Home Blog Page 1819

जिस शफी बेल्लारे पर BJYM नेता प्रवीण नेट्टारू की हत्या का आरोप, उसने भी लड़ा कर्नाटक में चुनाव: पुत्तूर में भारी मतों से हारा SDPI नेता

देश में प्रतिबंधित इस्लामी कट्टरपंथी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (PFI) की राजनीतिक शाखा सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया (SDPI) ने शफी बेल्लारे को भी मैदान में उतारा है। शफी बेल्लारे भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के नेता प्रवीण नेट्टारू की हत्या के आरोपियों में से एक है।

SDPI ने शफी बेल्लारे को कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले के पुत्तूर विधानसभा सीट से मैदान में उतारा है। निर्वाचन आयोग के अनुसार, अभी तक सामने आए रुझान में शफी बेल्लारे को लगभग 1770 मत लिए हैं और वह चौथे स्थान पर है। इस सीट पर उसका वोट शेयर लगभग 1.65 प्रतिशत है।

शफी बेल्लारे को विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाए जाने की घोषणा SDPI के कर्नाटक प्रदेश अध्यक्ष अब्दुल मजीद ने इस साल फरवरी में की थी। उस दौरान टाइम्स नाउ पर एक डिबेट के दौरान SDPI प्रवक्ता ने कहा था कि उनकी पार्टी का मानना है कि शफी बेल्लारे बेगुनाह है और उसे राजनैतिक कारणों से फँसाया गया है।

उस डिबेट में भाजपा नेता एस प्रकाश ने SDPI की इस घोषणा को घृणित बताया था। उन्होंने PFI और SDPI को आतंकी संगठन बताते हुए इन्हें जनता द्वारा कड़ा जवाब मिलने की बात कही थी। प्रकाश ने यह भी कहा था कि सिर्फ घोषणा करने से कोई विधायक नहीं बन जाता।

सामने आ रहे चुनावों परिणामों में भी भाजपा नेता एस प्रकाश की बात सही साबित होती दिख रही है। एक हत्यारेे को पुत्तूर की जनता ने नकार दिया है। अभी तक के आंकड़ों से पता चलता है कि उसके विधानसभा क्षेत्र में सिर्फ 1770 लोगों ने उसका समर्थन किया है।

शफी बेल्लारे उन हत्यारोपियों में से एक है, जिसने भाजपा नेता की हत्या की थी। 26 जुलाई 2022 को सुल्लिया तालुक में पड़ने वाले गाँव बेल्लारे में भाजपा नेता प्रवीण नेट्टारू को कुल्हाड़ी से काट डाला गया था। हमलावर बाइक पर सवार हो कर आए थे।

इस हत्याकांड की देश भर में आलोचना हुई थी। इसको देखते हुए जाँच कुछ ही समय बाद NIA को सौंप दी गई थी। इस मामले में NIA ने शफी बेल्लारे सहित 20 आरोपितों को गिरफ्तार किया था और उनके खिलाफ चार्जशीट भी दाखिल किया था। शफी बेल्लारे पर आरोप है कि उसने प्रवीण की मुखबिरी की थी और हत्यारों को उनके बारे में बताया था।

कर्नाटक में कॉन्ग्रेस को अपने विधायकों के बिकने का डर, बेंगलुरु लाने के लिए फ्लाइट-चॉपर-रिजॉर्ट का किया इंतजाम: रिपोर्ट्स

कर्नाटक में रुझानों में आगे निकलने के बाद अब कॉन्ग्रेस ने अपने जीतने वाले विधायकों को एक जगह इकट्ठा करना शुरू कर दिया है। पार्टी ने विधायकों की खरीद-फरोख्त के डर से अपने प्रत्याशियों को बेंगलुरु बुलाया है। वहीं कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को सारी स्थिति संभालने को कहा गया है।

टाइम्स नाऊ की खबर में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि कॉन्ग्रेस ने फ्लाइट और हेलीकॉप्टर भी बुक कर दिए हैं ताकि जीतने वाले विधायकों को बेंगलुरु पहुँचाया जा सके। रिपोर्ट के अनुसार, विधायकों के लिए कुछ खास व्यवस्थाएँ की गई हैं, उन्हें रखने के लिए रिजॉर्ट का इंतजाम किया गया है। ताकि कोई पार्टी उन्हें खरीद न सके या फिर उनके विधायक भी लालच में दूसरे पाले में न जा सकें।

बता दें कि कर्नाटक विधानसभा चुनावों के नतीजों की तस्वीर में लगातार कॉन्ग्रेस आगे चल रही है। लेकिन बावजूद इसके उन्हें अपने पार्टी के विधायकों पर भरोसा नहीं है। साल 2019 में चुनाव के बाद कॉन्ग्रेस और जेडीएस के 17 विधायकों ने अपनी पार्टियों से इस्तीफा देकर भाजपा को ज्वाइन किया था। इसके बाद कुमारस्वामी सरकार गिर गई थी और भाजपा ने अपनी सरकार राज्य में बनाई थी।

इस समय सामने आ रहे मतगणना के रुझानों में 224 विधानसभा सीट में कॉन्ग्रेस को 110 सीटों से ज्यादा मिलती दिख रही हैं। ऐसे में लगातार सवाल उठ रहा है कि स्थिति कहीं 2019 जैसी न हो। फिलहाल कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ता जश्न में डूबे हुए हैं। उन्होंने चुनाव से पहले आरोप लगाए थे कि ईवीएम साउथ अफ्रीका से आई है। अब उन्हें उसका भी ख्याल नहीं है। महासचिव प्रियंका गाँधी ने मंदिर जाकर पूजा अर्छना की है।

कर्नाटक चुनाव से पहले कॉन्ग्रेस ने रोया था EVM का रोना, मतगणना में बढ़त पाते ही पार्टी भूल गई अपने आरोप: महासचिव प्रियंका गाँधी सीधे मंदिर पहुँचीं

