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राष्ट्रगान के बराबर ही ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत का जो दर्जा देना चाहते थे डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, मोदी सरकार दे रही वही ‘सम्मान’: जानिए नेहरु-गाँधी और कॉन्ग्रेस को इस बात से क्या थी दिक्कत

संसद में मोदी सरकार राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 ला रही है। इसे वंदे मातरम बिल भी कहा जा रहा है। इसका मकसद राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ को ‘जन गण मन’ यानी राष्ट्रगान के समान कानूनी और वैधानिक सुरक्षा देना है।

24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में अध्यक्ष डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने भी ये बात कही थी। लेकिन उनके सपने को कॉन्ग्रेस ने ही पूरा होने नहीं दिया और शुरुआती अंतरे को गाने की परंपरा चला दी। अब मोदी सरकार इसके पूरे अंतरे को गाने का नियम बनाया है और इसके सम्मान के लिए संसद में बिल लेकर आ रही है।

दरअसल प्रावधान में ये है कि यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर वंदे मातरम के गाने में रुकावट डालता हो या उसका अपमान करता हो, तो इसे दंडनीय अपराध माना जाएगा और इसके लिए 3 साल जेल का प्रावधान है। इतना ही नहीं, ऐसे व्यक्ति को जुर्माना या दोनों लग सकता है।

सोशल मीडिया पर यह दावा किया जा रहा है कि अगर कोई ‘वंदे मातरम’ नहीं गाएगा तो उसे 3 साल की जेल होगी, लेकिन विधेयक में ऐसा कुछ नहीं है। सरकार जिस संशोधन को ला रही है, उसका उद्देश्य सिर्फ ‘वंदे मातरम’ के अपमान या उसके गायन में जानबूझकर बाधा डालने को दंडनीय बनाना है। केवल गीत न गाने को अपराध नहीं बताया गया है।

बिल में क्या संशोधन किए जा रहे हैं?

केंद्र सरकार Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 में संशोधन कर रही है। अभी इस कानून की धारा 3 केवल राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ के गायन में जानबूझकर बाधा डालने या उसका अपमान करने को दंडनीय अपराध माना जाता है।

संशोधन के बाद इसी धारा में राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ को भी शामिल किया जाएगा। इसके बाद यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर ‘वंदे मातरम’ के गायन को रोके, गायन के दौरान व्यवधान पैदा करे या कानून में बताए गए तरीके से उसका अपमान करे, तो उसे 3 साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। यह वही दंड है जो अभी राष्ट्रीय गान के लिए लागू है।

सरकार का कहना है कि ‘वंदे मातरम’ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक रहा है, लेकिन उसे अब तक वह वैधानिक संरक्षण नहीं मिला, जो ‘जन गण मन’ को मिला है। लेकिन कॉन्ग्रेस इसका विरोध कर रही है। दरअसल इसके पीछे कॉन्ग्रेस का वो काला इतिहास है, जिसने इसकी धर्मनिरपेक्षता’ को हिन्दू विरोध की तरफ लेकर गया।

1937 में कॉन्ग्रेस वर्किंग समिति के सामने मुस्लिम लीग सहित कुछ संगठनों ने ‘वंदे मातरम’ के बाद के अंतरों में देवी-देवताओं के उल्लेख और धार्मिक प्रतीकों पर आपत्ति जताई।

इसके बाद कॉन्ग्रेस ने फैसला लिया कि सार्वजनिक एवं सरकारी आयोजनों में केवल पहले दो अंतरे गाए जाएँ, जिसमें हिन्दू संस्कृति का जिक्र उस तरह से नहीं है। इसे मुस्लिम लीग ने भी स्वीकार किया और यही परंपरा आगे बढ़ी।

लेकिन अब जब केंद्र सरकार ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गान के समान वैधानिक संरक्षण देने वाला संशोधन ला रही है, तब कॉन्ग्रेस विरोध कर रही है और इसे संविधान की मूल भावना के विपरीत बता रही है। कॉन्ग्रेस का कहना है कि संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रीय गान और राष्ट्रीय गीत के बीच जानबूझकर अलग संवैधानिक स्थिति रखी थी।

दरअसल कॉन्ग्रेस पहले भी मुस्लिम लीग के दबाव में थी और अब भी मुस्लिम वोट बैंक ही उसके विरोध के केन्द्र में है। मुस्लिम लीग तो 1908 से ही वंदे मातरम का विरोध करना शुरू कर दिया था। अमृतसर अधिवेशन में सैयद अली इमाम ने कहा कि यह गीत इस्लाम विरोधी है, क्योंकि इसमें मातृभूमि की तुलना देवी-देवताओं से की गई है। बाद में खिलाफत आंदोलन के दौरान यह भावना और गहरी होती गई।

इस विरोध के बीच, 1937 में कॉन्ग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति बनाई, जिसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद भी शामिल थे। आजाद ने गीत का अध्ययन किया और निष्कर्ष दिया कि इसके शुरुआती दो पद केवल मातृभूमि की वंदना करते हैं और इनमें किसी मजहबी भावना का विरोध नहीं है। नतीजतन, कॉन्ग्रेस कार्यसमिति ने निर्णय लिया कि राष्ट्रगीत के रूप में केवल दो ही अंतरे को स्वीकार किए जाएँ।

नेहरू की अध्यक्षता में कॉन्ग्रेस ने दो अंतरे वाले ‘वंदे मातरम’ अपनाने का फैसला किया। कॉन्ग्रेस ने जानबूझकर माँ दुर्गा की स्तुति करने वाले छंद हटा दिए। कॉन्ग्रेस ने अपने एजेंडे के अनुरूप फैजपुर अधिवेशन में वंदे मातरम् के छोटे स्वरूप को अपनाया।

(कॉन्ग्रेस कार्यसमिति का फैसला)

जवाहर लाल नेहरू ने अली सरदार जाफरी को पत्र लिखा था। उसमें उन्होंने कहा, “मैं समझता हूँ कि पूरा गाना किसी को ठेस पहुँचाने वाला नहीं है। लेकिन मैं ये भी सोचता हूँ कि ये गाना राष्ट्रगान के ‘लायक’ नहीं है। इसके कुछ शब्द लोगों को समझ में नहीं आएँगे, क्योंकि इसमें व्यक्त भावनाएँ आज के राष्ट्रवाद के अनुकूल नहीं है। हमें आसान शब्दों वाले दूसरे राष्ट्रगान की तलाश करनी चाहिए।”

( अली सरदार जाफरी को लिखा पत्र)

यही नहीं, नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लिखे नेहरू की 1937 की चिट्ठी में भी इस मुद्दे को लेकर सफाई दी गई। चिट्ठी में नेहरू ने कथित तौर पर कहा था कि वंदे मातरम के बैकग्राउंड से मुस्लिमों को नाराजगी हो सकती है। एक सितंबर 1937 को लिखी इस चिट्ठी में नेहरू ने कटुता से लिखा था कि ‘वंदे मातरम’ के शब्दों को किसी देवी से जोड़कर देखना बेतुका है। उन्होंने तंज कसते हुए यह भी कहा कि ‘वंदे मातरम’ राष्ट्रीय गान के रूप में उपयुक्त नहीं है। 20 अक्टूबर 1937 को भी नेहरू ने नेताजी को पत्र लिखकर दावा किया कि ‘वंदे मातरम’ की पृष्ठभूमि मुस्लिमों को नाराज कर सकती है।

(नहरु के पत्र में वंदे मातरम को लेकर उनके विचार)

मोहम्मद अली जिन्ना ने 1938 में The New Times of Lahore में वंदे मातरम् का विरोध करते हुए लिखा कि मुस्लिम किसी भी रूप में इस गीत को स्वीकार नहीं कर सकते। धीरे-धीरे इस ‘धार्मिक विरोध’ पर राजनीतिक का रंग चढ़ गया और देश का विभाजन हुआ।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में दिया था समान दर्जा

लेकिन कॉन्ग्रेस का एक धरा शुरू से वंदे मातरम को ‘जन गण मन’ के समान दर्जा देने का हिमायती रहा। इसको लेकर संविधान सभा में बार-बार बहस हुई। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा की अंतिम बैठकों में तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने राष्ट्रीय गान पर अपना ऐतिहासिक वक्तव्य दिया। उन्होंने ‘वंदे मातरम’ को ‘जन गण मन’ के समान दर्जा और राष्ट्रीय गीत का स्थान दिया।

उन्होंने कहा था “वंदे मातरम, जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, उसे ‘जन गण मन’ के समान सम्मान दिया जाएगा और उसका समान दर्जा होगा।” उनका यही वक्तव्य आज मोदी सरकार के प्रस्तावित संशोधन के प्रमुख आधारों में से एक है।

संविधान सभा में कई बार उठी माँग

1947 से 1950 के बीच वंदे मातरम को लेकर कई बार बहस हुई क्योंकि आजादी के बाद स्वतंत्रता संग्राम का गीत बन चुके वंदे मातरम को सम्मान दिलाने की बात थी। 31 जुलाई 1947 में ने सदन से आग्रह किया था कि वंदे मातरम को आधिकारिक कार्यक्रम में शामिल किया जाए। आजादी की पूर्व संध्या पर 14 अगस्त 1947 में सुचेता कृपलानी ने आधिकारिक समारोह में वंदे मातरम का पहला अंतरा गाया था, जिसपर कुछ लोग बाहर चले गए। इस पर कामथ ने कहा था कि भले ही वंदे मातरम को राष्ट्रगान के रूप में शामिल नहीं किया गया, लेकिन यह हजारों देशवासियों के बलिदानी का प्रतीक है और पावन है।

संविधान शभा में जब 1948-49 में बहस के दौरान भी इस गीत के प्रति लोगों की आस्था का पता चला। सेठ गोविंद दास ने इसे देश की आजादी से जोड़ते हुए सच्चा राष्ट्रगान बताया। उन्होने जन गण मन को अंग्रेजी शासक जॉर्ज पंचम के सम्मान में गाए हुए गीत का तर्क देते हुए कहा कि वंदे मातरम ही राष्ट्रगीत होना चाहिए।

अक्टूबर 1949 में रोहिणी कुमार चौधरी ने सदन को याद दिलाया कि भारत का स्वतंत्रता आंदोलन वंदे मातरम से शुरू होता है। उन्होंने संपूर्ण गीत नहीं गाए जाने पर कहा कि ये देवी की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। सभी संप्रदाय के लोगों को समान मान्यता मिलनी चाहिए। उन्होंने भी जनगणमन के बजाए वंदे मातरम को तरजीह देने के लिए कहा।

इसी दौर में देश के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने अपने अंतिम प्रस्ताव में वंदे मातरम को देशभक्ति और सांस्कृतिक विविधता से जोड़ते हुए कहा कि इसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाई है इसलिए वंदे मातरम को जन गण मन के समान सम्मान दिया जाएगा और उसे समान दर्जा प्राप्त होगा। ये ऐतिहासिक घटनाएँ बताती हैं कि वंदे मातरम सिर्फ एक गान नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्रता संग्राम में प्रेरणा देनेवाला नारा है और इसमें समाज को जोड़ने की ताकत है।

आज फिर उस ताकत को पहचाने की कोशिश की जा रही है। हालाँकि बहाने बना कर समाजवाद के नाम पर इसे इस्लाम विरोधी करार दिया जा रहा है। ‘समाजवाद’ शब्द जिसे संविधान में संशोधन के बाद जोड़ा गया था, वह आजादी के इस प्रतीक का दुश्मन बना बैठा है।

एक्स्ट्रा टाइम में गोल से स्पेन बना FIFA विश्व कप का विजेता, अर्जेंटीना की हार के साथ मेस्सी की मैदान से भावुक विदाई: पढ़ें कैसे हर मिनट बढ़ी फैंस की धड़कनें

आज दो महान फुटबॉल राष्ट्र फुटबॉल के इतिहास का एक और महान पाठ लिखने जा रहे थे। कतर विश्व कप ने जहाँ फुटबॉल के महाकाव्य को एक सुखांत प्रदान किया था, वहीं यह विश्व कप फुटबॉल को और ऊँचाइयों की ओर लेकर जा रहा था। कई नए नायक व कई नवीन कहानियाँ फुटबॉल को मिलने जा रही थीं।

दो ऐसे कोच जिन्हें क्लब लेवल पर टॉप डिवीजन का कोई अनुभव नहीं, आज अपनी अपनी टीमों के संग विश्व कप के फाइनल मुकाबले के लिए तैयार थे। वह दोनों ही मिल कर विश्व कप, कोपा अमेरिका व यूरोपीयन चैंपियनशिप का खिताब जीत चुके हैं। अर्जेंटीना के कोच जब फुटबॉल का ककहरा सीख रहे थे तो स्पेन के वर्तमान कोच लुई डे ला फुएन्ते ही उनके मेंटर थे। मगर आज दोनों ही आमने-सामने खड़े थे।

निर्धारित समय पर दोनों ही टीमें मैदान का रुख करती हैं। अर्जेंटीनी टीम के खिलाड़ी अपनी पारंपरिक ‘अल्बीसेलेस्त’ जर्सियां पहने हमारी टीवी स्क्रीन पर थे। उनके साथ साथ खड़े थे अपनी चटख लाल व नीले रंग की जर्सी में खड़े स्पेनिश खिलाड़ी। वह इस जंग के लिए तैयार नजर आ रहे थे।

अर्जेंटीना के कोच लियोनेल स्कालोनी ने सेमीफाइनल की ही भांति,आज एक बार फिर 4-1-3-2 के बजाए 4-4-2 की फॉर्मेशन में अपनी टीम को मैदान में उतारा था। फॉरवर्ड लाइन में इस बड़े मुकाबले में एक बार फिर लियोनेल मेस्सी का साथ देने के लिए हूलियन अल्वारेज़ खड़े थे। उनके पीछे रॉड्रिगो दी पॉल, एंजो फर्नाडेज़, एलेक्सिस मैकऐलिस्टर व नीको गोंजालेज की सेना थी।

इस विश्व कप में शानदार फॉर्म में रहे लिआन्द्रो पारेदेस़ आज बेंच पर थे। रक्षापंक्ति में एकबार फिर मोंटील, रोमेरो, लीसान्द्रो मार्टीनेज़ व ताग्लियाफीको थे और गोलपोस्ट की रक्षा करने एमिलियानो मार्टिनेज खड़े थे।

कोच स्कालोनी ने शायद पारेदेस को बेंच पर बैठाकर एक ग़लती कर दी थी। साथ ही साथ नीको गोंजालेज सदैव अंतिम क्षणों में बेंच से आकर असरकारी दिखाई दिए थे, उन्हें फाइनल मुकाबले में सीधा प्लेइंग इलेवन में देखना थोड़ा आश्चर्यचकित कर रहा था।

