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1973 का ‘ब्लैक बजट’: जब इंदिरा गाँधी के काल में भुखमरी और आर्थिक संकट की कगार पर पहुँच गया था देश

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण रविवार (1 फरवरी) को जब अपना 9वाँ बजट पेश कर रही हैं, तो पूरा देश ‘विकसित भारत’ की चमक और 50 लाख नौकरियों के वादे के साथ भविष्य की ओर देख रहा है। लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटें तो एक दौर वह भी था जब साल 1973 में इंदिरा गाँधी के शासनकाल के दौरान ‘ब्लैक बजट’ पेश किया गया था। यह वह काला समय था जब सरकार की गलत आर्थिक नीतियों और अदूरदर्शिता ने देश को भुखमरी के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया था। आज के आत्मनिर्भर भारत और उस दौर की बेबसी के बीच जमीन-आसमान का फर्क है।

इंदिरा गाँधी का ‘ब्लैक बजट’: जब सरकारी तिजोरी में बचा था सिर्फ ‘अंधेरा’

साल 1973 का बजट भारतीय इतिहास में किसी डरावने सपने जैसा था। तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंतराव बी चव्हाण ने जब यह बजट पढ़ा, तो इसमें विकास की नहीं बल्कि बर्बादी की इबारत लिखी थी। उस समय सरकार को 550 करोड़ रुपए का भारी-भरकम घाटा हुआ था, जिसे आज हम राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) कहते हैं। उस दौर के हिसाब से यह आँकड़ा इतना बड़ा था कि इसने देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी थी।

राजकोषीय घाटा दरअसल सरकार की नाकामी का रिपोर्ट कार्ड होता है, जो बताता है कि आपकी कमाई से कहीं ज्यादा आपके खर्चे हैं। इंदिरा गाँधी के दौर में यह घाटा इसलिए बढ़ा क्योंकि सरकार ने आर्थिक अनुशासन को ताक पर रख दिया था। आम बोलचाल में कहें तो यह ‘कमाई अठन्नी और खर्चा रुपैया’ वाला हाल था। खजाना खाली था, लेकिन सरकार के पास फिजूलखर्ची और संकट को संभालने की कोई ठोस योजना नहीं थी। इसी वित्तीय अंधकार की वजह से इसे ‘ब्लैक बजट’ कहा गया, जिसने आने वाले सालों के लिए महँगाई और कंगाली का रास्ता खोल दिया।

आसान शब्दों में उदाहरण के सहित समझाते हैं कि फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) या राजकोषीय घाटा क्या होता है। दरअसल, राजकोषीय घाटा सरकार की आर्थिक सेहत का रिपोर्ट कार्ड होता है। यह बताता है कि सरकार अपनी कुल कमाई (जैसे टैक्स और अन्य स्रोतों से होने वाली आय) के मुकाबले कितना ज्यादा खर्च कर रही है। मान लीजिए, सरकार की जेब में टैक्स और अन्य रास्तों से ₹100 आए, लेकिन उसने देश के विकास, सैलरी और पुरानी योजनाओं पर ₹120 खर्च कर दिए। अब यह जो ₹20 का अंतर है, वही ‘फिस्कल डेफिसिट’ कहलाता है। इस कमी को पूरा करने के लिए सरकार को बाजार या अन्य संस्थाओं से कर्ज लेना पड़ता है।

अहंकार और गलत फैसलों की तिहरी मार: युद्ध, सूखा और सरकारी बेबसी

इंदिरा गाँधी की सरकार अपनी हर नाकामी का ठीकरा 1971 के युद्ध पर फोड़ती रही, लेकिन असल सच उनकी नीतियों की विफलता थी। युद्ध के बाद करीब 1 करोड़ शरणार्थियों का बोझ भारत पर पड़ा, लेकिन सरकार ने इसके लिए कोई इमरजेंसी फंड या आर्थिक बैकअप तैयार नहीं किया था। रक्षा बजट अचानक बढ़ाकर 1600 करोड़ रुपए कर दिया गया, जबकि आम जनता की थाली से रोटी गायब हो रही थी।

मुसीबत तब और बढ़ गई जब 1972-73 में भीषण सूखा पड़ा। इंदिरा गाँधी की सरकार के पास कृषि को लेकर कोई दूरदर्शी सोच नहीं थी, जिसका नतीजा यह हुआ कि फसलें पूरी तरह बर्बाद हो गईं। गाँवों में लोग भूख से मरने लगे और भुखमरी का वो काल पैदा हुआ जिसने लाखों परिवारों को उजाड़ दिया। देश के पास अपना पेट भरने के लिए अनाज तक नहीं था। मजबूरन, भारत को विदेशों के सामने हाथ फैलाने पड़े और 20 लाख टन अनाज मँगाना पड़ा। इस आयात पर 160 करोड़ रुपए खर्च हुए, जिससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार भी लगभग खत्म हो गया। यह एक ऐसे नेतृत्व की कहानी थी जिसने देश को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय दूसरों पर निर्भर बना दिया।

राष्ट्रीयकरण का ढोंग और बेपटरी होती अर्थव्यवस्था

अपनी विफलताओं को छिपाने और सत्ता पर पकड़ मजबूत करने के लिए इंदिरा गाँधी की सरकार ने ‘राष्ट्रीयकरण’ का सहारा लिया। कोयला खदानों, तांबा कंपनियों और बीमा कंपनियों को सरकारी नियंत्रण में ले लिया गया। सरकार ने कोयला खदानों पर कब्जे के लिए 56 करोड़ रुपए फूँक दिए, लेकिन इसका लाभ जनता को मिलने के बजाय सरकारी तंत्र और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया। बिजली संकट कम होने के बजाय और गहरा गया क्योंकि सरकारी नियंत्रण में आते ही इन उद्योगों में सुस्ती छा गई।

इसके अलावा, सरकार ने सूखा राहत के नाम पर 220 करोड़ रुपए बाँटने का दावा किया, लेकिन धरातल पर लोग दाने-दाने को तरसते रहे। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ीं, तो सरकार ने हाथ खड़े कर दिए और महँगाई को बेलगाम होने दिया। 1973 का यह बजट दरअसल एक ऐसी सरकार की स्वीकारोक्ति थी जिसने आर्थिक मोर्चे पर पूरी तरह घुटने टेक दिए थे।

बेबसी के ‘ब्लैक बजट’ से आत्मनिर्भर भारत का उदय

आज जब हम निर्मला सीतारमण के बजट को देखते हैं, तो हमें स्पष्ट रूप से मोदी सरकार के ‘आत्मनिर्भर भारत’ की मजबूत नींव दिखाई देती है। 1973 का वह काला दौर और आज का स्वर्ण काल एक-दूसरे के विपरीत ध्रुव हैं। जहाँ इंदिरा गाँधी के समय भारत विदेशों से मिलने वाले अनाज और कर्ज पर निर्भर था और पलता था, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आज भारत दुनिया को अनाज, तकनीक और वैक्सीन निर्यात कर रहा है।

मोदी सरकार के बजट ने यह साबित कर दिया है कि असली विकास वह है जहाँ देश अपनी क्षमताओं पर भरोसा करे। आज बजट का पैसा राजमार्गों, बंदरगाहों और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च हो रहा है, न कि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है। 1973 के ब्लैक बजट ने देश को भुखमरी की छवि दी थी, लेकिन आज का बजट मध्यम वर्ग को टैक्स में राहत देता है और छोटे व्यापारियों को पंख देता है। यह सफर बेबसी से ‘बॉस’ बनने का है। 1973 की उन डरावनी यादों से निकलकर आज भारत एक ऐसी आर्थिक महाशक्ति बन गया है, जो अब किसी के सामने झुकता नहीं, बल्कि दुनिया को रास्ता दिखाता है। इंदिरा गाँधी का वह दौर एक चेतावनी थी और मोदी का यह दौर एक नई आशा का सूर्योदय है।

ब्रिटिश काल से मोदी सरकार तक… रेल बजट की कहानी, जिसने भारत की वित्तीय व्यवस्था को करीब एक सदी तक अलग राह पर चलाया

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आज (1 फरवरी 2026) को लगातार नौंवी बार बजट पेश करने जा रही हैं। आम बजट में देश की अर्थव्यवस्था, विकास योजनाओं और नीतियों की दिशा तय होगी, इस बजट में रेलवे को लेकर भी कई बड़े ऐलान किए जाने की संभावना है। हालाँकि, हमेशा ऐसा नहीं था और लंबे वक्त तक रेलवे का बजट आम बजट से अलग पेश किया जाता रहा था। यह परंपरा करीब नौ दशकों तक चली लेकिन 2017 में इसे समाप्त कर रेल बजट को आम बजट में शामिल कर दिया गया। इस फैसले के पीछे ऐतिहासिक, आर्थिक और प्रशासनिक कारण रहे।

रेल बजट की शुरुआत कैसे हुई

रेल बजट को अलग से पेश करने की परंपरा 1924 में ब्रिटिश शासन के दौरान शुरू हुई थी। उस समय भारतीय रेलवे का आकार और महत्व इतना बड़ा था कि इसे आम बजट के तहत समायोजित करना कठिन माना गया। ईस्ट इंडिया रेलवे कमेटी के चेयरमैन सर विलियम एक्वर्थ ने रेलवे के प्रशासन और वित्तीय व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कई सुधार सुझाए। उनकी सिफारिशों के आधार पर यह तय किया गया कि रेलवे का बजट आम बजट से अलग पेश किया जाएगा ताकि इसके खर्च, आय और योजनाओं पर विशेष ध्यान दिया जा सके।

स्वतंत्रता के बाद भी जारी रही परंपरा

1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद भी रेल बजट को अलग पेश करने की परंपरा जारी रखी गई। स्वतंत्र भारत का पहला रेल बजट देश के पहले रेल मंत्री जॉन मथाई ने प्रस्तुत किया था। उन्होंने वित्त मंत्री के रूप में दो आम बजट भी पेश किए। उस समय रेलवे देश की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार था और इसकी आय का योगदान इतना बड़ा था कि इसे अलग बजट के रूप में बनाए रखना जरूरी समझा गया।

रेलवे की आय और अलग बजट का औचित्य

आजादी के समय रेलवे से होने वाली राजस्व प्राप्ति आम बजट की आय से लगभग 6% अधिक थी। इस वजह से सर गोपालस्वामी आयंगर समिति ने सिफारिश की थी कि रेलवे बजट को अलग ही पेश किया जाना चाहिए। 21 दिसंबर 1949 को संविधान सभा ने भी इस संबंध में एक प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। हालांकि यह व्यवस्था प्रारंभ में केवल पांच वर्षों के लिए तय की गई थी, लेकिन यह परंपरा लगातार आगे बढ़ती रही और 2016 तक कायम रही।

