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बिना नंबर की गाड़ी से आया और बिट्टू बजरंगी के भाई को लगा दी आग, बताया- हिंदुओं को फँसाने के लिए अपनी ही दुकान जला चुका है अरमान खान

फरीदाबाद की डाबुआ कॉलोनी में बुधवार (13 दिसंबर, 2023) की रात हिंदूवादी कार्यकर्ता बिट्टू बजरंगी के परिवार को निशाना बनाया गया, जिसमें बिट्टू बजरंगी के भाई महेश पर थिनर डालकर आग लगा दिया गया। महेश पांचाल की हालत गंभीर है। महज कुछ घंटों के अंदर ही उन्हें तीसरे अस्पताल में ट्रांसफर किया गया है। महेश पांचाल 60 प्रतिशत से अधिक झुलस गए हैं और उनकी हालत बेहद नाजुक बताई जा रही है। डॉक्टरों का कहना है कि अगले 72 घंटे उनके लिए काफी महत्वपूर्ण हैं।

जानकारी के मुताबिक, महेश को जलाने वाले हमलावरों ने पहले तो महेश को पकड़ कर जलाने की कोशिश की, लेकिन वो सफल नहीं हुए। फिर उसके ऊपर थिनर डाल कर आग लगा दी। इसके बाद आरोपित भाग गए। महेश ने तुरंत नाले में कूद लगाई, लेकिन आग नहीं बुझी। इसके बाद उन्होंने 3-4 डुबकियाँ मारीं, तब जाकर आग बुझी। इसके बाद करीब 800 मीटर दूर स्थित घर खुद ही चल कर आए। किसी ने रास्ते में मदद नहीं की। महेश जब घर पहुँचे, तो खुद बिट्टू उन्हें लेकर अस्पताल गए।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अरमान की अगुवाई में हमलावरों ने पहले बिट्टू बजरंगी के भाई महेश पांचाल की बाकायदा पहचान सुनिश्चित की। उन्होंने महेश पांचाल से पूछा कि ‘क्या तुम बिट्टू बजरंगी के भाई हो?’ इस सवाल के जवाब में महेश ने जैसे ही हाँ कहा, उन लोगों ने उनके ऊपर थिनर डाला और आग के हवाले कर दिया। 

इस मामले में मुख्य आरोपित अरमान खान से पूछताछ किए जाने की पुलिस ने ​पुष्टि की है। हालाँकि उसे हिरासत में लेने या गिरफ्तार किए जाने से इनकार किया है। इस बीच, पुलिस ने क्राइम सीन का मुआयना किया है। जानकारी के मुताबिक, हमलावरों ने जिस सफेद रंग की वैगनआर का इस्तेमाल किया उस पर नंबर नहीं दर्ज था। उसके साथ संदिग्ध तौर पर 2 बाइकें भी घटनास्थल पर गई थीं।

बिट्टू बजरंगी ने बताया कि अब तक महेश को तीन अस्पतालों में ले जाया गया है। पहला सरकारी अस्पताल, संतोष अस्पताल और अब प्राची अस्पताल – डॉक्टर ने अगले 72 घंटे बहुत क्रिटिकल बताए हैं। इस मौके पर हिंदू संगठनों के कार्यकर्ता भी अस्पताल पहुँचे, वहीं स्थानीय भाजपा विधायक भी महेश का हालचाल लेने पहुँचे।

बिट्टू का दावा है कि नूहं दंगा के दौरान अरमान फरीदाबाद में जूस बेचा करता था। उसने अपनी दुकान में खुद ही आग लगा कर हिंदुओं को फँसाने की कोशिश की थी। पुलिस की जाँच में वो पकड़ा गया था।

बिट्टू बजरंगी ने ये भी कहा कि उन्हें लंबे समय से जान से मारने की धमकी दी जा रही थी कि अपनी चप्पल लेकर जा। ‘चप्पल’ का कोड है – नूहं में जो चप्पल छोड़कर भागे थे, वो लेकर जाओ। क्योंकि नूहं में हिंदुओं पर जब हमले हुए थे, तब काफी लोगों के जूते-चप्पल मंदिर के बाहर ही छूट गए थे। ऐसे में उसे कोड की तरह इस्तेमाल किया जाता था।

खुद बिट्टू का ये दावा है कि जिन लोगों ने उनके भाई पर हमला किया, वो सब नूहं हिंसा से जुड़े हैं। उसके बाद से ही उन्हें और परिवार को निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि परिवार हथियारों का लाइसेंस माँग रहा था, लेकिन प्रशासन ने लाइसेंस नहीं दिया। यही नहीं, बिट्टू ने एक पुलिस अधिकारी के हवाले से दावा किया है कि जो शख्स धमकियाँ देता था, उसने गुड़गाँव के बड़े व्यापारी से भी प्रोटेक्शन मनी माँगी थी। वो प्रोफेशनल अपराधी हैं।

ऑपइंडिया की टीम भी मौके पर पहुँची और पाया कि अस्पताल में भारी मात्रा में पुलिस बल तैनात हैं। हिंदू संगठनों के लोग भी मौके पर मिले। किसी को भी पीड़ित से मिलने की अनुमति नहीं है। इस मामले में पुलिस ने धारा 147, 149, 307 और 326A समेत कई धाराएँ लगाई हैं।

‘नवा केरल’ में वामपंथी सरकार बिजी, फिर सबरीमाला की सुध कौन ले: भक्तों की भीड़ पर अव्यवस्था भारी, जागा हाई कोर्ट

केरल में भगवान अयप्पा के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में हर दिन करीब एक लाख श्रद्धालु पहुँच रहे हैं। पिछले साल के मुकाबले इस बार श्रद्धालुओं की संख्या काफी बढ़ी है, इसकी वजह से काफी अव्यवस्थाओं का सामना करना पड़ रहा है। 18 घंटे तक लाइन में खड़े होने के बाद ही भक्त मंदिर में दर्शन कर पा रहे हैं। इसके कारण कई बार बैरिकेड्स टूटने और भगदड़ मचने की खबर आ चुकी है। 12 साल की एक बच्ची की दर्शन के लिए जाते समय मौत हो गई, तो तमिलनाडु से मंदिर पहुँची एक अन्य श्रद्धालु की पहाड़ की चढ़ाई के दौरान मौत हो गई।

रिपोर्ट के अनुसार, भक्तों को पिछले कुछ हफ्तों से जंगल में कष्ट उठाने पड़ रहे हैं। उन्हें घंटों तक बसों का इंतजार करना पड़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार इन क्षेत्र में लोगों के लिए ठहरने के लिए कोई टेंट या किसी प्रकार की छत मौजूद नहीं है।

हालात देखकर ऐसा लगता है कि केरल सरकार की इन भक्तों की कोई परवाह ही नहीं है। पुलिस के जवानों की संख्या की कमी से लेकर श्रद्धालुओं के मंदिर तक पहुँचने और पहाड़ी की चढ़ाई के दौरान उनके विश्राम करने जैसी कोई व्यवस्था नजर नहीं आती। हर तरफ अफरा-तफरी का माहौल है। उधर केरल के वामपंथी मुख्यमंत्री पी विजयन इस समय पूरे राज्य में संपर्क यात्रा निकाल रहे हैं, जिसे ‘नवा केरल सदस’ नाम दिया गया है। मुख्यमंत्री की संपर्क यात्रा और रैलियों के लिए भारी पुलिस बल की तैनाती दिख रही है। सबरीमाला में सुरक्षा बलों की कमी की एक वजह यह भी मानी जा रही है।