वहीं, अपनी टीम को एक बेहतरीन सिस्टम को आधार बनाकर यूरोपियन चैंपियन बनाने वाले कोच लुई डे ला फुएन्ते ने फिर 4-1-2-3 की फॉर्मेशन में अपनी टीम को मैदान पर उतारा। सेमीफाइनल की ही भांति मिडफील्ड में रोड्री के संग फैबियान रुईज़ व दानी ओल्मो मौजूद थे। आगे अटैकिंग लाइन में सेंट्रल फॉरवर्ड ओयारजाबाल का साथ देने के लिए विंगर्स के रूप में एलेक्स बाएना व लामीन यमाल को मैदान पर उतारा गया, जबकि नीको वीलियम्स, फेरां तोरे, गावी, मिकेल मेरीनो, विक्टर मुनोज़, पेड्री जैसे मजबूत खिलाड़ी बेंच पर मौजूद थे। रक्षण का जिम्मा एक दफा फिर आयम्रिक लापोर्त के नेतृत्व में पाऊ कुबार्सी, पेड्रो पोर्रो व कुक्कुरेया के हिस्से था। गोलपोस्ट पर हमेशा की भांति अनुभवी उनाई सीमॉन मौजूद थे।

आय्म्रिक लापोर्त को आज रक्षापंक्ति का शानदार तरीके से नेतृत्व करना था। फुलबैक्स पेड्रो पोर्रो व कुक्कुरेया पर दारोमदार था मेस्सी व हूलियन अल्वारेज़ को खामोश रखने का। उन्नीस वर्षीय, बेबी फेस्ड असैसिन, पाउ कुबार्सी को, जिसने सेमीफाइनल मैच में किलियन एमबाप्पे, उस्मान डेंबेले, बार्कोला, माइकल ओलीस़ व देसीरे दोऊ को गोल मारने से वंचित रख दिया था, आज अर्जेंटीनी टीम को गोल के लिए तरसा देना था।

अर्जेंटीना को भी तो आखिर मजबूत स्पेनिश डिफेंस से टकराना था। हालाँकि पिछले विश्व कप से इतर एंजेल दि मारिया जैसे बड़े मैचों के खिलाड़ी की अनुपस्थिति ने इस विश्व कप में अर्जेंटीनी अटैक की धार को काफी हद तक कम कर दिया था सो उम्मीद थी कि इस मुकाबले में उनकी ओर से कम ही गोल देखने को मिलेंगे। मैच से पूर्व स्पेन का पलड़ा काफी हद तक भारी नजर आ रहा था।

इस अर्जेंटीना की खासियत है कि यह टीम अंतिम क्षणों तक भी हार नहीं मानती। लेकिन फिर लुई डे ला फुएन्ते की स्पेन एक इकाई के रूप में खेलती नजर आई थी। वह मिल कर अटैक और मिल कर ही रक्षण भी करते दिखते हैं। न्यूयॉर्क के न्यूजर्सी स्टेडियम में आज अर्जेंटीनी टैंकों का मुकाबला स्पेनिश दीवार से था। यह एक बेहद जबरदस्त मैच होने जा रहा था।

विशालकाय मेटलाइफ स्टेडियम में मौजूद अस्सी हजार दर्शकों के शोर से स्टेडियम किसी रोमन साम्राज्य के उस अरीना सा नजर आ रहा था जहाँ चौदह मिनटों में ग्लैडिएटर्स जान की बाजी लगाने जा रहे थे। रेफरी स्लावको विनचिच व्हिस्ल बजाते हैं। एक सौ तीन मैचों के बाद आज यहां खड़ी दो टीमों के मध्य इस बहुप्रतीक्षित फाइनल मुकाबले की शुरुआत हो जाती है। दोनों ही टीमों को यह मैच कैसे भी जीतना ही था। लक्ष्य था – विश्व कप की चमचमाती ट्रॉफी घर लेकर जाना।

मैच की शुरुआत से ही ‘ला रोज़ा’ गेंद को अपने कब्जे में ले लेती है। पांचवें मिनट में ही स्पेनिश टीम अपने सितारा खिलाड़ी लामीन यमाल के नेतृत्व में एक अटैक करती है। फिनीश लक्ष्य से काफी दूर रह जाता है। अर्जेंटीना बमुश्किल गेंद को छू पा रही थी। स्पेन गेंद को छोड़ने के मूड में थे ही नहीं। पहला हाइड्रेशन ब्रेक हो जाता है।

खेल आगे बढ़ता है। स्पेन अटैकिंग मूव्स बनाता रहता है परन्तु दो तीन दफा उसके खिलाड़ी ऑफसाइड दे दिए जाते हैं। अर्जेंटीनी डिफेंस किसी तरह अपने दुर्ग की रक्षा कर रही थी। अर्जेंटीना की टीम थोड़ा फिजिकल खेल खेलती दिख रही थी। स्पेनिश टीम ऐसे खेलने के लिए नहीं जानी जाती। उनके खेल में सदैव एक नफासत रही है। स्पेन काव्यात्मक अंदाज में खेल रहे थे। वह छोटे छोटे पासों से अर्जेंटीनी टीम को गेंद के लिए तरसा रहे थे। मिकेल ओयारजाबाल एक जोरदार किक लगाते हैं। लेकिन गोलकीपर एमिलियानो मार्तिनेज़ एक अच्छा बचाव करते हुए उन्हें गोल करने से रोक लेते हैं।

इकतालिसवें मिनट में अर्जेंटीना के लिए पूरे टूर्नामेंट में ही बेहतरीन फॉर्म में रहे लिसान्द्रो मार्टिनेज को रेफरी द्वारा येलो कार्ड दिखा दिया जाता है। थोड़ी ही देर में मार्क कुक्कुरेया भी गोल लगाने का एक असफल प्रयास करते हैं। स्पेन के हमले रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। अचानक ही, मिकेल ओयारजाबाल पर किए टैकल के चलते मिले येलो कार्ड के बाद, अर्जेंटीनी बुचर लिसान्द्रो मार्टिनेज जाँघ की माँसपेशियों की चोट के चलते घायल हो जाते हैं। वह आगे मैदान में बने रहने की स्थिति में नहीं थे।

अनुभवी ओटामेंडी मैदान में उनका स्थान लेते हैं। कुछ पलों में पहला हाफ समाप्त हो जाता है। अर्जेंटीना बस किसी तरह, स्पेन को अबतक गोल करने से रोक कर, इस मैच में बनी हुई थी। उनकी प्लेइंग इलेवन में काफी गड़बड़ियाँ थी। पारेदेस के स्थान पर नीको गोंजालेज को मैच शुरू करवाना गलत फैसला साबित हुआ था। नीको गोंजालेज अबतक अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह विफल रहे थे।

पहले हाफ में स्पेन ने विरोधी टीम को पूरी तरह अपने कब्जे में रखा हुआ था। उन्होंने उन्हें एक पल भी खुलकर खेलने ही नहीं दिया था। अर्जेंटीना बस स्पेन के अटैक के खिलाफ रक्षण करती दिख रही थी। स्पेन ने जो सबसे बेहतरीन चीज़ आज की थी वह यह थी कि गेंद लियोनेल मेस्सी तक पहुँचने ही नहीं दी जा रही थी। पहले हाफ में अर्जेंटीना के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी ने गेंद को मात्र पंद्रह बार ही छुआ था। स्कोर बोर्ड पर लिख रहे स्कोर से मैच की हकीकत काफी भिन्न रही थी। स्पेन मैच के पहले मिनट से ही गत विजेता पर पूरी तरह हावी हो गई थी। अर्जेंटीना खिताब बचाने उतरे हैं ऐसा लग ही नहीं रहा था।

खैर, दूसरे हाफ की शुरुआत होती है। अपनी ग़लती को ठीक करने के प्रयास में कोच लियोनेल स्कालोनी नीको गोंजालेज को बाहर बुलाकर अनुभवी डिफेंसिव मिडफील्डर लियान्द्रो पारेदेस को मैदान के भीतर भेजते हैं। खेल की शुरुआत होते ही स्पेन फिर हमले करती दिखती है। लेफ्ट विंगर एलैक्स बाएना गोल लगाने का एक प्रयास करते हैं पर वह गेंद को निशाने पर नहीं रख पाते। मैदान में उतरने के पाँच मिनट के भीतर ही लियान्द्रो पारेदेस एक घातक फाउल करते हैं और परिणामस्वरूप उन्हें रेफरी द्वारा येलो कार्ड दिखा दिया जाता है।

मैच में इस वक्त ऐसे फाउल की कोई जरूरत नहीं थी। अभी काफी खेल खेला जाना बाकी था। एक इतने अनुभवी खिलाड़ी से, इतने बड़े मुकाबले में, ऐसी उम्मीद नहीं थी। पाँच मिनट पश्चात अर्जेंटीना के लिए नाहुएल मोलीना मैदान पर गोंजालो मोंटील की जगह लेते हैं। थोड़ी ही देर में स्पेनिश कोच, एक गोल की आस में, मिकेल ओयारजाबाल के स्थान पर फेरां तोरे को और फैबियान रुईज़ की जगह पेड्री को मैदान पर उतारते हैं।

तुरंत ही स्पेन एक दफा फिर अटैक करते हैं। दानी ओल्मो गोल की दिशा में एक बेहतरीन शॉट लगाते हैं परन्तु गोलकीपर एमिलियानो मार्तिनेज़ एक बार फिर अच्छा बचाव करते हैं। एक मिनट के अंदर, गोल के लिए प्रयासरत, दानी ओल्मो फिर एक जोरदार हेडर लगाते हैं। लेकिन गोलकीपर एमिलियानो मार्तिनेज़ फिर एक शानदार बचाव कर लेते हैं। अगर पैंसठ मिनट तक स्कोर बराबरी पर था तो आज इसमें बड़ी भूमिका अर्जेंटीनी गोलपोस्ट पर खड़े उनके सजग प्रहरी एमिलियानो मार्तिनेज़ की थी।

आश्चर्यजनक यह था कि स्पेन अर्जेंटीना को गेंद दे ही नहीं रही थी, जिसके चलते मेस्सी मैच में कहीं नजर ही नहीं आ रहे थे। दो मिनट के भीतर एक बार फिर स्पेन अटैक करती है पर विपक्षी रक्षापंक्ति बचाव कर लेती है।

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI Grok)

दूसरे हाइड्रेशन ब्रेक के बाद अर्जेंटीनी टीम की मुश्किलें तब और भी बढ़ जाती हैं जब कोच स्कालोनी क्रिश्चियान रोमेरो को मैदान से बाहर बुलाकर उनके स्थान पर फाकुन्दो मेदीना को मैदान में भेजते हैं। रोमेरो चोटिल हो गए थे। इसके चलते, इतने बड़े मैच के इतने अहम मोड़ पर, अर्जेंटीना के दोनों ही प्रमुख सेंट्रल डिफेंडर मैदान से बाहर जा चुके थे। इससे एक नुकसान यह भी हुआ था कि कोच को अपनी रणनीति के इतर दो सब्स्टीट्यूशन इस्तेमाल करने पड़ गए। अब उनके पास चाह कर भी अटैकिंग सब्स्टीट्यूशन करने के ज्यादा मौके थे नहीं।

राउंड ऑफ 16 में स्पेन का सामना पुर्तगाल से था। वहां, लामीन यमाल पर लगाम लगाए हुए, पुर्तगाल के प्रमुख खिलाड़ी नूनो मेंडेस मैच के अहम समय में चोटिल हो गए थे। मैच स्पेन जीत लेती है। फिर क्वार्टर फाइनल में बेल्जियम के गोलकीपर ऐन मौके पर घायल होकर बीच मैच में बाहर हो जाते हैं। सीधे क्वार्टर फाइनल में मैदान पर आए, विश्व कप में अपना पहला मैच खेलने उतरे, गोलकीपर की बेजा ग़लती के चलते स्पेन यह मैच जीत जाती है। फिर सेमीफाइनल में जहाँ सामना मजबूत फ्रांस से था, विलियम सलीबा बीच मैच में घायल होकर मैदान छोड़ने के लिए मजबूर हो जाते हैं। नतीजतन एक बार फिर स्पेन मौका भुनाते हुए मैच जीत जाती है। अब, एकबार फिर, उनकी विरोधी टीम दोनों ही सेंट्रल डिफेंडर को चोटिल होने के कारण को चुकी थी। क्या यह कोई इशारा था?

खेल आगे बढ़ता है। इस मैच में बेअसर रहे स्टार खिलाड़ी रोड्रिगो डि पॉल को सत्तरवें मिनट में बाहर बुलाकर कोच एक बार फिर सिमियोनी को मैदान पर लाते हैं। इस विश्व कप में बेंच से मैदान में आकर अंतिम क्षणों में अहम गोल दागने वाले लाउतारो मार्टिनेज का शायद अब मैदान पर आ पाना लगभग नामुमकिन था। स्पेन, सत्तर फीसदी समय गेंद अपने कब्जे में रखते हुए, लगातार आक्रमण करता रहता है। पहले तो सेमीफाइनल में फ्रांस को और अब आज उन्होंने अर्जेंटीना को गेंद के लिए तरसा दिया था। अर्जेंटीनी खिलाड़ी बस इधर से उधर दौड़ रहे थे। वह गेम में कहीं थे ही नहीं।

पिच्हत्तरवें मिनट में अपने अटैक को और धार प्रदान करने हेतु कोच लुई डे ला फुएन्ते एलेक्स बाएना के स्थान पर नीको विलियम्स को मैदान पर उतारते हैं। और, अब वक्त आ गया था कि वह अपना अंतिम दाँव खेलें। दानी ओल्मो को बाहर बुलाकर अब कोच, अपने सबसे घातक हथियार, मिकेल मेरीनो को मैदान में उतार चुके थे। अब अर्जेंटीना के लिए यह मैच और भी ज्यादा खौफनाक होने जा रहा था।

पाऊ कुबार्सी एक दूरी से गोल की दिशा में घातक शॉट लगाते हैं। परन्तु एकबार फिर एमिलियानो मार्तिनेज़ शानदार बचाव कर लेते हैं। दो मिनट पश्चात ही पाऊ कुबार्सी के साथी आय्म्रिक लापोर्त एक गजब हेडर लगाते हुए गोल मारने का प्रयास करते हैं। परन्तु एमिलियानो मार्तिनेज़ आज एक दीवार की माफिक खड़े थे। ऐसा लग रहा था कि अर्जेंटीना के लिए आज सिर्फ वही खेल रहे हैं। स्पेन लगातार हमले कर रही थी, एमिलियानो मार्तिनेज़ लगातार एक के बाद एक सेव करते जा रहे थे।

अर्जेंटीनी खिलाड़ी लगातार फाउल करते हुए स्पेनिश खिलाड़ियों की लय तोड़ने का प्रयास कर रहे थे। वह काफी खूँखार तरीके से खेल रहे थे। यह शायद फुटबॉल तो नहीं ही था। बयासिवें मिनट में सेमीफाइनल में बराबरी का गोल लगाने वाले एंजो फर्नानदेज़ को एक घातक फाउल करने पर रेफरी द्वारा येलो कार्ड दिखा दिया जाता है। स्पेन फिर हमले के लिए छोटे छोटे पासों से गेंद लिए आगे बढ़ती है। फेरां तोरे एक प्रयास करते हैं मगर वह गेंद को निशाने पर नहीं रख पाते। तुरंत ही कप्तान रोड्री भी एक जोरदार प्रयास करते हैं। मगर वह भी गेंद को गोलपोस्ट से दूर रखते हैं। स्कोर अब भी 0-0 ही था। मैच में गरमा-गरमी बढ़ती ही जा रही थी। अर्जेंटीना लगातार घातक फाउल कर रही थी। गलत आचरण के लिए मैदान से बाहर गए रोमेरो को रेफरी द्वारा येलो कार्ड दिखाया जाता है।

