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2 शब्द की जगह 3 शब्द लिखवाया सरदार पटेल ने… वो कदम, जिसके कारण अनुच्छेद 370 हटाया जा सका

आर्टिकल 370 और 35-ए अब पूरी तरह सदा-सदा के लिए इतिहास की बातें हैं। सुप्रीम कोर्ट की पाँच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने की प्रक्रिया को सही करार दिया है। कोर्ट के मुताबिक अनुच्छेद 370 हटाने का केंद्र सरकार का फैसला संवैधानिक तौर पर सही है। यह फैसला J&K के एकीकरण के लिए था। अपना निर्णय सुनाते हुए कोर्ट ने माना:

  • जम्मू-कश्मीर राज्य की कोई आंतरिक संप्रभुता नहीं थी और भारतीय संविधान को जम्मू-कश्मीर राज्य में लागू करने के लिए राज्य सरकार की सहमति की आवश्यकता नहीं थी।
  • अनुच्छेद 370 एक अस्थायी प्रावधान था।
  • विलय पत्र और उद्घोषणा (दिनांक 25 नवंबर 1949) पर हस्ताक्षर के बाद जम्मू-कश्मीर संप्रभुता का कोई तत्व बरकरार नहीं रखता है।
  • अनुच्छेद 370 (3) के तहत राष्ट्रपति द्वारा शक्ति का प्रयोग भारतीय संविधान को उसकी संपूर्णता में लागू करना था।
  • यह कदम केवल देश के बाकी हिस्सों के साथ जम्मू-कश्मीर राज्य के संवैधानिक एकीकरण की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए था।

सुप्रीम कोर्ट ने मानवाधिकार उल्लंघनों की जाँच के लिए सत्य एवं सुलह आयोग के गठन की भी सिफारिश की है। लद्दाख और जम्मू कश्मीर को अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने को लेकर भी जजों ने टिप्पणी की है। 370 पर फैसला सुनाते हुए सीजेआई ने कहा कि भारत की संसद को यह अधिकार है कि वह जम्मू कश्मीर और लद्दाख को अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेश बना सके। अनुच्छेद 3(A) के मद्देनजर लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के फैसले की वैधता को बरकरार रखते हैं। यह अनुच्छेद भारत की संसद को किसी भी राज्य से एक क्षेत्र को अलग करके केंद्र शासित प्रदेश बनाने की अनुमति देता है।

अनुच्छेद 370 की माँग शेख ने उठाई, प्रधानमंत्री नेहरू का मिला समर्थन

अनुच्छेद 370 से जम्मू कश्मीर को पूरी तरह आजादी मिल गई है। जम्मू-कश्मीर पर इसे थोपने का षड्यंत्र शेख अब्दुल्ला और नेहरू ने किया था। अनुच्छेद 370 को लागू करने के लिए शेख अब्दुल्ला ने सबसे पहले माँग की थी। उन्होंने इस मामले में 3 जनवरी 1949 को सरदार पटेल को एक पत्र लिखा। सरदार पटेल ने इसे मानने से साफ इनकार कर दिया। जब सरदार पटेल के सामने शेख अब्दुल्ला की नहीं चली तो उन्होंने यही प्रस्ताव पंडित नेहरू के सामने रखा।

शेख अब्दुल्ला की जम्मू-कश्मीर को विभाजित करने का षड्यंत्र

शेख अब्दुल्ला ने 14 अप्रैल 1949 को स्कॉट्समैन के पत्रकार माइकल डेविडसन को इंटरव्यू देकर जम्मू-कश्मीर के विभाजन की माँग की। इसके बाद पंडित नेहरू ने सरदार पटेल पर शेख की बातों को मानने का दबाव बनाया लेकिन जब सरदार पटेल असरदार बने रहे तो मई 1949 में पंडित नेहरू जम्मू कश्मीर चले गए और शेख अब्दुल्ला के साथ कई सारे समझौते किए। इसकी भनक तक सरदार पटेल को नहीं लगी।

नेहरू ने सरदार पटेल को पत्र लिख दबाव बनाने का कार्य किया

जब सरदार पटेल को भनक लगे बिना ही तैयार कर दिया 370 का ड्राफ्ट

अनुच्छेद 370 को लेकर ड्राफ्ट गोपालस्वामी आयंगर और शेख अब्दुल्ला ने मिलकर तैयार किया लेकिन जब इसके बारे में सरदार बल्लभ भाई पटेल को बताया गया तो उन्होंने इसे मानने से साफ इनकार कर दिया। सरदार पटेल के हस्तक्षेप के बाद इसका एक नया मसौदा तैयार किया गया, लेकिन उसे शेख ने मानने से इनकार कर दिया। इसके बाद आयंगर ने कुछ परिवर्तनों के साथ इसे फिर से शेख को भेजा, लेकिन इस बार सरदार पटेल ने इसे मानने से इनकार कर दिया।

शेख की अंतरिम सरकार को दिया जाना था सारा पावर, सरदार पटेल ने जताई थी आपत्ति

इसमें आखिरी परिवर्तन कर 17 अक्टूबर 1949 को संविधान सभा में पेश किया गया। शेख ने इसका विरोध किया और आयंगर को पत्र लिखकर संविधान सभा से इस्तीफा देने की धमकी दी। हालाँकि, सरदार पटेल के आगे किसी की नहीं चली। 370 के पहले ड्राफ्ट में सारी शक्तियाँ शेख के पास थीं, जिसे बदलवा कर पटेल ने शेख अब्दुल्ला की अंतरिम सरकार की जगह यूनियन ऑफ इंडिया जोड़ दिया।

