उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले की घाटमपुर पुलिस ने 13 जनवरी 2026 को केरल के रहने वाले एक पादरी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। इस पादरी पर लालच देकर और डरा-धमकाकर हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराने का गंभीर आरोप है। यह पूरा खेल घाटमपुर के नौरंगा गाँव में एक ‘हाउस चर्च’ (घर में बने अवैध चर्च) के जरिए चलाया जा रहा था। पादरी यहाँ आर्थिक रूप से कमजोर हिंदुओं को निशाना बनाता था और उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन देकर ईसाई धर्म अपनाने के लिए उकसाता था।
पुलिस ने यह कार्रवाई फतेहपुर जिले के जहानाबाद निवासी मुकेश कुमार की लिखित शिकायत के बाद की है। मुकेश की शिकायत के आधार पर पादरी के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज की गई, जिसकी कॉपी ऑपइंडिया के पास उपलब्ध है। गिरफ्तारी के बाद आरोपित पादरी को कोर्ट में पेश किया गया, जहाँ से उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया है।
बीमारी ठीक करने के नाम पर धर्मांतरण का धंधा
यह घटना 13 जनवरी की है, जब पुलिस को सूचना मिली कि नौरंगा गाँव के एक घर के अंदर प्रार्थना सभा चल रही है। खबर मिलते ही बजरंग दल के कार्यकर्ता भी वहाँ पहुँच गए। उन्होंने देखा कि प्रार्थना और बीमारी ठीक करने के नाम पर असल में वहाँ लोगों का धर्म परिवर्तन कराया जा रहा था। कार्यकर्ताओं ने तुरंत इसकी जानकारी पुलिस को दी। मौके पर पहुँची पुलिस ने वहाँ मौजूद सभी लोगों को हिरासत में लिया और पूछताछ के लिए थाने ले आई।
इस मामले में बजरंग दल के जिला संयोजक शुभम शौर्य अग्निहोत्री ने एसीपी कृष्णकांत यादव को एक लिखित शिकायत सौंपी। शिकायत में बताया गया कि नौरंगा के एक घर से ‘हाउस चर्च’ चलाया जा रहा था, जहाँ केरल का रहने वाला एल्विन और उसकी पत्नी हिंदुओं को लालच देकर उनका धर्म बदलवाने का काम कर रहे थे।
शुरुआती पूछताछ के बाद पुलिस ने अन्य सभी लोगों को तो छोड़ दिया, लेकिन आरोपित पादरी को हिरासत में ले लिया। इस मामले में मुकेश कुमार की शिकायत पर एफआईआर (FIR) दर्ज की गई, जिसमें पादरी पर लालच देकर धर्म परिवर्तन कराने और डराने-धमकाने के आरोप लगाए गए हैं।
पुलिस की जाँच और दर्ज शिकायत के मुताबिक, आरोपित पादरी एल्विन ने अपने घर को ही एक ‘हाउस चर्च’ बना रखा था। यहाँ वह नियमित रूप से प्रार्थना सभाएँ और बीमारी ठीक करने (हीलिंग सेशन) के नाम पर कार्यक्रम आयोजित करता था। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इन सभाओं में गरीब और मजबूर हिंदुओं को बुलाया जाता था। उन्हें पैसों का लालच और कई तरह के वादे किए जाते थे ताकि उन्हें ईसाई धर्म अपनाने के लिए मनाया जा सके।
मीडिया से बातचीत में स्थानीय लोगों ने बताया कि पादरी खुद के पास चमत्कारी शक्तियाँ होने का दावा करता था। उसका कहना था कि उसके घर पर होने वाली प्रार्थना से बड़ी से बड़ी बीमारियाँ ठीक हो सकती हैं। कई बार तो लोगों को यह तक डराया जाता था कि उनकी बीमारी बुरी ताकतों (प्रेत बाधा) की वजह से है और अगर वे धर्म परिवर्तन कर लेंगे, तभी उन्हें इन बीमारियों से छुटकारा मिलेगा।
जाँच के दौरान पुलिस ने इस तथाकथित हाउस चर्च से कई फाइलें, दस्तावेज और भारी मात्रा में ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार की सामग्री बरामद की है। अब पुलिस इस बात की गहराई से जांच कर रही है कि क्या इन सामग्रियों का इस्तेमाल योजनाबद्ध तरीके से हिंदुओं को प्रभावित करने और उन्हें ईसाई धर्म अपनाने का लालच देने के लिए किया जा रहा था।
विदेशी फंडिंग का एंगल
पुलिस की पूछताछ में यह बात सामने आई है कि आरोपित मूल रूप से केरल का रहने वाला है और पिछले करीब दस सालों से नौरंगा इलाके में रह रहा था। शुरुआत में वह किराए के मकान में रहता था, लेकिन बाद में उसने खुद की जमीन खरीदी और 2022 में अपना घर बना लिया। इसी घर को उसने बिना किसी अनुमति के एक ‘हाउस चर्च’ में बदल दिया।
केरल का पादरी एल्विन (फोटो: शुभम शौर्य/फेसबुक)
हैरानी की बात यह है कि आरोपित का अपना कोई ज्ञात काम या कारोबार नहीं था, फिर भी वह काफी आराम की जिंदगी जी रहा था। इससे पुलिस को शक है कि उसे विदेश या कहीं और से भारी फंडिंग (पैसे) मिल रही थी। अब पुलिस इस बात की बारीकी से जांच कर रही है कि हाउस चर्च चलाने, प्रार्थना सभाएँ आयोजित करने और अन्य गतिविधियों के लिए पैसा कहाँ से आ रहा था।
अधिकारी इस बात की भी पड़ताल कर रहे हैं कि आरोपित अकेला ही यह सब कर रहा था या वह किसी ऐसे बड़े गिरोह का हिस्सा है जो अलग-अलग जिलों में धर्म परिवर्तन कराने के काम में लगा हुआ है।
एफआईआर में क्या लिखा है?
ऑपइंडिया के पास मौजूद एफआईआर की कॉपी के मुताबिक, यह शिकायत 13 जनवरी को बजरंग दल के कार्यकर्ता मुकेश कुमार ने दर्ज कराई थी। उनकी शिकायत के आधार पर पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 352 और 351(3) के साथ-साथ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम 2021 की धारा 3 और 5(1) के तहत मामला दर्ज किया है।
मुकेश ने अपनी शिकायत में बताया कि उन्हें जानकारी मिली थी कि नौरंगा गाँव में एल्विन नाम के व्यक्ति ने अपने घर को चर्च बना लिया है। वह वहाँ गरीब लोगों को बुलाकर उन्हें तरह-तरह के लालच देता था और ईसाई धर्म अपनाने के लिए उनका ब्रेनवॉश कर रहा था।
शिकायत में आगे कहा गया है कि जब मुकेश अपने दोस्त मनीष सचान के साथ उस चर्च में पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि आरोपित जबरन लोगों को घर के अंदर बिठाकर प्रार्थना करवा रहा था और उन्हें हिंदू धर्म छोड़ ईसाई बनने के लिए उकसा रहा था। जब मुकेश और उनके साथी ने इस पर आपत्ति जताई, तो आरोपित एल्विन ने उन्हें गालियाँ दीं और जान से मारने की धमकी दी, जिसके बाद वहाँ मौजूद लोग घर छोड़कर चले गए।
बजरंग दल के खिलाफ शिकायत
बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के खिलाफ शिकायत पादरी की गिरफ्तारी के बाद उसके परिवार और कुछ स्थानीय लोगों ने पुलिस को एक अलग शिकायत दी है। इसमें आरोप लगाया गया है कि बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने उनके साथ बदसलूकी और मारपीट की। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि इन आरोपों की अलग से जाँच की जा रही है और अगर सबूत मिलते हैं, तो उसी के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
घाटमपुर इलाके में धर्मांतरण के पुराने विवादों को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। इससे पहले भी यहाँ इस तरह की कई घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। पुलिस अधिकारी अब इस बात की पड़ताल कर रहे हैं कि क्या इस पादरी के तार पहले के मामलों से जुड़े हैं। साथ ही, यह भी देखा जा रहा है कि पादरी अकेला काम कर रहा था या वह किसी ऐसे संगठित गिरोह का हिस्सा है जो कई जिलों में सक्रिय है।
प्रशासन का कहना है कि जाँच के दौरान मिले दस्तावेजों, गवाहों के बयानों और पैसों के लेनदेन (फंडिंग) के सबूतों के आधार पर आगे की सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। अंग्रेजी में पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)
उत्तर भारत इस समय भीषण शीतलहर की चपेट में है, जिससे जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है। दिल्ली, गुरुग्राम समेत पूरे NCR में मंगलवार (13 जनवरी 2026) को कड़ाके की ठंड ने लोगों को घरों में कैद रहने पर मजबूर कर दिया। हड्डियाँ जमा देने वाली ठंडी हवाओं और गिरते तापमान के कारण सड़कों पर आवाजाही बेहद कम देखी गई, जबकि सुबह और रात के समय ठंड का असर और ज्यादा तीखा रहा।
लगातार जारी इस ठंड ने आम लोगों की दिनचर्या, कामकाज और यातायात व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। स्कूल, दफ्तर और खुले बाजारों में भी सर्दी का साफ असर देखा जा रहा है।
#Weatherforecast#Delhi reeled under an intense cold spell today as temperatures plunged sharply.
The #IMD said the city recorded a minimum of 2.9°C, with #Palam at 3.3°C and #LodhiRoad at 3°C. Dense fog is likely to persist over #DelhiNCR till the 17th.
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार, सोमवार सुबह (12 जनवरी 2026) को गुरुग्राम में न्यूनतम तापमान मात्र 0.6 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। यह पिछले 50 वर्षों में जनवरी महीने की सबसे ठंडी सुबह रही।
हिंदुस्तान टाइम्स से छवि
यह तापमान 22 जनवरी 1977 को दर्ज न्यूनतम तापमान के बराबर है और ऐसा बहुत कम बार ही देखने को मिला है। इससे पहले 5 दिसंबर 1966 को तापमान शून्य से नीचे गिरकर माइनस 0.4 डिग्री सेल्सियस रहा था, 11 जनवरी 1970 को 0 डिग्री और 22 जनवरी 1979 को 0.3 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था। वहीं दिल्ली भी ज्यादा पीछे नहीं रही, जहाँ सफदरजंग मौसम केंद्र पर न्यूनतम तापमान 3 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया।
हरियाणा और राजस्थान के आसपास के इलाकों में भी तापमान शून्य के आसपास या उससे नीचे दर्ज किया गया। हरियाणा के हिसार में न्यूनतम तापमान 2.6 डिग्री सेल्सियस, करनाल में 3.5 डिग्री सेल्सियस रहा, जबकि राजस्थान के सीकर जिले के फतेहपुर में तापमान शून्य से नीचे चला गया। वहीं, पंजाब के अमृतसर और हरियाणा के गुरुग्राम में भी कड़ाके की ठंड देखने को मिली, जहाँ न्यूनतम तापमान मात्र 1.1 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया।
दिल्ली शिमला से ज्यादा ठंडा है
इस बार सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मैदानी इलाकों में पहाड़ी क्षेत्रों से भी ज्यादा ठंड पड़ रही है। दिल्ली और आसपास के इलाकों में तापमान, शिमला जैसे हिल स्टेशनों से भी नीचे चला गया है।
सोमवार (12 जनवरी 2026) को शिमला में अधिकतम तापमान करीब 16 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम तापमान 9 डिग्री सेल्सियस रहने का अनुमान था, जबकि दिल्ली में न्यूनतम तापमान 3 से 4.2 डिग्री सेल्सियस और अधिकतम 18 से 20 डिग्री सेल्सियस के बीच रहने की संभावना जताई गई थी।
तापमान अपेक्षाकृत अधिक रहने के कारण हिमालयी राज्यों के कई हिल स्टेशनों पर इस साल बर्फबारी नहीं हुई या फिर पिछले वर्षों की तुलना में काफी कम बर्फबारी दर्ज की गई।
ग्राफ वाया ईज वेदर
हिमाचल प्रदेश के शिमला और कुल्लू जैसे इलाकों में फिलहाल किसी तरह की मौसम को लेकर चेतावनी जारी नहीं की गई है। वहीं दिल्ली में हर दिन ‘कोल्ड डे’ जैसी स्थिति बने रहने की संभावना है और बाद के दिनों में आसमान आंशिक रूप से बादल छाए रहने का अनुमान है। हैरानी की बात यह है कि इस समय दिल्ली और चंडीगढ़ जैसे मैदानी इलाके, शिमला जैसे पहाड़ी क्षेत्र से भी अधिक ठंडे बने हुए हैं।
मैदानी इलाके पहाड़ों से ज्यादा ठंडे क्यों होते हैं?
