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सोमनाथ सिर्फ एक मंदिर नहीं, संस्कृति का केंद्र है: जानिए उन आचार्यों और राजाओं को, जिन्होंने हर आक्रमण के बाद भी यहाँ जीवित रखी शैव परंपरा

भारत में कुछ स्थान केवल धार्मिक स्थल भर नहीं हैं। वे देश की सभ्यता, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा के प्रतीक बन जाते हैं। गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित प्राचीन सोमनाथ मंदिर ऐसा ही एक स्थान है।

सदियों से सोमनाथ केवल भगवान शिव का मंदिर नहीं रहा, बल्कि आस्था, संघर्ष, ज्ञान, भक्ति और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का जीवंत प्रतीक बना हुआ है।

हाल ही में स्वतंत्र भारत में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने पर आयोजित सोमनाथ प्राणप्रतिष्ठा अमृत महोत्सव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंदिर के लंबे और निरंतर इतिहास का उल्लेख किया।

उन्होंने बताया कि अलग-अलग समय में संतों, राजाओं, विद्वानों, योद्धाओं और भक्तों ने मंदिर पर आए हर संकट के बाद उसे फिर से खड़ा किया और उसकी परंपरा को जीवित रखा। उनके भाषण में सोमनाथ को केवल कई बार पुनर्निर्मित हुए मंदिर के रूप में नहीं, बल्कि हर चुनौती के बावजूद जीवित रही एक सतत सभ्यतागत परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया गया।

सोमनाथ सिर्फ एक मंदिर से कहीं ज्यादा

सोमनाथ की कहानी केवल आक्रमणों और राजनीतिक संघर्षों तक सीमित नहीं है। इसकी जड़ें प्राचीन भारत तक जाती हैं, जब प्रभास शैव दर्शन और आध्यात्मिक शिक्षा का बड़ा केंद्र बन चुका था। इतिहास में हुए हमलों से बहुत पहले ही सोमनाथ पश्चिम भारत का प्रमुख पूजा, तपस्या और दार्शनिक चर्चाओं का केंद्र बन गया था।

प्राचीन ऋषियों और आचार्यों ने इस क्षेत्र को शैव धर्म का महत्वपूर्ण केंद्र बनाया। समय के साथ सोमनाथ का संबंध भारत के सबसे पुराने शैव संप्रदायों में से एक पाशुपत परंपरा से जुड़ गया।

मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं था, बल्कि यहाँ विद्वान दर्शन पर चर्चा करते थे, योगी तपस्या करते थे और गुरु अपने शिष्यों को ज्ञान देते थे। इसी आध्यात्मिक और बौद्धिक वातावरण ने सोमनाथ को पूरे भारत में प्रसिद्ध बना दिया।

देश के अलग-अलग हिस्सों से यात्री, संत, व्यापारी और साधक प्रभास आने लगे और यह स्थान एक बड़ा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र बन गया।

सोम शर्मा और प्रभास का उदय

सोमनाथ के आध्यात्मिक इतिहास से जुड़े शुरुआती नामों में सोम शर्मा का विशेष महत्व है। शैव परंपराओं के अनुसार उन्हें रुद्र का 27वाँ अवतार माना जाता है और प्रभास में पाशुपत परंपरा की नींव रखने वाले प्रमुख ऋषियों में गिना जाता है।

पारंपरिक कथाओं में यह भी कहा जाता है कि सोम शर्मा ने सोमनाथ में भगवान शिव का पहला स्वर्ण मंदिर बनवाया था। लेकिन उनका महत्व केवल मंदिर निर्माण तक सीमित नहीं था। उस समय भारत में कई धार्मिक विचारधाराएँ विकसित हो रही थीं और सोम शर्मा ने प्रभास की आध्यात्मिक पहचान को मजबूत बनाने में बड़ी भूमिका निभाई।

उनसे जुड़ी शैव विचारधारा ने बाद में पूरे पश्चिम भारत को गहराई से प्रभावित किया। उनसे जुड़ी परंपराओं में सोम सिद्धांत का भी उल्लेख मिलता है, जिसने शैव साधना और आध्यात्मिक अनुशासन को दार्शनिक दिशा दी। इसी कारण प्रभास धीरे-धीरे केवल तीर्थ स्थल नहीं, बल्कि शिक्षा और ध्यान का केंद्र भी बन गया।

लकुलीश और पाशुपत परंपरा

सोम शर्मा के बाद पश्चिम भारत के शैव इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण नाम लकुलीश का माना जाता है। वर्तमान गुजरात के कायावरोहण में जन्मे लकुलीश को रुद्र का 28वाँ अवतार माना जाता है। उन्हें पाशुपत संप्रदाय को संगठित रूप देने वाला महान आचार्य कहा जाता है।

लकुलीश नाम लकुट शब्द से बना है, जिसका अर्थ डंडा या छड़ी होता है। मूर्तियों और चित्रों में उन्हें योग मुद्रा में हाथ में दंड लिए दिखाया जाता है, जो तपस्या, अनुशासन और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक माना जाता है।

परंपराओं के अनुसार लकुलीश का जन्म विश्वरूप और सुदर्शना के घर हुआ था। उनके बचपन और आध्यात्मिक यात्रा से जुड़ी कई कहानियाँ आज भी गुजरात में प्रसिद्ध हैं। कायावरोहण, देवखात झील और ब्रह्मेश्वर शिव मंदिर जैसे स्थान उनकी परंपरा से जुड़े हुए हैं।

इतिहासकारों को शिलालेखों में भी लकुलीश का उल्लेख मिलता है। लगभग 380-381 ईस्वी के मथुरा शिलालेख में उनके शिष्य कुशिक की दसवीं पीढ़ी का जिक्र मिलता है। इससे कई विद्वान मानते हैं कि लकुलीश दूसरी शताब्दी ईस्वी में हुए होंगे।

लकुलीश की शिक्षाएँ उनके चार प्रमुख शिष्यों कुशिक, गर्ग, मित्र और कौरुष के माध्यम से फैलीं। उनके अनुयायियों ने पाशुपत परंपरा को पश्चिम भारत के अलग-अलग क्षेत्रों तक पहुँचाया। कौशिक शाखा मेवाड़ में गर्ग शाखा गुजरात में मैत्रक शाखा सौराष्ट्र में और कौरुष शाखा आसपास के क्षेत्रों में प्रभावशाली बनी। इसी विस्तार के कारण प्रभास और कायावरोहण शैव शिक्षा और पूजा के बड़े केंद्र बन गए।

परंपरा को जीवित रखने वाले आचार्य

सोमनाथ का विकास केवल राजाओं के संरक्षण से संभव नहीं हुआ। आध्यात्मिक गुरुओं और पाशुपत आचार्यों ने लगातार मंदिर से जुड़ी धार्मिक और बौद्धिक परंपराओं को मजबूत किया।

ऐसे ही एक महत्वपूर्ण नाम भाव बृहस्पति का है, जिनका उल्लेख प्रधानमंत्री मोदी ने भी किया। आज आम लोगों में उनका नाम ज्यादा प्रसिद्ध नहीं है, लेकिन उन्होंने सोमनाथ को पूजा और ज्ञान दोनों के केंद्र के रूप में स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाई।

प्राचीन भारत में मंदिर विश्वविद्यालयों की तरह काम करते थे। मंदिर परिसरों में दर्शन, व्याकरण, शास्त्र, योग और आध्यात्मिक साधनाओं पर चर्चा होती थी। सोमनाथ भी इसी परंपरा का हिस्सा था। भाव बृहस्पति जैसे विद्वानों ने यह सुनिश्चित किया कि मंदिर शिक्षा और आध्यात्मिक चिंतन से जुड़ा रहे।

पाशुपत आचार्य केवल पुजारी नहीं थे। वे दार्शनिक, योगी, शिक्षक और मार्गदर्शक भी थे। उनकी वजह से कठिन राजनीतिक दौर में भी सोमनाथ आध्यात्मिक रूप से जीवित बना रहा।

राजाओं का संरक्षण और प्राचीन पुनर्निर्माण

सोमनाथ की निरंतरता को कई शासकों ने भी सदियों तक सुरक्षित रखा। मंदिर के शुरुआती पुनर्निर्माण से जुड़े राजाओं में मैत्रक वंश के चक्रवर्ती महाराजा धारसेन का नाम प्रमुख है।

उनका योगदान इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इससे पता चलता है कि सोमनाथ का इतिहास मध्यकालीन संघर्षों से भी कहीं पुराना है। मैत्रक काल में वल्लभी पश्चिम भारत का बड़ा शिक्षा और संस्कृति केंद्र बन गया था। इस दौर में शैव परंपराओं को भी राजकीय संरक्षण मिला।

धारसेन के पुनर्निर्माण ने प्रभास की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को फिर मजबूत किया। प्राचीन भारत में मंदिर केवल धार्मिक केंद्र नहीं होते थे, बल्कि व्यापार, यात्रा, शिक्षा और सामाजिक गतिविधियों का भी केंद्र होते थे। समुद्री व्यापार मार्गों के पास होने के कारण सोमनाथ का प्रभाव गुजरात से बहुत दूर तक फैला।

महमूद गजनवी का हमला और पुनर्जीवन

सोमनाथ के इतिहास का सबसे चर्चित अध्याय 11वीं शताब्दी में महमूद गजनी के हमले से जुड़ा है। लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि मंदिर और उसकी परंपराओं को बाद में फिर से कैसे जीवित किया गया।

गजनवी के हमले के बाद गुजरात कठिन राजनीतिक और धार्मिक स्थिति से गुजर रहा था। उस समय सोलंकी शासक भीमदेव प्रथम सोमनाथ के पुनर्निर्माण और पुनर्जीवन से जुड़े प्रमुख शासक बनकर सामने आए। भीमदेव केवल राजनीतिक शासक नहीं थे, बल्कि गुजरात की सांस्कृतिक पहचान को बचाने वाले राजा भी थे।

ऐतिहासिक विवरणों में बताया गया है कि उन्होंने मंदिर के पुनर्निर्माण और धार्मिक परंपराओं को फिर से स्थापित करने में सहयोग दिया। बाद में सोलंकी काल गुजरात के सबसे समृद्ध सांस्कृतिक दौरों में गिना गया।

इस समय मंदिर वास्तुकला, व्यापार, जल प्रबंधन, मूर्तिकला और साहित्य का तेज विकास हुआ। सोमनाथ का पुनर्जीवन इसी सांस्कृतिक पुनर्जागरण का हिस्सा बन गया।

आक्रमणों के खिलाफ व्यापक संघर्ष

सोमनाथ का इतिहास उत्तर-पश्चिम भारत में हुए बड़े संघर्षों से भी जुड़ा हुआ है। हिंदू शाही शासक जयपाल और आनंदपाल को तुर्क और गजनवी सेनाओं के खिलाफ लंबे समय तक संघर्ष करने के लिए याद किया जाता है।

हालाँकि उनका सीधा संबंध सोमनाथ के प्रशासन से नहीं था, लेकिन उनके युद्ध भारतीय राज्यों और परंपराओं की रक्षा के बड़े संघर्ष का हिस्सा थे। जयपाल ने सबुक्तगीन और बाद में महमूद गजनवी के खिलाफ लड़ाई लड़ी।

उनके पुत्र आनंदपाल ने भी यह संघर्ष जारी रखा। इन शासकों का उल्लेख यह दिखाता है कि सोमनाथ की कहानी केवल गुजरात तक सीमित नहीं थी। उस समय भारत के अलग-अलग हिस्सों के शासक राजनीतिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे थे।

महाराजा भोज और सांस्कृतिक गौरव

सोमनाथ के पुनर्जीवन से जुड़े प्रमुख शासकों में मालवा के महाराजा भोज का नाम भी आता है। उन्हें केवल शक्तिशाली राजा ही नहीं, बल्कि विद्वान, कवि, वास्तुकार और संस्कृति के संरक्षक के रूप में भी याद किया जाता है।

ऐतिहासिक परंपराओं में माना जाता है कि भोज ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण में योगदान दिया। उनके लिए मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं थे, बल्कि राज्य की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक शक्ति के प्रतीक थे।

भोज का समर्थन इस विचार को दिखाता है कि मंदिरों को बचाना भारत की ज्ञान परंपरा, कला और सभ्यतागत स्मृति को बचाने जैसा था।

सोलंकी राजा और गुजरात का स्वर्णकाल

बार-बार हुए हमलों और राजनीतिक संकटों के बाद भी सोमनाथ को जीवित रखने में सोलंकी वंश की सबसे बड़ी भूमिका रही। कर्णदेव सोलंकी ने उस समय गुजरात को राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से मजबूत किया, जब पश्चिम भारत में यह क्षेत्र बड़ी शक्ति बन रहा था।