बता दें कि सबरीमाला में मंडलम-मकरविलक्कू का सीजन चल रहा है। इस साल 17 नवंबर से शुरू हुए इस सीजन में सबरीमाला मंदिर में भक्तों की भीड़ उमड़ रही है। हर रोज करीब 1.20 लाख श्रद्धालु दर्शन करने के लिए पहुँच रहे हैं।

सबरीमाला में अव्यवस्थाओं की लंबी लिस्ट

कुछ दिन पहले ही सबरीमाला से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। इस वीडियो में एक बच्चा दिखता है, जो बस की खिड़की से रोता हुआ दिख रहा है, वो अपने पिता से बिछड़ गया था।

इसके अलावा सबरीमाला जाने के लिए जिस जगह से बस पकड़ी जाती है, उस निलक्कल बस स्टेशन से जुड़े कई वीडियो सोशल मीडिया पर भी दिख रहे हैं। बसों की बेहद कमी हैं और लोगों को घंटों तक इंतजार करना पड़ रहा है।

मंदिर में भगदड़, कई मौतें: 9 दिसंबर 2023 को 12 साल की बच्ची पद्मश्री की मौत हो गई। उसे बचपन से दिल से जुड़ी बीमारी भी थी। वो भीड़ में समूह के साथ ही चल रही थी, तभी कोलैप्स होकर गिर पड़ी। इसके बाद 13 दिसंबर को एक महिला, जो तमिलनाडु से आई थी, वो पारंपरिक रास्ते से मंदिर में प्रवेश के लिए जा रही थी तो गिर गईं। उनकी मौत की जानकारी सामने आने के बाद स्पेशल टीम को भेजना पड़ा, ताकि उनका शव वापस लाया जाए।

इस बीच, सबरीमाला मंदिर में ‘कुप्रबंधन’ को लेकर केरल में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। बीजेपी युवा मोर्चा ने भी प्रदर्शन किए हैं, तो सबरीमाला मंदिर में पहुँचे श्रद्धालुओं ने भी सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किए हैं। वहीं, सरकार का दावा है कि सब कुछ कंट्रोल में है।

बुनियादी सुविधाओं का अभाव, केरल हाई कोर्ट ने भी लिया संज्ञान

सबरीमाला मंदिर में दर्शन के दौरान यात्रियों को हो रही परेशानियों पर केरल हाई कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया है। केरल हाई कोर्ट ने स्टेट रोडवेज की बसों को बढ़ाने का निर्देश दिया है, ताकि श्रद्धालुओं की तकलीफों को कम किया जा सके। इसके अलावा हाई कोर्ट ने व्यवस्थाओं को देखने के लिए एक कमेटी का भी गठन किया है। हालाँकि हाई कोर्ट को सरकार ने बताया है कि भीड़ की वजह से दिक्कतें नहीं हो रही हैं, बल्कि हालात नियंत्रण में हैं।

देवस्वोम मंत्री के राधाकृष्णन ने कहा कि वास्तव में भक्तों की संख्या में वृद्धि हुई है और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए हस्तक्षेप किया गया है। उन्होंने कहा कि तीर्थयात्रियों का सबसे बड़ा उद्देश्य पथिनेट्टमपदी पर चढ़ना है, जो थोड़ा कठिन है। उन्होंने कहा कि कुछ सीमाएँ भी हैं, क्योंकि वृद्ध व्यक्तियों, दिव्यांगों, महिलाओं, बच्चों आदि को इस पर चढ़ना पड़ता है और इसके लिए अधिक समय की आवश्यकता होती है। इसी वजह से दर्शन के समय को बढ़ाया गया है। मंदिर का पट अब तीर्थयात्रा सीजन के दौरान हर दिन दोपहर 3 बजे खुलेगा, जिससे तीर्थयात्रियों को 18 घंटे दर्शन का मौका मिलेगा। यह कदम तीर्थयात्रियों, सरकार, बोर्ड और अदालत की सभी भक्तों के लिए सुचारू दर्शन सुनिश्चित करने की माँग के जवाब में उठाया गया है।

वहीं, मुख्यमंत्री पी विजयन इस समय नवा केरल सदस नाम से रैलियाँ कर रहे हैं। 19 नवंबर से शुरू हुआ यह​ सिलसिला 24 दिसंबर तक चलेगा। उनकी रैलियों में प्रबंधन के लिए भारी संख्या में पुलिस वालों की तैनाती की जा रही है। हालाँकि मुख्यमंत्री पी विजयन ने विपक्ष द्वारा सरकार और त्रावणकोर देवास्वोम बोर्ड पर लगाए जा रहे भीड़ का प्रबंधन करने में विफल होने के आरोपों को खारिज कर दिया है। विजयन ने कहा कि अनियंत्रित भारी भीड़ की वजह से कुछ दुर्घटनाएँ हमारे नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं। हम मामलों को अत्यधिक सावधानी से सँभाल रहे हैं और स्थिति को काबू करने के लिए सबरीमाला में 16,118 पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं।

सबरीमाला मंदिर में दर्शन के लिए अपनाई जाती है ये प्रक्रिया

केरल में 18 पहाड़ियों के बीच बसा 800 साल पुराना सबरीमाला मंदिर भगवान अयप्पा को समर्पित है। ये मंदिर पथानामथिट्टा जिले के रन्नी तालुक के भीतर रन्नी-पेरुनाड गाँव में स्थित है। यह मंदिर भारत के सबसे प्रसिद्ध हिंदू मंदिरों में से एक है। सबरीमाला मंदिर में दर्शन के लिए कुछ नियम और शर्ते हैं, जिनका पालन करना सभी श्रद्धालुओं के लिए अनिवार्य है। सबरीमाला मंदिर में दर्शन के लिए ऑनलाइन या ऑफलाइन पंजीकरण किया जा सकता है। पंजीकरण के बाद, श्रद्धालुओं को दर्शन का समय बुक करना होता है। नियमों में श्रद्धालुओं को 41 दिनों का सादगी भरा जीवन जीना होता है। ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है।

बंगाल के जमालुद्दीन के रामलला नहीं होंगे राम मंदिर में विराजमान, अयोध्या में 3 मूर्तिकार कर रहे प्रतिमा तैयार: न्यूज 24 कर रहा है गुमराह

अयोध्या में बन रहे भव्य राम मंदिर में 22 जनवरी, 2024 को प्राण-प्रतिष्ठा का कार्यक्रम होगा। जैसे-जैसे इसकी तारीख नज़दीक आते जा रही है, मीडिया में भी कई तरह की खबरें आ रही हैं। अब ‘News 24’ ने एक भ्रामक ट्वीट डाल कर दावा किया कि रामलला की मूर्तियों का निर्माण मुस्लिम कर रहे हैं। ‘न्यूज़ 24’ ने अपने ट्वीट में लिखा, “जनवरी में अयोध्या के राम मंदिर में विराजने के लिए रामलला तैयार हैं। मूर्तियों को बंगाल के मोहम्मद जमालुद्दीन और उनके बेटे बिट्टू ने किया तैयार। पिता-पुत्री की जोड़ी लंबे समय से शिल्पकारी कर रहे हैं।”

