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UGC का नया ‘इक्विटी’ नियम कॉन्ग्रेस के कम्युनल वॉयलेंस बिल जैसा: जनरल कैटेगिरी के लोगों से भेदभाव, झूठी शिकायतों की नहीं कोई जवाबदेही, जानें इससे जुड़ी हर बात

आजाद भारत में एंटी-ब्राह्मण हिंसा मुमकिन थी, हुई और अगर ब्राह्मणों से नफरत अनियंत्रित फैलती रही और 'सोशल जस्टिस' के नाम पर सेलिब्रेट हुई तो फिर हो सकती है।

यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन (यूजीसी) ने मंगलवार (13 जनवरी 2026) को हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस में इक्विटी प्रमोशन रेगुलेशंस 2026 का ऐलान किया, जो 2012 के पुराने फ्रेमवर्क की जगह लेगा। यह नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (एनईपी) 2020 के ‘इक्विटी और इनक्लूजन’ की जगह लेगा और इसका दावा है कि इसका मकसद भारतीय कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज में भेदभाव से निपटने के लिए प्रक्रियाओं को संस्थागत बनाना है।

रेगुलेशन का बताया गया लक्ष्य है- “केवल धर्म, नस्ल, लिंग, जन्म स्थान, जाति या विकलांगता के आधार पर भेदभाव को खत्म करना। खासकर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, विकलांग व्यक्तियों या इनमें से किसी के खिलाफ और हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस में स्टेकहोल्डर्स के बीच पूर्ण इक्विटी और इनक्लूजन को बढ़ावा देना।”

हालाँकि इस साधारण सी लाइन से शायद ही कोई भौंह चढ़ाए क्योंकि देश में दशकों से सकारात्मक कार्रवाई ऐसी ही रही है। लेकिन नोटिफिकेशन की आगे की शब्दावली इसे ‘खासकर खिलाफ’ नहीं बल्कि ‘सिर्फ’ एससी/एसटी/ओबीसी वर्ग के लोगों के लिए बनाती है और सामान्य जाति के लोगों को उनकी जाति की वजह से भेदभाव का शिकार मानने से पूरी तरह बाहर कर देती है।

इस बताए गए लक्ष्य को पूरा करने के लिए यूजीसी ने देश के सभी हायर एजुकेशन संस्थानों में इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर्स, इक्विटी कमेटियाँ, 24 घंटे हेल्पलाइन और तय समय में शिकायत निपटाने की व्यवस्था बनाने का आदेश दिया है। ये नियम संस्थान के अधिकारियों की भूमिका को काफी बढ़ाते हैं, खासकर व्यवहार की निगरानी, शिकायतों का फैसला और नियम लागू करने में। ऐसे समय में जब कैंपस सामाजिक, राजनीतिक और विचारधारा के झगड़ों का अखाड़ा बनते जा रहे हैं। ये सलाह देने वाले दिशानिर्देशों से बदलकर सख्त अनुपालन वाले फ्रेमवर्क की ओर ले जाते हैं।

ऐसे नियमों के डिजाइन और अमल का ड्यू प्रोसेस, एकेडमिक आजादी और संस्थान की तटस्थता पर गहरा असर पड़ता है।

भेदभाव कम करने का लक्ष्य तो ठीक और जरूरी है, लेकिन ‘हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस में इक्विटी प्रमोशन रेगुलेशंस 2026’ के तहत बने नियमों की इन प्रावधानों की वजह से कड़ी आलोचना हो रही है जो एक खतरनाक परंपरा को और मजबूत करते हैं कि सामान्य जाति (जनरल कास्ट) के लोग जाति की वजह से भेदभाव के शिकार कभी नहीं हो सकते। ये नियम जाति भेदभाव की झूठी शिकायतों पर कोई सजा नहीं देते, जिससे ये बिल्कुल गलत धारणा और बढ़ती है कि एससी/एसटी वर्ग के किसी व्यक्ति की शिकायत अपने आप सच्ची होती है और सामान्य जाति का कोई व्यक्ति शुरू से ही अपराधी है। इससे ये नियम बेहद सख्त और अन्यायपूर्ण हो जाते हैं।

क्या कहते हैं नियम

यूजीसी के इक्विटी प्रमोशन नियम भारत के सभी हायर एजुकेशन संस्थानों पर लागू होते हैं- सेंट्रल, स्टेट, प्राइवेट और डीम्ड यूनिवर्सिटीज सहित। ये सभी लोगों को कवर करते हैं- स्टूडेंट्स, टीचर्स, स्टाफ और संस्थान के अधिकारी। ये ऑफिशियल गजट में छपते ही लागू हो गए।

