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पवित्र पहाड़ी पर मद्रास HC का फैसला हिंदुओं के पक्ष में आया, तो मुस्लिमों को पीड़ित दिखाने वाली कहानी गढ़ने में जुट गया TNM: BJP पर लगाया ‘एक और अयोध्या’ बनाने का आरोप

तमिलनाडु के मदुरै में स्थित प्रसिद्ध ‘थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी’ हिंदू और मुस्लिम के बीच तनाव का कारण रहा है। हालाँकि मद्रास हाईकोर्ट ने हिंदुओं के पक्ष में अपना फैसला सुना कर भगवान मुरुगन की इस पहाड़ी पर विवाद खत्म करने की कोशिश की है।

पहाड़ी के नाम से लेकर सुल्तान सिकंदर बधुशा दरगाह (मंदिर) में पशु बलि की प्रथा और नेल्लितोप्पु क्षेत्र में मुसलमानों के इबादत करने के अधिकार पर अक्टूबर में मद्रास हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया, जिसकी काफी चर्चा की गई।

हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि पवित्र स्थल का नाम ‘थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी‘ ही रहेगा, सिविल न्यायालय के फैसले तक पशु बलि पर प्रतिबंध रहेगा और मुसलमान केवल रमज़ान और बकरीद के दौरान ही नेल्लितोप्पु क्षेत्र में शर्तों के साथ इबादत कर सकेंगे।

यह जगह सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए काफी पूजनीय है, क्योंकि यहाँ ऐतिहासिक अरुलमिघु सुब्रमण्यम स्वामी का मंदिर है, जो भगवान मुरुगन के छह निवास स्थानों में एक माना जाता है।

फिर भी, वामपंथी मुखपत्र ‘द न्यूज मिनट’ ने कोर्ट के फैसले के बावजूद इस मुद्दे को फिर से हवा देने की कोशिश की है। इसका मकसद धार्मिक भावनाओं को भड़काना और भारतीय जनता पार्टी को निशाना बनाना है। 5 नवंबर को प्रकाशित ‘दक्षिण की अयोध्या – अनादि काल की एक समयरेखा’ शीर्षक वाले लेख में, मुस्लिमों को ‘पीड़ित’ दिखाने की झूठी कोशिश की गई। इसके लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया।

‘अयोध्या’ का जिक्र किए जाने से साफ पता चलता है कि मीडिया हाउस इस लेख के जरिए क्या हासिल करना चाहता है। इस दौरान इस बात को भी नजरअंदाज कर दिया गया कि राम जन्मभूमि का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था। हालाँकि, यह वामपंथी प्रोपेगेंडा ऐसे फैसलों को तभी स्वीकार करता है जब वे उनके अनुसार हो। वरना वे हर संस्था को समझौतावादी बताते हैं या फैसलों का सम्मान नहीं करते, जैसा कि इस स्थिति में भी हुआ।

मुस्लिम को ‘पीड़ित’ बता बीजेपी पर हमला तेज

आर्टिकल में 4 जुलाई को 52 वर्षीय रसोइये सैयद अबुताहिर के साथ हुए एक साक्षात्कार का हवाला दिया गया है, जो तिरुपरनकुंड्रम स्थित दरगाह पर एक बकरे की बलि देना चाहते थे। उन्होंने दावा किया कि ‘सुन्नी मुसलमानों ने अपनी सूफी तीर्थयात्रा की तारीख क्रिसमस पर बदल दी। ताकि उनके गैर-ब्राह्मण हिंदू पड़ोसी इस उत्सव में शामिल हो सकें।”

हालाँकि, एक पुलिस निरीक्षक ने उन्हें बताया कि यहाँ पशुबलि निषेध है और उन्हें रोक दिया। दरगाह समिति के सदस्यों, स्थानीय जमात और कई मुस्लिम नेताओं ने इसका विरोध किया। लेकिन पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की। इस दौरान आरोप लगा कि केवल मुस्लिम पुरुषों पर ही एफआईआर दर्ज कीं, जबकि हिंदुओं, महिलाओं और बच्चों को छोड़ दिया गया।

(फोटो साभार- द हिन्दू)

इस लेख की शुरुआत में मुसलमानों को ऐसे चित्रित किया गया, जैसे वे काफी प्यार से रहते हैं और ‘गैर ब्राह्मण’ हिन्दुओं के लिए अपनी आस्था तक कुर्बान कर देते हैं। लेख में थोड़ा आगे बढ़ते ही हिंदू मुन्नानी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर हमला शुरू हो गया। जाहिर तौर पर वामपंथी प्रोपेगेंडा शुरू था, ताकि राज्य विधानसभा चुनावों के नजदीक आते ही इस मुद्दे को तूल दिया जा सके। लेख में हिन्दुओं पर पहाड़ी पर पूर्ण नियंत्रण के लिए राज्यव्यापी आंदोलन चलाने का भी आरोप लगाया गया।

मीडिया संस्थान ने इस बात पर जोर दिया कि हिंदू वर्ग दरगाह में नमाज पढ़ने और पशु बलि पर रोक लगाना चाहते थे, क्योंकि उनका तर्क था कि यह पूरी चट्टान हिंदू देवता मुरुगन के शरीर का प्रतिनिधित्व करती है।

अबुताहिर ने तो यह भी आरोप लगाया कि इस स्थल पर मुस्लिम प्रथाओं को लेकर वर्षों से कोई समस्या नहीं रही है, और यह भी कहा कि अगर पहले कोई आपत्ति नहीं थी, तो अब भी नहीं होनी चाहिए।

सबसे पहले तो यह तर्क ही त्रुटिपूर्ण है। क्योंकि कोई खास प्रथा वर्षों से चली आ रही है, इसका मतलब यह नहीं है कि उसे जारी रहने दिया जाना चाहिए। क्या इसी तरह तीन तलाक कानून जैसी प्रथाओं को भी वैसे ही छोड़ दिया जाना चाहिए था, जैसा पहले था। इसके लिए कानूनी बदलाव ये बताता है कि प्रथाएँ हमेशा सही नहीं होती।

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कोई हालिया विवाद नहीं है, बल्कि एक सदी से भी ज़्यादा समय से चला आ रहा है। हिंदुओं ने हमेशा से पूरी पहाड़ी पर अपना स्वामित्व बनाए रखा है, खासकर 1920 में दरगाह द्वारा मंडप बनाने के प्रयास के बाद से।

‘समन्वित पूजा स्थल’ और ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ स्थल होने का दावा

लेख के अनुसार, जब पुलिस ने मुस्लिम कट्टरपंथियों को गिरफ्तार किया, तब न तो स्थानीय भाजपा इकाई और न ही कोई अन्य हिंदुत्व संगठन ‘तस्वीर में’ था। पुलिस को पशु बलि के संबंध में तिरुपरनकुंड्रम के किसी भी हिंदू निवासी से कोई औपचारिक शिकायत नहीं मिली थी।

दिलचस्प बात यह है कि मुस्लिम पक्ष ने इस मुद्दे को लेकर अदालत का रुख किया और दलीलों के दौरान दावा किया कि यह एक ‘समन्वित पूजा स्थल है जहाँ दोनों या सभी धर्मों के तीर्थयात्री आते हैं’। उन्होंने यह भी कहा कि ‘दरगाह में हलाल समारोह आयोजित करने वाला व्यक्ति परमशिवम नाम का एक हिंदू है, जो मुक्कुलाथोर या थेवर समुदाय का सदस्य है।’

परमशिवम के बेटे का हस्ताक्षर युक्त शपथ पत्र भी लेख में दिखाया गया है, जिसमें उसे ‘दरगाह का भक्त’ बताया गया है। लेख में कहा गया है कि परमशिवम का परिवार ‘हलाल’ करता है और एक पुराने अनुष्ठान के तहत मांस का एक हिस्सा अपने पास रखता है।

(फोटो साभार- तमिलनाडु टूरिज्म)

इस्लामी आस्था के प्रतीक दरगाह को समन्वित संस्कृति और सांप्रदायिक सद्भाव स्थल के रूप में बताया गया है। साथ ही कहा गया कि इसके कार्यक्रम में हिंदू भी भाग लेते हैं, जो बेहद निराशाजनक है।

ईद या क्रिसमस पर हिंदुओं की भागीदारी या किसी मंदिर में गैर-हिंदुओं का जाना, इन अवसरों या स्थलों की धार्मिक प्रकृति को नुकसान नहीं पहुँचाता। इससे धार्मिक तत्वों को अलग नहीं किया जा सकता, भले ही इनमें विभिन्न धर्मों के लोग शामिल हों।

इसी तरह, जब हिंदू सैकड़ों वर्षों से पहाड़ी पर अपने वैध दावों के लिए संघर्ष कर रहे हैं और उन्हें लगातार इससे वंचित रखा जा रहा है, तो यह सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकता है?

दरगाह के कार्यक्रमों में शामिल कुछ हिंदुओं की हरकतें, व्यापक हिंदू समुदाय की भावनाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती। हिन्दुओं की आस्था को दूसरों की आस्था के समान ही महत्वपूर्ण क्यों नहीं माना जाना चाहिए?

फर्जी बयान को बनाए रखने के लिए आधिकारिक बयानों पर संदेह

तिरुपरनकुंद्रम राजस्व निरीक्षक के अनुसार, “दरगाह तक जाने वाले आम रास्ते को मुसलमानों ने जाम कर दिया था। उन्होंने बताया कि मुस्लिमों ने ‘पुलिस को अपना कर्तव्य निभाने से रोका’ और शिकायत में ‘पुलिस अराजकता मुर्दाबाद’ समेत कई विवादित नारे लगाए गए।” लेख में सवाल किया गया कि एक समुदाय के तीर्थयात्रियों को दूसरे समुदाय के तीर्थयात्रियों को दरगाह तक जाने देने में क्या आपत्ति हो सकती है?

