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‘बेटे ने बेसबॉल बैट से की TV अभिनेत्री वीणा कपूर की हत्या’ – मीडिया ने इस खबर को चलाया, अब वही हिरोइन जिंदा हो थाने पहुँचीं

टीवी और फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री वीणा कपूर की हत्या कर दी गई है। यह हत्या किसी और ने नहीं बल्कि वीणा कपूर (74 साल) के बेटे ने ही की है। – यह खबर मीडिया में चलाई गई। नई जानकारी के अनुसार यह खबर फर्जी निकली और एकसमान नाम होने के कारण मीडिया रिपोर्टिंग में गलती हुई।

इस मामले पर अभिनेत्री वीणा कपूर ने खुद समाने आकर कंफ्यूजन दूर किया है। उनके अनुसार किसी और वीणा कपूर की हत्या हुई है, जो अपने बेटे के साथ रहती थीं और ये भी (अभिनेत्री वीणा कपूर) अपने बेटे के साथ ही रहती हैं। इस कंफ्यूजन के कारण ही मीडिया रिपोर्टिंग में गड़बड़ी हुई।

पहले के मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जो खबर हमने पब्लिश की थी, उसे आप नीचे पढ़ सकते हैं।

वीणा कपूर की हत्या करने वाले बेटे का नाम सचिन कपूर है। कहा जा रहा है कि करोड़ों रुपए के फ्लैट को लेकर सचिन का उसकी माँ के साथ विवाद चल रहा था। जब वीणा कपूर ने बेटे की बात नहीं मानी, तो उसने उन्हें जान से मार डाला।

पुलिस के तरफ से दी गई जानकारी के मुताबिक वीणा कपूर के छोटे बेटे सचिन कपूर (43 साल) ने उनकी हत्या उसी फ्लैट में की जिसको लेकर विवाद चल रहा था। फ्लैट की कीमत 12 करोड़ बताई जा रही है। पुलिस के मुताबिक हत्यारे बेटे ने स्वीकार किया है कि उसने गुस्से में आकर अपनी माँ के सिर पर बेसबॉल बैट से हमला किया। हत्या करने के बाद आरोपित बेटे ने अपनी माँ की लाश को एक कार्टन में पैक किया और 90 किलोमीटर दूर रायगढ़ जिले के पास नदी में फेंक दिया। इस काम में हत्यारे बेटे ने घर के नौकर की सहायता भी ली थी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, वीणा कपूर का छोटा बेटा सचिन इन दिनों कोई काम नहीं कर रहा था। इसलिए वह अपनी माँ के पास जुहू के एक सोसाइटी में शिफ्ट हो गया था। अभिनेत्री का बड़ा बेटा यूएस में रहता है। बड़े बेटे को कॉल पर जवाब न मिलने के बाद उसे अपनी माँ की फिक्र हुई। इसके बाद उसने वॉचमैन को घर भेजकर माँ का हाल जानना चाहा। जब माँ की कोई जानकारी नहीं मिली तो उसने पुलिस को सूचना दी और माँ के गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवा दी।

पुलिस की जाँच के दौरान सच निकलकर सामने आ गया। पुलिस का कहना है कि सचिन ने हत्या की बात स्वीकार कर ली है।

अभिनेत्री की हत्या की खबर मिलने के बाद बॉलीवुड अभिनेत्री नीलू कोहली ने पोस्ट कर दुख जताया। अपने इंस्टाग्राम पर पोस्ट शेयर करते हुए नीलू कोहली ने लिखा- “वीणा जी आप इससे बेहतर डिजर्व करती थीं, मेरा दिल टूट गया है, आपके लिए यह लिखना, मैं क्या बोलूँ, आज मैं निशब्द हूँ, इतने साल के स्ट्रगल के बाद मैं उम्मीद करती हूँ कि आपको आखिरकार शांति मिली होगी।”

अपडेट: ऑपइंडिया ने भी मीडिया रिपोर्ट और बॉलीवुड अभिनेत्री नीलू कोहली के सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर टीवी और फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री वीणा कपूर की हत्या वाली खबर पब्लिश की थी। अब इस खबर को नई जानकारी के साथ अपडेट कर दिया गया है।

CM योगी पर टिप्पणी कर के फरार हुआ सपा नेता, अब यूपी पुलिस कुर्क करेगी संपत्ति: घर पर चस्पाया नोटिस, बेटी बोली – हमें प्रताड़ित किया जा रहा

योगी आदित्यनाथ पर अभद्र टिप्पणी करने के मामले में उत्तर प्रदेश की लखनऊ पुलिस ने फरार चल रहे सपा नेता अनुराग भदौरिया पर बड़ी कार्रवाई की है। हजरतगंज थाने की पुलिस ने उनके घर पर नोटिस चस्पा की है। इस नोटिस में एक तय समय दिया गया है। यह नोटिस शुक्रवार (9 दिसंबर 2022) को चस्पा हुई है।