कर्नाटक विधानसभा चुनावों की मतगणना में बढ़त मिलने के बाद दिल्ली से लेकर बंगलुरु तक कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं में खुशी की लहर है। कहीं लड्डू बाँटे जा रहे हैं तो कहीं ढोल-नगाड़े के साथ नृत्य किया जा रहा है। बढ़त हासिल होते ही कॉन्ग्रेस अपने उन आरोपों पर चुप्पी साध ली है, जो उसने मतगणना से पहले लगाए थे।

उधर पार्टी की महासचिव प्रियंका गाँधी हिमाचल प्रदेश के पौराणिक जाखू मंदिर में जाकर भगवान हनुमान की पूजा-अर्चना की। इसके बाद वे अपने आवास पर वापस लौट गईं। बताते चलें कि कर्नाटक चुनाव में बजरंग बली का मद्दा भाजपा ने जमकर उठाया था।

दरअसल, कर्नाटक में चुनाव से दो दिन पहले 8 मई 2023 को कॉन्ग्रेस ने चुनाव आयोग को पत्र लिखा था। अपने पत्र में पार्टी में चिंता जाहिर की थी कि साउथ अफ्रीका में इस्तेमाल की गई ईवीएम का प्रयोग कर्नाटक चुनाव में होने वाला है। पार्टी ने यह आरोप लगाते हुए चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण माँगा था।

कॉन्ग्रेस के आरोपों का जवाब देते हुए चुनाव आयोग ने कहा था कि कि कर्नाटक चुनाव में इस्तेमाल होने वाली सारी ईवीएम नई हैं। ये बात कॉन्ग्रेस भी जानती है। आयोग ने कहा कि जब भी ईवीएम आती है तो उस पूरे प्रक्रिया का वीडियोग्राफी होती है और हर पॉलिटिकल पार्टी के लोगों को वहाँ चश्मदीद बनने के लिए बुलाया जाता है।

कॉन्ग्रेस को फटकार लगाते हुए ईसीआई ने कहा कि कॉन्ग्रेस बहुत अच्छे से जानती है कि ईवीएम कहाँ से आई हैं। कॉन्ग्रेस इतने समय से राष्ट्रीय पार्टी है और विभिन्न चुनावों में भाग लिया है। उससे तो उम्मीद की जाती है कि उसे निर्वाचन आयोग के प्रोटोकॉल्स के बारे में पता होगा।

आयोग ने बताया था कि न केवल प्रतिनिधियों को बुलाकर दिखाया जाता है कि ईवीएम आई कहाँ से, बल्कि उन्हें ईवीएम की यूनिक आई़डी की लिस्ट भी दी जाती है। इतना ही नहीं उसे असेंबल करने से पहले उसे रैंडम चेक किया जाता है। उसे चालू किए जाने के बाद फिर उसे पार्टी के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में चेक किया जाता है।

बताते चलें कि साल 2014 में केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद और भाजपा के बढ़ते कदम पर विपक्षी दल हमेशा ईवीएम का रोना रोते हैं। कभी वे ईवीएम हैक करने का आरोप लगाते हैं, तो कभी ईवीएम टैंपर करने का तो कभी ईवीएम में हेरफेर करने का।

इसी के तहत चुनाव से पहले ही कॉन्ग्रेस ने ईवीएम का रोना रोना शुरू कर दिया था। अगर कर्नाटक चुनाव में भाजपा को बढ़त मिली होती तो कॉन्ग्रेस इस मुद्दे को लेकर चिल्लाती रहती। हालाँकि, राज्य में कॉन्ग्रेस को बढ़त हासिल है और वह भी बहुमत के आँकड़े के पार तक। ऐसे में उसने ईवीएम के अपने आरोपों को भूला दिया।

‘पूरे देश में चल रही है द केरल स्टोरी, आपने क्यों रोकी स्क्रीनिंग?’: SC ने पूछा बंगाल और तमिलनाडु सरकार से सवाल, कहा- फिल्म अच्छी है या बुरी लोग तय करेंगे

लव जिहाद का पर्दाफाश करती फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ पर प्रतिबंध लगाने के मुद्दे पर पश्चिम बंगाल की ममता सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया है। उच्चतम न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार को भी नोटिस जारी कर के जवाब माँगा है जहाँ कानून-व्यवस्था के चलते सिनेमाघरों के मालिकों ने इस फिल्म को लगाने से मना कर दिया है। इस मामले की सुनवाई शुक्रवार (12 मई 2023) को हुई थी जिसमें अगली सुनवाई इसी माह की 17 तारीख को तय की गई है।

दरअसल पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में फिल्म की स्क्रीनिंग रोके जाने के बाद फिल्म निर्माताओं ने इसे कोर्ट में चुनौती देने का ऐलान किया था। इसी बावत यह याचिका दाखिल हुई है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस याचिका पर चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने सुनवाई की। फिल्म निर्माताओं की तरफ से एडवोकेट हरीश साल्वे ने पक्ष रखा जबकि पश्चिम बंगाल सरकार ने अपना वकील अभिषेक मनु सिंघवी को बनाया है। एडवोकेट हरीश साल्वे ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि द केरल स्टोरी को सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ फिल्म सर्टिफिकेशन द्वारा हरी झंडी मिली है लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार ने फिर भी इसे राज्य में बैन कर दिया।

हरीश साल्वे ने कोर्ट को यह भी बताया कि 2 राज्यों में फिल्म रुकने की वजह से हर गुजरते दिन के बाद फिल्म निर्माताओं को नुकसान उठाना पड़ रहा है। इस दलील पर मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने ममता सरकार के वकील से फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की वजह पूछी। उन्होंने सवाल किया कि जब यह फिल्म देश के बाकी हिस्सों में चल रही है तो इसे पश्चिम बंगाल में रोका क्यों गया ? उन्होंने यह भी कहा कि फिल्म अच्छी है या बुरी इसे लोगों को तय करने दिया जाए। वहीं जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने भी टिपण्णी करते हुए कहा कि यह फिल्म उन राज्यों में भी चल रही है जहाँ जनसंख्या का अनुपात समान है तो खास तौर पर इसे पश्चिम बंगाल में ही क्यों रोका गया ?

