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सुप्रीम कोर्ट का स्टे मेरिट वाले प्रमोशन पर नहीं, राहुल गाँधी को सजा सुनाने वाले जज भी दायरे में नहीं: ​जस्टिस शाह, गुजरात के जजों की पदोन्नति पर लगी थी रोक

पिछले दिनों मीडिया में खबर आई थी कि सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुजरात (Gujarat) की निचली अदालत के 68 न्यायिक अधिकारियों के जिला जज के रूप में प्रमोशन पर रोक लगा दी है। इनमें हरीश वर्मा का नाम भी बताया गया था। उन्होंने मानहानि केस में राहुल गाँधी को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। लेकिन प्रमोशन पर स्टे लगाने वाले जस्टिस एमआर शाह का कहना है कि मीडिया ने आदेश को गलत तरीके से रिपोर्ट किया है। साथ ही यह भी बताया है कि इस आदेश के दायरे में राहुल गाँधी को सजा सुनाने वाले जज नहीं आएँगे।

बार ऐंड बेंच ने जस्टिस शाह के हवाले से कहा है कि यह स्टे योग्यता के आधार पर होने वाले प्रमोशन पर लागू नहीं होगी। उन्होंने कहा, “जजों के प्रमोशन पर रोक लगाने वाले आदेश का किसी एक व्यक्ति से लेना-देना नहीं है। मामला यह था कि प्रमोशन का पैमाना योग्यता सह वरिष्ठता हो या फिर वरिष्ठता सह योग्यता। सोशल मीडिया पर चल रही खबरों में कहा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने सभी 68 जजों के प्रमोशन पर रोक लगा दी है। लेकिन ऐसे लोगों ने आदेश नहीं पढ़ा है। केवल ऐसे प्रमोशन पर रोक लगाई गई है जिन्हें मेरिट लिस्ट में नहीं होने के बाद भी केवल वरिष्ठता के आधार पर प्रमोशन दिया गया था।”

जस्टिस शाह के अनुसार जज हरीश वर्मा रोक के इस पैमाने के दायरे में नहीं आते। उन्होंने कहा, “मैंने पढ़ा है कि सज्जन (राहुल गाँधी केस में सूरत कोर्ट के जज) को प्रमोशन नहीं मिल रहा है। यह भी सच नहीं है। उन्हें मेरिट के आधार पर प्रमोशन मिल रहा है। वह योग्यता के मामले में 68 में पहले स्थान पर हैं।”

बता दें कि शुक्रवार (12 मई, 2023) को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस सीटी रविकुमार की बेंच ने जजों के प्रमोशन पर रोक लगाई थी। फैसले में जस्टिस कहा गया था, “राज्य सरकार ने याचिका लंबित रहने के दौरान अधिसूचना जारी की है। हम हाई कोर्ट की सिफारिश और राज्य सरकार की अधिसूचना पर रोक लगाते हैं और जजों को उनके मूल पद पर वापस भेजते हैं।”

क्या है मामला

बता दें कि 68 जजों के प्रमोशन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। सीनियर सिविल जज कैडर के दो अधिकारियों ने अपनी याचिका में कहा था कि 65 प्रतिशत कोटा नियम के तहत इन जजों का प्रमोशन किया गया, जो कि अवैध है। याचिका में दलील दी गई थी कि प्रमोशन मेरिट कम सीनियरिटी के सिद्धांत पर की जानी चाहिए।

याचिका दाखिल करने वाले न्यायिक अधिकारी रवि कुमार मेहता और सचिन प्रजापराय मेहता ने अपनी अर्जी में कहा था कि कई ऐसे जज हैं, जिन्होंने पदोन्नति के लिए हुई परीक्षा में ज्यादा अंक हासिल किए हैं। इसके बावजूद उनका सिलेक्शन नहीं किया गया और उनसे कम अंक पाने वाले जजों को प्रमोट किया गया।

कॉन्ग्रेस के लिए अब दिल्ली कितनी दूर?

भाजपा हमें ताना मारती थी कि हम कॉन्ग्रेस मुक्त भारत बनाएँगे। अब यह सच्चाई है कि दक्षिण भारत भाजपा मुक्त हो गया है।

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने यह बात कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद कही। 2014 से चमत्कार की आस में प्रतीक्षारत विपक्ष को इन नतीजों में 2024 की जीत दिख रही है। बीजेपी की हर पराजय में ‘कॉन्ग्रेस उदय’ देखने वाले पत्रकारों/प्रोपेगेंडाबाजों के लिए यह 2024 से पहले नरेंद्र मोदी के ‘मिशन दक्षिण’ की बुनियाद दरकना है।

तो क्या दिल्ली अब कॉन्ग्रेस की मुट्ठी में है? क्या 2024 अब कॉन्ग्रेस की है?

दक्षिण भारत के राज्य

  • कर्नाटक
  • केरल
  • तमिलनाडु
  • आंध्र प्रदेश
  • तेलंगाना

दक्षिण भारत के राज्यों में किसकी सरकार

  • कर्नाटक: कॉन्ग्रेस
  • केरल: वाम दल
  • तमिलनाडु: डीएमके
  • आंध्र प्रदेश: वाईएसआर कॉन्ग्रेस
  • तेलंगाना: भारत राष्ट्र समिति

तेलंगाना में इसी साल विधानसभा चुनाव होंगे। आंध्र प्रदेश में अगले साल आम चुनावों के साथ चुनाव होंगे।

दक्षिण भारत में लोकसभा की सीटें

  • कर्नाटक: 28
  • केरल: 20
  • तमिलनाडु: 39
  • आंध्र प्रदेश: 25
  • तेलंगाना: 17

इस तरह ​दक्षिण भारत में लोकसभा की कुल सीटें 129 हैं। 2019 में इनमें से केवल 29 सीटों पर बीजेपी को जीत मिली थी। इनमें चार सीटें तेलंगाना से आई थी और 25 कर्नाटक से। मतलब, दक्षिण भारत के तीन राज्यों में तो बीजेपी का खाता भी नहीं खुला था।

अब क्या हो सकता है?

