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‘कॉन्ग्रेस के काले कारनामे, ‘लाल डायरी’ के पन्ने खुले तो अच्छे-अच्छे निपट जाएँगे’: राजस्थान से PM मोदी ने किसानों के खाते में भेजे ₹18000 करोड़

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजस्थान में कई विकास परियोजनाओं की का शुभारंभ किया और साथ ही राज्य की कॉन्ग्रेस सरकार पर भी बरसे। इस दौरान उन्होंने देश भर के करोड़ों किसानों को नमन करते हुए कहा कि खाटू श्याम जी की ये धरती देश भर के श्रद्धालुओं को भरोसा और उम्मीद देती है। उन्होंने वीरों की भूमि शेखावाटी से देश के लिए अनेक विकास परियोजनाओं की शुरुआत करने का अवसर मिलने को अपना सौभाग्य करार दिया।

पीएम मोदी ने कहा कि यहाँ से देश के करोड़ों किसानों को ‘PM किसान सम्मान निधि’ के लगभग 18,000 करोड़ रुपए सीधे उनके बैंक खातों में भेजे गए हैं। उन्होंने कहा कि आज देश में सवा लाख ‘पीएम किसान समृद्धि केंद्रों’ की शुरुआत की गई है। गाँव और प्रखंड स्तर पर इन केंद्रों से करोड़ों किसानों को लाभ होगा। उन्होंने बताया कि 1500 से ज़्यादा FPO के लिए, किसानों के लिए ‘ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ONDC)’ का लोकार्पण भी हुआ है।

शेखावाटी की धरती पर PM मोदी, किसानों को किया नमन

उन्होंने कहा कि इससे देश के किसी भी कोने में बैठे किसान के लिए अपनी उपज बाजार में पहुँचाना और आसान हो जाएगा। पीएम मोदी ने बताया कि आज भी देश के किसानों के लिए एक नया यूरिया गोल्ड शुरू किया गया है। राजस्थान के अलग-अलग शहरों को नए मेडिकल कॉलेज और मॉडल स्कूल का उपहार भी मिला है। पीएम मोदी ने इसके लिए राजस्थान की जनता, देश की जनता और खासकर किसान भाई-बहनों को खास शुभकामनाएँ दी।

पीएम मोदी ने कहा, “आजादी के इतने दशक बाद आज देश में ऐसी सरकार आई है, जो किसान का दुख-दर्द समझती है, किसान की चिंता समझती है इसलिए पिछले 9 वर्षों में लगातार किसानों के हित में फैसले लिए गए हैं। किसान का सामर्थ्य, किसान का परिश्रम मिट्टी से भी सोना निकाल देता है। इसलिए हमारी सरकार देश के किसान के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी है। पीएम-किसान की आज की 14वीं किश्त को जोड़ दें तो अब तक 2 लाख 60 हजार करोड़ से अधिक रुपए किसानों के बैंक खातों में सीधे भेजे गए हैं। इन पैसों ने छोटे-छोटे अनेक खर्च निपटाने में किसानों की बहुत मदद की है।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शेखावाटी में आगे कहा कि उनकी सरकार कैसे अपने किसान भाइयों के पैसे बचा रही है, इसका एक उदाहरण यूरिया की कीमतें भी हैं। उन्होंने जानकारी दी कि आज भारत में यूरिया की जो बोरी हम किसानों को 266 रुपए में देते हैं उतनी ही यूरिया हमारे पड़ोस में पाकिस्तान के किसानों को 800 रुपए में मिलता है, बांग्लादेश के किसानों को 720 रुपए में मिलता है, चीन में 2100 रुपए में और अमेरिका में 3000 रुपए से अधिक में मिलता है।

पीएम मोदी ने ये भी कहा कि भारत का विकास तभी हो सकता है, जब भारत के गाँवों का विकास हो। भारत विकसित भी तभी बन सकता है, जब भारत के गाँव विकसित हों। उन्होंने कहा कि हमारी सरकार ने मेडिकल की पढ़ाई को मातृभाषा में कराने का भी रास्ता बना दिया है। साथ ही कहा कि अब ये नहीं होगा कि अंग्रेजी न जानने के कारण किसी गरीब की बेटी और बेटा डॉक्टर न बन पाए और ये भी मोदी की गारंटी है।

बकौल पीएम मोदी, सफलता तब बड़ी होती है जब सपने बड़े होते हैं। उन्होंने कहा कि राजस्थान तो भारत का वह राज्य है, जिसके वैभव ने सदियों तक दुनिया को हैरान किया है। उस विरासत को संरक्षित करने पर जोर देते हुए उन्होंने संकल्प लिया कि राजस्थान को आधुनिक विकास की ऊँचाई तक भी पहुँचाना है। इस दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के जल्द स्वास्थ्य लाभ की कामना भी की।

सीकर में पीएम मोदी ने विशाल जनसभा को किया संबोधित

सीकर में रैली के दौरान उपस्थित भीड़ को देख कर पीएम मोदी ने कहा कि ये जन सैलाब बता रहा है कि आने वाले चुनाव में ऊँट किस करवट बैठेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब राजस्थान की करवट भी बदलेगी और राजस्थान की किस्मत भी बदलेगी। उन्होने कहा कि आज राजस्थान में एक ही गूँज है, एक ही नारा है… जीतेगा कमल, खिलेगा कमल। पीएम मोदी ने कहा कि राजस्थान में अच्छी सड़कों के लिए, अच्छे हाईवे के लिए, राज्य के विकास के लिए भाजपा सरकार लगातार पैसे भेज रही है।

उन्होंने बताया कि जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी तब 10 वर्षों में राजस्थान में टैक्स की हिस्सेदारी के रूप में एक लाख करोड़ रुपए ही दिए गए थे, जबकि बीते 9 वर्षों में भाजपा सरकार ने टैक्स की हिस्सेदारी के रूप में चार लाख करोड़ रुपए से अधिक पहुँचाए हैं। उन्होंने कहा कि अनेक राज्यों में शत-प्रतिशत नल से जल देने का काम पूरा हो गया है, लेकिन राजस्थान के लोगों को कांग्रेस की सरकार पानी के लिए भी तरसा कर रखना चाहती है। राजस्थान ‘हर घर जल’ योजना में बहुत पीछे चल रहा है।

पीएम मोदी ने कहा, “कॉन्ग्रेस ने राजस्थान में सरकार चलाने के नाम पर सिर्फ लूट की दुकान चलाई है और झूठ का बाजार चलाया है। झूठ की दुकान का सबसे ताजा प्रोजेक्ट है, राजस्थान की ‘लाल डायरी’। कहते हैं इस ‘लाल डायरी’ में कॉन्ग्रेस सरकार के काले कारनामे दर्ज हैं। लोग कह रहे हैं कि ‘लाल डायरी’ के पन्ने खुले तो अच्छे-अच्छे निपट जाएँगे। कॉन्ग्रेस के बड़े से बड़े नेताओं की इस ‘लाल डायरी’ का नाम सुनते ही बोलती बंद हो रही है। ये लोग भले ही मुँह पर ताला लगा लें, लेकिन ये ‘लाल डायरी’ इस चुनाव में कॉन्ग्रेस का डिब्बा गोल करने जा रही है।”

महिलाओं के खिलाफ अपराध पर बात करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि किसी दलित बेटी के साथ दुष्कर्म होता है और उस पर एसिड डाल दिया जाता है, किसी दलित बहन के साथ उसके पति के सामने गैंगरेप होता है, आरोपी उसका वीडियो बनाते हैं, पुलिस में रिपोर्ट नहीं लिखी जाती। उन्होंने कहा कि बेखौफ आरोपी वीडियो वायरल कर देते हैं, छोटी-छोटी बच्चियाँ और स्कूल की टीचर तक राजस्थान में सुरक्षित नहीं हैं। बता दें कि कॉन्ग्रेस के बर्खास्त मंत्री राजेंद्र सिंह गुढ़ा ने लाल डायरी में कई रहस्य होने का खुलासा किया था।

यहूदियों का खोया हुआ समुदाय या भारत के पहाड़ी जनजातीय? इजरायल लौटने के लिए क्यों बेचैन थे कुकी? सदियों पुराने पलायन का अनसुलझा रहस्य

जातीयता से लेकर मजहब, इतिहास और भौगोलिकता कुकी समाज दशकों से अपनी पहचान को अलग-अलग रूप देता रहा है। बताया जाता है कि ये लोग म्यांमार के चीन क्षेत्र से भारत में आए थे। ये इलाका सीमा पर ही स्थित है। बताया जाता है कि चीन-कुकी-मिजो (CHIKUMI) समुदाय अधिकतर ईसाई मजहब का अनुसरण करते हैं। लेकिन, क्या आपको पता है कि उनके पूर्वजों को लेकर एक थ्योरी ये भी है कि ये लोग इजरायल से आकर भारत में बसे थे।

मणिपुर में जब कुकी-मैतेई हिंसा के दौरान कुकी समाज के घरों में आग लगाई गई थी, तब इजरायली मीडिया ने भी इसे खूब कवर किया था। कुकी समाज ने यहूदी राष्ट्र से भी मदद की माँग की है, जिसके बाद एक बार फिर से कुकी-इजरायल संबंधों को लेकर चर्चा शुरू हो गई। ऐसे में अब सवाल ये उठता है कि मणिपुर में जो आज कुकी समाज रह रहा है, वो क्या है। आइए, इस पर चर्चा करते हैं कि कुकी समाज और इजरायल का क्या संबंध है।

