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2020 में अंकुरित हुआ था जो वामपंथी विष बेल, उसे 5 साल में ही बिहार ने फिर से किया दफन

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 कई दूरगामी राजनीतिक संदेश देने वाला रहा है। सत्तारूढ़ NDA को मिले स्पष्ट बहुमत ने जहाँ एक और दिखाया कि मतदाता अभी भी नीतीश कुमार की साफ छवि और विकासवादी राजनीति के साथ खड़े हैं। वहीं, RJD के खराब प्रदर्शन ने दिखाया कि उनका कोर वोट बैंक MY (मुस्लिम-यादव) भी उनसे छिटक रहा है। AIMIM को मिली 5 सीटों से उनके मुस्लिम बहुल इलाकों में पैठ बनाने की पुष्टि हुई तो बिहार ने एक बार फिर वामपंथ की ‘विषैली राजनीति’ को नकार दिया।

गुणा-गणित से 3 सीटों तक पहुँचीं लेफ्ट पार्टियाँ

इस विधानसभा चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्ससिस्ट-लेनिनिस्ट) (लिबरेशन) को जहाँ 2 सीटें मिलीं तो वहीं कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्ससिस्ट) के हाथ केवल एक सीट लगी। इन तीनों सीटों पर भी लेफ्ट के विचार से ज्यादा असर निर्दलीय उम्मीदवारों के गुणा-गणित का दिखाई पड़ा।

काराकाट सीट पर CPI (ML) (L) को 2,836 वोटों से जीत मिली तो इस सीट पर निर्दलीय चुनाव लड़ रहीं भोजपुरी सुपरस्टार पवन सिंह की पत्नी ज्योति सिंह को 23,469 वोट मिले। कमोबेश यही स्थिति लेफ्ट को मिली अन्य 2 सीटों पर दिखाई पड़ी। यानी अगर सीधा मुकाबला होता तो शायद लेफ्ट के हाथ ये सीटें भी ना आतीं।

जब बिहार ने RJD को किया था खारिज

दिलचस्प यह है कि यह पहली बार नहीं है जब वामपंथी दलों या RJD को बिहार ने इस तरह से नकारा हो। 2010 में RJD की ऐतिहासिक हार के बाद माना गया कि बिहार ने जंगलराज को प्रश्रय देने वाली पार्टी को जमीदोज कर दिया था। उसके उस स्मृति से हमेशा के लिए दूरी बना ली है जो उसके पिछड़ेपन का प्रतीक बनी हुई थी। नीतीश कुमार के सुशासन मॉडल ने उस जनमत को और मजबूत किया। RJD को उस चुनाव में केवल 22 सीटें मिली थीं।

2010 बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम (साभार: ECI)

हालाँकि, 2015 आते-आते नीतीश कुमार के राजनीतिक प्रयोगों के कारण RJD फिर जिंदा दिखाई देने लगी और उसकी नीतीश कुमार के साथ सत्ता में वापसी हो गई। इसके अगले चुनाव में भी हालात RJD के अनूकुल दिखाई दिए लेकिन उसके पीछे की बड़ी वजह चिराग पासवान थे। चिराग पासवान 2020 के चुनावों के दौरान नीतीश कुमार से नाराज थे और उनकी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए थे।

इसके कारण RJD को मदद मिली और पार्टी एक बार फिर ताकतवार बनकर वापस लौटी। हालाँकि, कॉन्ग्रेस-RJD की जीत फिर भी इतनी बड़ी नहीं थी कि उन्हें सत्ता दिला पाती। इसी चुनाव में वामपंथी दलों ने भी वापसी की थी। 2020 के चुनावों में CPI (ML) (L) को 12 तो CPI और CPI (M) को 2-2 सीटें मिलीं। यानी लंबे वक्त पहले जिस वामपंथ को बिहार ने खारिज कर दिया था वो 16 सीटों के साथ उसके फिर से वापसी करने की अटकलें लगने लगी थीं।

2015-2020 बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे (फोटो: PRS India)

2024 में लोकसभा चुनावों में भी CPI (ML) (L) ने बिहार में 2 सीटों पर जीत दर्ज की और लगने लगा की लेफ्ट की पार्टियाँ बिहार में एक बार फिर दम दिखा रही हैं। CPI-ML ने यह संकेत दिया कि बिहार के कुछ हिस्सों में उसकी जमीन अब भी सुरक्षित है।

2024 बिहार लोकसभा चुनाव परिणाम (ECI)

चिराग द्वारा दी गई ऑक्सीजन जब इस वार वामपंथियों और RJD से हटी तो उन्हें अपनी असलियत दिख गई। बिहार की जनता से RJD और वामंपथी दलों की एक बार फिर से सूपड़ा साफ कर दिया। जनता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर अपना विश्वास और पुख्ता किया है। जिस तरह से एकजुट होकर NDA ने चुनाव लड़ा उससे अगर वोटरों के मन में कोई शंका थी भी तो वो भी दूर हो गई। जनता ने स्पष्ट और एक तरफा मत दिया, वोटों की इस सुनामी में वामपंथी दल साफ हो गए।

फिर से ना पनपे ‘विष बेल’: अब NDA की जिम्मेदारी

अब NDA के सामने भी चुनौती है कि वो इस जनादेश का सम्मान करे। जनता ने उसे सिर्फ ‘विकल्प’ नहीं बनाया है बल्कि पूर्ण ‘विश्वास’ भी दिया है। यह विश्वास इस बात पर आधारित है कि NDA बिहार को उन पुराने दौरों में वापस नहीं ले जाएगा जिनमें वामपंथी उग्रवाद, जातीय हिंसा, आपराधिक राजनीति और संस्थागत दुर्बलता हावी रहती थी।

NDA को भी यह समझना होगा कि आगे वो ऐसे किसी भी राजनीतिक प्रयोग से बचें जिससे वामपंथी दलों को फिर से ताकत मिल सके। यह जनमत अतीत को दफन करने का विश्वासमत है। यह जनमत दिखाता है कि बिहार के लोग अपने सुरक्षित भविष्य के लिए NDA पर भरोसा कर रहे हैं। PM मोदी और नीतीश कुमार पर भरोसा कर रहे हैं।

जनता ने स्थिरता और विकास के नाम पर फैसला सुनाया है। यह फैसला सिर्फ NDA के पक्ष में नहीं है बल्कि यह फैसला उस बिहार के पक्ष में है जो आगे बढ़ना चाहता है, जो अपने युवा को अवसर देना चाहता है और जो किसी भी कीमत पर अराजकता के दौर में वापसी नहीं चाहता।

रील में अर्श पर, रियल में फर्श पर: प्रशांत किशोर की जनसुराज बिहार की जमीन पर क्यों हो गई साफ?

बिहार विधानसभा चुनाव में लड़ाई तो मुख्य रूप से सत्तारूढ़ राजग और विपक्षी दलों के महागठबंधन के बीच थी, लेकिन तमाम निगाहें एक और मोर्चे पर भी लगी हुई थीं। यह मोर्चा था चुनावी रणनीतिकार से नेता बनने की कवायद में जुटे प्रशांत किशोर की चुनावी पारी की शुरुआत और उसका परिणाम। उनकी नई नवेली जनसुराज पार्टी अपना खाता खोलना तो दूर इक्का-दुक्का सीटों को छोड़कर अपनी जमानत बचाने तक में नाकाम हुई।

सक्रिय राजनीति का पहला चुनावी ककहरा प्रशांत किशोर के लिए यही सिखाने वाला रहा कि चुनाव लड़वाने और लड़ने में जमीन-आसमान का फर्क है। चौबे जी छब्बे बनने गए और दुबे बनकर लौटे-वाली कहावत प्रशांत किशोर पर एकदम सटीक बैठती हुई दिख रही है।

वह इस कारण कि ऐसी चुनावी शिकस्त से रणनीतिकार के रूप में उनका कद भी घटेगा और संभव है कि भविष्य में उनकी कंपनी ‘आईपैक’ को मिलने वाले कामकाज पर भी इसका कोई असर पड़े।

बहरहाल, नेता के रूप में प्रशांत किशोर की पहली पारी एकदम फीकी रही। चुनाव से पहले बड़े-बड़े दावे करने वाले प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी जन के मन पर कोई छाप छोड़ने में सफल नहीं हो सकी। 243 सदस्यों वाली बिहार विधानसभा के लिए जनसुराज ने 238 उम्मीदवार उतारे। इनमें से लगभग 98% (233 उम्मीदवारों) की जमानत जब्त हो गई।

इस लिहाज से ये चुनाव प्रशांत किशोर के लिए राजनीतिक तौर पर गहरा झटका साबित हुआ है। चुनाव से पहले उन्होंने राज्य भर में व्यापक दौरे किए और पदयात्रा निकालकर लोगों से संपर्क भी साधा।

बड़े बड़े दावे, नहीं आए काम

जनसुराज के गठन से पहले प्रशांत किशोर ने 5 मई 2022 से 2 अक्टूबर 2024 तक 6 हजार किलोमीटर की पैदल यात्रा की। 5000 गाँवों तक पहुँचकर सभाएँ की। बिहार चुनाव से पहले वोटर्स को अपने पाले में लाने के लिए 1,280 दिन तक बिहार के चप्पे-चप्पे पर पहुँचने के जुगत में लगे रहे पर चुनाव के नतीजों में उनके हाथ कुछ न लगा।

उन्होंने चुनाव को एक जन आंदोलन के रूप में पेश करने का प्रयास किया, लेकिन उनकी यह कोशिश रंग नहीं ला पाई। चुनाव परिणाम में उनके लिए एकदम स्पष्ट सीख और संदेश रहा कि आँकड़ेबाजी और रणनीतिक तिकड़मों और जनता की नब्ज समझना एकदम विपरीत मुद्दे हैं।

चुनाव से पहले मीडिया से लेकर सोशल मीडिया पर प्रशांत किशोर और जनसुराज का बड़ा शोर सुनाई पड़ रहा था, लेकिन सुर्खियों, खबरों से लेकर नैरेटिव के मोर्चे पर मची यह हलचल जनमत की दशा-दिशा को किसी भी तरह प्रभावित करने में नाकाम दिखी।

