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कॉन्ग्रेस को ‘ओपन हार्ट सर्जरी’ की जरूरत, खड़गे के नेतृत्व में युवा हुए पार्टी से दूर- 3 साल में मैं खुद राहुल से नहीं मिल पाया: ओडिशा के पूर्व MLA मोहम्मद मोकीम ने सोनिया गाँधी को लिखा पत्र

पूर्व MLA मोहम्मद मोकिम ने सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखकर कॉन्ग्रेस की ‘ओपन हार्ट सर्जरी’ की माँग की है। साथ ही कहा है कि वह 3 साल से कोशिशों के बावजूद राहुल गाँधी से नहीं मिल पाए। उन्होंने खड़गे के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए कहा है कि पार्टी युवाओं से जुड़ नहीं पा रही है।

दरअसल चुनावों में लगातार हो रहे हार से कॉन्ग्रेस के नेता और कार्यकर्ता हताश हैं। नेतृत्व की नाकामियों पर अब खुलकर बोलने के लिए मजबूर हो गए हैं। राहुल गाँधी की जमीनी कार्यकर्ताओं से ‘दूरी’ पर अब कॉन्ग्रेस के नेता सवाल खड़े कर रहे हैं। साथ ही पार्टी का नेतृत्व बुजुर्ग खरगे के हाथों से लेकर युवा हाथों में देने की माँग कर रहे हैं।

कॉन्ग्रेस को ‘ऑपन हार्ट सर्जरी’ की जरूरत- मोकिम

ओडिशा के पूर्व विधायक मोहम्मद मोकिम ने कहा कि पार्टी को एक ऑपन हार्ट सर्जरी की जरूरत है। हाल ही में पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी को उन्होंने एक तीखा पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने पार्टी के संगठनात्मक पतन, नेतृत्व की नाकामियों और तत्काल सुधारों की आवश्यकता पर बल दिया है।

मोकिम ने चेतावनी दी है कि पार्टी बाहरी विरोधियों की वजह से नहीं, बल्कि पार्टी के अंदर लिए गए फैसलों की वजह से अपनी विरासत खो रही है।

दरअसल कॉन्ग्रेस में खलबली मची हुई है। पार्टी अपने ही जमीनी कार्यकर्ताओं को संतुष्ट करने में नाकाम दिख रही है। पंजाब और कर्नाटक में भूचाल के बाद अब ओडिशा से बवंडर उठने लगा है। बाराबाती कटक के पूर्व एमएलए ने पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी को पत्र लिख कर न सिर्फ राहुल गाँधी की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं, बल्कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को हटाने की माँग भी कर डाली है।

पूर्व एमएलए मोकिम का खत

तीन साल तक राहुल गाँधी से मिलने की कोशिश की- मोकिम

कॉन्ग्रेस नेता मोकिम ने कहा है कि आंतरिक फैसलों से पार्टी को नुकसान पहुँचा है। राहुल गाँधी पर आरोप लगाते हुए कॉन्ग्रेस नेता ने कहा कि अपनी विरासत बाहरी विरोधियों के कारण नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर लिए गए फैसलों के कारण कमजोर हुई है।

उन्होंने पत्र में कहा है कि विधायक होने के बावजूद, वह करीब 3 वर्षों तक राहुल गाँधी से मिलने की कोशिश की, लेकिन नहीं मिल पाए। दरअसल राहुल गाँधी से मिलना उनके ‘पहुँच’ से बाहर था। कॉन्ग्रेस नेता के मुताबिक, राहुल से मिलने में नाकामी ये दिखाता है कि केंद्रीय नेतृत्व और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच कितनी बड़ी खाई है।

मोकिम ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की उम्र पर भी टिप्पणी की और कहा कि पार्टी मौजूदा नेतृत्व में देश के युवाओं से जुड़ने में असमर्थ है। उन्होंने प्रियंका गांधी को नेतृत्व संभालने का ‘जिम्मा’ देने की वकालत की। उन्होंने कहा कि ये स्थिति पहले कभी नहीं रही। पार्टी कार्यकर्ताओं के हौसले टूट रहे हैं इसलिए नई लीडरशिप की जरूरत है। पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पहल कर नई लीडरशिप को आगे लाएँ, ताकि पार्टी में नई जान लाई जा सके।

इस पत्र से ओडिशा कॉन्ग्रेस के भीतर चल रहे आपसी खींचतान, कलह और असंतोष को भी उजागर किया गया है। उनका कहना है कि जब कोई नेता अपने ही विधानसभा में विश्वास मत हासिल नहीं कर पाता है, तो कार्यकर्ताओं का स्वाभाविक रूप से भरोसा कम हो जाता है। उन्होंने दावा किया कि पार्टी कार्यकर्ता भाई-भतीजावाद से परेशान हैं।

पत्र में उन्होंने ओडिशा के अध्यक्ष भक्त चरण दास के खिलाफ हमला बोला है। तीन चुनाव हार चुके भक्तचरण दास को राज्य का नेतृत्व सौंप दिया गया। इतना ही नहीं वे ऐसी विचारधारा से जुड़े थे, जो कॉन्ग्रेस की कभी नहीं रही है।

अध्यक्ष के बेटे ने कोसल राज्य का समर्थन क्यों किया- मोकिम

उन्होंने ओडिशा से अलग कोसल राज्य बनाने की माँग का समर्थन करने पर प्रदेश अध्यक्ष के बेटे विधायक सागर पर भी हमले किए। उन्होंने दावा किया कि इससे पार्टी में अशांति पैदा हुई।

ओडिशा के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में भक्त चरण दास की नियुक्ति फरवरी 2025 में हुई है। उस वक्त प्रदेश अध्यक्ष की रेस में मोकिम भी शामिल थे।

राज्य के लोगों के घटते भरोसे के एक सबूत के तौर पर भक्त चरण दास के संसदीय क्षेत्र का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि नुआपाड़ा विधानसभा सीट पर फरवरी में उपचुनाव हुआ था, जिसमें कॉन्ग्रेस की शर्मनाक हार हुई। कॉन्ग्रेस यहाँ 83000 मतों से हारी। ये दिखाता है कि प्रदेश अध्यक्ष के गढ़ में भी जनता उन्हें पसंद नहीं करती है।

पार्टी का किसी मुद्दे पर स्टेंड साफ नहीं है। इससे हजारों जमीनी स्तर के कार्यकर्ता भ्रमित, दिशाहीन और निराश हैं। कई ईमानदार कार्यकर्ता इसकी वजह से पार्टी से किनारा कर चुके हैं।

‘दंड शास्ति प्रजा: सर्वा दंड एवाभिरक्षित…’: बहराइच हिंसा के फैसले में मनुस्मृति का श्लोक पढ़कर लिबरलों में लगी आग, क्या समझ भी आया इसमें छिपा निहितार्थ

उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले की कोर्ट ने 2024 के दुर्गा प्रतिमा विसर्जन जुलूस पर हुए हमले में सजा का ऐलान किया है। 13 अक्टूबर 2025 को राम गोपाल मिश्रा की हत्या के मामले में कोर्ट ने मुख्य दोषी सरफराज उर्फ रिंकू को फाँसी की सजा सुनाई है, जबकि 9 साथियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। कोर्ट ने राम गोपाल की गोली मार कर हत्या करने वाले को फाँसी, सरफराज के अब्बा अब्दुल हमीद और उसके दो भाई फहीम और तालिब उर्फ सबलू के साथ ही सैफ, जावेद, जीशान, ननकाउ, शोएब और मरुफ को भी उम्रकैद की सजा दी।

न्यायालय प्रथम अपर जिला एवँ सत्र न्यायाधीश पवन कुमार शर्मा की अदालत ने यह फैसला सुनाया है। जज पवन कुमार शर्मा ने 142 पन्नों के आदेश में मनुस्मृति के श्लोक का उल्लेख भी किया। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए दोषियों के बारे में कहा कि ऐसे शैतानों के लिए न्याय की समुचित मंशा में दंड दिया जाना चाहिए, जिससे समाज में पनप रहे ऐसे हैवानों के अंदर भय उत्पन्न हो और सामाजिक न्याय व्यवस्था के लिए विश्वास पैदा हो।

कोर्ट ने अपने फैसले में मनुस्मृति के श्लोक- ‘दंड शास्ति प्रजा: सर्वा दंड एवाभिरक्षित। दंड सुप्तेषु जागर्ति, दंड धर्म विदुर्वधा।’ का उद्धरण किया है। इसका अर्थ है – “दंड ही सभी प्रजाओं पर शासन करता है, दंड ही उनकी रक्षा करता है, जब सभी सो रहे होते हैं, तब भी दंड जागता है; इसलिए बुद्धिमान लोग दंड को ही धर्म कहते हैं।”

कोर्ट के फैसले में मनुस्मृति के श्लोक का जिक्र

लोकतंत्र में मनुस्मृति के श्लोक का महत्वपूर्ण अर्थ- फैसले के संदर्भ में

मनुस्मृति के अध्याय 7 में श्लोक-14 का जिक्र बेहद महत्वपूर्ण है। यह श्लोक मूल रूप से कानून के शासन (Rule of Law) और न्यायपालिका की सर्वोच्चता के विचार को प्रतिध्वनित करता है। यह श्लोक प्राचीन है, लेकिन इसका संदेश आज भी महत्वपूर्ण है। इसका सार यह है कि समाज में व्यवस्था बनाए रखने के लिए एक निष्पक्ष और शक्तिशाली न्याय प्रणाली (जिसे यहाँ ‘दंड’ कहा गया है) आवश्यक है।

यहाँ ‘दंड’ से तात्पर्य सिर्फ सजा नहीं, बल्कि एक निष्पक्ष कानून व्यवस्था से है जो समाज को अनुशासित रखती है। लोकतंत्र में इसका मतलब है कि कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है और राज्य का कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे और गलत करने वालों को दंडित करे।

जज ने राम गोपाल की हत्या का जिक्र करते हुए कहा कि यह अपराध इतना भयावह था कि इससे समाज की नींव हिल गई, एक वर्ग की आस्था पर चोट पहुँची और हिंसा की आग भड़क गई। उचित दंड के बिना इसका दोहराव हो सकता है।

अब सवाल उठता है, इस श्लोक का लोकतंत्र में क्या मायने हैं? हमारा लोकतंत्र संविधान पर टिका है, जो समानता, स्वतंत्रता और न्याय का गान गाता है। लेकिन यह श्लोक उसी न्याय की याद दिलाता है। लोकतंत्र में ‘रूल ऑफ लॉ’ (कानून का राज) सबसे ऊपर है- कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी ताकतवर हो, कानून से ऊपर नहीं। दंड का भय ही समाज को विचलन से बचाता है, जैसा कि श्लोक कहता है।

लोकतंत्र की रीढ़ को मजबूत करने वाला श्लोक

ये श्लोक याद दिलाता है कि राज्य का काम है निर्दोषों की जान-माल बचाना। हमारे संविधान में भी यही बात है- अनुच्छेद 21 में जीवन का अधिकार। तो ये श्लोक लोकतंत्र की रक्षा का सबक देता है, बिना किसी भेदभाव के। कल्पना कीजिए, अगर राम गोपाल जैसे युवक की हत्या के बाद कोई सजा न मिलती, तो कितने परिवारों का दर्द अनसुना रह जाता? कितनी आग लग जाती?