अंतरिम सरकार की जगह यूनियन ऑफ इंडिया जोड़ा गया
अंतरिम सरकार की जगह यूनियन ऑफ इंडिया वाला ड्राफ्ट

सरदार पटेल का यही वो कदम था, जिसके कारण अनुच्छेद 370 हटाया जा सका। ये तथ्य सभी जानते हैं कि पंडित नेहरू के अहंकार और जिद के कारण जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय में देरी हुई थी जबकि महराजा हरि सिंह हमेशा से जम्मू-कश्मीर का विलय भारत में चाहते थे।

सरदार पटेल का सपना अब साकार हो गया है। आर्टिकल 370 को जम्मू-कश्मीर से हटाने के केंद्र सरकार के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने भी मुहर लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का देशभर में स्वागत हो रहा है।

अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद से जम्मू-कश्मीर वासियों को एक देश में एक विधान, एक प्रधान, एक निशान का सपना साकार हो गया है। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की माँग पूरी हो गई है। यही नहीं जम्मू कश्मीर में देश के बाकी राज्यों की तरह समान अधिकार भी मिल रहे हैं… नया जम्मू कश्मीर चहुँमुखी विकास के पथ पर लगातार अग्रसर है। पाकिस्तान समेत किसी को भी ये भ्रम नहीं होना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर किसका है? जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग था, अभिन्न अंग है और अभिन्न अंग रहेगा।

सुप्रीम कोर्ट में ‘मनचाहे जज’ के सामने सुनवाई चाहते थे सत्येंद्र जैन, CJI चन्द्रचूड़ का इनकार: कहा- क्या करना है यह मैं नहीं कह सकता

सुप्रीम कोर्ट में मनचाहे जज के सामने सुनवाई की आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता सत्येंद्र जैन की अपील मुख्य न्यायाधीश (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ ने ठुकरा दी है। सीजेआई ने कहा है कि वे किसी को जज को यह निर्देश दे सकते कि उन्हें क्या करना है।

दिल्ली की केजरीवाल सरकार में मंत्री रहे जैन मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में अभी मेडिकल ग्राउंड पर जमानत पर हैं। सुप्रीम कोर्ट में उनकी स्थायी जमानत को लेकर याचिका लंबित है। इसको लेकर ही उन्होंने सीजेआई से गुहार लगाई थी।

सत्येन्द्र जैन के वकील और कॉन्ग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने सत्येन्द्र जैन मामले की सुनवाई कर रही बेंच को बदलने की याचिका लगाई थी। उनकी इस याचिका को स्वीकार करने से चीफ जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड़ ने इनकार कर दिया।

जानकारी के अनुसार, सिंघवी ने एक मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस चन्द्रचूड़ ने से कहा, “यह मामला पहले जस्टिस एएम बोपन्ना के सामने लंबित था, उन्होंने इस मामले को 2.5 घंटे तक सुना था। अब यह मामला जस्टिस बेला एम त्रिवेदी के सामने लगाया गया है।”

सिंघवी का कहना था कि जो जज इस मामले की सुनवाई पहले कर चुके हैं, उनके सामने ही दोबारा इस मामले को लगाया जाए। सिंघवी का दावा था कि इस मामले की पूरी सुनवाई जस्टिस बोपन्ना कर चुके हैं, इसलिए उन्हें ही इस मामले का निर्णय भी सुनाना चाहिए।

इस पर चीफ जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड़ ने कहा, “मैं दूसरे जज के सामने लगे मामले को नियंत्रित नहीं करूँगा। जिसके सामने यह मामला लंबित है वही इस मामले पर आगे कोई कदम उठाएँगे। ” इस पर सिंघवी ने चीफ जस्टिस से इस मामले के दस्तावेज देखने की बात कही। इससे भी उन्होंने इनकार कर दिया।

दिल्ली की केजरीवाल सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे सत्येन्द्र जैन पर अपनी फर्जी कम्पनियों के जरिए हवाला का कारोबार चलाने का आरोप है। इसके अलावा उनके ऊपर इस काले धन को सफ़ेद करने और इससे जमीन खरीदने जैसे आरोप भी हैं। उनका दिल्ली शराब घोटाले में भी नाम आया था।

सत्येन्द्र जैन को मई 2023 में स्वास्थ्य आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने 6 सप्ताह की जमानत दी थी। इसके बाद से लगातार उनकी जमानत की अवधि बढ़ती रही है। सत्येन्द्र जैन ने इस बीच स्थायी जमानत की याचिका सुप्रीम कोर्ट के सामने लगाई थी।

हालाँकि यह कोई पहली बार नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट के वकील अपनी मर्जी के जज के सामने अपना मामला रखवाना चाहते हों। दुष्यंत दवे और प्रशांत भूषण जैसे वकील भी यही कर चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट लगातार कहता आया है कि वह ऐसे प्रयासों को सफल नहीं होने देगा।

सवाल: सैफ के साथ सेक्स सीन कैसे किया, करीना कपूर का जवाब: दिक्कत नहीं हुई, हम पहले से ही… चर्चा में ‘कुर्बान’ का ‘प्राइवेट ऑडिशन’