इस जनवरी में मैदानी इलाकों का पहाड़ों से ज्यादा ठंडा होना मौसम के कुछ खास कारणों का नतीजा है। सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ (वेस्टर्न डिस्टर्बेंस) के कारण शिमला जैसे ऊँचे पहाड़ी इलाकों में बादल छाए रहे, जो रात के समय एक तरह से कंबल की तरह काम करते हैं और जमीन की गर्मी को बाहर निकलने से रोकते हैं।
IMD के महानिदेशक एम मोहापात्रा के अनुसार, बादल छाए रहने की वजह से शिमला में न्यूनतम तापमान अपेक्षाकृत अधिक, करीब 8.8 डिग्री सेल्सियस रहा। वहीं कांगड़ा और पालमपुर में 3 डिग्री, जम्मू में 3.4 डिग्री, उत्तराखंड के मुक्तेश्वर में करीब 4.1 डिग्री और मसूरी में 7.7 डिग्री सेल्सियस न्यूनतम तापमान दर्ज किया गया।
इसके उलट दिल्ली-एनसीआर में आसमान साफ रहा, जिससे रात में जमीन की गर्मी तेजी से बाहर निकल गई। इसे रेडिएटिव कूलिंग कहा जाता है। बादल न होने के कारण तापमान तेजी से गिरा और दिल्ली में न्यूनतम तापमान 3 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया, जबकि आसपास के इलाकों में इससे भी कम रहा। ऊपर से उत्तर-पश्चिमी हवाएँ बर्फ से ढके पहाड़ों से बेहद ठंडी हवा सीधे मैदानी इलाकों में ले आईं, जिससे कड़ाके की ठंड पड़ गई।
NDTV की रिपोर्ट के अनुसार, IMD के नरेश कुमार ने बताया कि फिलहाल उत्तर-पश्चिम भारत में कोई सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ नहीं है, बल्कि 5 से 6 किलोमीटर ऊँचाई तक फैली ठंडी हिमालयी हवाएँ मैदानी इलाकों में ठंडी हवा जमा कर रही हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में ऊँचाई, ढलान और बादलों के कारण तापमान संतुलित रहता है और जमीन की गर्मी फँस जाती है, जिससे शिमला अपेक्षाकृत गर्म बना रहता है।
दिल्ली में प्रदूषण और शुष्क हवा के कारण तापमान इनवर्जन भी बन रहा है, जिससे ठंड सतह के पास ही फँसी रहती है। अन्य मैदानी इलाकों में भी यही हाल रहा हिसार में 2.6 डिग्री, अमृतसर में 1.1 डिग्री, चूरू में 1.3 डिग्री, करनाल में 3.5 डिग्री और मेरठ में 4.5 डिग्री सेल्सियस न्यूनतम तापमान दर्ज किया गया। पंजाब के बठिंडा में गुरुग्राम के बराबर 0.6 डिग्री तापमान रहा, जबकि राजस्थान के फतेहपुर में पारा शून्य से नीचे माइनस 0.4 डिग्री तक गिर गया।
गुरुग्राम के बाहरी इलाकों और हरियाणा के ग्रामीण क्षेत्रों में पाला जम गया, गाड़ियों और फसलों पर बर्फ की सफेद परत दिखी, सरसों के खेत मानो चीनी से ढक गए हों। उत्तर प्रदेश के शहरों में दिन का तापमान 13 से 19 डिग्री के बीच रहा, जबकि जम्मू-कश्मीर में चिल्ला-ए-कला के दौरान डल झील के कुछ हिस्से जम गए, जो सर्दी की सबसे खराब स्थिति को दर्शाता है।
अन्य मैदानी इलाकों में भी कड़ाके की ठंड
ठंड सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है, यह उत्तर-पश्चिम भारत के कई हिस्सों में जोरदार असर डाल रही है। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि साफ आसमान, तेज उत्तर-पश्चिमी हवाएँ, सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ का अभाव और हाड़ कंपाने वाली शुष्क सर्द हवाएँ इस रेडिएटिव कूलिंग की स्थिति को बढ़ावा दे रही हैं।
NCR के हर इलाके में पाले ने दस्तक दे दी है, फरीदाबाद से लेकर रेवाड़ी तक खेत, वाहन और खुला क्षेत्र जम गए हैं। कई जगहों पर यह इतनी घनी ठंड बनी कि दिखना लगभग बंद हो गया।
IMD ने जारी की चेतावनी
भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने दिल्ली-एनसीआर के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी किया है, जिसमें अगले 48 घंटों तक ठंड लहर या गंभीर सर्दी बनी रहने की चेतावनी दी गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि गुरुवार (15 जनवरी 2026) के बाद एक नया मौसम प्रणाली सक्रिय होने से न्यूनतम तापमान में थोड़ी बढ़ोतरी होगी और ठंड कुछ कम होगी। तब तक उत्तर भारत ऐतिहासिक कड़ाके की ठंड की चपेट में है।
अधिकारियों ने लोगों को खासकर बच्चों और बुजुर्गों, को सुबह जल्दी या रात देर तक बाहर न निकलने की सख्त हिदायत दी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि कांपना शरीर का पहला संकेत है कि शरीर गर्मी खो रहा है और इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
(मूल रूप से यह खबर अंग्रेजी में लिखी गई है। मूल रिपोर्ट पढ़नें के लिए यहाँ क्लिक करें।)
राष्ट्रीय चिकित्सा परीक्षा बोर्ड (NBEMS) ने मंगलवार (13 जनवरी 2026) को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के निर्देश पर NEET PG 2025–26 की क्वालिफाइंग कट-ऑफ में संशोधन किया।
कट-ऑफ प्रतिशत घटाए जाने के बाद SC, ST और OBC वर्ग के ऐसे अभ्यर्थी भी काउंसलिंग के लिए पात्र हो गए हैं, जिनके अंक शून्य से कम (नेगेटिव मार्क्स) हैं। इस फैसले के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इसे लेकर तीखी बहस शुरू हो गई है।
NBEMS की आधिकारिक अधिसूचना के अनुसार, NEET PG 2025–26 की तीसरी काउंसलिंग के लिए सभी श्रेणियों में न्यूनतम क्वालिफाइंग परसेंटाइल कम किए गए हैं, जो केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के निर्देशों के अनुसार है।
रिवाइज्ड क्वालिफाइंग क्राइटेरिया क्या कहता है
संशोधित मानदंडों के अनुसार, सामान्य (General) और EWS वर्ग के उम्मीदवारों के लिए क्वालिफाइंग परसेंटाइल को 50वें परसेंटाइल से घटाकर 7वाँ परसेंटाइल कर दिया गया है, जिसके तहत कट-ऑफ स्कोर 800 में से 103 अंक तय किया गया है।
वहीं, बेंचमार्क दिव्यांगता (PwBD) वाले सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए क्वालिफाइंग परसेंटाइल 45वें से घटाकर 5वाँ कर दिया गया है, जिसके बाद कट-ऑफ स्कोर 90 अंक तय किया गया है।
स्रोत: NBEMS
SC, ST और OBC वर्ग के उम्मीदवारों के लिए, जिनमें इन वर्गों के बेंचमार्क दिव्यांग (PwBD) अभ्यर्थी भी शामिल हैं, क्वालिफाइंग परसेंटाइल को 40वें से घटाकर 0वाँ परसेंटाइल कर दिया गया है। इसके तहत कट-ऑफ स्कोर 800 में से माइनस 40 अंक तय किया गया है, क्योंकि परीक्षा में नेगेटिव मार्किंग की व्यवस्था लागू है।
NBEMS ने यह भी स्पष्ट किया है कि 19 अगस्त 2025 को जारी की गई NEET PG 2025 की रैंक में कोई बदलाव नहीं किया गया है। यह संशोधन केवल काउंसलिंग में भाग लेने की पात्रता तय करने के लिए है, रैंक या मेरिट सूची पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।
अस्थाई व्यवस्था के तहत उठाया गया कदम, ये तय प्रक्रिया नहीं
नोटिस में आगे कहा गया है कि उम्मीदवारों की उम्मीदवारी पूरी तरह अस्थायी (प्रोविजनल) रहेगी और यह NEET PG 2025 सूचना पुस्तिका में तय सभी पात्रता शर्तों को पूरा करने पर निर्भर करेगी। आवेदन फॉर्म में अभ्यर्थियों द्वारा बताए गए MBBS प्रोफेशनल परीक्षाओं या विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट परीक्षा (FMGE) में प्राप्त कुल अंकों की जाँच प्रवेश के समय मूल दस्तावेजों से की जाएगी।
NBEMS ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि रैंक में टाई तोड़ने के लिए किसी उम्मीदवार ने गलत जानकारी दी होगी तो उसकी उम्मीदवारी रद्द कर दी जाएगी। इसके अलावा, परीक्षा के दौरान किसी भी तरह के अनुचित साधनों (अनफेयर मीन्स) के इस्तेमाल पर NBEMS, मेडिकल काउंसलिंग कमेटी या संबंधित प्रवेश प्राधिकरण द्वारा सख्त कार्रवाई की जाएगी।
कट-ऑफ क्यों कम किए गए?
सरकार ने पोस्टग्रेजुएट मेडिकल की बड़ी संख्या में सीटें खाली रहने की आशंका को देखते हुए क्वालिफाइंग कट-ऑफ घटाने का फैसला लिया। अधिकारियों के मुताबिक, NEET PG 2025 में करीब 2.4 लाख उम्मीदवार शामिल हुए थे, लेकिन हाई कट-ऑफ के कारण काउंसलिंग के कई दौर पूरे होने के बाद भी हजारों सीटें खाली रह गई थीं।
भारत में करीब 65,000 से 70,000 पोस्टग्रेजुएट मेडिकल सीटें हैं। अधिकारियों ने बताया कि अगर बड़ी संख्या में सीटें खाली रहती हैं, तो इसका सीधा असर टीचिंग हॉस्पिटल्स के कामकाज पर पड़ेगा, खासकर सरकारी अस्पतालों पर, जहाँ रेजिडेंट डॉक्टरों पर इलाज और शैक्षणिक जिम्मेदारियों का बड़ा भार होता है।
यह संशोधन ऐसे समय में किया गया जब इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) ने भी केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को पत्र लिखकर कट-ऑफ में तार्किक संशोधन की माँग की थी, ताकि मेडिकल प्रशिक्षण क्षमता की बड़े पैमाने पर बर्बादी को रोका जा सके।
सोशल मीडिया पर क्या कह रहे हैं लोग
संशोधित कट-ऑफ को लेकर सोशल मीडिया पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। कई यूजर्स इस बात पर बहस कर रहे हैं कि क्या यह फैसला केवल एक प्रशासनिक कदम है या फिर इससे शैक्षणिक मानकों में ढील का संकेत मिलता है।
कुछ यूजर्स ने इस फैसले को संदर्भ के साथ समझने की कोशिश की है। उनका कहना है कि कट-ऑफ में बदलाव से केवल काउंसलिंग में भाग लेने की पात्रता बढ़ी है, इससे एडमिशन की गारंटी नहीं मिलती।
टेक पॉलिसी विश्लेषक हिमांशु जैन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि यह बात सही है कि अब माइनस 40 अंक वाले उम्मीदवार भी काउंसलिंग में शामिल हो सकते हैं, लेकिन ऑनलाइन बहस में अक्सर इसका पूरा संदर्भ सामने नहीं रखा जा रहा है।
🩺 NEET-PG 2025 | CLARIFICATION
Yes, the –40 marks counselling claim is real — but the context matters.
• NBEMS (as per MoHFW) lowered cut-offs on 13 Jan 2026 to avoid ~9,000 PG seats going vacant • Eligibility ≠ guaranteed admission • Such ranks usually translate to… pic.twitter.com/9CQb1GCSOD
हिमांशु जैन ने बताया कि NBEMS ने यह फैसला मुख्य रूप से करीब 9,000 पीजी मेडिकल सीटें खाली रहने से बचाने के लिए लिया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि काउंसलिंग की पात्रता को एडमिशन की गारंटी नहीं माना जाना चाहिए। इतने कम कट-ऑफ पर क्वालिफाई करने वाले उम्मीदवारों को आमतौर पर नॉन-क्लिनिकल या कम माँग वाली ब्राँचें मिलती हैं, या फिर हाई फीस वाले प्राइवेट मेडिकल कॉलेज, जहाँ ऊँची रैंक वाले उम्मीदवार अक्सर सीटें छोड़ देते हैं।
हिमांशु के अनुसार, यह नीतिगत फैसला सीटों के बेहतर उपयोग (कैपेसिटी यूटिलाइजेशन) के लिए लिया गया है, न कि पासिंग स्टैंडर्ड बदलने के लिए। उन्होंने यह भी कहा कि NEET PG एक रैंकिंग परीक्षा है, जिसे वे उम्मीदवार देते हैं जो पहले ही MBBS पूरी कर चुके हैं और विश्वविद्यालय स्तर की परीक्षाएँ पास कर चुके हैं।
हालाँकि, कई अन्य यूजर्स ने नेगेटिव स्कोर वाले उम्मीदवारों को काउंसलिंग में शामिल करने के फैसले पर चिंता जताई है।
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन-JDN के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ ध्रुव चौहान ने कहा, “मुझे समझ नहीं आ रहा कि इस पर कैसे प्रतिक्रिया दूँ, लेकिन अब माइनस 40 अंक लाने वाले उम्मीदवार भी NEET PG की सीट पाने के लिए पात्र हो गए हैं। आसान शब्दों में कहें तो अगर आपके पास पैसा है या आप किसी खास कैटेगरी से आते हैं, तो परीक्षा में सो जाने और नेगेटिव नंबर लाने के बावजूद आप उस उम्मीदवार के बराबर हो जाते हैं, जिसने टॉप किया या कड़ी मेहनत की।”
I don’t know how to react on this , but now candidates scoring “Minus – 40”marks are also applicable to get NEET PG seat .