यह श्लोक हमें बताता है कि न्याय सिर्फ सजा नहीं, बल्कि एक जागरूक व्यवस्था है जो रात-दिन सतर्क रहती है। लोकतंत्र में इसका मतलब है कि पुलिस, कोर्ट और सरकार मिलकर निर्दोषों की रक्षा के लिए एक ढाल बनें। लोकतंत्र में दंड का यह सिद्धांत हमें याद दिलाता है कि हमारी आजादी दूसरों की आजादी पर निर्भर है। अगर एक की हत्या पर चुप्पी साध ली, तो कल आपकी बारी आ सकती है। इसलिए यह श्लोक प्राचीन भले हो, लेकिन लोकतंत्र की रीढ़ को मजबूत करने वाला है।

राम गोपाल मिश्र की हत्या में जो क्रूरता बरती गई, उसमें गोलियाँ चलाकर शरीर छलनी करना और पैरों को जलाना(नाखून तक बाहर निकल आए) भी दर्ज है। इन सबको देखते हुए कोर्ट ने कठोरतम सजा को ही न्याय के अनुरूप माना। जज ने यह स्पष्ट किया कि बहराइच हिंसा में जो हुआ वह केवल एक हत्या नहीं थी, बल्कि यह समाज में आस्था, विश्वास और शांति की भी हत्या थी। इसलिए कठोर दंड आवश्यक था।

लिबरल्स को क्यों लगी मिर्ची?

जज पवन कुमार शर्मा द्वारा फैसले में मनुस्मृति के उद्धरण ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है। यह ठीक उसी तरह है जैसे कभी जज महत्मा गाँधी का उद्धरण देते हैं, तो कभी स्वामी विवेकानंद का। अर्थात् उद्धरण का मतलब यह नहीं कि कोर्ट के फैसले का आधार वही है। यह बात लिबरल समूह अक्सर जानकर भी अनदेखी करते हैं ताकि अपनी वैचारिक राजनीति को हवा दे सकें।

चूँकि मनुस्मृति का उल्लेख होते ही लिबरल इसे ‘मनुवादी विचारधारा’ बताते हुए पूरे प्रकरण को राष्ट्रवाद बनाम समानता की बहस में बदल देते हैं। मीडिया नैरेटिव सेट करने की कोशिश की जाती है।

न्यूज पोर्टल्स, सोशल मीडिया थ्रेड्स और टीवी डिबेट्स में इसे संविधान के खिलाफ बताया जाता है। वे यह संदेश देने की कोशिश करते हैं कि अगर अदालतें धार्मिक ग्रंथों का उल्लेख करेंगी तो यह सेक्युलर न्याय व्यवस्था पर खतरा है। ऐसे में इस बार भी हल्ला होने लगा।

एक यूजर ने तो न्याय व्यवस्था में ही बदलाव का रोना रो दिया।

हालाँकि इस मामले में लिबरल नैरेटिव पूरी तरह कमजोर साबित हुआ, क्योंकि कोर्ट ने मनुस्मृति को ‘कानूनी आधार’ नहीं बनाया बल्कि सिर्फ नैतिक सिद्धांत यानी राजधर्म और दंड व्यवस्था को समझाने के लिए इसे उद्धरित किया। इस फैसले में कठोर सजा संविधान और दंड संहिता के आधार पर ही दी गई न कि मनुस्मृति के आधार पर। अपराधिरों के अपराध इतने जघन्य थे कि किसी भी विचारधारा के लोग बचाव की स्थिति में नहीं थे। इसलिए लिबरलों की प्रतिक्रियाएँ यहाँ माहौल बनाने की कोशिश भले ही कर रही थी, लेकिन वो पूरी तरह से असरहीन रहीं। इसके बावजूद मुस्लिम आईटी सेल जैसे हैंडल्स से संविधान के खिलाफ ही जहर उगलना जारी रहा।

विरोध के बावजूद क्यों मनुस्मृति का संदर्भ दिया जाता है?

यह सच है कि सामाजिक असंतोष के नाम पर इसे फाड़ा जाता है। डॉ. बीआर अंबेडकर ने तो 1927 में महाड सत्याग्रह में मनुस्मृति जलाई थी- वो प्रतीक था असमानता के खिलाफ। आज भी 25 दिसंबर को दलित संगठन इसे ‘मनुस्मृति दहन दिवस’ मानते हैं। लेकिन जब न्यायिक और ऐतिहासिक दृष्टि से मनुस्मृति को देखते हैं तो यह भारतीय ‘धर्म’ आधारित विधि-व्यवस्था का प्राचीन आधार है। ब्रिटिश काल में मनुस्मृति को हिंदू कानून बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया-शादी-ब्याह, संपत्ति के मामलों में।

हालाँकि आधुनिक समय की कोर्ट्स आज इसे कानून नहीं मानतीं, बस नैतिक संदर्भ के रूप में उद्धृत करती हैं। बहराइच फैसले में भी इसे इसी तरह से तरह से ‘कोट’ किया गया। वैसे, सच कहें तो अगर कोई ग्रंथ हजारों वर्षों से दंड, धर्म और शासन पर विचार देता आया है, तो जज उसका उद्धरण एक नैतिक तर्क के रूप में तो दे ही सकते हैं।

कोर्ट के 142 पन्नों के फैसले में अपराधियों की बर्बरता दर्ज

बहराइच कोर्ट के 142 पन्नों के फैसले में 12 गवाहों के बयान दर्ज हैं। इसमें मेडिकल और पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी हैं। केस के दौरान पेश किए घए फॉरेंसिक, इलेक्ट्रॉनिक सबूतों के साथ घटनास्थल की तस्वीरें और पीड़ित परिवार का बयान भी दर्ज है। इन सबको दृष्टिगत करते हुए कोर्ट ने कहा, “यह हत्या पूर्वनियोजित, क्रूरतापूर्ण और मानवता को शर्मसार करने वाली है। ऐसे अपराधियों को समाज में रहने का कोई अधिकार नहीं।” और फिर जज ने अपने पेन का निब तोड़ दिया।

बहराइच हिंसा केस का यह फैसला सिर्फ एक कानूनी फैसला नहीं, बल्कि समाज को संदेश भी है। कोर्ट ने साफ कहा कि जब हत्या इतनी क्रूर हो कि समाज का विश्वास हिल जाए, तब कानून को कठोर होना ही पड़ेगा। मनुस्मृति के जिक्र पर भले लिबरल हलकों में नाराजगी हो, लेकिन समाज में शांति और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए दंड का होना बेहद जरूरी है। अन्यथा ऐसी भयावह हत्याएँ, हिंसा, आगजनी की घटनाएँ बार-बार होती रहेंगी।

UP में नहीं होगी हड़ताल, जनता को होती असुविधा देख योगी सरकार का आदेश: जानिए क्या है ESMA जो 6 महीने तक राज्य में रहेगा लागू

यूपी में एक बार फिर एस्मा लागू कर दिया गया है यानी कोई आवश्यक कार्यों से जुड़ा सरकारी कर्मचारी अपना काम करने से मना नहीं कर सकता। अगर उसने काम रोका, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। उसे 6 महीने की जेल और जुर्माना या दोनों सजा भुगतना पड़ सकता है। सरकार ने आम जनता को किसी तरह की दिक्कत न हो, इसको देखते हुए इसे लागू किया है।

राज्य सरकार की अधिसूचना के मुताबिक, उत्तर प्रदेश आवश्यक सेवा रखरखाव अधिनियम,1966 की धारा 3 की उपधारा 1 के तहत राज्य को मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए राज्य सरकार ने 6 महीने की अवधि के लिए हड़ताल पर रोक लगा दी है।

यूपी के प्रमुख सचिव नियुक्त एवं कार्मिक एम देवराज ने एस्मा लागू करने की 12 दिसंबर 2025 को घोषणा की। अब यूपी के सरकारी कर्मचारी आगामी 6 महीने तक हड़ताल शुरू करने, इसमें भाग लेने या जारी रखने का काम नहीं कर सकते। इसके अलावा अगर कोई हड़ताल को वित्तीय मदद करता पाया गया तो उसे 1 साल तक की जेल या जुर्माना या दोनों लग सकता है।

क्या है एस्मा

आवश्यक सेवा रखरखाव अधिनियम यानी ESMA एक ऐसा एक्ट है, जिसके जरिए सरकार कर्मचारियों के हड़ताल को रोक सकती है। एस्मा के तहत हड़ताल को अवैध घोषित करते हुए दोषी कर्मचारियों को 6 महीने तक की कैद या जुर्माना या दोनों की सजा का प्रावधान है। यह आमतौर पर आम जनता के हितों को ध्यान में रखकर लागू किया जाता है। ऐसे काम जो जनता के लिए जरूरी हैं, उसमें रुकावट न आए इसलिए सरकार एस्मा लागू करती है।

ये कानून आवश्यक सेवाओं मसलन बिजली, पानी, सड़क, परिवहन, खाद्यान, बैंक जैसे विभागों में लागू होता है। ये आम तौर पर 6 महीने के लिए ही लागू होता है, लेकिन जरूरत महसूस होने पर इसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है।

किस-किस पर होगा नियम लागू

सरकारी की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि यह प्रतिबंध राज्य सरकार के सभी विभागों, कार्यालयों, स्थानीय निकायों, निगमों, बोर्डों, और प्राधिकरणों में लागू होगा। यानी स्वास्थ्य सेवाएँ, बिजली और जल आपूर्ति विभाग, पुलिस और सुरक्षा विभाग, परिवहन और यातायात विभाग समेत सभी सार्वजनिक सेवाओं से जुड़े सरकारी विभाग।

अगर कोई इसका उल्लंघन करता है यानी कामबंदी करता है तो उससे खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। इसे आमतौर पर आम जनता के हितों को सुरक्षित रखने के लिए लागू किया जाता है।