स्पष्ट है कि दूसरों को परीक्षा की तैयारी कराने वाले प्रशांत जब खुद अपने इम्तिहान में बैठे तब या तो उनकी तैयारी पर्याप्त नहीं थी या फिर वह अति-आत्मविश्वास के शिकार थे। दोनों ही परिस्थितियों में परिणाम वही निकलना था जो अंततः सामने भी आया। 1 करोड़ से ज्यादा सदस्यों का दावा करने वाली जनसुराज पार्टी को 10 लाख वोट भी नहीं मिल सके।

प्रशांत को मिली पटखनी के प्रमुख कारण

प्रशांत किशोर की हार के लिए कई हद तक उनकी ही रणनीति जिम्मेदार है। पार्टी का संगठनात्मक ढांचा और जनसंपर्क दोनों ही कमजोर थे। प्रशांत किशोर ने इस चुनाव को एक बड़े जन आंदोलन के रूप में पेश किया था, लेकिन चुनावी नतीजों ने दिखा दिया कि जनता ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। कुछ बिंदुओं में इसे समझा जा सकता है-

  • जनता के मुद्दों को संबोधित न कर पाना- प्रशांत किशोर बिहार के जमीनी मुद्दों को अनदेखा करते हुए ऐसे मुद्दे उठाते रहे, जिनती अनुगूंज जनता के बीच सुनाई नहीं दी। वे गुजरात जैसे राज्यों के उदाहरण गिनाकर बिहार के पिछड़ेपन का जिम्मेदार बताते रहे। आज के दौर में जब हर व्यक्ति के पास जागरूकता के कई माध्यम उपलब्ध हैं, तब जनता को इस तरह बरगलाना आसान नहीं। इस वास्तविकता को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि चाहे गुजरात हो या फिर तमिलनाडु जैसा औद्योगिक मोर्चे पर अग्रणी कोई अन्य राज्य, वह उस स्थिति में एकाएक नहीं पहुँचा और बिहार को रातोंरात उस मुकाम पर पहुँचा पाना भी संभव नहीं। इसी तरह बिहार से विस्थापन और पलायन का रुझान भी एकाएक शुरू नहीं हुआ। इन स्थितियों को सुधारने के लिए समय की आवश्यकता होगी और संक्रमण की इस अवधि में जरूरी जमीन भी तैयार करनी होगी। ऐसे में प्रशांत के बिहार के साथ पक्षपात और एकाएक बनी स्थितियों के आरोप जनता के गले नहीं उतरे।
  • व्यावहारिकता के बजाय कल्पनालोक में विचरण- अपने विमर्श में प्रशांत किशोर ने हरसंभव तरीके से यह दिखाने का प्रयास किया कि बिहार की दशा-दिशा सुधारने की उनकी मंशा एकदम भली है, लेकिन अपने इरादों को सिरे चढ़ाने के लिए वह कोई कारगर ब्लूप्रिंट नहीं सुझा सके। इस मामले में उनके दावे भी तेजस्वी यादव जैसे रहे, जिन्होंने हर एक घर से सरकारी नौकरी देने से लेकर महिलाओं को मकर संक्रांति पर 30,000 रुपये देने का वादा किया। तेजस्वी की तरह प्रशांत के वादे भी जनता को न समझ आए और न ही उन पर भरोसा हो पाया।
  • वैचारिक शून्यता- राजनीति में वैचारिक आग्रह की हमेशा से एक अहम भूमिका होती है, जो प्रमुख नीतिगत मुद्दों पर भी अपना एक स्पष्ट दृष्टिकोण रखता है। इस मामले में प्रशांत किशोर की जनसुराज की स्थिति दिल्ली से आम आदमी पार्टी के रूप में शुरू हुए राजनीतिक प्रयोग के जैसी रही, जिसकी भी वैचारिक मुद्दों पर कोई स्पष्टता नहीं थी। बिहार जैसे राजनीतिक रूप से जागरूक एवं संवेदनशील राज्य में तो वैचारिक दिशा की भूमिका और अहम हो जाती है, जिसे प्रशांत किशोर समय रहते समझ नहीं पाए।
  • सांगठनिक ढांचे के बजाय पेशेवर प्रणाली पर दांव- किसी भी राजनीतिक दल की ताकत उसके कार्यकर्ता होते हैं। इसलिए कैडर बहुत महत्वपूर्ण होता है। यह कैडर अमूमन वैचारिक दिशा से ही प्रेरित होता है और खुद को राजनीतिक दलों की गतिविधियों में एक अंशभागी के रूप में देखता है। उसका अपने दल के साथ एक भावनात्मक लगाव भी होता है। भावनाओं और वैचारिक खुराक की जुगलबंदी के अभाव में कार्यकर्ता दुविधा एवं भ्रम के शिकार हो जाते हैं। प्रशांत किशोर ने अपना ऐसा सांगठनिक ढांचा विकसित करने के बजाय पेशेवर लोगों को प्राथमिकता दी, जिनके लिए यह किसी सामान्य कवायद जैसा ही रहा। उनकी शिकस्त में यह भी एक कारण रहा कि वह अपने पीछे ऐसे लोगों को लामबंद नहीं कर पाए, जो कड़ी के रूप में और जनता को अपने साथ जोड़ पाते।
  • गलत टिकट वितरण- टिकट वितरण में भी प्रशांत किशोर का रवैया ऐसा रहा कि वह किसी राजनीतिक लड़ाई के बजाय किसी कारपोरेट ढांचे में काम करने जा रहे हैं। उन्होंने जनता के बीच पैठ के बजाय उम्मीदवारों की निजी उपलब्धियों को ज्यादा तरजीह दी। अमूमन विधान परिषद या राज्यसभा के मामले में ऐसा होता है, लेकिन पंचायत से लेकर विधानसभा और लोकसभा जैसे चुनावों में जनता से नेता का जुड़ाव और उसकी लोकप्रियता कहीं ज्यादा मायने रखती है। इसमें भी प्रशांत मात खा गए और वह ऐसे दमदार उम्मीदवार नहीं तलाश पाए। यही कारण रहा कि जीतना तो दूर वह वोट काटने की स्थिति में भी नहीं आ पाए।
  • खुद चुनाव न लड़ना- खुद चुनाव से कन्नी काटकर प्रशांत किशोर ने अपने कार्यकर्ताओं को निराश किया। यह भी एक कारण रहा कि उनका चुनाव अभियान कभी परवान ही नहीं चढ़ पाया। अगर वह खुद चुनाव लड़ते तो उनकी पार्टी और कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ता। उन्हें आम आदमी पार्टी के प्रयोग से भी यह सीख लेनी चाहिए थी अपने पहले ही चुनाव में अरविंद केजरीवाल ने शीला दीक्षित के खिलाफ मोर्चा खोला और उसे जीता भी। इस तरह की चुनौतियां प्रस्तुत करने में जोखिम तो जरूर रहता है, लेकिन बिना जोखिम के प्रतिफल भी हासिल नहीं होता। प्रशांत किशोर का चुनाव लड़ने से किनारा करना उनके रक्षात्मक रवैये को ही जाहिर करने वाला रहा। इस मामले मे स्थिति तब और खराब हो गई, जब पहले उन्होंने तेजस्वी यादव के खिलाफ चुनाव में उतरने के संकेत दिए थे।
  • बड़े बड़े दावे करना- एक के बाद एक इंटरव्यू और रैलियों में प्रशांत किशोर बड़े-बड़े दावे करते दिखे। कई बार अनावश्यक आक्रामकता भी उन पर हावी दिखी। वह जदयू, भाजपा और राजद जैसे दलों के साथ ही तेजस्वी, नीतीश और मोदी जैसे नेताओं पर निजी हमले भी करते रहे। उनका यह प्रचार पूरी तरह नकारात्मक रहा, जो कई बार उलटा ही पड़ता है।

नामी प्रत्याशी फिर भी जब्त हो गई जमानत

प्रशांत किशोर की पार्टी से खड़े हुए लगभग सभी प्रत्याशियों की जमानत जब्त हुई। हैरानी वाली बात ये रही कि इनमें से ज्यादातर काफी नामी और प्रतिष्ठित बैकग्राउंड से हैं। फिर भी जनता को इनके नामों को नकार दिया।

लता सिंह- अस्थावां सीट से खड़ी हुई। पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह की बेटी होने के बावजूद लता सिंह को जनता ने पूरी तरह नकार दिया और जमानत जब्त हो गई। एक तरह से जनता ने वंशवाद को नकार कर परिवारवाद की राजनीति को पूरी तरह खारिज कर दिया।

कुमारी पुनम सिन्हा- महिला प्रत्याशी होने के बावजूद पुनम सिन्हा को कोई खास समर्थन नहीं मिला। वह लालू यादव के गढ़ राघोपुर से उतरीं, लेकिन पूरी तरह हार गईं। इस जगह पर जनसुराज ने जातीय समीकरण साधने की कोशिश की, लेकिन जनता ने इसे भाव नहीं दिया।

तनुजा कुमारी- पूर्व जिला परिषद सदस्य होने और स्थानीय स्तर पर पहचान रखने वाली तनुजा ने कारगाह से चुनाव लड़ा और जमानत जब्त करा बैठीं। यहाँ जनसुराज ने स्थानीय चेहरों को टिकट तो दिया, लेकिन संगठनात्मक समर्थन नहीं दिखा पाए।

बिहार शरीफ सीट- नगर निगम के पूर्व महापौर को टिकट दिया गया, व्यापक प्रचार भी किया लेकिन जनता ने उन्हें भी नकार दिया। एक तरह से प्रशांत के पुराने चेहरों को नए रंग में पेश करने की कोशिश विफल रही।

रितेश पांडे- चर्चित नाम वाले रितेश सीवान से खड़े हुए पर चुनाव में तीसरे स्थान पर पहुँचे। जनसुराज ने प्रचार में सोशल मीडिया और इन्फ्लुएंसरों पर ज्यादा भरोसा किया फिर भी रितेश की जमानत जब्त हो गई। यह साफ तौर पर बताता है कि प्रशांत सोशल मीडिया की चमक में जमीनी वोट साध नहीं पाए।

के.सी. सिन्हा- एक अनुभवी चेहरा होने के चलते सिन्हा पटना साहिब से चुनाव लड़े पर हार गए। उनकी हार ने जनसुराज पार्टी के अंदर चल रही वैचारिक अस्पष्टता को जग जाहिर कर दिया।

