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गोधरा कांड के मृतक कारसेवकों के परिजन भी प्राण प्रतिष्ठा समारोह में होंगे शामिल, मिला निमंत्रण: साबरमती एक्सप्रेस के डब्बों में आग लगाकर हुई थी 59 लोगों की हत्या

अयोध्या में नवनिर्मित राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह की तैयारियाँ चल रही हैं। प्राण प्रतिष्ठा का मुख्य समारोह 22 जनवरी 2024 को होगा। इस समारोह में गुजरात के गोधरा कांड में जान गँवाने वाले 59 ‘कारसेवकों’ से 19 के परिवारवाले भी शामिल होंगे। साल 2002 में गोधरा में कारसेवकों से भरे एक रेलवे डब्बे को जला दिया गया था। इसके बाद गुजरात में दंगे भड़क उठे थे।

गुजरात विश्व हिंदू परिषद (VHP) के महासचिव अशोक रावल ने शनिवार (20 जनवरी 2024) को इसकी जानकारी दी। उन्होंने बताया, “आमंत्रित लोगों में उन कारसेवकों के परिजन भी शामिल हैं, जो अयोध्या से अहमदाबाद लौट रहे थे और गोधरा रेलवे स्टेशन के पास उपद्रवियों द्वारा साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन के दो डिब्बों में आग लगा दिए जाने से मारे गए थे।”

उन्होंने आगे कहा कि विश्व हिंदू परिषद के पास 39 कारसेवकों के नाम और संपर्क थे। इन लोगों के यहाँ संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन सिर्फ 20 परिवारों से ही संपर्क साधा जा सका। अशोक रावल ने कहा कि इनमें से 19 परिवारों (कुछ रिपोर्ट में 18 परिवार) 22 जनवरी को अयोध्या में होने जा रहे समारोह में शामिल होने की बात कही है।

गोधरा के जिन लोगों को अयोध्या में होने वाले प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया गया है, उनमें एक ऑटोरिक्शा चालक हरीशभाई डाभी भी शामिल हैं। उन्होंने गोधरा कांड में अपनी माँ को खो दिया था। डाभी अयोध्या के कारसेवकपुरम में रह रहे हैं। वह अहमदाबाद की एक दलित बस्ती से हैं।

विश्व हिंदू परिषद के अधिकारी रावल का कहना है कि गोधरा कांड के पीड़ित परिवारों के अलावा, गुजरात से 320 संत और समाज के 105 प्रमुख सदस्यों को भी समारोह में शामिल होने का न्योता दिया गया है। ये संत एवं प्रबुद्ध लोग प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के दौरान अयोध्या में उपस्थित रहेंगे।

अशोक रावल ने कहा कि VHP ने राम मंदिर निर्माण के लिए 225 करोड़ रुपए इकट्ठे कर इस पुनित काम में अपना योगदान दिया है। बताते चलें कि 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढाँचे के विध्वंस के बाद 27 फरवरी 2002 को गुजरात के गोधरा में ट्रेन अग्निकांड भी देश के इतिहास में सदा के लिए दर्ज हो गया।

27 फरवरी 2002 में 59 ‘कारसेवकों’ को ट्रेन में जिंदा जला दिया गया था। इनमें औरतें और बच्चे भी शामिल थे। इसके बाद गुजरात के इतिहास में सबसे भयानक सांप्रदायिक दंगे भड़के थे। वीएचपी ने 22 जनवरी को अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के मौके पर गोधरा में जान गँवाने वालों के परिवालों को भी याद रखा है।

बताते चलें कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने कहा था कि मंदिर आंदोलन में बलिदान हुए लोगों के परिवारों को प्राण प्रतिष्ठा समारोह में आमंत्रित किया जाएगा। हालाँकि, ट्रस्ट का ये भी कहना है कि समाज के हर तबके के लोगों को समारोह में आमंत्रित किया गया है। उनका कहना है कि ‘राम सबके हैं और सभी राम के हैं’।

छात्र ने जय श्रीराम कहा तो भड़क गया शिक्षक अब्दुल वाहिद, कर दी पिटाई: मध्य प्रदेश पुलिस ने मामला दर्ज कर गिरफ्तार किया

मध्य प्रदेश के शहडोल जिले के एक स्कूल में एक बच्चे द्वारा जय श्रीराम कहने पर शिक्षक अब्दुल वाहिद भड़क गया। सातवीं कक्षा में पढ़ने वाले इस छात्र की अब्दुल वाहिद ने पिटाई की और उसे सार्वजनिक तौर पर अपमानित किया। शिक्षक पर मामला दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर लिया गया है।

जानकारी के अनुसार, शहडोल के बुढार थाना क्षेत्र में पड़ने वाले ग्रीन बेल्स स्कूल में यह घटना शनिवार (20 दिसम्बर 2024) को हुई। स्कूल में सातवीं कक्षा के बच्चे ने जय श्रीराम के नारे लगाए। इस दौरान कक्षा में पढ़ाई हो रही थी। यह बात अब्दुल वाहिद को पसंद नहीं आई।

उसने अन्य बच्चों से पूछकर उसने पहले एक 12 वर्षीय छात्र को खड़ा किया और फिर उसको अपमानित करते हुए उसकी पिटाई कर दी। पिटाई के बाद जब छात्र घर पहुँचा तो उसने पूरी बात परिजनों को बताई। बताया जा रहा है छात्र को पीटने वाला अब्दुल वाहिद स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाता है। स्कूल का संचालक समीर नियाजी है।

घटना की जानकारी मिलते ही छात्र के घरवाले और स्थानीय हिन्दू संगठन जय श्रीराम के नारे लगाने पर पीटे जाने को लेकर भड़क गए और उन्होंने थाने को घेर कर कार्रवाई की माँग की। उन्होंने यहाँ जय श्रीराम के नारे लगाए और शिक्षक अब्दुल वाहिद और स्कूल प्रबन्धन पर कार्रवाई की माँग की।

बुढार पुलिस ने मामले की जानकारी लेकर शिक्षक अब्दुल वाहिद और स्कूल के संचालक समर नियाजी के खिलाफ धारा 153, 323, 500 और 34 के तहत मामला दर्ज कर लिया है। इनके खिलाफ किशोर न्याय अधिनियम की धाराएँ भी लगाई गईं है। बताया जा रहा है कि शिक्षक अब्दुल वाहिद को गिरफ्तार कर लिया गया है।

स्कूल प्रशासन पर भी इस मामले में लापरवाही बरतने का आरोप लगाया जा रहा है। जिस स्कूल में यह घटना हुई वह CBSE के अंतर्गत चलता है। इस स्कूल को नियाजी एजुकेशनल सोसायटी नाम की एक संस्था चलाती है। इससे पहले भी जय श्रीराम कहने पर पिटाई की घटनाएँ विदिशा और कठुआ से सामने आ चुकी हैं।

2 सगी बहनें, 2 बच्चे – घर से निकली 4 लाशें… भाइयों अजहरुद्दीन-अशफाक ने सऊदी से फोन पर बीवियों को दिया तीन तलाक, फिर मरवा डाला

राजस्थान के डीडवाना जिले में दो महिलाओं के शव मिले हैं। वो सगी बहनें थी। उनके साथ ही दो बच्चों के भी शव मिले हैं, इसमें से एक लड़की और एक लड़का है। इसमें एक का नाम नाजिया था और दूसरी का साजिया। दोनों बहनों का निकाह अजहरुद्दीन और अशराफ नाम के दो सगे भाइयों के साथ हुआ था। दोनों भाई सऊदी अरब में काम करते हैं। उन्होंने दोनों बहनों को फोन पर ही तीन तलाक दे दिया था, लेकिन जब दोनों बहनों ने उसे मानने से इनकार कर दिया, तो उनकी हत्या करवा दी गई। साजिया और नाजिया के परिजनों ने आरोप लगाए हैं कि अजरुद्दीन और अशराफ ने ही चारों की हत्या कराई है।