क्यों सरकार ने हड़ताल पर लगाई रोक

दरअसल बिजली विभाग और शिक्षा विभाग से जुड़े कर्मचारियों ने अपनी माँगों के समर्थन में हड़ताल पर जाने की चेतावनी दी थी। जून 2025 में बिजली विभाग के निजीकरण के विरोध में कर्मचारियों ने हड़ताल पर जाने की चेतावनी दी थी, तो योगी सरकार ने एस्मा लागू कर दिया था।

6 महीने की अवधि पूरी होने वाली है। इसको देखते हुए योगी सरकार ने एस्मा को 6 महीने और आगे बढ़ा दिया है, ताकि आगामी 6 महीने तक सरकारी कर्मचारी आवश्यक सेवाओं में किसी तरह का व्यवधान नहीं डाल पाएँ।

मुख्य सचिव एम देवराज के मुताबिक, सरकार का मकसद सिर्फ आवश्यक सेवाओं को सुचारू रूप से चलाना है। कर्मचारी अगर अपनी समस्याओं का समाधान चाहते हैं तो उन्हें प्रशासनिक तरीके से समाधान निकालना होगा। हड़ताल किसी भी हाल में स्वीकार युक्त नहीं होगा।

विशेषज्ञों के मुताबिक, एस्मा लागू करना सरकार का कानूनी अधिकार है। ये कर्मचारियों के हितों को सीमित नहीं करता बल्कि आम लोगों की जरूरतों को तरजीह देता है। सरकार किसी भी वक्त एस्मा लागू कर सकती है। हड़ताल शुरू होने से पहले या हड़ताल शुरू होने के बाद भी। इसका उल्लंघन करने वालों को सजा मिल सकती है।

एस्मा एक बार फिर लागू होने के बाद आम लोगों की जरूरतें पूरी होती रहेंगी। सरकार का मानना है कि हड़ताल पर रोक लगाने का मकसद सिर्फ काम को बाधित होने से रोकना है । इस दौरान कर्मचारियों की शिकायतों का समाधान निकालने का प्रयास किया जाएगा।

देश के किन-किन राज्यों में लगा एस्मा

यूपी में जून 2025 में एस्मा लागू किया गया और अब उसे 6 महीने का विस्तार दिया गया है। वहीं हरियाणा में कोरोना के दौरान 2022 में डॉक्टरों की हड़ताल को देखते हुए एस्मा लागू किया गया था, जो 6 महीने तक चला।

कर्नाटक में 2015 में इसे लागू किया गया। इससे पहले 1994 में भी एस्मा लागू किया गया था। केरल में 1993 में एस्मा लागू किया गया था। इसके बाद 1994 में इसे विस्तारित किया गया। राजस्थान में से RESMA यानी राजस्थान आवश्यक सेवा अनुरक्षण अधिनियम, 1970 के नाम से जाना जाता है।

डॉक्टरों की हड़ताल के दौरान दिल्ली सरकार ने भी ESMA का सहारा लिया था, जिससे हड़ताल खत्म हो गई थी।

जिसने किया रेप, उसके साथ शादी में खुश है लड़की: 2 साल पुराने बलात्कार केस में बेल चंडीगढ़ कोर्ट ने दी बेल, जानिए परिवार के ‘नाबालिग’ वाले दावे पर क्या कहा

चंडीगढ़ की एक कोर्ट ने दो साल पुराने अपहरण और रेप मामले के आरोपित को बरी कर दिया। कोर्ट का यह फैसला शादी के रिसेप्शन की तस्वीरे देखने के बाद लिया। कोर्ट का कहना है कि तस्वीरों में आरोपित के साथ पीड़िता ‘काफी खुश’ दिखाई दे रही है। इस समारोह में 200 से ज्यादा लोग उपस्थित हुए थे।

फैसला सुनाते हुए अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश डॉ. यशिका ने कहा, “यह विश्वास नहीं किया जा सकता कि आरोपित ने लड़की की इच्छा के बिना उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए थे।” कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि अगर आरोपित के साथ कोई संबंध बने भी हैं, तो लड़की ने खुद अपनी मर्जी से बनाए होंगे।

फैसले में आगे कहा गया कि क्योंकि यह साबित नहीं हो पाया कि लड़की नाबालिग थी, इसलिए वह अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ सहमति से संबंध बनाने के लिए स्वतंत्र थी।

क्या है मामला?

यह मामला एक 15 साल की लड़की से जुड़ा है। लड़की की पिता ने पुलिस से 14 मई 2023 की शिकायत के अनुसार, उनकी बेटी 12 मई 2023 को बिना बताए घर से चली गई। पिता ने कहा कि आरोपित ही उनकी बेटी को शादी का झाँसा देकर बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया था।

पीड़ित पिता की शिकायत के आधार पर पुलिस ने FIR दर्ज की। इसके बाद पुलिस ने अस्थिकरण परीक्षण (Ossification Test) में पाया कि पीड़िता की ‘बोन एज’ (Bone Age) 15-16 साल है और ‘डेंटल एज’ (Dental Age) यानी बायोलॉजिकल उम्र 14-16 साल है।

पुलिस ने आरोपित के खिलाफ चार्जशीट दायर की, जिसमें IPC की धारा 363 (अपहरण) और 376(2)(n)(बार-बार बलात्कार) और POCSO एक्ट की धारा 4 और 6 के तहत आरोप लगाए गए। लेकिन आरोपित ने इन आरोपों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। हालाँकि, कोर्ट में अभियोजन पक्ष ने पीड़िता के बयान और पिता की शिकायत का हवाला देते हुए कहा कि आरोपित बहला-फुसलाकर लड़की को अपने साथ ले गया और दो साल तक कब्जे में रखने के दौरान कई बार जबरन शारीरिक संबंध भी बनाए।

पीड़िता की सही उम्र पर कोर्ट ने क्या कहा?

पीड़िता की सही उम्र जानने के लिए काफी जद्दोजहद हुई। वहीं कोर्ट ने कहा कि पीड़िता की अनुमानित उम्र 15-16 साल है, पर दो साल के मार्जिन ऑफ एरर के प्रिंसिपल को लागू करने पर पीड़िता की उम्र उसकी जाँच के समय 18 साल से ज्यादा मानी जाती है। इसीलिए कोर्ट ने अपराध की तारीख 12 मई 2023 के अनुसार पीड़िता की उम्र 18 साल से ज्यादा मानी गई।

लॉ ट्रेंक के मुताबिक, कोर्ट के पास स्कूल रिकॉर्ड या नगर निगम के रिकॉर्ड भी दाखिल नहीं किया गया, जिसके चलते कोर्ट ने कहा कि यह नहीं कहा जा सकता था घटना के समय लड़की नाबालिग थी। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपित से शादी के समय लड़की नाबालिग थी।

कोर्ट ने रेप के आरोप पर क्या कहा?

कोर्ट ने क्रॉस-एग्जामिनेश के आधार पर फैसला सुनाते हुए कहा कि इससे साबित होता है कि उसका घर आरोपित के घर से महज 5-6 घरों की दूरी पर है, इसलिए शादी के तुरंत बाद उसके पास अपने घर जाने का पूरा मौका था। कोर्ट ने कहा, “इसके अलावा शादी और रिसेप्शन की तस्वीरों में भी वह काफी खुश दिख रही है।”

पीड़िता के रेप के आरोप पर कोर्ट ने कहा, “यहाँ लड़की को बच्ची साबित नहीं किया जा सका, इसीलिए उसे बड़ा समझा जाए। और अगर बालिग होने के बाद भी आरोपित ने उसका रेप किया होता तो उसके पास शोर मचाने का पूरा मौका था, लेकिन उसने ऐसा कभी नहीं किया, जिससे कोर्ट को लगता है कि आरोपित के साथ शारीरिक संबंध बनाने में उसकी भी सहमति थी।”

कोर्ट ने पीड़िता के बयानों पर जताया शक

कोर्ट ने पीड़िता और उसके पिता के बयानों में गंभीर विरोधाभास मिलने पर अभियोजन पक्ष के सबूतों पर शक जताया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, “ऐसे हालात में गलत फँसाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता और ऐसा लगता है कि पीड़िता और उसके पिता ने कहानी को तोड़-मरोड़कर पेश किया है।”

कोर्ट ने आगे कहा, “ऐसे हालात में पीड़िता के बर्ताव से यही नतीजा निकाला जा सकता है कि वह खुद आरोपित के साथ चली गई थी और उसने उसे कभी भी किसी गलत संबंध वगैरह के लिए मजबूर करने के इरादे से किडनैप नहीं किया था।”

किसी का घर हुआ खंडहर, किसी की पूरी जिंदगी बर्बाद: अखलाक मामले में पकड़े गए युवकों को क्या योगी सरकार में मिलेगा इंसाफ, पढ़ें ऑपइंडिया की खास रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश के दादरी का बिसाहड़ा गाँव एक बार फिर चर्चा में है। ऐसा इसलिए कि योगी सरकार ने अखलाक कांड के सभी 18 आरोपितों के केस वापस लेने के लिए कोर्ट में अर्जी डाली है। इसके बाद जहाँ एक ओर आरोपित के परिवारों को एक उम्मीद की किरण जगी है कि उन्हें न्याय मिलेगा तो वहीं दूसरी ओर अखलाक के परिवार ने सरकार के इस कदम पर सवाल उठाए हैं। हालाँकि, 12 दिसंबर 2025 को जिला अदालत इस पर सुनवाई करेगी कि आरोपितों के सभी केस वापस होंगे या नहीं।

इस बहस के बीच ऑपइंडिया की टीम बीते दिन दिल्ली से 50 किलोमीटर दूर दादरी के बिसाहड़ा गाँव पहुँची। गाँव के प्रवेश द्वार के ऊपरी हिस्से पर महाराणा प्रताप की प्रतिमा लगी है तो वहीं नीचे महाराजा मिहिर भोज के चित्र के साथ लगे बोर्ड पर लिखा है, “लक्ष्मण वंशी राजपूत सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार साठा चौरासी प्रवेश द्वार बाबा अफलातून शाहजी पावन नगरी बिसाहड़ा में आपका हार्दिक स्वागत है”।

इसके बाद हम उस जगह पहुँचे जहाँ मोहम्मद अखलाक ने गाय को काटने के बाद उसके अवशेष सड़क किनारे गोबर के ढेर पर फेंके थे। यहाँ कोई भी गाँव व्यक्ति हमसे बात करने के लिए तैयार नहीं हुआ। इसके बाद हम अखलाक के घर से 50 मीटर दूर उस पशु चिकित्सक अरूण सिसौदिया के घर पहुँचे जिसने अपने अनुभव से अखलाक द्वारा फेंके गए अवशेषों को पहचाना था कि वह गोवंश के ही अवशेष हैं।