उच्चतम न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार से भी राज्य में फिल्म की स्क्रीनिंग न होने पर सवाल किया है। हालाँकि तमिलनाडु सरकार के वकील अमित आनंद तिवारी ने कहा कि राज्य में फिल्म पर बैन नहीं है। इस जवाब के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि क्या सिनेमा घरों में होने वाले हमलों की जवाबदेही राज्य सरकार की नहीं है ? बताते चलें कि तमिलनाडु के थिएटर मालिकों ने द केरल स्टोरी को माहौल बिगड़ने के डर से अभी तक नहीं चलाया है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने दोनों राज्यों को 17 मई 2023 (बुधवार) तक अपना जवाब कोर्ट में दाखिल करने का आदेश दिया है।

यूपी निकाय चुनावों में BJP निकली आगे, नगर निगम की 14 सीटों पर लीड: हार के डर से अखिलेश यादव बोले- चुनाव आयोग हर राउंड के बाद बताए आँकड़े

कर्नाटक में जहाँ भाजपा को झटका लगते हुए दिख रहा है, वहीं उत्तर प्रदेश के निकाय चुनावों में हासिल बढ़त ने उसे राहत दी है। राज्य के 17 नगर निगम, 199 नगरपालिका परिषद और 544 नगर पंचायत के अध्यक्ष पदों पर हुए चुनाव की मतगणना जारी है।

अब तक सामने आए शुरुआती रुझान में नगर निगम की सभी 14 सीटों पर भाजपा को बढ़त हासिल है। वहीं, नगरपालिका परिषद में 37 सीटों और नगर पंचायत के 54 सीटों पर भाजपा आगे है। दूसरी ओर, सपा और कॉनग्रेस बहुत पीछे हैं। इसके साथ ही राज्य की दो विधानसभा सीटों पर भी भाजपा की सहयोगी अपना दल ने बढ़त बना रखी है।

रामपुर जिले की स्वार विधानसभा के उपचुनाव में 6 उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। वहीं, मिर्जापुर जिले की छानबे सीट पर 14 उम्मीदवार मैदान में हैं। यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की अगुवाई वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने इस उपचुनाव से दूर है। वहीं, कॉन्ग्रेस ने सिर्फ छानबे सीट पर ही अपना उम्मीदवार उतारा है।

सामने आए शुरुआती रुझान में छानबे विधानसभा सीट के उपचुनाव में बीजेपी की सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) की प्रत्याशी रिंकी कोल ने समाजवादी पार्टी की कीर्ति कोल से बढ़त बना रखी है। छानबे सीट से अपना दल के विधायक राहुल कोल की पत्नी हैं रिंकी कोल और वह अपना दल से प्रत्याशी हैं।

वहीं, समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता आजम खान के बेटे अब्दुल्ला आजम खान की सदस्यता रद्द होने के चलते स्वार सीट खाली हुई है। अब्दुल्ला को एक मामले में सजा होने के बाद उनकी सदस्यता खत्म हुई थी। यहाँ पर भाजपा की सहयोगी दल अपना दल के उम्मीदवार शफ़ीक़ अहमद अंसारी सपा के प्रत्याशी से आगे हैं।

बताते चलें कि इस बार उत्तर प्रदेश का नगर निकाय चुनाव दो चरणों में संपन्न हुए थे। पहले चरण में 4 मई 2023 को मतदान हुआ था, जबकि दूसरे चरण के लिए 11 मई को वोटिंग हुई थी। इसके साथ ही यूपी की दो विधानसभा स्वार और छानबे सीट पर भी उपचुनाव हुए हैं, जिसके लिए 10 मई 2023 को वोटिंग हुई थी।

शुरुआती रुझानों को देखते हुए सपा ने दूसरों पर आरोप मढ़ने शुरू कर दिए। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पूरी तरह परिणाम आने से पहले ही चुनाव आयोग पर तंज कसना शुरू कर दिया है। अखिलेश यादव ने ट्विटर पर कहा, “आशा है चुनाव आयोग हर एक राउंड के बाद आँकड़े बताता जाएगा, जिससे जन विश्वास बना रहे।”

‘हम छोटी पार्टी…हमें अब तक किसी ने नहीं पूछा’: कर्नाटक में रिजल्ट से पहले JDS प्रमुख कुमारस्वामी के बदले सुर, पहले कहा था- जो शर्त मानेगा, उसे समर्थन देंगे

कर्नाटक विधानसभा चुनावों में हुए मतदान की गणना जारी है। वोटों की अंतिम गिनती से पहले ही जनता दल सेक्युलर (JDS) के प्रमुख एचडी कुमारस्वामी ने शनिवार (13 मई 2023) को गठबंधन को लेकर बड़ा बयान दिया है। कुमारस्वामी ने कहा कि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में सरकार बनाने को लेकर अभी तक किसी पार्टी ने उनसे संपर्क नहीं किया है।

कुमारस्वामी ने कहा, “अगले 2-3 घंटे में सब साफ हो जाएगा। एग्जिट पोल में दिख रहा है कि दो राष्ट्रीय पार्टियों का स्कोर बड़ा रहने वाला है। एग्जिल पोल में JDS को 30-32 सीटें दी गई हैं। मैं एक छोटी पार्टी हूँ और मेरी कोई माँग नहीं है। मैं उम्मीद कर रहा हूँ कि सिर्फ अच्छा विकास हो।” 