जानकारी के मुताबिक, मौलासर थाना क्षेत्र के नुवा गाँव में नाजिया (32 वर्ष) और साजिया (30 वर्ष) अपने शौहर के घर के बगल में ही किराए पर कमरे लेकर रह रही थी। शनिवार सुबह (20 जनवरी, 2023) को दोनों बहनों और दो बच्चों कनिष्का (7 वर्ष) और आमिर (4 वर्ष) के शव मिले थे। सभी के शव रस्सियों से लटके पड़े थे। चारों के शव मिलने पर सनसनी फैल गई, जिसके बाद मौके पर पुलिस पहुँची। तब तक लोगों ने फंदे और रस्सियाँ काट दी थीं। इसके बाद साजिया और नाजिया के परिजनों को सूचित किया गया।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, स्थानीय लोगों की सूचना पर मौलासर पुलिस और उच्च अधिकारी मौके पर पहुँचे। डिप्टी एसपी धर्मपाल पूनिया ने बताया कि दोनों मृतकाओं के पति अजरुद्दीन और अशफाक सगे भाई हैं, जो सऊदी अरब में रह कर काम कर रहे हैं। पुलिस ने घटनास्थल की वीडियोग्राफी कराई और शवों को डीडवाना के बांगड़ अस्पताल में पहुँचाया।

पुलिस से मिली सूचना के बाद मौके पर पहुँचे मायके पक्ष ने उनकी हत्या के आरोप लगाए हैं। परिजनों ने आरोप लगाए कि सभी की हत्या ससुराली जनों ने की है। परिजनों ने बताया कि नाजिया और साजिया का निकाह अजहरुद्दीन और अशफाक से की गई थी। दोनों सगे भाई थे। दोनों ने फोन पर ही तीन तलाक दे दिया था, लेकिन लड़कियों ने ये मानने से इनकार कर दिया था। इसके बाद दोनों ससुराल वालों से अलग एक मकान ले लिया था।

उन्होंने ससुराल पक्ष के 11 लोगों के खिलाफ नामजद मामला दर्ज कराया गया है, जिसमें दोनों के शौहरों के नाम भी शामिल हैं। इस मामले में पुलिस ने 7 नामजद लोगों को हिरासत में ले लिया है और पूछताछ कर रही है।

‘The Wire’ का चहेता पूर्व सांसद मुन्नन खाँ, दीवारों पर होता था जिसका नाम: कारसेवकों के परिजन बोले – वर्दी पहन कर घूमते थे उसके गुर्गे, हेलिकॉप्टर से बरसाई गोलियाँ

अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा की तिथि समीप आ चुकी है। 22 जनवरी को रामलला अपनी जन्मभूमि पर बन रहे मंदिर के गर्भगृह में विराजमान होंगे। इस मौके पर पूरा देश उन तमाम बलिदानी रामभक्तों को याद कर रहा है जिन्होंने मुगल काल से मुलायम सरकार के बीच अपने-आप को न्योछावर कर दिया। इन बलिदानियों को जिस निर्ममता से बाबर के समय में मारा गया था उस से कहीं अधिक बेरहमी साल 1990 में मुलायम सरकार में दिखाई गई।

राम का नाम लेते निहत्थे कारसेवकों पर गोलियाँ बरसाने और उनकी लाशों तक से निर्दयता दिखाने वालों की ऑपइंडिया ने जमीनी पड़ताल की। इस पूरे मामले में भुल्लर और उस्मान नाम के 2 पैरामिलिट्री अधिकारियों के नाम सबसे अधिक चर्चा में हैं। लेकिन इस पूरे नरसंहार में जो सबसे चौंकाने वाला पहलू सामने आया वो है मुन्नन खाँ का नाम। 4 साल पहले ‘द वायर’ इसी मुन्नन खाँ का बचाव कर चुका है। द वायर ने विक्टिम कार्ड फेंकते हुए अपनी इसी रिपोर्ट में कई और भी झूठी और तथ्यों से परे जानकारियाँ डाली हैं।

प्राइवेट गैंग ले कर किया था नरसंहार

ऑपइंडिया ने सबसे पहले साल 1990 में अयोध्या में तैनात रहे एक पुलिस अधिकारी के हवाले से बताया था कि कहीं न कहीं मुन्नन खाँ की संलिप्तता तब हुए रामभक्तों के नरसंहार में थी। इस खुलासे के बाद अब कई जीवित कारसेवकों और बलिदानी रामभक्तों के परिजनों ने स्वीकार किया है कि उन्होंने 1990 में सुना था कि मुन्नन खाँ नाम का नेता नरसंहार में शामिल था। सुल्तानपुर जिले के बलिदानी रामभक्त राम बहादुर वर्मा के पुत्र काली सहाय का आरोप है कि मुन्नन खाँ को गोलियाँ बरसाने के लिए हेलीकॉप्टर तक दे दिया गया था।

बकौल काली सहाय तब 1990 में आम जनता भी यह जानती थी कि मुन्नन खाँ ने रामभक्तों की हत्या अपनी ‘प्राइवेट गैंग’ से करवाई है। काली सहाय ने रामभक्तों को लगे गोलियों के बोर के भी गैर सरकारी होने की आशंका जताई।

असली पुलिस मारी या नकली, हमें नहीं पता

ऑपइंडिया ने साल 1990 की कारसेवा में शामिल रहे रामभक्त रघुवीर सिंह से बात की। रघुवीर सिंह का सिर लाठीचार्ज में फट गया था। उन्होंने बताया कि तब कारसेवा के दौरान उन्होंने गोंडा के मुन्नन खाँ का नाम सुना था। उन्होंने आगे कहा, “यही सुना था कि वहाँ मुन्नन खाँ पुलिस की वर्दी में गोली चलाने के लिए 2-3 गाड़ियाँ गुंडों को भेजा है। रघुवीर को ये नहीं कन्फर्म है कि उन पर हमला नकली पुलिस ने किया था या असली ने क्योंकि तब अपनी जान बचाना उनके लिए प्राथमिकता थी। बकौल रघुवीर, उस आपाधापी में वो किसी का बिल्ला या नेमप्लेट नहीं पढ़ आए थे।

‘अयोध्या क्यों नहीं चल रहे, वहाँ फल मिलेगा’

साल 1990 में अयोध्या कारसेवा में शामिल रहे रामभक्त राजेश कुमार साहू ने भी ऑपइंडिया से बातचीत में मुन्नन खाँ का नाम लिया। उन्होंने बताया कि जब वो अयोध्या से लौट कर आए तब उन्हें आसपास के लोगों ने बताया कि सामने वाली सड़क से मुन्नन खाँ अपने आदमियों को पुलिस की वर्दी पहना कर ले गया है। आरोप है कि तब मुन्नन सरकारी रोडवेज बस में साथियों सहित उन इलाकों में घूम रहा था जहाँ से कारसेवकों का आना-जाना पूरी तरह से प्रतिबंधित था। राजेश साहू के पड़ोसियों ने उन्हें बताया कि मुन्नन खाँ कारसेवकों से बोल रहा था, “चलो अयोध्या। वहाँ फल मिलेगा।” राजेश के मुताबिक मुन्नन खाँ के पास हथियार भी देखे गए थे।

नकली PAC की पूरी बटालियन शामिल थी कत्लेआम में

1990 में अयोधा कारसेवा में शामिल रहे मुरारी लाल गुप्ता ने भी ऑपइंडिया से बातचीत में मुन्नन खाँ का जिक्र किया। उन्होंने आरोप लगाया कि तब उन्हें पता चला था कि मुन्नन खाँ ने रामभक्तों की हत्या के लिए नकली PAC की पूरी बटालियन ही तैयार कर ली थी। मुरारी लाल गुप्ता ने यह भी बताया कि वो जिस मुन्नन खाँ की बात कर रहे हैं वो गोंडा का सांसद रह चुका है। बकौल मुरारी लाल, इन्ही नकली PAC वालों ने ही बाद में रामभक्तों पर हनुमानगढ़ी के पास मौजूद मंदिरों की छतों पर चढ़ कर गोलियाँ बरसाईं थीं। इस गोलीबारी में कई कारसेवक बलिदान हो गए थे।

मुन्नन ही पिता का कातिल

2 नवंबर, 1990 को अयोध्या में गोलियों से भून दिए गए कारसेवक राम अचल गुप्ता के बेटे संजय ने ऑपइंडिया से बात की। संजय ने भी दावा किया कि बचपन में उन्होंने मुन्नन खाँ के बारे में सुना था कि वो रामभक्तों का नरसंहार पुलिस की वर्दी पहन के कर रहा था। संजय का दावा है कि उनके पिता भी मुन्नन खाँ द्वारा चलाई गई गोली के शिकार हुए थे।