साथ ही मीडिया संस्थान ने जमालुद्दीन का ये बयान भी छापा, “धर्म एक निजी चीज होती है। हमारे देश में कई धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं। एक कलाकार के तौर पर भाईचारे की संस्कृति मेरा सन्देश है।” ये ट्वीट मीडिया संस्थान ने गुरुवार (14 दिसंबर, 2023) को पोस्ट किया। इस पोस्ट के जरिए एक तरह से ये बताने की कोशिश की गई है कि राम मंदिर में रामलला की मुख्य प्रतिमा का निर्माण मुस्लिम कर रहे हैं। ये पूरी तरह भ्रामक है और गलत सन्देश देने वाला है।

मुस्लिम बना रहे रामलला की प्रतिमा – ‘News 24’ की खबर भ्रामक

दूसरे मीडिया संस्थानों की खबरों को खँगालने पर पता चलता है कि राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के लिए जो समारोह होगा, उसमें सजाने के लिए जो मूर्तियाँ बन रही हैं – उन्हें जमालुद्दीन और उसका बेटा बिट्टू बना रहे थे। ये आदमकद मूर्तियाँ फाइबर की बनाई जा रही हैं, जिन्हें मंदिर परिसर में लगाया जाएगा। भगवान राम की कई मूर्तियाँ अयोध्या के मुख्य स्थलों पर लगाने की भी तैयारी है, उन्हें गढ़ने में जमालुद्दीन और उसका बेटा शामिल हैं। ये लोग मुख्य प्रतिमा नहीं बना रहे।

फाइबर की प्रतिमाओं को मुख्यतः सजावट के लिए उपयोग में लाया जाता है, उन्हें मंदिर के भीतर स्थापित नहीं किया जाता। जहाँ भारत में अधिकतर मंदिरों में पत्थर की प्रतिमाएँ स्थापित की जाती हैं, वहीं त्योहारों के दौरान मिट्टी की मूर्तियाँ बनाई जाती हैं जिन्हें बाद में विसर्जित कर दिया जाता है। अयोध्या में रामलला की 3 मुख्य प्रतिमाएँ बन रही हैं, शिल्पकार अलग-अलग हैं। इन्हीं में से एक को गर्भगृह में स्थापित किया जाएगा और प्राण-प्रतिष्ठा का कार्यक्रम होगा।

वहीं जमालुद्दीन और उसका बेटा ऐसी मूर्तियाँ बना रहे जिन्हें मंदिर से बाहर लगाया जाना है और उन्हें बनाने में फाइबर का इस्तेमाल किया जाता है ताकि वो हर मौसम और परिस्थिति को बर्दाश्त कर सकें। नॉर्थ 24 परगना के रहने वाले बाप-बेटों को ये काम ऑनलाइन खोजने पर मिला था और फिर अयोध्या से उन्हें ऑर्डर मिला। अपने ही नाम से वर्कशॉप चलाने वाले बिट्टू का कहना है कि एक आदमकद प्रतिमा बनाने में एक-डेढ़ महीने लगते हैं और इसमें 30-35 लोग मेहनत करते हैं। इन मूर्तियों को अयोध्या ले जाया जाएगा।

जहाँ तक रामलला की मुख्य प्रतिमा की बात है, ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ के महासचिव चंपत राय ने बताया था कि गणेश भट्ट, कर्नाटक के अरुण योगीराज और जयपुर के सत्यनारायण पांडेय ये प्रतिमाएँ बना रहे हैं। 2 मूर्तियाँ कर्नाटक और एक राजस्थान के पत्थर से बन रहे हैं। नेपाल, ओडिशा और महाराष्ट्र से भी पत्थर आए थे, लेकिन उन्हें मुख्य प्रतिमा के लिए उपयुक्त नहीं पाया गया। गणेश भट्ट नेल्लिकारु रॉक (कृष्ण शिला) से मूर्ति बना रहे हैं। वहीं अरुण योगीराज केदारनाथ में शंकराचार्य की प्रतिमा गढ़ने के लिए जाने जाते हैं, जिसका लोकार्पण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था।

बिहार में मृत्युभोज को लेकर हत्या, सोशल मीडिया में राजस्थान के एक्ट पर बहस: जानिए क्या है मौत के बाद भोजन कराने की परंपरा, क्या कहता है कानून

62 साल के कमलेश्वरी मंडल को पहले बाँधकर पीटा। फिर गर्दन मरोड़कर हत्या कर दी। मंडल ने अपने जीजा की मृत्यु के बाद भोज का आयोजन अपने घर पर किया था, क्योंकि उनकी बहन मायके में रहती थी। कथित तौर पर इससे उनके जीजा के परिजन और रिश्तेदार नाराज थे।

बिहार के पूर्णिया में मृत्युभोज को लेकर हत्या की यह खबर ऐसे समय में आई है, जब सोशल मीडिया में राजस्थान के मृत्युभोज निवारण अधिनियम 1960 को लेकर बहस छिड़ी हुई है। इस बहस की शुरुआत 13 दिसम्बर 2023 को राजस्थान पुलिस के एक सोशल मीडिया पोस्ट से हुई।

एक्स/ट्विटर पर इस कानून के बारे में बताते हुए राजस्थान पुलिस ने लिखा है, “मृत्युभोज करना और उसमें शामिल होना कानूनन दंडनीय है। मानवीय दृष्टिकोण से भी यह आयोजन अनुचित है। आइए मिलकर इस कुरूति को समाज से दूर करें, इसका विरोध करें।”

इसके बाद राजस्थान पुलिस की आलोचना होने लगी। इसे कई पोस्ट में परंपराओं में गैर जरूरी दखल बताया और कुछ लोगों ने इस पोस्ट के भाजपा के नई सरकार के गठन से ठीक पहले किए जाने पर प्रश्न उठाए।

लोगों ने कहा कि मृत्युभोज में लोग अपने पितरों के मोक्ष के लिए करते हैं। कुछ यूजर्स ने पूछा कि इसे कुरीति कैसे कहा जा सकता है? लोगों ने राजस्थान पुलिस को औपनिवेशिक दिमाग वाला बाबू बताते हुए चोरों को पकड़ने की हिदायत दी। एक यूजर ने कहा कि एकाएक राजस्थान पुलिस इस विषय पर क्यों पोस्ट कर रही है, जबकि इस सम्बन्ध में कानून 1960 से ही है।

क्या राजस्थान पुलिस इस विषय में पहली बार पोस्ट कर रही है?