समय के साथ रेलवे के राजस्व में बदलाव

देश की अर्थव्यवस्था और परिवहन व्यवस्था में बदलाव के साथ रेलवे के राजस्व का अनुपात धीरे-धीरे कम होता गया। 1970 के दशक तक रेलवे का योगदान कुल राजस्व का लगभग 30% रह गया। 2015-16 तक यह घटकर करीब 11.5% तक पहुँच गया। इस गिरावट ने विशेषज्ञों को यह सोचने पर मजबूर किया कि क्या अलग रेल बजट की परंपरा अब भी जरूरी है।

रेल बजट के विलय की प्रक्रिया

नवंबर 2016 में रेल मंत्रालय ने घोषणा की कि रेल बजट को केंद्रीय बजट में शामिल किया जाएगा। यह फैसला नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों और बिबेक देबरॉय तथा किशोर देसाई द्वारा लिखे गए एक पेपर पर आधारित था। समिति का तर्क था कि आधुनिक सार्वजनिक वित्त प्रणाली में अलग रेल बजट का कोई व्यावहारिक उद्देश्य नहीं रह गया है और भारत दुनिया का लगभग अकेला देश था, जहाँ यह परंपरा अभी भी जारी थी।

सरकार के भीतर इस प्रस्ताव पर व्यापक चर्चा हुई। तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने इसका समर्थन किया और वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसे संसद में प्रस्तुत किया। आखिरकार 2017-18 के बजट से पहली बार रेल बजट और आम बजट को एकीकृत कर दिया गया, जिससे दशकों पुरानी परंपरा खत्म हो गई।

वित्तीय व्यवस्था में हुए बदलाव

रेल बजट के आम बजट में विलय के साथ कई महत्वपूर्ण वित्तीय बदलाव भी किए गए। वित्त मंत्रालय ने रेलवे के अनुमानों के साथ एक विनियोग विधेयक तैयार करने और संसद में प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी संभाली। रेलवे को सरकार को लाभांश देने की बाध्यता से मुक्त कर दिया गया, जिससे उस पर वित्तीय दबाव कम हुआ। पहले रेलवे के लिए अलग पूंजी प्रवाह (कैपिटल फ्लो) की व्यवस्था थी, जिसे समाप्त कर दिया गया और इसके स्थान पर वित्त मंत्रालय से सकल बजटीय सहायता प्रदान करने की व्यवस्था की गई। इसके साथ ही रेलवे को बाजार से अतिरिक्त संसाधन जुटाने की स्वतंत्रता भी दी गई ताकि वह अपने पूंजीगत व्यय को पूरा कर सके।

रेल बजट के विलय के पीछे उद्देश्य

रेल बजट को आम बजट में शामिल करने का मकसद यह था कि सरकार देश की आमदनी और खर्च को एक साथ और साफ तरीके से देख सके। इससे रेलवे, सड़क और जलमार्ग जैसे परिवहन क्षेत्रों की योजनाओं को मिलाकर बेहतर तरीके से बनाया जा सका। इसके साथ ही वित्त मंत्रालय को पैसों के बंटवारे में ज्यादा सुविधा और लचीलापन मिला, ताकि जरूरत के अनुसार बीच साल में भी संसाधनों में बदलाव किया जा सके।

इस फैसले से कैसे आई पारदर्शिता

रेल बजट को आम बजट में मिलाने से बजट बनाने और पेश करने की प्रक्रिया आसान और साफ हो गई। पहले रेल बजट और आम बजट अलग-अलग होने के कारण संसद में तैयारी और चर्चा में ज्यादा समय लगता था लेकिन अब यह समय बचने लगा। अब सरकार की कमाई और खर्च एक ही दस्तावेज में दिखाए जाते हैं, जिससे संसद, निवेशकों और आम लोगों के लिए देश की आर्थिक स्थिति को समझना ज्यादा सरल हो गया।

रेल बजट को आम बजट में शामिल करना सिर्फ एक सरकारी फैसला नहीं था बल्कि बदलती अर्थव्यवस्था और नई वित्तीय सोच का नतीजा था। पहले रेलवे देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता था लेकिन समय के साथ उसकी भूमिका बदलती गई। अलग रेल बजट की परंपरा लंबे समय तक भारतीय इतिहास का अहम हिस्सा रही लेकिन आधुनिक व्यवस्था में इसे खत्म कर एक ही बजट प्रणाली अपनाई गई। इस बदलाव से देश की वित्तीय व्यवस्था ज्यादा व्यावहारिक, साफ और बेहतर तालमेल वाली बन गई।

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण लगातार नौंवी बार बजट पेश कर रचेंगी इतिहास: जानें- भारत के वित्तीय विवरण को बनाने की प्रक्रिया, क्या हैं मध्य वर्ग की उम्मीदें और चुनौतियाँ

भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण रविवार (1 फरवरी 2026) को संसद में संघीय बजट 2026-27 पेश करेंगी। यह उनका लगातार नौवाँ बजट होगा, जो एक रिकॉर्ड है। पहली बार बजट रविवार को पेश हो रहा है, जो ऐतिहासिक है।

इस बजट पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं, खासकर मध्य वर्ग की, जो अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। मध्य वर्ग महँगाई, टैक्स बोझ और जीवन यापन की बढ़ती लागत से जूझ रहा है। इस लेख में हम बजट बनाने की पूरी प्रक्रिया, मध्य वर्ग की प्रमुख चुनौतियों और इस बजट से उनकी उम्मीदों पर विस्तार से चर्चा कर रहे हैं।

बजट बनाने की प्रक्रिया को समझें

भारत में संघीय बजट बनाने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 112 के तहत होती है। यह छह महीने पहले शुरू हो जाती है और अत्यंत गोपनीय रहती है, जिसके मुख्य चरण निम्नलिखित हैं-

बजट सर्कुलर जारी करना: वित्त मंत्रालय का आर्थिक मामलों का विभाग सितंबर-अक्टूबर में सभी मंत्रालयों और विभागों को बजट सर्कुलर जारी करता है। इसमें अगले वित्त वर्ष के लिए राजस्व और व्यय के अनुमान माँगे जाते हैं।

प्री-बजट मीटिंग्स: नवंबर-दिसंबर में वित्त मंत्री स्टेकहोल्डर्स जिसमें उद्योग जगत, किसान संगठन, अर्थशास्त्री, राज्य सरकारें आदि होने हैं, उनके साथ बैठके करते हैं। ये मीटिंग्स नीतिगत सुझाव देने में मदद करती हैं।

अनुमान तैयार करना: सभी मंत्रालय अपने व्यय और राजस्व के अनुमान भेजते हैं। वित्त मंत्रालय इनका मिलान करता है, घाटे का आकलन करता है और राजकोषीय नीति निर्धारित करता है।

हलवा सेरेमनी और लॉक-इन: बजट प्रिंटिंग की अंतिम कड़ी में पारंपरिक ‘हलवा सेरेमनी’ होती है। इस बार यह 27 जनवरी 2026 को हुई। इसमें वित्त मंत्री हलवा बनाती और बाँटती हैं, जो बजट टीम के लिए शुभ मानी जाती है।

इसके बाद बजट से जुड़े अधिकारी नॉर्थ ब्लॉक के बेसमेंट में ‘लॉक-इन’ हो जाते हैं। वो बाहरी दुनिया से संपर्क काटकर बजट दस्तावेज तैयार करते हैं। यह गोपनीयता सुनिश्चित करता है

अंतिम स्वीकृति और पेशकश: कैबिनेट की मंजूरी के बाद बजट लोकसभा में पेश होता है। इसके बाद चर्चा, मांगें अनुदान और वित्त विधेयक पारित होते हैं। यह प्रक्रिया न केवल आर्थिक योजना है, बल्कि सरकार की प्राथमिकताओं को दर्शाती है। 2026 बजट में ग्लोबल चुनौतियाँ जैसे अमेरिकी टैरिफ्स का भी असर दिख सकता है।

बजट 2026 से मध्य वर्ग की उम्मीदें

1 फरवरी को पेश होने वाले बजट से मध्य वर्ग को बड़ी राहत की उम्मीद है। प्रमुख अपेक्षाएँ:

हाउसिंग और शिक्षा-स्वास्थ्य: होम लोन ब्याज पर छूट बढ़ाना, मेडिकल खर्च पर डिडक्शन।

महंगाई नियंत्रण और रोजगार: GST में सुधार, आवश्यक वस्तुएँ सस्ती करना। स्किल डेवलपमेंट और जॉब क्रिएशन पर फोकस।

अन्य: कैपिटल गेंस टैक्स सरलीकरण, पेंशन और सेविंग स्कीम में राहत। विशेषज्ञ मानते हैं कि मध्य वर्ग को राहत से खपत बढ़ेगी, जो अर्थव्यवस्था को बूस्ट देगी।

उम्मीद और वास्तविकता का संतुलन

बजट 2026 विकसित भारत-2047 के सपने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा। मध्य वर्ग की चुनौतियाँ गंभीर हैं, लेकिन अगर सरकार टैक्स राहत और खपत बढ़ाने पर फोकस करती है, तो यह वर्ग फिर मजबूत हो सकता है।

निर्मला सीतारमण का यह नौवाँ बजट न केवल आर्थिक दस्तावेज है, बल्कि करोड़ों मध्य वर्ग परिवारों की उम्मीदों का आईना भी। उम्मीद है कि यह बजट संतुलित और समावेशी होगा, जो सभी वर्गों की जरूरतों को ध्यान में रखेगा।

शैक्षणिक परिसर को ‘सामाजिक न्याय उद्योग’ का अखाड़ा न बनाएँ- UGC नियमावली पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के संदेश

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के ‘इक्विटी प्रमोशन रेगुलेशंस 2026’ पर सुप्रीम कोर्ट की रोक किसी तकनीकी खामी पर लगाया गया विराम नहीं है, बल्कि एक खतरनाक वैचारिक ढाँचे पर खींची गई आपात रेखा है। यह सरकार और यूजीसी- दोनों के लिए अंतिम चेतावनी सरीखी है कि सामाजिक न्याय का अर्थ ऐसा तंत्र खड़ा कर देना नहीं होता, जिसमें एक वर्ग को जन्म से पीड़ित और दूसरे को जन्म से अभियुक्त मान लिया जाए। न्याय का यह मॉडल सुधार नहीं करता, वह पहले ही दिन कैंपस को संदेह और भय में बाँट देता है।