बॉलीवुड अभिनेत्री करीना कपूर खान ने हाल में एक शो के दौरान अपने और सैफ अली खान के बीच रिकॉर्ड हुए सेक्स सीन पर बात की। उन्होंने नेटफ्लिक्स के राउंडटेबल डिस्कशन के दौरान कुर्बान फिल्म के सीन पर बात करते हुए बताया कि वो लोग तो उससे पहले से ही डेट कर रहे थे।

दरअसल, शो के दौरान सिद्धार्थ मल्होत्रा ने उनसे कुर्बान फिल्म में जो सैफ अली खान और करीना कपूर खान का सेक्स सीन था, उसपर सवाल किया। इसके बाद एक्ट्रेस ने जवाब देते हुए कहा, “हम उससे पहले से एक दूसरे को डेट कर रहे थे। हमने ऑडिशन दिया तो वो भी ठीक था। कोई परेशानी नहीं थी।”

आप करीना के इस जवाब को वीडियो के 38:00 सेकेंड के बाद सुन सकते हैं। उनकी यह बात सुन काजोल ने उनका मजाक भी उड़ाया कि वो उनका प्राइवेट ऑडिशन था। यहाँ काजोल की बात सुनकर सबको हँसी भी आई।

बता दें कि करीना कपूर ने सैफ अली खान से 2012 में शादी की थी। इससे पहले दोनों एक साथ लिव-इन में रहते थे। 5 साल एक दूसरे के साथ रहकर करीना और सैफ अली खान ने इसलिए शादी की, क्योंकि उन्हें बच्चे चाहिए थे। साल 2016 में उनके पहला बच्चा तैमूर अली खान हुआ। इसके बाद 2021 में जेह अली खान हुआ।

डर्टी मैगजीन को दिए इंटरव्यू में एक बार करीना कपूर ने कहा था- “अब आप शादी इसलिए करते हो न क्योंकि आपको बच्चे चाहिए। मेरा मतलब है आप उसके बिना भी साथ में राह सकते हैं। मैं और सैफ शादी से पहले 5 साल लिव इन में रहे। हमने शादी इसलिए की क्योंकि हमको बच्चे चाहिए थी।”

एक्ट्रेस ने मैग्जीन में अपने पेरेंटिंग स्टाइल की भी चर्चा की थी। उन्होंने कहा था कि वह अपनी जिंदगी अपने बच्चों के आगे ही जीना चाहती हैं और अपने बच्चों के साथ सब कुछ करना चाहती हैं। उनका मानना है कि अगर वो लोग खुश रहेंगे तभी उनके बच्चे भी खुश रह पाएँगे।

अस्मत बनी नेहा सिंह, मुस्लिम शिक्षिका ने हलाला के डर से की ‘घर वापसी’: महाकाल का आशीर्वाद लेकर बोली- इस्लाम में औरतों की इज्जत नहीं

बरेली के एक प्राइवेट स्कूल की 33 साल की शिक्षिका नेहा असमत ने इस्लाम में हलाला और ‘तीन तलाक’ के डर से हिंदू धर्म अपना लिया है। अब नेहा सिंह बन चुकी इस टीचर का कहना है कि उसने अपनी मर्जी से हिंदू धर्म अपनाया है। वो भगवान शंकर को अपना आराध्य मानती हैं।

उन्होंने इस बात का ऐलान किया कि उज्जैन के महाकाल के दरबार में आशीर्वाद लेकर उन्होंने हिंदू धर्म अपना लिया। दरअसल, इस टीचर के परिवार ने उनके साथी शिक्षक मोहित सिंह पर उन्हें अगवा करने का शक जताते हुए सोमवार (11 नवंबर, 2023) को बारादरी थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। अब इस टीचर ने अपनी और अपने साथी मोहित को जान का खतरा बताकर बरेली एसएसपी, डीएम और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सुरक्षा की गुहार लगाई है। जानकारी के मुताबिक, नेहा की अम्मी रानी बेगम ने सोमवार को बारादरी थाने में नेहा के अपहरण की रिपोर्ट कराई थी।

इस रिपोर्ट के आधार पर बारादरी पुलिस नेहा की तलाश कर रही थी। इस दौरान नेहा का उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर का फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इस दौरान नेहा सिंह बन चुकी टीचर ने बरेली SSP के दफ्तर में अपनी सुरक्षा के लिए पत्र लिखा है।

इस पत्र के मुताबिक, उसने लिखा है कि वो बरेली के मुस्लिम बाहुल्य इलाके फाइक एनक्लेव की रहने वाली है। शुरू से ही उनका सनातन धर्म के लिए झुकाव था। उन्होंने बरेली कॉलेज से ग्रेजुएशन किया है और उसके बाद बीएड कर रही हैं और इसके साथ ही स्कूल में पढ़ा रही हैं। नेहा सिंह के मुताबिक, वो पढ़ी-लिखी और नौकरीपेशा है और खुद अच्छा-बुरा सब समझती हैं। उनके मुताबिक, बीज विकास निगम में लेखाकार रहे अब्बा असमत अली की मौत हो चुकी है।

मुस्लिम शिक्षिका नेहा असमत का पुलिस को दिया शिकायत पत्र (फोटो साभार: दैनिक भास्कर )

उनका आरोप है कि इसके बाद से ही उनकी अम्मी रानी बेगम के साथ मिलकर उनकी बहन गजाला, शबाना, बहनोई डॉ आसिफ और तनवीर अहमद उनका निकाह एक ऐसे अधेड़ शख्स से कराने की साजिश रच रहे हैं जो अपनी बीवी से तलाक लेने के बाद उसका हलाला करा चुका है। टीचर नेहा के मुताबिक, उन्हें यह शादी पसंद नहीं थी और परिवार ने अधिक दबाव बनाया तो उन्होंने घर छोड़ दिया। नेहा ने पुलिस को दी गई अपनी शिकायत में अपने धर्म परिवर्तन का प्रमाणपत्र नत्थी किया है लेकिन इसमें अपनी शादी का जिक्र नहीं किया है।