ऐसा पहली बार नहीं है जब राजस्थान की पुलिस ने मृत्युभोज और इससे सम्बंधित कानून पर पोस्ट किया हो। इससे पहले 2020, 2021, 2022 और 2023 में भी पोस्ट कर चुकी है। राजस्थान पुलिस के जिला स्तर के हैंडल भी इस विषय में ट्वीट करती आई है। हालाँकि 2020 से पहले का कोई पोस्ट नहीं है और इसका एक कारण है।

राजस्थान पुलिस द्वारा पूर्व में की गई पोस्ट
राजस्थान पुलिस द्वारा पूर्व में की गई पोस्ट
राजस्थान पुलिस द्वारा पूर्व में की गई पोस्ट
राजस्थान पुलिस द्वारा पूर्व में की गई पोस्ट
राजस्थान पुलिस द्वारा पूर्व में की गई पोस्ट
राजस्थान पुलिस द्वारा पूर्व में की गई पोस्ट

इस विषय में कानून भले ही 1960 में ही बन गया हो, लेकिन वर्ष 2020 से पहले तक राजस्थान में इस कानून का कड़ाई से पालन नहीं हो रहा था। इस कानून को कड़ाई से पालन करवाने की शुरुआत हुई 2020 में जब कोरोना महामारी आई।

राजस्थान सरकार ने कोरोना महामारी में लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगाई थी। इस दौरान राजस्थान सरकार ने आदेश दिए कि कोरोना गाइडलाइन्स का उल्लंघन ना होने पाए और मृत्युभोज जैसे आयोजन ना किए जाएँ, क्योंकि इनमें लोग इकट्ठा होते हैं। इस संबंध में कई शिकायतें भी आई थीं। इसके बाद कुछ मामले भी दर्ज हुए और जुर्माना भी लगा।

मृत्युभोज और मृत्युभोज कानून क्या है?

राजस्थान के सभी इलाकों और विशेष कर ग्रामीण अंचलों में यह परम्परा रही है कि किसी की मृत्यु के निश्चित दिनों के बाद उसके परिजन मृत्युभोज का आयोजन करते हैं। यह भारत में अन्य प्रदेशों में भी होता है। इस आयोजन में परिजनों के अलावा मृतक का परिवार अपने सम्बन्धियों तथा गाँव-मोहल्ले और समाज के लोगों को आमंत्रित करता है।

इसका उद्देश्य यह होता है कि जिस भी घर में मृत्यु हुई है, उसके यहाँ से आना-जाना पुनः सामान्य हो गया है और शोक का काल समाप्त हो गया है। हालाँकि, इस रीति में समस्या तब आई जब यह समाज में दबाव डाल कर करवाया जाने लगा। ऐसे में जो परिवार इस आयोजन में सक्षम नहीं थे उन पर कभी-कभी कर्जे का भी बोझ चढ़ जाता था। यह भी कहा गया कि जो व्यक्ति मृत्युभोज नहीं करवाते उनको समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता था।

हालाँकि, ऐसा नहीं है कि हिन्दुओं में ही मृत्युभोज का आयोजन होता है, मुस्लिमो में चेहल्लुम का आयोजन किया जाता है। यह मृतक की मौत के 40 दिन के बाद आयोजित होता है जिसमें लोगों को खाने पर बुलाया जाता है।

इसको लेकर राजस्थान में राजस्थान मृत्युभोज निवारण अधिनियम वर्ष 1960 में आया। इसके अंतर्गत नुक्ता, मोसर और चेहल्लुम जैसे आयोजनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। हालाँकि, इसके अंतर्गत परिजनों, अपने जानने वालों और अन्य लोगों को भोज करवाने पर रोक नहीं थी।

राजस्थान मृत्युभोज निवारण कानून
राजस्थान मृत्युभोज निवारण कानून

इस कानून के तहत मृत्युभोज का आयोजन करने और उसमें भाग लेने, दोनों को गैरकानूनी घोषित किया गया। इसके उल्लंघन पर ₹1,000 और एक वर्ष तक सजा का प्रावधान किया गया। इस कानून में मृत्युभोज या अन्य ऐसे ही किसी आयोजन में कितने लोग शामिल हों, उसकी संख्या नहीं बताई गई है। राजस्थान सरकार का ही एक अन्य कानून कहता है कि 100 लोगों से अधिक के भोज का आयोजन नहीं किया जा सकता।

हालाँकि, यह कानून किसी भी तरह से लोगों को इस बात से नहीं रोकता कि वह अंतिम संस्कार से सम्बंधित रीति-रिवाजों में कोई बदलाव करें। इसका उद्देश्य यह था कि मृत्युभोज के कारण किसी परिवार पर आर्थिक बोझ ना पड़े। या किसी को कोई इसके लिए मजबूर न कर सके।

संसद में स्प्रे करने वाले लौंडे का लाठी से नहीं हुआ ‘स्वागत’ इसलिए छटपटा रहे हैं RJD के ‘लठैत’: कुटाई पर लिबरल प्रलाप ‘दुख’ नहीं, ‘दर्द’ है उनका

जब टीवी एलीट माना जाता था, तब उस पर एक प्रचार आता था। जिसमें उस दौर के बुजुर्ग अभिनेता अशोक कुमार और शम्मी कपूर यह समझाते नजर आते थे कि ‘स्वागत मतलब पान पराग’ होता है। उसी दौर में बिहार में एक मसीहा उभर रहा था, जिसे आमलोगों का नेता माना जाता था। यह दूसरी बात है कि बाद में वह ‘चाराखोर’ निकला और लोगों को यह भी पता चला कि उसके लिए ‘स्वागत’ का मतलब लाठी होता है।

जाहिर है कि जिनकी ट्रेनिंग ही लाठी वाले चरवाहा विद्यालय में हुई हो वे झोंटा पकड़कर खींचने, मुक्का मारने, जूतियाने… को तो ‘स्वागत’ नहीं ही मानेंगे। इसलिए लोकसभा में 13 दिसम्बर 2023 को कूदकर स्प्रे मारने वाले लौंडे की सांसदों वाली कुटाई कुछ लोगों को रास नहीं आई है। लेकिन यह उनका दुख नहीं (जैसा कुछ लोग समझ रहे हैं), बल्कि दर्द है।

जब ‘दर्द’ गहरा हो और पिटने वाला लौंडा ‘अपना’ हो तो लाठी बगैर उसका ‘स्वागत’ लोकतंत्र की सेहत के लिए खराब हो ही जाता है। यही कारण है कि बिहार को 15 साल तक जंगलराज के चरमसुख का भोग कराने वाली राष्ट्रीय जनता दल (RJD) को इस ‘स्वागत’ से ज्वर हो गया है। राजद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष (यदि वहाँ ऐसे किसी पद की औकात हो) शिवानन्द तिवारी ने कहा है कि वह यह मान नहीं सकते कि वह युवक संसद में हिंसा फैलाने के लिए कूदा था। उनका विचार है कि यह ‘छोटी-मोटी घटना’ है।

छोटी-मोटी घटना वाली उनकी बात में दम है, क्योंकि तेजाब से युवकों को नहलाने वाले शहाबुद्दीन को उनकी ही पार्टी उस लोकसभा में भेजा करती थी, जिसमें 13 दिसंबर को स्प्रे वाली घटना हुई है। वहीं राजद के बुद्धिजीवी होने का दावा करने वाले (यह दावा सिद्ध नहीं किया जा सकता) प्रोफेसर मनोज झा का कहना है कि सांसदों पर हमला करने आए युवकों की पिटाई ‘असंसदीय’ है और सांसदों की छवि (अगर उनकी छवि पहले से कुछ अच्छी है तो) को बिगाड़ता है।

भले प्रोफेसर झा स्वयंभू बुद्धिजीवी हों लेकिन उनकी यह बात मूर्खतापूर्ण लगती है।अपने ऊपर हमले से बचने के लिए प्रतिक्रिया करने का अधिकार देश का संविधान भी इस देश के लोगों को देता है। जाहिर है सांसदों ने संविधान का पालन किया है। (इसके लिए वह बधाई के पात्र हैं)

सांसदों ने अगर उस युवक को नियंत्रित करने के लिए पकड़ा और अपनी तथा सदन में मौजूद लोगों की जान बचाने के लिए उसे एकाध हाथ लगाए तो यह आत्मरक्षा ही कहा जाएगा। (नहीं भी कहोगे तो क्या कर लोगे?)

