Home Blog Page 1179

मी लॉर्ड! ये अच्छा है कि आप देख लेंगे, पर समय से देख लेने से आम आदमी को मिल सकती है राहत

चुनाव आते ही सरकार को अस्थिर करने वाले लोग सक्रिय हो जाते हैं। यह अस्थिरता कई वजहों से फैलाने की कोशिश की जाती है। अपनी ताकत दिखाकर राजनीतिक पर दबाव बनाने की कोशिश भी इनमें एक शामिल है। इस बार भी विधानसभा चुनाव से बस कुछ दिन पहले ही किसान आंदोलन के नाम पर यह प्रक्रिया शुरू कर दी गई। साल 2021 में भी ऐसा ही आंदोलन शुरू किया गया। तब उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले थे। इन आंदोलनों के कारण दिल्ली-एनसीआर के लाखों लोगों को समस्याएँ झेलनी पड़ी थी और लोगों ने सुप्रीम कोर्ट का रूख किया था।

इस बार भी उन समस्याओं को याद करते हुए एक वकील ने सुप्रीम कोर्ट का रूख किया है। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष आदिश अग्रवाल ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ को पत्र लिखा है। इस पत्र में अग्रवाल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को इस आंदोलन का स्वत: संज्ञान लेना चाहिए, क्योंकि इससे आम लोगों को भारी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि अगर वकील इस आंदोलन की वजह से पैदा हुए ट्रैफिक समस्या के कारण समय पर कोर्ट नहीं पहुँच पाते हैं तो कोई फैसला नहीं सुनाया जाए।

सुप्रीम कोर्ट के एक वकील जब जाम में फँस गए तो उन्हें चलती कार से ही ऑनलाइन बहस करनी पड़ी। बहस के दौरान जस्टिस ओका ने कहा कि उन्हें वकीलों के वर्चुअली पेश होने से कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन इस तरह चलती कार में नहीं। इस पर एडवोकेट ने कहा कि वो किसान आंदोलन के कारण जाम में फँस गए हैं। इस पर कोर्ट ने कहा कि ‘फिर तो इस बात के लिए हम आपको माफ कर देंगे’।

इसके बाद सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि अगर वकीलों को आने-जाने में समस्या होती है तो उन्हें बताई जाए और वे मामले को देखेंगे। बार एसोसिएशन ने कथित किसानों के आंदोलन पर स्वत: संज्ञान लेने का भी आग्रह किया। हालाँकि, स्वत: संज्ञान वाले मामले पर सीजेआई ने क्या कहा, इसके बारे में कोई बात सामने नहीं आई है, लेकिन किसानों के पिछले आंदोलन और साल 2019 में शुरू हुए शाहीन बाग प्रदर्शन पर गौर करें तो ऐसा नहीं लगता कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले संज्ञान लेगा।

दरअसल, नागरिकता संशोधन बिल (CAA) और नागरिक पंजीकरण रजिस्टर (NRC) के विरोध में दिल्ली के शाहीन बाग में लंबा प्रदर्शन किया गया था। उस समय भी इलाके को जाम कर दिया गया था, जिसके कारण महीनों तक लोगों की समस्याओं का सामना करना पड़ा था। तब फरवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि फिलहाल इस मामले में वह हस्तक्षेप नहीं करेगा। हालाँकि, कोर्ट ने दोहराया था कि सार्वजनिक जगहों पर प्रदर्शन करना वाजिब नहीं है और जगह खाली कराने के लिए अधिकारियों को आगे आने के लिए कहा था।

इसी मामले पर अक्टूबर 2020 में जब सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की तो कहा था कि सार्वजनिक स्थानों पर अनिश्चितकाल के लिए कब्जा नहीं किया जा सकता है। अदालत ने कहा था कि धरना-प्रदर्शन का अधिकार अपनी जगह है, लेकिन अंग्रेजों के राज वाली हरकत अभी करना सही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सार्वजनिक जगहों पर प्रदर्शन लोगों के अधिकारों का हनन है। कानून में इसकी इजाजत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संविधान विरोध करने का अधिकार देता है, लेकिन इसे समान कर्तव्यों के साथ जोड़ा जाना चाहिए।

इस तरह की गोलमोल टिप्पणी साल 2021 के किसान आंदोलनों के दौरान भी सुप्रीम कोर्ट ने दिया था। उस दौरान केंद्र की मोदी सरकार ने किसानों की भलाई के लिए तीन कृषि कानून लागू किए थे। इन कृषि कानूनों को किसान विरोधी बताकर हरियाणा-पंजाब के कथित किसान सड़कों पर आ गए थे। उन्होंने इस दौरान कई हिंसा की वारदातों को भी अंजाम दिया था। प्रदर्शन स्थल पर एक व्यक्ति की मौत भी हो गई थी। तब भी सुप्रीम कोर्ट ने इसका स्वत: संज्ञान नहीं लिया था।

तीन कृषि कानूनों के खिलाफ दायर की गई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए तत्कालीन CJI एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र से कहा था कि न कृषि कानूनों पर रोक क्यों नहीं लगा रहे? उन्होंने कहा कि अगर केंद्र सरकार जिम्मेदारी दिखाते हुए इसे रोकने का आश्वासन देती है तो सुप्रीम कोर्ट एक समिति बना कर इसे देखने को कहेगा। तब तक इसे रोक कर रखा जाए। उन्होंने पूछा कि आखिर इसे क्यों जारी रखा जा रहा है? इस दौरान CJI ने बार-बार दोहराया कि वो इन कानूनों के कार्यान्वयन को रोक देंगे। हालाँकि, बाद में नंवबर 2021 में केंद्र सरकार ने इन कानूनों को रद्द कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने किसानों के हिंसक आंदोलन को लेकर कोई संज्ञान तो नहीं लिया, लेकिन 12 जनवरी 2021 को किसान आंदोलन को लेकर एक कमिटी का गठन किया था। इस कमिटी में कृषि विशेषज्ञ अशोक गुलाटी, डॉ. प्रमोद कुमार जोशी और अनिल घनवटे शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट ने 4 सदस्यीय टीम बनाई थी, लेकिन किसान नेता भूपिंदर सिंह मान ने इससे खुद को अलग कर लिया था। इस कमिटी ने अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में दे दी, लेकिन रिपोर्ट केंद्र सरकार द्वारा कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा के पाँच महीने बाद आई।

इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि देश भर के 86 फीसदी किसान संगठन सरकार के तीनों कृषि कानूनों से खुश थे। ये किसान संगठन करीब 3 करोड़ किसानों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। इन सबके बावजूद केंद्र सरकार को इन कानूनों को वापस लेना पड़ा। घनवटे के मुताबिक, सीलबंद रिपोर्ट में भी कृषि कानूनों को रद्द न करने की सलाह दी थी। घनवट ने कहा था कि इन कृषि कानूनों को रद्द करना या लंबे समय तक लागू न करना उन लोगों की भावनाओं के खिलाफ है, जो इसका मौन समर्थन करते हैं। 

आपको याद होगा जब कथित किसान संगठनों ने दिल्ली को घेर रखा था, हिंसा-हुड़दंग की खबरें लगातार आ रही थी तब कई लोगों ने इस मामले में दो टूक फैसले नहीं लेने पर सुप्रीम कोर्ट की आलोचना की थी। शाहीन बाग में भी सुप्रीम कोर्ट का यही रवैया सामने आया था। अब जबकि किसान फिर से दिल्ली के बॉर्डर पर पहुँच रहे हैं और हर तरफ आफरा-तफरी का माहौल है, ऐसे में एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट फिर संभावित हिंसा को देखते हुए किसी तरह का निर्देश देने से बचता दिख रहा है।

हालाँकि, किसान चुनाव को देखते हुए सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश में लगे हैं और इस तरह की माँगे रख रहे हैं, जिस पर गहन अध्ययन करके ही निर्णय लिया जा सकता है। किसानों ने जिन माँगों को रखा है उनमें MSP की गारंटी के साथ ही बिजली की दरों में छूट और किसानों के कर्ज की माफी की भी माँग है। यहाँ तक बात तो ठीक है। हालाँकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार (13 फरवरी 2024) को पीएम सूर्य घर योजना की घोषणा की है, जिसमें देश भर के एक करोड़ घरों को हर महीने 300 यूनिट मुफ्त बिजली दी जाएगी।

इसके अलावा, किसानों ने पिछले आंदोलन के समय दर्ज हुए मुकदमों को भी तुरंत खारिज करने की माँग की है और लखीमपुर में मारे गए चार किसानों के परिवारों के लिए सरकारी नौकरी और आर्थिक मदद की माँग कर रहे हैं। किसान स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की माँग भी कर रहे हैं, जिसमें लागत की तुलना में एमएसपी को डेढ़ गुना करने की माँग है। बताते चलें कि पिछले किसान आंदोलन के दौरान उपद्रवियों ने दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर हिंसा की थी। इतना ही नहीं, दिल्ली के लालकिले पर तिरंगा को नोंचने की कोशिश की थी।

‘पूर्व नौसैनिकों पर क़तर से शाहरुख़ खान ने कराई भारत की डील, उन्हें साथ लेकर जाएँ PM मोदी’: अजीबोगरीब दावा कर हँसी का पात्र बने सुब्रमण्यन स्वामी

हाल ही में भारत सरकार ने क़तर में मौत की सज़ा पाए 8 पूर्व भारतीय नौसेना अधिकारियों की सकुशल घर-वापसी सुनिश्चित कराई है। पहले इन पूर्व नौसैनिकों की सज़ा घटाई गई, उसके बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय विदेश मंत्री S जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल की इसके लिए जम कर तारीफ़ हो रही है। हालाँकि, सुब्रमण्यन स्वामी ने इसमें शाहरुख़ खान वाला एंगल खोज लिया है, जो न सिर्फ अजीब है बल्कि हास्यास्पद भी है।

असल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ट्वीट किया, जिसमें उन्होंने बताया कि अगले 2 दिनों में वो UAE और क़तर के दौरे पर रहेंगे। इस दौरान वो कई कार्यक्रमों का हिस्सा बनेंगे और इन दोनों देशों के साथ भारत के द्विपक्षीय रिश्तों में भी मजबूती आएगी। पीएम मोदी ने बताया कि PM बनने के बाद ये उनका UAE का 7वाँ दौरा होगा, जो भारत-यूएई की दोस्ती की महत्ता की तरफ इशारा करता है। उन्होंने कहा कि वो अपने भाई राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायेद से मिलने के लिए भी उत्साहित हैं।

पीएम मोदी ने ये भी बताया कि उन्हें UAE के पहले हिन्दू मंदिर के उद्घाटन का सौभाग्य भी प्राप्त हो रहा है। अबुधाबी में एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीय समुदाय से भी मुलाकात करेंगे। दुबई में ”वर्ल्ड गवर्नमेंट्स समिट (WGS)’ में भी उन्हें हिस्सा लेना है और साथ ही दुबई के शासक HH शेख मुहम्मद से भी मुलाकात करनी है। साथ ही उन्होंने क़तर के अमीर तमीम बिन हमाद अल थानी से मुलाकात को लेकर भी बात की और कहा कि उनके तहत क़तर अत्यधिक विकास कर रहा है।

इस ट्वीट की रिप्लाई में सुब्रमण्यन स्वामी टपक पड़े और लिखा, “मोदी को अपने साथ सिनेमा स्टार शाहरुख़ खान को लेकर क़तर जाना चाहिए। जब केंद्रीय विदेश मंत्रालय (MEA) और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) क़तर के शेखों को मनाने में विफल हो गए, तब मोदी ने शाहरुख़ खान से विनती की कि वो हस्तक्षेप करें। इसके बाद हमारे पूर्व नौसेना अधिकारियों की रिहाई के लिए क़तर के शेखों के साथ एक बहुत ही खर्चीली डील हुई।”

सुब्रमण्यन स्वामी का ये दावा हैरान करने वाला है, क्योंकि शाहरुख़ खान का इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है। क़तर ने इन कैदियों को काउंसलर एक्सेस मुहैया कराया था और भारतीय दूतावास ने उनकी मदद की, भारतीय नौसेना और विदेश मंत्रालय ने मामले के कानूनी पहलुओं को समझा, क़तर के सर्वोच्च न्यायालय में अपील की तैयारी की गई। कूटनीतिक रास्ते से ये जीत मिली। सुब्रमण्यन स्वामी अक्सर अजीबोगरीब दावे कर के हास्य का पात्र बनते रहते हैं।

गुजरातियों से माफी माँगने को तैयार हूँ… तेजस्वी यादव के गिड़गिड़ाने के बाद SC ने रद्द की FIR