कुमारस्वामी भले आज कह रहे हों कि उनकी कोई माँग नहीं है, लेकिन कल तक वे कुछ और कह रहे थे। कुमारस्वामी कल तक कह रहे थे कि जो भी दल उनकी शर्त मानेगा, वे उसी को समर्थन देंगे। कुमारस्वामी ने कहा था कि उनकी शर्त है कि उन्हें राज्य का मुख्यमंत्री बनाया जाए।

बताते चलें कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव में मुख्य लड़ाई सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी कॉन्ग्रेस के बीच है। कुमारस्वामी की जेडीएस इन दोनों के बाद है। कुमारस्वामी को उम्मीद थी कि त्रिशंकु विधानसभा होने की स्थिति में वे किंगमेकर की भूमिका निभा सकते हैं। हालाँकि, गिनती के शुरू होते ही उन्होंने अपना स्टैंड बदल लिया।

उधर, कर्नाटक चुनाव के नतीजों से पहले कर्नाटक के सीएम बसवराज बोम्मई ने हनुमान मंदिर में पूजा-अर्चना की और दावा किया राज्य में भाजपा की सरकार बनी रहेगी। उन्होंने दावा किया कि भाजपा पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने जा रही है। वहीं, कॉन्ग्रेस को उम्मीद को है कि वह भाजपा की सरकार को उखाड़ फेंकेगी।

बता दें कि राज्य के कुल 224 सीटों के लिए 2,615 उम्मीदवार मैदान में हैं। सरकार बनाने के लिए बहुमत के तिलिस्मी आँकड़े 113 तक पहुँचना जरूरी है। किस पार्टी के हाथ में राज्य की बागडोर जाएगी, इसका फैसला आज शाम तक हो जाएगा। कर्नाटक चुनाव में प्रमुख पार्टियाँ भाजपा, कॉन्ग्रेस और जनता दल सेक्युलर (JDS) है।

अभी तक 38 साल में कोई भी सरकार लगातार दोबारा चुनकर नहीं आई है। हालाँकि, जिस तरह से उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में मिथक टूटे हैं, कुछ ऐसा ही इस बार कर्नाटक में होने की उम्मीद जताई जा रही है। वोटिंग खत्म होने के साथ ही एग्जिट पोल भी सामने आ गए हैं। इनमें से अधिकांश एग्जिट पोल में भाजपा और कॉन्ग्रेस के बीच काँटे की टक्कर बताई गई है।

मनीष कश्यप पर NSA को तमिलनाडु के राज्यपाल ने नहीं दी है मँजूरी, मीडिया में चल रही खबरों को राजभवन ने बताया असत्य

बिहार के यूट्यूबर पत्रकार मनीष कश्यप पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाने को तमिलनाडु के राज्यपाल रविंद्र नारायण रवि ने मँजूरी नहीं दी है। मीडिया और सोशल मीडिया में राज्यपाल की मुहर लगने के दावे किए जा रहे थे। तमिलनाडु राजभवन ने एक बयान जारी कर इन दावों को असत्य बताया है। साथ ही झूठ फैलाने वालों पर कार्रवाई की चेतावनी भी दी है।

बयान में कहा गया है कि सोशल मीडिया से यह संज्ञान में आया है कि राज्यपाल ने बिहार के किसी व्यक्ति के खिलाफ NSA लगाने की मँजूरी दी है। यह असत्य है। तमिलनाडु के राज्यपाल ने किसी भी व्यक्ति के खिलाफ एनएसए लगाने की इजाजत नहीं दी है। बयान में कहा गया है कि जनता से आग्रह है कि वे ऐसी अपुष्ट सुचनाओं को न फैलाएँ। झूठी और गुमराह करने वाली सूचना फैलाने वालों पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

दरअसल, मुख्यधारा की कई मीडिया संस्थानों ने भी यह खबर चलाई थी कि तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि की इजाजत मिलने के बाद अब मनीष कश्यप को कम से कम 11 महीने जेल में बिताने होंगे। गौरतलब है कि 5 अप्रैल को मनीष पर तमिलनाडु सरकार ने NSA लगाया था।

बता दें कि मनीष कश्यप पर तमिलनाडु में बिहार के श्रमिकों पर कथित हमले का फेक वीडियो बनाने और सोशल मीडिया पर झूठी खबरें फैलाने का आरोप है। 8 मई 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने मनीष कश्यप की याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए उन्हें हाई कोर्ट जाने को कहा था। कश्यप ने सुप्रीम कोर्ट से NSA हटाने और अपने खिलाफ दर्ज सारे एफआईआर एक साथ करने की अपील की थी।

दिल्ली की मीडिया के दावों जैसी नहीं कर्नाटक की हवा, क्या फिर पोल पंडितों का गणित निकलेगा कमजोर

रिकॉर्ड मतदान (73.19%)। जहरीला साँप से लेकर बजरंग बली की जय वाला चुनाव प्रचार। 10 एग्जिट पोल में से 4 में कॉन्ग्रेस को बहुमत। 1 में बीजेपी की सरकार। 4 में त्रिशंकु विधानसभा। 2018 के चुनाव में सबसे सटीक आकलन करने वाले का बीजेपी को बढ़त देना। सबके अपने-अपने जीत के दावे। किंगमेकर बनने की आस लिए बैठी एक पारिवारिक पार्टी (JDS)। जी, मैं बात कर रहा हूँ कर्नाटक विधानसभा चुनावों (Karnataka Assembly election, 2023) की।

13 मई 2023 की दोपहर होते-होते कर्नाटक की 224 सदस्यीय विधानसभा चुनाव की तस्वीर साफ हो जाएगी। लेकिन तमाम किंतु-परंतु के बीच कोई भी आँकड़ा अब तक उस दावे को पुख्ता नहीं कर रहा है जो कई महीने पहले से ही दिल्ली की मीडिया में तैर रही थी। यह दावा है कर्नाटक में जबर्दस्त सत्ता विरोधी लहर का। बीजेपी सरकार के कथित भ्रष्टाचार से आम लोगों में भारी नाराजगी का। प्रवीण नेट्टारू जैसों की इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा की गई हत्या के बाद से कोर वोटरों में निराशा होने का।

