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कभी ईशनिंदा का इल्जाम लगाकर जला देते हैं जिंदा, कभी चोर बताकर ले लेते हैं जान: जानिए यूनुस राज में हिंदुओं को किन-किन बहाने निशाना बना रहे कट्टरपंथी, 35 दिनों में 14 को मारा

बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथियों की वजह से एक और हिन्दू युवक की जान चली गई। मिथुन सरकार नाम के युवक को कट्टरपंथियों ने दौड़ाया। भीड़ को अपनी ओर आता देखकर मिथुन डर के मारे तालाब में कूद गया। डूबने से उसकी मौत हो गई। कट्टरपंथी चोर-चोर कह कर उसका पीछा कर रहे थे।

पुलिस ने उसकी बॉडी बरामद कर ली है। बांग्लादेश में पिछले 35 दिनों में 14 हिंदुओं की हत्या कर दी गई है जबकि 50 से ज्यादा हिंसक हमले हुए हैं। इन हत्याओं के बाद भी मोहम्मद यूनुस सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी हुई है।

अगस्त 2024 में शेख हसीना को हटाए जाने के बाद से देश की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति लगातार अस्थिर बनी हुई है। यूनुस की अंतरिम सरकार और फरवरी 2026 में होने वाले चुनावों के बीच, अल्पसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ हिंसा, अत्याचार और हत्याओं का दौर जारी है। शेख हसीना ने हाल ही में कहा है कि इन उपद्रवियों पर लगाम लगाने के लिए मजबूत सरकार की दरकार है।

लेकिन हिन्दुओं की लगातार हो रही हत्या के बावजूद मुहम्मद यूनुस सरकार नींद से अब तक नहीं जगा पाई है। हिंसक इस्लामी भीड़ और कट्टरपंथी तत्वों को देश में अराजकता और अशांति फैलाने की खुली छूट मिली हुई है। दिसंबर 2025 से अब तक 11 हिन्दुओं की हत्या हो चुकी है।

स्थानीय मीडिया और सोशल मीडिया पर सामने आए मामलों पर गौर करें तो हालात की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

नरसिंदी में प्रांतोस कर्मकार की हत्या

2 दिसंबर को नरसिंदी जिले में 42 साल के हिंदू व्यवसायी प्रांतोस कर्मकार की गोली मारकर हत्या कर दी गई। उनकी ज्वेलरी की दुकान थी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नकाबपोश हमलावरों ने उन्हें घर से बाहर बुलाया, स्कूल के मैदान में ले जाकर सीने में गोली मार दी और फरार हो गए। बाद में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। पुलिस अब तक न तो हत्यारों की पहचान कर पाई है और न ही हत्या के मकसद का खुलासा हुआ है।

उत्पल सरकार की चाकू मारकर हत्या

5 दिसंबर की सुबह फरीदपुर जिले में 35 वर्षीय हिंदू मछली व्यापारी उत्पल सरकार की चाकू मारकर हत्या कर दी गई। हमलावरों ने उनकी वैन रोकी, सीने में वार किया और नकदी लूटकर फरार हो गए।

दिलचस्प बात यह है कि हमलावरों ने वैन चालक फिरोज मोल्ला को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया। उन्हें केवल आँखों पर पट्टी बाँधकर पुल से बाँध दिया गया था। बाद में स्थानीय लोगों ने मोल्ला को बचाया और पुलिस को सूचना दी।

पुलिस ने हिंदू मछली व्यापारी की खून ले लथपथ शव को फरीदपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल पहुँचाा। पुलिस के मुताबिक, उत्पल सरकार की हत्या में 2-3 लोग शामिल थे, जिनकी तलाश की जा रही है।

रंगपुर में जोगेश चंद्र रॉय और सुबर्णा रॉय की हत्या

7 दिसंबर की रात रंगपुर जिले में 75 वर्षीय जोगेश चंद्र रॉय और उनकी 60 वर्षीय पत्नी सुबर्णा रॉय की बेरहमी से हत्या कर दी गई। जोगेश रॉय बांग्लादेश मुक्ति संग्राम 1971 के योद्धा थे। पड़ोसियों ने सुबह उनके शव बरामद किए। उनका गला कटा हुआ था। अवामी लीग ने इस हत्याकांड के पीछे जमात-ए-इस्लामी का हाथ बताया।

कोमिल्ला में शांतो दास की हत्या

12 दिसंबर को कोमिल्ला जिले के होमना उपजिला में शांतो दास नामक एक हिंदू युवक का शव मक्के के खेत से बरामद हुआ। वह ऑटो-रिक्शा चालक और ग्राम पुलिस बल के सदस्य थे। इस घटना के बारे में उनके पिता अरुण चंद्र दास ने कहा था, “मेरा बेटा शांतो ऑटो रिक्शा चलाता था। गुरुवार शाम के बाद से हम उससे संपर्क नहीं कर पा रहे थे।” पीड़ित का गला कटा हुआ था और गर्दन पर चाकू के कई घाव थे। पुलिस ने शांतो दास का शव बरामद कर पोस्टमार्टम के लिए कोमिला मेडिकल कॉलेज अस्पताल भेज दिया।

मयमनसिंह में दीपू चंद्र दास की हत्या

18 दिसंबर को बांग्लादेश के मयमनसिंह जिले के भालुका गाँव में एक हिंसक मुस्लिम भीड़ ने एक हिंदू युवक की पीट-पीटकर हत्या कर दी । मृतक की पहचान 27 वर्षीय दीपू चंद्र दास के रूप में हुई है। पीड़ित को बुरी तरह पीटा गया, पेड़ से बाँध दिया गया और फिर आग लगा दी गई। इस घटना का दिल दहला देने वाला वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था।

दीपू चंद्र दास एक कपड़ा कारखाने में मजदूर के रूप में काम करते थे। विवाद के बाद, उन पर ईशनिंदा का झूठा आरोप लगाया गया। घटना के दिन उसे फैक्ट्री से निकाल दिया गया था और फ्लोर मैनेजर ने कट्टरपंथियों को बता दिया था। इसके बाद पुलिस की हिरासत में लेने के बाद उसे कट्टरपंथियों ने पीट-पीट कर मार डाला।

बोगुरा में पिंटू अकांडा की हत्या

23 दिसंबर को बांग्लादेश के बोगुरा जिले के आदमदिघी उपजिला में एक माइक्रोबस से पिंटू अकांडा नामक 35 वर्षीय हिंदू व्यक्ति का शव बरामद किया गया। उन्हें एक दिन पहले चार अज्ञात हमलावरों ने बंदूक की नोक पर अगवा कर लिया था। पीड़ित एक व्यवसायी और लॉटरी शोरूम के मालिक थे।

प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार, पिंटू अकांडा की गला घोंटकर हत्या की गई थी। एक बयान में, एएसपी आसिफ हुसैन ने कहा, “हमारा प्राथमिक संदेह है कि पिंटू को बंदूक की नोक पर अगवा करने के बाद गला घोंटकर मार डाला गया था। हम फिलहाल जाँच कर रहे हैं।”

पीड़ित परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। अपहरण का सीसीटीवी फुटेज अब सोशल मीडिया पर सामने आया है। वीडियो में चार नकाबपोश लोग पिंटू पर हथियार ताने हुए और उसे उसके शोरूम से बाहर ले जाते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसके बाद पीड़ित को जबरन गाड़ी में बैठाया गया।

राजबाड़ी में अमृत मंडल की हत्या

24 दिसंबर को अमृत मंडल नामक एक अन्य हिंदू व्यक्ति को उन्मादी भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। यह घटना बांग्लादेश के राजबारी जिले के पांग्शा उपजिला में घटी। पीड़ित की उम्र महज 29 वर्ष थी। वह होसेनडांगा गाँव का निवासी था। अमृत मंडल को गंभीर हालत में अस्पताल ले जाया गया लेकिन चोटों के कारण उसकी मृत्यु हो गई।

बाद में उनके शव को पोस्टमार्टम के लिए राजबारी सदर अस्पताल के मुर्दाघर भेजा गया। हिंदू व्यक्ति की हत्या के बाद, मोहम्मद यूनुस ने अमृत मंडल को ‘अपराधी’ बताकर उसकी पीट-पीटकर हत्या को उचित ठहराने की कोशिश की। इसके अलावा अंतरिम सरकार के मुखिया यूनुस ने भी इस मामले में सांप्रदायिक पहलू को कम करके आँका।

हबीगंज में कामदेव दास की हत्या

हबीगंज जिले में 18 वर्षीय हिंदू युवक कामदेव दास की हत्या ने इलाके में दहशत फैला दी। वह 25 दिसंबर से लापता था और 27 दिसंबर को उसका शव तालाब से मिला। उसके गले पर निशान भी मिले हैं। परिजनों और स्थानीय लोगों ने इस हत्या के पीछे इस्लामी कट्टरपंथियों का आरोप लगाया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, कामदेव गुरुवार (25 दिसंबर 2025) से लापता था। उसके पिता ने थाने में गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन परिवार का आरोप है कि पुलिस ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया।

बजेन्द्र बिस्वास की मारी गोली

29 दिसंबर को बांग्लादेश के अर्धसैनिक सहायक बल अंसार वाहिनी के हिन्दू सदस्य बजेन्द्र बिस्वास को गोली मार दी गई। ये अर्धसैनिक सहायक बल देश में आंतरिक सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार है। बिस्वास को मैनन सिंह इलाके में मारा गया। उसकी हत्या उसके दोस्त ने ही की। बांग्लादेशी मीडिया आउटलेट RTV ऑनलाइन ने बताया कि घटना के समय फैक्ट्री में कुल 20 अंसार सदस्य काम कर रहे थे। घटना के समय अंसार सदस्य नोमान मियाँ और बजेंद्र एक साथ बैठे थे। अचानक नोमान ने बजेंद्र की जांघ पर बंदूक (शॉटगन) तानी और कहा, ‘क्या मैं गोली मार दूँ?’ और फिर गोली चला दी। उसके बाद नोमान भाग गया।

खोकन चंद्र दास की हत्या

31 दिसंबर को को हिन्दू व्यवसायी खोकन चंद्र दास को घर लौटते समय हमलावरों ने चाकू से वार किया। इसके बाद पेट्रोल छिड़कर जिंदा जला दिया। खोकन दास अपने गाँव में एक छोटा मेडिकल स्टोर चलाते थे और मोबाइल बैंकिंग से भी जुड़ा काम करते थे। बुधवार (31 दिसंबर 2025) की रात, जब वह दुकान बंद कर घर लौट रहे थे, तभी रास्ते में कुछ लोगों ने उन्हें घेर लिया। पहले उन पर धारदार हथियार से हमला किया गया, जिससे उन्हें गंभीर चोटें आईं। इसके बाद हमलावरों ने उन पर ज्वलनशील पदार्थ डालकर आग लगा दी।

अपनी जान बचाने के लिए खोकन दास किसी तरह पास के तालाब में कूद पड़े, जिससे आग तो बुझ गई लेकिन वह बुरी तरह झुलस चुके थे और अत्यधिक खून बह चुका था। स्थानीय लोगों ने उन्हें तुरंत अस्पताल पहुँचाया, जहाँ से हालत नाजुक होने पर ढाका रेफर किया गया। हालाँकि, गंभीर चोटों और जलने के कारण डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके।

राणा प्रताप बैरागी की हत्या

जेस्सोर जिले के केशबपुर उपजिला स्थित अरुआ गाँव निवासी 38 वर्षीय राणा प्रताप बैरागी की सोमवार (05 जनवरी 2026) शाम को अज्ञात हमलावरों ने सिर में गोली मारकर हत्या कर दी गई। बैरागी की मोनिरामपुर के कोपलिया बाजार में बर्फ बनाने की फैक्ट्री थी। इसके अलावा ने ‘दैनिक बीडी खबर’ समाचार में नरैल क्षेत्र के कार्यवाहक संपादक भी थे।

पुलिस के अनुसार, सोमवार शाम लगभग 5.45 बजे बैरागी अपनी फैक्ट्री में थे। तभी तीन हमलावर मोटरसाइकिल पर आए और उन्हें फैक्ट्री से बाहर बुलाया और अपने साथ ले गए। रास्ते में हमलावरों ने बैरागी के सिर में तीन गोली मारी और भाग गए। बैरागी की मौके पर ही मौत हो गई।

हिंदू दुकानदार मणि चक्रवर्ती की चाकू घोंपकर हत्या

वहीं नरसिंदी जिले के पोलाश उपजिला क्षेत्र में एक हिंदू दुकानदार की सोमवार (05 जनवरी 2026) को चाकू से गोदकर बेरहमी से हत्या कर दी गई। वे चारसिंदुर बाजार में अपनी किराना दुकान चलाते थे। सोमवार शाम को भी वह अपनी दुकान पर बैठे थे, तभी अज्ञात हमलावरों ने अचानक उन पर हमला कर दिया।

उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन रास्ते में ही उन्होंने दम तोड़ दिया। मणि चक्रवर्ती को इलाके में प्रतिष्ठित व्यापारी के रूप में जाना जाता था। घटना के बाद से इलाके में दहशत फैल गई है।

मिथुन सरकार की हत्या

6 जनवरी को नाओगाँव जिले के महादेवपुर में कट्टरपंथी भीड़ से बचने के लिए नहर में कूदे एक हिंदू युवक मिथुन सरकार की मौत हो गई। रिपोर्ट के मुताबिक, स्थानीय लोगों की भीड़ ने मिथुन पर चोरी का आरोप लगाते हुए उसका पीछा किया। जान बचाने के लिए वह चकगौरी बाजार इलाके में एक नहर में कूद गया लेकिन तैर न पाने के कारण डूब गया। मदद की गुहार के बावजूद उसे बचाया नहीं गया। पुलिस ने नहर से उसका शव बरामद किया। मिथुन भंडारपुर गाँव का रहने वाला था।

ये वे हिन्दू थे, जिनकी मौत को पुलिस ने दर्ज की और मीडिया के सामने आई। कई ऐसी हत्याएँ भी हुई जिन्हें न तो दर्ज किया गया और न ही मीडिया में इन्हें जगह मिली।

हत्याओं के अलावा हिन्दुओं के उत्पीड़न की कई खबरें सामने आई। 19 दिसंबर को सिलहट में एक हिंदू पत्रकार सुशांत दासगुप्ता के घर पर हमला किया गया, वहीं एक रिक्शा चालक को कलावा पहनने पर पीटा गया। उस पर RA&W एजेंट होने का आरोप लगाया गया और पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया।

हिन्दू महिलाओं के साथ रेप की घटनाएँ काफी बढ़ गई है। जमीन हड़पने के लिए अकेली महिला को निशाना बनाया जा रहा है। कालीगंज में एक हिन्दू विधवा महिला को शाहीन और हसन ने गैंगरेप किया और उसके दो मंजिला घर को हड़पने की कोशिश की। महिला को पेड़ से बाँधकर उसके बाल भी काट डाले। वहीं एक हिन्दू सुमन को चोरी के आरोप में जमकर पीटा और खंभे से बाँध दिया। वह भिखारी था और उसका कोई आपराधिक मामला भी नहीं था।