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (13 फरवरी, 2024) को राष्ट्रीय जनता दल के नेता और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के खिलाफ दर्ज एक FIR को रद्द कर दिया। यह FIR उनके खिलाफ अहमदाबाद में करवाई गई थी वो भी तब जब उन्होंने ‘गुजरातियों’ पर अपमानजनक बयान दिया था। विवाद बढ़ने पर उन्होंने कोर्ट में कहा था कि वो लिखित में माफी माँगने को तैयार हैं। इसके बाद उनकी इस याचिका पर सुनवाई हुई। उनसे माफी मँगवाई गई। फिर, ये एफआईआर को रद्द कर दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले तेजस्वी यादव को आदेश दिया था कि वह एक सप्ताह के भीतर अपना बयान वापस लें। सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी, 2024 को कहा था कि तेजस्वी यादव को एक सप्ताह के भीतर स्पष्ट शब्दों में यह लिखना होगा कि गुजरातियों पर दिए गए बयान पर उन्हें खेद है। वह अपने इस बयान को वापस लेते हैं।

तेजस्वी ने कोर्ट का यह आदेश मान लिया है और अपना शपथपत्र दाखिल करके गुजरातियों पर दिया बयान वापस ले लिया है। उनके इस मामले की सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने FIR रद्द कर दी है। बेंच ने इस मामले में सभी पक्षों के दावों की जाँच के बाद आज कहा, “हम मामले को रद्द करते हैं।”

गौरतलब है कि तेजस्वी यादव ने 22 मार्च 2023 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में गुजरातियों के खिलाफ बयान दिया था। उन्होंने कहा था, “सिर्फ गुजराती ही ठग हो सकते हैं और उनका अपराध माफ भी कर दिया जाएगा। अगर वह देश से फरार भी हो जाएँ तो उसके लिए कौन जिम्मेदार होगा?”

इसको लेकर हरेश मेहता ने उनके खिलाफ गुजरात में आपराधिक मानहानि का मामला दर्ज करवाया था। इसमें कहा गया था कि तेजस्वी यादव ने पूरे गुजराती समाज का अपमान किया है। अहमदाबाद में इस मामले में उन्हें समन भी जारी किया गया था लेकिन वह यहाँ पेश होने नहीं पहुँचे थे और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

याद दिला दें कि इससे पहले एक ऐसा ही मामला कॉन्ग्रेस सांसद राहुल गाँधी के विरुद्ध दर्ज करवाया गया था। राहुल गाँधी ने 2019 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जाति मोदी को लेकर कहा था कि ‘सारे मोदी चोर’ होते हैं। इस पर उनके खिलाफ आपराधिक मानहानि का मामला चला था। इस मामले में उन्हें 2 वर्ष की सजा अहमदबाद की अदालत ने सुनाई थी।

अब्दुल मलिक पर सपा के मुस्लिम नेता की हत्या का आरोप, पुलिस पर हमले के लिए दुश्मनी भूले दोनों परिवार: हल्द्वानी के वरिष्ठ पत्रकार ने बताया – 1998 में भी भड़के थे दंगे

उत्तराखंड के हल्द्वानी स्थित बनभूलपुरा में जम कर हिंसा हुई। पुलिस थाना फूँक दिया गया और पेट्रोल पंप को भी आग के हवाले कर दिया गया। पत्रकारों तक को नहीं छोड़ा गया। पीड़ितों का कहना है कि इस्लामी कट्टरपंथी भीड़ नाम पूछ-पूछ कर पीट रही थी, मुस्लिम होने पर छोड़ दिया जा रहा था। एक पत्रकार को आग में झोंक दिया गया। महिला पुलिसकर्मियों को बदहवास अवस्था में जान बचा कर भागते हुए देखा गया। अस्पताल में हिन्दू कार्यकर्ताओं ने घायल पुलिस वालों का इलाज कराया।

अब इस मामले में नया खुलासा हुआ है। 20 वर्षों से हल्द्वानी में पत्रकारिता कर रहे जर्नलिस्ट अरविंद मलिक से ऑपइंडिया ने बातचीत की। उन्होंने इस दौरान अब्दुल मलिक के बारे में भी बताया, जो इस हमले का मुख्य साजिशकर्ता है और जिसने मलिक का बगीचा में अवैध मदरसा और मस्जिद बना रखा था। उन्होंने बताया कि 26 वर्ष पहले भी इसी तरह की एक घटना हुई थी जब अब्दुल मलिक पर पकड़ने गई टीम पर मुस्लिम भीड़ ने हमला बोल दिया था।

उन्होंने बताया कि उस दौरान भी मुस्लिमों ने पुलिस की गाड़ियाँ तोड़ी थी, जलाई थी। कई जवानों के अलावा एक सिटी एसपी भी घायल हुए थे। अरविंद मलिक ने बताया कि अब्दुल मलिक समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी, दोनों का ही करीबी है। उसने एक मुस्लिम नेता की ही हत्या करवाई थी, जो सपा में तेज़ी से उभर रहा था। अब्दुल मलिक को ये पसंद नहीं आया। 26 साल पहले यूपी से अलग होकर उत्तराखंड एक अलग राज्य नहीं बना था।

बड़ी बात ये है कि अब जब इस हत्याकांड के 26 वर्ष बाद पुलिस पर हमला किया गया है, तब अब्दुल मलिक के परिजन और जिस मुस्लिम शख्स की उसने हत्या करवाई थी उसके परिजन साथ हैं। दंगाइयों में दोनों ही शामिल थे। अब्दुल मलिक देवबंदी है, जबकि जिसकी उसने हत्या करवाई थी वो बरेलवी मुस्लिम था। इसके बावजूद आज हत्या की दुश्मनी भूल कर दोनों ने दंगे में हाथ बँटाया। देवबंदी और बरेलवी की मस्जिदें भी अलग-अलग होती हैं, लेकिन दंगे में दोनों साथ हैं।

अरविन्द मलिक ने बताया, “हल्द्वानी में 20% देवबंदी हैं, जबकि 80% बरेलवी। एक अब्दुल्ला थे, जो नगरपालिका के चेयरमैन रहे। अब्दुल मलिक फरीदाबाद से लोकसभा चुनाव लड़ चुका है, जहाँ उसे सफलता नहीं मिली। फिर वो कूड़ा के कारोबार में जुट गया। अब्दुलरउफ सिद्दीकी 26 साल पहले सपा में उभर रहे थे। तब अब्दुल मलिक के पास पार्टी में कोई बड़ा पद नहीं था। उसे सिद्दीकी का आगे बढ़ना कचोट रहा था। 19 मार्च, 1998 को वो लखनऊ जा रहे थे, उसी दौरान बरेली के भोजीपुरा थाना क्षेत्र में उनकी गाड़ी का एक्सीडेंट करा दिया गया।”