(फोटो साभार- आउटलुक ट्रेवलर)

इसका जवाब शायद वैसा ही हो सकता है जैसे हर त्योहार पर हिंदू जुलूसों पर हमले होते हैं और उन्हें अक्सर ‘मुस्लिम इलाकों’ से गुजरने की इजाजत नहीं दी जाती। हालाँकि, वामपंथी लॉबी इस चर्चा के लिए तैयार नहीं है और न ही कभी होगी। उन्हें सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली बात उनके पसंदीदा जनसांख्यिकी की सच्चाई को उजागर करने वाली असुविधाजनक सच्चाइयाँ हैं। इसलिए वे समुदाय के हर नापाक पहलू को नज़रअंदाज करते रहते हैं।

लेख में बताया गया है कि राजस्व निरीक्षक के आरोपों को मदुरै के पुलिस आयुक्त जे लोगनाथन ने मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ में अपनी याचिका में दोहराया और इस बात पर अफसोस जताया कि वे यह बताने को तैयार नहीं थे कि कैसे ‘राजपलायम के हिंदू अपने मुस्लिम पड़ोसियों के साथ एक परिवार की तरह बकरे की बलि देने और सूफ़ी रीति-रिवाजों में हिस्सा लेने के लिए यात्रा करते थे’, ताकि ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ का प्रचार जोर शोर से किया जा सके।

कथित तौर पर अबुताहिर ने लगभग पंद्रह मिनट तक बात की और फिर अचानक संपर्क तोड़कर गायब हो गए। उन्होंने जमात के उन सदस्यों से भी संपर्क तोड़ दिया जिन्होंने मीडिया हाउस को उनसे संपर्क करवाया था और बातचीत जारी रखने के लिए तभी राज़ी हुए जब मदुरै के वकील एस वंचिनाथन ने उनका मामला लेने का वादा किया और उनके गायब होने के लिए स्थानीय पुलिस को जिम्मेदार ठहराया।

इसके बाद लेख में एक ‘आदर्श समाज’ को दिखाने की कोशिश की गई है। इसमें कहा गया कि एक अकेला मुस्लिम परिवार हिंदुओं के बीच रहता है। दोनों समुदायों के लोग तब तक मिलजुलकर रहते हैं, जब तक कि भाजपा या हिंदुत्व कार्यकर्ता उनके बीच तनाव पैदा नहीं कर देते।

हिंदू भावनाओं को नजरअंदाज किया गया

यह लेख बड़ी चालाकी से दोष दोनों पर डाल देता है। इस दौरान इस बात को नज़रअंदाज़ किया गया है कि यह मामला लंबे समय से हिंदू धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हुआ है और राजनीति से इसका कोई लेना-देना नहीं है। यह लेख मूलतः हिंदुओं से ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ के नाम पर अपने अधिकारों को छोड़ने या आरोप झेलने के लिए तैयार रहने को कहता है।

लेख के अनुसार, पुलिस ने जिला कलेक्टर से आदेश मिलने का दावा किया और उन्हें पहाड़ी पर चढ़ने से रोक दिया, लेकिन जमात ने जब जाँच की तो पाया कि ऐसा कोई आदेश नहीं दिया गया था। अधिकारियों ने तब दावा किया कि ये निर्देश जिला के राजस्व विकास अधिकारी (आरडीओ) ने जारी किए गए थे। हालाँकि, मुसलमानों ने दावा किया कि पुलिस को ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं किया गया था।

अगर यह सच है, तो क्या यह वर्तमान सरकार के अधीन अधिकारियों की प्रशासनिक विफलता नहीं है? हालाँकि, लेख में जिम्मेदार अधिकारियों से सवाल पूछने के बजाय, हिंदू समूहों और भाजपा से सवाल पूछे गए हैं। ऐसा तब है जब राज्य विधानसभा में भाजपा के सिर्फ 4 सदस्य हैं।

लेख में यह भी जोड़ा गया कि जैनियों ने पुरातात्विक साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं जिनसे पता चलता है कि उन्होंने अन्य दो धर्मों से बहुत पहले तीर्थस्थल स्थापित किए थे, बिना यह बताए कि कैसे इस्लामवादियों ने उनकी गुफाओं को भी नहीं छोड़ा और उन्हें हरे रंग से रंग दिया।

लेख में कहा गया, “इस संघर्ष से जुड़े बदलते कानूनी और राजनीतिक समीकरणों ने विस्तार से बताया कि कैसे पुलिस और नौकरशाही की कार्रवाइयों ने एक खालीपन पैदा किया , जिसे भाजपा ने अपने हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए तेजी से भर दिया।”

निष्पक्षता का भ्रम पैदा करने के लिए लेख में दावा किया गया कि “धर्मनिरपेक्ष समूह पुलिस और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के नेतृत्व वाली राज्य मशीनरी से बेहद निराश हैं, जिसे वे द्रविड़ मॉडल की सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता को सक्रिय रूप से कमज़ोर करने वाला मानते हैं।”

पूरा लेख हिंदुत्व और भाजपा की निंदा करने के लिए समर्पित है, जबकि जिस सरकार को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, उसकी आलोचना केवल राज्य में उनकी बढ़ती उपस्थिति के बावजूद “सामाजिक न्याय” प्रदान करने में विफल रहने के लिए की जा रही है।

गौरतलब है कि यह वही पार्टी है जिसके मंत्री, विधायक और यहाँ तक कि सांसद भी सनातन धर्म को खत्म करना चाहते हैं। इसके प्रति अपनी घृणा सार्वजनिक तौर पर जाहिर कर चुके हैं। यह बेहद हास्यास्पद है कि लेख में यह सुझाव दिया गया है कि ऐसे प्रशासन ने उन शरारती ‘हिंदुत्ववादी ताकतों’ के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की, जिनका वास्तव में राज्य में कोई दबदबा नहीं है।

इसके बाद मीडिया संस्थान ने इसी बयानबाजी को दोहराया और कहा कि ‘हिंदुत्व समूह इसे दक्षिण भारत का अयोध्या कह रहे हैं।’ इसने आगे इस बात की निंदा की कि कैसे ‘हिंदू मुन्नानी, हिंदू मक्कल कच्ची, आरएसएस और भाजपा लगभग पाँच लाख लोगों के साथ 22 जून को मदुरै में मुरुगन ‘मानडु’ (सम्मेलन) के लिए एकत्रित हुए।’ यह राज्य के इतिहास में सबसे बड़ा हिंदुत्व सम्मेलन था।

इस दौरान पूरी पहाड़ी पर कब्जा करने का संकल्प लिया गया। भगवान मुरुगन के इस निवास स्थान में मौजूद दरगाह में पशु बलि पर रोक लगाने की माँग की गई। हिंदू मक्कल कच्ची ने अदालत में सिकंदर मलाई नाम के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए याचिका दायर की और इस बात पर ज़ोर दिया कि मुरुगन के कई नामों में से एक के सम्मान में पहाड़ी को स्कंदर मलाई कहा जाए।

मुसलमानों ने उस स्थान पर अपनी बलि प्रथा जारी रखी और मुस्लिम नेताओं ने भी उस स्थान का दौरा किया। हालाँकि, मीडिया संगठन ने सिर्फ हिंदुओं के वहाँ जमा होकर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने पर आपत्ति जताई। अगर हिंदू धर्मनिरपेक्षता के निर्धारित मार्ग से ज़रा भी विचलित होते हैं, अपनी धार्मिक पहचान का दावा करते हैं या कोई सच्ची माँग करते हैं, तो अदालत के फैसले की परवाह किए बिना उन्हें ‘हिंदुत्ववादी’ करार दिया जाएगा।

कानूनी विवादों का इतिहास एक सदी पुराना है

लेख में आरोप लगाया गया है कि “कुंड्रम, कुंदरू या मलाई हर एक नाम और दावे के पीछे एक कहानी है, जो उस समय से जुड़ी है जिसका ऐतिहासिक साक्ष्य काफी कम है।” हालाँकि, जैसा कि पहले बताया गया है, दरगाह ने 1920 में एक मंडप बनाने की कोशिश की, लेकिन तिरुपरनकुंड्रम स्थित अरुलमिगु सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर ने पूरे क्षेत्र पर स्वामित्व की घोषणा की।

निचली अदालत ने 1923 में कहा कि मंदिर के पास लगभग पूरी पहाड़ी है, सिवाय नेल्लीथोप्पु की लगभग 33 सेंट ज़मीन के, जहाँ दरगाह का ध्वजस्तंभ और मस्जिद स्थित हैं। उस समय की सर्वोच्च अदालत, प्रिवी काउंसिल ने, दरगाह की अपील के बाद, 1931 में ‘अनादि काल से’ पहाड़ी पर मंदिर के अधिकारों को बरकरार रखा।

इस रुख का समर्थन अन्य मामलों द्वारा भी किया गया। अदालत ने 1958 में दरगाह की प्रतिबंधित सीमाओं के बाहर खुदाई पर रोक लगा दी। साल 2011 में कोर्ट ने मंदिर की सहमति के बिना किसी भी नए निर्माण कार्य पर रोक लगा दी।

अदालतें एक सदी से भी ज़्यादा समय से पहाड़ी पर मंदिर के नियंत्रण को बरकरार रखती आई हैं, और दरगाह के अधिकारों को केवल उसके 33 सेंट के दायरे तक ही सीमित कर दिया है।

मुस्लिम अतिक्रमण का विरोध करते रहे हैं हिन्दू

हकीकत उस चित्रण के बिल्कुल उलट है जो द न्यूज़ मिनट ने अपने लेख में गढ़ने की कोशिश की थी। मुसलमानों द्वारा किए गए अवैध अतिक्रमणों का विरोध करने के लिए हिंदुओं को बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन करने पड़े और कानूनी लड़ाई भी लड़नी पड़ी।