ये यूनुस सरकार की हकीकत है जो चीख चीखकर कह रही है कि बांग्लादेश में कट्टरपंथियों का राज है। सरकार सिर्फ मूकदर्शक है, उसे न तो कानून व्यवस्था की फिक्र है और न ही जनता की।

हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो इसकी पुष्टि करता है। इसमें एक युवक बेखौफ थाने के अंदर बैठकर कह रहा है कि उसने हिन्दू पुलिस अधिकारी को जिंदा जला दिया। सत्ता का घमंड और सिस्टम का खस्ताहाल इससे ज्यादा क्या हो सकता है। इसे देखकर यही कहा जा सकता है कि बेशर्म मोहम्मद यूनुस, अब तो जाग जाओ, जनता त्राहि त्राहि कर रही है।

कहीं दिए अरबों डालर, कहीं किया युद्ध और कहीं बनाई रणनीति: जानिए- लुइजियाना से अलास्का तक अमेरिका ने कैसे फैलाईं अपनी सीमाएँ, अब ग्रीनलैंड कब्जाने का प्लान

नए साल 2026 की शुरुआत में ही डोनाल्ड ट्रंप ने दुनियाभर में हलचल मचा दी है। अमेरिका वेनेजुएला पर हमला कर वहाँ के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार कर अपने साथ ले आया। इस कदम के बाद अमेरिका ने कहा कि वे वेनेजुएला के तेल के 30 से 50 मिलियन बैरल का इस्तेमाल करेंगे और स्पष्टीकरण दिया कि यह कार्रवाई लोकतंत्र बहाल करने और सुरक्षा की वजह से की गई है। लेकिन बहुत देशों ने इसे अतंरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया है।

वेनेजुएला के बाद ट्रंप प्रशासन ने ग्रीनलैंड को भी अपनी ‘राष्ट्रीय सुरक्षा प्राथमिकता’ बताया है और कहा कि वह इसे हासिल करने के लिए कई विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। इन विकल्पों में सैन्य कार्रवाई भी शामिल है, ताकि रूस और चीन जैसे देशों के बढ़ते प्रभाव को टाला जा सके। लेकिन ग्रीनलैंड डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है और दोनों ने साफ कहा है कि वे अमेरिका को अपना हिस्सा नहीं बनने देंगे।

अगर इन दोनों घटनाओं को अलग-अलग न देखकर इतिहास के साथ जोड़ा जाए, तो अमेरिकी का पुरानी कहानी सामने आती है। अमेरिका पहले भी कई बार पैसे, ताकत और मौके का इस्तेमाल करके अपना सीमा दायरे को बढ़ा चुका है। लुइजियाना की खरीद हो, अलास्का का सौदा हो या हवाई और प्रशांत द्वीपों पर पकड़। हर बार वजह अलग बताई गई, लेकिन तरीका लगभग वही रहा।

अब वेनेजुएला में असर बढ़ाने की कोशिश और ग्रीनलैंड को प्राथमिकता बताना उसी पुराने पैटर्न की याद दिलाता है। इसी पृष्ठभूमि में यह समझना भी जरूरी है कि अमेरिका कैसे सीमा दायरे बढ़ा रहा है और क्यों अगली बारी ग्रीनलैंड की हो सकती है।

लुइजियाना सौदा: पैसे से अमेरिका का सबसे बड़ा सीमा विस्तार

अमेरिका का दायरा बढ़ने की कहानी की शुरुआत लुइजियाना सौदे से होती है। यह घटना बताती है कि अमेरिका ने सबसे पहले पैसों के दम पर कैसे अपना आकार कई गुना बढ़ाया। साल 1803 में अमेरिका ने फ्रांस से लुइजियाना नाम का एक बहुत बड़ा इलाका खरीद लिया। उस समय यह इलाका आज के अमेरिका के करीब एक-तिहाई हिस्से के बराबर था।

उस दौर में फ्रांस के शासक नेपोलियन को यूरोप में युद्ध लड़ने के लिए पैसों की जरूरत थी। वहीं अमेरिका को डर था कि अगर यह इलाका किसी ताकतवर देश के हाथ में रहा, तो उसकी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। इसी मजबूरी और मौके का फायदा उठाकर अमेरिका ने सिर्फ 15 मिलियन डॉलर में यह पूरा इलाका खरीद लिया। उस समय यह रकम बड़ी लगती थी, लेकिन बाद में यह सौदा अमेरिका के इतिहास का सबसे सस्ता और सबसे फायदेमंद सौदा साबित हुआ।

फ्लोरिडा, टेक्सास से अलास्का: एक ही सोच से अमेरिका का फैलाव

लुइजियाना सौदे के बाद धीरे-धीरे अमेरिका ने अपने कदम आगे बढ़ाए। अगली बारी फ्लोरिडा की आती है। फ्लोरिडा पहले स्पेन के कब्जे में था, लेकिन उस समय स्पेन कमजोर हो चुका था और इस इलाके को ठीक से संभाल नहीं पा रहा था। अमेरिका को डर था कि फ्लोरिडा उसके लिए खतरा बन सकता है। आखिरकार 1819 में Adams-Onis Treaty हुआ और फ्लोरिडा अमेरिका को मिल गया।

इसके बाद टेक्सास। टेक्सास पहले मैक्सिको का हिस्सा था, लेकिन वहाँ बड़ी संख्या में अमेरिकी नागरिक बस चुके थे। हालात ऐसे बने कि टेक्सास ने खुद को अलग देश घोषित कर दिया। कुछ साल बाद 1845 में टेक्सास अमेरिका में शामिल हो गया। यह कोई जमीन खरीदने का सौदा नहीं था, बल्कि राजनीतिक चाल और ताकत का इस्तेमाल से किया गया विस्तार था।

इसी दौर में ओरेगन टेरिटरी को लेकर अमेरिका और ब्रिटेन आमने-सामने थे। दोनों देशों के बीच टकराव हो सकता था, लेकिन अंत में बातचीत का रास्ता निकला। नतीजतन 1846 की Oregon Treaty के तहत यह इलाका बाँट लिया गया और आज का ओरेगन और वॉशिंगटन अमेरिका के हिस्से में आ गया।

फिर आया सबसे बड़ा और निर्णायक मोड़, मेक्सिको-अमेरिका युद्ध। यह युद्ध 1846 से 1848 तक चला। युद्ध खत्म होने के बाद अमेरिका को बहुत बड़ा इलाका मिला, जिसमें आज का कैलिफोर्निया, एरिजोना, न्यू मैक्सिको, नेवाडा और यूटा शामिल है। इसे Mexican Cession कहा जाता है। अमेरिका ने कुछ पैसा दिया, लेकिन असल में यह जमीन युद्ध के बाद उसकी ताकत के कारण मिली।

इसके कुछ साल बाद 1853 में Gadsden Purchase हुआ। अमेरिका ने मैक्सिको से एक छोटा-सा मेसिला वैली इलाका खरीदा। अमेरिका की वजह थी कि उसे रेलवे लाइन बिछानी थी। 78 हजार स्क्वायर किलोमीटर की जमीन भले ही छोटी थी, लेकिन अमेरिका ने भविष्य को देखते हुए यह सौदा किया।

अलास्का: कभी बेकार समझा गया, आज दुनियाभर की राजनीति का केंद्र

अलास्का को अमेरिका के विस्तार की कहानी में सबसे दिलचस्प अध्याय माना जाता है। साल 1867 में अमेरिका ने इसे रूस से खरीदा था। उस समय अमेरिका के भीतर ही लोग इस फैसले का मजाक उड़ाते थे। कहा जाता था कि अमेरिका ने बर्फ, बर्फ और सिर्फ बर्फ खरीद ली है। इसे ‘रूस की बेकार जमीन’ तक कहा गया। लेकिन समय ने साबित किया कि यह अमेरिका का यहा फैसला उसकी दूरगामी सोच का उदाहरण है।

अलास्का में बाद में सोना, तेल और गैस निकली। धीरे-धीरे यह इलाका अमेरिका की ऊर्जा सुरक्षा का बड़ा आधार बन गया। आज अमेरिका के पूरे तेल उत्पादन का बड़ा हिस्सा अलास्का से आता है। सिर्फ संसाधन ही नहीं, बल्कि इसकी भौगोलिक स्थिति भी बेहद अहम है। अलास्का सीधे ‘रूस के बेहद करीब’ है और आर्कटिक क्षेत्र में भी अमेरिका की मौजूदगी को मजबूत करता है।

यही वजह है कि अलास्का सिर्फ राज्य नहीं, बल्कि अमेरिका का रणनीतिक हथियार बन चुका है। हाल के समय में अलास्का एक बार फिर चर्चा में आया था, जब डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बैठक के लिए इस जगह को चुना गया था।

अलास्का यह दिखाता है कि अमेरिका ने सिर्फ आज की जरूरत नहीं देखी, बल्कि भविष्य की ताकत को ध्यान में रखकर फैसले किए। जिस जमीन को कभी बेकार कहा गया, वही आज अमेरिका को ऊर्जा, सुरक्षा और वैश्विक राजनीति में बढ़त देती है।

अमेरिका की यही सोच आज ग्रीनलैंड को लेकर भी दिखाई देती है। जैसे अलास्का में बर्फ के नीचे खजाना निकला, वैसे ही ग्रीनलैंड में भी खनिज, तेल और रणनीतिक रास्ते छिपे हुए हैं। इतिहास बताता है कि अमेरिका जब किसी बर्फीली और दूर की जमीन में दिलचस्पी दिखाता है, तो उसके पीछे सिर्फ नक्शा नहीं, बल्कि आने वाले दशकों की योजना होती है।

द्वीपों और छोटे क्षेत्रों के जरिए अमेरिका का फैलाव: समुद्री क्षेत्र में पकड़ मजबूत

अमेरिका ने खुद को केवल महाद्वीपों तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि द्वीपों और छोटे-छोटे क्षेत्रों के जरिए भी दायरा बढ़ाया। ये इलाके रणनीतिक और समुद्री महत्व रखते थे। हर जगह अमेरिका ने अलग तरीका अपनाया। किसी को खरीदा, कभी युद्ध के बाद समझौता और कभी सीधे दबाव या कब्जा। इन इलाकों से अमेरिका ने नौसेना और व्यापार में अपनी पकड़ मजबूत की।

सबसे पहले बात हवाई द्वीप (Hawaiian Island) की। हवाई पहले स्वतंत्र राज्य था, जहाँ रानी का शासन था। लेकिन अमेरिकी व्यापारियों और सेना के दबाव में 1898 में हवाई को अमेरिका में मिला लिया गया। यहाँ न खरीद हुई, न खुला युद्ध, बल्कि राजनीतिक दबाव और सत्ता पलट के जरिए अमेरिका ने इसे अपने अधीन किया।

इसके बाद आते हैं फिलिपींस और प्रशांत क्षेत्र के बड़े द्वीप। 1898 का स्पेन-अमेरिका युद्ध के बाद अमेरिका को फिलिपींस, गुआम (Guam) और प्यूर्टो रिको (Puerto Rico) मिले। यह इलाके सीधे युद्ध और उसके बाद हुए समझौते से अमेरिका में शामिल हुए। यहाँ अमेरिका का मकसद समुद्री रास्तों और रणनीतिक बेस पर दबदबा बनाना था।

अमेरिका ने छोटे और दूरदराज के अटोल और द्वीप भी अपने अधीन किए। इनमें Midway Island, Wake Island, Johnston Atoll, Palmyra Atoll, Kingman Reef और American Samoa शामिल हैं। ये इलाके आकार में छोटे थे। अमेरिका ने इनमें सैन्य बेस बनाए, नौसेना के लिए रास्ते बनाए, जिससे प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की पकड़ मजबूत हुई।

निष्कर्ष: वेनेजुएला और ग्रीनलैंड, अमेरिकी के विस्तार की वही पुरानी कहानी

अगर अब तक की पूरी कहानी को एक साथ जोड़कर देखा जाए, तो बात साफ समझ आती है। अमेरिका का विस्तार कभी अचानक नहीं हुआ और न ही किसी एक तरीके को अपनाने से हुआ। उसने कभी जमीन पैसे देकर खरीदी, कभी समझौते और दबाव से ली, कभी युद्ध के बाद अपने कब्जे में की और कभी छोटो-छोटे क्षेत्रों में धीरे-धीरे अपने पकड़ बनाई। अलास्का से लेकर हवाई द्वीप, हर जगह अमेरिका ने अपने फायदे को सबसे ऊपर रखा है।

ऐसे में आज जब वेनेजुएला की बात होती है, तो इतिहास अपने आप याद आता है। वेनेजुएला दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले देशों में से एक है। अमेरिका लंबे समय से वहाँ की राजनीति और सत्ता बदलाव में दिलचस्पी दिखाता रहा है। भले ही आज सीधे जमीन लेने की बात न हुई हो, लेकिन सत्ता पर असर डालकर और संसाधनों को नुकसान पहुँचाकर अमेरिका वही पुरानी रणनीति से अपना दायरा बढ़ाने का काम जरूर कर सकता है।

इसी तरह ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की दिलचस्पी भी नई नहीं लगती है। बर्फ से ढका यह इलाका दिखने में भले ही खाली लगे, लेकिन इसके नीचे खनिज, तेल और भविष्य में समुद्री रास्ते छिपे हैं। जैसे कभी अलास्का को बेकार समझा गया था और बाद में वही अमेरिका के लिए खजाना साबित हुआ, वैसे ही ग्रीनलैंड को भी अमेरिका भविष्य की बड़ी रणनीति के तौर पर देख रहा है।

इसीलिए वेनेजुएला और ग्रीनलैंड को अलग-अलग घटनाओं की तरह देखने के बजाए, अगर उन्हें अमेरिका के पुराने विस्तार के इतिहास से जोड़कर देखा जाए। तब तस्वीर ज्यादा साफ हो जाती है।

राजनीति के लिए कानून-व्यवस्था के नाम का डर फैलाया गया: पढ़ें- मद्रास HC ने कार्तिगई दीपम जलाने को सही ठहराते हुए स्टालिन सरकार से क्या-क्या कहा

मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन के उस आदेश को सही ठहराया जिसमें थिरुपरनकुंद्रम हिल पर दीपाथून पर कार्तिगई दीपम जलाने की इजाजत दी गई थी। कोर्ट ने स्टालिन के नेतृत्व वाली DMK सरकार की कड़ी आलोचना की। साथ ही सरकार के कानून व्यवस्था की समस्या के दावों को खारिज करते हुए इसे बेबुनियाद और राजनीति से प्रेरित बताया।

मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें मशहूर थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर बने पुराने पत्थर के खंभे पर दीया जलाने का आदेश दिया गया था। यह भगवान मुरुगन के छह घरों में से एक माना जाता है। यह आदेश 6 जनवरी को जस्टिस जी. जयचंद्रन और जस्टिस के.के. रामकृष्णन की खंडपीठ ने दी थी।