सोलंकी शासन में मंदिर निर्माण, शहरों का विकास, जल प्रबंधन और व्यापार तेजी से बढ़ा। सोलंकियों के लिए मंदिर समृद्धि और गौरव के प्रतीक थे। उनके संरक्षण से सोमनाथ फिर से एक प्रतिष्ठित तीर्थ स्थल बन सका।

बाद में सिद्धराज जयसिंह ने गुजरात की सांस्कृतिक शक्ति को और आगे बढ़ाया। उनके शासन में शिक्षा संस्थान, झीलें, मंदिर और नगरों का विकास हुआ। उनका काल गुजरात के स्वर्ण युगों में गिना जाता है।

सिद्धराज ने केवल सैन्य शक्ति ही नहीं बढ़ाई, बल्कि उन धार्मिक संस्थानों को भी संरक्षण दिया जिन्होंने गुजरात की सांस्कृतिक पहचान बनाई। सोमनाथ इसी पहचान का सबसे बड़ा प्रतीक बना रहा है।

कुमारपाल सोलंकी ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाया। हालाँकि उन्हें जैन आचार्य हेमचंद्र से संबंध के लिए ज्यादा याद किया जाता है, लेकिन उन्होंने शैव परंपराओं को भी संरक्षण दिया।

उनके समय में मंदिरों, तीर्थ स्थलों और शिक्षा केंद्रों को मजबूत समर्थन मिला। भाव बृहस्पति का नाम अक्सर कुमारपाल के साथ लिया जाता है, क्योंकि दोनों ने मिलकर सोमनाथ की धार्मिक और बौद्धिक परंपराओं को मजबूत किया।

वाघेला शासक और आध्यात्मिक संरक्षण

सोलंकी वंश के बाद गुजरात में वाघेला वंश उभरा। हालाँकि इस समय राजनीतिक परिस्थितियाँ कठिन होती जा रही थीं, फिर भी सोमनाथ की परंपराओं को बचाने के प्रयास जारी रहे।

विशालदेव वाघेला उन शासकों में गिने जाते हैं जिन्होंने गुजरात की सांस्कृतिक और धार्मिक संस्थाओं की रक्षा करने की कोशिश की। प्रधानमंत्री मोदी ने त्रिपुरांतक का भी उल्लेख किया, जिन्हें शैव परंपराओं में आध्यात्मिक ज्ञान का रक्षक माना जाता है।

इन लोगों का महत्व इसलिए है क्योंकि सोमनाथ केवल युद्धों से नहीं बचा, बल्कि लोगों ने उसकी परंपराओं, शिक्षाओं और स्मृतियों को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखा।

इस्लामी आक्रमणों के बाद पुनर्जीवन

बार-बार हुए आक्रमणों से सोमनाथ कई बार क्षतिग्रस्त हुआ। कुछ समय ऐसे भी आए जब स्थानीय लोग खुले रूप से मंदिर जाने से डरने लगे। फिर भी इसकी परंपरा कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।

जूनागढ़ के चूड़ासमा शासकों ने कठिन समय में सोमनाथ में पूजा-पाठ को फिर से शुरू कराने में बड़ी भूमिका निभाई। महिपाल चूड़ासमा और रा’ खेंगार को मंदिर की धार्मिक परंपराओं को फिर से जीवित करने के लिए याद किया जाता है।

इन शासकों के लिए सोमनाथ सौराष्ट्र की पहचान और गौरव का प्रतीक था। राजनीतिक अस्थिरता के बावजूद उन्होंने पूजा और तीर्थ यात्रा को जारी रखा।

अहिल्याबाई होल्कर का योगदान

कई सदियों बाद महारानी अहिल्याबाई होल्कर भारत के सबसे बड़े तीर्थ स्थलों की संरक्षक बनकर सामने आईं। उनका नाम काशी विश्वनाथ और सोमनाथ सहित कई प्रमुख मंदिरों के पुनर्निर्माण और संरक्षण से जुड़ा है।

जब राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता के कारण कई प्राचीन तीर्थ स्थल कमजोर पड़ रहे थे, तब अहिल्याबाई ने धार्मिक परंपराओं को जीवित रखने का काम किया। उनके प्रयासों से कठिन समय में भी सोमनाथ पूजा और भक्ति से जुड़ा रहा।

गायकवाड़ और तीर्थ यात्रियों की सुरक्षा

बड़ौदा के गायकवाड़ शासकों ने भी सोमनाथ और तीर्थ यात्रियों की सुरक्षा में योगदान दिया। हालाँकि उनके योगदान की चर्चा कम होती है, लेकिन ब्रिटिश प्रभाव बढ़ने के समय उन्होंने तीर्थ परंपरा को बनाए रखने में मदद की।

औपनिवेशिक शासन के दौरान मंदिरों की पुरानी परंपराओं को बचाए रखना आसान नहीं था। फिर भी गायकवाड़ शासकों ने यह सुनिश्चित किया कि सोमनाथ आध्यात्मिक रूप से सक्रिय बना रहे।

सोमनाथ के भूले-बिसरे नायक

सोमनाथ का इतिहास केवल राजाओं और संतों की कहानी नहीं है। यह उन साधारण योद्धाओं और स्थानीय नायकों की भी कहानी है जिन्होंने मंदिर के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

सौराष्ट्र की लोक स्मृतियों में सबसे ज्यादा याद किए जाने वाले नामों में हमीरजी गोहिल और वेगड़ाजी भील शामिल हैं। हमीरजी की वीरता पर आज भी लोकगीत गाए जाते हैं। उन्हें उस युवा योद्धा के रूप में याद किया जाता है जिसने सोमनाथ की रक्षा करते हुए अपने प्राण दे दिए।

वेगड़ाजी भील को भी बलिदान और संघर्ष के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। उनकी कहानियाँ दिखाती हैं कि सोमनाथ स्थानीय समाज की भावनाओं और पहचान से कितनी गहराई से जुड़ा था।

आधुनिक भारत में सोमनाथ का पुनर्निर्माण

आधुनिक दौर में सोमनाथ की नई यात्रा भारत की स्वतंत्रता के बाद शुरू हुई। जूनागढ़ के भारत में विलय के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल प्रभास पाटन पहुँचे और घोषणा की कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण किया जाएगा।

इस निर्णय को केवल मंदिर निर्माण नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत के सांस्कृतिक आत्मविश्वास के प्रतीक के रूप में देखा गया। के एम मुंशी ने इस सपने को साकार करने में बड़ी भूमिका निभाई। नवानगर के जाम साहब दिग्विजय सिंह और कई अन्य लोगों ने भी इस प्रयास में सहयोग दिया।

आखिरकार 1951 में पुनर्निर्मित मंदिर का उद्घाटन भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में हुआ। हालाँकि जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रपति के समारोह में शामिल होने के पक्ष में नहीं थे, फिर भी राजेंद्र प्रसाद कार्यक्रम में पहुँचे और सोमनाथ को भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक बताया।

एक अखंड सभ्यतागत यात्रा

सोमनाथ की कहानी सदियों तक फैली हुई है और इसमें ऋषि, संत, राजा, योद्धा और साधारण भक्त सभी जुड़े हुए हैं। सोम शर्मा और लकुलीश से लेकर भाव बृहस्पति तक, भीमदेव और भोज से लेकर अहिल्याबाई होल्कर तक, हमीरजी गोहिल से लेकर सरदार पटेल तक हर पीढ़ी ने सोमनाथ की रक्षा और पुनर्जीवन में अपना योगदान दिया।

सोमनाथ पर कई बार हमले हुए, लेकिन उसकी परंपराएँ कभी खत्म नहीं हुईं। यही निरंतरता सोमनाथ को खास बनाती है। यह मंदिर केवल पत्थरों से नहीं बचा, बल्कि लोगों की सांस्कृतिक स्मृतियों और आस्था में जीवित रहा। आज भी सोमनाथ केवल एक तीर्थ स्थल नहीं है। यह भारत की निरंतरता, संघर्षशक्ति और सभ्यतागत आत्मविश्वास का प्रतीक बनकर खड़ा है।

(नोट: मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित की गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

जिस अपर्णा यादव का उजड़ा सुहाग, उसे ही बदनाम कर रहे सपा समर्थक: किसी ने प्रतीक यादव की मौत को बताया ‘नीला ड्रम कांड’, कोई पूछ रहा- पति को छोड़ क्यों गई असम?

समाजवादी पार्टी (सपा) के संस्थापक स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव के छोटे बेटे और सपा प्रमुख अखिलेश यादव के छोटे भाई 38 साल के प्रतीक यादव का बुधवार (13 मई 2026) तड़के निधन हो गया। बताया जा रहा है कि प्रतीक यादव लंबे समय से बीमार चल रहे थे। एक तरफ जहाँ प्रतीक यादव के निधन के बाद उनकी पत्नी और BJP नेता अपर्णा यादव का सुहाग उजड़ गया, वहीं सोशल मीडिया पर समाजवादी इकोसिस्टम उन्हें ही बदनाम करने में लग गया है।

दरअसल, BJP नेता अपर्णा यादव अपने पति प्रतीक यादव के निधन के वक्त असम में थीं, उन्हें लखनऊ आते-आते दोपहर के 2 बज गए। इस पर समाजवादी इकोसिस्टम उन्हें घेरने में लगा हुआ है कि पति के बीमार होने के बावजूद वह असम गईं और अब निधन पर भी वे देरी से आ रही हैं। इसी के साथ कुछ समय पहले ही अपर्णा यादव और प्रतीक यादव के तलाक की भी खबरें सामने आई थीं, लेकिन बाद में प्रतीक यादव ने सबके सामने आकर बताया था कि दंपति के बीच सब कुछ ठीक चल रहा है।

सोशल मीडिया पर समाजवादी इकोसिस्टम ने फैलाया अपर्णा यादव के खिलाफ प्रोपेगेंडा

प्रतीक यादव की मौत के बाद सोशल मीडिया पर समाजवादी इकोसिस्टम ने अपर्णा यादव के खिलाफ प्रोपेगेंडा चला रखा है। लोग उन्हें प्रतीक यादव की मौत को उनकी पत्नी अपर्णा यादव के साथ पुरानी अनबन संग जोड़कर खयाली पुलाव पका रहे हैं। कोई अखिलेश यादव की फुर्ती में अस्पताल पहुँचने की तारीफ करते नहीं थक रहा है। यानी कि सोशल मीडिया पर पूरा समाजवादी नैरेटिव आगे बढ़ाया जा रहा है।

परमाननंद आजमगढ़ी नाम के ‘एक्स’ यूजर कहते हैं कि कुछ दिनों पहले ही अपर्णा यादव की सोशल मीडिया पर पोस्ट वायरल हुई थी, जिसमें प्रतीक ने अपनी पत्नी BJP महिला आयोग की उपाध्यक्ष अपर्णा यादव को परिवार तोड़ने वाला बताया था। उन्होंने आगे लिखा, “प्रतीक ने यह भी कहा था कि वह जल्द से जल्द अपर्णा यादव को तलाक देने जा रहे हैं। ऐसे में प्रतीक की संदिग्ध मौत की खबर आना तमाम विवादों को जन्म देता है।”

अविनाश लिखते हैं कि प्रतीक यादव की मौत मामले में उनकी पत्नी अपर्णा यादव से भी पूछताछ होनी चाहिए, पति की बीमारी के समय वो असम में क्या कर रही थी और अपर्णा यादव और प्रतीक का कई महीनों से झगड़ा चल रहा था क्या यह साजिश हो सकती है नीले ड्रम कांड की तरह।

‘गौरव’ ने भी दंपति के बीच पुराने विवाद को जड़ बनाकर कहा, “क्या कल रात प्रतीक यादव और अपर्णा बिष्ट के बीच कुछ भयानक विवाद हुआ था? ये सब पुलिस जाँच में सामने आएगा।”

डॉ. विष्णु यादव ने एंबुलेंस में प्रतीक यादव के शव का वीडियो पोस्ट कर दावा किया, “यह प्रतीक यादव का शव है। यहाँ पर कोई भी करीबी नहीं दिख रहा है। खासकर अपर्णा यादव भी नहीं।”

खुद को समाजवादी बताने वाले श्याम यादव का सवाल है कि प्रतीक यादव की तबीयत लंबे समय से ठीक नहीं थी, ऐसे में अपर्णा यादव असम क्यों गई थीं? उन्होंने सपा प्रमुख अखिलेश यादव की तारीफ करते हुए कहा कि वे अपने छोटे भाई की खबर मिलते ही तुरंत पहुँच गए।

मनीष यादव लिखते हैं, “आखिरकार भाई भाई ही होता है… प्रतीक यादव को सबसे पहले देखने अखिलेश यादव जी ही पहुँचे हैं। जबकि अभी तक अपर्णा यादव नहीं दिखी हैं?”

रिस्की यादव लिखते हैं, “पत्नी अपर्णा यादव से कलह और अखिलेश यादव से बिछड़कर अलग रहना प्रतीक यादव को काफी दुख देता था। अपर्णा यादव की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने परिवार को खत्म कर दिया।”

प्रतीक यादव की मौत की वजह अपर्णा यादव?