डीएमके सरकार की मंज़ूरी से पशु बलि की अनुमति दी गई थी। जब प्रतिबंधित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) की राजनीतिक शाखा, डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) ने सांप्रदायिक तनाव भड़काने की कोशिश की, तो हिंदू श्रद्धालुओं के उग्र प्रदर्शन के बाद अधिकारियों को अंततः कार्रवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके अलावा, डीएमके पहाड़ी का नाम बदलकर सिकंदर मलाई करने की कोशिश करता रहा।

निजी स्वार्थों वाले लोग दरगाह को सांप्रदायिक सद्भाव और धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक मान सकते हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि इसका इस्तेमाल हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों को कुचलने, उनके पवित्र स्थल पर अतिक्रमण करने और उनकी धार्मिक भावनाओं का शोषण करने के लिए किया गया है। उच्च न्यायालय का फैसला और इस क्षेत्र की कानूनी पृष्ठभूमि भी इसी सच्चाई को रेखांकित करती है, जिसे उदार-वामपंथी मीडिया छिपानी की कोशिश करता है।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

‘PM नरेंद्र मोदी पारस है, जिसको चाहेंगे सोना बना देंगे’: कटिहार में जनता का NDA को समर्थन

बिहार विधानसभा चुनाव के लिए पहले चरण का मतदान संपन्न हो चुका है। लगातार ग्राउंड पर बनी ऑपइंडिया की टीम इस बीच कटिहार पहुँची, यहाँ मतदाताओं की पहली पसंद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं। क्षेत्र के मतदाता बिहार की सरकार से काफी खुश दिखाई दिए।

कटिहार में पीएम नरेंद्र मोदी की रैली में शामिल हुए बुजुर्ग व्यक्ति कहते हैं, “पीएम नरेंद्र मोदी से काफी प्रेम है, उतना बाल-बच्चा से भी नहीं है। उन्होंने पुलिया बनाया, राशन-पानी दिया, विकास दिया और सारी सुविधाएँ दी।” रैली में आए युवाओं का भी कहना है कि रोजगार देने वाले सिर्फ नीतीश कुमार की सरकार है, वोट उन्हीं को देंगे।

योगेंद्र नाथ नाम के व्यक्ति कहते हैं, “NDA की सरकार ही आएगी। पीएम मोदी पारस है, जिसको चाहेंगे सोना बना देंगे देगा, विकास की गंगा बहा देंगे। हमारे घर में जितना भी कुछ है उन्हीं की देन है। पंखा, बिजली, घर सिलेंडर सब कुछ।”

देखें कटिहार से ग्राउंड रिपोर्ट

सीमांचल के किशनगंज में राहुल गाँधी का वोट चोरी दावा फुस्स, मुस्लिम बोले- हमें चाहिए SIR

बिहार के मुस्लिम बहुल किशनगंज में ऑपइंडिया की टीम पहुँची तो राहुल गाँधी का ‘वोट चोरी’ वाला बयान हवा में उड़ता मिला। एक चाय की दुकान पर बैठे अब्दुल बोले, “राहुल साहब झूठ बोल रहे, हमारा वोट कोई नहीं चुराता। हमें SIR चाहिए, घुसपैठिए बाहर निकलें।” पास ही खड़े जावेद ने हँसते हुए कहा, “राहुल गाँधी को लगता है हम बेवकूफ हैं? हम जानते हैं कौन हमारा हितैषी है।”

हमसे बातचीत में मुस्लिम महिलाएँ भी खुलकर बोलीं। रुकसाना बीबी ने बताया, “पहले बांग्लादेशी आकर बस जाते थे, अब SAR नहीं, SIR से डरते हैं। वोट चोरी की बात बकवास है।”

अनुराग मिश्रा की ग्राउंड रिपोर्ट में साफ है-70% मुस्लिम आबादी वाला किशनगंज घुसपैठ से त्रस्त है, लोग राहुल के दावे को सिरे से खारिज कर रहे हैं और SIR को अपना हिफाजत कवच बता रहे हैं।

देखें ग्राउंड रिपोर्ट

किशोरी और महिला के यौन उत्पीड़न के दोषी को इंग्लैंड में गलती से मिली रिहाई, सजा पूरी होने से पहले ही कर दिया डिपोर्ट: संसद में उठा मुद्दा

लंदन की पुलिस उन कैदियों की तलाश में है, जिसे एक हफ्ते के अंदर वेंड्सवर्थ जेल से ‘गलती से’ रिहा कर दिया गया था। इस घटना के बाद ब्रिटेन का जेल प्रशासन सवालों के घेरे में है।

29 अक्टूबर 2025 को ‘गलती’ से छूटा पहला कैदी 24 साल का ब्राहिम कद्दौर-चेरिफ था, जो एक अल्जीरियाई यौन अपराधी था। कुछ दिन बार 3 नवबंर को उसी जेल से दूसरा कैदी विलियम स्मिथ भी ‘गलती’ से रिहा हो गया।

ऐसी ही ‘गलती’ एक और हुई है। इथियोपियाई नागरिक और सजायाफ्ता यौन अपराधी हादुश केबातु को एसेक्स की एक जेल से ‘गलती’ से रिहा कर दिया गया। इन ‘गलतियों’ की वजह से न्याय सचिव डेविड लैमी की देशभर में आलोचना हो रही है। वे राजनीतिक आलोचनाओं के केन्द्र में हैं। हालाँकि उन्होंने केबातु के मामले के बाद भविष्य में ऐसी घटना नहीं होने देने की बात कही थी।

संसद में सवाल और राजनीतिक बवाल

यह मुद्दा इस हफ्ते प्रधानमंत्री से पूछे गए सवालों (पीएमक्यू) में भी था। हालाँकि प्रधानमंत्री कीर स्टारमर की जगह डेविड लैमी से घटना को लेकर सवाल पूछा गया। सांसद ये जानना चाहते थे कि क्या केबातु के मामले के बाद से किसी शरण माँगने वाले अपराधी को गलती से रिहा किया गया है। हालाँकि, लैमी ने इस सवाल का सीधा जवाब नहीं दिया।

संसद सत्र के समापन के बाद मेट्रोपॉलिटन पुलिस ने पुष्टि की कि 29 अक्टूबर को एक विदेशी कैदी को ग़लती से हिरासत से रिहा कर दिया गया था। इसकी सूचना उन्हें लगभग एक हफ्ते बाद मिली।

मेट्रोपॉलिटन पुलिस ने उस व्यक्ति की पहचान कद्दौर-शेरिफ के रूप में की, जिसके लंदन के टावर हैमलेट्स और वेस्टमिंस्टर से संबंध हैं।

नवंबर 2024 में उसे एक नग्न प्रदर्शन करने के मामले में दोषी ठहराया गया था। और 18 महीने जेल की सजा के साथ साथ यौन अपराधियों की सूची में पाँच साल के लिए शामिल कर दिया गया।

रिपोर्टों के नुसार, कद्दूर-शेरिफ 2019 में विज़िट वीजा पर कानूनी तरीके से यूके आए थे, लेकिन वीजा की अवधि समाप्त होने के बाद भी वे नहीं गए। अधिकारियों ने उन्हें 2020 में ही ‘ निर्धारित समय से ज्यादा समय तक रहने वाले’ के रूप में पहचान की थी।

बीबीसी ने बाद में बताया कि वे शरणार्थी नहीं हैं और डेविड लैमी को रातोंरात उनकी ‘गलती’ से हुई रिहाई के बारे में सूचित कर दिया गया था। न्याय सचिव लैमी ने इस गलती को ‘अस्वीकार्य’ बताया। पुलिस के बयान को लेकर लैमी ने प्रतिक्रिया देते हुए इसे ‘बेहद अपमानजनक और भयावह’ करार दिया। उन्होंने कहा कि दोषियों को सजा मिलनी चाहिए और ऐसी गलतियाँ ‘पूरी तरह से अस्वीकार्य’ हैं।

लैमी ने डेम लिन ओवेन्स के नेतृत्व में एक स्वतंत्र जाँच की घोषणा की। उन्होंने कहा, “मैंने पहले ही कड़ाई से जाँच शुरू कर दी है, लेकिन यह स्पष्ट है कि इन गलतियों को हमेशा के लिए रोकने के लिए और भी कुछ किया जाना चाहिए।”

हालाँकि, विपक्षी दल इससे सहमत नहीं थे। कंजर्वेटिव से जुड़े गृह सचिव क्रिस फिलिप ने कहा, “यह चौंकाने वाला है कि एक बार फिर एक विदेशी अपराधी को गलती से रिहा कर दिया गया। इससे लैमी के दावे की मजाक उड़ रही है। उन्होंने ‘अब तक की सबसे कड़ी जाँच’ शुरू करने की बात कही थी।

दूसरे कैदी को भी गलती से रिहा कर दिया गया

कद्दौर-शेरिफ़ की गलत रिहाई की जब पुलिस ने पुष्टि की, उसके कुछ ही घंटों बाद सरे पुलिस (surrey police) से एक और चौंकाने वाली जानकारी सामने आई। उन्होंने खुलासा किया कि विलियम स्मिथ को भी इसी हफ्ते उसी जेल वैंड्सवर्थ से, गलती से रिहा कर दिया गया।

स्मिथ को सोमवार, 3 नवंबर को धोखाधड़ी से जुड़े विभिन्न अपराधों के लिए 45 महीने की जेल की सजा सुनाई गई थी, लेकिन उसी दिन वह गलती से रिहा कर दिया गया।