शिक्षा के परिसर सर्वसमावेशी हों, उन्मुक्त हों, भेदभाव से मुक्त हों- यह आकांक्षा सर्वमान्य है। शायद यूजीसी की भी। लेकिन 2012 के पुराने फ्रेमवर्क को हटाकर जो नए रेगुलेशंस लाए गए, उनमें सामान्य जाति के अस्तित्व को ही लगभग नकार दिया गया। जैसे यह पहले से तय कर लिया गया हो कि वे भेदभाव के शिकार हो ही नहीं सकते, और उनके विरुद्ध झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतें हो ही नहीं सकतीं।

यह सुधार नहीं है। वैचारिक दमन है।

इसीलिए इसका मुखर विरोध हुआ और सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा। शीर्ष अदालत ने वस्तुतः यह संदेश दिया है कि अस्पष्ट परिभाषाओं, एकतरफा समितियों और बिना जवाबदेही वाले अधिकारों के सहारे चलने वाला ‘न्याय’ शिक्षा को बचा नहीं सकता। वह केवल समाज में नई दरारें पैदा करेगा।

अब सवाल केवल नियमों का भी नहीं रह गया है। सवाल उस राजनीतिक और बौद्धिक अहंकार का है, जो यह मान बैठा था कि कैंपस को भय के सहारे नियंत्रित किया जा सकता है। संभवतः वे यह भूल गए कि ‘सामाजिक न्याय उद्योग’ जब शैक्षणिक परिसर में उतरता है, तो न्याय नहीं, भय सबसे पहले संगठित होता है। शिक्षा का स्पेस संवाद से खिसककर संदेह में बदल जाता है।

सुप्रीम कोर्ट का संकेत साफ है- सामाजिक न्याय भावना से नहीं, संतुलित प्रक्रिया से चलता है। जो ढाँचा भरोसा तोड़े, वह सुधार नहीं, विभाजन पैदा करता है। यूजीसी के रेगुलेशंस से यह आशंका भी गहराई कि ये नियम अकादमिक सुधार से अधिक राजनीतिक संतुलन साधने का उपकरण बन सकते हैं। कैंपस को संवाद का क्षेत्र बनाने के बजाय शिकायत आधारित संघर्ष का मैदान बना सकते हैं।

भारतीय कैंपस के अतीत को मोटे तौर पर तीन चरणों में देखा जा सकता है;

  • 1970–80 के दशक के छात्र आंदोलन
  • मंडल काल के कैंपस तनाव
  • हालिया वर्षों का वैचारिक ध्रुवीकरण

हर चरण ने एक ही बात साबित की है- कैंपस में शांति, भय और निगरानी से नहीं आती। शांति आती है निष्पक्ष संवाद, पारदर्शी प्रक्रिया और भरोसे से। यूजीसी के नए नियम इस संतुलन को तोड़ते दिख रहे थे।

यह पूरा विवाद सत्तारूढ़ राजनीति के लिए भी कसौटी है। सामाजिक न्याय का प्रश्न यदि इस रूप में उभरे कि एक वर्ग स्वयं को स्थायी आरोपित और दूसरा स्वयं को स्थायी पीड़ित मानने लगे, तो परिणाम न्याय नहीं, स्थायी सामाजिक तनाव होता है।

कुछ इसे भाजपा की कथित कास्ट बैलेंसिंग राजनीति की परीक्षा मानते हैं, तो कुछ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पुतले जलाने और उग्र नारों में राजनीतिक अवसर खोज रहे हैं। पर सच यह है कि यह परीक्षा केवल भाजपा की नहीं, पूरे नीति निर्माण तंत्र की है।

आदर्श शैक्षणिक कैंपस की कसौटी बिल्कुल स्पष्ट है- वह संवाद प्रधान हो। शिकायत से पहले संवाद हो। मेडिएशन सेल हों, जो प्रशासनिक विस्तार नहीं, बल्कि विश्वसनीय शिक्षकों और छात्रों पर आधारित हों। जहाँ शिकायतकर्ता और आरोपित- दोनों की गरिमा सुरक्षित रहे, जाँच समयबद्ध हो और झूठे आरोपों पर स्पष्ट दंड का प्रावधान हो, क्योंकि न्याय का अर्थ केवल संरक्षण नहीं, निष्पक्षता भी है।

कैंपस में असहमति को अपराध न बनाया जाए। छात्रों को सिखाया जाए कि विचारों का संघर्ष लोकतंत्र की ताकत है, उसकी कमजोरी नहीं। भावनात्मक उन्माद के बजाय तथ्यात्मक जाँच पर आधारित व्यवस्था ही स्वस्थ शिक्षा की शर्त है।

हमें यह भी याद रखना चाहिए कि कैंपस वैचारिक प्रयोगशाला नहीं हैं। वे राष्ट्र की बौद्धिक नर्सरी हैं। शिक्षक और छात्र भय में जीते हुए न पढ़ सकते हैं, न पढ़ा सकते हैं। शिक्षा स्वतंत्रता में ही फलती है।

इसीलिए सुप्रीम कोर्ट की रोक को टकराव नहीं, संशोधन का अवसर समझा जाना चाहिए। UGC के लिए भी और उनके लिए भी, जो अदालत के निर्देश के बाद सड़कों पर उतर आए हैं। यूजीसी को चाहिए कि वह नियमों को स्पष्ट करे, परिभाषाओं को सर्वसमावेशी बनाए और प्रक्रिया को दोतरफा न्याय पर आधारित करे।

कैंपस का उद्देश्य किसी वर्ग को स्थायी विजेता या स्थायी पीड़ित बनाना नहीं है। कैंपस का उद्देश्य सोचने वाला नागरिक गढ़ना है। सुप्रीम कोर्ट की रोक यही याद दिलाती है कि शैक्षणिक परिसर न वैचारिक प्रयोगशाला हैं, न राजनीतिक अखाड़े। वह सोचने वाला नागरिक गढ़ने की जगह है।

स्मरण रहे जो नीति विवेक नहीं, डर बोती है, वह शिक्षा नहीं रचती; वह समाज में वही दरार और गहरी करती है, जिसके नाम पर उसे बेचा जाता है।

50+ देश, 800+ कलाकार, 1200+ स्टॉल: 39वें सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय शिल्प मेला की हुई शूरूआत, लोकल से ग्लोबल होने पर रहेगा जोर

हरियाणा के फरीदाबाद में शनिवार (31 जनवरी 2026) से विश्व प्रसिद्ध 39वें सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर शिल्प मेले की शानदार शुरुआत हो गई है। उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने इस भव्य महोत्सव का उद्घाटन किया, जिसमें हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और केंद्रीय पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत भी शरीक हुए।

15 फरवरी 2026 तक चलने वाले इस मेले की इस बार की थीम ‘Local to Global’ रखी गई है, जिसका उद्देश्य हमारे स्थानीय कारीगरों की कला को पूरी दुनिया के सामने पेश करना है। उत्तर प्रदेश और मेघालय इस साल के ‘थीम स्टेट’ हैं, जबकि मिस्र ‘पार्टनर नेशन’ के तौर पर अपनी प्राचीन संस्कृति का जादू बिखेरेगा।

लोकल से ग्लोबल की ओर बढ़ते कदम और अंतरराष्ट्रीय भागीदारी

इस बार सूरजकुंड मेला अपने पुराने सभी रिकॉर्ड तोड़ने के लिए तैयार है। पिछले सालों के मुकाबले इस बार 50 से अधिक देशों के करीब 800 कलाकार और शिल्पकार हिस्सा ले रहे हैं। उत्तर प्रदेश और मेघालय के स्टॉल्स पर आपको वहाँ की पारंपरिक लोक कला और हथकरघा का बेहतरीन काम देखने को मिलेगा।

वहीं, मिस्र अपनी वास्तुकला और प्राचीन कलाकृतियों से पर्यटकों का मन मोहेगा। यह आयोजन न केवल मनोरंजन का केंद्र है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच पर मजबूती से खड़ा करने का एक बड़ा जरिया भी बन गया है।

हस्तशिल्प, लजीज व्यंजन और ‘मेला साथी’ ऐप की सुविधा

मेला परिसर में 1200 से अधिक स्टॉल लगाए गए हैं, जहाँ लकड़ी, मिट्टी, धातु और पत्थर से बनी खूबसूरत कलाकृतियाँ बिक्री के लिए उपलब्ध हैं। स्वाद के शौकीनों के लिए इस बार यूनिसेफ (UNICEF) की मदद से उत्तर प्रदेश के खास लजीज व्यंजनों के स्टॉल लगाए गए हैं।

पर्यटकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए ‘मेला साथी’ (Mela Sathi) नाम का एक मोबाइल ऐप भी लॉन्च किया गया है, जिसकी मदद से आप किसी भी स्टॉल की लोकेशन आसानी से खोज सकते हैं और मेले का पूरा आनंद उठा सकते हैं।

सुरक्षा के कड़े इंतजाम और सितारों से सजी सांस्कृतिक शामें

मनोरंजन के लिए इस बार कैलाश खेर, गुरदास मान और सलमान अली जैसे दिग्गज कलाकार अपनी सुरीली आवाज से समाँ बांधेंगे। हरियाणा की मिट्टी से जुड़े पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूँज भी हर शाम सुनाई देगी।

मेले के लिए करीब 7 करोड़ रुपए की लागत से बुनियादी ढाँचे को और मजबूत किया गया है, जिसमें नए हाट और मनोरंजन क्षेत्र शामिल हैं। सुरक्षा के लिहाज से पूरे परिसर में चप्पे-चप्पे पर सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं और ट्रैफिक को सुचारू रखने के लिए खास पार्किंग व्यवस्था व रूट डायवर्जन भी किया गया है।

सुरक्षा और ट्रैफिक के पुख्ता इंतजाम

मेले के सफल आयोजन के लिए बुनियादी ढाँचे पर करीब 7 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं, जिसमें 127 नए हाट और मनोरंजन क्षेत्र का निर्माण शामिल है। सुरक्षा के लिए पूरे परिसर में भारी संख्या में CCTV कैमरे लगाए गए हैं। ट्रैफिक को सुचारू रखने के लिए फरीदाबाद में 31 जनवरी से 15 फरवरी तक भारी वाहनों की ‘नो-एंट्री’ रहेगी। पर्यटकों के लिए ईरोज सिटी, हेलीपैड और लेकवुड सिटी में पार्किंग की विशेष व्यवस्था की गई है।

सुनेत्रा पवार बनीं महाराष्ट्र की पहली महिला डिप्टी CM, अजित पवार की विरासत बढ़ाएँगी आगे: क्या शरद पवार ग्रुप करने वाला था NCP पर कब्जा?

