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ताकि बढ़े अमेरिकी खजाना, छँटकर आएँ सिर्फ अमीर लोग: जानिए ट्रंप के ‘गोल्ड कार्ड वीजा’ से जुड़ा सब कुछ, अब ₹9 करोड़ में मिलेगी US की नागरिकता

US राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार (10 दिसंबर, 2025) को गोल्ड कार्ड के लिए आवेदन प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा की। इसके साथ ही अमेरिका में धनी निवेशकों और वर्ल्ड क्लास टैलेंट के लिए नागरिकता लेना आसान हो गया है।

नागरिकता लेने के इच्छुक व्यक्ति को $1 मिलियन यानी करीब 8.8 करोड़ रुपए देने होंगे। हालाँकि कंपनियों को कोर्पोरेट वीजा कार्ड के लिए $2 मिलियन यानी 17.6 करोड़ प्रति कर्मचारी देना होगा। ऐसी कंपनी दूसरे कर्मचारी को वीजा ट्रांसफर कर सकती है। इसके लिए दोबारा 17.6 करोड़ रुपए देने की जरूरत नहीं है। यानी वीजा गोल्ड कार्ड किसी व्यक्ति या कंपनी के लिए अमेरिका में लंबे समय तक रहने, काम करने और नागरिकता पाने का एक विकल्प है।

गोल्ड कार्ड क्या है?

गोल्ड कार्ड एक नया US वीज़ा पाने का रास्ता है, जो आवेदकों को यूनाइटेड स्टेट्स की स्थायी नागरिकता देगा। इसका मकसद अमेरिका को आर्थिक तौर पर मालामाल करना है। इसमें $15,000 प्रोसेसिंग फीस यानी 15.33 लाख रुपए और वेटिंग के बाद $1 मिलियन यानी 8.8 करोड़ का गिफ्ट शामिल है। सफल आवेदकों को EB-1 या EB-2 के तहत कानूनी रूप से अमेरिका की स्थायी नागरिकता मिलेगी। पारंपरिक वीजा या ‘ग्रीन कार्ड’ से अलग यह प्रोग्राम खासतौर से अमीरों, इन्वेस्टर्स, बिजनेसमैन या टैलेंटेड प्रोफेशनल के लिए बनाया गया है।

ट्रंप ने व्हाइट हाउस के रूजवेल्ट रूम में बिज़नेस लीडर्स के एक कार्यक्रम में गोल्ड वीजा शुरू करने की जानकारी दी। तभी एप्लीकेशन लेने वाली एक वेबसाइट लाइव हो गई। इसका मकसद EB-5 वीज़ा की जगह लेना है, जिसे अमेरिकी कॉन्ग्रेस ने 1990 में विदेशी निवेश लाने के लिए बनाया था और यह उन लोगों के लिए उपलब्ध था, जो कम से कम 10 लोगों को नौकरी देने वाली कंपनी पर लगभग $1 मिलियन खर्च करते हैं।

ट्रंप नए वर्जन को U.S. के लिए टॉप टैलेंट को आकर्षित करने का तरीका मानते हैं, साथ ही दावा करते हैं कि इससे अमेरिका का खजाना भर जाएगा।

फरवरी 2025 में गोल्ड कार्ड प्रोग्राम की घोषणा करने के बाद राष्ट्रपति ट्रंप लगातार इसको प्रमोट कर रहे हैं। शुरुआत में हर व्यक्ति के लिए इसकी कीमत $5 मिलियन यानी करीब 42 करोड़ रखा गया था, लेकिन सितंबर में इसे घटा कर $1 मिलियन यानी 8.8 करोड़ रुपए कर दिया गया।

इस मौके पर राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा, हमारे लिए बहुत खुशी की बात है कि ट्रंप गोल्ड कार्ड लॉन्च हो गया है। सारा पैसा यूएस सरकार के पास जाएगा और दूसरी बात ये है कि इससे सरकारी खजाने में अरबों डॉलर आएँगे।

गोल्ड कार्ड की कीमत क्या है?

  1. $15,000 यानी 13.55 लाख रुपए DHS प्रोसेसिंग फीस (नॉन-रिफंडेबल)
  2. बैकग्राउंड चेक होने के बाद आवेदक को $1 मिलियन यानी 8.8 करोड़ रुपए बतौर गिफ्ट देने होंगे
  3. डिपार्टमेंट ऑफ स्टेट की एक्स्ट्रा फीस लग सकती है
  4. धनी व्यक्तियों को अमेरिकी की नागरिकता देना मकसद है

राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि गोल्ड कार्ड दरअसल अमेरिका फर्स्ट एजेंडे का हिस्सा है। इससे भारत-चीन जैसे देशों के स्टूडेंट्स की संख्या कम हो जाएगी यानी सिर्फ वर्ल्डक्लास टैलेंट के साथ-साथ सफल कंपनी इससे आकर्षित होंगे।

कॉर्पोरेट गोल्ड कार्ड क्या है?

ट्रम्प कॉर्पोरेट गोल्ड कार्ड कंपनी द्वारा अपने एक या अधिक कर्मचारियों के लिए जारी किया जाता है। कंपनी को प्रति कर्मचारी 15,000 डॉलर यानी 13.55 लाख रुपए का DHS शुल्क देना होता है, जो वापस नहीं होता। वेटिंग पूरी होने के बाद प्रति कर्मचारी 2 मिलियन डॉलर यानी 17.6 करोड़ रुपए देना होता है।

अगर कंपनी किसी कर्मचारी का स्पॉन्सरशिप बदलना चाहे तो नया फिर से 17.6 करोड़ रुपए नहीं देना होगा। पुराना कार्ड नए कर्मचारी के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें 1% सालाना मेंटेनेंस फीस और 5% ट्रांसफर फीस (नई DHS बैकग्राउंड चेक सहित) भी लगती है।

  1. कंपनियाँ विदेशी कर्मचारियों को स्पॉन्सर करने के लिए ये पैसे दे सकती हैं।
  2. हर कर्मचारी के लिए $15,000 यानी 13.55 लाख रुपए प्रोसेसिंग फीस (नॉन-रिफंडेबल)
  3. जाँच के बाद हर कर्मचारी के लिए $2 मिलियन यानी 17.6 करोड़ रुपए गिफ्ट के तौर पर देना होगा
  4. कर्मचारी बदलने की स्थिति में ये पैसा दोबारा नहीं देना होगा
  5. 1% सालाना मेंटेनेंस फीस और 5% ट्रांसफर फीस लगेगी (कर्मचारी बदलने पर)

प्लेटिनम कार्ड क्या है?

ट्रंप का प्लेटिनम कार्ड भी शुरू होने वाला है। इसके लिए $1500 फीस 13.55 लाख रुपए के साथ-साथ $5 मिलियन यानी करीब 42 करोड़ रुपए बतौर गिफ्ट देना होगा। इसका फायदा यह होगा कि प्लेटिनम धारकों को 270 दिनों तक अमेरिका में कोई टैक्स नहीं लगेगा। किसी तरह की ट्रेवल वीजा की जरूरत नहीं होगी। प्लैटिनम कार्ड वाले व्यक्ति को विदेश से कमाई हुई इनकम पर अमेरिका में कोई टैक्स नहीं देना पड़ेगा।

कार्ड धारकों को क्या-क्या सुविधाएँ मिलेगी

गोल्ड कार्ड के अंतर्गत नागरिकता हमेशा के लिए मिलेगी। उन्हें पासपोर्ट के साथ साथ वोटिंग का अधिकार मिलेगा। अमेरिका के नागरिकों को जितनी भी सुविधाएँ मिलती हैं, वह सब ऐसे नागरिकों को मिलेंगे। दरअसल ये ग्रीन कार्ड के जरिए मिलने वाले स्थायी नागरिकता की तरह है।

ये वीजा कार्यक्रम धनी विदेशियों के लिए हैं, ताकि भारी भरकम पैसे देकर वो अमेरिका की सेवा कर सकें। इसका मकसद आम लोगों की अमेरिका में एंट्री रोकना है। राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि सिर्फ विश्वस्तरीय टैलेंटेड लोगों को ही वीजा मिलेगा। ऐसे लोगों को अमेरिका में बसने का मौका नहीं दे सकते, जो अमेरिकियों की नौकरियाँ छीनते हैं।

सरकारी खजाने में पैसा जमा होने पर अमेरिकियों पर लगने वाले टैक्स में कमी आएगी और सरकारी कर्ज चुकाया जा पाएगा।

परिवार का सदस्य भी ट्रंप गोल्ड कार्ड के लिए आवेदन कर सकता है। इसमें पति-पत्नी और 21 साल के छोटे अविवाहित बच्चे मुख्य आवेदक के साथ शामिल किए जा सकते हैं। परिवार के हर सदस्य के लिए 15,000 डॉलर DHS शुल्क और 1 मिलियन डॉलर बतौर गिफ्ट देना होगा।

कैसे करें आवेदन

  1. वेबसाइट https://trumpcard.gov/ पर ऑनलाइन जाएँ
  2. तीन कार्ड के विकल्प मिलेंगे- गोल्ड कार्ड, कॉर्पोरेट कार्ड और प्लेटिनम वेटलिस्ट
  3. विकल्प चुनने के बाद अपनी व्यक्तिगत जानकारी भरें ( नाम, जन्म, पता, परिवार, नागरिकता आदि)
  4. बताए गए निर्देशों के मुताबिक myUSCIS.gov अकाउंट बनाएँ
  5. DHS प्रोसेसिंग फीस $15,375 यानी 13.89 लाख रुपए ( क्रेडिट कार्ड डिस्चार्ज के साथ) जमा करें
  6. क्रेडिट कार्ड (अमेरिकी व अंतरराष्ट्रीय) या ACH डेबिट (केवल अमेरिकी बैंक) का इस्तेमाल करें
  7. प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार करें
  8. बतौर गिफ्ट $1 मिलियन या $2 मिलियन जमा करें।
  9. ईमेल के निर्देश के मुताबिक ACH डेबिट या Swift वायर ट्रांसफर के माध्यम से करें

प्रोसेसिंग फीस जमा होने के बाद आवेदक की जाँच काफी कड़ाई से की जाती है। अप्रूवल प्रोसेस में आमतौर पर हफ़्ते लग जाते हैं। आवेदक को वीज़ा इंटरव्यू में शामिल होना जरूरी है और डॉक्यूमेंट वक्त रहते जमा करना और किसी तरह का सवाल पूछे जाने पर उसका जवाब वक्त पर देना जरूरी है।

गोल्ड कार्ड स्टेटस को रद्द करने का प्रावधान में इसमें शामिल किया गया है। अगर अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो या गंभीर आपराधिक मामला दर्ज हो जाए और वीजा धारक दोषी पाया जाए, तो उसकी वीजा रद्द कर दी जाएगी। अमेरिकी नागरिक या पहले से ग्रीन कार्ड वाले इनमें से किसी भी कार्ड के लिए अप्लाई नहीं कर सकते।

जिस भारतीय अर्थव्यवस्था पर ट्रंप ने कभी उठाए सवाल, अब उसी में ₹1 लाख करोड़ का निवेश करेंगे खुद: जानिए ‘भारत फ्यूचर सिटी’ प्लान के बारे में सब, जिसपर फिदा हुआ उनका मीडिया ग्रुप

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को ‘डेड इकोनॉमी’ बताने के बाद देश के डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स में निवेश करने का फैसला किया है। हाल ही में ट्रंप मीडिया एंड टेक्नोलॉजी ग्रुप (TMTG) ने तेलंगाना में बड़ा निवेश करने का वादा किया है। ट्रंप के मीडिया समूह TMTG ने अगले 10 सालों में तेलंगाना की भारत फ्यूचर सिटी (Bharat Future City) में ₹1 लाख करोड़ तक के निवेश की योजना की घोषणा की है।

ट्रंप के मीडिया TMTG ने घोषणा में क्या कहा?

दरअसल, ट्रंप मीडिया एंड टेक्नोलॉजी ग्रुप (TMTG) ने 08 दिसंबर 2025 को तेलंगाना राइजिंग ग्लोबल समिट 2025 के उद्घाटन समारोह में घोषणा की है कि वह आने वाले 10 सालों में तेलंगाना की भारत फ्यूचर सिटी और आसपास के विकास क्षेत्रों में लगभग ₹1 लाख करोड़ तक निवेश करेगा। यह घोषणा करते हुए TMTG के प्रतिनिधि एरिक स्वाइडर ने कहा कि वह इस अवसर के लिए बहुत आभारी हैं।

स्वाइडर ने कहा कि इस बात को नजरअंदाज करना अंधापन होगा कि दुनियाभर के प्रौद्योगिकी पूंजीपति भारत से आ रहे हैं और देश प्रगति पर है। उन्होंने कहा, “भारत से काफी प्रतिभाएँ सामने आ रही हैं। और अब अगर आप आज की स्थिति देखें, तो यह मानना गलत होगा कि दुनियाभर के प्रौद्योगिकी पूंजीपति भारत से ही आ रहे हैं।”

एरिक स्वाइडर ने आगे कहा, “भारत प्रगति कर रहा है और मुझे नहीं लगता कि भारत रुकने वाला है। मेरा मानना है कि भारत निरंतर प्रगति करता रहेगा और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व करेगा।”

एक अधिकारिक रिलीज के अनुसार, TMTG पहले ही ₹41,000 के समझौतों पर हस्ताक्षर कर चुका है। इन समझौतों के तहत कंपनी तेलंगाना में एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया और स्मार्ट टेक्नोलॉजी हब बनाने जा रहा है। इस प्रोजेक्ट से हजारों रोजगार पैदा होंगे और भारत में TMTG की बढ़ती उपस्थिति भी मजबूत होगी।

क्या है तेलंगाना में बनने जा रही भारत फ्यूचर सिटी?