नियम भेदभाव की बहुत व्यापक परिभाषा अपनाते हैं – स्पष्ट और छिपे हुए दोनों तरह के काम जो बराबरी के इलाज को खराब करें या इंसान की इज्जत को ठेस पहुँचाएँ। भेदभाव जाति, धर्म, लिंग, दिव्यांगता और जन्म स्थान जैसे आधारों पर बताया गया है, लेकिन खास और सिर्फ जोर एससी, एसटी, ओबीसी, ईडब्ल्यूएस और दिव्यांग लोगों पर है।

इन प्रावधानों को लागू करने के लिए हर संस्थान को इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर (ईओसी) बनाना होगा। ईओसी इक्विटी बढ़ाने, काउंसलिंग देने, बाहर की एजेंसियों से तालमेल करने, शिकायत पोर्टल चलाने और इनक्लूजन की पहलों की निगरानी करने का मुख्य केंद्र होगा। अगर कॉलेज में पर्याप्त टीचर्स नहीं हैं तो ये काम जुड़ी हुई यूनिवर्सिटी करेगी।

हर ईओसी इक्विटी कमेटी के जरिए काम करेगा। कमेटी की अध्यक्षता संस्थान का हेड करेगा और इसमें टीचर्स, स्टाफ, स्टूडेंट्स और सिविल सोसाइटी के लोग होंगे, वंचित ग्रुप्स से जरूरी प्रतिनिधित्व के साथ। कमेटी भेदभाव की शिकायतों की जांच करेगी और कार्रवाई की सिफारिशें देगी।

नियमों में ‘इक्विटी स्क्वाड्स’ और ‘इक्विटी एम्बेसडर्स’ भी लाए गए हैं जो कैंपस की निगरानी करेंगे और संभावित गलतियों की रिपोर्ट करेंगे। साथ ही 24×7 इक्विटी हेल्पलाइन सभी के लिए होगी। शिकायतें ऑनलाइन, लिखित या हेल्पलाइन से की जा सकती हैं, गोपनीयता के साथ। अगर शिकायत में शुरू से ही अपराध दिखे तो पुलिस को भेजी जाएगी।

नियमों में मुख्य संरचनात्मक कमियाँ

यूजीसी इक्विटी प्रमोशन रेगुलेशंस 2026 का संरचनात्मक डिजाइन प्रक्रिया की संतुलन और संस्थान की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाता है। फ्रेमवर्क स्पीड, लोगों की धारणा और अनुपालन को तरजीह देता है लेकिन सुरक्षा, स्पष्टता और सही प्रक्रिया में बड़ी खामियाँ छोड़ देता है। इससे खतरनाक रूढ़ियाँ बढ़ती हैं, एक तरफ की गिल्ट मान ली जाती है और सामान्य वर्ग के लोगों को बदनाम किया जाता है, जबकि झूठी शिकायतों और मासूम स्टूडेंट्स की जिंदगी पर उनके असर को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

झूठी SC-SC शिकायतों के खिलाफ कोई सुरक्षा नहीं यानी सामान्य जाति को शुरू से अपराधी मानना

नियमों की सबसे बड़ी कमी ये है कि जानबूझकर झूठी शिकायतों को रोकने का कोई साफ प्रावधान नहीं है। फ्रेमवर्क शिकायत करने वालों को गोपनीयता, तेज जाँच और बदले की कार्रवाई से सुरक्षा देने पर बहुत जोर देता है। गलत इस्तेमाल के नतीजों पर पूरी तरह चुप है।

झूठे आरोपों का निपटारा अस्पष्ट संस्थान नियमों और अफसरों की मर्जी पर छोड़ दिया गया है। मूल रूप से नियम सिर्फ इतना कहते हैं कि कमेटी की रिपोर्ट से नाराज कोई व्यक्ति 30 दिन में अपील कर सकता है और ओम्बड्सपर्सन को 30 दिन में अपील निपटानी होगी।

झूठी शिकायतों पर कोई सजा या कीमत नहीं है। इससे एससी/एसटी वर्ग का कोई व्यक्ति बिना सबूत के आरोप लगा सकता है और सामान्य जाति के व्यक्ति को जेल भिजवा सकता है, बहुत कम या बिना सबूत के।

इससे जोखिम का असंतुलन हो जाता है: शिकायत करने की कीमत कम है लेकिन आरोपी के लिए नाम खराब होना, पढ़ाई बर्बाद होना, मानसिक तनाव और जेल भी हो सकती है।

ऐसे झूठे आरोपों से मासूम लोगों की लंबी जेल होने के ढेरों सबूत हैं।

जनवरी 2025 में जबलपुर में एससी/एसटी एक्ट और उसके अमल पर हुए वर्कशॉप में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जज विवेक अग्रवाल ने इस एक्ट के बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल पर चिंता जताई। उन्होंने महिलाओं के खिलाफ अपराधों वाले कानूनों के गलत इस्तेमाल पर भी चिंता दिखाई।