सरफराज आलम- पूर्व सांसद सरफराज आलम कोचाधामन सीट से उतरे, लेकिन तीसरे स्थान पर रहे और जमानत जब्त हो गई। यहाँ जनसुराज ने मुस्लिम वोट बैंक को साधने की कोशिश की, लेकिन जनता ने इसे असली मुद्दों से भटकाव माना।

प्रशांत किशोर ने खुद चुनाव नहीं लड़ा, कार्यकर्ताओं की जगह पेड कैडर रखे, और सोशल मीडिया पर ज्यादा भरोसा किया। नतीजा यह हुआ कि पार्टी प्रशांत के बयान के अनुसार सीधे ‘फर्श’ पर ही आ गई।

अपने ही बयान में फँसे प्रशांत किशोर

प्रशांत किशोर ने बिहार विधानसभा चुनाव से पहले कई बार कहा था कि उनकी जनसुराज पार्टी ‘अर्श पर रहेगी या फर्श पर रहेगी‘ यानी या तो बहुत ऊँचाई पर जाएगी या पूरी तरह नीचे गिर जाएगी। चुनाव परिणामों में यह बयान कड़वी हकीकत बन गया, क्योंकि पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी।

इनके अलावा सोशल मीडिया पर प्रशांत किशोर का एक वीडियो भी तेजी से वायरल हुआ जिसमें वे अपना माथे से तिलक को मिटाते दिखे। यह वीडियो बिहार की जनता के बीच काफी विवादित रहा और इसने प्रशांत किशोर के प्रति नकारात्मक भावनाओं को और बढ़ाया। इस घटना के बाद से भी उनकी छवि जनता के बीच नकरात्मक बनी है।

बिहार के मुस्लिमों को विकास का एजेंडा नहीं कबूल, मजहब और BJP विरोध ही अब भी मतदान का पैटर्न: जानिए ओवैसी की ‘घुसपैठ’ क्यों हुई गहरी, क्या हैं इसके मायने

बिहार विधानसभा चुनाव में विपक्षी महागठबंधन की बुरी हार हुई है। 243 सीटों वाली विधानसभा में जहाँ NDA को 200 से अधिक सीटें मिलीं तो वहीं महागठबंधन 35 सीटों पर सिमट गया है। हालाँकि, 28 सीटों पर चुनाव लड़ने वाले असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ने भी इस चुनाव में 5 सीटें जीती हैं। ओवैसी की सारी सीटें मुस्लिम बहुल सीमांचल इलाके में आई हैं।

इस चुनाव में AIMIM की सफलता दिखाती है कि बिहार के एक बड़े मुस्लिम वर्ग के लिए अब मजहबी पहचान पर आधारित राजनीति ही निर्णायक बनती जा रही है। मुसलमान अब ऐसे नेतृत्व की तलाश में हैं जो उनकी मजहबी पहचान के साथ और अधिक खुलकर खड़ा हो। AIMIM की राजनीति की जड़ें मजहबी पहचान में ही हैं। पार्टी खुद को एक ‘मुस्लिम प्लेटफॉर्म’ की तरह पेश करती है।

ओवैसी की इस जीत से एक बात और साफ होती है कि उन्होंने सीमांचल में दमदार ‘घुसपैठ’ कर ली है। RJD की रीढ़ माने जाने वाले MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण को उन्होंने तोड़ दिया है। AIMIM के प्रदर्शन से साफ है कि ओवैसी ने RJD के मुस्लिम वोटों को अपने पाले में कर लिया है। उन्होंने अब सीमांचल में अपना एक जनाधार खड़ा कर लिया है।

हालाँकि, ये वोटर भी कब तक ओवैसी के साथ हैं, यह भी अपने आप में एक सवाल होगा क्योंकि यही वोटर बीजेपी विरोध में लंबे वक्त तक RJD के साथ खड़ा था। इन्हीं वोटरों ने अपने प्रतिनिधित्व के लिए उप-मुख्यमंत्री का पद माँगने के लिए आवाज उठानी शुरू की और RJD-कॉन्ग्रेस की तरफ से सब उन्हें यह गारंटी नहीं मिली तो वो ओवैसी की तरफ शिफ्ट हो गए। क्योंकि इन्हें जब प्रतिनिधित्व नहीं मिला तो कम-से-कम एक कट्टर मजहबी पार्टी को मिल ही गई है।

आम तौर पर मुस्लिम वोटों को पैर्टन यही रहता है कि वो ऐसे दल को वोट करते हैं जिसका अपना एक तय जनाधार हो और जो उनकी नजरों में ‘सांप्रदायिक’ BJP को हरा सकता हो। जैसे उत्तर प्रदेश इसका एक उदाहरण है, यहाँ सपा के पास एक तय जातिगत वोट बैंक है तो आम तौर पर मुस्लिम उससे मिलकर BJP को हराने के लिए वोटिंग करते हैं।

बिहार में अभी ऐसे जनाधार वाला कोई दल उनको नजर नहीं है क्योंकि RJD का फिक्स माना जाने वाला यादव वोट बैंक भी उनसे छिटका-छिटका है। अगर भविष्य में कोई दल बिहार में ऐसा उभकर सामने आता है जिसका पास अपना एक जनाधार हो और जो BJP के विरोध में सरकार बनाने के लिए तैयार हो तो मुस्लिम उसके साथ भविष्य में नहीं जाएँगे इसकी कोई गारंटी नहीं है। मगर अभी ओवैसी ने MY समीकरण का गणित ध्वस्त कर दिया है, यह भी पूरी तरह से सही है।

ओवैसी ने तोड़ दिया RJD का भ्रम?

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले ओवैसी ने कई बार कोशिश की थी कि वह किसी भी तरह महागठबंधन का हिस्सा बन जाएँ। ओवैसी ने RJD से 6 सीटों की माँग की थी और लालू यादव को दो बार खत लिखा था। लालू यादव ने इन खतों का कोई जवाब नहीं दिया।

खुद ओवैसी ने एक रैली में इससे जुड़ी जानकारी दी है। उन्होंने कहा था, “हमने RJD से कभी भी मंत्री पद की माँग नहीं की। अगर यह दरियादिली नहीं है तो और क्या है? हमने गठबंधन के लिए हर संभव प्रयास किए। अब फैसला RJD के हाथ में है।” तब ओवैसी को कुछ हाथ नहीं लगा लेकिन अब उन्होंने तेजस्वी को हाथ मलने को मजबूर कर दिया है।

औवेसी ने जो पाँच सीटें जीतीं हैं वो सभी मुस्लिम बहुल इलाकों में हैं और उन सभी पर मुस्लिम उम्मीदवारों ने ही जीत दर्ज की है। AIMIM ने जोकीहाट, बहादुरगंज, कोचाधामन, अमौर और बायसी सीट से क्रमश मोहम्मद मुर्शिद आलम, मौहम्मद तौसीफ आलम, मौहम्मद सरवर आलम, अखतरुल ईमान, गुलाम सरवर ने जीत दर्ज की है।

एक खास बात ये भी है कि AIMIM ने ये सीटें नजदीकी मुकाबले में नहीं जीती हैं बल्कि इन पर बड़े अंतर से जीत दर्ज की है। उनका सबसे कम जीत का अंतर ही 23,000 से ऊपर का है। इन सीटों पर मुस्लिम वोटों की भरमार है। इन सभी पाँचों सीटों पर मुस्लिमों की संख्या 64% से अधिक है। कोचाधामन में तो मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 72.4% है।

AIMIM द्वारा जीती गई सीटें और हार-जीत का अंतर (फोटो: ECI)

ओवैसी ने खुद को 5 सीटें जीतीं हैं इसके अलावा कम-से-कम 8 ऐसी सीटें भी हैं जहाँ उन्होंने महागठबंधन के उम्मीदवार को हराने में भूमिका निभाई है। यानी उन सीटों पर AIMIM के उम्मीदवार को मिले वोटों की संख्या हार-जीत के अंतर से अधिक रही है।

केवटी, शेरघाटी, प्राणपुर, कसबा, गोपालगंज और महुआ जैसी कम-से-कम 8 सीटें हैं, जहाँ AIMIM महागठबंधन की हार की वजह बनी है। RJD को जो यह भ्रम था कि मुस्लिम वोटों पर उसका एकमुश्त अधिकार है और मुस्लिम केवल उसके साथ ही जाएँगे यह भ्रम ओवैसी ने तोड़ दिया है।

मुस्लिमों वोटरों की प्राथमिकता- मजहबी पहचान और BJP विरोध

बिहार के इस चुनाव में एक बार फिर दिखा है कि मुस्लिम मतदाताओं की प्राथमिकताएँ दो मुख्य स्तंभों पर टिकती हैं। पहला है मजहबी पहचान और दूसरा है ऐसा राजनीतिक विकल्प चुनना जो BJP को प्रभावी रूप से चुनौती दे सके और उसे हराने की स्थिति में हो।

मुस्लिम समाज के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होता कि किसने कितनी सड़क बनाई या किसने कितनी योजनाएँ लागू कीं बल्कि यह कि कौन-सी राजनीतिक शक्ति उनकी मुस्लिम पहचान को मजबूत करने का काम करेगी। AIMIM को चुनकर एक बार फिर वही प्राथमिकता मुस्लिम वोटरों ने दिखाई है।

यही वजह है कि उनकी राजनीति में मजहबी पहचान, प्रतिनिधित्व और उनके विचार की प्रमुखता सबसे ऊपर रहती हैं। जब उन्हें लगता है कि कोई दल उनकी पहचान को सीधे तौर पर संबोधित कर रहा है या उन्हें एक मजहबी पहचान दे रहा है तो वे उसके साथ खड़े होते हैं।

दूसरा पहलू रणनीतिक वोटिंग है। मुस्लिम मतदाता अक्सर यह देखते हैं कि चुनावी मुकाबले में BJP के खिलाफ सबसे मजबूत दावेदार कौन है। यदि कोई गठबंधन या पार्टी BJP को हराने में सक्षम दिखती है, तो मुस्लिम वोट बड़ी संख्या में उसके पक्ष में एकजुट हो जाते हैं।

मुस्लिमों का यह वोटिंग पैटर्न पूरे भारत में नजर आता है। गैर-बीजेपी दलों के सत्ता में आने के बाद उन्हें मिलने वाली खुली छूट के चलते मुस्लिम BJP के खिलाफ लामबंद रहते हैं। अधिकतर गैर बीजेपी सरकारें मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति कर किसी भी तरह उन्हें अपने पाले में रखना चाहती है। इसलिए उन्हें हर काम करने की खुली छूट मिलती है।