पिछली बार भी जब आम चुनाव हुए थे तो कर्नाटक में कॉन्ग्रेस और जेडीएस की सरकार चल रही थी। फिर भी बीजेपी 25 सीटें जीतने में कामयाब रही। 2019 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में भी कॉन्ग्रेस सरकार बनाने में कामयाब हुई थी। लेकिन जब लोकसभा के चुनाव हुए तो छत्तीसगढ़ की 11 में से 9, मध्य प्रदेश की 29 में से 28 और राजस्थान की 25 में से 25 सीट बीजेपी को मिली। 2017 में गुजरात के विधानसभा चुनावों में भी बीजेपी को टक्कर देने में कॉन्ग्रेस सफल रही थी। लेकिन 2024 के लोकसभा में कॉन्ग्रेस का गुजरात में खाता तक नहीं खुला।

जाहिर है राज्यों के विधानसभा और लोकसभा के चुनाव अलग-अलग होते हैं। फिर भी कॉन्ग्रेस के लिए घोर आशावादी होकर भी सोचा जाए तो कर्नाटक विधानसभा चुनाव के मौजूदा गणित के हिसाब से बीजेपी को 18 सीटों का नुकसान हो सकता है।

दक्षिण भारत में बीजेपी की ताकत

कर्नाटक विधानसभा चुनाव की मुश्किल डगर का एहसास बीजेपी को पहले से था। हालाँकि यह उम्मीद नहीं रही होगी कि जेडीएस के वोट बैंक में इतना बिखराव होगा और कॉन्ग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिल जाएगा। कर्नाटक के अलावा दक्षिण में बीजेपी की उम्मीदों के हिसाब से तेलंगाना महत्वपूर्ण राज्य है। वहाँ पार्टी 2019 के बाद से खुद को कितना मजबूत कर पाई है, ​इसके संकेत राज्य में इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनावों में मिल जाएँगे। लोकसभा चुनाव के लिहाज से देखें तो कर्नाटक और तेलंगाना के अलावा दक्षिण के किसी और राज्य में 2024 में बीजेपी के चमत्कार कर जाने की अपेक्षा उसके घोर समर्थक को भी न होगी। वैसे आंध्र और तमिलनाडु में भी पूर्व में बीजेपी खाता खोलने में सफल रही है। लेकिन उसमें बीजेपी की खुद की मजबूती से अधिक गठबंधन साथियों का योगदान रहा है।

दक्षिण भारत में कॉन्ग्रेस का हाल

कर्नाटक की सत्ता हासिल करने में कामयाब रही कॉन्ग्रेस को 2019 के आम चुनावों में दक्षिणी राज्यों से 27 सीटों पर जीत मिली थी। इनमें से एक कर्नाटक से, तीन तेलंगाना से, 15 केरल से और 8 तमिलनाडु से थे। अब तेलंगाना में बीजेपी के उभार ने कॉन्ग्रेस को हाशिए पर धकेल रखा है। आंध प्रदेश में वाईएसआर कॉन्ग्रेस पहले की तरह मजबूत दिखती है। ऐसी कोई संभावना नहीं दिखती कि जगन मोहन रेड्डी विपक्षी एकता के नाम पर कॉन्ग्रेस की छतरी के नीचे जाएँगे। 2019 के आम चुनावों से पहले एनडीए छोड़ विपक्षी एका बनाने चले चंद्रबाबू नायूड की टीडीपी आंध्र की दूसरी प्रमुख क्षेत्रीय पार्टी है। राष्ट्रीय राजनीति में खुद को अप्रसांगिक कर चुके नायडू ने भी इस बार अब तक ऐसी किसी मुहिम से खुद को दूर ही कर रखा है। केरल में कॉन्ग्रेस गठबंधन और वाम दलों के गठबंधन के बीच ही इस बार भी कमोबेश मुकाबला रहेगा। तमिलनाडु में आज भी कॉन्ग्रेस सत्ताधारी डीएमके की सहयोगी है। मुकाबला डीएमके और एआईडीएमके गठबंधन के बीच होगा।

यानी ऐसी कोई संभावना नहीं दिखती जिससे लगे कि दक्षिणी राज्यों में कॉन्ग्रेस को कोई नया और मजबूत पाटर्नर मिलने जा रहा है। न ही इस बात की संभावना दिखती कि वह दक्षिण भारत की 129 लोकसभा सीटों में 2019 के मुकाबले अपनी सीटों में भारी इजाफा कर पाएगी। तेलंगाना और आंध्र में उसकी जमीन खिसक चुकी है। तमिलनाडु में वह डीएमके की कृपा पर है। कर्नाटक और केरल में ही उसके लिए बेहतर करने की संभावना बचती है। इन दोनों राज्यों की यदि सभी सीटें भी कॉन्ग्रेस जीत ले (जिसकी संभावना नाममात्र है) और अन्य दक्षिणी राज्यों में 2019 में हासिल की गई सीटों को वह बरकरार रख लेती है तो भी उसके पास खुद की 59 सीटें ही होंगी। दक्षिण भारत के अलावा अन्य राज्यों में भी कॉन्ग्रेस ऐसी स्थिति में नहीं है कि वह खुद के दम पर 41 सीटें लाकर लोकसभा में अपने सदस्यों की संख्या तीन डिजिट में पहुँचा सके।

… तो इस जीत से क्या होगा

कर्नाटक की जीत कॉन्ग्रेस के लिए लोकसभा चुनावों से पहले चुनावी संसाधन जुटाने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। इसने उसे वह नंबर्स दिए हैं जिससे वह 2024 के आम चुनावों तक राहुल गाँधी नाम के प्रोडक्ट को बेचने की कोशिश कर सके। वह ताकत दी है, जिससे काल्पनिक मुद्दे गढ़ सके, जैसे 2019 से पहले राफेल का गढ़ा गया था। उम्मीदों का वह लॉलीपॉप दिया है, जिससे अपने सहयोगियों को भागने से रोक सके।

वैसे भाड़े के सैनिकों से युद्ध जीतने की कई कहानियाँ हैं। पर ये युद्ध तभी जीते गए जब सेनापति खुद भी सक्षम थे। कॉन्ग्रेस की सबसे बड़ी दिक्कत यही है। वह भानुमती का कितना भी बड़ा कुनबा जोड़ ले, उसका स्वयंभू सेनापति (भले आज कर्नाटक जीत में भारत जोड़ो यात्रा का प्रभाव भी बताया जा रहा) निस्तेज और सामर्थ्यहीन है। खासकर जब मुकाबला नरेंद्र मोदी नाम के राजनीतिक बाहुबली से हो। फिलहाल जो कानूनी स्थिति है वह भी कॉन्ग्रेस के स्वयंभू सेनापति को चेहरा बनने की अनुमति नहीं देता है। यानी पार्टी को 2024 के लिए चेहरे की तलाश भी करनी है। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि 2019 के आम चुनावों से पहले कई विधानसभा चुनावों में अच्छे प्रदर्शन के बाद भी कॉन्ग्रेस लोकसभा में ट्रिपल डिजिट में अपने सीटों को ले जाने के आसपास भी नहीं पहुँच पाई थी। उस समय पप्पूपना की उम्र भी 5 साल कम थी।

त्रयंबकेश्वर मंदिर में घुस कर शिवलिंग पर चादर चढ़ाने की कोशिश, सतर्क सुरक्षाकर्मियों ने मुस्लिमों को रोका: मंदिर के पास ही चल रहा था उर्स का मजहबी आयोजन