उन्होंने बताया कि बरेली में इसका मुकदमा दर्ज हुआ था, जिसमें अब्दुल मलिक भी नामजद था। उन्होंने बताया कि इस हत्याकांड के कारण हल्द्वानी के बाजार कई दिनों तक बंद रहे। बरेली और हल्द्वानी की पुलिस ने मिल कर जॉइंट ऑपरेशन शुरू किया, लेकिन अब्दुल मलिक अपने संबंधों के बूते बच निकला। पुलिस बैकफुट पर आ गई और मामला सीबी-सीआईडी के पास चला गया। बकौल अरविन्द मलिक, ईद के समय यहाँ के एसपी नासिर भी नमाज पढ़ने गए थे, वो युवा नेता की हत्या से दुखी थे।

वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि इस दौरान उनका आमना-सामना अब्दुल मलिक से हुआ और फिर उन्होंने हत्यारों को सबक सिखाने की ठानी। ईद के अगले दिन उन्होंने एक मामले में अब्दुल मलिक के खिलाफ वॉरंट ले लिया। उस समय कल्याण सिंह यूपी के मुख्यमंत्री थे और सूरजभान को राज्यपाल बनाया गया था। सूरजभान जब राज्यपाल बन कर लखनऊ पहुँचे तो उनके साथ विमान में अब्दुल मलिक भी आया था, मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने राज्यपाल की अगवानी की। तब हत्या आरोपित का सीएम-राज्यपाल के साथ होना अख़बारों की सुर्खियाँ बनी थीं।

अरविंद मलिक ने बताया, “उस समय सीबी-सीआईडी की संस्तुति निरस्त कर दी गई। अब्दुल मलिक को गिरफ्तार कर के बरेली भेज दिया गया। उसे उसके आज़ाद नगर स्थित घर से उठाया गया था। उसके बाद आगजनी-पत्थरबाजी शुरू हो गई। जिस युवा सपा नेता की हत्या हुई, वो बरेलवी थे। लेकिन, ये ईगो की लड़ाई थी। मुकदमा चलता रहा, ये लोग कोर्ट से बरी भी हो गए। जिनकी हत्या हुई, उनके भाई आज सपा के नेता हैं। दोनों परिवार दुश्मन थे, लेकिन ताज़ा मामले में दोनों फिरके एक साथ हैं। अब्दुलरउफ का भाई जावेद सिद्दीकी गिरफ्तार हुआ है।”

किसान आंदोलन में आतंकी भिंडरावाले का झंडा: ट्रैक्टर से दिल्ली आने वाले वालों का मकसद क्या?

किसान आंदोलन में खालिस्तानी आतंकी भिंडरावाले का पोस्टर अभी से दिखने लगा है। वीडियो सामने आई है जिसमें अंबाला के शंभू बॉर्डर के पास किसान अपने ट्रैक्टर लेकर फतेहगढ़ साहिब से आ रहे हैं। ये सारे ट्रैक्टर दिल्ली सीमाओं पर इकट्ठा होंगे। इन्हीं में देख सकते है कि खुलेआम बड़ा का झंडा लगाकर इसे दिल्ली लाने की तैयारी हो रही है।

वीडियो में दिख रहा है कि एक साथ कई ट्रैक्टर आगे बॉर्डर की ओर आगे बढ़ रहे हैं। इसमें दूसरे नंबर पर जो ट्रक आ रहा है उसमें बड़ा सा झंडा लगा है जिसमें खालिस्तानी आतंकी भिंडारावाले का झंडा लगा है। इसे देखने के बाद लोग याद कर रहे हैं दिल्ली में जब इससे पहले किसान आंदोलन हुआ था तो किस तरह की घटनाओं को अंजाम दिया गया।

याद दिला दें कि इससे पहले भी जब किसानों ने दिल्ली सीमाओं पर धरना देना शुरू किया था, उस समय भी प्रदर्शनकारियों के पास भिंडरावाले के पोस्टर देखे गए थे और फिर खुलेआम नारे सुनाई पड़े थे- “भिंडरावाले तेरी सोच पर राज करेगा…।” इसके अलावा ये बात भी गौर करनी वाली है कि जब-जब भिंडरावाले के पोस्टर या झंडे देखे जाते रहे हैं तब तब कट्टरपंथी खालिस्तानी भीड़ का उग्र चेहरा सामने आया है।

2020-2021 के किसान आंदोलन को ही यदि याद करें तो भीड़ ने नारेबाजी के साथ तिरंगा का अपमान किया था। इसके अलावा कुछ दिन पहले की ही बात है कि आतंकी भिंडरावाले का पोस्टर गुरुद्वारे में लगाने से जब रिटायर कर्नल ने मना किया था तो कैसे खालिस्तानी उन पर टूट पड़े थे और उनकी गाड़ी को तोड़ दिया गया था। इन सब घटनाओं को देखते हुए ये सोचना अहम है कि आखिर इन बड़े-बड़े ट्रैक्टरों में बैठकर कौन से किसान दिल्ली आ रहे हैं जिनके लिए ऐसे झंडे लगाने जरूरी हैं।

केजरीवाल सरकार ने कहा – ‘किसानों को गिरफ्तार करना गलत, नहीं बनाएँगे जेल’: दिल्ली को घरने 6 महीने का राशन लेकर चले ‘अन्नदाता’

अरविंद केजरीवाल की दिल्ली सरकार ने मंगलवार (13 फरवरी 2024) को राष्ट्रीय राजधानी में किसानों के मार्च के मद्देनजर बवाना स्टेडियम को अस्थायी जेल में बदलने के केंद्र के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। दिल्ली के गृह मंत्री कैलाश गहलोत ने मुख्य सचिव नरेश कुमार को पत्र लिखकर अनुमति देने से इनकार कर दिया और किसानों के मार्च के प्रति एकजुटता व्यक्त की।

कैलाश गहलोत के पत्र में लिखा गया, “किसानों की माँगें वास्तविक हैं। दूसरी बात, शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। इसलिए, किसानों को गिरफ्तार करना गलत है।” दिल्ली सरकार ने कहा कि किसानों की माँग जायज है। किसान इस देश के अन्नदाता हैं। अन्नदाता को जेल में डालना गलत है। हम बवाना स्टेडियम को अस्थायी जेल बनाने की परमिशन नहीं दे सकते।

इससे पहले, आम आदमी पार्टी ने एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देश के अन्नदाताओं से नफरत का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि दिल्ली की हरियाणा और उत्तर प्रदेश से लगती बॉर्डरों पर लोगों को राजधानी में एंट्री करने से रोकने के लिए कीलों वाली रिकेडिंग हाईवे पर कर दी है। जो अन्नदाता किसान देश का पेट भरने के लिए जमीन पर फसल उगाते हैं, पीएम मोदी ने उन्हीं किसानों को रोकने के लिए रास्ते में कीलों का जाल बिछाया है।