नोटिस पर पेश होने की अंतिम तारीख 7 जनवरी 2023 पड़ी हुई है। मीडिया रिपोर्ट्स में मुताबिक, यदि तय सीमा के अंदर भदौरिया पेश नहीं हुए तो नोटिस पर कार्रवाई करते हुए उनकी संपत्ति कुर्क कर ली जाएगी। अनुराग भदौरिया की सास सुशीला सरोज ने पुलिस पर अपने परिवार को प्रताड़ित करने का आरोप लगाया है। सुशीला सरोज के मुताबिक, जिस घर पर नोटिस चस्पाई गई है वो घर अनुराग का है ही नहीं। उन्होंने आगे बताया कि नोटिस चिपकाने के पहले पुलिस ने उनसे बात तक नहीं की।

सुशीला सरोज ने अनुराग भदौरिया की तरफ से माफ़ी माँगते हुए खुद को भी गोरखपुर की बेटी बताया है। उन्होंने कहा कि उनका घर गोरखपुर मठ से बस 15 किलोमीर दूर है। पूर्वांचल के लोगों की अक्सर फिसलने की भी चर्चा सुशीला सरोज ने की। उन्होंने अपने दामाद को समाजवादी पार्टी का मेंबर होने के नाते परेशान करने का आरोप लगाया। अंत में अनुराग भदौरिया की सास ने न्याय न मिलने कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की बात कही है।

पुलिस द्वारा चस्पा की गई नोटिस में अनुराग पर FIR संख्या 395/22 के तहत IPC की धारा 153- A, 295- A, 298, 504 और 505 (2) का जिक्र है। यह नोटिस लखनऊ के इंदिरा नगर क्षेत्र के A ब्लॉक वाले मकान पर चस्पा हुई है। नोटिस में चीफ जुडिशियल मजिस्ट्रेट लखनऊ की मुहर भी लगी हुई है। चस्पा हुई नोटिस में यह भी बताया गया है कि पहले भेजी गई नोटिसों को अनुराग भदौरिया द्वारा रिसीव नहीं किया गया जिसके चलते यह कार्रवाई एक विकल्प के तौर पर की गई है।

अनुराग भदौरिया पर एक TV डिबेट के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनके दिवंगत गुरु महंत अवैद्यनाथ पर अपमानजनक टिप्पणी का आरोप है। यह केस एक भाजपा नेता की शिकायत पर दर्ज हुआ है।

देश में लोकतंत्र, लेकिन जनता को ‘कॉलेजियम सिस्टम’ के बारे में जानने का अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट के अड़ियल रुख से न्यायपालिका में खत्म हो जाएगी लोगों की आस्था

सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम सिस्टम (Supreme Court Collegium System) को लेकर केंद्र की मोदी सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच तल्खी बढ़ती जा रही है। एक तरफ सुप्रीम कोर्ट स्वघोषित ‘कॉलेजियम सिस्टम’ को ‘लॉ ऑफ लैंड’ बता रहा है तो दूसरी तरफ इसके बारे में देश की जनता को जानकारी देने से भी मना कर रहा है। इतना ही नहीं इसमें भाई-भतीजावाद और जातिवाद का ऐसा मिश्रण है कि न्यायिक क्षेत्र में इसे ‘अंकल कल्चर’ कहा जाने लगा है।

अन्य क्षेत्रों की तरह केंद्र की मोदी सरकार ने इसमें आवश्यक सुधार करने की कोशिश की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने खुद को सर्वोच्च ऑथरिटी बताते हुए संसद में बने इस कानून को ही खारिज कर दिया। इसके कारण देश की जनता में पहले से ही बैठी आशंका और मजबूत हो गई कि सुप्रीम कोर्ट आखिर कॉलेजियम में पारदर्शिता तक क्यों नहीं लाना चाहता है।

कॉलेजियम से संबंधित एक याचिका की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एमआर शाह और सीटी रविकुमार की पीठ ने हाल ही में कहा कि कॉलेजियम में क्या चर्चा होती है और किस आधार पर होती है, इसकी भी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती है। 9 दिसंबर 2022 को याचिका खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सूचना के अधिकार (RTI) कानून के तहत केवल अंतिम फैसले ही सार्वजनिक किए जा सकते हैं, न कि कॉलेजियम की बैठकों की चर्चा और जजों की नियुक्ति से संबंधित प्रक्रिया।

जिस व्यवस्था पर देश की जनता को सबसे अधिक भरोसा है, उसमें क्या हो रहा है और कैसे हो रहा है, इसकी जानकारी ही नहीं दी जा रही है। कॉलेजियम सिस्टम को लेकर सोशल मीडिया पर लोग अपनी-अपनी बातें रख रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट के इस रूख का विरोध कर रहे हैं। लोग तो यहाँ तक कह रहे हैं कि यह राजनीतिक तानाशाही और सैन्य तानाशाही की तरह ही यह एक तरह की न्यायिक तानाशाही है।