भारत फ्यूचर सिटी, तेलंगाना सरकार की एक परियोजना है, जिसे हैदराबाद के रंगारेड्डी जिले में विकसित किया जा रहा है। इसे एक आधुनिक, स्मार्ट और टिकाऊ शहर बनाने का लक्ष्य रखा गया है, जहाँ रहने, काम करने, शिक्षा, स्वास्थ्य और मनोरंजन की सभी सुविधाएँ एक ही जगह उपलब्ध होंगी। इस शहर को कई हिस्सों में बाँटकर तैयार किया जाएगा:

  • टेक्नोलॉजी और इनोवेशन जोन: जहाँ AI, इलेक्ट्रॉनिक्स, EV और हाई-टेक कंपनियाँ आएँगी।
  • फार्मा और हेल्थकेयर जोन: जहाँ दवाइयोमं और मेडिकल रिसर्च से जुड़े बड़े उद्योग लगेंगे।
  • मैन्युफैक्चरिंग जोन: जहाँ बड़े पैमाने पर उत्पादन करने वाली कंपनियाँ आएँगी।
  • शैक्षणिक और रिसर्च संस्थान: ताकि लोग यहीं पढ़ाई करके यहीं नौकरी कर सकें।
  • आवासीय और मनोरंजन क्षेत्र: जहाँ अच्छे घर, पार्क, मॉल और स्पोर्ट्स सुविधाएँ होंगी।
  • ग्रीन जोन और रिजर्व फॉरेस्ट: ताकि शहर हरियाली और पर्यावरण के साथ संतुलन में रहे

यह सिर्फ एक नया शहर नहीं होगा, बल्कि आने वाले समय की जरूरतों के अनुरूप तकनीक, उद्योग और रोजगार का केंद्र भी बनेगा। इस शहर का कुल क्षेत्रफळ लगभग 765 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें 56 गाँव और 7 मंडल शामिल हैं। सरकार ने इसके लिए फ्यूचर सिटी डेवलपमेंट ऑथरिटी (FCDA) का गठन किया है, जो शहर की योजना, जोनिंग, भू-अधिग्रहण और निर्माण कार्यों की देखरेख करेगा।

इस शहर को भारत की पहली ‘नेट-जीरो‘ स्मार्ट सिटी बनाने का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें ऊर्जा का इस्तेमाल पर्यावरण के अनुकूल होगा, कार्बन का उत्सर्जन न्यूनतम होगा और ग्रीन बिल्डिंग, कचरा प्रबंधन, जल प्रबंधन और हरे-भरे क्षेत्र होंगे। शहर में आधुनिक बुनियादी ढाँचे के साथ चौड़ी सड़कें, मेट्रो, बस रैपिड ट्रांजिट, स्मार्ट ट्रैफिक सिस्टम और डिजिटल नेटवर्किंग जैसी सुविधाएँ भी होंगी।

कौन-कौन से देश ‘भारत फ्यूचर सिटी’ में कर रहे निवेश?

सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि कई अन्य देश भी तेलंगाना में विकसित हो रही भारत फ्यूचर सिटी में निवेश कर रहे हैं। इनमें जापान, वियतनाम, कनाडा, सिंगापुर की बड़ी-बड़ी कंपनियाँ भी इस परियोजना की निवेशक हैं।

जापान की ट्रेडिंग कंपनी Marubeni Corporation लगभग ₹1000 करोड़ का निवेश कर एक बड़ा इंडस्ट्रियल पार्क बना रही है। सिंगापुर की Asia Gateway Infrastructure & Data Center (AGIDC) फ्यूचर सिटी में एक बड़े इंटरनेशनल गेटवे डेटा सेंटर बनाने के लिए ₹67000 करोड़ निवेश करने जा रही है।

इसके अलावा वियतनाम की सबसे बड़ी कंपनी में से एक Vingroup ने तेलंगाना सरकार के साथ लगभग ₹30,000 करोड़ निवेश का समझौता किया है। यह निवेश स्मार्ट-सिटी डेवलपमेंट, इलेक्ट्रिक वाहनों, रिन्यूएबल एनर्जी, हेल्थकेयर और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में किया जाएगा।

कनाडा की कंपनी ग्लोबल इन्वेस्टमेंट समूह Brookfield के नेतृत्व में एक कंसोर्टियम ने करीब ₹75,000 करोड़ निवेश का प्रस्ताव दिया है, जो ‘नेट जीरो इनोवेशन जोन’ विकसित करेगा।

ट्रंप ने भारत को बताया था ‘डेड इकोनॉमी’

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर बुधवार (30 जुलाई, 2025) को 25% टैरिफ का ऐलान किया था। ट्रंप ने इसी के साथ कहा था कि भारत के रूस से हथियार सौदों और तेल-गैस खरीदने के चलते भारत अपर अतिरिक्त टैरिफ भी लगेगा। ट्रंप ने इसके बाद गुरुवार (31 जुलाई, 2025) को भारत और रूस को ‘डेड इकॉनमी’ बता दिया। उनका इशारा था कि दोनों देश एक साथ हैं और अब वह जो चाहें वो करें।

भारत में ट्रंप के प्रोजेक्ट्स

भारत को ‘डेड इकोनॉमी’ बताने वाले डोनाल्ड ट्रंप ने उसी भारत को अपना सबसे बड़ा विदेशी बाजार माना है। साल 2012 में पहले प्रोजेक्ट से लेकर अब साल 2025 तक ट्रंप का रीयल-एस्टेट फूटप्रिंट 6 शहरों के फैले प्रोजेक्ट्स के साथ लगभग 252.5 एकड़ तक पहुँच गया है।

ट्रंप के मुंबई, पुणे, गुरुग्राम और कोलकाता में रिहायशी और ऑफिस-टावर प्रोजेक्ट्स हैं। हाल ही में ट्रंप वर्ल्ड सेन्टर पुणे लॉन्च हुआ है, जिसके अंतर्गत 27-27 मंजिला के दो टावर बनाए जाएँगे। यह ट्रंप का पहला कमर्शियल रियल-एस्टेट प्रोजेक्ट है।

वहीं, उत्तर भारत के पास NCR क्षेत्र में Trump Residences नाम का प्रोजेक्ट है। यह ऐसा प्रोजेक्ट है, जिसे लॉन्च होते ही खरीदारों ने खरीद लिया। इसमें दो 51 मंजिला टावर में 298 फ्लैट्स हैं, जिनकी पहले ही दिन करोड़ों रुपए में बुकिंग हुई थी।

मतलब साफ है कि ट्रंप ऑर्गेनाइजेशन देख चुका है कि भारत में रियल-एस्टेट, निवेश और प्रगति की गुंजाइश है। ट्रंप के दावे के मुताबिक भारत एक ‘डेड इकोनॉमी’ होती तो शायद ट्रंप कभी भारत में विकास परियोजनाओं के भागीदारी नहीं बनते।

‘वंदे मातरम’ पर PM का भाषण नहीं था तथ्यहीन, MK गाँधी ने किया था ‘राष्ट्र गीत’ का समर्थन: इरफान हबीब और द वायर के वेणु इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने में जुटे, पढ़ें सच्चाई

विवादित इतिहासकार एस इरफान हबीब ने दावा किया कि सोमवार (8 दिसंबर 2025) को लोकसभा में वंदे मातरम पर हुई चर्चा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण में मोहनदास करमचंद गाँधी पर गलत बयान दिया गया। इस बयान में पीएम मोदी ने कहा था कि गाँधी ने वंदे मातरम की प्रशंसा की थी और इसे राष्ट्रगान बताया था।

वंदे मातरम के इतिहास पर बात करते हुए पीएम मोदी ने कहा था कि 1905 में गाँधी ने गीत की प्रशंसा करते हुए एक लेख लिखा था और स्वीकार किया था कि यह पूरे बंगाल में इतना लोकप्रिय हो गया था कि यह एक राष्ट्रगान की तरह बन गया था, जिसमें अन्य देशों के राष्ट्रीय गीतों से अधिक भावनाएँ और मधुरता है। इस गीत में भारत को माता के रूप में देखा गया और उसकी भक्ति की गई।

लोकसभा में पीएम मोदी ने कहा, “मैं महात्मा गांधी की वंदे मातरम के प्रति भावनाओं के बारे में बताना चाहता हूँ। 2 दिसंबर 1905 के ‘इंडियन ओपिनियन’ में महात्मा गांधी ने लिखा था कि बंकिम चंद्र द्वारा लिखा गया गीत वंदे मातरम पूरे बंगाल में बहुत प्रसिद्ध हो गया था। स्वदेशी आंदोलन के समय लाखों लोग इसे गाते थे। उन्होंने यह भी लिखा कि यह गीत इतना लोकप्रिय था कि यह हमारे राष्ट्रगान जैसा बन गया था। इसमें दूसरे देशों के राष्ट्रगीतों से भी अधिक भावना और मिठास है। यह गीत भारत को माँ की तरह देखता है और उसकी प्रार्थना करता है।”

हालाँकि, विवादित इतिहासकार एस इरफान हबीब ने प्रधानमंत्री मोदी के बयान को खारिज कर दिया। हबीब का कहना है कि 1905 में महात्मा गाँधी दक्षिण अफ्रीका में थे और 1915 में भारत लौटे थे। इसलिए यह संभव नहीं कि उन्होंने उस समय वन्दे मातरम को राष्ट्रीय गान जैसा माना हो।

हबीब ने एक्स पर लिखा, “आज वन्दे मातरम् बहस के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि महात्मा गाँधी ने 1905 से इसे ‘राष्ट्रीय गान’ माना। लेकिन गाँधी उस समय दक्षिण अफ्रीका में थे, वे 1915 में भारत आए। क्या कोई संदर्भ है जो मुझे छूट गया लगता है?”

एस इरफान हबीब के साथ लेफ्ट प्रोपगैंडा वेबसाइट द वायर के संस्थापक संपादक एमके वेणु ने भी प्रधानमंत्री मोदी के बयान को गलत बताने का दावा किया। हबीब के पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए वेणु ने एक्स पर लिखा, “अगर हम मोदी के बयानों के संदर्भ ढूँढना शुरू कर दें, तो हम पागल हो जाएँगे!”

एस इरफान हबीब और एमके वेणु के दावों का फैक्टचेक

इतिहासकार हबीब के दावे की सत्यता जाँचने के लिए ऑपइंडिया ने फैक्ट-चेक किया और पाया कि उनका दावा पूरी तरह गलत है। हमारी जाँच के अनुसार, मोहनदास करमचंद गाँधी ने स्पष्ट रूप से वन्दे मातरम् गीत, जिसे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने रचा था का समर्थन किया और इसे ‘राष्ट्रीय गान’ के रूप में भी माना।

दरअसल, गाँधी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे थे, लेकिन इससे बहुत पहले दिसंबर 1905 में उनके विचार भारतीय पत्रिका ‘इंडियन ओपिनियन’ में प्रकाशित हुए। वहाँ स्पष्ट रूप से दिखता है कि उन्होंने इस गीत की सराहना की और समर्थन किया।

गाँधी ने अपनी लेखनी ‘The Heroic Song of Bengal’ में लिखा, “वंदे मातरम् गीत पूरे बंगाल में बहुत लोकप्रिय हो गया है। स्वदेशी आंदोलन के सिलसिले में बंगाल में विशाल सभाएँ आयोजित की गईं, जहाँ लाखों लोग एकत्रित हुए और बंकिम का गीत गाया। कहा जाता है कि यह गीत इतना लोकप्रिय हुआ कि यह हमारा राष्ट्रगान बन गया है।” इंडियन ओपिनियन में प्रकाशित गाँधी की इस लेखनी की छवि भी नीचे प्रस्तुत की गई है।

महात्मा गाँधी के संग्रहित कार्यों के एक अंश का स्क्रीनशॉट (Image via https://www.gandhiheritageportal.org/)

उपरोक्त गाँधी की अपनी लेखनी से स्पष्ट होता है कि वे इस गीत की प्रशंसा करते थे और उन्हें इसके लोकप्रिय होने का भी पता था। स्वतंत्रता सेनानियों के बीच यह गीत इतना लोकप्रिय था कि वे इसे राष्ट्रीय गान की तरह गाते थे।

एमके वेणु के दावों का उनकी वेबसाइट पर छपे एक आर्टिकल से हुआ खंडन

दिलचस्प बात यह है कि 8 नवंबर 2025 को द वायर में प्रकाशित एक लेख “गाँधी का दृष्टिकोण: वन्दे मातरम् समावेशी है, आज की तरह विभाजनकारी नहीं” में भी गाँधी की उसी लेखनी का उल्लेख किया गया है। इसमें बताया गया है कि गाँधी ने वन्दे मातरम् की प्रशंसा की और इसे राष्ट्रीय गान कहा।

लेख में लिखा गया है, “दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए, महात्मा गाँधी ने 2 दिसंबर 1905 को इंडियन ओपिनियन में ‘The Heroic Song of Bengal’ शीर्षक से एक लेख लिखा और वन्दे मातरम् को हमारा राष्ट्रीय गान बताया।”

फैक्ट-चेक के बाद यह साफ हो गया कि इतिहासकार एस इरफान हबीब और द वायर के संस्थापक संपादक एम के वेणु ने प्रधानमंत्री मोदी के बयान और वन्दे मातरम् के बारे में गलत जानकारी फैलाई। हालाँकि, हबीब और वेणु का ऐसा व्यवहार कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि लेफ्ट-इकोसिस्टम हमेशा से राष्ट्रवादी और राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रति नकारात्मक रहा है।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अदिति ने अंग्रेजी में लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)

रॉदरहैम में बच्चियों के रेप गैंग के सरगना निकले हुसैन ब्रदर्स, UK के नेशनल ऑडिट में हुआ खुलासा: पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग के खिलाफ ट्रायल के दौरान सामने आई रोंगटे खड़ी कर देने वाली दास्तान

दशकों तक साउथ यॉर्कशायर के रॉदरहैम शहर पर एक भयानक साया मंडराता रहा। यह साया आर्थिक बदहाली का नहीं, बल्कि उन संगठित गैंगों का था, जिन पर शहर की कमजोर और नाबालिग लड़कियों के साथ यौन शोषण का आरोप लगा। 2016 में हुसैन ब्रदर्स और उनके साथियों पर मुकदमा हुआ और इसके बाद ये खबर सुर्खियाँ बनी। लोगों के सामने इस गैंग का काला चेहरा और भी भयानक रूप से सामने आया।

हाल ही में ओपन जस्टिस यूके द्वारा जारी किये गये ट्रांसक्रिप्ट और ग्रुप-आधारित बच्चों के यौन उत्पीड़न पर राष्ट्रीय ऑडिट की रिपोर्ट ने इस काले अध्याय को फिर सामने ला दिया है। ये दस्तावेज साबित करते हैं कि कैसे संगठित रूप से बच्चों का शोषण, यातना और तस्करी होती रही और कैसे सरकारी तंत्र की नाकामी, लापरवाही से सालों तक इन अपराधों पर लगाम नहीं लग सका।

कमजोर लोगों को किया जाता था टारगेट

फरवरी 2016 की सजा सुनाते समय कोर्ट ने गैंग की खतरनाक और सोची-समझी रणनीति को साफ-साफ बताया। मुख्य आरोपित अर्शिद हुसैन, बन्नारस हुसैन और बशारत हुसैन अपने शिकार यूँ ही नहीं चुनते थे, बल्कि उनकी तलाश करते थे।

कोर्ट में सामने आया कि गैंग खास तौर पर उन नाबालिग लड़कियों को चुनता था, जो लोकल अथॉरिटी की देखभाल में थीं या अपने परिवारों से दूर थीं। उनका तरीका हर बार लगभग एक जैसा ही होता था- पहले लड़कियों को तोहफे, पैसे या नशा देकर भरोसा जीत कर बॉयफ्रेंड बन जाते थे और फिर दलाली करने लगते थे।

भरोसे की आड़ में शुरू हुआ रिश्ता धीरे-धीरे डर और हिंसा में बदल जाता। ट्रांसक्रिप्ट्स में दर्ज है कि आरोपित शहर में खौफ पैदा करके पीड़ितों को चुप रहने पर मजबूर करते थे।