सोशल मीडिया पर समाजवादी इकोसिस्टम जिस तरह अपर्णा यादव के खिलाफ प्रोपेगेंडा चला रहा है, उससे अमूमन अपर्णा यादव को प्रतीक यादव की मौत का संदिग्ध ठहराया जा चुका है। लेकिन अब तक जाँच में ऐसा कुछ सामने नहीं आया है। बताया जा रहा है कि वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे। वहीं उनके बड़े भाई अखिलेश यादव ने कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे के फैसले लेने की बात कही है।

उधर, प्रतीक यादव की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में भी मौत की असली वजह अब तक पता नहीं लगी है। डॉक्टरों को प्रतीक के शरीर पर कोई बाहरी चोट के निशान भी नहीं मिले हैं। इसीलिए डॉक्टरों ने आगे की जाँच के लिए विसरा सुरक्षित रख लिया है। साथ ही हार्ट को भी रख लिया गया है, ताकि जरूरत पड़ने पर दोबारा जाँच की जा सके।

प्रिय मीडिया कब तक बेचते रहोगे किसानों की ये दुखांत कहानियाँ, उन्हें क्यों नही बताते उनको ही ‘मंडी-दलालों’ से मुक्त कराने के लिए मोदी लेकर आए थे कृषि कानून

एक किसान जब खेती करता है तो उसकी फसल से सिर्फ आमदनी नहीं, बल्कि पूरे परिवार की उम्मीदें जुड़ी होती हैं। वह सोचता है कि फसल उचित दाम पर बिकेगी तो पुराने कर्ज चुकेंगे, घर का खर्च चलेगा और बच्चों के भविष्य के लिए कुछ बचत हो पाएगी। लेकिन सोचिए, अगर वही किसान अपनी मेहनत की फसल लेकर मंडी पहुँचे और वहाँ उसे दाम की जगह घाटे का सौदा झेलना पड़े, तो उस पर क्या बीतती होगी।

यह कोई काल्पनिक बातें नहीं हैं, बल्कि मीडिया में बताई जा रही महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजी नगर जिले के किसान की आपबीती है जिसे भावुक शब्दों के साथ पाठकों को परोसा जा रहा है।

मीडिया में बताई जा रही किसान की आपबीती

पैठण तालुका के वरुडी गाँव के एक किसान प्रकाश गलधर तीन महीने की मेहनत के बाद 1262 किलो प्याज 25 बोरे में भरकर मंडी तक लेकर आए, लेकिन यहाँ उन्हें बताया गया कि 100 रुपए प्रति क्विंटल का भाव मिलेगा इससे एक रुपया ज्यादा नहीं… यानी लगभग 1 रुपए प्रति किलो।

कुल बिक्री से उनकी जेब में सिर्फ 1262 रुपए आए। ये रकम किसान का प्रॉफिट नहीं थी बल्कि उनकी तीन महीने की कीमत थी। असली धक्का तो तब लगा जब घर से मंडी तक माल पहुँचाने की कुल कीमत को जोड़ा गया।

रिपोर्ट बताती हैं कि किसान को प्याज की तुलाई, भराई, मजदूरी, परिवहन में कुल खर्च 1263 रुपए आए। यानी जो दाम मंडी से मिला उससे एक रुपए ज्यादा लगाकर तो किसान अपनी फसल को मंडी तक पहुँचाकर ही आया था। तीन महीने की मेहनत, खेती में आई लागत और बचत का तो छोड़ दीजिए उलटा इस सौदे से किसान का नुकसान ही हुआ।

मीडिया का खेल

यह समस्या सिर्फ एक किसान की नहीं है। देश के लाखों किसान आज भी अपनी उपज बेचने के लिए मंडियों और बिचौलियों पर निर्भर हैं। मीडिया अक्सर ऐसी खबरों को भावनात्मक अंदाज में पेश करता है, जिससे आम आदमी या खबर पढ़ने वाले पाठक का गुस्सा सीधे सरकार और प्रशासन पर जाता है।

ये गुस्सा भी उचित होता है क्योंकि ये मीडिया हमें ऐसी खबरें परोसते वक्त खबर का दूसरा पहलू नहीं बताता। इस खबर में भी यही हुआ। यहाँ ये तो बताया गया कि किसान कितना दुखी है लेकिन ये नहीं बताया कि किसानों को ऐसी स्थिति से निकालने के लिए मोदी सरकार आज से 6 साल पहले ही कदम उठा चुकी थी, लेकिन कुछ आंदोलनजीवियों के चलते वह फैसला वापस हो गया।

मोदी सरकार का कृषि कानून और उसका विरोध

आज से करीब 6 साल पहले केंद्र सरकार तीन कृषि कानून लेकर आई थी। उन कानूनों का मूल उद्देश्य यही था कि किसान मंडियों और बिचौलियों के चंगुल से निकलकर अपनी फसल सीधे बाजार में कहीं भी बेच सके। लेकिन उस समय कुछ लोगों ने अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए ऐसे विरोध प्रदर्शन किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा आ पड़ा और आखिर में देश हित देखते हुए सरकार ने कानून वापस ले लिया।

वे कानून किसान विरोधी नहीं थे, लेकिन कुछ ‘आंदोलनजीवियों’ और स्वघोषित किसान नेताओं ने आम किसानों को ऐसे भड़काया था कि जिन्हें फायदा दिख भी रहा था वो भी उस पर संदेह करने लगे थे। उस दौरान सड़कों को ब्लॉक कर ऐसा माहौल बनाया गया जैसे इन कानूनों से ज्यादा किसान के लिए कुछ खतरनाक नहीं हो सकता।

उस समय जब कुछ मीडिया संस्थानों ने इन कानूनों के फायदे समझाने की कोशिश की, तो उन्हें ‘गोदी मीडिया’ कहकर खारिज कर दिया गया। तथ्यों की जगह भ्रम को स्थापित किया गया।

मीडिया में चल रही खबरें

प्रधानमंत्री मोदी ने खुद बताए थे फायदे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं इन रिफॉर्म्स के दूरगामी परिणाम समझाए थे। उन्होंने मन की बात से लेकर अलग-अलग प्लैटफॉर्म पर आकर ये समझाया था कि कैसे इन सुधारों के बाद किसानों को नए बाजार और विकल्प मिलेंगे, आधुनिक टेक्नोलॉजी और बेहतर कोल्ड स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर का लाभ मिलेगा। इससे कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ेगा और किसान मंडियों के साथ-साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भी अपने उत्पाद बेच सकेंगे।

शुरुआत में कई किसान संगठन इसके समर्थन में थे, लेकिन राकेश टिकैत जैसे चेहरों और अवसरवादी राजनीति ने दुष्प्रचार का सहारा लिया। धीरे-धीरे खबरें आई कि अगर ये सब चलता रहा तो इससे राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ भी समझौता हो सकता है। सरकार ने हर पहलू को देखा और अंत में यह कहते हुए कानून वापस लिया कि वे जनता को इसके लाभ समझाने में असफल रहे।

क्या होता अगर लागू होते कानून

आज जब स्थिति बदहाल है किसान परेशान हैं, अपने माल के उचित दाम के लिए जिरह कर रहे हैं, तो 2020-21 में हुई राजनीति, हिंसा को याद रखना जरूरी है। साथ ही ये याद रखना भी जरूरी है आज जो मीडिया इन किसानों के दर्द को अ्पनी हेडलाइंस बनाकर दिखा रहा है, अगर उस समय वह मीडिया किसान हित पर कायम रहता तो ये स्थिति नहीं आती। दुर्भाग्य यह है कि ये आज भी स्वीकार करने का साहस नहीं जुटा पा रहे कि कृषि कानूनों पर फैलाया गया भ्रम ही आज की इस स्थिति का एक बड़ा कारण है।

यदि वे कानून लागू होते, तो शायद प्रकाश गलधर को अपना प्याज 1 रुपए किलो बेचने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता। शायद किसानों को मीडिया के सामने आकर मदद की गुहार नहीं लगानी पड़ती या परिवार की बदहाली देख आत्महत्या का विचार नहीं लाना पड़ता।

राजकुमार भाटी की माफी भले लगे मासूम, पर ‘ब्राह्मण घृणा’ दिखाते समय सपा नेता की हँसी नहीं थी मासूम: जानिए जवाहर भवन में ‘जाति’ के नाम पर क्यों जुटे वामपंथी

समाजवादी पार्टी के नेता राजकुमार भाटी की यह कहानी शुरू होती है दिल्ली के एक ऐसे मंच से, जहाँ उन्होंने ‘समाजवाद’ का मुखौटा पहनकर हिंदू समाज के विरुद्ध नफरत की पटकथा लिखी। वामपंथियों और कट्टरपंथियों के जमावड़े के बीच खड़े होकर समाजवादी पार्टी के नेता राजकुमार भाटी ने जब ब्राह्मणों की तुलना वेश्याओं से की और उन्हें उनसे भी बदतर बताया, तो उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं बल्कि एक जहरीली ‘खिलखिलाहट’ थी। मंच पर गूँजते ठहाके और भाटी साहब की घृणा भरी मुस्कान गवाही दे रही थी कि यह सिर्फ एक मुहावरा नहीं, बल्कि उनके भीतर गहरे पैठी सनातन विरोधी सोच का प्रदर्शन था।

लेकिन जैसे ही कानून का शिकंजा कसा और गिरफ्तारी की आहट सुनाई दी, भाटी साहब ने तुरंत हाथ जोड़कर ‘बिना शर्त माफी’ का ढोंग शुरू कर दिया। हालाँकि, खुद उनके द्वारा साझा किया गया Video उनकी इस मजबूरी वाली माफी की पोल खोल देता है, जिसमें वे नफरत भरे बोल पढ़ते हुए आज भी मुस्कुरा रहे हैं और पीछे से उनके समर्थक इस अपमान के ‘पोस्टर’ लगवाने की माँग कर रहे हैं। चलिए, नफरत, चालाकी और चुनावी डर से बुनी इस पूरी कहानी को सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं।

नफरत का वह मंच जहाँ ब्राह्मणों की तुलना वेश्याओं से की

कहानी शुरू होती है 5 मई 2026 को। दिल्ली का जवाहर भवन, जो सोनिया गाँधी परिवार के ‘राजीव गाँधी फाउंडेशन’ से जुड़ा है, वहाँ एक किताब के विमोचन का कार्यक्रम चल रहा था। किताब का नाम था- ‘जाति और साम्प्रदायिकता के विषाणु’। विडंबना देखिए, किताब लिखने वाले दो मुस्लिम लेखक (डॉ रफरफ शकील अंसारी और जावेद अनवर) अपने समाज की कुरीतियों जैसे हलाला या तीन तलाक पर नहीं, बल्कि हिंदू समाज की जातियों पर जहर उगलने के लिए कलम चला रहे थे।

इसी मंच पर राजकुमार भाटी ने अपना भाषण शुरू किया। उन्होंने एक पुराना दोहा सुनाया, “ब्राह्मण भला न वेश्या, इनमें भला न कोय! और कोई-कोई वेश्या तो भली, ब्राह्मण भला न कोय।” इसका सीधा मतलब यह था कि उनके लिए ब्राह्मण वेश्याओं से भी गए-गुजरे हैं।

वामपंथियों का साथ और वह जहरीली खिलखिलाहट

इस मंच पर भाटी साहब अकेले नहीं थे। उनके साथ योगेंद्र यादव, प्रोफेसर रतन लाल, आशुतोष और शीबा असलम फहमी जैसे लोग बैठे थे, जिनका इतिहास ही हिंदू धर्म पर विवादित बयान देने का रहा है। जब राजकुमार भाटी ब्राह्मण समाज का अपमान कर रहे थे, तो उनके चेहरे पर एक अजीब सी नफरत भरी मुस्कुराहट थी। पूरे भाषण के दौरान वे कभी इतना नहीं हँसे होंगे, जितना ब्राह्मणों पर भद्दी टिप्पणी को बोलते हुए खिलखिला रहे थे।

हैरानी की बात यह है कि वहाँ बैठा ‘बुद्धिजीवी’ समाज इस अपमान पर तालियाँ बजा रहा था। भीड़ के बीच से तो किसी ने यहाँ तक कह दिया, “भाटी जी, इसका पोस्टर लगवा दीजिए!” यह साबित करता है कि वहाँ जुटे लोग किसी चर्चा के लिए नहीं, बल्कि एक खास समाज को नीचा दिखाने के लिए इकट्ठा हुए थे।