उन्होंने ये भी साफ किया कि उनके परिवारवालों की संजयनगर के रहने वाले मोहित सिंह के खिलाफ अपहरण की रिपोर्ट झूठी है। जबकि उन्होंने खुद की मर्जी से घर छोड़ा और बगैर किसी दबाव के सनातन धर्म अपनाया है।

नेहा का कहना है कि उनके परिवार से उन्हें, मोहित और उसके परिवार को भी जान का खतरा है। वो उनका कत्ल करा सकते हैं। उन्होंने कहा है कि उनके और मोहित के साथ कुछ भी अनहोनी हुई तो इसके लिए उनका मुस्लिम परिवार जिम्मेदार होगा।

बच्चों के साथ यौन शोषण, कोर्ट को निपटाने में लग जाएगा 9 साल से अधिक का समय: भयावह आँकड़ों के पीछे कानून के दुरुपयोग की भी कहानी

हाल ही में पॉक्सो अधिनियम को लेकर दो समाचार सामने आए। ये दोनों ही विश्लेषण की माँग करते हैं। पहला समाचार यह आया कि जनवरी 2023 तक फास्ट ट्रैक न्यायालयों में 2.43 लाख से अधिक पॉक्सो के मामले लंबित हैं। यदि कोई और नया मामला सामने नहीं आता है तो इन्हें निपटाने में ही 9 वर्ष से अधिक का समय लग जाएगा।

यह बहुत ही हैरान करने वाला और चौंकाने वाला आँकड़ा है। यह कल्पना से ही परे है कि भारत जैसे देश में पॉक्सो अर्थात यौन शोषण से बच्चों के संरक्षण को लेकर यह आँकड़े हो सकते हैं। कहते हैं कि आँकड़े झूठ नहीं बोलते। भारत के संदर्भ में ऐसे आँकड़े चौंकाते भी हैं… तो फिर क्या है सच? क्या आँकड़ों के पीछे कुछ और राज है?

23 नवम्बर 2023 को एक निर्णय आता है। इसमें माननीय उच्च न्यायालय ने अपनी एक टिप्पणी से चौंकाया है। टिप्पणी नहीं बल्कि निर्णय! पॉक्सो अधिनियम के दुरूपयोग को लेकर निर्णय। यह निर्णय विशेष है। यह विशेष इसलिए नहीं है क्योंकि यह पहला ऐसा निर्णय नहीं है, जिसमें किसी न्यायालय ने यह निर्णय दिया हो। यह निर्णय हाल का है, इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है।

यह मामला है दिल्ली का। अदालत ने पॉक्सो अधिनियम के मामले में सुनवाई करते हुए एक महिला को झूठी शिकायत दर्ज कराने का दोषी ठहराते हुए एक लाख रुपए का जुर्माना भरने का निर्देश दिया। दरअसल यह सारा विवाद संपत्ति को लेकर था। इस विवाद में अपने विरोधी को फँसाने के लिए एक महिला ने अपनी 5 वर्ष की बेटी के साथ बलात्कार का आरोप लगाया था और पॉक्सो अधिनियम के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कराया था।

अदालत में उस महिला का झूठ नहीं चल सका। न्यायाधीश ने लड़की की माँ के खिलाफ ही यह निर्णय सुना दिया। न्यायाधीश ने कहा कि यह स्पष्ट है कि उसने गुस्से में आकर और खुद को रोज-रोज के झगड़ों से बचाने के लिए झूठी शिकायत की।

न्यायाशीश ने यह भी कहा कि जैसा कार्य इस महिला ने किया है, वैसे कार्य कई लोग कर रहे हैं। भूमि विवाद, विवाह विवाद, व्यक्तिगत द्वेष, राजनीतिक उद्देश्यों या व्यक्तिगत लाभ के लिए आरोपितों को लम्बे समय तक अपमानित करते रहने के लिए फर्जी मामले दर्ज कराए जा रहे हैं। यह कानून का घोर दुरुपयोग है और इस प्रकार के कृत्य कानून के उद्देश्य को कमजोर करते हैं।

जहाँ इस प्रकार के मामले कानून के उद्देश्य को कमजोर करते हैं, वहीं एक और बड़ा खतरा पैदा करते हैं। यह खतरा है, देश की और हमारे पुरुषों की और समाज की छवि को खराब करने का। जरा कल्पना करें कि इस खबर से कि पॉक्सो अधिनियम के इतने मामले लंबित हैं कि नौ साल लगेंगे सुनवाई करने में, किस प्रकार की छवि बनेगी? किस प्रकार की छवि हमारे देश के प्रति बनेगी?