कोर्ट ने द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) सरकार के रवैये को लेकर नाराजगी जताई, क्योंकि उसने साल में एक दिन होने वाले रस्म को करने की इजाज़त नहीं दी। कोर्ट ने कहा कि इससे अशांति फैलेगी। बेंच ने कानून व्यवस्था के मुद्दे को ‘फिजुल और यकीन करने के लायक नहीं’ बताया।

मद्रास हाईकोर्ट ने सख्ती के साथ कहा कि ऐसा तभी हो सकता है जब ऐसी गड़बड़ी खुद राज्य द्वारा स्पॉन्सर की गई हो। हम प्रार्थना करते हैं कि कोई भी राज्य अपना पॉलिटिकल एजेंडा पूरा करने के लिए उस लेवल तक न गिरे। इससे सरकार को बड़ी शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी।

अपील करने वाले सबूत नहीं दे पाए, वक्फ बोर्ड के पास अधिकार नहीं

जजों ने कहा कि अपील करने वालों जैसे- हज़रत सुल्तान सिकंदर बादुशा अवुलिया दरगाह और राज्य के अधिकारियों के पास सबूत नहीं हैं। इनलोगों के पास ऐसे सबूत नहीं हैं कि शैवों के ‘आगम शास्त्र’ में उस जगह पर दीया जलाने पर रोक है, जो सीधे गर्भगृह में भगवान की मूर्ति के ऊपर नहीं है।

कोर्ट ने जोर देकर कहा, “निर्देश का मकसद सुरक्षा पक्का करना है। इसलिए जज द्वारा सुझाई गई दूरी की पाबंदी दीपम जलाने की जगह तय करने के लिए ज़रूरी शर्त नहीं है। दीपम जलाने की जगह तय करते समय सिर्फ धार की प्रॉपर्टी की सुरक्षा ही अहम है।”

धार्मिक कामों का महत्व, पत्थर के खंभे पर दीपम जलाने की जरूरत

बेंच ने कहा कि दीपम जलाने के लिए सबसे अच्छी जगह पत्थर का खंभा है, जो एक अलग चट्टान की चोटी पर है और उस चोटी के नीचे है जहाँ धार है। जजों ने धार्मिक कामों का मकसद भी बताया और बताया कि कार्तिकेयदीपम और दूसरे त्योहारों के दौरान अच्छी जगहों पर दीपम जलाने का रिवाज है, ताकि पहाड़ी और आस-पास के इलाकों में रहने वाले भक्त देख सकें और पूजा कर सकें।

फिर उन्होंने संत थिरुमूलर का ज़िक्र किया, जिन्होंने कहा था कि ‘रोशनी भगवान शिव का रूप है।’ कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि देवस्थानम के पास अपने भक्तों की इच्छाओं को नज़रअंदाज़ करने का कोई कारण नहीं है। उसकी ज़मीन की सीमाओं के अंदर ऊँची जगहों पर दीये जलाने की परंपरा है।

इसने पिछले फ़ैसले को दोहराया कि पहाड़ी पर कोई भी गतिविधि तय सीमाओं के अंदर हो रहा है। कोर्ट ने फिर से कहा कि पहाड़ी प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल और अवशेष (AMASR) एक्ट के तहत एक सुरक्षित इलाका है। सभी को एक्ट, इसके नियमों और जस्टिस आर. विजयकुमार के फैसले के बाद जो निकल कर सामने आया है, उसका पालन करना चाहिए।

DMK सरकार की चिंता निराधार

अदालत ने DMK सरकार की खिंचाई करते हुए कहा कि कानून-व्यवस्था की आशंका ‘एक काल्पनिक डर’ है, जिसे राजनीतिक एजेंडे के लिए बनाया गया है। पीठ ने कहा, “यह मानना हास्यास्पद और मुश्किल है कि शक्तिशाली राज्य इस डर से दीपम जलाने की अनुमति नहीं दे रहा है कि इससे सार्वजनिक शांति भंग होगी”। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पहाड़ी पर स्थित दीपस्तंभ की जगह श्री सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर की संपत्ति है।

बेंच ने आरोप लगाया, “देवस्थानम से कुछ लोगों को दीया जलाने के लिए खंभे तक आने देना और भक्तों को पहाड़ी के नीचे ही रोककर पूजा करना कोई मुश्किल काम नहीं है। यह दिखाना कि इस तरह के जमावड़े से शांति भंग होगी, भगदड़ मचेगी, समुदाय के बीच वैमनस्य बढ़ेगा, वगैरह, या तो यह दिखाता है कि वे कानून-व्यवस्था बनाए रखने में नाकाम हैं या समुदायों के बीच सद्भाव लाने में हिचकिचा रहे हैं।”

इसने कहा कि राज्य को, जिला प्रशासन के जरिए इस मुद्दे पर हिन्दू मुस्लिम समुदायों के बीच भाईचारा और शांति लाने की कोशिश करनी चाहिए था। कोर्ट ने कहा कि इतने सालों में शांति वार्ता ने सिर्फ शक बढ़ाने का काम किया है, क्योंकि यकीन की कमी है।

कोर्ट ने थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर दीया जलाने को सही ठहराया

जजों ने कहा कि दीपाथॉन में दीया देवस्थानम को जलाना होगा। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (ASI) पहाड़ी के स्मारकों की सुरक्षा के लिए AMASR एक्ट में दी गई पाबंदियों और रोक के साथ-साथ जरूरी शर्तें भी लागू करेगा।

उन्होंने बताया, “देवस्थानम को अपनी टीम के जरिए, तमिल महीने कार्तिगई में पड़ने वाले कार्तिगईदीपम त्योहार के मौके पर दीपाथून में दीया जलाना होगा। किसी भी आम आदमी को देवस्थानम टीम के साथ जाने की इजाज़त नहीं होगी।” टीम के सदस्यों की संख्या पुलिस और ASI से सलाह-मशविरा करने के बाद चुनी जाएगी। पूरा इवेंट डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर की देखरेख में होगा।

हिंदू अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई

मद्रास हाई कोर्ट ने फैसला किया कि थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर पुराना पत्थर का खंभा कार्तिगई दीपम का दीया जलाने के लिए सही है। हालांकि, खंभे के सिकंदर बादुशा दरगाह के पास होने की वजह से इसका विरोध हुआ, और दीया आमतौर पर उचिपिलैयार मंदिर के पास एक अलग जगह पर जलाया जाता था।

हालाँकि, जस्टिस जीआर स्वामीनाथन ने दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि दीपाथून पर दीया जलाने से मुस्लिम समुदाय या दरगाह के अधिकारों पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा। 3 नवंबर को पारंपरिक उचिपिलैयार मंदिर मंडपम में दीया जलाने के बाद पुलिस और हिंदू एक्टिविस्ट के बीच लड़ाई हो गई थी।

DMK ने कानून व्यवस्था को मुद्दा बनाते हुए कोर्ट के आदेश के खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। वहीं याचिकाकर्ता रामा रविकुमार ने CISF की मदद से पहाड़ी पर चढ़ने की कोशिश की थी।

लेकिन मदुरै डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर ने लोगों की सुरक्षा का हवाला देते हुए रोक लगा दी। इस स्थिति में मदुरै कमिश्नर जे लोगनाथन की अगुवाई में राज्य पुलिस ने श्रद्धालुओं को रोक दिया। हिंदू मुन्नानी के सदस्य समेत तमाम श्रद्धालुओं ने मंदिर के सामने जमा होकर कोर्ट द्वारा तय जगह पर दीया जलाने की इजाज़त देने की माँग की।

कुछ लोगों ने पुलिस बैरिकेड पार करने की भी कोशिश की। धक्का-मुक्की और झगड़े की वजह से एक पुलिस ऑफिसर घायल हो गया। एक टॉप हिंदू मुन्नानी एक्टिविस्ट के मुताबिक, मंदिर एडमिनिस्ट्रेशन ने कोर्ट के आदेश का पालन करने के लिए ‘कोई भी इंतज़ाम’ नहीं किया था।

मंदिर के मैनेजमेंट ने पिछले फैसले को यह कहते हुए चुनौती भी दी थी कि इस कार्रवाई से सांप्रदायिक सद्भाव को खतरा हो सकता है। लेकिन, कोर्ट ने सख्त निर्देश दिया कि शाम 6 बजे तक दीया जलाना होगा, नहीं तो शाम 6:05 बजे कंटेम्प्ट की कार्रवाई शुरू होगी।
जस्टिस स्वामीनाथन ने कहा, “मैंने खास तौर पर पुलिस को यह पक्का करने का आदेश दिया था कि भक्तों का पिटीशन में बताई गई जगह पर कार्यक्रम मनाने और पूजा करने का अधिकार बना रहे, लेकिन इसका पालन नहीं किया गया।”

फिर भी, तमिलनाडु सरकार और मदुरै के अधिकारियों ने बाद में फैसले को चुनौती देने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां भक्तों ने जस्टिस जी जयचंद्रन और केके रामकृष्णन की डिवीजन बेंच को बताया कि तमिलनाडु के हिंदू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट्स डिपार्टमेंट (HR&CE डिपार्टमेंट) कमिश्नर ने 17 दिसंबर को सनातन धर्म का ‘खुलेआम अपमान और बेइज्जती’ की है।

हिंदुओं का पक्ष रख रहे सीनियर एडवोकेट एस श्रीराम ने कहा कि हर बार जब शांति बैठक में हिन्दुओं को अपने अधिकार छोड़ने के लिए मजबूर किया गया है। उन्होंने थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर गैर-कानूनी कब्जे के साथ-साथ वहां जानवरों की बलि देने, उसका नाम बदलकर सिकंदर हिल करने और एक इस्लामी त्यौहार पर उसे हरे रंग से रंगने की कोशिश की भी चर्चा की। यह भी बताया गया कि राज्य कोई ऐसा डॉक्यूमेंट नहीं दे पाया, जिससे पता चले कि वह खंभा दीपाथॉन नहीं है।

यह ध्यान देने वाली बात है कि इस मामले को लेकर विपक्षी नेताओं ने पार्लियामेंट से वॉकआउट भी किया। विदुथलाई चिरुथैगल काची के फाउंडर-प्रेसिडेंट थोल. थिरुमावलवन ने तो थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर दीया जलाने की कोशिश कर रहे हिंदू भक्तों को ‘आतंकवादी’ तक कह डाला। यहाँ तक कि जस्टिस स्वामीनाथन को पद से हटाने की माँग की।

मद्रास HC ने हिंदू अधिकारों को दबाने की राज्य सरकार की कोशिश को एक बड़ा झटका दिया है और एक मिसाल कायम की है। भले ही राज्य की मशीनरी बेशर्मी से हिंदू अधिकारों को दबाने और उनके धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन करने की कोशिश कर रही हो। फैसले में कहा गया कि कानून और व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है, न कि सांप्रदायिक सद्भाव के बहाने हिंदू भक्तों को उनके विश्वासों और प्रथाओं को मानने से रोकना।

इसने सांप्रदायिक सद्भाव की गलत व्याख्या की भी निंदा की गई है, जो सिर्फ हिंदुओं की धार्मिक आजादी पर हमला करके हासिल की जाती है। सबसे महत्वपूर्ण बात, कोर्ट ने राज्य सरकार के गलत इरादों को सामने लाया है, जिसका मकसद मुसलमानों को खुश करने के लिए हिंदू समुदाय के अधिकारों को रोकना था।

(ये लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

अंबेडकर मंदिर के खिलाफ नहीं थे: सोमनाथ मंदिर से जुड़ा उनका पत्र बताता है असली इतिहास, लेखक अनुज धर ने शेयर किया दस्तावेज

गुजरात में समंदर के किनारे भारत का गौरव बनकर शान से खड़े सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी के आक्रमण को 1000 साल हो गए हैं। 8 जनवरी से गुजरात में सोमनाथ स्वाभिमान पर्व भी मनाया जाना है। इस बीच मंदिर से जुड़े पुराने किस्से लगातार चर्चा में हैं। सोशल मीडिया पर डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का मंदिर से जुड़ा एक पत्र वायरल हो रहा है जो उन्होंने कन्हैयालाल माणिकलाल (केएम) मुंशी को लिखा था।

सरदार पटेल ने नवंबर 1947 में जनता से वादा किया था कि वह सोमनाथ मंदिर का पुनर्निमाण करवाएँगे दिसंबर 1950 में उनके निधन के बाद तत्कालीन खाद्य मंत्री मुंशी ने यह जिम्मेदारी अपने कंधे पर ले थी। वह मंदिर के पुनर्निमाण की देख रेख कर रहे थे। मई 1951 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा नए मंदिर में ज्योतिर्लिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की जानी थी उससे पहले मार्च 1951 में मुंशी को अंबेडकर ने पत्र लिखा था।

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस मंदिर के पुनर्निमाण से विचलित थे यह तथ्य किसी से छिपा नहीं हैं। नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के प्रस्ताव का ‘हिंदू पुनरुत्थानवाद‘ कहकर विरोध भी किया था। वहीं, अंबेडकर के पत्र से यह स्पष्ट होता है कि वह इस मंदिर के पुनर्निर्माण के ना केवल समर्थक थे बल्कि उसमें अपने सुझाव भी दे रहे थे।

अंबेडकर ने पत्र में क्या लिखा है?

एक वर्ग द्वारा अंबेडकर की यह छवि बनाई गई है कि हिंदू विरोधी थे लेकिन यह पत्र अंबेडकर की छवि को लेकर एक नई दृष्टि भी देता है। Conundrum और Your Prime Minister is Dead जैसी चर्चित किताबों के लेखक अनुज धर ने ‘X’ पर यह पत्र शेयर किया है।

27 मार्च 1951 के इस पत्र में अंबेडकर मुंशी को लिखते हैं, “मुझे यह जानकारी मिली है कि सोमनाथ में मूर्ति की स्थापना की तिथि 11 मई तय की गई है। मैं चाहता हूँ कि इस अवसर पर मेरे मित्र अनिरुद्धाचार्य जी को समारोह में आमंत्रित किया जाए। वे बड़ौदा जिले के चंदोदा स्थित मठ के प्रमुख हैं। मैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ और मुझे पूरा विश्वास है कि वे इस निमंत्रण के पूर्णतः योग्य हैं।”

GROK ने लेटर को बताया AI जेनरेटेड, जानें क्या है सच?