कुछ मुस्लिमों ने महाराष्ट्र के नासिक स्थित त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में घुस कर शिवलिंग पर चादर चढ़ाने की कोशिश की, लेकिन सतर्क सुरक्षा गार्ड्स ने उनके इस कुत्सित प्रयास को विफल कर दिया। वो जबरन मंदिर के भीतर घुसना चाह रहे थे। इस घटना के बाद से इलाके में तनाव बढ़ गया है और ‘ब्राह्मण महासभा’ ने इसकी गहरी जाँच की माँग की है। बता दें कि भगवान शिव का ये मंदिर द्वादश ज्योतिर्लिंगों में आता है।

सुरक्षकर्मियों ने इन मुस्लिमों को मंदिर के अंदर प्रवेश करने से रोक दिया। जो मुस्लिम भीतर घुसने का प्रयास कर रहे थे, वो अपने मजहबी कार्यक्रम उर्स में शामिल होने के लिए आए थे। लेकिन, सतर्क सुरक्षाकर्मियों और मुस्तैद मंदिर प्रशासन ने उनकी मंशा पर पानी फेर दिया। फिर स्थिति को नियंत्रित भी कर लिया गया। आरोपितों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की माँग की जा रही है। पुलिस द्वारा कार्रवाई न होने पर पुजारियों ने विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी है।

इस संबंध में मंदिर प्रशासन ने स्थानीय पुलिस थाने को पत्र भी लिखा है। इसमें शनिवार (13 मई, 2023) को रात में 9:41 बजे हुई इस घटना के संबंध में बताया गया है। मंदिर के उत्तरी द्वार से कुछ ही दूरी पर उर्स का आयोजन चल रहा है। वहीं से कुछ मुस्लिमों ने मंदिर में एंट्री लेने की कोशिश की। इस पत्र में लिखा है कि सदियों से ये परंपरा चली आ रही है कि मंदिर में सिर्फ हिन्दुओं को ही प्रवेश देने की अनुमति रही है, जिनकी हिन्दू धर्म में आस्था नहीं है उन्हें नहीं।

देवस्थान ट्रस्ट ने पुलिस से इस मामले में जाँच शुरू कर कार्रवाई करने के लिए कहा है। लिखा है कि इस घटना से सामाजिक तानेबाने को नुकसान पहुँच सकता है। आगे इस तरह की घटना न हो, इसके लिए व्यवस्था करने के लिए भी निवेदन किया गया है। ये मंदिर नीलगिरि, ब्रह्मगिरि और कलागिरि की पहाड़ियों के बीच में स्थित है। मंदिर में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतिनिधित्व करते हुए 3 लिंग स्थापित हैं। मुग़ल बादशाह औरंगजेब द्वारा ध्वस्त किए जाने के बाद पेशवा बालाजी बाजीराव ने इसका पुनर्निर्माण करवाया था।

सुप्रीम कोर्ट ने जिस वकील को हाईकोर्ट का जज बनाने के लिए 4 बार की सिफारिश, कर्नाटक चुनाव में उसकी जमानत जब्त: JDS ने दिया था टिकट

सुप्रीम कोर्ट ने नागेंद्र नाइक नामक वकील को कर्नाटक हाई कोर्ट का जज बनाने के लिए केंद्र सरकार से 4 बार सिफारिश की थी। हालाँकि केंद्र ने हर बार शीर्ष अदालत को पुनर्विचार करने के लिए कहा। जज बनने का सपना पूरा न होता देख नागेंद्र नाइक ने विधायक बनने का सपना देखा और यह भी अधूरा रह गया। दरअसल, नागेंद्र ने जेडीएस के टिकट पर कर्नाटक विधानसभा का चुनाव लड़ा। लेकिन, उनकी जमानत जब्त हो गई।

जनता दल (सेक्युलर) ने नागेंद्र नाइक को भटकल विधानसभा क्षेत्र से अपना प्रत्याशी बनाया था। लेकिन न तो वह पार्टी की उम्मीदों पर खरे उतरे और न ही मतदाताओं की नजर में आ सके। यही कारण है कि उन्हें 1% से भी कम वोट मिला और 1502 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे। नाइक को मिले वोट उनकी पार्टी के प्रदर्शन को समझने के लिए काफी है। वास्तव में कर्नाटक की 224 सीटों में से जेडीएस को महज 19 सीटें ही मिलीं।

कर्नाटक विधानसभा चुनाव परिणाम 2023 (फोटो साभार: ECI)

‘इंडियन एक्सप्रेस’ से बात करते हुए नागेंद्र नाइक ने कहा, ‘मेरा चुनाव प्रचार बहुत देर से शुरू हुआ और वैसे भी लोगों ने कॉन्ग्रेस को भारी वोट दिया। जनता भाजपा को बाहर रखना चाहती थी।”

सुप्रीम कोर्ट चाहता था हाई कोर्ट के जज बने नागेंद्र नाइक

भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम ने पहली बार 3 अक्टूबर, 2019 को नागेंद्र नाइक का नाम हाई कोर्ट के जज के लिए प्रस्तावित किया था। हालाँकि, केंद्र सरकार ने आपत्ति जताई और कॉलेजियम से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए कहा। इसके बाद 2 मार्च, 2021 को तत्कालीन सीजेआई एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम कमेटी ने एक बार फिर नागेंद्र नाइक का नाम हाई कोर्ट के जज के रूप में आगे बढ़ाया

यही नहीं, सितंबर 2021 में भी तत्कालीन सीजेआई एनवी रमन्ना की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम ने भी नागेंद्र नाइक को जज बनाने का प्रस्ताव केंद्र को भेजा था। इसके बाद जनवरी 2023 में एक बार फिर मौजूदा सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस केएम जोसेफ की सदस्यता वाले कॉलेजियम ने नागेंद्र नाइक के नाम की सिफारिश की।

आमतौर पर होता यह है कि यदि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम व्यवस्था के तहत किसी जज का दो बार नाम भेजता है तो केंद्र सरकार उसके नाम को स्वीकार कर लेता है। लेकिन नागेंद्र नाइक के मामले में ऐसा नहीं हुआ। केंद्र सरकार हर बार सुप्रीम कोर्ट को उसकी सिफारिश पर विचार करने के लिए कहती रही।

इस साल मार्च में एनडीटीवी ने सूत्रों के हवाले से कहा था कि नागेंद्र नाइक एक राजनीतिक दल के करीबी हैं और उनके खिलाफ आपराधिक शिकायतें हैं। इसलिए, केंद्र उन्हें हाई कोर्ट का जज बनाने के लिए तैयार नहीं है। कथित तौर पर, कॉलेजियम ने केंद्र सरकार के सख्त रुख पर आपत्ति जताई थी। साथ ही कहा था कि इस तरह की देरी व्यक्तिगत रूप से पेशेवर वकील और संस्थान दोनों को प्रभावित करती है।