पशु चिकित्सक अरुण सिसौदिया बताते हैं कि गाँव के शिवम ने रात में सड़क किनारे अखलाक को पॉलिथिन फेंकते देखा था। इसके बाद जब मैंने पॉलिथिन को देखा तो उसमें गोवंश के अवशेष (मुँह और कान) थे, जो कि एक फ्रीजन गाय के बछड़े के थे। वह कहते हैं कि मेरा यही गुनाह था कि मैंने अपने 21 साल के अनुभव से उन अवशेषों की पहचान की जिसकी पुष्टि बाद में दो लेबों से भी हुई थी।

किसी की माँ तो किसी के पिता का हुआ देहांत

पशु चिकित्सक अरूण आगे बताते हैं कि घटना के बाद पुलिस ने गाँव में आतंक मचाया और हम जैसे बेगुनाह लोगों को राजनीति के तहत फँसाया गया। ये अखिलेश सरकार ने गलत किया था। इसके बाद मैं 23 महीने जेल रहा। सब कुछ बर्बाद हो गया। मैं पशुओं का इलाज करके हर रोज 3-4 हजार कमाता था, लेकिन जेल जाने के बाद धंधा चौपट हो गया। अब योगी जी से ही हमारी उम्मीदें हैं कि वही हमें न्याय दिला सकते हैं।

पशु चिकित्सक अरुण सिसौदिया से मुलाकात के बाद हम आगे बढ़े तो पता चला कि मामले में जिस भाजपा नेता संजय राणा के बेटे विशाल राणा को मुख्य आरोपित बनाया गया उसने भी गाँव छोड़ दिया है। घर पर ताला लगा है। खिड़की की जालियों पर जंग लगी है, कमरे की छत गिर चुकी है। साफ कहें तो गाँव में खंडहर पड़ा मकान बर्बाद होते परिवार का दर्द बयाँ कर रहा था। गाँव वालों की मानें तो इस घटना के बाद संजय राणा का राजनीतिक कैरियर ही समाप्त हो गया।

इसके बाद हमने मामले में आरोपित पुनीत शर्मा के पिता योगेन्द्र शर्मा से बात की। वह बताते हैं कि हमारा घर घटनास्थल से करीब 400 मीटर दूर है। घटना के समय बेटा छत पर सो रहा था। जैसे ही पता चला तो वह नीचे गया, लेकिन मौके पर पहुँचने से पहले ही लोगों ने उसे वहाँ जाने से रोक दिया, लेकिन इसके बाद बेटे को न सिर्फ आरोपित बनाया गया बल्कि बेटा करीब 17 महीने तक जेल में भी रहा।

बुजुर्ग योगेन्द्र शर्मा कहते हैं कि हमारे साथ अखलाक के परिवार को भी पता है कि हमारा बेटा उस घटना में शामिल नहीं था, लेकिन राजनीतिक द्वेष के चलते हमें फँसाया गया। अब योगी सरकार ने हमारी सुनी है और कोर्ट से आखिरी उम्मीद बची है।

मीडिया ने हिंदुओं को आतंकियों के रूप में दिखाया

गाँव के पूर्व प्रधान राकेश राणा बताते हैं कि सरकार आज तक कोई सबूत नहीं दे पाई कि अखलाक को किन लोगों ने मारा। सभी आरोपितों के नाम लोगों ने एक दूसरे रंजिश में लिखा दिए। सपा की सरकार ने इस घटना को हिंदू-मुस्लिम के नजरिए से देखा और हिंदुओं के सामने एक पक्ष बनकर खड़ी हो गई।

उस समय सपा सरकार की पुलिस का आतंक कुछ ऐसा था कि गाँव में सब्जी वाले सब्जी नहीं बेचने आते थे क्योंकि लोग पुलिस के डर के कारण गाँव छोड़कर चले गए थे। उस समय मीडिया वालों ने हमें आतंकियों के रूप में दिखाया जैसे कि हम मुसलमानों के ऊपर अत्याचार कर रहे हैं। जबकि गाँव के लोगों की सही भावना को मीडिया ने कभी दिखाया ही नहीं।

अखलाक का परिवार पीढ़ियों से गाँव में रहता है। इसके बावजूद आरोपितों के नाम बदले गए ये एक गहरी साजिश थी। जेल में हमारे बच्चों को यातनाएँ दी गईं। जेल में रवि की मौत उसी का परिणाम थी। राकेश राणा आगे कहते हैं कि रही बात योगी सरकार द्वारा केस वापस लेने की तो दूसरी सरकारों ने आतंकियों तक के केस वापस लिए हैं ये तो हमारे निर्दोष बच्चे हैं।  

वहीं, अखलाक के घर से करीब 150 मीटर दूर रहने वाले संजीव राणा कहते हैं कि सभी आरोपितों के परिवार पटरी से उतर गए हैं। अखलाक की मौत के बाद सपा सरकार ने गाँव के 20 परिवारों को मार दिया। वह सभी जिंदा रहकर भी मृत के समान हैं। अब समय आ गया है कि राजा से राजा लड़ेगा। सपा सरकार ने मुसलमानों का पक्ष लिया था और योगी सरकार हम हिंदुओं को न्याय दिलाएगी।

पाकिस्तान जाने के बाद कट्टर हो गया था अखलाक

अखलाक के पड़ोसी व पशु चिकित्सक अरुण सिसौदिया कहते हैं अखलाक का परिवार बहुत अच्छा था। हमारे यहाँ अखलाक का भी आना जाना रहता था। यहाँ तक कि वह अपनी शादी की एलबम में अखलाक के फोटो होने की बात कहते हैं। वह आगे बताते हैं कि जब से वह पाकिस्तान गया तब से उसके व्यवहार में बदलाव आया और इसके बाद से उसके घर पर 50-50 जमाती आने लगे थे। सभी को वह भोजन भी कराता था। तभी से अखलाक और ज्यादा कट्टर होने लगा था।

अखलाक के बारे में पड़ोसी संजीव राणा कहते हैं कि अखलाक लोहार का काम करता था। एक बार तो वह किसी से संदिग्ध बात कर रहा था। इस पर वहाँ खड़े व्यक्ति को शक होने पर मोबाइल दिखाने के लिए बोला तो उसने अपना मोबाइन न दिखाकर आग की भट्टी में झोंक दिया था। अखलाक जमातियों के संपंर्क में आने के बाद से ज्यादा कट्टर हो गया था और उसका पाकिस्तान प्रेम उजागर होता जा रहा था।

हिंदुओं ने कई बार पेश की भाईचारे की मिशाल

पशु चिकित्सक अरुण सिसौदिया बताते हैं कि अखलाक के भाई मोहम्मद अफजाल की लड़की कमरजहाँ का हिंदुओं ने तलाक नहीं होने दिया था। हिंदुओं ने मिलकर उसका साथ दिया था। गाँव के पूर्व प्रधान राकेश राणा कहते हैं कि हमारे यहाँ हमेशा से भाईचारा रहा है। गाँव में मस्जिद, ईदगाह के लिए जमीन हिंदुओं ने दी थी। यहाँ तक कि उनके निर्माण में भी हिंदुओं ने सहयोग किया था।

अखलाक घटना के बाद भी गरीब मुस्लिम हकीम की दो लड़कियों का निकाह गाँव के हिंदुओं ने मिलकर के ही कराया था। प्रधान कहते हैं कि अखलाक की घटना से न पहले गाँव में कुछ ऐसा हुआ और न उसकी घटना के बाद कुछ गलत हुआ। यहाँ तक कि अखलाक के किसी भी भाई को एक खरोंच तक नहीं आई।

वहीं गाँव के संजीव राणा कहते हैं कि अखलाक के परिवार का लेन-देन और आना-जाना हमेशा हिंदुओं के बीच रहता था, लेकिन उसने जघन्य अपराध किया और उसने गाँव के भाईचारे को गहरा धब्बा लगाया।

आपको बता दें कि 28 सितंबर 2015 को दादरी विधानसभा के बिसाहड़ा गाँव निवासी अखलाक ने ईद के बाद गोवंश को काटा था। इस घटना से गुस्साई हजारों लोगों की भीड़ ने अखलाक और उसके बेटे दानिश को घर से खींचकर पिटाई की थी, जिसमें घायल अखलाक की अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई थी। अखलाक द्वारा गाय को काटने की घटना को पहले अफवाह बताया गया था, लेकिन दो लेबों से हुई जाँच के बाद साफ हो गया था कि अखलाक द्वारा फेंका गया मांस गोवंश का ही था।

जिस ‘फिल्म क्रिटिक गिल्ड’ को सताई पत्रकारों की चिंता, उसकी अध्यक्ष ही हुईं थी ‘धुरंधर’ रिव्यू पर ट्रोल: लोग बोले- खुद के बचाव में अनुपमा चोपड़ा ने जारी किया बयान

रणवीर सिंह की फिल्म धुरंधर रिलीज के बाद सोशल मीडिया पर फिल्म क्रिटिक्स और दर्शकों के बीच बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। वरिष्ठ समीक्षक अनुपमा चोपड़ा ने फिल्म को टेस्टोस्टेरोन-हेवी, श्रिल नेशनलिज़्म और एंटी-पाकिस्तान नैरेटिव वाला बताते हुए नेगेटिव रिव्यू दिया, जिसके बाद उन्हें भारी आलोचना का सामना करना पड़ा और उन्होंने अपना वीडियो रिव्यू निजी कर दिया।

इसी माहौल में फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड (FCG) ने ऑनलाइन हमलों और डराने-धमकाने की कोशिशों की निंदा करते हुए लंबा बयान जारी किया। दिलचस्प यह है कि जिस संगठन ने यह बयान जारी किया है, उसकी अध्यक्ष अनुपमा चोपड़ा ही हैं। इस कारण गिल्ड की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह स्वतंत्र आलोचना की सुरक्षा है या स्वयं की आलोचना से सुरक्षा?

अनुपमा चोपड़ा के रिव्यू से शुरू हुआ विवाद?