कोर्टरूम में खौफनाक कहानियों का खुलासा

सजा सुनाते समय सामने आए विवरण बेहद दर्दनाक थे।

Victim 2 केवल 11 साल की उम्र में केयर में रखी गई थी। अर्शिद हुसैन रोज उसे ढूँढता था, मना करने पर उसे मारता-धमकाता था और बाद में अपने भाई बन्नारस और दोस्तों तक पहुँचा देता था। उसके साथ लगातार शारीरिक हिंसा और शोषण किया गया और उसे एक सामान की तरह इस्तेमाल किया गया।

Victim 7 को बशारत हुसैन ने मानसिक रूप से तोड़ा। एक घटना में बशारत और अर्शिद ने उसके हाथ-पैर बाँध दिए और सिर पर चादर डाल दी। वह पूरी तरह लाचार थी और बगल के कमरे में दूसरी लड़की की चीखें सुनकर दहशत में आ गई। उसे जलाने की धमकी देकर डराया गया।

Victim 6 के साथ अर्शिद हुसैन ने नस्लीय गालियाँ देते हुए उसे अपमानित किया और जबरन शोषण किया, यह कहते हुए कि वह ‘white trash’ है।

अंधेपन की संस्कृति: संस्थागत लीपापोती

हुसैन ब्रदर्स पर चले मुकदमों ने केवल कुछ मामलों को सामने रखा, लेकिन व्यापक जाँच ने साफ किया कि ये घटनाएँ अलग-थलग नहीं थीं, बल्कि राज्य की गंभीर नाकामी से जन्मी एक राष्ट्रीय स्तर की समस्या थीं। बैरोनेस लुईस केसी द्वारा तैयार नेशनल ऑडिट ऑन ग्रुप-बेस्ड चाइल्ड सेक्सुअल एक्सप्लॉइटेशन में खुलासा हुआ कि एक अंधेपन, अनदेखी और पूर्वाग्रह की संस्कृति ने इन गैंगों को सालों तक बेलगाम चलने दिया।

रिपोर्ट ने बिना किसी आसान भाषा के बताया कि बच्चों पर कई पुरुषों द्वारा बार-बार यौन अत्याचार, हिंसा, गैंग-रेप और मजबूरन गर्भपात जैसी घटनाएँ होती रहीं। सबसे जरूरी बात ऑडिट ने इस बात की पुष्टि की कि कई मामलों में आरोपित गैंगों में बड़ी संख्या में पाकिस्तानी और अन्य एशिया’ मूल के पुरुष शामिल थे।

सिर्फ रॉदरहैम में ही पाया गया कि चाइल्ड सेक्सुअल एक्सप्लॉइटेशन के 64% मामले ब्रिटिश पाकिस्तानी पुरुषों से जुड़े थे, जबकि उनकी आबादी स्थानीय जनसंख्या में कम है।

रिपोर्ट के अनुसार यह सच्चाई लंबे समय तक इसलिए छिपी रही क्योंकि अधिकारियों ने व्यवस्थित रूप से डेटा इकट्ठा ही नहीं किया। करीब दो-तिहाई मामलों में आरोपितों की जातीय पहचान दर्ज ही नहीं की गई।

इस सामूहिक विफलता की वजह से, सालों से बार-बार चेतावनी मिलने के बावजूद, अधिकतर पीड़िताएँ युवा श्वेत लड़कियाँ थीं और संदिग्धों का प्रोफ़ाइल बार-बार एक जैसा था सिस्टम न पैटर्न स्वीकार कर पाया, न बच्चों को सुरक्षा दे पाया।

राजनीतिक चुप्पी और पुलिस की मिलीभगत

जाँचो के जरिए ये बात साफ हुई कि सच्चाई को दबाने की सबसे बड़ी वजह डर था कि कहीं अधिकारियों या नेताओं पर रेसिस्ट या इस्लामोफोबिक होने का आरोप न लग जाए। इसी डर ने कई लोगों को बोलने से रोक दिया।

राजनीतिक दबाव –
लेबर सांसद सारा चैम्पियन को 2017 में सिर्फ इसलिए पद छोड़ना पड़ा क्योंकि उन्होंने कहा था कि ब्रिटेन में ब्रिटिश पाकिस्तानी पुरुषों द्वारा श्वेत लड़कियों के शोषण की गंभीर समस्या है। एक बयान जिसे अब डेटा सही साबित करता है। इसी तरह कुछ नेताओं, जैसे कीथ वाज़ ने समुदाय को कलंकित करने के डर से नस्लीय पहलू को कम करके दिखाया।

इंटेलिजेंस की अनदेखी –
पुलिस के पास सालों से साफ इनपुट मौजूद थे। वेस्ट मिडलैंड्स पुलिस की 2015 की प्रोफ़ाइल में पाया गया कि 62% संदिग्ध पाकिस्तानी मूल के थे, जबकि केवल 12% श्वेत थे। इसके बावजूद, पुलिस ने समुदायिक तनाव बढ़ने के डर से सार्वजनिक रूप से चेतावनी जारी नहीं की।

पीड़ितों को ही दोषी ठहराना –
नस्लीय प्रोफाइलिंग के आरोपों से बचने के लिए कई बार पुलिस ने अपराधियों पर कार्रवाई करने के बजाय खुद पीड़ित लड़कियों को ही छोटी-मोटी बातों में गिरफ्तार कर लिया, जबकि वे उन गैंगों के दबाव और नियंत्रण में थीं। नतीजा यह हुआ कि असली दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई और अपराध जारी रहे।

पुलिस की मिलीभगत, पीड़ित परिवारों पर कार्रवाई और हल्की सजा

रॉदरहैम की घटनाएँ कोई अपवाद नहीं थीं, बल्कि पूरे देश में फैली उस गंभीर समस्या का हिस्सा थीं जिसे सालों तक कम करके दिखाया गया। 1980 के दशक से टेल्फर्ड, रोचडेल, ऑक्सफोर्ड और न्यूकैसल जैसे शहर कई गैंगों के सक्रिय केंद्र बने रहे।

टेल्फर्ड में अकेले लगभग 40 सालों में करीब 1,000 लड़कियों का शोषण हुआ और तीन हत्याएँ भी इसी कांड से जुड़ी पाई गईं। रोचडेल में 2002 से कम से कम 47 लड़कियों के साथ अत्याचार हुआ। सरकारी आँकड़ों के अनुसार पूरे इंग्लैंड में लगभग 19,000 किशोरों के ग्रूमिंग का शिकार होने का अनुमान है।

कई जगह पुलिस प्रतिक्रिया इतनी कमजोर थी कि वह लापरवाही के कारण सहमति जैसी दिखने लगी। रेसियल प्रोफाइलिंग के आरोपों से बचने और सांस्कृतिक रूप से असंवेदनशील समझे जाने के डर में कई पुलिस बल शिकायतों की गहराई से जाँच ही नहीं करते थे।

कई मामलों में असली अपराधियों पर कार्रवाई करने के बजाय पीड़ित लड़कियों या उनके परिवारों को ही छोटी बातों में गिरफ्तार कर लिया गया। इस नाकामी ने कई गैंगों को खुले तौर पर काम करने का मौका दिया।

इस विफलता को मीडिया और कुछ राजनीतिक आवाजों ने भी बढ़ाया, जहाँ अक्सर एशियन या साउथ एशियन जैसे व्यापक शब्दों का इस्तेमाल किया गया, जिससे रिपोर्ट में सामने आए असामान्य पैटर्न और डेटा साफ हो गए।

इसी बीच, NSPCC की 2023 की रिपोर्ट में ऑनलाइन ग्रूमिंग मामलों में 82% बढ़ोतरी दर्ज की गई, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है, जिसे लंबे समय से चली आ रही सरकारी चुप्पी और अस्वीकार ने छुपा रखा है।

पॉलिटिकल करेक्टनेस ने सिस्टम को कैसे अपंग बना दिया

रॉदरहैम ट्रांसक्रिप्ट्स में दर्ज घटनाएँ किसी खाली जगह में नहीं हुईं। ये इसलिए दशकों तक चलती रहीं क्योंकि पूरे सिस्टम ने पॉलिटिकल करेक्टनेस के डर में कार्रवाई से हाथ खींच लिया।

सालों तक ज्यादातर पीड़ित श्वेत, कामगार वर्ग की लड़कियाँ पुलिस, सोशल सर्विस और काउंसिल जैसी संस्थाओं द्वारा अनदेखी की गईं। अधिकारियों को आशंका थी कि अगर वे एशियाई मूल के पुरुषों पर लगे आरोपों की जाँच करेंगे, तो उन्हें रेसिस्ट कहा जा सकता है। इसी डर ने एक माहौल बना दिया जहाँ ग्रूमिंग गैंग खुलकर काम करते रहे। ट्रांसक्रिप्ट्स में यह भी दर्ज है कि हुसैन ब्रदर्स इलाके में जाने-पहचाने थे, महँगी गाड़ियाँ चलाते थे और खुद को लगभग अछूता मानते थे।

जे रिपोर्ट ने 2014 में खुलासा किया कि 1997 से 2013 के बीच रॉदरहम में कम से कम 1,400 बच्चों का शोषण हुआ। इसके बावजूद, कई बार आरोपितों की जातीय पृष्ठभूमि जो कई मामलों में पाकिस्तानी मूल के पुरुषों से जुड़ी हुई थी, यही कारण था जिसकी वजह से अधिकारी कार्रवाई से पीछे हटते रहे।

लेबर-शासित रॉदरहैम काउंसिल पर यह आरोप लगा कि उसने समुदायिक सौहार्द और राजनीतिक लाभ-हानि को बच्चों की सुरक्षा से पहले रखा और डर था कि सच सामने होने से जातीय तनाव बढ़ सकता है या उनका वोट बैंक पर असर हो सकता है।

टैक्सपेयर-फंडेड डिफेंस का अपमान

पीड़ितों के लिए सबसे दर्दनाक बात यह थी कि जिन लोगों ने उनके साथ अत्याचार किया, वे कोर्ट में अपनी कानूनी लड़ाई के खर्च भी सरकारी पैसों से चलवाते रहे। कई जाँच रिपोर्टों में सामने आया कि ये आरोपित, जिनके पास अच्छी-खासी कमाई और कारोबार थे, कोर्ट में खुद को गरीब दिखाकर स्टेट फंडेड लीगल एड लेते रहे।

केवल 2016 के मुकदमे में ही हुसैन ब्रदर्स को £370,000 (₹ 4.43 करोड़ रुपए) से अधिक की कानूनी सहायता मिली और कुल खर्च करीब £500,000 (₹ 6 करोड़ रुपए) तक पहुँचा यानी पूरा बोझ टैक्सपेयर्स पर पड़ा। वहीं, उनकी कई पीड़िताओं को कोई मुआवज़ा नहीं मिला और जिन्हें मिला भी, उन्हें अक्सर बहुत कम रकम कभी-कभी सिर्फ £2,000 (2.40 लाख रुपए) दी गई।

रॉदरहैम केस की सर्वाइवर सैमी वुडहाउस ने इस अन्याय को सामने लाते हुए कहा कि अपराधियों को कानूनी मदद में जितना पैसा दिया गया, पीड़ितों को उसका एक अंश भी मुआवज़े में नहीं मिला। यह दिखाता है कि न्याय प्रणाली, मुकदमा चलाते समय भी, संरचनात्मक रूप से पीड़ितों के मुकाबले आरोपितों के पक्ष में झुकी हुई दिखाई दी।

बहुत देर से जागा सिस्टम

ठोस सबूतों के आधार पर फरवरी 2016 में जज सारा राइट ने कड़ी सजाएँ सुनाई और कहा कि इन अपराधों ने पीड़ितों पर तबाह कर देने वाला असर छोड़ा है।

  • अर्शिद हुसैन: गैंग का मुख्य संचालक माना गया, 35 साल की सजा।
  • बशारत हुसैन: गंभीर भूमिका के लिए 25 साल की सजा।
  • बन्नारस हुसैन: दोषी मानने के बाद 19 साल की सजा।
  • कैरेन मैकग्रेगर: अपने घर में शोषण को संभव बनाने के लिए 13 साल की सजा।

एक डरावनी विरासत

रोथरहैम 2016 ट्रायल के ट्रांसक्रिप्ट साफ दिखाते हैं कि शोषण जैसा हल्का शब्द असल हिंसा को छिपा देता है। इन गैंगों ने सालों तक कम उम्र की लड़कियों पर शारीरिक और मानसिक अत्याचार किए, जबकि रोथरहैम शहर अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में व्यस्त रहा।

लेकिन दोष सिर्फ आरोपितों का नहीं है। जैसा कि नेशनल ऑडिट रिपोर्ट और 197 पन्नों की केसी रिपोर्ट बताती हैं। पुलिस ने शिकायतें नजरअंदाज कीं, काउंसिल के अधिकारी कम्युनिटी कोहेशन के नाम पर बच्चों की सुरक्षा से समझौता करते रहे और राजनीतिक नेताओं ने असहज सच को दबा दिया।

दशकों तक सिस्टम ने अपनी सबसे कमजोर बेटियों को इसलिए बलि चढ़ने दिया ताकि संस्कृति, अपराध और इंटीग्रेशन पर कोई कड़े सवाल न उठें।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में जिनित जैन ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)

कहीं आपके अपनों का पैसा उस अकाउंट में तो नहीं पड़ा जो वे भूल गए, जानिए कैसे हासिल कर सकते हैं यह रकम: बैंकों में पड़े हुए हैं ऐसे ₹78000 करोड़

देशभर में लाखों लोगों का पैसा सालों से बैंकों और वित्तीय संस्थानों में बिना क्लेम का पड़ा हुआ है। PM मोदी ने आम लोगों से इन पैसों को चेक कर क्लेम करने की अपील की है।

10 दिसंबर 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर आम भारतीयों के करोड़ों अनक्लेम पैसे चेक कर क्लेम करने की अपील की है। पीएम मोदी ने बताया है कि सरकार की आपका पैसा, आपका अधिकार पहल के तहत अक्टूबर 2025 से अब तक यानी दो महीने में लगभग 2000 करोड़ रुपए उसके मालिकों तक पहुँचा है।

ये पैसे पुराने बैंक अकाउंट, इंश्योरेंस पॉलिसी, म्यूचुअल फंड फोलियो और डिविडेंड लेजर में पड़े हैं। उन्होंने बताया कि अकेले बैंकों के पास 78,000 करोड़ रुपये बिना दावे के जमा हैं, जबकि इंश्योरेंस कंपनियों के पास लगभग 14,000 करोड़ रुपये बिना भुगतान के जमा हैं। म्यूचुअल फंड और बिना दावे वाले डिविडेंड से हजारों करोड़ रुपए हैं।

PM मोदी ने कहा कि यह पैसा दशकों की मेहनत से कमाई गई पारिवारिक बचत है जो कागजी कार्रवाई, दूसरी जगह जाने या समय के साथ धुंधली यादों की वजह से छूट गई।

