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हिंदुत्व और संघ परिवार को घेरने की साजिश, समर्थकों के बहाने निशाने पर PM मोदी: गोडसे के नाम पर ‘द प्रिंट’ के सहारे झूठ-प्रोपेगेंडा फैला रहे वीर सांघवी

2 अक्टूबर को गाँधी जयंती थी, इसी दिन संयोग से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का शताब्दी वर्ष का उत्सव भी था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर संघ प्रमुख मोहन भागवत तक सबने गाँधी को याद किया। इसके उल्ट हमेशा की तरह कुछ लोगों के लिए यह दिन गाँधी के बहाने हिंदू धर्म और हिंदुत्व को कटघरे में खड़ा करने का बहाना बन गया।

पत्रकार वीर सांघवी ने ‘द प्रिंट’ में एक लेख लिखकर गोडसे के बहाने हिंदुत्व पर सवाल खड़े किए की। सांघवी ने अपने लेख में सीधे-सीधे आरोप लगाने के बजाय वामपंथियों की मूल विचारधारा की तरह संदेह का बीज बोने का तरीका अपनाया है।

द प्रिंट का लेख

सांघवी ने अपने लेख के शीर्षक में ही शब्दों से खेलने की कोशिश की है। उन्होंने लिखा, “क्यों मोदी के समर्थक ‘गर्वित हिंदू’ एमके गांधी से डरते हैं और उनके हत्यारे गोडसे का सम्मान करते हैं।” यानी जो प्रधानमंत्री गाँधी को अपना आदर्श मानकर चलते आए हैं, उनके विचार को आगे बढ़ाने की बात करते रहे हैं, समर्थकों के नाम पर किसी तरह उनको भी गाँधी के हत्यारे से जोड़ने की कोशिश की गई। जब इस लेख को पढ़ना शुरू करते हैं तो इसमें अगला निशाना ‘हिंदुत्व’ को बनाया गया है।

‘द प्रिंट’ की रिपोर्ट का एक हिस्सा

सांघवी का तर्क है कि ‘गोडसे की महिमा गाने की कोशिशें इसलिए बढ़ गई हैं क्योंकि देश में हिंदुत्व का असर बढ़ा है’।

सांघवी का यह तर्क बहुत सुविधाजनक तो है ही, साथ ही यह घृणित मानसिकता भी है। जब किसी विचार को तर्क की कसौटी पर ना कसा जा सके तो उसके लिए ‘रेडीमेड विलेन’ हिंदुत्व को जिम्मेदार ठहरा दिया जाए, यह एक विचारधारा की पुरानी आदत रही है।

पहली बात तो यह कि गाँधी की आलोचना या सवाल उठाना उनकी विरासत पर हमला कैसे हो सकता है? स्वतंत्रता से पहले ही सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रांतिकारियों के विचार गाँधी से अलग थे तो क्या वे सुनियोजित हमला कर रहे थे?

अब आते हैं गोडसे पर, नाथूराम गोडसे की तारीफ करने वाले कितने लोग आपको मिलेंगे, ऐसे लोगों की संख्या बमुश्किल सैकड़ों में ही होगी। ऐसे में चंद लोगों को पूरी विचारधारा का प्रतीक बनाकर हिंदुत्व पर सवाल खड़ा कर देना कैसे ठीक हो सकता है?

क्या कभी सांघवी लिख पाएँगे कि दुनियाभर में आतंकवाद की घटनाएँ बढ़ रही हैं तो इसका जिम्मेदार कौन है? क्या सांघवी लिख पाएँगे कि भारत समेत दुनिया के बड़े हिस्से में धर्मांतरण का एक सुनियोजित षड्यंत्र चल रहा है तो इसका जिम्मेदार कौन है? नहीं। क्योंकि हिंदुत्व पर सवाल खड़ा करना आसान है वो भी बिना किसी तर्क के, बिना किसी ठोस सबूत के।

वह खुद अपने लेख में आगे कहते हैं कि ‘यह व्याख्या अपने साथ कई और सवाल खड़े कर देती है, जिनके तार्किक उत्तर मौजूद नहीं हैं‘। फिर भी वो खुलकर हिंदुत्व को इसका जिम्मेदार ठहरा देते हैं। इसमें उन्होंने आगे विभाजन के लिए गाँधी और कॉन्ग्रेस को लगभग क्लीन चिट देते हुए, वीडी सावरकर (वीर सावरकर) को इसका जिम्मेदार ठहरा दिया है।

द प्रिंट की रिपोर्ट का एक अंश

अपने लेख में पहले तो सांघवी ने यह साबित करने की कोशिश की है कि विभाजन से असल में ‘हिंदुत्ववादियों’ को फायदा हुआ है। आगे वो टू नेशन थ्योरी को लेकर कहते हैं कि दो-राष्ट्र सिद्धांत गाँधी ने नहीं दिया था बल्कि सावरकर ने इसे पेश किया है।

सांघवी जैसे लोग सावरकर की 1937 में दिए गए भाषण के बहाने उन्हें ‘टू नेशन थ्योरी’ का जनक साबित करने की कोशिश करते हैं लेकिन वो सर सैयद अहमद खान के 1876 के बयानों को भूल जाते हैं।

सैयद अहमद ने 1876 में कहा था, “मुझे अब पूरा यकीन हो गया है कि हिंदू और मुसलमान कभी एक राष्ट्र नहीं बन सकते क्योंकि उनका धर्म और जीवन-शैली एक-दूसरे से बिल्कुल अलग है।” सर मुहम्मद इकबाल 1930 में मुस्लिम लीग के अध्यक्ष बने और पहली बार सार्वजनिक रूप से एक स्वतंत्र, संप्रभु मुस्लिम देश की माँग की थी।

सावरकर के जिस बयान का हवाला दिया जाता है, उसमें भी सावरकर ने भारत में हिंदू-मुस्लिम एकता की बात कही था। हालाँकि, सावरकर पर सवाल उठाना आसान है और सांघवी जैसों को लगता है कि सावरकर के बहाने ही सही, हिंदुत्व को घेरा जा सकता है।

द प्रिंट की रिपोर्ट का एक अंश

सांघवी ने अपने लेख में कहा है कि संघ परिवार का एक हिस्सा गोडसे को ‘महिमामंडित’ करता है। गोडसे जो खुद RSS की आलोचना करता था, उसके नाम पर संघ परिवार को बदनाम करना का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। संघ को गाँधी बताने की साजिश चलती रही है लेकिन हकीकत इससे अलग है।

गाँधी खुद संघ की शाखा में गए, गाँधी ने संघ के काम को लेकर प्रसन्नता व्यक्त की। संघ में हर रोज जिस महापुरुषों का स्मरण किया जाता है, उसमें गाँधी भी शामिल हैं। संघ के एकात्मता स्त्रोत में लिखा है, “दादाभाई गोपबन्धुः तिलको गान्धिरादृताः, रमणो मालवीयश्च श्रीसुब्रह्मण्यभारती।”

कितने और संगठन ऐसे हैं जो राजनीति और 2 अक्टूबर के अलावा भी गाँधी को याद करते हैं, गाँधी की जीवनदृष्टि का अनुसरण करने की बात करते हैं। संघ ऐसा संगठन है लेकिन कोशिश की जाती है कि कुछ लोगों के नाम के बहाने संघ के विचार को किसी भी तरह बदनाम कर दिया जाए।

सांघवी ने अपने लेख में आगे कुछ बातें लिखी है, जिनमें बताया है कि कैसे गोडसे ने RSS छोड़ दी थी आदि-आदि। लेकिन फिर भी उसी महीन विचार के जरिए संघ को बदनाम करने की भी कोशिश की है।

लेख को पढ़ने से स्पष्ट हो जाता है कि सांघवी के पास अपनी बात साबित करने के लिए तर्क नहीं है। फिर भी उन्होंने हिंदुत्व को निशाना बनाया, संघ परिवार को निशाना बनाया और इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम घसीटने की कोशिश की। यह उसी सोच का प्रतीक है कि लोगों के मन में किसी विचार को लेकर संदेह पैदा कर दिया जाए और धीरे-धीरे इसे पनपने दिया जाए ताकि यह संदेह का बीज ही आगे चलकर वटवृक्ष बन सके।

महिला वर्ल्ड कप में पाकिस्तानी कमेंटेटर सना मीर ने POK को बोला ‘आजाद कश्मीर’: विवाद भड़का, लोगों ने BCCI से की एक्शन लेने की माँग

भारत और श्रीलंका के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित महिला क्रिकेट विश्व कप 2025, जिसे महिलाओं के खेल का उत्सव होना चाहिए था, वह अब एक राजनीतिक विवाद का हिस्सा बन गया है। पाकिस्तान की पूर्व कप्तान और कमेंटेटर सना मीर ने कमेंट्री के दौरान एक बयान दे डाला।

बांग्लादेश के खिलाफ पाकिस्तान के मैच के दौरान सना ने एक टिप्पणी की, जिसमें उन्होंने खिलाड़ी नतालिया परवेज को ‘आजाद कश्मीर से आने वाली’ बताया।

इस टिप्पणीको लेकर भारत काफी निंदा कर रहा है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) के नियमों के अनुसार खेल में राजनीति का कोई स्थान नहीं है। जिस हिस्से को मीर ने ‘आजाद कश्मीर’ कहा, वह असल में भारत का वह हिस्सा है जिसपर पाकिस्तान ने अवैध रूप से कब्जा किया है। वर्तमान में उस क्षेत्र में पाकिस्ती फौज के अत्याचारों के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन भी चल रहे हैं।

हजारों भारतीय प्रशंसकों ने सोशल मीडिया पर ICC और BCCI को टैग करते हुए सना मीर को कमेंट्री पैनल से हटाने की माँग की। उनका आरोप है कि मीर ने क्रिकेट में भू-राजनीति को घसीट कर पाकिस्तान के अवैध कब्जे को वैध ठहराने की कोशिश की है।

पाकिस्तान की वैचारिक दिवालियापन आया सामने

असल में ये पाकिस्तान की दशकों की कट्टरता से पैदा हुई घटिया सोच से का इशारा करता है। स्कूल और मस्जिद से लेकर टीवी स्टूडियो और खएल के मैदान तक पीढ़ियों को यह सिखाया गया है कि भारत के लिए दुश्मनी रखना असल में सम्मान है और जिहादी हिंसा ‘शहीदों का प्रतिरोध’।

इस विकृत सोच के जरिए हार को जीत बताया जाता है, झूठ को सच की जगह दी जाती है और यहाँ तक कि प्रसिद्ध खिलाड़ी भी प्रोपेगेंडा की बातों को दोहराते रहते हैं।

हरिस रऊफ की फाइटर-जेट नकल और फरहान की बंदूक सलामी कोई एक दम से हुए भावनात्मक विस्फोट नहीं थे, बल्कि ये उस सैन्यीकृत मानसिकता की ओर इशारा था जो हिंसा और इनकार को आगे बढ़ाने का काम करता है। पाकिस्तान के लिए स्कोरबोर्ड से ज्यादा मायने उस ‘सर्वोच्चता के भ्रम’ का है।

एशिया कप की ‘ट्रॉफी चोरी’