माफी का ढोंग: जब चुनाव और जेल का डर सताया

जैसे ही भाटी साहब का ब्राह्मणों के प्रति नफरत का Video वायरल हुआ, लोगों में गुस्सा फूट पड़ा। जैसे ही गाजियाबाद में FIR दर्ज हुई, तो भाटी साहब तुरंत बैकफुट पर आ गए। इसके बाद उन्होंने 5 मिनट का एक Video डाला और खुद को उसमें बेचारा दिखाते हुए बोले, “7 सेकंड की क्लिप काटकर मुझे बदनाम किया जा रहा है।” उन्होंने खुद को बचाने के लिए ‘गुर्जर-यादव’ वाले मुहावरों का भी सहारा लिया, लेकिन हकीकत यह है कि उनका पूरा निशाना ब्राह्मण ही थे।

वीडियो में वे हाथ तो जोड़ रहे हैं, लेकिन उनकी आँखों में पछतावा नहीं, बल्कि चालाकी दिख रही है। फेसबुक पर शेयर की गई उस Video में साफ-साफ दिखाई देता है कि भाटी साहब पहले से ही ब्राह्मणों के खिलाफ लिखकर लाए थे और फिर कागज से पढ़कर लोगों को मुहावरे सुनाकर बीचों-बीच ठहाके मारकर हँस रहे थे। एक तरह से भाटी साहब वहाँ पुस्तक विमोचन करने नहीं, बल्कि वामपंथियों का मनोरंजन करने गए थे।

माफी माँगने वाली Video में भाटी साहब ने यह भी कह दिया कि ‘कुछ भोले-भाले लोग BJP के बहकावे में आकर उनके खिलाफ अभियान चलाने लग जाते हैं।’ मगर सच तो यह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, और ब्राह्मणों की नाराजगी कहीं वोटों का खेल न बिगाड़ दे, इसलिए यह ‘माफी का ढोंग’ रचा गया।

आदतन हिंदू विरोधी हैं भाटी साहब

सपा नेता राजकुमार भाटी की ये बातें कोई नई नहीं हैं, वे पहले भी कई बार हिंदू धर्म और परंपराओं के खिलाफ जहर उगल चुके हैं। उन्होंने भगवान राम तक पर टिप्पणी करने से परहेज नहीं किया। एक बार उन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि अगर वे राम होते, तो ब्राह्मणों को पाखंड छोड़ने की सलाह देते।

राजकुमार भाटी के लिए हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ भी कोई खास मायने नहीं रखते। वे मनुस्मृति को ‘घटिया’ बताते हैं और रामचरितमानस जैसी महान रचना को भगवान का ग्रंथ मानने के बजाय सिर्फ एक ‘साधारण कविता’ कहते हैं।

यही नहीं, भगवान के अस्तित्व पर भी उनके विचार काफी अजीब हैं। वे कहते हैं कि उन्हें मंदिर जाने की कोई जरूरत महसूस नहीं होती, क्योंकि वे अभी इस बात पर ‘रिसर्च’ कर रहे हैं कि दुनिया में भगवान है भी या नहीं। लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि जहाँ एक तरफ वे हिंदू देवी-देवताओं पर सवाल उठाते हैं, वहीं दूसरी तरफ TV पर खुलेआम यह कहते हैं कि वे मोहम्मद साहब से बड़ा महापुरुष किसी और को नहीं मानते।

उनकी ये बातें साफ दिखाती हैं कि उनकी सोच एकतरफा और सनातन धर्म के प्रति नफरत से भरी हुई है। इसके अलावा, राजकुमार भाटी ने पुराने ट्वीट में ब्राह्मणवाद को ‘वायरस’ कहा था और इसकी वैक्सीन खोजने की बात कही थी।

असली चेहरा बनाम समाजवादी मुखौटा

आज जब सपा नेता राजकुमार भाटी अपनी किए पर माफी माँग रहे हैं, तो यह उनके दिल की आवाज नहीं है, बल्कि गिरफ्तारी और राजनीतिक नुकसान का डर उन्हें ऐसा करने पर मजबूर कर रहा है। उनके फेसबुक Video की भाव-भंगिमा, पीछे से आती समर्थकों की आवाजें और उनकी खिलखिलाहट चीख-चीख कर कह रही है कि उनके मन में हिंदुओं के प्रति कितनी नफरत भरी है।

‘संत’ की यात्रा से ‘सनातन’ ही गायब, सपा-कॉन्ग्रेस ने किया हाइजैक: UP में विपक्ष का प्रोपेगेंडा टूल तो नहीं बन रहे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, ‘गविष्टि यात्रा’ की टाइमिंग-रूट को लेकर भी सवाल

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने 3 मई 2026 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से गायों के संरक्षण और गोवंश से जुड़े मुद्दों को उठाने के लिए 81 दिवसीय ‘गविष्टि (गोरक्षार्थ-धर्मयुद्ध) यात्रा’ की शुरुआत की थी। इस यात्रा का घोषित उद्देश्य गायों के संरक्षण को बढ़ावा देना और गाय माता को राष्ट्र माता का दर्जा दिए जाने जैसे मुद्दों पर समाज को जागरूक करना था। शुरुआत में इसे पूरी तरह धार्मिक और सामाजिक अभियान के तौर पर पेश किया गया। यह संदेश दिया गया कि यह यात्रा भारतीय परंपरा, धर्म और संस्कृति से जुड़े एक संवेदनशील विषय को लेकर जनजागरण की कोशिश है।

उम्मीद जताई जा रही थी कि यह अभियान गाँवों और कस्बों तक पहुँचकर लोगों में गो संरक्षण के प्रति जिम्मेदारी का भाव पैदा करेगा। लेकिन जैसे-जैसे यात्रा आगे बढ़ रही है उसका स्वरूप बदलता हुआ दिखाई देने लगा है। अब इस यात्रा में विपक्षी दलों के नेताओं की सक्रिय मौजूदगी चर्चा का विषय बन गई है। खासतौर पर समाजवादी पार्टी (सपा) और कॉन्ग्रेस से जुड़े कई नेता यात्रा के मंचों पर नजर आने लगे हैं।

यह यात्रा जिस-जिस विधानसभा से होकर गुजर रही है, वहाँ पर सपा और कॉन्ग्रेस जैसे दलों के नेता इस यात्रा को अपना समर्थन दे रहे हैं और आगे बढ़कर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का स्वागत सत्कार कर रहे हैं। यात्रा की शुरुआत से ही इसकी कमान सपा के नेताओं के हाथों में दिख रही है। कुशीनगर पहुँचने पर सपा के नेता और पूर्व मंत्री राधे श्याम सिंह ने इसका स्वागत किया। देवरिया में सपा के पूर्व प्रत्याशी मुरली मनोहर जायसवाल यात्रा में सक्रिय दिखे। बलिया में सपा और कॉन्ग्रेस के नेताओं की भरमार रही। अभी हाल ही में सोनभद्र पहुँचने पर सपा सांसद छोटेलाल खरवार इस यात्रा में प्रमुख रूप से नजर आए।

जाहिर है कि धार्मिक यात्राओं में नेताओं का शामिल होना कोई नई बात नहीं है और कई जगहों पर इस यात्रा में बीजेपी के नेता भी शामिल हुए हैं। लेकिन जिस तरह का पैटर्न इस यात्रा में दिख रहा है उससे इस यात्रा को लेकर कई सवाल उठने शुरू हो गए हैं। भले ही स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के शंकराचार्य होने को लेकर विवाद हो लेकिन उनके घोर से घोर विरोधी भी उनके संत होने पर सवाल नहीं उठा सकते हैं। संतों से जो उम्मीदें हैं, वहीं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से भी हैं।

कहीं विपक्ष का राजनीतिक हथियार तो नहीं बन रही गविष्टि यात्रा?

संतों की यात्राओं को हमेशा समाज को जोड़ने, लोगों में धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना पैदा करने और सामाजिक मुद्दों पर जागरूकता फैलाने के माध्यम के तौर पर देखा जाता रहा है। इसी कारण जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की ‘गविष्टि यात्रा’ शुरू हुई तो इसे भी एक धार्मिक और सामाजिक अभियान माना गया। अब जिस तरह से इस यात्रा में सपा और कॉन्ग्रेस के नेताओं की सक्रिय भूमिका लगातार सामने आ रही है उससे यह सवाल उठने लगो हैं कि कहीं यह यात्रा धीरे-धीरे राजनीतिक रंग तो नहीं ले रही।

सपा-कॉन्ग्रेस के नेताओं की सक्रिय भागीदारी को लेकर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या विपक्षी दलों ने इस यात्रा को अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की व्यक्तिगत मंशा पर भले सवाल न हों लेकिन जिस तरह का माहौल यात्रा के आसपास बनता दिखाई दे रहा है उसमें उन्हें यह जरूर देखना चाहिए कि जिन उद्देश्यों को लेकर यह यात्रा शुरू की गई थी क्या वे वास्तव में पूरे हो रहे हैं या नहीं।

लोगों के मन में यह सवाल भी है कि अगर यह यात्रा पूरी तरह समाज और धर्म से जुड़ा अभियान है तो फिर आम हिंदू समाज की उतनी बड़ी भागीदारी क्यों नहीं दिखाई दे रही। यात्रा में सनातन को लेकर बातें होने से ज्यादा राजनीतिक बातें हो रही हैं। कई जगहों पर राजनीतिक चेहरों की मौजूदगी भी खूब दिखाई दे रही है जबकि आम हिंदू समाज या सामाजिक संगठनों की सक्रियता उतने बडे़ स्तर पर नहीं नजर आ रही हैं। इन्हीं सबके चलते अब यह धारणा भी बन रही है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि यह यात्रा विपक्ष के लिए राजनीति का एक हथियार बनती जा रही हो। सवाल और भी हैं।

विधानसभाओं पर आधारित रूट और यात्रा की टाइमिंग पर सवाल

यह यात्रा 81 दिनों तक चलने वाली है और गोरखपुर से शुरू होकर उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों से होकर गुजरने वाली है। इसी बात को लेकर भी अब बातें होने लगी हैं। लोग ये पूछ रहे हैं कि भई अगर यह यात्रा पूरी तरह धार्मिक और सामाजिक उद्देश्य से निकाली गई है तो फिर इसका रूट विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से क्यों डिजाइन किया गया।

आमतौर पर विधानसभा पर आधारित प्लानिंग राजनीतिक अभियानों या चुनावी रणनीतियों में ही नजर आती है, राजनीतिक दल अपनी विधानसभाओं को मजबूत करने के उद्देश्य से इस तरह के कार्यक्रम डिजाइन करते हैं। रही बात धार्मिक यात्राओं की तो वे आम तौर पर तीर्थस्थलों, धार्मिक केंद्रों या सामाजिक जरूरत वाले क्षेत्रों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। इस यात्रा के रूट डिजाइन ने भी राजनीतिक चर्चाओं को और बढ़ा दिया है।

इसके साथ ही सवाल इस यात्रा की टाइमिंग को लेकर भी हैं। क्योंकि यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब उत्तर प्रदेश में चुनावी माहौल धीरे-धीरे बनने लगता है। अगले साल राज्य में विधानसभा चुनाव होने प्रस्तावित हैं। ऐसे में विपक्षी दलों की मौजूदगी और विधानसभाओं वाले रूट जैसी चीजों को लोग आपस में जोड़कर देख रहे हैं। यही वजह है कि अब यह यात्रा केवल गो संरक्षण तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि इसके राजनीतिक हाईजैक होने की आशंका और इसके पीछे की रणनीति को लेकर भी लगातार बहस बढ़ती जा रही है।

हिंदू लड़की को अब भी नोंच रहा होता लव जिहादी आशिक, यदि अनिरुद्धाचार्य महाराज ने न सुनी होती उस बेटी की व्यथा: जानिए कैसे हुआ देवरिया के ‘मीठा बलात्कार’ का पर्दाफाश

उत्तर प्रदेश के देवरिया का 18 साल का ‘लव जिहादी’ आशिक अंसारी कभी गिरफ्तार में नहीं आता, अगर कथावाचक अनिरुद्धाचार्य जी महाराज लोगों की समस्याएँ नहीं सुनते। ऐसे ही अपनी समस्या लेकर उनके दरबार में 16 साल की नाबालिग लड़की पहुँची और उसने अपनी पीड़ा साझा की। उसने बताया कि आशिक अंसारी ने उसको फँसाया और बलात्कार किया, यहाँ तक कि पैसे भी हड़पे। लड़की की बातचीत सोशल मीडिया पर वायरल हुई, तो क्षेत्र के BJP विधायक डॉ. शलभ मणि त्रिपाठी ने संज्ञान लिया और पुलिस अधीक्षक को कार्रवाई की माँग करते हुए पत्र लिखा। तब जाकर आशिक अंसारी को पुलिस ने पकड़ा।

ये अनिरुद्धाचार्य और नाबालिग लड़की के बीच संवाद के कुछ अंश हैं, बाकी मामले की पूरी जानकारी विस्तार में नीचे दी गई है।