आज का कुकी समाज कौन है

जहाँ तक चीन-कुकी-मिजो जनजातीय समाज की बात है, वो उत्तर-पूर्वी राज्यों मणिपुर, मिजोरम, असम, मेघालय और त्रिपुरा में बसे हुए हैं। ये सामान्यतः म्यांमार और बांग्लादेश से लगी सीमावर्ती इलाकों में ये रहते हैं। उन्हें तिब्बत-बर्मा भाषाई समूह का हिस्सा माना जाता है। इनका ताल्लुक मिजोरम के मिजो और म्यांमार के चीन से भी है। कुकी समाज के भीतर भी 20 समुदाय आते हैं, अधिकतर ईसाई ही हैं। वो माइग्रेशन ही कारण है कि इन्हें ‘नए कुकी’ और ‘पुराने कुकी’ के रूप में जाना जाता है।

‘ओल्ड कुकीज़’ उन्हें कहा जाता है, जो सन् 1600 या उससे पहले नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों में माइग्रेट हुए थे। वहीं ‘न्यू कुकीज’ उन्हें कहा जाता है, जो 18वीं या 19वीं सदी में आए। CHIKUMI से जुड़े जितने भी साहित्य हैं, वो बताते हैं कि कई चरणों में इनका पलायन संपन्न हुआ। निश्चित रूप से ये नहीं कहा जा सकता कि वो उत्तर-पूर्वी राज्यों के मूलनिवासी हैं या नहीं। हालाँकि, म्यांमार के चीन स्टेट से आए हुए कुकी समाज के बारे में बहुत कुछ नहीं पता है।

फिर कुकी समाज का इजरायल से क्या संबंध है?

यहूदी मानते हैं कि 3000 साल पहले इजरायल के उत्तरी साम्राज्य के 10 समुदायों को अश्शूर से आए असीरियन लोगों के हमले के कारण पलायन करना पड़ा था। उसके बाद से उनके बारे में बहुत कुछ पता नहीं चल पाया। इजरायली लोगों का मानना है कि उस समय पलायन करने वाले ये लोग वापस आएँगे और तब एक नए युग का प्रारंभ होगा। उस समय इन्हीं में से एक राजा डेविड का वंशज मसीहा भी होगा।

माना जाता है कि जो समुदाय खो गए हैं, वो जहाँ जाकर बसे वहीं की संस्कृति में घुल-मिल गए हैं। कुकी समाज को भी ऐसे ही एक ट्राइब के रूप में जाना जाता है, जिसे वो ‘Bnei Menashe’ कहा जाता है। इन्हें पैगंबर जोसेफ के बेटे बिबिलिकल मनस्सेह के वंशजों के रूप में जाना जाता है। बताया जाता है कि 1950 के दशक में मिजोरम-मणिपुर के 10,000 कुकी लोगों ने ईसाई मजहब छोड़ कर यहूदी मजहब अपना लिया था, जब उन्हें अपनी तथाकथित वास्तविक मातृभूमि का पता चला था।

कैसे ये समुदाय अपने कथित मूलस्थान से परिचित हुआ, इसकी भी एक अलग कहानी है। इसकी शुरुआत 1950 के दशक में हुई थी। मिजोरम के बुआल्लॉन में मेई चलाह नाम के एक मजहबी मंत्री ने बताया था कि उसने सपने में आया है कि कुकी लोग ज़िओन समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। साथ ही उन्होंने बताया था कि सपने में ये भी आया कि कुकी लोगों को अब अपने मूलस्थान की तरफ लौट चलना चाहिए।

इतिहास की बात करें तो कुकी समाज जीववाद (Animism), अर्थात पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं के अलाव प्रकृति की पूजा करता रहा है। साथ ही वो ‘मनमासी’ (मानसिया) समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। इसके बाद वहाँ मिशनरियों का प्रभाव बढ़ने लगा और कई जनजातीय समुदायों, खासकर कुकी लोगों ने ईसाई मजहब अपना लिया। ये मिशनरी ब्रिटेन और अमेरिका से आए थे। बनेई मेनाशे कम्युनिटी का दावा है कि धर्मांतरण के दौरान उन्होंने ईसाई मजहब और अपने परंपराओं के बीच समानता पाई।

मिशनरियों ने उन्हें खूब बाइबिल की कहानियाँ सुनाईं और खुद की परंपराओं से समानता पाते हुए उन्होंने थोक में धर्मांतरण किया। ब्रिटिश मिशनरियों को भी खुद के और इनकी परंपराओं में समानता मिली। दावा किया जाता है कि कुकी लोगों के कुछ प्राचीन गानों में बाइबिल के शब्द मिलते हैं। ‘सिकपुई हला’ उनमें से ही एक गाना है, एक कुकी सब-ट्राइब हमार द्वारा सदियों से गाया जाता रहा है।

मिजोरम का ‘Bnei Menashe’ समाज (फोटो साभार: Timeline YouTube)

ये लोग फसल की कटाई के मौसम ‘सिकपुइरोइ’ के दौरान इसे गाते हैं। ये गाना इजिप्ट से इजरायली लोगों के पलायन की बात करता है। फिर इसमें बताया जाता है कि कैसे लाल सागर ने उन्हें बचाया। ‘लिटेन्टेन ज़िओन’ नाम का एक गीत भी है, जिसका अर्थ है – ‘चलो, जिओन की ओर चलें।’ इजरायल की लोककथाएँ भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में गीत के रूप में कैसे आ गईं, ये एक रहस्य है। ‘सेलाह’, ‘अबोरीज़ा’ और ‘एलो’ जैसे शब्द बाइबिल में कई बार मिलते हैं।

वहीं Pslam की किताब में जहाँ ‘Selah’ शब्द मिलता है, ‘अबोरीज़ा’ एक हिब्रू शब्द है जिसका इस्तेमाल ईश्वर की प्रशंसा के लिए किया जाता है। ‘बुलपिजेम’ नाम की कुकी स्क्रिप्ट में 32 अक्षर हैं और इनका कनेक्शन भी Jews से सामने आता है। बताया जाता है कि ये चीन में राजा शीह हुंगताई के समय खो गया था। ये 214 ईसापूर्व की बात है। बिबिलिकल इजरायलियों से भी कुछ समानताएँ कुकी समाज से हैं।

कुकी ये शॉल ओढ़ते हैं, जो इजरायली शॉल से मिलता-जुलता है

समुदाय ‘Bnei Menashe’ द्वारा ओढ़ी जाने वाली एक प्रकार की शॉल यहूदियों द्वारा प्रार्थना के समय पहनी जाने वाली ‘तल्लीत’ से काफी मिलती-जुलती है। बाइबिल में लिखा है कि ऐसे शॉल के किनारों पर एक नाले रंग की डिजाइन वाला घेरा होना चाहिए, जो ‘Puan’ के लिए भी सटीक बैठता है। ‘Zelengam’ के तथाकथित झंडे में भी एक प्रकार का स्टार है, जिसे ‘स्टार ऑफ डेविड’ भी कहा गया है।

बताया जाता है कि ‘Zelengam’ के झंडे में ‘स्टार ऑफ डेविड’ है

इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारियों के आधार पर रिसर्च करने पर पता चलता है कि माना जाता है कि 30 लाख कुकी ‘Bnei Menashe’ हैं, जिन्हें उत्तरी इजरायल से निकाला गया था और वो सदियों तक चले पलायन में मध्य एशिया तक आए। फिर वो चीन और बर्मा से होते हुए उत्तर-पूर्वी भारत में पहुँचे। बताया जाता है कि उन्हें यहाँ पर ‘Shinlung’ कहा गया, क्योंकि वो चीन में यालुंग नदी के किनारे स्थित छीनलूंगसान से आए थे।

सबूत कहाँ है?

कही-सुनी गई बातों के अलावा इजरायल के ‘Manasseh’ और कुकी समाज के बीच संबंध को लेकर कोई और सबूत नहीं है। 2003 में कुकी समाज के सब ट्राइब्स हमार, कोम, लेंथंग, चांगसां, लुन्किम और हूआलंगो समाज के लोगों का DNA टेस्ट कराया गया, जो नेगेटिव निकला। 2005 में एक अन्य डीएनए टेस्ट में कुछ कनेक्शन निकला। कलकत्ता के सेन्ट्रल फॉरेंसिक इंस्टीट्यूट ने इस टेस्ट सैम्पल्स की जाँच की थी।

इसमें पाया गया कि जहाँ उनके पुरुष वाले हिस्से का कोई विदेशी लिंक सामने नहीं आया, उनके महिला वाले हिस्से का कनेक्शन मध्य-पूर्व से सामने आया। इस रिसर्च में शामिल एक स्कॉलर ने कहा था कि दुनिया के दो अलग-अलग इलाकों में रह रहे समुदायों के डीएनए में समानता मुश्किल है, जब तक वो एक ही जगह से न आएँ रहे हों। एक अन्य रिसर्च में पता चला कि रोग ‘Tay-Sachs’ और हड्डी रोग ‘Saitika-Zenghit’ रोग CHIKIMZO ट्राइब्स के अलावा सेमिटिक यहूदियों में भी पाया जाता है।

हालाँकि, 2005 में कराए गए ये टेस्ट इतने विश्वसनीय नहीं हैं। इजरायल के प्रोफेसर स्कोरकी जेनेटिसिस्ट्स ने पार्शियल सिक्वेंसिंग का सहारा लिया और पूरी तरह से सेक्वेंशिंग नहीं की। उन्होंने कहा था कि हजारों वर्षों बाद कॉमन जेनेटिक ओरिजिन का पता लगा पाना मुश्किल है।