नब्बे मिनट का खेल पूर्ण हो चुका था। अर्जेंटीना नब्बे मिनट के खेल में एक बार भी विपक्षी गोलपोस्ट की ओर निशाना नहीं साध सकी थी। यह मैच पूरी तरह एकतरफा ही रहा था। लग ही नहीं रहा था कि स्पेन की विपक्षी टीम अपने ताज की रक्षा करने मैदान में उतरी है।

90+3 मिनट। नीडो विलियम्स गोल दागने की एक कोशिश करते हैं। मगर यह प्रयास अच्छा नहीं था। स्कोर अब भी 0-0। माहौल एकदम गरम। सबके चेहरों पर चिंता की लकीरें। जबरदस्त प्रेशर भी था ही।

90+3 मिनट। एंजो फर्नानदेज़ स्पेनिश खिलाड़ी पाऊ कुबार्सी को बहुत ही बुरी तरह टैकल करते हैं। नतीजा येलो कार्ड। दो येलो कार्ड मिलने के चलते एंजो फर्नानदेज़ को मैदान से बाहर कर दिया जाता है। अब पहले से ही पस्त अर्जेंटीना दस खिलाड़ियों के संग खेलने के लिए मजबूर थी। एंजो एक अनुभवी खिलाड़ी हैं। जाने क्यूँ वह खुद पर काबू नहीं रख सके। वह अंतिम क्षणों में गोल दागने की क्षमता रखते हैं। मगर उनकी इस ग़लती के चलते अब वह मैदान से बाहर हो चुके थे।

90+9 मिनट। लामीन यमाल स्पेन के लिए गोल करने का एक अंतिम प्रयास करते हैं। मगर, उनका यह प्रयास भी नाकाफी रहता है। रेफरी द्वारा मैच 0-0 की बराबरी पर रोक दिया जाता है। अब मैच का फैसला एक्स्ट्रा टाइम में होने जा रहा था। या शायद पेनाल्टी शूटआउट? यह तो खैर आगे पता चलने वाला था।

एक्स्ट्रा टाइम का पहला हाफ शुरू होता है। अर्जेंटीना दस खिलाड़ियों के संग मैदान पर थी। अर्जेंटीना के पास स्पेन को गोल करने से रोकते हुए मैच को पेनाल्टी शूटआउट की ओर ले जाने के अलावा ज्यादा कुछ शेष रह नहीं गया था।

तिरानवे मिनट में एकबार फिर नीको विलियम्स एक हेडर लगाते हैं। मगर फिर एकबार गोलकीपर एमिलियानो मार्तिनेज़ अच्छा बचाव कर लेते हैं। अन्ठानवें मिनट में गोलकीपर एमिलियानो मार्तिनेज़ भी चोटिल हो चुके थे। अर्जेंटीनी डगआउट में सभी लोग चिंतित नजर आ रहे थे। लेकिन, टीम के हित को सर्वोपरि रखते हुए एमिलियानो मार्तिनेज़ मैदान पर बने रहते हैं।

इस बीच स्पेन दो और सब्स्टीट्यूशन कर लेता है। कुछ पलों बाद अर्जेंटीनी टीम भी अंतिम सब्स्टीट्यूट के तौर पर हूलियन अल्वारेज़ की जगह एक डिफेंडर मार्कोस सेनेसी को मैदान पर उतार देती है। इस का यह अर्थ हुआ कि सेमीफाइनल में अर्जेंटीना के लिए विजयी गोल दागने वाले लाउतारो मार्टिनेज अब इस मैच का हिस्सा नहीं होने जा रहे थे।

स्पेन अपने अटैक लगातार जारी रखती है। पहले मिकेल मेरीनो फिर नीको विलियम्स गोल पर हमला करते हैं। दोनों ही निशाने से दूर रह जाते हैं। माहौल इतना तल्ख़ हो चला था कि अर्जेंटीनी कोच तक को रेफरी द्वारा येलो कार्ड दिखा दिया जाता है। अर्जेंटीना की टीम अब काफी ज्यादा फाउल करने लगी थी। एक्स्ट्रा टाइम का पहला हाफ समाप्त हो जाता है।

यह चमत्कार ही था कि स्कोर अब भी किसी तरह से 0-0 से बराबरी पर था। स्पेन ने एक के बाद एक लगातार विपक्षी गोलपोस्ट पर हमले जारी रखें थे। मुश्किल की इस घड़ी में आश्चर्यजनक तरीके से मेस्सी कहीं भी दिखाई नहीं दे रहे थे। अब तो लग रहा था कि मैच शाय़द पेनाल्टी शूटआउट तक खिंचेगा।

एक्स्ट्रा टाइम के दूसरे हाफ की शुरुआत होती है। पहले ही मिनट में स्पेनिश राइट बैक पेड्रो पोर्रो मैदान की दाईं ओर से एक बेहतरीन क्रॉस अर्जेंटीनी बॉक्स में भेजते हैं। उनका प्रयास था नीडो विलियम्स को तलाशना। गेंद नीको की ओर जाती है। वह बड़ी चपलता के साथ एक हेडर से गेंद को साथी खिलाड़ी फेरां तोरे की ओर सरका देते हैं। फेरां तोरे अपने बाएँ पाँव से गेंद को खूबसूरत किक लगाते हुए गोलपोस्ट के भीतर भेज देते हैं। एमिलियानो मार्तिनेज़ का दुर्ग अंततः भेद लिया गया था। फेरां तोरे जोश में मैदान की बाँई ओर बढ़ते हैं। स्पेनिश बेंच से तमाम लोग उनकी ओर जश्न मनाने दौड़ते हुए आते हैं। स्टेडियम में मौजूद तमाम स्पेनिश समर्थकों की खुशी देखते ही बनती थी। अर्जेंटीनी समर्थकों की आंखें नम हो गई थीं। अर्जेंटीना अब टूट चुकी थी।

अर्जेंटीना अब विपक्षी गोलपोस्ट पर जवाबी हमला करने का प्रयास करती है। अब कहीं जाकर वह विपक्षी गोलपोस्ट पर पहला शॉट लगाते हैं। अब मैदान पर मेस्सी के क्रॉस पर गोल दागने के लिए न तो एंजो फर्नानदेज़ मौजूद थे न ही लाउतारो मार्टिनेज। फाकुन्दो मेदीना भी गोल की दिशा में एक शॉट लगाते हैं, यह शॉट गोल से काफी दूर रह जाता है। तुरंत ही गुइलिआनो सिमियोनी एक प्रयास करते जरूर हैं। वह भी नाकाफी रह जाता है।

120+6 मिनट। रेफरी स्लावको विनचिच दिन की आखिरी व्हिस्ल बजाते हैं। मैच का अंत होता है। इसके साथ ही अर्जेंटीना के वर्चस्व का भी अंत होता है। अर्जेंटीना अपने खिताब की रक्षा करने में असमर्थ रह जाती है। वह अपने खिताब की रक्षा करने वाली तीसरी टीम बनने से चूक गई थी। स्पेन के रूप में विश्व को अपना नया विजेता मिल गया था। वह पूरी तरह इसके हकदार थे। उन्होंने आज बेहद शानदार तरीके से अर्जेंटीनी टीम को धूल चटा दी थी। आज, उनका नाम, सदैव के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुका था।

कहते हैं इतिहास खुद को दोहराता है। इससे पहले भी सन् 2010 में फाइनल मुकाबले का निर्णायक गोल एक्स्ट्रा टाइम में बार्सिलोना के लिए खेलने वाले एक खिलाड़ी द्वारा आया था और स्पेन विश्व विजेता बनी थी। इस दफा फिर एक बार्सिलोना के ही खिलाड़ी ने स्पेन के लिए निर्णायक गोल दाग दिया था, वह भी एक्स्ट्रा टाइम में ही। क्या यह कथा स्वयं खुदा लिख रहा था? शायद हाँ।

मेस्सी मैदान में बैठे हुए कराह रहे थे। वह अपने आंसुओं को रोक नहीं पा रहे थे। हमेशा की तरह इस बार भी अकेले ही वह अपनी टीम को यहां तक ले आए थे। मगर, अफसोस, वह आज अंतिम बाधा पार नहीं कर सके थे।

ला रोजा ने आज लगातार एक सौ बीस मिनट तक अर्जेंटीना के गोलपोस्ट पर बमबारी कर दी थी। किसी तरह गोलकीपर एमिलियानो मार्तिनेज़ ने ग्यारह बेहद शानदार बचाव करते हुए अपनी टीम को मैच में बनाए रखा। आज अगर वह गोलपोस्ट पर खड़े नहीं होते तो शायद परिणाम इससे भी बद्तर हो सकता था। स्पेन ने मैच में 803 पास किए। अर्जेंटीना ने लगभग चार सौ। एक सौ बीस मिनट में अर्जेंटीना ने विपक्षी गोलपोस्ट की ओर कुल तीन बार शॉट लगाया। उसमें से एक भी निशाने पर न था।

लियोनेल मेस्सी का अंतिम नृत्य बेहद फीका रहा गया था। मैच पश्चात अर्जेंटीनी समर्थक उनके नाम के नारे गा रहे थे। वह जानते थे कि यह शायद अंतिम बार है जब वह मेस्सी को अल्बीसेलेस्त जर्सी पहने देख रहे हैं। मेस्सी भावुक हो गए थे। कहते हैं मरने से पहले कोई भी सितारा सबसे ज्यादा चमक बिखेरता है। मेस्सी ने इस विश्व कप में कमाल का प्रदर्शन किया था। अफसोस, उनके तमाम प्रयास आज असफल रह गए। स्पेन शानदार अंदाज में विश्व विजेता बन गई थी।

यह स्पेन के काव्यात्मक शैली के बेहद खूबसूरत खेल की अर्जेंटीनी टीम के कठोर दक्षिण अमेरिकी खेल पर जीत थी। यह फुटबॉल की जीत थी।

फुटबॉल का यह महाकुंभ अब समाप्त हो गया। यह बेहद शानदार आयोजन रहा। स्पेन के रूप में एक ऐसी टीम विश्व विजेता बनी, जो इसकी हकदार थी।

इस के साथ ही मैं अपने तमाम पाठकों का भी शुक्रिया अदा करूँगा जिन्होंने पिछले एक माह तक लगातार हमारे लेख पढ़े व मुलाकात कर या वॉट्सएप के जरिए अपनी राए हमें बतलाई। यह साथ बेहद खूबसूरत था। आपसे हमारी मैच रिपोर्ट्स को अपार स्नेह मिला। उम्मीद है कि यह साथ आगे भी बना रहेगा। तब तक के लिए अलविदा।

राजस्थान के ST समाज पर तमिलनाडु से इटली तक के मिशनरियों की नजर, युद्धस्तर पर ईसाई बनाने में जुटे: इन 10 मामलों से समझें- अवैध धर्मांतरण पर लगाम के लिए क्यों है SIT की जरूरत

राजस्थान में अब वही कहानी सामने आ रही है जो छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में देखने को मिलती है। यहाँ ईसाई मिशनरी जनजातीय (ST) समाज के वंचित गाँवों के लोगों को मुफ्त राशन, मुफ्त नौकरी, और मुफ्त पढ़ाई जैसी जरूरी चीजों का लालच देकर उन्हें धर्म बदलने के लिए मजबूर कर रही हैं। इनसे कहा जाता है कि ईसाई बनने से उनकी सारी परेशानियाँ दूर हो जाएँगी, लेकिन इनका नतीजा यह निकलता है कि लोग अपनी संस्कृति और समाज से कटते चले जाते हैं। ये वही मकसद है जिसके लिए मिशनरियाँ देश के अलग-अलग हिस्सों में सक्रिय हैं।

इसी मामले पर चिंता जताते हुए अब राजस्थान के उदयपुर से सांसद डॉ. मन्नालाल रावत ने आवाज उठाई है। उन्होंने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को चिट्ठी लिखकर पूरे मामले की जानकारी दी है।

अपने पत्र में सासंद ने लिखा है कि उदयपुर, डूंगरपुर और बांसवाड़ा जैसे इलाकों में मिशनरियों की अवैध धर्मांतरण गतिविधियों खासतौर पर बढ़ी हैं। उनका कहना है कि यहाँ संगठित तरीके से गिरोह बनाकर जनजातीय समाज को निशाना बनाया जा रहा है और शिक्षा व रोजगार के नाम पर बच्चों को राज्य से बाहर ले जाया जा रहा है।

उदयपुर सांसद ने पत्र लिखकर धर्मांतरण गतिविधियों में NIA-CBI-IB की जाँच की रखी माँग

पत्र के मुताबिक हाल ही में उदयपुर जिले दो लड़कियाँ और पाँच लड़के समेत सात बच्चों को तमिलनाडु के एक स्कूल में दाखिला दिलाने के बहाने राज्य से बाहर ले जाया जा रहा था। सांसद के अनुसार इन बच्चों को गोवा में स्थानीय पुलिस और बाल कल्याण समिति ने रोका, जिसके बाद राजस्थान पुलिस ने कार्रवाई करते हुए बच्चों को रेस्क्यू करने की प्रक्रिया शुरू की। पत्र में यह भी कहा गया है कि पहले भी इसी तरह बच्चों को राज्य से बाहर ले जाया जा चुका है।

सांसद मन्नालाल रावत द्वारा लिखे पत्र की कॉपी (साभार: NDTV)

सांसद ने अपने पत्र में यह आशंका भी जताई है कि इस पूरे नेटवर्क के तार पंजाब, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के अलावा पाकिस्तान और नेपाल तक फैले हो सकते हैं।

मामलों की गंभीरता को देखते हुए सांसद ने माँग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जाँच के लिए एक विशेष जाँच दल (SIT) बनाई जाए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर CBI, NIA और IB जैसी केंद्रीय एजेंसियों से भी जाँच करवाई जा सकती है, ताकि इन धर्मांतरण नेटवर्क से जुड़े संगठनों और मिशनरियों की फंडिंग की सच्चाई सामने आ सके।

उदयपुर सांसद का यह पत्र सचमुच राजस्थान में चल रहे धर्मांतरण रैकेट को बेनकाब करता है। क्योंकि पिछले कई वर्षों में ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें संगठित तरीके से मिशनरियों ने जनजातीय क्षेत्रों में पैठ जमाकर अवैध धर्मांतरण का खेल खेला है। राजस्थान में धर्मांतरण रैकेट के ऐसे 10 मामले इस रिपोर्ट में मैं आपको बताने जा रही हूँ।

1.उदयपुर से 7 बच्चों को मुफ्त शिक्षा के लिए गोवा लेकर गए मिशनरी

बीते दिन रविवार (19 जुलाई 2026) को ही मामला सामने आया, जहाँ मुफ्त सिक्षा का झाँसा देकर 7 से 12 साल के सात बच्चों को राजस्थान से गोवा ले जाया गया। बच्चों के साथ मिशनरी के 3 लोग भी थे, जिन्हें पुलिस ने हिरासत में ले लिया। यहाँ से बच्चों को तमिलनाडु ले जाने की प्लानिंग थी।