तब दीवालों पर लिखा गया था मुन्नन का नाम

30 अक्टूबर, 1990 में बलिदान हुए रामभक्त वासुदेव गुप्ता की बेटी सीमा ने ऑपइंडिया से बात की। सीमा ने दावा किया कि पिता को गोली लगने के समय वो काफी छोटी थीं लेकिन उनको अच्छे से याद है कि तब पैरामिलिट्री के स्टाफ जे एस भुल्लर और मोहम्मद उस्मान के अलावा किसी नेता मुन्नन खाँ का नाम कारसेवकों को मारने को ले कर खूब चर्चा में आया था। सीमा गुप्ता ने बताया कि उस समय मुन्नन खाँ का नाम कई जगह दीवालों पर लिखा देखा जाता था।

मुख्यमंत्री कराएँ मुन्नन के कुकृत्य की जाँच

बलिदानी रामभक्त आम अचल गुप्ता के बेटे संजय गुप्ता ने 11 जनवरी 2024 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक पत्र प्रेषित किया है। इस पत्र में संजय ने इस बात की पुख्ता जानकारी होने का दावा किया है कि साल 1990 में हुए कारसेवकों के नरसंहार में मुन्नन खाँ भी शामिल था। संजय गुप्ता ने पत्र में लिखा है कि यदि 1987 में मेरठ के हाशिमपुरा काण्ड की जाँच हो सकती है तो 1990 में कारसेवक नरसंहार की क्यों नहीं।

हाशिमपुरा कांड में 40 साल बाद उन पुलिसकर्मियों को अदालत से सजा दी गई है जिन पर 1987 में मेरठ के मुस्लिम समुदाय के लोगों को गोली मारने का आरोप था। इसमें से कई तत्कालीन पुलिसकर्मियों का देहांत हो चुका था और कई काफी बुजुर्ग हो गए थे।

संजय गुप्ता द्वारा DM अयोध्या, मुख्यमंत्री और UP पुलिस को प्रेषित पत्र

मुन्नन के रुतबे के आगे सब थे नतमस्तक

ऑपइंडिया ने एक ऐसे पुलिसकर्मी को खोज निकाला जो साल 1990 में अयोध्या में तैनात रहा था। पुलिसकर्मी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि प्रादेशिक पुलिस बल ने रामभक्तों पर अधिकतम लाठीचार्ज किया था जिस से वो भाग जाएँ और गोली खाने से बच जाएँ। पुलिसकर्मी ने बताया कि सरयू नदी के पास मुन्नन खाँ द्वारा साथियों सहित रामभक्तों पर हमले की चर्चा उस समय आम थी। इस हमले की वजह से कई रामभक्त उफनती सरयू नदी में कूद गए थे जिनका शव भी नहीं मिल पाया।

अयोध्या में तैनात रहे पुलिस स्टाफ का यह भी दावा है कि तब शासन और प्रशासन तक बहुत लोगों को मुन्नन खाँ की करतूत की जानकारी थी लेकिन उसका राजनैतिक रुतबा इतना ज्यादा था कि उस पर कोई कार्रवाई नहीं हो पाई।

कौन था मुन्नन खाँ

मुन्नन खाँ का पूरा नाम फसी उर रहमान था। 7 जनवरी, 1945 में उसका जन्म उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में हुआ था। गोंडा अयोध्या की सीमा से सटा हुआ जिला है। तब बलरामपुर जिला भी गोंडा का हिस्सा हुआ करता था। गोंडा के कई बुजुर्ग बताते मुन्नन खाँ ने 70 के दशक के आसपास ही अपराध का रास्ता चुन लिया था। कुछ ही दिनों में उसका नेटवर्क नेपाल तक फैल गया था। इस बीच साल 1985 में उसने गोंडा जिले के कटरा विधानसभा क्षेत्र से लोकदल के टिकट पर चुनाव लड़ा। इस चुनाव में उसे जीत मिली। साल 1989 में 5 साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद इसी साल मुन्नन ने बलरामपुर संसदीय सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ा। इस चुनाव में मुन्नन खाँ को जीत मिली।

जनप्रतिनिधि होने के बावजूद मुन्नन के आपराधिक कारनामें बदस्तूर जारी रहे। जमीन कब्ज़ाने और दंगे करवाने जैसे आरोप उस पर समय-समय पर लगते रहे। बावजूद उसके राजनैतिक संरक्षण के चलते उसके नाम पर न सिर्फ गोंडा जिले में चौराहे बल्कि गाँव तक के नाम रख दिए गए। मुन्नन खाँ 5 बेटे और 2 बेटियों का अब्बा भी था। उसका बेटा कासिम भी हिस्ट्रीशीटर अपराधी है। मुन्नन और उसके परिवार के आपराधिक और काले कारनामों की चर्चा हम जल्द ही एक अलग रिपोर्ट प्रकाशित करेंगे।

मुन्नन खाँ की ढाल बना था ‘द वायर’

वामपंथी न्यूज़ पोर्टल ‘द वायर’ ने इसी मुन्नन खाँ को क्लीन चिट देते हुए 2019 में उसकी शान में कसीदे गढ़े थे। तब ‘द वायर’ के पत्रकार कृष्ण प्रताप सिंह ने मुन्नन खाँ के नाम को महज कुछ पत्रकारों के मन की उपज करार दिया था। साल 1990 में मुन्नन खाँ की करतूत उजागर करने वाले तात्कालिक मीडियाकर्मियों को द वायर ने 9 नवंबर 2019 को प्रकाशित लेख में ‘हिन्दू पत्रकार’ बताया है। इसी रिपोर्ट में द वायर ने मुन्नन खाँ को मुलायम का करीबी ‘दबंग समाजवादी नेता’ को माना है लेकिन उसे हर तरह के अपराध से क्लीन चिट दे डाली है।

अपनी पूरी मनगढ़ंत रिपोर्ट में द वायर ने कभी भी किसी जीवित कारसेवक या बलिदान हुए रामभक्त के परिजन से जमीन पर उतर बात करने की जहमत नहीं उठाई।

वामपंथी ‘द वायर’ की तथ्यहीन रिपोर्ट

मुस्लिम-हिन्दू के नाम पर ‘द वायर’ का एक और झूठ

‘द वायर’ के वामपंथी लेखक कृष्ण प्रताप ने बड़ी चालाकी से फायरिंग, मुन्नन और तत्कालीन सरकार से सभी आरोप ट्रांसफर कर के तत्कालीन पत्रकारों के सिर पर मढ़ दिए हैं। इसी रिपोर्ट में उन्होंने बताया है कि 1990 में हुई फायरिंग के दौरान अयोध्या में कोई भी मुस्लिम अधिकारी तैनात नहीं था। द वायर की खबर प्रकशित होने के लगभग सवा महीने बाद TV 9 भारतवर्ष के पत्रकार हेमंत शर्मा ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि कारसेवकों पर गोलियाँ बरसाने वालों में CRPF का उप कमांडेंट उस्मान भी शामिल था।

दबी सच्चाई के खिलाफ ‘द वायर’ की एडवांस तैयारी

द वायर ने एक दावा और किया है कि मुन्नन खाँ अपनी दबंग छवि के चलते विश्व हिन्दू परिषद की आँखों में खटक रहा था। हालाँकि द वायर ये नहीं बता पाया कि दूर गोंडा जिले के निवासी मुन्नन खाँ के ही समय में तत्कालीन फैज़ाबाद (अब अयोध्या) जिले के ही अजीमुल हक उर्फ़ पहलवान और नजदीकी जिले सुल्तानपुर में ज़ुल्फ़िक़ारूल्लाह जैसे मुस्लिम नेताओं का भी अच्छा प्रभाव था। विश्व हिन्दू परिषद या किसी राष्ट्रवादी पत्रकार को अयोध्या या उस से नजदीकी जिले के बजाय दूर किसी जनपद के मुस्लिम नेता का नाम लेने की जरूरत क्यों पड़ेगी?