बीबीसी की पड़ताल में सामने आया है कि ऐसा तब हुआ, जब अदालत के कर्मचारियों ने अनजाने में उसे हिरासत में लेने के बजाय छोड़ दिया गया। हालाँकि थोड़ी देर बाद गलती सुधारने की कोशिश की गई। लेकिन जानकारी गलत अधिकारी को दे दी गई, जिसने उसे वापस पकड़ा नहीं जा सका।

पुलिस ने स्मिथ को गोरा, गंजा और क्लीन शेव बताया है। उसे आखिरी बार सफ़ेद नाइकी लोगो वाला नेवी ब्लू जम्पर, नेवी ब्लू ट्रैक पैंट और काले रंग के स्नीकर्स पहने देखा गया था। अधिकारियों ने ऐसे व्यक्ति को देखने पर तुरंत पुलिस को सूचित करने की लोगों से अपील की है।

आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, मार्च 2025 तक इंग्लैंड और वेल्स में 262 कैदियों को गलती से रिहा कर दिया गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 128% अधिक है। वैंड्सवर्थ के कर्मचारियों ने बीबीसी को बताया कि इन हालिया गलतियों के बाद से जेल में दहशत फैल गई है। वैंड्सवर्थ में सुरक्षा संबंधी चिंताएँ नई नहीं हैं।

पिछले साल की रिपोर्ट में भी व्यापक अराजकता और कैदियों की खराब ट्रैकिंग का उल्लेख किया गया था। साल 2023 में भी इसी जेल ने तब सुर्खियाँ बटोरीं जब ईरान के लिए जासूसी करने के मुकदमे का इंतजार कर रहे डैनियल खलीफ भाग गया था।

यौन अपराधी हदुश केबातु का मामला

हदुश केबातु एक इथियोपियाई शरणार्थी है, जिसे एसेक्स में एक किशोरी और एक महिला के यौन उत्पीड़न का दोषी ठहराया गया था। उसे 1 साल जेल की सजा हुई थी। लेकिन एक महीने बाद ही वह गलती से रिहा कर दिया गया।

इस मामले में डेम लिन ओवेन्स की अध्यक्षता में एक जाँच पहले से ही चल रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि इतनी गंभीर गलती कैसे हुई।

हदुश केबातु (फोटो साभार- इंडिपेंडेंट)

दो दिनों तक तलाशी अभियान चलाया गया और केबातु को 26 अक्टूबर को उत्तरी लंदन के फिन्सबरी पार्क में फिर से गिरफ्तार कर लिया गया। वह चेम्सफोर्ड से वहाँ आया था। दो दिन बाद उसे निर्वासित कर दिया गया, लेकिन निर्वासन प्रक्रिया में बाधा डालने की धमकी देने पर अधिकारियों ने उसे £500 दिए।

14 वर्षीय पीड़िता के पिता ने आईटीवी न्यूज़ को बताया कि सरकार पूरी तरह फेल रही। अपराधी को पकड़ा गया, फिर उसे निर्वासित कर दिया गया। जिस तरह से इस मामले को हेंडल किया गया, उससे उनका परिवार काफी निराश है।

उन्होंने गहरी निराशा व्यक्त करते हुए कहा, “हमें बस असफलता के बाद असफलता ही हाथ लग रही है। मैं नाराज नहीं हूँ, मैं निराश हूँ।”

उस युवती ने आईटीवी को लिखित बयान साझा किया। बयान में उसने कहा था कि वह ‘सो नहीं पा रही है’ क्योंकि उसे डर था कि वह मुझे ढूँढ़ने के लिए एपिंग वापस आ जाएगा”।

केबातु प्रकरण के बाद शरणार्थियों के होटलों के बाहर विरोध प्रदर्शन हुए। इस दौरान कई हिंसक झड़पें भी हुई।

उन्होंने कहा कि केबातु की गिरफ्तारी से लेकर उसके निर्वासन तक की पूरी प्रक्रिया में सिर्फ़ 17 हफ्ते लगे। परिवार का मानना है कि इससे उनके बेटी के साथ ‘न्याय’ नहीं हुआ।

राहुल गाँधी के सारे ‘हाईड्रोजन बम’ फुस्स, अपने ही कार्यकर्ताओं ने बनाया बेवकूफ: पढ़ें- कॉन्ग्रेस के युवराज के बैक-टू-बैक 8 दावों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने एक बार फिर बुधवार (5 नवंबर 2025) को प्रेस कॉन्फ्रेंस करके ‘वोट चोरी’ का ‘हाईड्रोजन बम’ फोड़ने का फर्जी दावा किया है। बिहार चुनाव से पहले राहुल गाँधी ने हरियाणा विधानसभा चुनाव 2024 का हवाला देते हुए चुनाव आयोग और बीजेपी पर 25 लाख वोटों की चोरी का गंभीर आरोप लगाया। राहुल गाँधी ने ‘एच फाइल्स‘ के नाम से प्रेजेंटेशन देकर दावा किया कि हर आठ में से एक वोटर फर्जी था, जिसकी वजह से कॉन्ग्रेस हारी।

हालाँकि, जब इन आरोपों की पड़ताल की गई और चुनाव आयोग ने तथ्य सामने रखे, तो राहुल गाँधी के दावे एक बार फिर कमजोर और आधारहीन साबित हुए। अब आपको फैक्ट चेक के आधार पर बताते है कि राहुल गाँधी ने क्या आरोप लगाए और उसके जवाब में क्या सच सामने आया।

आरोप नंबर 1: ‘ब्राजीलियन मॉडल’ ने 22 बार डाला वोट

राहुल गाँधी का आरोप: राहुल गाँधी ने आरोप लगाया कि सोनीपत के राई विधानसभा क्षेत्र की वोटर लिस्ट में ब्राज़ील की एक मॉडल का फोटो लगा हुआ था। राहुल गाँधी ने बताया कि इस मॉडल ने अलग-अलग नाम (जैसे स्वीटी या सीमा) से 10 बूथों पर 22 बार वोट डाले। राहुल गाँधी के अनुसार, यह ‘वोट चोरी’ की बड़ी साजिश थी।

फैक्ट चेक का सच: पड़ताल के लिए जब राई क्षेत्र के 8 गाँवों (मच्छरौला, मुरथल, बारोटा आदि) में जाँच की गई, तो सामने आया कि वोट किसी मॉडल ने नहीं डाले, बल्कि असली मतदाताओं ने ही डाले थे। 22 में से 13 महिला मतदाताओं ने पुष्टि की कि उन्होंने विधानसभा चुनाव में अपना वोट खुद डाला था।

मतदाताओं (जैसे मच्छरौला की पिंकी और मुनेश) ने बताया कि वोटर लिस्ट में भले ही उनकी जगह किसी और का फोटो लगा था, लेकिन उनका नाम, पति का नाम और पता बिल्कुल सही था। वोट डालते समय उन्होंने अपना पहचान पत्र (जैसे वोटर आई कार्ड) दिखाया, जिसके बाद चुनाव अधिकारियों ने उन्हें वोट देने दिया।

‘ब्राजीलियन मॉडल’ ने क्या कहा: राहुल गाँधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में हरियाणा की वोटर लिस्ट में अपनी तस्वीर दिखने के बाद, ब्राजील की डिजिटल इन्फ्लुएंसर और हेयरड्रेसर ने सोशल मीडिया पर इस पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने वीडियो जारी कर साफ किया, “मेरी तस्वीर का इस्तेमाल… मुझे नहीं पता कि यह चुनाव है या कुछ और, जहाँ वोटिंग जरूरी है। और… भारत में… सच में?? ये लोग मुझे एक भारतीय महिला के रूप में दिखा रहे हैं ताकि दूसरों को धोखा दिया जा सके, दोस्तों। यह मैं नहीं हूँ, मैं कभी भारत गई भी नहीं हूँ, मैं एक ब्राजीलियन डिजिटल इन्फ्लुएंसर और हेयरड्रेसर हूँ, और मैं भारतीय लोगों से बहुत प्यार करती हूँ।”

आरोप नंबर 2: ‘एक ही घर’ में 501 और 66 वोटर

राहुल गाँधी का आरोप: राहुल गाँधी ने दावा किया कि हरियाणा में एक घर में 501 वोटर और दूसरे घर (मकान नंबर 150) पर 66 वोटर दर्ज थे, और ये घर सिर्फ ‘कागजों पर’ थे।

फैक्ट चेक का सच: होडल विधानसभा क्षेत्र के गुदराना गाँव में मकान नंबर 150 की जाँच में पता चला कि यह कोई छोटा मकान नहीं, बल्कि करीब 1 एकड़ में फैला एक बड़ा पुश्तैनी भूखंड है। यहाँ रहने वाले जिला परिषद के वाइस चेयरमैन उमेश ने बताया कि उनके परिवार में करीब 200 सदस्य और 150 वोटर हैं, क्योंकि उनके दादाजी के चार भाई और पिताजी के 9 भाई थे। पूरा परिवार एक ही नंबर पर रजिस्टर्ड होने के कारण वोटों की संख्या ज्यादा दिखती है। मकान नंबर 265 पर 501 वोटर होने का दावा जाँच में मिला ही नहीं, जिससे यह तथ्य पूरी तरह से झूठा साबित हुआ।

आरोप नंबर 3: ’25 लाख वोट चोरी’

राहुल गाँधी का आरोप: राहुल गाँधी ने दावा किया कि 5 लाख से ज्यादा डुप्लीकेट वोटर और 19 लाख बल्क वोटर्स थे, जिससे कुल 25 लाख वोटों की चोरी हुई। राहुल गाँधी ने चुनाव आयोग (EC) पर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के बयान को लेकर भी ‘खुलेआम झूठ बोलने’ का आरोप लगाया।