लड़की: राधे राधे गुरु जी।
अनिरुद्धाचार्य: आप किससे प्यार करती हो?
लड़की: हमारी कास्ट का नहीं है, मुस्लिम है।
अनिरुद्धाचार्य: तो मुस्लिम से कब से प्यार करती हो?
लड़की: दो साल से, 16 साल की हूँ अभी।
अनिरुद्धाचार्य: कहाँ का है लड़का?
लड़की: हमारे गाँव के चौराहे का है।
अनिरुद्धाचार्य: क्या नाम है?
लड़की: आशिक अंसारी
अनिरुद्धाचार्य: आप लोग मिलते भी हो?
लड़की: हाँ, साथ में स्कूल में पढ़ते थे। पहले घूमते थे, अब सिर्फ बात करते हैं।
अनिरुद्धाचार्य: आपकी उम्र पढ़ने की है या प्यार करने की।
लड़की: पढ़ने की।
अनिरुद्धाचार्य: तो पहले पढ़-लिख लो, योग्य बन जाओ। वो लड़का कितने साल का है?
लड़की: 18 साल का है।
अनिरुद्धाचार्य: वो आपको फँसा रहा है। अपनी से छोटी उम्र की लड़कियों से लव जिहाद करने वाला है। आपकी माँ बता रही थी कि उस लड़के ने आपसे पैसे भी माँगे थे। आपने कितने पैसे दिए?
लड़की: ₹29 हजार
अनिरुद्धाचार्य: कहाँ से लाए थे?
लड़की: मम्मी से चुराए थे।
अनिरुद्धाचार्य: बताओ आप मम्मी से पैसे चुराकर दे रही हो। आज वो पैसे माँग रहा है, फिर वो लव जिहाद करेगा। आपको प्यार में फँसाकर दूसरे देश या राज्य में बेच देगा। जो आपसे अभी पैसे माँग रहा है, तो कल वो आपको बाजार में बेच देगा। फिर आपके साथ लोग वेश्याओं की तरह व्यवहार करेंगे। तो बताओ आपको लव जिहाद के चक्कर में, ऐसे प्यार के चक्कर में पड़ना चाहिए? आप पढ़ती हो?
लड़की: हाई स्कूल में फेल हो गए थे।
अनिरुद्धाचार्य: अब प्यार करोगी तो फेल ही होगी। अब उससे बात मत करना। मुस्लिम ऐसे ही हैं, हिंदू लड़की से बात करते हैं फिर शोषण करने लगते हैं। आपका शारीरिक शोषण भी किया उसने?
लड़की: हाँ
अनिरुद्धाचार्य: फिर, देखो। 18 साल का है और ये लड़की 16 साल की है। तो ये बलात्कार हुआ कि नहीं। इन लोगों पर केस होना चाहिए। बेटा आपके साथ जो हो रहा है उसे लव जिहाद कहते हैं। ऐसी कई लड़कियाँ शोषित हुई हैं। अब आप बताओं और लड़कियों को क्या कहना चाहोगी?
लड़की: गुरु जी हम ऐसे नहीं थे। अपनी सहेली के साथ रहते थे, तो वो भी मुस्लिम लड़कों से बात करती थी, तो हम भी शुरू किए।
अनिरुद्धाचार्य: सोचिए, ग्राउंड लेवल पर किस तरह लव जिहाद घुसा पड़ा है। 16-16, 15-15 साल की लड़की मासूम होती हैं, तो वहीं से ब्रेनवॉश करना शुरू कर देते हैं। 18 साल की होते ही धर्मांतरण करा देंगे। फिर इन लड़कियों को ले जाकर दुबई में, कनाडा में ₹5-10 लाख में बेच देंगे। वे आपकी जैसी 5 लड़कियों को भी बेचेंगे तो ₹40-50 लाख तो सालभर में कमा लिए उसने। सही है या गलत है। अब आपकी तीन सहेली और हैं।
लड़की: हम तीन सहेली को जानते हैं, लेकिन क्लास में सभी लड़कियाँ मुस्लिम लड़कों से ही बात करती थीं। स्कूल में ऐसी 300-400 लड़कियाँ हैं।
अनिरुद्धाचार्य: स्कूल सरकारी है या प्राइवेट?
लड़की: यादवों का स्कूल है।
अनिरुद्धाचार्य: मुस्लिम लड़कों का स्कूल में पढ़ना तो बहाना है, लव जिहाद में फँसाना है। मैं हजारों लड़कियों को समझा चुका हूँ। एक लड़की ये है। अब आप नहीं करोगी न? अब आपको हिंदू शेरनी बनना है, आपको बाकी हिंदू लड़कियों को बचाना है। आप गाँव की बाकी लड़कियों को भी जागरूक करिए। सही है या गलत? अब आपको पढ़-लिखकर डॉक्टर-इंजीनियर बनना चाहिए। ये लड़के तो चाहते हैं आपका शोषण करना, वो तो जिहादी है, वो तो चाहता ही है शोषण करना, अब इसमा आपकी गलती है या उसकी?
लड़की की माँ: कई बार बलात्कार कर चुका है वो लड़का।

अनिरुद्धाचार्य जी महाराज को लड़की ने क्या बताया?

देवरिया की रहने वाली लड़की ने अपना नाम बताते हुए अनिरुद्धाचार्य जी महाराज को आपबीती सुनाई। उसने बताया कि वह 14 साल की थी, जब स्कूल जाते हुए आशिक अंसारी नाम के मुस्लिम लड़के ने उससे बात करनी शुरू की, तब वह लड़का भी 16 साल का था। अंसारी ने धीरे-धीरे युवती से दोस्ती बढ़ाई और प्रेमजाल में फँसा लिया।

लड़की ने बताया कि उसने मुस्लिम लड़के से बात करना इसीलिए आम बात समझी क्योंकि उसकी सहेलियाँ और स्कूल की अधिकतर लड़कियाँ मुस्लिम लड़कों के संपर्क में थीं। तब उसने भी आशिक अंसारी से बात करनी शुरू की, लेकिन वह इसके पीछे रचे गए षडयंत्र से बिल्कुल अनजान थी। लड़की ने बताया कि उस लड़के ने इस कदर ब्रेनवॉश कर दिया कि वह अपने परिवार के खिलाफ जाने लगी। लड़की ने बताया कि उसके चक्कर में वह हाई स्कूल में भी फेल हो गई।

लड़की की आपबीती: ₹29 हजार ऐंठे, पैसे नहीं देती तो पीटता

लड़की ने अनिरुद्धाचार्य जी महाराज को बताया कि आशिक अंसारी उससे पैसे माँगता था। उससे ₹29 हजार ऐंठ लिए, एक ₹10 हजार का फोन और एक साइकिल भी ले ली। लड़की ने बताया कि अगर वो पैसे या उसकी कही चीज नहीं देती थी, तो वह उसके साथ मारपीट करता था।

लड़की ने बताया कि वह पैसे देने के लिए इस हद तक मजबूर करता था कि वह अपनी मम्मी से चुराकर उसे पैसे देती थी। लड़की ने कहा कि आशिक अंसारी उसके साथ मंदिर में शादी कर चुका है, उसने कहा कि उनके मजहब में मंदिर नहीं जाते, लेकिन वह सिर्फ उसके लिए आया है। लड़की ने बताया कि इन सारी बातों से उसे लड़के पर भरोसा हो जाता था।

लड़की से कई बार किया रेप, अन्य हिंदू लड़कियों को भी फँसा चुका

अनिरुद्धाचार्य से लड़की ने यह भी बताया कि आशिक अंसारी कई बार उसका शारीरिक शोषण भी कर चुका है। लड़की की माँ ने इसे बलात्कार बताया। लड़की ने कहा कि उससे पहले भी आशिक अंसारी किसी हिंदू लड़की को फँसा चुका था और अब भी किसी हिंदू लड़की के साथ ही है।

लड़की की आपबीती सुन अनिरुद्धाचार्य जी महाराज ने क्या कहा?

लड़की की आपबीती सुनकर अनिरुद्धाचार्य जी महाराज ने साफ कहा कि लड़की ने नाबालिग लड़की को लव जिहाद में फँसाया और इसके लिए स्कूल और माँ-बाप दोनों जिम्मेदार हैं। उन्होंने लड़की को आगाह करते हुए कहा कि ऐसे मुस्लिम लड़के प्रेमजाल में फँसाकर लड़कियों को बेचने का काम करते हैं। अनिरुद्धाचार्य ने लड़की को बेहतर जीवन जीने की सीख दी और लव जिहाद से बचकर रहने की सलाह दी।

कथावाचक ने इसे बड़े पैमाने में लव जिहाद बताते हुए कहा, “ग्राउंड लेवल पर जिहाद घुसा पड़ा है। 16-16, 15-15 साल की लड़कियाँ मासूम होती हैं, तो वहीं से ब्रेनवॉश करना शुरू कर देते हैं। 18 साल की होते ही धर्मांतरण करा देंगे। फिर इन लड़कियों को ले जाकर दुबई में, कनाडा या किसी और देशे में ₹5-5 लाख या ₹10-10 लाख में बेच देंगे। इनका एजेंडा है हिंदू लड़कियों को फँसाना। कोई भी मुस्लिम कभी हिंदू का सगा नहीं हो सकता। कोई कितना भी कहे कि मेरा अब्दुल ऐसा नहीं हो सकता, उससे कहो तेरा ही अब्दुल ऐसा है।”

अनिरुद्धाचार्य जी महाराज ने लड़की को सीख दी कि वह मुस्लिम लड़के से बात करना बंद कर दे और पढ़-लिखकर कामयाबी हासिल करे। उन्होंने लड़की से कहा कि अब हिंदू शेरनी बनो और अपनी जैसी बाकी हिंदू लड़कियों को बचाओ। लड़की ने भी कथावाचक से वादा किया कि अब वह कभी भी उस मुस्लिम लड़के आशिक अंसारी से बात नहीं करेगी। साथ ही कथावाचक ने लड़की को मुस्लिम लड़के के खिलाफ रेप का केस दर्ज करने की सलाह भी दी।

मामले में देवरिया के विधायक ने पत्र लिखकर पुलिस से कार्रवाई की माँग की

अनिरुद्धाचार्य जी महाराज की कथा में 16 साल की लड़की को आपबीती सुनाते यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इसके बाद देवरिया सदर से BJP विधायक डॉ. शलभ मणि त्रिपाठी ने जिला पुलिस अधीक्षक को पत्र लिखकर मामले में कार्रवाई करने की माँग की।

पत्र में विधायक त्रिपाठी ने कहा कि अनिरुद्धाचार्य जी महाराज की कथा में पिछड़े वर्ग के यदुवंशी समाज से आने वाली इस नाबालिग लड़की ने अपने साथ एक ‘जिहादी’ आशिक अंसारी द्वारा शारीरिक शोषण किए जाने की बात कही है। आशिक अंसारी ने उससे स्कूल में संपर्क किया, उसे बहला-फुसलाकर अपने झाँसे में लिया और बाद में उसके साथ मारपीट, शारीरिक और मानसिक शोषण जैसे गंभीर अपराध को अंजाम दिया।

पत्र में लड़की की अन्य हिंदू लड़कियों द्वारा मुस्लिम लड़कों के जाल में फँसने वाली बात पर भी प्रकाश डाला गया। पत्र में लड़की के साथ हुई घटना को गंभीर, चिंताजनक और कानून-व्यवस्था के तहत संवेदनशील बताया है। यह लिखते हुए विधायक ने अपने पत्र में पुलिस अधीक्षक से तुरंत FIR दर्ज करते हुए दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की। साथ ही विधायक ने इस मामले में वीडियो जारी करते हुए अपनी बात दोहराई।

पुलिस की कार्रवाई, आशिक अंसारी गिरफ्तार

उधर, 10 मई 2026 को नाबालिग लड़की की माँ ने भी बरियारपुर पुलिस थाने में आरोपित आशिक अंसारी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। इस पर तुरंत संज्ञान लेते हुए पुलिस ने आरोपित आशिक अंसारी को मंगलवार (12 मई 2026) को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में लेकर जेल भेज दिया।

थाना इंचार्ज मनोज कुमार ने बताया कि आरोपित के खिलाफ BNS की धारा 64(1) और पॉक्सो एक्ट की धारा 3 और 4 के तहत कार्रवाई की गई है।

वहीं नाबालिग लड़की के स्कूल में हिंदू लड़कियो को मुस्लिम लड़कों द्वारा फँसाने वाले आरोपों को स्कूल प्रशासन नकार दिया है।

निर्भया को इंसाफ दिलाने वाली अधिवक्ता ने UP की NCRB रिपोर्ट को बताया उपलब्धि, बोलीं- मजबूत इच्छाशक्ति से बदली तस्वीर: जानिए सीमा कुशवाहा ने क्यों की CM योगी के सुशासन की सराहना

उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों से जुड़े मामलों में सुनवाई और दोषसिद्धि की दर को लेकर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) 2024 की रिपोर्ट ने एक बार फिर राज्य की कानून-व्यवस्था पर राष्ट्रीय बहस को तेज कर दिया है।