जज बनने के दरवाजे हो गए बंद: नाइक

केंद्र सरकार पर आरोप लगाते हुए नागेंद्र नाइक ने दावा किया था कि उन्होंने जज बनने के लिए 4 साल का इंतजार किया है। लेकिन अब और इंतजार नहीं करना चाहते। उन्होंने कहा, “मैं हमेशा से ही सार्वजनिक सेवा करना चाहता था। एक बार जब मुझे एहसास हुआ कि अब मैं जज नहीं बन पाऊँगा। इसके बाद मैंने राजनीति में कदम रखने का फैसला किया। और एक महीने पहले चुनाव लड़ने का फैसला किया था।”

नागेंद्र नाइक से जब यह पूछा गया कि जेडीएस की टिकट पर कर्नाटक विधानसभा चुनाव लड़ने से पहले उन्होंने जज बनने के लिए अपनी सहमति वापस ली थी या नहीं। इस पर उन्होंने कहा है कि उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया। जब भी उनके जज बनने को लेकर चर्चा होती है तो उनके कानूनी करियर को झटका लगता है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से बात करते हुए उन्होंने स्वीकार किया है कि चुनावी राजनीति में उतरने के बाद उनके जज बनने के सभी दरवाजे अब बंद हो गए हैं।

‘सबसे ज्यादा यादवों को ही मरवाया, फिर भी मिला सपा का संरक्षण’: मुख़्तार अंसारी के इलाके के जिला पंचायत सदस्य ने याद किया माफिया का दौर

माफिया मुख़्तार अंसारी लगभग 4 दशक तक पूर्वांचल के अपराध जगत की धुरी रहा। उसके बारे में तमाम कही-सुनी बातों की जमीनी पड़ताल के लिए ऑपइंडिया की टीम अप्रैल के अंतिम व मई के पहले हफ्ते में पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में गई। इस दौरान हमें बताया गया कि मुख़्तार अंसारी को सबसे अधिक संरक्षण समाजवादी पार्टी की सरकार में मिला था। कुछ स्थानीय लोगों ने मुख़्तार को M+Y (मुस्लिम यादव) समीकरण के लिए मुलायम सिंह की पहली पसंद बताया।

हालाँकि, इस दौरान हमें यादव समाज के कई ऐसे लोग भी मिले जिन्होंने खुद को मुख़्तार से पीड़ित बताया। कुछ ने तो खुल कर हमसे कैमरे पर बात भी की जबकि कई डर से चुप रहे। मुख़्तार अंसारी के गुनाहों पर हमसे खुल कर बात करने वालों में मऊ जिले के भाजपा नेता प्रिंस यादव भी हैं। प्रिंस यादव वर्तमान समय में मऊ के वार्ड नंबर 22 बोझी क्षेत्र से जिला पंचायत सदस्य हैं।

मऊ दंगों में मुख़्तार ने कराया यादवों का कत्लेआम

भाजपा नेता प्रिंस यादव ने हमें बताया कि भले ही मुख़्तार को M+Y समीकरण के लिए किसी ने प्रयोग किया हो लेकिन मुख़्तार ने सबसे ज्यादा हत्याएँ यादवों की ही की। प्रिंस ने साल 2005 के मऊ दंगों की याद दिलाते हुए मुख़्तार अंसारी को उसका मुख्य गुनहगार बताया। प्रिंस यादव ने हमें बताया, “दंगे के दिन यादव बिरादरी के कई लोग दूध बेचने शहर गए थे, जो आज तक वापस नहीं लौटे। उन सभी को मार दिया गया। इसकी जाँच आज तक नहीं हुई। मैं चाहता हूँ कि इस घटना की जाँच हो।”

बकौल प्रिंस, मृतक के घर वालों में इतना डर है कि वो चाह कर भी मुख़्तार के खिलाफ मुँह नहीं खोल सकते।

पर्दा पड़ा है हमारे समाज के कुछ लोगों की आँख पर

प्रिंस यादव ने हमें आगे बताया कि उनके यादव समाज के कुछ लोगों की आँखों पर पर्दा पड़ा हुआ है। उन्होंने कहा, “मैं यादव समाज की बात कर लूँ तो जब मऊ दंगों की जाँच होगी तो हमारे समाज की आँखों से पर्दा हटेगा। यादव समाज का बड़ा तबका अखिलेश यादव को ही अपना नेता मानता है। अखिलेश यादव और मुख़्तार अंसारी की साठ-गाँठ शुरू से ही रही है। हमारे यादव समाज के कुछ लोग बस एक व्यक्ति या पार्टी के अंदर ही रहना चाहते हैं। हो न तो हिंदुत्व समझ पा रहे और न ही एकता। “

खुद मेरी जमीन कब्जाई है मुख़्तार ने

जिला पंचायत सदस्य प्रिंस यादव ने हमें बताया कि वो खुद मुख़्तार अंसारी द्वारा प्रताड़ित और पीड़ित हैं। प्रिंस के मुताबिक, मुख़्तार अंसारी ने समाजवादी पार्टी के शासन काल में उनकी कीमती जमीन जबरन कब्ज़ा कर ली थी जिसे योगी सरकार आने के बाद वो जैसे-तैसे छुड़ा पा रहे हैं। हालाँकि, प्रिंस का ये भी कहना है कि उनकी जमीन का एक बड़ा हिस्सा अभी भी मुख़्तार के गुर्गों के कब्ज़े में है जिसके लिए वो कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।

प्रिंस के अनुसार, मुख़्तार अंसारी अपनी कब्जाई जमीनों पर एक स्थानीय हिन्दू वकील के नाम पर बोर्ड लगा दिया करता था। बाद में कब्जाई जमीन का ही पीड़ित मालिक मजबूरी में मुख़्तार से आधे-आधे पर समझौता करता था।

हिन्दू को हिन्दू से लड़ा कर करता है राज

प्रिंस यादव का दावा है कि मुख़्तार अंसारी ने हिन्दुओं को ही हिन्दुओ से भिड़ा कर अपने अपराध के साम्राज्य को इतना बड़ा किया है। उन्होंने बताया कि मुख़्तार अंसारी की नजर सिर्फ सांसदी या विधायकी पर नहीं बल्कि कॉलेज के छात्र संघ चुनाव और गाँव के प्रधानी के चुनाव पर भी रहती है। बकौल प्रिंस यादव मुख़्तार, मऊ और गाजीपुर के हर चुनाव में अपना दखल और अपने गुलामों को जिताना चाहता है।

प्रिंस के अनुसार, “हर गाँव में मुख़्तार के गुर्गे सैलरी पर नियुक्त हैं। उन्हें 5 साल फ्री की सैलरी मिलती है। अंत में उन्हें गॉंव के सभी वोट दिलाने का टारगेट मिलता है भले ही वो साम, दाम, दंड, भेद कैसे भी हो। मुख़्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल को गुंडों का समूह बताते हुए प्रिंस ने राजनैतिक रूप से भी खुद को भी मुख़्तार अंसारी से पीड़ित बताया। उन्होंने कहा, “मुख़्तार अंसारी ने मेरे खिलाफ ही एक अन्य यादव को छात्र संघ चुनाव में इसलिए खड़ा कर दिया क्योंकि मैंने उसकी गुलामी कबूल नहीं की।”