12 जनवरी 2025 को हुए कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जस्टिस अग्रवाल ने एससी/एसटी एक्ट के मामलों में ईमानदार जांच और ईमानदार मुकदमा चलाने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने पुलिस और अभियोजन अधिकारियों से कहा कि असली और झूठे आरोपों को अच्छे से अलग करें। उन्होंने कहा, “अगर हमारे पास अधिकार है तो ये ड्यूटी भी है कि कोई मासूम गलत सजा न पाए। गड़बड़ियां छाननी होंगी और सच्चाई सामने लानी होगी।”

जस्टिस अग्रवाल ने पुलिस और अभियोजन को चेताया कि एससी/एसटी एक्ट में मुआवजे का प्रावधान है। इसलिए जैसे ही ऐसे मामले सामने आते हैं, बिचौलिए सक्रिय हो जाते हैं और मुआवजा दिलाने के नाम पर मासूमों को फंसाते हैं। उन्होंने बताया कि कैसे दलाल फर्जी केस दर्ज कराकर मुआवजा लेते हैं और अपना हिस्सा काटते हैं।

जस्टिस अग्रवाल ने कहा, “बहुत बार लोगों को एससी/एसटी में झूठा फँसाया जाता है। जाँच अधिकारी ध्यान रखें कि मासूम न फँसें और दोषी न बचें। इसमें कहीं न कहीं प्रशासन, पुलिस और न्यायपालिका कमी कर रही है। इसलिए जाँच में ध्यान रखें कि दलालों के चलते हमारी साख न खराब हो। अधिकार है तो ड्यूटी भी है कि मासूम गलत सजा न पाए। गड़बड़ियाँ छानकर सच्चाई सामने लानी होगी।”

साल 2024 में एक केस सामने आया जिसमें जज ने सामान्य जाति के व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा रद्द कर दिया, कहा कि सख्त एससी/एसटी एक्ट का इस्तेमाल जमीन माफिया की रक्षा के लिए हो रहा था।

अलीगढ़ में एक परिवार ने झूठे एससी/एसटी केस दर्ज करके लाखों रुपए ऐंठे। 10 साल में 15 फर्जी केस करके सामान्य जाति वालों से पैसे वसूले।

ये तो बस कुछ ही मामले हैं।

दरअसल एससी/एसटी एक्ट में झूठी शिकायतें बढ़ने से अदालतें भी सतर्क हो गई हैं और कई मामलों में शिकायत करने वाले को झूठ के लिए जेल भेजा है।

अक्टूबर 2025 में लखनऊ की स्पेशल एससी/एसटी कोर्ट ने एक महिला को झूठी शिकायत करने के लिए 3 साल की सजा दी, कहा कि ऐसे केस बढ़ रहे हैं।

महिला को आईपीसी की धारा 182 (सरकारी अफसर को झूठी जानकारी देना) में 6 महीने और धारा 211 (नुकसान पहुँचाने के इरादे से झूठा आरोप) में 3 साल की सजा हुई।

जुलाई 2025 में पूर्व चीफ जस्टिस बीआर गवई ने कहा कि एससी/एसटी एक्ट का इस्तेमाल निजी दुश्मनी निपटाने के लिए नहीं हो सकता। केस दो एससी ग्रुप्स के बीच जमीन का था लेकिन शिकायतकर्ता ने एससी/एसटी एक्ट लगा दिया।

बेंच ने कहा, “जहाँ मुकदमे में साफ कानूनी कमी हो या पूरा केस निजी दुश्मनी निपटाने का हथियार हो, वहाँ शुरुआत में ही मुकदमा रद्द करना चाहिए ताकि आरोपी को अनावश्यक परेशानी न हो।”

एससी/एसटी एक्ट में दर्ज ज्यादातर केस झूठे होने के ढेर सबूत हैं। कई निजी दुश्मनी, न्याय को अपने पक्ष में झुकाने या सामान्य जाति वालों से जाति की नफरत की वजह से होते हैं।

ऐसे में कोई तर्क नहीं बनता कि हायर एजुकेशन में इक्विटी प्रमोशन रेगुलेशंस 2026 में झूठी शिकायतों के खिलाफ कोई प्रावधान या सख्त सजा क्यों नहीं है। गलत इरादे वाली शिकायतों को रोकने का कोई स्पष्ट तरीका नहीं है।

ये नियम गलत इस्तेमाल को बढ़ावा देने का खतरा पैदा करते हैं।

‘भेदभाव’ की परिभाषा में चुनिंदा तटस्थता, लिंग में बराबरी लेकिन जाति में नहीं

कानून भेदभाव की बहुत चौड़ी परिभाषा लेता है- छिपा पूर्वाग्रह और ऐसा व्यवहार भी जो बराबरी या इज्जत को ठेस पहुँचाए। इससे व्यक्तिपरकता और व्याख्या की अनिश्चितता बढ़ती है। सबसे जरूरी बात, नियम तटस्थता को चुनिंदा तरीके से लागू करते हैं। कानून में ‘लिंग’ का मतलब पुरुष, महिला और थर्ड जेंडर है। लिंग में फ्रेमवर्क पूरी तरह तटस्थ है, बिना किसी शर्त के, सभी को कवर करता है बिना किसी को अपराधी बनाए। ये खास बात है क्योंकि आम नीतियाँ लिंग की सुरक्षा महिलाओं के पक्ष में ज्यादा करती हैं।