महाराष्ट्र की राजनीति में शनिवार (31 जनवरी 2026) को एक ऐतिहासिक पल आया, जब राज्यसभा सांसद सुनेत्रा पवार ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। वह महाराष्ट्र की पहली महिला डिप्टी सीएम बन गई हैं। शपथ ग्रहण के दौरान समर्थकों ने ‘अजित दादा अमर रहे’ के नारे भी लगाए।

यह शपथ ग्रहण समारोह मुंबई में हुआ, जिसमें मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उप मुख्यमंत्री एकनाश शिंदे और महायुति के अन्य नेता मौजूद रहे। दिवंगत अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार ने शाम 5.05 बजे इस पद पर अपने पति की जगह ली, जिनकी 28 जनवरी 2026 को बारामती में प्लेन क्रैश में दुखद मौत हो गई थी।

सुनेत्रा पवार को डिप्टी सीएम बनाने के इस फैसले ने एनसीपी (अजित गुट) को मजबूती दी, लेकिन शरद पवार गुट में हैरानी और नाराजगी पैदा की। सूत्रों के मुताबिक, यह कदम सिर्फ पद भरने का नहीं, बल्कि पार्टी पर नियंत्रण बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा है।

शपथ से पहले विधायक दल की बैठक में बनी सर्वसम्मति

मुंबई में शनिवार (31 जनवरी 2026) को दोपहर 2 बजे एनसीपी (अजित गुट) के विधायकों की बैठक विधान भवन में हुई। इसमें सुनेत्रा पवार को सर्वसम्मति से विधायक दल का नेता चुना गया। पार्टी नेता दिलीप वलसे पाटिल ने उनका नाम प्रस्तावित किया, जिसे सभी ने समर्थन दिया। इसके बाद मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर सुनेत्रा को डिप्टी सीएम बनाने की सिफारिश की गई।

प्रफुल्ल पटेल, सुनील तटकरे और छगन भुजबल जैसे वरिष्ठ नेताओं ने यह प्रक्रिया तेजी से पूरी की। विधायक सना मलिक ने कहा, “पिछले दो दिनों से कार्यकर्ता और नेता यही माँग कर रहे थे कि सुनेत्रा को दादा (अजित पवार) की जगह लाया जाए।”

बहरहाल, सुनेत्रा पवार ने अब डिप्टी सीएम पद की शपथ ले ली है। उन्होंने शपथ ग्रहण से पहले राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। हालाँकि सुनेत्रा अभी विधानसभा या विधान परिषद की सदस्य नहीं हैं, इसलिए उन्हें 6 महीने में चुनाव लड़ना होगा।

NCP को शरद पवार गुट के कब्जे से बचाना मुख्य वजह

सूत्र बताते हैं कि सुनेत्रा को इतनी जल्दी सत्ता के केंद्र में लाने का बड़ा कारण एनसीपी (अजित गुट) को बचाना है। अजित पवार के निधन से पहले दोनों गुटों के विलय की बातें जोरों पर थीं। शरद पवार गुट के नेता जयंत पाटिल, एकनाथ खड़से और अनिल देशमुख ने दावा किया कि विलय लगभग तय था। अजित पवार खुद 12 फरवरी को घोषणा करने वाले थे।

अजित पवार के विमान हादसे में निधन के बाद महाराष्ट्र की राजनीति शोक में थी, लेकिन सियासी गलियारों में एक और चर्चा तेज हो चुकी थी। एनसीपी के दोनों गुटों के विलय की। एनसीपी (शरद पवार) गुट के वरिष्ठ नेताओं ने दावा किया कि यह सिर्फ चर्चा नहीं थी, बल्कि तीन-चार महीनों से बातचीत चल रही थी। यहाँ तक कहा गया कि अजित पवार की आखिरी इच्छा भी यही थी कि पार्टी एक हो और शरद पवार के जन्मदिन तक यह ‘तोहफा’ दिया जाए। सवाल ये है कि अजित पवार की मौत के तुरंत बाद उनकी आखिरी इच्छा को क्यों सामने रखा गया?

ऐसे में अजित गुट को डर था कि विलय हुआ तो पार्टी पर शरद पवार की पकड़ मजबूत हो जाएगी और उनका गुट हाशिए पर चला जाएगा। प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे जैसे नेता नहीं चाहते थे कि पार्टी फिर शरद पवार के हाथ में जाए। इसलिए सुनेत्रा को डिप्टी सीएम बनाकर गुट को मजबूत केंद्र दिया गया। यह महायुति की सोची-समझी रणनीति है, ताकि एनसीपी पर संतुलन बना रहे।

शरद पवार का हैरानी भरा बयान- मुझे कोई जानकारी नहीं

शरद पवार ने शपथ ग्रहण पर हैरानी जताई। उन्होंने कहा, “मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। यह उनकी पार्टी का आंतरिक फैसला होगा। प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे ने शायद तय किया हो।” उन्होंने विलय पर कहा, “पिछले चार महीने से बात चल रही थी। अजित और जयंत पाटिल नेतृत्व कर रहे थे। अजित की इच्छा थी कि दोनों दल साथ आएँ, लेकिन अब कुछ कहा नहीं जा सकता।”

शरद पवार ने इशारा किया कि जल्दबाजी हुई है। उन्होंने कहा, “अजित के प्लेन क्रैश ने विलय की बात रोक दी।” शरद पवार और सुप्रिया सुले शपथ समारोह में नहीं गए। इससे परिवार में नाराजगी साफ दिखी। शरद पवार ने यह भी कहा कि परिवार की नई पीढ़ी विरासत आगे बढ़ाएगी, लेकिन सत्ता की मौजूदा संरचना में वे खुद हाशिए पर महसूस कर रहे हैं।

सिर्फ विलय रोकना ही नहीं, कई अन्य कारण भी हैं। सुनेत्रा पवार के डिप्टी सीएम बनने से 4 अहम संदेश NCP समर्थकों में गया है-

अजित पवार की राजनीतिक विरासत को परिवार में रखना। सुनेत्रा बारामती से जुड़ी हैं और 2024 लोकसभा चुनाव लड़ चुकी हैं। कार्यकर्ता उन्हें ‘वहिनी’ कहते हैं और उनकी माँग थी कि विरासत जारी रहे।

महायुति गठबंधन में स्थिरता। अजित के निधन से एनसीपी कमजोर हो सकती थी, जिसका फायदा विपक्ष को मिलता। सुनेत्रा को लाकर गठबंधन मजबूत हुआ।

महिला नेतृत्व को बढ़ावा। महाराष्ट्र में पहली महिला डिप्टी सीएम बनना बड़ा संदेश है।

  1. कार्यकर्ताओं का मनोबल मजबूत हुआ। शोक में डूबे कार्यकर्ताओं को नया चेहरा मिला।

सुनेत्रा पवार के बारे में 10 अहम बातें

  1. जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि: सुनेत्रा पवार का जन्म 18 अक्टूबर 1963 को महाराष्ट्र के धाराशिव (पूर्व ओसमानाबाद) में एक राजनीतिक परिवार में हुआ था। उनके पिता और भाई पद्मसिंह पाटिल भी सक्रिय राजनेता रहे, जिससे बचपन से ही सार्वजनिक जीवन का माहौल मिला।

शिक्षा और शुरुआती जीवन: सुनेत्रा ने औरंगाबाद से कॉमर्स में स्नातक की डिग्री हासिल की। 1985 में अजित पवार से शादी के बाद वे बारामती में बस गईं और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हुईं।

स्वच्छता और ग्रामीण विकास की शुरुआत: उन्होंने पवार परिवार के पैतृक गाँव काठेवाडी में स्वच्छता अभियान चलाया, जहाँ खुले में शौच की समस्या दूर की। बाद में निर्मल ग्राम अभियान के तहत 86 गांवों में सेल्फ हेल्प ग्रुप्स के जरिए स्वच्छता को बढ़ावा दिया।

पर्यावरण संरक्षण में योगदान: 2010 में एनवायरमेंटल फोरम ऑफ इंडिया एनजीओ की स्थापना की और इको-विलेज कॉन्सेप्ट को भारत में लोकप्रिय बनाया। पर्यावरण जागरूकता और सस्टेनेबल डेवलपमेंट पर उनका फोकस ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ा बदलाव लाया।

टेक्सटाइल उद्योग में नेतृत्व: सुनेत्रा पवार बारामती हाई टेक टेक्सटाइल पार्क (2008) की चेयरपर्सन हैं, जहाँ 15,000 से ज्यादा लोगों को रोजगार मिला, ज्यादातर महिलाओं को। यह प्रोजेक्ट केंद्र सरकार की स्कीम से जुड़ा और महिलाओं के सशक्तिकरण का बड़ा उदाहरण बना।

शिक्षा क्षेत्र में भूमिका: सुनेत्रा पवार विद्या प्रतिष्ठान की ट्रस्टी हैं, जो शरद पवार द्वारा स्थापित संस्था है और हजारों छात्रों को शिक्षा देती है। साल 2017 से सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी की सीनेट मेंबर के रूप में शिक्षा सुधारों में योगदान दे रही हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रियता: सुनेत्रा पवार साल 2011 से फ्रांस के वर्ल्ड एंटरप्रेन्योरशिप फोरम की थिंक टैंक मेंबर हैं। वो सस्टेनेबल डेवलपमेंट और उद्यमिता पर वैश्विक चर्चाओं में भारत का प्रतिनिधित्व करती रही हैं।

राजनीति में प्रवेश: लंबे समय तक बैकग्राउंड में रहने के बाद 2024 में सक्रिय राजनीति में आईं। बारामती से लोकसभा चुनाव लड़ा, हालाँकि हार गईं, लेकिन पवार परिवार की विरासत को आगे बढ़ाया।

राज्यसभा सांसद के रूप में भूमिका: एनसीपी से राज्यसभा सांसद चुनी गईं और संसद में महाराष्ट्र के मुद्दों पर आवाज उठाती हैं। सामाजिक और पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर उनकी सक्रियता संसदीय चर्चाओं में दिखती है।

वर्तमान में डिप्टी सीएम की जिम्मेदारी: अजित पवार के निधन के बाद महाराष्ट्र की पहली महिला उपमुख्यमंत्री बनीं। पार्टी और परिवार की विरासत को संभालते हुए ग्रामीण विकास, महिला सशक्तिकरण और पर्यावरण पर फोकस जारी रख रही हैं।

विलय की बात अब ठंडे बस्ते में, अब आगे क्या?