हालाँकि, माना जा रहा है कि 2019 के आसपास सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर केस अपने चरम और निर्णायक मोड़ पर था। ऐसे में दफन किए जा चुके सच और तथ्य बाहर आने की संभावना देख कर ‘द वायर’ जैसे संस्थानों ने अपने चहेतों के लिए एडवांस तैयारी कर ली थी।

‘द वायर’ का मनगढ़ंत प्रोपोगेंडा

फिलहाल द वायर के चेहते मुन्नन खाँ से जुड़े अभी कई दबे मामले सामने आने बाकी है। बलिदान हुए रामभक्तों के परिजनों की भी इच्छा है कि नेता मुन्नन खाँ ही नहीं उस्मान जैसे अधिकारियों की 1990 नरसंहार मामले में भूमिका की निष्पक्षता और गहनता से जाँच की जाए। मुन्नन खाँ का नाम लेने वाले तमाम भुक्तभोगी कारसेवक अभी जीवित हैं। तत्कालीन समय के कई पत्रकार भी अभी मौजूद हैं। ये सभी इस जाँच में पूरा सहयोग करने की भी बात कह रहे हैं। जनमानस की भी अपेक्षा है कि 3 दशक से भी पुराना वो सच अब बाहर आना चाहिए जिस दौरान सरयू नदी के पानी के लाल हो जाने का दावा किया जाता है।

तलाक नहीं, ‘खुला’ से टूटी सानिया मिर्जा और शोएब मलिक की जोड़ी: अब्बा के दावे के बाद जानिए क्या होता है ये, पूर्व टेनिस खिलाड़ी को ‘इद्दत’ का करना पड़ेगा पालन

पाकिस्तान के पूर्व इंटरनेशनल क्रिकेटर शोएब मलिक ने पाकिस्तानी एक्ट्रेस, मॉडल सना जावेद के साथ निकाह किया है। ये उनकी तीसरी शादी है। उन्होंने सानिया मिर्जा से अलगाव के बाद ये निकाह किया है। शोएब मलिक और सानिया मिर्जा के बीच तलाक की अफवाहें काफी लंबे समय से चल रही थी, लेकिन अब सानिया मिर्जा के पिता इमरान मिर्जा ने साफ कर दिया है कि दोनों के बीच अलगाव तलाक के जरिए नहीं हुआ है, बल्कि ये अलगाव ‘खुला’ के जरिए हुआ है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, सानिया मिर्जा के पिता इमरान मिर्जा ने दोनों के अलगाव पर पूछे गए सवाल के जवाब में कहा कि ये तलाक नहीं, बल्कि ‘खुला’ था। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि ये ‘खुला’ आखिर है क्या? क्योंकि लोग तलाक के बारे में तो जानते हैं, लेकिन ‘खुला’ के बारे में चर्चा नहीं होती। दरअसल, अगर अलगाव पुरुष द्वारा शुरू किया जाता है, तो ये तलाक कहलाता है, जबकि महिला अपने शौहर से अलगाव चाहे, तो उसे ‘खुला’ कहते हैं।

पुरुषों द्वारा महिलाओं को तलाक देने की कई प्रक्रियाएँ होती हैं, तो महिलाएँ भी अपने शौहर को छोड़ने के लिए तलाक जैसा कदम उठा सकती हैं। इस लेख में हम बता रहे मुस्लिम महिलाएँ तलाक के लिए क्या प्रक्रियाएँ अपना सकती हैं। इसमें औपचारिक तरीका है तलाक-ए-तहवीज का, तो खुला और मुबारत अनौपचारिक तरीका है।

तलाक-ए-तफवीज: इस तरह का समझौता निकाह के समय ही हो जाता है। अगर इस समझौते की शर्तें पूरी नहीं की जाती, तो महिला तलाक माँग सकती है। इसमें पति इस समझौते को मानता है कि अगर वो महिला द्वारा या आपस में रखी गई शर्तों का पालन नहीं कर पाया, तो उसे महिला तलाक दे सकती है। ये एकमात्र तरीका है, जिसमें कोई महिला एकतरफा तरीके से निकाह को खत्म कर सकती है।

खुला: मुस्लिम महिलाएँ आपसी सहमति से तलाक की प्रक्रिया खुला के जरिए पूरी कर सकती हैं। इसके मुताबिक, शौहर और बीवी में लेन-देन भी होता है। कई बार महिला को अपने शौहर से पीछा छुड़ाने के लिए उसे अपनी संपत्ति का हिस्सा भी देना पड़ता है। इसे मेहर की रकम के तौर पर भी देखा जाता है, जिसमें शौहर को भुगतान करना पड़ता है। हालाँकि ये मियाँ-बीवी के बीच बिना लेनदेन के भी हो सकता है, अगर निकाह के दौरान मेहर की रकम न तय हो या मियाँ-बीवी इस बात पर सहमत हों कि वो अब साथ नहीं रहना चाहते और बिना किसी विवाद के अपना निकाह खत्म करना चाहते हैं। इस दौरान इद्दत का पालन करना होगा है।

मुबारत: शौहर से मुक्ति के लिए महिला ये कदम भी उठा सकती है। हालाँकि इसमें दोनों पक्ष आपस में बैठते हैं, इसमें एक पक्ष दूसरे को अलगाव का ऑफर देता है। अगर इस पर दूसरा पक्ष सहमत होता है, तो फिर तलाक की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। हालाँकि इसमें भी इद्दत का पालन करना अनिवार्य होता है।

क्या है इद्दत?

इस्लाम में इद्दत या इद्दाह वह अवधि है, जिसका पालन करना किसी महिला के लिए अनिवार्य है। यह अवधि तब होती है जब किसी मुस्लिम महिला के पति की मृत्यु हो जाती है या उसे तलाक मिल जाता है। इस अवधि के दौरान महिला किसी अन्य पुरुष से निकाह नहीं कर सकती।

इद्दत की अवधि

पति की मृत्यु के बाद 4 महीने और 10 दिन

तलाक के बाद तीन महीने

अगर इद्दत की अवधि के दौरान महिला गर्भवती है, तो प्रसव की तारीख तक

इद्दत के बारे में कुछ और बातें:

इद्दत का मकसद यह है कि अगर महिला गर्भवती है, तो इसका पता चल सके।

इद्दत के दौरान महिला किसी गैर मर्द के सामने नहीं आती।

इद्दत की अवधि के दौरान महिला का पति अपना मन बदल सकता है और तलाक़ वापस ले सकता है। इसके बाद दोनों ही फिर से शादीशुदा जीवन एक साथ शुरू कर सकते हैं।

चूँकि इस मामले में शोएब मलिक और सानिया मिर्जा के बीच ‘खुला’ के जरिए तलाक हुआ है। ऐसे में दोनों का अलगाव किन शर्तों पर हुआ है, ये बात अभी बाहर नहीं आ पाई है। ये तलाक कब हुआ, इस बात की भी जानकारी नहीं है। चूँकि ये प्रक्रिया पाकिस्तान या यूएई में अपनाई गई है, ऐसे में ये तलाक पूरा माना जा सकता है। वहीं, अगर ये प्रक्रिया भारत में अपनाई जाती और पति ‘खुला’ को नकार देता है, तो अलगाव को पूरा नहीं माना जा सकता।

रंगनाथस्वामी में ‘कम्ब रामायण’ का पाठ, रामेश्वरम में रोड शो… PM मोदी की एक झलक पाने को बेताब दिखी तमिलनाडु की जनता, समुद्र में भी लगाई डुबकी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तमिलनाडु के दौरे पर हैं। पीएम सुबह करीब 11 बजे तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में श्री रंगनाथस्वामी मंदिर पहुँचे। यहाँ उन्होंने एक कार्यक्रम में हिस्सा लेते हुए विद्वानों से कम्‍ब रामायणम के पाठ सुने। पीएम मोदी ने श्री रंगनाथस्वामी के दर्शन कर आशीर्वाद लिए। इसके बाद वो रामेश्वरम पहुँचे, जहाँ उन्होंने रोड शो भी किया। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी की एक झलक पाने के लिए लोग बेताब दिखे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रामेश्नवम में श्री अरुलमिगु रामनाथस्वामी मंदिर पहुँचे और भगवान के दर्शन किए।

तमिलनाडु दौरे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार (20 जनवरी 2024) को तमिलनाडु के रामेश्वरम में श्री अरुलमिगु रामनाथस्वामी मंदिर में पूजा-अर्चना की। प्रधानमंत्री ने यहाँ समुद्र में पवित्र डुबकी भी लगाई। यहाँ प्रधानमंत्री को कई तीर्थों के पूजित जल से स्नान कराया गया। इसके बाद प्रधानमंत्री ने मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना भी की। इसके साथ ही पीएम मोदी ‘श्री रामायण पारायण’ कार्यक्रम में भाग लिया। इस कार्यक्रम में आठ अलग-अलग पारंपरिक मंडलियां संस्कृत, अवधी, कश्मीरी, गुरुमुखी, असमिया, बांग्‍ला, मैथिली और गुजराती में रामकथा (श्री राम की अयोध्या वापसी के प्रसंग का वर्णन) का पाठ किया गया। पीएम मोदी श्री अरुलमिगु रामनाथस्वामी मंदिर रामेश्वरम में भजन संध्या में भी शामिल हुए।