छोटे-छोटे बच्चों पर भी रखता है नजर

जिला पंचायत सदस्य प्रिंस यादव के अनुसार, मुख़्तार अंसारी अपने इलाके में छोटे-छोटे बच्चों पर भी नजर रखता है। उन्होंने बताया कि मुख़्तार नहीं चाहता कि भविष्य में भी उसको चैलेन्ज देने वाला कोई उभर कर सामने आए, इसलिए उसने कई हत्याएँ ऐसे लोगों की भी करवा दीं जिन्होंने उसकी गुलामी नहीं कबूली। मुख़्तार की गुंडागर्दी वाले समय को फिल्मों जैसा बताते हुए प्रिंस ने बताया कि जिस भी ठेके, काम या जमीन पर वो हाथ रख देता था वो उसकी ही हो जाया करती थी।

उन्होंने बताया कि किसी भी तरह से पैसा कमाने की चाह रखने वाले व्यक्ति को मुख़्तार से मिल कर चलना मजबूरी बन जाती थी।

मीडिया में भी था मुख़्तार का खौफ

मुख़्तार अंसारी को ब्रिगेडियर के परिवार और बेहद सम्मानित कुल-खानदान वाला बताने वाली खबरों को प्रिंस यादव ने मीडिया में मुख़्तार का खौफ बताया। उन्होंने कहा कि मुख़्तार के गुर्गे ही उसके बारे में अच्छी-अच्छी बातें चौराहों पर किया करते थे और स्थानीय मीडिया की उन खबरों को छापना मजबूरी होती थी। प्रिंस का दावा है कि बिर्गेडियर उस्मान का मुख़्तार के परिवार से कोई वास्ता नहीं था।

कम काम को ज्यादा बता रहे अधिकारी

वर्तमान समय में जिले में तैनात अधिकारियों की कार्यशैली पर भी जिला पंचायत सदस्य प्रिंस यादव ने सवाल खड़े किए। उन्होंने बताया कि लखनऊ में बैठे शासन को खुश करने के लिए मुख़्तार के खिलाफ कम किए गए काम को भी बढ़ा-चढ़ा कर बताया जाता है। प्रिंस ने दावा किया कि मुख़्तार की जब्त जमीनों की कीमत जितना प्रशासन बताता है वो असल में उतने की होती नहीं है। जिला पंचायत सदस्य का कहना है कि ऐसी रिपोर्ट कहीं न कहीं मुख़्तार को फायदा पहुँचा रहीं हैं क्योंकि शासन में बैठे लोग ये सोचते हैं कि स्थानीय प्रशासन मुख़्तार पर कड़ी कार्रवाई कर रहा है जबकि ऐसा असल में है नहीं।

प्रिंस यादव ने दावा किया कि अगर सच में मुख़्तार अंसारी की जमीनों का आँकलन करवाया जाए तो अभी बहुत सारी कार्रवाई अधूरी मिलेगी। उन्होंने इस बाबत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक पत्र भी जल्द प्रेषित करने की बात कही।

भारत का सबसे गुप्त रहस्य… भगवान श्रीकृष्ण के बाद अब नेताजी बोस के रहस्यों को ढूँढने निकले ‘कार्तिकेय 2’ वाले हीरो, ‘कर्तव्य पथ’ पर प्रतिमा के सामने लॉन्च हुआ SPY का टीजर

आपको फिल्म ‘कार्तिकेय 2’ याद होगी, जिसमें निखिल सिद्धार्थ मुख्य अभिनेता थे। मूल रूप से तेलुगु में बनी इस फिल्म ने दुनिया भर में 118 करोड़ रुपए का कारोबार किया था। फिल्म में भगवान श्रीकृष्ण और उनसे जुड़े रहस्यों के बारे में दिखाया गया था। वहीं आप निखिल सिद्धार्थ अपनी अगली पैन-इंडिया फिल्म लेकर आ रहे हैं। SPY नाम की इस फिल्म को नेताजी सुभाष चंद्र बोस के इर्दगिर्द बना गया है। इसका टीजर सोमवार (15 मई, 2023) को जारी किया गया।

SPY का टीजर जारी करने के लिए जिस लोकेशन को चुना गया, वो भी खास है। ‘कार्तिकेय 2’ के लिए पूरी फिल्म की टीम द्वारका गई थी, जबकि SPY फिल्म की टीम ने इसके लिए दिल्ली को चुना। दिल्ली के इंडिया गेट पर स्थित नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा के पास फिल्म की टीम ने मीडिया के सामने SPY का टीजर जारी किया। इस जगह पर पहली बार किसी फिल्म का टीजर जारी हुआ है। इस दौरान निर्देशक गैरी और अभिनेता निखिल सिद्धार्थ के अलावा अभिनेत्री एश्वर्या मेनन भी मौजूद रहीं।

‘कर्तव्य पथ’ पर SPY के टीजर को हिंदी और तेलुगु समेत अन्य भाषाओं में भी रिलीज किया गया। टीजर रिलीज से पहले बॉलीवुड और साउथ के कई बड़े अभिनेताओं को एक वीडियो के जरिए ट्रिब्यूट भी दिया गया, जिन्होंने समय-समय पर जासूस का किरदार अदा किया था। टीजर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस को ‘India’s Best Kept Secret’ बताया गया है। उनके द्वारा ‘आज़ाद हिंद फ़ौज’ के गठन का जिक्र करते हुए उन्हें दूरद्रष्टा बताया गया है।

फिल्म में निखिल सिद्धार्थ को देश-विदेश में एक्शन करते हुए देखा जा सकता है। साथ ही विमान दुर्घटना में सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु को ‘कवर-अप स्टोरी’ भी कहा गया है। टीजर से साफ़ है कि फिल्म में कई रहस्यों से पर्दा उठाने की कोशिश करते हुए उसके इर्दगिर्द कहानी बुनने की कोशिश की गई है। ‘बहुत सी बात है जो तुम नहीं जानते जय’ – एक किरदार ये डायलॉग बोलता हुआ भी दिखता है। बैकग्राउंड में ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा’ गाना भी बजता रहता है।

फिल्म के लोगो में नेताजी बोस के जन्म का साल तो लिखा है, लेकिन निधन के जगह को ब्लैंक रखा गया है। फिल्म 29 जून, 2023 को सिनेमघरों में रिलीज होगी और कार्तिक आर्यन-कियारा आडवाणी की ‘सत्यप्रेम की कथा’ से टकराएगी। ये फिल्म तेलुगू और हिंदी के अलावा मलयालम, कन्नड़ और तमिल में भी रिलीज होगी। फिल्म को ‘नेशनल थ्रिलर’ के रूप में भी पेश किया जा रहा है। ‘स्पाई’ साथ-साथ एक एडवेंचर फिल्म भी होगी।