हर चुनाव से पहले बड़ी पार्टियाँ विकास योजनाएँ, रोजगार और शिक्षा के मुद्दे गिनाती हैं लेकिन मुस्लिम मतदाता उसी विकल्प की ओर झुकते हैं जो उन्हें अपनी मजहबी पहचान की ‘सुरक्षा’ का आश्वासन देता हो। यह पैटर्न प्रदेश भर में साफ दिखाई दिया है।

जहाँ RJD या कांग्रेस मुस्लिम वोट को ‘तुष्टीकरण’ का जरिया मान रहे थे लेकिन AIMIM ने उससे आगे जाकर ‘प्रत्यक्ष नेतृत्व’ का वादा किया। इसी वजह से मुस्लिम मतदाता AIMIM को एक ऐसे विकल्प के रूप में देखने लगे हैं जो उनकी पहचान को बिना किसी समझौते के राजनीतिक रूप देता है। ओवैसी की यही ‘घुसपैठ’ कई सीटों पर इतनी गहरी हुई कि मुख्यधारा की पार्टियाँ उसका मुकाबला नहीं कर पाईं।

बिहार के मौजूदा नतीजों से यही संकेत मिलता है कि मुस्लिम वोटों में पहचान आधारित राजनीति आने वाले समय में मजबूत ही होती जाएगी। युवा मुस्लिम मतदाता सोशल मीडिया और भाषणों के जरिए ऐसे मुस्लिम नेतृत्व की ओर झुक रहे हैं जो उनकी मजहबी पहचान को खुले तौर पर प्रस्तुत करे।

अब बहाने देना बंद करे कॉन्ग्रेस और पहले अपने भीतर झाँके: बिहार में पार्टी के प्रदर्शन को देख कॉन्ग्रेसी ही हुए शर्मसार, थरूर से लेकर मणिशंकर अय्यर के बयान के समझें क्या है मायने

बिहार में अपनी खोई सियासी जमीन तलाशने में जुटी कॉन्ग्रेस को इस बार के विधानसभा चुनाव में और भी बड़ा झटका लगा है। बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी को बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद थी लेकिन नतीजों ने बता दिया कि बिहार में कॉन्ग्रेस कितने पानी में है। पार्टी दहाई का आँकड़ा भी नहीं छू पाई और 6 सीटों पर ही सिमट गई।

इस नतीजे के बाद जहाँ एक ओर कॉन्ग्रेस पार्टी के कई नेता चुनाव आयोग पर दोष मढ़ने पर तुले हैं तो वहीं कई नेताओं ने पार्टी के को लेकर रणनीतिक चूकों की ओर इशारा किया है। नेताओं ने संगठन की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न खड़े किए हैं।

चुनावी नतीजों के बाद कॉन्ग्रेस के कई नेताओं ने कहा कि स्थिति बेहद गंभीर है और पार्टी को कथित आत्मनिरीक्षण से आगे बढ़कर कुछ कड़े कदम उठाने होंगे। कुछ नेताओं ने यह भी कहा कि सिर्फ आत्मनिरीक्षण नहीं, अब सच स्वीकार करने और वास्तविकता का सामना करने का समय आ गया है।

वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने तो स्पष्ट शब्दों में कहा कि पार्टी ने उन्हें लंबे समय से दरकिनार कर दिया है। दूसरी ओर, कई पूर्व नेताओं और कार्यकर्ताओं ने भी संगठन की कमजोरियों को उजागर किया है। उनका कहना है कि पार्टी की हार के पीछे बूथ-स्तर पर पार्टी की ढीली पकड़, गलत टिकट वितरण, स्थानीय नेतृत्व की कमी और शीर्ष नेतृत्व से दूरी जैसे गंभीर कारण जिम्मेदार हैं।

कॉन्ग्रेस के बड़े नेताओं जैसे शशि थरूर, मणिशंकर अय्यर, कृपानाथ पाठक, मुमताज पटेल और कई नेताओं के हालिया बयानों से साफ समझा जा सकता है कि वे अपनी ही पार्टी की नीतियों से खुद खुश नहीं है।

बिहार के जिम्मेदार लोगों ने सही जानकारी नहीं दी: कॉन्ग्रेस नेता कृपानाथ पाठक

कॉन्ग्रेस नेता कृपानाथ पाठक ने मीडिया से बातचीत में कहा, “हमारा मानना ​​है कि राज्य में जिम्मेदार लोगों ने सही जानकारी नहीं दी। उन्होंने सही लोगों के बारे में सही जानकारी नहीं जुटाई। चाहे यह गलती से हुआ हो या चूक से, इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई? लोग हमसे लगातार शिकायत कर रहे हैं लेकिन हमें लगता है कि जो बातें उच्च अधिकारियों तक पहुँचनी चाहिए थीं, वे ठीक से नहीं पहुँचीं। अब उन्हें इस पर ध्यान देना होगा, वरना यह एक गंभीर संकट का कारण बन सकता है।”

विश्लेषण करना चाहिए कि कहाँ गलतियाँ हुईं: कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर

वहीं कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर ने बिहार चुनाव के परिणाम जानने के बाद मीडिया से बात करते हुए कहा, “यह बिल्कुल साफ है कि एनडीए की बढ़त जबरदस्त है। यह स्पष्ट रूप से बेहद निराशाजनक है और अगर यही अंतिम परिणाम निकलता है, तो मुझे लगता है कि बहुत गंभीर आत्मनिरीक्षण की जरूरत होगी और मेरा मतलब सिर्फ आत्मनिरीक्षण, बैठकर सोचना नहीं है बल्कि यह भी अध्ययन करना है कि क्या गलतियाँ हुईं, क्या रणनीतिक, संदेशात्मक या संगठनात्मक गलतियाँ रहीं।”

थरूर ने आगे कहा, “मैं बिहार में प्रचार करने वाला व्यक्ति नहीं हूँ। मुझे बिहार में प्रचार के लिए आमंत्रित नहीं किया गया था, इसलिए मैं आपको कोई प्रत्यक्ष जानकारी नहीं दे सकता। लेकिन मैं लोगों से बात कर रहा हूँ…हमारी पार्टी के नेताओं को इस बात का गंभीर विश्लेषण करना चाहिए कि कहाँ गलतियाँ हुईं।”

मणिशंकर अय्यर: मेरी ही पार्टी ने मुझको निकाल दिया है

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने तो सीधे कहा, “एक जमाने में मैं बहुत सीनियर था लेकिन हाल में मुझको एकतरफा किया गया है। मैंने शुरू में ही मैंने स्पष्टीकरण दिया था कि मैं कॉन्ग्रेस के जानिब से यहाँ नहीं आया हूँ, व्यक्तिगत रुप से यहाँ पहुँचा हूँ।” उन्होंने आगे कहा, “मैं बहुत छोटा आदमी हूँ, मेरी ही पार्टी ने मुझको निकाल दिया है। मोदी जी मेरे बारे में गलत-गलत बातों करते हैं और मेरी ही पार्टी उसे स्वीकार करती है।

यह हमारे संगठन की कमजोरी को दर्शाता है: कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व राज्यपाल निखिल कुमार

कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व राज्यपाल निखिल कुमार ने स्पष्ट रुप से पार्टी की गलती निकाली और कहा, “यह हमारे संगठन की कमजोरी को दर्शाता है। किसी भी चुनाव में, एक राजनीतिक दल अपनी संगठनात्मक शक्ति पर निर्भर करता है। अगर संगठन कमजोर है और प्रभावी ढंग से काम नहीं कर सकता, तो कुल मिलाकर परिणाम प्रभावित होते हैं।”

उन्होंने कहा, “हमारे सभी उम्मीदवार बहुत सक्षम हैं लेकिन और भी बेहतर उम्मीदवार चुने जा सकते थे। संगठन को रणनीतिक और समझदारी से काम करना चाहिए था और सभी निर्वाचन क्षेत्रों में अपनी मजबूत उपस्थिति बनाए रखनी चाहिए थी।”

कॉन्ग्रेस नेता निखिल कुमार ने कहा, “हमारे उम्मीदवारों के चयन में कुछ मतभेद थे और शायद हमने सर्वश्रेष्ठ उम्मीदवारों का चयन नहीं किया लेकिन हाँ, यह एक संभावना है। संभावना यह थी कि चुने गए कुछ उम्मीदवार सर्वोत्तम गुणवत्ता वाले नहीं रहे होंगे। और शायद इसी वजह से यह परिणाम हुआ।”

आत्ममंथन करेंगे कि कॉन्ग्रेस कहाँ पिछड़ी: कॉन्ग्रेस सांसद अखिलेश प्रसाद

चुनाव नतीजों पर कॉन्ग्रेस सांसद अखिलेश प्रसाद सिंह ने कहा, “हम आत्ममंथन करेंगे कि कॉन्ग्रेस कहाँ पिछड़ गई। हालाँकि, मैं नीतीश कुमार और NDA को बधाई देता हूँ। दोस्ताना मुकाबला नहीं होना चाहिए था- राजद के संजय यादव और हमारी पार्टी के कृष्णा अलावरु बेहतर बताएँगे कि चुनावों में हमारा प्रदर्शन इतना खराब क्यों रहा।”

कब तक सफलता का इंतजार करेंगे?: मुमताज पटेल

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे अहमद पटेल की बेटी मुमताज पटेल ने भयंकर नाराजगी जताते हुए कहा, “कोई बहाना नहीं, कोई दोषारोपण नहीं, कोई आत्मनिरीक्षण नहीं, अब समय है अपने भीतर झाँककर सच्चाई को स्वीकार करने का।”

उन्होंने एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा, “अनगिनत वफादार जमीनी कार्यकर्ता, जो हर मुश्किल हालात में पार्टी के साथ रहे हैं…कब तक सफलता का इंतजार करेंगे…बल्कि सत्ता कुछ ऐसे लोगों के हाथों में केंद्रित होने के कारण, जो जमीनी हकीकत से पूरी तरह कटे हुए हैं और बार-बार इस महान पुरानी पार्टी की दुर्गति और पराजय के लिए जिम्मेदार हैं, उन्हें लगातार असफलता ही हाथ लगेगी। और मेरी बात याद रखना, इन्हीं लोगों को बार-बार पुरस्कृत किया जाएगा क्योंकि उन्होंने अपने नियंत्रण और शक्ति से खुद को अपरिहार्य बना लिया है।”