सत्ता विरोधी लहर का मतलब होता है विपक्ष को प्रचंड बहुमत मिलना। लेकिन एग्जिट पोल काॅन्ग्रेस के लिए ऐसा कोई अनुमान नहीं लगा रहे। एक्सिस माई इंडिया और इंडिया टुडे ने भले 10 मई की शाम को काॅन्ग्रेस को 140 सीटें मिलने तक का अनुमान लगाया था। लेकिन नतीजों से ठीक पहले इंडिया टुडे के न्यूज डायरेक्टर राहुल कंवल ने एक ट्वीट में कहा है कि 57 सीटें ऐसी हैं जो किसी भी तरफ झुक सकती हैं। इनमें 6 सीटें ऐसी हैं जिस पर बीजेपी की टक्कर काॅन्ग्रेस से न होकर जेडीएस से है। 4 सीटें तो ऐसी भी हैं जो निर्दलीय भी झटक सकते हैं। कंवल ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि 13 मई के अंतिम नतीजे इन्हीं 57 सीटों से तय होंगी। अमूमन जब सत्ता विरोधी लहर चल रही हो तो इतने बड़े पैमाने पर काँटे की टक्कर नहीं दिखती। विपक्ष को स्पष्ट तौर पर बढ़त दिखती है।

इस तथ्य को समझाने के लिए एक्सिस माई इंडिया और इंडिया टुडे के एग्जिट पोल का उदाहरण इसलिए दिया गया क्योंकि काॅन्ग्रेस के लिए सबसे बेहतर संभावना इसमें ही दिखाई गई है। दिल्ली की मीडिया में दूसरा बड़ा दावा कर्नाटक में करप्शन के सबसे बड़ा मुद्दा होने का किया जाता है। लेकिन प्रचार के दौरान कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि काॅन्ग्रेस चुनाव को इस मुद्दे के इर्द-गिर्द सीमित करने में सफल रही है। उलटे जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आता गया काॅन्ग्रेस बैकफुट पर जाती दिखी। पहले उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विषधर साँप कहने पर सफाई देनी पड़ी। फिर बजरंग दल की तुलना पीएफआई से कर वह ऐसे फँसी कि उसे हर जिले में बजरंग बली का मंदिर बनाने का वादा करना पड़ा। पिछले कई चुनावों के नतीजों पर यदि गौर करेंगे तो उससे यह भी पता चलता है कि भ्रष्टाचार के आरोपों और साॅफ्ट हिंदुत्व से बीजेपी को पराजित करने में काॅन्ग्रेस को कहीं भी सफलता नहीं मिली है।

तीसरा दावा दिल्ली की मीडिया में प्रवीण नेट्टारू जैसों की हत्या से बीजेपी के कोर वोटरों में निराशा को लेकर किया जाता है। लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान ही हमने नेट्टारू के परिजनों के लिए बने घर की तस्वीरें भी देखी हैं। हमने उनके परिजनों के वह बयान भी सुने हैं, जिनमें उन्होंने कहा है कि मुश्किल वक्त में बीजेपी ने उनका साथ कभी नहीं छोड़ा। कभी उनको अकेला महसूस नहीं होने दिया। ऐसे में यह समझ पाना मुश्किल है जिस नेतृत्व से पीड़ित परिवार ही निराश नहीं है, उनके साथ हुई घटना से कोर वोटरों के निराश होने की थ्योरी कहाँ से निकली होगी? या फिर किसी प्रोपेगेंडा के तहत दिल्ली की मीडिया में इसे प्लांट किया गया था?

जाहिर है कि बीजेपी रेस से बाहर नहीं है। न ही कर्नाटक में वह बेहद बुरा प्रदर्शन करने जा रही है। जब उसे इस राज्य में सबसे मजबूत स्थिति में माना गया था, तब भी वह साधारण बहुमत ही हासिल कर पाई थी। ऐसे में कर्नाटक से जुड़े कुछ तथ्यों पर गौर करना जरूरी हो जाता है। 1978 तक इस राज्य में हर विधानसभा चुनाव में काॅन्ग्रेस को जीत मिली। लेकिन, 1985 के बाद किसी भी चुनाव में सत्ताधारी दल को जीत नहीं मिली। पिछले नौ चुनावों के ट्रेंड यह भी बताते हैं कि बीजेपी यदि सत्ता में रही है तो उसका वोट प्रतिशत सुधरा है। इसके ठीक उलट काॅन्ग्रेस यदि सत्ता में रही है तो उसको औसतन चार फीसदी वोटों का नुकसान झेलना पड़ा है।

अगर इन तथ्यों को ही सच मान लें तो तीन बातें तय दिखती हैं। पहला, 38 साल का ट्रेंड बताता है कि बीजेपी सत्ता में वापसी लायक सीटें हासिल नहीं कर पाएगी। अधिकतर एग्जिट पोल इसका अनुमान लगा रहे हैं। दूसरा, काॅन्ग्रेस विपक्ष में है, इसलिए उसे वोटों का नुकसान नहीं होगा। तीसरा, बीजेपी सत्ता में है तो उसके वोट बढ़ेगे। क्या 2018 के चुनावों के मुकाबले मतदान में जो एक फीसद की वृद्धि हुई है, वह बीजेपी का बढ़ा वोट है? यदि ऐसा है तो यह किसी भी पोल में नहीं दिखा है और न ही किसी पोल पंडित ने ऐसा पाया है। कर्नाटक के पिछले कुछ चुनावों के तथ्य और ट्रेंड को इस बार भी अंतिम सत्य (बीजेपी की हार) मान लें तो भी यह कहीं से नहीं दिखता कि कोई सत्ता विरोधी लहर चल रही थी। करप्शन बड़ा मुद्दा था। कोर वोटर निराश थे।

