गुजरात के सूरत जिले के मंगरोल तालुका के हथोड़ा गाँव में गौहत्या की सूचना पर पहुँची पुलिस टीम और गौ रक्षकों पर हिंसक हमला कर दिया गया। इस हमले में एक पुलिसकर्मी और एक गौ रक्षक गंभीर रूप से घायल हो गए।
घटना बुधवार (25 फरवरी 2026) की बताई जा रही है, जिसके बाद गुरुवार (26 फरवरी 2026) को सूरत जिला पुलिस ने गाँव में बड़ा अभियान चलाकर 22 मुस्लिम पुरुषों को उनके घरों से हिरासत में लिया। पुलिस ने इस मामले में खुद शिकायतकर्ता बनकर FIR दर्ज की है और जाँच जारी है।
कोसांबा पुलिस स्टेशन में कांस्टेबल गोविंदसिंह शिवभाई जलिया की शिकायत के आधार पर मामला दर्ज किया गया। शिकायत के मुताबिक, गौ रक्षक सत्यप्रकाश यादव ने गौहत्या की सूचना दी थी, जिसके बाद पुलिस टीम गाँव पहुँची। तलाशी के दौरान दो बाइकों पर सवार कुछ लोग वहाँ पहुँचे और पुलिस से बहस करने लगे। देखते ही देखते विवाद बढ़ गया और पुलिस व गौ रक्षकों पर हमला कर दिया गया।
FIR के अनुसार, बाद में करीब 50 लोगों की भीड़ जमा हो गई, जो तलवार और पाइप जैसे हथियारों से लैस थी। आरोप है कि भीड़ ने जान से मारने की नीयत से हमला किया, जिसमें सत्यप्रकाश यादव और एक पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए। दोनों को किसी तरह मौके से निकालकर अस्पताल में भर्ती कराया गया है। फिलहाल पुलिस पूरे मामले की जाँच में जुटी है और आगे की कार्रवाई जारी है।
SP के आदेश पर चला तलाशी अभियान, इस्लामी कट्टरपंथियों को किया गया गिरफ्तार
इस मामले में सूरत जिला बजरंग दल के समन्वयक और गौ रक्षक जय पटेल ने ऑपइंडिया से बातचीत में दावा किया कि रमजान शुरू होते ही कुछ कट्टरपंथी तत्व सक्रिय हो जाते हैं और गौहत्या जैसी घटनाएँ बढ़ जाती हैं।
उन्होंने कहा कि हथोड़ा गाँव की घटना में पुलिस और गौ रक्षकों, दोनों को निशाना बनाया गया। जय पटेल के मुताबिक, हमले के अगले ही दिन यानी गुरुवार (26 फरवरी 2026) को सूरत SP राजेश गड़िया के निर्देश पर सख्त कार्रवाई की गई।
सूरत ग्रामीण DSP बीके वनारा के नेतृत्व में पुलिस टीम ने गाँव में सर्च ऑपरेशन चलाया। टीम में कई जाँच अधिकारी और पुलिसकर्मी शामिल थे। तलाशी के दौरान संदिग्ध लोगों को पकड़कर कोसंबा पुलिस स्टेशन ले जाया गया। पुलिस ने आधिकारिक तौर पर 22 लोगों की गिरफ्तारी की पुष्टि की है।
जय पटेल ने यह भी आरोप लगाया कि हमलावर पुलिस की मौजूदगी और हथियारों से भी नहीं डरे। उनका कहना है कि रमजान के दौरान पहले भी कोसंबा और सूरत के अन्य इलाकों में इस तरह की घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। उन्होंने आरोपितों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की है।
वहीं, कोसांबा पुलिस स्टेशन के PI ने बताया कि घटना की गंभीरता को देखते हुए तुरंत कार्रवाई की गई। अब तक 22 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है और मामले की जाँच जारी है। FIR में कुल 40 लोगों को नामजद आरोपित बनाया गया है, जबकि कुछ अन्य अज्ञात भी शामिल हैं।
पुलिस ने आरोपितों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की कई धाराओं- 109(1), 121(1), 126(2), 132, 189(4), 190, 191(2), 191(3), 195(1), 221, 296(बी) और 351(3)- के तहत मामला दर्ज किया है। मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई जारी है।
कड़ी कार्रवाई की जाएगी – SP गधिया
इस मामले में सूरत जिला पुलिस प्रमुख राजेश गधिया ने ऑपइंडिया से बातचीत में पुष्टि की है कि 22 आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया है और बाकी बचे आरोपितों की तलाश जारी है।
उन्होंने यह भी बताया कि FIR में ‘अज्ञात व्यक्ति’ के रूप में लिखे गए सभी लोगों के नाम अब सामने आ गए हैं और पुलिस ने इस दिशा में कार्रवाई की है। घटना के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि हथोड़ा गाँव में रात 1:30 से 2 बजे के बीच गौहत्या की सूचना मिलने पर मुखबिर के साथ 6 पुलिसकर्मी गाँव गए।
रात में पुलिसकर्मी बैटरी लाइट की मदद से तलाशी कर रहे थे, तभी अचानक दो बाइकों पर सवार 6 लोग आए और पुलिसकर्मियों से भिड़ गए। इसके बाद उन्होंने करीब 50 और लोगों को बुला लिया। झगड़े के बाद इस भीड़ ने पुलिसकर्मियों और मुखबिर पर जानलेवा हमला कर दिया।
उन्होंने यह भी बताया कि पुलिसकर्मी की शिकायत के आधार पर हत्या के प्रयास, दंगा और कर्तव्य में बाधा डालने का मामला दर्ज किया गया है। फिलहाल, DCP की टीम मामले की जाँच कर रही है। उन्होंने आश्वासन दिया कि कानून को अपने हाथ में लेने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा, FSL की मदद से वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाए जाएँगे और सख्त कार्रवाई की जाएगी।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
गाजियाबाद के लोनी में एक्स मुस्लिम सलीम वास्तिक पर जानलेवा हमला हुआ है। वो दिल्ली के जीटीबी अस्पताल में मौत से जिंदगी के लिए जंग लड़ रहे हैं। सलीम पर हमले की खबर को ऑपइंडिया ने प्रकाशित किया। इसके बाद वो खबर सोशल मीडिया पर भी शेयर की गई। सोशल मीडिया पर खबरों को साझा करना एक स्टैंडर्ड प्रैक्टिस है। हालाँकि ये खबर प्रकाशित होते ही तेजी से पढ़ी जाने लगी, लेकिन जो चौंकाने वाली बात रही, वो ये कि सोशल मीडिया पर जहाँ अधिकतर गैर-मुस्लिमों ने पीड़ित के साथ संवेदना जताई, तो इस्लामी कट्टरपंथियों के लिए ये खुशी की खबर बन गई।
ऑपइंडिया की खबर जब सोशल मीडिया पर शेयर की गई, तो रिएक्शन में चौंकाने वाला पैटर्न सामने आया। फेसबुक पर 3000+ लोगों ने रिएक्शन दिया, जिसमें किसी ने केयर की इमोजी दी, तो किसी ने दुआ माँगी, लेकिन 46 लोग ऐसे रहे, जिनका रिएक्शन बताता है कि वो सलीम पर हमले से बेहद खुश हैं। देखिए-
फेसबुक पर सलीम के हमले के बाद हाहा रिएक्शन का स्क्रीनशॉट
आगे और भी नाम हैं।
फेसबुक पर सलीम के हमले के बाद हाहा रिएक्शन का स्क्रीनशॉट 2फेसबुक पर सलीम के हमले के बाद हाहा रिएक्शन का स्क्रीनशॉट 3
इन 46 में से अधिकतर आईडी मुस्लिमों के नाम से ही बनी हैं। कुछेक हिंदू नाम से लॉक आईडी भी दिख रही हैं। ये हाहा रिएक्शन बढ़ता जा रहा है। समाचार लिखे जाने तक ऐसे रिएक्शनों की बाढ़ आ चुकी है।
इस दौरान कमेंट बॉक्स में बहुत सारे लोगों ने चिंता जताई। महज 2 घंटों में 1200+ रिएक्शन आए, लेकिन इस्लामी पहचान वाली आईडी से दुख की जगह खुशियाँ जताई गई। कुछ रिएक्शन आप भी पढ़ सकते हैं।
सलीम पर हमले के बाद सोशल मीडिया पोस्ट पर आए कमेंट्स
सलीम पर हमले की खबर तेजी से वायरल हो रही है। इसी के साथ खुद रही है उस हमलावर प्रवृत्ति की पोल भी, जो खुद हमले में भले ही शामिल नहीं हुए हों, लेकिन उन पर हमले को खुला समर्थन दे रहे हैं।
ये स्क्रीनशॉट और ये रिएक्शन अपने आप में सबकुछ बयाँ कर दे रहे हैं।
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की पाठ्यपुस्तक में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ पर एक अध्याय शामिल किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट, मुख्य न्यायाधीश सहित उसके जजों और कुछ वकीलों की प्रतिक्रिया से कई सवाल उठते हैं।
पहला- जजों और वकीलों को आठवीं कक्षा के बच्चे के ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ के बारे में जानने, पढ़ने और चर्चा करने पर इतनी आपत्ति क्यों है? दूसरा- क्या न्यायपालिका में भ्रष्टाचार जैसी कोई चीज है ही नहीं? तीसरा- वह संस्था जो हमेशा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्राथमिकता देती है, हमेशा स्वतंत्रता और स्वतंत्र बहस को बढ़ावा देती है, एक अध्याय प्रकाशित होते ही इस पर प्रतिबंध क्यों लगा रही है? कई सवाल हैं, लेकिन पहले हम पूरे के बारे में बता देते हैं।
मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से पाठ्यक्रम में बड़े बदलाव हुए हैं। पहले बच्चों को जो इतिहास पढ़ाया जाता था, वह अधिकतर वामपंथी इतिहासकारों की देन होता था। अन्य विषयों में भी यही स्थिति देखने को मिलती थी। सरकार के आने के बाद से सभी क्षेत्रों में एक समान बदलाव शुरू हुए हैं।
साल 2020 में शिक्षा नीति लागू की गई, जिसके तहत कई बदलाव किए जा रहे हैं। ये बदलाव धीरे-धीरे और चरणबद्ध तरीके से होने चाहिए, किताबें रातोंरात नहीं बदली जा सकतीं। एक बदलाव यह आया कि पहले पाठ्यक्रम में सीधी-सादी बातें लिखी जाती थीं। गाँधी जी को महान क्यों न माना जाए या उन्हें अधिक महत्व क्यों न दिया जाए?
अगर इतिहास में ऐसा कुछ हुआ, तो हुआ, लेकिन हम इसके कारणों पर विस्तार से चर्चा नहीं करते थे। अब बच्चों को इन घटनाओं पर चर्चा करने और एक अलग दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। NCERT ने हाल ही में कक्षा आठवीं की पाठ्यपुस्तक में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ शीर्षक से एक अध्याय जोड़ा है।
इसमें देश की किन-किन कोर्ट में कितने मामले लंबित हैं और आम जनता को इससे किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है, इसकी विस्तृत जानकारी दी गई है। साथ ही इसमें यह भी बताया गया है कि कोर्ट में जजों का व्यवहार कैसा होना चाहिए, ‘आचार संहिता’ क्या है और यदि जज इसका पालन करने में विफल रहते हैं तो क्या व्यवस्था है।
इसमें यह भी जानकारी दी गई है कि यदि आरोप गंभीर हैं तो संसद जजों को बर्खास्त कर सकती है। दरअसल, इंडियन एक्सप्रेस ने इस मुद्दे पर एक लेख प्रकाशित किया, जिसके चलते कपिल सिबल और अभिषेक मनु सिंहवी जैसे वकीलों ने कोर्ट का रुख किया और इसे ‘गंभीर चिंता का विषय’ बताया।
अंततः यह मामला मुख्य जज सूर्यकांत की कोर्ट तक पहुँचा और उन्होंने NCERT की कड़ी आलोचना की। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी कोर्ट इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई शुरू करेगी और NCERT और केंद्र सरकार से जवाब माँगेगी।
दूसरी ओर, एनसीईआरटी ने पीछे हटते हुए पुस्तक वापस ले ली। जिन लोगों को प्रतियाँ बेची गई थीं, उनसे भी प्रतियाँ वापस मंगाई गईं। अगले दिन अदालत में स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई शुरू हुई और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र की ओर से माफी भी माँगी। बाद में अदालत ने आदेश पारित कर पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया और कहा कि इसकी सभी भौतिक और डिजिटल प्रतियाँ प्रतिबंधित की जानी चाहिए।
यह कार्रवाई 24 से 48 घंटों के भीतर की गई। यदि माननीय न्यायाधीशों ने अन्य मामलों में भी इतनी ही तेजी दिखाई होती, तो एनसीईआरटी की पुस्तक में उल्लिखित लंबित मामलों की संख्या में काफी कमी आ जाती!
कोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट के जजों ने ने इस पूरी घटना को न्यायपालिका पर ‘सोची-समझी साजिश’ करार दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोर्ट इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करता है, तो इससे जनता, विशेषकर युवाओं के मन में न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुँचेगी।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “इस मामले में न्यायपालिका की महत्वपूर्ण भूमिका को नजरअंदाज किया गया है, जिसके तहत उसने संविधान की मूलभूत संरचना के सिद्धांतों की रक्षा की है। यह एक गंभीर मामला है क्योंकि इसी कोर्ट ने भ्रष्टाचार, पद के दुरुपयोग और सार्वजनिक धन के दुरुपयोग के लिए कई उच्च पदस्थ अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की है।”
हालाँकि कोर्ट ने कहा कि यह आत्म-विश्लेषण अभ्यास किसी वास्तविक आलोचना या न्यायिक समीक्षा के अधिकार को दबाने के लिए शुरू नहीं किया गया था और उसका मानना है कि स्वतंत्र और गंभीर बहस से संस्थाएँ मजबूत होती हैं। कोर्ट ने तर्क दिया कि यह हस्तक्षेप शिक्षा की गरिमा बनाए रखने के लिए किया गया था।
छात्रों को इतनी कम उम्र में, जब वे सार्वजनिक जीवन और संस्थाओं की समझ विकसित कर रहे होते हैं, एकतरफा दृष्टिकोण देना उचित नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर गंभीर परिणामों और नकारात्मक प्रभाव को देखते हुए, ऐसा आचरण आपराधिक अवमानना की श्रेणी में आ सकता है और यदि जानबूझकर किया गया हो, तो यह न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप के बराबर होगा और संस्था की गरिमा का अपमान करने के समान होगा।
क्या न्यायपालिका में भ्रष्टाचार नहीं है?
पाठ में इस्तेमाल किए गए बोल्ड शब्दों और गंभीरता को देखते हुए ऐसा लग सकता है कि NCERT और शिक्षा मंत्रालय ने कोई बड़ा अपराध किया है, लेकिन उनका एकमात्र ‘अपराध’ यह था कि उन्होंने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में बात करना शुरू कर दिया, जो अब तक नहीं हो रहा था और वह भी पाठ्यपुस्तक में।
अगर न्यायपालिका में भ्रष्टाचार जैसी कोई चीज न होती, जजों के आचरण की कभी जाँच न हुई होती, जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार की कोई शिकायत न होती और NCERT ने मनगढ़ंत बातों से पाठ्यपुस्तक में एक अध्याय जोड़ दिया होता, तो सुप्रीम कोर्ट के इन शब्दों का महत्व होता।
अगर न्यायपालिका में भ्रष्टाचार जैसी कोई चीज न होती, तो कुछ महीने पहले दिल्ली हाई कोर्ट के एक पूर्व जज के घर से नकदी मिलने का क्या मामला था? आज तक यह पता क्यों नहीं चल पाया है कि यह पैसा किसका था और वहाँ कैसे पहुँचा? अगर समस्या मौजूद है, तो इस पर चर्चा क्यों नहीं होती?
हम वर्षों से राजनीति और व्यापार में भ्रष्टाचार का अध्ययन कर रहे हैं, इस समस्या पर लगातार चर्चा हो रही है और राजनेताओं से सवाल पूछे जा रहे हैं। समस्या का सही निदान तभी होता है जब उस पर पहली बार चर्चा की जाती है। चर्चा शुरू करने के लिए पाठ्यपुस्तकों से बेहतर कोई माध्यम या साधन नहीं है।
ऐसा नहीं है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के मामले नहीं हुए हैं और इसकी कोई गारंटी नहीं है कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा। ऐसा भी नहीं है कि यह पूरी तरह से स्वच्छ संस्था है, इसलिए इस पर चर्चा होनी चाहिए। मूल मुद्दा यह है कि वर्षों से भ्रष्टाचार की परिभाषा राजनीति, नौकरशाही और पुलिस विभागों आदि के इर्द-गिर्द घूमती रही है और जज हमेशा इससे बचते रहे हैं।
यदि कोई सवाल उठाता है, चर्चा करता है या आलोचना करता है, तो ‘न्यायालय की अवमानना’ का हथियार हमेशा तैयार रहता है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि न्यायपालिका भ्रष्टाचार से अछूती रही है। पहली बार NCERT ने संविधान के संरक्षक माने जाने वाले सर्वोच्च निकाय को इस दायरे में लाया है और संपूर्ण न्यायिक व्यवस्था ने इसका विरोध किया है।
भारतीय न्यायपालिका में सिर्फ एक नहीं, कई समस्याएँ
आपत्ति उठाना, किताबों पर प्रतिबंध लगाना समस्या का समाधान नहीं है। भारतीय न्यायपालिका में यही एकमात्र समस्या नहीं है। अतीत में कॉलेजियम प्रणाली को समाप्त करने के लिए, जहाँ जज बंद दरवाजों के पीछे बैठकर जजों की नियुक्ति करते थे, सरकार ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NGAC) के लिए एक अधिनियम बनाया था, लेकिन इसी सुप्रीम कोर्ट ने इसे ‘असंवैधानिक’ करार देते हुए रद्द कर दिया।
आज जज ही जजों की नियुक्ति करते हैं और केवल सूचना देने के लिए सामने आते हैं। किसे नियुक्त किया गया और किस कारण से, यह जानकारी न तो आम जनता को दी जाती है और न ही सरकार को। कोर्ट की अवमानना का प्रावधान आवश्यक है क्योंकि कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन करने पर कार्रवाई का विकल्प खुला होना चाहिए।
लेकिन यदि जजों की आलोचना करने, उनके आदेशों की आलोचना करने या कोर्ट की आलोचना करने पर अवमानना के मामले दर्ज होते रहते हैं, तो इससे किसी भी संस्था की गरिमा कम हो जाती है। विशेष रूप से ऐसी संस्था के लिए जो अन्य मामलों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों की बात करती है।
देश भर में राजनेताओं के लिए अपनी आय और संपत्ति घोषित करने की व्यवस्था है , जजों के लिए नियम यह है कि वे चाहें तो ऐसा कर सकते हैं और यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो कोई समस्या नहीं है, कोई दबाव नहीं है। अगर इस पर चर्चा शुरू भी होती है, तो लंबी छुट्टियों का मुद्दा भी सामने आ जाता है।
कौन सा अस्पताल या पुलिस स्टेशन दो या तीन महीने तक पूरी तरह से कम कर्मचारियों के साथ काम करेगा, सिर्फ इसलिए कि उसके डॉक्टरों या पुलिस अधिकारियों को छुट्टी पर जाना है? देश की कई कोर्टों में अनगिनत मामले लंबित हैं, कई मामले आते रहते हैं, जिनमें निपटारे में दशकों लग जाते हैं।
प्रक्रिया में देरी के कारण लोगों को वर्षों तक न्याय नहीं मिल पाता। सुप्रीम कोर्ट में मामलों की सुनवाई होना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है, लेकिन कुछ वकील हर तीसरे दिन मामले लेकर वहाँ पहुँचते हैं और मामले सूचीबद्ध भी हो जाते हैं। अगर हम बैठकर चर्चा करें तो कई ऐसी समस्याएँ हमारे सामने आएँगी।
एक तरफ तो सुप्रीम कोर्ट कहता है कि उसे जायज आलोचना से कोई आपत्ति नहीं है, वहीं दूसरी तरफ वह ऐसे अध्यायों पर प्रतिबंध लगा रहा है।
इसका कारण शिक्षा की गरिमा को बनाए रखना बताया जाता है। कोर्ट की अवमानना का जोखिम उठाते हुए भी, हम कहना चाहेंगे कि ये तर्क बचकाने, नासमझ और हास्यास्पद हैं और अब हम यह भी मान लें कि कोर्ट में भ्रष्टाचार जैसी कोई चीज नहीं है। अगर कोई पूछे कि जज के घर में नकदी मिलने की घटना क्या थी? तो हम कहेंगे कि यह तो मंगल ग्रह पर हुई थी!
(यह रिपोर्ट मूल रुप से गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
प्रोपेगेंडा पत्रकार आरफा खानम शेरवानी एक बार फिर अपने ही बुने हुए जाल में बुरी तरह फँस गई हैं। नोएडा की एक पॉश सोसाइटी में मंदिर निर्माण के सीधे-साधे मुद्दे को ‘सांप्रदायिक’ रंग देने और अपना पुराना ‘मुस्लिम विक्टिम कार्ड’ चमकाने पहुँची आरफा को वहाँ की जागरूक हिंदू महिलाओं ने ऐसा करारा जवाब दिया कि उन्हें वहाँ से उल्टे पाँव भागना पड़ा।
आरफा, जो हिंदू महिलाओं को ‘गैसलाइट’ करने और उन्हें अपराधी जैसा महसूस कराने गई थीं, खुद ट्रोल होकर लौटी हैं। इस पूरी घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि आरफा खानम की पत्रकारिता का मकसद जमीन की हकीकत दिखाना नहीं, बल्कि हर मुद्दे में बीजेपी, RSS और मुस्लिम एंगल घुसाकर समाज में दरार पैदा करना है।
वीडियो की हकीकत: आरफा के ‘मस्जिद कार्ड’ पर महिलाओं का जवाब
सोशल मीडिया पर आरफा खानम का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वे नोएडा के सेक्टर 15ए की महिलाओं से बातचीत कर रही हैं। इस वीडियो में महिलाओं अपनी माँग को बताती है कि उन्हें मंदिर सोसाइटी में चाहिए, जिससे काफी दूर आना-जाना, ट्रैफिक में फँसना बंद हो जाएगा और बुजुर्गों के लिए सुविधा हो जाएगी। इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि कोई भी महिला आरफा से ना तो बदतमीजी से बातचीत कर रही है, ना ही तेज आवाज में चिल्ला रही है और ना ही धक्का-मुक्की कर रही हैं।
आरफा ने जितने भी सवाल वहाँ खड़ी हिंदू महिलाओं से पूछे है उनके जवाब उन्हें बेहद शांतिपूर्ण तरीके से मिला है। अपना मुस्लिम और मस्जिद विक्टिम कार्ड घुसाने पर भी महिलाओं ने उन्हें ये ही कहाँ है कि आप अपना एजेंडा यहाँ मत लाओ। मंदिर की बात है, मंदिर तक रहने दो। वीडियो में आप सुन सकते हैं कि जब मंदिर की माँग ज्यादा कर रही लोगों की तादाद ज्यादा थी, तो प्रोपेगेंडाई पत्रकार आरफा ने मस्जिद बनवाने पर भी सवाल कर डाला। आरफा महिलाओं से कहने लगी कि फिर तो मस्जिद भी बनना चाहिए।
HUGE 🚨 Victim Hindu Women confront Arfa Khanum Sherwani
ARFA: How Noida Authority can declare park a Hindu Religious Site?
