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वैज्ञानिकों को पहचान दिलाती फिल्म, गिरोह की पोल खोलती फिल्म: पैनी होती विवेक अग्निहोत्री के निर्देशन की धार, ‘Vintage’ नाना पाटेकर के लिए भी देखें ‘The Vaccine War’

भारत की आम जनता की खासियत ये है कि वो भूलती बहुत जल्दी है। अब देखिए, जिस कोरोना वायरस ने देश में 5.31 लाख लोगों की जान ली, उसे हम कितनी जल्दी भूल गए? वैसे गम को जितनी जल्दी भूल जाएँ उतना ही अच्छा है, वरना व्यक्ति फिर उसी सोच में डूबा रहेगा और उसकी उत्पादकता जाती रहेगी। लेकिन, दुःख की घड़ी में किन लोगों ने अपने फायदे के लिए आपका और ज़्यादा नुकसान किया और आपके दुःख को बढ़ाने के लिए कई जतन किए – ये सब हमें नहीं भूलना चाहिए। ‘The Vaccine War’ भारत के महिला वैज्ञानिकों की उपलब्धियों को दुनिया के सामने लाने के साथ-साथ ही उन चेहरों को भी बेनकाब करती है जिन्होंने दुःख की घड़ी में देश विरोधी एजेंडा चलाया।

यहाँ मैं ‘The Vaccine War’ की कहानी के बारे में कुछ बताए बिना ही इसकी समीक्षा को आपके सामने रख रहा हूँ। अगर आप सीधे शब्दों में पूछेंगे कि आपको ‘The Vaccine War’ क्यों देखना चाहिए, तो मेरा जवाब होगा कि अपने आसपास घट रही उस वास्तविकता से रूबरू होने के लिए इसे ज़रूर देखिए, जिसका आपको भान भी नहीं होता और उसका अच्छा-बुरा असर भी आप पर पड़ जाता है। ये हुआ सीधा जवाब, अब आपको बताते हैं कि आखिर इस फिल्म को क्यों देखें।

ये फिल्म इसीलिए देखिए, ताकि आपको पता चले कि केवल रॉकेट उड़ाने वाले ही वैज्ञानिक नहीं होते। ये फिल्म इसीलिए देखिए, ताकि आपको पता चले कि असली सेलेब्रिटी कौन लोग होने चाहिए। ये फिल्म इसीलिए देखिए, ताकि आपको पता चले कि परंपरागत भारतीय परिधान पहनने वाली महिलाएँ विज्ञान के शिखर पर पहुँच सकती हैं। ये फिल्म इसीलिए देखिए, ताकि आपको पता चले कि जिन्हें आप पत्रकार समझते हैं वो हैं नहीं। ये फिल्म इसीलिए देखिए, ताकि पता चले कि हमारे देश में हर अच्छे कार्य को रोकने के लिए कुछ गद्दार भी हैं।

‘The Vaccine War’: निर्देशन, फिल्म की कहानी और एक्टिंग परफॉर्मेंस

‘The Vaccine War’ फिल्म की कहानी के बारे में इतना समझ लीजिए कि ये कहीं भी आपको बोर नहीं होने देती। फर्स्ट हाफ में फिल्म तेज़ गति से आगे बढ़ती हुई प्रतीत होती है और आपको अपनी सीट से बाँधे रखती है। कहानी सेकेंड हाफ में किरदारों से उनका सर्वश्रेष्ठ निकलवा लाती है। 2008 मुंबई हमलों पर 2013 में बनी रामगोपाल वर्मा की फिल्म ’26/11′ के बाद ये नाना पाटेकर का सर्वश्रेष्ठ पर परफॉर्मेंस है। फिल्म के क्लाइमैक्स में उनका ‘Vintage’ अवतार देखने को मिलता है।

फिल्म में बहुत ज़्यादा नाटकीयता नहीं है, इसे ‘सच्ची कहानी’ बोल कर प्रचारित किया था और ये इस तमगे के साथ न्याय भी करती है। विवेक अग्निहोत्री इससे पहले भी घटनाओं को जैसा है वैसे ही दर्शकों के सामने पेश करने की कला का प्रदर्शन कर चुके है, ये हमें ‘The Kashmir Files’ में भलीभाँति देखा था। यहाँ वो अपनी इस कला का और अच्छे से प्रदर्शन करते हैं। बतौर निर्देशक, फिल्म के कुछ शॉट्स उनके सर्वश्रेष्ठ दृश्यों में गिने जाएँगे, खासकर ओपनिंग दृश्य – पुलिसकर्मी, कुत्ते और वैज्ञानिक वाला।

फिल्म के एक दृश्य में अगर आप गौर करेंगे तो पाएँगे कि पूर्व राष्ट्रपति एवं वैज्ञानिक APJ अब्दुल कलाम की तस्वीर दीवार पर टँगी दिखती है। ऐसी छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखा गया है। ‘India Can Do It’ की थीम पर बनी इस फिल्म में नाना पाटेकर को देख कर ऐसा लगता है कि उन्होंने खुद को ही प्ले किया है। ICMR के मुखिया के रूप में उनका अभिनय वास्तविक है, लेकिन साथ ही नाना पाटेकर का जो पुराना स्टाइल रहा है वो भी बरकरार है।

जिन दृश्यों में वो थके हुए दिखाई दे रहे हैं वो हो, या फिर जिनमें पत्रकारों के सवालों के जवाब दे रहे हैं वो हों, या फिर वो दृश्य हों जिनमें वो एक खड़ूस लेकिन दिल के ईमानदार बॉस के रूप में अपने मातहतों से बात करते हैं – उनका अभिनय प्रभावशाली है। नाना पाटेकर जिस भी दृश्य में हैं, उसमें आपकी नज़रें उन पर ही टिकी रहेंगी। इस फिल्म को देख कर लगता है कि बॉलीवुड ने नाना पाटेकर की प्रतिभा का सही इस्तेमाल नहीं किया है, उनके पास काफी कुछ है देने के लिए मनोरंजन जगत को।

जिस दृश्य में वो कोरोना वैक्सीन के निर्माण को युद्ध बताते हुए इसे एक्सप्लेन करते हैं, वो फिल्म की रिलीज के बाद सोशल मीडिया पर जम कर वायरल होने वाला है। भारतीय फिल्मों में हमेशा से बैकग्राउंड म्यूजिक को लेकर शिकायतें रही हैं, लेकिन विवेक रंजन अग्निहोत्री की इस कम बजट की फिल्म में जिस तरह से पार्श्व संगीत का इस्तेमाल किया गया है, वो काबिल-ए-तारीफ़ है। खासकर कोरोना वायरस के लिए जिस तरह की डरावने बैकग्राउंड साउंड का इस्तेमाल किया गया है, वो बहुत ही अच्छा है।

फिल्म एकदम से गंभीर न हो, इसीलिए टुकड़ों में कॉमेडी भी है। खासकर एक दृश्य है जहाँ वैज्ञानिकों को बंदरों की ज़रूरत पड़ती है वैक्सीन की वैक्सीन के लिए, वो इस गंभीर फिल्म में थोड़े हल्के क्षण लेकर आती है। फिल्म की सबसे बड़ी विशेषताओं में से हैं इनके डायलॉग्स। डायलॉग्स ऐसे हैं जो अलग-अलग पात्रों को उनके किरदार और परिस्थिति के हिसाब से दिए गए हैं, जिनकी हम आगे चर्चा करेंगे। तकनीकी रूप से फिल्म इतने कम बजट में बनने के बावजूद समृद्ध है।

‘The Vaccine War’ समीक्षा: महिला वैज्ञानिकों का सम्मान, गद्दारों की पोल-खोल

‘The Vaccine War’ के अन्य किरदारों की बात करें तो सबसे प्रमुख है पल्लवी जोशी का किरदार। आपने उन्हें ‘The Tashkent Files’ और ‘द कश्मीर फाइल्स’ में नकारात्मक किरदारों में देखा होगा, लेकिन इस बार उन्होंने NIV (नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ वायरोलॉजी) की निदेशक डॉ प्रिया अब्राहम का किरदार निभाया है। हिंदी स्पष्ट न बोल पाने वाले किरदार में उन्होंने जान फूँक दी है। इसे देख कर उनके अनुभव और उनकी प्रतिभा का पता चलता है, साथ ही उनके अभिनय की विविधता का भी।