इसे ठीक करने के लिए, सरकार ने अक्टूबर 2025 में देश भर में ‘आपकी संपत्ति, आपका अधिकार’ या ‘आपका पैसा, आपका अधिकार’ नाम से पहल शुरू की है। यह पहल जागरूकता, पहुँच और कार्रवाई के 3A फ्रेमवर्क पर बनी है।

दो महीनों में, शहरी केंद्रों से लेकर दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों तक, 477 जिलों में सुविधा कैंप लगाए गए। RBI, IRDAI, SEBI, PFRDA और IEPFA जैसे रेगुलेटर अब नागरिकों को भूली हुई संपत्तियों का पता लगाने में मदद कर रहे हैं। लगभग 2,000 करोड़ रुपए पहले ही वापस किए जा चुके हैं, और अधिकारियों का कहना है कि यह तो बस शुरुआत है।

कई परिवारों, खासकर सीनियर सिटिजन के लिए, इस कैंपेन का मतलब हो सकता है कि उन्हें लंबे समय से खोई हुई जमा राशि या उनके माता-पिता द्वारा खरीदी गई पुरानी पॉलिसी फिर से मिल जाए।

Source: RBI

RBI का UDGAM पोर्टल – भूले हुए बैंक डिपॉजिट ढूँढना

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने अगस्त 2023 में UDGAM पोर्टल लॉन्च किया। यह एक सेंट्रलाइज़्ड प्लेटफॉर्म है, जो लोगों को अलग-अलग बैंकों में पड़े बिना दावे वाले बैंक डिपॉज़िट का पता लगाने में मदद करता है।

RBI ने पिछले कुछ सालों में डॉर्मेंट अकाउंट में लगातार बढ़ोतरी देखी है, और कई परिवारों को पता ही नहीं था कि उनके माता-पिता या दादा-दादी के जमा पैसों को डिपॉज़िटर एजुकेशन एंड अवेयरनेस फंड में ट्रांसफर कर दिए गए हैं।

UDGAM इस समस्या का समाधान करता है, जिससे कोई भी व्यक्ति हर इंस्टीट्यूशन से अलग-अलग संपर्क करने के बजाय एक ही विंडो से कई बैंकों को खोज सकता है।

पोर्टल ने धीरे-धीरे अपना कवरेज बढ़ाया है और अब इसमें लगभग पूरा बैंकिंग सेक्टर शामिल है। एक बार जब कोई यूजर मोबाइल नंबर और बेसिक डिटेल्स के साथ रजिस्टर करता है, तो वे चेक कर सकते हैं कि उनके नाम से जुड़ा कोई अकाउंट अनक्लेम्ड तो नहीं दिख रहा है।

अगर ऐसा होता है, तो पोर्टल उन्हें संबंधित बैंक में भेजता है, ताकि वे या तो अकाउंट को फिर से चालू कर सकें या क्लेम फाइल कर सकें। कई परिवारों के लिए, UDGAM यह पक्का करने का सबसे आसान तरीका बन गया है कि पहले की सेविंग्स सिर्फ इसलिए न भूल जाएं, क्योंकि डॉक्यूमेंट्स खो गए थे या बैंक ब्रांच दूसरी जगह चली गई थीं।

IRDAI का बीमा भरोसा पोर्टल – बिना क्लेम वाले इंश्योरेंस के पैसे वापस पाना

इंश्योरेंस वह सेक्टर है जहाँ लोग अक्सर यह क्लेम करना भूल जाते हैं कि उनका बकाया क्या है।

IRDAI का कहना है कि 25,000 करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम बिना क्लेम के रह गई है, क्योंकि पॉलिसी होल्डर्स ने घर बदल लिया, उनके कागज़ात खो गए या उनके नॉमिनी को कभी नहीं बताया गया कि कोई पॉलिसी है। ये बिना क्लेम वाली रकम डेथ बेनिफिट्स, मैच्योरिटी पेआउट्स, रिफंड्स, सर्वाइवल बेनिफिट्स या सेटलमेंट अमाउंट से आती है जो 12 महीने से ज़्यादा समय तक बिना पेमेंट के रहे।

Source: IRDAI

बीमा भरोसा पोर्टल इस सर्च को सभी लाइफ, जनरल और हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों में एक जगह पर रखता है। नाम, PAN, जन्मतिथि या पॉलिसी नंबर जैसी बेसिक जानकारी से परिवार यह देख सकते हैं कि कोई इंश्योरेंस कंपनी उनके नाम पर बिना पेमेंट वाले बेनिफिट्स तो नहीं रख रही है।

अगर कोई मैच मिलता है, तो क्लेम करने वाले को KYC, बैंक डिटेल्स और सपोर्टिंग डॉक्यूमेंट्स के साथ इंश्योरेंस कंपनी से कॉन्टैक्ट करना होगा। डेथ क्लेम के मामले में, नॉमिनी या कानूनी वारिसों को डेथ सर्टिफिकेट और सक्सेशन डॉक्यूमेंट्स जैसे आम प्रूफ्स जमा करने होते हैं। यह पोर्टल NRIs के लिए भी काम का साबित हुआ, जो सेल्फ-अटेस्टेड विदेशी प्रूफ्स के साथ डिजिटल तरीके से प्रोसेस पूरा कर सकते हैं।

बीमा भरोसा ने एक ऐसे प्रोसेस को आसान बना दिया है जिसके लिए पहले कई इंश्योरेंस कंपनियों के पास जाना पड़ता था और यह पक्का किया है कि असली बेनिफिशियरी सिर्फ इसलिए पैसे न खो दें, क्योंकि समय के साथ यादें या रिकॉर्ड धुंधले हो गए हैं।

SEBI का MITRA पोर्टल – इनएक्टिव या अनक्लेम्ड म्यूचुअल फंड फोलियो को ट्रेस करना

SEBI का MITRA पोर्टल MF Central के साथ इंटीग्रेटेड है। इसे इन्वेस्टर्स को इनएक्टिव या भूले हुए म्यूचुअल फंड फोलियो को ट्रैक करने में मदद करने के लिए बनाया गया था। एक फोलियो तब इनएक्टिव हो जाता है जब कम से कम 10 साल तक इन्वेस्टर द्वारा शुरू किया गया कोई ट्रांजैक्शन नहीं होता है, भले ही यूनिट्स अभी भी मौजूद हों।

Source: MF Central

कई परिवारों ने इन इन्वेस्टमेंट का हिसाब खो दिया क्योंकि उन्होंने शहर बदल लिया, ईमेल ID बदल लीं, या फंड हाउस के साथ अपनी कॉन्टैक्ट जानकारी कभी अपडेट नहीं की। समय के साथ, ये फोलियो चुपचाप अनक्लेम्ड कैटेगरी में चले जाते हैं।

MITRA, CAMS और KFin Technologies जैसे RTA से डेटा इकट्ठा करता है और इन्वेस्टर्स को यह वेरिफाई करने देता है कि उनके नाम पर ऐसे कोई फोलियो हैं या नहीं। OTP, PAN और दूसरे आइडेंटिटी पैरामीटर डालने के बाद, यूज़र्स अपने डॉर्मेंट इन्वेस्टमेंट को एक्सेस कर सकते हैं और उन्हें वापस पाने का प्रोसेस शुरू कर सकते हैं।

पहचान हो जाने पर, इन्वेस्टर्स KYC अपडेट कर सकते हैं, बैंक डिटेल्स दे सकते हैं और होल्डिंग्स को रिडीम या रिवाइवल करने का रिक्वेस्ट कर सकते हैं। चूंकि म्यूचुअल फंड इन्वेस्टमेंट अक्सर करियर के शुरुआती दौर में किए जाते हैं, MITRA ने कई परिवारों को छोटी लेकिन काम की रकम को फिर से खोजने में मदद की है, जो सालों से चुपचाप बढ़ रही थी।

IEPFA पोर्टल – बिना दावे वाले डिविडेंड और भूले हुए शेयर वापस पाना

IEPFA पोर्टल भारत में अनक्लेम सबसे बड़ी रकम में से एक को देखता है। एक अरब से ज़्यादा बिना दावे वाले शेयर और हज़ारों करोड़ रुपये का डिविडेंड अभी इन्वेस्टर एजुकेशन एंड प्रोटेक्शन फंड अथॉरिटी के पास जमा है, क्योंकि इन्वेस्टर्स ने लगातार सात साल तक डिविडेंड कैश नहीं कराया, क्योंकि कंपनियाँ उन तक नहीं पहुँच पाईं। इनमें से कई शेयर उन इन्वेस्टर्स के हैं, जिन्होंने दशकों पहले स्टॉक खरीदे थे और बाद में कंपनियों के मर्ज होने, रीस्ट्रक्चर होने या रजिस्ट्रार बदलने पर उन्हें भूला दिए गए।

Source: IEPF

कंपनीज़ एक्ट के सेक्शन 124 के तहत, इन्वेस्टर या कानूनी वारिस IEPF-5 मैकेनिज्म के ज़रिए इन एसेट्स को वापस पाने के लिए अप्लाई कर सकते हैं। इस प्रोसेस में ऑनलाइन फॉर्म भरना, पहचान और ओनरशिप प्रूफ जमा करना और कंपनी के नोडल ऑफिसर को इंडेम्निटी बॉन्ड और सपोर्टिंग डॉक्यूमेंट भेजना शामिल है। वेरिफाई होने के बाद, IEPFA शेयर या डिविडेंड इलेक्ट्रॉनिक तरीके से जारी करता है।

हाल के सुधारों जैसे कि सेल्फ-अटेस्टेड डॉक्यूमेंट्स की इजाज़त देना, 5 लाख रुपए तक के क्लेम के लिए सक्सेशन सर्टिफिकेट माफ करना और बड़े शहरों में निवेशक शिविर कैंप लगाना, इनसे यह प्रोसेस और आसान हो गया है। एक नया इंटीग्रेटेड डिजिटल प्लेटफॉर्म भी बन रहा है, जो रियल-टाइम ट्रैकिंग और ऑटोमेटेड वेरिफिकेशन का वादा करता है। कई परिवारों को लंबे समय से भूले हुए इन्वेस्टमेंट को पाना आसान हो सकता है, जिन्हें पहले ट्रेस करना नामुमकिन लगता था।

जो आपका है उसे वापस पाने में सरकार मदद कर रही है। अपने परिवार की सेविंग्स को नजरअंदाज न होने दें। पुराने सैलरी अकाउंट, भूली हुई इंश्योरेंस पॉलिसी, दशकों पहले खरीदी गई यूनिट या कभी कैश न किए गए डिविडेंड अभी भी वैसे ही पड़े हो सकते हैं।

सरकार के सुविधा कैंप और इन चार रेगुलेटर-समर्थित पोर्टल ने आखिरकार बिना कागज़ात के उस पैसे को ढूंढना और वापस पाना मुमकिन कर दिया है।

अगर आपके माता-पिता ने कभी किसी ऐसे अकाउंट के बारे में बताया जिसे वे बंद नहीं कर पाए, या अगर आपको शक है कि कहीं कोई पुरानी पॉलिसी या इन्वेस्टमेंट हो सकता है, तो यह चेक करने का सही समय है। आपका पैसा आपका अधिकार है। पहली बार, ऐसे तरीके मौजूद हैं जो सच में इसे वापस पाना मुमकिन बनाते हैं। अपने पैसे को घर आने दें।

(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखी गई है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

कॉन्ग्रेस, सपा, RJD, NC के हर एक उस नेता की अमित शाह ने संसद में खोली पोल, जिन्होंने वंदे मातरम का किया अनादर

वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर संसद के दोनों सदनों में विशेष चर्चा का आयोजन किया गया है। लोकसभा में जहाँ सरकार की और से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद चर्चा की शुरुआत की तो वहीं राज्यसभा में सत्ता पक्ष की तरफ से गृह मंत्री अमित शाह ने बागडोर सँभाली।

राज्यसभा में शाह के भाषण के दौरान राष्ट्रगीत के अनादर से जुड़ी कुछ घटनाओं को जिक्र किया गया जिस पर विपक्ष ने उनसे अपमान करने वालों का नाम बताने को कहा। जिस पर शाह ने राज्यसभा सचिवालय को एक दस्तावेज सौंपा जिसमें अलग-अलग नेताओं और राजनीतिक दलों द्वारा समय-समय पर ‘वंदे मातरम’ का ‘अपमान’ किए जाने की घटनाओं की विवरण है।

राज्यसभा में कैसे हुआ विवाद?

शाह ने कहा कि इस संसद में वंदे मातरम के गान को बंद करा दिया था। 1992 में भाजपा सासंद राम नाईक ने वंदे मातरम को संसद में फिर से गाने की शुरुआत करने का मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा, “उस समय लालकृष्ण आडवाणी जी ने लोकसभा के स्पीकर से कहा कि इस महान सदन के अंदर वंदे मातरम का गान होना चाहिए। क्योंकि संविधान सभा ने इसे स्वीकार किया है फिर लोकसभा ने सर्वसम्मति से 1992 में वंदे मातरम के गान की शुरुआत की।”

शाह ने कहा, “INDI गठबंधन के ढेर सारे लोगों ने कहा था कि हम वंदे मातरम नहीं गाएँगे। मैंने खुद देखा है कि कई सदस्य वंदे मातरम गान से पहले संसद से बाहर चले जाते हैं। भाजपा का एक भी सदस्य वंदे मातरम के गान के वक्त सम्मान के साथ खड़ा ना हो, ऐसा हो ही नहीं सकता है।”

इस पर जयराम रमेश ने शाह से कहा कि कौन खड़ा नहीं हुआ इसका सबूत दीजिए। विपक्ष ने कहा कि शाह का यह गंभीर दावा है।

शाह ने कहा, “सम्मानीय सदस्य ने कहा है कि कौन-कौन कॉन्ग्रेस पार्टी के लोगों ने वंदे मातरम नहीं गाने के लिए स्टेटमेंट दिया है और गान के वक्त संसद से बाहर चले गए हैं। मैं इसकी सूची आज शाम होने के पहले सदन के पटल पर रख दूँगा।” इसके बाद शाह ने चर्चा के बाद सदन के पटल पर वह सूची रखी जिसमें 9 नेताओं का जिक्र था।

शाह की लिस्ट में कौन-कौन हैं शामिल?