ऐसा भी नहीं है कि जिस कर्नाटक को बीजेपी के लिए ‘दक्षिण का द्वार’ कहते हैं, उसकी कठिन डगर का एहसास पार्टी को नहीं था। जनवरी 2023 के मध्य में मुझे बीजेपी के दिल्ली मुख्यालय में इसका पहली बार एहसास हुआ। बंद कमरे में पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कुछ लोगों से बातचीत कर रहे थे। इस दौरान 2023 में होने वाले राज्यों के चुनाव पर बातचीत के दौरान उन्होंने माना कि कर्नाटक की सत्ता में वापसी आसान नहीं है।

संभवतः यही कारण है कि बीजेपी ने टिकट बँटवारे के दौरान सख्त फैसले लिए। बड़े पैमाने पर नए चेहरों को मौका दिया। पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार जैसे नेताओं की नाराजगी की चिंता नहीं की। कई हेविवेट के टिकट काट दिए। राज्य के अपने सबसे बड़े नेता बीएस येदियुरप्पा को मोर्चे पर लगाया। एक्सिस माई इंडिया और इंडिया टुडे का एग्जिट पोल भी कहता है कि येदियुरप्पा जिस लिंगायत समुदाय से आते हैं उसका 64 फीसदी वोट बीजेपी को गया है। यानी लिंगायत समुदाय से आने वाले जगदीश शेट्टार भले बीजेपी छोड़कर काॅन्ग्रेस में चले गए हैं, पर इस समुदाय का आम वोटर बीजेपी के ही साथ है।

यहाँ गौर करने वाली बात यह भी है कि कर्नाटक में बीजेपी के उभरने की सबसे बड़ी वजह लिंगायतों का समर्थन ही माना जाता है। हाल के समय में कर्नाटक में बीजेपी ने सबसे बुरा प्रदर्शन 2013 में तब किया जब येदियुरप्पा उससे अलग हो गए थे। जन की बात के फाउंडर प्रदीप भंडारी ने भी ऑपइंडिया से बातचीत में कहा कि लिंगायत के बीच बीजेपी का आधार पहले की तरह ही बना हुआ है। गौरतलब है कि 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनावों का सबसे सटीक आकलन जन की बात ने ही किया था। इस बार अपने एग्जिट पोल में उसने बीजेपी के सबसे बड़ी पार्टी होने का अनुमान लगाया है।

प्रदीप भंडारी ने इस चुनाव के दौरान भी करीब-करीब पूरे कर्नाटक की यात्रा की है। उन्होंने करीब 50 दिन इस राज्य में बिताए हैं। उनका कहना है, “बुरी से बुरी स्थिति में बीजेपी को 90 सीटें मिलनी चाहिए। यदि मैं क्लोज मार्जिन की सभी सीटों पर काॅन्ग्रेस की जीत मान लूँ तब भी वह बहुमत हासिल नहीं करने जा रही है। मेरा स्पष्ट मानना है कि नतीजों से त्रिशंकु विधानसभा की तस्वीर उभरेंगी।”

ऑपइंडिया से बातचीत में ऐसे ही नतीजों का दावा कर्नाटक में 20 दिन बिताकर लौटे यूट्यूबर पत्रकार अभिषेक तिवारी भी करते हैं। उन्होंने बताया, “मुझे कोई सत्ता विरोधी लहर नहीं दिखी। बीजेपी का वोट शेयर 36 फीसदी से कम होने की भी कोई संभावना नहीं दिखती। काॅन्ग्रेस को बहुमत के लिए अपना वोट शेयर 42 फीसदी तक ले जाना होगा, जिसकी संभावना कम दिखती है। ऐसे में मुझे लगता है कि सरकार किसकी बनेगी, यह जेडीएस और निर्दलीय तय करेंगे।”

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पोल पंडित 2020 के बिहार और 2018 के राजस्थान चुनावों की तरह ही कर्नाटक चुनाव की नब्ज पकड़ने में असफल रहे हैं? ध्यान रहे कि इन दोनों चुनावों में भी सत्ता विरोधी लहर चलने का शोर वैसा ही था, जैसा अभी कर्नाटक को लेकर है। लेकिन जब अंतिम नतीजे आए तो बिहार में सत्ताधारी गठबंधन ही आगे रहा। राजस्थान में काॅन्ग्रेस साधारण बहुमत ही हासिल कर पाई। प्रदीप भंडारी का भी मानना है कि सीटों का अनुमान लगाने में ज्यादातर लोग बिहार जैसी ही गलती कर रहे हैं।

वैसे यह रात पोल पंडितों के साथ काॅन्ग्रेस के लिए भी भारी है। आखिर उनके ‘युवराज’ ने भारत जोड़ो यात्रा के दौरान कर्नाटक में 27 दिन जो बिताए थे। इस राज्य के 7 जिलों से जो गुजरे थे।

जिस मुनव्वर फारूकी ने कॉमेडी के नाम पर बनाया हिन्दू देवी-देवताओं का मजाक, उसे IPL में स्टार स्पोर्ट्स ने दिया मंच: लोग बोले – ‘Jio Cinema’ पर ही देखेंगे

हिंदू देवी देवताओं को गाली देकर पैसे कमाने वाले कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी को स्टार स्पोर्ट्स पर आईपीएल मैच के दौरान शो होस्ट करने का मौका मिला। स्टार स्पोर्ट्स पर हिंदूफोबिक कॉमेडियन को देखकर सोशल मीडिया यूजर्स भड़क गए। माइक्रो ब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर यूजर्स ने नाराजगी का इजहार किया।