In simple language if you have money or specific category then even if you slept in the exam and scored negative marks = someone who topped /worked hard. pic.twitter.com/6O9r1o0NIJ
सोशल मीडिया टिप्पणीकार अमित किलहोर ने काउंसलिंग के लिए परसेंटाइल घटाने पर सवाल उठाए और मेडिकल दाखिलों के लिए न्यूनतम मानक तय करने की माँग की। उन्होंने यह बात केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को टैग करते हुए सोशल मीडिया पर उठाई।
पॉलिसी टिप्पणीकार अंशुल सक्सेना ने लिखा,”NEET PG 2025 में 800 में से माइनस 40 अंक लाने वाले उम्मीदवारों को भी पीजी काउंसलिंग में शामिल होने की अनुमति दी जा रही है। मेरिट कट-ऑफ इतना नीचे गिर गया है कि अब नेगेटिव स्कोर को भी क्वालिफाइंग माना जा रहा है। यह शैक्षणिक मानकों में एक गंभीर संकट है।”
In NEET-PG 2025, candidates with scores as low as –40 out of 800 are allowed to participate in PG counselling.
The merit cutoff has fallen so low that a negative score is now considered qualifying.
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर DAMS-Alpha के संस्थापक डॉ सुमेर सेठी ने लिखा, “मेरिट का नेगेटिव मूल्य नहीं होना चाहिए। NEET PG का कट-ऑफ माइनस 40 कोई राहत नहीं, बल्कि मानकों में गिरावट है। सिर्फ सीटें भरना ही गुणवत्ता नहीं होता। नेगेटिव कट-ऑफ ‘क्वालिफाइंग’ शब्द को ही बेमानी बना देता है।”
Merit shouldn’t have negative value. NEET PG cut-off at -40 isn’t relief it’s dilution.
NEET PG के संशोधित कट-ऑफ ने पोस्टग्रेजुएट मेडिकल सीटों को भरने को लेकर चल रही बहस को और तेज कर दिया है। एक तरफ प्रशासन का कहना है कि यह फैसला सीटें खाली रहने से बचाने और खासकर सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त रेजिडेंट डॉक्टर सुनिश्चित करने के लिए लिया गया, ताकि अस्पतालों का कामकाज और पढ़ाई प्रभावित न हो।
वहीं दूसरी ओर, बहुत कम या नेगेटिव अंक लाने वाले उम्मीदवारों को तीसरे दौर की काउंसलिंग में शामिल करने की अनुमति ने डॉक्टरों और आम लोगों के बीच गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह मामला पोस्टग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा में सीटों के बेहतर उपयोग और न्यूनतम शैक्षणिक मानकों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती को सामने लाता है। काउंसलिंग प्रक्रिया शुरू होने के साथ आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर बहस जारी रहने की संभावना है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)
कुछ दिन पहले ही मुझे सोमनाथ की पवित्र भूमि पर ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ में हिस्सा लेने का सुअवसर मिला। इस पर्व को हम वर्ष 1026 में सोमनाथ पर हुए पहले आक्रमण के एक हजार साल पूरे होने पर मना रहे हैं। इस क्षण का साक्षी बनने के लिए देश के कोने-कोने से लोग सोमनाथ पहुँचे। यह इस बात का प्रमाण है कि भारतवर्ष के लोग जहाँ अपने इतिहास और संस्कृति से गहराई से जुड़े हैं, वहीं कभी हार ना मानने वाला साहस भी उनके जीवन की एक बड़ी विशेषता है। यही भावना उन्हें एक साथ जोड़ती भी है।
इस कार्यक्रम के दौरान मेरी मुलाकात कुछ ऐसे लोगों से भी हुई, जो इससे पहले सौराष्ट्र-तमिल संगमम के दौरान सोमनाथ आए थे और इससे पहले काशी-तमिल संगमम के समय काशी भी गए थे। ऐसे मंचों को लेकर उनकी सकारात्मक सोच ने मुझे बहुत प्रभावित किया। इसलिए मैंने तय किया कि क्यों ना इस विषय पर अपने कुछ विचार साझा करूँ।
‘मन की बात’ के एक एपिसोड के दौरान मैंने कहा था कि अपने जीवन में तमिल भाषा ना सीख पाने का मुझे बहुत दुख है। यह हमारा सौभाग्य है कि बीते कुछ वर्षों से हमारी सरकार तमिल संस्कृति को देश में और लोकप्रिय बनाने में निरंतर जुटी हुई है। यह ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को और सशक्त बनाने वाला है। हमारी संस्कृति में संगम का बहुत महत्त्व है। इस पहलू से भी काशी-तमिल संगमम एक अनूठा प्रयास है। इसमें जहाँ भारत की विविध परंपराओं के बीच अद्भुत सामंजस्य दिखता है, वहीं यह भी पता चलता है कि कैसे हम एक दूसरे की परंपराओं का सम्मान करते हैं।
काशी तमिल संगमम के आयोजन के लिए काशी सबसे उपयुक्त स्थान कहा जा सकता है। यह वही काशी है, जो अनादि काल से हमारी सभ्यता की धुरी बनी हुई है। यहाँ हजारों वर्षों से लोग ज्ञान, जीवन के अर्थ और मोक्ष की खोज में आते रहे हैं।
काशी का तमिल समाज और संस्कृति से अत्यंत गहरा नाता रहा है। काशी बाबा विश्वनाथ की नगरी है, तो तमिलनाडु में रामेश्वरम तीर्थ है। तमिलनाडु की तेनकासी को दक्षिण की काशी या दक्षिण काशी कहा जाता है। पूज्य कुमारगुरुपरर् स्वामिजि ने अपनी विद्वता और आध्यात्म परंपरा के माध्यम से काशी और तमिलनाडु के बीच एक सशक्त और स्थायी संबंध स्थापित किया था।
तमिलनाडु के महान सपूत महाकवि सुब्रमण्यम भारती जी को भी काशी में बौद्धिक विकास और आध्यात्मिक जागरण का अद्भुत अवसर दिखा। यहीं उनका राष्ट्रवाद और प्रबल हुआ, साथ ही उनकी कविताओं को एक नई धार मिली। यहीं पर स्वतंत्र और अखंड भारत की उनकी संकल्पना को एक स्पष्ट दिशा मिली। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जो काशी औैर तमिलनाडु के बीच गहरे आत्मीय संबंध को दर्शाते हैं।
वर्ष 2022 में वाराणसी की धरती पर काशी-तमिल संगमम की शुरुआत हुई थी। मुझे इसके उद्घाटन समारोह में शामिल होने का सौभाग्य मिला था। तब तमिलनाडु से आए लेखकों, -विद्यार्थियों, कलाकारों, विद्वानों, किसानों और अतिथियों ने काशी के साथ-साथ प्रयागराज और अयोध्या के दर्शन भी किए थे। इसके बाद के आयोजनों में इस पहल को और विस्तार दिया गया।
इसका उद्देश्य यह था कि संगमम में समय-समय पर नए विषय जोड़े जाएँ, नए और रचनात्मक तरीके अपनाए जाएँ और इसमें लोगों की भागीदारी ज्यादा से ज्यादा हो। प्रयास यह था कि ये आयोजन अपनी मूल भावना से जुड़े रहकर भी निरंतर आगे बढ़ता रहे। वर्ष 2023 के दूसरे आयोजन में टेक्नोलॉजी का बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया, ताकि यह सुनिश्चित हो कि भाषा इसमें बाधा ना बने। इसके तीसरे संस्करण में इंडियन नॉलेज सिस्टम पर विशेष फोकस रखा गया। इसके साथ ही शैक्षिक संवादों, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों, प्रदर्शनियों और संवाद सत्रों में लोगों की बड़ी भागीदारी देखने को मिली। हजारों लोग इनका हिस्सा बने।
काशी-तमिल संगमम का चौथा संस्करण 2 दिसंबर, 2025 को आरंभ हुआ। इस बार की थीम बहुत रोचक थी- तमिल करकलम् यानि तमिल सीखें….। इससे काशी और दूसरी जगहों के लोगों को खूबसूरत तमिल भाषा सीखने का एक अनूठा अवसर मिला। तमिलनाडु से आए शिक्षकों ने काशी के विद्यार्थियों के लिए इसे अविस्मरणीय बना दिया! इस बार कई और विशेष कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। प्राचीन तमिल साहित्य ग्रंथ तोलकाप्पियम का चार भारतीय और छह विदेशी भाषाओं में अनुवाद किया गया।
तेनकासी से काशी तक पहुँची एक विशेष व्हीकल एक्सपेडिशन भी देखने को मिली। इसके अलावा काशी में स्वास्थ्य शिविरों और डिजिटल लिट्रेसी कैंप के आयोजन के साथ ही कई और सराहनीय प्रयास भी किए गए। इस अभियान में सांस्कृतिक एकता के संदेश का प्रसार करने वाले पांड्य वंश के महान राजा आदि वीर पराक्रम पांडियन जी को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। पूरे आयोजन के दौरान नमो घाट पर प्रदर्शनियाँ लगाई गईं, बीएचयू में शैक्षणिक सत्र का आयोजन हुआ, साथ ही विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुए।
काशी-तमिल संगमम में इस बार जिस चीज ने मुझे सबसे अधिक प्रसन्नता दी, वो हमारे युवा साथियों का उत्साह है। इससे अपनी जड़ों से और अधिक जुड़े रहने के उनके पैशन का पता चलता है। उनके लिए ये एक ऐसा अद्भुत मंच है, जहाँ वे विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए अपनी प्रतिभा दिखा सकते हैं।
संगमम के अलावा काशी की यात्रा भी यादगार बने, इसके लिए विशेष प्रयास किए गए। भारतीय रेल ने लोगों को तमिलनाडु से उत्तर प्रदेश ले जाने के लिए विशेष ट्रेनें चलाईं। इस दौरान कई रेलवे स्टेशनों पर, विशेषकर तमिलनाडु में उनका खूब उत्साह बढ़ाया गया। सुंदर गीतों और आपसी चर्चाओं से ये सफर और आनंददायक बन गया।
यहाँ मैं काशी और उत्तर प्रदेश के अपने भाइयों और बहनों की सराहना करना चाहूँगा, जिन्होंने काशी-तमिल संगमम को विशेष बनाने में अपना अद्भुत योगदान दिया है। उन्होंने अपने अतिथियों के स्वागत और सत्कार में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। कई लोगों ने तमिलनाडु से आए अतिथियों के लिए अपने घरों के दरवाजे तक खोल दिए। स्थानीय प्रशासन भी चौबीसों घंटे जुटा रहा, ताकि मेहमानों को किसी प्रकार की दिक्कत ना हो। वाराणसी का सांसद होने के नाते मेरे लिए ये गर्व और संतोष दोनों का विषय है।
इस बार काशी-तमिल संगमम का समापन समारोह रामेश्वरम में आयोजित किया गया, जिसमें तमिलनाडु के सपूत उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन जी भी मौजूद रहे। उन्होंने इस कार्यक्रम को अपने विचारों से समृद्ध बनाया। भारतवर्ष की आध्यात्मिक समृद्धि पर बल देते हुए उन्होंने बताया कि कैसे इस तरह के मंच राष्ट्रीय एकता को और अधिक सुदृढ़ करते हैं।
काशी-तमिल संगमम का बहुत गहरा प्रभाव देखने को मिला है। इसके जरिए जहाँ सांस्कृतिक चेतना को मजबूती मिली है, वहीं शैक्षिक विमर्श और जनसंवाद को भी काफी बढ़ावा मिला है। इससे हमारी संस्कृतियों के बीच संबंध और प्रगाढ़ हुए हैं। इस मंच ने ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को आगे बढ़ाया है, इसलिए आने वाले समय में हम इस आयोजन को और वाइब्रेंट बनाने वाले हैं। ये वो भावना है, जो शताब्दियों से हमारे पर्व-त्योहार, साहित्य, संगीत, कला, खान-पान, वास्तुकला और ज्ञान-पद्धतियों का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।