कॉन्ग्रेस नेता शकील अहमद: मैं कॉन्ग्रेस में नहीं, मुझे बोलने का कोई अधिकार नहीं

बिहार के पूर्व मंत्री और कॉन्ग्रेस नेता शकील अहमद ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “मैं कॉन्ग्रेस में नहीं हूँ। मुझे बोलने का कोई अधिकार नहीं है। लेकिन टिकट वितरण के तुरंत बाद कॉन्ग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा कि फलां व्यक्ति ने गलत कारणों से टिकट बाँटे हैं, वित्तीय अनियमितताओं और अन्य मुद्दों का आरोप लगाया है… हमें उम्मीद है कि जाँच होगी  और अगर आरोप सही हैं और टिकट किसी और कारण से दिए गए हैं, तो जाहिर है उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।”

करारी हार ने कॉन्ग्रेस के भीतर गहरे संकट और आत्ममंथन की माँगों को किया तेज

कॉन्ग्रेस के नेताओं के प्रतिक्रियाओं को देखकर साफ लगता है कि पार्टी के भीतर गहरी बेचैनी, असंतोष और आत्मविश्वास की कमी है। बयान भले अलग-अलग नेताओं के हों लेकिन इन सबके पीछे एक ही भावना दिखाई देती है कि हार का असली कारण संगठन के भीतर की कमजोरी, गलत आकलन, गलत उम्मीदवार चयन और शीर्ष नेतृत्व का जमीनी सच्चाइयों से दूर रहना।

नेताओं के मन में यह भी चल रहा है कि इतने वर्षों से लगातार मिल रही नाकामियों पर भी पार्टी की ऊपरी परत में कोई बड़ा बदलाव नहीं होता। जो लोग हार के लिए जिम्मेदार हैं, वही आगे भी फैसले ले रहे हैं और जमीनी स्तर पर मेहनत करने वाले कार्यकर्ताओं की आवाज लगातार अनसुनी हो रही है।

कई नेताओं के वक्तव्यों से यह भी साफ है कि पार्टी की आंतरिक लोकतांत्रिक संरचना कमजोर पड़ चुकी है। नेताओं को लगता है कि शीर्ष नेतृत्व अपने चार-पाँच सलाहकारों पर ही निर्भर रहता है और ये लोग जमीनी जानकारी तक नहीं पहुँचते या जानबूझकर असल हालत को दबा देते हैं।

हालात इतने खराब हैं कि कुछ वरिष्ठ नेता खुद स्वीकार कर रहे हैं कि उन्हें पार्टी से दूर कर दिया गया है, उनकी सलाह या अनुभव की कोई अहमियत नहीं बची है। इससे यह संकेत मिलता है कि पार्टी में संवादहीनता और अविश्वास का माहौल बढ़ रहा है।

गौरतलब है कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में राज्य की सत्ता में एक बार फिर NDA की जोरदार वापसी हुई है। गठबंधन ने 200 से अधिक सीटों पर जीत दर्ज कर प्रचंड बहुमत हासिल किया है।

इन चुनावों में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जिसे 89 सीटों का जनादेश मिला। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) 85 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही। खास बात यह है कि 243 सीटों वाली विधानसभा में बीजेपी और JDU दोनों ने 101–101 सीटों पर मुकाबला किया था।

विपक्ष में आरजेडी तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी है और उसे 26 सीटों पर सफलता मिली। वहीं चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) ने 28 सीटों पर किस्मत आजमाई और 19 सीटों पर जीत हासिल की।

वहीं चुनाव में कॉन्ग्रेस का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। 60 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद पार्टी केवल 6 सीटें ही जीत पाई और दहाई का आँकड़ा भी पार नहीं कर सकी। इसे लेकर अब कॉन्ग्रेस पार्टी के नेताओं में भी अपनी ही पार्टी के प्रदर्शन को लेकर गहरी नाराजगी देखने को मिल रही है।

बिहार की करारी हार ने कॉन्ग्रेस के भीतर गहरे संकट और आत्ममंथन की माँगों को और तेज कर दिया है और संकेत साफ हैं कि पार्टी में निकट भविष्य में बड़ा आंतरिक मंथन देखने को मिल सकता है।

बिहार में जहाँ पहुँचे PM मोदी-योगी वहाँ NDA की बंपर जीत, राहुल गाँधी की सभाओं वाली जगह पर डूबी कॉन्ग्रेस की लुटिया

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजे स्पष्ट रूप से एक नया राजनीतिक संदेश लेकर आए हैं। 243 सीटों में से NDA गठबंधन ने 200 से अधिक सीटें जीतकर प्रचंड जीत दर्ज की, जबकि विपक्षी महागठबंधन केवल 34 सीटों पर सिमट गया। चुनावी नतीजों का गहरा विश्लेषण यह साबित करता है कि बिहार की जनता ने ‘कुशासन’ और विरोध की नकारात्मक राजनीति को स्पष्ट रूप से नकार दिया है, और विकास तथा सुशासन के एजेंडे को चुना है।

यह परिणाम सीधा संकेत देता है कि जिन क्षेत्रों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चुनावी सभाएँ कीं, वहाँ मतदाताओं ने विकास की गारंटी पर मुहर लगाई। लेकिन, जहाँ राहुल गाँधी ने वोट चोरी को मुद्दा बनाकर रैलियाँ की, वहाँ वो हारी।

प्रधानमंत्री मोदी की रैलियाँ बनीं NDA की विजय गारंटी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी घोषणा के बाद कुल 14 जिलों में जनसभाएँ और पटना में एक रोड शो किया। उनकी रैलियाँ न केवल भीड़ खींचने में, बल्कि सीधे वोटों में बदलने में भी निर्णायक साबित हुईं। पीएम मोदी ने अपने भाषणों का केंद्र विकास, सुशासन, राष्ट्रीय सुरक्षा और बिहार को आगे ले जाने की योजनाओं को बनाया।

पीएम मोदी ने भावनात्मक अपील के बजाय ठोस वादों पर जोर दिया, जिसका असर खासकर महिलाओं, युवा वोटरों और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं के बीच सबसे ज्यादा देखने को मिला। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मोदी फैक्टर अंतिम चरण तक चुनावी हवा को पूरी तरह से NDA के पक्ष में मोड़ने में सफल रहा। PM मोदी की सभाओं वाले कई जिलों में मतदान प्रतिशत भी औसत से अधिक रहा, जो उनकी लोकप्रियता और प्रभाव का सीधा संकेत है।

जहाँ मोदी ने रैली की, वहाँ NDA को मिली प्रचंड जीत

पीएम मोदी ने जिन प्रमुख सीटों पर रैलियाँ कीं, वहाँ NDA प्रत्याशियों को बड़ी जीत मिली। उदाहरण के लिए, बेगूसराय में बीजेपी उम्मीदवार ने 30 हजार से अधिक वोटों से जीत दर्ज की, मुजफ्फरपुर में बीजेपी उम्मीदवार रंजन कुमार 32 हजार से अधिक वोटों से जीते, और कटिहार में बीजेपी उम्मीदवार को 22 हजार से अधिक वोटों से जीत मिली।

समस्तीपुर और भागलपुर में भी NDA के उम्मीदवार विजयी रहे। यह साबित करता है कि मोदी की उपस्थिति ने जातीय समीकरणों से ऊपर उठकर जनता के झुकाव को विकास की ओर मोड़ दिया। NDA के रणनीतिकारों ने प्रधानमंत्री की सभाओं को उन सीटों पर केंद्रित किया था जहाँ गठबंधन पिछली बार कमजोर था या जहाँ मुकाबला कड़ा था।

परिणामों से यह रणनीति बिल्कुल सटीक साबित हुई। सीमांचल, मगध, शाहाबाद और मिथिला के कई हिस्सों में पीएम की सभाओं की गूँज मतदान के दिन तक कायम रही। NDA के उम्मीदवारों ने खुद माना कि प्रधानमंत्री की सभा ने उनके अभियान में नई जान फूँक दी और मोदी फैक्टर ने विरोधी जातीय समीकरणों को भी पूरी तरह बदलकर रख दिया।

सीएम योगी आदित्यनाथ का ‘भगवा’ स्ट्राइक रेट: कुशासन पर सीधा प्रहार

प्रधानमंत्री मोदी के साथ-साथ, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी बिहार चुनाव में एक अत्यंत सफल स्टार प्रचारक की भूमिका निभाई। सीएम योगी ने 31 सभाएँ और रैलियाँ कीं और उनके प्रचार वाली सीटों पर NDA का जीत का स्ट्राइक रेट 87% से अधिक रहा।

सीएम योगी ने अपने भाषणों में महागठबंधन पर उसके ‘जंगलराज’ और परिवारवाद को लेकर तीखा हमला बोला। CM योगी ने विकास और सुशासन के नाम पर वोट माँगते हुए बिना नाम लिए महागठबंधन के प्रमुख नेताओं को ‘पप्पू-टप्पू और अप्पू‘ नाम के तीन बंदरों की जोड़ी तक करार दिया। उनकी रैलियों में भीड़ भी खूब उमड़ी, जो उनके प्रभाव को दर्शाती है।

योगी के प्रचार का शानदार परिणाम

सीएम योगी ने जिन 31 सीटों पर प्रचार किया, वहाँ NDA के 27 प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की। यह प्रदर्शन दिखाता है कि योगी आदित्यनाथ का सख्त सुशासन और राष्ट्रवाद का एजेंडा बिहार के मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को प्रभावित करने में सफल रहा।

उदाहरण के लिए, उन्होंने बगहा, बेतिया, परिहार, ढाका, लौरिया और रक्सौल जैसी सीटों पर रैलियाँ की और तीनों ही जगह बीजेपी ने जीत हासिल की। यह सफलता स्पष्ट करती है कि बिहार की जनता ने अराजकता नहीं, बल्कि कानून का राज चुनने का मन बना लिया था।

वहीं, समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने 22 सीटों पर महागठबंधन के लिए प्रचार किया, लेकिन उनका स्ट्राइक रेट महज 9% रहा (सिर्फ दो सीटों पर जीत)। बसपा प्रमुख मायावती का स्ट्राइक रेट भी सिर्फ 20% रहा। ये नतीजे साबित करते हैं कि जनता ने यूपी के उन नेताओं को पूरी तरह नकार दिया जिनकी अपनी साख या पकड़ बिहार की राजनीति में कमजोर थी और जो केवल विरोध के नाम पर चुनाव लड़ रहे थे।