फैक्ट चेक का सच: चुनाव आयोग ने राहुल गाँधी के आरोपों को आधारहीन बताते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस ने मतदाता सूची के रिवीजन (SSR) के दौरान डुप्लीकेट मतदाताओं को हटाने के लिए कोई शिकायत या आपत्ति दर्ज नहीं कराई थी। EC ने कहा कि अगर आरोप सही हैं, तो कॉन्ग्रेस निर्धारित नियमों के अनुसार हर एक आरोप के संबंध में शपथ पत्र दे, जिसके बाद आयोग हर शिकायत पर कार्रवाई करेगा।

EC ने यह भी बताया कि हरियाणा चुनाव से पहले 4,16,408 दावों और आपत्तियों पर सुनवाई हुई थी, लेकिन चुनाव के बाद किसी भी उम्मीदवार द्वारा मतदान या मतगणना पर कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने भी इसे ‘नाकामी छुपाने का बहाना’ बताया, क्योंकि कॉन्ग्रेस को महाराष्ट्र और हरियाणा में हार मिली।

आरोप नंबर 4: CCTV फुटेज डिलीट और डुप्लीकेट वोटिंग

राहुल गाँधी का आरोप: राहुल गाँधी ने दावा किया कि चुनाव आयोग ने CCTV फुटेज डिलीट कर दिए, ताकि एक ही महिला द्वारा 223 बार वोट डालने जैसे मामले सामने न आ सकें।

फैक्ट चेक का सच: राहुल गाँधी ने अपने आरोपों के समर्थन में कोई पुख्ता सबूत (जैसे डिलीटेड फुटेज का साक्ष्य) पेश नहीं किया, जबकि चुनाव आयोग नियमों से बँधा होता है और हर चरण की निगरानी होती है। चुनाव आयोग ने साफ कहा है कि वह बिना शपथ पत्र और निर्धारित शिकायत के स्वतः संज्ञान नहीं ले सकता, क्योंकि इससे आधारहीन आरोपों की जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती।

आरोप नंबर 5: नायब सिंह सैनी की प्रेस कॉन्फ्रेंस

राहुल गाँधी का आरोप: राहुल गाँधी ने CM सैनी की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का क्लिप दिखाया। इस क्लिप में सीएम सैनी यह कहते दिख रहे हैं कि ‘बीजेपी अकेले सरकार बनाएगी… हमारे पास सारी व्यवस्थाएँ हैं।’ राहुल गाँधी ने सीएम सैनी के ‘मुस्कुराते चेहरे’ और ‘व्यवस्था’ शब्द पर सवाल उठाया। राहुल का दावा था कि सीएम सैनी का इतना आश्वस्त दिखना और ‘व्यवस्था’ शब्द का उपयोग करना यह साबित करता है कि बीजेपी ने वोट चोरी की कोई ‘सेंट्रलाइज्ड साजिश’ रची थी, क्योंकि एग्जिट पोल कॉन्ग्रेस के पक्ष में थे।

फैक्ट चेक का सच: पूरे संदर्भ में जाँच करने पर पता चला कि सीएम सैनी का बयान ‘वोट चोरी’ या चुनावी धांधली से बिल्कुल संबंधित नहीं था। सीएम सैनी से असल में एक रिपोर्टर ने पूछा था कि क्या बीजेपी सरकार बनाने के लिए किसी अन्य पार्टी के साथ गठबंधन (गठबंधन की संभावना) करेगी। इसके जवाब में सीएम सैनी ने आत्मविश्वास से कहा था, “हमें किसी भी तरह के गठबंधन की जरूरत नहीं पड़ेगी। मैंने शुरू से ही कहा है कि भाजपा अकेले सरकार बनाएगी। हमारे पास सारे इंतजाम हैं…।”

आरोप नंबर 6: मकान नंबर ‘शून्य’ (0) का मतलब फर्जी वोटर

राहुल गाँधी का आरोप: राहुल गाँधी ने दादरी शहर की मतदाता सूची में नरेंद्र नामक एक युवक का उदाहरण दिया, जिसके पास खुद का मकान होने के बावजूद उसका मकान नंबर ‘शून्य’ (0) दिखाया गया था। राहुल गाँधी ने दावा किया कि चुनाव आयोग (CEC) मकान नंबर ‘0’ उन लोगों का दिखाता है, जिनके पास घर नहीं होता (जैसे फुटपाथ या पुल के नीचे सोने वाले), और ऐसा करना मतदाता की जाँच को मुश्किल बनाने का एक तरीका है।

फैक्ट चेक का सच: जमीनी जाँच में पता चला कि यह आरोप भी आधारहीन है और स्थानीय प्रशासनिक समस्या को गलत ढंग से पेश किया गया है। जिस नरेंद्र का जिक्र किया गया, वह अपने परिवार के साथ 30 वर्षों से दादरी में खुद के मकान में रह रहा है।

जाँच में यह सामने आया कि उस वार्ड में नगर परिषद की ओर से कोई मकान नंबर आवंटित यानि अलोट ही नहीं किया गया है। इसी कारण नरेंद्र के ही नहीं, बल्कि उनके माता-पिता और पत्नी के वोटर कार्ड और यहाँ तक कि आधार कार्ड में भी मकान संख्या ‘शून्य’ दर्ज है।

आरोप नंबर 7: वोटर लिस्ट ‘आखिरी मिनट’ मिली

राहुल गाँधी का आरोप: राहुल गाँधी से जब पूछा गया कि आने वाले चुनावों में ‘वोट चोरी’ रोकने के लिए उनकी क्या तैयारी है, तो राहुल गाँधी बोले, “सबसे पहले आपको यह समझना है कि वोटर लिस्ट बहुत मुश्किल से मिलती है।” हरियाणा की वोटर लिस्ट पर राहुल गाँधी ने कहा, “ये जो हरियाणा की वोटर लिस्ट थी, लास्ट मिनट, चुनाव से एकदम पहले हमें दी जाती है, फाइनल लिस्ट।” राहुल गाँधी ने इस दावे का इस्तेमाल यह बताने के लिए किया कि उन्हें तैयारी के लिए समय ही नहीं मिला। वीडियो आप 1:08:29 से सुन सकते हैं।

फैक्ट चेक का सच: राहुल गाँधी के इस दावे पर हरियाणा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) ने तुरंत फैक्ट शीट जारी करके सच्चाई सामने रखी। चुनाव आयोग के मुताबिक, हरियाणा चुनाव से लगभग दो महीने पहले (2 अगस्त 2024) ही सभी राजनीतिक दलों के साथ ‘ड्राफ्ट मतदाता सूची’ बाँट दी गई थी।

इसके बाद, आपत्तियों को ठीक करके फाइनल मतदाता सूची भी चुनाव से करीब 40 दिन पहले (27 अगस्त 2024) राजनीतिक दलों के साथ शेयर कर दी गई थी। चुनाव आयोग ने साफ कहा कि राहुल गाँधी का यह दावा कि उन्हें ‘आखिरी वक्त’ पर वोटर लिस्ट दी गई, पूरी तरह गलत है। इसके अलावा, एक और महत्वपूर्ण बात सामने आई। फाइनल वोटर लिस्ट जारी होने के बाद, कॉन्ग्रेस या किसी भी दल ने जिलाधिकारी (DM) के पास एक भी शिकायत या अपील दाखिल नहीं की थी।

आरोप नंबर 8: हरियाणा की महिला वोटर का वीडियो क्लिप

राहुल गाँधी का आरोप: राहुल गाँधी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक महिला वोटर की वीडियो क्लिप चलाई। क्लिप का इस्तेमाल करते हुए राहुल ने यह बताने की कोशिश की कि हरियाणा में बड़े पैमाने पर धाँधली हुई है और यह महिला उनकी ‘वोट चोरी’ की थ्योरी का सबूत है।

फैक्ट चेक का सच: ऑपइंडिया ने जब उस महिला वोटर से बात की, तो पता चला कि राहुल गाँधी ने उनके वीडियो का इस्तेमाल गलत संदर्भ में किया था। महिला वोटर का नाम अंजलि त्यागी है और वह सोनीपत, हरियाणा की रहने वाली हैं। अंजलि त्यागी ने ऑपइंडिया के साथ एक्सक्लूसिव बातचीत में राहुल गाँधी के दावे को पूरी तरह से खारिज कर दिया। उन्होंने साफ कहा, “मेरे वीडियो का गलत संदर्भ में इस्तेमाल किया गया। मैं राहुल गाँधी के आरोपों से सहमत नहीं हूँ।”

दरअसल, राहुल गाँधी का यह ‘हाइड्रोजन बम’ चुनाव आयोग की वैधानिक प्रक्रियाओं की अनदेखी करते हुए, अपनी पार्टी की हार के बाद, राजनीतिक विफलता को बाहर के कारकों पर डालने की एक कोशिश मात्र साबित हुआ है।

‘बाबरी हमारी, मुगल हमारे बाप-दादा’: सिवान में बोला पढ़ा-लिखा मुसलमान, राम मंदिर का निर्माण गलत

बिहार के सिवान में ऑपइंडिया की यात्रा दौरान अनुराग मिश्रा ने कॉलेज पढ़े मुस्लिम युवकों से बात की। एक इंजीनियरिंग स्टूडेंट ने कहा, “राम मंदिर तोड़कर बनाया गया, बाबरी मस्जिद हमारी थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना था ना?” दूसरा MA पास युवक बोला, “मुगल हमारे पूर्वज हैं, औरंगजेब ने हिंदू मंदिर तोड़े तो क्या गलत किया? वो इस्लाम फैला रहे थे।”

शहाबुद्दीन को लेकर सब एक स्वर में बोले, “साहेब गरीब मुसलमानों के मसीहा थे, ऊँची जाति वालों से लड़ते थे।”

राम मंदिर पर गुस्सा साफ था। एक टीचर ने कहा, “हिंदू हमेशा मुसलमानों को दबाते हैं, राम मंदिर इसका सबूत है।” लोग मुगलों को गौरवशाली योद्धा बताते हैं और राम मंदिर को अन्याय।