फिल्म धुरंधर पर अपने रिव्यू में अनुपमा चोपड़ा ने फिल्म को पुरुषों पर केंद्रित, पूरी तरह से मेल सेन्ट्रिक एनर्जी, ज्यादा राष्ट्रवादी और पाकिस्तान-विरोधी नैरेटिव पर आधारित बताया। उनकी समीक्षा में उपयोग हुए शब्द ‘टेस्टोस्टेरॉन-हेवी’, ‘श्रिल नेशनलिज़्म’ और एंटी-पाकिस्तान सोशल मीडिया पर तुरंत बहस का विषय बन गए।

कई दर्शकों ने आरोप लगाया कि यह समीक्षा फिल्म की कहानी के बजाय विचारधारा के चश्मे से लिखी गई है। आलोचना का स्वर तेज होने पर चोपड़ा ने अपना रिव्यू वीडियो प्राइवेट कर दिया, जिससे विवाद और भी बढ़ गया।

फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड ने क्या कहा

फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड एक ऐसा ग्रुप है, जिसमें भारत के कई बड़े फिल्म रिव्यू करने वाले लोग और एंटरटेनमेंट पत्रकार शामिल होते हैं। इसका काम फिल्मों की समीक्षा को सही ढंग से ईमानदारी के साथ और प्रोफेशनल तरीके से करना है।

यह लोग फिल्मों, वेब सीरीज और ऑनलाइन कंटेंट पर अपनी राय देते हैं और हर साल अवॉर्ड्स भी घोषित करते हैं। जब किसी रिव्यू को लेकर विवाद होता है या कोई सवाल उठता है, तब यह पूरा ग्रुप मिलकर एक आधिकारिक बयान जारी करता है, ताकि लोगों को उनकी बात साफ-साफ समझ आ सके और उनकी विश्वसनीयता बनी रहे।

रिव्यू विवाद बढ़ते ही फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड ने एक बयान जारी किया। गिल्ड ने कहा कि कई समीक्षकों को हाल के दिनों में टारगेटेड अटैक, हैरेसमेंट और नफरत का सामना करना पड़ा है। बयान में कहा गया कि असहमति से शुरू हुई बहस अब ऑनलाइन कैंपेन, व्यक्तिगत हमलों और धमकियों तक पहुँच गई है।

कुछ मौजूदा रिव्यू को बदलवाने, एडिटोरियल राय को प्रभावित करने और प्रकाशनों पर दबाव बनाने जैसी घटनाओं का भी उल्लेख किया गया। गिल्ड ने इसे इंडिपेंडेंट फिल्म क्रिटिसिज़्म पर हमला बताया और कहा कि किसी भी प्रोफेशनल को केवल अपना काम करने के लिए बदनाम करना गलत है। साथ ही जनता से अपील की गई कि फिल्म पसंद या नापसंद करना उनका अधिकार है, लेकिन समीक्षकों से किसी लाइन में आने की उम्मीद करना नहीं।

इस बयान पर क्यों हुआ विवाद?

गिल्ड का यह बयान सामान्य परिस्थितियों में फिल्म आलोचना की स्वतंत्रता की रक्षा के रूप में देखा जा सकता था, लेकिन विवाद इसलिए बढ़ा क्योंकि गिल्ड की मैनेजिंग कमिटी की चेयरपर्सन खुद अनुपमा चोपड़ा हैं। वही व्यक्ति जिनके रिव्यू पर सबसे ज्यादा प्रतिक्रियाएँ आईं।

आलोचकों ने मजाकिया अंदाज में कहा कि जिस आलोचक को आलोचना झेलनी पड़ी, उसी के नेतृत्व वाले संगठन ने आलोचकों पर आलोचना बंद करो जैसा बयान जारी कर रहा है जिससे उसका बचाव किया जा सके। इससे गिल्ड की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हुए और बयान के पीछे की मंशा पर बहस शुरू हो गई।

अनुपमा चोपड़ा के रिव्यू की भाषा और फोकस कई दर्शकों को फिल्म के मूल संदर्भ से हटकर लगी। फिल्म में युद्ध, सैनिकों और दुश्मन देश के हिसाब से जैसे तत्व कहानी का हिस्सा हैं, लेकिन दर्शकों का आरोप था कि चोपड़ा ने इन्हें राजनीतिक चश्मे से देखा।

श्रिल नेशनलिज़्म (जोर-जबरदस्ती वाला राष्ट्रवाद) जैसे शब्दों को देशभक्ति का मजाक बताया गया, जबकि एंटी-पाकिस्तान नैरेटिव वाली टिप्पणी को फिल्म की कहानी का स्वाभाविक हिस्सा माना गया। इसी वजह से यह मामला साधारण रिव्यू विवाद से आगे बढ़कर विचारधारा की बहस में बदल गया।

लोकसभा में जिस E-Ciggrette पर हुआ बवाल, उसके बारे में कितना जानते हैं आप: भारत समेत 37 देशों में है बैन, फूँकने से सिर्फ फेफड़े नहीं दिमाग भी होता है खराब

ई सिगरेट पर प्रतिबंध लगा हुआ है, लेकिन सदन में टीएमसी के सांसद पर इसे पीने का आरोप लगा है। बताया जा रहा है कि टीएमसी के 3 सांसद हैं, जो सदन में ई सिगरेट पी रहे थे। हालाँकि इनका नाम उजागर नहीं किया गया है। बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर ने लोकसभा में स्पीकर के सामने ये मुद्दा उठाया है। हालाँकि इस दौरान उन्होंने टीएमसी सांसद के ई सिगरेट पीने की बात कही। किसी का नाम नहीं लिया। स्पीकर ने लिखित शिकायत देने के बाद कार्रवाई का भरोसा दिया है।

लोकसभा में गूँजा ई-सिगरेट पीने का मामला

टीएमसी के सांसद पर संसद परिसर में ई सिगरेट पीने का सांसद अनुराग ठाकुर ने आरोप लगाया। लोकसभा में ई-सिगरेट पीने का मुद्दा उठाते हुए सांसद अनुराग ठाकुर ने कहा कि “देशभर में ई सिगरेट बैन है, क्या संसद में सिगरेट पीना अलाउ कर दिया गया है।” इस पर लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने ‘ना’ कहा। तब अनुराग ठाकुर ने कहा कि टीएमसी के सांसद कई दिनों से बैठकर पी रहे हैं। सदन में ई-सिगरेट पी जा रही है। इसकी जाँच करवाएँ।’ उन्होंने कहा कि लाखों लोग संसद की सीधी कार्रवाई देखते हैं, ये संसद की गरिमा के खिलाफ है।

पूरे मामले पर स्पीकर ओम बिरला ने कहा कि ‘हमें संसदीय परंपराओं और संसदीय नियमों का अनुपालन करना चाहिए। ऐसा कोई विषय मेरे पास आएगा तो कार्रवाई करेंगे।’

न्यूज 18 के मुताबिक, पिछले कई दिनों में सांसदों के बीच ये मुद्दा गरम है। बीजेपी का कहना है कि टीएमसी के 3 सांसद संसद भवन के भीतर ई-सिगरेट का सेवन कर रहे थे। सांसद अनुराग ठाकुर ने सांसद शब्द का जिक्र किया, उनकी संख्या नहीं बताई और न ही नाम उजागर किया।

क्या होता है ई सिगरेट

ई-सिगरेट यानी वेप पेन या वेप्स, बैटरी से चलने वाला डिवाइस है जो एक लिक्विड को गर्म करके भाप बनाता है। इसे इस्तेमाल करने वाला यूजर साँस के जरिए शरीर के अंदर लेता है। इस लिक्विड में आमतौर पर निकोटीन, फ्लेवरिंग और दूसरे केमिकल होते हैं।

शुरुआत में इन्हें आमतौर पर सिगरेट पीने वाले लोग ‘सुरक्षित’ विकल्प के तौर पर देख रहे थे। इसके बनाने की प्रक्रिया में निकोटीन, फ्लेवरिंग, प्रोपलीन ग्लाइकॉल और दूसरे पदार्थ डाले जाते हैं और गर्म करने पर ये एरोसोल में बदल जाता है। इससे साँस लेने में समस्या पैदा होती है।

फेफड़ों समेत शरीर के दूसरे अंगों को नुकसान पहुँचता है। ये सिगरेट पीने जैसा ही है। बस तम्बाकु को जलाने के बजाए यहाँ लिक्विड को गर्म किया जाता है और उसके भाप का सेवन किया जाता है।

दुनियाभर में इससे होने वाले नुकसान को देखते हुए जागरुकता फैलाया जा रहा है। लोगों से इसे नहीं पीने की अपील की जा रही है। दुनिया के 37 देशों ने इस पर प्रतिबंध लगा रखा है, उनमें भारत भी एक है।

भारत सरकार ने 2019 में ई-सिगरेट की बिक्री, इसे बनाने, बाँटने या आयात करने पर रोक लगा दी थी। सरकार को चिंता थी कि ये युवा पीढ़ी को नुकसान पहुँचा रही हैं और नशे का आदी बना रही है।

क्यों लगा है बैन

ई-सिगरेट से तंबाकू नहीं जलता, लेकिन फिर भी इसके इस्तेमाल से गंभीर खतरे हैं। ज्यादातर वेपिंग लिक्विड में निकोटीन होता है, जो बहुत ज़्यादा एडिक्टिव होता है और टीनएजर्स और युवा पीढ़ी के ब्रेन डेवलपमेंट पर असर डालता है। वेपर में ऐसे केमिकल भी होते हैं, जो फेफड़ों में जलन पैदा कर सकते हैं। सांस लेने में दिक्कत पैदा कर सकते हैं और शायद लंबे समय तक सांस की समस्या का कारण बन सकते हैं।

कई स्टडीज़ से पता चला है कि वेपिंग से दिल की बीमारी का खतरा बढ़ जाता है, नसों को नुकसान पहुँचता है और फेफड़े सिकुड़ने लगते हैं। विदेशों में, ई-सिगरेट के इस्तेमाल से फेफड़ों को नुकसान पहुँचने के कई मामले सामने आए हैं, यानी वेपिंग से खतरा है इस पर पूरी दुनिया सहमत है।

ई सिगरेट के प्रकार

ई सिगरेट कई तरह की होती है। वेप्स, वेप पेन या स्टिक, हुक्का, ई-हुक्का, मॉड्स, पर्सनल वेपोराइजर यानी पीवी। पूरे को मिलाकर इलेक्ट्रॉनिक निकोटीन डिलीवरी सिस्टम यानी ईएनडी कहते हैं।

किसी भी ई सिगरेट में एक टैंक या पॉड होता है, जिसमें लिक्विड भरा जाता है।

लिक्विड को गरम करने के लिए उपकरण लगा होता है। उसे चलाने के लिए बैटरी लगी होती है। साथ में एक कंट्रोल बटन होता है।

इसमें इस्तेमाल होने वाले लिक्विड को ई जूस या वेप जूस भी कहते हैं। लेकिन ये कोई ‘जूस’ नहीं होता। इसमें पानी भी नहीं होता है। भाप पैदान करने के लिए प्रोपिलीन ग्लाइकॉल और ग्लिसरीन का इस्तेमाल किया जाता है। फ्लेवरिंग के लिए अलग अलग सामग्री इस्तेमाल की जाती है।

