम ने हिंदू की दुकान तोड़ी, सरकार के विरोध में प्रदर्शन भी जुमे की नमाज के बाद ही शुरू होते हैं। यहाँ कटाक्ष है कि इसी नमाज को आरफा दुनिया की सबसे ‘खामोश इबादत’ का तबका दे रही हैं।

सच तो यह है कि आरफा ‘बेगम’ का यह तरीका नया नहीं है। यह वही पुरानी स्क्रिप्ट है, जो वह हर बार दोहराती हैं। जहाँ भी किसी मुस्लिम का नाम जुड़ जाए, वहाँ आरफा को तुरंत जुल्म, नाइंसाफी और संविधान खतरे में दिखने लगता है। तब आरफा इस्लाम की दीन देने लग जाती है, नमाज को ‘खामोश इबादत’ कहने लग जाती हैं।

लेकिन जब वही मुस्लिम भीड़ बनकर सड़क पर उतरता है, पत्थर चलाता है, धर्मांतरण और लव जिहाद करता है और ‘शहादत’ के नाम पर आत्मघाती हमले करता है तब आरफा की आवाज कहीं गायब हो जाती है। उसे यह सवाल ‘मजाकिया’ लगने लगते हैं।

बरेली वाली घटना में भी आरफा को मुस्लिम नमाज पढ़ते दिखाई दे रहे हैं और पुलिस मानो विलन। जबकि इस फैक्ट को नजरअंदाज कर दिया गया कि पुलिस ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी की कार्रवाई सिर्फ घर में नमाज पढ़ने के कारण नहीं हुई, बल्कि एक खाली निजी घर के अंदर बिना प्रशासनिक अनुमति के सामूहिक रूप से ऐसा करने पर की गई।

यहाँ आरफा को नमाज से दिक्कत नहीं हुई, न ही उन्हें शांति से कोई लेना-देना है। आरफा को सिर्फ मौका चाहिए था- सरकार को घेरने का, प्रधानमंत्री पर तंज कसने का और अपने यूट्यूब चैनल की व्यूअरशिप बढ़ाने का। इसीलिए बरेली की घटना को उठाकर वह पूरे देश के मुस्लिमों को पीड़ित बताने निकल पड़ती हैं, लेकिन इंदौर, प्रयागराज, संभल और बरेली विवाद और हिंसा जैसे मामलों पर चुप रहती हैं या बात घुमा देती हैं। यही उनकी ‘पत्रकारिता’ है, जो सवाल पूछने की जगह ढाल बन जाती है।

और आखिर में, आरफा से एक सीधा सवाल- अगर नमाज इतनी ही ‘खामोश इबादत’ है, तो जुमे की नमाज के बाद हिंसा क्यों भड़कती हैं? क्या ये सब भी उसी ‘खामोश इबादत’ का हिस्सा है? साथ ही एक और हकीकत भी जान ही लो आरफा, आधा सच दिखाने से खुद को आवाज उठाने वाली ‘पत्रकार’ बताना बंद कर दो, क्योंकि तुम्हारे इस एजेंडो को देश पहचान चुका है।