लेकिन जाति के मामले में ऐसी तटस्थता नहीं है।

नियमों में ‘जाति आधारित भेदभाव’ का मतलब सिर्फ अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के खिलाफ भेदभाव है। रोजमर्रा की जिंदगी में लोग सरनेम से जाति के आधार पर पहचाने जाते हैं। जैसे रोहित शर्मा नाम वाला स्टूडेंट जाति की वजह से ज्यादा कैटेगरी में डाला जाएगा लिंग की बजाय। फिर भी नियम जाति भेदभाव को सिर्फ पहले से तय वंचित ग्रुप्स तक सीमित रखते हैं, बिना ये माने कि जाति पूर्वाग्रह इनके बाहर भी हो सकता है।

जब लिंग में तटस्थता मुमकिन और अच्छी है तो जाति में वैसी ही स्पष्ट तटस्थता न होना डिजाइन की गलती या जानबूझकर हकीकत न देखना दिखाता है।

यानी अगर नियम मान सकते हैं कि पुरुष और महिला दोनों लिंग की वजह से भेदभाव के शिकार हो सकते हैं तो सवाल ये है कि हर जाति के लोग जाति भेदभाव के शिकार हो सकते हैं, ये क्यों नहीं माना। नियम लगभग साफ कहते हैं कि अगर शिकार की जाति ‘ऐतिहासिक रूप से दबी हुई’ नहीं है तो वो कभी भेदभाव का शिकार नहीं हो सकता – जो हकीकत से मेल नहीं खाता। ऐसा भेदभाव का फ्रेम इक्विटी या न्याय नहीं लाता, बल्कि बाँटता है, खतरा पैदा करता है और उकसाता है।

संस्थान के अंदर ही सारी ताकत

शिकायत निपटाने की व्यवस्था में सारी बड़ी ताकत संस्थान के अंदर ही है। संस्थान का हेड इक्विटी कमेटी बनाता और देखता है जो पूर्वाग्रह के आरोपों की जाँच करती है। वही हेड कमेटी के फैसले पर कार्रवाई भी करता है।

बाहर की निगरानी सिर्फ अपील में ओम्बड्सपर्सन (यूजीसी द्वारा नियुक्त व्यक्ति) से आती है। तब तक शुरुआती फैसले और कार्रवाई से नुकसान हो चुका होता है। ये व्यवस्था संस्थान की डर, राजनीतिक दबाव या विचारधारा से प्रभावित होने का खतरा पैदा करती है। पहले चरण में स्वतंत्र बाहर के सदस्य न होना पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता और निष्पक्षता को कमजोर करता है।

इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर- एनजीओ और ‘सिविल सोसाइटी सदस्यों’ का शामिल करने वाली समस्या

नियम कहते हैं कि “हर हायर एजुकेशन संस्थान को वंचित ग्रुप्स के लिए नीतियों और प्रोग्राम्स के अच्छे अमल की निगरानी के लिए इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर बनाना होगा; पढ़ाई, पैसा, सामाजिक और दूसरे मामलों में सलाह और मदद देना होगा; और कैंपस में विविधता बढ़ानी होगी। अगर कॉलेज में कम से कम पाँच टीचर्स नहीं हैं तो उसका काम जुड़ी यूनिवर्सिटी का सेंटर करेगा।”

इसके लिए नियम कहते हैं कि ये सेंटर “सिविल सोसाइटी, लोकल मीडिया, पुलिस, जिला प्रशासन, इस क्षेत्र में काम करने वाले गैर-सरकारी संगठनों, टीचर्स, स्टाफ और अभिभावकों के साथ मिलकर बनाए जाएंगे ताकि नियमों के उद्देश्य पूरे हों।”

सिविल सोसाइटी सदस्यों और एनजीओ को शामिल करना समस्या पैदा करता है क्योंकि इतिहास में ऐसे संगठन राजनीतिक फायदे के लिए हिंदू समाज में फूट ही डालते रहे हैं।

मिसाल के लिए ‘दलित राइट्स’ संगठन इक्वैलिटी लैब्स लें। नए नियमों में इक्वैलिटी लैब्स सिविल सोसाइटी और एनजीओ के रूप में क्वालिफाई करेगी और नियमों के उद्देश्य पूरे करने में मदद करेगी।

इक्वैलिटी लैब्स अमेरिका में एक कट्टर वामपंथी संगठन है जो कई सालों से हिंदुओं के खिलाफ काम कर रहा है। डिसइंफो लैब ने ‘ऑपरेशन TUPAC’ पर विस्तृत रिपोर्ट छापी जिसमें भारत की कमजोर कड़ियों का फायदा उठाने वाले संगठनों को समझाया गया। इसमें इक्वैलिटी लैब्स का अच्छा खासा जिक्र है।