ग्राउंड रिपोर्ट में साफ है – सिवान के पढ़े-लिखे मुस्लिम अभी भी बाबरी को अपनी जमीन और मुगलों को अपना इतिहास मानते हैं।

देखें – ग्राउंड रिपोर्ट

क्या है भारत का IndiaAI मिशन, Meity ने जिसके लिए जारी किए दिशा-निर्देश: 7 सूत्र और 6 बिंदुओं को विस्तार से पढ़कर सब समझिए

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने बुधवार (5 नवंबर 2025) को IndiaAI मिशन के तहत ‘इंडिया AI गवर्नेंस गाइडलाइन्स’ लॉन्च कीं। यह पहल देश में सुरक्षित, जिम्मेदार और समावेशी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस्तेमाल की दिशा में एक अहम कदम है।

इस कार्यक्रम में देश के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार अजय कुमार सूद और MeitY के सचिव एस कृष्णन सहित IndiaAI मिशन के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। यह लॉन्चिंग India-AI Impact Summit 2026 से पहले हुई है, जो भारत की जिम्मेदार AI गवर्नेंस में बढ़ती नेतृत्व भूमिका को दर्शाती है।

नई गाइडलाइन्स का उद्देश्य एक मजबूत गवर्नेंस ढाँचा तैयार करना है ताकि नवाचार को बढ़ावा देते हुए AI तकनीक का सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग किया जा सके और इससे समाज या व्यक्ति को होने वाले जोखिमों को कम किया जा सके।

इस फ्रेमवर्क के चार मुख्य घटक हैं –

1. सात मार्गदर्शक सिद्धांत (सूत्र) – जो भारत की नैतिक और जिम्मेदार AI नीति की नींव तय करते हैं।

2. छह स्तंभों पर आधारित सिफारिशें – जो AI गवर्नेंस के विभिन्न पहलुओं को कवर करती हैं।

3. कार्रवाई योजना (Action Plan) – जिसमें अल्पकालिक, मध्यमकालिक और दीर्घकालिक लक्ष्यों का खाका तैयार किया गया है।

4. व्यावहारिक दिशानिर्देश (Practical Guidelines) – जो उद्योग, डेवलपर्स, नियामक और अन्य हितधारकों के लिए पारदर्शी और जवाबदेह एआई उपयोग सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई हैं। इन गाइडलाइन्स के माध्यम से भारत का लक्ष्य है कि AI तकनीक का विकास न केवल नवाचार और प्रगति के लिए हो, बल्कि सुरक्षा, पारदर्शिता और नैतिकता को भी प्राथमिकता दी जाए।

सात मार्गदर्शक सिद्धांत (सूत्र)

भारत की नई AI शासन रूपरेखा (AI Governance Framework) को सात मूलभूत सिद्धांतों या ‘सूत्रों’ पर आधारित किया गया है, जिन्हें सभी क्षेत्रों और तकनीकों में लागू किया जाएगा।

ये सूत्र RBI की FREE-AI समिति की सिफारिशों से लिए गए हैं और भारत की राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप बनाए गए हैं। समिति का मानना है कि यही सिद्धांत देश में सुरक्षित, जिम्मेदार और मानव-केंद्रित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के विकास की दिशा तय करेंगे।

नीचे इन सात मार्गदर्शक सूत्रों का सरल रूप में विवरण दिया गया है –

1. विश्वास ही है आधार (Trust is the Foundation): AI के पूरे मूल्य-श्रृंखला में तकनीक, उसे विकसित करने वाले संगठन, निगरानी संस्थान और उपयोगकर्ता सभी में विश्वास (Trust) जरूरी है। यदि लोगों को AI पर भरोसा नहीं होगा, तो इसका व्यापक लाभ नहीं मिल पाएगा। इसलिए तकनीक के हर स्तर पर पारदर्शिता और जिम्मेदारी के साथ भरोसे को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

2. जन प्रथम (People First): AI का केंद्र मानव होना चाहिए। इसका अर्थ है कि AI सिस्टम ऐसे बनाए जाएँ जो लोगों को सशक्त करें, उनकी मूल्यों और आवश्यकताओं के अनुरूप हों और अंतिम निर्णय पर मानव नियंत्रण (human oversight) बना रहे। ‘पीपल-फर्स्ट’ दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करता है कि तकनीक इंसानों की सेवा में रहे, न कि उन पर हावी हो।

3. संयम की बजाय नवाचार (Innovation over Restraint): AI का विकास नवाचार (Innovation) पर आधारित होना चाहिए, न कि अनावश्यक प्रतिबंधों पर। हालाँकि सुरक्षा और जिम्मेदारी जरूरी हैं, लेकिन तकनीक के प्रयोग को केवल डर या सावधानी के कारण रोकना उचित नहीं। उत्तरदायी नवाचार को प्रोत्साहित करते हुए देश के सामाजिक-आर्थिक विकास और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को मजबूत किया जाना चाहिए।

4. न्याय और समानता (Fairness & Equity): AI का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुँचना चाहिए। सिस्टम में किसी तरह का भेदभाव या पक्षपात नहीं होना चाहिए। AI का प्रयोग समावेशी विकास (inclusive development) के लिए किया जाए ताकि कोई भी व्यक्ति या समुदाय पीछे न रह जाए।

5. जवाबदेही (Accountability): AI से जुड़ी हर इकाई, डेवलपर, उपयोगकर्ता, संस्था की जवाबदेही स्पष्ट होनी चाहिए। जो भी जोखिम या नुकसान की संभावना है, उसके अनुसार जिम्मेदारी तय की जाए। नीतिगत, तकनीकी और बाजार-आधारित उपायों के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाए कि कोई भी बिना जिम्मेदारी के काम न करे।

6. समझने योग्य डिजाइन (Understandable by Design): AI सिस्टम इतने स्पष्ट और पारदर्शी (transparent) होने चाहिए कि उपयोगकर्ता और नियामक दोनों यह समझ सकें कि सिस्टम कैसे काम करता है। AI का निर्णय ‘ब्लैक बॉक्स’ जैसा न हो, बल्कि उपयोगकर्ता को यह बताया जाए कि उसका परिणाम किस आधार पर आया। यही समझ, भरोसे की नींव रखती है।

7. सुरक्षा, लचीलापन और स्थिरता (Safety, Resilience & Sustainability): AI सिस्टम सुरक्षित, मजबूत और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार (sustainable) होने चाहिए। इनमें ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि किसी भी गड़बड़ी या खतरे का समय रहते पता चल सके। संसाधनों की बचत करने वाले और हल्के (lightweight) मॉडल्स को बढ़ावा दिया जाए ताकि तकनीक पर्यावरण पर बोझ न बने।

अपने संबोधन में  प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार डॉ अजय कुमार सूद ने कहा कि पूरे ढाँचे की भावना ‘Do No Harm’ (किसी को नुकसान न पहुँचाना) पर आधारित है। यानी, AI का हर उपयोग समाज के हित में हो और किसी भी रूप में हानिकारक न साबित हो।

AI शासन के 6 स्तंभ

गाइडलाइंस के दूसरे भाग में छह प्रमुख स्तंभों पर सिफारिशें दी गई हैं, जिन्हें तीन मुख्य क्षेत्रों में बाँटा गया है –

1. इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure): गाइडलाइंस में कहा गया है कि भारत को AI के लिए मजबूत आधारभूत ढाँचा तैयार करना चाहिए, ताकि सभी को समान अवसर मिल सके। इसमें डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) का उपयोग करके AI को बड़े पैमाने पर और समावेशी रूप से फैलाने की बात कही गई है।

सरकार द्वारा 38,231 GPUs स्टार्टअप, शोधकर्ताओं और डेवलपर्स को रियायती दरों पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। 3,000 आधुनिक GPUs वाला सुरक्षित क्लस्टर रणनीतिक कार्यों के लिए तैयार किया जा रहा है।

AIKosh प्लेटफॉर्म पर अब तक 1,500 डेटा सेट और 217 AI मॉडल जोड़े गए हैं, जो 20 सेक्टरों की 34 संस्थाओं से लिए गए हैं। MSME (लघु उद्योग) के लिए टैक्स छूट, AI से जुड़े ऋण और सस्ती कंप्यूटिंग सुविधाओं जैसी प्रोत्साहन योजनाओं की सिफारिश की गई है।

2. क्षमता निर्माण (Capacity Building): यह स्तंभ शिक्षा, प्रशिक्षण और जागरूकता पर केंद्रित है। AI साक्षरता को बढ़ाने के लिए टियर-2 और टियर-3 शहरों, व्यावसायिक संस्थानों और सरकारी अधिकारियों को प्रशिक्षण देने की सिफारिश की गई है।

मौजूदा कार्यक्रम जैसे IndiaAI FutureSkills और FutureSkills PRIME को आगे बढ़ाने और विस्तार करने की जरूरत बताई गई है ताकि AI का लाभ अधिक लोगों तक पहुँचे।

3. नीति और नियमन (Policy & Regulation): इस भाग में एक लचीला और संतुलित नियामक ढाँचा अपनाने की बात कही गई है। सुझाव दिया गया है कि नई ‘AI Act’  लाने के बजाय मौजूदा कानूनों (जैसे IT Act 2000, DPDP Act, कॉपीराइट कानून आदि) में संशोधन करके AI से जुड़े मुद्दों को शामिल किया जाए।

खास तौर पर, IT Act में यह स्पष्ट करने की आवश्यकता बताई गई है कि डिजिटल इंटरमीडियरी और AI सिस्टम की कानूनी जिम्मेदारी किस पर होगी।