वर्ष का यह समय हर देशवासी के लिए बहुत ही पावन माना जाता है। लोग बड़े उत्साह के साथ संक्रांति, उत्तरायण, पोंगल, माघ बिहू जैसे अनेक त्योहार मना रहे हैं। ये सभी उत्सव मुख्य रूप से सूर्यदेव, प्रकृति और कृषि को समर्पित हैं। ये त्योहार लोगों को आपस में जोड़ते हैं, जिससे समाज में सद्भाव और एकजुटता की भावना और प्रगाढ़ होती है। इस अवसर पर मैं आप सभी को अपनी शुभकामनाएँ देता हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि इन उत्सवों के साथ हमारी साझी विरासत और सामूहिक भागीदारी की भावना देशवासियों की एकता को और मजबूत करेगी।
भारत में जब भी कोई बड़ा संकट आता है चाहे पहाड़ धंस जाएँ, नदियाँ उफनाएँ, चक्रवात तांडव मचाएँ या जातीय हिंसा से पूरा क्षेत्र अशांत हो जाए, सबसे पहला फोन भारतीय सेना के पास जाता है। यह कोई संयोग नहीं है, न ही कोई पुरानी आदत। यह एक मजबूत, विश्वसनीय और तेज प्रतिक्रिया वाली संस्था की पहचान है। भारतीय सेना की गतिशीलता, इंजीनियरिंग कौशल, चिकित्सा सुविधाएँ, लॉजिस्टिक्स व्यवस्था और अनुशासित कमांड स्ट्रक्चर ने इसे देश का ‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ बना दिया है।
पिछले कई दशकों से यह पैटर्न दोहराया जा रहा है। प्राकृतिक आपदाओं से लेकर आंतरिक सुरक्षा के संकट तक, सेना हमेशा सबसे आगे खड़ी मिलती है। रक्षा मंत्रालय की रिपोर्टों से लेकर जमीनी हकीकत तक, हर जगह यही तस्वीर उभरती है कि जब सिविल प्रशासन की क्षमता कम पड़ जाती है, तो सेना ही वह मजबूत कंधा बनती है जिस पर पूरा राज्य टिकता है।
सेना की संकटमोचक भूमिका को समझना जरूरी
भारतीय सेना की ‘एड टू सिविल अथॉरिटी’ की भूमिका नई नहीं है। आजादी के बाद से ही सेना को आपात स्थितियों में सिविल प्रशासन की मदद के लिए बुलाया जाता रहा है। 2001 का गुजरात भूकंप इसका बड़ा उदाहरण है, जहाँ सेना ने हजारों लोगों को मलबे से निकाला और राहत सामग्री पहुँचाई। लेकिन पिछले दो दशकों में यह भूमिका और ज्यादा स्पष्ट और संस्थागत हो गई है।
साल 2004 के हिंद महासागर सुनामी के बाद भारत ने अपनी HADR (ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस एंड डिसास्टर रिलीफ) क्षमताओं को मजबूत किया। फिर 2013 की उत्तराखंड आपदा ने इसे नया आयाम दिया। उसके बाद से हर साल सेना की यह भूमिका बढ़ती गई। आज सेना न सिर्फ देश के अंदर बल्कि पड़ोसी देशों में भी फर्स्ट रिस्पॉन्डर के रूप में उभर रही है नेपाल भूकंप, श्रीलंका चक्रवात, तुर्की भूकंप, थाईलैंड भूकंप जैसी घटनाओं में भारत की मदद सबसे पहले पहुँची।
यह बदलाव इसलिए हुआ क्योंकि सेना की ट्रेनिंग और संरचना ही ऐसी है कि वह सबसे कठिन परिस्थितियों में भी काम कर सकती है। जहाँ सिविल एजेंसियाँ बुनियादी ढाँचे पर निर्भर रहती हैं, वहीं सेना अपने साथ सब कुछ लेकर आती है खाना, दवा, संचार, इंजीनियरिंग उपकरण और अनुशासन।
सेना की पहुँच को बताने वाले आँकड़े
रक्षा मंत्रालय की 2025 की सालाना समीक्षा के अनुसार, अकेले 2025 में भारतीय सेना ने 10 राज्यों के 80 से ज्यादा स्थानों पर 141 कॉलम तैनात किए। इनमें विशेष इंजीनियर टास्क फोर्स भी शामिल थीं। इन अभियानों में 28,000 से अधिक लोगों को बचाया गया, 7,000 से ज्यादा को चिकित्सा सहायता दी गई और हजारों प्रभावितों तक राहत सामग्री पहुँचाई गई।
साल 2024 में भी यही पैटर्न था। पूरे साल में 83 से ज्यादा डिसास्टर रिलीफ टीमें 14 राज्यों में तैनात की गईं, जिन्होंने 30,000 से अधिक नागरिकों को बचाया और लाखों को राहत दी। पिछले दस सालों में यह संख्या हर साल औसतन 100 कॉलम से ऊपर रही है। ये कॉलम बाढ़, भूस्खलन, हिमस्खलन, चक्रवात और आंतरिक अशांति के लिए तैनात किए जाते हैं।
ये आँकड़े सिर्फ संख्या नहीं हैं। ये एक ऐसी व्यवस्था की कहानी कहते हैं जो पहले से तैयार रहती है। सेना की टुकड़ियाँ उन इलाकों में पहले से तैनात रहती हैं जहाँ आपदाएँ सबसे ज्यादा आती हैं- हिमालय, पूर्वोत्तर, तटीय क्षेत्र। जब राज्य सरकार रिक्विजिशन भेजती है, तो घंटों में कॉलम निकल पड़ते हैं।
वायनाड भूस्खलन 2024: सबसे ताजा और मार्मिक उदाहरण
30 जुलाई 2024 को केरल के वायनाड में आए भयानक भूस्खलन ने सैकड़ों जिंदगियाँ छीन लीं। गाँव मलबे में दफन हो गए, सड़कें-पुल बह गए, पूरा क्षेत्र अलग-थलग पड़ गया। राज्य सरकार ने तुरंत मदद माँगी और सेना सबसे पहले पहुँची।
कुछ ही घंटों में दो फ्लड रिलीफ कॉलम कन्नूर से रवाना हो गए। फिर 6 बड़े HADR कॉलम तैनात किए गए, जिसमें लगभग 500 जवान, मेडिकल टीमें, स्निफर डॉग्स और भारी उपकरण शामिल थे। सेना ने करीब 1,000 लोगों को मलबे से जिंदा निकाला, प्राथमिक उपचार दिया और सुरक्षित जगहों पर पहुँचाया। दर्जनों शवों को सम्मान के साथ बरामद किया गया।
सबसे बड़ी चुनौती थी पहुँच। नदियाँ उफन रही थीं, पुल टूट चुके थे। मद्रास इंजीनियर ग्रुप ने 190 फीट लंबा क्लास-24 बेली ब्रिज बनाया, जो मुंडक्कई को बाहर की दुनिया से जोड़ता है। एक अस्थायी पैदल पुल तो रातोंरात तैयार हो गया। हेलिकॉप्टरों से भारी मशीनें नदियों के उस पार पहुँचाई गईं।
सेना ने कोझिकोड में कमांड-कंट्रोल सेंटर स्थापित किया। नौसेना, वायुसेना, कोस्ट गार्ड, एनडीआरएफ और राज्य पुलिस के साथ मिलकर 1,500 से ज्यादा रेस्क्यू वर्कर्स ने काम किया। लेकिन शुरुआती और सबसे महत्वपूर्ण घंटों में सेना ही थी जिसने स्थिति को संभाला।
सिक्किम फ्लैश फ्लड 2023, ऊँचाई पर चुनौतीपूर्ण अभियान
अक्टूबर 2023 में सिक्किम में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड ने तबाही मचाई। तीस्ता नदी उफनाई, पुल बह गए, 23 सैनिक लापता हो गए। सेना ने तुरंत रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। एनडीआरएफ के साथ मिलकर हजारों पर्यटकों और स्थानीय लोगों को बचाया गया।
सेना के जवान खुद प्रभावित थे, फिर भी उन्होंने रिलीफ कैंप लगाए, राहत सामग्री पहुँचाई और सड़कें बहाल कीं। यह दिखाता है कि सेना कितनी कठिन परिस्थितियों में भी काम करती है।
उत्तराखंड आपदा 2013 में ऑपरेशन सूर्य होप
जून 2013 की उत्तराखंड बाढ़ को कौन भूल सकता है? केदारनाथ सहित पूरा क्षेत्र तबाह हो गया। हजारों तीर्थयात्री फँस गए। सेना ने ऑपरेशन सूर्य होप शुरू किया। 2,223 सॉर्टीज उड़ान भरीं, 1,700 टन राहत सामग्री पहुँचाई गई। 10,000 कंबल, दवाइयाँ, खाना… सब कुछ सेना ने पहुँचाया।
लाखों लोगों को बचाया गया। यह ऑपरेशन दुनिया भर में सराहा गया और इसने सेना की HADR भूमिका को नई ऊँचाई दी।
असम की बाढ़ में हर साल संघर्ष
असम में हर साल बाढ़ आती है। ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियाँ लाखों लोगों को प्रभावित करती हैं। सेना हर साल दर्जनों कॉलम तैनात करती है। बोट्स, हेलिकॉप्टर, मेडिकल टीमें सब कुछ सेना तैनात करती है। साल 2025 में भी असम को बाढ़ राहत के लिए बड़ी राशि दी गई और सेना ने मुख्य भूमिका निभाई।
सेना की संस्थागत ताकत का कोई अन्य विकल्प नहीं
सेंटर फॉर लैंड वारफेयर स्टडीज के ADG मेजर जनरल RPS भदौरिया (VSM-रि) ने कहा कि सेना की सबसे बड़ी ताकत उसकी सेल्फ-कंटेन्ड यूनिट्स हैं। हर कॉलम में कम्युनिकेशन, लॉजिस्टिक्स, इंजीनियर्स और मेडिकल टीम होती है। कॉम्बैट इंजीनियर्स बेली ब्रिज, अस्थायी रोड सब बना सकते हैं। मेडिकल टीमें फील्ड हॉस्पिटल लगा सकती हैं।
लॉजिस्टिक्स इतनी मजबूत है कि हवाई, सड़क, नदी हर रास्ते से सामग्री पहुँचाई जा सकती है। कमांड स्ट्रक्चर साफ है- मिशन टाइप ऑर्डर्स दिए जाते हैं और जवान बिना देरी के अमल करते हैं।
संकटमोचक भूमिका की हमेशा तैयारी करती रहती है सेना
सेना की यह क्षमता रिहर्सल से आती है। 2024 में गुजरात में संयुक्त विमोचन अभ्यास हुआ। चक्रवात की कल्पना की गई, सभी एजेंसियों ने मिलकर प्लान परखे। स्वदेशी तकनीक भी दिखाई गई। ऐसे अभ्यास से इंटर-एजेंसी फ्रिक्शन कम होता है।
सिविलियन क्षमता को बढ़ाना जरूरी
यह निर्भरता एक चेतावनी भी है। सेना की मुख्य जिम्मेदारी देश की रक्षा है। सेना को हर प्रशासनिक कमी या संरचनात्मक कमजोरी के लिए यूनिवर्सल फायर ब्रिगेड नहीं बनने दिया जा सकता। हर संकट में उसे बुलाना उसकी युद्ध तैयारी को प्रभावित कर सकता है। इसलिए सिविलियन क्षमताएँ मजबूत करनी होंगी, जिसमें एनडीआरएफ को और बड़ा करना, राज्य फोर्स को बेहतर उपकरण, इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना शामिल है।
सेना का फर्स्ट रिस्पॉन्डर होना गर्व की बात
भारतीय सेना का फर्स्ट रिस्पॉन्डर बनना देश के लिए गर्व की बात है। यह नागरिकों को भरोसा देता है कि सबसे बुरे समय में भी कोई है जो आएगा। अब जरूरत है कि इस भरोसे को एक मजबूत सिविलियन इकोसिस्टम से पूरा किया जाए, ताकि सेना अपनी मुख्य जिम्मेदारी पर फोकस कर सके और जरूरत पड़ने पर फिर सबसे पहले पहुँचे।
सही तरीके से इस्तेमाल की जाए तो सेना की फर्स्ट रिस्पॉन्डर की भूमिका एक राष्ट्रीय संपत्ति है। यह नागरिकों को आश्वासन देती है कि जब आपदा आएगी, तो राज्य अपनी सबसे सक्षम संस्था को उनकी रक्षा के लिए सबसे पहले भेजेगा। अब चुनौती यह है कि इस आश्वासन के साथ एक व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र तैयार किया जाए जो उन वर्दीधारी जवानों के योग्य हो जो बार-बार सबसे पहला फोन उठाते हैं और सबसे पहले पहुँचते हैं।
भारत की सबसे प्रमुख आतंकवाद विरोधी एजेंसी, राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) को नया नेतृत्व मिल गया है। वरिष्ठ IPS अधिकारी राकेश अग्रवाल को एजेंसी का नया महानिदेशक (DG) नियुक्त किया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट की नियुक्ति समिति (ACC) ने उनके नाम पर मुहर लगा दी है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देश आतंकवाद और टेरर फंडिंग जैसे संवेदनशील मामलों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ रहा है।
कौन हैं राकेश अग्रवाल और कब तक सँभालेंगे कमान?