रिपोर्ट कहती है–

अमेरिका में जाति की कमजोरी पर काम करने वाला मुख्य संगठन इक्वैलिटी लैब्स है। ये 2016 में बना, अम्बेडकरवादी साउथ एशियन पावर बनाने वाला संगठन, ‘जाति भेदभाव’ से लड़ने के नाम पर। इसकी संस्थापक थेन्मोझी साउंदराराजन हैं। वो अमेरिका में जन्मी-पली दलित टेक विशेषज्ञ, कलाकार और एक्टिविस्ट है।। संगठन खुद को प्रोग्रेसिव बताता है और जाति भेदभाव से लड़ने का दावा करता है लेकिन भारत को जाति की बीमारी और दमन वाला देश दिखाने की कोशिश करता है- ब्रिटिशों वाला पुराना नैरेटिव जो पश्चिमी मूल्यों को थोपने के लिए इस्तेमाल होता था। दूसरी सह-संस्थापक शर्मिन हुसैन हैं, बांग्लादेशी अमेरिकन, जो मार्च 2021 तक पॉलिटिकल डायरेक्टर रहीं। अप्रैल 2021 में उन्होंने क्वियर क्रेसेंट नाम का नया संगठन बनाया जो एलजीबीटीक्यूआई+ मुस्लिम्स का पॉलिटिकल घर है।

साल 2018 में इक्वैलिटी लैब्स ने अमेरिका में जाति रिपोर्ट छापी, कई संगठनों की मदद से जैसे आईएएमसी, ओएफएमआई और एलाइंस फॉर जस्टिस एंड अकाउंटेबिलिटी (एजेए)- दलित संगठनों का गठबंधन आईएएमसी, ओएफएमआई और हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स के साथ।

जुलाई 2020 में कैलिफोर्निया के फेयर एम्प्लॉयमेंट डिपार्टमेंट और दो इंडियन ओरिजिन कर्मचारियों ने सिस्को कंपनी पर जाति भेदभाव का मुकदमा किया। आरोप था कि एक दलित कर्मचारी (जॉन डो) को दो इंडियन सहकर्मियों सुंदर अय्यर और रमना कोम्पेला ने 2016 से भेदभाव किया। मुकदमे में इक्वैलिटी लैब्स की 2018 रिपोर्ट का जिक्र था। उसके बाद थेन्मोझी साउंदराराजन ने मीडिया पर आकर मुद्दा और उछाला।

जाति के अलावा इक्वैलिटी लैब्स भारत के अंदरूनी मामलों में गहरी दिलचस्पी लेती है और ऐसी लाइनों पर काम करती है जो भारत की कमजोरियाँ हैं। सीएए प्रोटेस्ट के समय ये सक्रिय हुई। तब इसने सीएए, एनआरसी और एनपीआर को भारत में नरसंहार से जोड़ा और एक पेज का पैम्फलेट छापा और उसे हर तरफ बाँटा।

इसने प्रोटेस्ट और ऑनलाइन कैंपेन के लिए ‘हिंदू फासिज्म के खिलाफ ऑर्गनाइजिंग’ नाम का टूलकिट भी जारी किया। इसमें सैंपल ट्वीट्स और तरीके थे। पासवर्ड था ‘RejctCAA’। टूलकिट में ऑल्टन्यूज, इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन और सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर जैसे प्लेटफॉर्म्स को सपोर्ट करने को कहा गया।

डिसइंफो लैब की रिसर्च के मुताबिक, 14 नवंबर 2017 को थेन्मोझी साउंदराराजन और पीटर फ्राइडरिच ने भारत के कास्ट सिस्टम को कैलिफोर्निया के कोर्स से बदलने के खिलाफ कैलिफोर्निया एजुकेशन डिपार्टमेंट में प्रोटेस्ट किया। ओएफएमआई की स्थापना पीटर फ्राइडरिच ने की जो साउथ एशिया का खुद को विशेषज्ञ बताता है और खालिस्तानी आतंकी भजन सिंह भिंडर का साथी है। ओएफएमआई भजन सिंह भिंडर और उसके कर्मचारी पीटर फ्राइडरिच चलाते थे, जो 1990 में आईएसआई के साथ मिलकर भारत में आतंक के लिए हथियार भेजता था।

मई 2019 में इक्वैलिटी लैब्स की संस्थापक ने खालिस्तानी आतंकी संगठन सिख्स फॉर जस्टिस के गुरपतवंत पन्नू के साथ कार्यक्रम किया। हिंदूपैक्ट ने फोटो शेयर की जो 22 मई 2019 की बताई गई। ये लोकसभा 2019 नतीजों से एक दिन पहले था। उसी दिन थेन्मोझी की इक्वैलिटी लैब ने अमेरिका में जाति भेदभाव पर कॉन्ग्रेस ब्रीफिंग की, जो उनके संदिग्ध सर्वे पर आधारित थी। वही सर्वे एसबी403 बिल तक पहुँचा।