समय-समय पर ऐसे निर्णयों का आना यह बताता है कि इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है और आँकड़ों का विश्लेषण बहुत गहराई से होना चाहिए। क्योंकि आँकड़े ही हैं, जो विमर्श पैदा करते हैं, विमर्श बनाते हैं। अगस्त 2023 में भी ऐसा ही एक निर्णय आया था, जिसमें इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पॉक्सो अधिनियम के दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त की थी।

सबसे बड़ी चिंता यह भी है कि बच्चों को यौन शोषण से बचाने वाला एक अच्छा कानून स्वार्थों का शिकार न बन जाए, बच्चों का कानूनी सुरक्षा कवच उतना सुरक्षात्मक न रह जाए।

‘क्या तुम बिट्टू बजरंगी के भाई हो?’ – पूछा और पेट्रोल डाल कर आग लगा दी: नूहं हिंसा के बाद जिस हिन्दू कार्यकर्ता के पीछे पड़ा है इस्लामी गिरोह, उसके भाई पर हमला

नूहं हिंसा के दौरान पुलिस से झड़प के मामले में गिरफ्तार किए गए बिट्टू बजरंगी को फिर से निशाना बनाया जा रहा है। उनका परिवार भी नूहं और मेवात क्षेत्र से जुड़े हिंदू विरोधी ताकतों के निशाने पर है। फरीदाबाद के झाबुआ में रहने वाले बिट्टू बजरंगी के भाई को बुधवार (13 दिसंबर, 2023) रात में पेट्रोल डाल कर ज़िंदा जलाने की कोशिश की। पीड़ित की हालत गंभीर है और अस्पताल में भर्ती है। पीड़ित ने अपने बयान में बताया है कि हमलावरों में एक का नाम अरमान है। उसका पिता झाबुआ सब्जी मंडी में ही जूस की दुकान चलाता है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अरमान की अगुवाई में हमलावरों ने बिट्टू बजरंगी के भाई महेश पांचाल की बाकायदा पहचान सुनिश्चित की। उन्होंने महेश पांचाल से पूछा कि ‘क्या तुम बिट्टू बजरंगी के भाई हो?’ इस सवाल के जवाब में महेश ने जैसे ही हाँ कहा, उन लोगों ने उनके ऊपर पेट्रोल डाला और आग के हवाले कर दिया। इसके बाद उसे बिट्टू बजरंगी ने अस्पताल में भर्ती कराया। अस्पताल में महेश पांचाल की हालत गंभीर बनी हुई है। सूचना पाकर मौके पर पुलिस भी पहुँची और मामले की जाँच शुरू कर दी।

हमलावरों ने चुना आधी रात के बाद का समय

बताया जा रहा है कि फरीदाबाद की डाबुआ सब्जी मंडी में दुकान लगाने वाले महेश को घर लौटने में देर हो गई थी। रात में करीब 1 बजे अरमान के साथ 4-5 लोग कार में सवार होकर आए और उसे निशाना बना लिया। पुलिस को दिए अपने बयान में महेश ने बताया है कि वो हमलावरों में से एक अरमान को पहचानता है। बताया जा रहा है कि महेश करीब 60% फीसदी तक झुलस गया है और उसकी हालत गंभीर है।

कौन है बिट्टू बजरंगी?

बिट्टू बजरंगी हिंदूवादी एक्टिविस्ट हैं। वो हिंदुओं की एकता को लेकर आवाज उठाते रहे हैं। मेवात क्षेत्र के नूहं से शुरू हुई हिंसा के बाद उनका नाम तेजी से उछला था, जिसके बाद पुलिस के साथ झड़प के मामले में उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था। फिलहाल, बिट्टू बजरंगी जमानत पर जेल से बाहर चल रहे हैं। इस मामले में तमाम हिंदूवादी संगठनों ने उनका समर्थन किया था। शुरुआत में इस अफवाह का प्रसार तेजी से हुआ था कि बिट्टू बजरंगी का नाम हिंसा में आया है, लेकिन पुलिस ने साफ कर दिया कि बिट्टू बजरंगी पर हिंसा से जुड़ा नहीं, बल्कि पुलिस के साथ झड़प के मामले में कार्रवाई हुई थी।

काली मंदिर में पेशाब करने वाला निकला सद्दाम, 200+ CCTV फुटेज की ख़ाक छानने के बाद उत्तराखंड पुलिस ने दबोचा: परिवार कह रहा – वो मानसिक रूप से विक्षिप्त

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के हर्रावाला माँ काली मंदिर पर में पेशाब कर उसे अपवित्र करने और वहाँ तोड़फोड़ करने वाले आरोपी सद्दाम को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस ने उसकी तलाश में 200 से अधिक CCTV फुटेज छानी, तब कहीं जाकर आरोपित पकड़ में आया।

पुलिस ने उसे दर्ज मुकदमे के आधार पर बुधवार (13 नवंबर, 2023) को अदालत में पेश कर जेल भेज दिया है। पुलिस के मुताबिक, पटेल इलाके के मेहूँवाला नया नगर का रहने वाला आरोपित सद्दाम आरिफ अली का बेटा है। परिवार द्वारा उसके बारे में बताया जा रहा है कि वो मानसिक रूप से अस्वस्थ है।

परिवार का दावा है कि मौजूदा वक्त में उसका इलाज सेलाकुई मानसिक अस्पताल देहरादून में चल रहा है। उसके परिवार वालों ने पुलिस को उसकी मानसिक अस्वस्थता की रिपोर्ट भी दिखाई है। इस मसले पर एसएसपी (SSP) अजय सिंह का कहना है कि आरोपित के मानसिक तौर पर अस्वस्थ होने की मेडिकल रिपोर्ट मिली है, लेकिन इसके बाद भी उसने मंदिर में ऐसा काम किया। इसे लेकर आगे जाँच की जा रही है।