अनुज धर के पोस्ट शेयर करने के बाद कई X यूजर्स इस पत्र को नकली और AI द्वारा बनाया गया बताने लगे। कई यूजर्स ने मस्क की कंपनी xAI के चैटबॉट GROK को टैग कर इस लैटर को लेकर सवाल पूछे तो चैटबॉट ने इसे AI द्वारा बनाया गया पत्र बता दिया।

चैटबॉट ने X पोस्ट में लिखा, “यह पत्र अंबेडकर की आधिकारिक लेखों या ऐतिहासिक अभिलेखागारों में नहीं मिलता है। 2026 से पहले की खोजों में इसका कोई ज़िक्र नहीं मिला। ‘Antrudhachary’ नाम का 1951 के ऐतिहासिक रिकॉर्ड से कोई मेल नहीं खाता। ऐसा लगता है कि यह मनगढ़ंत है, हो सकता है कि AI द्वारा बनाया गया हो।”

इसके बाद तो इसे AI द्वारा बनाया गया बताने वालों की बाढ़ सी ही आ गई। हमने खुद अनुज धर से इस पत्र को लेकर बात की। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा, “इन सभी रिकॉर्ड्स का सोर्स नेशनल आर्काइव्स है। जो कोई भी इन्हें नकली समझता है, उसे आर्काइव्स में केएम मुंशी के पेपर्स देखने चाहिए।” साथ ही, उन्होंने इस पत्र से जुड़े और पत्र भी साझा किए हैं।

यानी AI चैटबॉट के भरोसे जो लोग आर्काइव्स पढ़ने या उससे समझने की कोशिश करते हैं और मानते हैं कि AI है तो सब जानता है होगा, उनके लिए यह समझना भी जरूरी है कि AI शब्द नहीं जानता है। AI पर पूरी तरह भरोसा करना समस्या है।

चैटबॉट आर्काइव्स को इसलिए नहीं पढ़ पाता क्योंकि ऐतिहासिक अभिलेखों का बहुत बड़ा हिस्सा आज भी डिजिटल रूप में मौजूद ही नहीं है। भारत ही नहीं, दुनिया भर के आर्काइव्स में करोड़ों दस्तावेज कागज पर तो सुरक्षित हैं कि पुराने सरकारी फाइलें, निजी पत्र, हस्तलिखित डायरी, रिपोर्टें और रजिस्टर। ये दस्तावेज अक्सर न तो स्कैन किए गए हैं और न ही ऑनलाइन उपलब्ध हैं। चैटबॉट केवल उसी सामग्री तक पहुँच सकता है जो पहले से डिजिटल और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो।

इसमें भी कई तरह की दिक्कतें हैं, जो आर्काइव्स डिजिटाइज किए भी गए हैं, वे अधिकतर स्कैन की गई तस्वीरों के रूप में होते हैं, न कि साफ-सुथरे टेक्स्ट फाइल की तरह। इनमें स्याही के धब्बे, फटे पन्ने, धुंधले अक्षर और पुरानी लिपियाँ होती हैं। ऐसी सामग्री को पढ़ने के लिए सिर्फ भाषा ज्ञान का नहीं बल्कि पैलियोग्राफी और ऐतिहासिक दस्तावेज पढ़ने का अभ्यास चाहिए जो चैटबॉट के लिए संभव नहीं है।

इस लेटर से जुड़े अन्य पत्र

अनुज धर ने अंबेडकर के इस पत्र से जुड़े दो अन्य पत्र भी साझा किए हैं जिनमें एक अंबेडकर को मुंशी का जवाब और दूसरे में स्वामी अनिरुद्धाचार्य को निमंत्रण है। 30 मार्च 1951 को मुंशी ने डॉक्टर अंबेडकर को लिखा, “27 मार्च के आपके पत्र के लिए धन्यवाद। मुझे अनिरुद्धाचार्य को समारोह के लिए आमंत्रित करके बहुत खुशी होगी। मैं आपसे यह भी अनुरोध करूँगा कि आप भी प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में शामिल हों।”

अंबेडकर को मुंशी का पत्र (साभार: अनुज धर)

30 मार्च 1951 को ही मुंशी ने स्वामी अनिरुद्धाचार्य को निमंत्रण देते हुए पत्र लिखा था। मुंशी ने लिखा, “आपको यह जानकारी होगी कि सोमनाथ लिंग की स्थापना 11 मई 1951 को प्रभास पाटन में तय की गई है। इसी दौरान अखिल भारतीय संस्कृत परिषद का आयोजन भी किया जाएगा। हम इस अवसर पर देश के सभी धार्मिक संस्थानों के प्रमुखों को आमंत्रित कर रहे हैं। हमें बहुत खुशी होगी यदि आप अपनी सुविधा के अनुसार इस पावन अवसर पर उपस्थित होकर कार्यक्रम की शोभा बढ़ाएँ। आप चाहें तो कार्यक्रम से दो दिन पहले भी पधार सकते हैं।”

स्वामी अनिरुद्धाचार्य को मुंशी का पत्र (फोटो साभार: अनुज धर)

अंबेडकर के पत्र के अलावा इन दोनों को पढ़ने के बाद अनुज धर का यह दावा पुख्ता हो जाता है कि यह पत्र कोई इकलौता पत्र नहीं है जो AI से बना लिया गया है बल्कि पत्रों की एक पूरी सीरीज है। इससे उन लोगों की भी पोल खुल जाती है जो अंबेडकर को हिंदुओं को खिलाफ खड़ा करने पर तुले रहते हैं।

‘डेमोक्रेसी’ के नाम पर गिराई सरकारें, तानाशाहों को किया मजबूत: जानिए कैसे दुनियाभर में दोगलापन करता है अमेरिका

शनिवार (3 जनवरी) की सुबह, काराकास की नींद रात के आसमान में फाइटर जेट्स के उड़ने की आवाज़ से खुली। सुबह तक यह साफ हो चुका था कि वेनेज़ुएला एक जाने-पहचाने अमेरिकी ड्रामे का नया मंच बन चुका है। यहाँ अमेरिकी सेना की टुकड़ी को ‘डेमोक्रेसी वापस लाने’ के एक मिशन पर लगाया गया था।

US के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कन्फर्म किया कि अमेरिकी सेना ने वेनेज़ुएला में कई हमले किए हैं और प्रेसिडेंट निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को पकड़कर यूनाइटेड स्टेट्स ले गए हैं। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर ऑपरेशन की घोषणा की, और इसे ‘नारकोटिक टेररिज्म’ कहे जाने वाले सिस्टम के खिलाफ अभियान बताया।

(साभार- ट्रंप/ ट्रूथ सोशल)

इसके तुरंत बाद, US अटॉर्नी जनरल पामेला बोंडी ने बताया कि मादुरो और फ्लोरेस पर न्यूयॉर्क में नार्को-टेररिज्म की साजिश में शामिल होने से लेकर लोकतंत्र को खत्म करने जैसे आरोप लगाए गए थे।

ट्रंप ने मादुरो सरकार पर प्रवासियों को US के दक्षिणी बॉर्डर की ओर धकेलने, जेलों और मेंटल इंस्टीट्यूशन को खाली करने और ड्रग कार्टेल और आतंकवादी ग्रुप्स के साथ मिलकर काम करने का आरोप लगाया। ट्रंप के मुताबिक, वेनेजुएला अमेरिका में कोकेन लाने का एक बड़ा रास्ता बन गया है, जहाँ कैरिबियन और पैसिफिक के रास्ते नशीले पदार्थों की तस्करी होती है।

यह वजह जानी-पहचानी लग रही थी क्योंकि पहले भी अमेरिका ऐसे आरोप लगाकर कई देशों के साथ ऐसा व्यवहार कर चुका है। कई सालों से अमेरिका अपने विरोधी देशों और उनकी सरकारों पर मानवाधिकार उल्लंघन करने, लोगों पर जुल्म करने और दुनिया की सुरक्षा के लिए खतरा बताता रहा है।

वेनेज़ुएला के मामले में सितंबर 2025 में ट्रंप प्रशासन ने कई नावों पर हमला किया था और उसमें ड्रग्स होने की बात कही थी। यह एक संकेत था, जो अमेरिका ने दुनिया को दिया था।

हालाँकि मादुरो ने हमेशा ऐसे आरोपों से इनकार किया और उन्हें वेनेजुएला के बड़े तेल भंडार को कंट्रोल के लिए एक कवर बताया। हमलों से कुछ दिन पहले मादुरो ने प्रवासियों और ड्रग ट्रैफिकिंग पर US के साथ सहयोग की पेशकश की थी। लेकिन अमेरिका ने मादुरो के सामने देश छोड़ने की शर्त रख दी थी। इससे मादुरो उखड़ गए। इस पर अमेरिका ने मादुरो पर ‘गंभीर’ नहीं होने का आरोप लगाया।

इसका खामियाजा वेनेजुएला को उठाना पड़ा। अमेरिकी जेट बिना कॉन्ग्रेस की मंजूरी के उड़ गई। इसपर अमेरिका में भी सवाल किए जा रहे हैं। यूएन को बताना तो दूर की बात है।

वेनेज़ुएला में जो हुआ वह एक ऐसे पैटर्न से मेल खाता है, जिसे दुनिया ने पहले भी कई बार देखा है। डेमोक्रेसी, सिक्योरिटी और नैतिक जिम्मेदारी में लिपटा हुआ एक शासन बदलने का ऑपरेशन।

डेमोक्रेसी बहाल करने के नाम पर शासन बदलना

वेनेज़ुएला में US का दखल यूँ ही नहीं हुआ। यह दुनिया भर में अमेरिका की लीडरशिप में हुए तख्तापलट का एक और उदाहरण है। वियतनाम से लेकर इराक तक, अफगानिस्तान से लेकर सीरिया तक अमेरिका ने बार-बार मिलिट्री एक्शन को ‘खराब राज’ हटाने और उनकी जगह ‘डेमोक्रेटिक सिस्टम’ लाने के तौर पर इस्तेमाल किया। इसकी वजह से दुनिया में अस्थिरता का दौर आया और व्यापक हिंसा हुई।

2001 के आखिर में US के समर्थन वाली सेना काबुल में घुसी और कुछ ही हफ्तों में तालिबान सरकार को गिरा दिया। हामिद करजई को अमेरिकी समर्थन मिला और उन्हें अफगानिस्तान का लीडर बनाया गया। उस वक्त तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने सेंट्रल एशिया में डेमोक्रेसी की जड़ें जमने की बात कही। दो दशक बाद, US सैनिक वापस चले गए और तालिबान लगभग रातों-रात सत्ता में वापस आ गया। अमेरिका की बनाई सरकार गिर गई। इससे पता चलता है कि वह हमेशा से कितनी खोखली और परजीवी थी।

इराक ने भी ऐसा ही रास्ता अपनाया गया। 2003 में US सैनिकों ने सद्दाम हुसैन को सत्ता से बाहर कर दिया। इराक को मिडिल ईस्ट में लोकतंत्र का अगुआ करार दिया। लेकिन इराक के सिक्योरिटी सिस्टम को खत्म करने से लाखों हथियारबंद लोग बेरोजगार हो गए। देश बगावत, सांप्रदायिक हिंसा और सिविल वॉर में डूब गया। ईरान के सपोर्ट वाले मिलिशिया का असर बढ़ा, और इस अफ़रा-तफ़री से आखिरकार इस्लामिक स्टेट बना, जिसने इलाके के सिक्योरिटी माहौल को इस तरह से बदल दिया जो आज भी उसे परेशान करता है।

सीरिया, लीबिया और पहले वियतनाम एक ही कहानी के अलग-अलग रूप हैं। US नैतिकता की दुहाई देते हुए मौजूदा सरकार को सत्ता से बाहर करता है। सिस्टम खत्म कर देता है और टूटे-फूटे समाज को पीछे छोड़ जाता है। जानकार इस पैटर्न को विदेशियों द्वारा थोपा गया शासन परिवर्तन कहते हैं।

पिछले 120 सालों में यूनाइटेड स्टेट्स ने करीब 35 देशों के नेताओं को सत्ता से जबरदस्ती बाहर किया है। ये आंकड़ा पूरी दुनिया में हुए ऐसे सभी दखलदांजी का लगभग एक-तिहाई है। चिंता की बात यह है कि इनमें से लगभग एक-तिहाई देशों में शासन परिवर्तनों के बाद एक दशक के अंदर सिविल वॉर हुआ।

यहाँ तक ​​कि ट्रंप, जिन्होंने अमेरिका में अपनी राजनीति ही दुनिया के युद्ध बंद करने के नाम पर शुरू की, वे भी इस परंपरा से बाहर नहीं निकल पा रहे। हालाँकि उन्होंने बार-बार इराक हमले की निंदा की है और नियोकंज़र्वेटिव विदेश नीति की आलोचना की है, उनका वेनेजुएला दखल उनके ‘शांतिदूत’ होने के अपने दावों से मेल नहीं खाता।

बांग्लादेश: बिना बम के US ने बदली सरकार

जहाँ वेनेज़ुएला में फाइटर जेट और मिसाइलें देखी गईं, वहीं बांग्लादेश में अमेरिकी दखल अलग तरीके से हुआ। बांग्लादेश में सैनिक नहीं भेजे गए, बल्कि पॉलिटिकल प्रेशर, इंटेलिजेंस नेटवर्क और सड़क पर विरोध प्रदर्शनों के जरिए लोकतांत्रिक सरकार को हटाया गया।

एक किताब, इंशाअल्लाह बांग्लादेश: द स्टोरी ऑफ़ एन अनफिनिश्ड रेवोल्यूशन के मुताबिक, शेख हसीना के पूर्व होम मिनिस्टर असदुज्जमां खान कमाल ने CIA पर उन्हें सत्ता से हटाने की साज़िश रचने का आरोप लगाया है। उन्होंने इन घटनाओं को ‘CIA की एक परफेक्ट साज़िश’ बताया।

(फोटो- Hindu e shop)

कमाल ने दावा किया कि देश के आर्मी चीफ जनरल वाकर-उज़-ज़मान इस साज़िश के सेंटर में थे। हैरानी की बात यह है कि उन्होंने कहा कि बांग्लादेश की टॉप इंटेलिजेंस एजेंसियों ने भी हसीना को चेतावनी नहीं दी, जिससे लगता है कि सीनियर अधिकारियों की मिलीभगत रही होगी। कमाल के मुताबिक, वाकर ने आर्मी चीफ का पद संभालने के कुछ ही हफ़्तों बाद 5 अगस्त, 2024 को हसीना को देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया, यह एक ऐसा पद था जिस पर हसीना ने खुद उन्हें अपॉइंट किया था।

हसीना के गिरने से पहले हुए विरोध प्रदर्शनों को इंटरनेशनल लेवल पर तथाकथित जेन जी लीड और डेमोक्रेटिक बताया गया, लेकिन कमाल ने कहा कि जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टर इस्लामी ग्रुप, जो पहले से बँटे हुए थे, पहली बार विदेशी इंटेलिजेंस नेटवर्क के सपोर्ट से एक हो गए। उन्होंने आगे दावा किया कि पाकिस्तान की ISI ने इसमें अहम भूमिका निभाई। इस दौरान विदेश में ट्रेंड आतंकवादी प्रदर्शनकारियों के साथ मिल गए और पुलिस पर हमला किया।

कमाल ने तर्क दिया कि इसका मोटिवेशन स्ट्रेटेजिक था। उन्होंने कहा कि अमेरिका एक ही समय में साउथ एशिया में बहुत सारे मजबूत लीडर नहीं चाहता। भारत में नरेंद्र मोदी और चीन में शी जिनपिंग के होने से, हसीना का इंडिपेंडेंट रुख उनके लिए असुविधाजनक हो गया। एक और मुख्य वजह बंगाल की खाड़ी में सेंट मार्टिन आइलैंड था, जो अमेरिका चाहता था। हिन्द महासागर में जियोपॉलिटिक्स के लिए ये बहुत जरूरी है।