इससे पहले, पीएम नरेन्द्र मोदी ने यहाँ श्रीरंगम में रामायण से जुड़े प्राचीन मंदिर श्री रंगनाथस्वामी मंदिर में पूजा-अर्चना की और विद्वानों से ‘कम्ब रामायण’ का पाठ सुना। तमिलनाडु के इस प्राचीन मंदिर में आनेवाले वह देश के पहले प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने इस दौरान पारंपरिक परिधान वेष्टि यानी धोती और अंगवस्त्रम यानी शॉल पहना था और भगवान विष्णु के मंदिर में पूजा-अर्चना की।

पीएम मोदी ने इस दौरान श्री रंगनाथस्वामी के दर्शन किए। उन्हें मंदिर के पुजारियों ने ‘सदरी’ प्रदान की। प्रधानमंत्री ने वैष्णव संत-गुरु श्री रामानुजाचार्य और श्री चक्रथाझवार को समर्पित कई ‘सन्नाधि’ (देवताओं के लिए अलग-अलग पूजास्थल) में प्रार्थना की। उन्होंने मंदिर में हाथी को भोजन देकर उसका आशीर्वाद भी प्राप्त किया। मंदिर के इष्टदेव को तमिल में ‘रंगनाथर’ के नाम से जाना जाता है।

इस मंदिर में ही प्रधानमंत्री ने ‘कंब’ रामायण के छंद सुने जो रामायण के प्राचीन संस्करणों में से एक है। ‘कम्ब’ रामायण की रचना महान तमिल कवि कंबर ने 12वीं शताब्दी में की थी। प्रधानमंत्री ने जिस मंदिर में दर्शन किए हैं उसका ‘कंब’ रामायण से गहरा संबंध है। आईए, जिन मंदिरों में प्रधानमंत्री जा रहे हैं, उनके बारे में आपको बताते हैं।

त्रिची में श्री रंगनाथस्वामी मंदिर

त्रिची के श्रीरंगम में स्थित यह मंदिर देश के सबसे प्राचीन मंदिर परिसरों में से एक है। इसका उल्लेख पुराणों और संगम युग के ग्रंथों सहित विभिन्न प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। यह अपनी स्थापत्य भव्यता और अपने असंख्य प्रतिष्ठित गोपुरमों के लिए प्रसिद्ध है। इस मंदिर में पूजे जाने वाले मुख्य देवता श्री रंगनाथ स्वामी हैं, जो भगवान विष्णु के शयन रूप में हैं। वैष्णव धर्मग्रंथों में इस मंदिर में पूजी जाने वाली मूर्ति और अयोध्या के बीच संबंध का उल्लेख है। ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु की जिस मूर्ति की पूजा श्री राम और उनके पूर्वज करते थे, उसे उन्होंने लंका ले जाने के लिए विभीषण को दे दी थी। रास्ते में यह मूर्ति श्रीरंगम में स्थापित कर दी गई।

महान दार्शनिक और संत रामानुजाचार्य भी इस मंदिर के इतिहास से गहराई से जुड़े हुए हैं। इसके अलावा, इस मंदिर में कई महत्वपूर्ण स्थान हैं – उदाहरण के लिए, प्रसिद्ध कम्ब रामायणम को पहली बार तमिल कवि कंबन ने इसी मंदिर परिसर में सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया था।

रामेश्वरम में श्री अरुलमिगु रामनाथस्वामी मंदिर

इस मंदिर में पूजे जाने वाले मुख्य देवता श्री रामनाथस्वामी हैं, जो भगवान शिव का एक रूप हैं। ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में मुख्य लिंगम की स्थापना और पूजा भगवान राम और माता सीता ने की थी। यह मंदिर सबसे लम्‍बे गलियारे और अपनी सुंदर वास्तुकला के लिए भी प्रसिद्ध है। यह चार धामों बद्रीनाथ, द्वारका, पुरी और रामेश्वरम में से एक है। यह 12 ज्योतिर्लिंगों में से भी एक है।

धनुषकोडी में श्री कोठंडारामस्वामी मंदिर

अपने दौरे के दूसरे दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी धनुषकोड़ी के कोठंडारामस्वामी मंदिर में जाएँगे। यह मंदिर कोठंडाराम स्वामी को समर्पित है। कोठंडाराम नाम का अर्थ धनुषधारी राम है। यह धनुषकोडी नामक स्थान पर स्थित है। ऐसा कहा जाता है कि यहीं पर विभीषण पहली बार भगवान राम से मिले थे और उनसे शरण माँगी थी। इसके बारे में ऐसा भी कहा जाता है कि यही वह स्थान है जहाँ भगवान राम ने विभीषण का राज्याभिषेक किया था।

यह केवल धर्म नहीं, राम सिर्फ भगवान नहीं, यह हर्ष मात्र भक्ति नहीं

मेरी बेटी के अंग्रेजीदां स्कूल में सप्ताह भर से ऐसी गतिविधियाँ चल रही हैं जो राम और अयोध्या को समर्पित हैं। कभी रामचरितमानस पर आधारित सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता हो रही तो कभी बच्चों से कहा जाता है कि वे घर से दीया-बाती लेकर आएँ। स्कूल में सामूहिक दीपोत्सव हो रहा है।

नोएडा की एक एक्सपोर्ट कंपनी में काम कर रहे पप्पू कुमार गुप्ता की तनख्वाह 18 हजार रुपए मासिक है। 22 जनवरी 2024 को वे और उनके सहकर्मी मिलकर 101 किलो लड्डू बनवा रहे हैं। इसे वे आम लोगों के बीच वितरित करेंगे। इसके लिए पप्पू गुप्ता और उनके जैसे ही आय वाले कर्मचारी आपस में पैसा इकट्ठा कर रहे हैं। कोई 500 दे रहा तो कोई 2000।

मेरे घर में काम करने वाली शबाना सफाई करते समय गुनगुनाती रहती है ‘राम आएँगे तो अंगना सजाऊँगी’। रामेश्वर यादव दूध और घी बेचकर अपने परिवार का गुजारा करते हैं। लेकिन आज उन्होंने गाँव के हर घर में घी बाँटा है और सबसे आग्रह किया है कि 22 जनवरी को वे इसी घी से दीये जलाएँ।

बाजार जाता हूँ तो फल-फूल बेचने वाले से लेकर किताब-कपड़ों के दुकानदार तक राम की चर्चा कर रहे हैं। घर से कार्यालय जाता हूँ तो रास्ते में कहीं कोई हनुमान/राम का ध्वज बेचता मिल जाता है। कोई टकराता है तो अयोध्या, राम और 22 जनवरी की बात किए बिना आगे नहीं बढ़ता।

इसमें मुझे क्यों नहीं दिख रहा राम का सिर्फ ईश्वरत्व?

मैं जानता हूँ कि भारत उत्सवों का देश है। भारत धार्मिक राष्ट्र है। इसके सामाजिक ढाँचे के मूल में धर्म है। मैंने बचपन से हर माघ में कांवड़ लेकर टोली के साथ देवघर जाते पिता को देखा है। घर की महिलाओं को रोज मिट्टी से महादेव बनाते देखा है। फिर उस महादेव की पूजा करते हुए घंटेभर मंत्रोच्चार करते लाल कक्का को भी देखा है। मैंने मंदिर बनने और ईश्वर की प्राण-प्रतिष्ठा से पैदा हुए धार्मिक वातावरण को बचपन में ही अपने गाँव में जीया है। फिर भी आज कल जो कुछ देख रहा हूँ वह मुझे सिर्फ धर्म नहीं लगता। यह मुझे सिर्फ भक्ति भी नहीं लगती। इसमें मुझे राम का सिर्फ ईश्वरत्व नहीं दिखता।

वैसे भी इस उत्सवी और धार्मिक राष्ट्र भारत में केवल सनातन की ही बात करें तो कई धार्मिक परंपराएँ साथ चलती हैं। हर इलाके की अपनी धार्मिक मान्यताएँ हैं। अपने ईश्वर हैं। इन सभी मान्यताओं का अपना संपूर्ण संसार है। सकल विधान है। धार्मिक स्वतंत्रता इतनी है कि एक ही घर में पिता महादेव को पूज रहे हैं तो पुत्र दुर्गा को। उसी घर की महिला पीपल में ईश्वर देखती हैं। प्रकृति की पूजा करती हैं।

क्या संभव है कि इतनी विविधताओं वाले समाज को धर्म की एक परंपरा, जिसे श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ‘रामानंदी’ कहते हैं, एक सूत्र में पिरो दे? जब सबके अपने-अपने अराध्य हैं तो सब राम की आराधना में क्यों रत हैं? जब सबकी अपनी पूजा पद्धति है तो सब राममय क्यों हुए पड़े हैं?