दरअसल, टाटा आईपीएल 2023 के लीग मैच खेले जा रहे हैं। शुक्रवार (12 मई) को गुजरात टाइटन्स और मुंबई इंडियन्स के बीच मुकाबला खेला गया। इस मैच के लिए होस्ट के रूप में स्टार स्पोर्ट्स पर अन्य क्रिकेटर और फिल्मी सितारों के साथ मुनव्वर फारूकी भी नजर आया। शो के दौरान मुनव्वर के अलावा अनिल कपूर, आदित्य रॉय कपूर, मोहम्मद कैफ और इरफान पठान भी मौजूद रहे।

स्टार स्पोर्ट्स पर उनकी मौजूदगी यूजर्स को पसंद नहीं आई एक यूजर ने शो का स्क्रीन शॉट शेयर करते हुए लिखा, वाह अब कम्युनल बाइगोट भी स्पोर्ट्स चैनल शो करने लगे।”

सिबा प्रसाद शुक्ला नाम के यूजर ने तो लिख दिया कि आज स्टार स्पोर्ट्स चैनल ने अपना एक कस्टमर खो दिया। स्टार स्पोर्ट्स हटा कर ‘जियो सिनेमा’ लगा दिया।

मनोरमा नाम की यूजर ने लिखा, “एंटी हिंदू होना लोगों को अमीर बना देता है।”

किरण कसाला नाम की यूजर ने नाराजगी जताते हुए लिखा कि इन लोगों के लिए पैसा महत्वपूर्ण है। पैसा मिले तो किसी के साथ स्टेज शेयर कर लेते हैं। चाहे उसने तुम्हारे धर्म का मजाक ही क्यों न उड़ाया हो।

हिमाँशु नाम के यूजर ने लिखा कि स्टार का नियंत्रण जरूर किसी वामपंथी हिंदू हेटर के हाथ में है। स्टार स्पोर्ट्स कन्नड़ पर भी किसी हिंदू विरोधी को शो पर बुलाया गया था।

मुनव्वर फारूकी स्टैंडअप कॉमेडियन है। जो अपनी कॉमेडी के दौरान हिंदू देवी देवताओं का मजाक उड़ाने के लिए कुख्यात है। उसकी माता सीता और भगवान राम पर आपत्तिजनक टिप्पणी वायरल हुई थी। जिसका देश भर में विरोध हुआ था। जनवरी 2021 में मध्य प्रदेश के इंदौर में 56 दुकान के पास मोनरो कैफे में आयोजित एक कार्यक्रम में हिंदू देवताओं और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बारे में बेहद अपमानजनक टिप्पणी करके विवादास्पद ‘स्टैंड-अप कॉमेडियन’ ने एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था।

कार्यक्रम समाप्त होने के बाद, हिंदू रक्षक संगठन के समर्थकों ने कथित तौर पर ‘कॉमेडियन’ के साथ मारपीट की थी और फिर उसे कार्यक्रम के आयोजकों के साथ तुकोगंज पुलिस स्टेशन ले गए थे। हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करने के कारण उसे एक महीना जेल में बिताना पड़ा था।

वेंकटेश को बना दिया अली, निहार बना अबू और शंकर को बना दिया अब्दुल्ला… महिलाओं की ही नहीं, पुरुषों की भी है ‘The Kerala Story’: ब्रेनवॉश कर ISIS में भर्ती

बॉक्स ऑफिस पर सुदीप्तो सेन की फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ ने धूम मचा रखी है। लोग फिल्म को खूब पसंद कर रहे हैं लेकिन इस्लामवादियों, हिंदू और भारत विरोधी ताकतों को फिल्म रास नहीं आ रही है। फिल्म का विरोध करने वाले उन तथ्यों पर आँख मूँद लेते हैं जो साबित करते हैं कि केरल लव जिहाद, धर्म परिवर्तन और आईएसआईएस में भर्ती कराने का केंद्र रहा है। कई लड़कियों को मुस्लिम युवकों ने सुनियोजित तरीके से बहला-फुसलाकर निकाह का झाँसा देकर इस्लाम कबूल कराया। बाद में उन्हें ISIS में शामिल होने या ‘ISIS ब्राइड्स’ बनने के लिए सीरिया भेज दिया।

हालाँकि, धर्म परिवर्तन और आईएसआईएस के लिए गुलाम तैयार करने का यह खेल केवल महिलाओं तक ही सीमित नहीं रहा। इस रैकेट ने हिंदू पुरुषों को भी इस्लाम में धर्मांतरित किया। धर्म परिवर्तन के बाद हिंदू पुरुषों को भी मुस्लिमों के साथ आतंकवादी गतिविधियों में शामिल कराया गया। ऐसी सैकड़ों रिपोर्ट्स उपलब्ध हैं जो बताती हैं कि केरल के परिवर्तित या मूल मुस्लिम आतंकवादी संगठनों या दहशतगर्दाना गतिविधियों से जुड़े हुए हैं।

इस रिपोर्ट में तीन ऐसे हिंदू नौजवानों की कहानी है जिन्होंने आईएसआईएस में शामिल होने से पहले इस्लाम कबूला था। एनआईए (NIA) के दस्तावेजों में दर्ज वे नाम हैं, ‘शंकर वेंकटेश पेरुमल उर्फ ​​अली मुआविया, शैबु निहार वीके उर्फ ​​अबू मरियम, और मदेश शंकर उर्फ ​​अब्दुल्ला।

शंकर वेंकटेश पेरुमल (​अली मुआविया)