राकेश अग्रवाल 1994 बैच के हिमाचल प्रदेश कैडर के अनुभवी IPS अधिकारी हैं। उन्हें पुलिसिंग और सुरक्षा मामलों का करीब तीन दशकों का गहरा अनुभव है। अपनी नई भूमिका में वह 31 अगस्त 2028 तक या अपनी सेवानिवृत्ति (Retirement) तक इस पद पर बने रहेंगे।
खास बात यह है कि राकेश अग्रवाल इस जिम्मेदारी के लिए कोई नए नाम नहीं हैं। इससे पहले वह NIA में विशेष महानिदेशक (SDG) और कार्यवाहक महानिदेशक के रूप में भी अपनी सेवाएँ दे रहे थे। उनके बेहतरीन ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए सरकार ने उन्हें अब पूर्णकालिक जिम्मेदारी सौंपी है।
NIA में ‘नंबर-2’ से ‘नंबर-1’ बनने का सफर
यह पद 1990 बैच के अधिकारी सदानंद वसंत दाते के वापस अपने कैडर (महाराष्ट्र) जाने के बाद खाली हुआ था। इसके बाद राकेश अग्रवाल को अंतरिम कमान दी गई थी। सितंबर 2025 में ही उन्हें विशेष महानिदेशक बनाया गया था। एजेंसी की कार्यप्रणाली पर उनकी मजबूत पकड़ और कई हाई-प्रोफाइल मामलों में उनकी सफल निगरानी ने सरकार का भरोसा उन पर और मजबूत कर दिया।
राकेश अग्रवाल की नियुक्ति क्यों है बेहद अहम?
केंद्र सरकार आतंकवाद को जड़ से खत्म करने की अपनी ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को लेकर बेहद गंभीर है और राकेश अग्रवाल की नियुक्ति इसी रणनीति का एक बड़ा हिस्सा है। उन्हें यह जिम्मेदारी देने की सबसे बड़ी वजह उनका अनुभव है। राकेश अग्रवाल पहले से ही NIA में काम कर रहे हैं, इसलिए उन्हें एजेंसी के काम करने के तरीके और चल रही बड़ी जाँचों की पूरी जानकारी है। उनके आने से जाँच की रफ्तार धीमी नहीं पड़ेगी और काम में निरंतरता बनी रहेगी।
इसके अलावा, राकेश अग्रवाल को तकनीक की गहरी समझ रखने वाला और बेहद अनुशासित अधिकारी माना जाता है। वे पेचीदा और मुश्किल मामलों को सुलझाने में माहिर हैं, जिससे देश की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूती मिलेगी। उनकी सीनियरिटी और इस पद के महत्व को देखते हुए उन्हें शीर्ष स्तर (लेवल-16) पर नियुक्त किया गया है। यह साफ दर्शाता है कि सरकार ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई की कमान एक ऐसे भरोसेमंद हाथों में सौंपी है, जो चुनौतियों से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
इन बड़ी चुनौतियों से निपटना होगी प्राथमिकता
नए महानिदेशक के तौर पर राकेश अग्रवाल के सामने कई बड़ी चुनौतियाँ होंगी, जिनसे निपटने के लिए सरकार को उनसे काफी उम्मीदें हैं। उनकी सबसे पहली और बड़ी प्राथमिकता विदेशों से चल रहे खालिस्तानी आतंकी नेटवर्क और भारत विरोधी गतिविधियों को पूरी तरह खत्म करना होगा। साथ ही, उन्हें टेरर फंडिंग यानी आतंकी संगठनों को मिलने वाले पैसे के रास्तों को भी बंद करना होगा, ताकि उनकी आर्थिक कमर तोड़ी जा सके।
इसके अलावा, सीमा पार से होने वाली हथियारों और ड्रग्स की तस्करी जैसे संगठित अपराधों पर लगाम लगाना उनकी टीम के लिए एक बड़ा टास्क होगा। देश की आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए वे स्लीपर सेल्स और छिपे हुए देश विरोधी तत्वों की पहचान कर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करेंगे। कुल मिलाकर, इन चुनौतियों से निपटकर देश में शांति और सुरक्षा बनाए रखना उनकी मुख्य जिम्मेदारी होगी।
सुरक्षा बलों में अन्य बड़े बदलाव
सरकार ने सिर्फ NIA ही नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा से जुड़े दो अन्य बड़े बलों में भी नए प्रमुखों की तैनाती की है। अब प्रवीण कुमार सीमा सुरक्षा बल (BSF) की कमान सँभालेंगे, जबकि शत्रुजीत सिंह कपूर को भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) का नया मुखिया बनाया गया है। इन नियुक्तियों के जरिए सरकार ने देश की सीमाओं को और सुरक्षित करने की कोशिश की है।
जहाँ तक राकेश अग्रवाल की बात है, तो उनकी नियुक्ति से यह साफ हो गया है कि सरकार आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में कोई भी ढील नहीं देना चाहती। वे सिस्टम और एजेंसी के कामकाज को पहले से ही बहुत करीब से जानते हैं, इसलिए उम्मीद है कि उनके आने से NIA और भी ज्यादा फुर्ती से काम करेगी। यह कदम आतंकवादियों और देश विरोधी ताकतों के खिलाफ कड़ी और प्रभावी कार्रवाई करने के लिए उठाया गया है।
‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ की इस्लामिक जिहादी गतिविधियों को खत्म करने की दिशा में US सरकार ने अहम कदम उठाया है। 13 जनवरी 2026 को मुस्लिम ब्रदरहुड के लेबनानी, मिस्र और जॉर्डन की आतंकी ग्रुप के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उन्हें ‘विदेशी आतंकवादी संगठन’ घोषित कर दिया। इन संगठनों को लेकर अमेरिका ने कहा कि ये उसके हितों को नुकसान पहुँचा सकते हैं और ये देश के लिए खतरा हैं।
नवंबर 2025 में US प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप के एक खास दस्तावेज पर साइन किया था, जिसमें उनके एडमिनिस्ट्रेशन को मुस्लिम ब्रदरहुड के खास ग्रुप को FTOs और SDGTs के तौर पर नामित करने की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए था।
सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मार्को रुबियो ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि मुस्लिम ब्रदरहुड के मिस्री, जॉर्डनी और लेबनानी चैप्टर्स को FTOs और SDGTs के तौर पर नामित करना राष्ट्रपति ट्रंप के उस वादे का एक हिस्सा है, जिसके तहत वे मुस्लिम ब्रदरहुड के उन ग्रुप को खत्म करेंगे, जो यूनाइटेड स्टेट्स के लिए खतरा पैदा करते हैं।
रुबियो ने कहा, “हम लेबनानी मुस्लिम ब्रदरहुड को एक विदेशी आतंक संगठन और एक स्पेशली डेजिग्नेटेड ग्लोबल टेररिस्ट (SDGT) मानते हैं और ग्रुप का लीडर मुहम्मद फॉजी तक्कोश को एक जिहादी बताते हैं। साथ ही इस्लामिक संगठन हमास को मदद पहुँचाने के लिए मिश्र और जॉर्डन की मुस्लिम ब्रदरहुड की शाखा को SDGTs डेजिग्नेट कर रहे हैं।”
Today, we are designating the Lebanese, Egyptian, and Jordanian chapters of the Muslim Brotherhood as terrorist groups. Under President Trump's leadership, the United States will eliminate the capabilities and operations of Muslim Brotherhood chapters that threaten U.S. citizens…
रुबियो ने कहा कि अमेरिका इन मुस्लिम ब्रदरहुड की शाखाओं को मिल रहे आर्थिक सहायता को बंद करने की कोशिश करेगा। राष्ट्रपति ट्रंप का मानना था कि लेबनानी गुट के एक हिस्से ने 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद इजरायल पर रॉकेट दागे थे, जिसके कारण गाजा युद्ध शुरू हुआ। जॉर्डन के गुट ने हमास का समर्थन किया था।
1928 में मिस्र में हसन अल-बन्ना ने मुस्लिम ब्रदरहुड की स्थापना की थी। वह एक टीचर और इस्लामिक स्कॉलर था। इखवान अल-मुस्लिमिन की शुरुआत एक सुन्नी इस्लामी मूवमेंट के तौर पर की गई थी. जो बाद में हिंसक जिहादी संगठन बन गया। पिछले कुछ सालों में मुस्लिम ब्रदरहुड एक ट्रांसनेशनल इस्लामिक टेरर नेटवर्क बन गया है। इसका मकसद किसी भी तरीके से अलग-अलग देशों में शरिया कानून लागू करना है।
मुस्लिम ब्रदरहुड ने दुनिया भर में कई ग्रुप बनाए हैं, जो अहिंसक और सोशियो-पॉलिटिकल होने का दिखावा करते हैं और अंदरखाने इस्लामिक आतंकवाद का समर्थन करते हैं।
मुस्लिम ब्रदरहुड को आधिकारिक तौर पर टेरर ग्रुप बताना US सरकार के लिए हमेशा मुश्किल रहा है। इस संगठन की अलग-अलग शाखा कई देशों में काम करती हैं। इस वजह से अमेरिका में लीगल एक्सपर्ट्स और इंटेलिजेंस अधिकारियों को अक्सर पूरे मूवमेंट पर एक जैसा टेररिस्ट लेबल लगाना मुश्किल लगता है।
यही वजह है कि इस्लामिक आतंकवाद से लिंक साबित होने के बाद मुस्लिम ब्रदरहुड के खास चैप्टर को टारगेट किया जाता है और उन्हें टेरर ग्रुप बताया जाता है।
लेबनानी मुस्लिम ब्रदरहुड
हाल ही में, US सरकार ने लेबनानी मुस्लिम ब्रदरहुड, जिसे अल-जमा अल-इस्लामिया, इजिप्टियन मुस्लिम ब्रदरहुड और जॉर्डनियन मुस्लिम ब्रदरहुड के नाम से भी जाना जाता है, को FTOs और SDGTs घोषित किया है।
अल-जमा अल-इस्लामिया के नाम से मशहूर लेबनानी मुस्लिम ब्रदरहुड को एक खास मकसद से 1960 के दशक में इजिप्टियन मुस्लिम ब्रदरहुड की एक ब्रांच के तौर पर बनाया गया था। यह ज़्यादातर लेबनान की सुन्नी मुस्लिम आबादी के बीच काम करता है। यह संगठन लेबनान की राजनीति में शामिल रहा है और यहाँ तक कि पार्लियामेंट्री सीटें भी हासिल की हैं। यह इस्लामी संगठन एजुकेशनल और हेल्थकेयर सर्विस भी चलाता था; हालाँकि, चैरिटी के दिखावे के अलावा, LMB हिंसक गतिविधियों में भी शामिल रहा है।
लेबनानी मुस्लिम ब्रदरहुड यानी lbm की एक मिलिट्री विंग है जिसे अल-फज्र फोर्सेज (डॉन फोर्सेज) के नाम से जाना जाता है। इसका दूसरा नाम कुव्वत-अल-फज्र भी है। LMB के फाति याकन और अब्दुल्ला तेराकी समेत कई नेता हिज्बुल्लाह के करीब थे। हालाँकि 2006 में इस्लामिक एक्शन फ्रंट बना लिया, जो एक सुन्नी जिहादी संगठन था और शिया संगठन के साथ जुड़ा हुआ था। ये ज्यादा दिन तक एक्टिव नहीं रहा।
हालाँकि 2023 में इजरायल-लेबनान बॉर्डर पर हुई झड़पों के दौरान, अल-फज्र ने खुद को फिर से एक्टिव कर लिया और उत्तरी इजरायल में रॉकेट दागे। अल-फज्र ने हिज़्बुल्लाह और हमास के साथ भी कोऑर्डिनेट किया।
मार्च 2024 में अल-फज्र ने इजरायल के खिलाफ आतंकी हमला करने की योजना बनाई थी, हालाँकि लेबनानी मुस्लिम ब्रदरहुड आतंकवादी हमला कर पाते, उससे पहले ही इजरायली डिफेंस फोर्स ने कार्रवाई शुरू कर दी।
LMB के सेक्रेटरी जनरल मुहम्मद फावजी तक्कोश ने हिज्बुलल्लाह-हमास गठजोड़ के साथ एक फॉर्मल अलायंस बनाकर काम करने लगा। रिपोर्ट्स कहती हैं कि अल-फ़ज्र के 1000 से ज्यादा जिहादी एक्टिव थे।
LMB के अंदर दो ग्रुप है। इसमें एक कतर और तुर्की का वफादार है, जबकि दूसरा ईरान-समर्थित हिज़्बुल्लाह के साथ है।
अक्टूबर 2023 में इजरायल-हमास युद्ध शुरू होने के बाद से, इजरायल ने हमास के समर्थक 15 से ज्यादा अल-फ़ज्र जिहादियों को मार डाला। असल में, अल-फ़ज्र हमास की लेबनानी मिलिट्री कमांड के तौर पर काम करता है।