हसीना ने खुद सार्वजनिक तौर पर कहा था कि US ने उन पर सत्ता में बने रहने के बदले आइलैंड का एक्सेस माँगा था। उन्होंने इसे बांग्लादेश की संप्रभुता का उल्लंघन बताते हुए मना कर दिया। शेख हसीना को हटाए जाने के बाद इकॉनमिस्ट मुहम्मद यूनुस को सत्ता की जिम्मेदारी सौंपी गई, जो अमेरिका के करीबी थे।

तानाशाह के दोस्त, लोकतंत्र के दुश्मन

अमेरिका ने ‘डेमोक्रेसी’ के नाम पर कई देशों और उसके राष्ट्राध्यक्षों को बर्बाद किया। वहीं दूसरी ओर तानाशाही सरकारों के साथ उसके करीबी रिश्ते रहे, बशर्ते वे US के लिए फायदेमंद हों। सऊदी अरब इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।

सऊदी में कोई चुनाव नहीं होता, कोई पॉलिटिकल पार्टी नहीं है और कोई राजनीतिक आजादी नहीं है। फिर भी अमेरिका उसे एक अहम साथी मानता है।

हाल ही में, US ने सऊदी अरब को $1.4 बिलियन की सैन्य साजोसामान की बिक्री को मंज़ूरी दी। इसमें उसकी आर्मी को ट्रेनिंग देने के लिए करोड़ों डॉलर शामिल हैं। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के व्हाइट हाउस दौरे के नतीजे में F-35 फाइटर जेट की बिक्री और एक स्ट्रेटेजिक डिफेंस एग्रीमेंट को मंजूरी मिली। इस व्यापार से US और सऊदी अरब के रिश्ते और ‘मधुर’ हुए।

यह वही सऊदी लीडरशिप है, जिसे मानवाधिकार के उल्लंघन, यमन में युद्ध और पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या पर दुनिया भर में गुस्से का सामना करना पड़ा है। फिर भी, ऐसा नहीं लगता कि इनमें से कोई भी बात रियाद को अमेरिकी सपोर्ट के लिए अयोग्य ठहराती है।

सऊदी अरब के अलावा, US के मिडिल ईस्ट, अफ्रीका और एशिया में दूसरे तानाशाही देशों के साथ मजबूत रिश्ते हैं। मिस्र, जहाँ मिलिट्री तख्तापलट के बाद प्रेसिडेंट अब्देल फत्ताह अल-सिसी का राज है, को US से अरबों की मिलिट्री मदद मिलती है।

यूनाइटेड अरब अमीरात, जहाँ पूरी तरह से राजशाही है, US का एक और करीबी पार्टनर है। इन रिश्तों को शायद ही कभी डेमोक्रेसी के लिए समस्या के तौर पर देखा जाता है। इसके बजाय, उन्हें ‘स्टेबिलिटी’, ‘सिक्योरिटी,’ और ‘रीजनल बैलेंस’ के तौर पर देखा जाता है।

जब ये सरकारें विरोध को दबाती हैं या विरोधियों को जेल में डालती हैं, तब भी अमेरिका चुप रहता है।

अमेरिका का दोगलापन

वेनेजुएला, अफगानिस्तान, इराक, बांग्लादेश के साथ और तानाशाही सरकारों के साथ अमेरिका के रिश्ते, उसके दोहरे चरित्र को उजागर करते हैं। डेमोक्रेसी का इस्तेमाल चुनिंदा तरीके से किया जाता है, दुश्मनों के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है और दोस्तों के साथ डील करते समय नजरअंदाज कर दिया जाता है।

जो सरकारें US के असर का विरोध करती हैं, उन्हें क्रिमिनल, गैर-कानूनी या खतरनाक करार दिया जाता है। जो लोग बात मानते हैं, भले ही वे बिना चुनाव के राज करें या तानाशाही रवैया अपनाएँ, उन्हें ‘इनाम’ दिया जाता है।

इस पैटर्न को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है। सरकार बदलना डेमोक्रेसी के बारे में नहीं है, यह कंट्रोल के बारे में है। यह तेल, मिलिट्री बेस, शिपिंग रूट और जियोपॉलिटिकल फायदे के बारे में है। लैटिन अमेरिका से लेकर साउथ एशिया तक, यूनाइटेड स्टेट्स ने बार-बार दिखाया है कि उसका कमिटमेंट डेमोक्रेटिक वैल्यूज़ के लिए नहीं, बल्कि स्ट्रेटेजिक फायदे के लिए है।

(मूलरूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों का साजिशकर्ता अब्बा के लिए ‘इंटरनेशनल हीरो’, मजहबी ‘पत्रकार’ के लिए भगत सिंह: प्रोपेगेंडा फैलाते-फैलाते आरफा खानम के रोंगटे हुए खड़े

“जब इस दौर का इतिहास लिखा जाएगा, नाइंसाफी की दास्तान लिखी जाएगी तो उमर खालिद का नाम सबसे ऊपर होगा। क्योंकि वे पिछले 10 से 15 साल में मोदी सरकार की भगवा राजनीति का शिकार हुए हैं।”

तो कुछ इस तरीके से आरफा खानुम शेरवानी अपने नए यूट्यूब वीडियो में दिल्ली दंगा 2020 के साजिशकर्ता उमर खालिद का परिचय देती हैं। नए वीडियो में आरफा ने प्रतिबंधित संगठन SIMI से जुड़े उमर खालिद के अब्बा एस कासिल रसूल इलियास का साक्षात्कार लिया है। खालिद के अब्बा से बातचीत में आरफा ने अपने ‘प्रिय’ जोहरान को भी याद किया, और उमर खालिद की तुलना स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह से भी की। यह साक्षात्कार कुछ और नहीं, बल्कि उमर खालिद को ‘स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने वाले क्रांतिकारी का तबका’ देने का पूरा प्रयास है, जिससे एक और भारत-विरोधी उमर खालिद का जन्म हो।

पूरे इंटरव्यू में काफी अटपटी बातें कही गई हैं। जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उमर खालिद के नाम को बढ़ावा मिलने पर खुशी जताई गई है, तो वहीं बाहरी देशों में पीएम मोदी की छवि को बेकार बताया गया है। न्यूयॉर्क के नवनिर्वाचित मेयर जोहरान ममदानी की उमर खालिद को लिखी उस चिट्ठी की बारे में भी बात की गई। उमर खालिद को लेकर भारत की मोदी सरकार और न्यायपालिका को भी घेरे में रखा गया। कुल मिलाकर आरफा और उमर खालिद के अब्बा के बीच उस राजनीति और विजन की बात हुई, जिसे जेल में बैठे उमर खालिद ने साल 2020 में सुलगाने की कोशिश की थी।

जोहरान ममदानी से मुलाकात की बात छिपाई

हाल ही में उमर खालिद के अब्बा इलियास ने खुलासा किया था कि उन्होंने न्यूयॉर्क में नवनिर्वाचित मेयर जोहरान ममदानी से दिसंबर 2025 में मुलाकात की थी। आरफा के साथ इंटरव्यू में भी उन्होंने यह बात दोहराई और जोहरान की उमर खालिद के नाम चिट्ठी पर भी बात की।

इलियास कहते हैं कि उन्होंने जोहरान ममदानी से मुलाकात की बात को छिपाकर रखा, क्योंकि वह ‘मुनासिब’ समझते थे कि जोहरान के शपथ लेते ही इस बात को दुनिया के सामने लाया जाए। यहाँ अब्बा ने पूरी रणनीति के साथ जोहरान की उमर खालिद के नाम चिट्ठी को दुनिया के सामने पेश किया है।

वह जानते थे कि यह बात जोहरान के चुनाव जीतने के बाद सामने आनी ही बेहतर है, क्योंकि तब वह ‘रौला’ दिखा सकते थे कि विदेश तक से उमर खालिद को समर्थन मिल रहा है। वह भी उस व्यक्ति से जो भारत के इस्लामी कट्टरपंथी और लेफ्ट-लिबरल के बीच खूब चर्चित है। इसीलिए पूरी बातचीत में बार-बार जोर देकर कह रहे हैं कि देखो उमर खालिद को जोहरान जैसे ‘महान व्यक्ति’ का समर्थन मिल रहा है, और वह ऐसे व्यक्ति से भारतीय राजनेताओं को सबक लेने की सीख भी देते हैं।

आरफा खानुम और जोहरान ममदानी की जबरदस्ती वाली दोस्ती

यहाँ जोहरान के ‘अनपेड कैंपियन’ का हिस्सा आरफा खानुम भी हमेशा की तरह जोहरान का राग अलापते हुए कहती हैं कि उमर खालिद को जोहरान ममदानी ने खत इसीलिए लिखा, क्योंकि वे दुनियाभर में नाइंसाफी की परवाह करते हैं।

आरफा यहाँ बिल्कुल सही है। दुनियाभर की परवाह तो करते हैं जोहरान ममदानी। बिल्कुल उसी तरह जिस तरह आरफा करती हैं। मुस्लिमों की हिंसा पर चुप्पी और हिंदुओं से जुड़े मामूली सी बात पर खूब बवाल। इसीलिए तो आरफा की तरह ही जोहरान को एक भारत-विरोधी और मोदी-विरोधी उमर खालिद की परवाह हैं, लेकिन बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार पर बोलना वह मुनासिब नहीं समझते।

असल में जोहरान और आरफा दुनिया के सामने एक मनगढ़ंत कहानी पेश करते हुए जबरदस्ती दोस्त बने बैठे हैं। क्योंकि एक ने मोदी-विरोधी छवि बनाकर न्यूयॉर्क में इस्लामी कट्टरपंथियों के वोट हासिल किए और दूसरी यहाँ भारत में बैठकर इस्लामी कट्टरपंथियों और आतंकवादियों की छवि सुधारती है। बदले में जोहरान मेयर तो बना, लेकिन आरफा तो अब भी आए दिन न्यूयॉर्क में तस्वीरें खिंचवाती है और वहाँ की नागरिकता मिलने का इंतजार करती है।

पीएम मोदी की छवि खराब, बेटा उमर विदेशों में ‘हीरो’

इंटरव्यू के दौरान आरफा खानुम सवाल करती हैं कि यह जानने के बाद भी कि जोहरान ‘एंटी-मोदी’ हैं और वे पीएम मोदी को ‘वॉर क्रिमिनल’ तक कह चुके हैं। तो ऐसे व्यक्ति से मिलने का क्या कारण था? तो खालिद के अब्बा का जवाब आता है, “मोदी को प्रधानमंत्री बनने से पहले अमेरिका का वीजा तक नहीं मिला था, बाहर के देशों में मोदी के बारे में अच्छी राय तो पाई नहीं जाती है।”

उधर, अपने बेटे को अंतरराष्ट्रीय स्तर का ‘हीरो’ बताने में अब्बा ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। उनके लिए देश का प्रधानमंत्री, जिसकी अमेरिका और रूस जैसे ताकतवर देशों से दोस्ती है वह मायने नहीं रखता। लेकिन एक भारत-विरोधी होने के नाते बेटे को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलना उनके लिए उपलब्धि हो जाती है। वह ऐसे कुछ किस्से भी सुनाते हैं, जिससे दर्शक उमर खालिद को अंतरराष्ट्रीय ‘हीरो’ मानने लगें।

एक किस्सा सुनाते हुए इलियास कहते हैं कि एक बार उनकी बीवी इंग्लैंड गई थी, उस दौरान बीवी ने जब टैक्सी ड्राइवर को बताया कि वह उमर खालिद की ‘मदर’ हैं, तो वह टैक्सी ड्राइवर तुरंत उमर को पहचान गया और कहने लगा- वही JNU वाला लड़का। लेकिन इलियास के इन किस्सों में एक बात अधूरी है कि उमर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोग पहचानते किस भाव से हैं? जिस छात्र पर देश-विरोधी धाराएँ लगी हो, उसे लोग अच्छी छवि के कारण तो पहचानते नहीं होंगे। ऐसे तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विजय मालया को भी लोग जानते हैं, लेकिन है तो वह ‘भगौड़ा’ ही न।

तो गुजारिश यह है कि उमर खालिद के अब्बा लोगो को न समझाए कि पीएम मोदी की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कैसी छवि है, क्योंकि यह पूरी दुनिया जानती है कि वह विश्व के ताकतवर नेताओं में गिने जाते हैं। यहाँ आपको स्पष्ट करने की जरूरत है कि उमर खालिद को किस छवि से विदेशों में जाना जाता है, बेशक है तो वह भारत-विरोधी तत्व ही।

आरफा के खुशी के आँसू और उमर के अब्बा की फेंकू बातें

पूरे इंटरव्यू में उमर खालिद के अब्बा इलियास लंबी-लंबी फेंकू बातें करते हैं। और उधर आरफा इन बातों को सुनकर खुशी के आँसू टपकाने ही वाली होती हैं। दोनों ने उमर को क्रांतिकारी साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। आरफा खानुम को उमर खालिद की आजादी वाली स्पीच को एक स्वतंत्रता आंदोलनकारी के नजरिए से देखती हैं। उधर, अब्बा कहते हैं कि कभी बेटे को रोकने की कोशिश नहीं की।

यहाँ तक कि आरफा खानुम ने उमर की तुलना स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह से तक कर दी। उमर खालिद को वे युवाओं का प्रेरणास्रोत बताते हैं। अगर उमर खालिद जैसा प्रेरणास्रोत युवाओं को मिल गया, तो शायद हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में टुकड़े-टुकड़े गैंग बन जाएगा। जैसे JNU में आए दिन जान से मारने की धमकी वाले सरकार-विरोधी नारे लगते हैं, ऐसा ही पूरे देश में दहशत फैलेगी। तब भी ये लोग सारा इल्जाम सरकार पर ही लगाएँगे कि सरकार ने समय पर युवाओं को क्यों नहीं रोका?