ऐसा भी नहीं है कि राम परम ब्रह्म हैं और सारे ईश्वर उनके बाद पंक्ति में आते हैं। यदि राम को सिर्फ ईश्वर ही मान लें तो वे विष्णु के सिर्फ एक अवतार भर हैं। उनसे पहले भी विष्णु के अवतार हुए और उनके बाद भी। यदि इसे किसी सम्राट के प्रताप का ही द्योतक भर मान लें तब भी राम ही जिस कुल में पैदा हुए, उसमें उनसे पहले मनु आए जिससे हम मानव कहलाए। भागीरथ आए जो माँ गंगा को धरती पर लेकर आए। रघु आए जिसके कारण राम की एक पहचान रघुकुल नंदन के तौर पर हुई। वह कुल, रघुकुल कहलाया। राम के आने के बाद भी उसे रामकुल नहीं कहा गया।

यदि यह मान लूँ कि यह वातावरण उन संघर्षों और बलिदानों के कारण उत्पन्न हुआ है जो रामजन्मभूमि को प्राप्त करने के लिए हुआ है तो भी मुझे अपने अराध्य और मिट्टी के लिए संघर्ष और बलिदान के ऐसे कई प्रतिमान इतिहास में विद्यमान मिलते हैं। यदि इसे एक आंदोलन से पैदा हुई ऊर्जा मान लूँ तो मैंने वो दस्तावेज देखे हैं जो बताते हैं कि काशी, मथुरा और अयोध्या की मुक्ति के आंदोलन की पटकथा एक साथ लिखी गई थी।

कई दिनों से इन उधेड़बुनों में फँसे मेरे मस्तिष्क को राम के, ‘सबके राम’ होने का जवाब उनकी उस यात्रा में मिलता है, जिसमें न कोई चमत्कार है और न कोई ईश्वरत्व। मुझे इसका जवाब हमारी उन सामाजिक और धार्मिक परंपराओं में मिलता है, जिनमें राम आराध्य भले नहीं हैं, लेकिन उनका अस्तित्व सहर्ष स्वीकार है।

कुछ साल पहले दक्षिण भारत की यात्रा पर गया था। रामेश्वरम में कई स्थानीय लोग मिले जो खुलकर बता रहे थे कि रावण उनका राजा था, जिसकी राम ने हत्या कर दी। उनके हृदय में विभीषण को लेकर कोई सम्मान नहीं था। पर वे भी राम के अस्तित्व को नकार नहीं रहे थे, जबकि इस देश में हम जानते हैं कि राजनीतिक लाभ के लिए देश के सर्वाेच्च अदालत में राम के अस्त्तिव को ही नकार देने की कोशिश हुई है।

कुछ साल पहले जांजगीर के एक गाँव में जाना हुआ था। वहाँ जो भी मिला सबके शरीर पर राम दिखे। उनलोगों ने जो कुछ बताया था (जैसा मुझे स्मरण है) उसके अनुसार करीब सवा सौ साल पहले उनके किसी पूर्वज को मंदिर में जाने से रोक दिया गया था। इसके बाद उनके बीच ‘राम राम’ से शरीर को गुदवाने की परंपरा शुरू हुई। इनलोगों ने राम के अस्तित्व को नहीं नकारा, बल्कि राम में ही अपना अस्तित्व साकार कर लिया। ये लोग आज भी मृतकों के शव को जलाते नहीं हैं। मुझे बताया गया था कि जिस शरीर पर राम विद्यमान हैं, उसे कैसे जलाया जाए।

रामनामी संप्रदाय के लोगों के इस समर्पण से आज के वे ‘जय भीम-जय मीम’ वाले भी सीख सकते हैं जो तुच्छ राजनीति और सस्ती लोकप्रियता के बहकावे में राम और सीता को लेकर अश्लील बातें करते हैं। जांजगीर आज के उस छत्तीसगढ़ प्रदेश का हिस्सा है जहाँ के अलग-अलग धार्मिक परंपराओं के लोग भी खुद को राम के ननिहाल का बताकर उनके साथ जुड़ जाते हैं।

यह केवल राम का ईश्वरत्व नहीं

जिस दौर में अपने अलावा हर किसी के अस्तित्व को खारिज करने की सनक हो, मजहब के नाम पर ‘सर तन से जुदा’ कर देने का उन्माद हो, उस दौर में केवल ईश्वरत्व का होना समाज में इतना सहिष्णु हर्ष नहीं भर सकता है। किसी देश के शासक को खुद को राम कहलाने पर गौरवान्वित नहीं कर सकता है। दुनिया के सबसे बड़े इस्लामी मुल्क को अपनी रामलीलालों के मंचन पर गौरव की अनुभूति नहीं करा सकता है। हर सभ्यता-संस्कृति को राम से जुड़ जाने का आनंद नहीं दे सकता है। जैसे मिस्र की सभ्यता ‘रामसेस’ या मेसोपोटामिया अथवा सुमेरियन सभ्यता ‘राम सिन’ से खुद को जुड़ा पाकर आनंदित होती है।

राम का यह प्रभाव अवतार होने के कारण नहीं है। अराध्य होने के कारण नहीं है। किसी मायाजाल या चमत्कार से नहीं है। यह उस यात्रा की उपज है जो अयोध्या में राम के जन्म से लेकर जल समाधि लेने तक की है। इसी उपज का फल है कि राम में हर किसी को अपना अंश दिखता है। उन पर हर कोई अपना अधिकार मानता है।

राम राज को आज भी किसी भी व्यवस्था का लक्ष्य माना जाता है। उसकी सफलता मानी जाती है। यही कारण है कि राम का नाम आज भी हर्ष पैदा करता है, जबकि हम जानते हैं कि राम राज्य में भी काल की गति पर विराम नहीं लगा था। शोक के पल उस राज्य में भी आते रहे होंगे। पर शोक के उन काल में भी राम का होना शोकाकुल समाज को मुक्ति का प्रकाश प्रदान करता रहता होगा। सृजन की ऊर्जा से भरता रहता होगा।

राम हैं इसलिए हर सवाल निष्प्रभावी हैं

जिस समाज में धार्मिकता कूट-कूटकर भरी हुई हो उस समाज को आज शंकराचार्य की गद्दी पर आसीन धर्माचार्यों के सवाल व्याकुल नहीं कर रहे हैं। जबकि यही समाज यह भी जानता है कि श्री रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के लिए सार्वजानिक तौर पर जो मापदंड सुनिश्चित किए थे, उनका पूरी तरह पालन नहीं हुआ है। इस समाज ने प्राण-प्रतिष्ठा से पहले विग्रह की नेत्र ढके बिना तस्वीरों को वायरल होते देखा है। इत्यादि, इत्यादि…

यदि यह केवल राम के ईश्वर भर होने का मामला होता है, यह केवल एक मंदिर का बनना भर होता है, यह केवल धार्मिकता मात्र होता, यह केवल अपने अराध्य को लेकर केवल भक्ति का भाव होता तो आज शंकराचार्यों की आपत्ति से लेकर ट्रस्ट की ओर से हुई चूकों का क्रंदन सर्वव्यापी होता। पर हम देख हैं वे भाव जिसमें कोई वृद्ध अक्षत निमंत्रण मिलने पर फूट-फूटकर रोने लगते हैं। कोई वृद्ध महिला वाहन पर राम की तस्वीर वाले पोस्टर देख बीच रास्ते अपने चप्पल उतार कर भाव विह्वल होकर उस तस्वीर को आलिंगन करने लगती है। किसी सैयदा बतूल जेहरा का गाया राम भजन वायरल हो जाता है।