इस सवाल का जवाब महिलाओं ने बेहत लहजे से दिया कि जब सोसाइटी में 99.99 प्रतिशत हिंदू लोग है तो मस्जिद बनवाना या ना बनवाना कहाँ से आ जाता है। फिर आरफा ने महिलाओं की तादात को ‘मेजोरिटिज्म’ शब्द से नवाजा, जिसका जवाब भी हिंदू महिलाओं ने बेहद तरीके और करारा दिया। वहाँ खड़ी एक हिंदू महिला ने आरफा को कहा- “हमें ऐसा लग रहा है कि अपने ईश्वर का नाम लेने में क्रिमिनल करार दिया जा रहा है।”
महिला ने आरफा को सीधा मुँह यह भी जवाब दिया कि यह महीने आज से 40 साल पहले नोएडा के मास्टर प्लान में मंदिर के लिए डेजिग्नेटिड यानि नामित थी। 40 साल पहले इतना ट्रैफिक नहीं हुआ करता था और लोग आसानी से दूर मंदिर जा सकते हैं। लेकिन आज ट्रैफिक बढ़ रहा है, समय नहीं है, लोग बुजुर्ग है, कुछ दिव्याँग है, तो कुछ लोगों के पास गाड़ी चलाने के लिए ड्राइवर नहीं है कि वह उन्हें मंदिर तक ले जाए।
वहाँ खड़ी एक महिला ने तो साफ कहा कि इसमें सरकार का कोई रोल नहीं है, ये हम लोगों की माँग है। इसके अलावा भी आरफा को हिंदू महिलाओं ने उनके कट्टरपंथी एजेंडे पर काफी बढ़िया जवाब दिया है, जिसे आप वीडियो में सुन सकते हैं। महिलाओं ने आरफा को ये ही कहा कि आप अपने एजेंडा यहाँ मत थोपिए… महिलाओं ने साफ कहा कि हमें पता है आपका एजेंडा क्या होता है, आप एक Biased साइड के लिए रिपोर्टिंग करती है। सोशल मीडिया पर भी नेटिजन्स ने आरफा के इस वीडियो पर काफी हँसी उड़ाई। कुछ लोगों ने लिखा कि जनता अब नफरत भरे एजेंडे पर यकीन नहीं कर रही है। अब जनता झगड़े के बजाय फैक्ट्स पर यकीन कर रही है।
The Wire का खेल: एडिटिंग का मायाजाल और फर्जी हेडलाइन
जब ग्राउंड पर आरफा का एजेंडा बुरी तरह फेल हो गया, तो उनके संस्थान ‘The Wire’ ने डैमेज कंट्रोल के लिए अपने यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो डाला। इस वीडियो का टाइटल दिया गया- ‘मंदिर का समर्थन पर ‘लोकतंत्र’ से समस्या, उग्र महिलाओं ने आरफ़ा के साथ की धक्का-मुक्की’।
इस टाइटल और वीडियो की एडिटिंग को गौर से देखें तो ‘The Wire’ का प्रोपेगेंडा बेनकाब हो जाता है। वीडियो की शुरुआत में ही आरफा इसे ‘अमीर लोगों की सोसाइटी’ और ‘BJP वोटर्स’ का गढ़ बताकर नफरत फैलाना शुरू कर देती हैं। वे कहती हैं कि उत्तर प्रदेश के चुनाव पास हैं और RSS पूरी हरकत में आ गई है, हमारे समाज का हिंदूकरण कम पड़ गया था जो अब घर तक मंदिर की बात आ गई है।”
आरफा ने जानबूझकर इसे ‘RSS का प्रोजेक्ट’ करार दिया और अपने दर्शकों से कहा कि ‘आप 100 साल के RSS को देख रहे हैं कि वे कैसे घुसपैठ कर रहे हैं।’ ‘The Wire’ ने वीडियो को इस तरह से काट-छाँट कर पेश किया है ताकि हिंदू महिलाएँ ‘उग्र’ दिखें, जबकि असल में आरफा खुद महिलाओं को उकसा रही थीं और उन्हें अपराधी साबित करने पर तुली हुई थीं। वीडियो में कहीं भी वह धक्का-मुक्की नहीं है जिसका दावा हेडलाइन में किया गया है। लेकिन आरफा अपनी आदत के मुताबिक ‘डोंट टच मी’ कहकर खुद को पीड़ित दिखाने का नाटक करती रहीं।
क्या है पूरा मामला? क्यों हो रही है मंदिर की माँग?
नोएडा के सेक्टर 15A का यह पूरा मामला कोई सांप्रदायिक विवाद नहीं, बल्कि वहाँ रहने वाले लोगों की बुनियादी सुविधा और उनके अधिकारों का मामला है। इस सोसाइटी में रहने वाले लगभग 99 प्रतिशत से ज्यादा हिंदू लोग चाहते हैं कि उनकी सोसाइटी के भीतर एक मंदिर बन जाए। इसके पीछे बहुत ही साधारण वजहें हैं।
पहली वजह यह है कि सोसाइटी के पास कोई मंदिर नहीं है, जिसके कारण बुजुर्गों को पूजा-पाठ के लिए काफी लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। दूसरी समस्या ट्रैफिक और जाम की है, मुख्य मंदिर दूर होने की वजह से लोगों को घंटों जाम में फँसना पड़ता है, जिससे समय और ऊर्जा दोनों की बर्बादी होती है। साथ ही, वहाँ की महिलाओं का कहना है कि 40 साल पहले जब इस इलाके का नक्शा बना था, तभी यह जमीन मंदिर के लिए ही तय की गई थी।
लेकिन इस सीधी-सादी माँग को पत्रकार आरफा खानम ने एक अलग ही रंग दे दिया। उन्हें इसमें ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने की साजिश और जमीन हड़पने जैसा गंभीर मामला नजर आने लगा। उन्होंने सोशल मीडिया पर इसे एक खतरे की घंटी (वेक-अप कॉल) बताया। जबकि हकीकत यह है कि वहां के निवासी सिर्फ अपनी ही जमीन पर अपनी आस्था और सुविधा के लिए मंदिर बनवाना चाहते हैं, जो उनका अधिकार है।
After visiting Sec 15A, Noida and seeing how a thriving public park is being pushed toward conversion into a temple, I’m convinced that “Hindu Rashtra” is nothing but a convenient cover for land grabs and power consolidation. Many residents are opposing. It is definitely a…
आरफा खानम की पूरी रिपोर्टिंग का मकसद यह था कि सेक्टर 15A को ‘RSS की प्रयोगशाला’ साबित किया जाए। उन्होंने जानबूझकर बातचीत में नरेंद्र मोदी और BJP को घुसाया ताकि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘मैजोरिटी टेररिज्म’ का नैरेटिव सेट कर सकें। वे वहाँ रिपोर्टिंग करने नहीं, बल्कि महिलाओं को डराने और उन्हें ‘अलोकतांत्रिक’ साबित करने गई थीं।
आरफा खानम वही चेहरा हैं जिन्होंने शाहीन बाग के समय मुस्लिमों को सलाह दी थी कि ‘विचारधारा न बदलें, बस रणनीति बदलें।’ नोएडा में भी वे इसी ‘रणनीति’ के साथ आई थीं, पहले निष्पक्ष पत्रकार होने का ढोंग करना और फिर धीरे से ‘मस्जिद’ और ‘मुस्लिम अधिकार’ का रोना रोकर हिंदुओं को दबाना।
लेकिन नोएडा की इन महिलाओं ने उनकी इस चाल को भांप लिया और उन्हें साफ कह दिया ‘अपना एजेंडा यहाँ मत चलाइए।’ जब आरफा का ‘मुस्लिम विक्टिम कार्ड’ नहीं चला, तो वे आक्रामक हो गईं और बाद में सोशल मीडिया पर झूठ फैलाने लगीं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऐतिहासिक इजरायल यात्रा ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। जहाँ भारत और इजरायल व्यापार से लेकर रक्षा तक कई क्षेत्रों में अपनी साझेदारी मजबूत कर रहे हैं, वहीं ‘फ्री फिलिस्तीन’ इस्लामी-वामपंथी गिरोह इससे बुरी तरह तिलमिला गया है।
इस्लामवादियों, दिखावटी ‘सेक्युलर’ नेताओं, वामपंथी प्रचार मंचों और तथाकथित बुद्धिजीवियों सभी ने बिना सोचे-समझे पीएम मोदी के इजरायल दौरे और कनेसेट में संबोधन की निंदा शुरू कर दी है। इसी क्रम में प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल की सह-जनरल कोऑर्डिनेटर वर्षा गंडिकोटा-नेल्लुतला ने पीएम मोदी को ‘राष्ट्र-विरोधी’’ तक कह दिया।
उन्होंने 25 फरवरी 2026 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा, “हमारे खूबसूरत देश का नाम खून से सने कनेसेट में लिखना सबसे बड़ा राष्ट्र-विरोधी काम है।”
गौरतलब है कि 25 फरवरी 2026 को पीएम मोदी ने इजरायल की संसद कनेसेट को संबोधित किया। पीएम मोदी ने हमास द्वारा 7 अक्टूबर 2023 को किए गए आतंकी हमले की कड़ी निंदा करते हुए कहा, “हम आपके दर्द को महसूस करते हैं। भारत पूरी मजबूती से इजरायल के साथ खड़ा है। निर्दोष नागरिकों की हत्या को जायज नहीं ठहराया जा सकता।”
अंत में पीएम मोदी को ‘स्पीकर ऑफ द कनेसेट मेडल’ से सम्मानित किया गया, जो कनेसेट द्वारा दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान है।
वर्षा गंडिकोटा-नेल्लुतला, प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल और न्यूजक्लिक कनेक्शन
वर्षा गंडिकोटा प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल (PI) की सह-जनरल कोऑर्डिनेटर हैं। यह एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है जो दुनियाभर में वामपंथी कार्यकर्ताओं और समूहों को एकजुट करता है। इसके वेबसाइट के अनुसार, “प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल मई 2020 में दुनिया की प्रगतिशील ताकतों को संगठित करने के उद्देश्य से शुरू हुआ।”
वर्षा इस संगठन में ‘ब्लू प्रिंट’ पॉलिसी वर्क और द हेग ग्रुप का नेतृत्व करती हैं। यह संगठन खुले तौर पर इजरायल विरोधी और फिलिस्तीन समर्थक एजेंडा चलाता है, यहाँ तक कि हमास जैसे आतंकी संगठन की हिंसा को भी कमतर दिखाता है। इसकी वेबसाइट पर मोदी सरकार और हिंदुओं के खिलाफ कई आपत्तिजनक प्रचार लेख मौजूद हैं।
2023 में हरियाणा के नूंह में दंगाइयों के घरों पर बुलडोजर कार्रवाई को इस संगठन ने ‘भारत के लोकतंत्र का ध्वंस’ बताया था, जिस बयान पर जेरेमी कॉर्बिन और जारा सुल्ताना जैसे इस्लामवादी नेताओं के हस्ताक्षर थे। ‘नेकेड हिंदू सुप्रीमिज्म’ हेडलाइन वाली ऐसी ही एक रिपोर्ट में प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल ने मुस्लिमों को पीड़ित दिखाने के लिए हिंदुओं को बदनाम किया।
प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल लगातार हिंदुओं, हिंदुत्व, भाजपा-RSS और मोदी सरकार को बदनाम करता रहा है। मणिपुर संकट पर लिखे एक लेख में, प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल ने ‘हिंदू राष्ट्रवादियों’ को दोषी ठहराते हुए उन पर ‘सर्वोच्चता’ का युद्ध छेड़ने का आरोप लगाया।
प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल में हर्ष मंदर जैसे लोग परिषद सदस्य हैं। मंदर ने हिंदुत्व और उससे जुड़े हिंदुओं को बदनाम करने वाले कई लेख लिखे हैं। ऐसे ही एक लेख में, जिसका शीर्षक था, क्या भारत नरसंहार की ओर बढ़ रहा है?, मंदर ने ग्रेगरी स्टैंटन का हवाला देते हुए झूठा दावा किया कि भारत में मुस्लिमों का नरसंहार हो सकता है।
गौरतलब है कि हर्ष मंदर ने बतौर IAS लगभग दो दशकों तक काम किया था और 2002 में गुजरात में हुए ‘राज्य प्रायोजित दंगों’ के विरोध में उन्होंने सेवा से इस्तीफा दे दिया था। पद से इस्तीफा देने के बाद, मंदर ने सोनिया गाँधी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में काम किया, जिसने हिंदू विरोधी सांप्रदायिक हिंसा विधेयक का मसौदा तैयार किया था।
मैंडर ने सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज के निदेशक के रूप में भी कार्य किया है, जिसे ईसाई इंजीलवादी संगठनों से फंड प्राप्त हुआ था और उन्होंने अतीत में खुले तौर पर धार्मिक धर्मांतरण का समर्थन किया है। हर्ष मंदर का लेख, जो मुस्लिमों में पीड़ित होने की भावना को भड़काने के उद्देश्य से लिखा गया था, पाकिस्तान के पूर्व पीएम इमरान खान द्वारा साझा किया गया था।
उन्होंने 2018 में प्रकाशित अपने लेख में लिखा था, “आज मुस्लिम लगभग हर राजनीतिक दल के लिए बेघर और बेसहारा हैं। यह स्थिति तब है जब भारत दुनिया के दसवें हिस्से के मुस्लिमों का घर है, लगभग 18 करोड़ लोग, जो इसे इंडोनेशिया और पाकिस्तान के बाद सबसे बड़ा मुस्लिम देश बनाता है। भारत में मुस्लिम होना कभी इतना कठिन नहीं रहा, भारत के विभाजन के बाद के तूफानी महीनों के बाद से तो बिल्कुल भी नहीं।”
हर्ष मंदर, इशरत का भी एक जाना-माना समर्थक है, जो आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की महिला काडर थी। इशरत को 3 साथियों के साथ गुजरात क्राइम ब्रांच ने मुठभेड़ में ढेर कर दिया। हर्ष मंदर उन 40 ‘कार्यकर्ताओं’ में से एक था जिन्होंने अयोध्या फैसले के खिलाफ कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की थी।