अब नए नियमों के मुताबिक ये जमात-ए-इस्लामी, खालिस्तानी और एंटी-हिंदू ताकतों वाला संगठन भारतीय यूनिवर्सिटीज में बराबरी और निष्पक्षता लाने का सही साथी होगा क्योंकि ये दलित अधिकारों पर काम करने का दावा करता है। सभी तरह की शिकायतों के खिलाफ सुरक्षा न होने और गिल्ट पहले से मान लेने की वजह से नियम ऐसे संगठनों को स्वीकार करेंगे जो भारत और हिंदुओं के खिलाफ काम करते हैं और अन्याय को बढ़ावा देंगे।

सबूत का कोई तय मानक नहीं, सामान्य जाति को नकारात्मक साबित करना, शिकायतकर्ता की कोई जवाबदेही नहीं

नियमों में जाँच के लिए सबूत का कोई मानक नहीं बताया गया। कोई स्पष्टता नहीं कि कितना सबूत चाहिए, बोझ किस पर है या गवाही, दस्तावेज या परिस्थितिजन्य सबूत का वजन कितना होगा। ऐसे में जाँचें सबूतों पर नहीं बल्कि कहानी पर चलेंगी, फैसले तथ्यों से नहीं धारणा से होंगे। इससे सही प्रक्रिया का आधार कमजोर होता है और अलग-अलग संस्थानों में अलग फैसले हो सकते हैं, इससे निष्पक्षता और कानूनी मजबूती दोनों कमजोर होती है।

जब नियम एक पक्ष (सामान्य जाति) को पहले से अपराधी मानते हैं तो सबूत का बोझ बदल जाता है और मानक कम हो जाता है। शिकायत करने वाले को साबित नहीं करना पड़ता कि भेदभाव हुआ, बल्कि आरोपी को साबित करना पड़ता है कि उसने वो नहीं किया- जो लगभग नामुमकिन है क्योंकि नकारात्मक साबित करना मुश्किल होता है और वो पहले से अपराधी माना जा चुका है।

तेज प्रक्रिया और उसके नतीजे

नियम तेज कार्रवाई पर जोर देते हैं ताकि संस्थान सुस्ती न करें, लेकिन सख्त समयसीमा प्रक्रिया की गहराई से ज्यादा स्पीड को तरजीह देती है। गंभीर आरोपों, पढ़ाई के फैसले, व्यक्तिगत झगड़े या अलग कहानियों वाले कॉम्प्लेक्स केस में समय और सावधानी से जाँच चाहिए।

गाइडलाइंस के मुताबिक कमेटी 24 घंटे में मिलेगी कार्रवाई के लिए; इक्विटी कमेटी 15 काम के दिनों में रिपोर्ट देगी; संस्थान हेड 7 काम के दिनों में आगे कार्रवाई शुरू करेगा।

इससे ओवरकरेक्शन का खतरा है। संस्थान अनुपालन के लिए डिफेंसिव फैसले लेंगे। समय के साथ पढ़ाई की बातचीत ठंडी पड़ सकती है, खुली चर्चा कम हो सकती है और सावधानी वाले फैसले की जगह डर से कार्रवाई होगी।

क्या बेहतर हो सकता था

नियम एससी/एसटी या ओबीसी शिकायतकर्ताओं को मजबूत प्रक्रिया सुरक्षा देते हैं लेकिन सामान्य वर्ग के लिए वैसी सुरक्षा नहीं। गलत शिकायतों को रोकने का स्पष्ट तरीका, सबूत का मानक या पहले चरण में स्वतंत्र निगरानी न होना सभी को प्रभावित करता है।

ज्यादा मजबूत फ्रेमवर्क सख्त रुख से बचता और दोनों तरफ सुरक्षा देता। इसमें गलत इरादे वाली शिकायतों का स्पष्ट प्रावधान, सबूत के साफ मानक और सभी वर्गों में तटस्थता होती। लिंग की तरह जो बिना पूर्वाग्रह के सभी को कवर करता है। ऐसे कदम नियमों की विश्वसनीयता बढ़ाते और चुनिंदा निष्पक्षता की शिकायत कम करते।

भेदभाव से सुरक्षा और प्रक्रिया के गलत इस्तेमाल से सुरक्षा को साफ अलग न करके नियम अविश्वास और गलत समझ पैदा करते हैं। इस कमी को दूर करने से इक्विटी के उद्देश्य कमजोर नहीं होते, बल्कि मजबूत होते क्योंकि निष्पक्षता दोनों तरफ काम करती।

इरादा बनाम डिजाइन, कम्युनल वायलेंस बिल की याद

यूजीसी इक्विटी प्रमोशन रेगुलेशंस 2026 का उद्देश्य है कि कैंपस संविधान की बराबरी और इज्जत की गारंटी निभाएँ और टीचर्स, स्टाफ, स्टूडेंट्स को गलत व्यवहार से बचाएँ।