तिहाड़ जेल में बैठकर VIP ट्रीटमेंट ले रहे उमर खालिद के संघर्ष की गाथा तो उनके अब्बा इलियास ने आरफा खानुम के साथ इंटरव्यू में सुना दी। लेकिन कितने लोग इस पर यकीन करेंगे, यह एक बड़ा सवाल है। भारत-विरोधी नारे लगाने वाला उमर खालिद जब क्रांतिकारी और आजादी के लिए लड़ने वाला युवा बनकर पेश किया जाता है, तो कितने लोग चाहेंगे कि वह एक जेल में बैठे युवा से प्रेरणा लें। तो Gen Z को भी समझने की जरूरत है कि उमर खालिद को क्रांतिकारी दर्शाने वाला यह इंटरव्यू मात्र एक प्रोपेगेंडा है। वह चाहते हैं कि एक और उमर खालिद पैदा हो, जो भारत कि खिलाफ आवाज बने लेकिन यह नहीं बताते कि उस आवाज में सुर भारत-विरोधी नहीं, बल्कि भगत सिंह की तरह राष्ट्रहित में होने चाहिए।

तो आरफा खानुम को यह जानने की जरूरत है कि इस दौर का इतिहास जब लिखा जाएगा तो उमर खालिद का नाम नाइंसाफी की दास्तान में नहीं, बल्कि भारत-विरोधी तत्वों में सबसे ऊपर होगा। ये लोग देश का खाते हैं और उसी से छल करते हैं। उमर खालिद इसी तरह के तत्व हैं और पत्रकारिता का चोला पहनकर ऐसे लोगों का महिमामंडन करने वाली आरफा खानम भी इनसे कम नहीं हैं।

असम के पुराने स्कूलों में डिजिटल क्रांति, PM-DevINE से बच्चों को शहर जैसी शिक्षा की गारंटी: जानें- सड़क से क्लासरूम और एयरपोर्ट्स तक कैसे यह योजना बदल रही राज्य की तस्वीर

प्रधानमंत्री पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास पहल जिसे ‘पीएम-डिवाइन’ (PM-DevINE) कहा जाता है, असम और पूरे पूर्वोत्तर भारत के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो रही है। यह केंद्र सरकार की 100% फंडिंग वाली योजना है, जिसे अक्टूबर 2022 में शुरू किया गया था ताकि पूर्वोत्तर के राज्यों में विकास की उन कमियों को दूर किया जा सके जिन्हें दशकों से नजरअंदाज किया गया था।

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के मुताबिक, इस योजना ने राज्य की शिक्षा व्यवस्था का चेहरा बदल दिया है। पुराने और जर्जर सरकारी स्कूलों को अब आधुनिक स्मार्ट क्लासरूम और बेहतरीन सुविधाओं में बदला जा रहा है, जिससे गरीब बच्चों को भी निजी स्कूलों जैसी शिक्षा अपने घर के पास ही मिल रही है।

PM-DevINE योजना क्या है और क्यों लाई गई

पीएम-डिवाइन (PM-DevINE) को आप केंद्र सरकार की एक ऐसी खास योजना समझ सकते हैं, जिसका पूरा खर्चा यानी 100% पैसा केंद्र सरकार खुद उठाती है। इसे साल 2022-23 के बजट में खास तौर पर भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों (जैसे असम, मेघालय, मणिपुर आदि) की जरूरतों को ध्यान में रखकर शुरू किया गया था। अक्सर देखा गया है कि देश के अन्य हिस्सों के मुकाबले इन राज्यों में कुछ बुनियादी सुविधाओं की कमी रह गई थी।

इसी ‘डेवलपमेंट गैप’ यानी विकास की खाई को पाटने के लिए सरकार ने यह कदम उठाया है। इस योजना की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सड़क बनाने से लेकर, बच्चों की पढ़ाई (शिक्षा), लोगों के इलाज (स्वास्थ्य), नए कारखाने लगाने (उद्योग) और महिलाओं व युवाओं को रोजगार देने (आजीविका) तक के हर जरूरी प्रोजेक्ट के लिए पैसा मुहैया कराती है।

सरकार ने इस योजना को चलाने के लिए एक लंबा रोडमैप तैयार किया है। साल 2022-23 से शुरू होकर 2025-26 तक के चार सालों के लिए सरकार ने कुल 6,600 करोड़ रुपए का एक बड़ा फंड सुरक्षित कर दिया है। योजना की शुरुआत को मजबूती देने के लिए पहले ही साल में 1,500 करोड़ रुपए जारी कर दिए गए थे। इस पूरे काम की देखरेख की जिम्मेदारी ‘उत्तर-पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्रालय’ (DoNER) को सौंपी गई है।

यह मंत्रालय यह सुनिश्चित करता है कि पैसा सीधे उन कामों में लगे जिनसे वहाँ के लोगों का जीवन आसान हो सके, जैसे कि सरकारी स्कूलों को स्मार्ट बनाना या दूर-दराज के गाँवों तक पक्की सड़कें पहुँचाना। यह योजना किसी पुरानी स्कीम की जगह नहीं लेती, बल्कि उन कमियों को पूरा करती है जो बाकी योजनाओं से छूट गई थीं।

PM-DevINE कैसे काम करती है?

पीएम-डिवाइन योजना के तहत काम करने का तरीका बहुत ही व्यवस्थित और पारदर्शी रखा गया है ताकि सरकारी पैसे का एक-एक रुपया सही जगह इस्तेमाल हो सके। इस योजना की सबसे खास बात यह है कि इसके तहत छोटे-मोटे नहीं, बल्कि 20 करोड़ रुपए से लेकर 500 करोड़ रुपए तक के बड़े और असरदार प्रोजेक्ट्स ही हाथ में लिए जाते हैं।

यह योजना किसी दूसरी चल रही सरकारी स्कीम को बंद नहीं करती या उसकी जगह नहीं लेती, बल्कि इसका असली काम उन जरूरी सुविधाओं को पूरा करना है जो किसी कारणवश दूसरी योजनाओं से छूट गई थीं। नियमों के मुताबिक, इस पैसे का इस्तेमाल जमीन खरीदने, दफ्तर के स्टाफ की सैलरी देने या किसी खास व्यक्ति को निजी फायदा पहुँचाने के लिए नहीं किया जा सकता, बल्कि यह सिर्फ समाज के सामूहिक विकास के लिए है।

किसी भी प्रोजेक्ट को मंजूरी देने से पहले उसकी बारीकी से जाँच की जाती है और बड़े संस्थानों से तकनीकी टेस्ट करवाया जाता है। साथ ही, काम को एक तय समय सीमा के भीतर पूरा करने की सख्त शर्त होती है, ताकि जनता को मिलने वाली सुविधाओं में देरी न हो और हर प्रोजेक्ट का पूरा फायदा स्थानीय लोगों को समय पर मिल सके।

असम में स्कूल शिक्षा में कैसे आया बड़ा बदलाव

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का कहना है कि PM-DevINE योजना का सबसे शानदार और सीधा फायदा राज्य के उन बच्चों को मिल रहा है जो सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। पहले जहाँ सरकारी स्कूलों का नाम आते ही टूटी दीवारें या पुराने कमरों की तस्वीर सामने आती थी, अब वह पूरी तरह बदल रही है। इस योजना की मदद से स्कूलों का कायाकल्प किया जा रहा है।

अब वहाँ सिर्फ बोर्ड और चौक वाली पुरानी पढ़ाई नहीं होती, बल्कि स्कूलों में ‘स्मार्ट क्लासरूम’ बनाए गए हैं। इसका मतलब है कि अब बच्चे कंप्यूटर और बड़े डिजिटल पर्दों की मदद से पढ़ रहे हैं। इसके साथ ही स्कूलों की इमारतों को नया रूप दिया गया है और वहाँ साफ पानी, शौचालय जैसी जरूरी सुविधाएँ भी बेहतर की गई हैं।

यह सब इसलिए किया जा रहा है ताकि गाँव और कस्बों में रहने वाले बच्चों को भी वही आधुनिक सुविधाएँ मिलें जो बड़े शहरों के महँगे प्राइवेट स्कूलों में मिलती हैं। इस बदलाव को समझने के लिए मुख्यमंत्री ने पलाशबाड़ी में स्थित एक बहुत पुराने सरकारी स्कूल का उदाहरण दिया। यह स्कूल आजादी के कुछ साल बाद, यानी 1953 में बना था।

दशकों पुराना होने की वजह से इसकी हालत वैसी नहीं थी जैसी आज के दौर में होनी चाहिए, लेकिन पीएम-डिवाइन योजना ने इस स्कूल की पूरी शक्ल ही बदल दी है। अब वहाँ का माहौल इतना आधुनिक हो गया है कि देखकर लगता ही नहीं कि यह वही पुराना स्कूल है। मुख्यमंत्री का मानना है कि जब स्कूल की इमारत और वहाँ मिलने वाली सुविधाएँ अच्छी होती हैं, तो बच्चों का मन भी पढ़ाई में ज्यादा लगता है।

उनका कहना है कि यह सिर्फ दीवारों की मरम्मत या नई पेंटिंग का काम नहीं है, बल्कि यह बच्चों की सोच को बड़ा बनाने की कोशिश है। जब बच्चे एक आधुनिक माहौल में पढ़ेंगे, तो उनमें आत्मविश्वास जागेगा और वे देश की तरक्की में अपना बड़ा योगदान दे पाएँगे।

गाँव के बच्चों के लिए शहर जैसी सुविधा अब घर के पास

सरकारी अधिकारियों का कहना है कि PM-DevINE योजना का सबसे बड़ा फायदा असम के उन इलाकों को हुआ है जो शहरों से दूर हैं। पहले गाँव और छोटे कस्बों (अर्ध-शहरी इलाकों) में रहने वाले बच्चों के पास पढ़ाई के अच्छे साधन नहीं होते थे। अगर किसी बच्चे को अच्छी और आधुनिक शिक्षा चाहिए होती थी, तो उसे मजबूरी में अपना घर छोड़कर बड़े शहरों का रुख करना पड़ता था। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है।

इस योजना के तहत सरकार ने शहर की भीड़-भाड़ के बजाय सीधे गाँव के स्कूलों को ‘अपग्रेड’ करना शुरू कर दिया है। इसका मतलब है कि अब गाँव का बच्चा भी अपने घर के पास ही उन्हीं सुविधाओं के साथ पढ़ रहा है जो पहले सिर्फ बड़े शहरों के बड़े स्कूलों में मिलती थीं। अब माता-पिता को भी इस बात की चिंता नहीं रहती कि अच्छी पढ़ाई के लिए उनके बच्चों को दूर जाना पड़ेगा।

स्कूलों में जो डिजिटल टूल्स और स्मार्ट क्लासरूम लगाए गए हैं, उन्होंने पढ़ाई के तरीके को बहुत मजेदार बना दिया है। पहले बच्चे सिर्फ किताबों को रटते थे, लेकिन अब स्मार्ट बोर्ड और वीडियो की मदद से वे मुश्किल से मुश्किल पाठ को देख और समझ सकते हैं। इससे पढ़ाई अब उबाऊ नहीं लगती, बल्कि बच्चों के लिए एक रोचक अनुभव बन गई है।

जब स्कूल में कंप्यूटर, इंटरनेट और अच्छी लैब जैसी सुविधाएँ मिलने लगती हैं, तो बच्चों में स्कूल जाने का उत्साह बढ़ जाता है। अधिकारियों का मानना है कि जब पढ़ाई आसान और खेल-खेल में होने लगती है, तो बच्चे बेहतर तरीके से सीखते हैं। कुल मिलाकर, पीएम-डिवाइन योजना ने शिक्षा को केवल किताबों तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि इसे आधुनिक और हर बच्चे की पहुँच में ला खड़ा किया है।

शिक्षा सुधार के साथ नए स्कूलों की तैयारी

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में PM-DevINE योजना असम सरकार के उन बड़े लक्ष्यों को पूरा करने में मददगार साबित हो रही है, जिससे राज्य की पूरी शिक्षा व्यवस्था को जड़ से सुधारा जा सके। मुख्यमंत्री ने साझा किया कि राज्य कैबिनेट ने असम भर में 100 नए सरकारी स्कूल खोलने का एक बड़ा फैसला लिया है, ताकि शिक्षा का नेटवर्क हर कोने तक फैल सके।

इस पूरी मुहिम का सबसे बड़ा मकसद यह है कि चाहे बच्चा अमीर हो या गरीब, उसे पढ़ाई के एक जैसे और बेहतरीन मौके मिलें। सरकार चाहती है कि आज के इन बच्चों को इतना काबिल बनाया जाए कि वे भविष्य में राज्य और देश की तरक्की के लिए एक मजबूत ‘मानव संसाधन’ बन सकें।

शिक्षा के जानकारों का भी यही कहना है कि जब केंद्र सरकार की पीएम-डिवाइन जैसी बड़ी योजनाएँ और राज्य सरकार की नीतियाँ एक साथ मिलकर काम करती हैं, तो जमीन पर इसके नतीजे बहुत शानदार निकलते हैं। जब अच्छे टीचरों के साथ-साथ स्कूलों में स्मार्ट क्लास और बढ़िया इमारत जैसी सुविधाएँ जुड़ जाती हैं, तो बच्चों के सीखने का स्तर अपने आप ऊपर चला जाता है।

सिर्फ स्कूल नहीं, हर क्षेत्र में विकास

पीएम-डिवाइन योजना का दायरा सिर्फ स्कूल और पढ़ाई-लिखाई तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे असम और उत्तर-पूर्व की तस्वीर बदलने वाला एक बड़ा अभियान है। आँकड़ों की बात करें तो अक्टूबर 2022 से लेकर 30 नवंबर 2025 तक इस योजना के तहत कुल 44 बड़े प्रोजेक्ट्स को हरी झंडी दी जा चुकी है, जिन पर सरकार लगभग 5,728.79 करोड़ रुपए खर्च कर रही है।

इन पैसों से न केवल सड़कें और अस्पताल बन रहे हैं, बल्कि नए बिजनेस शुरू करने के लिए ‘स्टार्टअप इकोसिस्टम’ को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। इन सब कामों का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि इलाके के युवाओं और महिलाओं के लिए रोजगार के नए रास्ते खुल गए हैं, जिससे लोगों की कमाई बढ़ी है और स्थानीय बाजार मजबूत हुए हैं।

इतना ही नहीं, इलाके में बाहरी निवेश लाने के लिए ‘राइजिंग नॉर्थईस्ट इन्वेस्टर्स समिट 2025’ जैसा बड़ा आयोजन भी किया गया, जिसमें खेती, पर्यटन, IT, खेल और बिजली जैसे कई क्षेत्रों पर खास जोर दिया गया। साथ ही, कनेक्टिविटी को आसान बनाने के लिए ‘उड़ान’ योजना के तहत 90 हवाई रास्ते शुरू किए गए हैं, जिनसे अब 12 एयरपोर्ट और हेलीकॉप्टर स्टेशन (हेलीपोर्ट) आपस में जुड़ गए हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि अब असम और उसके पड़ोसी राज्यों में आना-जाना और व्यापार करना पहले से कहीं ज्यादा आसान और तेज हो गया है।

दो से निकाह, तीसरी को झाँसा देकर 16 साल तक किया उत्पीड़न: बोलता हिंदुस्तान के ‘पत्रकार’ हसीन रहमानी ने ब्लैकमेल कर किया रेप, पीड़िता बोली- आपबीती सुन रूह काँप जाएगी; जानें- FIR में क्या-क्या आरोप

बोलता हिंदुस्तान’ के पत्रकार मोहम्मद हसीन रहमानी पर रेप, छेड़खानी, ब्लैकमेल, दो लड़कियों से एक ही वक्त में निकाह करने और कई लड़कियों को धोखा देने जैसे कई संगीन आरोप लगे हैं। पीड़िता ने दिल्ली के जाकिर नगर थाने में एफआईआर दर्ज करवाई है। एफआईआर में 29 जनवरी 2010 से 3 जनवरी 2026 यानी 16 साल तक उत्पीड़न का आरोप है।