शपथ के बाद विलय की अटकलें थम गई हैं। अजित गुट चुप है, जबकि शरद गुट कह रहा है कि बात रुक गई। यह घटना महाराष्ट्र की राजनीति में नया मोड़ है। एक तरफ परिवार की विरासत सुनेत्रा पवार ने बचा ली है, तो दूसरी तरफ NCP के दोनों गुटों की दूरी और बढ़ गई है। वहीं, माना जा रहा है कि शरद पवार अब अपनी रणनीति के अगले पड़ाव को लेकर विचार कर रहे हैं।

मद्रास HC ने DMK सरकार के आदेश को किया रद्द, ऐतिहासिक कल्लाझागर मंदिर फंड के कॉमर्शियल इस्तेमाल की दी थी अनुमति: पढ़ें कोर्ट ने क्या कहा

मद्रास हाई कोर्ट (मदुरै बेंच) ने तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें मदुरै जिले के ऐतिहासिक कल्लाझागर मंदिर के अतिरिक्त (सरप्लस) धन का उपयोग व्यावसायिक गतिविधियों के लिए करने की अनुमति दी गई थी।

कोर्ट ने 23 जनवरी 2026 को स्पष्ट कहा कि मंदिरों को विकास परियोजनाओं की तरह नहीं देखा जा सकता और ‘विकास’ के नाम पर होने वाली कोई भी गतिविधि मंदिर की धार्मिक भावना और मंदिर प्रशासन से जुड़े कानून के अनुरूप ही होनी चाहिए।

जस्टिस अनीता सुमंत और जस्टिस सी कुमारप्पन की डिवीजन बेंच ने 8 मार्च 2024 को जारी उस सरकारी आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मंदिर के धन से रेस्टोरेंट, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, कॉटेज और अन्य व्यावसायिक सुविधाओं के निर्माण की अनुमति दी गई थी।

बेंच ने कहा कि यह आदेश कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है और तमिलनाडु हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती (HR&CE) अधिनियम के कई प्रावधानों का उल्लंघन करता है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह एक चिंताजनक प्रवृत्ति है, जहाँ राज्य मंदिर संसाधनों को अपना समझकर वैधानिक प्रक्रिया अपनाए बिना उपयोग करना चाहता है।

कोर्ट ने कहा- मंदिर का विकास उसकी धार्मिक भावना के अनुरूप होना चाहिए

फैसला सुनाते हुए हाई कोर्ट ने साफ किया कि मंदिर व्यावसायिक स्थान नहीं हैं और इन्हें इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट की तरह नहीं बदला जा सकता। जजों ने HR&CE विभाग के रवैये की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि विभाग का मुख्य काम मंदिरों की रक्षा और संरक्षण करना है, न कि उन्हें कमाई का साधन बनाना।

कोर्ट ने कहा कि HR&CE अधिनियम की धाराएँ 35, 36, 66, 67 और 86 तथा ‘सरप्लस फंड उपयोग नियम’ यह स्पष्ट करते हैं कि मंदिर के रखरखाव का खर्च केवल वर्तमान आय से होना चाहिए, न कि वर्षों से जमा अतिरिक्त धन से। कोर्ट ने कहा कि राज्य ने मंदिर के रिजर्व फंड को गैर-जिम्मेदाराना और अवैध तरीके से खर्च किया है, जो कानून का उल्लंघन है।

बेंच ने यह भी कहा कि विभाग ने कल्लाझागर मंदिर को एक प्रोजेक्ट की तरह देखा, जिसे आधुनिक विकास और अपग्रेडेशन की जरूरत है, जबकि ऐसे विचार मंदिर की प्रकृति से ही अलग हैं। कोर्ट ने माना कि भक्तों के लिए बुनियादी सुविधाएँ जरूरी हैं, लेकिन ऐसा करते समय मंदिर की आध्यात्मिक पहचान से समझौता नहीं होना चाहिए और न ही कानूनी सुरक्षा को दरकिनार किया जा सकता।

बजट मंजूरी के बिना मंदिर धन का अवैध उपयोग

सरकारी आदेश रद्द करने का एक बड़ा कारण यह था कि HR&CE अधिनियम के तहत अनिवार्य बजट और मंजूरी की प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि करोड़ों रुपए का खर्च मंदिर के ट्रस्टी बोर्ड की अनुमति और उचित बजट बनाए बिना तय कर लिया गया।

बेंच ने बताया कि धारा 86 के तहत बजट प्रक्रिया में HR&CE आयुक्त की जाँच, विचार-विमर्श, स्पष्टीकरण और अवैध खर्च को हटाने की व्यवस्था है, लेकिन यहाँ इनमें से कुछ भी नहीं किया गया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि ट्रस्टियों ने खर्च की आवश्यकता या वैधता पर गंभीरता से विचार किया हो।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि धार्मिक संस्थाओं के धन को व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए बिना उचित मंजूरी और निगरानी के मोड़ा नहीं जा सकता, खासकर जब इसमें करोड़ों रुपये शामिल हों।

मंदिर के अतिरिक्त धन में तेज गिरावट ने बढ़ाई चिंता

कोर्ट ने मंदिर के जमा अतिरिक्त धन में तेजी से आई कमी पर गंभीर चिंता जताई। ऑडिट खातों के अनुसार, मंदिर का सरप्लस मार्च 2021 में 96.6 करोड़ था, जो मार्च 2023 तक बढ़कर 107.60 करोड़ हो गया, लेकिन मार्च 2024 में यह तेजी से घटकर 62.37 करोड़ रह गया।

कोर्ट ने कहा कि यह गिरावट बिना बजट और बिना कानूनी मंजूरी के खर्च का नतीजा है। बेंच ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह देवता के खिलाफ अपराध है और यह स्थिति ‘खेत की रखवाली करने वाला ही फसल खाने’ जैसी है। कोर्ट के अनुसार, यह सिर्फ अवैध नहीं बल्कि मंदिर प्रबंधन में विश्वासघात भी है।

ट्रस्टी बोर्ड की अनुपस्थिति से आदेश की वैधता कमजोर

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि मंदिर के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज का कार्यकाल समाप्त हो चुका था और कानून के अनुसार नया बोर्ड गठित नहीं किया गया। HR&CE अधिनियम की धारा 46 के तहत नया बोर्ड बनाना जरूरी है, लेकिन ऐसा करने के कोई प्रमाण नहीं मिले। कोर्ट ने कहा कि ‘फिट पर्सन’ या कार्यकारी अधिकारी स्थायी रूप से ट्रस्टियों की जगह नहीं ले सकते।

बेंच ने साफ कहा कि ऐसे मंदिरों का संचालन अधिकारियों द्वारा नहीं, बल्कि ट्रस्टी बोर्ड द्वारा होना चाहिए। ट्रस्टी बोर्ड के बिना मंदिर वित्त से जुड़े फैसले और भी ज्यादा अवैध और कमजोर हो जाते हैं।

मंदिर सरकारी संपत्ति नहीं है, कोर्ट ने राज्य को दिलाया याद

हाई कोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि मंदिर राज्य का हिस्सा या सरकारी विभाग नहीं हैं। बेंच ने स्पष्ट किया कि राज्य मंदिर की संपत्ति को अपना नहीं समझ सकता और न ही मंदिर के धन का उपयोग सरकार द्वारा सोची गई परियोजनाओं में कर सकता है।

कोर्ट ने राज्य की ‘आइकोनिक टेंपल डेवलपमेंट स्कीम’ की आलोचना करते हुए कहा कि विकास मंदिर और भक्तों की जरूरतों से निकलना चाहिए, न कि राजनीतिक घोषणाओं या एक जैसे मॉडल से। कोर्ट ने कहा कि मंदिर आस्था के स्थान हैं, प्रशासनिक प्रयोग के विकास प्रोजेक्ट नहीं।

कैसे हुई विवाद की शुरुआत?

यह विवाद 8 मार्च 2024 को जारी सरकारी आदेश और 11 अक्टूबर 2024 के कार्य आदेश से शुरू हुआ। इन आदेशों के तहत लगभग 40 करोड़ के सिविल कार्यों को मंजूरी दी गई थी। इस परियोजना में मंदिर परिसर में गेस्ट हाउस, डॉर्मिटरी, दुकानें, भोजनालय, पार्किंग सुविधा, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, पुजारियों के क्वार्टर और मंदिर संरचनाओं के नवीनीकरण जैसे कार्य शामिल थे।

इसके खिलाफ कई याचिकाएँ दायर की गईं, जिनमें कहा गया कि मंदिर धन का गलत उपयोग हो रहा है, ट्रस्टी बोर्ड की मंजूरी नहीं ली गई और HR&CE अधिनियम का उल्लंघन हुआ। सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने सरकारी आदेश और कार्य आदेश दोनों को रद्द कर दिया। साथ ही मंदिर के रख-रखाव और वसंत मंडपम की प्रसिद्ध भित्ति चित्रों के संरक्षण के निर्देश भी दिए।

अरुलमिघु नंदीश्वरर शिवन मंदिर: पहले भी आया था ऐसा ही मामला

यह पहली बार नहीं है जब मद्रास हाई कोर्ट ने मंदिर धन के व्यावसायिक उपयोग को रोका है। जनवरी 2025 में कोर्ट ने अरुलमिघु नंदीश्वरर शिवन मंदिर में शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बनाने की योजना भी रद्द कर दी थी। मुख्य जज केआर श्रीराम और जस्टिस सेंथिलकुमार राममूर्ति की बेंच ने कहा था कि संपन्न मंदिरों के अतिरिक्त धन का उपयोग शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बनाने में नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा था कि ऐसा निर्माण मंदिर की धार्मिक शिक्षाओं का प्रचार नहीं करता, जैसा कि HR&CE अधिनियम की धारा 66 में जरूरी है। बेंच ने चेतावनी दी थी कि व्यावसायिक निर्माण से मुकदमे, किराएदार विवाद और अतिक्रमण जैसी समस्याएँ पैदा हो सकती हैं, जबकि धन को सुरक्षित निवेश में रखा जाए तो निश्चित लाभ मिल सकता है।