क्या प्रोफ़ेसर झा इस बात की गारंटी ले सकते हैं कि अगर उस युवक को पकड़ कर मारा ना गया होता तो वह किसी सांसद को नुकसान नहीं पहुँचाता?

वह बात अलग है कि उनकी पार्टी के मालिक यादव परिवार के छोटे बेटे (कम से कम कागजों के अनुसार) और बिहार के वन एवं पर्यावरण मंत्री (अगर उन्हें यह होने में कोई रूचि है) तेजप्रताप यादव ने एक बार एक दलित पत्रकार (जो कि वह व्यक्ति खुद को बताता है) को 2 मिनट बात करने (इसे कूटने के लिए पढ़ा जाए) के लिए ऐसा बुलाया था कि उसे अपनी जान बचाकर भागना पड़ा था। इसका वीडियो भी राजद समर्थकों ने खूब चटखारे लेकर शेयर किया था।

मेरे एक बॉस बताते हैं कि 1990 के आसपास लालू यादव के मुख्यमंत्री रहते हुए कोर्ट के आदेशानुसार हाईस्कूल शिक्षक भर्ती की दरख्वास्त लेकर गए थे और लालू यादव ने उनका ‘स्वागत’ करने के लिए लाठी मँगाई थी। इसके पीछे लालू का तर्क था कि कोई भूमिहार (यह एक जाति होती है और लालू की पार्टी के अनुसार यह होना एक अपराध है) कैसे शिक्षक की नौकरी माँगने उनके द्वार पर आ सकता है। लाठी से स्वागत का लालू मोह ऐसा है कि राजद ‘तेल पिलावन लाठी घुमावन रैला’ भी कर चुका है।

जब पार्टी की ‘विशेषज्ञता’ इतने आले दर्जे की हो तो उसके ‘लठैतों’ का हाथ से कुटाई पर पीड़ा छलक जाना तो बनता ही है। पीड़ा से कराह उठना इनके ‘मानस पुत्रों’ का भी बनता है। उन्होंने भी निराश नहीं किया है।

यही कारण है कि हाल ही में एक राष्ट्रीय चैनल से एंकर की नौकरी छोड़ कर लाल सलाम को मजबूत करने के लिए यूट्यूब पर लाल माइक को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे एक ‘पत्रकार’ को सांसदों की आत्मरक्षा का प्रयास ‘पैथेटिक’ यानी बहुत ही अशोभनीय लगा है। लाल माइक वाले महोदय का कहना है कि सांसदों को कानून को अपने हाथों में नहीं लेना चाहिए था।

हालाँकि, एंकर जी कुछ चूक गए हैं क्योंकि कुछ सांसदों ने पिटाई के दौरान कानून को पैरों में भी लिया था और संभवतः उस युवक को लातें भी पड़ी थी। यह वही महोदय हैं जिनके चैनल में काम करते समय इनके एक वरिष्ठ (जो इनसे पहले यूट्यूबर हो लिए) ने दिल्ली दंगों में पुलिस पर फायरिंग करने वाले शाहरुख की बन्दूक को बटुआ (इसे बटुआ ही पढ़ें) बता दिया था।

इन सबके अलावा कम्युनिस्ट पत्रकार इस बात से चिंतित हो गए हैं कि उनकी विरोध-प्रदर्शन की विधा को कोई और लौंडे-लपाड़ी लूट ले गए और सरकार के खिलाफ बोलने का तमगा भी कुछ एक हलकों में हासिल कर लिया। इसलिए सत्यहिंदी (असल में वह असत्यहिंदी है) पर एक रिटायर्ड (टायर्ड भी) पत्रकार ने कहा कि यह हमारे ही लोग थे।

वैसे उनकी बात पर विश्वास करना कुछ ख़ास कठिन नहीं है, क्योंकि 2001 की 13 दिसंबर को ही संसद पर हुए आतंकी हमले का मास्टरमाइंड अफजल गुरु भी कम्युनिस्टों के लिए अपना (अब्बा पढ़े) ही था। रिटायर्ड पत्रकार का कहना है, “पार्लियामेंट में अपने लोग गए थे, बस गलत तरीके से गए, लेकिन किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया।”

कम्युनिस्ट पत्रकार यह देख कर खुद हैरान था कि अन्य कम्युनिस्टों की तरह संसद में गलत तरीके से जाना वाला कोई व्यक्ति नुकसान कैसे नहीं पहुँचा पाया। क्योंकि इससे पहले जितने भी कम्युनिस्ट बंगाल में चुनावी हिंसा के बाद संसद पहुँचे थे वह देश को कुछ ना कुछ नुकसान पहुँचाने में अवश्य सफल रहे हैं।

खैर, अब खबर यह है कि इस मामले में 6 लोग गिरफ्तार हुए हैं। दिल्ली पुलिस ने उनके साथ ‘अशोभनीय’ या ‘असंसदीय’ व्यवहार किया या नहीं, अभी स्पष्ट नहीं है। इन सब पर UAPA भी लगाया गया है। इससे भी कम्युनिस्टों को दर्द हो सकता है।

अयोध्या राम मंदिर के मुख्य पुजारी कौन? जिन मोहित पांडेय की मीडिया में चर्चा उनकी नियुक्ति से श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का इनकार

अयोध्या में बन रहे भव्य एवं दिव्य राम मंदिर में 22 जनवरी, 2024 को प्राण प्रतिष्ठा होनी है। इसी बीच मीडिया में खबर चलने लगी कि उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के रहने वाले मोहित पांडेय को राम मंदिर का मुख्य पुजारी चुन लिया गया है। कई मीडिया संस्थानों ने चलाया कि 3000 पुजारियों के आवेदन स्वीकार किए गए थे, जिनमें से अंत में 50 को चुना गया और उनमें मोहित पांडेय का नाम है और उन्हें मुख्य पुजारी चुना गया है। वो दूधेश्वर वेद विद्यापीठ के छात्र रहे हैं

इसी बीच ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र’ ट्रस्ट के सदस्य कामेश्वर चौपाल ने एक फेसबुक पोस्ट के जरिए इन खबरों को गलत बताया है। उन्होंने साफ़ कहा कि अयोध्या स्थित श्री रामजन्मभूमि मंदिर हेतु किसी भी मुख्य पुजारी की नियुक्ति नहीं की गई है। साथ ही उन्होंने अपील की कि कृपया भ्रामक ख़बरों पर ध्यान ना दें। कामेश्वर चौपाल ने ऑपइंडिया से बात करते हुए भी कहा कि राम मंदिर के पुजारी सत्येंद्र दास ही हैं और कोई नया पुरोहित नहीं चुना गया है।