शाह ने राज्यसभा के सभापति को सूची देते हुए उनसे अनुरोध किया, “मेरा विनम्र आग्रह है कि माननीय सभापति महोदय इन तथ्यों को राज्यसभा के आधिकारिक अभिलेख में सम्मिलित कराने की कृपा करें।”

इस सूची में 2018 से 2025 तक की नौ घटनाएँ शामिल हैं जिनमें कॉन्ग्रेस, समाजवादी पार्टी (SP), नेशनल कॉन्फ्रेंस (JKNC) और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सदस्यों या पार्टियों से जुड़ी घटनाएँ शामिल हैं।

शाह द्वारा दी गई सूची (फोटो: DD News)
  • कॉन्ग्रेस सांसद इमरान मसूद – इस सूची में सबसे पहली एंट्री उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से कॉन्ग्रेस सांसद इमरान मसूद की है। लिस्ट में एक भाषण के लिंक के साथ लिखा गया है कि इमरान ने धार्मिक आस्था का हवाला देते हुए वंदे मातरम गाने से इनकार किया। 8 दिसंबर 2025 के इस वीडियो में इमरान मसूद ने कहा, “वंदे मातरम की जो शब्दावाली है उससे हमारी मजहबी (समस्या) है। मैं आपसे नहीं कह सकता है कि आप नमाज पढ़ो, तो ऐसे ही वंदे मातरम है। आप पढ़िए, हमारे यहाँ सजदा सिर्फ अल्लाह को है।”
  • नेशनल कॉन्फ्रेंस सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी – लिस्ट में दूसरा नाम जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर से नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी का है। मेहदी ने भी 8 दिसंबर 2025 को लोकसभा में चर्चा के दौरान वंदे मातरम गाने का विरोध किया था।

लोकसभा में चर्चा के दौरान मेहदी ने कहा, “वंदे मातरम का जब मसला पेश आता है, जब ये कहा जाता है कि आपको ये जबरदस्ती गाना पड़ेगा। हम तब यह कहते हैं कि आप गाए हम एहतराम देते हैं। नेशनल सॉन्ग है। हम उसका भी एहतराम करते हैं। उसमें दो राय नहीं है। आप गाएँ हम एहतराम के लिए खड़े हो जाएँगे। मगर आप ये चाहेंगे कि हम भी गाएँ, मुमकिन ही नहीं है। हो ही नहीं सकता है।”

  • शफीकुर्रहमान बर्क – सूची में तीसरा नाम सपा के दिवंगत सांसद शफीकुर्रहमान बर्क का है। शाह ने अपनी सूची में बर्क को जो वीडियो शेयर किया है वो जून 2019 में उनके लोकसभा में सांसद के तौर पर शपथ लेते समय का है। बर्क ने तब लोकसभा में शपथ लेने के ठीक बाद कहा था, “जहाँ तक वंदे मातरम का ताल्लुक है, यह इस्लाम के खिलाफ है। हम इसका पालन नहीं कर सकते हैं।”
  • सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क – अमित शाह ने अपनी लिस्ट में उत्तर प्रदेश के संभल से सपा के सांसद जियाउर्रहमान बर्क का नाम भी है। शाह ने लिखा, “जियाउर्रहमान ने वंदे मातरम ना गाने के अपने दादा के रुख का समर्थन किया है।” नवंबर 2025 में जियाउर्रहमान बर्क ने कहा था, “मेरे दादा ने हमेशा इसका विरोध किया है और कभी उसे नहीं गाया है। ना ही मैं गाता हूँ। इससे कोई मेरी देशभक्ति पर सवाल नहीं उठा सकता है। ना ही मैं किसी को सफाई देने बैठा हूँ कि मैं कितना देशभक्त हूँ।”
  • कॉन्ग्रेस की रैली में वंदे मातरम का अपमान – शाह ने 2018 की एक घटना का जिक्र कर बताया है कि कॉन्ग्रेस की रैली में वंदे मातरम का अपमान किया गया था। शाह ने एक वीडियो का लिंक शेयर करते हुए लिखा, “एक रैली में वंदे मातरम् का केवल एक छंद गाया गया। बताया गया कि राहुल गाँधी जी के आने का इंतजार था। जिस पर के.सी. वेणुगोपाल जी ने एक ही लाइन में समाप्त करने को कहा।”

शाह ने जिस वीडियो का लिंक शेयर किया है वो ‘TV9 Kannada’ का है। इसका शीर्षक ‘राहुल गाँधी ने कहा कि वंदे मातरम के लिए समय नहीं है – राष्ट्रीय गीत का किया अपमान’ है।

  • कॉन्ग्रेस विधायक आरिफ मसूद – मध्य प्रदेश के कॉन्ग्रेस विधायक आरिफ मसूद का नाम भी वंदे मातरम का विरोध करने वालों की सूची में शामिल है। शाह ने आरिफ मसूद का फरवरी 2019 के बयान से जुड़ी एक खबर का लिंक भी शेयर किया है। ‘आज तक’ की इस खबर के मुताबिक, विधायक आरिफ मसूद ने सार्वजनिक मंच से कहा है कि वो वंदे मातरम नहीं बोलेंगे।

उन्होंने कहा था, “ये हमारी बुनियादी लड़ाई है। मैं शरीयत के साथ समझौता नहीं कर सकता और इसलिए वंदे मातरम नहीं बोलूंगा। हमारे पूर्वजों ने देश के लिए जान दी। हम भी देंगे और हमारी आने वाली नस्लें भी देंगी लेकिन मैं वंदे मातरम नहीं कहूँगा। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम गाने से देशभक्ति का कोई लेना-देना नहीं है।”

  • कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया – शाह ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता सिद्धारमैया का 2022 का एक वीडियो शेयर किया है। शाह ने लिखा, “संविधान दिवस कार्यक्रम में कार्यकर्ताओं से वंदे मातरम ना गाने को कहा इसका वीडियो भी उपलब्ध है।” शाह ने इसके साथ ‘इंडिया टुडे’ का एक वीडियो भी शेयर किया है। इस वीडियो में सिद्धारमैया कह रहे हैं, “वंदे मातरम मत गाओ, वंदे मातरम गाना है तो आगे जाओ।”
  • समाजवादी पार्टी – शाह ने समाजवादी पार्टी (सपा) द्वारा स्कूलों में वंदे मातरम अनिवार्य करने के आदेश को रद्द करने की माँग का भी अपनी सूची में जिक्र किया है। शाह ने एक खबर का लिंक भी शेयर किया है। अक्टूबर 2025 की इस खबर के मुताबिक, समाजवादी पार्टी (सपा) नेता अबू आजमी ने महाराष्ट्र के सभी स्कूलों में वंदे मातरम अनिवार्य करने वाले आदेश को रद्द करने की माँग की थी।

अबू आजमी ने कहा कि वंदे मातरम गाना अनिवार्य करना सही नहीं है क्योंकि हर किसी की धार्मिक मान्यताएँ अलग-अलग होती हैं। उन्होंने कहा कि इस्लाम अपनी माँ के सम्मान को बहुत महत्व देता है लेकिन उसके आगे सजदा करने की इजाजत नहीं देता।

  • RJD विधायक सऊद आलम – शाह की इस लिस्ट में 9वाँ और आखिरी नाम सऊद आलम RJD के नेता है। शाह ने कहा है कि सऊद आलम ने विधानसभा में वंदे मातरम के दौरान खड़े होने से इनकार किया है। इसके साथ ही शाह ने इसका एक वीडियो भी शेयर किया है जिसमें वह वंदे मातरम के दौरान बैठे दिख रहे हैं। साथ ही, सऊद आलम ने इसका विरोध करते हुए कहा कि वह हिंदू गाने का सम्मान नहीं करेंगे क्योंकि यह हिंदू राष्ट्र नहीं है।

ओवैसी, मदनी, इकरा, राशिद… जिन्ना के कितने मुन्ना, जिनके लिए वंदे मातरम शिर्क

संसद में वंदे मातरम के 150 वर्ष पर चर्चा के दौरान बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर के भाषण की चर्चा है। अनुराग ठाकुर ने कहा कि अंग्रेजों को वंदे मातरम से दिक्कत थी, फिर जिन्ना को इससे आपत्ति और अब जिन्ना के मुन्ना को भी इससे दिक्कत है।

बीजेपी सांसद का यह बयान संसद में इसी चर्चा के दौरान सही साबित होता दिखा जब एक के बाद कई मुस्लिम सांसदों ने सदन के भीतर ही वंदे मातरम का विरोध किया। जो काम जिन्ना ने दशकों पहले किया था, जो विचार जिन्ना के थे, वो विचार आज भी सदन में मौजूद दिखे। मजहब के नाम पर वंदे मातरम का खूब विरोध हुआ।

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की यह कविता, जिसे 1882 में उनके बंगाली उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया गया था, बाद में 1896 में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने संगीतबद्ध कर पूरे देश में लोकप्रिय बना दिया।

धीरे-धीरे यह गीत देशभर में गूंजने लगा। श्री अरबिंदो ने इसे राष्ट्रवाद का मंत्र कहा, लाला लाजपत राय ने इसके नाम से उर्दू साप्ताहिक निकाला और मैडम भीकाजी कामा ने विदेश में ‘वंदे मातरम’ लिखे झंडे को फहराकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज बुलंद की। लेकिन इसी समय 1908 में मुस्लिम लीग ने इस गीत का विरोध शुरू कर दिया।

इस विरोधियों में मोहम्मद अली जिन्ना का नाम भी शामिल था। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में चर्चा के दौरान कहा कि जिन्ना ने लखनऊ से 15 अक्टूबर 1937 को वंदे मातरम के खिलाफ नारा बुलंद किया। इसके बाद कॉन्ग्रेस पार्टी जिन्ना के दबाव में झुक गई थी और वंदे मातरम को तोड़ दिया। जिन्ना का यही विचार आगे चलकर देश के बँटवारे की नींव भी बना और आज दशकों बाद भी वही विचार जिंदा है और संसद तक में इस वंदे मातरम विरोधी विचार को बोला जा रहा है।

जमीयत उलेमा ए हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने वंदे मातरम् का विरोध करते हुए यहाँ तक कह दिया कि जब-जब जुल्म होगा, तब-तब जिहाद होगा। जो समुदाय इसके दबाव में झुक जाए, वह ‘मुर्दा कौम’ कहलाएगा।

उन्होंने कहा, ‘मुसलमानों को मर जाना स्वीकार है, लेकिन शिर्क नहीं। वतन से मोहब्बत अलग, उसकी पूजा अलग है। हर एक मुसलमान देश से मोहब्बत करता है, लेकिन इबादत सिर्फ अल्लाह की करेगा। हम जिएंगे तो इस्लाम पर, मरेंगे तो इस्लाम पर।’

एक तरफ जिहाद की परिभाषा, दूसरी ओर सर्वोच्च न्यायपालिका पर उंगली उठाना और राष्ट्रगीत को ‘धर्म बनाम पहचान’ की बहस में खड़ा करना एक बड़ा संदेश देता है। संदेश साफ है कि मदनी अपने बयान के जरिए केवल व्यवस्था को लेकर नाराजगी नहीं जता रहे बल्कि मुस्लिम समाज में गुस्सा और असुरक्षा की भावना को उकसाने का भी प्रयास कर रहे हैं।

जमीअत के पोस्ट में लिखा है, “हमारे बुजुर्गों ने जेलों को आबाद किया, फांसी के फंदों को चूमा और कौम के लिए अपनी जानें कुर्बान कीं। अगर उन्होंने जुल्म के सामने सर नहीं झुकाया, तो हम कैसे उस तसल्सुल को छोड़ दें? डरेंगे नहीं – कभी नहीं। चाहे हालात जैसे भी हों, मुकाबला करेंगे – इंशाअल्लाह।”

संसद में ओवैसी से लेकर इकरा तक का रवैया

संसद के अंदर एआईएमआईएम नेता ओवैसी ने मुसलमान के वंदे मातरम नहीं गाने की वजह बताई कि हम अपनी माँ की इबादत नहीं करते, कुरान की इबादत नहीं करते और इस्लाम में अल्लाह के सिवा किसी की इबादत नहीं करते, तो वंदे मातरम् भी नहीं कह सकते। लेकिन राष्ट्र और धर्म को अलग रखने की संविधान की आत्मा को ये नेता भूल गए। राष्ट्र सर्वोपरि है और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करना हर भारतीय का धर्म है। वंदे मातरम् न सिर्फ एक गान है बल्कि आजादी की अलख जगाने में इसकी अहम भूमिका रही। ऐसे में इसके टुकड़े कर कॉन्ग्रेस ने तो इसका अपमान किया ही है, ओवैसी जैसे नेता इसको हवा दे रहे हैं। धर्म की आड़ में राष्ट्रीय गीत का अपमान कर रहे हैं।

संसद में जेकेएनसी सांसद आगहा सैयद रुहुल्लाह ने सरकार पर ‘मुस्लिम पहचान’ को कंट्रोल करने का आरोप लगाया। इस दौरान सरकार के अवैध तरीके से बनाए गये इमारतों को तोड़ने पर भी सवाल खड़े करते हुए इसे राजनीतिक रणनीति कहा।

‘मुस्लिम पहचान’ की बात करने वाले नेता ये भूल जाते हैं कि पहले देश की पहचान जरूरी है। कोई भी देश अपनी पहचान को भूला कर विकसित नहीं कहला सकता। अपनी पहचान बचाने के लिए इजरायल जैसे देश आसपास के मुस्लिम देशों के साथ सालों से संघर्ष कर रहा है। ये देश की पहचान ही है, जिसकी वजह से वह बचा भी हुआ है।

कैराना की एसपी सांसद इकरा हसन ने वंदे मातरम् का मतलब समझाते हुए कहा कि ‘हम मुसलमान भारतीय हैं, चांस से नहीं बल्कि चॉइस से हैं।’ इकरा जी देश का विभाजन विशुद्ध धर्म के आधार पर हुआ था। मुस्लिम लीग के बैनर तले सिर्फ जिन्ना ही नहीं थे जिन्होंने अलग मुस्लिम राष्ट्र की माँग की थी। उनके हजारों मुस्लिम समर्थकों ने भी अलग देश की माँग का समर्थन किया था।

धर्म के आधार पर देश के बाँटे जाने के बाद अगर भारत में रहकर मुस्लिम पहचान को राष्ट्र से ऊपर रखा जाता है, तो ये भारत में मौजूद उन सभी लोगों का अपमान है, जिन्होंने बंटवारे का दंश झेला। सालों तक सिर्फ धर्म के नाम पर हुए बंटवारे की वजह से अपना घर-बार छोड़ कर भारत आने पर विवश हुए। हजारों जानें गईं और लाखों लोग बेघर हुए। आखिर इस बंटवारे की वजह धर्म नहीं था तो क्या था, ये बता दें इकरा हसन?