राहुल-प्रियंका का प्रचार रहा ‘नकारात्मक’, जनता ने किया खारिज

इसके विपरीत, नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी ने कटिहार, पूर्णिया, नालंदा, बेगूसराय और खगड़िया सहित कई जिलों में महागठबंधन के लिए प्रचार किया, लेकिन यह प्रचार वोट में तब्दील नहीं हो सका। राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी ने जहाँ-जहाँ प्रचार किया, वहाँ महागठबंधन को भारी निराशा हाथ लगी।

बेगूसराय और नालंदा में जहाँ कॉन्ग्रेस के उम्मीदवारों के लिए जोर-शोर से प्रचार किया गया था, वहाँ उन्हें बीजेपी और जेडीयू उम्मीदवारों के हाथों 30 हजार से अधिक वोटों के बड़े अंतर से हार मिली। कटिहार और पूर्णिया में भी कॉन्ग्रेस उम्मीदवार हार गए। किशनगंज (जहाँ कॉन्ग्रेस उम्मीदवार एमडी कमरुल होदा 12 हजार वोटों से जीते) एकमात्र अपवाद रहा, जो अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र है।

यह आँकड़ा साफ करता है कि महागठबंधन के शीर्ष प्रचारकों का ध्यान वोट चोरी जैसे आरोपों और विरोध की नकारात्मक राजनीति पर केंद्रित रहा, जबकि बिहार की जनता को विकास, रोजगार और बेहतर भविष्य की ठोस गारंटी चाहिए थी। जनता ने उन नेताओं पर भरोसा किया, जिन्होंने विकास का खाका पेश किया, न कि उन पर जो केवल चुनावी धांधली के आरोप लगाते रहे। बिहार चुनाव 2025 का यह जनादेश स्पष्ट रूप से ‘कुशासन को नकारने और सुशासन को चुनने‘ का ऐतिहासिक फैसला है।

जमीन पर थे कई मुश्किल मोर्चे, पर अमित शाह की रणनीतियों से सब हुए ढेर: पहले बागियों को मनाया, फिर विरोधियों को चटाई धूल

2014 के लोकसभा चुनाव से पहले जब भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश के चुनाव की कमान अमित शाह के हाथों में सौंपी थी तो बहुत से जानकारों ने इसे एक खतरनाक दाँव माना था। UP की सामाजिक संरचना, जातीय समीकरण और दशकों से चली आ रही राजनीतिक खेमेबंदियों के बीच BJP के लिए पैठ बनाना आसान नहीं था।

मगर शाह के लिए यह चुनाव उन्हें चाणक्य बनाने वाला साबित हुआ। 2014 में यूपी के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने साबित कर दिया कि वो संगठन के असल रणनीतिकार और जमीनी राजनीति के प्रबंधन के मास्टर हैं। बिहार के नतीजों ने इस पर एक बार फिर मुहर लगा दी है।

बिहार को समझना किसी भी नेता के लिए आसान नहीं रहा है। यहाँ का सामाजिक परिवेश, अलग-अलग इलाके के लोगों की अलग महत्वाकाँक्षाएँ और मानसिकता के साथ-साथ स्थानीय राजनीति को समझकर लोगों को भरोसा जीतना बिल्कुल आसान नहीं है। बिहार को भी उसी तरह से समझने, बूछने और लोगों भरोसा जीतने में अमित शाह को 11 वर्ष लगे लेकिन जब उन्होंने यह भरोसा जीता है तो तमाम जानकार और रणनीतिकारों के गणित को ध्वस्त कर दिया।

जो कर रहे थे बगावत वही बनाए गए जिम्मेदार

इस चुनाव में यह सही है कि JDU के लिए मैदान कुछ हद तक अनुकूल था। नीतीश कुमार को लेकर सहानुभूति थी, मोदी की लोकप्रियता थी, महिलाओं को 10,000 रुपए दिए जाने और वृद्धावस्था पेंशन बढ़ाए जाने का असर था। मगर बीजेपी के लिए यह लड़ाई कहीं से आसान नहीं थी। कई सीटों पर बगावत, कुछ जगहों पर भीतरघात को लेकर असमंजस की स्थिति थी और यहीं काम आया अमित शाह का चुनावी अनुभव।

चुनाव प्रचार शुरू होने से पहले उन्होंने पहला बड़ा काम किया बागियों को मनाने का, जहाँ कुछ लोगों ने चुनाव लड़ने का मन बना लिया था उम्मीदवारी वापस कराई और भीतरघात का खतरा लगभग खत्म कर दिया। खास बात यह थी कि जब बागी मान गए तो शाह ने उन्हें किनारे नहीं किया बल्कि अपने ही इलाके की चुनावी जिम्मेदारी देकर उन्हें सक्रिय भूमिका में रखा। इससे संगठन में ऊर्जा भी बढ़ी और अनुशासन भी मजबूत हुआ।

सिर्फ बड़ी सभाएँ नहीं छोटी-छोटी बैठकों से बनाई रणनीति

चुनाव अभियान के बीच में भी जहाँ अमित शाह को लगा कि इस इलाके में नेतृत्व को बदला जाना जरूरी है तो वहाँ प्रचार के बीच ही उन्होंने कमान हाथों-हाथ बदली। शाह को किसी फैसले को टालने या लंबा खींचने की आदत नहीं है। हर सीट की अलग प्रकृति, अलग संरचना और अलग चुनौतियों को देखते हुए उन्होंने ताबड़तोड़ फैसले लिए।

चुनाव अभियान के दौरान भी जब वह किसी इलाके में गए तो केवल सभा तक ही सीमित नहीं रहे, वे जहाँ भी जाते सुबह सबसे पहले प्रबुद्ध वर्ग, स्थानीय कार्यकर्ताओं और जमीन से जुड़े लोगों की अलग-अलग बैठकें लेते। यह सिर्फ फॉर्मेलिटी नहीं होती थी बल्कि इससे जो फीडबैक मिलता, उसके आधार पर उसी दिन रणनीति में बदलाव भी कर देते।

देर रात तक समीक्षा बैठकें करते शाह

दिन में रोड शो, सभाएँ, रैलियाँ और देर रात सीट-दर-सीट समीक्षा, चुनावों के बीच शाह का यह सिलसिला लगातार चलता रहा। उन्होंने इन दर रात तक चलने वाली बैठकों में सिर्फ आँकड़े नहीं जुटाए बल्कि हर संभावित बदलाव, हर नए मौके और विपक्ष की गतिविधियों का बारीकी से विश्लेषण किया था। इसके आधार पर फैसले लिए और धीरे-धीरे पार्टी के लिए जमीन मजबूत होती गई।

मिथिला-कोशी इलाके में बनाई खास रणनीति

बीजेपी के लिए बिहार का सबसे मुश्किल इलाका मिथिला-कोशी रहा है। दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी जिलों में वर्षों से बीजेपी के भीतर उठापटक चल रही थी लेकिन शाह ने इस चुनौती से दूरी नहीं बनाई। उन्होंने यहाँ डेरा डाल दिया। कई दिनों तक वहीं रहे, स्थानीय नेताओं को साथ बैठाया और उनके बीच के मतभेद दूर कराए। इसके साथ ही, बूथ स्तर की टीमों को दुरुस्त किया और यह स्पष्ट संदेश दिया कि संगठन का अनुशासन सर्वोपरि है।

उनका लक्ष्य केवल चुनाव जीतना नहीं था बल्कि संगठन को स्थायी रूप से मजबूत करना था। उनके इस प्रयास का असर यह हुआ कि चुनाव के नतीजों में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर रही है। 101 सीटों पर चुनाव लड़ी बीजेपी 90 के करीब सीटें जीतता दिख रही है। शाह की मेहनत, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रभाव और नीतीश की साख ने NDA को अभेद्य किला बना दिया है।

चुनाव से पहले जिनको बता रहे थे बीमार, जिनके खत्म होने के हो रहे थे दावे; नतीजों के बाद वही नीतीश कुमार बने ‘जननायक’: जानिए कैसे विपक्ष को किया साफ

बिहार चुनाव शुरू होने से पहले नीतीश कुमार को थका हुआ मान लिया गया था लेकिन नतीजों में दिख रहा है कि आज भी बिहार को नीतीश कुमार की जरूरत है। उन्होंने सारे समीकरणों को खारिज कर दिया है। चुनाव से पहले उनके स्वास्थ्य को लेकर भ्रम फैलाए गए लेकिन नीतीश कुमार ने इस चुनाव में अपनी मेहनत से साबित कर दिया कि क्यों वह 20 वर्षों तक बिहार की राजनीति की धुरी बने हुए हैं।

इस चुनाव में जब बारिश के कारण नेता अपनी सभाओं में नहीं पहुँच पा रहे थे, सभाओं को मोबाइल से संबोधित कर रहे थे लेकिन जब हेलीकॉप्टर पटना से नहीं उड़ पा रहे थे। तो नीतीश कुमार ने सड़क से कुशेश्वर स्थान से अररिया संग्राम तक नाप दिया था। वो बारिश और खराब मौसम में सड़कों से सभाओं में पहुँचते रहे और लोगों से मिलते रहे। उन्होंने अपनी मेहनत से यह साबित कर दिया कि उनका स्वास्थ्य एकदम ठीक है।

बिहार की जरूरत बने नीतीश कुमार

जनता ने सीएम नीतीश कुमार पर अपना विश्वास जता कर तय कर दिया है कि आज भी वे ‘बिहार की जरूरत’ हैं। लालू राबड़ी का वो 15 सालों का राज, जब राजनीति का अपराधीकरण किया गया और जनता पर ताबड़तोड़ हमले किए गए। जनता को ये मंजूर नहीं है। इस ‘जंगल राज’ से राज्य को बाहर निकाल कर महिलाओं को सशक्त बनाने की उन्होंने पहल की।

जंगलराज की छवि से निकाल कर बिहार के विकास की नींव डाली। राज्य की जनता उसे नहीं भूली है। यही वजह है कि सभी समीकरणों को धत्ता बताते हुए जनता ने नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार पर भरोसा जताया।