मुस्लिम ब्रदरहुड खुद को हिंसा से दूर बताता है, फिर भी जिहादी एक्टिविटीज़ में शामिल है। US ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने कहा, “हालाँकि हमास का समर्थन करने वाले मुस्लिम ब्रदरहुड हिंसा छोड़ने का दावा करते हैं, लेकिन ये आतंकवाद को बढ़ावा देना, भड़काना और उसकी तारीफ करना जारी रखे हुए हैं। ये यूनाइटेड स्टेट्स और उसके सहयोगियों के हितों के लिए खतरनाक है।”
जॉर्डन मुस्लिम ब्रदरहुड
जॉर्डन मुस्लिम ब्रदरहुड (JMB) की स्थापना 1945 में अब्देल लतीफ अबू कुरा ने की थी। शुरुआत में, युवा राजा हुसैन I के नेतृत्व वाली जॉर्डन की राजशाही ने कट्टरपंथ के बजाय धर्मार्थ कामों के जरिए असहमति को दबाने, सेक्युलर अरब राष्ट्रवादियों से मुकाबले करने के लिए JMB को मंजूरी दी। इसके बाद धीरे-धीरे जॉर्डन मुस्लिम ब्रदरहुड मजबूत होता गया और राजशाही का एक पिलर बन गया।
1989 में जॉर्डन में राजनीतिक उदारीकरण के बाद, JMB ने इस्लामिक एक्शन फ्रंट नाम से अपनी राजनीतिक पार्टी बनाई। 1992 में, इस्लामिक एक्शन फ्रंट ऑपचारिक तौर पर पार्टी बन गई। IAF और JMB ने अलग-अलग लीडरशिप स्ट्रक्चर बनाए रखे।
जॉर्डन मुस्लिम ब्रदरहुड जॉर्डन में अपनी एक्टिविटी कम रखता है, लेकिन ‘फिलिस्तीनी मकसद’ के लिए यह एक्टिव रहता है। जॉर्डन सरकार पर अपने अरब साथियों की तरफ से JMB पर बैन लगाने का दबाव था। हालाँकि, उनकी एक्टिविटीज़ को शक की नज़र से देखने और उनकी एक्टिविटीज़ को कंट्रोल करने की इच्छा के बावजूद वह ऐसा करने से हिचकिचा रही थी।
हालाँकि, समय के साथ, जॉर्डन सरकार ने अपना रुख बदल लिया और 2015 में, सरकार ने ऐलान किया कि वह अब मुस्लिम ब्रदरहुड को एक लीगल ऑर्गनाइज़ेशन के तौर पर मान्यता नहीं देती है। उसने JMB का लाइसेंस रिन्यू करने से भी मना कर दिया। इसके बजाय उसने मुस्लिम ब्रदरहुड एसोसिएशन नाम के एक नए संगठन को मंजूरी दी, जिसे सरकार ज्यादा सुधारवादी, नरमपंथी और पूरी तरह से जॉर्डन पर फोकस करने वाला मानती थी।
2020 में, जॉर्डन की टॉप कोर्ट ने मुस्लिम ब्रदरहुड को खत्म करने का ऑर्डर दिया। हालाँकि, सरकार के जानबूझकर कुछ न करने की वजह से यह फैसला लागू नहीं हो सका। यह भी न भूलें कि JMB की पॉलिटिकल विंग, इस्लामिक एक्शन फ्रंट, देश में काफी मजबूत है। संगठन ने सितंबर 2024 के चुनावों में 138 में से 31 सीटें जीती थीं।
जॉर्डन ने ऑफिशियली ओरिजिनल मुस्लिम ब्रदरहुड (JMB) पर मई 2025 में बैन लगा दिया और उसकी संपत्ति जब्त कर ली। यह फैसला JMB मेंबर्स समेत 16 लोगों को एक तोड़फोड़ की साज़िश रचने को लेकर गिरफ्तारी के बाद किया गया। JMB को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया था, लेकिन इस्लामिक एक्शन फ्रंट पर बैन नहीं लगाया गया था।
जॉर्डन मुस्लिम ब्रदरहुड पर अमेरिकी एक्शन की वजह यह है कि यह संगठन नए जिहादियों की भर्ती के अलावा रॉकेट, एक्सप्लोसिव और ड्रोन बनाने के लिए विदेशी आतंकी संस्थाओं के साथ मिलकर काम कर रही थी। US ट्रेजरी डिपार्टमेंट के ऑफिस ऑफ़ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल (OFAC) का कहना है कि जॉर्डन और विदेशों में मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े लोगों ने ‘गैर-कानूनी तरीकों से पैसे जुटाकर इस काम में मदद की है।’
US ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने कहा, “इजिप्टियन मुस्लिम ब्रदरहुड और जॉर्डनियन मुस्लिम ब्रदरहुड को हमास को सामान या सर्विस देने, फाइनेंशियल, मटीरियल या टेक्नोलॉजिकल सपोर्ट देने या उसकी मदद करने के लिए डेजिग्नेट किया जा रहा है।”
इजिप्टियन मुस्लिम ब्रदरहुड
एक और जिहादी आतंकवादी संगठन जिसे फॉरेन टेररिस्ट ऑर्गनाइजेशन (FTO) और स्पेशली डेजिग्नेटेड ग्लोबल टेररिस्ट (SDGT) के तौर पर डेजिग्नेट किया गया है, वह है इजिप्टियन मुस्लिम ब्रदरहुड (EMB)। इसे दुनिया भर में सभी मुस्लिम ब्रदरहुड चैप्टर्स की पेरेंट बॉडी कहा जा सकता है।
मुस्लिम ब्रदरहुड या इखवान अल-मुस्लिमिन की स्थापना 1928 में मिस्र में हसन अल-बन्ना ने की थी, जो एक टीचर और इस्लामिक स्कॉलर थे। इस इस्लामी संगठन की नींव एंटी-वेस्टर्न कॉलोनियलिज्म और पोस्ट-ओटोमन दुनिया में इस्लामिक वैल्यूज के कथित नुकसान के आधार पर थी। अल-बन्ना ने मुस्लिम ब्रदरहुड को एक पैन-इस्लामिस्ट मूवमेंट के तौर पर शुरू किया, जो चैरिटी और इस्लामिस्ट एडवोकेसी पर फोकस करता था।
अपने शुरुआती सालों में, मुस्लिम ब्रदरहुड या इजिप्शियन मुस्लिम ब्रदरहुड ने मिस्र में गरीब और अनपढ़ लोगों के लिए स्कूल, हॉस्पिटल और मस्जिदें बनाकर मदद की, साथ ही सेक्युलरिज्म और इंपीरियलिज्म के खिलाफ इस्लाम और ‘तौहीद’ (अल्लाह की एकता और सबसे बड़ी ताकत) का प्रचार भी किया। मुस्लिम ब्रदरहुड का मोटो यह साफ करता है कि, भले ही शुरू में इसका संबंध हिंसा से न रहा हो, ‘जिहाद’ हमेशा से इसका तरीका रहा है।
ब्रदरहुड का स्लोगन है, “अल्लाह हमारा मकसद है; पैगंबर हमारे लीडर हैं; कुरान हमारा कानून है; जिहाद हमारा रास्ता है; अल्लाह की राह में मरना हमारी सबसे बड़ी उम्मीद है।”
1930 के दशक तक, इजिप्शियन मुस्लिम ब्रदरहुड के हजारों मेंबर बन गए थे और वह पॉलिटिक्स में भी आ गया था। लेकिन, इस इस्लामी संगठन का एक पैरामिलिट्री विंग था जिसे सीक्रेट अपैरेटस या अल-निजाम अल-खास कहा जाता था। इस विंग ने राजनीतिक हत्याएँ और जिहादी हिंसा की। 1948 में, सीक्रेट अपैरेटस के सदस्यों ने इस्लामी संगठन पर बैन लगाने पर प्राइम मिनिस्टर महमूद अल नोकराशी पाशा की हत्या कर दी। 1949 में, पाशा की हत्या का बदला लेने के लिए मिस्र की सीक्रेट पुलिस ने अल-बन्ना की हत्या कर दी।
मिस्र के मुस्लिम ब्रदरहुड के सीक्रेट अपैरेटस के सदस्य भारी फिजिकल और मिलिट्री ट्रेनिंग लेते थे। उन्हें हथियार चलाने और अंडरग्राउंड ऑपरेशन करने की ट्रेनिंग दी गई थी। धोखे और सीक्रेसी (तक़्क़िया) पर ज़ोर देते हुए, अपैरेटस से जुड़े जिहादी पॉलिटिकल पार्टियों, सेनाओं, इंटेलिजेंस, मीडिया, एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन और यहां तक कि NGOs में भी घुसपैठ करते हैं और उन्हें तोड़-फोड़ते हैं।
हालांकि UK जैसे गैर-मुस्लिम देशों में, हिंसा मुस्लिम ब्रदरहुड का पसंदीदा तरीका नहीं हो सकता है। वे इस्लामिक जिहादी एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए मीडिया, राजनीति, एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन और चैरिटी का इस्तेमाल करते हैं।
2012 में, EMB ने चुनाव जीता और मोहम्मद मुर्सी को प्रेसिडेंट चुना। हालांकि, 2013 में, उस समय के जनरल अब्देल फत्ताह अल-सिसी के नेतृत्व में एक मिलिट्री तख्तापलट ने मुर्सी को हटा दिया। इस इस्लामी संगठन पर बैन लगा दिया गया और मिस्र में इसे आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया गया।
मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अफ्रीका के कई देश की सरकारें मुस्लिम ब्रदरहुड को पॉलिटिकल स्टेबिलिटी के लिए खतरा मानती हैं। हाल ही में, टेक्सास के गवर्नर ग्रेग एबॉट ने घोषणा की कि काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस समेत मुस्लिम ब्रदरहुड को ‘विदेशी आतंकवादी और ट्रांसनेशनल क्रिमिनल संगठन’ माना जाएगा।
खास तौर पर, UAE, सऊदी अरब, मिस्र, बहरीन और रूस पहले ही ब्रदरहुड को आतंकवादी संगठन घोषित कर चुके हैं। जॉर्डन ने अप्रैल 2025 में इस ग्रुप पर बैन लगा दिया था, जब उन्होंने इस मूवमेंट से जुड़े लोगों को गिरफ्तार किया था, जिन पर रॉकेट और ड्रोन का इस्तेमाल करके हमलों की साज़िश रचने का आरोप था। जनवरी 2026 में, UAE ने यूनाइटेड किंगडम (UK) में पढ़ाई करने में दिलचस्पी रखने वाले अपने नागरिकों के लिए फंडिंग बंद कर दी, क्योंकि UK ने इस इस्लामिक आतंकवादी संगठन पर बैन लगाने से इनकार कर दिया था।
मिस्र के मुस्लिम ब्रदरहुड ने 1940 के दशक में मौलाना अबुल अला मौदूदी की जमात-ए-इस्लामी को भी प्रेरित किया था। स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया (SIMI) और पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (PFI) जैसे बैन इस्लामिक आतंकी संगठन, जो हिंदुओं के खिलाफ जिहादी हमलों में शामिल रहे हैं और भारत को इस्लामिक देश बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं, मुस्लिम ब्रदरहुड की टैक्टिक्स से प्रेरणा लेते हैं।
इजिप्शियन मुस्लिम ब्रदरहुड पर कार्रवाई करने से पहले, US ने EMB के कई हिंसक ग्रुप को FTOs और SDGTs के तौर पर डिफाइन किया था, जिसमें हमास भी शामिल है।
US ने पहले भी मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ उनके लिंक्स के लिए कई इस्लामिक संगठनों को रडार पर लिया है। इनमें इजिप्शियन इस्लामिक जिहाद (EIJ), गामा अल-इस्लामिया (IG), फ़िलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद (PIJ), हमास, हरकत सवाद मिस्र (HASM), और लिवा अल-थौरा शामिल हैं। मुस्लिम ब्रदरहुड के ये सभी हिंसक जिहादी ग्रुप 1970 और 1980 के दशक में बने थे।
इजिप्शियन इस्लामिक जिहाद ने इजिप्शियन सरकार के बड़े अधिकारियों पर हिंसक हमले किए और 1981 में इजिप्शियन प्रेसिडेंट अनवर सादात की हत्या के लिए जिम्मेदार था। जून 2001 में अल-कायदा में पूरी तरह से मिलने से पहले अयमान अल-ज़वाहिरी इस संगठन को लीड करता था। US ने 1997 में EIJ को FTO और 2001 में SDGT नाम दिया था।
गामा अल-इस्लामिया (IG) के प्रमुख उमर अब्द अल रहमान को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर बम धमाके में उनकी भूमिका के लिए अमेरिका में उम्रकैद की सजा हुई। ये संगठन मिस्र को एक इस्लामिक देश बनाना चाहता था।
फिलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद (PIJ) इजरायल को खत्म करने के लिए काम करता है और इजरायल पर कई हमलों में शामिल रहा है, जिसमें 7 अक्टूबर 2023 को हमास के नेतृत्व में इजरायली लोगों का नरसंहार भी शामिल है। इस मुस्लिम ब्रदरहुड प्रॉक्सी को US ने 1997 में FTO और 2001 में SDGT नाम दिया था।
फिलिस्तीनी इस्लामिक टेरर ग्रुप हमास के भी मुस्लिम ब्रदरहुड से संबंध हैं, और इसे 1997 में FTO और 2001 में SDGT नाम दिया गया था। 1988 में अपनी स्थापना के बाद से इजरायल पर अनगिनत हमले किए। हमास ने इजरायल में 7 अक्टूबर का नरसंहार किया, जिसमें 1200 से ज़्यादा लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी गई और 240 से ज़्यादा लोगों को किडनैप कर लिया गया।