जहाँ तक बुलडोजर के इस्तेमाल की बात है, तो ये अवैध तरीके से बनाए गए इमारतों पर चली है। चाहे वह मस्जिद, मजार हो या मंदिर। कई जगहों पर अवैध रूप से बने मंदिर भी तोड़े गए हैं। देश की धर्मनिरपेक्षता मुस्लिम तुष्टिकरण में नहीं, बल्कि सबको एक बराबर दर्जा देने में है। ये नहीं हो सकता कि ईद पर इफ्तार पार्टी का आयोजन राष्ट्रपति भवन में किया जाए, लेकिन हिन्दू त्यौहारों पर कुछ न हो।

बारामूला के सांसद इंजीनियर रशीद ने वंदे मातरम पर चर्चा के दौरान कहा कि देश ने कभी हमें अपना नहीं माना। कश्मीर को धारा 370 हटा कर देश की मुख्य धारा में शामिल करने की कवायद जो पीएम मोदी ने की। वह अपना मानने के लिए किया गया। सांसद रशीद ने कहा कि 5 अगस्त को उनकी मातृभूमि छीन ली गई। मातृभूमि पूरा देश होता है और जम्मू कश्मीर को देश के अन्य राज्यों की तरह व्यवहार करना, मातृभूमि छीनना नहीं है।

वंदे मातरम् को विभाजत कर देश का किया बंटवारा

पीएम मोदी ने संसद में कहा कि ‘1937 में वंदे मातरम’ को तोड़ दिया गया था। उसके टुकडे किए गए थे। वंदे मातरम के इस विभाजन ने देश के विभाजन के बीज भी बो दिए थे। राष्ट्र-निर्माण के इस महामंत्र के साथ यह अन्याय क्यों हुआ? यह आज की पीढ़ी को जानना जरूरी है, क्योंकि वही विभाजनकारी सोच आज भी देश के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।”

अब सवाल ये उठता है कि कॉन्ग्रेस ने ऐसा क्यों किया। दरअसल मुस्लिम तुष्टिकरण की वजह से वंदे मातरम् के चार अंतरे हटाए थे। जवाहरलाल नेहरू के कहने पर इसे हटाया गया था। जिस वंदे मातरम ने पूरे राष्ट्र को प्रकाशित किया, उसके हिस्से को काटकर ‘पूरी आत्मा’ निकाल दी गई थी।

मुस्लिम सोच पर संविधान निर्माता आंबेडकर ने किया था वार

संविधान निर्माता बीआर आंबेडकर ने इस्लाम को लेकर क्या कहा था, ये जानना जरूरी है। आंबेडकर ने इस बात से नाराजगी जताई थी कि लोग हिन्दू धर्म को विभाजन करने वाला मानते हैं और इस्लाम को एक साथ बाँध कर रखने वाला। आंबेडकर के अनुसार, यह एक अर्ध-सत्य है। उन्होंने कहा था कि इस्लाम जैसे बाँधता है, वह लोगों को उतनी ही कठोरता से विभाजित भी करता है। आंबेडकर मानते थे कि इस्लाम मुस्लिमों और अन्य धर्म के लोगों बीच के अंतर को वास्तविक मानता है और अलग तरीके से प्रदर्शित करता है।

इस्लाम में अक्सर भाईचारे की बात की जाती है। अमन-चैन और सभी कौमों के एक साथ रहने की बात की जाती है। इस बारे में बाबासाहब ने कहा था कि इस्लाम जिस भाईचारे को बढ़ावा देता है, वह एक वैश्विक या सार्वभौमिक भाईचारा नहीं है। बाबासाहब के इस कथन से झलकता है कि वह इस्लाम में ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ जैसी किसी भी धारणा होने की बात को सिरे से खारिज कर देते हैं।

बाबासाहब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने जो बातें कही हैं, वो सोचने लायक है और आज भी प्रासंगिक है। बाबासाहब ने कहा था कि इस्लाम कभी भी किसी भी अपने अनुयायी को यह स्वीकार नहीं करने देगा कि भारत उसकी मातृभमि है। बाबासाहब के अनुसार, इस्लाम कभी भी अपने अनुयायियों को यह स्वीकार नहीं करने देगा कि हिन्दू उनके स्वजन हैं, उनके साथी हैं। पाकिस्तान और विभाजन पर अपनी राय रखते हुए बाबासाहब ने ये बातें कही थीं। आंबेडकर की इन बातों पर आज ख़ुद को उनका अनुयायी मानने वाले भी चर्चा नहीं करते, क्योंकि ये उनके राजनीतिक हितों को साधने का काम नहीं करेगा।

बाबा साहेब आंबेडकर कहते थे कि कोई भी मुस्लिम उसी क्षेत्र को अपना देश मानेगा, जहाँ इस्लाम का राज चलता हो। इस्लाम में जातिवाद और दासता की बात करते हुए उन्होंने कहा कि सभी लोगों का मानना था कि ये चीजें गलत हैं और कानूनन दासता को गलत माना गया, लेकिन जब ये कुरीति अस्तित्व में थीं, तब इसे सबसे ज्यादा समर्थन इस्लामिक मुल्कों से ही मिला।

उन्होंने माना था कि दास प्रथा भले ही चली गई हो लेकिन मुस्लिमों में जातिवाद अभी भी है। आंबेडकर का ये बयान उन लोगों को काफी नागवार गुजर सकता है, जो कहते हैं कि हिन्दू समाज में कुरीतियाँ हैं, जबकि मुस्लिम समाज इन सबसे अलग है। आंबेडकर का साफ़-साफ़ मानना था कि जितनी भी सामाजिक कुरीतियाँ हिन्दू धर्म में हैं, मुस्लिम उनसे अछूते नहीं हैं। ये चीजें उनमें भी हैं।

बाबासाहब आंबेडकर आगे कहते हैं कि हिन्दू समाज में जितनी कुरीतियाँ हैं, वो सभी मुस्लिमों में हैं ही, साथ ही कुछ ज्यादा भी हैं। मुस्लिम महिलाओं के ‘पर्दा’ प्रथा पर को लेकर पूछा था कि ये अनिवार्य क्यों है? दरअसल उनका इशारा बुर्का और हिजाब को लेकर था। इन चीजों की आज भी जब बात होती है तो घूँघट को कुरीति बताने वाले लोग चुप हो जाते हैं। आंबेडकर में इतनी हिम्मत थी कि वो खुलेआम ऐसी चीजों को ललकार सकें। उनका मानना था कि दलितों को धर्मांतरण कर के मुस्लिम मजहब नहीं अपनाना चाहिए, क्योंकि इससे मुस्लिम प्रभुत्व का खतरा पैदा हो जाएगा।

स्वामी विवेकानंद के राष्ट्रप्रेम से सीखिए

राष्ट्रप्रेम पर स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि संन्यासी को भी अपने देश से प्रेम होना चाहिए। उन्होंने कहा था कि “जो व्यक्ति अपनी ही माँ को प्रेम तथा सेवा नहीं दे सकता, वह भला दूसरे की माँ को सहानुभूति कैसे दे सकेगा ?” अर्थात पहले देशभक्ति और उसके बाद विश्वप्रेम!

स्वामी विवेकानंद के भारत प्रेम को लेकर उनकी सहयोगी अमेरिकी महिला जोसेफिन मैक्लाउड ने कहा है कि जब उनसे उन्होंने पूछा कि कि मैं आपकी सहायता कैसे कर सकती हूँ, तो उन्होंने कहा था कि भारत से प्रेम करो। उनका भारत-प्रेम इतना गहन था कि आखिरकार वे भारत की साकार प्रतिमूर्ति ही बन गए थे।

उनकी राष्ट्रप्रेम पर उनकी रिश्तेदार निवेदिता कहती हैं कि भारत ही स्वामी जी का महानतम भाव था। भारत ही उनके हृदय में धड़कता था, भारत ही उनकी धमनियों में प्रवाहित होता था, भारत ही उनका दिवा-स्वप्न था और भारत ही उनकी सनक थी। इतना ही नहीं वे स्वयं ही भारत बन गए थे। वे भारत की सजीव प्रतिमूर्ति थे। वे स्वयं ही – साक्षात भारत, उसकी आध्यात्मिकता, उसकी पवित्रता, उसकी मेधा, उसकी शक्ति, उसकी अन्तर्दृष्टि तथा उसकी नियति के प्रतीक बन गए थे।”

राष्ट्र के प्रति उनका ये गहरा प्रेम उस वक्त भी उतना ही प्रासांगिक था और आज भी उनका ही प्रासांगिक है। राष्ट्र की भक्ति सभी धर्मों से ऊपर है। देश के लिए सर्वस्व बलिदान करने वाले आजादी के मतवाले हों या देश की सीमा पर खड़ा जवान, दोनों के दिलों में देशभक्ति की ज्वाला ही धधकती है, जो अपना सर्वस्व देश पर न्यौछावर कर देते हैं।

गाँधी जी ने कहा था शुद्धतम आत्मा से निकला हुआ गान

‘वन्दे मातरम्’ को महात्मा गाँधी ने ‘शुद्धतम आत्मा से निकला हुआ गान’ कहा था। ऐसे में उसी गीत को कॉन्ग्रेस ने दो हिस्सों में बाँट दिया। वंदे मातरम् ने एक ऐसे राष्ट्र को जागरूक किया जो अपनी दिव्य शक्ति को भुला चुका था। राष्ट्र की आत्मा को जागरूक करने का काम वंदे मातरम् ने किया था इसलिए महर्षि अरविंद ने कहा वंदे मातरम् भारत के पुनर्जन्म का मंत्र है।

वंदे मातरम् के गान ने देश की युवाशक्ति को राष्ट्र सर्वोपरि है, इसकी प्रेरणा देती है। इसके महत्व को जेन जी को समझाना जरूरी है, जो राष्ट्र के पुनर्निर्माण का आधार बनेगा। न कि वंदे मातरम के 100 साल पूरा होने पर आपातकाल लगा कर और वंदे मातरम बोलने वालों को जेल भेज कर राष्ट्र का उद्धार होगा।

बांग्लादेशी घुसपैठियों से असम को बचाने में 850+ बलिदान, 22 साल के खरगेश्वर पहले बलिदानी: 40000+ फर्जी वोटों के लिए कॉन्ग्रेस सरकार ने मारी थी गोली

असम 10 दिसंबर को ‘बलिदान/शहीद दिवस’ (Swahid Divas) के तौर पर याद करता है। साल 1979 में इसी तारीख को अपनी मिट्टी के लिए असम के 22 साल के खरगेश्वर तालुकदार बलिदान हुए थे। वे उन 850+ लोगों में पहले बलिदानी थे, जिन्होंने बांग्लादेशी घुसपैठियों से अपनी जमीन की रक्षा करते हुए प्राण गवाए थे। उनपर बेरहमी से हमला कर हत्या कर दी गई और उनके शरीर को सड़क किनारे एक खाई में फेंक दिया गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने असम के 46वें ‘शहीद दिवस’ पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट किया। पोस्ट में प्रधानमंत्री ने लिखा, “आज शहीद दिवस पर हम असम आंदोलन में शामिल सभी लोगों के पराक्रम को याद करते हैं। यह आंदोलन हमारे इतिहास में हमेशा एक प्रमुख स्थान रखेगा। हम असम आंदोलन में भाग लेने वालों के सपनों को साकार करने, विशेष रूप से असम की संस्कृति को मजबूत करने और राज्य के संपूर्ण विकास के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हैं।”

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने भी खरगेश्वर तालुकदार और उन 850 बलिदानी को याद करते हुए स्वाहिद स्मारक का उद्घाटन किया और उन्हें श्रद्धांजलि दी। सीएम ने कहा कि मातृभूमि के प्रति उनका प्रेम हमेशा हमारे लिए प्रेरणा रहेगा क्योंकि आज हम उनके सर्वोच्च बलिदान को याद करते हैं। आइए इस 46वें शहीद दिवस पर जानते हैं कि कैसे असम के लोगों ने अपनी पहचान के लिए क्रांति की। कैसे खरगेश्वर तालुकदार का बलिदान पूरे असमवासियों की मशाल की लौ बनकर साबित हुआ।

असम में क्रांति की शुरुआत

साल 1970 और 1980 के दशक में, जब असम में 1950 से हो रहे बांग्लादेशियों के घुसपैठ के चलते विद्रोह की ज्वाला उठने लगी। असमवासियों को अपनी पहचान, अपनी भाषा, अपनी जमीन और संस्कृति खोने का डर था। इसी विद्रोह में खरगेश्वर तालुकदार नाम के एक 22 साल के ऑल असम छात्र संघ (AASU) के छात्र नेता को बेरहमी से मार दिया गया। AASU ही असम आंदोलन का नेतृत्व कर रहा था।

खरगेश्वर तालुकदार की हत्या से असम में क्रांति शुरू हो गई। तब यह सिर्फ हत्या नहीं थी बल्कि एक चेतावनी के रूप में ली गई। इस घटना ने नाराज असमवासियों में प्रतिशोध की ज्वाला जगा दी। उस दिन से असम में असंतोष खुलकर सामने आने लगा। AASU और ऑल असम गना संग्राम परिषद (AAGSP) के नेतृत्व में शुरू हुए संघर्ष को हर वर्ग लोगों का समर्थन मिलने लगा। छात्र-संघ, किसान, बौद्धिक वर्ग और आम लोगों ने मिलकर आवाज उठाई।

असम की तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने इसे अंजाम दिया था। बीजेपी का आरोप है कि ऐसा 40000+ बांग्लादेशी वोटरों के चक्कर में किया गया था।

असम आंदोलन का नतीजा

खरगेश्वर तालुकदार की हत्या ने पूरे असम को झकझोर कर रख दिया। अब यह केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं रहा बल्कि व्यक्तिगत और भावनात्मक संघर्ष बन चुका था। बांग्लादेशी घुसपैठ की चिंता से शुरू हुआ ये संघर्ष अब एक आंदोलन में बदल चुका था।

आंदोलन अब अपनी आवाज ऊँची कर चुका था। इतनी ऊँची कि असम की तत्कालीन मुख्यमंत्री गोलाप बोरबोरा के नेतृत्व वाली हजारिका सरकार बढ़ती अशांति को नियंत्रित करने में असमर्थ रही। असमवासियों का सरकार पर से विश्वास उठ गया था। लोगों का कहना था कि तत्कालीन सरकार बांग्लादेशी घुसपैठ को नजरअंदाज कर कर रही है।

उधर, असम में बढ़ती अशांति को देखते हुए केंद्र सरकार को भी हस्तक्षेप करना पड़ा। सरकार ने सख्त कदम उठाते हुए 12 दिसंबर 1979 को असम में राष्ट्रपति शासन लागू किया। यह असम के राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव था।

विधानसभा चुनाव बहिष्कार और नेल्ली नरसंहार

असम की विरासत को बचाने के लिए चल रहे बांग्लादेशी घुसपैठ के खिलाफ आंदोलन के बीच 1983 में केंद्र सरकार ने विधानसभा चुनाव करवाने का फैसला किया, लेकिन आंदोलनकारियों का कहना था कि नागरिकता का मुद्दा हल हुए बिना चुनाव कराना असम की असली जनसंख्या के साथ अन्याय है। नतीजा यह हुआ कि पूरे प्रदेश में चुनावों का अभूतपूर्व बहिष्कार हुआ।

फिर फरवरी 1983 में नेल्ली नरसंहार हुआ, जो जो प्रदेश के इतिहास में काले पन्नों में दर्ज किया गया। त्रिभुवन प्रसाद तिवारी कमीशन की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदेश में इस दौरान 8019 हिंसक घटनाएँ हुई। 248292 लाख लोगों को राहत शिविरों में रहना पड़ा, जबकि 225951 लोग बेघर हुए। करीब 22 रेलवे की संपत्तियों का नुकसान हुआ और 85 रेलवे ट्रैक प्रभावित हुए। 22436 प्राइवेट घरों को आग के हवाले कर दिया गया।