इस रिपोर्ट के आंकड़ों ने न सिर्फ उत्तर प्रदेश की न्यायिक और प्रशासनिक प्रणाली को सामने रखा बल्कि यह भी दिखाया कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति साफ हो, पुलिस-प्रशासन के स्तर पर सख्ती हो और अभियोजन तंत्र सक्रिय रहे तो जटिल और बड़े राज्य में भी अपराधियों को सजा दिलाने की रफ्तार बढ़ाई जा सकती है।

इसी कड़ी में सुप्रीम कोर्ट की वकील सीमा कुशवाहा ने टाइम्स ऑफ इंडिया में एक लेख लिखा है। इसमें उन्होंने NCRB की रिपोर्ट में यूपी के आंकड़ों की सराहना की है। उन्होंने यूपी की उपलब्धि को एक ‘मॉडल’ बताकर अन्य राज्यों को भी अपनाने का सुझाव दिया है।

कौन हैं सीमा कुशवाहा

सीमा कुशवाहा का नाम राष्ट्रीय स्तर पर कोई नया नहीं है। वे निर्भया मामले में पीड़िता पक्ष की वकील रही हैं और महिलाओं के अधिकार, पीड़िता न्याय तथा सामाजिक सुधार से जुड़े मुद्दों पर मुखर रहीं हैं। बाद में उन्होंने राजनीति में भी कदम रखा।

अलग-अलग चरणों में वे बहुजन समाज पार्टी से जुड़ी रहीं और पार्टी की पहली महिला राष्ट्रीय प्रवक्ता भी बनीं। उनके बयानों को केवल कानूनी टिप्पणी नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और सामाजिक संदेश के रूप में भी देखा जाता है। ऐसे में यूपी की NCRB रिपोर्ट पर उनकी प्रतिक्रिया का महत्व और बढ़ जाता है।

NCRB रिपोर्ट क्यों है चर्चा में

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी NCRB की रिपोर्ट देश में अपराधों के पैटर्न, न्यायिक प्रक्रिया, पुलिस-तंत्र और आपराधिक मामलों की स्थिति को समझने का प्रमुख सरकारी दस्तावेज मानी जाती है।

यह रिपोर्ट केवल यह नहीं बताती कि किस राज्य में कितने अपराध दर्ज हुए, बल्कि यह भी दिखाती है कि किन मामलों में सुनवाई हुई, कितने मामलों का निस्तारण हुआ, कितनों में दोषसिद्धि हुई और न्यायिक प्रणाली किस रफ्तार से काम कर रही है।

खासकर महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामले में दोषसिद्धि की दर बहुत अहम मानी जाती है, क्योंकि इससे यह समझ आता है कि दर्ज एफआईआर सिर्फ कागजों तक सीमित हैं या वास्तव में वे न्याय तक पहुँच रही हैं।

उत्तर प्रदेश जैसी विशाल जनसंख्या और विविध सामाजिक संरचना वाले राज्य के लिए यह डेटा और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। अक्सर बड़े राज्यों में केसों की संख्या भी अधिक होती है, लंबित मामलों का बोझ भी ज्यादा होता है और पुलिस-न्याय प्रणाली पर दबाव भी अत्यधिक रहता है।

इसके बावजूद अगर किसी राज्य में conviction rate यानी दोषसिद्धि दर बढ़ता है, तो उसे केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि सिस्टम की कार्यक्षमता का संकेत माना जाता है।

यूपी के आंकड़े क्या कहते हैं

NCRB की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में UP में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के 3,52,664 मामले ट्रायल के लिए लंबित थे। इनमें से 27,639 मामलों में सुनवाई पूरी हुई और 21,169 आरोपी दोषी ठहराए गए। रिपोर्ट के अनुसार यह देश में सबसे अधिक संख्या है।

सीमा ने लिखा कि इस रिपोर्ट में शामिल है कि कुल 27,743 मामलों का निस्तारण हुआ। यानी यूपी ने बड़ी संख्या में मामलों को निपटाने में सफलता हासिल की। इसके साथ ही राज्य का conviction rate 76.6% बताया गया है, जो एक प्रभावशाली दर है।

इसका मतलब ये है कि जिन मामलों की सुनवाई पूरी हुई, उनमें से बड़ी संख्या में आरोपी दोषी पाए गए। न्याय-प्रणाली की भाषा में यह एक मजबूत संकेत है कि पुलिस जाँच, अभियोजन और अदालतों की प्रक्रिया अपेक्षाकृत बेहतर तालमेल के साथ काम कर रही है।

रिपोर्ट में अन्य बड़े राज्यों की तुलना भी की गई है। उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, केरल, पंजाब और तमिलनाडु जैसे राज्यों के मुकाबले यूपी का प्रदर्शन बेहतर बताया गया है।

खास बात यह है कि कई मामलों में यूपी ने उन राज्यों को भी पीछे छोड़ा जिनकी प्रशासनिक संरचना छोटे आकार या अपेक्षाकृत कम आबादी के कारण अधिक चुस्त मानी जाती है। यही कारण है कि इस रिपोर्ट को केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक संस्थागत उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।

सीमा कुशवाहा का लेख क्या कहता है

सीमा कुशवाहा ने इस रिपोर्ट को लेकर जो रुख अपनाया, वह स्पष्ट रूप से सकारात्मक है। उन्होंने कहा कि यह रिपोर्ट साबित करती है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति मजबूत हो, प्रशासनिक मशीनरी सक्रिय रहे और न्यायिक प्रक्रिया में सख्ती बरती जाए तो बड़े और घनी आबादी वाले राज्य में भी उत्कृष्ट न्याय दिया जा सकता है।

सीमा के अनुसार, उत्तर प्रदेश ने यह दिखाया है कि महिलाओं की सुरक्षा और अपराधियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई केवल नारे नहीं, बल्कि प्रभावी नीति और प्रशासनिक संकल्प से संभव है।

उनकी टिप्पणी में तीन बातें विशेष रूप से उभरती हैं। पहली, उन्होंने दोषसिद्धि दर को शासन की उपलब्धि बताया। दूसरी, उन्होंने इसे महिलाओं की सुरक्षा के व्यापक संदर्भ में जोड़ा। तीसरी, उन्होंने संकेत दिया कि यूपी का मॉडल दूसरे राज्यों के लिए भी उपयोगी हो सकता है।

उनका यह दृष्टिकोण बताता है कि वे NCRB रिपोर्ट को महज तकनीकी डेटा की तरह नहीं देख रही हैं, बल्कि एक राजनीतिक-सामाजिक बदलाव के प्रमाण के तौर पर प्रस्तुत कर रही हैं।

राजनीतिक पृष्ठभूमि का असर

सीमा कुशवाहा की राजनीतिक पृष्ठभूमि उनके बयान को और भी दिलचस्प बनाती है। वे केवल एक वकील नहीं हैं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा भी रही हैं।

BSP से उनकी निकटता और बाद में BJP में शामिल होने की खबरों ने उन्हें एक ऐसे सार्वजनिक व्यक्तित्व के रूप में स्थापित किया है, जिनकी बात को लोग अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोण से पढ़ते हैं। इसलिए जब वे यूपी सरकार की तारीफ करती हैं, तो इसे सिर्फ निष्पक्ष कानूनी राय के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि उसके राजनीतिक अर्थ भी निकाले जाते हैं।

यह बात भी महत्वपूर्ण है कि उनके बयान में आलोचना की तुलना में प्रशंसा का स्वर अधिक है। वे यह स्वीकार करती हैं कि लंबित मामलों, फास्ट ट्रैक कोर्टों की संख्या, अभियोजन की गुणवत्ता और साइबर अपराध जैसे क्षेत्रों में अभी काम बाकी है। लेकिन इन सीमाओं के बावजूद उनका मुख्य निष्कर्ष सकारात्मक है। यानी वे कहती हैं कि व्यवस्था में सुधार संभव है और यूपी ने उस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है।

महिलाओं की सुरक्षा पर संदेश

इस पूरे विवाद या बहस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू महिलाओं की सुरक्षा है। NCRB की रिपोर्ट केवल दोषसिद्धि की दर नहीं बताती, बल्कि यह भी संकेत देती है कि महिला पीड़िताओं को न्याय देने की प्रक्रिया किस हद तक तेज हुई है।

जब अदालतें मामलों को समय पर निपटाती हैं और दोषियों को सजा मिलती है, तो समाज में एक निवारक प्रभाव (deterrent effect) या डर का माहौल पैदा होता है। अपराधियों को यह संदेश जाता है कि कानून केवल दर्ज होने वाली प्रक्रिया नहीं, बल्कि वास्तविक परिणाम देने वाली व्यवस्था है।

सीमा कुशवाहा ने इसी बिंदु को अपने लेख का केंद्रीय आधार बनाया है। उन्होंने कहा कि जब criminal justice system में accountability बढ़ती है, तो महिला सुरक्षा भी मजबूत होती है।

उनके मुताबिक UP ने एंटी रोमियो स्क्वाड, फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट्स, पुलिस की जवाबदेही और अभियोजन दक्षता (prosecutorial efficiency) के जरिये एक ऐसा ढाँचा तैयार किया है जो महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर असर डाल सकता है।

यह बात पूरी तरह सही हो या नहीं, इस पर बहस हो सकती है, लेकिन इतना तय है कि उनका विमर्श राज्य को सुरक्षा और न्याय के सकारात्मक उदाहरण के रूप में रखता है।

उपलब्धि के साथ चुनौतियाँ भी

हालाँकि रिपोर्ट की सकारात्मक तस्वीर के बावजूद कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं। सबसे बड़ी समस्या लंबित मामलों की भारी संख्या है। 3,52,664 मामलों का पेंडिंग रहना यह बताता है कि न्याय प्रणाली पर अभी भी बहुत बोझ है।

इसके अलावा conviction rate अच्छा होना महत्वपूर्ण है, लेकिन अगर केस वर्षों तक लंबित रहें, तो पीड़ितों को पूरा न्याय नहीं मिल पाता। न्याय में देरी, कई बार न्याय से इनकार के बराबर मानी जाती है। इसलिए दोषसिद्धि की अच्छी दर के साथ-साथ समयबद्ध सुनवाई भी बेहद जरूरी है।

इसके अलावा साइबर अपराध, दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, यौन अपराध, ट्रैफिकिंग और आर्थिक शोषण जैसे मामलों पर और गंभीर ध्यान देने की आवश्यकता है। आधुनिक अपराधों की प्रकृति बदल रही है, इसलिए पुलिस और अभियोजन प्रणाली को भी लगातार अपडेट होना पड़ेगा।

सीमित संसाधनों या पुराने ढाँचों से काम नहीं चलेगा। इस दिशा में डिजिटल फॉरेंसिक, महिला पुलिस कर्मियों की संख्या बढ़ाना, संवेदनशील जाँच प्रक्रिया और पीड़ित-केंद्रित न्याय प्रणाली को और मजबूत करना होगा।

क्या UP सच में ‘मॉडल’ हो सकता है

सीमा कुशवाहा ने यूपी के प्रदर्शन को एक ‘मॉडल’ के रूप में पेश किया है। यह दावा पूरी तरह राजनीतिक या प्रतीकात्मक नहीं है, क्योंकि आँकड़े सचमुच मजबूत हैं। लेकिन किसी राज्य को मॉडल कहने के लिए केवल conviction rate काफी नहीं होता।

उस राज्य में यह भी देखना होगा कि अपराध दर्ज करने की प्रक्रिया कितनी निष्पक्ष है, पीड़ितों को रिपोर्ट लिखवाने में कितनी सुविधा है, जाँच कितनी पारदर्शी है और समाज के कमजोर वर्गों और आखिरी तबके तक न्याय किस समानता के साथ पहुँच रहा है। यानी ‘मॉडल’ की परिभाषा व्यापक होनी चाहिए।

फिर भी यह मानना पड़ेगा कि यूपी जैसे बड़े राज्य में यदि महिलाओं से जुड़े मामलों में सजा दिलाने की दर ऊँची है, तो यह एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। खासकर उस राज्य में, जिसे लंबे समय तक कानून-व्यवस्था की चुनौतियों, प्रशासनिक जटिलताओं और न्यायिक बोझ के कारण आलोचना झेलनी पड़ी।

रिपोर्ट का व्यापक राजनीतिक अर्थ

उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था पर राष्ट्रीय चर्चा हमेशा से राजनीतिक रही है। किसी सरकार के लिए आपराधिक डेटा केवल प्रशासनिक सूचकांक नहीं होता, बल्कि राजनीतिक पूँजी भी बन जाता है। अगर दोषसिद्धि दर बढ़ती है तो सरकार इसे अपनी सख्ती और व्यवस्था-निर्माण की सफलता बताती है।

कुल मिलाकर सीमा कुशवाहा का बयान यूपी की NCRB रिपोर्ट पर एक सकारात्मक, प्रशंसात्मक और समर्थन करने वाला बयान है। उन्होंने उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामलों में बढ़ी हुई दोषसिद्धि दर को मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक सख्ती और न्यायिक दक्षता का नतीजा बताया है।