अपनी ‘मूल भूमि’ की तरफ लौटने वाली थ्योरी

1970 के दशक में ‘Bnei Menashe’ का एक समूह इजरायल की यात्रा पर निकला, जहाँ उसने रब्बी एलियाहु अविचाईल से मुलाकात की, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने ही इस समुदाय का नामकरण किया। साथ ही ‘Amishav’ नाम का एक NGO (जिसका अर्थ है – मेरे लोग वापस आएँगे) भी है, जो इजरायल से पलायन करने वाले ट्राइब्स को ढूँढने में लगा हुआ है। साथ ही ये संगठन उन्हें वापस यहूदी मजहब में धर्मांतरित करने करने के प्रयास में भी ये लगा रहता है।

उसी साल अविचाईल ने भारत का दौरा कर ‘बनई मेनाशे’ समुदाय के लोगों से मुलाकात की। उन्होंने ही इस समुदाय को इजरायल के करीब लाने में अहम भूमिका निभाई और आइजोल के साथ-साथ इम्फाल में भी धर्मांतरण की शुरुआत की। उन्होंने इस दावे पर भी रिसर्च किया कि उनके इजरायल से पलायन करने की बातों में कितनी सच्चाई है। इम्फाल में येरुसलम के रब्बी ने ‘अमिषाव हाउस’ भी खोला। उसमें एक सिनेगॉग भी है।

उसमें 2 गेस्ट रूम, एक मिक्वाह (परंपरागत नहाने का स्थान), एक क्लासरूम और कर्मचारियों के रहने के लिए क्वार्टर भी हैं। हालाँकि, इजरायल सरकार ने इस समुदाय के इजरायल माइग्रेशन ‘अलियाह’ का समर्थन नहीं किया। 90 के दशक में इस समाज के कुछ लोग इजरायल पर्यटक बन कर पहुँचे और वहाँ बस गए। उन्हें वहाँ की नागरिकता भी मिली और वो यहूदी कहलाए। 1997 में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के डिप्टी कम्युनिकेशंस डायरेक्टर माइकल फ्रूंड को इस समाज का एक पत्र मिला और उन्होंने इनसे मिलने का मन बनाया।

उन्होंने इसके बाद कहा कि उक्त समाज और बिबिलिकल इजरायलियों में काफी समानताएँ हैं। उनकी परंपराओं और विश्वासों में भी उन्हें समानता मिली। उन्होंने इस समाज के माइग्रेशन को सपोर्ट करने के लिए फंड भी इकट्ठा किया। उनका मानना है कि इजरायल का खोया हुआ समुदाय यही है। उनके प्रयासों के कारण हर साल 100 ‘बनई मेनाशे’ को इजरायल में जाकर बसने और यहूदी बनने की अनुमति मिली।

उन्होंने एक ‘Shavei’ नामक एक NGO की भी स्थापना की, जिसने इजरायल की खोई हुई ट्राइब्स को वापस लेकर बसाने को अपना लक्ष्य बताया। 2003 तक इस समाज के 1000 लोगों को इजरायल में बसाया जा चुका था। उसी साल इजरायल के तत्कालीन इंटीरियर मिनिस्टर अवराहम पोराज ने कुछ राजनीतिक और मजहबी कारणों से फिर इस प्रक्रिया पर रोक लगा दी। लेकिन, फ्रूंड इसके लिए प्रयास करते रहे और 2005 में एक फैसला कराया कि इस समाज को यहूदियों का ही हिस्सा माना जाए।

इस फैसले के बाद उनके NGO का खासा उत्साहवर्धन हुआ और उन्होंने मिजोरम और मणिपुर में धर्मांतरण के लिए सेंटरों की स्थापना की। अगर ‘Bnei Menashe’ को यहूदी का दजा मिल गया तो वो बिना रोकटोक इजरायल में जाकर बस सकेंगे। 2006 में इस प्रक्रिया के तहत 218 ऐसे लोगों को ‘Bnei Menashe’धर्मांतरित कर इजरायल ले जाया जाना था, लेकिन भारत सरकार ने इस पर आपत्ति दर्ज कराई। बताया जाता है कि 10,000 लोग इजरायल जा चुके हैं।

क्या कुकी और ‘Bnei Menashe’ को उनकी असली भूमि मिल गई?

यहूदियों ने भी कुकी समाज के ‘Bnei Menashe’ होने के दावों पर आपत्ति जताई है। भारत और इजरायल की सरकारों ने भी इसके खिलाफ आवाज उठाई है। इजरायल के कई नेता भी इन्हें यहूदी नहीं मानते। इजरायली आलोचकों का कहना है कि उन्हें वेस्ट बैंक और गाजा से लगे इलाकों में जानबूझकर एक साजिश के तहत बसाया गया। बेंजामिन नेतन्याहू इन्हें वहाँ बसाने के पक्ष में थे, ऐसे में वो अपने देश में विवादों के केंद्र में भी आ गए।

इस समाज को पूरी तरह यहूदी कहलाने के लिए भी काफी संघर्षों का सामना करना पड़ा। स्टैण्डर्ड ऑफ लिविंग से लेकर आर्थिक स्थिति तक, शुरुआत में बिल्कुल भी इस समाज को समर्थन नहीं मिला। कइयों ने नागरिकता ली और इजरायल की सेना में भी शामिल हुए। भारत में इस धर्मांतरण के खिलाफ भी आवाज उठी। इसमें कोई शक नहीं है कि कुकी समाज में अधिकतर प्रवासी ही रहे हैं।

वहीं दूसरी तरफ ‘कुकी नेशनल ऑर्गेनाइजेशन (KNO)’ का नेता पीएस हाओकीप अभियान चला रहा है कि पूरे कुकी समाज को एक ‘Zelengam’ के अंतर्गत लाया जाए। इसे ‘लैंड ऑफ फ्रीडम’ भी कहा जाता है और यहूदी थ्योरी ही मानी जाती है। कुकी समाज की कई पहचान है, जिससे वो कहाँ से ताल्लुक रखते हैं इस पर संशय बना रहता है। अब इस पर और रिसर्च हो या कोई सबूतों वाला इतिहास निकले तो इस बारे में और पता चलेगा। इतिहास के गर्त में छिपा पलायन के इस रहस्य से पूरी तरह पर्दा हटना अभी बाक़ी है।

(OpIndia पर प्रकाशित मूल अंग्रेजी लेख यहाँ क्लिक कर के पढ़ें।)

33 साल बाद श्रीनगर के लाल चौक से निकला मुहर्रम का ताजिया, मुस्लिम बहुल फिर भी खौफ में थे शिया: मोदी राज में हुए भयमुक्त

यह आपको सुनने में अजीब लग सकता है, पर सच्चाई यही है। 33 साल बाद श्रीनगर की गलियों से मुहर्रम का ताजिया निकला है। मुस्लिम बहुल क्षेत्र होने के बावजूद 1989 से शिया मुहर्रम का जुलूस नहीं निकाल पा रहे थे। यह बताता है कि जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन कर, आर्टिकल 370 को खत्म कर और आतंकवाद की कमर तोड़ कर मोदी सरकार ने किस तरह इस केंद्र शासित प्रदेश की स्थिति सामान्य की है। अब हर तबका भय मुक्त होकर जी रहा है।

1989 में एक आदेश जारी कर श्रीनगर के डलगेट मार्ग से ताजिया निकालने पर पाबंदी लगाई गई थी। इसी रास्ते में लाल चौक भी पड़ता है। लेकिन 27 जुलाई 2023 को इस रास्ते से शिया मुस्लिमों ने मुहर्रम का जुलूस निकाला। सैकड़ों लोग इसमें शामिल थे।

कश्मीर के अतिरित्क पुलिस महानिदेशक IPS विजय कुमार ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि शिया समुदाय पिछले काफी समय से मुहर्रम के जुलूस की अनुमति माँग रहा था। प्रशासन ने इस बार अनुमति देते हुए सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम किए थे। वहीं कश्मीर के कमिश्नर वी के भिदुरी के मुताबिक वर्किंग डे में अन्य लोगों की सुविधा को देखते हुए जुलूस के लिए सुबह 6 से 8 बजे के बीच 2 घंटे का समय निर्धारित किया गया था। भिदुरी ने इस जुलूस की अनुमति को प्रशासन का ‘ऐतिहासिक कदम’ बताया।

इस जुलूस का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में सैकड़ों की संख्या में अकीदतमंद शहीद गंज से डलगेट वाली सड़क पर जुलूस की शक्ल में जा रहे हैं। उनके हाथों में मजहबी झंडे हैं। मौके पर सुरक्षा बल के जवान और प्रेस रिपोर्टरों को भी देखा जा सकता है। जुलूस में कुछ बुर्काधारी महिलाएँ भी शामिल थीं। प्रशासन द्वारा तय किए गए समय पर यह जुलूस शांतिपूर्वक सम्पन्न हुआ।

इस जुलूस की अनुमति देते हुए रखी गई शर्तों में उत्तेजक नारेबाजी, आतंकियों या उनके संगठनों की तस्वीरें, किसी भी स्तर पर बैन किया गया LOGO, कोई प्रतिबंधित झंडा आदि न ले जाना शामिल था। गौरतलब है कि साल 1989 में मोहर्रम के जुलूस में कुछ आतंकी घुस गए थे। उन्होंने देश विरोधी नारे लगाए थे। नारे लगाने वालों में यासीन मलिक, जावेद मीर और हमीद शेख का नाम सामने आया था। तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन ने तब एक आदेश जारी करते हुए शहीदगंज से डलगेट वाले मार्ग पर जुलूस निकालने पर पाबन्दी लगा दी थी। तब से यह प्रतिबंध कायम था।