ये प्रोपेगेंडा महज मैदान तक ही सीमित नहीं रहा,बल्कि प्रशासन का भी हिस्सा बन गया। एशिया कप फाइनल उस समय विवादों में घिर गया जब पीसीबी प्रमुख और एसीसी अध्यक्ष मोहसिन नकवी ट्रॉफी लेकर चले गए। इसे वैश्विक स्तर पर ‘ट्रॉफी चोरी’ कहा गया। रिपोर्ट्स के अनुसार, नकवी ट्रॉफी और मेडल्स को अपने दुबई होटल रूम तक ले गए।

बीसीसीआई के नेताओं राजीव शुक्ला और आशीष शेलार ने एसीसी की बैठक में नकवी का कड़ा विरोध किया और कहा कि ट्रॉफी भारत की है। नकवी ने माफी माँगने से इनकार कर दिया और बीसीसीआई ने चेतावनी दी कि यह मुद्दा नवंबर की आईसीसी बैठक में उठाया जाएगा। यह विवाद एशियाई क्रिकेट की साख पर गंभीर सवाल खड़े करता है, खासकर जब 2026 का टी20 विश्व कप नजदीक है।

पहलगाम की छाया और ऑपरेशन सिंदूर

इन खेल विवादों के पीछे आतंकवाद की भयावह सच्चाई है। अप्रैल 2025 में पाकिस्तानी आतंकवादियों ने पहलगाम में 26 से अधिक हिंदू पर्यटकों की हत्या कर दी, पुरुषों से उनकी धार्मिक पहचान पूछने के बाद पैंट उतार कर पुष्टि भी की गई और फिर उन्हें निशाना बनाया गया। इस बर्बरता ने भारत में बड़े स्तर पर आक्रोश पैदा किया और भारतीय टीम ने नकवी से एशिया कप ट्रॉफी लेने से इनकार कर दिया।

भारत की जवाबी प्रतिक्रिया निर्णायक और विध्वंसक थी। ऑपरेशन सिंदूर के तहत भारतीय सेनाओं ने जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के नौ आतंकी ठिकानों को नष्ट किया। संघर्ष बढ़ने पर भारत ने कम से कम 11 पाकिस्तानी एयरबेस भी तबाह कर दिए। इन हमलों ने पाकिस्तान को युद्धविराम की गुहार लगाने पर मजबूर कर दिया, जो दशकों में उसकी सबसे शर्मनाक सैन्य हारों में से एक थी।

इसके बावजूद पाकिस्तान की सेना और प्रोपेगेंडा मशीन ने इस हार को जीत में बदलने की कोशिश की। हरिस रऊफ का 6-0 इशारा निजी बहादुरी नहीं था, बल्कि रावलपिंडी की दुष्प्रचार रणनीति का प्रतीक था, जिसका उद्देश्य युद्धक्षेत्र की हार से ध्यान भटकाना और आकर्षक नारों से भ्रम फैलाना था।

BCCI सुनिश्चित करे कि सना मीर अगली उड़ान से इस्लामाबाद लौटें

महिला विश्व कप विवाद, हरिस रऊफ की हरकतें, नकवी की ट्रॉफी चोरी, और पहलगाम नरसंहार अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं। ये एक ही पहेली के टुकड़े हैं: एक ऐसा देश जो श्रेष्ठ होने का भ्रम लिए बैठा है, जहाँ क्रिकेटर, मौलवी, कमेंटेटर और जनरल एक ही प्रोपेगेंडा की बोली बोलते हैं।

ICC के लिए चुनौती कड़ी है: सना मीर को जवाबदेह ठहराना और यह सुनिश्चित करना कि क्रिकेट को जियोपॉलिटिक्स के मंच बनाने के लिए हाइजैक न किया जाए। अगर इसे अनदेखा किया गया, तो यह दूसरों को क्रिकेट के वैश्विक मंच का दुरुपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करेगा।

भारत और BCCI के लिए सबक और भी साफ है। पाकिस्तान के साथ जुड़ाव चाहे वह कूटनीति के लिए हो या क्रिकेट के मैदान पर, परिणाम हमेशा एक ही है- प्रोपेगेंडा, झूठ और नफरत की प्रतिस्पर्धा का पैकेज बना कर पेश करना। भारत और श्रीलंका की ओर से सह-आयोजित टूर्नामेंट में मीर को कमेंट्री बॉक्स में बैठने देना और ‘आजाद कश्मीर’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने देना, ये सब असल में BCCI की ओर से पाकिस्तान के अवैध कब्जे को वैधता देने और भारत का अपमान करने की मंजूरी देने जैसा होगा।

इसका जवाब सिर्फ एक जरिया नहीं हो सकता। BCCI को तय करना चाहिए कि मीर अगली फ्लाइट से इस्लामाबाद लौटें और यह साफ तौर पर बताया दिया जाए कि कोई भी पाकिस्तानी कमेंटेटर क्रिकेट मंच का दुरुपयोग अपने प्रोपेगेंडा को फैलाने के लिए नहीं कर सकता।

यह केवल सना मीर के बारे में नहीं है। यह PCB, पाकिस्तान के खेल संस्थानों और उस प्रोपेगेंडा मशीनरी के लिए एक लाल रेखा खींचने के बारे में है जो हर अंतरराष्ट्रीय मंच में घुसपैठ करती है।

BCCI दुनिया का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड है। कम से कम इतना तो कर ही सकता है कि आर्थिक संकट से जूझ रहे PCB और पाकिस्तानियों को यह सिखाए कि बॉस कौन है और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का हिस्सा बने रहने के लिए उन्हें किस अनुशासन का पालन करना होगा। इसे अपनी वित्तीय ताकत का इस्तेमाल करके ICC को मजबूर करना चाहिए कि मीर को पाकिस्तान वापस भेजा जाए।

उन्हें घर भेजना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है; यह एक आवश्यक संदेश है कि भारत क्रिकेट के मैदान पर या कमेंट्री बॉक्स में पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा को ऑक्सीजन नहीं देगा।

ये खबर मूल रुप से अंग्रेजी में जिनित जैन ने लिखी है। इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।

विदेश में राहुल गाँधी का भारत विरोधी अभियान जारी, अब कोलंबिया में देश के लोकतंत्र को बताया खतरा: अमेरिका से बहरीन तक फैला चुके हैं प्रोपेगेंडा

विदेशी धरती से नेता प्रतिपक्ष और कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने एक बार फिर देश को शर्मसार किया है। उन्होंने देश के लोकतंत्र पर सवाल उठाए हैं और ‘भारत विरोधी’ बातें की हैं। अमेरिका, यूके, बहरीन, मलेशिया जहाँ-जहाँ राहुल गाँधी गए, वहीँ से मोदी सरकार के खिलाफ बोलते-बोलते ‘देश विरोधी’ बयान भी दे दिया।

देश में परिवारवाद का पर्याय बने राहुल गाँधी जब लोकतंत्र की बात करते हैं, तो जनता को नेहरू, इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, सत्ता के पीछे सत्तासीन सोनिया गाँधी और अब प्रियंका गाँधी का चेहरा भी याद आता है। आपातकाल का वो दौर भी याद आता है, जब लोकतंत्र को कुचला गया था।

दिलचस्प बात ये है कि लैटिन अमेरिकी देश कोलंबिया में कभी लोकतंत्र अपनी मजबूत जड़ें जमा ही नहीं पाया। यहां कभी स्थिर सरकार नहीं रही। दुनिया भर में ड्रग्स सप्लाई का केन्द्र रहा ये देश, वहाँ से लोकतंत्र की दुहाई दी जा रही है।

राहुल के बयान पर बीजेपी ने कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की। भाजपा ने कहा कि राहुल विदेश में बैठकर भारत को बदनाम कर रहे हैं, उनका रिमोट कंट्रोल विदेशियों के हाथों में है। वे मोदी-भाजपा का विरोध करते-करते भारत और यहाँ की संस्थाओं के विरोध में उतर आए हैं।

बीजेपी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कहा, “राहुल गाँधी कह रहे हैं कि लोकतांत्रिक संरचना पर हमला हो रहा है। हमला कौन कर रहा है। परिवारतंत्र ही तो संविधान तंत्र पर हमला करता आ रहा है। 50 साल पहले इंदिरा गाँधी और अब पोता राहुल गाँधी संविधान को परिवार से नीचे रख रहे हैं।”

क्या कहा राहुल गाँधी ने कोलंबिया में

कोलंबिया के ईआईए विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में बोलते हुए, राहुल गाँधी ने कहा कि ‘लोकतंत्र पर हमला’ भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

उन्होंने कहा, “सबसे बड़ा खतरा भारत में हो रहे लोकतंत्र पर हमले का है। भारत वास्तव में अपने सभी लोगों के बीच संवाद का एक केंद्र है… विभिन्न परंपराओं, धर्मों, विचारों को जगह की ज़रूरत होती है। और उस जगह को बनाने का सबसे अच्छा तरीका लोकतांत्रिक व्यवस्था है। वर्तमान में, लोकतांत्रिक व्यवस्था पर व्यापक हमला हो रहा है। इसलिए यह एक खतरा है।”

उन्होंने भाजपा पर भारत के लोकतांत्रिक ताने-बाने को कमजोर करने का आरोप लगाया। गुरुवार (2 अक्टूबर 2025) को एक संवाद कार्यक्रम में बोलते हुए, राहुल गाँधी ने कहा कि वह भारत की सांस्कृतिक विविधता, तकनीकी मजबूती और स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के कारण ‘भारत को लेकर बहुत आशावादी’ हैं। लेकिन देश ‘गंभीर खतरों’ का सामना कर रहा है।

चीन के साथ भी उन्होंने भारत की तुलना की और कहा, “हम चीन जैसा नहीं कर सकते, जो लोगों का दमन करता है और एक सत्तावादी व्यवस्था चलाता है। हमारी व्यवस्था इसे स्वीकार नहीं करेगी।”

नेता विपक्ष ने 2016 के नोटबंदी से लेकर 2025 तक के सरकार की तमाम योजनाओं को विफल करार दिया। उन्होंने कहा कि सरकार ने नोटबंदी लागू की इस सोच के साथ की नकदी खत्म हो जाएगी, लेकिन एक नीति के तौर पर ये विफल रही। सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए कहा, “भारत में अब बहुत ही केंद्रीकृत स्तर पर भ्रष्टाचार व्याप्त है। तीन-चार कंपनियां पूरी अर्थव्यवस्था पर कब्जा कर रही हैं, जिनका प्रधानमंत्री से सीधा संबंध है। भारत में (अब) भ्रष्टाचार व्याप्त है।”

राहुल गाँधी ने कब-कब बताया ‘खतरे में है लोकतंत्र’

यह पहली बार नहीं है जब कॉन्ग्रेस नेता ने विदेशी धरती से पीएम मोदी के नेतृत्व वाली सरकार पर हमला किया हो। 2014 के बाद जब भी मौका मिलता है, राहुल गाँधी भारत के खिलाफ जहर उगलते नजर आते हैं। बार-बार विदेशी मंचों का इस्तेमाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए करते हैं।