उन्होंने बताया कि किसी मुख्य पुजारी की नियुक्ति नहीं हुई है। बकौल कामेश्वर चौपाल, इंटरव्यू के बाद 21 लोगों का चयन किया गया है। हालाँकि, उन्हें अभी 6 महीने की ट्रेनिंग दी जानी है। उसके बाद योग्यता के आधार पर निर्णय लिया जाएगा। कामेश्वर चौपाल ने कहा कि ये बात सत्य है कि सत्येंद्र दास बुजुर्ग हैं, लेकिन अभी वो ही मुख्य पुजारी का दायित्व निभा रहे हैं और उनके उत्तराधिकारी के रूप में किसी का नाम तय नहीं हुआ है।

‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र’ ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने भी मोहित पांडेय को मुख्य पुजारी बनाए जाने की खबरों पर ऑपइंडिया को प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि मीडिया और सोशल मीडिया का क्या है, वो तो कोई भी नाम लेकर चलाते रहते हैं, किसी का नाम चला सकते हैं। उन्होंने कहा कि जिसका जो मन हो नाम चला दे।

बता दें कि सत्येंद्र दास पिछले 32 वर्षों से राम मंदिर के मुख्य पुजारी हैं। वहीं रामलला की पूजा करते आ रहे हैं। 1992 के दिसंबर में बाबरी ढाँचे के विध्वंस से 9 महीने पहले उनकी नियुक्ति की गई थी। उन्होंने स्वयं बताया था कि पूजा करते हुए उन्हें लगता था कि एक न एक दिन रामलला का मंदिर बनेगा। बता दें कि प्राण-प्रतिष्ठा से पहले तक रामलला टेंट में ही रहेंगे जहाँ वो वर्षों से हैं। सत्येंद्र दास को नियुक्ति के समय मात्र 100 रुपए का वेतन मिलता था, जिसे बाद में 13,000 रुपए कर दिया गया।

सत्येंद्र जैन पेशे से शिक्षक रहे हैं और इसी नौकरी से वो घर चलाते रहे। BJP सांसद रहे विनय कटियार और VHP प्रमुख रहे अशोक सिंघल ने उनका नाम तय किया था। उनके हिन्दू नेताओं से अच्छे संबंध थे। 1949 में जिन बैरागियों ने राम जन्मभूमि में रामलला की प्रतिमा स्थापित की थी, उनमें वो भी शामिल थे। 1958 में उन्होंने घर छोड़ा, 1975 में आचार्य की डिग्री ली और इसके अगले ही वर्ष वो संस्कृत के अध्यापक हो गए। बाबरी विध्वंस के समय भी वो रामलला के पास ही थे और प्रतिमा को लेकर थोड़ी दूर चले गए थे।

मातृ भाषा पर बल, प्राचीन भाषाओं का ज्ञान, खेल-खेल में गणित: अब ‘5+3+3+4’ पैटर्न पर पढ़ेगा आपका बच्चा, जानिए क्या है NEP 2020

देश के नौनिहालों का भविष्य सँवारने के लिए केंद्र की मोदी सरकार नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लेकर आई है। भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में आने वाले बड़े बदलाव पर और केंद्र सरकार की सोच पर केंद्रीय शिक्षा और कौशल विकास मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपनी राय जाहिर की।

आजतक के ‘एजेंडा आजतक’ कार्यक्रम के सेशन ‘भारतीयता का पाठ’ की शुरुआत पर केंद्रीय मंत्री प्रधान ने कहा कि पीएम मोदी ने ‘अमृत काल’ में आह्वान किया है कि वो 2047 तक भारत को एक विकसित देश बनाकर रहेंगे।

उन्होंने आगे कहा, “हमारे सामने और कोई विकल्प नहीं है। यह महज अकेले भारत की जरूरत नहीं है बल्कि यह दुनिया की जरूरत है कि भारत जैसी एक संतुलित सभ्यता, दुनिया के विकास का केंद्र बिंदु बने।”

केंद्रीय मंत्री प्रधान ने आगे कहा, “इसके लिए हमें विकसित, आत्मनिर्भर और स्वावलंबी होना पड़ेगा तब जाकर दुनिया में सही संतुलन रहेगा ये भारत की सभ्यता की सीख है। ये तभी संभव होगा जब सभी रचनाओं के केंद्र में सही शिक्षा होगी।”

उन्होंने कहा, “शिक्षा सही होगी, शिक्षा की उपज सही निकलेगी और दिशा सही होगी तो जिस अपेक्षित समाज और विकसित देश की हम कल्पना कर रहे हैं हम उसी दिशा में जा सकेंगे।” उन्होंने कहा कि इस दिशा में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत अब 10+2+3 को हम 5+3+3+4 में बदला है।

उन्होंने कहा कि 34 साल बाद भारत में शिक्षा का रूप बदलने की कोशिश की गई है। इसके लिए पीएम मोदी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लाए जिसमें संविधान सभा की तर्ज पर बहुत बड़े विमर्श के बाद सभी अनुभव को समेटते हुए एक मसौदा पेश किया गया। इसके कई रूप हैं जिससे हमें कई उपलब्धियाँ हासिल होंगी।

उन्होंने आगे कहा पहले पढ़ाई पहली कक्षा से शुरू होती थी। इसमें 1 से 12वीं कक्षा तक की व्यवस्था थी। ये 12 साल की व्यवस्था थी। इसे अब हमने बदलकर 15 साल (5+3+3+4) किया है।

शिक्षा मंत्री ने कहा कि बच्चे का तीन से आठ साल की उम्र में 85 फीसदी मानसिक विकास हो जाता है। इस हिसाब देश की शिक्षा में नई चीजों को व्यवस्थित तरीके से सिखाने की प्रक्रिया को तीन साल की उम्र से शुरू किया गया है।

नई शिक्षा नीति 2020

आप भी इस नई शिक्षा नीति के इस 15 साल के (5+3+3+4) फॉर्मेट को जानना चाहते हैं और ये जानना चाहते है इससे छात्रों, उनके अभिभावकों और परिवार की जिंदगी में क्या बदलाव आएगा तो उसे यहाँ समझे…।

करीब दो लाख लोगों के सुझाव लेने के बाद नई शिक्षा नीति 2020 तैयार की गई। इसके बाद ही पीएम मोदी की सरकार ने इस पर मोहर लगाई और तीन साल पहले मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इसका ऐलान किया। नई शिक्षा नीति 2020 की घोषणा के साथ ही मानव संसाधन मंत्रालय का नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय कर दिया गया। इस नीति से देश में स्कूली और उच्च शिक्षा में परिवर्तनकारी सुधारों की अपेक्षा की गई है। नई शिक्षा नीति 2020 अंतरिक्ष वैज्ञानिक के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट पर आधारित है।

दरअसल पिछली राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 की जगह नई शिक्षा नीति लाई गई है। शिक्षा नीति 1986 में साल 1992 में संशोधन किया गया था।

इस नई शिक्षा नीति के उद्देश्यों के तहत साल 2030 तक स्कूली शिक्षा में 100% GER यानी सकल नामांकन अनुपात के साथ-साथ पूर्व-विद्यालय से माध्यमिक स्तर तक शिक्षा को सरल साधारण और सामान्य बनाने का लक्ष्य रखा गया है।