PM मोदी के दौरे पर प्रोपेगेंडा कर रहे थे CM अशोक गहलोत, PMO ने खोल दी पोल: बताया- आमंत्रित किया था, लेकिन कहा नहीं आ पाएँगे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 27 जुलाई 2023 के राजस्थान दौरे को कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राजनीतिक विवाद में घसीटने का प्रयास किया है। गहलोत ने दावा किया कि पीएम के कार्यक्रम से उनका भाषण हटा दिया गया है। इस प्रोपेगेंडा की पोल खोलते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने बताया है कि प्रोटोकॉल के तहत मुख्यमंत्री गहलोत को कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया था। उनका संबोधन भी था। लेकिन उनके कार्यालय ने बताया कि मुख्यमंत्री कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाएँगे।

जिस कार्यक्रम को लेकर गहलोत ने दावा किया था वह सीकर में होना है। यहाँ से प्रधानमंत्री नौ करोड़ किसानों के खाते में किसान सम्मान निधि (Kisan Samman Nidhi Yojana) की 14वीं किस्त ट्रांसफर करेंगे। प्रधानमंत्री किसान समृद्धि केंद्र, और यूरिया गोल्ड की शुरुआत करेंगे। सीकर सहित राज्य में 5 मेडिकल कॉलेज का उद्घाटन और 7 का शिलान्यास करेंगे। इसके बाद प्रधानमंत्री जनसभा को संबोधित भी करेंगे।

लेकिन प्रधानमंत्री के सीकर पहुँचने से कुछ घंटे पहले गहलोत ने एक लंबा ट्ववीट कर आरोप लगाया कि उनका पूर्व निर्धारित तीन मिनट का संबोधन पीएमओ ने हटा दिया है। उन्होंने लिखा, “माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी। आज आप राजस्थान पधार रहे हैं। आपके कार्यालय PMO ने मेरा पूर्व निर्धारित 3 मिनट का संबोधन कार्यक्रम से हटा दिया है। इसलिए मैं आपका भाषण के माध्यम से स्वागत नहीं कर सकूँगा। अतः मैं इस ट्वीट के माध्यम से आपका राजस्थान में तहेदिल से स्वागत करता हूँ।”

इस ट्वीट में गहलोत ने 5 माँगें भी रखी है। इसके जवाब में पीएमओ ने बताया है कि गहलोत के कार्यालय ने बताया था कि वे इस कार्यक्रम में नहीं रहेंगे। पीएमओ ने अपने ट्वीट में कहा है, “अशोक गहलोत जी, प्रोटोकॉल के अनुसार, आपको आमंत्रित किया गया है। आपका भाषण भी निर्धारित किया गया है। लेकिन आपके कार्यालय ने बताया कि आप शामिल नहीं हो पाएँगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पिछली यात्राओं के दौरान भी आपको हमेशा आमंत्रित किया गया है। आपने अपनी उपस्थिति से उन कार्यक्रमों की शोभा भी बढ़ाई है। आज के कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आपका हार्दिक स्वागत है। विकास कार्यों की पट्टिका पर भी आपका नाम है। अगर आपको हाल ही में लगी चोट के कारण कोई शारीरिक परेशानी न हो, तो आपकी उपस्थिति बहुत महत्व रखेगी।”

CM गहलोत की माँगें

CM अशोक गहलोत ने ट्वीट कर जो माँगें रखी हैं उनमें अग्निवीर स्कीम वापस लेकर सेना में पहले जैसी भर्ती चालू करवाना, केंद्र सरकार द्वारा जातिगत जनगणना पर निर्णय लेना, राज्य के किसानों की कर्जमाफी के लिए वन टाइम सेटेलमेंट के प्रस्ताव को मँजूरी देना, जनजातीय इलाकों ने खुले 3 मेडिकल कॉलेजों के लिए केंद्र सरकार से आर्थिक सहायता और पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना को राष्ट्रीय महत्व परियोजना का दर्जा दिया जाना शामिल है।

लंदन में बागेश्वर बाबा का दरबार: ‘कोहिनूर वापसी’ की चर्चा कर बोले- कभी अंग्रेज भारत में लेक्चर देते थे, आज बैठकर रामकथा सुन रहे

बागेश्वर धाम पीठाधीश्वर पंडित धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री इन दिनों ब्रिटेन में हैं। लंदन के लीसेस्टर में उनकी रामकथा चल रही है। कथा सुनने के लिए स्थानीय हिंदुओं के अलावा ब्रिटिश अधिकारी भी आ रहे हैं। 27 जुलाई 2023 को ब्रिटेन के राजा चार्ल्स के प्रतिनिधि साइमन भी व्यासपीठ से आशीर्वाद लेने पहुँचे थे। इस बीच रामकथा का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसे बागेश्वर धाम के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से 25 जुलाई को शेयर किया गया था।

इस वीडियो में एक अंग्रेज अधिकारी रामनामी दुपट्टा डाल रामकथा में शामिल दिख रहे हैं। उनके सामने एक सवाल के जवाब में पंडित धीरेन्द्र शास्त्री कोहिनूर वापसी की चर्चा करते हैं। साथ ही कहते हैं कि कभी अंग्रेज भारत में आकर बोलते थे और हमारे पुरखे सुनते थे। आज लंदन में अंग्रेज रामकथा बैठकर सुन रहे हैं।

लगभग 4:13 मिनट के इस वीडियो में बागेश्वर धाम पीठाधीश्वर पंडित धीरेन्द्र शास्त्री एक बड़े हॉल में विशाल जनसमूह को कथा सुनाते दिखाई दे रहे हैं। वे कहते हैं, “कोहिनूर लेकर वापस लौटेंगे।” आगे उन्होंने कहा, “वैसे ये नहीं कह सकता कि कोहिनूर वापस दो। अभी हमको बहुत बार आना भी है। लोग कहेंगे कि अराजकता फैलाता है। वैसे भी हम बदनाम हैं। जो दिल में होता है हम साफ-साफ बोल देते हैं।”

इसी रामकथा में मौजूद मैथ्यू नाम के एक अंग्रेज को धीरेन्द्र शास्त्री क्राइम कमिश्नर बता रहे हैं। उन्होंने कहा कि समय में ऐसा बदलाव आया है कि कभी अंग्रेज भारत आकर अपना लेक्चर देते थे, लेकिन आज लंदन में बैठ कर उनकी रामकथा सुन रहे हैं। इस दौरान बागेश्वर बाबा पंडित धीरेन्द्र शास्त्री ने कथा के मंच से पूरे इंग्लैंड के उद्धार की कामना की। ब्रिटेन के राजा को व्यास पीठ से आशीर्वाद देते हुए अर्थव्यवस्था में मजबूती आने की प्रार्थना की।

दिल्ली की मस्जिदों से नहीं हटेगा अतिक्रमण, हाई कोर्ट ने लगाई रोक: रेलवे ने 15 दिन में जमीन खाली करने का दिया था नोटिस

दिल्ली की दो बड़ी मस्जिदों से अतिक्रमण नहीं हटेगा। बाबर रोड के बच्चू शाह मस्जिद जिसे बंगाली मार्केट मस्जिद भी कहते हैं और आईटीओ के तिलक मार्ग रेलवे ब्रिज के पास स्थित तकिया बब्बर शाह मस्जिद के खिलाफ कार्रवाई पर दिल्ली हाई कोर्ट ने रोक लगा दी है। उत्तर रेलवे प्रशासन ने नोटिस जारी कर इन मस्जिदों से अपनी जमीन से अवैध कब्जा हटाने को कहा था। इसके लिए 15 दिन का समय दिया था। ऐसा नहीं होने पर एक्शन लेने की चेतावनी दी थी।

इसे चुनौती देते हुए दिल्ली वक्फ बोर्ड याचिका दायर की थी। हाई कोर्ट ने 26 जुलाई 2023 को इस पर सुनवाई करते हुए नोटिस पर स्टे लगा दिया। जस्टिस प्रतीक जालान की पीठ ने कहा कि रेलवे अपनी भूमि से अनधिकृत ढाँचों और अतिक्रमण को हटाने के लिए मस्जिदों पर चिपकाए गए नोटिस पर आगे कोई कार्रवाई ना करे

वक्फ बोर्ड के वकील वजीह शफीक ने कहा कि जाँच करने पर पता चला है कि मस्जिदों पर चिपकाए गए नोटिस मंडल रेलवे प्रबंधक के कार्यालय से जारी किए गए थे। इस नोटिस में कोई फाइल नंबर, तारीख, हस्ताक्षर, जारी करने वाले व्यक्ति का नाम या पद नहीं है। उन्होंने रेलवे द्वारा कार्रवाई की आशंका जताते हुए अदालत से इस पर रोक की गुहार लगाई।

वक्फ बोर्ड ने अपनी याचिका में कहा है कि बंगाली मार्केट मस्जिद करीब 250 साल और तिलक मार्ग मस्जिद 400 साल पुरानी है। ऐसे में इन नोटिसों को रद्द कर दिया जाना चाहिए। इन मस्जिदों को 1945 में कानूनी तौर पर एग्रीमेंट के जरिए जमीन ट्रांसफर किए जाने का हवाला भी याचिका में दिया गया है। कहा गया है कि ये मस्जिद अनधिकृत नहीं हैं और जमीन रेलवे की नहीं है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने भी नोटिस की प्रकृति पर सवाल उठाए। कहा कि नोटिस पर हस्ताक्षर नहीं किए गए थे। उस प्राधिकरण का उल्लेख नहीं किया गया था, जिसके तहत उन्हें जारी किया गया। अदालत ने कहा, “ऐसा प्रतीत होता है कि नोटिस कथित तौर पर रेलवे प्रशासन, उत्तर रेलवे, दिल्ली द्वारा जारी किया गया एक सामान्य नोटिस है, जो 15 दिनों के भीतर रेलवे भूमि से मंदिरों/मस्जिदों/मजारों को स्वेच्छा से हटाने का आह्वान करता है, अन्यथा उन्हें रेलवे प्रशासन द्वारा हटा दिया जाएगा। यह नोटिस अहस्ताक्षरित, अदिनांकित हैं और उस प्राधिकार का उल्लेख नहीं करते जिसके तहत उन्हें जारी किया गया है। फिलहाल इन नोटिसों के अनुसार कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी।” इस दौरान केंद्र सरकार के वकील ने इस मुद्दे पर ‘स्पष्ट निर्देश’ लेने के लिए अदालत से समय देने की अपील की थी।