पूछताछ में इसका खुलासा हुआ है कि बच्चे उदयपुर में भी चर्च जाया करते थे। पुलिस इस मामले की धर्मांतरण एंगल से भी जाँच कर रही है। पुलिस की जानकारी में आया है कि पहले भी उदयपुर से ही कम से कम 15 बच्चों को तमिलनाडु भेजा गया था।

2.खेतों में कुआँ और ट्यूबवेल खुदवाने का लालच देकर 200+ जनजातियों को ईसाई बनाने की कोशिश

उदयपुर जिले के ऋषभदेव थाना क्षेत्र के कानूवाड़ा बिलखाई गाँव में प्रार्थना सभा आयोजित कर 20 से ज्यादा गाँवों के 200 जनजातीय लोगों को धर्म परिवर्तन कराने की कोशिश की गई। सभा में लोगों को खेतों में कुआँ और ट्यूबवेल खुदवाने का लालच दिया गया और इसके बदले ईसाई बनने को कहा गया।

सभा में यह भी कहा गया कि हिंदू धर्म छोड़ दो, सारी बीमारियाँ दूर हो जाएँगी और हर तरीके से आर्थिक लाभ भी मिलेगा। पुलिस ने कार्यक्रम स्थल में पहुँचकर झारखंड और छत्तीसगढ़ के 3 पादरियों समेत 11 लोगों को हिरासत में लिया था।

3.पिछले 10 साल से 50+ गाँवों में सक्रिय ईसाई धर्मांतरण रैकेट

उदयपुर के ऋषभदेव क्षेत्र में धर्मांतऱण का मामला सामने आने के बाद दैनिक भास्कर की ग्राउंड रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि खेरवाड़ा क्षेत्र के 50 से अधिक गाँवों इनकी चपेट में हैं, जहाँ मिशनरियाँ पिछले 10 सालों से जनजातीय परिवारों का लालच देकर धर्मांतरण करवा रही हैं।

रिपोर्ट में सामने आया कि गाँव वालों के धर्मांतरण के लिए मिशनरी ग्रुप ने हर गाँव में 3 से 4 ऐसे स्थानीय समाज के नेताओं को प्रभारी बना रखा था। कई ग्रामीणों और महिलाओं ने आरोप लगाया कि धर्मांतरण का विरोध करने वालों पर ऐसे प्रभावशाली लोगों के जरिए उन पर दबाव बनाया जाता था।

4.पादरी ने 450 लोगों को बनाया ईसाई

श्रीगंगानगर जिले में फ्रेंडस मिशनरी प्रेयर बैंड नाम की ईसाई मिशनरी के पादरी पोलुस बरजो को पुलिस ने गिरफ्तार किया। पूछताछ में पता लगा कि उसने पिछले 11 वर्षों में 450 से अधिक लोगों को ईसाई बनाया है। पुलिस ने उसके पास से एक रजिस्टर समेत कई दस्तावेज भी बरामद किए, जिनमें धर्मांतरण करने वाले लोगों का रिकॉर्ड था।

वह खुद एक हिंदू हुआ करता था और बाद में उसने धर्मांतरण कर लिया। उसने यह भी बताया कि पादरी के तौर पर उसे 9 हजार रुपए सैलरी दी जाती है और जिस संस्था के लिए वह काम करता है उसका काम ही हिंदुओं को लालच देकर धर्म परिवर्तन करना है। पोलस ने बताया कि उसे हर महीने 20 लोगों को ईसाई बनाने का टारगेट मिला है।

5.हिंदू देवी-देवताओं का विसर्जन करवा 250 लोगों को ईसाई बनाने का प्रयास

जयपुर के वाटिका थाना क्षेत्र में भी साल 2022 में ईसाई धर्मांतरण के बड़े मामले का खुलासा हुआ था। शिकायत में आरोप लगाया गया कि करीब 250 लोगों पर हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपनाने का दबाव बनाया गया। मामले की जानकारी सामने आने के बाद हिंदू संगठनों ने विरोध जताया और आरोप लगाया कि लोगों को लालच और ईसाइयत की प्रार्थना सभाओं के जरिए धर्मांतरण के लिए प्रेरित किया जा रहा था।

शिकायत में यह भी कहा गया था कि हिंदुओं से हिंदू देवताओं की पूजा बंद करवाकर मूर्तियों का विसर्जन करवा दिया गया और बीमारी ठीक करने और पैसों का लालच दिया जा रहा था।

6.बाप-बेटे घर पर चर्च बनाकर चलाते थे धर्मांतरण का खेल

श्रीगंगानगर में बाप बग्गूसिंह और बेटा अमनदीप सिंह मिलकर जनजातीय समाज को ईसाई धर्मांतरण करवाया। बाप और बेटे ने अपने घर में चर्च बनाया, जहाँ प्रार्थना सभा में गरीब लोगों को बीमारी ठीक करने का लालच देकर ईसाई बनाते थे। पुलिस ने बाप-बेटों के खिलाफ कार्रवाई की।

मामले कि शिकायतकर्ता ने बताया कि खुद को पादरी बताने वाला बग्गू सिंह अपने घर पर पानी पिलाता, कुछ मंत्र पढ़ता औऱ सिर पर हाथ रखकर कहता, “अब तुम ईसाई हो गए हो, प्रभु यीशु तुम्हारी सारी बीमारी ठीक करेंगे।” वहीं दूसरी ओर बग्गू सिंह हिंदू धर्मों के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करता था। पुलिस की जाँच में सामने आया था कि वह अब तक 25 परिवारों को ईसाई बना चुका था।

7.‘राजस्थान में शैतान का राज है, यहाँ यीशू राज होगा’: राजस्थान में मिशनरियों का मकसद

पिछले साल ईसाई धर्मांतरण का एक और गंभीर मामला सामने आया था जब कोटा के बोरेकहेड़ा थानाक्षेत्र की एक चर्च में ईसाई मिशनरियों ने तीन दिवसीय प्रार्थना सभा आयोजित की और अपना मकसद बताया। सभा से एक वीडियो वायरल हुई, जिसमें कहा गया था, “राजस्थान में शैतान का राज है, यहाँ यीशू राज होगा।”

इस मामले में ‘राजस्थान अवैध धर्म परिवर्तन निषेध अधिनियम, 2025’ के तहत राज्य में पहला मुकदमा दर्ज हुआ था। शिकायत कुछ हिंदू संगठनों के स्वयंसेवकों द्वारा बोरेकहेड़ा थाने में वीडियो क्लिप और सोशल मीडिया लाइवस्ट्रीम के आधार पर दी गई थी।

8.छत पर बने कमरे में ईसाइयत की सभा में धर्म परिवर्तन का खेल

लगभग 10 महीने पहले राजस्थान में धर्म परिवर्तन के खिलाफ कानून लागू होते ही जयपुर के प्रताप नगर क्षेत्र में एक मामला सामने आया, जहाँ छत पर बने कमरे में ईसाइयत की सभा आयोजित की जाती थी और लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए उकसाया जाता था। मौके पर मिशनरी के 5 लोग मिल थे, जिसके बाद स्थानीय लोगों ने विरोध किया तो मारपीट शुरू कर दी।

9.बीकानेर और उदयपुर में ईसाई धर्मांतरण के गंभीर मामले

इसी साल फरवरी में उदयपुर और जयपुर, दो जिलों में एक साथ ईसाई धर्मांतरण का खुलासा हुआ, जिसमें एक सांसद मन्नालाल रावत और दूसरा हिंदू संगठन ने किया। उदयपुर वाले मामले में छगनलाल नाम के व्यक्ति पर प्रार्थना सभा आयोजित कर धर्मांतरण का पाठ पढ़ाया जा रहा था।

वहीं बीकानेर में भी ईसाई धर्मांतरण गतिविधियाँ आयोजित की जा रही थीं हिंदू संगठन ने विरोध किया तो उनसे मारपीट की गई। हिंदू संगठन ने पुलिस से इस मामले में शिकायत दर्ज कराई थी।

9.दिल्ली से अलवर आकर पादरी राजकुमार लोगों को बनाता ईसाई

हाल ही में एक और पादरी राजकुमार को पुलिस ने गिरफ्तार किया। जो अलवर जिले के अखेपुरा थाना क्षेत्र में ईसाइयत की सभा की आड़ में बीमारियाँ दूर करने का लालच देकर धर्मांतरण के लिए उकसा रहा था। हिंदु संगठन ने शिकायत में बताया था कि मौके पर ईसाइयत की किताबें और मोबाइल में ईसाई धर्मांतरण गतिविधि का खुलासा हुआ है।

वह दिल्ली से अलवर आकर यहाँ छोटे-छोटे गाँवों के लोगों को बहला-फुसलाकर ईसाई बनाने का काम करता था, ऐसा वो पिछले 4-5 साल से कर रहा था। उसके यह कारनामे देखकर हिंदू संगठन के कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों ने उसे सड़क पर घसीटकर पीटा जिसमें उसके कपड़े भी फट गए।

10.भरतपुर में धर्मांतरण गतिविधियाँ के तार इटली से जुड़े, बजिंदर ने 20 हजार लोगों को बनाया ईसाई

साल 2024 में भरतपुर जिले में ईसाई धर्मांतरण रैकेट का खुलासा हुआ था, तब जाँच के दौरान सामने आया था कि पूरे नेटवर्क के तार एक इटली की संस्था ‘लभाना मिनिस्ट्री’ से जुड़ रहे हैं। भरतपुर में ईसाई बने लोगों को इसी संस्था का धर्मांतरण सर्टिफिकेट दिया गया था।

यह संस्था ईसाइयों की संख्या को बढ़ाने के पीछे लगी है, जिसमें मूल काम लोगों को तमाम तरह के प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराना होता है। इसके अलावा भरतपुर के मालों में फंडिंग की जाँच में एलएमएन कंपनी का नाम सामने आया था, जो लोगों को बाइबिल भी गिफ्ट करती थी।

इस मामले में पादरी बजिंदर को गिरफ्तार किया गया था, जिसका ‘यीशु-यीशु’ गाने के साथ वीडियो भी वायरल है। वह अपने साथी के साथ मिलकर भरतपुर में 20 हजार से ज्यादा लोगों का धर्मांतरण करा चुका था।

निष्कर्ष: राजस्थान में धर्मांतरण पर कब लगेगी लगाम, सरकार के सख्त कानून का कितना असर

राजस्थान में पिछले कुछ वर्षों में सामने आए ईसाई धर्मांतरण के मामलों से यह सवाल लगातार उठ रहा है कि राज्य में 10 महीने पहले लागू हुआ सख्त कानून के बावजूद ऐसी घटनाएँ क्यों नहीं रुक रही हैं। उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, श्रीगंगानगर, जयपुर, कोटा, अलवर और बीकानेर जैसे कई जिलों में अलग-अलग समय पर धर्मांतरण से जुड़े मामले सामने आए हैं। इन मामलों में कहीं जनजातीय समाज को आर्थिक मदद, इलाज, शिक्षा और रोजगार का लालच दिया गया, तो कहीं बच्चों को दूसरे राज्यों में ले जाकर पढ़ाई के नाम पर धर्मांतरण कराने की आशंका जताई गई।

इससे यह साफ है कि पुलिस जिन मामलों की जाँच कर रही है, वे केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं हो सकते, बल्कि इनके पीछे संगठित नेटवर्क होने की संभावना है।

इसी पृष्ठभूमि में उदयपुर सांसद डॉ. मन्नालाल रावत ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर पूरे मामले की जाँच NIA, CBI और IB जैसी केंद्रीय एजेंसियों से कराने की माँग की है। सांसद का तर्क है कि अगर बच्चों को राज्य से बाहर ले जाने, दूसरे राज्यों के मिशनरियों की भूमिका और विदेशी फंडिंग जैसे पहलुओं की निष्पक्ष जाँच करनी है, तो केवल स्थानीय पुलिस की जाँच पर्याप्त नहीं होगी। उनका कहना है कि यदि वास्तव में कोई अंतरराज्यीय या अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क सक्रिय है, तो उसकी परतें केंद्रीय एजेंसियां ही प्रभावी ढंग से खोल सकती हैं।

‘द वायर’ वाली आरफा हो या ‘द हिंदू’ वाली विजेता… CJP प्रदर्शन में पत्रकारों के साथ बदसलूकी से लेफ्ट-लिबरल जमात को मिला ‘चरमसुख’

लेफ्ट-लिबरल जमात खुद को ‘बुद्धिजीवी’, ‘सहिष्णु’, ‘असहमति का सम्मान करने वाला’ और ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे बड़ा रक्षक’ बताता है। पर हल्की से भी आलोचना इनसे बर्दाश्त नहीं होती। जैसे ही ये आलोचना के दायरे में आते हैं, अपने वैचारिक विरोधियों के विरुद्ध भीड़ की हिंसा का भी समर्थन करने लगते हैं।

सोशल मीडिया पर एक वायरल वीडियो में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन के दौरान जंतर-मंतर पर ABP न्यूज के रिपोर्टर के साथ धक्का-मुक्की और अभद्र व्यवहार करते प्रदर्शनकारी दिख रहे हैं। लेकिन इस घटना की निंदा करने की जगह वामपंथी जमात सोशल मीडिया पर हमले का समर्थन करते दिख रहा है।

वैसे यह वीडियो जून 2026 की शुरुआत का है। लेकिन 19-20 जुलाई को नीट (NEET) पेपर लीक मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर CJP का प्रदर्शन तेज होने के बाद यह फिर से वायरल है।

वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि प्रदर्शन को कवर कर रहे एबीपी न्यूज के रिपोर्टर को प्रदर्शनकारियों की भीड़ ने चारों ओर से घेर रखा है। भीड़ ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारे लगा रही है। रिपोर्टर के साथ धक्का-मुक्की कर रही है। हूटिंग कर लगातार रिपोर्टिंग में बाधा डाल रही। रिपोर्टर को डराने-धमकाने पर उतारू यह ‘भीड़’ मॉब लिंचिंग जैसी स्थिति पैदा करने को आतुर दिख रही है।

सीजेपी (CJP) प्रदर्शनकारियों की इस गुंडई के फिर से वायरल होने के बाद लेफ्ट-लिबरल और बीजेपी विरोधी समूह ने इसे सही ठहराने की कोशिश की। 19 जुलाई को इस वीडियो को साझा करते हुए ‘द वायर’ की इस्लामी पत्रकार अरफा खानम शेरवानी ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, “दुख हो रहा रिपोर्टरों की ये हालत देखकर। जब स्टार एंकर दिन-रात स्टूडियो में नफरत और मोदी का प्रोपेगेंडा फैलाएँगे तो फील्ड में कीमत जूनियर रिपोर्टर को चुकानी पड़ेगी।”

आरफा की यह टिप्पणी पीड़ित पत्रकार के प्रति उनकी सहानुभूति नहीं है। वह अपरोक्ष रूप से रिपोर्टर के साथ भीड़ की बदसलूकी को उचित ठहराने का प्रयास कर रही है। उस भीड़ को जो ‘फासीवादी सरकार’ के विरोध में प्रदर्शन करने का दावा कर रही है।