‘भगवान की फोटो हटा दो, यीशु के दर्शन होंगे’: ब्यूटी पार्लर की आड़ में ईसाई धर्मांतरण का ‘धंधा’, पादरी समेत 3 गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश की गाजियाबाद पुलिस ने धर्मांतरण के लिए बरगलाने के आरोप में ईसाई पादरी और उसकी पत्नी समेत 2 लोगों को गिरफ्तार किया है। स्थानीय भाजपा महिला नेता सुनीता अरोड़ा ने इस मामले में पुलिस को शिकायत दी थी। सुनीता का आरोप है कि पहले तो ब्यूटी पार्लर बुलाकर उन्हें धर्मांतरण के लिए बरगलाया गया। इसके बाद उनके गले से भगवान श्रीकृष्ण का लॉकेट उतरवा दिया गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मामला गाजियाबाद के खोड़ा थाना क्षेत्र इलाके का है। यहाँ रहने वाली भाजपा महिला मोर्चा की पूर्व अध्यक्ष सुनीता अरोड़ा का आरोप है कि उनके घर के पास बबीता नामक महिला ब्यूटी पार्लर चलाती है। शुक्रवार (12 मई, 2023) को बबीता ने उन्हें किसी काम से ब्यूटी पार्लर बुलाया। यहाँ बबीता ने उनकी मुलाकात इब्राहिम थॉमस, और उसकी पत्नी रीवा से कराई

सुनीता अरोड़ा ने आरोप लगाया है कि जब वह ब्यूटी पार्लर पहुँची तब वहाँ मौजूद करीब आधा दर्जन लोग हाथों में किताब लेकर प्रार्थना कर रहे थे। पादरी इब्राहिम थॉमस वहाँ लोगों को प्रार्थना करा रहा था और लोग ‘आमीन-आमीन’ बोल रहे थे। इस पूरे मामले का वीडियो भी सामने आया है। वीडियो में पादरी की हरकतों और वहाँ मौजूद लोगों को ‘आमीन’ बोलते सुना जा सकता है।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि ईसाई पादरी इब्राहिम ने उन्हें उनके गले से श्रीकृष्ण का लॉकेट उतारने के लिए कहा। यही नहीं, वह सुनीता से उनके घर में रखे देवी-देवताओं के चित्र भी हटाने के लिए कह रहा था। इब्राहिम ने उनसे कहा था कि यह सब करने के बाद ही उन्हें यीशु के दर्शन होंगे।

इन सब बातों के बीच सुनीता पूरा माजरा समझ गईं। उन्होंने फोन कर अपने साथियों को मौके पर बुलाया। इसके बाद वे लोग तीनों आरोपितों को पकड़कर स्थानीय खोड़ा थाना ले गए। यहाँ पुलिस ने तीनों आरोपितों के खिलाफ उत्तर प्रदेश धर्म परिवर्तन निषेध अधिनियम 2021 के तहत मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। मुख्य आरोपित इब्राहिम थॉमस मूल रूप से केरल का रहने वाला है। वह दिल्ली के एक चर्च में पादरी है।

‘मुस्लिम युवक के प्यार में हिन्दू लड़की’: राजस्थान चुनाव से पहले ‘लव जिहाद’ को नकारती ज़ोया अख्तर की ‘दहाड़’, सीरियल किलर की राजपूत जाति पर जोर

सोनाक्षी सिन्हा और विजय वर्मा की एक वेब सीरीज आई है ‘दहाड़’, जिसकी निर्देशक रीमा कागती हैं। उनके साथ-साथ ज़ोया अख्तर इस सीरीज की क्रिएटर, प्रोड्यूसर और स्क्रीनप्ले राइटर हैं। जहाँ ज़ोया अख्तर को ‘ज़िन्दगी ना मिलेगी दोबारा (2011)’ और ‘गली बॉय (2019)’ जैसी फिल्मों के लिए जाना जाता है, रीमा कागती ‘तलाश (2012)’ और ‘गोल्ड (2018)’ जैसी बड़ी फिल्मों का निर्देशक कर चुकी हैं। लेकिन, चूँकि ये बॉलीवुड वेब सीरीज है तो इसमें प्रोपेगंडा न हो ऐसा हो ही नहीं सकता है।

‘दहाड़’ जब शुरू होती है, तो आपको पहले 5-10 मिनट में ही दिख जाता है कि इसे बनाने वाले लोगों की मंशा क्या हो सकती है। सोनाक्षी सिन्हा बाकी साथियों की तरह अपने कोच के पाँव नहीं छूती, क्योंकि वो कहती हैं कि उनके ‘बाप’ ने ऐसा करने से मना किया है। उन्हें एक दलित पुलिस अधिकारी के किरदार में दिखाया गया है, जिसे हर जगह जातीय भेदभाव का सामना करना पड़ता है। कहानी राजस्थान में सेट की गई है। एक दलित SI, जो बिना हेलमेट बुलेट बाइक दौड़ाती फिरती है।

वैसे भी आजकल चलन है कि ‘थारे-म्हारे’ बोल कर किरदारों को राजस्थान दिखा दिया जाता है, भले ही बाकी के डायलॉग वो बंबइया या फिर पंजाबी एक्सेंट में ही क्यों न बोलें। जैसा कि फिल्म निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने हाल ही में अपने एक विश्लेषण में पाया है, पुलिस किरदार के लिए भार मेकअप कर के टाइट फिटिंग कपड़े पहना दिए जाते हैं, हो गया। ‘दहाड़’ भी कुछ ऐसी ही है। सोनाक्षी सिन्हा की एक्टिंग इसमें एकदम बोरिंग और चिड़चिड़ा टाइप की है।

इस वेब सीरीज में दिखाया गया है कि एक ‘ठाकुरों की लड़की’ एक मुस्लिम लड़के के साथ भाग जाती है और हिन्दू संगठन पुलिस के कामकाज में बाधा डालते हैं। हिन्दू कार्यकर्ताओं को उपद्रव करने वाला दिखाया गया है। साथ ही एक व्यक्ति झूठ बोल देता है कि उसकी बेटी मुस्लिम लड़के के साथ भागी है, ताकि पुलिस उसके मामले में गंभीरता से कार्रवाई करे। वेब सीरीज के अंत में दिखाया गया है कि एक बड़े ठाकुर खानदान की लड़की स्वेच्छा से एक मुस्लिम युवक के साथ भागती है।

आजकल जब ‘The Kerala Story’ जैसी फिल्मों के माध्यम से ये दिखाया जा रहा है कि कैसे हिन्दू लड़कियों को ‘लव जिहाद’ में फँसा कर उनका इस्लामी धर्मांतरण कर के मानव तस्करी के माध्यम से ISIS के पास सेक्स-स्लेव बनने भेज दिया जाता है, ‘दहाड़’ जैसी वेब सीरीज वास्तविकता को नकारने के लिए वामपंथियों के नैरेटिव को आगे बढ़ाने की कोशिश करती है। इसमें ये बताने की कोशिश की गई है कि ‘लव जिहाद’ कुछ होता ही नहीं है, मुस्लिम लड़कों के प्यार में हिंदू लड़कियाँ स्वेच्छा से पड़ती हैं।