हर्ष मंदर उस ग्रुप का भी हिस्सा है, जिसने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के खिलाफ भी याचिका दायर की है। मंदर ने CAA विरोधी प्रदर्शनों के दौरान मुस्लिमों को दंगा भड़काने के लिए भी उकसाया था। उसका नाम दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में भी बार-बार आया है।
खैर, हर्ष मंदर की तरह ही प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल की परिषद में पूर्व JNU प्रोफेसर और इस्लामी आतंकवादी अफजल गुरु की प्रशंसक जयति घोष भी शामिल हैं।
2016 में घोष ने आतंकवादी अफजल गुरु की मौत की सजा के विरोध में आयोजित प्रदर्शनों को दबाने के लिए मोदी सरकार की आलोचना की थी। इसके अलावा घोष का नाम सीताराम येचुरी और योगेंद्र यादव के साथ 2020 के दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों के पूरक आरोप पत्र में भी शामिल है।
प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल की कार्यकारी संस्था ‘कैबिनेट’ में ब्रिटेन की लेबर पार्टी के पूर्व नेता जेरेमी कॉर्बिन शामिल हैं। कॉर्बिन विवादों में घिरे रहते हैं। 2023 में पियर्स मॉर्गन के साथ एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने हमास को आतंकवादी संगठन मानने से इनकार कर दिया था।
2009 में जेरेमी कॉर्बिन ने कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों हिजबुल्लाह और हमास से जुड़े आतंकवादियों को ब्रिटेन की संसद में आमंत्रित किया था। इससे पहले, कॉर्बिन ने ‘फ्री रियाज एंड कय्यूम कैंपेन’ का समर्थन किया था, जिसका उद्देश्य भारतीय राजनयिक रविंद्र म्हात्रे के अपहरण और हत्या के दोषी मोहम्मद रियाज और अब्दुल कय्यूम राजा को जेल से रिहा कराना था।
2022 में कॉ़न्ग्रेस नेता राहुल गाँधी की विवादास्पद ब्रिटेन यात्रा के दौरान कॉर्बिन की उनके साथ तस्वीर खींची गई थी। कॉर्बिन से मुलाकात को लेकर भारी विवाद खड़ा हुआ था, क्योंकि पूर्व लेबर नेता का कश्मीरी अलगाववादी विचारों का समर्थन करने, जम्मू कश्मीर पर पाकिस्तान के रुख से सहमत होने और भारत के आंतरिक मामलों में अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की माँग का समर्थन करने का इतिहास रहा है।
गौरतलब है कि PI के ‘मानद’ सलाहकार सदस्यों में नोआम चोम्स्की और न्यूजक्लिक से जुड़े मार्क्सवादी पत्रकार विजय प्रसाद जैसे लोग शामिल हैं। प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल में पहले विजय प्रसाद परिषद के सदस्य थे। वे प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल की संस्थापक अंतरिम परिषद का हिस्सा थे।
विजय प्रसाद नेविल रॉय सिंघम द्वारा वित्तपोषित वामपंथी नेटवर्क में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। सिंघम ने पीपुल्स डिस्पैच सहित विभिन्न चीन समर्थक और भारत विरोधी प्रचार माध्यमों में लाखों डॉलर का निवेश किया है। यहाँ विजय प्रसाद ने प्रचार संबंधी लेख लिखे हैं।
पीपुल्स डिस्पैच एक मीडिया पोर्टल है जो खुद को एक ‘अंतरराष्ट्रीय मीडिया परियोजना’ बताता है जिसका मिशन दुनिया भर के जन आंदोलनों और संगठनों की आवाजों को दुनिया के सामने लाना है। जनवरी 2020 के एक लेख में, प्रसाद ने JNU प्रदर्शनकारियों के प्रति सहानुभूति व्यक्त की और मोदी सरकार की कड़ी आलोचना की।
न्यूजक्लिक का हिंदू-विरोधी पूर्वाग्रह किसी से छिपा नहीं है। इसके अलावा न्यूजक्लिक पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) से कथित संबंधों को लेकर भी जाँच चल रही है। 2023 में न्यूयॉर्क टाइम्स की एक जाँच में कार्यकर्ता संगठनों, गैर-लाभकारी संस्थाओं, फर्जी कंपनियों और चीनी प्रचार से उनके घनिष्ठ संबंधों का खुलासा हुआ, जिसका नेतृत्व नेविल रॉय सिंघम कर रहे थे।
2024 में दिल्ली पुलिस द्वारा दायर आरोपपत्र में चीनी सरकार को ‘अंतिम धनदाता’ बताया गया, जिसके माध्यम से भारत-विरोधी विचारों, विशेष रूप से कश्मीर और किसानों के विरोध प्रदर्शनों को भड़काने के लिए धन भेजा गया था। यह मामला अभी अदालत में चल रहा है।
साल 2021 में ही OpIndia ने NewsClick के संबंधों की विस्तृत जाँच की और खुलासा किया कि यह कई ऐसे व्यक्तियों से जुड़ा हुआ था जो नियमित रूप से भारत के खिलाफ जहर उगलते हैं, जिनमें शहरी नक्सली, तीस्ता सेतलवाद, अभिसार शर्मा और कई अन्य शामिल हैं। OpIndia की वह रिपोर्ट यहाँ पढ़ी जा सकती है।
प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल के टाइड्स फाउंडेशन से संबंध
प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल की वेबसाइट के अनुसार, इसके 70 से अधिक संगठन सदस्य हैं। इनमें हमास समर्थक समूह अरब रिसोर्स एंड ऑर्गेनाइजिंग सेंटर भी शामिल है, जिसे टाइड्स फाउंडेशन फंडिंग करती है।
दिलचस्प बात यह है कि OpIndia ने पहले ही टाइड्स फाउंडेशन और न्यूजक्लिक के बीच संबंधों का पता लगाया था। टाइड्स फाउंडेशन कई हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी संगठनों और तत्वों को वित्तपोषण देने के लिए कुख्यात है। इस फाउंडेशन ने हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स (HfHR) को अनुदान दिया था, जिसके इस्लामवादियों और खालिस्तानियों से संबंध हैं।
इस फाउंडेशन का गठन 2019 में दो इस्लामवादी समर्थक समूहों, इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) और ऑर्गेनाइजेशन फॉर माइनॉरिटीज ऑफ इंडिया (OFMI) द्वारा किया गया था। टाइड्स ने अमन पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट को भी वित्त पोषित किया था। यह ट्रस्ट न्यूजक्लिक-चीन फंडिंग घोटाले से जुड़ा है।
वर्षा गंडाकोटी का हिंदुत्व विरोधी और हमास समर्थक दृष्टिकोण
हमास को नॉन-स्टेट एक्टर बताकर वर्षा लगातार इस फिलिस्तीनी इस्लामी आतंकी गुट का बचाव करती रही हैं। जबकि हमास की विचारधारा साफ है कि इजरायल वक्फ की संपत्ति है, यानी मुसलमानों की और वो आखिरी यहूदी को धरती से खत्म करने तक संघर्ष करता रहेगा। हमास यही कर भी रहा है।
इस्लामी-वामपंथी लंबे समय से हिंदुत्व को बदनाम करते आ रहे हैं। वर्षा ने भी पहले हिंदुत्व की तुलना जायोनिज्म से की थी। हालाँकि वर्षा के समर्थकों के अनुसार जायोनिज्म एक नरसंहारवादी विचारधारा है, लेकिन उन्होंने कभी यह स्पष्ट नहीं किया कि यदि हिंदुत्व जायोनिज्म की तरह ही है, तो ‘हिंदू राष्ट्रवादियों’ ने वास्तव में कौन सा नरसंहार किया है।
इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि फिलिस्तीन और इस्लामी आतंकवादी समूह हमास का समर्थन करने वाली वर्षा पहलगाम हमले के बाद मई 2025 में भारत द्वारा पाकिस्तान में इस्लामी आतंकवादी ठिकानों पर किए गए हमले से नाराज थीं। उसने लिखा, “आज भारत में एक भी युद्ध-विरोधी राजनीतिक नेता का न दिखना चिंताजनक है।”
वर्षा का सोशल मीडिया और प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल में उनका काम मुख्य रूप से इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष और गाजा में कथित ‘नरसंहार’ के इर्द-गिर्द घूमता है। वर्षा प्रोग्रेसिव इंटरनेशल द्वारा बनाए गए ‘द हेग’ ग्रुप की एक्टिंग चेयर (अंतरिम मुखिया) भी है, जिसका काम ही है इजरायल की कार्रवाई को नरसंहार घोषित करना। ऐसे में वो इजरायल की आत्मरक्षा हर की कार्रवाई को गाजा के मुस्लिमों नरसंहार तो घोषित करती ही है, लेकिन पाकिस्तान और बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओं पर किए जा रहे अत्याचारों के खिलाफ कभी मुँह नहीं खोलती।
वर्षा वामपंथी प्रचार प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द वायर’ पर भी लगातार आर्टिकल लिखती रही है, जिसमें अधिकतर कंटेंट हिंदुओं, राष्ट्रवादियों और इजरायल के खिलाफ है।
(यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
रमजान के महीने के बीच डूरंड लाइन पर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया है। गुरुवार (26 फरवरी) रात से जारी इस खूनी संघर्ष में तालिबान ने 55 पाकिस्तानी फौजियों को मार गिराने और 19 सैन्य चौकियों पर कब्जा करने का दावा किया है। अफगानिस्तान का कहना है कि यह कार्रवाई पाकिस्तान द्वारा किए गए हवाई हमलों के जवाब में की गई है।
वहीं, बुरी तरह घिरे पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने अपनी विफलता का ठीकरा भारत पर फोड़ते हुए तालिबान को ‘भारत का प्रॉक्सी‘ करार दिया है। इस टकराव ने दोनों देशों के बीच तनाव को चरम पर पहुँचा दिया है।
पाकिस्तान ने इन दावों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि उसके सिर्फ दो फौजी मारे गए हैं और 36 अफगान लड़ाके मारे गए हैं। दोनों देशों के दावे एक-दूसरे से बिल्कुल उलट हैं। अफगानिस्तान के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह सैन्य कार्रवाई गुरुवार (26 फरवरी 2026) की रात शुरू हुई, जो इस्लामी कैलेंडर के अनुसार 9 रमजान 1447 के दिन थी।
अफगानिस्तानी मंत्रालय ने कहा कि कुछ दिन पहले पाकिस्तानी फौज ने अफगान क्षेत्र का उल्लंघन करते हुए मिसाइल और हवाई हमले किए थे, जिनमें महिलाएँ और बच्चे मारे गए थे। इसी के जवाब में तालिबान बलों ने पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी अफगानिस्तान के पक्तिका, पक्तिया, खोस्त, नंगरहार, कुनार और नूरिस्तान प्रांतों से लगे डूरंड लाइन के पार समन्वित जवाबी हमले किए।
#Breaking Spokesperson of the Islamic Emirate of Afghanistan, Zabihullah Mujahid, says that operations have also begun in Kandahar and Helmand along the hypothetical Durand Line against security posts of Pakistan’s military regime.
अफगान रक्षा मंत्रालय के बयान के अनुसार, करीब चार घंटे चली इस लड़ाई में तालिबान बलों ने पाकिस्तान के दो सैन्य अड्डों और 19 चौकियों पर कब्जा कर लिया, जबकि चार अन्य चौकियों से पाकिस्तानी फौजी भाग खड़े हुए। मंत्रालय ने दावा किया कि इस दौरान 55 पाकिस्तानी फौजी मारे गए, कई को जिंदा पकड़ा गया।
Hamdullah Fitrat, deputy spokesperson for the Islamic Emirate, has said that along the hypothetical Durand Line, one headquarter and 19 checkposts of Pakistan’s military regime have so far been captured by Afghan forces in various provinces.
वहीं कुछ शव अफगानिस्तान लाए गए और भारी मात्रा में हथियार, गोला-बारूद भी जब्त किए गए हैं। एक पाकिस्तानी टैंक को नष्ट करने और एक सैन्य परिवहन वाहन को कब्जे में लेने का भी दावा किया गया। तालिबान ने माना कि 8 तालिबान लड़ाके मारे गए और 11 घायल हुए।
तालिबान का आरोप: काबुल, कंधार और पक्तिया पर हवाई हमले
तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा, “कायर पाकिस्तानी फौजियों ने काबुल, कंधार और पक्तिया के कुछ इलाकों में हवाई हमले किए हैं, सौभाग्य से अब तक किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है।”
The cowardly Pakistani military has carried out airstrikes in certain areas of Kabul, Kandahar, and Paktia; fortunately, there have been no reported casualties.