फिल्म में एक और रोचक किरदार है – राइमा सेन का, जिन्होंने ‘रोहिणी सिंह धुलिया’ नामक पत्रकार का किरदार निभाया है। विदेश से फंडिंग लाने वाली पत्रकार, स्वदेशी वैक्सीन को बदनाम करने वाली पत्रकार, भारत पर ‘विश्वगुरु’ का तंज कसने वाली पत्रकार, भारत के हर मोर्चे पर फेल होने की कामना करने वाली पत्रकार, दंगों पर रोटी सेंकने वाली पत्रकार, आतंकियों की हिमायत करने वाली पत्रकार, अपने एजेंडे के आगे किसी की भी नहीं सुनने वाली पत्रकार।

आप ज़रूर ऐसे किरदारों को वास्तविकता में भी जानते हैं, खासकर अगर आप ट्विटर या यूट्यूब का इस्तेमाल करते हैं तो। ये पत्रकार दिखने में तो सुन्दर होती है, लेकिन उसके भीतर बड़ी मात्रा में ज़हर भरा होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई मौकों पर विज्ञान को बढ़ावा देने की बातें कर चुके हैं और साइंस बजट भी उनकी सरकार में बढ़ाया गया है, फिल्म में उनकी वैज्ञानिक सोच भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से आपको जानने को मिलेगी। अब सरकारी दफ्तरों की, सरकारी बाबुओं की और सरकारी विभागों की कार्यशैली बदल गई है – इस बदलाव को ‘The Vaccine War’ सामने लेकर आती है।

फिल्म में ऋग्वेद के नासदीय सूक्त का हिन्दू अनुवाद ‘सृष्टि से पहले कुछ भी नहीं था’ का एकदम सटीक मोड़ पर इस्तेमाल किया गया है। इससे पहले श्याम बेनेगल की ऐतिहासिक टीवी सीरीज ‘भारत – एक खोज’ (1988-89) में इसका इस्तेमाल किया गया था। ये आपको इसमें ज़बरदस्ती ठूँसा हुआ नहीं लगेगा, बल्कि खास-खास एवं सटीक मौकों पर ये बजता है और फिल्म में चार चाँद लगाता है। फिल्म में आपको भारतीय वैज्ञानिकों के आम जीवन के बारे में भी जानने को मिलेगा, उनका भी परिवार है, उनके भी व्यक्तिगत संघर्ष हैं।

‘The Vaccine War’ की समीक्षा: अंतिम टिप्पणी

अगर आप कोरोना काल याद करेंगे तो पाएँगे कि पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के एक बड़े गिरोह ने विदेशी वैक्सीन के लिए पैरवी की। उन्होंने एक व्यापक दुष्प्रचार के जरिए भारतीय वैक्सीन को नीचा दिखाया। जबकि भारत ने न सिर्फ अपने लोगों को वैक्सीन की 200 करोड़ डोज लगाने में कामयाबी पाई, बल्कि 101 देशों को भी स्वदेशी वैक्सीन की सप्लाई की। इसी बीच दिल्ली जैसे राज्य थे, जहाँ की AAP सरकार ने उस कठिन समय में केंद्र सरकार को परेशान किया और ज़रूरत से ज़्यादा मात्रा में ऑक्सीजन लेकर उसकी होर्डिंग की।

यही वो समय था, जब WHO पर भी उँगलियाँ उठीं। चीन के खिलाफ ये संस्था कुछ भी कहने से बचती रही, जबकि इसने बार-बार दुनिया को डराने का प्रयास किया और कोवैक्सीन को मान्यता देने में देरी की। कोरोना को चीनी वायरस बताने वाले डोलैंड ट्रम्प अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव हार गए। चीन के वुहान लैब से वायरस के लीक होने की बात करने वाले गायब कर दिए गए। भारत में हिन्दुओं के अंतिम संस्कार की तस्वीरें अंतरराष्ट्रीय मीडिया को बेचीं गईं, वीडियो बनाए गए श्मशान में बैठ कर।

इन वास्तविकताओं को बड़े पर्दे पर ‘The Vaccine War’ न सिर्फ दिखाती है, बल्कि कई सवालों के जवाब देती हुई भी दिखती है। ये देख कर आपको पता लगेगा कि वो गरीब और अनपढ़ ज़्यादा अच्छे हैं उनसे, जो पढ़े-लिखे होने के बावजूद विदेशी एजेंडा चलाते हैं। चीनपरस्त वामपंथी गिरोह की पोल खोलने वाली ये फिल्म दिखाती है कि कैसे वैक्सीन निर्माण में कदम-कदम पर अपने ही लोगों द्वारा खड़ी की जाने वाली बाधाओं पर पाए कर हमारे वैज्ञानिकों ने ये कर दिखाया।

जहाँ ‘The Kashmir Files’ एक समाज को न्याय दिलाने के लिए एक अभियान थी, वहीं ‘The Vaccine War’ देश की एक उपलब्धि और उसके पीछे काम करने वालों को पहचान देने का प्रयास है। वहाँ दर्द था, यहाँ गर्व है। वहाँ इस्लामी आतंकवाद पर खुल कर प्रहार किया गया था, यहाँ पत्रकारों के एक गिरोह को लेकर लोगों को सजग किया गया है। ‘The Vaccine War’ इसीलिए भी देखिए, ताकि आप इसके साक्षी बनें कि हर फिल्म के साथ विवेक अग्निहोत्री के निर्देशन की धार और पैनी होती चली जा रही है।

मणिपुर घोषित किया गया ‘अशांत क्षेत्र’: 19 थानों को छोड़ कर पूरे राज्य में 6 महीने के लिए AFSPA लागू, 2 मैतेई छात्रों की हत्या के बाद सरकार का बड़ा कदम

मणिपुर सरकार ने मौजूदा कानून व्यवस्था की हालात को देखते हुए बुधवार (27 सितंबर, 2023) को पूरे राज्य को ‘सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA)’ के तहत 6 महीने के लिए ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित कर दिया। हालाँकि, यह स्थिति राजधानी इंफाल सहित 19 पुलिस स्टेशनों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले क्षेत्रों में लागू नहीं की जाएगी। सरकार ने ये फैसला 2 मैतेई छात्रों की हत्या को लेकर राज्य में चल रहे ताजा तनाव को देखते हुए लिया है।

राज्य सरकार ने एक अधिसूचना में कहा कि विभिन्न चरमपंथी और विद्रोही समूहों की हिंसक गतिविधियों की वजह से पूरे राज्य में नागरिक प्रशासन की सहायता के लिए सशस्त्र बलों के इस्तेमाल की जरूरत है। सरकार जारी अधिसूचना में पहाड़ी इलाकों में भी AFSPA को 1 अक्टूबर से छह महीने के लिए बढ़ा दिया है। जिन 19 थाना क्षेत्र AFSPA लागू नहीं होगा वो- इंफाल, लेंफेल, सिटी, सिंग्जमेई, सेकमई, लामसांग, पत्सोई, वांगोई, पोरोमपट, हेंगेंग, लामलाई, इरिलबुंग, लेमखोंग, थोबुल, बिष्णुपुर, नांबोल, मोइरोंग, काकचिंग और जिरिबम हैं।

फोटो साभार: हिन्दुस्तान टाइम्स

अधिसूचना में आगे कहा गया है कि इस समय जमीनी स्तर पर स्थिति का विस्तृत आकलन सुविधाजनक नहीं है, क्योंकि सुरक्षा बल इस वक्त राज्य में कानून व्यवस्था बनाए रखने में लगे हुए हैं।

सरकार ने कहा इसीलिए बिना विस्तृत आकलन के ऐसे संवेदनशील मामले पर किसी निष्कर्ष या फैसला पर पहुँचना अतार्किक होगा। इसलिए फिलहाल राज्य के अशांत क्षेत्र की स्थिति की समीक्षा करना उचित नहीं है। इसमें आगे कहा गया है कि ‘अशांत क्षेत्र’ जैसे हालात का ऐलान करना बेहद संवेदनशील मामला है। अगर सही तरीके ध्यान रखकर फैसला नहीं किया गया तो इसकी सार्वजनिक आलोचना के साथ ही प्रतिरोध भी हो सकता है।

राज्य की मौजूदा कानून-व्यवस्था के हालात और राज्य के मौजूदा तंत्र की क्षमता को देखते हुए राज्य सरकार ने राज्य के 19 पुलिस स्टेशन के तहत आने वाले क्षेत्रों के अलावा पूरे राज्य में मौजूदा अशांत क्षेत्र स्टेट्स को बनाए रखने का फैसला लिया है। इसलिए 19 थाना क्षेत्रों को छोड़कर 1 अक्टूबर से पूरे राज्य 6 महीने के लिए AFSPA लागू रहेगा।