उनके मुताबिक यूपी ने यह सिद्ध किया है कि बड़ा राज्य होने के बावजूद प्रभावी न्याय संभव है। साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि लंबित मामलों, अभियोजन तंत्र और साइबर अपराधों पर अभी और काम करने की जरूरत है।

इसलिए यदि इस खबर को निष्पक्ष रूप से देखा जाए, तो यह सिर्फ एक आंकड़ों की रिपोर्ट नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा के क्षेत्र में आई एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक उपलब्धि की कहानी है।

सीमा कुशवाहा का लेख इस कहानी को और मजबूत बनाता है। उन्होंने इस उपलब्धि को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया है और यूपी को एक ऐसे राज्य के रूप में दिखाया है, जहाँ सुधार संभव ही नहीं, बल्कि दिखाई भी दे रहे हैं।

NEET पेपर लीक की पूरी पड़ताल: ₹5 लाख तक में बिके 600 नंबर वाले ‘गेस पेपर’, जानें- डॉक्टर-कोचिंग सेंटर-एन्क्रिप्टेड ऐप्स का रोल और कैसे काम करता था सिंडिकेट

नीट 2026 की परीक्षा पेपर लीक की वजह से रद्द कर दी गई। नया डेट जल्द ही NTA घोषित करेगा। ‘गेस पेपर’ के रूप में लीक हुए करीब 600 अंक से सवालों की जाँच राजस्थान, बिहार, केरल समेत कई जगहों पर की जा रही है। सवाल ये है कि वास्तव में ये गेस पेपर था या नीट 2026 के प्रश्नपत्र में बड़ा हिस्सा, जिससे रिजल्ट के वारे- न्यारे हो जाने थे।

‘गेस पेपर’ के रूप में लीक हुआ प्रश्नपत्र

गेस पेपर के रूप में प्रश्नपत्र लीक किया गया। गेस पेपर व्हाट्स एप पर तेजी से वायरल हुआ। परीक्षा से एक दिन पहले हाथ से लिखा गया ‘गेस पेपर’ छात्रों को दिया गया। इसके 140-150 सवाल हुबहू नीट के प्रश्नपत्र से मैच कर गए। जानकारी के मुताबिक बायोलॉजी के सभी 90 सवाल और रसायन विज्ञान के करीब 45 सवाल इस गेस पेपर में मौजूद थे। नीट की परीक्षा में 180 सवाल पूछे जाते हैं और एक ही पेपर होता है। ये पेपर 720 नंबर का होता है। ऐसे में ‘गेस पेपर’ से करीब 600 नंबर के सवाल एकदम एक जैसे थे। यहाँ तक कि उत्तर के विकल्प का क्रम भी समान था।

ये गेस पेपर दो दिन पहले ही राजस्थान के सीकर के छात्रों तक पहुँच गए।

राजस्थान पुलिस के स्पेशल ऑपरेशन्स ग्रुप के एडिशनल डायरेक्टर जनरल विशाल बंसल के मुताबिक, NEET के ‘गेस पेपर’ में करीब 410 सवाल हैं। इनमें से 120 सवाल परीक्षा में पूछे गए थे। बताया जा रहा है कि ये ‘गेस पेपर’ स्टूडेंट्स के बीच काफी पहले से सर्कुलेट होने लगा था। 3 मई की परीक्षा से करीब 15 दिन या महीने भर पहले छात्र-छात्राओं को ये गेस पेपर मिलना शुरू हो गया था।

इंडिया टुडे ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि गेस पेपर परीक्षा से दो दिन पहले 5-5 लाख रुपए में बिके, लेकिन परीक्षा से एक रात पहले इसे 50-50 हजार में बेचा गया, ताकि अधिक से अधिक पैसे कमाए जा सकें। इस मामले में पुलिस ने जिन लोगों ने हिरासत में लिया, उनके मोबाइल पर ये मैसेज ‘फॉर्वडेड मेनी टाइम्स’ दिख रहा है अर्थात इस मैसेज को कई बार ‘सेंड’ किया गया।

राजस्थान पुलिस ये भी पता लगा रही है कि क्या इस गेस पेपर के आधार पर कोई चीटिंग या क्रिमिनल एक्टिविटी हुई है।

केरल से जुड़ा कनेक्शन

इंडिया टुडे के मुताबिक, गेस पेपर का लिंक राजस्थान के चूरू से गए एक छात्र से जुड़ा है, जो केरल में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहा है। उसने 1 मई को अपने दोस्त को ये गेस पेपर भेजे थे। केरल के एमबीबीएस छात्र को पुलिस ने हिरासत में ले लिया और उससे पूछताछ की जा रही है।

जानकारी के मुताबिक उसके दोस्त ने इसे पीजी संचालक को दिया और वहाँ रहने वाले छात्रों, करियर काउंसलर से होते हुए दूसरे जगहों के स्टुडेंट्स तक पहुँचा। इसको लेकर पीजी संचालक भी जाँच एजेंसियों के रडार पर है। हालाँकि परीक्षा के बाद इसी ने सीकर के उद्योग नगर पुलिस थाने में जाकर पेपर लीक की शिकायत की और NTA को भी जानकारी दी।

जाँच में सामने आया है कि उसे पेपर परीक्षा से पहले मिल चुका था और उसने स्टूडेंट्स को आगे बढ़ाया। बताया जा रहा है कि पकड़े जाने के डर से उसने पुलिस को जानकारी दी।

जाँच कर रही पुलिस की टीम ने सीकर के कई कोचिंग सेंटर्स के मालिकों से पूछताछ की है। इसमें लिंक का पता चला और जयपुर के कई कोचिंग सेंटर्स में जाँच के बाद जाँच टीम गुरुग्राम पहुँची।

एसओजी की जाँच में पता चला है कि मनचाहे रेट पर पेपर बाँटा गया। यह नासिक, सीकर- जयपुर, केरल, देहरादून, गुरुग्राम, बिहार, जम्मू कश्मीर तक पहुँचा। अब इस मामले की जाँच सीबीआई को सौंप दी गई है।

गुरुग्राम का नाम अहम ट्रांजिट पॉइंट के रूप में सामने आया है। जाँच रिपोर्ट के मुताबिक, नासिक की एक प्रिंटिंग प्रेस से पेपर की फिजिकल कॉपी लीक हुई थी, जिसे गुरुग्राम लाया गया था। ये पेपर गुरुग्राम के एक डॉक्टर को भी दी गई। इसके डुब्लीकेट कॉपी सेट तैयार किए गए।

जाँच के दौरान पुलिस ने दिल्ली के महिपालपुर से किर्गिस्तान से एमबीबीएस कर आए डॉक्टर अखलाक अहमद को गिरफ्तार किया है । उसकी भूमिका को लेकर पुलिस पूछताछ कर रही है। उसके अलावा दो अन्य लोगों को भी पुलिस ने पकड़ा है।

ये बात भी सामने आ रही है कि गेस पेपर का फैलाव सिर्फ व्हाट्स एप के जरिए ही नहीं हुआ, बल्कि एंड टू एंड एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग एप्स पर भी इसे शेयर किए गए। बताया जा रहा है कि ‘गेस पेपर’ का प्रिंट आउट निकालकर ऑफलाइन भी स्टूडेंट्स को दिया गया।

अब सवाल यह उठता है कि यह नेटवर्क कहाँ तक फैला हुआ है और इसका मास्टरमाइंड कौन है?

पेपर लीक पर बनी कमेटी की सुझाव

2024 में हुए नीट पेपर लीक को लेकर केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय ने इसरो के पूर्व अध्यक्ष के राधाकृष्णन की अध्यक्षता में 7 सदस्यीय कमेटी का गठन किया था। कमेटी में AIIMS के पूर्व निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया, हैदराबाद यूनिर्वसिटी के कुलपति बीजे राव, IIT मद्रास के प्रोफेसर पंकज बंसल, IIT दिल्ली के प्रोफेसर अदित्य मित्तल और शिक्षा मंत्रालय के संयुक्त सचिव गोविन्द जैसवाल शामिल थे।

कमेटी ने 101 सिफारिशों की लिस्ट सौंपी थी। इसमें एनटीए का पुनर्गठन करने और इसकी तीन उप समितियाँ बनाने को कहा था। NTA की क्षमता बढ़ाने की सिफारिश की थी। दूसरी परीक्षाओं से दूरी बनाए रखने को कहा था।

चुनाव की तरह परीक्षा कराने को गया था। इसके लिए बायोमैट्रिक के इस्तेमाल की बात कही गई थी। पूरे प्रशासनिक तंत्र को इसमें शामिल होने की सिफारिश की गई थी। परीक्षा केन्द्रों को जिला प्रशासन और पुलिस की निगरानी में सील करने को कहा गया था।

सरकारी स्कूलों, नवोदय या केन्द्रीय विद्यालयों को नीट परीक्षा केन्द्र बनाने की सिफारिश की गई थी। स्कूलों में डिजिटल बुनियादी ढाँचा विकसित करने पर जोर दिया गया था। परीक्षा को हाईब्रिड मोड में कराने को कहा था ताकि कम्प्यूटर के साथ पेन-पेपर पर भी परीक्षा हो। जेईई की परीक्षा की तरह दो चरणों में परीक्षा कराने का भी सुझाव दिया गया था।

पेपर लीक ‘गंभीर अपराध’ की श्रेणी में शामिल

प्रश्नपत्र या उत्तर लीक होना गंभीर अपराध है। परीक्षा खत्म होने के बाद OMR शीट बदलना, नंबर बढ़ाने के लिए डेटा बदलना या उत्तर पुस्तिका से छेड़छाड़ करना भी कानून के तहत दंडनीय अपराध है। किसी के बदले पेपर देने वाला या बाहर से उत्तर उपलब्ध करानेवाला भी अपराधी माना जाएगा।

फर्जी वेबसाइट बना कर प्रश्नपत्र या उत्तर डालना, नकली परीक्षा पोर्टल बनाना या कम्प्यूटर सिस्टम हैक करना साइबर अपराध है। सिंडिकेट या गैंग बनाकर परीक्षा में धांधली करवाने को संगठित अपराध माना जाएगा। परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसी, तकनीक देने वाली कंपनी या परीक्षा केन्द्र पर धाँधली के आरोप लगने पर कार्रवाई की बात कही गई है।

पैसे के लिए किसी भी गोपनीय जानकारी लीक करना अपराध की श्रेणी में आएगा। परीक्षा केन्द्र में घुसना, अधिकारियों को धमकाना गुनाह है। सरकार के तय सुरक्षा मानकों को नहीं बदला जा सकता। इसके खिलाफ काम करने पर कार्रवाई हो सकती है।

कानून में साफ तौर पर छात्र-छात्राओं और नकल कराने वाले गिरोह या व्यक्ति के बीच अंतर किया गया है। साधारण छात्र पर अलग स्थिति हो सकती है, लेकिन पेपर लीक सिंडिकेट से जुड़े लोग कठोर दंड के दायरे में आएँगे।

दोषियों को कितनी मिलेगी सजा

अगर कोई व्यक्ति पेपर लीक, OMR छेड़छाड़ या परीक्षा में नकल करते हुए पकड़ा जाता है तो उसे 3- 5 साल तक जेल हो सकती है। साथ ही उस पर 10 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

अगर कोई गिरोह, गैंग या सिंडिकेट परीक्षा धाँधली में शामिल पाया जाता है तो उसे 5 साल से 10 साल तक की जेल हो सकती है। साथ ही कम से कम 1 करोड़ रुपए का जुर्माना लग सकता है।

अगर परीक्षा आयोजित करने वाली कंपनी या एजेंसी दोषी है तो उसे 1 करोड़ रुपए तक का जुर्माना लग सकता है। 4 साल तक परीक्षा कराने पर रोक के साथ-साथ परीक्षा का पूरा खर्च भी वसूला जा सकता है।

अगर किसी कंपनी का निदेशक, मैनेजर या अधिकारी पेपर लीक में शामिल है, तो उसे 3 – 10 साल तक की जेल के साथ-साथ 1 करोड़ रुपये तक जुर्माना देना पड़ सकता है।

वहीं अगर संगठित अपराध साबित हो जाता है, तो आरोपियों की संपत्ति जब्त भी की जा सकती है। यह कानून देश की लगभग सभी बड़ी केंद्रीय परीक्षाओं पर लागू होता है। इनमें UPSC, SSC, रेलवे, बैंकिंग, NEET, JEE, CUET, NET समेत दूसरी परीक्षाएँ शामिल हैं।

कोई दे रहा CM शुभेंदु को दफनाने की धमकी, कोई कर रहा हिंदुओं के नरसंहार की बात… बंगाल में भगवा से सीमा पार बौखलाहट, जानिए- क्यों बाड़बंदी से डरा बांग्लादेश

पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार बनते ही पड़ोसी देश बांग्लादेश में बौखलाहट साफ नजर आ रही है। कहीं बंगाल की नई सरकार के खिलाफ सड़कों पर प्रदर्शन शुरू हो गए हैं, तो कहीं कट्टरपंथी मौलाना राज्य के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी को खुलेआम जान से मारने की धमकी दे रहे हैं। ना केवल कट्टरपंथी मौलाना बल्कि बांग्लादेश की सरकार में अहम पदों पर बैठे लोग भी इससे बौखलाहट में हैं।

इसके पीछे वजह केवल सरकार बदलना और एक पार्टी की जगह दूसरी पार्टी का आना नहीं है बल्कि उस पूरी वैचारिकी का बदलाव है जो इस सत्ता परिवर्तन से बंगाल में होने जा रहा है। भारत की खुली सीमा बांग्लादेश घुसपैठियों के लिए एक प्रवेश द्वार की तरह काम कर रही थी। ममता बनर्जी ने इसे बंद करने का विरोध कर रहीं थी लेकिन अब हालात बदल गए हैं। शुभेंदु अधिकारी ने बाड़बंदी को प्राथमिकता दी है और यही नकेल कट्टरपंथियों की बेचैनी को बढ़ाती जा रही है।

शुभेंदु सरकार का BSF को बाड़बंदी को दी जमीन, ममता सरकार ने अटकाकर रखी

बंगाल में सत्ता संभालते ही मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने अपने पहले ही कैबिनेट फैसलों में भारत-बांग्लादेश सीमा की सुरक्षा को सबसे बड़ी प्राथमिकता दी। नई सरकार ने फैसला लिया कि भारत-बांग्लादेश सीमा पर जिन इलाकों में अब तक बाड़बंदी नहीं हो सकी थी, वहाँ के लिए जरूरी जमीन 45 दिनों के भीतरBSF को सौंप दी जाएगी।

शुभेंदु अधिकारी ने साफ कहा कि उनकी सरकार सीमा सुरक्षा को लेकर कोई समझौता नहीं करेगी। राज्य सरकार के इस फैसले से सीमा पर बाड़बंदी पूरी होने के बाद डेमोग्राफी बदलने की साजिश के तहत घुसपैठ, मवेशियों की तस्करी और गैरकानूनी नेटवर्क पर रोक लगेगी।

यब जमीन ममता बनर्जी की TMC सरकार के कार्यकाल में अटका हुआ था। यह मामला कलकत्ता हाई कोर्ट तक पहुँचा था, तब हाई कोर्ट ने तत्कालीन ममता सरकार को फटकारा BSF को तय जमीन न देने के लिए फटकारा था और सरकार के अधिकारी पर ₹25 हजार का जुर्माना भी लगाया था।

बाड़बंदी के फैसले से बांग्लादेश में बेचैनी, तारिक रहमान के एडवाइजर का बयान

शुभेंदु सरकार के इस फैसले से बांग्लादेश में बेचैनी बढ़ गई। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के विदेशी मामलों के सलाहकार (एडवाइजर) हुमायूं कबीर ने इस फैसले पर कहा कि बांग्लादेश को ‘काँटेदार तार’ से डराया नहीं जा सकता। इसके साथ ही बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड (BGB) को अलर्ट पर रखे जाने की भी खबर सामने आई है।

यानी जिस फैसले को पश्चिम बंगाल की नई BJP सरकार सीमा सुरक्षा और राष्ट्रीय हित से जोड़कर देख रही है, उसी फैसले ने बांग्लादेश में राजनीतिक और कट्टरपंथी हलकों की बेचैनी बढ़ा दी है।

बांग्लादेश में विरोध प्रदर्शन और कट्टरपंथियों के भड़काऊ बयान

बंगाल में BJP सरकार बनने के बाद बांग्लादेश के इस्लामी कट्टरपंथियों के बीच भी खलबली मची है। ये कट्टरपंथी सड़कों पर उतरकर बंगाल की नई सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। वहीं कई मौलाना भी खुलकर बंगाल की BJP सरकार और हिंदुओं के खिलाफ जहर उगलते दिखाई दे रहे हैं।

एक वायरल वीडियो में बांग्लादेश के कट्टरपंथी संगठन ‘इंसाफ कायमकारी छात्र श्रमिक जनता’ से जुड़े मौलाना ने हिंदू घृणा में कहा, “अगर भारत के 40 करोड़ मुस्लिम गुस्से में आ गए तो हिंदू नहीं बचेंगे।” उसने पाकिस्तान की मदद से भारत पर हमला करने और ‘तीन घंटे में कब्जा’ करने जैसे बयान भी दिए। वीडियो में उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का नाम लेकर धमकी दी।

शुभेंदु अधिकारी को बॉर्डर पर गाड़ने की धमकी

एक और वीडियो सामने आया, जिसमें एक मुस्लिम व्यक्ति बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी को सीमा पर दफन करने की धमकी जारी कर रहा है। यह वीडियो ‘द इंकलाब’ नाम से फेसबुक पेज से प्रसारित किया जा रहा है। हालाँकि, पुलिस इस वीडियो की पुष्टि के लिए जाँच कर रही है।

उधर, बांग्लादेश का मौलाना इनायतुल्लाह अब्बासी कहता है कि अगर बंगाल में मुस्लिम सुरक्षित नहीं है, तो बांग्लादेश में भी हिंदुओं को सुरक्षित नहीं रहने दिया जाएगा। वह बांग्लादेश की तारिक रहमान सरकार को भारत के साथ व्यापारिक संबंध तोड़ने की चेतावनी देने के लिए भड़का रहा है।

बंगाल में ‘पोरिबर्तन’ की जमीनी हकीकत, सीमापार के गोरख धंधे होंगे अब बंद

पश्चिम बंगाल में BJP की बढ़ती राजनीतिक ताकत और चुनावी सफलता के बाद बांग्लादेश की बौखलाहट साफ दिख रही है। बंगाल की करीब 2200 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा बांग्लादेश से लगती है और इसका एक हिस्सा खुला हुआ था। वर्षों से यह इलाका अवैध घुसपैठ, पशु तस्करी, नकली नोटों के नेटवर्क तथा कट्टरपंथी गतिविधियों का हब बना हुआ था।

पश्चिम बंगाल में तुष्टिकरण की राजनीति के कारण सीमा सुरक्षा को लेकर ममता बनर्जी की सरकार में कठोर कदम नहीं उठाए गए। वोट बैंक की राजनीति के चलते अवैध घुसपैठियों को संरक्षण मिलता रहा और धीरे-धीरे कई सीमावर्ती जिलों की जनसांख्यिकी तक प्रभावित हुई। यहाँ तक बातें सामने आईं कि बांग्लादेश की और से किए अवैध कामों को तुष्टिकरण की राजनीति में डूबी सरकार की ‘ममता’ मिली हुई थी।

अब जैसे-जैसे बीजेपी का प्रभाव बढ़ रहा है तो वैसे-वैसे उन तत्वों में घबराहट दिख रही है जो सीमा पार से चलने वाले अवैध कारोबार और राजनीतिक संरक्षण पर निर्भर थे। बांग्लादेश के कट्टरपंथी संगठनों और वहाँ के मजहबी नेताओं और सरकारी अधिकारियों की प्रतिक्रियाओं को इसे से जोड़कर देखे जाने की जरूरत है। उन्हें डर है कि यदि बंगाल में सख्त प्रशासनिक व्यवस्था लागू होती है तो अब तक जिन अवैध गतिविधियों को संरक्षण मिला हुआ था उन पर अंकुश लग सकता है।

‘ये हमें थूक कर या मूत कर खिलाते हैं’: पिंकी चौधरी ने बताया भंडारा में मुस्लिम से क्यों छीनी प्लेट, जानिए इस्लाम को लेकर क्या बोले

इन दिनों सोशल मीडिया पर हिंदू रक्षा दल के अध्यक्ष पिंकी चौधरी का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में पिंकी को एक भंडारे के दौरान एक मुस्लिम व्यक्ति से खाने की प्लेट छीनते हुए देखा जा सकता है। इस वीडियो के सामने आने के बाद विवाद खड़ा हो गया है। पिंकी चौधरी द्वारा मुसलमानों के खिलाफ की गई टिप्पणियों को लेकर भी विवाद बढ़ गया है। सोशल मीडिया पर इस घटना को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ देखने को मिल रही हैं।

कुछ लोग इस व्यवहार की आलोचना करते हुए इसे समाज में नफरत फैलाने वाला बता रहे हैं तो वहीं कुछ अन्य यूजर्स इस मामले को लेकर अलग-अलग राय व्यक्त कर रहे हैं। फिलहाल इस वायरल वीडियो पर चर्चा जारी है। ऑपइंडिया ने इस वायरल वीडियो को लेकर पिंकी चौधरी से ही बात की है।

जब पिंकी चौधरी से वीडियो की सच्चाई और उसमें दिख रहे घटनाक्रम पर सवाल किया गया तो पिंकी ने कहा कि वीडियो सच है। पिंकी चौधरी ने आगे अपनी प्रतिक्रिया में कहा, “जब धर्म के आधार पर देश का बँटवारा हो गया, तो अब ये लोग यहाँ क्या कर रहे हैं? अगर ये प्यार से रहें, लव जिहाद न करें और हिंदुओं का कत्लेआम न करें तो ठीक है। लेकिन इनकी मंशा गलत है और मैं उसी का विरोध करता हूँ।”

मुस्लिम मंदिरों का प्रसाद नहीं लेता तो भंडारा क्यों?

पिंकी का मुस्लिमों के विरोध को लेकर कहना है, “हर रोज मस्जिदों और मदरसों से लव जिहाद चल रहा है। हमारी नाबालिग बहन-बेटियों को बहला-फुसलाकर निकाह किया जा रहा है। हिंदू ऐसा कभी नहीं करता।” पिंकी का कहना है कि मुस्लिम ने हिंदुओं को कभी नहीं खिलाया है। पिंकी ने कहा, “अगर खिलाया भी है, तो थूक कर या मूत कर खिलाया है और सबसे बड़ी बात किया कभी हमारे मंदिरों का प्रसाद ये (मुस्लिम) कभी लेते हैं क्या? मैं इसीलिए मुसलमानों का विरोध करता हूँ।”

पिंकी चौधरी ने कहा कि जो जिहादी कुरान को फॉलो करता है वह कभी भारत का नहीं हो सकता। पिंकी ने कहा, “हर रोज ISI से जुड़े आतंकी यहाँ पकड़े जा रहे हैं और उनके तार पाकिस्तान से पाए जा रहे हैं। ये सब आतंकी है ये लोग हमें मारना चाहते हैं कभी हमें तो कभी योगी जी को मारने की धमकी देते हैं। ये हमारी धार्मिक यात्राओं पर हमला करते हैं और हमारे मंदिरों को तोड़कर मस्जिद-मदरसे बना रहे हैं।”

पिंकी ने कहा, “कश्मीर में कलमा पढ़ाकर मारा जा रहा है। मुंबई में कलमा पढ़वाकर हमला किया गया।” जब हमने पिंकी से कहा कि सभी मामलों में कानून अपना काम कर रहा है तो इसके जवाब में पिंकी चौधरी कहते हैं कि ‘कानून अपना काम कर रहा है तो मैं अपने भाइयों को जगाने का काम कर रहा हूँ’।

इस्लाम कैंसर से भी बुरी बीमारी

अपने वीडियो को ‘जहर फैलाए जाने वाला’ बताए जाने को लेकर पिंकी ने कहा, “यह जहर पहले ही फैला देना चाहिए था। इस्लाम कैंसर से भी बुरी बीमारी है। इसे समाप्त करने के लिए हिंदू को पहले ही जागरूक हो जाना चाहिए था। हिंदू हमेशा प्यार से रहा है लेकिन इन्होंने कभी भाईचारा नहीं निभाया।” पिंकी ने कहा, “आज विश्व में मुसलमानों के 58 देश हैं। ईसाईयों के सैकड़ों देश हैं लेकिन हिंदुओं का विश्व में एक भी देश नहीं है क्योंकि हिंदुओं ने सभी को हमेशा अपने गले लगाया है।”

पिंकी ने कहा, “ये कोई टैक्स नहीं देते हैं। फ्री का खाते हैं। इनको हमारे देश में रहने का कोई अधिकार नहीं है। धर्म के आधार पर जब बँटवारा हो गया तो ये लोग अभी तक यहाँ क्या कर रहे हैं?” पिंकी को अपने बयानों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का भी डर नहीं है। पिंकी ने कहा, “हो जाए कार्रवाई मुझे कोई डर नहीं है। मैं अपनी बात पर अडिग हूँ। वह खाना मेरे पैसे का था, मेरे घर का था। जैसे एक परिवार अपने सदस्यों को खिलाता है, वैसे ही हम अपने लोगों (हिंदुओं) को खिलाएँगे।”