इस बीच, किसानों का दिल्ली मार्च जारी है। भारी संख्या में किसान दिल्ली बॉर्डर पहुँचने भी लगे हैं। किसानों ने कहा कि हम अपनी माँगों को पूरा करवाकर ही जाएँगे। हम 6 महीने का राशन लेकर आए हैं। किसान पहले दिल्ली के पास बॉर्डर पर जमा होंगे और दोपहर तीन बजे आगे की रणनीति के बारे में फैसला करेंगे। किसानों की ओर से कहा गया है कि हम अन्न उगाते हैं। सरकार ने हमारे लिए कीलों की फसल उगा रखी है। सरकार हमारे लोगों को अलग-अलग राज्यों में पकड़ रही है। हम फिर भी सरकार से बात करने को तैयार हैं।

जो पुलिस मूक होकर देखती रही तमाशा, वो कैसे दिलाएगी न्याय: संदेशखाली में महिलाओं ने राज्यपाल से लगाई गुहार, स्मृति ईरानी ने CM ममता को लताड़ा

पश्चिम बंगाल के संदेशखाली में तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडों से तंग आई महिलाओं का वहाँ की स्थानीय पुलिस से विश्वास उठ गया है। जाँच टीम गठित होने के बावजूद महिलाओं ने राज्यपाल से न्याय की गुहार लगाई है। उनका कहना है कि पुलिस उनपर होते अत्याचारों के बारे में जानती थी फिर भी कोई एक्शन नहीं लिया। उनकी इस गुहार के बीच यह मुद्दा केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने भी उठाया है। उन्होंने मीडिया में कॉन्फ्रेंस करते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को खरी-खरी सुनाई है।

उन्होंने मीडिया में बात करते हुए कहा कि जवान शादीशुदा महिलाओं को संदेशखाली में निशाना बनाया जा रहा है। केंद्रीय मंत्री ने ममता बनर्जी पर आरोप लगाया कि वो ऐसे लोगों को संरक्षण दे रही हैं जो हिंदू महिलाओं को टारगेट करके उनका रेप करते हैं। ईरानी ने संदेशखली की महिलाओं द्वारा लगाए आरोपों को अनुवाद कर बताया कि TMC के गुंडे घर-घर जाकर देखते थे कि किस घर की कौन सी औरत सुंदर है। कौन कम उम्र की है? इसके बाद TMC के गुंडे उन्हें रात में उठा कर लेकर चले जाते थे। जब तक TMC वाले नहीं चाहते थे, तब तक इन औरतों को नहीं छोड़ा जाता था।

स्मृति ईरानी ने संदेशखली की औरतों की व्यथा सुनाते हुए कहा- “ममता हिंदुओं के नरसंहार के लिए जानी जाती हैं। वह अपने गुट के पुरुषों को महिलाओं से अभद्रता करने की अनुमति दे रही हैं। देश के लोग इसे चुपचाप कैसे देख सकते हैं।”

बता दें कि एक ओर जहाँ संदेशखली में महिलाओं के यौन उत्पीड़न का मुद्दा सामने आने के बाद सब हैरान हैं। वहीं इस मामले में बंगाल पुलिस ने 10 सदस्यों की टीम गठित करके महिलाओं के आरोपों की जाँच करने की बात कही है। लेकिन महिलाओं की आपत्ति इस बात से है कि जो पुलिस अब तक उनके साथ होते अन्याय पर चुप थीं, वो अब उनको न्याय कैसे देंगी।

बताया जा रहा है कि टीम को जो महिला डीआईजी लीड करेंगी, उन पर भी स्थानीयों ने इल्जाम लगाया है कि वो टीएमसी गुंडों की गुंडागर्दी के बारे में जानती थीं और फिर भी अब तक चुप थीं। वहीं कुछ वीडियोज भी महिलाओं की सामने आई है जिनमें वह कहती सुनाई पड़ रही हैं कि संदेशखाली में पुलिस द्वारा पीड़िताओं को प्रताड़ित किया जाता है। कभी रात में पुलिस घर आ जाती है तो कभी घर के पुरुषों को गाली देती है।

एक महिला ने तो रिपब्लिक बंग्ला को यहाँ तक बताया कि टीएमसी गुंडों ने उनकी खिड़की तोड़ दी थी और उनसे बाहर आने को कहा था। महिला के अनुसार, “उन लोगों ने साफ कहा था कि वो मेरा गैंगरेप करेंगे। ये सब पुलिस के सामने हो रहा था। कई महिलाएँ ऐसी भी हैं जिनके बाल और साड़ी खींची जाती है। हम संदेशखली में सुरक्षित नहीं है। ऐसी प्रताड़ना से तो बेहतर है हमें मार दिया जाए।”

पुलिस का रवैया देख पीड़िताएँ उनपर विश्वास नहीं कर पा रहीं। 12 फरवरी को उन्होंने बंगाल गवर्नर सीवी आनंद बोस से इस मामले में न्याय माँगा। उन्होंने कहा, “जब तक आप यहाँ रहते हैं, हम बात कर सकते हैं, लेकिन एक बार जब आप चले जाते हैं, तो स्थिति वही हो जाती है जो पहले थी। वे हम पर अत्याचार करते रहेंगे। कुछ ऐसा करो कि वे गिरफ्तार हो जाएँ। हम कड़ी सजा की माँग करते हैं; हम न्याय चाहते हैं।” बंगाल राज्यपाल ने इस मामले में महिलाओं को आश्वासन दिया है कि आरोपितों के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी।

गौरतलब हो कि 8 फरवरी 2024 को संदेशखाली में सैंकड़ों महिलाएँ झाड़ू और डंडा लेकर सड़कों पर आ गईं थीं। उन्होंने टीएमसी नेता शेख शाहजहाँ की गिरफ्तारी की माँग की थी। उन्होंने कहा था कि इन लोगों ने उनका जीना मुश्किल कर दिया है। उनकी जमीनें कब्जा ली गई हैं। घटना के बाद भाजपा नेता अर्चना मजूमदार ने दावा किया था कि स्थानीय पुलिस ने प्रदर्शनकारी महिलाओं के घर रेड मारी थी और उन्हें प्रताड़ित भी किया गया। इसके बाद वहाँ हिंदू महिलाओं को टारगेट करने, उनके साथ यौन हिंसा क की बातें भी मीडिया में आईं और जब स्मृति ईरानी ने इस मुद्दे को उठाया तो इस पर हर जगह चर्चा शुरू हो गई। अब महिलाओं को न्याय दिलाने की माँग हो रही है।