— Zabihullah (..ذبـــــیح الله م ) (@Zabehulah_M33) February 26, 2026
प्रवक्ता जबीहुल्लाह ने कहा कि इन हमलों के बाद अफगान बलों ने कड़ी जवाबी कार्रवाई की। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अफगान वायु रक्षा बलों ने अफगान हवाई क्षेत्र में घुसे एक पाकिस्तानी विमान को भी मार गिराया है। हालाँकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी।
तालिबान सरकार ने यह भी आरोप लगाया कि पाकिस्तान की ओर से नंगरहार में स्थित एक शरणार्थी शिविर पर मिसाइल हमला किया गया, जिसमें महिलाओं और बच्चों समेत 13 अफगान नागरिक घायल हुए।
पाकिस्तान का पलटवार: तालिबान ने बिना उकसावे के की फायरिंग
पाकिस्तान ने तालिबान के सभी दावों को खारिज करते हुए कहा कि सीमा पर झड़प की शुरुआत अफगान-तालिबान बलों ने की थी। पाकिस्तान के सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने कहा कि सिर्फ उनके दो फौजी मारे गए और तीन घायल हुए हैं, जबकि 36 अफगान लड़ाके मारे गए हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान बिना उकसावे की गई फायरिंग का जवाब दे रहा है।
पीएम शहबाद शरीफ के प्रवक्ता मुशर्रफ अली जैदी ने कहा कि पाकिस्तानी फौजियों के पकड़े जाने की खबर गलत है। पाकिस्तान के सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा, “अफगान-तालिबान शासन ने खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में पाकिस्तान-अफगान सीमा पर बिना उकसावे के फायरिंग शुरू की। इसका पाकिस्तान द्वारा प्रभावी जवाब दिया जा रहा है।”
इसके अलावा राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने भी बयान जारी करते हुए कहा, “पाकिस्तान अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से कोई समझौता नहीं करेगा। हमारी सशस्त्र फौजियों की प्रतिक्रिया व्यापक और निर्णायक है। जो लोग हमारी शांति को हमारी कमजोरी समझते हैं, उन्हें कड़ा जवाब मिलेगा।”
🇵🇰 “Pakistan will not compromise on peace & territorial integrity. Our armed forces' response is comprehensive & decisive. Those who mistake our peace for weakness will face a strong response — and no one will be beyond reach." ~ President Asif Ali Zardari
संघर्ष का असर तोरखम सीमा चौकी तक फैल गया, जो दोनों देशों के बीच एक प्रमुख व्यापारिक और आवागमन मार्ग है। अफगान अधिकारियों ने सीमा के पास स्थित एक शरणार्थी शिविर को खाली कराना शुरू कर दिया, क्योंकि कई शरणार्थी घायल हो गए थे। वहीं पाकिस्तानी पुलिस ने बताया कि सीमा से सटे गाँवों के लोग सुरक्षित इलाकों की ओर पलायन कर रहे हैं।
पाकिस्तानी अधिकारियों का कहना है कि अफगान क्षेत्र से दागे गए मोर्टार गोले सीमावर्ती गाँवों में गिरे, हालाँकि किसी नागरिक के हताहत होने की पुष्टि नहीं हुई।
क्यों बार-बार भड़कता है विवाद
डूरंड रेखा अफगनिस्तान और पाकिस्तान के बीच लगभग 2,600 किलोमीटर लंबी सीमा है जो 1893 में ब्रिटिश भारत और अफगानिस्तान के बीच स्थापित की गई थी। अंग्रेजों के बनाए इस सीमा रेखा को अफगानिस्तान नहीं मानता है। रेखा के एक ओर अफगानिस्तान के 12 प्रांत हैं, दूसरी ओर पाकिस्तान के खैबर पखतूनख्वा, बलूचिस्तान और गिलगित-बाल्टिस्तान।
दोनों देशों के लोग इस खुली सीमा के आर-पार आते जाते हैं और परंपरागत रूप से जुड़े हुए हैं। धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर काफी समानताएँ हैं। यही वजह है कि खैबर पखतूनख्वा, बलूचिस्तान और गिलगित जैसे इलाकों में पाकिस्तानी फौज के खिलाफ लोग विद्रोह कर रहे हैं। यहाँ पाकिस्तानी फौज का जुर्म सुर्खियों में भी रहा है।
महिलाओं-बच्चों के साथ अमानवीय हरकत, पुरुषों का लगातार गायब होने को लेकर लोग पाकिस्तान के फौज को जिम्मेदार मानते हैं। अफगानिस्तान के लिए यह एक संवेदनशील मामला है। यहाँ कोई भी शासन में आ जाए, वह डूरंड रेखा को नहीं मानेगा, क्योंकि ये भावनाओं से जुड़ा है।
अफगानिस्तान ने पश्तून प्रभाव वाले क्षेत्र खैबर पख्तूनख्वाह को पश्तूनिस्तान बनाने का भी समर्थन किया है। पाकिस्तान ने जब पख्तूनख्वाह सीमा पर वीजा और पासपोर्ट अनिवार्य किया, तो पख्तूनों ने प्रदर्शन किया। ब्रिटिश विदेश सचिव सर मोर्टिमर डूरंड ने 1893 में अफगानिस्तान और भारत के बीच सीमा की स्थापना की थी और पख्तून प्रांत को अलग कर दिया था।
दोनों देशों के बीच फैली हुई लंबी डूरंड रेखा पख्तून जनजातीय क्षेत्रों से होकर गुजरती है और उन्हें दो अलग-अलग मुल्कों में विभाजित करती है। पाकिस्तान बनने के बाद डूरंड रेखा उसे विरासत में मिली, लेकिन इस पर कोई औपचारिक समझौता या मान्यता नहीं है।
पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग (HRCP) के उपाध्यक्ष काशिफ पानेजई के मुताबिक, सीमा पर जो इलाका बँटा हुआ है, वह सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं है, वह उनका घर है। उन्होंने कहा, “डूरंड रेखा कई गाँवों को आधे में विभाजित करती है और कई लोगों को उनके कृषि वाली भूमि से विभाजित करती है। यह जनजातियों और अन्य समूहों को बीच से बाँटता है।”
डूरंड रेखा के बावजूद कई इलाके ऐसे भी हैं, जहाँ पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच की रेखा अस्पष्ट है। ये दुर्गम और सुलेमान पर्वत श्रृंखला वाला इलाका है। ओरकजई, स्पिन बोल्डक से गजनी तक कई क्षेत्र ऐसे हैं। इसको लेकर भी दोनों देशों में तनाव रहता है।
दिल्ली में पहली बार इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल दिल्ली (IFFD) 2026 का आयोजन होने जा रहा है। 25 से 31 मार्च 2026 तक भारत मंडपम में आयोजित होने वाला यह महोत्सव दिल्ली को वैश्विक सांस्कृतिक और रचनात्मक केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और पर्यटन मंत्री कपिल मिश्रा ने संयुक्त रूप से इसकी घोषणा की। सरकार के 365 दिन पूरे होने के अवसर पर आयोजित इस फेस्टिवल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली है और 100 से अधिक देशों से 2000 से ज्यादा फिल्मों की एंट्री हुई हैं।
दिल्ली की रचनात्मक शक्ति का वैश्विक मंच पर प्रदर्शन
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने इसे केवल फिल्म महोत्सव नहीं, बल्कि दिल्ली की सांस्कृतिक विरासत, विविधता और आधुनिक सोच का उत्सव बताया। उन्होंने कहा कि दिल्ली पूरे भारत का आईना है, जहाँ हर राज्य और संस्कृति की झलक मिलती है। IFFD के माध्यम से दिल्ली को ‘क्रिएटिव कैपिटल’ बनाने की दिशा में ठोस पहल की गई है।
Delhi humbly welcomes the film fraternity to the capital.
It is an honour to host storytellers, artists and creators who enrich our cultural life and inspire millions through their craft.
IFFD welcomes you all.
The stage is set. 25–31 March 2026. Bharat Mandapam.
मुख्यमंत्री ने फिल्म उद्योग से राष्ट्र निर्माण की भावना के साथ सिनेमा बनाने की अपील करते हुए कहा कि सिनेमा समाज को दिशा देने की ताकत रखता है। उन्होंने अपने छात्र जीवन के अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्हें फिल्मों में गहरी रुचि रही है और व्यस्त कार्यक्रम के बावजूद वे इस फेस्टिवल में कुछ फिल्में देखने का प्रयास करेंगी।
125 से अधिक फिल्मों का प्रदर्शन, बस्तियों तक पहुँचेगा सिनेमा
फेस्टिवल के दौरान 125 से अधिक भारतीय और अंतरराष्ट्रीय फिल्मों का प्रदर्शन किया जाएगा। खास बात यह है कि स्क्रीनिंग केवल बड़े सभागारों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि दिल्ली की विभिन्न बस्तियों और इलाकों में भी स्क्रीन लगाई जाएँगी। पंजाबी, गुजराती, तमिल, तेलुगु सहित कई भारतीय भाषाओं की फिल्मों को दर्शकों तक पहुँचाया जाएगा, ताकि हर वर्ग और समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित हो सके।
इसके साथ ही गाला प्रीमियर, मास्टरक्लास, इंडस्ट्री संवाद, कार्यशालाएँ और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएँगे। सिनेएक्सचेंज फिल्म मार्केट और सिनेवर्स एक्सपो के जरिए फिल्म उद्योग से जुड़े पेशेवरों को नेटवर्किंग और निवेश के अवसर मिलेंगे।
दिल्ली को पर्यटन और फिल्म हब बनाने की तैयारी
पर्यटन मंत्री कपिल मिश्रा ने कहा कि दिल्ली को केवल ट्रांजिट डेस्टिनेशन नहीं, बल्कि प्रमुख पर्यटन और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में स्थापित करना सरकार का लक्ष्य है। यशोभूमि और भारत मंडपम को इस अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के लिए तैयार कर रहे हैं।
दिल्ली सरकार की फिल्म नीति के तहत सिंगल-विंडो सुविधा, प्रोडक्शन सपोर्ट और उद्योग सहयोग के माध्यम से शूटिंग प्रक्रिया को सरल बनाया जा रहा है। सरकार की योजना है कि यह अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव हर वर्ष आयोजित किया जाए, जिससे फिल्म पर्यटन, प्रतिभा विकास, रोजगार सृजन और रचनात्मक अर्थव्यवस्था को नई गति मिल सके।
IFFD 2026 को दिल्ली की नई सांस्कृतिक पहचान के रूप में देखा जा रहा है, जो राजधानी को वैश्विक सांस्कृतिक मानचित्र पर एक मजबूत स्थान दिलाने की दिशा में अहम साबित हो सकता है।
क्या आपने कभी सोचा है कि नक्शे पर खिंची चंद लकीरें किसी देश की किस्मत और पूरी दुनिया का भूगोल कैसे बदल सकती हैं? फरवरी 2026। इस तारीख को नोट कर लीजिए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजरायल की जमीन पर कदम रखते हैं और यरूशलेम से एक ऐसी खबर निकलती है जो इस्लामाबाद से लेकर बीजिंग और तेहरान तक हड़कंप मचा देती है। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू एक शब्द इस्तेमाल करते हैं, ‘हेक्सागोन एलायंस’।
एक ऐसा गठबंधन जिसके केंद्र में भारत है। लेकिन ये कोई मामूली दोस्ती नहीं है। ये जवाब है 2025 के उस खूनी मंजर का जब भारत-पाकिस्तान और इजरायल-ईरान के बीच मिसाइलों ने आसमान काला कर दिया था।
आज के इस एनालिसिस में हम उस ‘सीक्रेट ब्लूप्रिंट’ को डिकोड करेंगे जो भारत को दुनिया का ‘Net Security Provider’ बनाने जा रहा है। कुर्सी की पेटी बाँध लीजिए, क्योंकि भू-राजनीति (Geopolitics) का ये खेल अब अगले लेवल पर पहुँच चुका है।
हेक्सागन अलायंस का जन्म – क्यों और कैसे?
इजरायली कैबिनेट कीरविवार बैठक में नेतन्याहू ने रविवार (22 फरवरी 2026) भारत को महत्वपूर्ण आधार बताया। यानी एक बहुत जरूरी स्तंभ। उनके विजन में ये ‘हेक्सागन’ 6 इलाक़ों को जोड़ता है। लेकिन सवाल ये है कि इजरायल को अचानक इस सुरक्षा घेरे की जरूरत क्यों पड़ी? यहाँ नेतन्याहू ने दो बड़े खतरों का जिक्र किया है।
इन दोनों के बीच में फँसा इजरायल अब अपनी सुरक्षा के लिए केवल अमेरिका के भरोसे नहीं रहना चाहता। उसे चाहिए एक ऐसी महाशक्ति जिसके पास मैनपावर भी हो, मार्केट भी और तकनीक को अडॉप्ट करने की भूख भी। और वो शक्ति है सिर्फ भारत।
2025 का वो ‘सामरिक मोड़’ जिसने सब बदल दिया
इतिहास गवाह है कि बड़े गठबंधन युद्ध की कोख से पैदा होते हैं। हेक्सागन अलायंस के पीछे 2025 की दो ऐसी घटनाएँ हैं जिन्होंने भारत और इज़रायल की रातों की नींद उड़ा दी थी।
ऑपरेशन सिंदूर (मई 2025): आपको याद होगा भारत और पाकिस्तान के बीच चार दिनों तक भयानक झगड़ा चला। भारत ने पहलगाम में हुए आतंकी हमले के गुनहगारों को निपटने के लिए पाकिस्तान को उसके घर में घुसकर मारा।
भारत ने अपनी संप्रभुता बचाई, दुनिया को संदेश भी दिया कि भारत आज कितना बदल गया है। लेकिन इस सबके बीच एक कड़वा सच भी सामने आया और वो था चीन की टेक्नोलॉजी। पाकिस्तान के J-10C लड़ाकू विमानों और PL-15 मिसाइलों ने हमारी वायुसेना को कड़ी टक्कर दी। हमें एहसास हुआ कि अब पारंपरिक हथियारों से काम नहीं चलेगा। हमें चाहिए एक अभेद्य सुरक्षा कवच।
ऑपरेशन राइजिंग लायन (जून 2025): इजरायल और ईरान के बीच 12 दिनों का सीधा युद्ध। ईरान ने 500 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। इजरायल का ‘आयरन डोम’ तो कामयाब रहा, लेकिन ईरान ने ये साबित कर दिया कि वो इजरायल के घर में घुसकर चोट कर सकता है।
इन दोनों देशों ने एक ही चीज सीखी – दुश्मन के पास चीनी और ईरानी तकनीक का घातक कॉम्बिनेशन है। इसका जवाब अकेले देना संभव नहीं है।
‘इस्लामिक नाटो’ का उदय – भारत की घेराबंदी?