उस मामले में भी कोर्ट ने सरकार की योजना रद्द करते हुए सुझाव दिया था कि धन का उपयोग गरीब हिंदुओं के विवाह, जरूरतमंदों को भोजन कराने और देशी पेड़ लगाने जैसे धार्मिक उद्देश्यों में किया जाए।

मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रृति सागर ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

शरजील इमाम के लिए दिल्ली प्रेस क्लब में फिर से वही रटा-रटाया रोना, फैलाया एकतरफ फर्जी नरेटिव: जानें- ‘सेक्युलर-लिबरल’ गैंग के दावों की हकीकत

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में गुरुवार (29 जनवरी 2026) को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई, जो UAPA के तहत गिरफ्तार शरजील इमाम की गिरफ्तारी के छह साल पूरे होने के अवसर पर थी। इस मौके पर कई वक्ताओं ने उसके मामले को न्यायिक दुरुपयोग और असहमति को दबाने के लिए राज्य दमन का स्पष्ट उदाहरण बताया।

कार्यक्रम की शुरुआत सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने की, जिन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों के पतन की आलोचना की और इमाम की लंबी जेल यात्रा को नागरिकता संशोधन कानून जैसे कानूनों के विरोध करने वालों को चुप कराने की रणनीति बताया।

इसके बाद द वायर से जुड़ी वकील रश्मि सिंह ने अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि इमाम के भाषणों को गलत तरीके से देशद्रोही बताकर पेश किया गया, जबकि वे केवल शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का समर्थन करते थे। उन्होंने लंबित मामलों के बीच जमानत को एक मौलिक अधिकार के रूप में भी पेश किया।

शरजील इमाम के भाई मुजम्मिल इमाम ने अपने अनुभव साझा किए और कथित पुलिस क्रूरता की घटनाओं का जिक्र किया, जो उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय के खिलाफ लक्षित उत्पीड़न का प्रतिनिधित्व करती हैं।

राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा ने राजनीतिक दृष्टिकोण से टिप्पणी की और UAPA जैसे कानूनों के संसदीय दुरुपयोग की आलोचना करते हुए नागरिक स्वतंत्रताओं की सुरक्षा के लिए बदलाव की आवश्यकता बताई।

पत्रकार सबा नकवी ने बताया कि किस तरह आतंकवाद विरोधी कानूनों का इस्तेमाल अल्पसंख्यकों के खिलाफ हथियार के रूप में किया जा रहा है। पत्रकार आदित्य मेनन ने इमाम की शैक्षणिक पृष्ठभूमि पर जोर दिया और कहा कि उनकी जेल यात्रा से होने वाला बौद्धिक नुकसान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए खतरनाक मिसाल पेश करता है। सेवानिवृत्त दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिता नारायण ने भी भाषण दिया, जिसमें न्यायिक प्रणाली में कथित अन्याय पर ध्यान केंद्रित किया गया।

कोर्ट के निर्णयों और पृष्ठभूमि की समीक्षा से यह संकेत मिलता है कि मामला पूरी तरह अन्याय का नहीं, बल्कि कानूनी जवाबदेही से जुड़ा है, हालाँकि उनके साझा किए गए कथन में इमाम को बदले की भावना वाले सिस्टम का पीड़ित दर्शाया गया है।

शरजील इमाम पर होने वाले कथित कार्यक्रम की जाँच

अपने उद्घाटन भाषण में, जो मानवाधिकारों की चिंता से प्रेरित था, हर्ष मंदर ने दिल्ली पुलिस पर 2020 की दंगों को आरोपित की साजिश के रूप में पेश करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि अगर पुलिस जल्दी कार्रवाई करती तो हिंसा आसानी से रोकी जा सकती थी।

मंदर ने स्वीकार किया कि उन्होंने दिसंबर 2019 में जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों के कथित रूप से पुस्तकालय में पीटने के अगले दिन भी इसी तरह का भाषण दिया था, लेकिन उन्होंने बताया कि उमर खालिद ने समान विचारों को अधिक कुशलता से दिखाया और वह अभी भी स्वतंत्र हैं, जबकि खालिद जेल में हैं।

मंदर ने खालिद की सराहना की कि उन्होंने गाँधीवादी अहिंसा पर जोर दिया और सांप्रदायिक सद्भाव बढ़ाने का प्रयास किया, लेकिन उन्होंने ‘आतंक’ और ‘सांप्रदायिक हिंसा’ के बीच अस्पष्ट अंतर किया।

उन्होंने कहा कि अगर किसी मुस्लिम समूह ने हमला किया तो इसे आतंकवादी हमला कहा जा सकता है, जबकि हिंदू समूह को गौ रक्षक, रामभक्त या स्वयंसेवक कहकर नजरअंदाज किया जा सकता है।

मंदर ने खालिद के साथ उनकी अंतरिम जमानत के दौरान हुई हाल की फोन बातचीत का भी जिक्र किया, जिसमें खालिद ने देश की खराब स्थिति पर ईमानदार चर्चा करने की इच्छा व्यक्त की।

अंत में मंदर ने भारत के कुछ सबसे होशियार दिमागों और संवेदनशील लोगों की जेल यात्रा की आलोचना की और शरजील इमाम व खालिद को युवा पीढ़ी के लिए ‘रोल मॉडल’ बताया।

हालाँकि, यह विवरण गहन जाँच की माँग करता है। दिल्ली हाई कोर्ट के 2022 के दस्तावेजों से पता चलता है कि खालिद के भाषण, अहिंसा के दावे के बावजूद, तनाव बढ़ने पर सार्वजनिक अशांति पैदा करने की प्रवृत्ति रखते थे।

प्रारंभिक सबूत उनके अन्य साथियों के मामले में साजिश में उनकी भूमिका में अंतर को सामने लाते हैं, जिन्हें राहत मिली थी। न्यायपालिका द्वारा खालिद की जमानत लगातार अस्वीकृत करने से भाषण की सामग्री और संदर्भ में महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट होते हैं, जैसे कॉल लॉग जैसी फोरेंसिक कनेक्शन जो उनके उत्तेजक भाषण को 53 मौतों वाले दंगों से जोड़ती हैं।

पुलिस की प्रतिक्रिया के संदर्भ में, आधिकारिक दस्तावेज दावा करते हैं कि यह हिंसा एक संगठित ‘रेजिम चेंज ऑपरेशन’ थी, जो एंटी-CAA विरोध के दौरान की गई थी और इसे साधारण दमन के रूप में नहीं देखा जा सकता। खालिद की व्यक्तिगत चर्चा की आशाएँ सुप्रीम कोर्ट द्वारा जनवरी 2026 में उसकी जमानत खारिज करने के फैसले में स्थापित सबूतों को प्रभावित नहीं करतीं।

रश्मि सिंह का विश्लेषण, जिसमें उन्होंने बताया कि इमाम का ‘चक्का जाम’ का आह्वान किसी हिंसक उद्देश्य पर आधारित नहीं था और इसलिए इसे देशद्रोह नहीं माना जाना चाहिए, उनके द वायर में प्रकाशित लेखों पर आधारित है, जिसमें उन्होंने कहा कि इमाम गलत समझे जाने की कीमत चुका रहे हैं।

हालाँकि, यह दृष्टिकोण उनके बयानों के पूरे संदर्भ को नजरअंदाज करता है, जो साधारण विरोध प्रदर्शन से लेकर क्षेत्रों के रणनीतिक अलगाव (चिकन नेक) तक के सुझावों तक फैले थे और इसके जरिए अलगाववादी खतरे का भी संकेत दिया।

आरोपों की रूप रेखा

आरोपों की रूपरेखा बढ़ते तनाव की समयरेखा को सामने लाती है, जिसने फरवरी 2020 के हिन्दू विरोधी दिल्ली दंगों को जन्म दिया, जिसमें सांप्रदायिक झड़पों में 53 लोग मारे गए। अभियोजक कॉल रिकॉर्ड और चैट जैसी सबूतों का उपयोग करके इमाम को कथित साजिश से जोड़ते हैं, लेकिन रश्मि सिंह और अन्य इसे झूठा बताते हैं।

विडंबना यह है कि इस तरह की रक्षा में जमानत पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया जाता है, लेकिन उसी कोर्ट के मूल्यांकन को खारिज कर दिया जाता है कि इमाम और उनके सह-आरोपित उमर खालिद ‘मौजूदा सबूतों के आधार पर गुणात्मक रूप से अलग स्थिति’ में हैं। इससे साफ होता है कि चयनात्मक गुस्सा दिखाई देता है और अशांत समय में भाषणों के संभावित प्रभाव को नज़रअंदाज करना कानूनी वास्तविकता को सरल बना सकता है।

मुजम्मिल इमाम का 2020 के अपने पूछताछ का नाटकीय विवरण, जिसमें पुलिस ने कथित रूप से उन्हें निर्वस्त्र किया, पीटा, पिस्टल मुँह में ठूँस दी और अपमानजनक रिकॉर्डिंग की, परिवार की कठिनाइयों को व्यक्तिगत रूप देने और कथित मुसलमान विरोधी पक्षपात को उजागर करने के लिए था। हालाँकि, इन दावों की आधिकारिक रिकॉर्ड में पुष्टि नहीं हुई है।

मुजम्मिल की संक्षिप्त हिरासत दंगों के वित्तपोषण और समन्वय की जाँच के दौरान हुई, जिसमें इमाम पर डिजिटल सबूतों के आधार पर आरोप है। सुप्रीम कोर्ट ने जमानत खारिज करते समय प्रतिशोध पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि प्रारंभिक सबूतों पर ध्यान केंद्रित किया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि शुद्ध पीड़ित होने की कहानी प्रेस कॉन्फ्रेंस में अधिक आकर्षक हो सकती है।

लेकिन न्यायालय में उतनी प्रासंगिक नहीं है। यह एक पैटर्न को दर्शाता है जिसमें परिवार की गवाही नाटकीयता बढ़ाती है, लेकिन चल रही जाँच के दौरान निर्दोष साबित करने में कोई योगदान नहीं देती।