दरअसल सरकार ने शनिवार 23 सितंबर, 2023 को ही राज्य में 5 महीने के लंबे वक्त से बंद इंटरनेट सेवाएँ बहाल की थी, लेकिन इसके तुरंत बाद ही ही सोमवार को 25 सितंबर सोशल मीडिया पर 6 जुलाई को लापता हुए दो मैतेई छात्रों 20 साल के फिजाम हेमजीत और 17 साल के हिजाम लिनथोइनगांबी की लाशों की तस्वीरें वायरल हो गई।

इसके बाद इस पूर्वोत्तर राज्य में फिर से तनाव हो और विरोध प्रदर्शनों का एक नया दौर शुरू हो गया। इस प्रदर्शनकारियों ने सीएम एन बिरेन सिंह के आवास के तरफ मार्च करने की कोशिश शुरू की थी। इस दौरान इन्हें काबू में करने के लिए मंगलवार 26 सिंतबर को पुलिस ने लाठीचार्ज किया। इसमें 30 से अधिक छात्र घायल हो गए। राज्य में अशांति को देखते हुए सरकार ने एक अक्टूबर तक 5 दिनों के लिए इंटरनेट सेवाओं पर रोक लगा दी। बुधवार (27 सितंबर, 2023) से लेकर 29 सितंबर तक स्कूल बंद हैं।

इस मामले में सीएम बीरेन सिंह ने आरोपितों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया। मामला केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) को सौंप दिया गया है और एजेंसी के विशेष निदेशक अजय भटनागर के नेतृत्व में एक टीम बुधवार को ही इंफाल पहुँच चुकी है।

‘छात्रा का दुपट्टा खींचा गया, तुम आरती उतार रहे थे?’: CM योगी ने SP को लगाई फटकार, अम्बेडकर नगर में छात्र की हत्या के बाद शाहबाज़, अरबाज़ और फैज़ल हुए थे गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सोमवार (25 सितंबर, 2023) को राज्य के विभिन्न जिलों के पुलिस अधिकारियों की बैठक बुलाई। इस मीटिंग में उन्होंने पुलिसकर्मियों को कार्यशैली में सुधार लाने की नसीहत देते हुए हर शिकायत पर बारीकी और गंभीरता से जाँच और कार्रवाई करने के निर्देश दिए। मीटिंग के दौरान ही अम्बेडकर नगर जिले में दुपट्टा खींचे जाने से हुई छात्रा की मौत का भी जिक्र आया। इस दौरान CM योगी ने वहाँ के SP को फटकार लगाई और कार्यशैली को जल्द से जल्द सुधारने के लिए कहा।

दरअसल सोमवार को मुख्यमंत्री योगी पूरे प्रदेश में विभिन्न जिलों के पुलिस अधीक्षक से ले कर थानेदार स्तर के अधिकारियों से रूबरू हो रहे थे। इस दौरान अम्बेडकरनगर में नाबालिग हिन्दू छात्रा की मौत का मुद्दा सबसे चर्चित विषय रहा। वहाँ के पुलिस अधीक्षक IPS अजीत कुमार सिन्हा से किसी सवाल-जवाब के दौरान CM योगी आदित्यनाथ नाराज हो गए। योगी ने SP से घटना के तुरंत बाद कड़ी कार्रवाई न करने की वजह पूछी तो वो संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए। तब मुख्यमंत्री ने कहा, “छात्रा का दुपट्टा खींचा गया। तुम अपराधियों की आरती उतार रहे थे क्या ?”

लगभग 3 घंटे 10 मिनट चली इस मीटिंग में थाना प्रभारी, डिप्टी एसपी रैंक के अधिकारी भी मौजूद थे। एक-एक थानाक्षेत्र में हुए कामों की बारीकी से निगरानी हुई। इस दौरान प्रदेश में अच्छा काम करने वाले टॉप 10 सर्किल और फिसड्डी रहे 10 सर्किलों का भी आंकड़ा रखा गया। लापरवाह अधिकारियों को अपनी कार्यशैली में सुधार लाने की चेतावनी देते हुए योगी आदित्यनाथ ने कहा, “हमें बर्खास्तगी की कार्रवाई करने पर मजबूर मत कीजिए।” इस दौरान अधिकारियों को महिला विरुद्ध अपराधों पर तत्काल एक्शन लेने के आदेश दिए गए।

DSP रैंकिंग

इस मीटिंग में फील्ड पुलिसिंग में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर खासा जोर दिया गया। सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों को शासन ने निर्देश जारी किए हैं कि वो जिले में महिला थाने की प्रभारी के अतिरिक्त कम से कम 1 अन्य थाने का प्रभार किसी महिला अधिकारी को सौंपें। बढ़ रहे साइबर अपराधों की समस्या को देखते हुए CM योगी ने बताया कि हर जिले में न सिर्फ साइबर थाने खोल दिए गए हैं बल्कि सभी थानों में साइबर डेस्क का भी गठन कर दिया गया है। बैठक में साफ कहा गया कि सभी थाने इस समय शासन की सीधी निगरानी में हैं और किसी भी स्तर पर कोई भी लापरवाही कतई बर्दाश्त नहीं होगी।

याद दिलाते चलें कि उत्तर प्रदेश के अम्बेडकरनगर जिले में शुक्रवार (15 सितंबर, 2023) को स्कूल से घर लौट रही एक नाबालिग छात्रा की बाइक से कुचल कर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में पुलिस ने शाहबाज़, अरबाज़ और फैज़ल को गिरफ्तार किया है।

गर्म पानी से जलाया, जबरन उतरवाए कपड़े; नाक, जीभ और दाँतों में जख्म: मेजर और पत्नी ने नाबालिग मेड को किया प्रताड़ित, महिलाओं के प्रदर्शन के बाद गिरफ्तार

असम के दिमा हसाओ जिले में भारतीय सेना के एक मेजर और उनकी पत्नी को नाबालिग घरेलू नौकरानी को प्रताड़ित करने के आरोप में (25 सितंबर, 2023) गिरफ्तार किया गया। मेजर की शैलेन्द्र यादव के रूप में हुई है। बच्ची का इलाज फिलहाल हाफलोंग सिविल अस्पताल में इलाज चल रहा है।

वर्तमान में मेजर यादव हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में तैनात हैं। दो साल पहले दिमा हसाओ में तैनाती के दौरान उन्होंने हाफलोंग की किम्मी राल्सन से शादी की थी। हिमाचल में तबादला होने के बाद वो हाफलोंग से ही नाबालिग बच्ची को हाउस हेल्प के तौर पर लेकर गए थे।

इस कपल के यातनाएँ देने बाद बच्ची अपनी माँ के पास लौट आई थी। स्थानीय पुलिस को बच्ची की भयावह स्थिति के बारे में रविवार (24 सितंबर, 2023) को सतर्क किया गया और इस पर पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की।

आरोपितों भेजे गए न्यायिक हिरासत में

पुलिस से मिली जानकारी के मुताबिक, मेजर शैलेन्द्र यादव के असम के हाफलोंग से हिमाचल प्रदेश तबादला होने के बाद किमी राल्सन घर के कामों में मदद करने के लिए संकीजंग गाँव से नाबालिग को अपने साथ ले गई थी।

हालाँकि, किम्मी राल्सन ने कथित तौर पर बच्चे के साथ गंभीर दुर्व्यवहार किया। उस पर बच्ची को शारीरिक यातना देने, नाबालिग को गर्म पानी से जलाने और जबरन उसके कपड़े उतारने के आरोप है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, बच्ची हाल ही में 24 सितंबर को हाफलोंग में अपने परिवार के पास लौट आई थी।

पुलिस के मुताबिक, पीड़ित नाबालिग बच्ची को बुरी तरह मारा-पीटा गया था। जब बच्ची परिवार को सौंपी गई तो उसकी नाक टूटने के साथ ही जीभ और दाँत में भी चोटें थीं। आरोपित मेजर शैलेन्द्र यादव और उनकी पत्नी किम्मी राल्सन को हाफलोंग न्यायिक मजिस्ट्रेट की अतिरिक्त अदालत में पेश किया गया।

अदालत ने आरोपितों की न्यायिक हिरासत का आदेश दिया। दीमा हसाओ पुलिस ने आरोपितों के खिलाफ हाफलोंग पीएस केस नंबर 74/2023 दर्ज किया गया। इसके तहत आरोपितों पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 326 (स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाना), 374 (गैरकानूनी अनिवार्य श्रम), 354 (महिला की गरिमा को ठेस पहुँचाने के इरादे से उस पर हमला या उसकी के मर्जी के खिलाफ आपराधिक इरादे से बल का इस्तेमाल करना) की धाराएं लगाई गई।