क्रिश्चियन मिशनरी स्कूल में रामायण-महाभारत का अपमान, लड़कियों के चूड़ी पहनने और बिंदी लगाने पर भी रोक: हिंदू संगठनों के प्रदर्शन के बाद टीचर बर्खास्त

कर्नाटक के मेंगलुरु स्थित एक क्रिश्चियन मिशनरी संचालित स्कूल में हिंदू बच्चों पर तमाम तरह की रोक लगाई गई। इसके बाद उन बच्चों के मन में सनातन और हिंदुत्व के प्रति जहर भरने का काम किया गया। इससे भी बात नहीं बनी, तो एक टीचर ने प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ प्रोपेगेंडा वाली बातें सातवीं कक्षा के छात्रों को बताई। टीचर ने ‘गोधरा कांड’ और ‘बिल्किस बानो केस’ जैसे संवेदनशील मुद्दों को तोड़-मरोड़ कर बच्चों के सामने परोसा, ताकी बच्चों के मन में प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ नफरत भर जाए।

यही नहीं, टीचर ने रामायण – महाभारत को काल्पनिक बताते हुए भगवान राम और अयोध्या नगरी तक को खारिज कर दिया। ये बातें तब हो रही हैं, जब सारी दुनिया अयोध्या में भगवान राम के जन्मस्थान पर भव्य मंदिर बनता देख रही है और रामलला स्वयं गर्भगृह में विराजमान हो गए हैं।

ये मामला मेंगलुरु स्थित सेंट गेरोसा इंग्लिश एचआर प्राइमरी स्कूल का है। आरोप है कि बीते गुरुवार (8 फरवरी) को सातवीं कक्षा के बच्चों को पढ़ाते हुए टीचर ने ऐसी टिप्पणियाँ की। इसका खुलासा तब हुआ, जब किसी बच्चे के अभिभावक और विश्व हिंदू परिषद के स्थानीय नेता शरण पंपवेल की बातचीत हुई और इस बातचीत का ऑडियो वायरल हो गया। इस बातचीत के दौरान ही बच्चे के माता-पिता ने शिक्षक पर गंभीर आरोप लगाए और बताया कि बच्चों का किस तरह से ब्रेनवॉश किया जा रहा है। ऐसा पिछले कई सालों से चल रहा है। पिछले साल भी बच्चों को यही सब बातें बताई गई थी।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद मेंगलुरु उत्तर विधानसभा सीट से बीजेपी के विधायक भरत शेट्टी की अगुवाई में स्कूल के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया गया। भरत शेट्टी ने हिंदू परिजनों से “ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित स्कूलों में अपने बच्चों को दाखिला देने पर पुनर्विचार करने” की भी अपील की। ये प्रदर्शन 11 फरवरी को किया गया। प्रदर्शन में विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्या भी शामिल रहे।

भरते शेट्टी ने कहा, “जिन स्कूलों ने लड़कियों के चूड़ी पहनने और माथे पर बिंदी लगाने पर बैन लगाया था, वे अब राम मंदिर के खिलाफ नफरत फैला रहे हैं।” उन्होंने कहा, “अगर स्कूल प्रबंधन शिक्षक के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरू करने में विफल रहता है, तो विरोध प्रदर्शन किया जाएगा।”

इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने उप निदेशक (सार्वजनिक निर्देश) के कार्यालय में भी घुसने की कोशिश की। प्रदर्शनकारियों के गुस्से को देखते हुए 100 से अधिक पुलिस कर्मियों को मौके पर तैनात कर दिया गया। विरोध प्रदर्शन के दौरान लोगों ने आरोपित टीचर के खिलाफ कार्रवाई की माँग करते हुए नारे लगाए। उन्होंने स्कूल मैनेजमेंट से टीचर को नौकरी से निकालने और उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की माँग की। सेंट गेरोसा इंग्लिश एचआर प्राइमरी स्कूल के प्रशासन ने कहा है कि वे मामले की जाँच कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि अगर शिक्षक पर आरोप सही साबित होते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। हालाँकि जाँच के बाद शिक्षक को बर्खास्त कर दिया गया।

मुस्लिम औरतों के लिए 3 महीने का ‘इद्दत’, सागरिका जी ने 3 साल का रखा, इसलिए TMC से जायज माना जाए राजदीप सरदेसाई की बीवी का ‘निकाह’

पत्रकारों का राजनीति में जाना नई बात नहीं है। लेकिन तृणमूल काॅन्ग्रेस (TMC) की राज्यसभा सांसदी कबूल करने के बाद सागरिका घोष की सोशल मीडिया में थू-थू हो रही है। इसकी वजह कभी सार्वजनिक तौर पर सागरिका का खुद को ‘नैतिक’ दिखाने के फेर में यह लिख देना है कि किसी सरकार में शामिल होने या किसी पार्टी की तरफ से राज्यसभा में जाने से बड़ी बात एक पत्रकार होना है। यह दूसरी बात है कि इस ‘नैतिक मूल्य’ के दर्शन न तो कभी उनकी पत्रकारिता और न कभी उनके पति राजदीप सरदेसाई की पत्रकारिता में हुए।

दरअसल सागरिका घोष ने मार्च 2018 के एक ट्वीट में कहा था, “हाहा! मैं कभी कोई मैं कभी कोई RS टिकट, PS टिकट या CS टिकट किसी भी राजनीतिक पार्टी से स्वीकार नहीं करूँगी सर।” उन्होंने अपने इस ट्वीट को सेव कर रखने की चुनौती देते हुए यह भी कहा था कि ऐसा वे लिखकर देने को भी तैयार हैं। ऐसे में जब टीएमसी ने उन्हें राज्यसभा के लिए उम्मीदवार बनाने की घोषणा की तो लोगों ने उन्हें उनके ही थूके (लिखे) की याद दिलाते हुए पूछा कि क्या अब उनकी राय बदल गई है?