सबसे बड़ा प्रोपेगंडा है कि हिन्दू कार्यकर्ताओ और हिन्दू संगठनों को उपद्रवियों के रूप में चित्रित करना। कर्नाटक में कॉन्ग्रेस ने चुनाव प्रचार के दौरान ‘बजरंग दल’ की तुलना प्रतिबंधित आतंकी संगठन PFI से करते हुए इसे बैन करने का वादा किया था। इसमें दिखाया गया है कि एक हिन्दूवादी विधायक और उसके कार्यकर्ता जहाँ-तहाँ उपद्रव करते हैं, हिंसा करते हैं, मुस्लिमों के विरुद्ध हिंसा करते हैं और पुलिस को काम करने में बाधा पहुँचाते हैं।

वेब सीरीज में में विजय वर्मा मुख्य विलेन के किरदार में हैं। ये आदमी दर्जनों लड़कियों को फँसा कर उनके साथ बलात्कार करता है और उनकी हत्या कर देता है। जानबूझ कर बार-बार एक सीरियल किलर के परिवार की जाति को हाइलाइट किया गया है। विलेन का पिता एक महिला पुलिस अधिकारी को घर में घुसने से रोकता है, क्योंकि वो उसे ‘नीची जाति का’ समझता है। फिर वो संविधान के डायलॉग मारती हुई उसके घर में घुस जाती है रेड मारने के लिए।

क्या आपने वास्तविक ज़िन्दगी में कहीं ऐसे होते हुए देखा है? फिल्म का जो सबसे अच्छा किरदार दिखाया गया है, वो एक मुस्लिम होता है। सोनाक्षी सिन्हा किसी भी समस्या के समाधान और मार्गदर्शन के लिए उसके पास ही जाती हैं, उसने उन्हें पढ़ाया होता है। इस तरह जहाँ मुख्य विलेन को ठाकुर दिखाया गया है, उसे पकड़वाने में मदद करने वाला मुस्लिम और उसे पकड़ने वाली दलित होती है। इसमें कुछ भी बुरा नहीं है, बशर्ते जातियों पर विशेष जोर दिया जाए। इसमें यही किया गया है।

एक और बड़ी बात, जो आजकल सारे सिनेमा वाले साबित करने में लगे रहते हैं। पढ़े-लिखे युवा या अपने जीवन में सफल युवा पूजा-पाठ या हिन्दू धर्म में विश्वास नहीं रखते – ये वो नैरेटिव है जिसे आगे बढ़ाने की भरपूर कोशिश की जाती है। कोई बड़ी नौकरी कर रहा है या फिर मॉडर्न है, तो इसका अर्थ है कि वो हिन्दू धर्म की परंपराओं और रीति-रिवाजों को नीचा दिखाएगा ही। वेब सीरीज में सोनक्षी सिन्हा भी ऐसा ही करती हैं और माँ द्वारा पूजा पर बैठने के लिए कहे जाने पर अपमानजनक तरीके से आगे बढ़ जाती हैं।

हमें इस मिथक को तोड़ने की ज़रूरत है। हाल ही में NASA की महिला भारतीय कर्मचारी की एक तस्वीर सामने आई थी, जिसमें उनकी दशक पर देवी-देवताओं की तस्वीरें रखी हुई थीं। दुनिया के सबसे बड़े गणितज्ञों में से एक श्रीनिवास रामानुजन माँ लक्ष्मी के बड़े भक्त थे। मिसाइल मैन APJ अब्दुल कलाम को हमने संतों के चरणों में बैठे हुए देखा है। फिर आखिर ये दिखाने की बार-बार कोशिश क्यों की जाती है कि जो हिन्दू धर्म से जितना दूर होगा, उतना ही सफल होगा और मॉडर्न कहेगा?

अब इसे ज़रा पलट कर देखिए। क्या किसी मुस्लिम युवती को नमाज या कुरान का अपमान करते हुए कभी भी दिखाया जाता है? ऐसा बिलकुल नहीं होगा। उन्हें बुर्का या हिजाब का विरोध करते हुए बॉलीवुड नहीं दिखा सकता, इस्लाम तो दूर की बात है। फिर हिन्दू धर्म के लिए ही ऐसा क्यों प्रदर्शित किया जाता है? कभी किसी ईसाई युवक को बाइबिल का विरोध करते हुए दिखाया गया? ये चीजें ईशनिंदा में आ जाएँगी, लेकिन हिन्दुओं के लिए सब चलता है।

इस वेब सीरीज में लड़के-लड़की के बीच शादी के बिना अस्थायी रिश्तों पर जोर दिया गया है, मतलब दोनों में से किसी एक ने जगह बदल दिया तो सब खत्म। साथ ही शादी के लिए लड़का-लड़की के परिवारों के मिलने वाले रिवाज का बार-बार मजाक बनाया गया है। एक तरह से ये दिखाने की कोशिश की गई है कि सफल लड़कियों को शादी नहीं करनी चाहिए, सिर्फ ‘Casual Relationships’ में रहना चाहिए। सीरीज ‘जय भीम-जय मीम’ क्र प्रोपेगंडा को आगे बढ़ाती हुई दिखती है।

कुल मिला कर बात ये है कि वास्तविक तथ्यों और खबरों के आधार पर अगर आप गायब लड़कियों की कहानी दिखाने के लिए ‘The Kerala Story’ बनाते हैं तो वामपंथी और इस्लामी कट्टरपंथी आपको गाली देंगे, लेकिन ‘दहाड़’ में एक हिन्दू सीरियल किलर को दर्जनों लड़कियों की रेप-हत्या करते हुए दिखाया जाएगा तो वाहवाही देंगे। एक रियल लाइफ पर आधारित है, एक फिक्शन है। फिक्शन में जम कर प्रोपेगंडा है, हिन्दू विरोधी और जातिवादी। ये भी याद रखने की ज़रूरत है कि राजस्थान में इस साल चुनाव भी होने हैं।

ओवैसी के कॉलेज के ‘आतंकी प्रोफेसर’ की फंडिंग-कनेक्शन की होगी जाँच, MP सरकार ने दिया आदेश: पहले सौरभ से सलीम बना, फिर फैलाने लगा मजहबी जहर