इसके साथ ही आईपीसी की धारा 506 (आपराधिक धमकी), 370 (किसी व्यक्ति को गुलाम के रूप में खरीदना या निपटान करना) और 34 (सामान्य इरादे को आगे बढ़ाने में कई लोगों का किए काम) भी आरोपितों पर लगी हैं। इसके आईपीसी के अलावा आरोपित दंपत्ति के खिलाफ एससी और एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के साथ ही यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) की धाराओं के तहत भी केस दर्ज है।

महिलाओं ने किया था प्रदर्शन

दिमा हासो के एसपी मयंक कुमार के मुताबिक, पीड़ित बच्ची मेजर शैलेन्द्र यादव के परिवार के साथ बीते दो साल से काम कर रही थी और इस दौरान उसे गंभीर शारीरिक यातनाएँ दी गई। एसपी कुमार ने आगे बताया कि बच्ची के बीमार पड़ने पर किम्मी ने उसे परिवार के हवाले कर दिया।

पुलिस के मुताबिक, नाबालिग लड़की और उसके परिवार को केस दर्ज न करवाने के लिए भी धमकाया गया था। किसी ने नाबालिग बच्ची की हालत की पोस्ट सोशल मीडिया में डाल दिया। इस मामले में पुलिस ने स्वत:संज्ञान लेते हुए कपल को बुलाया और बाद में उन्हें नाबालिग बच्ची को यातना देने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। इस दौरान सोमवार 25 सितंबर को लोकल महिलाओं ने हाफलोंग थाने के बाहर आरोपित कपल के खिलाफ सख्त से सख्त सजा देने की माँग को लेकर प्रदर्शन किया था।

तेलंगाना में तेज़ी से आगे बढ़ रही थी BJP, अचानक क्यों उखड़ने लगे पाँव? BRS के उम्मीदवार तय तो कॉन्ग्रेस की गारंटियाँ, कभी बढ़त बना रही भाजपा अब स्थिर

एक मशहूर कहावत है- ‘राजनीति में एक सप्ताह का समय बहुत लंबा होता है।’ इसका इस्तेमाल राजनीतिक जानकार अक्सर करते हैं। इसका मतलब है कि कम समय में राजनीतिक क्षेत्र में तेजी से कुछ ऐसे बदलाव हो जाते हैं, जिसके बारे में किसी ने कोई कल्पना भी न की हो। तेलंगाना की राजनीति कुछ इसी तरह से करवट ले रही है। यहाँ राजनीतिक पार्टियों की स्थितियों में पिछली बार के मुकाबले इस बार तेजी से बदलाव आया है।

भाजपा ने साल 2018 के विधानसभा चुनाव में करारी हार (119 सीटों पर चुनाव लड़कर महज एक सीट पर जीत) के बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में अच्छी सफलता दर्ज की थी। 2019 में भाजपा ने 17 में से 4 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की थी। इसके बाद भाजपा ने नवनिर्वाचित सांसद बंदी संजय कुमार को राज्य इकाई का अध्यक्ष बनाया, जो कि संघ में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं। भाजपा ने 2020 और 2021 में दो विधानसभा सीटों पर उपचुनाव में महत्वपूर्ण जीत दर्ज की। 2022 में पार्टी को हार झेलना पड़ा। इस बीच, भाजपा को साल 2020 के JHMC चुनाव में 4 के मुकाबले 49 सीटों पर जीत मिली, तो 2023 में एमएलसी चुनाव (शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र) में भी जीत हासिल की।

तेलंगाना भाजपा अध्यक्ष बंदी संजय कुमार ने पूरे राज्य में पदयात्रा शुरू की, जिसका उल्लेख खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया और बाकी राज्य इकाइयों से भी इसी इस तरह की पहल के लिए कहा। वहीं, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की रणनीति के कारण एमआईएम-बीआरएस सरकार को ‘तेलंगाना मुक्ति दिवस‘ मनाने के लिए भी मजबूर होना पड़ा।

तेलंगाना में भाजपा का उदय कॉन्ग्रेस पार्टी के पतन के साथ हुआ। साल 2018 में कॉन्ग्रेस पार्टी के 18 विधायकों ने जीत दर्ज की थी, जिसमें से 12 अगले साल 2019 में BRS में शामिल हो गए। हालाँकि, कॉन्ग्रेस ने लोकसभा चुनाव 2019 में तीन सीटें जीती थी, लेकिन उसके बाद से कॉन्ग्रेस को लगातार हार ही मिली है। मुनुगोडे सीट पर उपचुनाव में कॉन्ग्रेस की जमानत जब्त हो गई, जबकि वो सीट पहले कॉन्ग्रेस की ही थी।

इस बीच, भाजपा तेलंगाना में जब लगातार आगे बढ़ रही थी, तभी अफवाहें उड़ने लगीं कि भाजपा के राज्य अध्यक्ष बंदी संजय कुमार की जगह किसी अन्य को अध्यक्ष बनाया जा सकता है। इस अफवाह के बाद भाजपा में अंदरुनी कलह बढ़ गई। इस दौरान, दूसरी पार्टियों से भाजपा में शामिल हुए नेताओं ने दिल्ली में अमित शाह और जेपी नड्डा से मुलाकात की और संजय की शिकायत की। वहीं, संजय कुमार ने भी अपनी पदयात्रा रोक दी है।

अंदरुनी लड़ाई रुकने का नाम नहीं ले रही है, जिसकी वजह से अब तक तेलंगाना में भाजपा को जो बढ़त मिली भी थी, वो धीरे-धीरे खत्म होने लगी। और फिर वही हुआ, बंदी संजय कुमार को हटाकर केंद्रीय नेतृत्व ने किशन रेड्डी को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया। वो केंद्रीय मंत्री भी थे। इस बीच ये बात फैलाई गई कि बंदी संजय कुमार को केंद्रीय मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री के तौर पर शामिल किया जाएगा, लेकिन उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय महासचिव बना दिया गया। हालाँकि, ये शक्तिशाली पद है।

जहाँ बीजेपी अंदरूनी कलह में उलझी थी, वहीं कॉन्ग्रेस में अचानक से जान आने लगी। मई 2023 में कर्नाटक चुनावों में कॉन्ग्रेस की जीत, कई मामले में अप्रत्याशित थी। वहीं इस जीत ने तेलंगाना में पार्टी की किस्मत में एक बड़ा उछाल ले आई। लगभग इसी समय, KCR ने एक पूर्व सांसद और एक पूर्व मंत्री को BRS पार्टी से निष्कासित कर दिया था। वे खम्मम जिले के थे। इस जिले में बीजेपी परंपरागत रूप से कमजोर रही है। ऐसे में सभी को उम्मीद थी कि ये दोनों नेता भाजपा में प्रवेश करेंगे और इससे बीजेपी को फायदा मिलेगा।

हालाँकि, भाजपा इन दोनों नेताओं को लुभाने में विफल रही और कॉन्ग्रेस पार्टी ने उस अवसर को भुना लिया। और इस जॉइनिंग के साथ ही अब कॉन्ग्रेस पार्टी में लोगों का आना शुरू हो गया है जबकि करीब 6 महीने पहले ही बीजेपी में शामिल होने वालों की लाइन लग गई थी। ऐसे में कॉन्ग्रेस पार्टी ने तेलंगाना के लिए भी 6 गारंटियों की घोषणा करने का फैसला किया ठीक उसी तरह जो उन्होंने कर्नाटक के लिए किया था और जिसका एक तरह से मतलब है कि उन्होंने अपना घोषणापत्र जारी कर दिया है।

इस बीच सीएम और बीआरएस पार्टी के सुप्रीमो KCR ने 119 सीटों में से 115 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। बता दें कि 2018 के चुनाव में भी उन्होंने ऐसी ही शुरुआती घोषणा की थी। हालाँकि, 2023 में वह दो अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ रहे हैं, जो बेहद पास-पास हैं। ये अपने आप में एक संकेत है कि वह अपने मौजूदा निर्वाचन क्षेत्र में बहुत मजबूत स्थिति में नहीं हैं। क्योंकि, दो अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ना आमतौर पर दो कारणों से किया जाता है – या तो यह दिखाने के लिए कि वे राज्य/देश के विभिन्न क्षेत्रों को कवर कर रहे हैं, या वे मौजूदा सीट बरकरार रखने के बारे में आश्वस्त नहीं हैं।

वहीं केसीआर के मामले में, उनके द्वारा चुने गए दोनों निर्वाचन क्षेत्र एक-दूसरे के बहुत करीब हैं जिससे कहीं न कहीं यह स्पष्ट है कि उन्हें मौजूदा निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव जीतने का भरोसा नहीं है। जैसा कि अपेक्षित था, उम्मीदवारों की घोषणा के बाद पार्टी में असंतोष फैल गया। कुछ असंतोष इतना गंभीर था कि KCR को चुनाव से ठीक 3 महीने पहले जल्दबाजी में बुलाए गए शपथ ग्रहण समारोह में एक एमएलसी को अपने मंत्रिमंडल में भी शामिल करना पड़ा।