उत्तर रेलवे प्रशासन की तरफ जारी नोटिस में कहा गया था, “सर्व साधारण को सूचित किया जाता है कि रेलवे भूमि को अनाधिकृत रूप से अतिक्रमित किया गया है। आप लोग अनाधिकृत रूप से रेलवे की जमीन पर बने अनाधिकृत भवन/मंदिर/ मस्जिद/मजार को इस सूचना के 15 दिन के अंदर स्वेच्छा से हटा दें। अन्यथा रेलवे प्रशासन एक्शन लेगा। रेलवे अधिनियम के प्रावधान के तहत अनाधिकृत कब्जे को हटा दिया जाएगा। इस प्रक्रिया में होने वाले नुकसान के लिए आप स्वयं जिम्मेदार होंगे। रेलवे प्रशासन जिम्मेदार नहीं होगा।” आज तक की रिपोर्ट के अनुसार तकिया बब्बर शाह मस्जिद के बगल में स्थित एमसीडी के मलेरिया दफ्तर को भी खाली करने का नोटिस दिया गया था।

इससे पहले इसी साल अप्रैल में भूमि और विकास कार्यालय (L&DO), नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (NDMC) और केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (CPWD) ने एक संयुक्त अभियान में बंगाली मार्केट की मस्जिद के एक हिस्से को ध्वस्त कर दिया था। इस कार्रवाई के दौरान एक दीवार हटाई गई थी। अधिकारियों ने बताया था कि कुछ महीने पहले अतिक्रमण कर कंक्रीट की यह दीवार खड़ी की गई थी। वहीं मस्जिद के अधिकारियों का कहना था कि कार्रवाई से पहले उन्हें कोई सूचना नहीं दी गई थी।

वहीं 2 जुलाई 2023 को उत्तर-पूर्वी दिल्ली के भजनपुरा में एक सड़क को चौड़ा करने के लिए फुटपाथ पर बने दो धार्मिक स्थलों को हटाया गया था। लोक निर्माण विभाग (PWD) ने इस दौरान एक हनुमान मंदिर और एक दरगाह को हटाया था। अभियान के दौरान भारी संख्या में बलों की तैनाती की गई थी। साथ ही ड्रोन से पूरे इलाके की निगरानी हो रही थी।

‘ये छोटी घटना है’: कॉलेज में छात्राओं का वीडियो बनाए जाने पर बोले कर्नाटक के गृह मंत्री, छानबीन के लिए उडुपी पहुँचा महिला आयोग

कर्नाटक के उडुपी स्थित एक निजी मेडिकल कॉलेज की हिंदू छात्राओं का बाथरूम में अश्लील वीडियो बनाने के मामले में पुलिस ने तीन मुस्लिम छात्राओं पर FIR दर्ज की है। वहीं, अब इस मामले की जाँच के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की सदस्य खुशबू सुंदर गुरुवार (27 जुलाई 2023) को उडुपी पहुँचेंगी।

इस मामले का पुलिस ने स्वत: संज्ञान लेकर दो एफआईआर दर्ज की है। एक मामला टॉयलेट में छात्रा के बनाए गए वीडियो को डिलीट करने को लेकर तीन छात्राओं और कॉलेज प्रशासन से जुड़ा है। दूसरा मामला यूट्यूब चैनलों पर हिडन कैमरे वाला वीडियो अपलोड करने से जुड़ा है। मामले में अलीमतुल शैफ़ा, शबानाज़ और आलिया को आरोपित बनाने के साथ-साथ कॉलेज प्रशासन को भी नामजद किया गया है।

उडुपी पहुँचने के बाद NCW की सदस्य खुशबू सुंदर ने कहा, “मैं राष्ट्रीय महिला आयोग के सदस्य के रूप में यहाँ के लिए आई हूँ। मैं सबसे पहले पुलिस के साथ बैठक करूँगी। मैं देखूँगी कि FIR में क्या कहा गया है।”

उन्होंने आगे कहा, “क्या हुआ था… इस बात की जानकारी के लिए मैं इस घटना में शामिल लड़कियों से मिलूँगी। इसके साथ ही कॉलेज के अन्य विद्यार्थियों से भी मिलूँगी। कॉलेज प्रशासन से मिलकर उनसे बात करूँगी और उनका पक्ष जानने की कोशिश करूँगी कि उनका क्या कहना है।”

उधर, कॉन्ग्रेस शासित कर्नाटक सरकार में गृहमंत्री डॉक्टर जी परमेश्वर ने कहा कि उडुपी की घटना बहुत छोटी है और इसे राजनीतिक रंग देने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि कॉलेजों में ऐसी चीजें होती रहती हैं। भाजपा को ऐसे छोटे-छोटे मुद्दों पर राजनीति करने से बचना चाहिए।

‘ये लव जिहाद और ड्रग्स का मामला, ओपन एन्ड शट केस’: नज़ीबुर ने हिन्दू पत्नी और उसके माँ-बाप को मार डाला, CM सरमा बोले – 15 दिन में फाइल करो चार्जशीट

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने राज्य के गोलाघाट में सामने आई तिहरे हत्याकांड की घटना को ‘लव जिहाद’ का दुष्परिणाम करार दिया है। उन्होंने आश्वासन दिया है कि इस मामले में असम पुलिस 15 दिनों के भीतर चार्जशीट दायर करेगी। उन्होंने कहा कि ये पूरी तरह ‘लव जिहाद’ का मामला है। जहाँ मृतक हत्यारा समुदाय से था, वहीं तीनों मृतक हिन्दू परिवार के थे। CM सरमा ने बताया कि फेसबुक पर नजीबुर रहमान ने खुद को हिन्दू बता कर संघमित्रा घोष से जान-पहचान की थी।

‘ये ओपन एन्ड शट केस, ड्रग्स का मामला’: CM सरमा

उन्होंने ये जानकारी दी कि जब नजीबुर रहमान और संघमित्रा घोष कोलकाता भागे थे, तब उसने महिला को भी ड्रग्स का इस्तेमाल करना सिखा दिया। उन्होंने बताया कि नजीबुर रहमान बोरा ड्रग्स का आदी था और प्रतिबंधित पदार्थों की तस्करी भी करता था। उन्होंने बताया कि महिला को ड्रग्स इंजेक्ट किया गया था, जिसके प्रभाव में आकर बेसुध हालत में महिला को गर्भवती कर दिया गया। मुख्यमंत्री ये जानकारी भी दी कि महिला जब उसके पास रहने गई थी, तब उसे प्रताड़ित भी किया गया था।

असम के सीएम ने मृतकों के परिजनों से भी मुलाकात की। उन्होंने इस पर भी चिंता जताई कि नाम बदल कर प्यार में फँस जाने के बाद महिला जब वापस लौटती है तो समाज में उसे स्वीकार्यता नहीं मिलती। उन्होंने कहा कि मज़बूरी में ऐसी स्थिति में लड़कियाँ धर्मांतरण कर लेती हैं, सब कुछ का त्याग कर देती हैं और एक दूसरे ही जीवन में घुस जाती है। सीएम सरमा ने कड़ी से कड़ी सज़ा सुनिश्चित करने का आश्वासन देते हुए इसे एक ‘ओपन एन्ड शट केस’ करार दिया।

नजीबुर ने हिन्दू बीवी और उसके माता-पिता को कुल्हाड़ी से काट डाला

जानकारी देते चलें कि असम में नजीबुर रहमान नामक एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी संघमित्रा और पत्नी के माता-पिता को मार डाला। इसके बाद वो 9 महीने के बच्चे को लेकर पुलिस थाने पहुँच गया। राज्य में इस ट्रिपल मर्डर की घटना सामने आने के बाद सनसनी मच गई है। नजीबुर रहमान ने इस वारदात को अंजाम देने के बाद आत्मसमर्पण कर दिया है। संघमित्रा की उम्र 24 साल थी। हत्यारा नजीबुर रहमान पेशे से मेकेनिकल इंजीनियर है। मामला ‘लव जिहाद’ का भी लग रहा है।

इसकी शुरुआत जून 2020 में हुई, जब नजीबुर रहमान ने फेसबुक के माध्यम से संघमित्रा से दोस्ती की। ये वो समय था, जब कोरोना संक्रमण अपने शिखर पर था और देश भर में लॉकडाउन लगा हुआ था। अक्टूबर 2020 आते-आते दोनों एक-दूसरे से प्रेम करने लगे और कोलकाता भाग कर उन्होंने शादी तक कर ली। हालाँकि, संघमित्रा के परिजनों को ये रिश्ता बिल्कुल भी पसंद नहीं था। इसके बावजूद उसने नजीबुर रहमान से कोर्ट में शादी कर ली थी।