4. जोखिम प्रबंधन (Risk Mitigation): गाइडलाइंस में भारत के संदर्भ में एक जोखिम मूल्यांकन ढाँचा (Risk Assessment Framework) तैयार करने की बात कही गई है। शुरुआत में उद्योगों के लिए स्वैच्छिक (voluntary) नियम लागू करने और बाद में कानूनी ढाँचा बनाने की सलाह दी गई है।

संवेदनशील क्षेत्रों जैसे सरकारी सेवाएँ या कमजोर वर्गों से जुड़ी परियोजनाएँ में अतिरिक्त सुरक्षा नियम लागू होंगे। साथ ही डीपफेक, कंटेंट ऑथेंटिकेशन, डेटा स्रोत की सत्यता (dataset provenance) और जेनरेटिव एआई में कंटेंट की पहचान (attribution) पर भी सख्त निगरानी रखने की जरूरत बताई गई है।

5. जवाबदेही (Accountability): जिम्मेदारी तय करने के लिए ग्रेडेड लायबिलिटी सिस्टम की सिफारिश की गई है। यानी किसी के कार्य, जोखिम स्तर और सावधानी के आधार पर उसकी जवाबदेही तय की जाए। AI वैल्यू चेन के हर हिस्से, डेवलपर, डिप्लॉयर और थर्ड-पार्टी प्रदाता के बीच पारदर्शिता आवश्यक बताई गई है, ताकि नियामक संस्थाएँ सही और उचित कार्रवाई कर सकें।

6. संस्थान (Institutions): गाइडलाइंस में ‘Whole-of-Government’ दृष्टिकोण अपनाने की बात कही गई है, यानी सभी सरकारी संस्थाएँ मिलकर एआई गवर्नेंस को लागू करें। एक AI Governance Group (AIGG) बनाया जाएगा जो नीति और क्रियान्वयन की निगरानी करेगा।

इसके तहत एक Technology & Policy Expert Committee (TPEC) और एक तकनीकी निकाय AI Safety Institute (AISI) का गठन प्रस्तावित है। इसके साथ BIS, TEC, राज्य सरकारें और सेक्टोरल रेगुलेटर भी इस ढाँचे में भाग लेंगे।

कार्य योजना: लघु, मध्यम, दीर्घकालिक

भारत की नई AI गवर्नेंस गाइडलाइंस में एक स्पष्ट कार्ययोजना (Action Plan) दी गई है, जिसे तीन चरणों, लघु अवधि (Short-term), मध्यम अवधि (Medium-term) और दीर्घ अवधि (Long-term) – में बाँटा गया है।

लघु अवधि (Short-term) लक्ष्य: AI गवर्नेंस के लिए मुख्य संस्थान (Institutions) स्थापित किए जाएँ। भारत-विशिष्ट जोखिम ढाँचे (Risk Frameworks) तैयार किए जाएँ। उद्योग जगत से स्वैच्छिक प्रतिबद्धताएँ (Voluntary Commitments) ली जाएँ ताकि जिम्मेदार AI उपयोग बढ़े।

कानूनी संशोधन (Legal Amendments) के सुझाव दिए जाएँ और जिम्मेदारी तय करने की व्यवस्था (Liability Regime) स्पष्ट की जाए। कंप्यूटिंग और डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर तक पहुँच बढ़ाई जाए। जनजागरूकता अभियान चलाए जाएँ और AI सुरक्षा उपकरणों (AI Safety Tools) की पहुँच सभी तक सुनिश्चित की जाए।

मध्यम अवधि (Medium-term) लक्ष्य: साझा मानक (Common Standards) प्रकाशित किए जाएँ। संबंधित कानूनों व नियमों में संशोधन किए जाएँ। AI घटनाओं की रिपोर्टिंग प्रणाली (Incident Reporting System) को लागू किया जाए। रेगुलेटरी सैंडबॉक्स (Regulatory Sandbox) परियोजनाएँ शुरू की जाएँ।

डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) में AI के एकीकरण को बढ़ाया जाए। क्षमता निर्माण (Capacity Building) और मानकीकरण कार्य लगातार जारी रखा जाए।

दीर्घ अवधि (Long-term) लक्ष्य: समय-समय पर गवर्नेंस फ्रेमवर्क की समीक्षा और अद्यतन (Review & Update) किया जाए ताकि यह टिकाऊ और प्रभावी बना रहे। उभरते जोखिमों और नई तकनीकों के अनुसार नए कानून तैयार किए जाएँ। भारत का डिजिटल इकोसिस्टम मजबूत, लचीला और अनुकूलनशील (Resilient & Adaptive) बना रहे, यह सुनिश्चित किया जाए।

हितधारकों के लिए व्यावहारिक दिशानिर्देश

दस्तावेज का चौथा भाग व्यावहारिक दिशा-निर्देश देता है, जिसमें उद्योग, डेवलपर, नियामक और नीति-निर्माताओं के लिए साफ-साफ सुझाव दिए गए हैं।

उद्योग, डेवलपर्स और AI लागू करने वाले संगठनों के लिए सुझाव: उन्हें मौजूदा भारतीय कानूनों का पालन करना होगा, साथ ही स्वैच्छिक सिद्धांतों और मानकों को अपनाने की सलाह दी गई है। कंपनियों को पारदर्शिता या ‘सेल्फ-असेसमेंट’ रिपोर्ट जारी करने, शिकायत निवारण प्रणाली स्थापित करने और तकनीकी व कानूनी उपायों के जरिए जोखिम कम करने के निर्देश दिए गए हैं।

नियामकों (Regulators) के लिए सुझाव: नियामकों को नवाचार (innovation) को प्रोत्साहन देने के साथ-साथ AI से होने वाले संभावित नुकसान या जोखिमों पर सक्रिय रूप से ध्यान देना चाहिए। दिशानिर्देशों में कहा गया है कि नियम इतने कठोर न हों कि वे नवाचार को रोक दें।

इसके बजाय, तकनीक और कानून के मिश्रित (techno-legal) दृष्टिकोण को अपनाने और समय-समय पर नीतियों की समीक्षा करने की सलाह दी गई है ताकि बदलती तकनीक के साथ तालमेल बना रहे।

गाइडलाइंस जारी करते हुए MeitY सचिव एस कृष्णन ने कहा कि भारत का उद्देश्य AI का इस्तेमाल नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए करना है, साथ ही इससे जुड़े खतरों और नुकसानों को भी संबोधित करना है।

उन्होंने जोर दिया कि जहाँ संभव हो, देश मौजूदा कानूनों का ही उपयोग करेगा और मानव-केंद्रित दृष्टिकोण (human-centric approach) को केंद्र में रखेगा। यह घोषणा ऐसे समय में की गई है जब इंडिया AI इम्पैक्ट समिट 2026 की तैयारियाँ चल रही हैं, जो अगले वर्ष नई दिल्ली में आयोजित की जाएगी।

BBC ने वामपंथी नैरेटिव गढ़ने के लिए ट्रंप के भाषण से की छेड़छाड़, 5 साल बाद करतूत खुली: जानिए कैसे गलती मानने से बच रहा ब्रिटिश मीडिया, हरकत देख उठी लाइसेंस रद्द की माँग

ब्रिटिश मीडिया संस्थान BBC News अब आए दिन सवालों के घेरे में रहता है। कारण है उसका अपना नैरेटिव, जिसे आगे बढ़ाने के लिए मीडिया संस्थान तथ्यों के साथ छेड़छाड़ कर भ्रमित कंटेन्ट लोगों तक पहुँचाने को भी तैयार है। ऐसा ही कुछ हाल ही में BBC ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भाषण के साथ किया है, जिसे वॉशिंगटन डीसी के कैपिटल हिल्स में दंगा भड़काने को उकसाते हुए पेश किया गया।

पहली नजर में BBC के पैनोरामा प्रोग्राम के इस संपादित वीडियो को देखने में लगता है कि डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के कैपिटल हिल्स में भड़काऊ भाषण दे रहे हैं, जिसमें वह कहते हैं, “हम कैपिटल हिल्स तक चलेंगे और मैं वहाँ तुम्हारे साथ रहूँगा। और हम लड़ेंगे, हम जी-जान से लड़ेंगे।” BBC के संपादित वीडियो में ट्रंप के भाषण को तोड़-मरोड़ कर दिखाया, जो दर्शकों को गुमराह कराने का मकसद है। जबकि वीडियो की असलियत कुछ और है।

BBC के एडिटेड वीडियो कैसे हुए खुलासा?

खुद को निष्पक्ष बताने वाले BBC ने अपने संपादित वीडियो दिखाकर कैपिटल हिल्स में हुए दंगो की एकतरफा सच्चाई दिखाने की कोशिश की है। असलियत में यह वीडियो को BBC ने अपने नैरेटिव के मुताबिक एडिट किया है, जिसका सच अब दुनिया के सामने है। इसका खुलासा BBC में कथित पक्षपात पर 19 पन्नों के डोजियर में हुआ है, जिसे अक्टूबर 2025 में BBC के संपादकीय गाइडलाइंस एवं मानक समिति के पूर्व एक्सटर्नल एडवाइजर माइकल प्रेस्कॉट ने लिखा था। हाल ही में नवंबर 2025 में इस डोजियर को BBC बोर्ड को सबमिट किया गया है।

इस डोजियर में कहा गया है कि BBC के पैनोरामा प्रोग्राम में अमेरिकी राष्ट्रपति से ऐसी बातें कहलवाई गईं जो उन्होंने वास्तव में कभी नहीं कहीं। इसमें ट्रंप के भाषण की शुरुआत के फुटेज को उनके द्वारा लगभग एक घंटे बाद कही गई बातों के साथ जोड़ दिया गया है। डोजियर में कहा गया कि BBC के वरिष्ठ अधिकारियों और अध्यक्ष ने संस्था के अपने मानक निगरानी अधिकारी (Watchdog) द्वारा उठाई गई कई गंभीर शिकायतों को नजरअंदाज कर इसे खारिज कर दिया।

BBC के एडिटेड वीडियो पर अमेरिका से निकालने की धमकी?