2024 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में, राहुल गाँधी ने कहा था कि भारत में ‘लोकतंत्र पर हमले’ हो रहे हैं। लगातार तीन लोकसभा चुनाव में धूल चाटने के बाद राहुल गाँधी को कभी ‘वोट चोरी’ नजर आती है तो कभी ‘लोकतंत्र पर हमला’ नजर आता है। देश के बाहर झूठे आरोप लगाकर देश को बदनाम करने की कोशिश का वह कोई मौका हाथ से जाने नहीं देते।

लंदन में एक कार्यक्रम में मई 2022 में उन्होंने दावा किया था कि ‘भारत की आत्मा पर हमला हो रहा है’। सीबीआई और ईडी जैसी संस्थाओं का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया। भारत की तुलना पाकिस्तान से करते हुए कहा कि ‘डीप स्टेट’ भारत को धीरे- धीरे खा रहा है।

यूके और जर्मनी की यात्रा के दौरान राहुल गाँधी ने 2018 में, पीएम मोदी की तुलना तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से की थी। राहुल ने कहा कि देश में व्याप्त ‘बेरोजगारी’ पर लोगों के गुस्सा था, इसका राजनीतिक फायदा उठाया गया। उन्होंने पीए मोदी को ‘देशद्रोही’ तक कह डाला।

2018 में ही मलेशिया के दौरे के दौरान नोटबंदी की प्रक्रिया का मजाक उड़ाते हुए कहा था कि अगर वह प्रधानमंत्री होते, तो इसे ‘कूड़ेदान में फेंक देते’। सिंगापुर में उन्होंने ‘डराने-धमकाने’ के साथ-साथ मोदी सरकार पर ‘विभाजनकारी राजनीति’ करने का आरोप लगाया।

कॉन्ग्रेसअध्यक्ष बनने के बाद 2018 में बहरीन पहुँचे राहुल गाँधी ने एनआरआई को संबोधित करते हुए मोदी सरकार पर ‘समुदायों के बीच भय और घृणा’ फैलाने का आरोप लगाया।

2017 में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के एक समारोह में राहुल गाँधी ने ‘अहिंसा के विचार पर हमला’ होने की बात कही थी। साथ ही प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली सरकार पर केवल देश की शीर्ष 100 कंपनियों पर ध्यान देने का आरोप लगाया।

अमेरिका से लेकर लंदन तक और कोलंबिया से लेकर मलेशिया तक जब भी राहुल गाँधी को मौका मिला उन्होंने भारत पर आरोप लगाए। देश में संविधान की प्रति हाथ में लेकर रैली करने वाले राहुल गाँधी संवैधानिक संस्थानों पर आरोप लगाने से नहीं चूकते। कोलंबिया में भी उन्होंने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बोलते हुए सत्ता के विकेन्द्रीकरण को भ्रष्टाचार की वजह बता दिया।

भारत के लोकतंत्र की मिसाल पूरी दुनिया देती है, लेकिन राहुल गाँधी को भारत का लोकतंत्र खतरे में नजर आता है। संविधान के अंतर्गत उन्हें नेता प्रतिपक्ष का पद मिला है। उनकी सुरक्षा से लेकर गाड़ी- बंगले हर चीज लोकतांत्रिक ढाँचे के तहत मिले अधिकार की वजह से हैंं। सरकार इन पर करोड़ों रुपए खर्च करती है, लेकिन उन्हें लोकतंत्र खतरे में नजर आता है।

राहुल गाँधी की भाषा पाकिस्तान को पसंद आती है। वहाँ की मीडिया की राहुल गाँधी चहेते चेहरे हैं और उनके बयान ‘भारत विरोध’ को दिखाने के काम आते हैं। विदेश जाकर भारत विरोधी बयान देकर भारत के लोकतांत्रिक ताने- बाने को वे कमजोर कर रहे हैं, सरकार नहीं।

रावण को ‘शरारती’ बता दशहरे का मजाक उड़ा रही सिमी ग्रेवाल: हिंदू परंपराओं पर हमला और महिलाओं की पीड़ा को हल्का दिखाने का वामपंथी प्रोपेगेंडा फिर आया सामने

हर साल दशहरे पर पूरे भारत में रावण के पुतले जलाए जाते हैं। करोड़ों हिंदुओं के लिए यह सिर्फ एक तमाशा नहीं बल्कि एक ऐसा संस्कार है जो यह याद दिलाता है कि धर्म हमेशा अधर्म पर विजय पाता है। यह हमारी सभ्यता का संदेश है कि बुराई चाहे कितनी भी ताकतवर या चालाक क्यों न हो, अंततः उसे धर्म और सत्य के आगे हारना ही पड़ता है।

लेकिन इस बार अभिनेत्री और निर्माता सिमी ग्रेवाल ने इस पर सवाल उठाकर विवाद खड़ा कर दिया। उन्होंने रावण के नाम एक ‘खुले खत’ (open letter) में लिखा कि उसका व्यवहार ‘बुरा’ नहीं बल्कि ‘थोड़ी शरारत’ था। सिमी ने यहाँ तक कहा कि सीता का अपहरण करने के अलावा रावण ने उनके साथ अच्छा व्यवहार किया था, जो आज कई महिलाओं को समाज से नहीं मिलता। उन्होंने यह भी कहा कि दशहरे पर रावण का पुतला जलाना अब बस फैशन या इन-थिंग बन गया है।

पहली नजर में सिमी ग्रेवाल का यह ट्वीट सिर्फ मजाक या व्यंग्य जैसा लग सकता है। लेकिन ध्यान से देखने पर यह एक खतरनाक सोच को दिखाता है, जो आजकल भारत के तथाकथित लिबरल एलीट में आम होती जा रही है। यह सोच हिंदू परंपराओं और रीति-रिवाजों का मजाक उड़ाती है और महिलाओं के खिलाफ हुए अपराधों को हल्का करके दिखाती है, वो भी हास्य के नाम पर।

अपहरण को तुच्छ बताना

ग्रेवाल की पोस्ट का सबसे परेशान करने वाला पहलू यह है कि उन्होंने रावण के सबसे बड़े अपराध माता सीता का अपहरण को बहुत ही हल्के में लिया है। वह इसे ‘जल्दीबाज़ी’ में किया गया काम कहती हैं और फिर यह तर्क देती हैं कि रावण ने सीता को खाना, रहने की जगह और पहरेदार दिए, इसलिए उसके इस अपराध को अलग नजरिए से देखा जाना चाहिए।

यह कोई ‘गहराई से समझने वाली बात’ नहीं है बल्कि अपराध को सही ठहराने की कोशिश है। किसी महिला का अपहरण करना कोई ‘छोटी गलती’ नहीं हो सकती, जिसे बाद में दिए गए सुविधाओं के बहाने माफ कर दिया जाए।

अगर यही तर्क मान लिया जाए, तो फिर हर अपहरणकर्ता यह कह सकता है कि उसने अपने कैदी को अच्छा खाना और रहने की जगह दी, इसलिए उसका अपराध माफ होना चाहिए। सोचिए, अगर यही तर्क आज के समय में लागू किया जाए तो क्या हम किसी अपहरणकर्ता को इसलिए बरी कर देंगे कि उसने अपने शिकार को अच्छी रोटी और आरामदायक घर दिया? बिल्कुल नहीं।

चतुराई दिखाने के चक्कर में ग्रेवाल असल में एक स्त्री के अपने सम्मान, स्वतंत्रता और सुरक्षा के अधिकार को हल्का बना देती हैं। विडंबना यह है कि जिस नारीवाद का दावा वह शायद करती हों, वही नारीवाद माँग करता है कि अपहरण जैसे अपराध की बिना किसी शर्त के कड़ी निंदा की जाए। लेकिन हिंदू परंपरा पर कटाक्ष करने की जल्दबाजी में गरेवाल रावण को ‘गुलाबी’ चश्मे से देखने का रास्ता चुन लेती हैं।

चयनात्मक ‘नारीवाद’ और हिंदू पंचिंग बैग

सिमी ग्रेवाल के ट्वीट से एक गहरा सवाल उठता है, आखिर क्यों ऐसे व्यंग्य और पुनर्व्याख्याएँ हमेशा हिंदू प्रथाओं और रीति-रिवाजों को ही निशाना बनाती हैं? क्या सिमी गरेवाल कभी किसी अन्य धर्म के लोगों के लिए ऐसा खुले खत लिखने की हिम्मत करेंगी? क्या वह कहेंगी कि किसी अधेड़ उम्र के पुरुष का छह साल की लड़की से विवाह बुरा नहीं बल्कि सिर्फ थोड़ा अनुचित था? क्या वह इस्लामी या ईसाई इतिहास में दर्ज अत्याचारों पर ऐसे ही मजाक करेंगी?

हमने पहले नुपुर शर्मा प्रकरण में देखा कि जब किसी ने अप्रिय तथ्यों को सीधे कहा, तो उसे बहस या खंडन का सामना नहीं करना पड़ा। इसके बजाय, एक संगठित अभियान चलाया गया, जो ऑनलाइन दुनिया से सड़कों तक फैल गया। भारतीय शहरों में भीड़ ने सर तन से जुदा जैसे खौफनाक नारे लगाए, सिर्फ इसलिए कि शर्मा ने ऐसी बातें कही जो मुस्लिम समुदाय के कुछ हिस्सों ने पैगंबर मुहम्मद पर अपमान मान लिया।

इसके बावजूद, हिंदू धर्म बॉलीवुड के तथाकथित लिबरल लोगों के लिए सबसे सुरक्षित निशाना बन गया है। हिंदुओं की आलोचना करें, उनके देवताओं का मजाक उड़ाएँ, त्योहारों का उपहास करें तो इन्हें खुशी होती है। लेकिन किसी अन्य धर्म की प्रथाओं या इतिहास को छूएँ, तो वही लोग रक्षात्मक हो जाते हैं या चुप्पी साध लेते हैं।

यह चयनात्मक आक्रोश सिर्फ पाखंड नहीं, बल्कि इसे साहस का नाम देकर पेश की गई कायरता है। असली नारीवाद, असली मानवता और असली प्रगतिशीलता वही है जो अन्याय को हर जगह चुनौती दे, न कि केवल वहाँ जहाँ ऐसा करना सुरक्षित और फैशनेबल लगे।

रावण के पुतले जलाने का सभ्यतागत उद्देश्य

सिमी ग्रेवाल शायद यह समझ ही नहीं पाईं कि हिंदू हर साल रावण का पुतला क्यों जलाते हैं। यह किसी काल्पनिक पात्र के प्रति क्रूरता या बुराई दिखाने के लिए नहीं है। इसका मकसद यह सिखाना है कि घमंड, वासना और अत्याचार, चाहे कितने भी ताकतवर दिखें, अंततः हारते हैं।

हर समाज में कुछ रीति-रिवाज और प्रतीक होते हैं जो नैतिक मूल्यों को मजबूत करने का काम करते हैं। पश्चिमी देशों में भी तानाशाहों या क्रांतियों पर जीत की याद को जीवित रखने के लिए परेड, स्मारक और नाटकीय प्रस्तुतियाँ की जाती हैं।