OpIndia ने पहले फ़िलिस्तीनी इस्लामिक टेरर ग्रुप हमास के बारे में रिपोर्ट किया था, जिसने अपने 1988 के कवनेंट या चार्टर में इजरायल को ‘वक्फ’ प्रॉपर्टी बताया था और यहूदियों के खिलाफ तब तक जिहाद जारी रखने की कसम खाई थी, जब तक आखिरी यहूदी भी मारा नहीं जाता। हमास को मुस्लिम ब्रदरहुड का सपोर्ट है और 7 अक्टूबर, 2023 के नरसंहार के बाद वह भी इजरायली नागरिकों और सेना के खिलाफ एयरस्ट्राइक करने में फिलिस्तीनी आतंकी ग्रुप के साथ शामिल हो गया।
हमास ने 2017 में मिस्र के साथ अपने रिश्ते सुधारने के लिए मुस्लिम ब्रदरहुड से दूरी बनाने की कोशिश की। हमास ने ज़ायोनिस्ट और यहूदियों में फ़र्क करते हुए यहूदियों से लड़ने के अपने रुख में नरमी बरती। लेकिन 7 अक्टूबर 2023 को यहूदियों की अंधाधुंध हत्या ने हमास के दोगलेपन और यहूदियों के लिए नफ़रत को सामने ला दिया।
2015 में बना, हरकत सवाद मिस्र (HASM) मुस्लिम ब्रदरहुड का एक और मिस्र का हिस्सा है, जो मिस्र की सरकार को उखाड़ फेंकना चाहता है। 2016 में, HASM ने मिस्र के मुफ़्ती अली गोमा की हत्या की कोशिश की। इसके अगले साल HASM ने मिस्र की नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी के ऑफिसर इब्राहिम अजाजी की हत्या की कोशिश की। 2019 में, HASM जिहादियों ने काहिरा के एक हॉस्पिटल के पास एक कार-बम धमाका किया, जिसमें 20 लोग मारे गए। US ने 2018 में HASM को SDGT और 2021 में FTO घोषित किया।
2018 में SDGT घोषित लिवा अल-थौरा EMB की एक और बड़ी शाखा है। इस संगठन ने अक्टूबर 2016 में मिस्र की सेना के नौवें आर्मर्ड डिवीज़न के कमांडर ब्रिगेडियर जनरल अदेल रागाई की काहिरा में उनके घर के बाहर हत्या कर दी थी। 2017 में, लिवा अल-थौरा ने मिस्र के शहर तांता में एक पुलिस ट्रेनिंग सेंटर पर बमबारी की थी।
मुस्लिम ब्रदरहुड के मिस्र, जॉर्डन और लेबनानी चैप्टर को FTO और SDGT घोषित किए जाने के नतीजे
US द्वारा मुस्लिम ब्रदरहुड के जॉर्डन, मिस्र और लेबनानी चैप्टर को FTO और SDGT घोषित किए जाने की वजह से अब US में या US के कब्ज़े वाली जगहों पर इन संगठनों की सभी प्रॉपर्टी और प्रॉपर्टी में हिस्सेदारी ब्लॉक कर दी जाएगी। इसके लोग हिरासत में लिए जाएँगे।
इसके अलावा, ऐसी कोई भी संपत्ति,जिसका मालिकाना हक, सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से, अकेले या कुल मिलाकर, एक या ज़्यादा ब्लॉक किए गए लोगों के पास 50 परसेंट या उससे ज़्यादा है, उसे भी ब्लॉक कर दिया जाएगा।
(13 जनवरी 2026 को US ट्रेजरी डिपार्टमेंट की वेबसाइट पर पब्लिश हुई प्रेस रिलीज़ से लिए गए ज़रूरी हिस्से।)
ब्लॉक किए गए इस्लामिक संगठनों से किसी तरह का आर्थिक फायदा पहुँचाने वाले लोगों या संगठनों पर भी कार्रवाई की जाएगी।
US ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने कहा, “किसी डेज़िग्नेटेड या ब्लॉक किए गए व्यक्ति द्वारा, उसे, या उसके फ़ायदे के लिए कोई भी कंट्रीब्यूशन या फ़ंड, सामान, या सर्विस देना, या ऐसे किसी भी व्यक्ति से कोई कंट्रीब्यूशन या फ़ंड, सामान, या सर्विस लेना अपराध है।” उन्होंने कहा कि डेज़िग्नेटेड लोगों और ग्रुप के साथ जुड़ने पर हिस्सा लेने वाले विदेशी फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन्स को भी सेकेंडरी सजा मिल सकती है।
(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडेय ने लिखी है। अंग्रेजी का लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
पुन्गनूर गाय, दुनिया की सबसे छोटी गायों में से एक। इसका दूध अमृत समान होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस गाय के साथ कई बार न सिर्फ दिख चुके हैं, बल्कि प्रधानमंत्री आवास में भी इन विशेष गायों को पाला गया है। मकर संक्रांति के अवसर पर PM मोदी ने इन गायों को चारा खिलाकर गौसेवा की है, जिसके कारण फिर से ये गायें चर्चा में हैं।
पुन्गनूर गाय का अस्तित्व वैदिक काल से है। महर्षि विश्वामित्र के साथ भी पुन्गनूर गाय की पौराणिक गाथा जुड़ी है। अभी दुनिया में इस तरह की सिर्फ कुछ सौ गायें ही हैं, लेकिन ये दुनिया की सबसे महँगी गायों में से एक है। लगभग 2.5 फिट ऊँचाई वाली इन गायों की कीमत लाखों में होती है।
पुन्गनूर गाय के दूध में सबसे ज्यादा वसा
आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में पाई जाने वाली पुन्गनूर गाय बेहद अनूठी है। इसे ‘मदर ऑफ ऑल काउज़’ के रूप में भी जाना जाता है। पुन्गनूर गाय एक छोटी आकार की गाय है, लेकिन यह बहुत ही मजबूत और रोग प्रतिरोधी होती है। इन गायों का दूध बहुत ही पौष्टिक होता है और इसमें प्रोटीन, कैल्शियम और अन्य आवश्यक पोषक तत्वों की उच्च मात्रा होती है। खास बात ये है कि आम गाय के दूध में 3-4 प्रतिशत ही वसा पाया जाता है, लेकिन पुन्गनूर गाय की नस्ल के दूध में 8 प्रतिशत तक वसा पाया जाता है।
पुन्गनूर गाय का इतिहास प्राचीन काल से है। इन गायों का उल्लेख कई प्राचीन भारतीय ग्रंथों में मिलता है। इस गाय का उपयोग हिंदू धर्म में धार्मिक अनुष्ठानों के लिए भी किया जाता है। हाल के वर्षों में, पुन्गनूर गाय की लोकप्रियता बढ़ रही है। चित्तूर जिले के पुन्गनूर जगह पर पाई जाने वाली इस गाय की पहचान के साथ पुन्गनूर का नाम जोड़ दिया गया है। पुन्गनूर गाय को भारत के अन्य राज्यों में भी प्रचारित किया जा रहा है। प्रधानमंत्री आवास से अक्सर आने वाली तस्वीरों में भी पुन्गनूर गाय दिखती है।
शहरी घरों में पालने के लिए बदलाव
यूँ तो आम पुन्गनूर गाय की लंबाई 3 से 5 फिट की होती है। पुन्गनूर गाय का अधिकतम वजन 150 से 200 किलोग्राम तक हो सकता है। पुन्गनूर की पूँछ लंबी होती है और जमीन तक जाती है। वहीं पुन्गनूर के कान बाहर और पीछे की तरफ खड़े रहते हैं। इनकी कमर के हिस्से में एक छोटा सा कर्व भी देखने को मिलता है।
आंध्र प्रदेश के काकीनाडा में एक वैद्य कृष्णम राजू ने इसकी नस्ल में सुधार का जिम्मा 15 साल पहले उठाया था। उन्होंने अपनी मेहनत और कोशिशों से इस गाय की लंबाई को 2-3 फिट तक सीमित करने में सफलता पाई है। एक मीडिया रिपोर्ट में उन्होंने दावा किया है कि पुन्गनूर गाय को पहले ब्रह्मा गाय कहते थे, लेकिन जलवायु परिवर्तन की वजह से धीरे-धीरे इसकी ऊँचाई बढ़ती गई।
वैद्य कृष्णम राजू ने कहा कि उन्होंने कहीं से पुन्गनूर गाय की ब्रीडिंग के लिए साँड़ का वीर्य प्राप्त किया। इसके बाद कई सालों तक कृत्रिम गर्भाधान के माध्यम से 2 फीट तक की गाय तैयार करने में सफलता मिली। उन्होंने कहा कि ये गाय रोजाना 3 लीटर तक दूध दे सकती है। शहरी घरों में अधिक से अधिक लोग पुन्गनूर गाय पाल सकें, इसलिए इसकी छोटी नस्ल विकसित की गई है। डॉक्टर कृष्णम राजू पुन्गनूर के जरिए देश के उन लोग को गाय पालना सिखा रहे हैं जो जगह या चारे की कमी की वजह से गाय नहीं पालना चाहते।
कीमत चौंकाने वाली
पुन्गनूर गाय की कीमत काफी ज्यादा है। इसकी कीमत 1 लाख रुपए से लेकर 10 लाख रुपए तक भी है। अगर जोड़ा लेना है, तो कीमत थोड़ी ज्यादा हो सकती है। हालाँकि डॉ कृष्णम राजू का दावा है कि उन्होंने पैसे लेकर एक भी गाय नहीं बेची है, बल्कि उनके यहाँ से गाय लेकर गए लोगों ने अपने स्तर पर ब्रीडिंग करा कर बेचा होगा। उन्होंने अभी तक सभी को मुफ्त में ही इन गायों को दिया है। उनका अंदाजा है कि अभी पूरे देश में इस तरह की गायों की संख्या महज 300-500 तक ही है।
वैसे, 500 तक की संख्या मिनिएचर पुन्गनूर की है। जिसकी लंबाई छोटी होती है। मूल पुन्गनूर जिसकी लंबाई 3 से 5 फिट तक है, साल 2019 के आँकड़ों के मुताबिक, उनकी संख्या 13 हजार से कुछ अधिक है।
राजू का दावा है कि उनसे कई विदेशी लोगों ने इस गाय को खरीदने की कोशिश की थी, लेकिन उन्होंने अब तक किसी विदेशी को ये गाय दी नहीं है।
आँध्र प्रदेश सरकार भी संरक्षण में जुटी
पुन्गनूर गाय को बचाने और उनकी संख्या बढ़ाने के लिए आँध्र प्रदेश सरकार भी जाग गई है। प्रदेश सरकार ने मिशन पुन्गनूर चलाया है, जिसके तहत 5 साल के लिए करीब 70 करोड़ रुपए का बजट दिया गया है। इस योजना पर कडप्पा जिले में स्थित श्री वेंकटेश्नर पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय काम कर रहा है। ऐसे में उम्मीद है कि आने वाले कुछ समय में जैसे पुन्गनूर गाय की लोकप्रियता बढ़ती है, वैसे ही इसकी संख्या भी बढ़ेगी और ये कुछ सालों में सर्वसुलभ भी हो सकेगी।
31 मार्च 2026… यह सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि भारत के आंतरिक सुरक्षा इतिहास में एक निर्णायक लक्ष्य है- ‘नक्सल मुक्त भारत’। केंद्र सरकार, सुरक्षा एजेंसियाँ और राज्य सरकारें पिछले एक दशक से इस दिशा में लगातार और सुनियोजित तरीके से आगे बढ़ रही हैं। अब जब नक्सलवाद अपने अंतिम गढ़ों तक सिमट चुका है, तो सरकार ने सिर्फ इसे हराने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि यह भी सुनिश्चित करने की तैयारी कर ली है कि वामपंथी आतंकवाद दोबारा सिर न उठा सके।
सरकार ने इसके लिए विस्तृत एजेंडा बनाया है जिनमें अर्बन नक्सलियों पर लगाम लगाना भी शामिल है। सरकार के इस एजेंडा पर विस्तार से चर्चा करें उससे पहले बताते हैं कि किस तरह सरकार इस नक्सलियों के खात्मे के लिए पूरी तरह कमर कस चुकी है। 14 जनवरी 2026 को ही छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में 29 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। ये सरकार की नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ाई का एक मामूली हिस्सा है आँकड़े पर गौर करें तो दिखता है कि किस तरह बीते वर्ष में नक्सलवाद पर सबसे बड़ा प्रहार किया गया था।
नक्सली हिंसा में ऐतिहासिक गिरावट
पिछले एक दशक में सुरक्षा बलों और सरकार की साझा कोशिशों से नक्सली हिंसा में 53 प्रतिशत की बड़ी कमी दर्ज की गई है। अगर पिछले दो दशकों की तुलना करें तो साल 2004 से 2014 के बीच जहाँ हिंसा की 16,463 घटनाएँ हुई थीं, वहीं 2014 से 2024 के बीच यह घटकर 7,744 रह गईं। इस दौरान सुरक्षाकर्मियों की शहादत में 73 प्रतिशत (1,851 से घटकर 509) और आम नागरिकों की जान जाने की घटनाओं में 70 प्रतिशत (4,766 से घटकर 1,495) की भारी गिरावट आई है, जो प्रभावित इलाकों में लौटती शांति का स्पष्ट संकेत है।
साल 2025: ऑपरेशंस और सरेंडर के बड़े आँकड़े