सोशल मीडिया पर पीड़िता ने अपनी लड़ाई की जानकारी दी है और कहा है कि अगर हसीन रहमानी को जमानत मिल जाती है तो उसकी जान को खतरा है, क्योंकि उसने पहले ही पीड़िता को धमकी दे चुका है।

पीड़िता का शिकायत पत्र

पीड़िता ने आरोप लगाया है कि कई लड़कियों को ट्रैप कर हसीन रहमानी अपने मनमाने काम करवाता था और उसे नेताओं और करीबियों को ‘खुश’ करने के लिए कहता था। जब तक लड़कियाँ उसकी बात मानती थी, तब तक वह प्रेमिका बनाकर साथ रखता था।

पीड़िता को जान का खतरा, माँगी सुरक्षा

पीड़िता ने हसीन रहमानी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है, जिसके आधार पर उसे दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया। उसने दिल्ली पुलिस से अपनी सुरक्षा की गुहार भी लगा रही है। पीड़िता ने अपनी शिकायत में कहा है कि उसके साथ रेप किया गया। मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। धोखाधड़ी और ठगी की गई। निकाह का झूठा वादा कर शारीरिक शोषण किया गया।

(सोशल मीडिया पर पीड़िता का बयान)

शिकायत के मुताबिक, पीड़िता 2010 में जामिया मिलिया इस्लामिया में पढ़ाई कर रही थी। उसी वक्त उसकी दोस्ती हसीन रहमानी से हुई। धीरे धीरे दोस्ती गहरी हो गई। इस दौरान एक दिन रहमानी ने पीड़िता को अपने जाकिर नगर स्थित फ्लैट पर बुलाया। पीड़िता के जाने पर उसे बेडरूम में ले गया और निकाह का वादा कर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। पीड़िता को अच्छा नहीं लगा और वह उससे कटी-कटी रहने लगी।

इस पर रहमानी ने आपत्तिजनक तस्वीरों और वीडियो का हवाला देकर ब्लैकमेल करने लगा। उसने अपने भाई मुस्तफा रहमानी के जरिए कहा कि वह पीड़िता से निकाह करेगा। इसके बाद दोनों में मिलने लगे। 2014 तक इसी तरह चलता रहा।

निकाह का भरोसा देकर घरवालों से मिलवाया

2014 में तस्वीर वाली बात पूछने और दूसरे रिश्ते का शक होने पर रहमानी ने उसे पीटा और कमरे में बंद कर जबरदस्ती की। तस्वीरों का सच पता नहीं चला, इसलिए वह ब्लैकमेल होती रही। 25 जुलाई 2025 को रहमान ने पीड़िता से अपनी बहन रेशमा और बहनोई सरवर हुसैन से लाजपतगनर के मजार कैफे में मिलवाया।

पीड़िता के मुताबिक, इस दौरान रहमानी ने कहा कि वह उसके साथ निकाह करेगा। यहाँ तक कि भाई मुस्तफा रहमानी ने कई बार यकीन दिलाने की कोशिश की कि पीड़िता के साथ ही निकाह होगी। हालाँकि पीड़िता को पता चल चुका था कि हसीन रहमानी के कई लड़कियों के साथ रिश्ते हैं। उसने एक शिफा उर्फ शालू नाम की लड़की के साथ निकाहनामा बनवाया था। रूबा नाम की लड़की के साथ ही निकाह कर चुका था।

पीड़िता के मुताबिक, उसे अंधेरे में रख कर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए गए। 27 अप्रैल 2025 को रहमानी अपने दोस्त आमिर के साथ पीड़िता के घर पहुँचा और उससे सगाई की। इन सालों में वह पैसे भी माँगता रहा।

रहमानी की साजिश में उसके घरवाले भी शामिल

पीड़िता के मुताबिक रहमानी के घरवालों को सबकुछ पता था। उनलोगों ने दहेज में कार की डिमांड की। जब पीड़िता ने इनकार किया तो वे लोग संपर्क तोड़ने लगे। यहाँ तक कि रहमानी के दूसरे रिश्तों की जानकारी भी उसे पता चलने लगे। हो सकता है कि साजिश के तहत इनलोगों ने जानकारी पीड़िता तक पहुँचाई हो। 6 दिसंबर 2025 को पीड़िता के भाई के मोबाइल पर एक निकाहनामा आया, जो हसीन रहमानी और शालू सिद्दीकी का था। यूपी की रहने वाली शालू सिद्दीकी पिछले 5-6 साल से उसके साथ रिलेशनशिप में है।

वहीं पीड़िता को एक और निकाहनामा रूबा सिद्दीकी का भी मिला। रूबा ने उससे कहा कि हसीन रहमानी उसके साथ रहता है। एक बच्चा रहमानी के फोटो को देखकर अब्बू कह रहा था।

पीड़िता का कहना है कि न सिर्फ हसीन रहमानी बल्कि उसका पूरा परिवार साजिश में शामिल है। दो-दो निकाह होने की बात उससे छिपाई गई। दहेज माँगे और धोखाधड़ी की। उसके करतूतों का सारा सच उसके भाई मुस्तफा रहमानी, बहन रेशमा और उसका शौहर समेत सभी को पता है। इसलिए इनलोगों को भी हवालात भेजा जाए। पीड़िता का कहना है कि उसके साथ न सिर्फ धोखा हुआ है बल्कि ब्लैकमेल कर रेप किया गया, आर्थिक धोखाधड़ी की गई और दहेज माँगे गए।

जिसके पास परमाणु बम, वो देश सुरक्षित?: जानें- बेडरूम से घुसकर मादुरो को पकड़ने वाला अमेरिका, किम जोंग उन से क्यों नहीं टकराता

दुनिया ने हमेशा ताकत को सलाम किया है, लेकिन आज की दुनिया में कमजोरों को सजा भी दी जाती है। ऐसे समय में जब संसाधनों को हड़पने की होड़ और बड़ी ताकतों के बीच दुश्मनी जगजाहिर है, यूएन चार्टर और नैतिकता की बात करना बेमानी है।

जो बचा है वह एक लेन-देन वाली सच्चाई है। ताकतवर देश, छोटे देशों को बर्बाद कर सकते हैं। लेकिन जो मजबूत देश हैं, उनका कुछ खास नहीं बिगाड़ सकते। उन पर हमला नहीं कर सकते। उन्हें झुकने के लिए मजबूर भी नहीं किया जा सकता। यहाँ तक कि यूएन भी कुछ नहीं बिगाड़ पाता। इस क्रम में सबसे ऊपर न्यूक्लियर पावर वाले देश हैं।

वेनेजुएला में US मिलिट्री एक्शन

वेनेजुएला में US का ऑपरेशन, जिसका परिणाम प्रेसिडेंट निकोलस मादुरो की किडनैपिंग के रूप में सामने आया, लैटिन अमेरिकन जियोपॉलिटिक्स में सिर्फ़ एक घटना नहीं है। यह एक केस स्टडी है कि आज की दुनिया में ताकत का इस्तेमाल कैसे किया जाता है? कैसे न्यूक्लियर पावर नहीं होना देश की संप्रभुता के लिए नुकसानदायक है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 3 जनवरी को ऐलान किया कि यूनाइटेड स्टेट्स की सेना ने मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को पकड़ लिया है और उन्हें देश से बाहर ले जाया गया है। यह ऑपरेशन बिना किसी शर्मिंदगी के एकतरफ़ा किया गया।

लोकल टाइम के हिसाब से सुबह करीब 2 बजे काराकास जोरदार धमाकों से दहल उठा। आसमान में काफी नीचे उड़ रहे फाइटर प्लेन की आवाज से लोग दहशत में थे। बिजली चली गई थी। चारों तरफ मची अफरा-तफरी के बीच नेशनल इमरजेंसी घोषित कर दिया गया, लेकिन इतनी देर में ही आजाद देश वेनेजुएला पर अमेरिकी प्रभुत्व स्थापित हो चुका था।

वॉशिंगटन ने इस कार्रवाई को कैरिबियन और पूर्वी प्रशांत महासागर के रास्ते कथित तौर पर नशीली दवाओं की तस्करी का हवाला देते हुए, एक बड़े ‘ड्रग्स के खिलाफ युद्ध’ का हिस्सा बताया। न तो अमेरिकी कॉन्ग्रेस से सलाह ली गई और न ही यूनाइटेड नेशंस से पूछा गया। लॉजिक आसान था- यूनाइटेड स्टेट्स मादुरो को सजा देना चाहता था, उसने ऐसा किया भी। नशीली दवाएँ और ड्रग्स शायद राष्ट्रपति मादुरो और वेनेजुएला के खिलाफ गैर-कानूनी सैन्य कार्रवाई को सही ठहराने के सिर्फ बहाने हैं।

वेनेज़ुएला को जिस चीज ने खास तौर पर कमजोर बनाया, वह सिर्फ आर्थिक, अंदरूनी नाराज़गी या डिप्लोमैटिक अकेलापन नहीं था। वह था न्यूक्लियर छतरी का न होना। अगर वेनेजुएला के पास न्यूक्लियर छतरी होती, तो अमेरिका किसी भी हाल में अपने पड़ोसी देश के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करता।

वेनेज़ुएला की तुलना नॉर्थ कोरिया से करें तो ये और भी साफ हो जाता है। सालों से नॉर्थ कोरिया को एक ऐसा दुष्ट देश कहा जाता रहा है जिसे सुधारा नहीं जा सकता। इसके नेता किम जोंग पर कई आरोप हैं। बिना किसी कानूनी कार्रवाई के हत्याएँ करने, टॉर्चर करने और दमनकारी नीति अपनाने के आरोप हैं।

न्यूक्लियर पॉवर होना शांति लाता है या तबाही

नॉर्थ कोरिया ने बार-बार अमेरिका और उसके साथी देशों, मसलन साउथ कोरिया और जापान को धमकी दी है। इनदोनों ही देशों में अमेरिका के बड़े मिलिट्री बेस हैं। इसके जवाब में नॉर्थ कोरिया ने जापानी इलाके के ऊपर मिसाइलों का टेस्ट किया है और दावा किया है कि उसके पास अमेरिका के वेस्ट कोस्ट पर हमला करने की काबिलियत है। नॉर्थ कोरिया ने रेगुलर ICBM का टेस्ट किया है। इस दौरान उसने जापान के ऊपर से ले जाकर प्रशांत महासागर में क्रैश कर दिया। इसके बाद अमेरिका को चुनौती देते हुए कहा कि वह अमेरिका की सिलिकॉन वैली के दिल, सैन फ्रांसिस्को पर हमला करने की क्षमता रखता है।

ट्रंप और अमेरिका लंबे समय से नॉर्थ कोरिया के राष्ट्राध्यक्ष किम जोंग उन को एक क्रूर तानाशाह कहता आ रहा है, जो सिर्फ सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए अपने ही लोगों पर ज़ुल्म करता है।

फिर भी उकसावे के बावजूद, नॉर्थ कोरिया पर अमेरिका ने कोई हमला नहीं किया। प्योंगयांग पर आधी रात को कोई रेड नहीं हुई। किम जोंग उन को पकड़कर किसी इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल के सामने पेश करने की कोई कोशिश नहीं हुई। इसका कारण नॉर्थ कोरिया पर अमेरिकी मेहरबानी नहीं है, बल्कि बदले की कार्रवाई का डर है।

वेनेजुएला पर आक्रमण, न्यूक्लियर हथियारों से लैस नॉर्थ कोरिया पर नहीं

नॉर्थ कोरिया के पास न्यूक्लियर हथियार हैं। एक छोटा जवाबी हमला भी सियोल पर हमलों की बौछार कर सकता है, पैसिफिक में US सेना को कमजोर कर सकता है, और किसी के भी कंट्रोल से बाहर तनाव बढ़ा सकता है। यह अकेली बात वाशिंगटन को नॉर्थ कोरिया की सरकार बदलने के सपने छोड़ने के लिए मजबूर करती है। वह सिर्फ पाबंदियाँ ही लगा सकता है।

यही लॉजिक चीन पर भी लागू होता है, जिसके पास दुनिया में न्यूक्लियर हथियारों का तीसरा सबसे बड़ा स्टॉक है। चीन में अक्सर मानवाधिकार का उल्लंघन, मिलिट्री दबाव और आक्रामक विस्तार का रवैया अपनाता रहा है। साउथ चाइना सी में, चीन ने अपने हर पड़ोसी देश के साथ टकराव की स्थिति में है।

उसने आर्टिफिशियल आइलैंड बनाना शुरू कर दिया है, दुनिया के सबसे बिज़ी समुद्री कॉरिडोर में से एक को सैनिक छावनी में तब्दील कर दिया है। इंटरनेशनल पानी में चलने वाले मछली पकड़ने वाले जहाजों को परेशान करता रहा है। ताइवान के साथ उसका हमेशा से झगड़ा रहा है और उसने गलत तरीके से भारतीय इलाकों पर अपना दावा किया है।

ट्रेड वॉर, डिप्लोमैटिक दबाव, ताइवान पर कब्ज़ा करने की धमकियों और नौसेना की खतरनाक चालों के बावजूद, US ने अभी तक सीधी मिलिट्री कार्रवाई नहीं की है। चीन ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हाउस भी है, जो इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ बनाने में इस्तेमाल होने वाले रेयर-अर्थ मिनरल से लेकर हाई-एंड इलेक्ट्रॉनिक्स सामान तक, हर प्रोडक्ट के लिए ग्लोबल सप्लाई चेन को लगभग कंट्रोल करता है।

न्यूक्लियर पावर होना देश के लिए जरूरी

जून 2025 में ईरान पर US और इजराइली हमलों को देखें तो अंतर और भी साफ हो जाता है। 21 जून को ट्रंप ने घोषणा की कि यूनाइटेड स्टेट्स ने ईरान की तीन न्यूक्लियर ठिकानों, फोर्डो, नतांज और एस्फाहान पर हमला किया है। इस दौरान पहाड़ों के अंदर बने ठिकानों को निशाना बनाया गया। GBU-57 मैसिव ऑर्डनेंस पेनेट्रेटर्स, 30,000 पाउंड के बंकर-बस्टर बमों से लैस B-2 स्टेल्थ बॉम्बर्स पहाड़ों के नीचे जाकर उन जगहों को नष्ट किया।

ट्रंप का मैसेज साफ था, “दुनिया में कोई दूसरी मिलिट्री नहीं है जो ऐसा कर सकती थी। अब शांति का समय है।” यह डिप्लोमेसी नहीं थी। यह ज़बरदस्ती थी जिसे अमेरिका ने अंजाम दिया। इससे साफ जाहिर होता है कि ताकत, ताकत का सम्मान करती है।

ईरान की फोर्डो संवर्धन सुविधा (Fordo enrichment facility) जमीन के नीचे 80-90 मीटर की गहराई पर स्थित है। तेहरान के दक्षिण में एक पहाड़ी के अंदर स्थित यह ईरान की सबसे सुरक्षित परमाणु ठिकानों में एक है।