अमेरिका में स्वतंत्रता दिवस पर आतिशबाज़ी उपनिवेशवाद पर विजय का प्रतीक है। फ्रांस में ‘बैस्टील डे’ जेल पर धावा बोलने की घटना की स्मृति है। इन परंपराओं का कोई मजाक नहीं उड़ाता, इन्हें कोई ‘चलन की चीज’ नहीं कहता। लेकिन जब हिंदू रावण दहन करते हैं, तो उसे अचानक पुराना, बेकार या यहाँ तक कि क्रूर ठहराया जाने लगता है।

महिलाओं की पीड़ा का मजाक उड़ाना

ग्रेवाल के ट्वीट का एक और परेशान करने वाला पहलू है उनका व्यंग्यपूर्ण बयान कि रावण की महिला पहरेदार ‘ज्यादा खूबसूरत नहीं थीं’। यह केवल घटिया मज़ाक नहीं है बल्कि यह दिखाता है कि ग्रेवाल का नारीवाद कितना खोखला है, जहाँ महिलाओं को उनके रूप-रंग के आधार पर नीचा दिखाया जाता है।

यह हमें स्वरा भास्कर के उस विवाद की याद दिलाता है जब उन्होंने राजपूत महिलाओं द्वारा जौहर करने पर सवाल उठाया था, ताकि वे आक्रमणकारी सेनाओं से बलात्कार से बच सकें। दोनों ही मामलों में, हिंदू महिलाओं की पीड़ा को तुच्छ बना दिया गया। ऐसे फेमिनिज्म के गलत रूप महिलाओं को सशक्त नहीं बनाते, वे उनके ऐतिहासिक संघर्ष को कमतर दिखाते और उनकी पीड़ा को सिर्फ मजाक का विषय बना देते हैं।

सीता का अपहरण कोई काल्पनिक कहानी नहीं है जिसे हँसकर टाल दिया जाए, यह यह सिखाता है कि महिलाओं की गरिमा की रक्षा हर हाल में करनी चाहिए। भगवान राम का रावण के खिलाफ युद्ध पुरुष अहंकार का नहीं, बल्कि यह सिद्धांत है कि कोई भी पुरुष किसी महिला का अपहरण या उत्पीड़न करने का हक नहीं रखता, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो। सिमी ग्रेवाल का इसे मजाक में बदलने का प्रयास इस संदेश को कमजोर करता है।

रावण: विद्वान अत्याचारी

सिमी ग्रेवाल यह भी कहती हैं कि रावण ‘हमारे संसद के आधे से ज्यादा लोगों से ज्यादा पढ़ा-लिखा था।’ यह भी एक साधारण और सतही दृष्टिकोण है। हाँ, रावण एक विद्वान था, वेदों का ज्ञाता और भगवान शिव का महान भक्त था। लेकिन ज्ञान बिना विनम्रता के खतरनाक हो सकता है। रामायण खुद यह सिखाती है कि यदि ज्ञान और बुद्धि घमंड और वासना से भ्रष्ट हो जाएँ, तो उनका कोई मूल्य नहीं रह जाता।

असल में यही वजह है कि हर साल रावण का पुतला जलाया जाता है, इसलिए नहीं कि वह अज्ञानी था, बल्कि इसलिए कि उसने अपने ज्ञान का दुरुपयोग किया। यह कहना कि उसकी शिक्षा उसे कम बुरा बनाती है, ऐसा ही है जैसे यह कहना कि तानाशाह जिन्होंने सड़कें और विश्वविद्यालय बनाए, उन्हें उनके अत्याचारों के लिए माफ कर देना चाहिए। शिक्षा और शक्ति, जब गलत तरीके से इस्तेमाल की जाएँ, तो ये गुण नहीं बल्कि उत्पीड़न के हथियार बन जाते हैं।

उदारवादियों के तानों पर रोक क्यों लगाई जानी चाहिए?

असल में, सिमी ग्रेवाल का पोस्ट सिर्फ रावण के बारे में नहीं है। यह भारत की बौद्धिक और सांस्कृतिक बहस में एक बड़ी प्रवृत्ति को दिखाता है, जहाँ हिंदू परंपराओं का नियमित रूप से मजाक उड़ाया जाता है, उन्हें कमजोर दिखाया जाता है और पश्चिमी नैतिक दृष्टिकोण के जरिए दोषी ठहराया जाता है।

रावण को थोड़ा शरारती कहकर, सिमी सभ्यतागत नैतिक संघर्ष को मजाक में बदल देती हैं। सीता के अपहरण को हल्का करके, वह उन महिलाओं का अपमान करती हैं जिन्होंने सदियों से उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाई लड़ी। रावण का पुतला जलाना सिर्फ फैशन कहना, इस रीति के गहरे नैतिक उद्देश्य को नज़रअंदाज करना है।

सच्चाई यह है कि हिंदुओं को अपनी परंपराओं और रिवाजों की व्याख्या करने के लिए बॉलीवुड हस्तियों के लेक्चर की जरूरत नहीं है। हिंदुओं को चाहिए अपने धर्म का सम्मान, वही सम्मान जो अन्य धर्मों को अपने आप दिया जाता है।

दशहरा किसका प्रतीक है?

दशहरा न तो किसी घृणा का त्योहार है और न ही किसी व्यक्तिगत दुश्मनी का। यह नैतिक स्पष्टता का त्योहार है। रावण के पुतले इसलिए जलाए जाते हैं क्योंकि समाज को यह याद दिलाना जरूरी है कि घमंड, अहंकार और अधर्म हमेशा हारेंगे। इसे फैशन कहना या रावण को एक गलत समझा गया सज्जन बताना सिर्फ अज्ञान नहीं, बल्कि इस धरती की सभ्यतागत बुद्धि का अपमान है।

सिमी ग्रेवाल का ट्वीट कोई चतुर व्यंग्य नहीं है। यह एक विकृत सोच को दर्शाता है, जो हिंदू रीति-रिवाज़ों का अपमान करती है, महिलाओं की पीड़ा को तुच्छ बनाती है और चयनात्मक व्याख्यान में लिप्त रहती है। इसी कारण हर साल रावण का पुतला जलता रहेगा। क्योंकि कुछ विचार, चाहे बॉलीवुड के तथाकथित लिबरल उन्हें कितना भी सजाएँ, अच्छाई और न्याय के लिए नष्ट किए जाने ही चाहिए।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में जिनित जैन ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)

PM मोदी को रिटायरमेंट का ज्ञान दे रहे वामपंथियों अपने घर में झाँक लो, 76 साल की उम्र में फिर CPI के मुखिया बने हैं डी राजा

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) का 25वां राष्ट्रीय अधिवेशन हाल ही में संपन्न हुआ। इसमें वरिष्ठ नेता डी राजा को तीसरी बार पार्टी का महासचिव चुना गया।ये अधिवेसन 21 से 25 सितंबर 2025 तक चंडीगढ़ में राष्ट्रीय कार्यक्रम हुआ। इसमें देशभर से 800 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।

इससे पहले मदुरै कॉन्ग्रेस में जब उन्हें दूसरी बार महासचिव चुना गया तब उन्होंने कहा कि अगली बार वे 75 साल के हो चुके होंगे और पार्टी उनको तीसरी बार महासचिव नहीं चुनेगी। लेकिन तीसरी बार उनके चयन के बाद पार्टी के अंदर कई तरह की चर्चा शुरू हो गई।

पार्टी के अंदर केरल और कुछ छोटे राज्यों की कई इकाइयों ने 75 वर्ष की आयु सीमा को सख्ती से लागू करने की माँग की थी। लेकिन 76 वर्ष के हो चुके राजा को अपवाद के तौर पर फिर चुना गया।

CPI इस वर्ष अपनी शताब्दी मना रही है। इसी साल पार्टी ने बड़े पदों पर नेतृत्व के लिए 75 वर्ष की आयु सीमा तय की थी। लेकिन इस अधिवेशन में ‘निरंतरता बनाए रखने’ के नाम पर इस नियम को दरकिनार कर दिया गया। राजा ही नहीं, केंद्रीय नियंत्रण आयोग के अध्यक्ष चुने गए के नारायण भी 75 वर्ष की आयु सीमा से ऊपर हैं।

गौरतलब है कि CPI वही पार्टी है जिसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर ‘रिटायरमेंट’ का प्रोपेगेंडा चलाया था, यह कहते हुए कि 75 पार नेता को पद छोड़ देना चाहिए। इसके बाद खुद की पार्टी में ये निर्णय लिए जाने के बाद पार्टी खुद ही सवालों के घेरे में आ गई है। विपक्षियों का कहना है कि क्या यह नियम सिर्फ दूसरों पर लागू होता है?

पार्टी के अंदर ही दो फाड़

पार्टी में महासचिव पद के लिए पहले अमरजीत कौर का नाम सामने आया था। अगर उन्हें चुना जाता, तो वह भारत में किसी वामपंथी पार्टी की पहली महिला प्रमुख होतीं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पार्टी के शीर्ष पदों पर अब भी 70 से अधिक आयु के नेता ही बने हुए हैं।

जब पार्टी कॉन्ग्रेस में नए नेशनल काउंसिल और नियंत्रण आयोग के नाम प्रस्तुत किए गए, तो डी राजा के चयन के बाद अधिवेशन में केरल के CPI नेता राजाजी मैथ्यू थॉमस और दिल्ली इकाई के सचिव दिनेश वर्श्नेय ने सार्वजनिक तौर पर राजा को दी गई छूट का विरोध किया। थॉमस ने तो मंच पर चढ़कर अपना विरोध दर्ज कराया।

डी राजा सीपीआई के पहले दलित महासचिव हैं। उनसे पहले सुधाकर रेड्डी महासचिव के पद पर थे।रेड्डी ने स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा दिया तो 2019 में महासचिव पद संभाला था। इसके बाद उन्हें 2022 में विजयवाड़ा में हुए पार्टी कॉन्ग्रेस में फिर से चुना गया।

मदुरै की पार्टी कॉन्स में 75 वर्ष की आयु सीमा को लागू किया जाने के बाद प्रकाश करात, बृंदा करात, सूर्यकांत मिश्रा, सुभाषिनी अली, माणिक सरकार और जी रामकृष्णन जैसे वरिष्ठ नेता पोलित ब्यूरो से हट गए थे। लेकिन उस समय भी केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन को अपवाद के तौर पर 79 वर्ष की आयु में पोलित ब्यूरो में जगह मिली। इसके पीछे राज्य में अगले वर्ष होने वाले चुनावों को कारण बताया गया।

CPI के राष्ट्रीय सम्मेलन से पहले नेतृत्व को लेकर काफी बहस हुई। केरल और कुछ अन्य राज्यों की इकाइयाँ आयु सीमा को सख्ती से लागू करने के पक्ष में थी। वहीं उत्तर भारत के बिहार जैसी कुछ इकाइयाँ राजा को छूट देने के पक्ष में थी। दिल्ली में पार्टी का सबसे प्रमुख चेहरा होने के कारण राजा को समर्थन मिला।

महिलाओं को प्रतिनिधित्व नहीं, सिर्फ भाषणों में बराबरी

वामपंथी दलों की राजनीति में CPI असल में दो चेहरे लिए है। विचारधारा के स्तर पर पार्टी समानता, भागीदारी और सामाजिक न्याय की बात करते हैं, लेकिन जब बात अपने संगठन की आती है, तो वही पुराना नेतृत्व, वही चेहरे और वही ढाँचा बनाए रखते हैं।