माता-पिता ने बेटी के खिलाफ चोरी का मामला भी दर्ज कराया था। पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया और एक महीने उसे न्यायिक हिरासत में गुजारने पड़े। इसके बाद संघमित्रा घर लौट आई थी और अपने माता-पिता के साथ रहने लगी थी। लेकिन, जनवरी 2022 में दोनों एक बार फिर से भाग गए थे। जब अगस्त में दोनों लौटे तब संघमित्रा गर्भवती थी। दोनों 5 महीने चेन्नई में रहे थे। नवंबर में नजीबुर रहमान के घर में ही संघमित्रा ने एक बेटे को जन्म दिया।

मार्च 2020 में दोनों में फिर से झगड़ा हुआ और संघमित्रा अपने बेटे के साथ माँ-बाप के पास रहने चली गई। नजीबुर रहमान पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए उसके विरुद्ध FIR भी दर्ज की गई थी। 28 दिन बाद आखिरकार उसे जमानत मिली और वो बाहर निकला था। जेल से निकलने के बाद वो बार-बार बच्चे से मिलने की जिद कर रहा था, लेकिन संघमित्रा के माता-पिता ने मना कर दिया। 29 अप्रैल को नजीबुर रहमान के भाई ने संघमित्रा के परिजनों पर मारपीट का आरोप लगाया।

सोमवार (24 जुलाई, 2023) को दोनों पक्ष एक बार फिर से भिड़े। नजीबुर ने न सिर्फ संघमित्रा, बल्कि अपने ससुर संजीव घोष और सास जुनू घोष का भी क़त्ल कर डाला। फिर वो अपने 9 महीने के बच्चे को लेकर भाग गया। अंततः उसे थाने में सरेंडर करना पड़ा। कुल्हाड़ी से काट कर इस हत्याकांड को अंजाम दिया गया। तीनों के शव खून से लथपथ अवस्था में मिले। नजीबुर रहमान ने काफी निर्ममता से तीनों को कुल्हाड़ी से काट डाला था। तीनों के शरीर पर कई जख्म मिले हैं।

रिलेशनशिप, फिर रेप-धर्मांतरण का केस… ‘पूजा शर्मा’ बन कइयों को ठगने वाली महिला निकली जमीला खातून, फर्जी आधार कार्ड मिला

फर्जी हिंदू महिला बनकर कई लोगों के साथ ठगने वाली जमीला खातून और उसके दो साथियों को उत्तर प्रदेश की पुलिस ने गिरफ्तार किया है। जमीला ने पूजा शर्मा के नाम से फर्जी आधार कार्ड बनवाया था। वह मुस्लिम समुदाय के लोगों के साथ रिलेशनशिप में जाती और फिर बलात्कार एवं जबरन धर्मांतरण का मुकदमा करने की धमकी देकर उनसे पैसे वसूलती थी।

जमीला खातून मूल रूप से असम की रहने वाली है। वह यूपी के बिजनौर के कोतवाली देहात इलाके में पूजा शर्मा बनकर रह रही थी। पुलिस ने जमीला खान के साथ-साथ उसके दो साथियों- मोहम्मद जहीर और आसिफ को भी गिरफ्तार किया है। वहीं, उसके अन्य साथी- सलमान, अमजद और खालिद पुलिस के चंगुल से बाहर हैं। ये सभी बिजनौर के रहने वाले हैं।

इस मामले का खुलासा पूजा शर्मा बनी जमीला खातून के एक तहरीर से हुआ। जमीला ने 6 जुलाई 2023 को कोतवाली देहात में एक तहरीर दी। इस तहरीर में उसने अपना नाम पूजा शर्मा, पिता का नाम स्वर्गीय राजू शर्मा और निवासी महावीर कॉलोनी तिलक नगर दिल्ली बताया था।

तहरीर में जमीला खातून ने कहा था कि 29 मई 2023 को उसका निकाह जिले के अकबराबाद गाँव के रहने वाले एहतेशाम पुत्र मोहम्मद फरीद के साथ हुआ था। पूजा शर्मा ने आरोप लगाया था कि उसका शौहर उसे छोड़कर चला गया है और उसके सास-ससुर उसके साथ मारपीट कर रहे हैं।

महिला की शिकायत के बाद यूपी पुलिस ने मामला दर्ज करके जाँच शुरू कर दी। जाँच के दौरान पता चला कि जो महिला खुद को पूजा शर्मा बता रही है, उसका असली नाम जमीला खातून है। वह दिल्ली की नहीं, बल्कि असम के जिला दर्रांग के थाना डलगाँव के अंतर्गत आने वाले कस्बा लालबरी सीलबोरी की रहने वाली है।

जमीला के अब्बू का नाम रजब अली और अम्मी का खालीदा बेगम है। रजब अली और खालीदा बेगम ने जमीला खातून की पहचान अपनी बेटी के रूप में की है। यूपी पुलिस को जमीला के पास से उसका आधार कार्ड, पैन कार्ड, वोटर आईडी और बैंक खाता मिला है।

पुलिस ने पाया कि जमीला ने आधार कार्ड पूजा शर्मा के नाम से बनवा रखा है। वहीं, पैन कार्ड, वोटर आईडी और बैंक खाता पासबुक जमीला खातून के नाम से ही हैं। पुलिस ने इन सारे कागजातों की जाँच कराई तो ये सही पाए गए, जबकि पूजा नाम का आधार कार्ड फर्जी मिला।

पुलिस जाँच में यह बात भी पता चला कि जमीला ने उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के पटेल नगर थाने में जहीर अहमद नाम के एक व्यक्ति के खिलाफ साल 2019 में मुकदमा दर्ज करा रखा है। उसने साल 2023 में ही देहरादून के रहने वाले के नौशाद कुरैशी के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज करा रखा है। दोनों अभी जेल में हैं।

पुलिस ने पाया कि जमीला ने इस साल जनवरी में नौशाद कुरैशी नाम के एक व्यक्ति के खिलाफ जबरन धर्मांतरण का मामला दर्ज कराया था। उसने अपने बयान में कहा था कि वह डेढ़ साल से नौशाद के साथ रह रही थी और उसने निकाह का झूठा आश्वासन देकर उसके साथ रेप किया। जमीला ने आगे कहा था कि नौशाद ने उसका जबरन गर्भपात करा दिया।

पूजा शर्मा बनीं जमीला ने कहा कि जब भी वह इसका विरोध करती थी तो नौशाद अपने भाई और अब्बू के साथ मिलकर उसकी पिटाई करता था। उसके बयान के आधार पर पुलिस ने नौशाद, उसके भाई शाहनवाज और उनके अब्बू जहीर पर बलात्कार, मारपीट और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने का मामला दर्ज किया था।

बिजनौर के पुलिस अधीक्षक नीरज जादौन ने कहा कि पूछताछ के दौरान जमीला ने खुलासा किया कि जहीर अहमद से पहले उसने दो बार निकाह किया था। उसने मोइदुल हसन इस्लाम और इनाम-उल-हक के साथ निकाह किया था। जमीला ने दोनों को छोड़ दिया था। उसने यह भी खुलासा किया कि एहतेशाम के साथ निकाह के लिए उसने अपना नाम पूजा शर्मा से बदलकर जैनब परवीन रख दिया गया।

स्कूलों में 60 लाख बच्चे बढ़े, 1.84 करोड़ मुफ्त पुस्तकें… दिव्यांग छात्रों से लेकर स्कूलों में सुविधाओं तक, 7 पॉइंट्स में समझें योगी सरकार ने कैसे बदल दी यूपी की शिक्षा व्यवस्था

यदि सामाजिक बदलाव लाना है तो सर्वप्रथम समाज को शिक्षित करना पड़ेगा। भारत के पास विश्व की सबसे बड़ी युवा शक्ति है जिसे एक बेहतर मानव संसाधन के रूप में तैयार करने के लिए बेहतर शिक्षा देनी पड़ेगी। उत्तर प्रदेश की मौजूदा सरकार ने पिछले 6 वर्षों में शिक्षा के हर क्षेत्र में बुनियादी स्तर से बदलाव लाने का सार्थक प्रयास किया। शिक्षा के क्षेत्र में बुनियादी बदलाव बुनियाद को मज़बूत करके ही लाया जा सकता है।

इस सरकार ने न केवल प्राथमिक शिक्षा के सुधार हेतु कई कदम उठाए, अपितु शिक्षा व्यवस्था की कार्य शैली में हर स्तर पर बड़े बदलाव देखने को मिले। ‘बीमारू राज्य’ की संज्ञा से नवाज़ा गया उत्तर प्रदेश सरकारी शिक्षा व्यवस्था के ख़स्ताहाल हो जाने का दंश झेल रहा था। प्राथमिक विद्यालयों की छवि एक दिन में ख़राब नहीं हुई थी, इसके पीछे वर्षों की सरकारी अकर्मण्यता शामिल थी।

परिणामस्वरूप निजी विद्यालयों का धंधा खूब फला-फूला। प्राथमिक पाठशालाओं में शिक्षकों के साथ-साथ कमरों, कुर्सी -मेज़, बिजली-पानी और शौचालय जैसी बुनियादी व्यवस्थाएँ न होने से विद्यालय होने की श्रेणी में ही लोग इन्हें नहीं शामिल करते थे ।इस सरकार ने बुनियादी सुविधाओं को दुरुस्त कर सर्वप्रथम लोगों को यह एहसास कराया कि ये पठन-पाठन का प्राथमिक केंद्र है। 