अक्टूबर 2023 बिलकुल करीब है और वहाँ दिसंबर 2023 में ही चुनाव होने हैं। ऐसे में बीआरएस पार्टी ने 119 सीटों के लिए 115 उम्मीदवारों की घोषणा की है। कॉन्ग्रेस पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में 6 गारंटी की घोषणा की है। वहीं भाजपा ने अभी तक इसमें से कुछ भी नहीं किया है। भाजपा, जो पिछले साल इसी समय बढ़त पर थी, अब पिछले 6 महीनों के घटनाक्रम के कारण स्थिर हो गई है। लगभग एक साल पहले 2023 का चुनाव बीआरएस और बीजेपी के बीच एक लड़ाई जैसा लग रहा था।

वहीं अब यह बीआरएस, कॉन्ग्रेस और बीजेपी (MIM अपनी 7 सीटें जीतेगी) के बीच लड़ाई है। ऐसे में इस तीन-तरफ़ा प्रतियोगिता में, एकमात्र लाभार्थी केसीआर होंगे। फिर भी अब हमें इंतजार करने और देखने की जरूरत है कि अगले दो महीनों में क्या सामने आने वाला है।

‘उनका इंटरव्यू लीजिए, जिनका TMC के गुंडों ने किया यौन उत्पीड़न’: महिला आरक्षण पर ममता बनर्जी के कसीदे पढ़ रहे थे राजदीप सरदेसाई, स्मृति ईरानी ने यूँ करा दिया चुप

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) सुप्रीमो ममता बनर्जी के मुरीद पत्रकार राजदीप सरदेसाई एक बार फिर अपने शो में उनकी तारीफों के पुल बाँधते नजर आए, लेकिन इस बार उनका सामना केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति जुबिन ईरानी से हो गया। ईरानी ने इस मुद्दे पर ऐसे जवाब दिए की सरदेसाई चुप्पी साध गए।

पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने इंडिया टुडे शो में मंत्री ईरानी से कहा कि 2029 में महिला आरक्षण बिल लागू होने से पहले सभी राजनीतिक दलों को महिलाओं को अधिक टिकट देने के लिए अधिक कोशिश करनी चाहिए। इसके आगे उन्होंने पश्चिम बंगाल में हुई हालिया हिंसा को दरकिनार कर कहा कि ममता बनर्जी ने महिलाओं को 40 फीसदी टिकट दिए, नवीन पटनायक ने 33 फीसदी टिकट दिए, क्या आपको लगता है कि आपकी (भाजपा) और कॉन्ग्रेस जैसी पार्टियों को भी ऐसा करने की ज़रूरत है?

इस सवाल से एक तरह से पत्रकार सरदेसाई ने टीएमसी सुप्रीमो बनर्जी को महिला अधिकारों का पुरोधा साबित करने की कोशिश की थी। इसके जवाब में केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ऐसा सटीक जवाब दिया कि राजदीप को आगे कुछ कहते नहीं बना। इसे आप नीचे दिए गए वीडियो में 12.09 से लेकर 13:52 में सुन सकते हैं।

मंत्री ईरानी ने कहा, “मिस्टर सरदेसाई, मेरे देश में एकमात्र राजनीतिक संगठन है, जिसने हमारे संगठन के अंदर महिलाओं के लिए आरक्षण दिया है। यदि आप सोचते हैं कि ममता बंदोपाध्याय (ममता बनर्जी) महिलाओं के अधिकारों की पुरोधा हैं, तो मुझे लगता है कि दूर से इस अत्याचार का अंदाजा लगाने की जगह आपको पश्चिम बंगाल के उन गाँवों में जाने की जरूरत है, जहाँ ममता बंदोपाध्याय का विरोध करने पर महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया था।”

उन्होंने आगे कहा, “आपको उन परिवारों का इंटरव्यू लेने की ज़रूरत है, ऐसे वक्त में जब महिलाओं को उनके गाँवों में वापस जाने की इजाजत नहीं थी क्योंकि टीएमसी के गुंडों ने उनका यौन उत्पीड़न किया था। ये जानकारी होने पर भी आपका ममता बनर्जी को महिलाओं के अधिकारों का पुरोधा मानना अपमानजनक है।”

दरअसल, इंटरव्यू की शुरुआत इस पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने सवाल किया था कि केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी से सवाल किया था कि जब से बीते हफ्ते महिला आरक्षण बिल संसद में पास हुआ है तब से सरकार, पीएम और सभी बीजेपी नेता इसे विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनावों से पहले अहम मुद्दा बना रहे है, जबकि अभी ये आरक्षण लागू नहीं होने जा रहा है।

इस पर मंत्री स्मृति ईरानी ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ यानी महिला आरक्षण विधेयक के लागू होने में शामिल प्रक्रियाओं को समझाते हुए कहा कि इसे जनगणना और परिसीमन के बाद 2026 के बाद लागू किया जा सकता है।

हालाँकि, इस बातचीत के दौरान पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने हमेशा की तरह सीएम ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी सरकार के कार्यकाल में पश्चिम बंगाल में हुई राजनीतिक हिंसा पर एक शब्द भी नहीं बोला।

इसी के जवाब में केंद्रीय मंत्री ईरानी ने कहा कहा, ” हमारे (पार्टी) राजनीतिक नेतृत्व ने महिला आरक्षण विधेयक को पारित करने के लिए वह किया है जो इस देश में कोई भी अन्य राजनीतिक दल नहीं कर सका।” उन्होंने कहा कि दशकों से अन्य राजनीतिक दल सत्ता में होने के बावजूद ऐसा नहीं कर सके।

गौरतलब है कि भारतीय जनता पार्टी ने 2007 में ऐलान किया था कि वह राष्ट्रीय पदाधिकारियों सहित अपने संगठनात्मक पदों में से 33 फीसदी महिलाओं के लिए आरक्षित करेगी। लेकिन राजदीप सरदेसाई ये सब भूलकर ये जानने में उत्सुक थे कि क्या भाजपा आने चुनावों में महिलाओं को अधिक टिकट देने में ममता बनर्जी की राह चुनेगी।

यह भाजपा ही थी जिसने सबसे पहले संसद और राज्य विधानमंडलों में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण के समर्थन में एक औपचारिक प्रस्ताव का पालन किया और साल 1994 में इस संबंध में एक आवश्यक संवैधानिक संशोधन की माँग की थी।

यह हैरानी की बात नहीं है कि पत्रकार राजदीप सरदेसाई पश्चिम बंगाल में हाल ही में हुए पंचायत चुनावों या पिछले राज्य विधानसभा चुनावों के दौरान टीएमसी पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा की गई राजनीतिक हिंसा के बारे में पूरी जानकारी होने के बाद भी ममता बनर्जी को महिला अधिकारों के पुरोधा के तौर पर देखते हैं।

उनके पश्चिम बंगाल की सीएम बनर्जी के कायल होने का एक वाकया इस साल जुलाई में पेश आया था। तब ‘द लल्लनटॉप’ के पत्रकार सौरभ द्विवेदी से बात करते हुए सरदेसाई ने पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा को प्रासंगिक बनाने की कोशिश की थी।

इसके साथ ही जब पश्चिम बंगाल की सीएम के राज्य में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव में विफलता पर बोलने के लिए कहा गया तो उन्होंने ‘क्रोनोलॉजी’ और ‘बंगाल की राजनीतिक संस्कृति’ को सामने लाकर टीएमसी नेता को क्लीन चिट भी दे डाली।

इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा कि पंचायत चुनाव प्रासंगिकता और राजनीतिक कद को बनाए रखने की लड़ाई थी। इस तहर से उस वक्त हुई हिंसा एक राजनीतिक मजबूरी थी।

इस साल अगस्त में ही द लल्लनटॉप कार्यक्रम में सरदेसाई ने दंगों के दौरान महिलाओं के खिलाफ हुए अपराधों के बारे में बात की थी। इस संदर्भ में उन्होंने 1992-1993 में मुंबई दंगों और 2013 में मुजफ्फरनगर में दंगों का भी जिक्र किया।

हालाँकि, जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने इस संदर्भ में पश्चिम बंगाल का जिक्र क्यों नहीं किया, जबकि ये महिलाओं के खिलाफ अपराधों का हालिया उदाहरण था तो सरदेसाई ने यह कहकर लीपापोती करने कि कोशिश की वर्तमान में बंगाल एकमात्र राज्य है जहाँ महिला मुख्यमंत्री है।