बात महिला राजनेताओं के हों तो CPI और CPI(M) जैसे दलों में महिला महासचिव आज तक नहीं बनीं। अमरजीत कौर जैसी वरिष्ठ नेता का नाम महासचिव पद के लिए सामने तो आया, लेकिन उन्हें शीर्ष पद नहीं दिया गया। इन दलों में महिला कार्यकर्ताओं की भूमिका जमीनी आंदोलनों तक सीमित है, नेतृत्व में उनकी जगह नहीं बनती।

शीर्ष पदों पर भी पुराने नेताओं का ही बोलबाला है। फिर चाहे महासचिव की बात हो तो 76 वर्षीय डी राजा के साथ, 82 वर्षीय एमए बेबी, और 70 वर्ष से अधिक दीपांकर भट्टाचार्य जैसे नेता दशकों से शीर्ष पदों पर बैठे हैं। पार्टी की तय आयु सीमा को 75 वर्ष को खुद ही तोड़ा गया, फिर भी महासचिव की बारी आई तो इसे अपवाद कह दिया गया।

वामपंथी दल सत्ता पक्ष पर तो लोकतंत्र, जवाबदेही और भागीदारी के सवाल जोर शोर से उठाते हैं। लेकिन खुद की पार्टी में न आंतरिक लोकतंत्र दिखता है और न नेतृत्व परिवर्तन की परंपरा नजर आती है। युवा और महिला कार्यकर्ताओं को तो सिर्फ नारे लगाने तक सीमित रखा गया है।

शोभायात्रा पर पथराव-दुर्गा प्रतिमा खंडित, आस्था के पर्व पर दिखा इस्लामी कट्टरपंथियों का आतंक: गरबा पंडाल में नाम बदलकर घुसे मुस्लिम युवक, हिंदू युवतियों से की छेड़खानी

हिंदुओं की आस्था से जुड़े पर्वों पर आतंक फैलाना जिहादियों की आदत बनती जा रही है। हर साल की तरह इस बार भी नवरात्रि के मौके पर आयोजित दुर्गा पूजा और गरबा पंडालों को इस्लामी कट्टरपंथियों का कहर देखने को मिला। कुछ जगहों पर मुस्लिम युवकों ने जबरन घुसकर महिलाओं से छेड़खानी की तो कहीं मजहब के नाम पर दंगे फैलाए गए।

वहीं, दूसरी ओर सनातन संस्कृति की रक्षा को लेकर भी इस बार कुछ खास पहलें देखने को मिलीं। मध्य प्रदेश और राजस्थान में कई आयोजनों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाने वाले बोर्ड लगाए गए। इसके साथ ही गरबा पंडालों में लव जिहाद और धर्मांतरण के खिलाफ जागरूकता संदेश प्रसारित किए गए।

‘आई लव मोहम्मद’ स्टेटस पर गरबा पंडाल में पथराव

गुजरात के गाँधीनगर में ‘आई लव मोहम्मद’ का स्टेटस लगाने के बाद हिंसा हुई थी। इसके लगाने को लेकर इस्लामी कट्टरपंथियों ने गरबा पंडाल और दुकानों पर हमला कर पथराव और आगजनी की गई। पुलिस ने कड़ा एक्शन लेते हुए 70 आरोपितों को गिरफ्तार किया।

महाराष्ट्र में मुस्लिम छात्रों की आपत्तिजनक व्हाट्सऐप चैट लीक

महाराष्ट्र के विरार शहर में VIVA कॉलेज में पढ़ने वाले छात्रों की व्हाट्सऐप चैट लीक हुई। शाहिद और फैज नाम के दो छात्र के बीच गरबा पंडाल में घुसकर हिंदू लड़कियों को निशाना बनाने की प्लानिंग कर रहे थे। इन छात्रों ने अपनी चैट में लिखा था कि ‘एक भी हिंदू लड़की को नहीं छोड़ना है’।

इसी कॉलेज में डांडिया कार्यक्रम के दौरान छात्राओं के वीडियो Discord App पर डालकर अश्लील कमेंट भी किए गए।

16 साल का मुस्लिम लड़का ‘आरव त्रिवेदी’ बन गरबा पंडाल में घुसा

कई जगहों पर मुस्लिम युवकों ने तमाम कोशिशों के बाद भी फर्जी नाम के सहारे गरबा पंडाल में एंट्री ले ली। राजस्थान के बांसवाड़ा में 16 साल का मुस्लिम लड़का ‘आरव त्रिवेदी’ बनकर गरबा पंडाल में घुसा आया। यहाँ उसने 17 वर्षीय हिंदू लड़की से छेड़छाड़ की और उसपर अपने साथ जाने का दबाव भी बनाया। हिंदू संगठन ने मुस्लिम लड़के को पकड़ा और पुलिस के हवाले कर दिया।

गरबा पंडाल में घुसकर महिलाओं से छेड़खानी, पथराव

राजस्थान के बीकानेर से एक और ऐसा मामला सामने आया। यहाँ बेनीसर बाड़ी इलाके में गरबा कार्यक्रम में मुस्लिम युवकों ने जबरदस्ती में पंडाल में घुसकर महिलाओं से छेड़छाड़ की। युवक जबरन महिलाओं के साथ डांस करने लगे। बाकी लोगों ने रोकने की कोशिश की तो पथराव तक किया गया।

इस दौरान पुलिस की एक जीप और मोटरसाइकिल को नुकसान पहुँचा जबकि करीब 5 लोग घायल हो गए। पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए 12 आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया।

कानपुर में गरबा पंडाल में घुसे सुहैल सिद्दीकी-सैफ

कानपुर में नवरात्रि के दौरान हुए डांडिया कार्यक्रम में दो मुस्लिम युवक सुहैल सिद्दीकी और सैफ घुसपैठ करते पकड़े गए। आयोजन स्थल पर गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित था फिर भी दोनों अंदर पहुँच गए और युवतियों पर अश्लील टिप्पणियाँ करने लगे। एक महिला पुलिसकर्मी की शिकायत पर दोनों के खिलाफ केस दर्ज किया गया।

छत्तीसगढ़ में मुस्लिम युवक की पंडाल में घुसपैठ

छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में नवरात्रि के गरबा कार्यक्रम के दौरान एक मुस्लिम युवक के पकड़े जाने के बाद खूब विवाद हुआ। जानकारी के मुताबिक, हिंदूवादी संगठन के कार्यकर्ताओं ने युवक को गरबा खेलते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया। बताया गया कि यह युवक गलत नाम बताकर पंडाल में घुसा था। इसके बाद हिंदू संगठन के सदस्यों ने उससे माता की मूर्ति के सामने दंडवत प्रणाम करवाया, प्रसाद खिलाया और माता के जयकारे भी लगवाए।

मक्का-मदीना की AI जेनरेटेड फोटो पर बवाल, नवरात्रि पंडाल तोड़ा

गुजरात के वडोदरा में 19 सितंबर 2025 को मक्का-मदीना का मजाक उड़ाती एक AI जेनरेटेड तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई। इस पोस्ट पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने जूनीगढ़ी और पानीगेट स्थिति पुलिस थाने के बाहर जमकर हंगामा किया। कट्टरपंथियों की भीड़ ने नवरात्रि पंडाल में तोड़फोड़ की।

भीड़ ने इलाके में जमकर पत्थरबाजी की और वाहनों को नुकसान पहुँचाया। इस घटना में कई पुलिसकर्मी भी घायल हो गए। भारी पुलिसबल ने स्थिति को काबू में किया। वडोदरा DCP के मुताबिक तुरंत कार्रवाई करते हुए 50 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया।

दुर्गा प्रतिमा खंडित कर जानलेवा हमला भी किया

मुंबई के मानखुर्द इलाके में 21 सितंबर 2025 को सांप्रदायिक तनाव पैदा करने के लिए दुर्गा प्रतिमा को खंडित कर दिया गया। दरअसल, हिंदू समुदाय के लोग नवरात्र में माँ दुर्गा की पूजा करने के लिए धूमधाम से मूर्ति लेकर जा रहे थे। तभी यात्रा मस्जिद के सामने से गुजरी तो इस्लामी कट्टरपंथियों ने ढोल बजाने पर आपत्ति जताई और गाली-गलौज की।

इस बीच इस्लामी कट्टरपंथियों ने दुर्गा प्रतिमा को खंडित कर दिया। प्रतिमा का हाथ टूटा हुआ मिला। इतना ही नहीं इस्लामी कट्टरपंथियों ने धारदार हथियार और रॉड से हिंदुओं पर हमला किया। मौके पर पहुँची पुलिस ने 7 लोगों को गिरफ्तार किया।

दुर्गा प्रतिमा विसर्जन जुलूस पर पथराव

मध्य प्रदेश के बुरहानपुर के नयाखेड़ा गाँव में बुधवार (1 अक्टूबर 2025) को हुए दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के दौरान जुलूस के मस्जिद के पास से गुजरते समय विवाद हो गया। वहाँ कुछ लोगों ने DJ के शोर पर आपत्ति जताई, जिसके बाद दो पक्षों में ज्यादा बहस और फिर पथराव हुआ। इसमें एक युवक को गंभीर चोटें आईं और एक छोटी प्रतिमा क्षतिग्रस्त हो गई।

दुर्गा पूजा पंडाल में ईसा मसीह की तस्वीरें

झारखंड के राँची में दुर्गा पूजा का पंडाल वेटिकन सिटी की थीम पर बनाया गया, जिसमें दीवारों पर ईसा मसीह, मरियम और ईसाई धर्म से जुड़ी तस्वीरे लगाई गई। हिंदू संगठन ने इसका विरोध किया तब जाकर ये थीम बदली गई। इसकी जगह श्रीराम, श्रीकृष्ण और अन्य हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरें लगाई गई।

गरबा कार्यक्रम पर मोहसिन खान ने अंडे फेंके

मुंबई के मीरा रोड पूर्व की जेपी नॉर्थ गार्डनर सिटी सोसायटी में गरबा कार्यक्रम के दौरान मोहिसन खान ने इमारत की 16वें मंजिल से अंडे फेंके। इसके बाद कार्यक्रम में विवाद हो गया। पुलिस ने मोहसिन खान के खिलाफ FIR दर्ज कर जाँच शुरू कर दी। यह भी सामने आया कि उसने पहले भी पुलिस को फोन कर कई बार कार्यक्रम रुकवाने की कोशिश की थी।

गरबा पंडाल में हिंदुओं को किया जागरूक, गैर-हिंदुओं की नो-एंट्री

इस साल गरबा पंडाल में तमाम तरीकों के संदेशों के साथ हिंदुओं को जागरूक करने का प्रयास भी किया गया। कहीं लव जिहाद और धर्मांतरण को लेकर तरह-तरह के मैसेज लिखे गए। तो वहीं पिछले सालों में देखी गई सांप्रदायिक घटनाओं के चलते मध्य प्रदेश और राजस्थान में गैर-हिंदुओं की एंट्री पर रोक भी लगा दी गई।