लेकिन अच्छा इरादा अकेला अच्छा डिजाइन नहीं बनाता। हर व्यक्ति के अधिकार बचाने वाला फ्रेमवर्क खुद सही प्रक्रिया, सबूत की स्पष्टता और संतुलन पर टिका होना चाहिए। स्पीड, धारणा और अनुपालन को तरजीह देकर जरूरी सुरक्षा छोड़ने से नियम एक गलत को दूसरे से बदलने का खतरा पैदा करते हैं। बिना साफ मानक, दोनों तरफ सुरक्षा या गलत इस्तेमाल से बचाव के इक्विटी तंत्र अनजाने में डर, खुद सेंसरशिप और डर से फैसले पैदा कर सकते हैं।

दरअसल ये यूजीसी नियम उस कम्युनल वायलेंस बिल से बेहतर नहीं हैं जिसे कॉन्ग्रेस की सरकार लाना चाहती थी।

कम्युनल वायलेंस बिल का ड्राफ्ट, आधिकारिक नाम प्रिवेंशन ऑफ कम्युनल एंड टारगेटेड वायलेंस (एक्सेस टू जस्टिस एंड रेपरेशंस) बिल 2011, अगर पास होता तो सबसे खराब कानूनों में होता। बिल मानता था कि कम्युनल हिंसा के शिकार सिर्फ धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक और एससी-एसटी हो सकते हैं, हकीकत को नजरअंदाज करके। तब अरुण जेटली ने सही कहा था कि बिल बहुसंख्यक विरोधी है और मानता है कि कम्युनल हिंसा में हमेशा बहुसंख्यक दोषी होता है। मौजूदा नियम उसी सख्त कम्युनल वायलेंस बिल की कॉपी लगते हैं जिसे 32 ‘सिविल सोसाइटी सदस्यों’ और विदेशी कनेक्शन वाले एनजीओ ने मिलकर लिखा था।

हाल के समय में ब्राह्मण विरोधी बातें उफान पर हैं और भेदभाव का पलड़ा सामान्य जाति कहे जाने वालों के खिलाफ झुक गया है। 2024 की एक रिसर्च ने कहा कि नाजियों की यहूदियों से नफरत वैसी ही डीईआई प्रोग्राम्स से ब्राह्मणों के खिलाफ नॉर्मल की जा रही है।

नाजियों वाली नफरत ब्राह्मणों पर: एक रिसर्च पेपर ने क्या कहा

रटगर्स यूनिवर्सिटी और नेटवर्क कंटेजियन रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनसीआरआई) की हालिया स्टडी का नाम है इंस्ट्रक्टिंग एनिमोसिटी: हाउ डीईआई पेडागॉजी प्रोड्यूसेज द होस्टाइल एट्रिब्यूशन बायस। इसमें पाया गया कि डीईआई प्रोग्राम्स ब्राह्मणों जैसे कुछ धार्मिक, नस्ली और जाति ग्रुप्स के खिलाफ गलत धारणाएँ और नफरत फैला रहे हैं जबकि मुस्लिमों के लिए बेवजह हमदर्दी पैदा कर रहे हैं।

जाति संवेदनशीलता ट्रेनिंग के असर की जाँच में रिसर्च ने एंटी-ब्राह्मण एक्टिविस्ट ग्रुप इक्वैलिटी लैब्स की ट्रेनिंग सामग्री को प्रयोग के रूप में इस्तेमाल किया। न्यूट्रल एकेडमिक सोर्स को कंट्रोल के रूप में। दो ग्रुप्स थे- एक को-इक्वैलिटी लैब्स वाला टेक्स्ट, दूसरे को न्यूट्रल।

दोनों ग्रुप्स ने टेक्स्ट पढ़ने के बाद बिना जाति संकेत वाला सिनेरियो देखा। स्टडी में पाया गया कि इक्वैलिटी लैब्स वाला टेक्स्ट पढ़ने वालों में माइक्रोएग्रेशन, नुकसान और इंटरव्यू में पूर्वाग्रह की धारणा काफी ज्यादा थी (क्रमशः 32.5%, 15.6% और 11% ज्यादा)।

आगे पता चला कि इक्वैलिटी लैब्स टेक्स्ट पढ़ने वाले 19% ज्यादा तैयार थे सिनेरियो के एडमिनिस्ट्रेटर को सजा देने को और 47% ने हिंदुओं को “नस्लवादी” माना। ये दिखाता है कि डीईआई कंटेंट पूर्वाग्रह हटा नहीं रहा बल्कि हिंदुओं, खासकर ऊपरी जाति कहे जाने वाले ब्राह्मणों के खिलाफ पैदा कर रहा है जो पहले से एंटी-हिंदू ताकतों की नफरत के शिकार हैं।