सरदेसाई ने अगस्त 2021 में ये स्वीकार किया था कि अगर उन्होंने पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद हुए नरसंहार के बारे में सीएम ममता बनर्जी से पूछा होता तो उन्हें वो ‘रसगुल्ला’ खिलाने से मना कर देतीं। तब उन्होंने हँसते हुए कहा, “मैं उनका इंटरव्यू लेने के लिए वहाँ नहीं गया था। मैं वहाँ ‘चाय पर चर्चा’ के लिए गया था। अगर मैंने उनसे चुनाव के बाद की हिंसा के बारे में पूछा होता तो मुझे रसगुल्ला खाने को नहीं मिलता।”

गुलामी के चिह्नों को मिटा कर शिक्षा का भारतीयकरण, आमूलचूल परिवर्तन कर रही मोदी सरकार: मैकॉले पुत्रों की असफल नीति के कारण लाई गई ‘नेशनल एजुकेशन पॉलिसी’

अपने दूसरे कार्यकाल के प्रारंभ से ही मोदी सरकार शिक्षा क्षेत्र में आधारभूत परिवर्तनों के लिए प्रयत्नशील है। हालाँकि, इन परिवर्तनों की पृष्ठभूमि पहले कार्यकाल में ही तैयार होने लगी थी। व्यापक विचार-विमर्श और जन-भागीदारी से निर्मित राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 उसी तैयारी का फलागम है। मैकॉले और मैकॉले-पुत्रों द्वारा निर्मित-विकसित भारत का शिक्षा-तंत्र भारत और भारतीयों की आवश्यकताओं और अपेक्षाओं को पूरा करने में असफल रहा है।

इसीलिए, इस औपनिवेशिक तंत्र में आमूलचूल परिवर्तन करते हुए उसे भारत केंद्रित बनाने और उसके भारतीयकरण पर जोर दिया जा रहा है। भारतीय ज्ञान परंपरा का पुनराविष्कार और प्रतिष्ठा राष्ट्रीय शिक्षा नीति की केंद्रीय चिंता है। शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाकर और उसकी पहुँच सर्वसाधारण तक सुनिश्चित करके ही भारत में अंतर्निहित अपरिमित संसाधनों और भारतवासियों की असीम क्षमताओं का पूर्ण विकास संभव है। गुणवत्तापूर्ण और सर्वसुलभ शिक्षा, समाजोपयोगी नवाचारी शोध तथा युवा पीढ़ी के कौशल विकास द्वारा ही राष्ट्रीय विकास का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।

इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार द्वारा 2018 में ‘भारतीय उच्च शिक्षा आयोग’ तथा 2019 में ‘राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन’ के गठन की घोषणा की गयी थी। हालाँकि, कुछ कारणों से इन दोनों के कार्यान्वयन की गति धीमी रही। पिछले दिनों संसद में अधिनियम पारित करके भारत सरकार ने इन दोनों का कार्यान्वयन प्रारम्भ कर दिया है। अब तक उच्च शिक्षा क्षेत्र में अनेक नियामक संस्थाएँ थीं। उनके अपने अपने मानदंड व मापदंड हुआ करते थे।

UGC, ICSSR, ICMR, AICTE, NCTE, नैक, NIRF जैसी एक दर्जन से अधिक नियामक संस्थाएँ देश के कला, विज्ञान, व्यवसाय, अभियांत्रिकी, शिक्षा, प्रबंधन, कृषि शिक्षा आदि अनुशासनों से सम्बंधित उच्च शिक्षण संस्थानों व शोध-संस्थानों की संबद्धता, मूल्यांकन, प्रत्यायन, रैंकिंग, वित्तपोषण और नियंत्रण आदि का काम किया करती थीं। इन अलग-अलग नियामक संस्थाओं के अधीन उच्च शिक्षा पृथक्करण और बहुस्तरीय नियंत्रण का शिकार थी।

देश भर में ऐसे अनेक उच्च शिक्षण संस्थान व शोध-संस्थान हैं, जहाँ एक साथ कई प्रकार के पाठ्यक्रम पढ़ाए जाते हैं एवं इनसे सम्बद्ध शोध-कार्य किया जाता है। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में सभी संस्थानों को क्रमशः बहु-अनुशासनिक बनाने पर जोर दिया गया है। विभिन्न पेशेवर और परम्परागत संस्थानों की आपसी दूरी और अलगाव के ‘स्टील फ्रेम’ की क्रमिक समाप्ति प्रस्तावित है। इन बहु-अनुशासनिक उच्च शिक्षण संस्थानों व शोध-संस्थानों को अपनी मान्यता, मूल्यांकन, प्रत्यायन, रैंकिंग एवं वित्तपोषण आदि के लिए अलग-अलग नियामक संस्थाओं का दरवाजा खटखटाना पड़ता था।

इस प्रक्रिया में ये संस्थान अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करते रहे हैं। कई बार इन नियामक संस्थाओं में अनियमितता एवं पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने का दोषारोपण भी होता रहा है। पाठ्यक्रमों के निर्माण एवं उनके कार्यान्वयन में भी ये नियामक संस्थाएँ दोषमुक्त नहीं रही हैं। ये स्वायत्त नियामक संस्थाएँ आपसी टकराव और अंतर्विरोध का भी शिकार रही हैं। इससे संबंधित संस्थानों को अनावश्यक अड़चन और अवरोध का सामना करना पड़ता था।

इसीलिए, मोदी सरकार ने इन सभी नियामक संस्थाओं की कार्यशैली का मूल्यांकन करते हुए इन्हें एक निकाय के अधीन लाने का निर्णय लिया है। अब अलग-अलग नियामक संस्थाओं में बँटी-बिखरी हुई उच्च शिक्षा एक ही नियामक संस्था ‘भारतीय उच्च शिक्षा आयोग’, जो कि सीधे तौर पर शिक्षा मंत्रालय की निगरानी में काम करेगा, के अधीन होगी। भारतीय उच्च शिक्षा आयोग की विशेषता यह है कि यह एक साथ देश के तमाम केंद्रीय विश्वविद्यालयों और शीर्षस्थ उच्च शिक्षण संस्थानों जैसे IIT, NIT, IIIT आदि का नियमन और नियंत्रण करते हुए उनके मूल्यांकन, प्रत्यायन, रैंकिंग एवं वित्तपोषण आदि का काम करेगा।

इस आयोग के चार आयाम (वर्टिकल) होंगे। इन चार आयामों को क्रमशः राष्ट्रीय उच्च शिक्षा विनियामक परिषद्, राष्ट्रीय प्रत्यायन परिषद्, उच्चत्तर शिक्षा अनुदान परिषद् तथा सामान्य शिक्षा परिषद् के नाम से जाना जाएगा। राष्ट्रीय उच्च शिक्षा विनियामक परिषद् उच्च शिक्षण संस्थानों के नियंत्रक के रूप में काम करेगी। वहीं, राष्ट्रीय प्रत्यायन परिषद् उच्च शिक्षण संस्थानों के मूल्याङ्कन, प्रत्यायन, रैंकिंग का काम करेगी। उच्च शिक्षण संस्थानों के वित्तपोषण का काम उच्चतर शिक्षा अनुदान परिषद् द्वारा किया जाएगा।

अब तक इन संस्थानों के वित्तपोषण का काम UGC आदि कई एजेंसियाँ करती थीं। वहीं, सामान्य शिक्षा परिषद् पाठ्यचर्या और शिक्षण से जुड़े मामले देखेगी। इनके नवीकरण की जिम्मेदारी भी इसी की होगी। अब देश के उच्च शिक्षण संस्थानों को मौजूदा अलग-अलग नियामक संस्थाओं के चक्कर काटने से मुक्ति मिलेगी एवं ये शिक्षण संस्थान राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लक्षित उद्देश्यों की प्राप्ति की दिशा में तत्पर हो सकेंगे। यह आयोग भारत में उच्च शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण और सर्वसुलभ बनाने के लिए उत्तरदायी होगा।

संस्कारपूर्ण, कौशल संवर्धक और रोजगारपरक शिक्षा देने वाले सर्वसमावेशी उच्च शिक्षण संस्थानों को स्वायत्तता, संरक्षण और प्रोत्साहन देने का काम भी यह आयोग करेगा। यह आयोग उच्च शिक्षण संस्थानों के दोहरे-तिहरे नियमन की वर्तमान व्यवस्था का सरलीकरण और स्तरीकरण करेगा, ताकि शिक्षण संस्थानों के प्रबंधन में दोहरा/तिहरा हस्तक्षेप न हो। इस आयोग द्वारा उच्च शिक्षा में मानकों और गुणवत्ता के संबंध में पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक प्रस्तुतीकरण और योग्यता आधारित निर्णय के माध्यम से विनियमन किया जायेगा।