ऐसे ही मध्य प्रदेश के आगर मालवा जिले के एक गरबा पंडाल में ‘लव जिहाद’ को लेकर जागरूकता फैलाने की कोशिश की गई। यहाँ पोस्टर में लिखा गया, “बहन, तू दुर्गा बन, काली बन या फिर झाँसी की रानी बन, पर कभी लव जिहाद की शिकार मत बन।” इस पंडाल में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर भी प्रतिबंध लगाया गया।

नागपुर में नवरात्र के दौरान गरबा कार्यक्रम के आयोजको ने सख्त आदेश जारी किए। इसके तहत सिर्फ हिंदुओं को नवरात्र के कार्यक्रम में प्रवेश दिया जाएगा। इसके लिए आधार कार्ड दिखाना और तिलक लगाना जरूरी कर दिया गया। साथ ही पंडाल में भगवान विष्णु की मूर्ति के सामने झुकना भी जरूरी कर दिया गया।

इसके साथ पंडाल में प्रवेश करने वालों को रक्षासूत्र (कलावा) बाँधना होगा और उनपर ‘गौमूत्र’ भी छिड़का जाएगा। ये नियम विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने ‘लव जिहाद’ जैसी घटनाओं से बचने के लिए लागू किए गए।

मध्य प्रदेश के एक गरबा पंडाल को ‘लव जिहाद’ के खतरे को उजागर करने वाले जागरूक संदेश से भरा केंद्र बनाया गया। इस पंडाल में लव जिहाद से जुड़े कुछ मामलों की तरह पीड़ित हिंदू लड़कियों को सूटकेस और फ्रिज में प्रतीकात्मक रूप में दिखाया गया। पंडाल को हिंदू संगठनों ने ‘हिंदू बेटी बचाओ अभियान’ के तहत प्रदर्शित किया।

‘याद रहे, कराची का रास्ता सर क्रीक से होकर गुजरता है’: जानें इस ‘दलदली खाड़ी इलाके’ का इतिहास और भूगोल जिसे बदलने की राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान को दी चेतावनी

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान को सरक्रीक को लेकर चेताया है। पाकिस्तान ने यहाँ सैन्य गतिविधियाँ बढ़ा दी हैं और बुनियादी ढाँचे का निर्माण कर रहा है। सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण यह क्षेत्र पश्चिमी समुद्री सीमा पर है। भारत के कच्छ और पाकिस्तान के सिंध से लगी 96 किलोमीटर की इस खाड़ी में भारत ने अपने क्षेत्र में नौसेना की तैनाती की है। साथ ही तटरक्षक बल इसकी चौकसी करते हैं।

इतिहास-भूगोल दोनों बदल देंगे- राजनाथ सिंह

राजनाथ सिंह ने कहा, “भारत की सेना और बीएसएफ पूरी तरह चौकस हैं। पाकिस्तान को याद रहे, कराची तक जाने का एक रास्ता इसी क्रीक से गुजरता है। सर क्रीक में कोई भी दुस्साहस किया गया, तो भारत का जवाब ऐसा होगा कि इतिहास और भूगोल दोनों बदल जाएगा।”

उन्होंने कहा, “सरक्रीक को लेकर भारत ने कई बार बातचीत के रास्ते से समाधान निकालने की कोशिश की, लेकिन पाकिस्तान के मन में खोट है। 1965 के युद्ध में, भारतीय सेना ने लाहौर तक पहुँचने की क्षमता का प्रदर्शन किया था। रक्षा मंत्री ने कहा कि आज 2025 में, पाकिस्तान को याद रखना चाहिए कि कराची जाने का एक रास्ता सर क्रीक से होकर गुजरता है।”

रक्षा मंत्री ने ये भी खुलासा किया कि ऑपरेशन सिंदूर के वक्त पाकिस्तान ने सरक्रीक से लेकर लेह तक भारत की रक्षा प्रणाली को ध्वस्त करने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहा। भारतीय जवानों के जवाबी कार्रवाई के बाद पाकिस्तान की वायु रक्षा प्रणाली पूरी तरह तहस-नहस हो गई।

दशहरा के मौके पर (2 अक्टूबर 2025) गुजरात के भुज में सैनिकों के बीच ‘शस्त्र पूजा’ के मौके पर राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान को सर क्रीक को लेकर चेतावनी दी है।

क्या है सर क्रीक खाड़ी विवाद

भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा को निर्धारित करने वाला ये इलाका शुरुआत से ही विवादों में रहा है। गुजरात के कच्छ और सिंध प्रांत के बीच 96 किलोमीटर का ये दलदली खाड़ी इलाका है, जो अरब सागर से मिलता है। पानी का स्तर यहाँ अरब सागर में उठने वाली ऊँची-ऊँची लहरों की वजह से बदलता रहता है।

सर क्रीक खाड़ी में हाइड्रोकार्बन और प्राकृतिक गैस के भंडार हैं और मछली पकड़ने से लेकर समुद्री व्यापार तक में इसका अहम रोल है। पाकिस्तान पर समुद्र से निगरानी रखने का ये अहम केन्द्र भी है। पाकिस्तान के कराची पोर्ट तक पहुँचने का यह एक समुद्री मार्ग है। सीमा तय करना भी यहाँ मुश्किल रहा है, इसलिए शुरू से विवाद रहा।

सर क्रीक खाड़ी विवाद को सुलझाने के लिए कई प्रयास किए गए। 1965 के युद्ध के बाद, तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री हेरोल्ड विल्सन ने मामले में हस्तक्षेप किया। भारत- पाकिस्तान के बीच न्यायाधिकरण की स्थापना करवाई, ताकि विवाद का स्थाई समाधान किया जा सके। 1968 में इसने कहा कि पाकिस्तान को उसके दावे का 10 फीसदी हिस्सा दे दिया जाए, लेकिन पाकिस्तान नहीं माना।

1997 में दोनों देशों के बीच कई मुद्दों के साथ सर क्रीक पर भी बात हुई। 2005-07 के बीच दोनों देशों ने मिलकर सर्वेक्षण भी किया, लेकिन हल नहीं निकला। इस इलाके में कई मछुआरों को पाकिस्तान इसलिए पकड़ लेता है, क्योंकि गलत से वह उनकी सीमा की ओर चले जाते हैं।

भारत का कहना है कि इस खाड़ी के बीच से बॉर्डर होनी चाहिए, जबकि पाकिस्तान अधिक क्षेत्र की माँग करता रहा है। भारत इस विवाद को शांतिपूर्ण तरीके से बातचीत से हल करना चाहता है। लेकिन पाकिस्तान अक्सर उकसावे की कार्रवाई करता है। ताजा मामला भी उसके सैन्य गतिविधियों के बढ़ने और तटीय क्षेत्र में बुनियादी ढाँचे के निर्माण की वजह से पैदा हुआ है।

सर क्रीक विवाद की शुरुआत

सर क्रीक के विवाद की जड़ 1914 में मुंबई प्रेसिडेंसी और सिंध के बीच समझौते से माना जाता है। उस वक्त सर क्रीक को सीमा माना गया था।
भारत-पाकिस्तान बँटवारे के समय कच्छ भारत का क्षेत्र बना जबकि सिंध पर पाकिस्तान का अधिकार हो गया। लेकिन पाकिस्तान शुरू से ही सर क्रीक के पूरे क्षेत्र पर अपना हक जताता है।

भारत 1925 के उस नक्शे को भी आधार मानता है, जिसमें इस इलाके के बीच में सीमा रेखा बनाई गई थी। साथ ही एक साल पहले यानी 1924 में खाड़ी के बीच में स्तंभ बनाए गए थे।

भारत अंतर्राष्ट्रीय कानून के ‘थलवेग सिद्धांत’ के अनुरूप सीमा निर्धारण की बात भी कहता है। इसके मुताबिक समुद्री सीमा नौकाओं के आवागमन चैनल से मुताबिक तय होगी। लेकिन पाकिस्तान इसे खारिज करता है। उसका कहना है कि ये नियम नौका जलमार्ग चैनल के लिए लागू होती है। सर क्रीक के लिए इसे लागू नहीं किया जा सकता। जबकि भारत कहता है कि जब समुद्री में ऊँची ज्वार-भाटा उठता है तो इस क्षेत्र में नौकाएँ आसानी से पहुँचती हैं।

‘मैं काशी में ही रहना चाहती हूँ’ : 260 साल पहले जब माँ दुर्गा ने बनारस छोड़ने से किया इनकार, 15 ग्वाले मिलकर भी नहीं हिला पाए मूर्ति; जानें बंगाली टोले की पौराणिक परंपरा, आज भी पूजी जाती है वही प्रतिमा

“ई ना हटत हौ!” यह शब्द 1767 की विजयादशमी के दिन वाराणसी के मदनपुरा इलाके के 15 मजबूत यादव ग्वालों ने थक-हार कर कहे थे। उस दिन हर साल की तरह बंगाली टोला के मुखोपाध्याय (अब मुखर्जी) परिवार ने अपने घर में स्थापित दुर्गा प्रतिमा को विसर्जन के लिए ले जाने की कोशिश की थी पर वह मिट्टी, भूसे, बाँस और जुट से बनी माँ दुर्गा की मूर्ति अपनी जगह से टस से मस नहीं हुई।

कई कोशिशों के बाद भी मूर्ति नहीं हिली तो कहा जाता है, उसी रात परिवार के मुखिया काली प्रसन्न मुखोपाध्याय के सपने में माँ दुर्गा आईं और बोलीं, “मैं शिव की नगरी काशी में ही रहना चाहती हूँ। मुझे विसर्जित मत करो।” यह स्वप्न केवल एक सपना नहीं, बल्कि माँ की आज्ञा मानी गई। तब से लेकर आज तक यानी लगभग 260 वर्षों से वही मूर्ति हर साल दुर्गा पूजा में पूजी जाती है, लेकिन विसर्जन नहीं किया जाता।

260 सालों से एक ही मूर्ति की पूजा

माँ की यह प्रतिमा वाराणसी के बंगाली टोला, मदनपुरा इलाके की पुरानी दुर्गा बाड़ी में स्थापित है। यहाँ की दुर्गा प्रतिमा करीब 6 फीट ऊँची है और साथ में हैं माँ लक्ष्मी, माँ सरस्वती, भगवान गणेश और कार्तिकेय। यह मूर्ति हर साल दुर्गा पूजा में पूजी जाती है, लेकिन कभी विसर्जित नहीं की जाती। मिट्टी, बाँस, पुआल और जूट से बनी यह मूर्ति आज भी वैसी ही है, जैसी 1767 में थी। हर साल बस हल्की-फुल्की मरम्मत की जाती है।

मुखोपाध्याय परिवार मूल रूप से पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के रहने वाले थे। एक पारिवारिक झगड़े के बाद, वे वाराणसी आकर बस गए, जहाँ पहले से ही बंगाली संस्कृति का गहरा असर था। काली प्रसन्न मुखोपाध्याय ने अपने घर पर बंगाल की परंपरा से दुर्गा पूजा शुरू की। उस समय (1700 के दशक में) दुर्गा पूजा बंगाल में भी घरेलू, पारिवारिक होती थी। भव्य पंडालों और सार्वजनिक आयोजनों की बात तब दूर थी।