अब सागरिका घोष ने सोशल मीडिया के जरिए ही इसका जवाब दिया है। उन्होंने लिखा है, “6 साल पहले 2018 का मेरा ट्वीट वायरल किया जा रहा है। उस समय मैं सक्रिय पत्रकार थी। उस समय रातों-रात दलगत राजनीति में चले जाना मेरे लिए अनुचित होता। 2020 से मैं पूर्णकालिक पत्रकार नहीं हूँ। बीते 3 साल से मैं विभिन्न समाचार-पत्रों के लिए बतौर स्वतंत्र स्तंभकार लिखती हूँ।”

आगे उन्होंने कहा है कि सार्वजनिक जीवन में आने से पहले सक्रिय पत्रकारिता से उन्होंने तीन साल तक दूरी बनाकर रखी थी। अधिनायकवाद के इस दौर में जब मोदी सरकार ने मीडिया पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया है, संवैधानिक लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता ने उन्हें तृणूमल काॅन्ग्रेस के जुड़कर संघर्ष के लिए प्रेरित किया है ताकि लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाया जा सके।

जैसा कि मैंने ऊपर कहा है कि पत्रकारों के लिए राजनीति में आना नई बात नहीं है। वैसे ही पत्रकारों का ढीठ और निर्लज्ज होना भी सामान्य है। सागरिका इस मामले में आशुतोष से सीख सकती थीं। आशुतोष ने भी आम आदमी पार्टी (AAP) ज्वाइन करने के बाद डंके की चोट पर पत्रकारिता में नहीं लौटने का ऐलान किया था। लेकिन वे लौटे और आज भी टीवी चैनलों पर बैठ दूसरों के लिए ‘नैतिकता’ बाँच रहे हैं।

सागरिका चाहतीं तो अपने पति राजदीप सरदेसाई से भी सीख सकती थीं, जिनकी पहचान ही कुछ भी थूकने (बोलने/लिखने) और उससे पलट जाने की रही है। वैसे उनके पति कह भी चुके हैं कि राज्यसभा की सीट बिकती है, मोदी सरकार के जमाने में संसद की अहमियत नहीं रह गई है ब्ला ब्ला ब्ला

सीखने के लिए तो सागरिका के सामने रवीश कुमार का भी अप्रतिम उदाहरण था। दुनिया भर का ‘ज्ञान’ देने वाले रवीश कुमार ने आज तक अपने भाई को काॅन्ग्रेस टिकट मिलने की ‘काबिलियत’ का खुलासा नहीं किया है। बीजेपी के किसी सामान्य से कार्यकर्ता के दूर के रिश्तेदार की मामी के भांजे के पोते की करतूतों को सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल पूछने का ‘साहस’ रखने वाले रवीश कुमार ने आज तक अपने भाई पर लगे यौन शोषण के आरोपों पर भी कुछ नहीं कहा है।

पर सागरिका घोष ने स्वघोषित अधिनायकवाद के इस दौर में निर्लज्जता से खुद के थूके (लिखे) को चाटने का विकल्प चुना है, क्यों ऐसा नहीं करने पर रवीश कुमार की भाषा में यह ‘साहस की मंदी’ कही जाती है। सागरिका जी बताना चाहती हैं कि जैसे शौहर की मौत अथवा तलाक के बाद इद्दत का समय पूरा कर मुस्लिम औरतें का दूसरा निकाह इस्लाम को कबूल है, वैसे ही उनका भी टीएमसी के साथ निकाह कबूल किया जाए। चूँकि वे सागरिका घोष हैं तो उन्होंने ‘इद्दत’ का मापदंड (3 साल) भी खुद के लिए ऊँचा रखा है।

अमूमन मुस्लिम औरतों के लिए इद्दत की अवधि तीन माह के करीब होती है, पर सागरिका बता रही हैं कि पत्रकारिता से तलाक लेकर सियासत से निकाह को उन्होंने तीन साल का ‘इद्दत’ पूरा किया है। वे चाहती हैं कि इन तीन साल के दौरान बतौर ‘स्वतंत्र पत्रकार’ उन्होंने विभिन्न समाचार-पत्रों में जो प्रोपेगेंडा परोसा, ‘पत्रकार’ होने के नाम पर मंचों से जो कुछ उगला है, उसे इद्दत की अवधि में प्रेमी के साथ छिप-छिप कर मिलना नहीं माना जाए। वे चाहती हैं कि भले इद्दत अवधि में इमरान खान और बुशरा बीवी का निकाह इस्लाम को कबूल न हो पर तीन साल के ‘इद्दत’ में भी चले उनके सियासी इश्क को कबूल किया जाए। कहा जाए वाह सागरिका जी आप पत्रकारिता और राजनीति में नैतिकता की मिसाल हैं!

पकड़ा, मारा, लूटा, फूँक दी गाड़ी… हल्द्वानी हिंसा में चुन-चुन कर हिंदू पत्रकारों पर हुआ हमला: ऑपइंडिया ग्राउंड रिपोर्ट में खुलासा

उत्तराखंड के हल्द्वानी हिंसा में दंगाइयों ने पुलिस प्रशासन के अलावा घटना की रिपोर्टिंग कर रहे हिंदू पत्रकारों को भी अपना निशाना बनाया था। उन्होंने चुन चुन कर पत्रकारों पर वार किया था। उस दौरान किसी के सिर पर पत्थर मारे गए थे तो किसी का हाथ ही तोड़ दिया गया था। इनमें कुछ वो पत्रकार भी थे जो कोर्ट के विरुद्ध जाकर भी उन लोगों के साथ समय-समय पर खड़े रहते थे। अब उनका कहना है कि उनकी आँखे इस घटना से खुल गई हैं।

ऑपइंडिया के पत्रकार राहुल पांडे जब ग्राउंड पर हालात जानने गए तो उनकी मुलाकात इन पत्रकारों से हुई। इनमें एक अमृत विचार अखबार के पत्रकार संजय भी थे। संजय से जब हम मिले तो वो अस्पताल में भर्ती थे। रिपोर्टिंग के दौरान उन्हें सबसे ज्यादा घाव लगे। उनका हाथ भी फ्रैक्चर हुआ और सिर पर भी धारदार हथियार से मारा गया। अब प्रशासन उनका इलाज करवा रहा है। लेकिन उनके सामने से वो मंजर नहीं हट रहा जो उन्होंने रिपोर्टिंग के दौरान देखा।

पत्रकार पर धारदार हथियार से हमला

बृजलाल अस्पताल में भर्ती संजय ने बताया कि जब अवैध मस्जिद गिराने की कार्रवाई शुरू हुई तो अचानक छतों से पत्थर आने लगे। उन्हें रोकने के लिए जब आँसू गैस के गोले छोड़े, लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। एक डेढ़ घंटे बाद जब अंधेरा हुआ तो भीड़ आ गई। उन्होंने आग जलानी शुरू कर दी। जो बाहर निकलने के रास्ते थे उन्हें बंद कर दिए। उसके बाद चारों ओर से पत्थरबाजी होने लगी। फोर्स भी सोचने लगी कि ये तो हर जगह से पत्थर आ रहे हैं। इसके बाद आला अधिकारियों को कवर करके फोर्स ने बड़ी मुश्किल से वहाँ से निकाला। लेकिन तब तक पुलिस की गाड़ियों में भी आगजनी होना शुरू हो गई थी। पत्थरबाजी इतनी तेजी से हो रही थी कि वहाँ से निकलना मुश्किल था। पुलिस एक दूसरे के ऊपर से कुचल कुचल कर भाग रही थी।