भारतीय उच्च शिक्षा आयोग को अधिगम परिणामों (लर्निंग आउटकम) पर विशेष ध्यान देने के अलावा शैक्षणिक मानकों में सुधार, संस्थानों के शैक्षणिक प्रदर्शन का मूल्यांकन, संस्थानों का परामर्श, शिक्षकों का प्रशिक्षण, अधुनातन शैक्षिक पद्धतियों और प्रौद्योगिकी के उपयोग को बढ़ावा देने आदि का काम भी करना होगा। यह आयोग संस्थानों के नियमन और संचालन के लिए अनुकूलित वातावरण बनाते हुए अधिक लचीलेपन के साथ स्वायत्तता प्रदान करेगा। इस आयोग के पास उच्च शिक्षण संस्थानों में शैक्षणिक गुणवत्ता मानकों का अनुपालन सुनिश्चित करवाने तथा स्तरहीन और कागजी संस्थानों को बंद कराने की शक्ति भी होगी।

औपनिवेशिक काल से ही जनसंख्या के अनुपात में उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या एवं गुणवत्ता की दृष्टि से भारत की स्थिति सुखद नहीं है। भारत लगभग एक हजार विश्वविद्यालयों एवं चालीस हजार कॉलेजों के साथ दुनिया की सबसे बड़ी उच्च शिक्षा प्रणाली है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली के अनुपात में यह बहुत सीमित है। भारत में उच्च शिक्षा क्षेत्र के विस्तार और विकास की अत्यधिक आवश्यकता एवं असीम संभावनाएं हैं। 

उच्च शिक्षा की वर्तमान दशा स्वतंत्रता के बाद देश में अपनाई गयी उच्च शिक्षा नीति के मूलभूत दोषों को उजागर करती है। किंतु अब ‘भारतीय उच्च शिक्षा आयोग’ उच्च शिक्षा की खामियों को चिह्नित करते हुए उन्हें दूर करने तथा शिक्षा के भारतीयकरण का काम करेगा। यह शिक्षा तंत्र के विस्तार को भी सुनिश्चित करेगा। यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति के पूर्ण कार्यान्वयन करते हुए भारत को ज्ञान अर्थव्यवस्था बनाने में सहायक होगा। उच्च शिक्षण संस्थानों को योग्य शिक्षक और सक्षम नेतृत्व प्रदान करने में भी इस आयोग द्वारा निर्मित नीतियों और मानकों की निर्णायक भूमिका होगी।

इस एकीकृत और सर्वसक्षम आयोग के गठन से समय, संसाधन और धन की भी बचत होगी। हालाँकि, इस आयोग की सीमा यह है कि इस आयोग में विधि तथा चिकित्सा से जुड़े उच्च शिक्षण संस्थानों को शामिल नहीं किया गया है। साथ ही, उपरोक्त लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सरकार को उच्च शिक्षा तंत्र में भारी निवेश करने की भी आवश्यकता होगी। भारत सरकार ने इस आयोग के साथ ही विगत 4 अगस्त, 2023 को ‘राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन अधिनियम’ को भी संसद से पारित कराया है।

भारतीय उच्च शिक्षा आयोग की भाँति यह फाउंडेशन भी अनुसंधान की दशा व दिशा को बदलने की युगांतकारी पहल है। यह फाउंडेशन गणित, प्राकृतिक विज्ञान, इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण और पृथ्वी विज्ञान, स्वास्थ्य और कृषि तथा मानविकी और सामाजिक विज्ञान की अंतर्क्रिया और अभिक्रिया को संभव करेगा। यह अनुसंधान, नवाचार एवं उद्यमिता के लिए रणनीतिक दिशा एवं आवश्यक संसाधन और ढाँचागत सुविधाएँ प्रदान करने वाला देश का सर्वोच्च निकाय होगा।

आज भारत चाँद के दक्षिणी ध्रुव पर तिरंगा लहरा रहा है। यह भारत के वैज्ञानिकों की गंभीर अनुसंधान-वृति का प्राप्य है। भारत की प्राचीनतम अनुसंधान-वृत्ति का पुनराविष्कार, प्रोत्साहन इस फाउंडेशन के ध्येय है। संसाधनों की कमी और लालफीताशाही को समाप्त करके और अनुसंधान को समाज और उद्योग जगत से जोड़कर ही भारत को 2047 में विकसित राष्ट्र बनाया जा सकता है।

‘क्रिकेट का नहीं, 5 अक्टूबर से शुरू होगा टेरर वर्ल्ड कप’: खालिस्तानी आतंकी पन्नू ने फोन कॉल कर धमकाया, कहा – कनाडा में बंद करो अपना दूतावास, हाई कमिश्नर को वापस बुलाओ

भारत में इस साल 5-9 अक्टूबर, 2023 तक ODI क्रिकेट विश्व कप का आयोजन होने वाला है। अब खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू ने इसे लेकर धमकी दी है। 5 अक्टूबर को गुजरात के ‘नरेंद्र मोदी स्टेडियम’ में इंग्लैंड और न्यूजीलैंड के मैच के साथ इसका आगाज होना है, जिसमें आतंकी हमले की धमकी उसने दी है। उसने धमकाया है कि 5 अक्टूबर को क्रिकेट वर्ल्ड कप नहीं, बल्कि ‘वर्ल्ड टेरर कप’ शुरू होगा। भारत में कई लोगों को UK के एक नंबर से फोन कॉल कर ये धमकी दी गई है।

फोन नंबर +44 7418 343648 से आए इस कॉल में पहले से रिकॉर्ड किए हुए ऑडियो को प्ले किया गया। इसमें गुरपतवंत सिंह पन्नू कहता है, “शहीद निज्जर की हत्या को लेकर हम बुलेट के विरोध में बैलेट का इस्तेमाल करने जा रहे हैं। हमलोग तुम्हारी हिंसा के खिलाफ वोट का इस्तेमाल करने जा रहे हैं। इस अक्टूबर में क्रिकेट वर्ल्ड कप नहीं होगा, 5 अक्टूबर को टेरर वर्ल्ड कप शुरू होगा। ये मैसेज गुरपतवंत सिंह पन्नू की तरफ से है, SFJ (सिख फॉर जस्टिस) के जनरल काउंसिल का।”

SFJ के आतंकी ने कनाडा में रह रहे भारतीय राजनयिकों को भी धमकाया है, खासकर वहाँ भारत के हाई कमिश्नर संजय वर्मा को। खालिस्तानी आतंकी समूह ने भारत को ‘सलाह’ दी है कि वो ओटावा स्थित अपने दूतावास को बंद करे और वहाँ पदस्थापित राजनयिकों को वापस बुलाए। इस सन्देश में कहा गया है कि भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कनाडा के PM जस्टिन ट्रूडो को अपमानित किया है। साथ ही कहा, “गुरपतवंत सिंह पन्नू और कनाडा की जनता की तरफ से मोदी प्रशासन को सलाह है कि अपना दूतावास बंद कर राजदूत को वापस बुलाओ।”

गुरपतवंत सिंह पन्नू ने धमकाया है कि ‘कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के अपमान’ के लिए वो पीएम नरेंद्र मोदी और हाई कमिश्नर संजय वर्मा को जिम्मेदार ठहराएगा। ऐसा प्रतीत होता है कि IP-कॉल सर्विस का इस्तेमाल कर के ये फोन कॉल किया गया है। पत्रकार आदित्य राज कौल उनलोगों में से एक हैं, जिन्हें ये फोन कॉल आया। बता दें कि खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का दोष कनाडा के पीएम ने भारत पर मढ़ा है, जिसके बाद दोनों देशों में तनाव जारी है।

भारत में भी NIA खालिस्तानियों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है। इसी कड़ी में वो बांबिया, लॉरेंस और अर्श डल्ला से जुड़े तीन केसों में छह राज्यों में 51 जगहों पर बड़ी छापेमारी कर रही है। इसके तहत पंजाब, हरियाणा, दिल्ली-एनसीआर और राजस्थान की कई लोकेशन पर जाँच एजेंसी की छापेमारी जारी है। पंजाब में 30, राजस्थान में 13, हरियाणा में 4, उत्तराखंड में 2 और दिल्ली और उत्तर प्रदेश में 1-1 जगह पर छापेमारी की गई। 19 भगोड़े खालिस्तानी आतंकियों की सूची भी जारी की गई है।