इसी तरह जब डीईआई वाला मैटेरियल पढ़ने वालों ने हिटलर के स्टेटमेंट्स और माइन कैंपफ के बदले वर्जन देखे जिसमें ‘ज्यू’ की जगह ‘ब्राह्मण’ था, तो वे ज्यादा सहमत थे कि ब्राह्मण ‘परजीवी’ (+35.4%), ‘वायरस’ (+33.8%) और ‘शैतान का अवतार’ (+27.1%) हैं।

रटगर्स-एनसीआरआई की रिसर्च बताती है कि डीईआई प्रोग्राम्स के दावे के उलट नाजियों की यहूदियों से नफरत कुछ डीईआई प्रोग्राम्स से ब्राह्मणों के खिलाफ नॉर्मल हो रही है। नाजी जर्मनी में यहूदी नरसंहार रातोंरात नहीं हुआ, ये धीरे-धीरे प्रोपगैंडा और नफरत के फैलाव का नतीजा था। यहूदियों को सदियों से दुनिया में निकाला गया, अलग किया गया और हिंसा का शिकार बनाया गया। प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी की हार और 1929 की मंदी के बाद यहूदियों से नफरत बेकाबू हो गई। भाषणों, पैम्फलेट्स से लेकर 1935 के नूरेम्बर्ग कानून तक जो नागरिकता छीनते थे, यहूदी विरोधी हिंसा, अलगाव और आखिर में कंसंट्रेशन कैंप्स में गैस से मारना-नफरत को सिस्टेमैटिक तरीके से फैलाया गया और ये नरसंहार तक पहुँची। याद रखें कि इंसानियत खत्म करने वाली बातें हमेशा नरसंहार से पहले आती हैं।

ऑपइंडिया ने तब लिखा था कि इस्लामी-लेफ्ट गठजोड़ ब्राह्मणों के अस्तित्व और नरसंहार के खतरे को खारिज कर देगा, हिंदू धार्मिक लोग भी इसे बढ़ा-चढ़ाकर बताया हुआ मानेंगे। लेकिन यहूदियों की तरह ब्राह्मणों ने भी काफी दुख और उत्पीड़न झेला है। एक बड़ा उदाहरण 1948 में महाराष्ट्र में एंटी-ब्राह्मण दंगे थे, गाँधीजी की हत्या के बाद चितपावन ब्राह्मण नाथूराम गोडसे द्वारा। तब गाँधी समर्थकों और कॉन्ग्रेस नेताओं ने ब्राह्मणों पर हमला किया, नरसंहार जैसी हिंसा हुई। दंगाइयों ने कई ब्राह्मण मारे और उनके घर-प्रॉपर्टी तबाह की।

1980 के दशक में इस्लामिस्टों के हाथों कश्मीरी पंडितों की हत्याएँ और पलायन याद दिलाता है कि आजाद भारत में एंटी-ब्राह्मण हिंसा मुमकिन थी, हुई और अगर ब्राह्मणों से नफरत अनियंत्रित फैलती रही और ‘सोशल जस्टिस’ के नाम पर सेलिब्रेट हुई तो फिर हो सकती है।

ब्राह्मणों से नफरत करने वाले एक्टिविस्ट और संगठन सिनेमा, मीडिया, राजनीति से लेकर डीईआई प्रोग्राम्स तक हर तरीके से ब्राह्मणों से नफरत को सामान्य बना रहे हैं भले जरूरत न हो। रटगर्स-एनसीआरआई रिसर्च से पता चला कि हिटलर की यहूदी नफरत वाली बातें ब्राह्मणों पर लगाई जाएँ तो ठीक लगती हैं, इससे समझ आता है कि एंटी-ब्राह्मण ताकतें न्यूट्रल लोगों के दिमाग में हिटलर-नाजी स्तर की नफरत पैदा कर रही हैं।

आज भी ब्राह्मणों के खिलाफ हिंसा के बुलावे बिना सख्त सजा के दिए जाते हैं। ब्राह्मणों को बदनाम करना, गलत चित्रण और शैतानीकरण को लेफ्ट-लिबरल सिस्टम में प्रोग्रेसिव, लिबरल और बराबरी वाली सोच का चिह्न माना जाता है।

सच्ची बराबरी प्रक्रिया के असंतुलन या नाम और संस्थान को नुकसान के डर पर नहीं टिक सकती। ये दोनों तरफ निष्पक्षता पर टिकी होनी चाहिए- भेदभाव झेलने वालों की रक्षा करते हुए बिना सबूत या गलत इरादे के आरोपों से भी बचाव। इज्जत बचाने वाला नियम खुद स्पष्टता, संयम और सही प्रक्रिया के सम्मान से चलना चाहिए।

(नोट: हमने यूजीसी चेयरमैन डॉ. विनीत जोशी को विस्तृत सवाल भेजे हैं। जवाब मिलने पर यह लेख अपडेट किया जाएगा।)

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित की गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

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