पत्रकार को टारगेट कर रहे सीजेपी प्रदर्शनकारी के एक अन्य वीडियो को लेकर ‘द हिंदू’ की डिप्टी एडिटर विजेता सिंह ने सोशल मीडिया पर लिखा, “नफरत फैलाने वाले टीवी एंकर/प्रजेंटर/वरिष्ठ पत्रकारों और टीवी रिपोर्टरों के बीच अंतर किया जाना चाहिए, क्योंकि इनमें अधिकतर बेहद परिश्रमी होते हैं।”

विजेता सिंह की यह टिप्पणी उन पत्रकारों के खिलाफ भीड़ की कार्रवाई को वैध ठहराने जैसी है, जिन्हें वह और उनके वैचारिक सहयोगी ‘नफरत फैलाने वाला’ मानते हैं। यह ‘भीड़ के न्याय’ का खुला महिमामंडन है, जबकि यही इस्लामी-वामपंथी समूह उस समय ऐसी घटनाओं की तीखी आलोचना करता है, जब भीड़ वैचारिक तौर पर उनसे सहमत नहीं होती।

आरफा खानम शेरवानी और विजेता सिंह की सोशल मीडिया पोस्ट पत्रकारों पर हमले या उन गंभीर खतरों के प्रति चिंता नहीं है, जिससे गैर-वामपंथी पत्रकार घिरे हैं। उनका मकसद शाब्दिक चतुराई के साथ भीड़ के हमले को जायज ठहराने का प्रयास है।

हालाँकि विजेता सिंह की टिप्पणी की आलोचना शेखर गुप्ता जैसों ने भी की है। उन्होंने एक्स पर लिखा है, “विजेता, हम यह फैसला भीड़ पर नहीं छोड़ सकते कि वह किस पत्रकार से प्यार करे और किससे नफरत। हर पत्रकार, चाहे वह वरिष्ठ हो या जूनियर, अपना काम करते समय पूरी तरह सुरक्षित महसूस करे। एक भीड़ के लिए जो ‘अच्छा’ है, वही दूसरी भीड़ के लिए ‘बुरा’ हो सकता है। यह प्रवृत्ति अन्ना आंदोलन के दौरान शुरू हुई थी। उस समय भी कई लोगों ने इसका समर्थन किया था। लेकिन यह उस समय भी गलत था और आज भी गलत है।”

6 जून को जब एबीपी न्यूज रिपोर्टर के साथ हुइ घटना का वीडियो पहली बार वायरल हुआ था, तब कॉन्ग्रेस समर्थक एक सोशल मीडिया अकाउंट को सीजेपी प्रदर्शनकारियों की इस हरकत से ‘चरम सुख’ प्राप्त हुआ था।

एक अन्य पत्रकार सचिन गुप्ता ने भी इस घटना को अपरोक्ष रूप से सही ठहराने की कोशिश की। उन्होंने लिखा, “इसके जिम्मेदार अंजना, रूबिका, चित्रा, सुधीर जैसे लोग हैं। भुगतना फील्ड रिपोर्टर को पड़ता है। इस बहादुर रिपोर्टर की सहनशीलता को नमन है, जिन्होने सारी आवाजों को इग्नोर कर अपने काम पर फोकस रखा।”

परीक्षाओं में कथित अनियमितता और पेपर लीक के मुद्दे पर केंद्र सरकार, विशेषकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री के खिलाफ प्रदर्शन का दावा सीजेपी करती है। लेकिन इस प्रदर्शन के दौरान ‘आजादी-आजादी’ के नारे लगे हैं। हिंदू घृणा से सने कथित कॉमेडियन कुणाल कामरा जैसे इस प्रदर्शन को समर्थन के बहाने हिंदू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ कर चुके हैं।

इस प्रदर्शन को कवर करने के दौरान ऑपइंडिया के पत्रकार अनुराग मिश्रा भी इसी तरह के अनुभव से गुजर चुके हैं। जब वह सीजेपी समर्थकों से उनकी माँगों को लेकर बात कर रहे थे तो उन्हें घेरकर प्रदर्शनकारियों ने ‘गोदी मीडिया’ के नारे लगाने शुरू कर दिए थे।

अनुराग मिश्रा ने प्रदर्शनकारियों से केवल इतना पूछा था कि जब सीजेपी के सोशल मीडिया पर लाखों समर्थक होने का दावा किया जाता है, तो प्रदर्शन स्थल पर लोगों की संख्या इतनी कम क्यों है। इस सवाल से प्रदर्शनकारी नाराज हो गए और उन्होंने डराने-धमकाने की नीयत से नारेबाजी शुरू कर दी।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर सीजेपी का प्रदर्शन शुरू होने के बाद से कई पत्रकारों के साथ धक्का-मुक्की और बदसलूकी की घटना हो चुकी है। कई बार पुलिस को बीच-बचाव कर पत्रकारों को भीड़ से सुरक्षित निकालना पड़ा है। इन घटनाओं में एक समान पैटर्न देखने को मिला है। ‘गोदी मीडिया’ के नारे, पत्रकारों के सख्त सवालों पर गुस्सा, उन्हें घेर लेना और उनके साथ धक्का-मुक्की करना। ऐसे कई मामलों की रिपोर्ट ऑपइंडिया ने प्रकाशित की है। हालाँकि प्रदर्शन स्थल पर पुलिस बल की भारी मौजूदगी के कारण अब तक गंभीर हिंसा की स्थिति पैदा नहीं हुई है।

वामपंथी जमात ‘गोदी मीडिया’ का लेबल लगाकर उन पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को बदनाम करता है जो उनके भाजपा-हिंदू विरोधी नैरेटिव का समर्थन नहीं करते। इनका मानना है कि कोई पत्रकार तभी निर्भीक, पेशेवर और लोकतंत्र का पहरेदार माना जाएगा, जब वह वामपंथी वैचारिक लाइन का अनुसरण करें। ऐसा नहीं होने पर यदि उनकी सुरक्षा और गरिमा पर हमला होता है तो इसे वे ‘जनता का गुस्सा’, ‘वे इसके हकदार थे’ जैसी टिप्पणियों के जरिए जायज ठहराते हैं।

सीजेपी प्रदर्शनकारियों की भीड़ उन इस्लामी भीड़ से अलग नहीं है जो अतीत में पत्रकारों पर हमले में शामिल रही है। चाहे वक्फ संशोधन विधेयक के विरोध में प्रदर्शन हो, अवैध बूचड़खानों या गोहत्या पर सवाल उठाने का मामला हो, या ‘मुस्लिम विक्टिम’ नैरेटिव के विपरीत सवाल पूछने का मामला हो, पत्रकारों पर हमले हुए हैं।

वैसे कथित ‘गोदी मीडिया’ पत्रकारों के निशाना बनने पर लेफ्ट-लिबरल जमात की खुशी चौंकाती नहीं है। सीजेपी के इस प्रदर्शन में हम उमर खालिद जैसे लोगों के प्रति समर्थन भी देख चुके हैं जो 2020 के हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों की साजिश रचने के आरोपित हैं। सनद रहे कि इस दंगे की शुरुआत भी कथित ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन’ से ही हुई थी।

इस्लामी-वामपंथी समूह का सिद्धांत सरल है- हमारी भीड़ अच्छी, आपकी भीड़ बुरी। जब उनकी भीड़ हिंसा करे तो वह ‘न्याय’ है और उनसे सहमति न रखने वालों की हिंसा ‘नफरत और असहिष्णुता’ है।

संदेश स्पष्ट है- हमारे सुर में सुर मिलाओ या चुप रहो। ऐसा नहीं करने पर ‘हमारी भीड़’ चुप करा देगी।

बहुविवाह, हलाला और तीन तलाक पर लगेगा पूर्ण विराम: MP में UCC विधेयक को मोहन यादव कैबिनेट की हरी झंडी, जानिए बिल में है क्या-क्या प्रावधान

मध्य प्रदेश सरकार ने 19 जुलाई 2026 को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई विशेष कैबिनेट बैठक में ‘समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक, 2026’ को मंजूरी दे दी। विधानसभा से पारित होने और अधिसूचना के बाद ये लागू होगा।

इस पर मोहन सरकार का कहना है कि इस बिल का उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और पारिवारिक मामलों में समान नागरिक कानून लागू करना है। दिसंबर 2024 में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने UCC लागू करने की घोषणा की थी।

विधेयक में क्या-क्या प्रावधान है

इसके प्रमुख प्रावधानों में बहुविवाह पर प्रतिबंध, तलाक के लिए समान कानूनी प्रक्रिया, पुरुषों-महिलाओं में संपत्ति का समान अधिकार, उत्तराधिकार, विवाह का पंजीकरण गाँव के स्तर पर कराने और लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य पंजीकरण शामिल है। हालाँकि राज्य की जनजातीय आबादी को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है।

वैवाहिक व्यवस्था- सभी धर्मों और समुदायों में विवाह और तलाक का पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया है, जिसे ग्राम स्तर तक लागू किया जाएगा। यूसीसी विधेयक में साफ कहा गया है कि किसी भी नागरिक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं होगा, लेकिन विवाह व्यवस्था पर पूरा जोर है।

बहुविवाह पर रोक लगाई गई है, हालाँकि इसमें राज्य के जनजातीय लोगों को इस कानून में अपवाद रखा गया है। उनपर यह कानून लागू नहीं होगा। इसके अलावा कोई भी पुरुष या महिला एक से अधिक विवाह तभी कर सकता है, जब तलाक हो गया हो या पार्टनर की मौत हो गई हो।

लिव-इन रिलेशनशिप- विधेयक में लिव-इन रिलेशनशिप में सख्ती बरती गई है। लिव-इन में रहने वाले जोड़ों को अपना रजिस्ट्रेशन अनिवार्य रूप से कराना होगा। रजिस्ट्रेशन के बिना साथ रहने पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। रजिस्ट्रेशन कराने के लिए एक महीने तक का वक्त दिया गया है। ऐसे संबंधों से जन्मे बच्चों को वैध माना जाएगा। साथ ही महिला और बच्चों के भरण-पोषण के अधिकारों को स्पष्ट किया किया गया है।

महिला-पुरुष समान अधिकार- प्रावधान में महिलाओं के अधिकारों को साफ किया गया है। संपत्ति में महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार देने की बात कही गई है। यहाँ तक कि उत्तराधिकार के मामले में भी उन्हें समान माना गया है। यानी बेटा और बेटी दोनों को समान अधिकार हैं, वहीं पति-पत्नी को भी बराबरी का अधिकार है।

तीन तलाक और हलाला निकाह पर रोक- इन प्रथाओं को पूरी तरह से गैरकानूनी और दंडनीय अपराध बनाया गया है। सिर्फ ‘तलाक, तलाक, तलाक’ कह देने से तलाक वैध नहीं होगा। तलाक के लिए कानूनी प्रक्रिया अपनाना अनिवार्य होगा। इसी तरह निकाह हलाला पर ड्राफ्ट में रोक लगाई गई है। ड्राफ्ट में निकाह हलाला को अपराध की श्रेणी में रखने का प्रस्ताव है।

किन-किन लोगों ने मिलकर मसौदा तैयार किया

विधेयक का मसौदा तैयार करने से पहले सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की अगुवाई में समिति का गठन किया गया। इसके 6 सदस्य थे। समिति में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी शत्रुघ्न सिंह, कानूनी विशेषज्ञ अनूप नायर, शिक्षाविद गोपाल शर्मा और सामाजिक कार्यकर्ता बुद्धपाल सिंह शामिल थे। इसके अलावा सामान्य प्रशासन विभाग के अपर सचिव अजय कटेसरिया समिति के सचिव थे।

समिति ने उत्तराखंड और गुजरात जैसे राज्यों के यूसीसी मॉडल की गहराई से अध्ययन किया। इसके बाद मध्य प्रदेश की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए पूरा ड्राफ्ट बनाया। समिति को 60 दिनों के अंदर ड्राफ्ट बिल के साथ अपनी रिपोर्ट जमा करना था।

समिति ने जिला स्तर तक जनता से सुझाव लिया। समिति को करीब 9.58 लाख सुझाव मिले। सभी धर्मों से जुड़े सामाजिक संगठनों और राज्य के राजनीतिक दलों से बातचीत की, फिर विधेयक का मसौदा तैयार किया। मसौदे को मुस्लिम समाज का भी पूरा समर्थन मिला है। करीब 80 फीसदी मुस्लिम महिलाओं और 40 फीसदी मुस्लिम पुरुषों ने यूसीसी कानून लागू करने का समर्थन किया। अब मानसून सत्र में विधानसभा में इस विधेयक को पेश किया जा रहा है।

किन-किन राज्यों में यूसीसी लागू

गोवा देश का पहला राज्य है, जहाँ 1962 से ही पुर्तगाली नागरिक संहिता के रूप में यूसीसी लागू है। स्वतंत्र भारत में उत्तराखंड ऐसा पहला राज्य है जहाँ यूसीसी लागू किया गया। यहाँ 2024 में प्रस्ताव आया और जनवरी 2025 में यूसीसी को पूरी तरह लागू कर दिया गया। इसके बाद गुजरात विधानसभा ने मार्च 2026 में यूसीसी विधेयक पारित किया। असम भी यूसीसी विधेयक को लेकर चर्चा में रहा। यहाँ मई 2026 में असम विधानसभा ने यूसीसी विधेयक को मंजूरी दी।

इन सभी राज्यों के यूसीसी ड्राफ्ट में विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे मामलों के लिए सभी धर्मों के लिए एक समान नियम बनाए गए हैं। सभी राज्यों में लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया है। साथ ही उनके जन्में बच्चों को मान्यता दी गई है।

पुरुष और महिला को संपत्ति में बराबरी का अधिकार देते हुए बेटे-बेटियों को उत्तराधिकार के रूप में समान हक दिया गया है। इसके अलावा यूसीसी लागू करने वाले सभी राज्यों ने स्थानीय अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों को इस कानून से छूट दी है।

इसका असर सबसे ज्यादा मध्यप्रदेश में देखा जाएगा, क्योंकि यहाँ कि कुल आबादी का पाँचवाँ हिस्सा जनजातीय समुदाय का है। वहीं उत्तराखंड में जनजातीय आबादी काफी कम है, फिर भी उनकी संस्कृति की रक्षा करने के लिए संरक्षण दिया गया है।

असम और गुजरात में भी वहाँ के डेमोग्राफिक्स और स्थानीय स्थिति के अनुसार जनजातीय समुदाय को संरक्षण दिया गया है। उत्तराखंड स्वतंत्र भारत का पहला राज्य है जहाँ यह पूर्ण रूप से लागू हो चुका है। यहाँ यूसीसी नियमावली और ऑनलाइन पोर्टल भी शुरू हो चुका है।

गुजरात, असम और मध्यप्रदेश में इसे विधानसभा से पारित करने या लागू करने की प्रक्रिया चल रही है। कार्यान्वयन शुरू हो चुका है। सभी राज्यों में लिव-इन रजिस्ट्रेशन और विवाह रजिस्ट्रेशन न करने पर जुर्माना लगाया गया है। लेकिन रजिस्ट्रेशन की अवधि और जुर्माना राज्यों के हिसाब से अलग- अलग है। असम में बहुविवाह को अपराधिक काम माना गया है, वहीं उत्तराखंड और गुजरात में इसे केवल सिविल अपराध हैं। उत्तराखंड में लिव-इन का 30 दिन में रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है, जबकि गुजरात में यह समय-सीमा 60 दिन है। सभी राज्यों में यूसीसी से अनुसूचित जनजातियों को बाहर रखा गया है।