पर इन कठिन दौरों के बीच भी असम के युवाओं और नागरिकों का हौसला नहीं टूटा। इन सबके बीच भी खागेश्वर तालुकदार की छवि हर पल उभरती रही, जो असम के अस्तित्व के लिए किए जा रहे बलिदानों की निरंतर याद दिलाती रही। उनकी मृत्यु इस आंदोलन का प्रतीक बन गई थी और सड़कों पर उतरने वाला हर प्रदर्शनकारी उनकी स्मृति में ही प्रदर्शन कर रहा था।

केंद्र सरकार के साथ ‘असम समझौता’

आखिरकार 15 अगस्त 1985 का वो दिन आया, देश के स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर असम के लिए भी एक नए चैप्टर की शुरुआत हुई। लंबे संघर्ष के बाद तत्कालीन केंद्र सरकार, AASU और AAGSP के बीच ऐतिहासिक ‘असम समझौते’ (Assam Accord) पर बात बनी।

इस समझौते ने पहली बार स्पष्ट रूप से यह तय किया कि असम में किसे ‘विदेशी’ माना जाएगा और किसे नहीं। इसमें कहा गया कि 01 जनवरी 1966 से पहले जो लोग असम आए, वे नागरिक माने जाएँगे। 1966 से 24 मार्च 1971 के बीच आने वालों को अस्थायी तौर पर नागरिक अधिकारों से 10 साल के लिए वंचित रखा जाएगा, लेकिन वे प्रदेश में रह सकेंगे।

और 24 मार्च 1971 के बाद जो लोग आए, उनकी पहचान की जाएगी और अगर वे अवैध पाए जाते हैं तो उन्हें देश छोड़ना होगा। साथ ही केंद्र सरकार ने यह भी भरोसा दिलाया कि असम की सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषा की पहचान की रक्षा के लिए विशेष कदम उठाए जाएँगे। समझौते को असम आंदोलन की जीत माना गया।

असम के शहीद दिवस का महत्व और अधूरे वादे

असम में मनाया जाने वाला ‘शहीद दिवस’ सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि उन हजारों लोगों की याद है, जिन्होंने असम की पहचान, संस्कृति और भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। आज के समय में जब बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा तूल पकड़ रहा है, ऐसे में असम आंदोलन को याद किया जाना चाहिए।

इस आंदोलन के दौरान किए गए कई वादे अभी भी पूरे नहीं हो पाए हैं। बांग्लादेशी घुसपैठ, असम की पहचान और नागरिकता से जुड़े मुद्दों पर अब भी बहस जारी है। ‘असम समझौते’ में तय किए गए प्रावधान आज भी पूरी तरह लागू नहीं हुए हैं। इसलिए ‘शहीद दिवस’ केवल अतीत की याद नहीं, बल्कि एक चेतावनी भी है कि हमें असम की संस्कृति, भाषा और सामाजिक संरचना की रक्षा के लिए सतर्क रहना होगा। यह चेतावनी है कि असम की पहचान कोई साधारण बात नहीं, बल्कि वह विरासत है जिसे बचाने के लिए कई लोगों ने अपना जीवन समर्पित कर दिया।

ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया हुआ बैन, इंस्टा-FB-टिकटॉक जैसे कई प्लैटफॉर्म शामिल: जानें कैसे बच्चों के लॉग-इन पर लगेगी रोक और उन्होंने इसका क्या निकाला तोड़

ऑस्ट्रेलिया में 10 दिसंबर 2025 से 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया का पूरा बैन लागू हो गया है। इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब, टिकटॉक, स्नैपचैट, थ्रेड्स, एक्स, रेडिट, ट्विच और किक जैसे बड़े प्लेटफॉर्म अब बच्चों को अपनी सेवाएँ नहीं दे पाएँगे।

सरकार का कहना है कि यह फैसला बच्चों को हानिकारक कंटेंट, ऑनलाइन फ्रॉड, साइबरबुलिंग और लत लगाने वाले एल्गोरिद्म से बचाने के लिए लिया गया है। कंपनियाँ अगर इन बच्चों को ब्लॉक करने में नाकाम रहीं, तो उन पर 49.5 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक का भारी जुर्माना लगेगा।

यह बैन आखिर है क्या और क्यों लगाया गया?

ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला देश बन गया है जिसने इतना बड़ा कदम उठाया है। सरकार का दावा है कि सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म बच्चों को देर रात तक स्क्रीन से चिपकाए रखते हैं, जिससे उनका मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा था। कई ऑस्ट्रेलियाई माता-पिता लंबे समय से इसकी शिकायत कर रहे थे कि बच्चे पढ़ाई से दूर हो रहे हैं और कई बार ऑनलाइन बुलिंग या अजीबोगरीब कंटेंट के कारण तनाव झेलते हैं।

प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज ने इसे ‘ऑस्ट्रेलियाई बच्चों के बचपन को सुरक्षित करने’ का फैसला बताया। उन्होंने कहा कि अगर बच्चे फोन से हटकर खेलेंगे, पढ़ेंगे और दोस्तों से आमने-सामने मिलेंगे, तो समाज पर इसका अच्छा असर पड़ेगा। हालाँकि, आलोचकों का कहना है कि सोशल मीडिया को पूरी तरह काटने से कई कमजोर या अलग-थलग रहने वाले बच्चे और भी अकेले हो सकते हैं।

कौन-कौन से प्लेटफॉर्म बैन किए गए?

बैन की लिस्ट काफी लंबी है और इसमें लगभग सभी बड़े प्लेटफॉर्म शामिल हैं। इंस्टाग्राम, फेसबुक, टिकटॉक, यूट्यूब, थ्रेड्स, एक्स (पहले ट्विटर), स्नैपचैट, किक, रेडिट और ट्विच। इन कंपनियों को आधी रात से आदेश दिया गया कि 16 साल से नीचे के बच्चों की पहुँच पूरी तरह बंद कर दें। इस मामले में कई कंपनियों ने तुरंत कदम उठाए।

टिकटॉक ने कहा कि 10 दिसंबर 2025 से 16 साल से कम उम्र के सभी अकाउंट डी-एक्टिवेट कर दिए जाएँगे। इसके अलावा, एक्स ने भी घोषणा की कि वह 100% कानून का पालन करेगा। सरकार का संदेश साफ है कि अगर बच्चे दिखें, तो कंपनियाँ जवाब देंगी। बच्चे या माता-पिता पर कोई सजा नहीं होगी।

और कौन-कौन से प्लेटफॉर्म बैन में शामिल नहीं हैं?

कुछ ऐप्स को फिलहाल बैन की लिस्ट में नहीं जोड़ा गया है। इन प्लेटफॉर्म पर बच्चे अभी भी जा सकते हैं। इनमें डिस्कॉर्ड, गूगल क्लासरूम, मैसेंजर, व्हाट्सऐप, रोब्लॉक्स, स्टीम, यूट्यूब किड्स, गिटहब और लेगो प्ले शामिल हैं।

लोगों को सबसे ज्यादा हैरानी रोब्लॉक्स को बाहर रखने पर हुई है, क्योंकि यह बच्चों में बहुत लोकप्रिय है। हालाँकि, सरकार ने साफ किया है कि लिस्ट फाइनल नहीं है। आने वाले दिनों में यह बदल सकती है।

यह नया सिस्टम कैसे काम करेगा?

यह बैन तभी काम करेगा जब सोशल मीडिया कंपनियाँ बच्चों की असली उम्र पहचान सकें। इसी वजह से ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने हर प्लेटफॉर्म को कई लेयर वाला सिस्टम बनाने का आदेश दिया है, जो अलग-अलग तरह के संकेतों से उम्र का अंदाजा लगा सके। सबसे पहले, कंपनियाँ एक नए ‘एज-सिग्नल सिस्टम’ का इस्तेमाल कर रही हैं। इसमें बच्चे की उम्र का पता कई तरह के संकेतों से लगाया जाएगा।

जैसे- अकाउंट बनाते समय दर्ज की गई उम्र, प्रोफाइल फोटो देखकर चेहरे की उम्र का अनुमान, बच्चा कौन-सा कंटेंट देखता है, स्कूल के समय में उसकी ऑनलाइन गतिविधि कम होती है या ज्यादा, उसके दोस्तों के बर्थडे पोस्ट और उसका ईमेल पहले किन कामों में इस्तेमाल हुआ है। पहले ये संकेत कंपनियाँ सिर्फ विज्ञापन दिखाने के लिए इस्तेमाल करती थीं, लेकिन अब इन्हीं से यह तय किया जाएगा कि कोई बच्चा 16 साल से कम का है या नहीं।

क्या बच्चों से सरकारी आईडी भी माँगी जाएगी?

सरकार ने पहले ही साफ कर दिया है कि किसी भी यूजर चाहे बच्चा हो या बड़ा से पासपोर्ट या सरकारी आईडी नहीं माँगी जाएगी। यह फैसला इसलिए लिया गया, क्योंकि लोग अपनी प्राइवेसी को लेकर डर सकते हैं। साथ ही यह भी आसानी से हो सकता है कि कोई बच्चा किसी बड़े की आईडी इस्तेमाल करके सिस्टम को धोखा दे दे।

इसी वजह से सोशल मीडिया कंपनियाँ अब थर्ड-पार्टी एजेंसियों की मदद ले रही हैं। ये एजेंसियाँ उम्र की जाँच करती हैं, लेकिन यूजर का डेटा अपने पास नहीं रखतीं। स्नैपचैट उम्र पहचानने के लिए ‘k-ID’ नाम की सर्विस का इस्तेमाल कर रहा है। मेटा यानी फेसबुक और इंस्टाग्राम Yoti की तकनीक से उम्र की पुष्टि करेगा।

टिकटॉक भी Yoti की ही मदद ले रहा है। ये सर्विसेज सिर्फ इतना बताती हैं कि कोई यूजर 16 साल से ऊपर है या नहीं। यानी प्लेटफॉर्म को सिर्फ ‘हाँ, ये 16+ है’ या ‘नहीं’ जैसा नतीजा मिलता है, इससे ज्यादा कुछ नहीं। इससे यूजर की प्राइवेसी भी सुरक्षित रहती है और कंपनियाँ उम्र की जाँच भी कर पाती हैं।

सेल्फी से उम्र पहचानने वाली टेक्नोलॉजी

यह तरीका सबसे ज्यादा चर्चा में है। अब किसी भी प्लेटफॉर्म पर बच्चे को अपना चेहरा कैमरे के सामने दिखाना होगा। इसके बाद एल्गोरिद्म चेहरे की बनावट और पैटर्न देखकर अंदाजा लगाएगा कि बच्चा 16 साल से ऊपर है या नहीं। Yoti कंपनी का कहना है कि यह प्रक्रिया सिर्फ एक मिनट में हो सकती है। यानी, बहुत जल्दी यह पता चल जाएगा कि यूजर की उम्र ठीक है या नहीं

लेकिन इसमें कुछ चुनौतियाँ भी हैं। कई बच्चे ठीक 16 साल के आसपास होते हैं, ऐसे में सिस्टम कभी-कभी गलत अनुमान लगा सकता है। इसके अलावा बच्चे कभी-कभी तस्वीरें या वीडियो का इस्तेमाल करके सिस्टम को धोखा देने की कोशिश भी कर सकते हैं।

पुराने अकाउंट्स का क्या होगा?

कंपनियों ने पुराने अकाउंट्स की जाँच पहले ही शुरू कर दी है। इसका मतलब है कि अब सिर्फ नए अकाउंट्स ही नहीं, बल्कि पहले से बने अकाउंट्स पर भी ध्यान दिया जा रहा है। कंपनियाँ यह देखने की कोशिश कर रही हैं कि कौन से यूजर 16 साल से कम उम्र के हैं और उन्हें प्लेटफ़ॉर्म से हटाना जरूरी है।

टिकटॉक और इंस्टाग्राम जैसे बड़े प्लेटफॉर्म पहले ही हजारों अकाउंट्स को हटा चुके हैं। कई बच्चों के अकाउंट अचानक बंद हो रहे हैं। जब अकाउंट बंद होता है, तो बच्चे को स्क्रीन पर एक मैसेज दिखाई देता है, जैसे ‘आपकी उम्र 16 से कम होने की आशंका है।’ यह मैसेज उन्हें बताता है कि उनका अकाउंट इसलिए सस्पेंड किया गया क्योंकि सिस्टम ने उनकी उम्र पर शक किया है।

इस प्रक्रिया का मतलब यह भी है कि अगर किसी बच्चे ने अकाउंट बनाते समय अपनी उम्र गलत दर्ज की थी, तो अब उसके पकड़े जाने की संभावना बढ़ गई है। पुराने अकाउंट्स पर यह कदम इसलिए जरूरी है ताकि कानून का सही तरीके से पालन हो और कोई भी 16 साल से कम उम्र का बच्चा सोशल मीडिया का इस्तेमाल न कर पाए। इससे कंपनियों को यह भी सुनिश्चित करना है कि प्लेटफ़ॉर्म पर मौजूद सभी यूज़र्स कानून के मुताबिक उम्र के मानदंड पर खरे उतरें।

बच्चों ने बैन से बचने का क्या रास्ता निकाला है?

बैन लागू होने के कुछ ही घंटों बाद बच्चों ने इससे बचने के तरीके ढूँढने शुरू कर दिए। उन्हें पता है कि अब सोशल मीडिया इस्तेमाल करना मुश्किल होगा, इसलिए वे अलग-अलग ट्रिक अपनाकर सिस्टम को धोखा देने की कोशिश कर रहे हैं।

सबसे आम तरीका यह है कि बच्चे अपने बड़े भाई-बहनों या माता-पिता की आईडी का इस्तेमाल कर रहे हैं। भले ही सरकार आईडी माँगने की अनुमति नहीं देती, लेकिन कई प्लेटफॉर्म ‘वेरिफिकेशन’ का विकल्प देते हैं। ऐसे में बच्चे अपने पेरेंट्स की आईडी या डॉक्यूमेंट से अकाउंट का बैकअप तैयार कर रहे हैं ताकि उनका अकाउंट बंद न हो।

कई बच्चे VPN भी डाउनलोड कर रहे हैं। VPN इस्तेमाल करने पर सिस्टम को लगता है कि बच्चा ऑस्ट्रेलिया की बजाय किसी दूसरे देश में है, जहाँ यह नियम लागू नहीं है। इस वजह से कुछ बच्चे बिना रोक-टोक अपने अकाउंट चला पा रहे हैं।

इसके अलावा बच्चे उन ऐप्स पर जा रहे हैं, जो बैन की लिस्ट में शामिल नहीं हैं। डिस्कॉर्ड, रोब्लॉक्स, व्हाट्सऐप और स्टीम जैसे ऐप्स पर बच्चों की संख्या अचानक बढ़ गई है। कुछ बच्चे तो कह रहे हैं कि वे पूरी तरह इन ऐप्स पर शिफ्ट हो जाएँगे।

कुछ बच्चे अपना नाम, असली फोटो और असली ईमेल दिए बिना ‘अनाम अकाउंट’ भी बना रहे हैं। इस तरह का अकाउंट पकड़ना मुश्किल होता है, इसलिए बच्चे सोचते हैं कि वे इससे बच जाएँगे। सरकार को पहले से अंदाजा था कि बच्चे ऐसा करने की कोशिश करेंगे। इसी वजह से ई‑सेफ्टी अधिकारियों ने कहा है कि ‘कोई तरीका 100% सुरक्षित नहीं हो सकता, लेकिन कंपनियों को हर संभव प्रयास करना होगा कि बच्चे सोशल मीडिया से दूर रहें।’

इस बैन का असर क्या दिख रहा है?