शिक्षकों की कमी दूर की गई

कोई भी शिक्षा का केंद्र केवल अपने भवन की वजह से नहीं जाना जाता है, उसको बेहतर बनाने का कार्य वहाँ के शिक्षक करते हैं। उत्तर प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी थी। अपने कार्यकाल में लगभग एक लाख बीस हज़ार शिक्षकों की भर्ती कर इस सरकार ने एक बड़ी चुनौती को ख़त्म किया। शिक्षक भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह से निष्पक्ष रही, अभ्यर्थी पहले की तरह सालों-साल न्यायालय के दरवाज़े नहीं खटखटा रहे थे। अपितु निष्पक्ष व पारदर्शी तरीके से हुई नियुक्तियों ने एक बार फिर से लोगों में विश्वास पैदा किया। 

विद्यालयों में आधारभूत सुविधाओं पर विशेष ध्यान   

विद्यालयों में शिक्षकों की कमियों को दूर करने के साथ-साथ लगभग 93,000 प्राथमिक विद्यालयों में आधारभूत सुविधाओं को सही किया गया। प्राथमिक विद्यालय महमूदपुर, प्राथमिक विद्यालय मोहरिकला, प्राथमिक विद्यालय नरही, प्राथमिक विद्यालय मिर्ज़ापुर जैसे विद्यालय प्राइवेट विद्यालयों से हर क्षेत्र में बेहतर साबित हो रहे थे जिस वजह से ये काफ़ी चर्चित भी रहे।

जून 2018 में माननीय मुख्यमंत्री के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश सरकार ने भारत के सबसे बड़े अन्तर्विभागीय कनवर्जन्स प्रोग्राम में से एक ‘ऑपरेशन कायाकल्प’ की शुरुआत की थी। इसके अन्तर्गत केन्द्र व राज्य सरकार द्वारा विभिन्न मदों जैसे समग्र शिक्षा अभियान, ग्राम पंचायत निधि, जिला खनिज निधि, नगरीय क्षेत्र की विभिन्न निधियां, जल जीवन मिशन, मनरेगा इत्यादि में विशेष रूप से धनराशि उपलब्ध कराई गई है जिसमें अन्तर्विभागीय समन्वय स्थापित कर प्राथमिक व उच्च प्राथमिक विद्यालयों की मूलभूत अवस्थापनात्मक सुविधाओं को कायाकल्पित किया जा रहा है।

‘ऑपरेशन कायाकल्प‘ को शुरू हुए अभी लगभग 4 वर्ष हुए हैं मगर इस अल्प अवधि में ही प्रदेश के प्रत्येक विद्यालय में चरण बद्ध रूप से कायाकल्प का कार्य प्रारम्भ हो चुका है । प्रत्येक जनपद में बड़े पैमाने पर स्कूलों का कायाकल्प किया जा चुका है। इसकी प्रमाणिकता एवं पारदर्शिता हेतु विद्यालय की फोटो प्रोटोकॉल के तहत जीओ टैगिंग करवाई जा रही है। प्रेरणा पोर्टल के माध्यम से निरंतर इन कार्यों के सन्तृप्तिकरण का रियल टाइम अनुश्रवण भी किया जा रहा है।

इन विद्यालयों में गेट, चारदीवारी, फर्श पर टाइल्स, खेलने के लिए पार्क और लाइब्रेरी के साथ डिजिटल क्लास रूम्स, बालक और बालिकाओं के लिए अलग अलग शौचालय, पीने के पानी और हाथ धोने के लिए हैण्डवॉश सिस्टम, क्लास रूम में बच्चों के बैठने के लिए फर्नीचर की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। बेसिक शिक्षा के महत्व को देखते हुए वित्त वर्ष 2016-17 में 55,176 हजार करोड़ से बढ़ाकर वित्त वर्ष 2021-22 में 63,455 तक पहुँचाया है। इसे प्रति वित्त वर्ष लगातार बढ़ाया ही जा रहा है ताकि हमारे भविष्य के लिए नींव को मज़बूत किया जा सके। 

लगातार विद्यार्थियों के पंजीकरण में इज़ाफ़ा 

सरकारी विद्यालय कहने पर ही हमारे मन-मस्तिष्क में वह छवि आती थी जहाँ टूटी दीवारें, जर्जर इमारत और बिना शिक्षक के शोर मचाते बच्चे। उनकी इतनी ख़राब छवि के कारण ही गरीब से गरीब व्यक्ति भी अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में भेजने को मजबूर होने लगे थे। इस सरकार के आने  के बाद, अर्थात् 2017 से अब तक लगभग 60 लाख बच्चे प्राथमिक विद्यालयों में बढ़े हैं। यदि लोगों का विश्वास सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में बढ़ा न होता तो इतनी बड़ी मात्रा में बच्चे इन सरकारी विद्यालयों में दाख़िला न लेते।

उत्तर प्रदेश में ग़रीबों की संख्या अधिक है इसलिए वहाँ अतिरिक्त प्रयास करने पड़ते हैं। चूँकि प्राथमिक शिक्षा सबका मौलिक अधिकार है इसलिए बच्चों के भविष्य निर्माण हेतु 1.84 करोड़ पाठ्य पुस्तकें, 1.83 करोड़ बस्ते, 1.61 करोड़ विद्यालय की पोशाकें मुफ़्त में वितरित की गईं। इस व्यवस्था को और अधिक बेहतर बनाने के लिए डी.बी.टी. के माध्यम से छात्र-छात्राओं को यूनीफार्म, स्वेटर जूते-मोजे एवं स्कूल बैग खरीदने के लिए अभिभावकों के बैंक खातों में 1100 रुपए की धनराशि उपलब्ध कराई जाती है।

परिषदीय प्राथमिक, परिषदीय उच्च प्राथमिक, कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय एवं राजकीय विद्यालयों में अध्ययनरत् समस्त बालिकाओं (के0जी0बी0वी0 बालिकाओं सहित), अनुसूचित जाति के बालकों, अनुसूचित जनजाति के बालकों एवं गरीबी रेखा के नीचे के परिवार के प्रत्येक छात्र-छात्रा को दो जोड़ी यूनीफार्म हेतु 600 रुपए, स्वेटर हेतु 200 रुपए, जूता-मोजा हेतु रू0 125, स्कूल बैग हेतु 175 रुपए – अर्थात् कुल 1100 रुपए प्रदान किए जा रहे हैं।

समग्र शिक्षा के अन्तर्गत प्रदेश के सभी जनपदों में संचालित परिषदीय प्राथमिक/उच्च प्राथमिक विद्यालयों, राजकीय विद्यालयों, अशासकीय सहायता प्राप्त प्राथमिक/उच्च प्राथमिक एवं समाज कल्याण विभाग द्वारा संचालित राजकीय व सहायता प्राप्त विद्यालयों तथा सहायता प्राप्त मदरसों में अध्ययनरत् कक्षा 01 से 08 तक के समस्त छात्र-छात्राओं को प्रोत्साहन के रूप में निःशुल्क पाठ्य-पुस्तक वितरित की जाती हैं। राज्य में पाठ्य पुस्तकों का विकास हिन्दी के अतिरिक्त अंग्रेजी, उर्दू भाषा एवं ब्रेल लिपि में भी किया जाता है। ये सब उपाय सरकार द्वारा इसलिए किए जा रहे हैं ताकि कोई भी बच्चा किसी भी प्रकार के संसाधन के न रह पाने के कारण शिक्षा से वंचित न रह जाए।

प्राथमिक शिक्षा यदि बेहतर है तो आगे की शिक्षा के बेहतर होने की सम्भावना बढ़ जाती है इसलिए सर्वाधिक कार्य आधार पर किया जाना चाहिए जो कि अनवरत किया जा रहा है। इनमें भी कुछ व्यावहारिक समस्याएँ हैं। केवल शिक्षक नियुक्ति या आधारभूत सुविधा बाधा देने से शिक्षा व्यवस्था सुधर नहीं जाती। औचक निरीक्षण में विद्यालयों में नदारद शिक्षकों के लिए सरकार बायोमैट्रिक प्रणाली को अपनाने की बात कर रही है। शिक्षकों की उपस्थिति को ऑनलाइन बनाने की ओर कदम बढ़ाया गया । छोटे-छोटे प्रशासनिक सुधार का समाज पर व्यापक असर पड़ता है। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि इस सरकार ने लोगों के मानस पटल पर विद्यालयों की छवि को सुधार दिया है।

आधार की मजबूती के बाद सरकार ने उसके ऊपर होने वाले भवन निर्माण पर भी पूरा ध्यान दिया। माध्यमिक विद्यालयों में भी प्राथमिक विद्यालयों की तरह ही बेहतर आधारभूत सुविधाओं को सुनिश्चित किया गया। सीबीएसई के पाठ्यक्रम को अधिक श्रेष्ठ व आगे की प्रतियोगी परीक्षा के लिए अधिक उपयोगी मानने के कारण तथा देश में एक ही तरह का पाठ्यक्रम लागू करने की बहस को ध्यान में रखते हुए सरकार ने अपने यहाँ यही पाठ्यक्रम लागू किया।

प्रतियोगी परीक्षाओं के दौर में शहरी छात्र ग्रामीण छात्रों से आगे निकल ही जाते हैं क्योंकि उनके पास अतिरिक्त सुविधाएँ हैं। इस हेतु वर्तमान सरकार ने अभ्युदय कोचिंग निःशुल्क प्रारम्भ की ताकि छात्र किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में अपनी बेहतर तैयारी कर सकें। 70,000 से अधिक ई-पेज का कंटेंट ऑनलाइन पोर्टल पर चढ़ाया जा चुका है जिससे छात्र किसी भी समय इसको आराम से पढ़ सकें।