SSP ने आगे कहा कि हम आरोपित से गहनता से पूछताछ करने के साथ ही उसके मेडिकल दस्तावेजों की जाँच भी कर रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि इस किसी भी धार्मिक स्थल पर इस तरह का काम करना सौहार्द वाले माहौल को खराब करने जैसा है।

हालाँकि, पुलिस के इन बयानों पर नेटिज़ेंस खासा ऐतराज जता रहे हैं। उनका कहना है कि हर बार इस तरह की हरकत करने वाला मुस्लिम समुदाय का शख्स ‘मानसिक रूप से विक्षिप्त’ ही क्यों होता है।

फोटो साभार: X हैडल @DehradunPolice

प्रताप नेगी नाम के ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) हैंडल यूजर लिखते हैं, “सद्दाम इतना मानसिक रूप से विक्षिप्त है कि वो पेशाब करने हर्रावाला के मंदिर में गया, मस्जिद में नहीं गया जो बगल में ही है।” वहीं एक दूसरे एक्स यूजर ‘हिमालय टाइगर’ पोस्ट करते हैं, “सारे इस्लामिक, जिहादी काण्ड करने के बाद मानसिक रूप से विक्षिप्त क्यों निकलते हैं।”

एक्स हैंडल यूजर शंशाक ने आरोपित के मानसिक अस्पताल से वहाँ पहुँचने पर सवाल उठाते हुए लिखा, “भाई साहब ये बताइए कि सेलाकुई, मेहुवाला और हर्रावाला के बीच कितनी दूरी है? तो ये वहाँ पहुँचा कैसे? और मेहूवाला शिमला बायपास से अंदर जाकर है। शिमला बायपास से विकासनगर तक के एरिया में ऐसा लगता है कि हम किसी और ही जगह आ गए हो, देहरादून से।”

दारागिरी नामक एक्स हैंडल यूजर ने लिखा, “ये मानसिक विक्षिप्त मंदिर में ही क्यों घुसते हैं? या ये प्रोसीजर पुलिस को पहले ही बता दिया जाता है?” गौरतलब है कि 31 अक्टूबर, 2023 को पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में सलार ब्लॉक के केदार गाँव में आरा शेख नाम के शख्स ने मंदिर में जाकर पेशाब कर दी थी। इसे भी मानसिक तौर से विक्षिप्त बताया गया था।

जानकारी के मुताबिक, देहरादून-हरिद्वार रोड पर हर्रावाला में माँ काली मंदिर के बाहर 11-12 दिसंबर 2023 की रात एक बजे एक शख्स ने पेशाब की। इसके बाद उसने मंदिर पर पत्थर फेंकें। उसके पत्थर फेंकने की वजह से मंदिर का शीशा टूट गया। इसके कुछ देर बाद वह वहाँ से चला गया।

ये सारी घटना मंदिर में लगे CCTV में कैद हो गई। सुबह पुजारी के मंदिर पहुँचने पर उन्होंने देखा कि मंदिर में तोड़फोड़ हुई है। मंदिर में लगे सीसीटीवी की फुटेज चेक की गई। इसमें पता चला कि देर रात एक दाढ़ी वाले शख्स ने मंदिर में आकर ये काम किया है।

इसके बाद मंदिर की ये सीसीटीवी फुटेज सोशल मीडिया पर खासी वायरल हो गई। इसे लेकर लोगों में आक्रोश पैदा हो गया और भीड़ मंदिर के बाहर इकट्ठा हो गई। पुलिस ने मौके पर पहुँच कर हालात सँभाला। इसके बाद हर्रावाला जनप्रतिनिधि विनोद कुमार की शिकायत के आधार पर पुलिस ने अज्ञात शख्स के खिलाफ केस दर्ज कर मामले की जाँच की।

अप्राकृतिक सेक्स और विवाहेतर संबंध बनाना अपराध नहीं: अंग्रेजों के IPC की जगह मोदी सरकार लेकर आई BNS, अमित शाह ने संसद में पेश किया नया मसौदा

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संशोधन के बाद ‘भारतीय न्याय संहिता’ यानी बीएनएस (BNS) का नया मसौदा मंगलवार (12 दिसंबर, 2023) को संसद में पेश किया। लोकसभा में पेश किए गए BNS (द्वितीय) विधेयक, 2023 के नए संस्करण में संसदीय समिति की सिफारिशों की अनदेखी करते हुए अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने और व्यभिचार को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा गया है।

दरअसल, बीएनएस ब्रिटिश युग के ‘भारतीय दंड संहिता’ (IPC) को बदलने के लिए प्रस्तावित है। इस मामले में सरकार ने संसदीय पैनल की सिफारिशों के बावजूद BNS विधेयक से धारा 377 और धारा 497 को बाहर करने का फैसला लिया है। धारा 377 प्रकृति के खिलाफ जाकर यौन संबंध बनाने तो धारा 497 व्यभिचार से जुड़ी है। इन दोनों धाराओं को सुप्रीम कोर्ट पहले ही खारिज कर चुकी है।

इन धाराओं के प्रावधानों को अधिकारों का उल्लंघन और अवैध करार देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में व्यभिचार (विवाहेतर संबंध) यानी एडल्ट्री को अपराध की श्रेणी से हटा दिया। हालाँकि, इसके आधार पर तलाक लिया जा सकता है। इस साल 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने समान-लिंग वाले जोड़ों के बीच सहमति से बने यौन संबंध को अपराध की श्रेणी से हटा दिया।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इन धाराओं को खारिज करने के साथ ही समलैंगिकों के बीच बने अप्राकृतिक यौन संबंध और व्यभिचार कहे जाने वाले सहमति से बने विवाहेतर यौन संबंध अपराध की श्रेणी से बाहर हो गए। हालाँकि, देश की इस नई दंड संहिता यानी बीएनएस विधेयक में बलात्कार और यौन अपराधों के पीड़ितों से संबंधित पहचान या जानकारी का खुलासा करने को दंडनीय बनाने वाला एक नया प्रावधान पेश किया गया है।