‘हिंदुओं के देवी-देवता खाते थे मांस और पीते थे शराब’: ध्रुव राठी की कंटेंट पर केंद्र सरकार सख्त, यूट्यूब से वीडियो हटाने के दिए निर्देश

सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले शिकायत अपील समिति (जीएसी) ने यूट्यूबर ध्रुव राठी को हिन्दू देवी-देवताओं पर किए गए विवादित वीडियो पर रोक लगा दी है और यूट्यूब को 24 घंटे के अंदर हटाने का निर्देश दिया है। समिति का मानना ​​है कि इस वीडियो से हिन्दू समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचा है। समिति ने यूट्यूब को लिखित आदेश प्राप्त होने के 24 घंटों के भीतर वीडियो हटाने के लिए कहा है।

यूट्यूबर ध्रुव राठी की ‘क्या हिंदू गोमांस खा सकते हैं?/ केरल स्टोरी 2 का पर्दाफाश’ शीर्षक वाला 21 मिनट का वीडियो 21 मार्च, 2026 को राठी की आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर अपलोड किया गया था। इसे लाखों बार देखा जा चुका है और चार लाख से अधिक लाइक मिल चुके हैं।

फिल्म ‘द केरल स्टोरी 2’ पर टिप्पणी करते हुए इस वीडियो में राठी ने हिंदुओं के खान-पान की बात की। गोमाँस के सेवन से जुड़ी संवेदनशीलता को दरकिनार करते हुए सांस्कृतिक विविधता और भारत में सामाजिक धारणाओं की चर्चा की। प्राचीन ग्रंथों, शास्त्रों और आधुनिक सर्वेक्षणों का हवाला देते हुए राठी ने दावा किया कि रामायण और महाभारत के पात्र अपने वनवास के दौरान हिरण के माँस सहित माँस और शराब का सेवन करते थे। इस दौरान उसने भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण और पांडवों का नाम लिया।

इस वीडियो के खिलाफ वकील अमित सचदेवा ने 22 मार्च 2026 को नई दिल्ली स्थित साइबर क्राइम सेल में शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद 23 मार्च को यूट्यूब के रेजिडेंट ग्रीवेंस अधिकारी के समक्ष औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई।

शिकायत में सचदेवा ने तर्क दिया कि ध्रुव राठी ने रामायण और महाभारत के चुनिंदा संदर्भों का उपयोग करते हुए मनगढंत तरीके से दावा किया कि श्री राम, श्री कृष्ण और पांडवों ने अपने वनवास के दौरान हिरण के माँस सहित दूसरे माँस और शराब का सेवन किया था। उन्होंने इन देवताओं के लिए सात्विक भोजन करने का मजाक उड़ाया और माँ सीता की कथित ‘प्रतिज्ञा’ का उल्लेख किया।

यूट्यूब ने वीडियो को लेकर और जानकारी माँगी और समीक्षा के बाद 25 मार्च को अनुरोध को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि कंटेंट स्थानीय कानूनों या उसके सामुदायिक दिशानिर्देशों का उल्लंघन नहीं करती है। प्लेटफॉर्म ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कम प्रचलित विचारों को व्यक्त करने के अधिकार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पर जोर दिया, साथ ही शिकायतकर्ता को सलाह दी कि यदि उसे लगता है कि वीडियो भारतीय कानून का उल्लंघन करता है तो वह उसे ब्लॉक कर दे या कोर्ट की शरण में जाए।

इसके बाद सचदेवा ने 27 मार्च 2026 को जीएसी के समक्ष अपील दायर की। दो महीने से अधिक समय तक अपील लंबित रहा। इसके बाद उन्होंने रिट याचिका के माध्यम से दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया। 3 जुलाई 2026 को दिल्ली हाई कोर्ट ने अपीलीय प्राधिकारी को मामले का शीघ्र निपटारा करने का निर्देश दिया, साथ ही आदेश की कॉपी 15 दिनों के भीतर कोर्ट में जमा करने का निर्देश दिया

जीएसी ने धार्मिक भावनाओं से जुड़े मामलों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तर्क को खारिज करते हुए यूट्यूब को अपना कंटेंट हटाने को कहा। समिति का कहना है कि इस वीडियो की जाँच से पता चलता है कि इससे एक समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँच सकता है। यह पूरे समाज के लिए भी अच्छा संकेत नहीं है।

इसमें इस बात पर जोर दिया गया कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(2) के तहत कुछ नियमों के अधीन है। जीएसी ने आगे बताया कि सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) अधिनियम 2021 के नियम 3(1)(घ) के तहत मध्यस्थों को सावधानी बरतने के लिए कहा गया है। समिति ने अदालत के आदेश के बिना प्लेटफॉर्म के कंटेंट नहीं हटाने पर आश्चर्य जताया।

जीएसी ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के कारण यूट्यूब को निर्देश दिया कि वह विवादित वीडियो को आदेश मिलने के 24 घंटों के भीतर हटा दें। राठी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के लिए सचदेवा ने साकेत की मजिस्ट्रेट अदालत में पहल की है, जो अभी तक लंबित है। इसकी अगली सुनवाई 10 सितंबर 2026 को होगी। जीएसी के निर्देश के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि मजिस्ट्रेट कोर्ट में राठी पर केस दर्ज हो सकता है।

सचदेवा ने सोशल मीडिया पर इस आदेश को साझा करते हुए इसे इस दिशा में उठाया गया कदम बताया। उन्होंने कहा, “कंटेंट क्रिएशन की आड़ में आस्था का मजाक नहीं उड़ाया जा सकता। न्याय चरणबद्ध तरीके से दिया जा रहा है।” दरअसल ऐसे मामले त्वरित निपटाया जाना चाहिए, क्योंकि जब तक इस पर बहस होती है, तब तक इसे लाखों लोग देख चुके होते हैं और यही कंटेंट क्रिएटर की चाह होती है। विवादित वीडियो बनाओ और अधिक से अधिक व्यूज पाओ।

सहाबुद्दीन मंडल का गैंग कराता था बंगाल में घुसपैठ, फिर दिल्ली-मुंबई-चेन्नई-बेंगलुरु तक फैल जाते बांग्लादेशी: जानिए- NIA कैसे तोड़ रहा इस सिंडिकेट की कमर

भारत और बांग्लादेश की सीमा पर सुरक्षा और अवैध घुसपैठ हमेशा से ही एक बेहद संवेदनशील और गंभीर मुद्दा रहा है। हाल ही में इस दिशा में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े कर दिए हैं।

NIA ने एक बड़े अंतरराष्ट्रीय मानव तस्करी सिंडिकेट के खिलाफ मामला दर्ज कर एक बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश किया है। इस सिंडिकेट द्वारा भारत-बांग्लादेश सीमा के कमजोर और बिना बाड़ वाले इलाकों का फायदा उठाकर बांग्लादेशी नागरिकों की अवैध रूप से भारत में एंट्री कराई जा रही थी।

इस मामले के सामने आने के बाद भारत-बांग्लादेश सीमा पर जल्द से जल्द पूरी तरह से बाड़ लगाने की माँग और भी ज्यादा तेज हो गई है। NIA की इस कार्रवाई से यह साफ हो गया है कि यह केवल अवैध घुसपैठ का मामला नहीं है, बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा को सेंध लगाने की एक बड़ी और सोची-समझी साजिश है।

मामले की पृष्ठभूमि और FIR की मुख्य बातें

इस पूरे मामले की शुरुआत बंगाल पुलिस की कार्रवाई से हुई थी। 27 मई 2026 को पश्चिम बंगाल पुलिस ने उत्तर 24 परगना जिले के बनगाँव थाने में एक FIR दर्ज की थी। यह मामला बनगाँव थाने के सब-इंस्पेक्टर बिल्टू मित्रा की शिकायत पर स्वतः संज्ञान लेते हुए दर्ज किया गया था।

पुलिस की शुरुआती जाँच के बाद, मामले की गंभीरता, इसके अंतर-राज्यीय फैलाव और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को देखते हुए केंद्र सरकार ने इसे एक बेहद गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा माना। इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) के CTCR डिवीजन ने 1 जुलाई 2026 को आदेश के तहत इस केस की जाँच NIA को सौंप दी।

गृह मंत्रालय के अंडर सेक्रेटरी विमल कुमार शुक्ला के निर्देश पर कार्रवाई करते हुए NIA ने 3 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में इस केस को री रजिस्टर किया। इस मामले की मुख्य जाँच अधिकारी के रूप में कोलकाता की DSP प्रियंका शर्मा को नियुक्त किया गया है।

इस मामले में आरोपितों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 143(1), 143(3), 144(2) और 61(2) के साथ-साथ इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट, 2025 की धारा 24 के तहत मामला दर्ज किया गया है।

सिंडिकेट का मास्टरमाइंड और उसके सहयोगी

NIA की FIR में इस पूरे अवैध मानव तस्करी रैकेट के मास्टरमाइंड और उसके करीबियों को नामजद किया गया है। इस सिंडिकेट का मुख्य आरोपित सहाबुद्दीन मंडल है, सहाबुद्दीन मंडल एक शातिर अपराधी है, जिसे पुलिस ने इस FIR से कुछ दिन पहले 13 मई 2026 को एक अन्य मामले में BNS की धारा और आर्म्स एक्ट के तहत गिरफ्तार किया था और वह पुलिस रिमांड पर था।

सहाबुद्दीन मंडल के साथ इस रैकेट में उसके कई स्थानीय सहयोगी भी शामिल हैं, जो सीमा से लेकर रेलवे स्टेशन तक अलग-अलग भूमिकाएँ निभाते थे। इस मामले में मुख्य आरोपित सहाबुद्दीन मंडल के अलावा भीरा के दुखे उर्फ हारुन रशीद को नामजद किया गया है, जिसका काम घुसपैठियों को गाड़ी से हावड़ा स्टेशन पहुँचाना था।

वहीं हावड़ा रेलवे स्टेशन क्षेत्र से राजू को आरोपित बनाया गया है, जो घुसपैठियों के लिए आगे के सफर के लिए ट्रेन टिकटों की व्यवस्था करता था। सीमा पर घुसपैठ कराने और अवैध रूप से सीमा पार कराने की जिम्मेदारी बागदा पुलिस स्टेशन के अंतर्गत रॉन्गहाट/रौनाघाट निवासी राणा, खैरुल और अजारुल की थी, जबकि धनताला पुलिस स्टेशन के अंतर्गत कुलगाछी के रहने वाले राशेद को भी सीमा पार कराने में सहयोग करने के आरोप में नामजद किया गया है।

कैसे काम करता था घुसपैठ और तस्करी का रूट मैप?

जाँचकर्ताओं और स्थानीय पुलिस की पूछताछ में इस सिंडिकेट के काम करने के बेहद व्यवस्थित और संगठित तरीके का पता चला है, जो पिछले कुछ वर्षों से लगातार सक्रिय था और उसने एक मजबूत ट्रांजिट रूट तैयार कर लिया था।

इस नेटवर्क के तहत सबसे पहले राणा, खैरुल, अजारुल और राशेद जैसे आरोपित भारत-बांग्लादेश सीमा के बनगाँव और बागदा पुलिस स्टेशन क्षेत्रों में स्थित उन हिस्सों की पहचान करते थे जहाँ बाड़ नहीं लगी है।

इन असुरक्षित और अनगार्डेड रास्तों, जैसे भीरा और उसके आस-पास के इलाकों से बांग्लादेशी नागरिकों  को भारतीय सीमा में प्रवेश कराया जाता था और इसके बदले में सिंडिकेट इन लोगों से भारी-भरकम रकम वसूलता था। सीमा पार कराने के तुरंत बाद, इन बांग्लादेशी नागरिकों को आगे की यात्रा के लिए मुख्य सरगना सहाबुद्दीन मंडल को सौंप दिया जाता था।

इसके बाद सहाबुद्दीन का एक और साथी, दुखे उर्फ हारुन रशीद, स्थानीय स्तर पर किराए की कारों की व्यवस्था करता था और इन गाड़ियों में छिपाकर इन अवैध घुसपैठियों को सड़क मार्ग के जरिए बनगाँव से सीधे हावड़ा रेलवे स्टेशन भेजा जाता था।

हावड़ा स्टेशन पर मौजूद उनका सहयोगी राजू इन लोगों को रिसीव करता था और देश के अलग-अलग बड़े शहरों के लिए रेलवे टिकटों का इंतजाम करता था, जिससे ट्रेन टिकट मिलते ही इन घुसपैठियों को बेहद तेजी से भारत के अलग-अलग कोनों में भेज दिया जाता था ताकि वे सुरक्षा एजेंसियों की नजरों में न आएँ।

महानगरों में अवैध नेटवर्क: कहाँ भेजे जा रहे थे घुसपैठिए?

NIA की जाँच के अनुसार, यह नेटवर्क केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके तार देश के लगभग सभी बड़े आर्थिक और प्रशासनिक केंद्रों से जुड़े हुए थे। हावड़ा रेलवे स्टेशन से ट्रेन टिकट बुक कराकर इन बांग्लादेशी नागरिकों को दिल्ली, मुंबई, पुणे, सूरत, चेन्नई, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे देश के प्रमुख महानगरों में भेजा जा रहा था।

जाँच एजेंसियों का कहना है कि इन शहरों में ले जाकर इन लोगों को अवैध श्रम और अनैतिक गतिविधियों सहित कई तरह के गैर-कानूनी कामों में धकेला जा रहा था। इतने बड़े शहरों में इतनी तेजी से घुसपैठियों का घुल-मिल जाना सुरक्षा के लिहाज से बड़ा खतरा है।

राष्ट्रीय सुरक्षा पर मंडराता खतरा और अंतरराष्ट्रीय साजिश की आशंका

NIA ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया है और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा प्रबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती बताया है। जिस आसानी से यह सिंडिकेट बिना बाड़ वाले इलाकों से देश के भीतर लोगों को ला रहा था और उन्हें देश के अलग-अलग महानगरों में फैला रहा था, वह सीमा सुरक्षा में मौजूद बड़ी कमियों को उजागर करता है।

अधिकारियों को संदेह है कि यह गिरोह केवल कुछ लोगों का एक स्थानीय ग्रुप नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बहुत बड़ी अंतरराष्ट्रीय साजिश काम कर रही है। इस बात की पूरी आशंका है कि सीमा के दोनों तरफ  कई बड़े प्रभावशाली लोग और पैसे से मदद करने वाले  इस रैकेट को हवा दे रहे हैं।

NIA अब इस नेटवर्क के वित्तीय लेन-देन, हवाला नेटवर्क और विदेशी संपर्कों की गहराई से जाँच कर रही है ताकि इस पूरे इकोसिस्टम को समूल नष्ट किया जा सके।

सीमा पर बाड़ लगाने की माँग और राजनीतिक हलचल

इस मामले के सामने आने के बाद पश्चिम बंगाल में सीमा सुरक्षा और बुनियादी ढाँचे को लेकर एक बार फिर से राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी बहस तेज हो गई है। सुरक्षा एजेंसियाँ लंबे समय से यह माँग करती रही हैं कि घुसपैठ, तस्करी और मानव व्यापार को रोकने का एकमात्र पुख्ता जरिया पूरी सीमा पर अभेद्य बाड़ लगाना ही है।