ई सिगरेट से होने वाली बीमारियाँ

इससे सांस की तकलीफें, अस्थमा, फेफड़े में सूजन, जकड़न और सिकुड़न हो सकता है। फेफड़े में हमेशा के लिए निशान पड़ सकता है या छोटे कण गहराई से घुस सकते हैं, जिससे कैंसर हो सकता है। यूनिवर्सिटी ऑफ़ नॉर्थ कैरोलिना की एक स्टडी के अनुसार ई-सिगरेट में पाए जाने वाले दो मुख्य इंग्रीडिएंट्स- प्रोपलीन ग्लाइकॉल और वेजिटेबल ग्लिसरीन शरीर के लिए घातक होते हैं।

इनका सबसे बुरा प्रभाव कोशिकाओं पर पड़ता है। ब्रेन के विकास पर असर डालता है। इसलिए टीनएजर्स और जेनजी के लिए खास तौर पर खतरनाक है। ब्लड प्रेशर बढ़ा सकता है। भारी धातु जैसे निकेल, लेड कैडमियन खून में घुलकर नसों को नुकसान पहुँचा सकता है।

इतने नुकसान और प्रतिबंध के बावजूद लोकतंत्र के मंदिर संसद में सांसदों द्वारा ई सिगरेट का सेवन करना काफी आश्चर्यजनक है। टीएमसी के सांसदों के खिलाफ लिखित शिकायत के बाद कार्रवाई का आश्वासन लोकसभा स्पीकर ने दिया है। लेकिन ये सिर्फ अनुशासनहीनता का मामला नही है। जनता के प्रतिनिधि का आचरण अनुसरणीय होनी चाहिए। जनता संसद की सीधी कार्रवाई देखती है। ऐसे में ये सांसद जनता को क्या संदेश देना चाहते हैं।

सांसदों पर संसदीय मर्यादा को भंग करने का आरोप भी है। संसद तो इसके लिए कार्रवाई करेगी ही। अच्छा होता, अगर टीएमसी भी अपने सांसदों की जाँच के बाद आरोप साबित होने पर कार्रवाई करती। ये दूसरे सांसदों के लिए सीख होती और पार्टियों के लिए अनुकरणीय होता। आखिर जनता का नुमाइंदा इस तरह से सार्वजनिक तौर पर अनुशासनहीनता और अमर्यादित काम करे, तो जनता को ये क्या शिक्षा देंगे।

‘भोला घोष’ पर वामपंथियों को सूंघा साँप, चिकन पैटीज वाले ‘रियाज’ के लिए माँग रहे इंसाफ: बंगाल की 2 घटनाएँ और लेफ्ट लॉबी की दोगलई फिर से उजागर

पश्चिम बंगाल इन दिनों कई कारणों से लेफ्ट लॉबी का सबसे पसंदीदा राज्य बना हुआ है। कारण- वहाँ उनकी मर्जी का वो सब हो रहा है जो वो देश में देखना चाहते हैं। जैसे SIR का विरोध, घुसपैठियों का समर्थन, हिंदुओं का उत्पीड़न, भाजपा से खुलकर घृणा आदि-आदि।

खास बात ये है कि ये वामपंथी धड़ा इन खबरों के आने पर भीतर से खुश जरूर होता है, लेकिन बाहर से ऐसा दिखाता है कि इन्हें कुछ पता ही नहीं। ऐसे मुद्दों पर ये लोग कोई प्रतिक्रिया देना भी जरूरी नहीं समझते। इन्हें चर्चा उस मुद्दे पर करनी है, जिसमें हिंदुओं को ‘अत्याचारी’ दिखाने में ये सफल हो सकें। उदाहरण दो ताजा घटनाएँ हैं।

चिकन पैटीज वाले रियाजुल की ‘पिटाई’, संदेशखाली के गवाह भोला घोष का ‘एक्सीडेंट’

बंगाल में पिछले 2 दिन में 2 वाकये हुए। एक कोलकाता ब्रिगेड परेड ग्राउंड में गीता पाठ के दौरान और दूसरा नॉर्थ 24 परगना जिले में संदेशखाली के गवाह के साथ। कोलकाता ब्रिगेड परेड ग्राउंड में ‘गीता पाठ’ कार्यक्रम के बीच एक चिकन पैटीज बेचने वाले की पिटाई की वीडियो सामने आई, वहीं नॉर्थ परगना में संदेशखाली के गवाह का ‘एक्सीडेंट’ हुआ जिसमें 2 लोगों की जान चली गईं।।

दोनों खबरें सोशल मीडिया पर जोरों शोरों से चलाई गईं। लेकिन लेफ्ट लॉबी को अपने सोशल मीडिया पर शेयर करने लायक खबर वो लगी, जिसमें ‘रियाजुल’ नाम के शख्स को मजलूम दिखाया गया और भगवा पहने हिंदुओं को क्रूर।

इन्होंने उस खबर पर नजर तक नहीं मारी, जहाँ संदेशखाली के गवाह पर तेजी से आता ट्रक चढ़ गया, गवाह के बेटे की मौत हो गई, वो खुद घायल हो गया। लेफ्ट लॉबी ने इस बात को हर सिरे से नकारे रखा कि एक पीड़ित परिवार चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है कि इसके पीछे शेख शहाजहाँ हो सकता है। खबर चारों ओर होने पर भी वामपंथियों के कान में जू तक नहीं रेंगी।

जुबैर से लेकर अपूर्वानंद तक की चुप्पी, वामपंथी नेटीजन्स का रिएक्शन

वामपंथी प्रोपेगेंडाबाज मोहम्मद जुबैर को देखिए। खबर लिखने तक जुबैर के सोशल मीडिया पर एक भी ट्वीट संदेशखाली के गवाह के साथ हुई घटना को लेकर नही था, मगर ऐसा नहीं है कि वो बंगाल से आ रही खबरों से अनभिज्ञ है। आपको उसके सोशल मीडिया पर SIR के विरोध वाले अपडेट से लेकर चिकन पैटीज वाले के साथ क्या हुआ, इन सब मामलों पर सब मिलेगा। मगर, संदेशखाली के गवाह भोला नाथ घोष पर कुछ नहीं।

यही हाल पूरे इकोसिस्टम का है। अन्य वामपंथी भी रियाजुल की वायरल वीडियो को साझा करके एक रोना रो रहे हैं। उसके दर्द को महसूस कर रहे हैं। उसके लिए आवाज उठाने के लिए, इंसाफ दिलाने के लिए लोगों से अपील कर रहे हैं।

अपनी गुट में ‘बुद्धिजीवी’ कहलाए जाने वाले अपूर्वानंद का कहना है कि ये भारत में रोज की घटना हो गई है। इस तरह के अपराधों को देख हिंदुओं को चिंता होनी चाहिए, लेकिन वो मुस्लिम और ईसाइयों के खिलाफ इस अमानवीयता पर मजे लेते हैं, जिससे इन लोगों को ताकत मिलती है।

इसी तरह एक वामपंथी यूजर सरदश्री घोष का ट्वीट देखिए। ऐसा लगता है कि वीडियो सिर्फ बहाना था, इन लोगों को गीता पाठ कार्यक्रम और हिंदुओं क को निशाना बनाना था। ये यूजर अपने पोस्ट में चिकन पैटीज बेचने वाले शख्स की पिटाई पर ट्वीट करने वालों को ‘भगवा छपरी’ लिख रही हैं। और गीता के पाठ को ‘सो कॉल्ड’ कहते हुए उसका अपमान भी करती है।

इसके बाद तन्मय नाम के TMC समर्थक का ट्वीट देखिए। उसके मुताबिक ये मामला सिर्फ मांसाहारी खाने को बेचने को लेकर है। ये कहाँ बेचा जा रहा था। ग्राहकों को कैसे झूठ बोला जा रहा था इस पर कोई चर्चा नहीं है। उसके ट्वीट का मकसद सिर्फ मोदी आलोचना है और ये दिखाना है कि पहले बंगाल कितना शांतिपूर्ण था।

ये दोगलई नहीं तो और क्या है कि वामपंथी संदेशखाली के गवाह की न बात उठा पा रहे हैं, न बेटे या गाड़ी के ड्राइवर की मौत पर दुख जता पा रहे हैं। जाहिर उनकी विचारधारा है जो कि इस खबर को खबर नहीं मानती। उन्हें स्वीकारना ही नहीं है कि संदेशखाली में बीते समय कैसे महिलाओं ने सामने आकर शेख शाहजहाँ की ज्यादती का खुलासा किया। उन्हें ये खबरें पढ़नी ही नहीं है कि शेख शाहजहाँ पर कोई आरोप लगे, वो गिरफ्तार हुआ। उन्हें जानना ही नहीं है कि नॉर्थ 24 परगना में सिर्फ एक ट्रक ने कार को नहीं कुचला, उसमें दो लोगों की जान चली गई।

संदेशखाली का मुद्दा कब होगा वामपंथियों के लिए खबर

अभी इसी मामले में यदि कहीं से ये झूठी खबर या उड़ती अफवाह भी मिल जाए कि शेख शाहजहाँ निर्दोष है तो शायद लेफ्ट लॉबी के लिए संदेशखाली चर्चा का मुद्दा बने। वो दिखाना शुरू करें कि कैसे ‘बेचारे’ एक नेता को झूठे आरोपों में फँसाया गया, पर अभी चूँकि ऐसा हो नहीं पा रहा तो उन्हें न महिलाओं के दर्द से सरोकार है न पीड़ित के साथ हुए ‘हादसे’ से। संदेशखाली में गवाह के साथ जो हुआ वो दुर्घटना है या साजिश… ये हो सकता है जाँच के बाद सामने आ जाए, लेकिन ये बात सुनिश्चित है कि उस समय भी वामपंथी धड़े के लिए वो खबर चर्चा करने वाली नहीं होगी।

उनके लिए चिंता का केंद्र तब भी ‘रियाजुल’ रहेगा। वो रियाजुल जिसपर हिंदू इसलिए नहीं भड़के कि वो चिकन पैटीज बेच रहा था। हिंदुओं को गुस्सा इसलिए आया क्योंकि वो गीता पाठ कार्यक्रम के आसपास ऐसा करता मिला और जब उससे सवाल पूछा गया तो उसने बताया कि इसमें सिर्फ सब्जी है। इस वाकये के बाद जब पैटीज में मांस मिला तब वहाँ बैठे हिंदुओं को गुस्सा भड़के।

ये सारी जानकारी भले सोशल मीडिया पर साझा हो रही है, लेकिन सच ये है कि इस मामले में एक पक्ष ये भी है जो हिंदू कह रहे हैं। इसके बावजूद हम किसी को मारने पीटने का समर्थन नहीं करते, न उसपर कोई मजे लेते हैं…।

आज जिन लोगों ने रियाजुल के साथ मारपीट की उन लोगों पर पुलिस कार्रवाई कर चुकी है, मामला दर्ज हो चुका है। लेकिन संदेशखाली के गवाह का दर्द कैसे कम होगा ये अब भी सवाल है। भोला घोष ने उस ‘एक्सीडेंट… दुर्घटना… हादसे…’ में अपने बेटे को खो दिया है!