अकेले साल 2025 की बात करें तो सुरक्षाबलों ने 270 नक्सली उग्रवादियों को मुठभेड़ में ढेर किया है। इसके साथ ही 680 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया और 1,225 नक्सलियों को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर किया गया। ‘ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट’ जैसे अभियानों और बीजापुर, छत्तीसगढ़ व महाराष्ट्र में हुए बड़े एनकाउंटर्स ने नक्सलियों की कमर तोड़ दी है। अक्टूबर 2025 तक के आँकड़े बताते हैं कि मुख्यधारा में लौटने वाले नक्सलियों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है।
मध्य प्रदेश: लाल आतंक से पूरी तरह मुक्त
दिसंबर 2025 में एक ऐतिहासिक घोषणा हुई जब मुख्यमंत्री मोहन यादव ने मध्य प्रदेश को ‘नक्सल मुक्त’ घोषित किया। बालाघाट में अंतिम दो बड़े नक्सलियों, दीपक (29 लाख इनामी) और रोहित (14 लाख इनामी) के आत्मसमर्पण ने इस राज्य से वामपंथी उग्रवाद का नामो-निशान मिटा दिया। यह इस बात का प्रमाण है कि यदि सरकार का संकल्प दृढ़ हो और एजेंसियाँ सतर्क हों, तो दशकों पुरानी समस्या का अंत संभव है।
मिशन 2026: गोलियों से नहीं, अब विकास और तकनीक से होगा ‘लाल आतंक’ का अंत
ET की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार ने 31 मार्च 2026 तक भारत को नक्सल मुक्त बनाने के लिए एक दमदार ’10-सूत्रीय’ फॉर्मूला तैयार किया है। रोडमैप का पहला हिस्सा सुरक्षा के मोर्चे पर एक बड़े बदलाव का संकेत देता है। अब ध्यान ‘संघर्ष प्रतिक्रिया’ से हटकर ‘दीर्घकालिक शांति’ पर है। इसके तहत केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (CAPF) की जगह धीरे-धीरे राज्य पुलिस को कमान सौंपी जा रही है।
डेटा के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में 576 किलेनुमा पुलिस स्टेशन बनाए गए हैं और 336 नए सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए हैं। साथ ही, नक्सलियों की फंडिंग रोकने के लिए NIA, ED और आयकर विभाग को समन्वित जाँच का जिम्मा दिया गया है। NIA ने अब तक नक्सलियों की ₹40 करोड़ और ED ने ₹12 करोड़ की संपत्ति जब्त की है, जिससे उनके वित्तीय नेटवर्क की कमर टूट गई है। शहरी क्षेत्रों में छिपे ‘अर्बन नक्सलियों’ और उनके फ्रंट संगठनों की पहचान कर उन्हें प्रतिबंधित करने की प्रक्रिया भी तेज कर दी गई है।
आँकड़े बताते हैं कि नक्सल प्रभावित 38 प्राथमिकता वाले जिलों में गरीबी दर 20% से अधिक है, जबकि राष्ट्रीय औसत 15% है। सुकमा, मलकानगिरी और पश्चिम सिंहभूम जैसे जिलों में तो यह 40% से भी ऊपर है। इसे देखते हुए सरकार ने 137 केंद्रीय योजनाओं को इन क्षेत्रों में शत-प्रतिशत लागू करने का लक्ष्य रखा है।
कनेक्टिविटी के मोर्चे पर 17,589 किमी सड़कों के लिए ₹20,815 करोड़ स्वीकृत किए गए हैं, जिसमें से 12,000 किमी का काम पूरा हो चुका है। संचार क्रांति के लिए 8,527 4G टावर मंजूर किए गए हैं। ड्रोन तकनीक के जरिए ‘स्वामित्व योजना’ को गति दी जा रही है ताकि हर ग्रामीण परिवार के पास अपनी जमीन का डिजिटल रिकॉर्ड हो, जिससे भूमि विवाद और नक्सलियों के बहकावे की गुंजाइश खत्म हो जाए।
बस्तर जैसे क्षेत्रों के आर्थिक विश्लेषण से पता चला है कि 70% घरों की आय ₹10,000 से कम है। रोडमैप का लक्ष्य इस मासिक आय को बढ़ाकर ₹25,000-30,000 तक ले जाना है। इसके लिए कौशल विकास और बाजार संपर्कों को मजबूत किया जा रहा है। अक्टूबर 2025 तक 1,225 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है, जिन्हें पुनर्वास नीति के तहत ₹5 लाख तक की आर्थिक मदद और ₹10,000 का मासिक वजीफा दिया जा रहा है। बस्तरिया बटालियन (1,143 जवान) जैसे प्रयोगों ने स्थानीय युवाओं को ‘बंदूक’ की जगह ‘वर्दी’ और ‘सम्मान’ की राह दिखाई है। सरकार का यह ‘ममता और कठोरता’ वाला मिश्रण नक्सलियों के भर्ती आधार को पूरी तरह खत्म कर रहा है।
हिंसा के विचार का अंत और भारत का नया सवेरा
इस रोडमैप की सबसे बड़ी ताकत इसका ‘पोस्ट-LWE’ विजन है। अतीत में हमने देखा है कि सुरक्षा बल जब किसी क्षेत्र को खाली कराते थे, तो शासन की अनुपस्थिति में नक्सली फिर लौट आते थे। लेकिन अब ‘सड़क, स्कूल और सुशासन’ की तिगड़ी ने उन दरारों को भर दिया है। NIA और ED के जरिए उनके ‘अर्बन इकोसिस्टम’ पर चोट करना एक मास्टरस्ट्रोक है, क्योंकि लाल आतंक को ऑक्सीजन शहरों के वातानुकूलित कमरों में बैठे बौद्धिक मददगारों से ही मिलती थी।
आज जब बस्तर के अबूझमाड़ में तिरंगा लहराता है और बालाघाट नक्सल मुक्त होता है, तो यह संदेश स्पष्ट है- ‘लोकतंत्र में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है।’ 2026 तक भारत की धरती वामपंथी आतंकवाद से पूरी तरह मुक्त होगी और यह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसा सुरक्षित भारत होगा जहाँ विकास की धारा हर उस अंतिम छोर तक पहुँचेगी जिसे नक्सलियों ने कभी ‘अंधेरा’ बनाए रखा था।
आज के डिजिटल दौर में, जहाँ हर पल मोबाइल की घंटी और स्क्रीन की रोशनी जिंदगी पर हावी है, वहाँ हिमाचल प्रदेश की ऊझी घाटी एक अलग ही तस्वीर पेश करती है। कुल्लू जिले में मनाली से सटी इस घाटी के नौ गाँव आज भी अपनी सदियों पुरानी देव परंपराओं को उसी अनुशासन के साथ निभाते हैं। यहाँ आस्था किसी प्रतीक तक सीमित नहीं है बल्कि जीवन की दिनचर्या का हिस्सा है, जो समय और तकनीक दोनों से परे जाकर अपनी जगह बनाए हुए है।
हर साल मकर संक्रांति से शुरू होकर पूरे 42 दिनों तक इन गाँवों में स्वेच्छा से सन्नाटा छा जाता है। इस दौरान न टीवी चलता है, न रेडियो, न डीजे और न ही किसी तरह का शोर-शराबा। मोबाइल फोन साइलेंट मोड में रखे जाते हैं, ऊँची आवाज में बात करना वर्जित होता है और खेतों में काम तक रोक दिया जाता है। मंदिरों के कपाट बंद रहते हैं और घंटियों को कपड़े से बांध दिया जाता है ताकि देवताओं की तपस्या में कोई विघ्न न पड़े।
यह सब किसी सरकारी आदेश या प्रशासनिक दबाव से नहीं होता। यह अनुशासन यहाँ के आराध्य देवी-देवताओं के आदेश से जुड़ा माना जाता है, जिसे गाँववाले पूरी श्रद्धा के साथ निभाते हैं। ऊझी घाटी की यह परंपरा इस बात का जीवंत प्रमाण है कि जब आस्था गहरी हो, तो आधुनिकता उसे कमजोर नहीं करती बल्कि उसके साथ सह-अस्तित्व में रहकर भी शांति और संतुलन बनाए रखती है।
क्या है यह देव परंपरा, जो 42 दिन तक गाँवों को कर देता है खामोश?
ऊझी घाटी के इन गाँवों में मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन से गाँवों के आराध्य देवता गौतम ऋषि, ब्यास ऋषि, कंचन नाग और नाग देवता तपस्या में लीन हो जाते हैं और स्वर्ग प्रवास पर चले जाते हैं।
देवताओं की तपस्या को भंग न किया जाए, इसके लिए गाँवों में पुरी तरह शांति बनाए रखना अनिवार्य हो जाता है। इसी कारण मनोरंजन, शोर-शराबा, खेती-बाड़ी और यहाँ तक कि मंदिरों में नियमित पूजा भी रोक दी जाती है।
(फोटो साभार – न्यूज 18)
गोशाल गाँव में मकर संक्रांति के दिन विधिवत पूजा-अर्चना के बाद देवालयों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। मंदिरों की घंटियों को कपड़े से बांध दिया जाता है ताकि गलती से भी कोई घंटी न बज जाए। यह रोक 42 दिनों तक यानी फागली उत्सव तक लागू रहता है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, यदि इस दौरान देव आदेश का उल्लंघन हुआ तो प्राकृतिक आपदाएँ, फसल खराब होना या गाँव में अशांति जैसी घटनाएँ हो सकती हैं। यही कारण है कि ग्रामीण इस परंपरा को पूरी गंभीरता से निभाते हैं।
किन गाँवों में लागू होता है देव प्रतिबंध?
कुल्लू जिले की ऊझी घाटी के नौ गाँव गोशाल, कोठी, सोलंग, पलचान, रुआड़, कुलंग, शनाग, बुरुआ और मझाच में देव परंपरा के तहत विशेष प्रतिबंध लागू रहते हैं। इन गाँवों के लोग अपने आराध्य देवताओं के आदेश को सामूहिक रूप से और पूरी आस्था के साथ निभाते हैं।
इन नियमों के तहत कहीं मनोरंजन के सभी साधन बंद रहते हैं, तो कहीं कृषि कार्य पूरी तरह निषिद्ध होता है। कुछ गाँवों में दोनों तरह की पाबंदियाँ एक साथ लागू होती हैं। गोशाल में टीवी, रेडियो और अन्य मनोरंजन साधनों पर पूर्ण रोक रहती है जबकि अन्य गाँवों में खेतों में काम करने या गोशालाओं से गोबर निकालने तक की अनुमति नहीं होती।
आधुनिक समय में भी इन गाँवों में 42 दिनों तक मोबाइल फोन का उपयोग बेहद सीमित रहता है। फोन केवल जरूरी कामों के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं और सभी लोग उन्हें साइलेंट मोड पर रखते हैं।
घंटी बजना, रील्स या वीडियो चलाना, तेज आवाज में गाने सुनना, लाउडस्पीकर, डीजे या रेडियो का उपयोग पूरी तरह से रोक लग जाता है। यहाँ तक कि सीटी बजाना या ऊँची आवाज में बात करना भी देव आदेश का उल्लंघन माना जाता है। इस समय खेती-बाड़ी से जुड़े सभी कार्य रोक दिए जाते हैं। किसान न तो खुदाई करते हैं, न जुताई और न ही किसी अन्य कृषि गतिविधि में शामिल होते हैं। इन सभी नियमों का पालन ग्रामीण बिना किसी सवाल के श्रद्धा और अनुशासन के साथ करते हैं।
मंदिरों में नहीं होती पूजा
इस देव परंपरा की सबसे अनोखी बात यह है कि 42 दिनों तक मंदिरों में नियमित पूजा भी नहीं होती। गोशाल गाँव में कंचन नाग, गौतम ऋषि और ब्यास ऋषि के मंदिरों के कपाट विधिवत पूजा के बाद बंद कर दिए जाते हैं। इसी तरह सिमसा गाँव में देवता कार्तिक स्वामी के मंदिर के कपाट भी मकर संक्रांति से 12 फरवरी तक बंद रहते हैं।
फोटो साभार – न्यूज 18
मंदिरों में लगी घंटियों को कपड़े से बांध दिया जाता है ताकि कोई श्रद्धालु गलती से भी घंटी न बजा दे। यह सब देवताओं को पूर्ण शांति देने के उद्देश्य से किया जाता है।
42 दिन बाद फागली उत्सव और देवताओं की भविष्यवाणी
42 दिनों का यह देव प्रतिबंध फागली उत्सव के साथ समाप्त होता है। इसी दिन देवताओं के स्वर्ग प्रवास से लौटने की मान्यता है। इस मौके पर गाँवों में भव्य उत्सव आयोजित किया जाता है। देवताओं का जोरदार स्वागत होता है और देव वाद्य यंत्रों की गूंज से घाटी फिर से जीवंत हो उठती है।
मान्यता है कि देवता लौटकर आने वाले साल में होने वाली घटनाओं के बारे में भविष्यवाणी भी करते हैं। मंदिर के अंदर मूर्ति पर लगाए गए मिट्टी के लेप को हटाया जाता है, जिसमें से कुमकुम, अनाज के दाने, सेब के पत्ते जैसी चीजें निकलती हैं। इन्हीं संकेतों के आधार पर सालभर की भविष्यवाणी की जाती है।