पश्चिम बंगाल में इस दिशा में प्रशासनिक कदम भी उठाए गए हैं। राज्य प्राधिकारियों के अनुसार, मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सरकार ने सत्ता संभालने के बाद से अब तक सीमा सुरक्षा बल (BSF) को बाड़ लगाने के काम में तेजी लाने के लिए लगभग 1025 एकड़ भूमि सौंप दी है।

इसके अलावा सीमा सुरक्षा की समीक्षा करने और बाड़ लगाने के काम की प्रगति का जायजा लेने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का भी पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों का दौरा प्रस्तावित है।

जब सोनम वांगचुक को उठाकर ले गई दिल्ली पुलिस, तब ‘समलैंगिक’ प्रवक्ता के घर थे अभिजीत दिपके: जानें कौन हैं अनीश गावंडे, शरद पवार की पार्टी से क्या है कनेक्शन

एनसीपी (शरदचंद्र पवार) के प्रवक्ता अनीश गावंडे ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे ‘एक्टिविस्ट’ सोनम वांगचुक को हटाने की दिल्ली पुलिस की कार्रवाई की निंदा की है। 18 जुलाई को दिल्ली पुलिस ने वांगचुक को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के धरना स्थल से हटाया था। वह करीब 20 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे थे। गावंडे ने लोगों से बड़ी संख्या में प्रदर्शन में शामिल होने की अपील भी की।

गावंडे ने दावा किया कि प्रदर्शन स्थल से सोनम वांगचुक को हटाना दरअसल उनकी ‘गिरफ्तारी’ थी। उनका आरोप था कि पुलिस ने बिना कोई कारण बताए और बिना किसी लिखित आदेश के यह कार्रवाई की। हालाँकि, दिल्ली पुलिस ने वांगचुक को प्रदर्शन स्थल से हटाकर उनकी बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया था।

इसके बाद गावंडे ने यह भी दावा किया कि पुलिस की यह कार्रवाई वांगचुक की सेहत की चिंता की वजह से नहीं की गई बल्कि इसका मकसद चल रहे प्रदर्शन को बाधित करना था।

अनीश गावंडे को किसी राजनीतिक दल का पहला खुले तौर पर समलैंगिक (ओपनली गे) प्रवक्ता बनाए जाने के कारण भी पहचान मिली थी। उन्होंने खुलकर CJP के प्रदर्शन का समर्थन किया है और उससे जुड़े रहे हैं। जब पुलिस सोनम वांगचुक को प्रदर्शन स्थल से हटा रही थी, उसी दौरान CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके कपड़े बदलने के लिए गावंडे के घर गए हुए थे। इसी दौरान पुलिस ने दिपके को कुछ समय के लिए हिरासत में लिया था।

गावंडे ने आरोप लगाया कि जब अभिजीत दिपके उनके घर की सीढ़ियों पर थे, तभी पुलिसकर्मियों ने उन्हें हिरासत में लिया और उनके साथ मारपीट की। उन्होंने यह भी दावा किया कि पुलिस की पिटाई के चलते दिपके जोर-जोर से चिल्ला रहे थे।

कौन है अनीश गावंडे?

मीडिया रिपोर्ट्स में मौजूद जानकारी के अनुसार, अनीश गावंडे स्वतंत्रता सेनानी, वकील और प्रसिद्ध शिक्षाविद टी. के. टोपे के परिवार से आते हैं। उनका पालन-पोषण मुंबई में हुआ। उन्होंने वर्ली के ग्रीनलॉन्स स्कूल और फोर्ट स्थित कैथेड्रल एंड जॉन कॉनन स्कूल से पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी से तुलनात्मक साहित्य (Comparative Literature) की पढ़ाई की। बाद में रोड्स स्कॉलर (Rhodes Scholar) के रूप में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से बौद्धिक इतिहास (Intellectual History) और लोक नीति (Public Policy) में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की।

राजनीति में आने से पहले अनीश गावंडे LGBTQ+ अधिकारों के कार्यकर्ता और लेखक रहे हैं। उन्होंने पिंक लिस्ट इंडिया की भी स्थापना की जो LGBTQ+ अधिकारों का समर्थन करने वाले नेताओं का एक डेटाबेस है।

अपनी समलैंगिक (गे) पहचान सार्वजनिक करने के बाद गावंडे ने फ्रैंकोफोन पश्चिम अफ्रीका और सेनेगल की भाषाई राजनीति पर अध्ययन किया। उनका इरादा अकादमिक क्षेत्र में प्रोफेसर बनने का था। हालाँकि, 2018 में उन्हें भारत में एक चुनावी अभियान से जुड़ने का अवसर मिला, जिसके बाद उन्होंने राजनीति की ओर रुख किया। अगस्त 2024 में उन्हें एनसीपी (शरदचंद्र पवार) का राष्ट्रीय प्रवक्ता नियुक्त किया गया।

गावंडे क्षैतिज आरक्षण (Horizontal Reservation) के समर्थक हैं। उनका मानना है कि जाति आधारित आरक्षण के साथ-साथ खेल कोटा, महिलाओं और दिव्यांगों जैसी श्रेणियों के लिए भी क्षैतिज आरक्षण का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए। उनका यह भी मानना है कि देश में भेदभाव की समस्या को दूर करने के लिए एक व्यापक भेदभाव-विरोधी कानून बनाया जाना चाहिए।

हाल ही में अनीश गावंडे ने खालिस्तानी प्रोपेगेंडा फिल्म ‘सतलुज’ का समर्थन किया था। यह फिल्म रिलीज के तुरंत बाद Zee5 ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटा दी गई थी।

फिल्म के समर्थन में इंस्टाग्राम पर लिखी एक पोस्ट में गावंडे ने कहा था, “दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’ जिसमें उन्होंने मानवाधिकार जांचकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की भूमिका निभाई है, भारतीय स्क्रीन पर केवल 48 घंटे ही रह सकी और फिर उसे ‘अगली सूचना तक’ चुपचाप हटा दिया गया। जिन लोगों को गायब कर दिया गया, उन पर बनी एक फिल्म भी गायब कर दी गई।”

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ा जा सकता है)

डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ से परेशान हुआ US, अमेरिकियों को मिल रहा घटिया क्वालिटी का सामान: जानिए IMF रिसर्च ने और क्या बताया

डोनाल्ड ट्रंप की महत्वाकांक्षी टैरिफ (टैक्स) नीति खुद अमेरिकी अर्थव्यवस्था और वहाँ के आम नागरिकों के लिए बड़ी मुसीबत बन गई है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अर्थशास्त्रियों की एक नई रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, इन भारी-भरकम शुल्कों से विदेशी निर्यातकों पर कोई असर नहीं पड़ा, बल्कि अमेरिकी खरीदारों को अब महँगे दामों पर घटिया क्वॉलिटी का सामान खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

दरअसल, जब साल 2025 में ये टैक्स लगाए गए थे, तब दावा किया गया था कि विदेशी कंपनियाँ अमेरिकी बाजार में टिके रहने के लिए अपने दाम कम कर देंगी और इससे अमेरिका में रोजगार बढ़ेंगे। लेकिन आईएमएफ (IMF) के अर्थशास्त्रियों जेबीन आन, लोरेंजो रोटुनो और मिशेल रूटा ने जब अमेरिकी सीमा शुल्क और सेंसस ब्यूरो के आँकड़ों की बारीकी से जाँच की, तो सच कुछ और ही निकला। इस रिसर्च ने यह साबित कर दिया है कि ट्रंप की हाई रेसिप्रोकल टैरिफ नीति अपने उद्देश्यों में न केवल विफल रही है, बल्कि उसने अमेरिकी बाजार को सस्ते और निम्न गुणवत्ता वाले उत्पादों का डंपिंग ग्राउंड बनाने की शुरुआत कर दी है।

IMF पेपर का स्क्रीनशॉट

विदेशी निर्यातकों ने कीमतें घटाने से साफ इनकार

आर्थिक सिद्धांतों के अनुसार, जब कोई बड़ा देश किसी आयातित वस्तु पर भारी शुल्क लगाता है, तो अगर उस देश की बाजार में धाक (मोनोप्सोनी पावर) हो, तो विदेशी निर्यातक अपनी वस्तुओं की मूल कीमतों में कटौती कर लेते हैं ताकि वे प्रतिस्पर्धी बने रह सकें। इसे अर्थशास्त्र में ‘टैरिफ एब्जॉर्प्शन’ या निर्यातकों द्वारा लागत का बोझ उठाना कहा जाता है। ट्रंप प्रशासन को भी यही उम्मीद थी कि चीन, मैक्सिको, कनाडा और यूरोपीय संघ जैसे बड़े हिस्सेदार अमेरिकी बाजार में टिके रहने के लिए अपने उत्पादों के दाम घटाएंगे।

लेकिन आईएमएफ के बारीक प्रॉडक्ट-लेवल डेटा विश्लेषण से जो बात सामने आई है, वह इसके बिल्कुल विपरीत है। विदेशी निर्यातकों ने अमेरिकी टैरिफ के जवाब में अपनी कीमतों में कोई कटौती नहीं की। यदि उत्पाद के स्तर पर सबसे सूक्ष्म ‘वेरायटी’ (यानी किसी खास देश से आने वाला विशिष्ट उत्पाद) की जाँच की जाए, तो शुल्क हटाने के बाद की कीमतें (Duty-Exclusive Prices) लगभग वैसी ही बनी रहीं जैसी टैरिफ लागू होने से पहले थीं।

IMF द्वारा जारी किया गया चार्ट

इसका सीधा और साफ मतलब यह है कि ट्रंप द्वारा लगाए गए टैक्स का पूरा का पूरा बोझ अमेरिकी आयातकों (Importers) और अंततः वहाँ के आम उपभोक्ताओं की जेब पर ट्रांसफर हो गया।

इस रिसर्च पेपर के सामने आने के बाद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की पूर्व डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर गीता गोपीनाथ ने सोशल मीडिया पर बयान जारी करते हुए लिखा, “टैरिफ से अभी भी कोई अच्छी खबर नहीं है। नए शोध से पता चलता है कि टैरिफ के कारण अमेरिका द्वारा आयात किए जाने वाले उत्पादों की गुणवत्ता में भारी गिरावट आई है। सीधे शब्दों में कहें तो, टैरिफ ने निर्यात की कीमतों को कम करने में बहुत कम काम किया और इसके बजाय हम सस्ते, कम गुणवत्ता वाले आयात की ओर मुड़ गए। उच्च कीमतों का भुगतान करने के अलावा सामान की गुणवत्ता भी घट गई है।”

महँगे लेकिन अच्छे सप्लायर्स OUT, सस्ते और घटिया सप्लायरों की एंट्री

अब सवाल यह उठता है कि यदि व्यक्तिगत स्तर पर वस्तुओं की कीमतें नहीं घटीं, तो फिर अमेरिका के कुल आयात मूल्य (Import Bill) में जो थोड़ी-बहुत गिरावट या बदलाव दिखाई दे रहा है, उसकी असली वजह क्या है? आईएमएफ के शोधकर्ताओं ने इसके पीछे एक बेहद जटिल और महत्वपूर्ण आर्थिक प्रक्रिया को उजागर किया है, जिसे ‘इंपोर्ट रीएलोकेशन’ (आयात का पुनर्वितरण) कहा जाता है।

जब अमेरिका ने कुछ खास देशों या उत्पादों पर भारी शुल्क लगाया, तो उन देशों से आने वाले बेहतरीन और उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद अमेरिकी आयातकों के लिए बहुत महँगे हो गए। परिणामस्वरूप अमेरिकी कंपनियों ने उन स्थापित, ब्रांडेड और उच्च कीमत वाले सप्लायर्स से नाता तोड़ना या कम करना शुरू कर दिया। उनके स्थान पर आयातकों ने ऐसे नए देशों और सप्लायर्स की खोज की जिन पर टैरिफ की मार कम थी या जिनके उत्पाद बुनियादी रूप से बहुत सस्ते थे।

इस शोध के आँकड़े बताते हैं कि अध्ययन की अवधि के दौरान अमेरिका की औसत प्रभावी टैरिफ दरें लगभग 8 प्रतिशत बढ़ गईं। इस बढ़ोतरी के कारण कुल आयात मात्रा में करीब 3.6% की गिरावट दर्ज की गई। लेकिन सबसे बड़ा खेल प्रॉडक्ट बास्केट के भीतर हुआ। टैरिफ बढ़ने के बाद अधिक कीमत और उच्च गुणवत्ता वाले सप्लायर्स के अमेरिकी बाजार छोड़ने की संभावना नाटकीय रूप से बढ़ गई, जबकि कम कीमत वाले नए सप्लायर्स ने बड़ी तेजी से अमेरिकी बाजार में एंट्री मारी। आईएमएफ के अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि कीमतों में जो भी थोड़ी-बहुत गिरावट या स्थिरता ऊपरी तौर पर दिखाई दे रही है, उसमें से लगभग 65% की वजह सप्लायर्स बदलने का यही पैटर्न था।

गुणवत्ता में गिरावट की कड़वी सच्चाई का ‘अपील स्कोर’ में हुआ खुलासा

ट्रंप प्रशासन इस बात की पीठ थपथपा सकता था कि सप्लायर्स बदलने से अमेरिका को कम कीमत पर सामान मिल रहा है, लेकिन आईएमएफ की रिसर्च ने इस भ्रामक खुशी को भी एक बड़े झटके में बदल दिया है। रिसर्चर्स का स्पष्ट तर्क है कि कम कीमत का मतलब हमेशा बेहतर मूल्य या बचत नहीं होता। यह बचत केवल इसलिए दिख रही है क्योंकि अमेरिका अब घटिया उत्पाद खरीद रहा है।

शोधकर्ताओं ने साल 2023 और 2024 के बेसलाइन डेटा का उपयोग करके विभिन्न देशों के उत्पादों का एक ‘अपील स्कोर’ (Product Appeal Score) तैयार किया था। उपभोक्ता माँग के सिद्धांतों के तहत जो उत्पाद ऊँची कीमत के बावजूद बाजार में अपनी मजबूत हिस्सेदारी बनाए रखते हैं, उनका अपील स्कोर अधिक माना जाता है क्योंकि उपभोक्ता उनकी गुणवत्ता, टिकाऊपन और ब्रांड वैल्यू को पसंद करते हैं। जब आईएमएफ ने 2025 के टैरिफ के बाद आए नए सप्लायर्स के उत्पादों के अपील स्कोर की जाँच की तो पाया कि अमेरिकी आयातकों को आकर्षित करने वाले इन नए सप्लायर्स का स्कोर बेहद खराब था।

जब इन गुणवत्ता संबंधी अंतरों को सांख्यिकीय मॉडलों में शामिल किया गया, तो कीमतों में दिखने वाला सारा का सारा फायदा हवा हो गया। आईएमएफ के अध्ययन का अनुमान है कि 2025 के टैरिफ के बाद कीमतों में देखी गई तथाकथित गिरावट का लगभग आधा हिस्सा (तकरीबन 50%) असल में कुछ और नहीं, बल्कि उच्च गुणवत्ता से निम्न गुणवत्ता यानी कम-क्वालिटी वाले सप्लायर्स की ओर मजबूरन किया गया झुकाव था।