ताकि बढ़े अमेरिकी खजाना, छँटकर आएँ सिर्फ अमीर लोग: जानिए ट्रंप के ‘गोल्ड कार्ड वीजा’ से जुड़ा सब कुछ, अब ₹9 करोड़ में मिलेगी US की नागरिकता

US राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार (10 दिसंबर, 2025) को गोल्ड कार्ड के लिए आवेदन प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा की। इसके साथ ही अमेरिका में धनी निवेशकों और वर्ल्ड क्लास टैलेंट के लिए नागरिकता लेना आसान हो गया है।

नागरिकता लेने के इच्छुक व्यक्ति को $1 मिलियन यानी करीब 8.8 करोड़ रुपए देने होंगे। हालाँकि कंपनियों को कोर्पोरेट वीजा कार्ड के लिए $2 मिलियन यानी 17.6 करोड़ प्रति कर्मचारी देना होगा। ऐसी कंपनी दूसरे कर्मचारी को वीजा ट्रांसफर कर सकती है। इसके लिए दोबारा 17.6 करोड़ रुपए देने की जरूरत नहीं है। यानी वीजा गोल्ड कार्ड किसी व्यक्ति या कंपनी के लिए अमेरिका में लंबे समय तक रहने, काम करने और नागरिकता पाने का एक विकल्प है।

गोल्ड कार्ड क्या है?

गोल्ड कार्ड एक नया US वीज़ा पाने का रास्ता है, जो आवेदकों को यूनाइटेड स्टेट्स की स्थायी नागरिकता देगा। इसका मकसद अमेरिका को आर्थिक तौर पर मालामाल करना है। इसमें $15,000 प्रोसेसिंग फीस यानी 15.33 लाख रुपए और वेटिंग के बाद $1 मिलियन यानी 8.8 करोड़ का गिफ्ट शामिल है। सफल आवेदकों को EB-1 या EB-2 के तहत कानूनी रूप से अमेरिका की स्थायी नागरिकता मिलेगी। पारंपरिक वीजा या ‘ग्रीन कार्ड’ से अलग यह प्रोग्राम खासतौर से अमीरों, इन्वेस्टर्स, बिजनेसमैन या टैलेंटेड प्रोफेशनल के लिए बनाया गया है।

ट्रंप ने व्हाइट हाउस के रूजवेल्ट रूम में बिज़नेस लीडर्स के एक कार्यक्रम में गोल्ड वीजा शुरू करने की जानकारी दी। तभी एप्लीकेशन लेने वाली एक वेबसाइट लाइव हो गई। इसका मकसद EB-5 वीज़ा की जगह लेना है, जिसे अमेरिकी कॉन्ग्रेस ने 1990 में विदेशी निवेश लाने के लिए बनाया था और यह उन लोगों के लिए उपलब्ध था, जो कम से कम 10 लोगों को नौकरी देने वाली कंपनी पर लगभग $1 मिलियन खर्च करते हैं।

ट्रंप नए वर्जन को U.S. के लिए टॉप टैलेंट को आकर्षित करने का तरीका मानते हैं, साथ ही दावा करते हैं कि इससे अमेरिका का खजाना भर जाएगा।

फरवरी 2025 में गोल्ड कार्ड प्रोग्राम की घोषणा करने के बाद राष्ट्रपति ट्रंप लगातार इसको प्रमोट कर रहे हैं। शुरुआत में हर व्यक्ति के लिए इसकी कीमत $5 मिलियन यानी करीब 42 करोड़ रखा गया था, लेकिन सितंबर में इसे घटा कर $1 मिलियन यानी 8.8 करोड़ रुपए कर दिया गया।

इस मौके पर राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा, हमारे लिए बहुत खुशी की बात है कि ट्रंप गोल्ड कार्ड लॉन्च हो गया है। सारा पैसा यूएस सरकार के पास जाएगा और दूसरी बात ये है कि इससे सरकारी खजाने में अरबों डॉलर आएँगे।

गोल्ड कार्ड की कीमत क्या है?

  1. $15,000 यानी 13.55 लाख रुपए DHS प्रोसेसिंग फीस (नॉन-रिफंडेबल)
  2. बैकग्राउंड चेक होने के बाद आवेदक को $1 मिलियन यानी 8.8 करोड़ रुपए बतौर गिफ्ट देने होंगे
  3. डिपार्टमेंट ऑफ स्टेट की एक्स्ट्रा फीस लग सकती है
  4. धनी व्यक्तियों को अमेरिकी की नागरिकता देना मकसद है

राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि गोल्ड कार्ड दरअसल अमेरिका फर्स्ट एजेंडे का हिस्सा है। इससे भारत-चीन जैसे देशों के स्टूडेंट्स की संख्या कम हो जाएगी यानी सिर्फ वर्ल्डक्लास टैलेंट के साथ-साथ सफल कंपनी इससे आकर्षित होंगे।

कॉर्पोरेट गोल्ड कार्ड क्या है?

ट्रम्प कॉर्पोरेट गोल्ड कार्ड कंपनी द्वारा अपने एक या अधिक कर्मचारियों के लिए जारी किया जाता है। कंपनी को प्रति कर्मचारी 15,000 डॉलर यानी 13.55 लाख रुपए का DHS शुल्क देना होता है, जो वापस नहीं होता। वेटिंग पूरी होने के बाद प्रति कर्मचारी 2 मिलियन डॉलर यानी 17.6 करोड़ रुपए देना होता है।

अगर कंपनी किसी कर्मचारी का स्पॉन्सरशिप बदलना चाहे तो नया फिर से 17.6 करोड़ रुपए नहीं देना होगा। पुराना कार्ड नए कर्मचारी के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें 1% सालाना मेंटेनेंस फीस और 5% ट्रांसफर फीस (नई DHS बैकग्राउंड चेक सहित) भी लगती है।

  1. कंपनियाँ विदेशी कर्मचारियों को स्पॉन्सर करने के लिए ये पैसे दे सकती हैं।
  2. हर कर्मचारी के लिए $15,000 यानी 13.55 लाख रुपए प्रोसेसिंग फीस (नॉन-रिफंडेबल)
  3. जाँच के बाद हर कर्मचारी के लिए $2 मिलियन यानी 17.6 करोड़ रुपए गिफ्ट के तौर पर देना होगा
  4. कर्मचारी बदलने की स्थिति में ये पैसा दोबारा नहीं देना होगा
  5. 1% सालाना मेंटेनेंस फीस और 5% ट्रांसफर फीस लगेगी (कर्मचारी बदलने पर)

प्लेटिनम कार्ड क्या है?

ट्रंप का प्लेटिनम कार्ड भी शुरू होने वाला है। इसके लिए $1500 फीस 13.55 लाख रुपए के साथ-साथ $5 मिलियन यानी करीब 42 करोड़ रुपए बतौर गिफ्ट देना होगा। इसका फायदा यह होगा कि प्लेटिनम धारकों को 270 दिनों तक अमेरिका में कोई टैक्स नहीं लगेगा। किसी तरह की ट्रेवल वीजा की जरूरत नहीं होगी। प्लैटिनम कार्ड वाले व्यक्ति को विदेश से कमाई हुई इनकम पर अमेरिका में कोई टैक्स नहीं देना पड़ेगा।

कार्ड धारकों को क्या-क्या सुविधाएँ मिलेगी

गोल्ड कार्ड के अंतर्गत नागरिकता हमेशा के लिए मिलेगी। उन्हें पासपोर्ट के साथ साथ वोटिंग का अधिकार मिलेगा। अमेरिका के नागरिकों को जितनी भी सुविधाएँ मिलती हैं, वह सब ऐसे नागरिकों को मिलेंगे। दरअसल ये ग्रीन कार्ड के जरिए मिलने वाले स्थायी नागरिकता की तरह है।

ये वीजा कार्यक्रम धनी विदेशियों के लिए हैं, ताकि भारी भरकम पैसे देकर वो अमेरिका की सेवा कर सकें। इसका मकसद आम लोगों की अमेरिका में एंट्री रोकना है। राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि सिर्फ विश्वस्तरीय टैलेंटेड लोगों को ही वीजा मिलेगा। ऐसे लोगों को अमेरिका में बसने का मौका नहीं दे सकते, जो अमेरिकियों की नौकरियाँ छीनते हैं।

सरकारी खजाने में पैसा जमा होने पर अमेरिकियों पर लगने वाले टैक्स में कमी आएगी और सरकारी कर्ज चुकाया जा पाएगा।

परिवार का सदस्य भी ट्रंप गोल्ड कार्ड के लिए आवेदन कर सकता है। इसमें पति-पत्नी और 21 साल के छोटे अविवाहित बच्चे मुख्य आवेदक के साथ शामिल किए जा सकते हैं। परिवार के हर सदस्य के लिए 15,000 डॉलर DHS शुल्क और 1 मिलियन डॉलर बतौर गिफ्ट देना होगा।

कैसे करें आवेदन

  1. वेबसाइट https://trumpcard.gov/ पर ऑनलाइन जाएँ
  2. तीन कार्ड के विकल्प मिलेंगे- गोल्ड कार्ड, कॉर्पोरेट कार्ड और प्लेटिनम वेटलिस्ट
  3. विकल्प चुनने के बाद अपनी व्यक्तिगत जानकारी भरें ( नाम, जन्म, पता, परिवार, नागरिकता आदि)
  4. बताए गए निर्देशों के मुताबिक myUSCIS.gov अकाउंट बनाएँ
  5. DHS प्रोसेसिंग फीस $15,375 यानी 13.89 लाख रुपए ( क्रेडिट कार्ड डिस्चार्ज के साथ) जमा करें
  6. क्रेडिट कार्ड (अमेरिकी व अंतरराष्ट्रीय) या ACH डेबिट (केवल अमेरिकी बैंक) का इस्तेमाल करें
  7. प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार करें
  8. बतौर गिफ्ट $1 मिलियन या $2 मिलियन जमा करें।
  9. ईमेल के निर्देश के मुताबिक ACH डेबिट या Swift वायर ट्रांसफर के माध्यम से करें