इतना ही नहीं नई शिक्षा नीति के तहत केंद्र व राज्य सरकार के सहयोग से शिक्षा क्षेत्र पर जीडीपी के 6 फीसदी हिस्से के सार्वजनिक व्यय का लक्ष्य रखा गया है। इसके तहत स्कूली शिक्षा में 5 + 3 + 3 + 4 डिज़ाइन वाले शैक्षिक संरचना का प्रस्ताव किया गया।

5+3+3+4 फार्मेट क्या है

इस 5 + 3 + 3 + 4 डिज़ाइन वाले शैक्षणिक फॉर्मेट में 3 से 18 साल की उम्र के बच्चों और किशोरों को शामिल किया गया है। इस फॉर्मेट में 5+ से मतलब 5 साल तक पढ़ाई फाउंडेशनल स्टेज में कराए जाने से है। इस स्टेज में प्री प्राईमरी के तीन साल और पहली और दूसरी कक्षा की पढ़ाई शामिल है।

3 साल की उम्र से छात्र बाल वाटिका या प्री-स्कूल में रहेंगे। इसके तहत बच्चों को बगैर किसी किताबी ज्ञान के खिलौनों, कहानियों, मैजिक, गीत, डांस से शिक्षा दी जाएगी।

इसके बाद प्राथमिक स्कूल में कक्षा 1 और 2 की पढ़ाई होगी। इसका पाठ्यक्रम NCERT ने तैयार किया है। इससे बच्चों की शिक्षा की नींव को मजबूती मिलेगी। इसे लेकर शिक्षा मंत्री प्रधान का कहना है कि बच्चों के प्ले स्कूलों को फॉर्मल रूप देना बाकी है।

इस वजह से राष्ट्रीय शिक्षा नीति की सिफारिश पर NCF बनी और उनका लर्निंग और टीचिंग लर्निंग मैटेरियल भी आ गया है, जिसे जादुई पिटारा नाम दिया गया है। उन्होंने आगे कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में गणित और भाषा से बच्चों का परिचय खेल-खेल में शुरू करवाया जाएगा।

उनका कहना है कि इससे बच्चों में क्रिटिकल थिंकिंग यानी आलोचनात्मक सोच और समस्या का समाधान करने की सोच को विकसित होने में मदद मिलेगी। देशभर में इसे लागू करना शुरू कर दिया गया है। आने वाले 3-4 सालों में फायदा देखने को मिलेगा।

इसके बाद की +3 स्टेज में बच्चा कक्षा 3 से लेकर कक्षा 5 की पढ़ाई करेगा और उसके बाद की दूसरी +3 स्टेज में कक्षा 6 से लेकर 8वीं तक की पढ़ाई करेगा। इसके बाद बच्चा +4 स्टेज में 9वीं, 10वीं, 11वीं और 12वीं तक की पढ़ाई करेगा। इस स्टेज में दो बार बोर्ड परीक्षा होगी।

दरअसल NEP-2020 में कक्षा-5 तक की शिक्षा में मातृ भाषा, स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा को पढ़ाई के लिए अपनाने पर बल दिया गया है। इसके साथ ही इस नीति में मातृ भाषा को कक्षा-8 और आगे की शिक्षा के लिए प्राथमिकता देने का सुझाव भी दिया गया है।

स्कूली और उच्च शिक्षा में छात्रों के लिए संस्कृत और अन्य प्राचीन भारतीय भाषाओं का विकल्प उपलब्ध होगा, लेकिन किसी भी छात्र पर भाषा के चुनाव की कोई बाध्यता नहीं होगी।

काशी के बाद अब मथुरा की बारी, हाईकोर्ट ने शाही ईदगाह ढाँचे के सर्वे का दिया आदेश: श्रीकृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति की राह में बड़ा फैसला

मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर स्थित शाही ईदगाह के सर्वे के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुमति दे दी है। कोर्ट ने इस सम्बन्ध में दायर याचिका को मंज़ूरी देते हुए इस पूरे परिसर की जाँच के लिए एक एडवोकेट कमिश्नर की नियुक्ति की माँग को माना है। इसी की देखरेख में सर्वे पूरा होगा

यह याचिका हिन्दू पक्ष की तरफ से श्रीकृष्ण विराजमान और वकील विष्णु शंकर जैन समेत 7 लोगों द्वारा लगाई गई थी। इस मामले में पूरे परिसर की वैज्ञानिक सुनवाई की याचिका स्वीकार होने की जानकारी हिन्दू पक्ष के वकील विष्णु शंकर जैन ने दी है।

विष्णु शंकर जैन ने कहा, “इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हमारी याचिका को स्वीकार कर लिया है जिसमें हमने माँग की थी कि इस पूरे परिसर का एक एडवोकेट कमिश्नर द्वारा सर्वे करवाया जाए। इसकी बाकी चीजें 18 दिसम्बर को तय की जाएँगी। कोर्ट ने शाही ईदगाह मस्जिद पक्ष की दलीलों को अस्वीकार कर दिया है। हमारी माँग थी कि शाही मस्जिद के भीतर हिन्दू मंदिर के कई चिह्न हैं। इन सबकी असली स्थिति जानने के लिए एक सर्वे की आवश्यकता है। कोर्ट ने इस माँग को स्वीकार कर लिया है। यह एक ऐतिहासिक निर्णय है।”

हिन्दू पक्ष का कहना है कि मथुरा में स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर के बराबर में बनी शाही ईदगाह वाला ढाँचा जबरन वही बना दिया गया जहाँ भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था। इस जगह पर कब्जा करके ढाँचा बनाया गया है। यहाँ अभी भी कई ऐसे सबूत हैं जो कि यह सिद्ध करते हैं कि यहाँ पहले एक मंदिर हुआ करता था।

हिन्दू पक्ष का दावा है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म राजा कंस के कारागार में हुआ था और यह जन्मस्थान शाही ईदगाह के वर्तमान ढाँचे के ठीक नीचे है। सन् 1670 में मुगल आक्रांता औरंगज़ेब ने मथुरा पर हमला कर दिया था और केशवदेव मंदिर को ध्वस्त करके उसके ऊपर शाही ईदगाह ढाँचा बनवा दिया था और इसे मस्जिद कहने लगे। मथुरा का मुद्दा नया नहीं है।

अदालत में इस मामले में याचिकाएँ दाखिल की गई हैं और उन पर सुनवाई होती रही है। 13.37 एकड़ जमीन पर दावा करते हुए हिन्दू यहाँ से शाही ईदगाह ढाँचे को हटाने की माँग करते रहे हैं। 1935 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वाराणसी के हिन्दू राजा को भूमि के अधिकार सौंपे थे।

‘आप ई-मेल भेजिए… मैं देख लूँगा’ : महुआ मोइत्रा की याचिका पर CJI करेंगे गौर, TMC सांसद ने कहा- मुझे सदन में बोलने नहीं दिया गया

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया डीवाई चंद्रचूड़ ने बुधवार (13 दिसंबर 2023) को तृणमूल कॉन्ग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा को आश्वासन दिया है कि वह कैश फॉर क्वेरी मामले में लोकसभा से उनके निष्कासन के खिलाफ उनकी याचिका की लिस्टिंग पर गौर करेंगे।

वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने मोइत्रा की ओर से इस मामले को अर्जेंट लिस्टिंग में रखने की गुहार लगाई थी। ऐसे में मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “ये मामला शायद लिस्ट नहीं हुआ होगा… अगर कोई ईमेल भेजा गया होता, तो मैं उसे तुरंत देख लेता। कृपया भेज दें।”

बता दें कि इससे पहले सिंघवी ने जस्टिस संजय किशन कौल के सामने इस याचिका को रखा था जिन्होंने इसे सीजेआई के समक्ष रखने की सलाह दी। उन्होंने कहा था कि इस मामले को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को देखने दो, अभी इस स्तर पर ये सब निर्णय नहीं लिया जा सकता। इसके बाद मोइत्रा के मामले को वकील मनु सिंघवी ने सीजेआई के पास रखा।

टीएमसी सांसद ने सुप्रीम कोर्ट में अपने निष्कासन के खिलाफ सुनवाई की माँग की है। उन्होंने कहा कि उन्हें सदन के अंदर चर्चा के दौरान बोलने का मौका नहीं मिला। इसके अलावा उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोपों को लेकर भी कहा कि उनके खिलाफ लगे सारे आरोप सिर्फ दो लोगों की गवाहियाँ पर आधारित हैं जिनमें से एक उनका पुराना साथी है जिसने दुर्भावना से उनपर इल्जाम लगाए।

मोइत्रा के मुताबिक, जो लिखित गवाहियों उनके खिलाफ दी गईं वो भौतिक दृष्टि से विरोधाभासी भी हैं। उन्होंने कहा कि उनसे जिरह करने का अधिकार छीन लिया गया।

बता दें कि महुआ मोइत्रा के खिलाफ एथिक्स कमेटी ने अपनी रिपोर्ट पिछले महीने दी थी। इसमें उनके विरुद्ध कैश फॉर क्वेरी मामले में जाँच होकर कहा गया था कि महुआ 2019 से 2023 के बीच में चार बार दुबई गईं, जिसके बाद उनका संसद का लॉग-इन कई बार एक्सेस किया गया।

ऑस्ट्रेलिया के उस्मान ख्वाजा ने इजरायल के विरोध में पहना जूता, ICC ने लगाया बैन तो काला बैंड पहन कर उतरे खेलने: कहा – गाजा मेरे दिल के करीब है

ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर उस्मान ख्वाजा खुल कर इजरायल पर हमला करने वाले गाजा के समर्थन में आ गए हैं। उस्मान ख्वाजा ने इससे पहले पाकिस्तान के खिलाफ होने वाले टेस्ट मैच से पहले अपने जूते पर एक सन्देश लिखा था जो कि गाजा से सम्बंधित था। उस्मान ख्वाजा ऑस्ट्रेलिया के लिए ओपनिंग करते हैं। 36 वर्षीय उस्मान ख्वाजा मूल रूप से पाकिस्तानी हैं। उनका जन्म 1986 में पाकिस्तान में हुआ था।

उस्मान ख्वाजा ने पाकिस्तान से होने वाले टेस्ट से पहले प्रैक्टिस सेशन के दौरान अपने जूते के निचले हिस्से पर कई रंगों से लिखा था, “सभी जिंदगियाँ बराबर हैं। (All Lives Are Equal) और आजादी लोगों का अधिकार है। (Freedom is Human Right)” उस्मान के जूतों पर लिखा यह सन्देश गाजा से सम्बंधित था। उस्मान इजरायल का गाजा के आतंकियों पर बमबारी विरोध कर रहे थे जो कि गाजा से इजरायल पर हुए आतंकी हमले के बाद चालू हुई थी।

उनकी यह जूते पहने फोटो वायरल हुई थी। इसके बाद क्रिकेट की प्रशासक संस्था अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट काउंसिल (ICC) के अधिकारियों ने ख्वाजा को बताया था कि वह इन जूतों को पहन कर प्रैक्टिस या फिर आगामी टेस्ट मैच में नहीं जा सकते। यह उनके नियमों के विरुद्ध है।

दरअसल, ICC खिलाड़ियों के कपड़े, जूते या अन्य माध्यम से फील्ड पर खेलने के दौरान कोई सन्देश नहीं प्रसारित कर सकते जो राजनीतिक, धार्मिक या नस्लीय हो। ख्वाजा के जूतों पर लिखी बाद राजनीतिक श्रेणी में आती है। ख्वाजा ने ICC के इस फैसले पर अपना विरोध जताया है।

36 वर्षीय ख्वाजा ने इसके पश्चात एक वीडियो सोशल मीडिया पर जारी किया है, जिस्मने उन्होंने ICC से लड़ने की बात कही है। उन्होंने इस फैसले को लेकर मतभेद प्रकट किया। उन्होंने 2 मिनट लम्बे इस वीडियो में कहा, “मैं ज्यादा नहीं कहूँगा, मुझे जरूरत नहीं है। लेकिन मैं जो भी लोग मेरे जूतों पर लिखे सन्देश से आहत हुए हैं, उनको प्रश्न पूछना चाहिए कि क्या सबके लिए जीवन बराबर नहीं है या आज़ादी सबके लिए नहीं है।”

आगे उन्होंने जूते पर लिखी बातों के ऊपर कहा, “मेरे जूतों पर लिखा सन्देश राजनीतिक नहीं है। मैं यहाँ किसी का पक्ष नहीं ले रहा हूँ। मेरे लिए लोगों की जिन्दगी बराबर है। एक यहूदी की जिन्दगी मुस्लिम के बराबर है और हिन्दू के भी। मैं उनकी आवाज उठा रहा हूँ जो बोल नहीं सकते। गाजा मेरे दिल के करीब है।”

इसके बाद उन्होंने कहा, “ICC ने मुझे कहा है कि मैं वह जूते नहीं पहन सकता क्योंकि उनके दिशानिर्देशों के अंतर्गत यह एक राजनीतिक सन्देश है। मुझे नहीं लगता यह है। यह एक मानवीय अपील है। मैं उनके फैसले का सम्मान करता हूँ लेकिन मैं लडूँगा।”

इसके बाद 14 दिसम्बर, 2023 को पाकिस्तान के खिलाफ चालू हुए पहले टेस्ट के दौरान बैटिंग के लिए उतरे ख्वाजा अपनी बाँह पर एक काला बैंड बाँध कर उतरे। इस पर अभी ICC का कोई निर्णय नहीं आया है। उनका यह बैंड भी गाजा में आतंकियों के खिलाफ इजरायल की कार्रवाई को लेकर सन्देश था। उस्मान ख्वाजा इससे पहले भी गाजा को लेकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करते रहे हैं।

हालाँकि यह कोई पहली बार नहीं है कि मुस्लिम खिलाड़ियों ने क्रिकेट में गाजा जैसे मुद्दों को लाने का प्रयास किया हो। इससे पहले इंग्लैंड के क्रिकेटर मोईन अली भी गाज़ा को समर्थन करने वाले बैंड पहनने से रोके गए थे। यह वर्ष 2014 में हुआ था। गाजा मुद्दे के अलावा पाकिस्तानी खिलाड़ियों के फील्ड पर नमाज पढ़ने को लेकर भी प्रश्न उठाए जाते रहे हैं।