अब दुनिया के सामने सच आने के बाद BBC की खूब आलोचना हुई। जिस निष्पक्षता का नैरिटिव बनाकर मीडिया संस्थान ने एडिटेड वीडियो चलाया, अब उसपर पक्षपात के आरोप लगे। यहाँ तक कि BBC को ‘फर्जी खबरें’ फैलाने वाला मीडिया संस्थान बताते हुए अमेरिका से बाहर निकालने की भी माँगे उठीं।

खुद अमेरिकी राष्ट्रपति के बड़े बेटे डोनाल्ड ट्रंप जूनियर ने भी BBC के एडिटेड वीडियो के जरिए फर्जी सूचना फैलाने पर गुस्सा जाहिर किया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा, “ब्रिटेन में फर्जी समाचार ‘रिपोर्टर’ उतने ही बेईमान और बकवास से भरे हुए हैं, जितने यहाँ अमेरिका में हैं!!”

अमेरिका के कई मीडिया संस्थान ने भी BBC के एडिटेड वीडियो पर सवाल खड़े किए। यहाँ तक कि BBC को अमेरिका में रद्द करने की भी माँगे उठीं। अमरिकी मीडिया संस्थान GB News से जुड़े लियो हैरिस ने इसे ‘पागलपन’ कहते हुए लिखा, “BBC के ट्रंप-विरोधी वामपंथियों ने अमेरिकी चुनाव से एक हफ्ते पहले यह कार्यक्रम प्रसारित किया। लाइसेंस शुल्क रद्द करो।”

कोलिन वॉल्टर्स नाम के एक एक्स यूजर ने लिखा, “मैं राष्ट्रपति ट्रंप से आग्रह करता हूँ कि वे BBC को अमेरिका से बाहर निकाल दें और उन पर मुकदमा चलाएँ।”

क्या है BBC के एडिटेड वीडियो की असलियत?

BBC की यह वीडियो मीडिया संस्थान के पक्षपात नैरेटिव को दर्शाता है। कैपिटल हिल्स पर ट्रंप के भाषण को तोड़-मरोड़कर पेश करने से BBC ने अपने नैरेटिव को आगे बढ़ाने की कोशिश की है। जबकि वीडियो की असलित कुछ और है। इस एडिटेड वीडियो की The Telegraph ने BBC के ही मुखबिर के हवाले से सबसे पहले पोल खोली है।

The Telegraph के अनुसार, BBC ने वीडियो में जो ट्रंप का भाषण दिखाया है, वह साल 2021 में हुए अमेरिकी चुनावों का है। BBC के एडिटेड वीडियो के नजरिए से देखें तो डोनाल्ड ट्रंप का कैपिटल हिल्स में हुए दंगों को भड़काने में हाथ है। जबकि असलियत में यह वीडियो ट्रंप के भाषण के दो हिस्सा का जुड़ाव है।

भाषण में डोनाल्ड ट्रंप पहले कहते हैं, “हम कैपिटल हिल्स तक चलेंगे और मैं वहाँ तुम्हारे साथ रहूँगा।” इसी भाषण में 54 मिनट बाद ट्रंप ने कहा, “और हम लड़ेंगे, हम जी-जान से लड़ेंगे।” एक ही समय पर दिए गए ट्रंप के इस भाषण के बीच के अंतराल को जोड़ दिया गया है, जिससे इस बयान को भडकाऊ का रूप दे दिया गया है।

असल में ट्रंप ने कहा था, “हम कैपिटल तक पैदल चलेंगे। और हम अपने बहादुर सीनेटरों, कॉन्ग्रेसियों और महिलाओं का उत्साहवर्धन करेंगे।” The Telegraph अपनी रिपोर्ट में लिखता है, “अमेरिकी चुनाव से एक सप्ताह पहले प्रसारित पैनोरमा कार्यक्रम में दर्शकों को ‘पूरी तरह से गुमराह’ किया गया।”

करतूत पर BBC ने क्या दी प्रतिक्रिया?

दुनिया के सामने BBC के एडिटेड वीडियो का सच उजागर होने के बाद मीडिया संस्थान ने प्रतिक्रिया दी। काफी हल्के शब्दों में संस्थान के बोर्ड सदस्यों ने मामले पर जाँच करने की बात कही। इस संबंध ने BBC ने एक लंबे-चौड़े आर्टकल में एडिटेड वीडियो की हिस्ट्री से लेकर जियोग्राफी तक बता दी। लेकिन न तो माफी माँगी और न ही वीडियो को डिलीट करने जैसे कोई आदेश दिए।

रिपोर्ट में BBC का एक प्रवक्ता कहता है, “हम लीक हुए दस्तावेजों पर टिप्पणी नहीं करते लेकिन जब BBC को फीडबैक मिलता है तो वह उसे गंभीरता से लेता है और उस पर सावधानीपूर्वक विचार करता है।” यहाँ BBC के पक्षपात वाले 19 पन्नों के डोजियर की बात की जा रही है, जिसके लीक होने से BBC के ‘फर्जीवाड़े’ का खुलासा हुआ।

BBC का ‘एथिकल जर्नलिज्म’ की आड़ में पक्षपात

इस घटना से BBC ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि ‘फेक न्यूज़’ फैलाने में उसकी कोई बराबरी नहीं। जो संस्था खुद को निष्पक्ष और विश्वसनीय बताने का दावा करती है, वही अपने एजेंडे के लिए सच्चाई को मरोड़ने से भी नहीं हिचकती। ट्रंप के भाषण को इस तरह तोड़-मरोड़कर पेश करना सिर्फ एक ‘एडिटिंग मिस्टेक’ नहीं बल्कि एक सुनियोजित नैरेटिव का हिस्सा है।

माइकल प्रेस्कॉट के 19 पन्नों वाले डोजियर ने BBC की पोल खोलकर रख दी है। BBC की ‘एथिकल जर्नलिज़्म’ की आड़ में पक्षपात, झूठ और प्रोपेगेंडा का जो जाल बुना गया है, वह अब दुनिया के सामने उजागर हो चुका है। लेकिन सबसे शर्मनाक बात यह है कि BBC ने न तो माफी माँगी, न ही किसी जिम्मेदारी का एहसास दिखाया। उल्टा ‘हम फीडबैक को गंभीरता से लेते हैं’ जैसी रटी-रटाई लाइन बोलकर खुद को बचाने की कोशिश की।

साफ है कि BBC अब पत्रकारिता नहीं, एजेंडा चलाने वाली संस्था बन चुकी है। जो दूसरों को फेक न्यूज फैलाने का पाठ पढ़ाती थी। आज वही अपने झूठ में बुरी तरह फँस गई है। जनता अब समझ चुकी है, ‘BBC के लिए अब एजेंडा ही असली धर्म है।’

खेसारी लाल यादव की मार्केट क्यों हो गई खराब? छपरा में RJD का बुरा हाल

बिहार चुनाव की सरगर्मी में छपरा पहुँची ऑपइंडिया टीम ने पाया कि भोजपुरी सुपरस्टार खेसारी लाल यादव की चमक फीकी पड़ गई है। RJD ने उन्हें टिकट दिया, लेकिन लोग कहते हैं, “ये तो पैराशूट से उतरे हैं, छपरा को जानते तक नहीं।”

एक दुकानदार बोले, “जंगलराज को अच्छा बता रहे हैं, लालू के समय की लूट-मार भूल गए क्या?” खेसारी के पुराने फैन भी नाराज हैं। एक युवक ने कहा, “फिल्मों में हीरो थे, अब वोट माँगने आए तो जंगलराज का बचाव कर रहे। सेलिब्रिटी स्टेटस सिर्फ रीलों तक था, रियल में फेल रहेगा सब।”

इस दौरान महिलाओं ने कहा कि खेसारी की बातों से आम जनता की बातें गायब है, वो सिर्फ स्टारडम बेच रहे। अनुराग मिश्रा की ग्राउंड रिपोर्ट में साफ है – छपरा में खेसारी की मार्केट डाउन होने से RJD को नुकसान पहुँच रहा है।

देखें छपरा से ग्राउंड रिपोर्ट

सिवान का ‘मसीहा’ या माफिया? शहाबुद्दीन की मौत के बाद भी जिंदा है डर

बिहार के सिवान में लालू यादव के जंगलराज के दौर में RJD के बाहुबली शहाबुद्दीन का खौफ इतना था कि लोग दिनदहाड़े काँपते थे। 2021 में कोविड से मौत के बाद भी उनके मुस्लिम समर्थक उन्हें गरीबों का मसीहा और देश का रक्षक बताते नहीं थकते। ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया कि प्रतापपुर गाँव में शहाबुद्दीन के घर के बाहर समर्थक जुटते हैं और उसके अपराधों को भूलकर तारीफ करते हैं।

एक समर्थक ने कहा, “साहेब ने गरीबों के लिए स्कूल-हॉस्पिटल बनवाए, ऊँची जातियों के गुंडों से मुस्लिमों को बचाया। वो देश के मसीहा थे।” जबकि हकीकत ये है कि शहाबुद्दीन पर हत्या, फिरौती, तेजाब डालने जैसे दर्जनों केस थे। उनके गुर्गों ने चंदा बाबू के बेटों को तेजाब से नहलाया था।

रिपोर्टर अनुराग मिश्रा से बातचीत में युवकों ने ओसामा (शहाबुद्दीन का बेटा) की जीत के लिए धमकी भरे अंदाज में कहा, “पोस्टर फाड़ने वालों को जिंदा जला देंगे।” आम लोग डरते हैं कि जंगलराज लौट रहा है, लेकिन समर्थक गुनाहों पर सफेदी पोत रहे हैं।

देखें ग्राउंड रिपोर्ट