लेकिन कहानी में एक और ट्विस्ट है। सितंबर 2025 में सऊदी अरब और पाकिस्तान ने एक ‘स्ट्रटीजिक म्यूचूअल डिफेन्स अग्रीमेंट’ (Strategic Mutual Defence Agreement) (SMDA) साइन किया। जानकारों ने इसे ‘इस्लामिक नाटो’ का नाम दिया।
परमाणु कवर: पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने इशारा किया कि उनके न्यूक्लियर हथियार अब सऊदी की रक्षा के लिए भी हैं।
चीनी पैठ: पाकिस्तान के जरिए चीन के खतरनाक हथियार अब खाड़ी देशों (Gulf countries) के बाजारों में पहुँच रहे हैं।
अब समझिए, एक तरफ चीन-पाकिस्तान-सऊदी-तुर्की का गठजोड़ बन रहा है, तो दूसरी तरफ भारत को अपना ‘काउंटर-बैलेंस’ तैयार करना ही था। हेक्सागन अलायंस वही जवाबी हमला है।
हेक्सागन के 6 स्तंभ – कौन, कहाँ और क्यों?
ये गठबंधन कोई कागजी शेर नहीं है। इसके हर सदस्य की अपनी एक ‘Superpower’ है। आप इस चार्ट को देखिए:
Pillar
मुख्य खिलाड़ी
रणनीतिक भूमिका
दक्षिण एशिया
भारत
ग्लोबल साउथ का नेतृत्व, विशाल सेना और आर्थिक गहराई।
पश्चिम एशिया
इजरायल
कटिंग-एज मिलिट्री टेक, मोसाद का खुफिया नेटवर्क।
भूमध्य सागर
ग्रीस और साइप्रस
यूरोप के लिए समुद्री दरवाज़ा और गैस पाइपलाइन का रास्ता।
अरब वर्ल्ड
UAE
भारी-भरकम निवेश और अब्राहम समझौते की ताक़त।
अफ्रीका
इथियोपिया
लाल सागर (Red Sea) की सुरक्षा और समुद्री डकैती पर लगाम।
पूर्वी एशिया
नाम गोपनीय
सप्लाई चेन और चिप मैन्युफैक्चरिंग का सपोर्ट।
इस चार्ट से यही मैसेज दिखता है कि ‘हेक्सागन अलायंस’ असल में एक ऐसी तगड़ी टीम है जहाँ हर खिलाड़ी का अपना खास रोल है। इसमें भारत अपनी बड़ी अर्थव्यवस्था और रुतबे के साथ लीडर की भूमिका में है, क्योंकि भारत न केवल एक सैन्य शक्ति है, बल्कि पश्चिम एशिया और यूरोप के बीच IMEC नाम के आर्थिक गलियारे के रूप में भी काम करता है। ऐसे ही इज़रायल अपनी घातक मिसाइल टेक्नोलॉजी और जासूसी नेटवर्क (Intelligence) के साथ इस टीम का ‘मास्टरमाइंड’ है।
UAE इसमें पैसा और सामान पहुँचाने के रास्ते (Logistics) संभाल रहा है, जबकि ग्रीस और साइप्रस यूरोप के लिए समुद्री रास्ता खोलते हैं। साथ ही, इथियोपिया समुद्र में जहाजों की सुरक्षा देखता है और एक सीक्रेट एशियाई देश टेक्नोलॉजी की सप्लाई चेन को मज़बूत बनाता है।
मिशन सुदर्शन चक्र – भारत बनेगा अभेद्य
प्रधानमंत्री मोदी की इजरायल यात्रा का सबसे बड़ा फायदा 8.6 बिलियन डॉलर (करीब 72,000 करोड़ रुपए) का रक्षा समझौता है। लेकिन इसे सिर्फ हथियारों की शॉपिंग मत समझिए, यह असल में ‘मिशन सुदर्शन चक्र’ की नींव है। पीएम मोदी ने लाल किले से जिस मिशन का ऐलान किया था, उसका मकसद भारत के ऊपर आसमान में एक ऐसी अदृश्य दीवार खड़ी करना है जिसे कोई भी दुश्मन पार न कर सके।
इसमें इज़रायल हमारा सबसे बड़ा पार्टनर है, जो भारत को एक ऐसा स्मार्ट डिफेंस सिस्टम बनाने में मदद करेगा जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से चलेगा और पलक झपकते ही दुश्मन की मिसाइल या ड्रोन को हवा में ही ढेर कर देगा।
भारत अब इज़रायल से ऐसी ‘टॉप सीक्रेट’ टेक्नोलॉजी ले रहा है जो इजरायल ने आज तक अपने सबसे खास दोस्तों को भी नहीं दी। यह सिर्फ हथियारों का सौदा नहीं है, ये एक तरह से तकनीक की पूरी चाबी भारत को सौंपने जैसा है। इसका मतलब है कि ये हथियार अब भारत की अपनी फैक्ट्रियों में बनेंगे।
इसमें तीन कमाल की चीजें शामिल हैं
आयरन बीम (Iron Beam): यह एक ‘लेजर गन’ है। जहाँ दुश्मन के ड्रोन को गिराने में पहले करोड़ों की मिसाइल खर्च होती थी, अब महज़ 250-300 रुपए ($3) की बिजली खर्च करके दुश्मन का करोड़ों का ड्रोन राख हो जाएगा।
एरो और डेविड स्लिंग: ये लंबी दूरी के वो शिकारी हैं जो चीन या पाकिस्तान से आने वाली बड़ी से बड़ी मिसाइलों को रास्ते में ही खत्म कर देंगे।
AI नेटवर्क ग्रिड: यह पूरे देश के रक्षा सिस्टम के लिए एक ‘सुपर ब्रेन’ जैसा है। हज़ारों रडार और सेंसर मिलकर पलक झपकते ही बता देंगे कि खतरा कहाँ है और खुद ही एक्शन लेंगे।
आर्थिक गलियारा और ‘पैक्स सिलिका’
आज के समय में जंग सिर्फ सरहदों पर नहीं, बाज़ारों में भी लड़ी जाती है। हेक्सागन अलायंस का आर्थिक इंजन है IMEC (India-Middle East-Europe Economic Corridor)। ये रास्ता पाकिस्तान को बाईपास करके भारत को सीधा यूरोप से जोड़ता है।
और इसके ऊपर एक नया मास्टर स्ट्रोक है- ‘पैक्स सिलिका’ । 20 फरवरी 2026 को भारत ने अमेरिका के इस टेक-गठबंधन पर साइन किए। इसका मकसद क्या है? सेमीकंडक्टर और एआई की दुनिया से चीन की दादागिरी खत्म करना।
‘पैक्स सिलिका’ असल में दुनिया की नई ‘टेक्नोलॉजी वाली शांति’ का नाम है, जिसका नेतृत्व अमेरिका कर रहा है और भारत इसमें एक मुख्य खिलाड़ी बनकर उभरा है। इसका सबसे बड़ा मकसद हाई-टेक दुनिया, खासकर सेमीकंडक्टर (चिप्स), आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और जरूरी खनिजों (Critical Minerals) की सप्लाई चेन से चीन के दबदबे को खत्म करना है।
आसान शब्दों में कहें तो, यह लोकतांत्रिक देशों का एक ऐसा ‘डिजिटल क्लब’ है जो यह सुनिश्चित करना चाहता है कि भविष्य की सबसे एडवांस टेक्नोलॉजी पर किसी एक तानाशाह देश का कब्जा न हो। भारत के लिए इसमें शामिल होने का मतलब है, देश में चिप बनाने वाली बड़ी फैक्ट्रियों का आना, AI के क्षेत्र में दुनिया का लीडर बनना और अपनी ‘डिजिटल संप्रभुता’ को सुरक्षित करना।
यानी, इजरायल की सॉफ्टवेयर पावर और भारत की इंजीनियरिंग मिलकर एक ऐसा ‘डिजिटल किला’ बना रहे हैं जिसे भेदना बीजिंग के लिए नामुमकिन होगा।
चुनौतियाँ और ‘ग्रे जोन’ – क्या सब कुछ इतना आसान है?
लेकिन थोड़ा सा रुकिए। जैसे हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती, कुछ-कुछ उसी तरह से हेक्सागन अलायंस के रास्ते में कुछ कांटे भी हैं। जैसे:
ईरान फैक्टर: भारत ने इस साल चाबहार बंदरगाह के लिए बजट नहीं दिया, जिससे ईरान कुछ हद तक नाराज है। अगर हम पूरी तरह इज़रायल के पाले में जाते हैं, तो क्या हम अपना ‘नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर’ खो देंगे?
ICC का नेक्सस: ग्रीस और साइप्रस इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट के सदस्य हैं। ICC ने नेतन्याहू के खिलाफ वारंट जारी किया है। ऐसे में ये देश गठबंधन की मीटिंग कैसे करेंगे? ये एक बड़ा कानूनी सिरदर्द है।
धार्मिक नैरेटिव: पाकिस्तान इसे ‘मुस्लिम उम्माह’ के खिलाफ साजिश बता रहा है। भले ही UAE भारत के साथ है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कट्टरपंथ को भड़काना पाकिस्तान का पुराना खेल है।
नया भारत, नई व्यवस्था
ये हेक्सागन अलायंस बताता है कि भारत अब स्ट्रटीजिक औटोनोमी (Strategic Autonomy) के खोल से बाहर निकलकर स्ट्रटीजिक रीलिज़म (Strategic Realism) की ओर बढ़ चुका है। हम अब सिर्फ शांति की बातें नहीं करते, हम शांति को सुरक्षित करने के लिए ताकतवर गठबंधन बनाना जानते हैं।
कुछ सवाल इस अलायंस के साथ जरूर जुड़े हैं। जैसे कि क्या भारत इस गठबंधन के जरिए चीन और पाकिस्तान के ‘इस्लामिक नाटो’ को मात दे पाएगा? या हम पश्चिम एशिया की उस आग में कूद रहे हैं जहाँ से निकलना मुश्किल होगा?