मनोज कुमार झा का हस्तक्षेप विधायी दृष्टिकोण वाला था। उन्होंने इमाम और खालिद को जमानत न देने के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर सवाल उठाया और पाँच साल से अधिक समय तक हिरासत में रहने के बावजूद मामले में कोई महत्वपूर्ण न्यायिक प्रगति न होने को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए चिंता का विषय बताया, जिसे उन्होंने आपराधिक न्याय प्रणाली पर चोट के रूप में वर्णित किया। उन्होंने उदाहरण के तौर पर ‘चक्का जाम’ का जिक्र किया, जो गर्ल्स हॉस्टल की टूट चुकी दीवार को बदलने के काम में रोड़ा बन गया और इसे इमाम के मामले में सड़क अवरोध जैसी स्थिति के समान बताया।

हालाँकि, इस आपत्ति को न्यायिक तर्क के साथ संतुलित करना आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में स्पष्ट कहा कि इमाम और खालिद ‘गुणात्मक रूप से अलग स्थिति’ में हैं, क्योंकि प्रारंभिक सबूत (prima facie evidence) मौजूद हैं और यही कारण है कि जमानत खारिज की गई, भले ही हिरासत का समय लंबा हो चुका हो।

कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, इमाम ने चिकन नेक मार्ग को ब्लॉक करने और असम एवं पूर्वोत्तर को अलग करने के संदर्भ में टिप्पणियाँ की थीं, जिसे कोर्ट ने संप्रभुता को खतरे में डालने वाला माना, न कि साधारण चक्का जाम, जिससे संवेदनशील भू-राजनीतिक स्थिति में सक्रियता की सीमाओं पर सवाल उठते हैं।

झा के शब्द इमाम के मामले में कुछ विशेष दावों, जैसे कि फोरेंसिक सबूतों से जुड़े दंगे की साजिश को कम महत्व देते हैं, जिसे कोर्ट ने पारंपरिक जमानत मिसालों को पलटने के लिए पर्याप्त माना।

सबा नकवी का भाषण मुख्य रूप से मुस्लिम असहमति पर आतंकवाद विरोधी कानूनों के प्रणालीगत हथियार के रूप में इस्तेमाल पर केंद्रित था। उन्होंने खालिद जैसे मामलों का हवाला देते हुए बताया कि अल्पसंख्यक ऐसी नीतियों (जैसे CAA) का विरोध करते समय असमान जाँच और कठोर दंड झेलते हैं।

उन्होंने कहा कि ऐसे कानून वैध विरोध प्रदर्शनों को दंडित करते हैं, जिससे सामाजिक अलगाव और लोकतांत्रिक स्थानों की हानि होती है। नकवी ने यह भी स्वीकार किया कि भेदभाव 2014 के बाद शुरू नहीं हुआ, बल्कि उससे पहले भी मौजूद था।

उनके द्वारा अलगाव पर जोर, सामाजिक-राजनीतिक बहस में सही है, जटिल साजिश मामलों में जमानत निर्णयों को प्रभावित करने वाले साक्ष्य मानकों की भूमिका को नजरअंदाज कर सकता है।

आदित्य मेनन ने इमाम की विद्वत्ता और अकादमिक योग्यता की सराहना की और उनकी जेल यात्रा को विद्वान चर्चा के लिए भयावह नुकसान और युवा मनों में स्वतंत्र अभिव्यक्ति को दबाने वाली मिसाल बताया, खासकर उन लोगों में जो इस्लामोफोबिया पर सवाल उठाते हैं।

उन्होंने इमाम के बयानों की तुलना 2008 के अमरनाथ विरोध प्रदर्शन जैसी अहिंसक आंदोलनों से की, यह कहते हुए कि ये बयानों रणनीतिक ब्लॉकेड के रूपक थे, न कि देशद्रोह और इमाम को मुस्लिम राजनीतिक सक्रियता का प्रतीक बताया, जबकि लोकतांत्रिक स्थान सिकुड़ रहे हैं। मेनन ने बताया कि ऐसे हालात अल्पसंख्यकों की राजनीतिक प्रभावशीलता को सीमित करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने जमानत की खारिज

हालाँकि, इस प्रशंसात्मक दृष्टिकोण की न्यायिक व्याख्या के साथ तुलना आवश्यक है। 2022 में दिल्ली की कोर्ट ने देशद्रोह के आरोप तय किए, जिसमें ‘चिकन नेक’ का उदाहरण ऐसे बयानों के रूप में देखा गया जो देश की एकता के लिए हानिकारक थे, जबकि अमरनाथ का संदर्भ इसी प्रकार के भौगोलिक प्रभाव नहीं रखता।

अभियोजकों के सबूत, जैसे दंगों के समन्वय से जुड़े लिंक, प्रारंभिक सबूत के रूप में पर्याप्त माने गए, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने जमानत अस्वीकार करते हुए पुष्ट किया और गुणात्मक अंतर को को दिखाया। शरजील इमाम की अकादमिक योग्यता उन्हें ऐसे भाषणों के लिए न्यायिक जाँच से बचाती नहीं है, जिन्हें कोर्ट ने अशांति के समय में द्वेष पैदा करने वाला माना, खासकर जिन परिस्थितियों में मौतें हुईं।

नंदिता नारायण ने भारतीय सरकार की न्याय प्रणाली में कथित दोहरे मानकों का दावा किया, यह कहते हुए कि UAPA जैसे कानून मुस्लिम सक्रियकों और इमाम जैसे विद्वानों के खिलाफ ‘चयनात्मक रूप से लागू’ किए जाते हैं, जबकि बाकी कार्यों के लिए अन्य लोगों पर कार्रवाई नहीं होती।

उन्होंने इमाम की गिरफ्तारी को अल्पसंख्यकों की अकादमिक स्वतंत्रता और असहमति दबाने के पैटर्न का हिस्सा बताया। नारायण ने गाजा में इजराइल के कार्यों की तुलना भारत के अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार से की और हिटलर द्वारा शत्रुता की भावना का राजनीतिक लाभ उठाने के उदाहरण का हवाला दिया, वर्तमान प्रशासन की रणनीतियों की तुलना ऐसे विभाजनकारी प्रयासों से की। नारायण ने अन्याय का मुकाबला करने के लिए एकजुटता की अपील और इमाम को नैतिक विरोध का उदाहरण बताया।

इस आलोचना के लिए सावधानी जरूरी है, क्योंकि UAPA का उपयोग अल्पसंख्यकों के अलावा अन्य मामलों में भी किया गया है, जैसे एल्गर परिषद जाँच में गैर-मुस्लिम आरोपित। इमाम के क्षेत्रीय अवरोध पर किए गए विशेष बयानों को कोर्ट के दस्तावेजों, जैसे 2022 के दिल्ली कोर्ट के फैसले में, केवल अकादमिक अभिव्यक्ति नहीं बल्कि आरोप का आधार माना गया।

साजिश के आरोपों का समर्थन संपर्क ट्रेल जैसे सबूतों से होता है। जबकि अकादमिक स्वतंत्रता की चिंताएँ वैध हैं, भारत की बहुदलीय लोकतंत्र, जहाँ चुनाव, स्वतंत्र प्रेस और न्यायिक निगरानी जारी है, उसकी तुलना नाजी जर्मनी के तानाशाही या इजराइल की गाजा नीति जैसी भू-राजनीतिक स्थिति से करना आसान होगा।

निष्कर्ष

हर्ष मंदर की मानवाधिकार चिंताओं से लेकर नंदिता नारायण द्वारा प्रस्तुत ऐतिहासिक तुलना तक, प्रेस कॉन्फ्रेंस में दी गई भावुक अपीलें अक्सर इमाम के मामले में कोर्ट के निर्णयों और सबूतों के महत्व को कम करके दिखाती हैं। वास्तविक सच्चाई चाहे 2020 के दंगों से जुड़े फोरेंसिक सबूत हों या प्रारंभिक सबूत (prima facie) के लिए बार-बार न्यायिक पुष्टि संकेत देते हैं कि इस मामले में दुश्मनी नहीं, बल्कि जवाबदेही काम कर रही है।

भारत जो लोकतांत्रिक सिद्धांतों के प्रति दृढ़ है, मजबूत संस्थानों, नियमित चुनावों और सतर्क न्यायपालिका के माध्यम से किसी भी दुरुपयोग की रोकथाम करता है। भारत की न्यायिक प्रणाली की स्थायी मजबूती ट्रायल्स के दौरान स्पष्ट होती है, जब सबूतों की गंभीरता से जाँच की जाती है।

यह विभाजन का उपकरण नहीं, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय एकता का रक्षक है। यह याद दिलाता है कि सच्चा न्याय संतुलित जाँच पर फलता-फूलता है, न कि अतिशयोक्तिपूर्ण भय की गूंज पर, जो अनजाने में उन्हीं स्वतंत्रताओं को कमजोर कर सकती है जिन्हें यह संरक्षित करने का दावा करता है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

हनुमान चालीसा पाठ पर भड़के SC दबंग, प्रजापति माँ-बेटे को जूतों की माला पहनाकर निकाला जुलूस-अंबेडकर प्रतिमा के सामने रगड़वाई नाक: हापुड़ में 4 गिरफ्तार, पढ़ें FIR की अहम बातें

उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले से सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ने वाली एक रूह कंपा देने वाली वारदात सामने आई है। यहाँ शाहपुर चौधरी गाँव में एक माँ और उसके बेटे को जूतों की माला पहनाकर पूरे गाँव में घुमाया गया और उन्हें अमानवीय तरीके से अपमानित किया गया। इस पूरी घटना से जुड़ी FIR की कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने तत्काल कार्रवाई की है और अब तक चार आरोपितों को गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेज दिया है, जबकि अन्य की तलाश जारी है।

मंदिर में विवाद और जूतों की माला का ‘फरमान’

जानकारी के अनुसार, घटना की जड़ें अयोध्या में श्रीराम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के समय से जुड़ी हैं। पीड़ित युवक दीपक चौधरी (प्रजापति समुदाय) के अनुसार, उस दौरान गाँव के मंदिर में हनुमान चालीसा का पाठ हो रहा था, तभी दलित समुदाय के एक युवक ने हिंदू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी, जिसका दीपक ने विरोध किया था।

आरोप है कि इसी रंजिश के चलते 26 जनवरी 2026 को कुछ दलित युवकों ने दीपक को रास्ते में रोक लिया और गाली-गलौज की। इसके बाद उसकी माँ को भी मौके पर बुला लिया गया। गाँव की पंचायत ने कथित तौर पर एक ‘तालिबानी’ फरमान सुनाया कि दोनों को जूतों की माला पहनाकर घुमाया जाए ताकि धर्म पर टिप्पणी का बदला लिया जा सके।