इसके तहत बीएनएस विधेयक ने महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों से निपटने के प्रावधानों में एक नई धारा 73 जोड़ दी। इसके तहत अदालती कार्यवाही में बलात्कार और यौन अपराधों के सर्वाइवर्स से संबंधित पहचान या जानकारी का खुलासा करने पर 2 साल तक की जेल की सजा हो सकती है।

बीएनएस की धारा 73 के मुताबिक, “जो कोई धारा 72 में बताए गए अपराध के संबंध में किसी अदालत में चल रही किसी भी कार्यवाही के किसी भी मामले को अदालत की पूर्व अनुमति के बगैर मुद्रित या प्रकाशित करेगा, उसे कारावास की सजा दी जाएगी। इसे 2 साल तक बढ़ाया जा सकता है। इसे दंडित करते के साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है।”

हालाँकि, यह भी साफ कर दिया किया गया है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसले को प्रिंट करना या छापना इस धारा के तहत अपराध नहीं माना जाएगा। धारा 72 यौन अपराध के पीड़ित की पहचान उजागर करने वाली सामग्री को छापने या प्रकाशित करने पर रोक लगाती है।

गौरतलब है कि बृज लाल के नेतृत्व वाली गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने 4 दिसंबर, 2023 को संसद में अपनी रिपोर्ट पेश की थी। इसमें संसदीय पैनल ने विवाह की पवित्रता बनाए रखने के लिए धारा 377 को इसके रीड-डाउन फॉर्म में शामिल करने यानी समलैंगिक और बगैर सहमति के बनाए गए यौन संबंधों पर मुकदमा चलाने की सिफारिश की थी। इसके साथ ही धारा 497 को बरकरार रखने की सिफारिश भी की थी।

धारा 497 के तहत, “जो कोई किसी ऐसे व्यक्ति के साथ यौन संबंध बनाता है जो ये जानता है या जिसके पास ये विश्वास करने की वजह है कि वह किसी अन्य पुरुष की पत्नी है तो उस पुरुष की सहमति या मिलीभगत के बगैर यानी जिस पुरुष की वो पत्नी है से किया ऐसा संभोग बलात्कार के अपराध की श्रेणी में नहीं आता है, बल्कि दूसरे की पत्नी से संभोग करने वाले पुरुष व्यभिचार के अपराध का दोषी माना जाएगा है। उसे किसी एक वक्त के लिए कारावास, जिसे पाँच साल तक बढ़ाया जा सकता है या जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है। ऐसे मामले में, पत्नी को बहकाने वाले के तौर पर सजा नहीं दी जाएगी।”

संसद की सुरक्षा चूक मामले में 8 सुरक्षाकर्मी सस्पेंड: लोकसभा सचिवालय की कार्रवाई, PM मोदी भी मंत्रियों के साथ कर रहे बैठक

संसद में चल रहे शीतकालीन सत्र के दौरान हुई सुरक्षा चूक मामले में लोकसभा सचिवालय ने बड़ी कार्रवाई करते हुए सुरक्षा टीम से जुड़े 8 सुरक्षाकर्मियों को सस्पेंड कर दिया है।

सामने आई जानकारी के अनुसार, जिन्हें सस्पेंड किया गया है वह सब लोकसभा सचिवालय के सिक्योरिटी स्टाफ हैं। इनके नाम उनके नाम रामपाल, अरविंद, वीरदास, गणेश, अनिल, प्रदीप, विमित, नरेंद्र बताए जा रहे हैं। इन सभी की तैनाती उसी जगह थी जहाँ से आरोपितों की एंट्री हुई।

बता दें कि बुधवार (13 दिसंबर 2023) को संसद की सुरक्षा में हुई बड़ी चूक के मामले में संसद भवन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अहम बैठक कर रहे हैं। जिसमें कई बड़े मंत्री भी शामिल हैं।

इसके अलावा इस पूरे मामले में गृह मंत्रालय ने भी जाँच के आदेश दिए हैं। जाँच एजेंसियाँ हर एंगल पर छानबीन कर रही है। वहीं, इस मामले के बाद विपक्षी पार्टियाँ लगातार सुरक्षा पर उठा रही हैं।

गौरतलब है कि एक तरफ सुरक्षा चूक के बाद जाँच एजेंसियाँ चौकन्ना हैं वहीं दिल्ली पुलिस ने घटना में शामिल 7 में से 6 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। इनके खिलाफ दिल्ली पुलिस ने अनलॉफुल एक्टिविटीज (प्रीवेंशन) एक्ट (UAPA) के तहत केस दर्ज कर लिया है।

पुलिस ने छानबीन में पता लगाया है कि ये सारे के सारे ‘भगत सिंग फैन क्लब’ के जरिए एक दूसरे से जुड़े थे। सागर शर्मा नाम के आरोपित संसद की सिक्योरिटी चेक के बारे में जाना था। वहीं अमोल शिंदे वो आरोपित है जो महाराष्ट्र से जाकर स्मोक कनस्तर लेकर आया था, जिसे उसने अपने साथियों को इंडिया गेट पर बाँटा।