आईएसआईएस मॉड्यूल केस की जाँच कर रही एनआईए की टीम ने मार्च 2021 में केरल के 8 ज्ञात और कई अज्ञात लोगों पर UAPA और IPC की विभिन्न धाराओं में केस दर्ज किया। जाँच के दौरान NIA को मोहम्मद अमीन उर्फ अबू याह्या के बारे में पता चला, जो राज्य में ‘इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (ISIS)’ की विचारधारा को फैलाने और युवाओं को कट्टर बनाने के लिए सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रहा था। उनका काम नए सदस्यों की भर्ती करना भी था। NIA ने जाँच के दौरान तीन लोगों मोहम्मद अमीन, रहीस रशीद और मुशब अनवर को गिरफ्तार किया।

गिरफ्तार लोगों की निशानदेही पर NIA की टीम ने 4 अगस्त 2021 को जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक और केरल के पाँच अलग-अलग स्थानों पर छापे मारे। रेड के दौरान NIA ने कश्मीर के श्रीनगर से ओबैद हामिद, बांदीपोरा से मुज़म्मिल हसन भट, मैंगलोर के उल्लाल से अम्मार अब्दुल रहमान और बैंगलोर से शंकर वेंकटेश पेरुमल (अली मुआविया) को गिरफ्तार किया।

शंकर वेंकटेश को अली मुआविया नाम इस्लाम अपनाने के बाद दिया गया। वह टेलीग्राम, हूप और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ISIS के कट्टर जिहादी विचार धारा को फैलाने वाले समूह का हिस्सा था। जहाँ लोगों का ब्रेनवॉश कर कट्टरपंथी बनाया जाता और उन्हें आतंकी संगठन में शामिल कराया जाता था। मोहम्मद अमीन के नेतृत्व में ही इन कट्टरपंथियों ने आईएसआईएस के प्रति वफादारी की कसम खाई थी। इतना ही नहीं उन्होंने केरल से लेकर कर्नाटक तक ऐसे लोगों की लिस्ट तैयार की थी जिनकी हत्या की जानी थी।

शैबु निहार वीके (अबू मरियम)

शैबु निहार वीके (अबू मरियम) को NIA ने 9 अप्रैल 2019 को केरल के कालीकट अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से गिरफ्तार कर लिया। वह कतर के दोहा से भारत लौटा था। गिरफ्तारी से पहले अबू मरियम बहरीन में एक विज्ञापन एजेंसी चला रहा था। यह गिरफ्तारी आईएसआईएस के वंदूर (Wandoor) मॉड्यूल मामले में की गई थी। मामले में 8 लोगों को यूएपीए के तहत आरोपित बनाया गया था। शुरुआत में केस केरल पुलिस के हाथ में थी जिसे 1 जून 2018 को NIA ने अपने हाथ में ले लिया था।

शैबु निहार वीके से अबू मरियम बने शख्स को 14 सितंबर 2022 को एर्नाकुलम की एनआईए अदालत ने दोषी ठहराया था। जाँच के दौरान पता चला था कि शैबू निहार वीके ने ISIS/Daesh के लिए काम कर रहा था। उसने संगठन के लिए फंडिंग की भी व्यवस्था की। इसके अलावा अबू मरियम ने अपने सहयोगियों को सीरिया पहुँचाने के लिए भी धन जुटाए थे।

मदेश शंकर (​​अब्दुल्ला)

मदेश शंकर, मोहम्मद अमीन (अबू याह्या) के ही साथियों में से एक था। जाँच के दौरान यह पता चला कि अमीन एक परिवर्तित मुस्लिम दीप्ति मारला के संपर्क में था। दीप्ति ने मैंगलोर के अनस अब्दुल रहमान से निकाह किया था। मारला अपनी पढ़ाई के लिए 2015 में दुबई गई थी। दुबई में उसकी मुलाकात मिज़ा सिद्दीकी से हुई। जिसके बाद दोनों ने ISIS में शामिल होने की ठानी। इसके लिए साल 2019 में दोनों खुरसान तक गईं लेकिन कामयाब नहीं हो सकीं।

भारत लौटने के बाद भी मारला की आईएसआईएस-नियंत्रित इलाके में जाने की ख्वाहिश खत्म नहीं हुई थी। उसने ओबैद हामिद मट्टा, मदेश शंकर और अन्य के साथ मिलकर अमीन से संपर्क किया। जनवरी 2020 में वह ओबैद से मिलने श्रीनगर पहुँची जहाँ वह एक हफ्ते तक ठहरी थी।

NIA के अनुसार मदेश शंकर और उसके साथी सोशल मीडिया के जरिए कट्टरपंथ फैलाने का काम करते थे। उनका काम आईएसआईएस के लिए नई भर्ती और फंड का इंतजाम करना था। बता दें आईएसआईएस में शामिल होने से पहले मदेश शंकर ने भी इस्लाम कबूल कर अपना नाम अब्दुल्ला रख लिया था।

‘शंकर वेंकटेश, शैबु निहार वीके और मदेश शंकर के उदाहरणों से स्पष्ट है कि कट्टरपंथियों ने लड़कियों और महिलाओं के साथ साथ गैरमुस्लिम पुरुषों को भी जिहाद के लिए इस्लाम कबूल कराया। धर्मांतरित पुरुष और महिला दोनों को ISIS आतंकवादियों के रूप में मध्य पूर्वी देशों में भेजा गया। जैसा कि फिल्म ‘द केरला स्टोरी’ में दिखाया गया है। कट्टरपंथी अपने टारगेट का ब्रेनवॉश करते हैं। लड़कियों को पहले प्रेमजाल में फँसाया जाता है और शादी के बहाने उनका धर्म परिवर्तन कराया जाता है। दूसरी ओर पुरुषों को अपने धर्म के प्रति भड़काया जाता है।

उन्हें हीन भावना का शिकार बनाया जाता है। उनके धर्म को झूठा धर्म बता कर इस्लाम का महिमामंडन किया जाता है। उन्हें काफिरों के खिलाफ जिहाद छेड़ते हुए शहीद होने पर जन्नत में हूरों और बेहतर जीवन के सपने दिखाए जाते हैं।

नोट- यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे आप इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।