साल 2024-25 और 2017-19 के टैरिफ एपिसोड के दौरान विभिन्न उत्पादों के भीतर शुल्क दरों में आए उतार-चढ़ाव का विश्लेषण, फोटो साभार: IMF Report

दिलचस्प बात यह है कि इंपोर्ट का यह पैटर्न पहली बार नहीं देखा जा रहा है। आईएमएफ के अर्थशास्त्रियों ने अपने शोध में साल 2018-19 के दौरान हुए प्रसिद्ध अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध (US-China Tariff Tension) के डेटा की भी दोबारा पड़ताल की। उस दौरान भी ट्रंप ने चीन पर भारी टैरिफ लगाए थे। तब भी यह देखा गया था कि चीन के निर्यातकों ने अपनी कीमतें कम नहीं की थीं, बल्कि अमेरिकी खरीदार वियतनाम, ताइवान और अन्य दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों की ओर स्थानांतरित हो गए थे।

साल 2018-19 और 2025 के इन दोनों आर्थिक झटकों की तुलना करने पर यह साफ हो जाता है कि टैरिफ का असर निर्यातकों की जेब पर पड़ने के बजाय हमेशा आयात बास्केट की संरचना को बिगाड़ने में होता है। 2018-19 में जहाँ केवल चीन को निशाना बनाया गया था, इसलिए रीएलोकेशन का दायरा थोड़ा सीमित था, वहीं 2025 के टैरिफ अधिक व्यापक और अनिश्चितता से भरे थे। इसके बावजूद, बुनियादी आर्थिक व्यवहार नहीं बदला, बल्कि दोनों ही बार अमेरिकी आयातकों को अंततः निम्न गुणवत्ता वाले इनपुट और उत्पादों की शरण में जाना पड़ा।

अमेरिका पर ही मंडरा रहा लंबे समय का खतरा

यह स्थिति सिर्फ आम उपभोक्ताओं द्वारा रोजमर्रा के इस्तेमाल में लाए जाने वाले कपड़ों, जूतों या इलेक्ट्रॉनिक्स की घटिया क्वॉलिटी तक सीमित नहीं है। इसका एक अधिक खतरनाक पहलू अमेरिकी विनिर्माण क्षेत्र की उत्पादकता (Productivity) से जुड़ा है। अमेरिका में आयात होने वाले सामान का एक बहुत बड़ा हिस्सा कच्चा माल, मध्यवर्ती वस्तुएँ (Intermediate Goods) और पूँजीगत उपकरण (Capital Goods) होते हैं, जिनका उपयोग अमेरिकी फैक्ट्रियाँ अपने अंतिम उत्पाद बनाने के लिए करती हैं।

जब अमेरिकी फैक्ट्रियाँ टैरिफ के डर से उच्च गुणवत्ता वाले पुराने सप्लायर्स को छोड़कर सस्ते और कम अपील स्कोर वाले नए सप्लायर्स से मशीनरी या पुर्जे आयात करती हैं, तो उनकी खुद की उत्पादन क्षमता और उत्पाद की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। औद्योगिक सर्वेक्षणों के अनुसार, विनिर्माण क्षेत्र के अधिकांश गुणवत्ता प्रबंधकों (Quality Leaders) ने स्वीकार किया है कि टैरिफ और व्यापारिक बाधाओं के कारण उनके लिए अपने अंतिम उत्पादों की गुणवत्ता बनाए रखना बेहद कठिन हो गया है।

उदाहरण के लिए, कपड़ा और परिधान उद्योग में स्थापित सप्लायर्स से हटकर नए देशों में ट्रांसफर की गई सप्लाई चेन के कारण शिपमेंट में डिफेक्ट (खामियों) की दरें तेजी से बढ़ी हैं। इसका सीधा नुकसान अमेरिकी कंपनियों को उठाना पड़ रहा है, क्योंकि उनके उत्पाद वैश्विक बाजार में अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता खो रहे हैं।

डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों में संरक्षणवाद की नीतिगत विफलता का सबक

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की इस रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि डोनाल्ड ट्रंप की यह नीति खुद अमेरिका के पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसी साबित हुई है। ऐसे में ट्रंप की टैरिफ नीति ‘अँधेरे में तीर चलाने’ जैसी साबित हुई है, जिसका निशाना दुश्मन पर नहीं बल्कि खुद के पैरों पर लगा है। बाहरी देशों को सबक सिखाने के चक्कर में इस नीति ने खुद अमेरिका के बाजार को बिगाड़ दिया है। सस्ते और घटिया सामानों पर निर्भरता भले ही कागजों पर आयात का खर्च थोड़ा कम दिखा दे, लेकिन लंबे समय में यह देश की अर्थव्यवस्था को खोखला कर रही है।

आईएमएफ का यह वर्किंग पेपर दुनिया भर के नीति निर्माताओं के लिए एक कड़ा सबक है कि संरक्षणवाद की दीवारें अक्सर बाहर के दुश्मनों को रोकने के बजाय, भीतर की आर्थिक खुशहाली और उत्पाद की गुणवत्ता का दम घोंट देती हैं। ट्रंप के टैरिफ ने अमेरिका को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय, अनजाने में एक ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है जहाँ महँगाई और घटियापन एक साथ उसकी अर्थव्यवस्था का स्वागत कर रहे हैं। यह पूरी दुनिया के लिए सबक है कि संरक्षणवाद (अपने बाजार को बंद करने) की दीवारें अक्सर फायदे के बजाय खुद का ही दम घोंट देती हैं।

वांगचुक OUT, वामपंथी IN… ‘एक्टिविस्ट’ के जाते ही CJP के मंच पर डफली गैंग का कब्जा, जानें- कौन है व्हीलचेयर वाली AISA की नेहा बोरा और उसके साथी

शिक्षा व्यवस्था में सुधारों और परीक्षाओं में गड़बड़ी के खिलाफ शुरू हुआ ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) का आंदोलन अब एक नया मोड़ ले चुका है। 20 दिनों से अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस द्वारा सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराए जाने के बाद, जंतर-मंतर पर चल रहे इस प्रदर्शन की कमान पूरी तरह से ‘डफलीबाज गैंग’ यानी वामपंथी छात्र संगठनों (AISA और SFI) के हाथों में आती दिख रही है।

एक तरफ जहाँ गैर-राजनीतिक होने का दावा करने वाले इस आंदोलन को फ्रंट से लीड करने के लिए वामपंथी नेता आगे आ गए हैं, वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया और प्रदर्शन स्थल पर इन लीडर्स के ‘फर्जी अनशन’ और ‘पर्दे के पीछे के ड्रामे’ को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

सोनम वांगचुक के जाते ही फ्रंट पर आए AISA के चेहरे

अब तक इस आंदोलन को गैर-राजनीतिक बनाए रखने की कोशिश की जा रही थी, लेकिन जैसे ही शनिवार (18 जुलाई 2026) सुबह को सोनम वांगचुक को खराब स्वास्थ्य के कारण दिल्ली हाई कोर्ट के आदेशानुसार सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया, इतने ही पर्दे के पीछे सक्रिय वामपंथी संगठनों ने मंच पर कब्जा जमा लिया।

विशेष रूप से ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) के तीन बड़े चेहरे नेहा बोरा, अमीन अमितोज और मनीष कुमार जो जेएनयू (JNU), आंबेडकर यूनिवर्सिटी दिल्ली (AUD) और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के PhD स्कॉलर्स हैं, अब खुद को आंदोलन का मुख्य चेहरा साबित करने में जुटे हैं।

इनका दावा है कि वे सोनम वांगचुक के साथ ही पिछले 21 दिनों से अनशन पर बैठे हैं। लेकिन प्रदर्शन स्थल पर मौजूद लोग और सोशल मीडिया पर आ रही जानकारियाँ कुछ और ही कहानी बयाँ कर रहे हैं।

अनशन या महज राजनीतिक प्रोपेगेंडा?

जब से AISA की नेहा बोरा की अनशन पर सवाल उठे हैं और उनके बेनकाब होने की बातें सामने आई हैं, तब से प्रदर्शन स्थल पर एक नया ड्रामा देखने को मिल रहा है। खुद को सचमुच 21 दिनों से भूखा दिखाने के लिए अब वह व्हीलचेयर का सहारा ले रही हैं, ताकि यह प्रदर्शित किया जा सके कि वह चलने-फिरने में भी असमर्थ हैं।

गंभीर विरोधाभास तब सामने आया जब सरकारी डॉक्टरों की टीम इन AISA सदस्यों का मेडिकल चेक-अप करने पहुँची। 21 दिनों से अनशन का दावा करने वाले इन छात्र नेताओं ने सरकारी डॉक्टरों से इलाज कराने से साफ इनकार कर दिया। इस इनकार ने आंदोलन की साख पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।

रात में मटन बिरयानी और सीख कबाब का गुप्त मेन्यू

प्रदर्शन स्थल के आस-पास से सामने आए वीडियोज के हवाले से यह दावा किया जा रहा है कि इन वामपंथियों का अनशन महज दिन के उजाले और कैमरों के सामने तक ही सीमित है। कई ऐसे वीडियो सामने आए है जिनमें ये तथाकथित अनशनकारी रात के अंधेरे में अपनी अनशन तोड़ते हुए मटन बिरयानी और सीख कबाब का लुत्फ उठाते देखे गए हैं।

यही वजह है कि दिल्ली पुलिस ने इन्हें अस्पताल ले जाने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई, क्योंकि इनका स्वास्थ्य सोनम वांगचुक की तरह वास्तव में गंभीर नहीं था। यहाँ तक कि खुद को आंदोलन का कर्ता-धर्ता बताने वाले इन लीडर्स को लेकर प्रदर्शनकारियों के बीच ही फूट पड़ गई है।

अनशन पर बैठे 3 AISA लीडर्स: कौन हैं ये चेहरे और क्या हैं इनके दावे?

सोनम वांगचुक के हटने के बाद, आंदोलन के केंद्र में आए वामपंथी छात्र संगठन AISA के तीनों मुख्य लीडर्स देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से जुड़े छात्र हैं, जो पिछले 21 दिनों से इस अनशन का मुख्य चेहरा होने का दावा कर रहे हैं।

नेहा बोरा जेएनयू से PhD की छात्रा है और AISA की एक सक्रिय सदस्य है। आंदोलन के शुरुआती दिनों से ही वह मंच के आस-पास सक्रिय थी। हाल ही में सोशल मीडिया पर उनके फर्जी अनशन के खुलासे के बाद वे भारी विवादों में घिर गई हैं।

आलोचकों का दावा है कि अपनी अनशन को सच साबित करने और सहानुभूति बँटोरने के लिए वे अब व्हीलचेयर का इस्तेमाल कर रही हैं, जबकि डॉक्टरों की जाँच से वे लगातार बच रही हैं।

अंबेडकर यूनिवर्सिटी का PhD स्कॉलर अमीन अमितोज भी नेहा के साथ 21 दिनों से अनशन पर बैठने का दावा कर रहा है। प्रदर्शन स्थल पर मौजूद वॉलंटियर डॉक्टरों के मुताबिक, लंबे समय तक भूखे रहने के दावों के बीच अमीन के मसूड़ों से खून आने की शिकायत सामने आई है, जिसे डॉक्टर विटामिन-C और प्रोटीन की भारी कमी या लीवर को हो रहे नुकसान का संकेत मान रहे हैं। हालाँकि सरकारी मेडिकल टीम के सामने इसने भी स्वास्थ्य परीक्षण कराने से इनकार कर दिया।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ताल्लुक रखने वाला PhD स्कॉलर मनीष कुमार इस तिकड़ी का तीसरा सदस्य है। दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए मनीष ने कहा था, “जब पुलिस ने सोनम वांगचुक को उठाया, तो उन्होंने हमें भी पकड़ने की कोशिश की, लेकिन भीड़ ने हमें घेर लिया।” मनीष की स्थिति भी अमीन की तरह ही बताई जा रही है, जहाँ शरीर में पोषक तत्वों की भारी कमी के लक्षण दिख रहे हैं।

हालाँकि एक तरफ प्राइवेट डॉक्टरों द्वारा इन्हें गंभीर रूप से बीमार बताया जाना और दूसरी तरफ सरकारी डॉक्टरों को चेक-अप न करने देना, रात में बिरयानी और कबाब खाकर अनशन तोड़ने के वीडियो सामने आने की बातें, इन तीनों लीडर्स को संदेह के घेरे में खड़ा करती हैं।

क्या था असली आंदोलन और कैसे बदला इसका स्वरूप?

दरअसल यह पूरा आंदोलन मई के महीने में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) नाम से एक ऑनलाइन व्यंग्यात्मक मुहिम के रूप में शुरू हुआ था। इसका मुख्य उद्देश्य देश की शीर्ष प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे NEET में हुए पेपर लीक और प्रशासनिक अनियमितताओं का विरोध करना था।

सोशल मीडिया पर युवाओं और छात्रों के थोड़े से समर्थन के बाद यह आंदोलन जंतर-मंतर पर जमीनी धरने में बदल गया, जहाँ प्रदर्शनकारी खुद को ‘कॉकरोच’ कहकर संबोधित करते हैं।

इनकी मुख्य माँग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा है। शिक्षा मंत्री ने इस आंदोलन को पहले ही माहौल खराब करने वाला करार देकर खारिज कर दिया था। आंदोलन को तब बड़ी ताकत मिली जब सोनम वांगचुक इसमें शामिल हुए और सिर्फ नमक-पानी पर रहकर 20 दिनों तक उपवास किया, जिसके कारण उनका वजन 9 किलोग्राम से अधिक घट गया।

दिल्ली पुलिस की कार्रवाई और राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ

शनिवार (18 जुलाई 2026) की सुबह करीब 07:30 बजे भारी पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने जंतर-मंतर पर पहुँचकर सोनम वांगचुक को चादरों के घेरे में लिया और एम्बुलेंस के जरिए सफदरजंग अस्पताल पहुँचाया। अस्पताल की मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ चारू बांबा के अनुसार, वांगचुक स्थिर और सचेत हैं, हालाँकि लंबे अनशन के कारण उन्हें कमजोरी और डिहाइड्रेशन है।

पुलिस का कहना है कि यह कार्रवाई दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश के तहत की गई है जिसमें सरकार को नियमित रूप से वांगचुक के स्वास्थ्य की निगरानी करने और जरूरत पड़ने पर तुरंत इलाज मुहैया कराने का निर्देश दिया गया था।

सोनम वांगचुक की अनुपस्थिति में अब CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने अनिश्चितकालीन उपवास शुरू कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि 20 जुलाई 2026 को संसद मार्च हर हाल में आयोजित किया जाएगा। वांगचुक के हटाए जाने के बाद अब CJP ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की माँग शुरू कर दी है।

हालाँकि AISA और वामपंथियों द्वारा आंदोलन को हाई जैक करने और सुबह अनशन का दिखावा कर रात में बिरयानी खाने जैसी चर्चाओं ने इस पूरे मोर्चे की साख को भारी नुकसान पहुँचाया है।