इन सबमें कहीं भी वह धार्मिकता नहीं है जो आपको ईश्वर से अपनी दरिद्रता दूर करने की प्रार्थना के भाव से भरती है। कोई छात्र यह नहीं माँग रहा कि राम जी इस बार अच्छे नंबर से पास करवा देना। कार्यालयों में प्राण-प्रतिष्ठा पर आयोजन हो रहे हैं पर कोई व्यापारी यह नहीं कह रहा प्रभु मेरे कारोबार को उन्नति देना। धन-धान्य से भर देना। कोई अपने लिए संतान की कामना नहीं किए जा रहा। कोई ‘पत्नीं मनोरमां देहि’ की इच्छा लिए अयोध्या नहीं जा रहा…

यह राममय वातावरण जगत कल्याण के भाव से संचालित है। निज का भाव गौण है। यही भाव राम को ‘सबके राम’ बनाता है। यह व्यवस्था को बताता है कि हर्ष का भाव स्थायी नहीं है। शोक के क्षण भी आएँगे। पर समाज को सृजन की उस उर्जा से आलोकित करते रहना उसका परम दायित्व है जो राम का प्रभाव पैदा करता है। 2024 के आम चुनावों से ठीक पहले भारतीय समाज ने अपनी राजनीतिक व्यवस्था को इस दायित्व से बाँध दिया है। इस दायित्व को पूरा करना कोई विकल्प नहीं है। दायित्व से डिगने वाले मिट जाएँगे। राम राज का लक्ष्य अडिग रहेगा।

बिहार में नीतीश कुमार की नई टीम, JDU की कार्यकारिणी से पूर्व अध्यक्ष ललन सिंह और उनके करीबियों की भी छुट्टी: उधर ‘मिशन 2024’ पर बिहार पहुँच रहे JP नड्डा

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के संग ‘ऊँट किस करवट बैठेगा’ वाली कहावत अक्षरशः सही साबित होती है। बीते महीने वो जनता दल यूनाईटेट (JDU) के अध्यक्ष ललन सिंह को पद से हटा कर खुद पार्टी चीफ बन बैठे। अब उन्होंने शनिवार (20 जनवरी, 2024) को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का पुनर्गठन कर डाला है।

अब JDU ने अपने सभी विधायकों को 72 घंटे तक पटना में ही रुकने का फरमान सुनाया है। इस बीच बिहार के पल-पल बदलते सियासी माहौल पर पूरे देश की नजर बनी हुई है तो वहीं राजद के लालू-तेजस्वी की जोड़ी I.N.D.I. महागठबंधन की अगुवाई करने वाले सुशासन बाबू के मूड को लेकर पेशोपश में पड़ी है। हालिया कुछ घटनाक्रम ऐसे हैं जो इशारा कर रहे हैं कि सीएम नीतीश किसी को भी गच्चा दे सकते हैं और कभी भी पलट सकते हैं।

लोकसभा चुनावों के लिए JDU राष्ट्रीय कार्यकारिणी की नई टीम

हम शुरू करते हैं नीतीश कुमार के जदयू के राष्ट्रीय पदाधिकारियों की टीम का पुनर्गठन करने से। शनिवार को ही उन्होंने इस काम को अंजाम दिया है। नई टीम में कई लोकसभा सांसदों को उनके संगठनात्मक पदों से मुक्त कर दिया गया। इसे नीतीश की अपने हिसाब से डील करने की रणनीति माना जा रहा है।

राज्यसभा सांसद वशिष्ठ नारायण सिंह को मंगनी लाल मंडल की जगह उपाध्यक्ष बनाया गया है। मंगनी लाल नई टीम में अब संगठन के 11 महासचिवों में से एक हैं। केसी त्यागी को राजनीतिक सलाहकार के रूप में प्रमोशन दिया गया। वो पहले विशेष सलाहकार और पार्टी के चीफ प्रवक्ता रहे हैं।

नई टीम में पार्टी के पहले प्रवक्ता त्यागी है तो दूसरे नंबर पर राजीव रंजन हैं। पार्टी के मुताबिक, जेडीयू के 11 महासचिवों में पाँच लोकसभा सांसद भी शामिल हैं। कहा जा रहा है कि ये जेडीयू की लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर बनाई रणनीति है।

नई टीम में पुरानी टीम के बिहार के मंत्री संजय झा, राज्यसभा सांसद रामनाथ ठाकुर, अली अशरफ फातमी और अफाक अहमद खान को महासचिव पद पर बरकरार रखा गया है। बताते चले कि पूर्व पार्टी अध्यक्ष ललन सिंह की टीम में 22 महासचिव थे। नई टीम से उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता धनंजय सिंह और हर्ष वर्धन सिंह समेत अन्य नेताओं को नई बाहर कर दिया गया हैं।

जेपी नड्डा का बिहार दौरा

वहीं नीतीश कुमार पर अमित शाह की नरमी से आरजेडी के नेताओं लालू-तेजस्वी के पेशानी पर बल पड़ रहे हैं। खबर है की बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा बिहार की 40 लोकसभा सीटों पर विजय पताका फहराने के लिए बिहार दौरे पर जाने वाले हैं।

नड्डा की 30 जनवरी को कटिहार में होने जा रही जनसभा कई मायनों में अहम मानी जा रही है। इसमें नड्डा मिशन 2024 के तहत सीमांचल के मतदाताओं किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार और अररिया की सीटों को साधने की कोशिश में है।

चूँकि ये सीटें बीजेपी के लिए ही नहीं बल्कि सभी राजनीतिक दलों के लिए अहम मानी जाती हैं, यहाँ की हार-जीत का सीधा असर इसके साथ सटे बंगाल की सीटों पर पड़ता है। बिहार में लोकसभा चुनाव में 2019 में किशनगंज सीट से जेडीयू कॉन्ग्रेस से हार गई। तब कॉन्ग्रेस को बिहार में बस यही एक सीट मिली थी। साल 2019 बीजेपी-जेडीयू 17-17 सीटों पर लड़ी।

उस चुनाव में BJP 17 तो JDU 16 सीट जीती थी। वहीं टूटने से पहले लोकजनशक्ति पार्टी (LJP) 6 सीट पर लड़ी और सब जीती थी। इस तरह 2019 के आम चुनावों में NDA ने बिहार की 40 सीटों में 39 जीत ली थी।

अमित शाह ने खोली नीतीश के लिए खिड़की

बताते चलें कि साल 2022 में नीतीश कुमार ने NDA से नाता तोड़ कर महागठबंधन का दामन थाम लिय था। इसके बाद साल 2023 में झंझारपुर की रैली गृहमंत्री अमित शाह ने बिहार में बीजेपी की एक चुनावी जनसभा में साफ कहा था कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए एनडीए के दरवाजे पूरी तरह बंद हो चुके हैं।

इसके बाद बिहार भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं ने भी अमित शाह के बयान को दोहराया था, लेकिन कुछ दिन पहले उन्होंने एक अखबार को दिए इंटरव्यू में जब अमित शाह से पूछा गया कि NDA को छोड़कर गए नेता अगर वापस आना चाहते हैं तो इस पर उनका क्या रुख है।

इस सवाल के जवाब में अमित शाह ने अपने तेवर नरम करते हुए कहा कि अगर इस संबंध में कोई प्रस्ताव आएगा तो विचार किया जाएगा। इसके बाद से ही नीतीश कुमार के एक बार फिर महागठबंधन और I.N.D.I. गठबंधन को छोड़कर एनडीए के साथ जाने की चर्चाएँ तेज हो गई हैं।

बीते दिनों RJD के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और उनके बेटे व राज्य के उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के घर पर जाकर मुलाकात की तो चर्चाओं का बाजार और गर्म हो गया। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और ‘हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (HAM) सेकुलर’ के अध्यक्ष जीतन राम माँझी ने कहा है कि अगर नीतीश कुमार एनडीए में वापस आते हैं तो वह इसका विरोध नहीं करेंगे।

बिहार की सियासत में इस बात की चर्चा आम है कि नीतीश कुमार लोकसभा सीटों के बँटवारे में हो रही देरी के वजह से ख़ासे नाराज हैं और वह चाहते हैं कि लोकसभा सीटों को लेकर जल्द से जल्द बँटवारा हो, जबकि राजद के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव इसे लेकर जल्दबाजी में नहीं दिखाई देते।