संजय ने आपबीती सुनाते हुए कहा, “इसी दौरान हमें पकड़कर मारा गया। हमारा कैमरा छीना गया। मोबाइल निकाल लिया। घड़ी ले ली। गाड़ी फूँक दी। ये तो हमारा दूसरा जन्म मान लो। हम पर लाठी-डंडे, पत्थर से हमला हुआ था।”

संजय की वीडियो में देख सकते हैं कि पत्रकार के हाथ में फ्रैक्चर आया है। इसके अलावा सिर पर पीछे की ओर धारदार हथियार से वार भी किए गए हैं। उनकी हालत सुधरने में समय लगेगा। अस्पताल में उनके साथ उनकी पत्नी हैं जो रोते हुए बताती हैं कि वो वो अपने तीन बच्चे और सास को बिन बताए यहाँ (अस्पताल) में हैं। सास का हार्ट ऑपरेशन हुआ है इसलिए वो उन्हें कुछ नहीं बता सकती। वो बस चाहती हैं कि उनका पति जल्दी से जल्दी घर आ जाए।

जो पत्रकार खड़े थे साथ, उन्हें भी आईडी देख भीड़ ने बनाया निशाना

ग्राउंड पर रहने के दौरान राहुल पांडे उत्तराखंड के बनभूलपुरा में उत्तराखंड 24 के पत्रकार अतुल अग्रवाल से भी मिले। अतुल अग्रवाल वो स्थानीय पत्रकार हैं, जो पिछले साल कोर्ट की कार्रवाई के विरोध में मुस्लिम भीड़ के साथ खड़े थे। साथ ही कह रहे थे कि वो लोग मासूम हैं, उनको सजा न दी जाए। लेकिन इस बार की घटना के बाद उनकी सोच बदल गई।

उन्होंने कहा, “वो नजारा सोचकर भी रूह काँप जा रही है। हम वहाँ से जिंदा लौटकर आ पाए शायद हमने कोई अच्छे कर्म किए होंगे या फिर ऊपर वाले की मेहरबानी है। मामला शासन-प्रशासन का था। इसमें हमें क्यों टारगेट बनाया गया?” उन्होंने पत्थरबाजी से पिचका हेलमेट दिखाया और कहा- “अगर आज हेलमेट नहीं होता तो मेरा सिर खुला हुआ होता। वहाँ हैवानियत थी। पत्थबाजी लगातार हो रही थी।उन्हें बस हमें मारना था। पत्रकार पूछते हैं हमने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया। हम तो न्यूज बनाने गए थे।”

वह बताते हैं कि पिछले साल जब कोर्ट ने अतिक्रमण हटाने को कहा था तब वो इनके साथ खड़े थे कि ये लोग बेघर हो जाएँगे तो कहाँ जाएँगे। वह पूछते हैं- “जब हम उनके साथ खड़े थे तो ये हमारे साथ खड़े होने को क्यों नहीं निकले। वहाँ पत्थर ऐसे आ रहे थे जैसे आँधी के बाद बारिश आती है… बस जिंदा बचे हम इसके लिए भगवान को शुक्रिया करते हैं।”

उन्होंने कहा- “जैसा व्यवहार हमारे साथ हुआ है उसके बाद टीस हमारे मन भी है। घटना के बाद किसी ने सॉरी नहीं बोला। हमारे साथ दूसरे समुदाय के पत्रकार भी थे। लेकिन किसी को खरोंच भी नहीं आई। आप सब अस्पताल घूम लीजिए वहाँ जितने पत्रकार भर्ती हैं उनसे पूछ लीजिए उनका नाम पता कर लीजिए, हमें कुछ कहने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।”

पत्रकार अतुल अग्रवाल ने यह भी दावा किया कि दंगाई भीड़ नाम पूछकर हमला कर रही थी। आईकार्ड देख रहे थे। उसके बाद टारगेट किया जा रहा था। ये बहुत अमान्य घटना है। बहुत क्रूर घटना है। चौथे स्तंभ के संग अगर ऐसा होगा तो उनसे क्या उम्मीद रखेंगे। उन्होंने कहा कि घटना के बाद उनका नजरिया बदल गया। अतुल कहते हैं- “हमने बस सुना था कि इस तरह हमला होता है। आज देखा। अगर चौथे स्तंभ पर ऐसा हमला होगा तो आप उससे क्या उम्मीद रखेंगे। उनकी लड़ाई शासन-प्रशासन से थी। हमें क्यों मारा।”

अतुल अग्रवाल ने द वायर जैसे संस्थानों को भी लताड़ा जो कार्यालय में बैठ दंगाई भीड़ को क्लीन चिट देने में लगे हैं। उन्होंने कहा- “अगर ये (द वायर जैसे संस्थान) लोग ग्राउंड पर होते तो देखते कि इनकी मासूमियत क्या होती है। हमसे पूछो क्या था मंजर। वो तो दिल्ली में बैठकर बस न्यूज चला रहे हैं। यहाँ आकर ग्राउंड पर देखो न। क्या ऐसे होते हैं मासूम लोग? क्या वो ऐसे करते हैं? मेरे तीन बच्चे हैं। अगर कुछ हो जाता तो मेरा परिवार कौन पालता। हमने कल्पना भी नहीं की थी कि ये मंजर देखने को मिलेगा। हम लोग भाईचारा निभाते हैं, उन्हें आगे रखते हैं लेकिन अब इन चीजों पर विचार करना पड़ेगा।”

भीड़ के निशाने पर थे पुलिस और मीडिया

बता दें कि इससे पहले भी खबर आई थी कि 8 फरवरी को हल्द्वानी हिंसा में दंगाइयों के निशाने पर पुलिस के साथ मीडियाकर्मी भी थे। हिंसा पीड़ित पत्रकार मुकेश सिंह ने भी कहा पुलिस और मीडिया को निशाना बनाने की योजना पहले ही बना ली गई थी। मुकेश ने जानकारी दी थी कि कैसे अवैध अतिक्रमण ध्वस्त करने की कार्रवाई के बाद भीड़ ने पुलिस और मीडिया को निशाना बनाया। उनको घेरकर पत्थरबाजी की गई और पेट्रोल बम फेंके गए।