महिला वोटरों का भरोसा बरकरार

बिहार विधानसभा चुनाव में इस बार महिलाओं ने पुरुषों के मुकाबले ज्यादा वोट किया। दरअसल नीतीश कुमार को महिलाओं ने अपना ‘रक्षक’ माना। शराबबंदी से लेकर साइकिल स्कीम तक का असर महिलाओं पर पड़ा है। साइकिल स्कीम के बाद राज्य में महिला शिक्षा 53 फीसदी से बढ़ कर 70 फीसदी हो गई है।

महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत रिकॉर्डतोड़ 71.6% रहा, जो 1951 के बाद सबसे अधिक है। पुरुषों के मुकाबले महिलाओं ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। इससे पता चलता है कि महिलाओं में वोटिंग को लेकर कितना उत्साह था और ये उत्साह एनडीए को वोट देने के लिए था। नतीजे इसका ऐलान कर रहे हैं।

शराबबंदी-कैश ट्रांसफर का पड़ा असर

महिलाओं के स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए उनके खातों में दिए गए 10000 रुपए का असर भी था। साथ ही उम्मीद थी कि अगर सरकार फिर से सत्ता में आई तो 2 लाख रुपए रोजगार को और बढ़ाने के लिए महिलाओं को दिए जाएँगे। इसका काफी असर पड़ा।

इसके अलावा फ्री राशन, आवास और शराबबंदी, हर महीने खाते में आने वाले पैसों ने नीतीश-मोदी कॉम्बो पर महिलाओं में अपना विश्वास कायम रखा। महिलाओं ने साबित किया कि उन्होंने जाति से परे विकास के मॉडल को अपना समर्थन दिया।

साफ छवि और परिवारवाद से कोसों दूर

नीतीश कुमार के 20 साल के कार्य में उनकी छवि अभी भी बेदाग रही है। राज्य में नीतीश और केन्द्र में मोदी, इन दो चेहरों पर जनता विश्वास करती है। ये इस विधानसभा चुनाव में भी साबित हो गई है। सीएम नीतीश के परिवार का कोई सदस्य राजनीति में नहीं है। यही बात पीएम मोदी के साथ भी है।

महागठबंधन पर परिवारवाद के आरोप लगते हैं। लालू यादव का पूरा कुनबा यानी पति- पत्नी और बेटे- बेटियाँ आरजेडी को संभाल रहे हैं। कॉन्ग्रेस में गाँधी परिवार के युवराज राहुल गाँधी के साथ प्रियंका गाँधी वाड्रा लोकसभा के सदस्य हैं जबकि माँ सोनिया गाँधी राज्यसभा की सांसद हैं। पीएम मोदी से लेकर सीएम नीतीश कुमार तक ने इस मुद्दे को अपनी रैली में जोरशोर से उठाया। इसका परिणाम हुआ कि जनता ने विपक्षी दलों को नकारा।

सुशासन बाबू के दौर में विकास की बयार, डबल इंजन की सरकार

2005 में बिहार को जंगलराज से बाहर निकाल कर विकास की पटरी पर लाने वाले नीतीश कुमार के काल में जनता ने देखा है कि कैसे बिहार की सड़कें तेजी से विकसित हुई है। राज्य में एयरपोर्ट, मेट्रो का निर्माण हुआ। एम्स, आईआईटी जैसी संस्थानों का निर्माण हुआ। विकास के पथ पर बिहार के अग्रसर होने का असर रहा कि जनता ने वर्तमान सरकार पर अपना भरोसा जताया।

केन्द्र सरकार की आवास योजना, उज्जवला योजना, इज्जतघर जैसी योजनाएँ जमीन तक पहुँची। सीएम नीतीश के ‘लोकल टच’ के साथ किए गए डबल इंजन की सरकार के कार्य को लोगों ने सराहा। बिहार ने पहली बार इंजन एक्सपोर्ट किया, गजाजी में इंजीनियरिंग क्लस्टर बना इससे जनता में विश्वास पैदा हुआ।

नीतीश कुमार की सेहत पर सवाल को जनता ने नकारा

चुनाव से पहले नीतीश कुमार के स्वास्थ्य को लेकर भ्रम फैलाए गए। आरजेडी के सीएम चेहरा तेजस्वी यादव ने उन्हें बीमार कहा। जन सुराज के प्रशांत किशोर ने उनके सेहत को लेकर बुलेटिन जारी करने की माँग की। इस भ्रम के बीच पटना में बारिश से हेलीकॉप्टर नहीं उतरा तो सड़क मार्ग से कुचेश्वर स्थान से अररिया तक सड़क मार्ग से पहुँचे और लोगों को संबोधित किया।

इस दौरान ज्यादातर नेताओं की रैलियाँ केंसिल कर दी गई थी। ऐसे प्रतिकूल मौसम में, स्वास्थ्य को लेकर अटकलों के बीच उन्होंने साबित कर दिया कि वो सेहतमंद हैं और राज्य की बागडोर संभालने में पुरी तरह सक्षम है। ग्राउंड लेवल पर नीतीश कुमार की मेहनत रंग लाई और एनडीए की सरकार बनने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

बिहार में मोदी-नीतीश की प्रचंड सुनामी: महिला वोटरों से लेकर नौकरी-विकास तक, जानें वो 5 बड़े फैक्टर जिन्होंने NDA को फिर बना दिया ‘किंग’

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के रुझानों ने इतिहास रच दिया है। मतगणना का हर राउंड यही बता रहा है कि बिहार की जनता ने ‘जंगलराज’ को पूरी तरह नकार दिया है और डबल इंजन के विकास पर मुहर लगा दी है। यह कोई साधारण जीत नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 5-फैक्टर रणनीति का परिणाम है, जिसने विरोधियों को चारों खाने चित कर दिया।

मोदी ने अपनी रैलियों में लालू-राबड़ी शासन के खौफनाक अतीत को सफलतापूर्वक जीवित किया, जिससे जनता को यह संदेश मिला कि उन्हें फिर से उस अंधकार की ओर नहीं लौटना है। यह जीत नीतीश कुमार के जमीनी विश्वास और केंद्र सरकार की जन-कल्याणकारी योजनाओं के सफल क्रियान्वयन का भी प्रमाण है, जिसने गरीब और युवाओं का भरोसा जीता। पाँच मजबूत फैक्टरों की बदौलत, NDA ने न सिर्फ एक बड़ी जीत हासिल की है, बल्कि बिहार की राजनीतिक दिशा को भी पूरी तरह से विकासोन्मुख बना दिया है।

मोदी बने X फैक्टर: ‘जंगलराज’ की याद ने पूरा चुनावी माहौल मोड़ा

इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर बिहार के सबसे बड़े ‘नैरेटिव सेटर’ साबित हुए। उनकी रैलियों ने चुनाव का मुद्दा महँगाई, बेरोजगारी या स्थानीय नाराजगी से हटाकर सीधे कानून व्यवस्था के इतिहास पर ला खड़ा किया। मोदी ने लगातार जनता को ‘लालू-राबड़ी‘ शासन के उस काल की याद दिलाई जिसे बिहार की राजनीतिक भाषा में ‘जंगलराज‘ कहा जाता है।

शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा को टिकट देकर आरजेडी ने जैसे खुद विपक्ष के हाथ में हथियार दे दिया और मोदी ने इस मुद्दे को हर रैली में उछालकर लोगों की स्मृतियों को फिर जगा दिया। पुराने लोग इस दौर को आज भी डर और अव्यवस्था से जोड़ते हैं और आज की नई पीढ़ी को मोदी ने बार-बार यह कहकर प्रभावित किया, “अपने घर के बुजुर्गों से पूछो कि जंगलराज में क्या-क्या होता था।” यह भावनात्मक अपील अत्यंत प्रभावी साबित हुई।

मोदी ने सिर्फ भय की याद नहीं दिलाई, बल्कि उसकी तुलना डबल इंजन सरकार के विकास मॉडल से भी की। उन्होंने सड़क, बिजली, आवास, गैस, शौचालय, मुफ्त अनाज और किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं को जोड़कर यह संदेश दिया कि बिहार अब उस अंधकार से निकल चुका है और इसे फिर पीछे नहीं जाने देना चाहिए।

महिलाओं के प्रति मोदी की विशेष अपील, छठ पूजा के सम्मान का मुद्दा और सशस्त्र बलों के शौर्य- इन सभी को जोड़कर उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की कि एनडीए केवल सुरक्षा और विकास नहीं, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक पहचान का भी संरक्षक है। कुल मिलाकर, मोदी ने चुनाव का फोकस अपने नियंत्रण में लिया। इस चुनाव में वे निर्णायक ‘X फैक्टर’ साबित हुए।

नीतीश कुमार ने जमीन पर दिखाया दम: बीमार होने के बावजूद बारिश में भी सभाएँ कीं

20 साल सत्ता में रहने के बाद किसी भी नेता के लिए जनता के बीच उत्साह बनाए रखना आसान नहीं होता। लेकिन नीतीश कुमार ने इस चुनाव में दिखा दिया कि उनका जमीनी नेटवर्क और प्रशासनिक भरोसा आज भी उतना ही मजबूत है। बीमारी और उम्र की दिक्कतों के बावजूद वे लगातार दौरे करते रहे।

जब कई बड़े नेता बारिश के कारण सभाएँ स्थगित कर रहे थे, नीतीश कुमार कार से घंटों दूर-दराज के इलाकों में पहुँचते रहे और छोटी-बड़ी हर सभा में लोगों से संवाद करते रहे। इससे एक बहुत बड़ा संदेश गया कि ‘नीतीश थके नहीं हैं, रिटायर नहीं हुए हैं और काम छोड़ने को तैयार नहीं हैं।’

उनके इन दौरे सिर्फ राजनीतिक कार्यक्रम नहीं थे, बल्कि उस लंबे कार्यकाल का स्मरण थे जिसमें उन्होंने सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और प्रशासन को नई दिशा दी। लोगों में उनके प्रति स्वाभाविक भरोसा इस बार भी दिखाई दिया। दिलचस्प बात यह रही कि नीतीश के खिलाफ कोई बहुत बड़ी एंटी-इनकंबेंसी नहीं दिखी, जबकि यह भारतीय राजनीति में दुर्लभ है। इसका कारण उनका बीते 20 वर्षों का रिकॉर्ड है, विशेषकर शराबबंदी, महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण सड़कों की क्रांति और प्रशासनिक सुधार।