बच्चों की इस नए बैन पर प्रतिक्रिया काफी मिली-जुली है। कुछ बच्चे बहुत नाराज हैं और उनका कहना है कि अब वे अपने दोस्तों से जुड़ नहीं पाएँगे। सोशल मीडिया उनके लिए दोस्त बनाने और दोस्तों से संपर्क बनाए रखने का मुख्य तरीका था, इसलिए अचानक यह सुविधा छिन जाने से उन्हें बड़ा झटका लगा है।

कुछ बच्चे तो इतना गंभीर रूप से नाराज हैं कि उन्होंने इस फैसले के खिलाफ कोर्ट तक अपना केस दर्ज किया है। उनका तर्क है कि यह नियम उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करता है और उनके सामाजिक जीवन को प्रभावित करता है।

दूसरी ओर, कुछ बच्चे मानते हैं कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल मानसिक रूप से थकान और तनाव बढ़ा देता है। उनके लिए यह बैन शायद अच्छा भी हो सकता है क्योंकि अब वे फोन और स्क्रीन से दूर रहकर अपनी पढ़ाई, खेल और आराम पर ध्यान दे सकते हैं।

ग्रामीण इलाकों में रहने वाले बच्चों को इस बैन से और भी ज्यादा मुश्किल हो रही है। वहाँ वे अक्सर दूर-दराज इलाकों में रहते हैं और सोशल मीडिया ही उनके लिए दोस्तों और बाहरी दुनिया से जुड़ने का एकमात्र माध्यम था। ऐसे बच्चों के लिए यह बदलाव अचानक और चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है।

क्या यह बैन लंबे समय तक चलेगा?

सरकार ने यह साफ नहीं किया है कि यह सोशल मीडिया बैन कब तक रहेगा। इसका मतलब यह है कि फिलहाल बच्चों पर यह प्रतिबंध जारी रहेगा, लेकिन भविष्य में इसे बदलने का फैसला डेटा और शोध के आधार पर किया जा सकता है। अगर शोध से यह पता चलता है कि बैन बच्चों के लिए फायदेमंद नहीं है या नुकसान कर रहा है, तो सरकार अपने नियमों में बदलाव कर सकती है।

इस बैन के असर को समझने के लिए स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता और दुनिया भर के 11 विशेषज्ञ इस पर अध्ययन करेंगे। वे बच्चों की जीवनशैली और व्यवहार पर बैन के प्रभाव को अलग-अलग तरीके से देखेंगे। शोधकर्ताओं की नजर इस बात पर होगी कि अब बच्चे बेहतर नींद ले पा रहे हैं या नहीं।

साथ ही यह देखा जाएगा कि क्या बच्चों की पढ़ाई में सुधार हुआ है और वे ज्यादा ध्यान से पढ़ाई कर रहे हैं। इसके अलावा यह भी देखा जाएगा कि क्या बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर पड़ा है, जैसे एंटीडिप्रेसेंट दवाओं का इस्तेमाल कम हुआ है या नहीं।

इसके साथ ही यह भी देखा जाएगा कि क्या बच्चे अब बाहर जाकर खेलकूद और अन्य शारीरिक गतिविधियों में शामिल हो रहे हैं। यानी शोध का मकसद यह समझना है कि सोशल मीडिया बैन बच्चों के जीवन और स्वास्थ्य पर किस तरह असर डाल रहा है और क्या इससे उनका बचपन और ज्यादा सुरक्षित और सक्रिय बन रहा है।

क्या यह मॉडल दुनिया अपनाएगी?

दुनिया भर के देश अब ऑस्ट्रेलिया की ओर ध्यान लगाए हुए हैं। लोग देख रहे हैं कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर बैन का यह मॉडल कितना सफल होता है। अगर यह मॉडल सच में काम करता है और बच्चों को ऑनलाइन नुकसान से बचाने में मदद करता है, तो कई और देश भविष्य में इसे अपनाने की कोशिश कर सकते हैं।

लेकिन इस नियम की सफलता पूरी तरह तय नहीं है। अगर बच्चे बड़े पैमाने पर बैन को चकमा देने में कामयाब हो जाते हैं, या इस नियम से बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ता है, तो सरकार इसे बदलने या ढीला करने पर विचार कर सकती है।

फिलहाल इतना तय है कि ऑस्ट्रेलिया ने एक नया और अनोखा प्रयोग शुरू किया है। यह प्रयोग न केवल वर्तमान पीढ़ी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की ऑनलाइन जिंदगी के तरीके को बदल सकता है। बच्चों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल, उनकी सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य पर इसके लंबे समय तक असर देखने को मिलेगा।

संसद में खड़े होकर राहुल गाँधी ने विदेशी-लिबरल मीडिया को दिया प्रोपेगेंडा, जानिए SIR और चुनाव आयोग पर कैसे किया गुमराह: क्या है सच

लोकसभा में मंगलवार (09 दिसंबर 2025) को चुनाव सुधारों पर बहस के दौरान विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने बीजेपी पर लोकतंत्र को कमजोर करने का जोरदार आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि वोट चोरी सबसे बड़ा राष्ट्र-विरोधी कृत्य है और चुनाव आयोग (EC) को बीजेपी ने अपने कब्जे में ले लिया है।

संसद में राहुल ने तीन सवाल पूछे, 1-मुख्य न्यायाधीश (CJI) को चुनाव आयुक्त के चयन पैनल से क्यों हटाया गया, 2-दिसंबर 2023 के कानून से चुनाव आयुक्तों को दंड से क्यों बचाया गया और 3- चुनाव के 45 दिन बाद सीसीटीवी फुटेज क्यों नष्ट की जा रही है।

राहुल गाँधी ने एक बार फिर से EVM का रोना रोया और हरियाणा चुनाव में वोट चोरी के सबूत पेश करने का दावा (हालाँकि सारे दावे फर्जी ही निकले हैं) किया।

राहुल गाँधी के पहले सवाल का ये है सही जवाब

खैर, राहुल गाँधी के पहले सवाल को देखें- तो सवाल ये है कि सीजेआई को चुनाव आयुक्त की चयन समिति से क्यों हटाया गया। तो सबसे पहले इस मुद्दे को जान लेते हैं। राहुल ने कहा कि चयन समिति में पीएम, विपक्ष नेता और एक केंद्रीय मंत्री हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट के 2023 के अनूप बरनवाल फैसले में CJI को शामिल किया गया था। लेकिन तथ्य यह है कि कॉन्ग्रेस के शासनकाल में CEC की नियुक्ति पूरी तरह सरकार के हाथ में थी।

साल 1991 के कानून में कोई चयन प्रक्रिया नहीं थी, राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर अपॉइंट करता था। सुप्रीम कोर्ट ने ही अंतरिम व्यवस्था दी थी, जिसे 2023 के कानून से बदला गया। यह ‘हटाना’ कम, SC फैसले को संसदीय कानून से ओवरराइड करना ज्यादा लगता है। हालाँकि यहाँ एक बात ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है कि मोदी सरकार ने ही इस फैसले में नेता प्रतिपक्ष को शामिल किया है, वर्ना अभी तक कभी नेता प्रतिपक्ष की पूछ तक नहीं होती थी।

चुनाव आयुक्तों को राजनीतिक इम्युनिटी देने की बात

दिसंबर 2023 के कानून से चुनाव आयुक्तों को इम्यूनिटी मिली है। राहुल गाँधी ने दावा किया कि यह 2024 चुनाव से ठीक पहले किया गया, ताकि गलत कामों पर कोई कार्रवाई न हो। उनका ये दावा पूरी तरह से फर्जी है, क्योंकि साल 2023 के एक्ट की धारा 16 में साफ है कि CEC/EC को आधिकारिक कर्तव्यों में किए कार्यों के लिए सिविल या क्रिमिनल केस से छूट है। लेकिन यह पूरी तरह बिना जवाबदेही नहीं है।

साल 2023 के कानून के मुताबिक, CEC को भी सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह हटाया जा सकता है। इसके लिए संसदीय कार्यवाही तय की गई है। यहाँ राहुल गाँधी ने ‘रिवेंज’ जैसे भारी भरकम शब्द का इस्तेमाल किया, लेकिन हकीकत ये है कि चुनाव आयुक्तों को स्वतंत्रता दिए बिना उनसे निष्पक्ष काम की उम्मीद कैसे की जा सकती है? हालाँकि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अभी मामला है, तो इस पर बहस की अभी कोई जरूरत नहीं दिखती।

राहुल गाँधी के तीसरे सवाल का जवाब भी पढ़िए

चुनाव के 45 दिन बाद सीसीटीवी फुटेज नष्ट करने के नियम को लेकर राहुल गाँधी ने फिर से मुद्दा बनाने की कोशिश की। राहुल ने कहा कि हर बूथ पर लगे कैमरों का डेटा हमेशा रखा जाना चाहिए, यह निष्पक्ष जाँच को रोकता है।

इस मामले की सच्चाई ये है कि चुनाव आयोग ने मई 2025 में गाइडलाइंस जारी की थी। इसमें 45 दिनों तक फुटेज रखने को कहा गया है। चुनाव आयोग ने कहा कि अगर इन 45 दिनों में कोई विवाद नहीं है, कोई याचिका न आई हो तो इस फुटेज को नष्ट कर दिया जाएगा।

पहले ये समय 1 साल तक का था, लेकिन इस 1 साल में रिकॉर्डिंग के साथ कोई गलत हरकत न हो, इसके लिए चुनाव आयोग ने ये अवधि 45 दिन कर दी है। चुनाव आयोग ने प्राइवेसी का भी हवाला दिया है, क्योंकि वोटरों की तस्वीरें लीक हो सकती हैं।
ऐसे में देखें तो राहुल का ‘डिस्ट्रॉय’ शब्द नाटकीयता भरा है, जबकि 45 दिनों का प्रोसेस एक स्टैंडर्ड प्रैक्टिस है। ये ठीक वैसे ही है, जैसे ईमेल या फोन गैलरी डिलीट करते हैं।

राहुल ने हरियाणा 2024 विधानसभा चुनाव में वोट चोरी के आरोप दोहराए। उन्होंने कहा कि 25 लाख फर्जी वोट डाले गए, जिसमें ब्राजीलियन मॉडल की फोटो 22 वोटर आईडी पर इस्तेमाल हुई- नाम सीमा, स्वीटी, सरस्वती आदि। ये आरोप ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में ही गलत पाई जा चुकी है। और इसे लेकर चुनाव आयोग के पास कोई आधिकारिक शिकायत भी दर्ज नहीं कराई गई, सिवाय पॉलिटिकल माइलेज लेने के लिए की गई प्रेस कॉन्ग्रेस के।

ईवीएम की तरफ घूमी राहुल गाँधी की सुई

अब राहुल गाँधी ने एक बार फिर से ईवीएम को निशाने पर लेने की कोशिश की है। ऐसे में ये जानना दिलचस्प होगा कि ईवीएम का कॉन्सेप्ट कब आया और कब लागू हुआ। पहली बार 1961 और 1971 में न सिर्फ SIR की जरूरत कॉन्ग्रेस के शासनकाल में बताई गई थी, बल्कि ईवीएम भी पहली बार कॉन्ग्रेस ही लेकर आई। वो भी कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान।

वैसे, अभी तक राहुल का फोकस वोटर लिस्ट पर था और अब उस फोकस को बिना अंजाम तक पहुँचाने वो फिर से ईवीएम की तरफ मुड़ते नजर आए। राहुल गाँधी का ये मेकशिफ्ट बताता है कि वो अपने किसी भी दावे को लेकर खुद ही पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हैं।

अपनी पसंद के CEC से लेकर तमाम बड़े पदों पर कॉन्ग्रेस बैठाती रही है ‘अपने’ लोग

कॉन्ग्रेस का अपने लोगों को ‘उपकृत’ करने का इतिहास जवाहरलाल नेहरू के समय से ही रहा है। आजाद भारत की पहली सरकार में ही जब देश के पहले चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन रिटायर हुए तो उन्हें सूडान में अधिकारी बना दिया गया। वीएस रमादेवी के रिटायर होने के बाद कॉन्ग्रेस ने उन्हें हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल बना दिया। अभी तक के सबसे ‘कड़क’ CEC माने गए TN शेषन के साथ तो कॉन्ग्रेस ने ऐसी प्रक्रिया शुरू कर दी, जो उसके इस मुद्दे की जान निकाल देता है।

शेषन जब रिटायर हुए, तो उन्हें बाकायदा कॉन्ग्रेस ने अपना कैंडिडेट बनाया और लोकसभा में चुनाव मैदान में ही उतार दिया। वहीं, शेषन के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त बने मनोहर सिंह गिल (MS Gill) के मामले में तो कॉन्ग्रेस और आगे निकल गई। वो आईएएस अफसर से खेल सचिव बने, फिर उन्हें चुनाव आयुक्त बनाया गया और ईवीएम को पूरे देश में लागू किया गया। वो रिटायर हुए, तो कॉन्ग्रेस ने उन्हें राज्यसभा भेजा और यूपीए-2 में मंत्री भी बना दिया।

खास बात ये है कि यूपीए के दौरान खानदानी कॉन्ग्रेसी नवीन चावला को मुख्य चुनाव आयुक्त बना दिया गया और यूपीए ने सत्ता में वापसी भी की। खास बात ये है कि चावला को पद से हटाना पड़ा था, क्योंकि वो कॉन्ग्रेस को चुनाव आयोग से जुड़ी जानकारियाँ ‘पास’ करते थे। चावला को हटाने के लिए उस समय उनके साथी चुनाव आयुक्तों ने ही कमर कसी थी।

एक खास बात पर ध्यान दिया जाए तो चावला को 1984 के दंगों की जाँच करने वाली एक कमीशन ने ‘किसी भी’ सार्वजनिक पद पर बैठने के लिए अयोग्य बताया था, हालाँकि कोर्ट ने उस समिति की सिफारिशों को खारिज कर दिया था। और बाद में यही चावला कॉन्ग्रेस के लिए चुनाव आयुक्त रहते हुए काम करते पकड़े गए।

कुल मिलाकर राहुल गाँधी का लोकसभा में दिया गया भाषण सिर्फ मीडिया में सुर्खियाँ पाने की कोशिश ही लगती है। फिर, वो बीते काफी समय से लगातार भारत के लोकतंत्र को लेकर दुनिया के अलग-अलग देशों में जाकर प्रोपेगेंडा करते रहे हैं। ऐसे में लोकसभा में दिया गया उनका भाषण भी महज प्रोपेगेंडा ही साबित होकर रह गया, जो विदेशी मीडिया में शायद थोड़ी चर्चा पा जाए।