दिव्यांग विद्यार्थियों हेतु कई सार्थक प्रयास 

विशिष्ट आवश्यकता वाले बच्चों को पर्याप्त उपकरण उपलब्ध किया जाता है। मापन एवं वितरण शिविर में एलिम्को कानपुर के सहयोग से दिव्यांग बच्चों को विभिन्न प्रकार के सहायक उपकरण यथा- ब्रेल किट्स, मोबिलिटी केन, स्मार्ट केन, डेजीप्लेयर, ट्राईसाइकिल, व्हील चेयर, क्रचेज, कैलीपर्स, रोलेटर्स वाकिंग स्टिक, सी0पी0 चेयर, मल्टी सेन्सरी एजुकेशन किट एवं हियरिंग एड उपलब्ध कराये जाने की व्यवस्था है।

गम्भीर एवं बहु-दिव्यांग बच्चों हेतु होम बेस्ड एजूकेशन राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के टास्क संख्या 186 के क्रम में गम्भीर एवं बहु दिव्यांग बच्चों को उनकी शैक्षिक आवश्यकताओं के अनुरूप लर्निंग मटेरियल उपलब्ध कराते हुए होम बेस्ड एजुकेशन की व्यवस्था की गई है। विद्यालयों में अध्ययनरत पूर्ण दृष्टि दिव्यांग बच्चों को ब्रेल पाठ्य पुस्तकें एवं ब्रेल स्टेशनरी मटेरियल यथा- ब्रेल पेपर, स्टाइलस, अबेकस, अल्फाबेट ट्रेनर प्लेट आदि उपलब्ध कराए जाने की व्यवस्था की गई है।

अल्प दृष्टि दिव्यांग बच्चों को उनके शैक्षिक पुनर्वसन हेतु इनलार्ज प्रिंट की पाठ्य पुस्तकें उपलब्ध कराए जाने की व्यवस्था की गई है। अल्प दृष्टि दिव्यांग बच्चों को उनकी शैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु लो-विजन किट सामग्री यथा- LED मैग्नीफायर लेंस, फुल पेज फ्रेन्सल लेंस, व्हाइट पेपर, बोल्ड मार्कर आदि सामग्री उपलब्ध कराए जाने हेतु व्यवस्था की गई है। इसके साथ ही दिव्यांग छात्राओं की सम्प्राप्ति स्तर को बढ़ाने तथा उन्हें सशक्त बनाने के उद्देश्य से दिव्यांग छात्राओं को स्टाइपेण्ड उपलब्ध कराए जाने की व्यवस्था है।

अन्य शैक्षणिक कार्यक्रमों का विस्तार 

भारत सरकार द्वारा केन्द्र पुरोनिधानित “नव भारत साक्षरता कार्यक्रम” नामक एक नवीन योजना का संचालन दिनांक 01 अप्रैल, 2022 से 31 मार्च, 2027 (कुल 5 वर्ष) तक संचालन किए जाने का निर्णय लिया गया है। इसके अंतर्गत 15+ वयवर्ग के निरक्षरों विशेषकर महिलाओं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अल्पसंख्यकों, दिव्यांगजनों  आदि को संबंधित जनपदों के खण्ड शिक्षा अधिकारियों के माध्यम से 15+ वयवर्ग के निरक्षरों को चिह्नित करने के उपरान्त साक्षर किया जाएगा। उक्त हेतु वित्तीय वर्ष 2022-23 में योजना के सफल संचालन के लिए भारत सरकार द्वारा लगभग 34 करोड़ रुपए धनराशि का प्रावधान किया गया है।

निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 के अन्तर्गत 06-14 आयु वर्ग के ऐसे बच्चे जिन्हें किसी विद्यालय में नामांकित नहीं किया गया है अथवा नामांकन के उपरान्त वे अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण नहीं कर सके हैं उनका चिह्नीकरण करते हुए उनका नामांकन आयुसंगत कक्षा में कराया जाए और अन्य विद्यार्थियों के समकक्ष लाने हेतु उन बच्चों को विशेष प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है।

उक्त प्रावधान को प्रभावी रूप में क्रियान्वित करने हेतु कार्यक्रम ’शारदा’ संचालित किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त विद्यालय में अनेक शिविर व शिक्षकों हेतु अनेक कार्यशालाएँ जैसे निजी विद्यालयों के शिक्षकों की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए किए जाते हैं, उसी प्रकार यहाँ भी 24220 उच्च प्राथमिक विद्यालयों में रानी लक्ष्मी बाई आत्मरक्षा प्रशिक्षण कार्यक्रम, यूनिसेफ तथा निमहान्स के सहयोग से 20500 शिक्षक/शिक्षिकाओं का जेण्डर संवेदीकरण प्रशिक्षण, आत्मरक्षा प्रशिक्षण के अन्तर्गत मॉड्यूल का निर्माण,

यूनिसेफ के सहयोग से 150 मास्टर ट्रेनर्स का जीवन कौशल शिक्षा पर आधारित कार्यशाला, निमहान्स बंगलौर के सहयोग से स्पेशल फोकस जनपदों के 50 एस0आर0जी0 की बाल अधिकार, तनाव प्रबन्धन आदि मुद्दों पर 25 दिवसीय कार्यशाला, निमहान्स बंगलौर के सहयोग से स्पेशल फोकस जनपदों के समस्त जनपदों से 100 शिक्षकों की बाल अधिकार, तनाव प्रबन्धन आदि मुद्दों पर 25 दिवसीय कार्यशालाओं का आयोजन किया गया।

उच्च शिक्षा का बदलता स्वरूप   

वर्तमान सरकार इक्यावन राजकीय महाविद्यालयों की स्थापना कर रही है, 28 नए निजी विश्वविद्यालय खोले जाने पर मुहर लग ही गई है। इसके साथ ही साथ खेल विश्वविद्यालय, पुनर्वास विश्वविद्यालय, फ़ोरेंसिक विश्वविद्यालय, आयुष विश्वविद्यालय भी खोले जा रहे हैं। सरकार ने प्राविधिक शिक्षा के क्षेत्र में लगातार नए कॉलेज को मंज़ूरी दी है। पूरे राज्य में वर्तमान समय में 1417 पॉलीटेक्निक कॉलेज हैं जो पहले के दोगुने से भी ज़्यादा हैं

7 लाख से अधिक लोगों को कौशल विकास मिशन के तहत प्रशिक्षित किया गया। ये ऐसे आँकड़े हैं जो यह दर्शाते हैं कि राज्य में शिक्षा के हर क्षेत्र में प्रयास किए जा रहे हैं जो सबके समक्ष हैं। 14 नए मेडिकल कॉलेज के लिए 2491 करोड़ का बजट पास किया गया है।

नए विद्यालय-कॉलेज का निर्माण तो बेहतर है परंतु उनके उचित क्रियान्वयन के अभाव में सब व्यर्थ हो जाता है।उत्तर प्रदेश में परीक्षा व्यवस्था नक़ल माफिया का पर्याय हो चुकी थी। अपनी प्रतिभा से अंक लाने वाले छात्रों को बाहर के लोग संदेह की नज़र से देखते थे। नक़ल माफ़ियाओं और उनके राजनीतिक रसूख़ ने इन सब कार्यों को पनपने में बड़ी मदद की। परंतु वर्तमान सरकार ने इस पर बड़ी नकेल कसी। इस तरह के कार्यों में लिप्त परीक्षा केंद्रों को काली सूची में डालकर सरकार ने साफ़-सुथरी परीक्षा को संचालित कर पाने में सफलता पाई है। इससे प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को एक आत्मविश्वास मिला। 

मदरसों पर भी समुचित ध्यान 

शिक्षा का मूल उद्देश्य सभी नागरिकों को बेहतर मानव संसाधन के रूप में विकसित करने से है। शिक्षित समाज ही बेहतर समाज को साकार करता है। शिक्षा व्यक्ति को तार्किक बनाती है, वैज्ञानिक सोच का विकास करती है। उत्तर प्रदेश के मदरसों में जो पाठ्यक्रम चल रहे थे वे धार्मिक थे परंतु उनमें वैज्ञानिकता का अभाव था, अतः वहाँ भी पाठ्यक्रम को बदल कर सीबीएसई पाठ्यक्रम लागू किया जा रहा है। वहाँ भी पढ़ने वाले बच्चों का सर्वांगीण विकास हो सकेगा क्योंकि अब वे केवल मजहब से जुड़े मात्र पाठ्यक्रम नहीं अपितु एक पूर्ण पाठ्यक्रम पढ़ेंगे जो उनके व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास में सहायक होगा। 

कई स्तरों पर योगी सरकार ने शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने और उसके  समावेशी रूप को लगातार बेहतर करने का जो बीड़ा उठाया है वह आने वाले वर्षों में फलित होता हुआ दिखाई देगा। बीमारु और पिछड़े राज्यों की संज्ञा वाले राज्यों को इनसे एक सीख अवश्य लेनी चाहिए। समाज के पिछड़े, दलित-शोषित और वंचित वर्ग के बच्चे जो किसी भी कारण शिक्षा से वंचित रहे, उन्हें शिक्षित करने का प्रयास हो रहा है।

गरीबी के कारण कुपोषित भविष्य न तैयार हो, इसलिए उन्हें मिड डे मील के माध्यम से भरपूर पोषण के साथ-साथ अन्य सभी शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध करा के शिक्षा क्षेत्र को बदलने का भागीरथ प्रयास हो रहा है। इससे यह उम्मीद मजबूत होती है कि हमारे प्रदेश और फिर देश का आने वाला भविष्य बेहतर होगा।

(इस लेख के लेखक लेखक दिग्विजय सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर एवं ‘होप’ संस्था के संस्थापक हैं। अनुराग सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर एवं ‘होप’ संस्था में रिसर्च फेलो हैं।)