हर साल की तरह, 1767 में भी गंगामाटी (गंगा की मिट्टी) से बनी मूर्ति बजरा नाव से बंगाल से वाराणसी लाई गई। पूरे नवरात्र में पूजा हुई, लेकिन विजयदशमी के दिन जब विसर्जन का समय आया, तो मूर्ति ने मानो खुद को जड़ कर लिया। जितनी भी ताकत लगाई गई, मूर्ति हिली नहीं। तब माँ दुर्गा के सपने के बाद, मूर्ति को वहीं रहने देने का निर्णय लिया गया। तभी से, इसी प्रतिमा की हर साल पूजा होती है, लेकिन विसर्जन नहीं होता।

यह मूर्ति केवल दुर्गा पूजा के नौ दिनों में ही नहीं, पूरे साल पूजी जाती है। हर दिन 20 मिनट की आरती होती है और दुर्गा पूजा में ये बढ़कर 45 मिनट की हो जाती है। दुर्गा पूजा के समय फल, मटर, मूँग, और पंचमी को 51 नारियल से बनी नारियल नारू (पहले 151 से बनती थी) का विशेष भोग लगता है।

यहाँ कोई भव्य पंडाल नहीं लगता, लेकिन रिश्ते, स्मृतियाँ और आस्था का संगम होता है। देशभर से लोग यहाँ आते हैं, खासकर वे लोग जिनकी जड़ें कभी बंगाली टोला में थीं। यह पूजा सिर्फ मुखर्जी परिवार की नहीं, बल्कि पूरे मोहल्ले और काशी की है।

यह मूर्ति भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा मान्यता प्राप्त मूर्ति है। प्रतिमा का चेहरा विशेष है, वह माँ दुर्गा को युवावस्था में दर्शाता है, जो बहुत दुर्लभ है।

आज जहाँ अमेरिका, कनाडा, यूरोप जैसे देशों में रहने वाले भारतीय माँ दुर्गा की फाइबरग्लास की मूर्तियाँ मँगवाते हैं जो विसर्जित नहीं होतीं, वहीं काशी की यह मूर्ति हर मायनों में अनोखी है। विदेशों में मूर्तियाँ दोबारा इस्तेमाल होती हैं सुविधा और खर्च के कारण। लेकिन काशी में यह मूर्ति माँ के आदेश के कारण स्थायी है।

मंदिर का रखरखाव और परिवार की भूमिका

परिवार के सदस्य मूर्ति को छू नहीं सकते, केवल पुजारी ही पूजन करते हैं। भट्टाचार्य परिवार पुजारी का कार्य करते हैं। वहीं दत्ता परिवार मूर्ति की सजावट और रंग-रोगन का कार्य करता है। इंद्रनील मुखर्जी, जो अब इस परंपरा को सँभाल रहे हैं, कहते हैं, “हमारे लिए यह मूर्ति माँ के रूप में यहीं काशी में हमेशा के लिए है। यह विसर्जन की नहीं, स्थायित्व की देवी हैं।”

जब देशभर में विजयादशमी पर माँ को विदा किया जाता है, “आश्चे बोछोर आबार होबे” (अगले साल फिर होगी), काशी की यह माँ हमेशा के लिए यहीं रह गईं। यह सिर्फ मूर्ति की बात नहीं, बल्कि विश्वास की नींव पर टिकी एक विरासत की कहानी है।

‘हम सौभाग्यशाली हैं, हमें ये महान अवसर को देखने को मिला’ : RSS के शताब्दी वर्ष पर PM मोदी ने दी शुभकामनाएँ, बोले- विकसित भारत में संघ का होगा योगदान

100 वर्ष पूर्व विजयदशमी के महापर्व पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना हुई थी। ये हजारों वर्षों से चली आ रही उस परंपरा का पुनर्स्थापन था, जिसमें राष्ट्र चेतना समय-समय पर उस युग की चुनौतियों का सामना करने के लिए, नए-नए अवतारों में प्रकट होती है। इस युग में संघ उसी अनादि राष्ट्र चेतना का पुण्य अवतार है। ये हमारी पीढ़ी के स्वयंसेवकों का सौभाग्य है कि हमें संघ के शताब्दी वर्ष जैसा महान अवसर देखने मिल रहा है।

मैं इस अवसर पर राष्ट्रसेवा के संकल्प को समर्पित कोटि-कोटि स्वयंसेवकों को शुभकामनाएँ देता हूँ। मैं संघ के संस्थापक, हम सभी के आदर्श…परम पूज्य डॉक्टर हेडगेवार जी के चरणों में श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। संघ की 100 वर्षों की इस गौरवमयी यात्रा की स्मृति में भारत सरकार ने विशेष डाक टिकट और स्मृति सिक्के भी जारी किए हैं।

जिस तरह विशाल नदियों के किनारे मानव सभ्यताएँ पनपती हैं, उसी तरह संघ के किनारे भी सैकड़ों जीवन पुष्पित-पल्लवित हुए हैं। जैसे एक नदी जिन रास्तों से बहती हैं, उन क्षेत्रों को अपने जल से समृद्ध करती हैं, वैसे ही संघ ने इस देश के हर क्षेत्र, समाज के हर आयाम को स्पर्श किया है। जिस तरह एक नदी कई धाराओं में ख़ुद को प्रकट करती है, संघ की यात्रा भी ऐसी ही है। संघ के अलग-अलग संगठन भी जीवन के हर पक्ष से जुड़कर राष्ट्र की सेवा करते हैं।

शिक्षा, कृषि, समाज कल्याण, आदिवासी कल्याण, महिला सशक्तिकरण, समाज जीवन के ऐसे कई क्षेत्रों में संघ निरंतर कार्य करता रहा है। विविध क्षेत्र में काम करने वाले हर संगठन का उद्देश्य एक ही है, भाव एक ही है….राष्ट्र प्रथम।

अपने गठन के बाद से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्र निर्माण का विराट उद्देश्य लेकर चला। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए संघ ने व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण रास्ता चुना और इस चलने के लिए जो कार्यपद्धति चुनी वो थी नित्य-नियमित चलने वाली शाखाएँ। संघ शाखा का मैदान, एक ऐसी प्रेरणा भूमि है, जहां से स्वयंसेवक की अहम् से वयं की यात्रा शुरू होती है। संघ की शाखाएँ…व्यक्ति निर्माण की यज्ञवेदी हैं।

राष्ट्र निर्माण का महान उद्देश्य, व्यक्ति निर्माण का स्पष्ट पथ और शाखा जैसी सरल, जीवंत कार्यपद्धति यही संघ की सौ वर्षों की यात्रा का आधार बने। इन्हीं स्तंभों पर खड़े होकर संघ ने लाखों स्वयंसेवकों को गढ़ा, जो विभिन्न क्षेत्रों में देश को आगे बढ़ा रहे हैं।

संघ जब से अस्तित्व में आया…संघ के लिए देश की प्राथमिकता ही उसकी अपनी प्राथमिकता रही। आज़ादी की लड़ाई के समय परम पूज्य डॉक्टर हेडगेवार जी समेत अनेक कार्यकर्ताओं ने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया, डॉक्टर साहब कई बार जेल तक गए। आजादी की लड़ाई में कितने ही स्वतन्त्रता सेनानियों को संघ संरक्षण देता रहा…उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करता रहा।

आजादी के बाद भी संघ निरंतर राष्ट्र साधना में लगा रहा। इस यात्रा में संघ के खिलाफ साजिशें भी हुईं, संघ को कुचलने का प्रयास भी हुआ। ऋषितुल्य परम पूज्य गुरु जी को झूठे केस में फँसाया गया। लेकिन संघ के स्वयंसेवकों ने कभी कटुता को स्थान नहीं दिया। क्योंकि वो जानते है, हम समाज से अलग नहीं हैं, समाज हमसे ही तो बना है। समाज के साथ एकात्मता और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति आस्था ने संघ के स्वयंसेवकों को हर संकट में स्थित प्रज्ञ रखा है…समाज के प्रति संवेदनशील बनाए रखा है।

प्रारंभ से संघ… राष्ट्रभक्ति और सेवा का पर्याय रहा है। जब विभाजन की पीड़ा ने लाखों परिवारों को बेघर कर दिया, तब स्वयंसेवकों ने शरणार्थियों की सेवा की। हर आपदा में संघ के स्वयंसेवक अपने सीमित संसाधनों के साथ सबसे आगे खड़े रहते रहे। यह केवल राहत नहीं थी, यह राष्ट्र की आत्मा को संबल देने का कार्य था। खुद कष्ट उठाकर दूसरों के दुख हरना…ये हर स्वयंसेवक की पहचान है। आज भी प्राकृतिक आपदा में हर जगह स्वयंसेवक सबसे पहले पहुंचने वालों में से एक रहते हैं।

अपनी 100 वर्षों की इस यात्रा में, संघ ने समाज के अलग-अलग वर्गों में आत्मबोध जगाया…स्वाभिमान जगाया। संघ देश के उन क्षेत्रों में भी कार्य करता रहा है..जो दुर्गम हैं…जहाँ पहुँचना सबसे कठिन है। संघ…दशकों से आदिवासी परंपराओं, आदिवासी रीति-रिवाज, आदिवासी मूल्यों को सहेजने-संवारने में अपना सहयोग देता रहा है…अपना कर्तव्य निभा रहा है। आज सेवा भारती…विद्या भारती, एकल विद्यालय…वनवासी कल्याण आश्रम…आदिवासी समाज के सशक्तिकरण का स्तंभ बनकर उभरे हैं।

समाज में सदियों से घर कर चुकी जो बीमारियाँ हैं, जो ऊँच-नीच की भावना है, जो कुप्रथाएँ हैं, ये हिन्दू समाज की बहुत बड़ी चुनौती रही हैं। ये एक ऐसी गंभीर चिंता है, जिस पर संघ लगातार काम करता रहा है। डॉक्टर साहब से लेकर आज तक, संघ की हर महान विभूति ने, हर सर-संघचालक ने भेदभाव और छुआछूत के खिलाफ लड़ाई लड़ी है।

परम पूज्य गुरु जी ने निरंतर ‘न हिन्दू पतितो भवेत्’ की भावना को आगे बढ़ाया। पूज्य बाला साहब देवरस जी कहते थे- छुआछूत अगर पाप नहीं, तो दुनिया में कोई पाप नहीं! सरसंघचालक रहते हुए पूज्य रज्जू भैया जी और पूज्य सुदर्शन जी ने भी इसी भावना को आगे बढ़ाया। वर्तमान सरसंघचालक आदरणीय मोहन भागवत जी ने भी समरसता के लिए समाज के सामने एक कुआं, एक मंदिर और एक श्मशान का स्पष्ट लक्ष्य रखा है।

जब 100 साल पहले संघ अस्तित्व में आया था तो उस समय की आवश्यकताएँ, उस समय के संघर्ष कुछ और थे। लेकिन आज 100 वर्षों बाद जब भारत विकसित होने की तरफ बढ़ रहा है तब आज के समय की चुनौतियाँ अलग हैं, संघर्ष अलग हैं। दूसरे देशों पर आर्थिक निर्भरता, हमारी एकता को तोड़ने की साजिशें, डेमोग्राफी में बदलाव के षड़यंत्र, हमारी सरकार इन चुनौतियों से तेजी से निपट रही है। मुझे ये खुशी है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी इन चुनौतियों से निपटने के लिए ठोस रोडमैप भी बनाया है।