युवाओं में बेरोजगारी को लेकर कुछ नाराजगी जरूर थी, पर प्रधानमंत्री मोदी और नीतीश कुमार ने मिलकर इसे बड़े वादों में बदल दिया, कौशल विकास, उद्योग लाने और पलायन रोकने जैसे मुद्दे उठाकर। नतीजा यह रहा कि ‘अनुभव + विश्वास’ के रूप में नीतीश की छवि NDA की जीत की रीढ़ बन गई।

महिलाओं ने खेल दिया पलट: 10,000 रुपए की सीधी सहायता और 8% ज्यादा महिला वोटिंग

2025 के बिहार चुनाव की सबसे प्रभावशाली बात महिलाओं की ऐतिहासिक मतदान भागीदारी रही। पहले चरण में पुरुषों के मुकाबले 8% अधिक महिलाओं ने वोट डाले। यह सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश था कि बिहार की महिलाएँ अब चुनाव का भविष्य तय कर रही हैं।

आपको बता दें, कि 10,000 रुपए की सीधी आर्थिक मदद इसके केंद्र में था, जो 1 करोड़ से अधिक जीविका समूह से जुड़ी महिलाओं के खातों में भेजी गई। यह लाभ पहली बार सीधे महिला मतदाता को मिला, बिना किसी बिचौलिये के।

इस आर्थिक सहायता के साथ 2 लाख रुपए तक आसान लोन का वादा, स्कूलों में साइकिल योजना, पोशाक योजना, सुरक्षा, स्वास्थ्य और स्व-सहायता समूहों की सफलता, इन सबने मिलकर महिलाओं को नीतीश के पक्ष में गोलबंद कर दिया। कई महिलाएँ जो पहले कभी वोट डालने नहीं आती थीं, इस बार वे बूथों पर लंबी कतारों में दिखाई दीं। यह बताता है कि महिलाओं के भीतर नीतीश सरकार के प्रति गहरा भरोसा और भावनात्मक जुड़ाव है।

इसके अलावा, पीएम मोदी ने भी महिलाओं को अपने संबोधनों के केंद्र में रखा। छठ पूजा के सम्मान, परिवारवाद की आलोचना और महिलाओं के लिए आर्थिक अवसर, इन सबकी बात करके उन्होंने महिला वोट को और सुदृढ़ किया। स्पष्ट है कि 2025 की जीत के मूल में महिलाओं की अभूतपूर्व भागीदारी सबसे निर्णायक फैक्टरों में से एक है।

नौकरी, विकास और जनकल्याण योजनाएँ: युवाओं और गरीबों का भरोसा NDA पर टिका

रोजगार हमेशा बिहार का केंद्रीय मुद्दा रहा है। इस बार भी युवा बेरोजगारी को लेकर असंतुष्ट थे, लेकिन NDA ने इसे अवसर में बदला। संकल्प पत्र में 1 करोड़ रोजगार का वादा मुख्य आकर्षण बना। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे अपनी हर रैली में दोहराया और ‘बिहार में ही काम करेगा, बिहार का ही नाम करेगा’ जैसा नारा देकर युवाओं को यह संदेश दिया कि सरकार पलायन की समस्या को समझती है और उसका समाधान लाने की तैयारी में है।

दूसरी तरफ, गरीब और निम्न मध्यवर्गीय परिवारों में एनडीए की कल्याणकारी योजनाओं की पहुँच करोड़ों घरों तक बनी रही। मुफ्त अनाज योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, शौचालय, गैस कनेक्शन, किसान सम्मान निधि, वृद्धावस्था पेंशन, बिजली–सड़क–पानी जैसी योजनाओं ने NDA के आधार को बहुत मजबूत बनाया। जिन लोगों को इन योजनाओं का लाभ मिला, उन्होंने मूक लाभार्थी यानि ‘silent beneficiary’ की भूमिका निभाई और बड़ी संख्या में एनडीए के पक्ष में वोट किया।

पहले चरण में रिकॉर्ड वोटिंग इसलिए भी हुई क्योंकि SIR के तहत फर्जी और निष्क्रिय नाम हटाए गए थे और 21 लाख नए मतदाता जुड़े थे। बाहर रहने वाले बिहारियों में यह डर भी था कि अगर वे वोट नहीं देंगे तो अगली सूची में उनका नाम कट सकता है। इस बार कई वर्षों से वोट न डालने वाले भी मतदान केंद्र पहुँचे। इसमें प्रशांत किशोर के जनसुराज अभियान का भी प्रभाव रहा। लेकिन अंतिम फैसला युवाओं ने रोजगार की उम्मीद और गरीबों ने कल्याणकारी योजनाओं के भरोसे पर किया और इन दोनों वर्गों ने मिलकर NDA को भारी समर्थन दिया।

विपक्ष का आउट-ऑफ-फोकस अभियान: राहुल की वेबफूकियाँ, तेजस्वी के अनर्गल वादे

इस चुनाव में विपक्ष का सबसे बड़ा नुकसान उसकी खुद की रणनीतिक कमजोरियों से हुआ। राहुल गाँधी ने चुनाव प्रचार की शुरुआत तो दमदार की, लेकिन जब प्रचार का पीक समय था, वे 57 दिनों तक बिहार से गायब रहे। विदेश यात्रा, दिल्ली में इमरती छानने की तस्वीरें और हरियाणा-UP के कार्यक्रमों में दिखना… इन सबने यह संदेश दिया कि वे बिहार चुनाव को गंभीरता से नहीं ले रहे।

विपक्ष ने SIR पर ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाया, लेकिन यह समझाने में असफल रहे कि इससे आम वोटर का क्या नुकसान हुआ। उल्टा, जिस फर्जी फोटो को उन्होंने हरियाणा का मतदाता बताकर ‘वोट चोरी’ का उदाहरण दिया था, वह ब्राजील की मॉडल निकली। इससे उनकी विश्वसनीयता को भारी चोट लगी।

दूसरी ओर तेजस्वी यादव के वादे अवास्तविक और अनियोजित लगे। 10 लाख नौकरियों का दावा, उद्योग के बिना रोजगार का फॉर्मूला और सीएम फेस की घोषणा को लेकर महागठबंधन में लंबी खींचतान… इन सबने जनता में यह धारणा बनाई कि विपक्ष खुद ही अपनी दिशा तय नहीं कर पा रहा, तो बिहार का भविष्य क्या है सही करेगा।

RJD और कॉन्ग्रेस की स्थानीय स्तर पर फूट की खबरें, कॉन्ग्रेस अध्यक्ष की सीट पर RJD उम्मीदवार खड़ा करना और दोनों दलों का एक-दूसरे को नुकसान पहुँचाने की कोशिश… इसने गठबंधन को कमजोर कर दिया। मतदाताओं का बिहार चुनाव के नतीजों से ये ही साफ संदेश मिलता है, “जो खुद बिखरा है, वह बिहार को क्या संभालेगा?” और यह सीधा लाभ एनडीए को मिला।

अब, 14 नवंबर 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों का रुझान यह साफ दिखा रहा हैं कि बिहार की जनता ने सोच-समझकर मतदान किया है। मोदी का प्रबल नैरेटिव, नीतीश की जमीनी विश्वसनीयता, महिलाओं की रिकॉर्ड वोटिंग, रोजगार-विकास की उम्मीद, और विपक्ष की रणनीतिक कमजोरियाँ… इन पाँच फैक्टरों ने मिलकर NDA को 198 सीटों की मजबूत बढ़त दिला दी है। यह जीत सिर्फ एक चुनाव जीत नहीं, बल्कि बिहार की बदलती राजनीतिक मानसिकता का संकेत है।

बिहार चुनाव LIVE: मोकामा से अनंत सिंह जीते, तेजस्वी और तेज प्रताप बड़े अंतर से पीछे: रुझानों में NDA को 200 सीट पार, RJD-कॉन्ग्रेस मिलकर भी अर्धशतक तक नहीं पहुँची; जनसुराज का खाता खुलना मुश्किल

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की 243 सीटों पर मतगणना सुबह 08:00 बजे से प्रारंभ हुई। शुरुआती रुझानों में लगातार एनडीए की बढ़त है। सुबह 9:30 बजे के आँकड़ों के मुताबिक सबसे अच्छा प्रदर्शन अब तक जेडीयू-भाजपा का है। बिहार चुनाव से जुड़े पल-पल अपडेट्स के लिए यहाँ क्लिक करके पढ़ें और हमारे यूट्यूब पर चल रही चुनावी चर्चा को देखने के लिए नीचे दिए यूट्यूब लिंक पर क्लिक करें।

बिहार में वोटों की गिनती शुरू होते ही रुझानों में आगे निकली NDA, नीतीश का दिख रहा है जलवा: जानिए अब तक महागठबंधन का क्या है हाल

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की मतगणना शुरू हो चुकी है। निर्वाचन आयोग ने सभी 243 सीटों पर मतगणना 08:00 बजे से प्रारंभ करने की जानकारी दी। शुरुआती रुझानों में मीडिया लगातार एनडीए की बढ़त दिखा रहा है।

सबसे अच्छा प्रदर्शन अब तक जेडीयू का है। 182 सीटों पर रुझान दिख रहे हैं तो जेडीयू के पास 51-52 सीट बताई जा रही हैं। वहीं महागठबंधन फिलहाल के लिए रेस में आधे से ज्यादा मार्जिन से पीछे है। उनके हिस्से करीबन 61+ सीटें आ रही है। किसी भी दल को राज्य में जीतने के लिए 122 सीट जीतनी जरूरी होगी। इसके करीब अभी एनडीए ही है।

बता दें कि ECI की प्रक्रिया के अनुसार, मतगणना के क्रम में पहले डाक मत-पत्रों की गिनती हो रही है, उसके बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के मतों की गिनती की जाएगी।

राज्य के 40+ मतगणना केंद्रों में कुल 4,372 गिनती टेबल लगाई गई हैं और लगभग 18,000 एजेंट्स तथा रिटर्निंग अधिकारियों को नियुक्त किया गया है ताकि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और व्यवस्थित तरीके से हो सके। मतगणना के दौरान पूरे राज्य में सुरक्षा-व्यवस्था कड़ी की गई है। सीआरपीएफ और राज्य पुलिस बल को तैनात किया गया है ताकि किसी भी तरह की व्यवधान की स्थिति न बने।