गुजरात वाइब्रेंट समिट के 20 साल पूरे, बोले PM मोदी- निवेशकों को धमकाया जाता था, मैंने निराशा से बाहर निकाला

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के दो दिवसीय दौरे (26 और 27 सितंबर) पर हैं। पीएम मोदी ने आज बुधवार (27 सितंबर, 2023) को वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट के 20 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया। इसके अलावा, पीएम मोदी छोटा उदेपुर के बोडेली में 5 हजार करोड़ से ज्यादा की परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास भी किया।

‘ब्रांडिंग नहीं बॉन्डिंग का आयोजन’ 

वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट के 20 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा, “यह सिर्फ ब्रांडिंग का आयोजन नहीं, बल्कि बॉन्डिंग का आयोजन है। मेरे लिए यह मजबूत बॉन्ड का प्रतीक है। यह मेरे और गुजरात के सात करोड़ नागरिक के सामर्थ्य से जुड़ा हुआ है।”

‘निवेश को लेकर माहौल बिगाड़ने की हुई थी कोशिश’

इस अवसर बोलते हुए पीएम ने कहा कि आज वाइब्रेंट गुजरात वटवृक्ष बन चुका है। जब मैंने इस समिट की शुरुआत की तो केंद्र के मंत्री इस आयोजन में शामिल नहीं होना चाहते थे। निवेश को लेकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश हुई थी। गुजरात को उस दौर में अस्थिर करने की कोशिश की गई। निवेशकों को यहाँ निवेश न करने के लिए धमकाया जाता था।

पीएम मोदी ने आगे कहा कि मैंने उस दौर में देश के दूसरे राज्यों को न्योता दिया। हमने राज्यों को कहा कि आइए और इस कार्यक्रम में राज्य का स्टॉल लगाकर फायदा उठाइए। हरियाणा, ओड़िशा और कई राज्यों ने इसका फायदा उठाया।

गोधरा को भी PM मोदी ने किया याद 

वाइब्रेंट गुजरात समिट को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने गोधरा कांड को भी याद किया और कहा, “गोधरा कांड के बाद पूरे गुजरात में हिंसा भड़क उठी थी। उस समय एक मुख्यमंत्री के रूप में मेरे पास ज्यादा अनुभव नहीं था। फिर भी मुझे गुजरात की जनता पर बहुत भरोसा था। कुछ लोग अपना एजेंडा चला रहे थे। उन्होंने गुजरात को बदनाम करने की साजिश रची और लोगों ने नकारात्मकता फैलाने की पूरी कोशिश की। उन्होंने सोचा कि गुजरात नष्ट हो गया है, लेकिन हमारी सरकार ने ध्यान केंद्रित किया और गुजरात को इस नकारात्मकता से उबारने के लिए सही निर्णय लिए।”

‘गुजरात को संकट से निकालने का लिया था संकल्प’

पीएम मोदी ने समिट में आगे कहा, “जो लोग एजेंडा लेकर चलते थे वे उस समय भी घटनाओं का अपने तरीके से आँकलन करने में जुटे हुए थे। कहा गया कि गुजरात से युवा, व्यापारी, उद्योग सब पलायन कर जाएँगे। दुनिया में गुजरात को बदनाम करने की साजिश रची गई। कहा गया गुजरात कभी अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाएगा। उस संकट में मैंने संकल्प लिया कि चाहे परिस्थितियाँ जैसी भी हो गुजरात को इससे बाहर निकालकर रहूँगा। भयंकर दिनों से कैसे गुजरात को निकाला है और आज गुजरात कहाँ पहुँच गया है। जीवन में इससे बड़ा संतोष और क्या हो सकता है।”

उन्होंने यह भी  कहा कि हमने न केवल गुजरात का पुनर्विकास किया बल्कि इसके भविष्य के बारे में भी सोचा, हमने इसके लिए ‘वाइब्रेंट गुजरात’ को एक प्रमुख माध्यम बनाया. ‘वाइब्रेंट गुजरात’ को गुजरात के आत्मविश्वास को बढ़ाने का एक माध्यम बनाया गया और एक चैनल बनाया गया।

सड़क पर अर्धनग्न बच्ची, खून से लथपथ कपड़े, प्राइवेट पार्ट पर घाव… CCTV से खुलासा – बलात्कार के बाद 8 किलोमीटर भटकती रही, बताया – माँ से भी हुई दरिंदगी

मध्य प्रदेश के उज्जैन में एक नाबालिग लड़की से हैवानियत किए जाने का मामला सामने आया है। अर्धनग्न अवस्था में 12 वर्षीया बच्ची शहर की सड़कों पर काफी देर तक भटकते हुए लोगों से मदद की गुहार लगाती रही। उसके प्राइवेट पार्ट पर घाव दिख रहे थे। पुलिस ने पीड़िता को अस्पताल पहुँचाया। बच्ची ने पुलिस को बताया कि उसकी माँ के साथ भी गलत काम हुआ है। बच्ची मूल रूप से उत्तर प्रदेश के प्रयागराज की बताई जा रही है।

केस दर्ज करने के बाद जाँच के लिए SIT का गठन कर दिया गया है। एक ऑटो ड्राइवर को भी हिरासत में लिया गया है। घटना सोमवार (25 सितंबर, 2023) की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मामला थाना क्षेत्र महाकाल का है। सोमवार को पुलिस को यहाँ के बड़नगर रोड स्थित दांडी आश्रम के पास एक घायल बच्ची के पड़े होने की सूचना मिली। पुलिस मौके पर पहुँची और सूचना सही पाई गई। बच्ची के प्राइवेट पार्ट पर चोट के निशान थे। वह अर्धनग्न अवस्था में थी और कपड़े खून से सने हुए थे। पुलिस ने पीड़िता को फ़ौरन अस्पताल पहुँचाया। बच्ची बेहद डरी हुई थी। वह ठीक से बोल नहीं पा रही थी। बताया जा रहा है कि उसने अपनी माँ के साथ भी दरिंदगी होने की जानकारी दी। हालाँकि, पीड़िता की माँ का अभी तक कोई पता नहीं चल पाया है।

पुलिस ने फ़ौरन केस दर्ज कर के जाँच शुरू कर दी। बच्ची को खून पुलिस वालों ने दिया। बच्ची को बेहतर इलाज के लिए इंदौर भेजा गया है। वहाँ मेडिकल के बाद डॉक्टरों ने पीड़िता के साथ रेप होने की पुष्टि की। दूसरी तरफ CCTV फुटेज खँगाले जाने लगे। इन फुटेज में बच्ची घंटों से उज्जैन के अलग-अलग इलाकों में बदहवास हो कर भटकती और लोगों से मदद माँगती दिखाई दे रही है। लगभग 8 किलोमीटर की दूरी नाबालिग पीड़िता ने पैदल ही घायल हालत में तय की। इस दौरान वह सांवराखेड़ी मार्ग, तिरुपति ड्रीम्स, हाटकेश्वर विहार कॉलोनी सहित चिंतामण ब्रिज मार्ग पर भटकती रही।

पुलिस ने अपनी जाँच का दायरा बढ़ाते हुए 72 घंटों की CCTV फुटेज निकलवाई। इस फुटेज में एक व्यक्ति बच्ची के साथ हाटकेश्वर मार्ग पर दिखा। जाँच के दौरान वह संदिग्ध ऑटो ड्राइवर निकला जिसे हिरासत में ले कर पूछताछ की जा रही है। अन्य अन्य फुटेज सोमवार की सुबह लगभग 5 बज कर 52 मिनट का मिला है। इस फुटेज में उज्जैन की ड्रीम्स कॉलोनी से हड़बड़ा कर गुजर रही बच्ची से एक वृद्ध व्यक्ति ने सवाल-जवाब किया। बच्ची ने बस इतना बताया कि कुछ लोग उसके पीछे लगे हैं। इतना कह कर वो आगे बढ़ गई।

अभी तक हुई जाँच में पीड़िता के उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के किसी हिस्से की निवासी होने की अपुष्ट जानकारी मिली है। मध्य प्रदेश पुलिस ने पुष्टि के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस को सम्पर्क किया है। पीड़िता के मूल पते की तस्दीक करवाई जा रही है। अभी तक पीड़िता की माँ का भी कुछ पता नहीं चल पाया है। पुलिस बच्ची के ठीक होने की प्रतीक्षा कर रही है। पीड़िता उज्जैन क्यों, कहाँ और किसके पास आई थी इसकी भी जानकारी अभी तक पुलिस को नहीं मिल पाई है। केस भी अज्ञात के खिलाफ दर्ज किया गया है।