 इन सबकी प्लानिंग थी कि ये सारे संसद में घुसते। लेकिन सिर्फ सागर शर्मा और मनोरंजन को ही पास मिल पाए थे इसलिए अमोल और नीलम बाहर ही थे। इनकी एंट्री के बाद ही लोकसभा के जीरो ऑवर में अफरा-तफरी देखी गई। विजिटर गैलरी से सांसदों के बीच कूदने वाला सागर शर्मा था। बताया जा रहा है कि जैसे ही सागर वहाँ कूदा तो मनोरंजन ने पीछे से वो स्मोग पैकेट खोल दिए। इतनी देर में नीलम और अमोल ने लोकसभा के बाहर ये काम कर दिया और तानाशाही बंद करो के नारे लगाए जाने लगे।

सऊदी अरब में 3 देवियों की मूर्ति-पूजा, आराधना को बढ़ावा देने पर बवाल: कुछ कह रहे – यही है अरब का असली इतिहास, विरोध में कट्टरपंथी

सऊदी अरब का सोशल मीडिया तीन प्राचीन अरबी देवियों की आराधना को बढ़ावा देने को लेकर बँट गया है। यह तीनों देवियाँ सऊदी अरब और आसपास के अरबी जगत में प्राचीन काल में पूजी जाती थीं। यह पूरा मामला सऊदी अरब के प्रधानमंत्री और राजकुमार मोहम्मद बिन सलमान की राष्ट्रवाद और विरासत को बढ़ावा देने की विचारधारा से मेल खाता है।

इसी को लेकर एक्स (पहले ट्विटर) पर एक यूजर ने इन तीन में से एक देवी अल-उज्ज़ा की एक तस्वीर डाली है। इस तस्वीर में सऊदी अरब के म्यूजियम में अल उज्जा की मूर्ति को घेर कर कुछ लोग खड़े हैं। यूजर का कहना है कि सऊदी अरब के लोग अपने इतिहास से गहरे तौर पर जुड़े हैं चाहे वो मुस्लिम हों या नहीं लेकिन यह अरब का इतिहास है। इस यूजर ने सऊदी सरकार की तारीफ़ भी की। उसने लिखा कि सरकार प्राचीन सऊदी देवताओं का संरक्षण कर रही।

इसी ट्वीट के बाद शुरू हुई बहस में कुछ यूजर्स ने बताया कि प्राचीन समय में पूरे अरब जगत में तीन देवियों की मान्यता थी। इनके नाम ‘अल्लत (Allat)’, ‘मनत (Manat)’ और ‘अल-उज्जा (Al-Uzza)’ थे। इसे सोशल मीडिया पर लोगों ने अरब जगत में महिला सशक्तीकरण के प्रतीक के तौर पर भी बताया। यह भी बताया गया कि इन देवियों के सम्मान में छोटी बच्चियों को दफनाया जाता था। तब अरबी समाज के लिए यह कोई शर्म की बात नहीं थी।

सऊदी अरब के कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने सहवा (पुनर्जागरण) पर सऊदी के इस्लाम से पहले के इतिहास को तवज्जो ना देने और तीन देवियों की महत्ता को धुँधला करने का आरोप लगाया। सहवा, 1960 के बाद सऊदी अरब में आई इस्लामी राजनीतिक विचारधारा है। इसमें सऊदी समेत मिस्र जैसे अरब देशों के कई मुस्लिम बुद्धिजीवी शामिल थे।

सोशल मीडिया पर एक यूजर का कहना था कि सहवा ने सऊदी अरब का इतिहास लोगों के दिमाग से भुला दिया। इसने इतिहास, संस्कृति और विरासत से संबंधित बातों को भी तोड़ा-मरोड़ा। यूजर का कहना है कि अगर कुछ साल पहले तक आप इन देवियों की बात करते तो यह मूर्ति-पूजा और बहुदेववाद को बढ़ावा देना करार दिया जाता।

सऊदी अरब के सोशल मीडिया यूजर्स का कहना है कि मुस्लिम ब्रदरहुड और अन्य इस्लामी बुद्धिजीवियों ने सहवा के दौरान सऊदी लोगों की शिक्षा व्यवस्था को बदल दिया। बाहरी लोगों को शरण देना सऊदी की एक बड़ी भूल थी।

तीन देवियों के ऊपर छिड़ी इस बहस को कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने सऊदी अरब में मूर्ति पूजा को जिन्दा करने की कोशिश बताया। वर्तमान समय में सऊदी अरब में मूर्ति पूजा नहीं होती क्योंकि यह एक इस्लामिक देश है और इस्लाम में मूर्ति (बुत) की पूजा की मनाही है।

कुछ कट्टरपंथी यूजर्स का कहना है कि सऊदी सरकार राष्ट्रवाद को बढ़ावा देकर इस्लामिक पहचान को दबा रही है। कुछ यूजर्स ने इसके लिए ‘हिंदुत्व’ और यहूदियों को दोषी ठहरा दिया। उनका कहना था कि यह हिंदुत्व और यहूदियों की साजिश है कि अरब जगत को सेक्यूलर और उदार बनाया जाए।

गौरतलब है कि सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान बीते कुछ वर्षों से सहवा पर बंदिशें लगा रहे हैं और कट्टरपंथियों को हाशिये पर धकेल रहे हैं। उनके सत्ता का नियन्त्रण लेने के बाद सऊदी के समाज में तेजी से बदलाव देखने को मिले हैं।