14 मार्च 2025। होली का दिन। दिल्ली की एक कोठी में आग बुझाने दमकलकर्मी पहुँचते हैं। अंदर से जले हुए नोटों के बंडल मिलते हैं। यह कोई आम निजी आवास नहीं था, बल्कि उस समय दिल्ली हाई कोर्ट में पदस्थ जस्टिस यशवंत वर्मा का सरकारी निवास था।
इसके बाद घटनाओं की एक श्रृंखला शुरू होती है। जस्टिस वर्मा का तबादला इलाहाबाद हाई कोर्ट के लिए कर दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट की ‘इन हाउस जाँच’ से लेकर संसद में महाभियोग प्रस्ताव तक की चर्चा सुनाई पड़ती है।
लेकिन 2026 में प्रवेश कर चुके भारत में एक तथ्य अडिग है- जस्टिस यशवंत वर्मा आज भी न्यायिक सेवा में हैं। इस बीच पूरे मामले को दूसरा रंग देने की कोशिशें भी शुरू हो गई है। इसी कड़ी में वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी, जो इससे जुड़े एक मामले में जस्टिस वर्मा की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पैरवी कर चुके हैं, ने एक किताब के विमोचन के अवसर पर टिप्पणी की है।
रोहतगी ने जस्टिस वर्मा का नाम लिए बिना कहा है,
जिस तरह से मीडिया ट्रायल हुआ है, उसमें अगर वह जज बरी भी हो जाएँ, तो कोई नहीं मानेगा कि वे ईमानदार थे। उनका करियर खत्म हो चुका है।
सुनने में यह बात संवेदनशील लगती है। लेकिन यही वह बिंदु है, जहाँ भावना और तथ्य अलग हो जाते हैं।
मीडिया ट्रायल न्यायिक करियर नष्ट कर देता है- यह तर्क नया नहीं है। यह वही घिसा-पिटा हथियार है, जिसका इस्तेमाल तब किया जाता है, जब सवाल असुविधाजनक हो।
असल समस्या मीडिया नहीं है। असल समस्या यह है कि न्यायपालिका आलोचना से असहज होती है। भारतीय अभिजात वर्ग को मीडिया ट्रायल की चिंता चुनिंदा मौकों पर ही सताती है। खासकर जब ऊँगली न्यायपालिका या उसके भीतर बैठे प्रभावशाली चेहरे पर उठती है।
यह केवल संयोग है या फिर संस्थागत आत्मरक्षा की प्रवृत्ति?
एक समय था जब मुख्यधारा मीडिया न्यायपालिका को लगभग पवित्र मानती थी। कोर्ट की अवमानना का डर न्यूजरूम को खामोश रखता था। न्यायिक आचरण पर सवाल उठाना ईशनिंदा के समान माना जाता था।
वह दौर अब खत्म हो चुका है। सोशल मीडिया के युग में न्यायिक व्यवहार जनता की निगरानी में आ गया है। अब सवाल पूछने की जिम्मेदारी सिर्फ संपादकों की नहीं, नागरिकों की भी है।
यह सत्य है कि न्यायपालिका लोकतंत्र का स्तंभ है। लेकिन वह लोकतांत्रिक निगरानी से ऊपर नहीं हो सकती। यदि किसी न्यायाधीश पर गंभीर आरोप लगते हैं, तो क्या जनता को यह जानने का अधिकार नहीं है कि मामला क्या है? क्या ‘न्यायिक गरिमा’ का अर्थ पूर्ण मौन होता है?
मुकुल रोहतगी का यह कथन कि ‘बरी होने के बाद भी कोई नहीं मानेगा’ दरअसल मीडिया पर आरोप नहीं, बल्कि संस्थागत अविश्वास की स्वीकारोक्ति है। यदि अदालत का फैसला जनता को आश्वस्त नहीं कर पाता है तो दोष कैमरे का नहीं, प्रक्रिया की अपारदर्शिता का है।
यह स्थिति न्यायपालिका ने खुद बनाई है। भारतीय न्यायपालिका संभवतः दुनिया की इकलौती ऐसी संस्था है जो अपनी नियुक्ति खुद तय करती है। अपनी जाँच खुद करती है। अपनी जवाबदेही की सीमा खुद खींचती है।
कॉलेजियम सिस्टम संविधान में नहीं है। संसद ने इसे नहीं बनाया। यह 1993 के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से उपजा एक आत्म-नियुक्त ढाँचा है। इस व्यवस्था में RTI लागू नहीं है। लोकपाल लागू नहीं है। संपत्ति की घोषणा अनिवार्य नहीं है।
यह स्थिति लोकतांत्रिक असंतुलन पैदा करती है। जब सरकार और संसद ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) के जरिए सुधार की कोशिश की तो सुप्रीम कोर्ट ने उसे ‘संविधान के मूल ढाँचे पर हमला’ बताकर खारिज कर दिया।
क्या जवाबदेही सुनिश्चित करना भी न्यायपालिका के मूल ढाँचे के खिलाफ है?
यह भी तथ्य है कि नोटों के बंडल मिलने से पहले भी जस्टिस वर्मा का न्यायिक व्यवहार विवादों से अछूता नहीं था। चाहे वह सिंभावली शुगर्स से जुड़ा मामला हो या प्रकाश इंडस्ट्रीज से। लेकिन इन पर गंभीर सार्वजनिक बहस कभी नहीं हुई, क्योंकि तब तक ‘गरिमा’ का कवच सलामत था।
यह भी सत्य है की मुख्यधारा की मीडिया में सनसनी है। टीआरपी की होड़ है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि कई संस्थागत सड़ाँध इसी मीडिया के कारण उजागर हुई है। यदि मीडिया पूरी तरह चुप रहती तो देश कभी उन सवालों से रूबरू ही नहीं हो पाता।
समस्या मीडिया ट्रायल नहीं है। समस्या यह है कि न्यायपालिका आलोचना के लिए तैयार नहीं है। ऐसे में मुकुल रोहतगी का बयान बहस छेड़ता है, लेकिन अधूरी।
असली प्रश्न यह नहीं है कि मीडिया न्यायिक करियर नष्ट करती है या नहीं। असली प्रश्न यह है कि क्या भारतीय न्यायपालिका सार्वजनिक जाँच और आलोचना का सामना करने को तैयार है?
यदि नहीं, तो ‘गरिमा’ के नाम पर जवाबदेही से बचना लोकतंत्र नहीं, संस्थागत आत्मरक्षा है।
सनद रहे लोकतंत्र में गरिमा बचाई नहीं जाती, कमाई जाती है।