मध्य प्रदेश एटीएस ने आतंकी इस्लामी संगठन हिज्ब-उत-तहरीर (HUT) के जिन 16 सदस्यों को पकड़ा है, उनमें से एक मोहम्मद सलीम एआईएमआईएम चीफ व हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी के कॉलेज में पढ़ाता था। जाँच में यह बात सामने आने के बाद बीजेपी लगातार औवेसी पर हमला कर रही है। उन पर हैदराबाद में आतंकवादियों को पनाह देने का आरोप लगाया जा रहा है। इस क्रम में मध्य प्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा की प्रतिक्रिया भी सामने आई है।

उन्होंने सोमवार (15 मई, 2023) को कहा, “इन जिहादी कॉकरोचों के लिए हमारे मध्य प्रदेश की एटीएस पुलिस पेस्टिसाइड्स की तरह है। पुलिस लगातार ऐसे संगठनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर रही है। ब्रेनवॉश करने वाले सभी पढ़े लिखे लोग हैं। इनमें से एक हैदराबाद का प्रोफेसर है। एक इंजीनियर है। ये सभी लोग जो कार्य कर रहे हैं, वह निंदनीय है। मैं उन लोगों के बारे में कहना चाहता हूँ, जो केरल स्टोरी पर बोले, लेकिन HUT पर एक शब्द भी नहीं कहा। हमने पीएफआई को पकड़ा, सिमी का नेटवर्क ध्वस्त किया, लेकिन ये लोग एक शब्द भी नहीं बोले। ये तुष्टिकरण की राजनीति इन लोगों को बढ़ावा देती है। पहले लड़कों का धर्म परिवर्तन फिर उनके द्वारा लड़कियों का धर्मांतरण, ऐसे लोगों का कनेक्शन किससे जुड़ा है।”

उन्होंने इशारों-इशारों में इसका जिम्मेदार औवेसी को भी ठहराया। नरोत्तम मिश्रा ने कहा, “इनमें से एक प्रोफेसर औवेसी के हैदराबाद वाले कॉलेज में ही पढ़ाता था। ये गंभीर विषय है। सार्वजनिक जीवन में जीने वाले लोग भी अगर इस तरह के काम को हतोत्साहित नहीं करेंगे तो दिक्कत होगी। इनको कहाँ से फंडिंग होती थी। इनके किस-किस से कनेक्शन हैं, इसके जाँच के आदेश दिए गए हैं। ये मामला ‘लव जिहाद’ से भी ऊपर जा रहा है इसलिए हमने कड़ी जाँच के आदेश दिए हैं।”

इससे पहले तेलंगाना बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बंदी संजय कुमार ने औवेसी को आड़े हाथों लेते हुए कहा था कि वह हैदराबाद में आतंकवादियों को पनाह दे रहे हैं। उन्होंने कहा था कि हैदराबाद हिज्ब-उत-तहरीर (HUT) जैसे आतंकवादी संगठनों के लिए एक सुरक्षित जगह बन गया है। संजय ने मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव से माँग की थी कि वह इस मामले की जाँच करवाएँ। भाजपा नेता ने साथ ही यह भी आरोप लगाया था कि बीआरएस और कॉन्ग्रेस दोनों को हैदराबाद के लोगों की सुरक्षा की चिंता नहीं है। वे केवल अल्पसंख्यकों के वोट से सत्ता में आना चाहते हैं।

बता दें कि सलीम पहले सौरभ हुआ करता था। उसका पूरा नाम सौरभ राजवैद्य था। वह भोपाल के बैरसिया के पास का रहने वाला है। साल 2010 में उसने पहले खुद इस्लाम कबूला और 2012 में अपनी बीवी को इस्लाम कबूल करवाया। इसके बाद दोनों हैदराबाद शिफ्ट हो गए। चूँकि सलीम मध्य प्रदेश से था, इसलिए उसे पूरे एमपी में हिज्ब-उत-तहरीर संगठन का एजेंडा फैलाने की जिम्मेदारी सौंपी गई और ट्रेनिंग के लिए विदेश भेजा गया।

हैरानी की बात यह है कि सौरभ राजवैद्य से सलीम बनने के बाद उसे हैदराबाद में डेक्कन कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज के बायोटेक्निकल डिपार्टमेंट में प्रोफेसर की नौकरी मिल गई और यहाँ वह कॉलेज में पढ़ाने के नाम पर मजहबी जहर फैलाने लगा।

‘ये पवित्र गाथा नहीं, विवादित फिल्म है’: द केरल स्टोरी पर जम्मू मेडिकल कॉलेज में हंगामा, क्लासें खाली-प्रदर्शन शुरू

‘द केरल स्टोरी’ फिल्म को लेकर जम्मू शहर के एक हॉस्टल छात्रों के 2 गुटों में मारपीट की खबर है। झगड़े की शुरुआत कॉलेज के आधिकारिक ग्रुप में फिल्म का लिंक भेजने से हुई। इस मारपीट में मेडिकल का एक छात्र घायल हुआ है। छात्रों के गुट ने हमलावर समूह पर कार्रवाई की माँग की है। झगड़े के बाद कॉलेज में नारेबाजी हुई है। घटना रविवार (14 मई 2023) की है। पुलिस मामले की जाँच कर रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मामला जम्मू के सरकारी मेडिकल कॉलेज (JMC) का है। यहाँ रविवार (13 मई 2023) की रात कॉलेज के आधिकारिक ग्रुप में फर्स्ट ईयर के एक छात्र ने द केरल स्टोरी फिल्म का लिंक शेयर कर दिया। इस बात पर ग्रुप में मौजूद एक अन्य छात्र ने आपत्ति दर्ज करवाई। छात्र ने कहा कि ग्रुप पढ़ने के लिए बना है न कि ऐसे कामों के लिए। आरोप है कि इस मामले के बाद कुछ छात्रों ने हॉस्टल के अंदर ही आपत्ति जताने वाले छात्र की पिटाई कर दी।

इस मारपीट के बाद दूसरी तरफ से भी लोग जमा होने लगे। पिटाई करने वाले छात्रों पर कार्रवाई की माँग करते हुए नारेबाजी शुरू कर दी। कुछ छात्र इस घटना को तूल देते हुए अस्पताल के बाहर जमा हो गए। इस समूह ने आरोपितों पर कार्रवाई न होने की दशा में कक्षाओं के बहिष्कार का भी ऐलान किया। प्रदर्शन करने वालों में एक छात्र ने केरल स्टोरी पर सवाल खड़े किए। छात्र ने कहा कि केरल स्टोरी एक विवादित फिल्म है न कि कोई पवित्र गाथा। छात्रों ने CCTV में दिख रहे छात्रों को चिन्हित कर के कार्रवाई की माँग की।

जीएमसी प्रधानाचार्य शशि सुधन शर्मा ने मामले को शाँत करने की कोशिश की। उन्होंने प्रदर्शन कर रहे छात्रों से मुलाकात कर के दोषियों पर कार्रवाई का भरोसा दिया। वहीं इस मामले पर जम्मू के SSP चंदन कोहली ने बताया कि GMC में हाथापाई की घटना की सूचना पर मामले की जाँच करवाई जा रही है।