आजादी के महान नायकों में से एक वीर सावरकर की पुण्यतिथि (26 फरवरी ) पर आज के समय को ध्यान में रखते हुए एक महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा जरूरी है। वो चर्चा है भारत और इजरायल को लेकर। हिंदुओं की पुण्यभूमि और यहूदियों की पुण्यभूमि को लेकर। वैसे भी, उनकी जिंदगी और काम देश की आजादी की लड़ाई और अपनी सभ्यता को मजबूत करने से बहुत गहरे जुड़े हैं।
चूँकि पीएम मोदी भी इजरायल के महत्वपूर्ण दौरे पर रहे। ऐसे में ये सही समय है, जब उनकी सोच के महत्वपूर्ण बिंदु पर चर्चा की जाए। वैसे भी, भारत और इजरायल की दोस्ती मौजूदा समय में दो देशों, दो सभ्यताओं की सबसे मजबूत दोस्ती में बदल चुकी है।
दरअसल, पहले भारत की विदेश नीति में जो साफ-साफ बात नहीं दिखती थी वो अब भारत-इजरायल के रिश्ते में साफ दिख रही है। ये रिश्ता रक्षा, खुफिया जानकारी बाँटने और टेक्नोलॉजी पर आधारित है।
अक्सर लोग वीर सावरकर को सिर्फ राजनीतिक विवाद के नजरिए से याद करते हैं लेकिन वे एक विचारक थे जो राष्ट्र, सभ्यता की पहचान और दुनिया की राजनीति को अच्छे से समझते थे। 1923 की शुरुआत में ही वीर सावरकर ने यहूदियों के अपने पुराने देश को वापस पाने का खुलकर समर्थन किया था। ये इजरायल बनने से 1948 से भी 20 साल पहले की बात है।
सावरकर का ये स्टैंड दिखाता है कि वे राष्ट्रों के खुद फैसला करने के अधिकार पर कितना भरोसा रखते थे जो इतिहास और सभ्यता से जुड़ा हो। उस समय यहूदी सवाल अभी खुला था और दुनिया भर में राय बंटी हुई थी।
फिर भी वामपंथी गिरोह हमेशा सावरकर को नाजी जर्मनी का समर्थक बताता रहा है भले ही उन्होंने यहूदियों के राष्ट्र का साफ समर्थन किया हो। ये आरोप बिना पूरी जानकारी और उनके असली लेखों को देखे ही लगाए जाते हैं। असली इतिहास और राजनीतिक कहानी में फर्क समझने के लिए जरूरी है कि सावरकर के यहूदियों, जियोनिज्म और उस समय की दुनिया की स्थिति पर क्या लिखा है जब भारत इजरायल के साथ अपना रिश्ता और गहरा कर रहा है।
वीर सावरकर: क्रांतिकारी, विद्वान और सख्त राष्ट्रवादी
वीर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को नासिक जिले के भगुर गांव में श्रीमती राधा और श्री दामोदर सावरकर के यहाँ हुआ। बचपन से ही उन्हें पढ़ना बहुत पसंद था और कविता लिखने में भी वे माहिर थे। वे सबसे पहले और सबसे मजबूत उन लोगों में से थे जिन्होंने ब्रिटिश राज से पूरी आजादी यानी पूर्ण स्वराज की माँग की जब ये बात भारतीय राजनीति में अभी लोकप्रिय नहीं हुई थी। छोटी उम्र से ही सावरकर में जबरदस्त दिमाग था। वे इतिहास, साहित्य और राजनीति के विचारों में बहुत रुचि रखते थे। उनकी पढ़ाई की ताकत उनके देश की आजादी के लिए जुनून के बराबर थी जो जल्दी ही संगठित क्रांतिकारी काम में बदल गया।
साल 1904 में सावरकर ने अभिनव भारत सोसाइटी बनाई जो ब्रिटिश राज को हथियार से उखाड़ फेंकने के लिए गुप्त क्रांतिकारी संगठन था। जब वे लंदन पहुंचे तो भारत हाउस में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई जो भारतीय राष्ट्रवाद का केंद्र था। उनके लेख, भाषण और संगठन के काम से उन्होंने युवा भारतीयों को आजादी को दूर का सपना नहीं बल्कि तुरंत का काम मानने के लिए प्रेरित किया। अपनी किताब द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस 1857 में उन्होंने 1857 के विद्रोह को ब्रिटिश कहानी के खिलाफ एक पूरा राष्ट्रीय संघर्ष बताया न कि सिर्फ सिपाही बगावत।
सावरकर के क्रांतिकारी काम का उन्हें बहुत बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। साल 1910 में ब्रिटिशों ने उन्हें गिरफ्तार किया और अंडमान-निकोबार के सेल्युलर जेल में आजीवन सजा दे दी जो उस समय की सबसे बुरी जेल थी। उन्होंने सालों तक अकेले बंद कमरे, मजबूरी का काम और सख्त सजा झेली। इतनी कड़ी हालत में भी वे दिमाग और राजनीति से सक्रिय रहे। उनकी कैद उपनिवेशवाद की ज्यादती और आजादी की लड़ाई की अडिग हिम्मत का प्रतीक बन गई।
क्रांतिकारी काम के अलावा सावरकर बहुत लिखने वाले थे। उन्होंने राष्ट्र की पहचान को राजनीतिक आजादी, सांस्कृतिक एकता और सभ्यता की निरंतरता पर आधारित एक पूरा विचार बनाया। दुनिया के मामलों पर उनकी राय खासकर यहूदियों के अपने पुराने घर को वापस पाने का शुरुआती और अडिग समर्थन इसी बड़े विचार से आया।
सावरकर का यहूदियों और यहूदी घर के लिए शुरुआती और साफ समर्थन
वीर सावरकर ने इजरायल बनने से 1948 में पहले और भारत के इजरायल को आधिकारिक मान्यता देने से कई दशक पहले ही यहूदियों के अपने पुराने देश को वापस पाने का खुलकर समर्थन किया था। सावरकर उन पहले भारतीय नेताओं में से थे जिन्होंने जियोनिस्ट आंदोलन को सही माना जब ज्यादातर देश इसे समर्थन देने से हिचक रहे थे। उनका स्टैंड उनके बड़े विश्वास पर आधारित था कि राष्ट्र सिर्फ राजनीतिक सिस्टम से नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान, इतिहास और सभ्यता की निरंतरता से बनते हैं।
अपनी किताब हिंदुत्व: हू इज ए हिंदू? जो 1923 में छपी थी उसमें उन्होंने जियोनिज्म को साफ समर्थन दिया। उन्होंने लिखा, “अगर यहूदियों का सपना कभी सच हो जाए… अगर फिलिस्तीन यहूदी राज्य बन जाए तो हमें उतनी ही खुशी होगी जितनी हमारे यहूदी दोस्तों को।” ये बात तब कही गई जब यहूदी राज्य बनना दूर की बात लग रही थी। ये सावरकर के साफ और सिद्धांत वाले समर्थन को दिखाता है। उन्होंने फिलिस्तीन को यहूदियों का इतिहास और सांस्कृतिक जन्मस्थान माना और उनके घर बसाने के प्रयास को सही और जायज बताया।
सावरकर की सहानुभूति यहूदियों के पुराने दर्द और बेघर होने से भी आई। उन्होंने यहूदियों की हिम्मत की तारीफ की कि सदियों की सताए जाने और बेघर होने के बावजूद उन्होंने अपनी राष्ट्र की पहचान और संस्कृति बचाए रखी। भारतीय संदर्भ में सावरकर ने भारतीय यहूदियों का बहुत सम्मान किया। उन्होंने कहा कि वे सदियों से भारत में रह रहे हैं बिना किसी राजनीतिक या सामाजिक झगड़े के और शांतिपूर्वक भारतीय समाज में घुल-मिल गए।
आज जब भारत और इजरायल रक्षा, खुफिया, कृषि और टेक्नोलॉजी में अपनी साझेदारी और गहरी कर रहे हैं तो सावरकर का यहूदियों के राष्ट्र का शुरुआती समर्थन बहुत दूरदर्शी लगता है। पीएम मोदी की इजरायल यात्रा उस रिश्ते के पूरी तरह पकने को दिखाती है जो आपसी सम्मान और साझा रणनीतिक हितों पर टिका है।
यात्रा के दौरान इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पीएम मोदी की तारीफ की और उन्हें सिर्फ दोस्त नहीं बल्कि भाई कहा। उन्होंने भारत के लंबे दोस्ती के लिए शुक्रिया कहा और बोला कि भारत वो एकमात्र सभ्यता है जहाँ यहूदियों का स्वागत हुआ और उन्हें कभी सताया नहीं गया। ये भी दिखाता है कि वो साझेदारी जिसके नैतिक और सभ्यता वाले आधार सावरकर के लेखों में दशकों पहले ही पहचाने गए थे वो अब आधिकारिक नीति बन गई है।
नाजी मिथक: सावरकर की स्थिति को उसके सही इतिहास के संदर्भ में समझना जरूरी
यहूदियों के राष्ट्र का लिखित समर्थन और उनके प्रति सहानुभूति होने के बावजूद वामपंथी गिरोह वीर सावरकर को नाजी जर्मनी का समर्थक बताता रहा है। ये आरोप ज्यादातर उनके 1 अगस्त 1938 के पुणे में दिए गए अध्यक्षीय भाषण की कुछ पंक्तियों पर टिका है जिसमें उन्होंने कहा कि जर्मनी को नाजीवाद अपनाने का अधिकार है ठीक वैसे ही जैसे दूसरे देश अपने हिसाब से सरकार का रूप चुनते हैं। लेकिन भाषण को पूरा और गहराई से देखने पर पता चलता है कि सावरकर का स्टैंड कोई विचारधारा का समर्थन नहीं बल्कि दुनिया की राजनीति को व्यावहारिक नजरिए से देखना था।
वीर सावरकर का मुख्य मुद्दा ये था कि भारत की विदेश नीति सिर्फ अपने राष्ट्र हित पर आधारित होनी चाहिए न कि किसी दूसरे देश की विचारधारा या भावना पर। उन्होंने कहा कि हर देश अपनी खास इतिहास और स्थिति के हिसाब से अपना शासन चुनता है और भारत के लिए ये न तो व्यावहारिक है न रणनीतिक कि वो दूसरे देशों के फैसलों में टांग अड़ाए।
आइए उनके बयान को सही इतिहास के संदर्भ में समझें। साल 1938 में नाजी जर्मनी की तानाशाही और यहूदियों के खिलाफ नीतियाँ तो पता थीं लेकिन होलोकॉस्ट यानी लाखों यहूदियों का व्यवस्थित नरसंहार अभी पूरा नहीं हुआ था। वो औद्योगिक हत्याकांड जो बाद में नाजी जर्मनी की पहचान बना वो दूसरे विश्व युद्ध के दौरान शुरू हुआ और पूरी दुनिया को 1945 में जब सहयोगी सेनाओं ने कंसंट्रेशन कैंप छुड़ाए तब पता चला।
खास बात ये कि सावरकर के अपने लेखों में नाजीवाद की असली कट्टर विचारधारा को साफ खारिज किया गया है। अपनी किताब हिंदुत्व: हू इज ए हिंदू? में उन्होंने लिखा कि ‘एक ही जाति है मानव जाति’ जो नस्ल की शुद्धता और श्रेष्ठता के नाजी विचार को पूरी तरह नकारता है। ये दर्शन हिटलर के नस्लीय अलगाववाद से बिल्कुल उलटा था।
कुल मिलाकर सावरकर के लेख, काम और बड़े विचार फ्रेमवर्क एक बहुत सूक्ष्म और जटिल तस्वीर दिखाते हैं जो नाजी समर्थक का सरल आरोप नहीं है। उनके विचार ज्यादा भू-राजनीतिक यथार्थ और सभ्यता के सोच से आए थे जैसा उनके यहूदियों के राष्ट्र का शुरुआती समर्थन, नस्ल शुद्धता को खारिज करना और राष्ट्र हित पर जोर से साफ है।
नेहरू की हिचक और भारत का इजरायल को देर से अपनाना
जबकि सावरकर 1920 के दशक से ही यहूदियों के राष्ट्र की वकालत कर रहे थे उसी समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारत की आधिकारिक रुख इजरायल के प्रति बहुत सतर्क रहा। 1947 में जब संयुक्त राष्ट्र ने फिलिस्तीन को बांटने का प्लान पास किया जिसमें यहूदी राज्य बनाने की बात थी तो भारत ने इसके खिलाफ वोट किया। उस समय के भारतीय नेतृत्व ने एक संघीय या एकीकृत व्यवस्था की वकालत की।
ये फैसला कई भू-राजनीतिक कारणों से था। नेहरू नए आजाद देशों का नेता बनना चाहते थे और अरब देशों से अच्छे रिश्ते बनाए रखना चाहते थे। घरेलू कारण भी थे जैसे देश के मुस्लिम आबादी की नाराजगी। ऐसे में भारत की विदेश नीति उन मुद्दों पर सावधानी से बनाई गई जो अंदर या आसपास तनाव बढ़ा सकते थे।
भारत ने सितंबर 1950 में इजरायल को औपचारिक मान्यता दी लेकिन पूरे राजनयिक रिश्ते दशकों बाद बने। 1992 में भारत और इजरायल ने एक-दूसरे की राजधानी में दूतावास खोले और पूरे स्तर पर रिश्ते सामान्य किए। आजादी के बाद 40 साल से ज्यादा समय तक रिश्ता सीमित और कम दिखने वाला रहा।