ईरान ने लगातार कहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, जबकि पश्चिमी देशों ने चिंता व्यक्त की है कि इसका उपयोग हथियार विकसित करने के लिए किया जा सकता है। इस आशंका के मद्देजनर यूनाइटेड स्टेट्स ने एयर अटैक किया। यह एक युद्ध जैसा काम था, जिसे पश्चिमी देशों ने सही ठहराया, क्योंकि ईरान वेपन-ग्रेड यूरेनियम के करीब पहुँच रहा था।

न्यूक्लियर युग की यही उलझन है: कब्ज़ा करने से संयम आता है; पीछा करने से मिलिट्री हमले होते हैं।

इज़राइल ने पहले ही ईरान के खिलाफ ‘ऑपरेशन राइजिंग लायन’ शुरू कर दी थी। ईरान ‘ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 3’ से इसका जवाब दे रहा था। इस दौरान ड्रोन और मिसाइल से इजरायली एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया, लेकिन ईरान के पास मिडिल ईस्ट में US बेस पर हमला करने और होर्मुज स्ट्रेट को बाधित करने की क्षमता नहीं थी, जिससे दुनिया भर की तेल सप्लाई का लगभग 30% गुजरता है।

ऐसे में अमेरिका को बढ़त मिली हुई थी। वॉशिंगटन ने ध्यान से हिसाब लगाया। ईरान के पास अभी न्यूक्लियर हथियार नहीं हैं। इसलिए अमेरिका ने सीधे तौर पर ईरान के ठिकानों को निशाना बनाया।

इसकी तुलना नॉर्थ कोरिया से करें तो साफ होता है कि न्यूक्लियर छतरी जरूरी है, साथ ही अमेरिका को नुकसान पहुँचाने की क्षमता। इकॉनमी टूटी हुई है, डिप्लोमेसी पसंद नहीं है, ये मायने नहीं रखता।

यूनाइटेड नेशंस, जिसपर सभी देशों की रक्षा करने की जिम्मेदारी है, उसके सेक्रेटरी-जनरल एंटोनियो गुटेरेस ने ईरान पर US के हमलों पर ‘गंभीर चिंता’ जताई। खतरनाक नतीजों की चेतावनी दी और डिप्लोमेसी की अपील की। लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। UN नैतिकता की बात करता है, लेकिन नतीजा ताकत के बल पर मिलती है।

वेनेजुएला के बाद कोलंबिया को ट्रंप की धमकियाँ

वेनेजुएला और मादुरो को जबरन उठा ले जाने के ऑपरेशन के बाद लैटिन अमेरिका अस्थिर हो चुका है। ट्रंप ने खुलेआम अब कोलंबिया को धमकी दी है। उसके प्रेसिडेंट गुस्तावो पेट्रो को ‘सुधरने’ को कहा वरना वेनेजुएला वाला हश्र होने की बात कही। यहाँ एक बार फिर कोलंबिया की संप्रुभता को चुनौती दी गई।

खास बात यह है कि वेनेजुएला पर हुए अमेरिकी हमले की कोलंबिया ने निंदा की और इसे लैटिन अमेरिका की संप्रभुता पर हमला करार दिया। इससे अमेरिका बिदक गया और ट्रंप ने ‘अपने पीछे देखने’ के लिए कहा।

वेनेजुएला और राष्ट्रपति मादुरो के साथ हुए बदसलूकी ने दुनिया को परेशान कर दिया है। न्यूक्लियर हथियार अब सिर्फ़ स्ट्रेटेजिक एसेट नहीं रहे, बल्कि देश की ढाल हैं। ये दुनिया के सबसे ताकतवर देश को भी रुकने, हिसाब लगाने और फिर से सोचने पर मजबूर करते हैं। इसके बिना देश की संप्रभुता की कीमत नहीं रह जाती। ताकतवर देश अपने फायदा-नुकसान के हिसाब से ट्रीट करते हैं।

यह सच्चाई यह भी बताती है कि देशों में न्यूक्लियर पावर बनने का दबाव क्यों बढ़ रहा है, कम क्यों नहीं हो रहा है। दुनिया के छोटे-छोटे देश देख रहे हैं कि लीबिया के साथ क्या हुआ, जब उसने अपना न्यूक्लियर प्रोग्राम छोड़ दिया। वे देखते हैं कि इराक के साथ क्या हुआ, जिसके पास कभी न्यूक्लियर प्रोग्राम नहीं था। वे देखते हैं कि वेनेज़ुएला के साथ क्या हुआ। और वे देखते हैं कि नॉर्थ कोरिया के साथ क्या नहीं हुआ।

नतीजा लॉजिकल होता है, आइडियोलॉजिकल नहीं।

ऐसी दुनिया में जहाँ मानवाधिकार की बात सेलेक्टिव होता है, जहाँ ‘रूल्स-बेस्ड ऑर्डर’ सिर्फ कमजोर लोगों पर लागू होता है और जहाँ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ मूकदर्शक बन जाती है, उनकी सोच कोई मायने नहीं रखता, वहाँ न्यूक्लियर पॉवर होना संप्रभुता की आखिरी गारंटी बन जाती है।

यह न्यूक्लियर वॉर का सपोर्ट नहीं है। बल्कि शांति और संतुलन के लिए ‘न्यूक्लियर’ का होना जरूरी है। ये तबाही मचा सकता है, लेकिन शांति भी यही लाता है।

अजीब बात है कि आज शांति अच्छी नीयत या ग्लोबल नियमों से नहीं, न्यूक्लियर ताकत की मोहताज बन गई है। क्योंकि बदले की कार्रवाई का डर इतना खतरनाक है कि ताकतवर देश भी खौफ खाते हैं।

उस डर ने नॉर्थ कोरिया को बचाया। इसने चीन को बचाया। इसने अमेरिका को ईरान में ‘हिसाब लगाने’ पर मजबूर किया और इसकी गैरमौजूदगी ने काराकास को बर्बाद कर दिया।

(ये लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

विकास के बाद अब जातिवाद की राजनीति की ओर धकेला जा रहा गुजरात, कौन हर मुद्दे में जबरन जोड़ रहा जाति का गणित

गुजरात के बाहर पत्रकारों और राजनीतिक हस्तियों से बात करते समय एक शिकायत हमेशा सुनने को मिलती है कि गुजरात राजनीतिक रूप से बहुत ‘हैपनिंग’ राज्य नहीं रहा है। यह शिकायत काफी हद तक सही है। हम इन सभी मामलों में मूल रूप से शांतिप्रिय लोग हैं। चुनाव 5 साल में एक बार होते हैं और चुनाव के दौरान ही कुछ हंगामा होता है। एक बार नई सरकार बन जाती है तो हमारा ध्यान काम पर लौट आता है। जब चुनाव 5 साल बाद आते हैं, तो उस पर बात करने का समय होता है। पिछले कुछ वर्षों से ऐसा ही हो रहा था। अब यह ट्रेंड बदल रहा है। हालाँकि, हमाम में सब नंगे हैं लेकिन इस सब में एक बड़ा योगदान विपक्ष और उनके इकोसिस्टम का है। क्योंकि तीन दशकों तक सत्ता से अलग-थलग रहने के बाद शायद उनके लिए सत्ता तक पहुँचने का यही एकमात्र रास्ता है।

कुछ राज्यों में अभी भी जाति की राजनीति हावी है। हालाँकि, वहाँ भी जाति की राजनीति धीरे-धीरे अपना असर खो रही है और दूसरे मुद्दे ज्यादा अहम होते जा रहे हैं। समीकरण धीरे-धीरे बदल रहे हैं। इसके उल्ट गुजरात पिछले कुछ सालों में गलत दिशा में जाने लगा है। बल्कि, चीजों को गलत दिशा में ले जाने के लिए सिस्टमैटिक, प्लान्ड कोशिशें चल रही हैं।

अगर हम इतिहास पढ़ें तो हमें पता चलता है कि गुजरात में एक समय ऐसा रहा था। माधव सिंह की ‘खाम’ थ्योरी बहुत मशहूर है। यह सब 2001 तक चलता रहा लेकिन नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद राजनीति के केंद्र ‘जाति’ धीरे-धीरे हटती गई और विकास, अर्थव्यवस्था आदि केंद्र में आते गए। यही एक वजह है कि मोदी के 13 साल के ऐतिहासिक शासन में गुजरात का कायापलट हो गया। मोदी जानते थे कि नतीजे तभी मिल सकते हैं जब हम इन सभी विषयों से ध्यान हटाकर उन पर ध्यान दें जो करने की जरूरत है। जब सरकार और समाज का ध्यान एक ही मुद्दे पर होता है, तो विपक्ष को न चाहते हुए भी उसी पिच पर खेलते रहना पड़ता है और वह कहीं भी बराबरी नहीं कर पाता।

2014 में मोदी के गुजरात छोड़ने के बाद अलग पिच पर खेलने के मौके तलाशने शुरू हो गए। 2014 के लोकसभा चुनाव के ठीक अगले साल यानी 2015 में गुजरात में आंदोलनों का एक सिलसिला शुरू हुआ जिसके केंद्र में समुदाय और जातियाँ थीं। सामाजिक मुद्दों पर शुरू हुए इन आंदोलनों के बाद कई और आंदोलन हुए और आखिर में वही हुआ जो ऐसे आंदोलनों में होता है: सरकार पर खतरा मंडराने लगा। अंतत: आनंदीबेन पटेल को इस्तीफा देना पड़ा और विजय रूपाणी के नेतृत्व में नई सरकार बनी।

इस सरकार के सामने भी कई चुनौतियाँ थीं। जाति की राजनीति अभी भी हावी थी। दो साल बाद 2017 के विधानसभा चुनाव आए और उनमें BJP सत्ता से बाहर होने से सिर्फ 7 सीट दूर थी। 99 सीटों ने सरकार बचा ली लेकिन हालात अच्छे नहीं थे। विपक्ष दो दशकों में सत्ता के सबसे करीब था।

BJP 99 सीटों के साथ सत्ता में तो रही लेकिन उसकी पकड़ मजबूत नहीं थी। 2015 में अलग-अलग समुदायों को आगे करके राज्य में अस्थिरता और अराजकता लाने के बाद से ही सरकार के लिए परिस्थितियाँ मुश्किल होती गई हैं। 2017 में उन्हें इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा। यह कहना ज्यादा नहीं होगा कि अगर 2017 के चुनाव के नतीजे अलग होते तो केंद्र में हालात अलग होते लेकिन अब यह सब ‘अगर-मगर’ की बात है।

2017 के इन नतीजों के बाद BJP ने नए सिरे से काम करना शुरू किया और पार्टी लगातार मजबूत होती गई। दूसरी तरफ, कॉन्ग्रेस पूरी तरह से कमजोर हो गई थी इसलिए 2017 से पहले चल रही जबरदस्त लड़ाई पूरी तरह से बंद हो गई। 2022 आते-आते माहौल वैसा ही रहा। पिछले अनुभवों से सीखते हुए बीजेपी ने अपने समीकरणों को फिर से ठीक किया, कई दूसरे मुद्दों ने भी भूमिका निभाई और 2022 के चुनावों में ऐसा नतीजा आया जो पहले कभी नहीं देखा गया था। बीजेपी ने 156 सीटें जीतीं और यह संख्या अब कुल 182 सीटों में से बढ़कर 162 हो गई है।

अगर ध्यान से देखें तो गुजरात में यह पैटर्न काफी समय से देखने को मिल रहा है। जब भी कोई मामला पूरे राज्य में चर्चा का विषय बनता है या जानबूझकर बनाया जाता है, तो उसके साथ जाति का एंगल भी जोड़ दिया जाता है। समाज के कुछ नेता सामने आ जाते हैं। इंसान की यह स्वाभाविक आदत होती है कि वह खुद को आगे दिखाना चाहता है, यह साबित करना चाहता है कि वह समाज के लिए काम कर रहा है। इसलिए इसमें सिर्फ उन लोगों की गलती नहीं होती लेकिन इसका नुकसान पूरे समाज को उठाना पड़ता है। ऐसे नेता बीच में कूद पड़ते हैं, राजनीति घुस जाती है और आखिरकार पूरा माहौल खराब हो जाता है।

अगर कोई मुद्दा वास्तव में जाति से जुड़ा हो तो उस पर बात करना समझ में आता है। लेकिन कई बार ऐसे मामलों में भी जाति का रंग चढ़ा दिया जाता है जिनका जाति से कोई लेना-देना नहीं होता। कुछ दिन पहले अंबाजी मंदिर ट्रस्ट और राज परिवार के बीच विवाद में हाईकोर्ट ने फैसला दिया और नवरात्रि में राज परिवार के विशेष पूजा अधिकार को खत्म करने का आदेश दिया। इस मामले में भी सोशल मीडिया पर कुछ जगह इसे जाति से जोड़ने की कोशिश की गई।

हाल ही में सौराष्ट्र के बगदाणा में एक सरपंच पर हमला हुआ और ऐसा माहौल बना दिया गया कि दो जातियाँ आमने-सामने आ गईं। इसके बाद सुरेंद्रनगर में एक जमीन घोटाला पकड़ा गया जिसमें कलेक्टर की गिरफ्तारी हुई तो उस पर ED की कार्रवाई को भी उसकी जाति से जोड़ दिया गया। यहाँ तक कि शादी-ब्याह, प्रेम संबंध जैसे छोटे-छोटे मामलों को भी पूरे राज्य का मुद्दा बना दिया गया और उनमें भी समाज को घसीटा गया। कुछ समय पहले गोंडल के मामलों में भी यही देखने को मिला था।

समाज, जाति जैसे मुद्दे ऐसे होते हैं, जिन पर सरकार और राजनीतिक दल बहुत संभल-संभलकर चलते हैं। अब गुजरात में अगर किसी का नुकसान होना है, तो वह सत्ताधारी पार्टी का ही होना है। विपक्षी दलों के पास इस समय खोने के लिए कुछ खास बचा नहीं है। इसी वजह से वे समय-समय पर ऐसे मुद्दों को हवा देने की कोशिश करते रहते हैं।

विपक्षी दल और उनका पूरा इकोसिस्टम अच्छी तरह जानता है कि विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर अगले दस साल तक गुजरात में बीजेपी को हराना आसान नहीं है। ऐसे में उनके पास एक ही आखिरी रास्ता बचता है- समाज और जातियों को आगे रखकर राजनीति करना। यही कारण है कि हर मुद्दे में किसी न किसी तरह जाति का एंगल जोड़ दिया जाता है और किसी भी तरह से उस मुद्दे को जिंदा रखने की कोशिश की जाती है।

यूट्यूब के पत्रकारों से लेकर तथाकथित इन्फ्लुएंसर्स तक पूरा इकोसिस्टम लगातार ऐसा माहौल बनाने में लगा हुआ है। किसी न किसी रूप में उनकी ज्यादातर खबरें जातियों के इर्द-गिर्द ही घूमती हैं। किसी न किसी तरीके से हमें इन्हीं मुद्दों पर चर्चा करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। चर्चा करना गलत नहीं है लेकिन इसके नतीजों और साइड इफेक्ट्स को समझना भी उतना ही जरूरी है। क्योंकि 2027 तक इस तरह की गतिविधियाँ और ज्यादा देखने को मिलेंगी।