प्रतिमा के सामने नाक रगड़वाई और निकाला जुलूस

पीड़ित ने FIR में आरोप लगाया कि उसे और माँ को जबरन बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा के सामने ले जाया गया और वहाँ उनकी नाक रगड़वाई गई। इसके बाद भीड़ ने दोनों के गले में जूतों और चप्पलों की माला डाल दी और पूरे गाँव में उनका जुलूस निकाला।

इस दौरान माँ-बेटे के साथ मारपीट भी की गई और उन्हें हाथ जोड़कर माफी माँगने पर मजबूर किया गया। यह पूरी शर्मनाक घटना गाँव में लगे सीसीटीवी कैमरों में कैद हो गई, जिसका वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

पुलिस की कार्रवाई और गाँव में तनाव

वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया। गढ़ कोतवाली पुलिस ने पीड़ित की तहरीर पर तत्काल 10 नामजद युवकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए चार आरोपितों (अनिल, अमित, सागर और विनीत) को गिरफ्तार कर लिया है।

गढ़ कोतवाली प्रभारी इंस्पेक्टर देवेंद्र विष्ट ने बताया कि आरोपितों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जा रही है। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि एक आरोपित पुलिस विभाग से जुड़ा है, जिसकी जाँच की जा रही है। फिलहाल गाँव में तनावपूर्ण शांति बनी हुई है और एहतियातन पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।

‘जानवरों की तरह नोंचा, मुँह में कपड़ा ठूँसा’: दिल्ली के भजनपुरा में 6 साल की मासूम से 3 मुस्लिम नाबालिगों ने किया गैंगरेप, पीड़ित परिवार की आपबीती का Video

देश की राजधानी दिल्ली में शाम ढलते ही मानवता को शर्मसार करने वाली एक रूह कंपा देने वाली वारदात सामने आई है। यहाँ के भजनपुरा थाना क्षेत्र में महज 6 साल की मासूम बच्ची के साथ पड़ोस में रहने वाले तीन नाबालिग मुस्लिम लड़कों ने सामूहिक दुष्कर्म (गैंगरेप) की घटना को अंजाम दिया। दरिंदगी इस कदर बर्बर थी कि जब बच्ची खून से लथपथ हो गई, तो उसे घर के दरवाजे पर एक आरोपित यह झूठ बोलकर छोड़ गया कि वह ‘ई-रिक्शा से टकराकर गिर गई’ है। दर्द से कराह रही वह नन्हीं जान जैसे ही कमरे के अंदर दाखिल हुई, अपनी माँ की आँखों के सामने ही बेहोश होकर गिर पड़ी। अपनी लाड़ली की यह हालत देख माँ के पैरों तले जमीन खिसक गई।

बेटी के कपड़ों को खून से सना देख माँ ममता के मारे उसे अस्पताल की ओर लेकर भागी, लेकिन रास्ते में ही उसने विचार बदला और वह बच्ची को लेकर सीधे जाफराबाद पुलिस थाने पहुँच गई। वहाँ उसने पुलिस को पूरी कहानी सुनाई। हैरानी की बात यह रही कि जिन आरोपितों को पकड़ने के लिए पुलिस को महज 10 मिनट का रास्ता तय करना था, वहाँ पहुँचने में पुलिस को 10 घंटे लग गए। इस देरी का नतीजा यह हुआ कि पुलिस केवल दो आरोपितों को ही हिरासत में ले सकी, जबकि गैंगरेप का मुख्य आरोपित घटना के 10 दिन बीत जाने के बाद भी दिल्ली पुलिस की गिरफ्त से मीलों दूर है।

ग्राउंड रिपोर्ट: बदबूदार गली के उस कमरे की कहानी जहाँ सिसक रही है मासूमियत

इस भयावह घटना की हकीकत जानने के लिए ऑपइंडिया की टीम बीते बुधवार (28 जनवरी, 2026) को पीड़ित परिवार के घर पहुँची। भजनपुरा इलाके की एक छोटी सी और बदबूदार गली के आखिरी छोर पर यह परिवार एक बड़े से कमरे में रहने को मजबूर है। यह गली आगे से बंद है, जो इलाके के घुटन भरे माहौल को दर्शाती है। कमरे के अंदर का दृश्य हृदयविदारक था। पीड़ित बच्ची कंबल ओढ़े बेड पर सुध-बुध खोकर लेटी थी, जबकि गहरी चिंता और बेबसी में डूबे माता-पिता बेड के अलग-अलग कोनों पर बैठे अपनी किस्मत और कानून व्यवस्था को कोस रहे थे।

पीड़िता के पिता ने बताया कि 18 जनवरी 2026 की शाम करीब 7 बजे जब वह बाजार सब्जी लेने जा रहे थे, तब उनकी बिटिया ने साथ चलने की जिद की। पिता ने उसे घर के बाहर एक दुकान से कुछ सामान दिलाया और बाजार चले गए। जब वह लौट रहे थे तो उन्होंने देखा कि एक आरोपित और उसका परिवार उनके सामने से ही भाग रहा था, लेकिन तब उन्हें अंदाजा नहीं था कि वह भागने वाला शख्स उनके परिवार की खुशियाँ लूट चुका है। घर पहुँचने पर उन्हें पता चला कि उसी लड़के और उसके दो साथियों ने मासूम बेटी के साथ घिनौनी हरकत की है। पिता का कहना है कि मुख्य आरोपित वर्तमान में बिहार के दरभंगा में खुलेआम घूम रहा है, लेकिन पुलिस उसे पकड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही है। इस सदमे के कारण न तो पिता रिक्शा चलाने जा पा रहे हैं और न ही माँ काम पर जा रही है। दोनों बारी-बारी से बस अपनी बेटी के घावों को सहला रहे हैं।

दरिंदों ने बच्ची को जानवरों की तरह नोंचा- माँ

पीड़ित माँ ने उस शाम का मंजर याद करते हुए बताया कि वह घर पर ही थीं तभी एक आरोपित लड़का उनकी बेटी को गोद में उठाकर लाया और एक्सीडेंट की झूठी कहानी गढ़ी। माँ ने जब देखा कि बच्ची के प्राइवेट पार्ट से खून बह रहा है तो उनका माथा ठनका। उन्होंने आरोपित से सवाल किया कि अगर टक्कर लगी तो चेहरे या सिर पर चोट क्यों नहीं है? इसके बाद वह आरोपित बच्ची को वहीं छोड़कर भाग निकला। माँ ने बताया कि दरिंदों ने बच्ची को जानवरों की तरह नोंचा था। उसके शरीर पर दांतों के निशान थे, कपड़े फटे हुए थे और कान पर गंभीर सूजन थी।

जब पुलिस को लेकर माँ घटनास्थल पर पहुँची तो वहाँ का नजारा देख रूह काँप गई। एक चूड़ी की फैक्ट्री की छत और दीवारों पर खून के धब्बे बिखरे हुए थे, जो चीख-चीख कर उस शाम की बर्बरता गवाही दे रहे थे। पुलिस ने मौके का वीडियो तो बनाया लेकिन दबिश देने में इतनी देरी की कि मुख्य आरोपित को फरार होने का पूरा मौका मिल गया। हद तो तब हो गई जब घटना के अगले दिन एक आरोपित की माँ ने पीड़ित परिवार के घर आकर सहानुभूति दिखाने के बजाय उन्हें धमकाया और कहा कि ‘तेरी बेटी के साथ जो हुआ वह ठीक ही हुआ, ऐसे ही होना चाहिए।’

तीन दरिंदों ने मुँह में कपड़ा ठूँस कर लूटी मासूमियत

बिस्तर पर लेटी उस 6 साल की बच्ची ने जब अपनी टूटी-फूटी जुबान से दर्द बयाँ किया, तो वहाँ मौजूद हर शख्स की आँखें नम हो गईं। बच्ची ने बताया कि वे तीन लड़के थे जिन्होंने उसके साथ गंदा काम किया। उसे डराया-धमकाया गया और उसकी चीखें दबाने के लिए उसके मुँह में कपड़ा ठूँस दिया गया था। आरोपितों ने न केवल कानून का उल्लंघन किया, बल्कि मानवता के हर उस मापदंड को तोड़ दिया जो समाज को सुरक्षित बनाता है।

यह पीड़ित परिवार मूल रूप से उत्तराखंड के रुद्रपुर जिले का रहने वाला है और पिछले 15 सालों से दिल्ली में आजीविका की तलाश में संघर्ष कर रहा है। पिता पैडल वाला रिक्शा चलाकर अपने परिवार का पेट पालते हैं, जबकि माँ एक कागज बनाने वाली फैक्ट्री में मजदूरी करती है। यह परिवार पिछले तीन सालों से भजनपुरा के इस किराए के कमरे में रह रहा है। पिता बताते हैं कि उनके पाँच बच्चे थे (3 लड़की, 2 लड़का) लेकिन आठ महीने पहले 14 साल के सबसे बड़े बेटे की बीमारी के कारण मौत हो गई। गरीबी के चलते वह अपने बच्चों तक का इलाज नहीं करा सके। अब इस दरिंदगी ने उनकी बची-खुची हिम्मत भी तोड़ दी है।

पिता बताते हैं कि जिस गली में यह वारदात हुई, वहाँ उनका अकेला हिंदू परिवार रहता है, जबकि बाकी सभी पड़ोसी मुस्लिम समुदाय से हैं। हालाँकि, यह पूरा इलाका हिंदू बाहुल्य है, लेकिन उस विशेष गली में वे सामाजिक और सुरक्षा के लिहाज से खुद को बेहद कमजोर महसूस कर रहे हैं। 12 वर्ष की उनकी बड़ी बेटी अब घर पर रहकर छोटे भाई-बहनों की देखभाल करती है, क्योंकि माता-पिता इस सदमे से उबर नहीं पा रहे हैं।

पड़ोसी बोले- आरोपितों को हो फाँसी की सजा

इलाके के लोगों में भी इस घटना को लेकर भारी रोष व्याप्त है। गली में रहने वाली एक हिंदू महिला ने गुस्से में कहा कि आरोपितों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए कि किसी की रूह काँप जाए। उन्हें तड़पा-तड़पा कर चौराहे पर मारना चाहिए।

वहीं, बाजार में चाय बेचने वाली एक मुस्लिम महिला ने भी आरोपितों के लिए फाँसी की माँग की। उन्होंने कहा कि ‘आज उस बच्ची के साथ हुआ है, कल हमारी बेटियों के साथ भी हो सकता है।’