फर्क साफ है। सावरकर ने इजरायल के बनने से दशकों पहले ही यहूदी घर के विचार का खुलकर समर्थन किया था। फिर भी आजाद भारत ने किसी खास समुदाय को खुश रखने की लालच या नाराज होने के डर से यहूदी राज्य को अपनाने में देरी की। आज जब भारत और इजरायल रक्षा, खुफिया, कृषि और टेक्नोलॉजी में मजबूत साझेदारी साझा कर रहे हैं तो ये रिश्ता उस रणनीतिक स्पष्टता को दिखाता है जो भारत की आधिकारिक विदेश नीति में समय ले कर पकी।
भारत-इजरायल रिश्ते को सावरकर की दूरदृष्टि से देखने की जरूरत
वीर सावरकर भारतीय आजादी की लड़ाई के सबसे अहम किरदारों में से एक बने हुए हैं। उनकी जिंदगी राष्ट्र की संप्रभुता और सभ्यता को बचाए रखने के अडिग समर्पण से भरी थी जिसमें क्रांतिकारी हिम्मत और रणनीतिक सोच दोनों थे। सावरकर ने यहूदियों की राष्ट्र की आकांक्षा को वैध माना और उनके पुराने देश को वापस पाने के अधिकार का समर्थन किया था इजरायल आधुनिक राष्ट्र बनने से दशकों पहले।
उनके विचार उस बड़े दर्शन से मेल खाते थे कि राष्ट्रों को राजनीतिक खुद फैसला करने का अधिकार है क्योंकि वे साझा इतिहास और संस्कृति से जुड़े होते हैं। सावरकर के विचारों को सही इतिहास के संदर्भ में देखना भी उतना ही जरूरी है।
उनकी दुनिया की राजनीतिक व्यवस्थाओं पर टिप्पणियाँ भू-राजनीतिक यथार्थ पर आधारित थीं जिसमें राष्ट्र हित ही भारत की विदेश नीति का मार्गदर्शक होना चाहिए न कि कोई विचारधारा। नस्ल शुद्धता के विचारों को खारिज करना ये और साफ करता है कि उनका फोकस मुख्य रूप से भारत की रणनीतिक ताकत पर था न कि विदेशी विचारधाराओं के प्रति वफादारी पर।
दूसरी तरफ आजादी के बाद भारत का इजरायल के साथ औपचारिक रिश्ता धीरे-धीरे बदला। भारत ने 1950 में इजरायल को मान्यता दी लेकिन राजनयिक रिश्ते पूरे विकसित होने में दशक लग गए। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा व्यावहारिक और हित आधारित विदेश नीति की साफ दिशा दिखाती है क्योंकि इसमें सैन्य, टेक्नोलॉजी और साझा रणनीतिक हितों में सहयोग मजबूत हो रहा है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित की गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार (25 फरवरी 2026) को इजराइल के तेल अवीव पहुँचे। भारत-इजराइल संबंधों में इसके साथ ही नए अध्याय की शुरुआत हुई। 9 साल के बाद दूसरी बार पीएम मोदी इजराइल गए। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब दोनों देश रक्षा, व्यापार और आतंकवाद के खिलाफ एक-दूसरे के सहयोग को नई ऊँचाई देना चाह रहे हैं।
इस दौरे से भारत और इज़राइल एक अहम रक्षा समझौते पर साइन करने के करीब पहुँच सकते हैं, जो उनकी सुरक्षा साझेदारी को अगले लेवल पर ले जा सकता है। पिछली डील्स में हथियार खरीदने पर ज्यादा जोर था। लेकिन इस बार एडवांस्ड मिलिट्री टेक्नोलॉजी के ट्रांसफर पर बातचीत हुई है। ये ऐसे सिस्टम हैं, जिन्हें इजराइल ने कथित तौर पर अब तक किसी दूसरे देश के साथ शेयर नहीं किया है।
मजबूत रक्षा साझेदारी बेहद जरूरी- पीएम मोदी
इजरायल के संसद नेसेट को संबोधित करते हुए PM मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग कितने अहम हैं। उन्होंने रक्षा सहयोग को भारत-इजरायल संबंधों का एक ‘जरूरी पिलर’ बताया।
उन्होंने कहा, “आज की अनिश्चित दुनिया में, भारत और इजराइल जैसे भरोसेमंद पार्टनर्स के बीच एक मजबूत रक्षा साझेदारी बहुत जरूरी है।”
In today’s uncertain world, a strong defence partnership between trusted partners, like India and Israel, is of vital importance.#PMModiInIsraelpic.twitter.com/ayygRjUWgD
उन्होंने कहा कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भारत के साथ व्यापार बढ़ाने, निवेश करने और साझा इंफ्रास्ट्रक्चर विकास को बढ़ावा देने के लिए दृढ़ संकल्प हैं। पीएम के मुताबिक, पिछले साल गाजा सीजफायर ने सहयोग के नए मौके खोल दिए हैं। उनका संदेश साफ था कि भारत और इजराइल एक-दूसरे को बढ़ते सिक्योरिटी खतरों का सामना कर रही दुनिया में भरोसेमंद पार्टनर के तौर पर देख रहे हैं।
अधिकारियों के मुताबिक, PM मोदी इस दौरे के दौरान इजरायल में बने मिसाइल सिस्टम के लिए एक बड़े ऑर्डर को फाइनल कर सकते हैं। हालाँकि विस्तार से इसके पब्लिक डोमेन में होने की उम्मीद नहीं है। मोटे तौर पर यह समझा जा रहा है कि इस सहयोग के दो मुख्य हिस्से होंगे, डिफेंसिव सिस्टम और आक्रामक हथियार।
माना जा रहा है कि डिफेंस सिस्टम में जिस पर बातचीत हो सकती है, उसमें इजराइल के कुछ सबसे एडवांस्ड एयर डिफेंस सिस्टम शामिल हैं। इनमें इजराइल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज, राफेल एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम और एल्बिट सिस्टम जैसी कंपनियों द्वारा विकसित किए गए सिस्टम हैं।
आक्रमण करने वाले हथियारों में एडवांस्ड प्रिसिजन और लॉन्ग-रेंज स्ट्राइक सिस्टम शामिल होने की संभावना है। इनमें राफेल की SPICE 1000 गाइडेंस किट, एल्बिट सिस्टम्स की रैम्पेज एयर-टू-ग्राउंड मिसाइल, आइस ब्रेकर नेवल क्रूज मिसाइल और IAI की सुपरसोनिक एयर LORA मिसाइल शामिल हो सकती हैं।
हालाँकि भारत सरकार की दिलचस्पी इन सिस्टम को सिर्फ खरीदने में नहीं है, बल्कि टेक्नोलॉजी ट्रांसफर में भी है। योजना है कि इस सिस्टम को ‘मेक इन इंडिया’ प्रोग्राम के तहत भारत में बनाया जाए और भविष्य में ‘सुदर्शन चक्र’ नाम के मल्टी-लेयर्ड मिसाइल डिफेंस सिस्टम प्रोजेक्ट में इस्तेमाल किया जाए। इसके 2035 तक पूरा होने की उम्मीद है।
आयरन डोम और इसका कॉम्बैट रिकॉर्ड
बातचीत में जिस सिस्टम पर सबसे ज्यादा चर्चा होने की उम्मीद है, वह है इजराइल का आयरन डोम। इसके अंतर्गत एरो मिसाइल डिफेंस सिस्टम, डेविड्स स्लिंग शामिल हैं। इसमें 300 km तक की मीडियम-रेंज मिसाइलों और ड्रोन को नष्ट करने की क्षमता है। इसमें 4 से 70 km के बीच कम दूरी के रॉकेट को नष्ट करने की क्षमता है।
हमास के साथ बार-बार होने वाली लड़ाइयों के दौरान इन सिस्टम ने अपने परफॉर्मेंस से दुनिया भर का ध्यान खींचा है। गाजा से रॉकेट हमलों के दौरान, आयरन डोम सिस्टम ने इजरायली शहरों को निशाना बनाने वाले हजारों रॉकेट को सफलतापूर्वक नष्ट कर दिया, जिससे आम इजरायली के जान-माल को कम नुकसान हुआ।
आयरन डोम में कम दूरी के रॉकेट का जल्दी पता लगाने और नष्ट करने की क्षमता है, जिसने इसे दुनिया के सबसे विश्वसनीय एयर डिफेंस सिस्टम में से एक बना दिया है। भारत जैसे लंबे बॉर्डर और समुद्र तट वाले देश में ऐसा सिस्टम बहुत काम का है।
आयरन डोम के अलावा, भारत ने इजरायल के नए आयरन बीम सिस्टम में भी गहरी दिलचस्पी दिखाई है। दुश्मन देशों के खिलाफ ये तेज स्पीड वाला डिफेंस सिस्टम बेहद घातक है। इजरायल की डिफेंस कंपनी राफेल एडवांस्ड सिस्टम्स एंड एल्बिट ने इसे तैयार किया है। ये लेजर हथियार हवा में दुश्मन की ओर से आ रहे मोर्टार, ड्रोन और रॉकेट को समय रहते इंटरसेप्ट कर लेता है।
इस पार्टनरशिप का मकसद भारतीय शहरों और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा को पुख्ता बनाना है। इसका मकसद 2030 तक एक ऐसा नेशनल सिक्योरिटी सिस्टम बनाना है जिसे अधिकारी ‘अभेद्य’ बताते हैं।
भारत के मिसाइल शील्ड को मज़बूत करना
भारत में एडवांस्ड मिसाइल डिफेंस सिस्टम की माँग पाकिस्तान के साथ हाल के तनाव से मिले सबक के बाद आया है। पिछले साल मई में पाकिस्तान ने कथित तौर पर भारतीय मिलिट्री और सिविलियन एसेट्स को निशाना बनाने की कोशिश में तुर्की के ड्रोन और चीनी PL-15 लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइलों का इस्तेमाल किया था।
भारत पहले से ही रूस के S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम, इज़राइल द्वारा डेवलप किए गए बराक सिस्टम और स्वदेशी आकाश सिस्टम का इस्तेमाल करता है। हालाँकि अधिकारियों का मानना है कि आयरन डोम और आयरन बीम जैसी एक्स्ट्रा लेयर्स देश के एयर डिफेंस नेटवर्क को और मज़बूत बना देंगी और उन्हें भेदना ज्यादा मुश्किल हो जाएगा।
15,000 किलोमीटर से ज्यादा लंबी जमीनी सीमा और 7,500 किलोमीटर से ज्यादा लंबी समुद्री सीमा की रक्षा के लिए भारत को एक बड़े और इंटीग्रेटेड शील्ड की जरूरत महसूस होती है। आइडिया यह है कि पूरे भारत में एक मल्टी-लेयर्ड डिफेंस सिस्टम बनाया जाए जो कम दूरी के रॉकेट और ड्रोन से लेकर लंबी दूरी की मिसाइलों तक के खतरों से निपट सके।
एडवांस्ड स्ट्राइक सिस्टम पर बातचीत हो सकती है
गोल्डन होराइजन को खरीदने पर भी बातचीत हो रही है, जिसे स्पैरो टारगेट मिसाइल फ़मिली का अगला वर्जन माना जा रहा है। यह मिसाइल की एक खास क्लास है जिसे एयरक्राफ्ट से लॉन्च करने के लिए डिजाइन किया गया है। इसे इंडियन एयर फोर्स के सुखोई-30MKI जेट के साथ इंटीग्रेट किया जा सकता है।
यह 1,000 से 2,000 किलोमीटर के बीच स्ट्राइक रेंज और Mach 5 तक की स्पीड के साथ, यह सिस्टम अंडरग्राउंड बंकरों सहित मजबूत मिलिट्री टारगेट को भेदने के लिए डिजाइन किया गया है। इतनी तेज स्पीड पर इसे इंटरसेप्ट करना बहुत मुश्किल हो जाता है। भारत की ब्रह्मोस क्रूज़ मिसाइल लगभग Mach 3 की रफ़्तार से चलती है और इसे दुनिया की सबसे तेज़ ऑपरेशनल सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइलों में से एक माना जाता है। ऐसे में गोल्डन होराइजन भारत की सुरक्षा को सुनिश्चित कर सकता है।
हथियारों से इतर एक बड़ा सिक्योरिटी विजन
एक और बड़ा डेवलपमेंट एक बड़े सिक्योरिटी अलायंस की घोषणा हो सकती है। प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने हाल ही में मिडिल ईस्ट के आसपास ‘अलायंस का हेक्सागन’ बनाने की बात कही थी। उन्होंने सुझाव दिया कि इस ग्रुप में भारत के साथ अरब देश, अफ्रीकी देश के अलावा ग्रीस, साइप्रस और दूसरे एशियाई पार्टनर शामिल हो सकते हैं।
उनके अनुसार, इसका मकसद इस इलाके में ‘रेडिकल एक्सिस’ के खिलाफ एकजुट होना है।
भारत और इजराइल के बीच यह रिश्ता दशकों में बना है। इजरायल लंबे समय से भारत के मुख्य हथियार सप्लायर में से एक रहा है। आज यह पार्टनरशिप खरीद-फरोख्त से आगे बढ़कर ड्रोन और मिसाइल सिस्टम जैसे हथियारों की जॉइंट मैन्युफैक्चरिंग करती है।
PM मोदी का दौरा इस बात का संकेत है कि यह रिश्ता एक नए दौर में जा रहा है, जिसमें एडवांस्ड डिफेंस कोऑपरेशन, टेक्नोलॉजी शेयरिंग और एक बड़ी स्ट्रेटेजिक सोच शामिल है, जो दुनिया में अनिश्चितताओं से भरी होती जा रही है।
(मूल रूप से ये लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)