प्रोसेसिंग फीस जमा होने के बाद आवेदक की जाँच काफी कड़ाई से की जाती है। अप्रूवल प्रोसेस में आमतौर पर हफ़्ते लग जाते हैं। आवेदक को वीज़ा इंटरव्यू में शामिल होना जरूरी है और डॉक्यूमेंट वक्त रहते जमा करना और किसी तरह का सवाल पूछे जाने पर उसका जवाब वक्त पर देना जरूरी है।

गोल्ड कार्ड स्टेटस को रद्द करने का प्रावधान में इसमें शामिल किया गया है। अगर अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो या गंभीर आपराधिक मामला दर्ज हो जाए और वीजा धारक दोषी पाया जाए, तो उसकी वीजा रद्द कर दी जाएगी। अमेरिकी नागरिक या पहले से ग्रीन कार्ड वाले इनमें से किसी भी कार्ड के लिए अप्लाई नहीं कर सकते।

जिस भारतीय अर्थव्यवस्था पर ट्रंप ने कभी उठाए सवाल, अब उसी में ₹1 लाख करोड़ का निवेश करेंगे खुद: जानिए ‘भारत फ्यूचर सिटी’ प्लान के बारे में सब, जिसपर फिदा हुआ उनका मीडिया ग्रुप

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को ‘डेड इकोनॉमी’ बताने के बाद देश के डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स में निवेश करने का फैसला किया है। हाल ही में ट्रंप मीडिया एंड टेक्नोलॉजी ग्रुप (TMTG) ने तेलंगाना में बड़ा निवेश करने का वादा किया है। ट्रंप के मीडिया समूह TMTG ने अगले 10 सालों में तेलंगाना की भारत फ्यूचर सिटी (Bharat Future City) में ₹1 लाख करोड़ तक के निवेश की योजना की घोषणा की है।

ट्रंप के मीडिया TMTG ने घोषणा में क्या कहा?

दरअसल, ट्रंप मीडिया एंड टेक्नोलॉजी ग्रुप (TMTG) ने 08 दिसंबर 2025 को तेलंगाना राइजिंग ग्लोबल समिट 2025 के उद्घाटन समारोह में घोषणा की है कि वह आने वाले 10 सालों में तेलंगाना की भारत फ्यूचर सिटी और आसपास के विकास क्षेत्रों में लगभग ₹1 लाख करोड़ तक निवेश करेगा। यह घोषणा करते हुए TMTG के प्रतिनिधि एरिक स्वाइडर ने कहा कि वह इस अवसर के लिए बहुत आभारी हैं।

स्वाइडर ने कहा कि इस बात को नजरअंदाज करना अंधापन होगा कि दुनियाभर के प्रौद्योगिकी पूंजीपति भारत से आ रहे हैं और देश प्रगति पर है। उन्होंने कहा, “भारत से काफी प्रतिभाएँ सामने आ रही हैं। और अब अगर आप आज की स्थिति देखें, तो यह मानना गलत होगा कि दुनियाभर के प्रौद्योगिकी पूंजीपति भारत से ही आ रहे हैं।”

एरिक स्वाइडर ने आगे कहा, “भारत प्रगति कर रहा है और मुझे नहीं लगता कि भारत रुकने वाला है। मेरा मानना है कि भारत निरंतर प्रगति करता रहेगा और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व करेगा।”

एक अधिकारिक रिलीज के अनुसार, TMTG पहले ही ₹41,000 के समझौतों पर हस्ताक्षर कर चुका है। इन समझौतों के तहत कंपनी तेलंगाना में एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया और स्मार्ट टेक्नोलॉजी हब बनाने जा रहा है। इस प्रोजेक्ट से हजारों रोजगार पैदा होंगे और भारत में TMTG की बढ़ती उपस्थिति भी मजबूत होगी।

क्या है तेलंगाना में बनने जा रही भारत फ्यूचर सिटी?

भारत फ्यूचर सिटी, तेलंगाना सरकार की एक परियोजना है, जिसे हैदराबाद के रंगारेड्डी जिले में विकसित किया जा रहा है। इसे एक आधुनिक, स्मार्ट और टिकाऊ शहर बनाने का लक्ष्य रखा गया है, जहाँ रहने, काम करने, शिक्षा, स्वास्थ्य और मनोरंजन की सभी सुविधाएँ एक ही जगह उपलब्ध होंगी। इस शहर को कई हिस्सों में बाँटकर तैयार किया जाएगा:

  • टेक्नोलॉजी और इनोवेशन जोन: जहाँ AI, इलेक्ट्रॉनिक्स, EV और हाई-टेक कंपनियाँ आएँगी।
  • फार्मा और हेल्थकेयर जोन: जहाँ दवाइयोमं और मेडिकल रिसर्च से जुड़े बड़े उद्योग लगेंगे।
  • मैन्युफैक्चरिंग जोन: जहाँ बड़े पैमाने पर उत्पादन करने वाली कंपनियाँ आएँगी।
  • शैक्षणिक और रिसर्च संस्थान: ताकि लोग यहीं पढ़ाई करके यहीं नौकरी कर सकें।
  • आवासीय और मनोरंजन क्षेत्र: जहाँ अच्छे घर, पार्क, मॉल और स्पोर्ट्स सुविधाएँ होंगी।
  • ग्रीन जोन और रिजर्व फॉरेस्ट: ताकि शहर हरियाली और पर्यावरण के साथ संतुलन में रहे

यह सिर्फ एक नया शहर नहीं होगा, बल्कि आने वाले समय की जरूरतों के अनुरूप तकनीक, उद्योग और रोजगार का केंद्र भी बनेगा। इस शहर का कुल क्षेत्रफळ लगभग 765 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें 56 गाँव और 7 मंडल शामिल हैं। सरकार ने इसके लिए फ्यूचर सिटी डेवलपमेंट ऑथरिटी (FCDA) का गठन किया है, जो शहर की योजना, जोनिंग, भू-अधिग्रहण और निर्माण कार्यों की देखरेख करेगा।

इस शहर को भारत की पहली ‘नेट-जीरो‘ स्मार्ट सिटी बनाने का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें ऊर्जा का इस्तेमाल पर्यावरण के अनुकूल होगा, कार्बन का उत्सर्जन न्यूनतम होगा और ग्रीन बिल्डिंग, कचरा प्रबंधन, जल प्रबंधन और हरे-भरे क्षेत्र होंगे। शहर में आधुनिक बुनियादी ढाँचे के साथ चौड़ी सड़कें, मेट्रो, बस रैपिड ट्रांजिट, स्मार्ट ट्रैफिक सिस्टम और डिजिटल नेटवर्किंग जैसी सुविधाएँ भी होंगी।

कौन-कौन से देश ‘भारत फ्यूचर सिटी’ में कर रहे निवेश?

सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि कई अन्य देश भी तेलंगाना में विकसित हो रही भारत फ्यूचर सिटी में निवेश कर रहे हैं। इनमें जापान, वियतनाम, कनाडा, सिंगापुर की बड़ी-बड़ी कंपनियाँ भी इस परियोजना की निवेशक हैं।

जापान की ट्रेडिंग कंपनी Marubeni Corporation लगभग ₹1000 करोड़ का निवेश कर एक बड़ा इंडस्ट्रियल पार्क बना रही है। सिंगापुर की Asia Gateway Infrastructure & Data Center (AGIDC) फ्यूचर सिटी में एक बड़े इंटरनेशनल गेटवे डेटा सेंटर बनाने के लिए ₹67000 करोड़ निवेश करने जा रही है।

इसके अलावा वियतनाम की सबसे बड़ी कंपनी में से एक Vingroup ने तेलंगाना सरकार के साथ लगभग ₹30,000 करोड़ निवेश का समझौता किया है। यह निवेश स्मार्ट-सिटी डेवलपमेंट, इलेक्ट्रिक वाहनों, रिन्यूएबल एनर्जी, हेल्थकेयर और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में किया जाएगा।

कनाडा की कंपनी ग्लोबल इन्वेस्टमेंट समूह Brookfield के नेतृत्व में एक कंसोर्टियम ने करीब ₹75,000 करोड़ निवेश का प्रस्ताव दिया है, जो ‘नेट जीरो इनोवेशन जोन’ विकसित करेगा।

ट्रंप ने भारत को बताया था ‘डेड इकोनॉमी’

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर बुधवार (30 जुलाई, 2025) को 25% टैरिफ का ऐलान किया था। ट्रंप ने इसी के साथ कहा था कि भारत के रूस से हथियार सौदों और तेल-गैस खरीदने के चलते भारत अपर अतिरिक्त टैरिफ भी लगेगा। ट्रंप ने इसके बाद गुरुवार (31 जुलाई, 2025) को भारत और रूस को ‘डेड इकॉनमी’ बता दिया। उनका इशारा था कि दोनों देश एक साथ हैं और अब वह जो चाहें वो करें।

भारत में ट्रंप के प्रोजेक्ट्स

भारत को ‘डेड इकोनॉमी’ बताने वाले डोनाल्ड ट्रंप ने उसी भारत को अपना सबसे बड़ा विदेशी बाजार माना है। साल 2012 में पहले प्रोजेक्ट से लेकर अब साल 2025 तक ट्रंप का रीयल-एस्टेट फूटप्रिंट 6 शहरों के फैले प्रोजेक्ट्स के साथ लगभग 252.5 एकड़ तक पहुँच गया है।

ट्रंप के मुंबई, पुणे, गुरुग्राम और कोलकाता में रिहायशी और ऑफिस-टावर प्रोजेक्ट्स हैं। हाल ही में ट्रंप वर्ल्ड सेन्टर पुणे लॉन्च हुआ है, जिसके अंतर्गत 27-27 मंजिला के दो टावर बनाए जाएँगे। यह ट्रंप का पहला कमर्शियल रियल-एस्टेट प्रोजेक्ट है।

वहीं, उत्तर भारत के पास NCR क्षेत्र में Trump Residences नाम का प्रोजेक्ट है। यह ऐसा प्रोजेक्ट है, जिसे लॉन्च होते ही खरीदारों ने खरीद लिया। इसमें दो 51 मंजिला टावर में 298 फ्लैट्स हैं, जिनकी पहले ही दिन करोड़ों रुपए में बुकिंग हुई थी।

मतलब साफ है कि ट्रंप ऑर्गेनाइजेशन देख चुका है कि भारत में रियल-एस्टेट, निवेश और प्रगति की गुंजाइश है। ट्रंप के दावे के मुताबिक भारत एक ‘डेड इकोनॉमी’ होती तो शायद ट्रंप कभी भारत में विकास परियोजनाओं के भागीदारी नहीं बनते।