कुल मिलाकर एक बार फिर नीतीश कुमार के एनडीए में वापसी की अटकलों ने बिहार से लेकर दिल्ली तक सियासी पारा चढ़ा दिया है। अगर नीतीश कुमार I.N.D.I. गठबंधन का साथ छोड़कर एनडीए से हाथ मिलाते हैं तो निश्चित रूप से यह इंडी गठबंधन के लिए बहुत बड़ा झटका साबित होगा क्योंकि नीतीश कुमार की पहल पर ही विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की कवायद शुरू हुई थी।

अयोध्या के नवनिर्मित मंदिर में भगवान रामलला का अधिवास: वैदिक मंत्रोच्चार के साथ सरयू नदी के जल से स्नान, 1008 हवन कुंडों में चल रहा महायज्ञ

अयोध्या में रामलला के मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का अनुष्ठान जारी है। 16 जनवरी 2024 से शुरु हुए प्राण प्रतिष्ठा अनुष्ठान में शनिवार (20 जनवरी 2024) को रामलला को तीन अधिवास कराए गए। रामलला का शर्कराधिवास और फलाधिवास कराने के बाद पुष्पाधिवास कराया गया। इसमें रामलला को पुष्प, फल और शक्कर चढ़ाया गया और उनका आह्वान वैदिक मंत्रोच्चार के साथ किया गया। इसके बाद 21 जनवरी (रविवार) को रामलला का मध्याधिवास कराया जाएगा, फिर शाम के समय शय्याधिवास कराया जाएगा।

शर्कराधिवास के तहत तहत सरयू नदी के पवित्र जल से गर्भगृह को धोया गया। इसके बाद वास्तु शांति और अन्नाधिवास अनुष्ठान हुआ। इस अनुष्ठान के तहत विग्रह को गेहूँ और धान आदि अन्न के भंडार में ढ़ँककर मंत्रोचारण किया गया। वहीं, अनुष्ठान के तहत अयोध्या में 1008 हवन कुंडों में लगातार यज्ञ चल रहा है। इसमें 1008 पुरोहित और 5000 से ज्यादा यजमान प्राण प्रतिष्ठा से पहले हवन और पूजन कर रहे हैं। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी 1008 कुंडीय महाय़ज्ञ में शुक्रवार को शामिल हुए थे।

अयोध्या के भव्य मंदिर में राम लला को प्राण प्रतिष्ठित करने वाले सभी अनुष्ठान लगातार जारी हैं। सप्ताह भर के कार्यक्रमों में पहले दिन 16 जनवरी 2024 को पहले दिन प्रायश्चित और कर्मकूटि पूजन अनुष्ठान किए गए थे। इसके अगले दिन 17 जनवरी 2024 को रामलला का परिसर प्रवेश कराया गया था। वहीं, 18 जनवरी को रामलला का तीर्थ पूजन, जल यात्रा, जलाधिवास और गंधाधिवास कराया गया था।

इसके बाद 19 जनवरी की सुबह रामलला का औषधाधिवास, केसराधिवास और घृताधिवास कराया गया था, जबकि सायं काल धान्याधिवास कराया गया। 20 जनवरी 2024 को शर्कराधिवास, फलाधिवास और पुष्पाधिवास कराया गया। राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा से एक दिन पहले यानी 21 जनवरी को मध्यधिवास और शय्याधिवास कराया जाएगा।

रविवार 21 जनवरी के अनुष्ठान में रामलला के विग्रह में नख से शिखा तक शक्ति का संचार करने के लिए मंत्रोचारण किया जाएगा। इसके बाद श्री विग्रह का महाभिषेक किया जाएगा और 22 जनवरी 2024 (सोमवार) को भव्य मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की जाएगी। ये अनुष्ठान दोपहर 12 बजकर 20 मिनट पर शुरू होगा, जिसमें सोने की सिलासा से भगवान के नयन खोले जाएँगे।

इससे पहले, शनिवार (19 जनवरी 2024) को रामलला की मूर्ति की पहली झलक मिली थी। वहीं, रामलला की नई मूर्ति के गर्भग्रह में स्थापित होने से पहले पहले भगवान की एक छोटी मूर्ति को पालकी में विराजित करके मंदिर परिसर का भ्रमण कराया गया। शुरू में प्लान किया गया था कि इस मूर्ति को नगर भ्रमण करवाया जाएगा मगर फिर सुरक्षा व्यवस्था के चलते उस कार्यक्रम को रद्द किया गया और रामलला को मंदिर में घुमाकर उनके दर्शन हुए।

श्रीराम जन्मभूमि पथ पर लगभग 5 फीट की अगरबत्तियाँ लगाई गई हैं। ये अगरबत्तियाँ 11 घंटे तक वातावरण को सुगंधित रखती हैं। इन्हें हर 11 घंटे पर ITC द्वारा बदल दिया जाता है। अगरबत्तियों पर राम जन्मभूमि ट्रस्ट का लोगो भी लगा है। आईटीसी ने इसे सुगंध कॉरिडोर का भी नाम दिया है।

जमीन पर शयन और ब्रह्म मुहूर्त में 1 घंटा 11 मिनट का विशेष जाप: राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के लिए ऐसे व्रत कर रहे हैं पीएम मोदी, पी रहे हैं सिर्फ नारियल पानी

अयोध्या के नवनिर्मित भव्य मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हो रही है। इसके लिए 16 जनवरी से ही अनुष्ठान जारी है। अनुष्ठान के अंतिम दिन 22 जनवरी 2024 को रामलला अपने जन्मभूमि स्थान पर विराजमान हो जाएँगे। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, संघ के प्रमुख मोहन भागवत एवं अन्य गणमान्य लोग भी उपस्थित रहेंगे।

प्राण प्रतिष्ठा समारोह में पीएम मोदी बतौर यजमान पूजा-पाठ करेंगे। पीएम मोदी पूजा-पाठ में शामिल होने के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं और इसके लिए कड़ी व्रत-तपस्या भी कर रहे हैं। यहीं नहीं, पीएम खास तरह का जाप भी कर रहे हैं, जो उन्हें सिद्ध महात्मा द्वारा बताया गया है। पीएम मोदी संन्यासी की तरह फर्श पर सो रहे हैं और सिर्फ और सिर्फ नारियल पानी पी रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में जाग जाते हैं और हर दिन एक घंटा 11 मिनट तक खास मंत्र का जाप करते हैं। इस मंत्र का 11 दिनों तक का जाप अनिवार्य बताया गया है। वे विशेष धार्मिक परंपरा के मुताबिक ही फर्श पर सो रहे हैं। फर्श पर वो सिर्फ कंबल बिछाते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन तमाम व्रत एवं जाप के अलावा, अपने आवास पर ही गाय की पूजा भी कर रहे हैं। वे दिन गायों को चारा भी खिलाते हैं। इसकी कई तस्वीरें भी पिछले दिनों सोशल मीडिया पर वायरल हुई थीं। इसके अलावा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शास्त्रों के मुताबिक अन्नदान और वस्त्रदान भी कर रहे हैं।

बता दें कि शास्त्रों में देव प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा के लिए एक लंबी प्रक्रिया बताई गई है। इसके लिए कई सारे नियमों का पालन करना होता है। पीएम मोदी एक रामभक्त के रूप में आध्यात्मिक साधना कर रहे हैं। आमतौर पर पीएम मोदी दैनिक दिनचर्या में ब्रह्ममुहूर्त जागरण, साधना और सात्विक आहार जैसे नियमों का पालन तो करते ही हैं, लेकिन इस बार वो यम-नियम के तहत सभी अनुष्ठान कर रहे हैं।

गौरतलब है कि अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हो रही है। 16 जनवरी से शुरू हुए धार्मिक अनुष्ठान 22 जनवरी तक चलेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में 22 जनवरी को रामलला अपने स्थान पर विराजमान होंगे। पूरे देश में लोग अपने घरों में दिवाली मनाएँगे। हर तरफ मंगल गीत गाए जा रहे हैं।

सोशल मीडिया भी भगवान राम की भक्ति में डूबा हुआ है। प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के लिए खास मेहमानों को न्यौता भेजा जा रहा है। इसके अलावा, अयोध्या रामलला जन्मस्थान केस में फैसले देने वाले सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के सभी 5 जजों को भी न्यौता भेजा गया है। इनमें से कुछ जज रिटायर भी हो चुके हैं।