संघ के पंच परिवर्तन, स्व बोध, सामाजिक समरसता, कुटुम्ब प्रबोधन, नागरिक शिष्टाचार और पर्यावरण ये संकल्प हर स्वयंसेवक के लिए देश के समक्ष उपस्थित चुनौतियों को परास्त करने की बहुत बड़ी प्रेरणा हैं।

स्व बोध की भावना का उद्देश्य गुलामी की मानसिकता से मुक्त होकर अपनी विरासत पर गर्व और स्वदेशी के मूल संकल्प को आगे बढ़ाना है। सामाजिक समरसता के जरिए वंचित को वरीयता देकर सामाजिक न्याय की स्थापना का प्रण है। आज हमारी सामाजिक समरसता को घुसपैठियों के कारण डेमोग्राफी में आ रहे बदलाव से भी बड़ी चुनौती मिल रही है। देश ने भी इससे निपटने के लिए डेमोग्राफी मिशन की घोषणा की है। हमें कुटुम्ब प्रबोधन यानी परिवार संस्कृति और मूल्यों को भी मजबूत बनाना है। नागरिक शिष्टाचार के जरिए नागरिक कर्तव्य का बोध हर देशवासी में भरना है। इन सबके साथ अपने पर्यावरण की रक्षा करते हुये आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करना है।

अपने इन संकल्पों को लेकर संघ अब अगली शताब्दी की यात्रा शुरू कर रहा है। 2047 के विकसित भारत में संघ का हर योगदान, देश की ऊर्जा बढ़ाएगा, देश को प्रेरित करेगा। पुन: प्रत्येक स्वयंसेवक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

Wikipedia के दबदबे को ध्वस्त करने की तैयारी में एलन मस्क, लाएँगे Grokipedia: क्या वामपंथी प्रोपेगेंडा को खत्म कर पाएगा नया ऑनलाइन इनसाइक्लोपीडिया

दुनिया के सबसे अमीर शख्स एलन मस्क ने ऑनलाइन इनसाइक्लोपीडिया ‘विकिपीडिया’ (Wikipedia) के दबदबे को ध्वस्त करने की तैयारी शुरू कर दी है। वामपंथी प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए कुख्यात विकिपीडिया को टक्कर देने के लिए मस्क ‘ग्रोकिपीडिया’ (Grokipedia) बनाने जा रहे हैं। यह मस्क की कंपनी एक्सएआई (xAI) द्वारा विकसित किया जाएगा।

xAI के संस्थापक मस्क ने घोषणा की है कि यह एक ओपन-सोर्स ज्ञान का भंडार होगा जो विकिपीडिया का विकल्प बनने की दिशा में काम करेगा। मस्क ने कहा है कि यह विकिपीडिया से बेहतर होगा और इसके इस्तेमाल के लिए कोई लिमिट नहीं होगी। मस्क ने लोगों से xAI से जुड़कर ग्रोकिपीडिया बनाने में मदद करने की अपील भी की है।

एलन मस्क ने अपने एक्स (पूर्व ट्विटर) पोस्ट में कहा, “हम ग्रोकिपीडिया बना रहे हैं। यह विकिपीडिया से बहुत बड़ा सुधार होगा। वास्तव में, यह एक्सएआई के ब्रह्मांड को समझने के लक्ष्य की दिशा में एक आवश्यक कदम है।”

इससे पहले मस्क ने विकिपीडिया को अपना नाम बदलने के लिए $1 बिलियन की पेशकश की थी। मस्क ने बुधवार को इससे जुड़ा एक पोस्ट भी रिपोस्ट किया है, जिसमें लिखा है, “विकिपीडिया को एलन मस्क से 1 बिलियन डॉलर का प्रस्ताव स्वीकार कर लेना चाहिए था, अब बहुत देर हो चुकी है, प्रतिद्वंद्वी आ रहा है- ग्रोकिपीडिया!”

मस्क द्वारा यह घोषणा 30 सितंबर 2025 को की गई, जब मस्क ने डेविड सैक्स के एक पोस्ट का जवाब दिया, जिसमें विकिपीडिया की पूर्वाग्रही होने की आलोचना की गई थी।

कैसे काम करेगा ग्रोकिपीडिया?

शुरुआती जानकारी के मुताबिक, एक्सएआई की टीम द्वारा विकसित किया जाएगा, जिसमें एआई विशेषज्ञ और डेवलपर्स शामिल होंगे। मस्क ने लोगों को आमंत्रित किया है। यह ओपन-सोर्स होगा, अर्थात इसका कोड और सामग्री सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होगी, जिससे कोई भी व्यक्ति इसमें सुधार कर सकेगा।

मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि नवंबर 2023 में लॉन्च किया गया ग्रोक नामक एआई चैटबॉट इस प्लेटफॉर्म का मुख्य इंजन होगा। ग्रोकिपीडिया में एआई का उपयोग जानकारी को सत्यापित करने, गलतियों को सुधारने और रीयल-टाइम अपडेट्स देने के लिए किया जाएगा। साथ ही, एक्स प्लेटफॉर्म से प्राप्त रीयल-टाइम डेटा का उपयोग करके यह सुनिश्चित किया जाएगा कि जानकारी हमेशा अपडेट रहे।

मस्क के मुताबिक, ग्रोकिपीडिया का लक्ष्य विकिपीडिया की तुलना में अधिक सटीक, पारदर्शी और विविध जानकारी लोगों तक पहुँचाना है। मस्क लंबे समय से विकिपीडिया की आलोचना करते रहे हैं। अक्टूबर 2024 में उन्होंने X पर ही एक पोस्ट किया था कि विकिपीडिया पर अति-वामपंथी एक्टिविस्ट्स का नियंत्रण है। मस्क ने लिखा था, “लोगों को उन्हें दान देना बंद कर देना चाहिए।”

विकिपीडिया का एंटी हिंदू और वामपंथ प्रेमी प्रोपेगेंडा

Wikimedia Foundation बेशक यह दावा करता रहा हो कि विकिपीडिया एक स्वतंत्र, संपादकीय हस्तक्षेप-रहित विश्वकोश है लेकिन हकीकत इससे अलग है। वामपंथियों की टूलकिट बने विकिपीडिया का खुलासा करते हुए ऑपइंडिया ने 186 पन्नों का डोजियर तैयार किया था।

विकिपीडिया में असामान्य शक्ति वाले संपादक और प्रशासक सुनिश्चित करते हैं कि ‘दक्षिणपंथी’ (गैर-वामपंथी) स्रोतों को खारिज या ब्लैकलिस्ट कर दिया जाए। मस्क या ऑपइंडिया छोड़िए खुद Wikipedia के सह-संस्थापक लैरी सेंगर भी यह साफ-साफ कह चुके हैं कि विकिपीडिया में स्पष्ट वामपंथी पूर्वाग्रह है।

हमारे शोध में सामने आया कि खुद को ओपन सोर्स बताना का दावा करने वाले विकिपीडिया की संरचना स्वयं कुछ व्यक्तियों को पूर्ण शक्ति देती है जिन्हें ‘प्रशासक’ कहा जाता है। पूरे विश्व में केवल 435 सक्रिय प्रशासक हैं जिनके पास संपादकों को प्रतिबंधित करने, स्रोतों को ब्लैकलिस्ट करने, योगदानकर्ताओं को प्रतिबंधित करने और लेखों पर संपादन करने या पलटने का अधिकार है।

नवंबर 2024 में मोदी सरकार ने भी विकिपीडिया को नोटिस भेजकर इस पर प्रकाशित भ्रामक और पक्षपाती जानकारी पर सवाल पूछे थे। सूचना और प्रसारण मंत्रालय (I&B) द्वारा जारी इस नोटिस में जिक्र किया गया था कि किस तरह विकिपीडिया की सामग्री पर एक छोटे समूह के संपादकों का नियंत्रण है, जो इसमें हेरफेर करने में सक्षम होते हैं और एकपक्षीय जानकारियाँ उपलब्ध कराते हैं।

Wikimedia Foundation की पूर्व CEO कैथरीन माहेर ने अगस्त 2021 में एक TED टॉक में अनजाने में यह खुलासा किया कि विकिपीडिया के माध्यम से फैलाई गई जानकारी सत्य पर आधारित नहीं होती।

कैथरीन माहेर ने अपने TED टॉक और अन्य सार्वजनिक भाषणों में स्पष्ट किया कि विकिपीडिया पर लिखने वाले लेखक ‘सत्य’ पर ध्यान केंद्रित नहीं करते। उन्होंने कहा, “जो लोग इन लेखों को लिखते हैं, वे सत्य पर नहीं, बल्कि वर्तमान समय में जो सबसे अच्छा संभव ज्ञान है, उस पर ध्यान केंद्रित करते हैं।”

विकिपीडिया के हिंदू विरोध को कुछ उदाहरणों से समझें तो इसने ऐसे कंटेंट को बढ़ावा दिया जिसे संभल के मुस्लिम पत्थरबाजों को बचाने की कोशिश हुई और ‘जय श्रीराम’ के नारों को हिंसा के लिए ठहराया जिम्मेदार गया।

इसके अलावा विकिपीडिया ने छत्रपति संभाजी महाराज पर विवादित कंटेंट हटाने से मना कर दिया था। साथ ही, RSS के विकिपीडिया पेज से छेड़छाड़ कर उसे इस्लामी यूजर द्वारा ‘हिंदू आतंकी संगठन’ लिखे जाने का केस भी सामने आया है। हाल ही काे उदाहरण को देखें तो विकिपीडिया में वामपंथी एडिटर ‘द बंगाल फाइल्स’ को ‘प्रोपेगेंडा’ फिल्म बताने पर तुले नजर आए थे।

विकिपीडिया की फंडिंग पर भी हैं सवाल

Wikimedia Foundation का वित्तीय जुड़ाव Tides Foundation से है, जिस पर अमेरिका में हमास समर्थक प्रदर्शनों और जॉर्ज सोरोस से जुड़े संगठनों को फंड देने के आरोप हैं। ये दोनों मिलकर कई ऐसे समूहों को सहायता देते हैं जो भारत विरोधी एजेंडा चलाते हैं। इनमें Hindus for Human Rights, Equality Labs, Art+Feminism, Access Now और हिंडेनबर्ग जैसे संगठन शामिल हैं।

2019 से Wikimedia Foundation की भारत में कोई औपचारिक मौजूदगी नहीं है, फिर भी यह भारत से भारी डोनेशन लेता है और उन्हें उन एनजीओ तक पहुँचाता है जो उसके व्यावसायिक और भारत-विरोधी हितों को मजबूत करते हैं।

विकिपीडिया के एकछत्र और एक आयामी राज को खत्म कर एलन मस्क की यह पहल एक ऑनलाइन विश्वकोश से आगे बढ़कर सूचना की दिशा में एक क्रांतिकारी बदलाव बन सकती है। विकिपीडिया जैसे प्लेटफॉर्म पर जो पक्षपात, अधूरी जानकारी और विवादास्पद संदर्भ होने की समस्याओं के उल्ट ग्रोकिपीडिया पारदर्शी और भरोसेमंद ऑनलाइन इनसाइक्लोपीडिया बन सकता है।