देश में जब राजतंत्र था, तब कोई भी व्यक्ति अपना मुद्दा लेकर राजदरबार में पहुँच सकता था और अपनी समस्या कह सकता था। हालाँकि, अब जबकि देश में लोकतंत्र है, तब न्यायिक व्यवस्था में पारदर्शिता लाने में सुप्रीम कोर्ट द्वारा कोई ठोस कदम उठाते हुए नहीं दिख रहा है। इसके कारण आधुनिक भारत की यह न्याय प्रणाली प्राचीन न्याय प्रणाली से भी पिछड़ती हुई दिख रही है।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एस अब्दुल नजीर ने दिसंबर 2021 में प्राचीन भारतीय न्याय प्रणाली की प्रशंसा की थी। उन्होंने कहा था कि भारत की प्राचीन कानूनी व्यवस्था में राजा को भी कानून के सामने झुकना पड़ता था। उनके परिजनों या यहाँ तक कि राजा के खिलाफ भी न्याय की माँग की जा सकती थी।

उन्होंने कहा था कि प्राचीन भारतीय न्याय व्यवस्था में न्याय माँगने की बात निहित थी, लेकिन इसके उलट ब्रिटिश न्याय व्यवस्था में न्याय की गुहार की जाती है, न्याय के लिए प्रार्थना की जाती है और जजों को ‘लॉर्डशिप’ या ‘लेडीशिप’ कहा जाता है। न्यायाधीश ने कहा कि न्याय कोई अनुग्रह नहीं है, यह जनता का अधिकार है और इसका सम्मान होना चाहिए।

क्या है कॉलेजियम सिस्टम

कॉलेजियम सिस्टम सुप्रीम कोर्ट द्वारा खुद से विकसित किया हुआ एक सिस्टम है, जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति की जाती है। यह नियुक्ति फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के पाँच वरिष्ठ जजों की अनुशंसा पर ही की जाती है। हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति भी कॉलेजियम की सलाह पर होती है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, संबंधित हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस और उस राज्य के राज्यपाल शामिल होते हैं।

कॉलेजियम सिस्टम कोई संवैधानिक अवधारणा नहीं है, बल्कि यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने तीन फैसलों के आधार पर विकसित किया गया है। इसे ‘जजेस केस’ के नाम से जाना जाता है। पहला केस 1981, दूसरा 1993 और तीसरा 1998 के केस से जुड़ा है।

1981 के पहले केस को एसपी गुप्ता केस के नाम से भी जाना जाता है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जजों की नियुक्ति के लिए चीफ़ जस्टिस के पास एकाधिकार नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें सरकार की भी भूमिका होनी चाहिए। 1993 में दूसरे केस में 9 जजों की एक बेंच ने कहा कि जजों की नियुक्तियों में मुख्य न्यायाधीश की ‘राय’ को बाकी लोगों की राय के ऊपर तरजीह दी जाए। इस तरह 1998 के तीसरे केस में सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम का आकार बड़ा करते हुए इसे पाँच जजों का एक समूह बना दिया।

इन तीन केसों के आधार पर कॉलेजियम सिस्टम को विकसित किया गया और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के साथ-साथ चार अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों की राय को अनिवार्य बना दिया गया। इनकी राय के बिना सुप्रीम कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में किसी भी न्यायाधीश की नियुक्ति नहीं की जा सकती।

जजों की नियुक्ति को लेकर क्या कहता है संविधान

सारा काम इसी ‘राय’ को ‘सहमति’ बनाने को लेकर है। संविधान में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के वरिष्ठ जजों से विचार-विमर्श करके ही राष्ट्रपति करेंगे। संविधान के अनुच्छेद 124 में सुप्रीम कोर्ट और उसमें जजों की नियुक्ति और अनुच्छेद 217 में हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति से संबंधित प्रावधान है।

संविधान के अनुच्छेद 217 में कहा गया है कि राष्ट्रपति हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश, राज्य के राज्यपाल और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से विचार-विमर्श करने के बाद निर्णय लेंगे।

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने ‘जजेज केसेस’ में संविधान में उल्लेखित शब्द ‘कंसल्टेशन’ की व्याख्या करके ‘सहमति’ कर दी। यानी विचार-विमर्श को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की ‘सहमति’ के रूप में संदर्भित कर दिया।

मोदी सरकार का न्यायिक सुधार और सुप्रीम कोर्ट का अड़ंगा

साल 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद अन्य क्षेत्रों की तरह न्यायिक क्षेत्रों में भी सुधार करने की कोशिश की। मोदी सरकार ने साल 2014 में संविधान में 99वाँ संशोधन करके नेशनल ज्यूडिशियल अप्वाइंटमेंट कमीशन (NJAC) अधिनियम लेकर आई। इसमें सरकार ने कॉलेजियम की जगह जजों की नियुक्ति के लिए NJAC के प्रावधानों को शामिल किया था।

NJAC में 6 सदस्यों का प्रावधान किया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठ जज, केंद्रीय कानून मंत्री और दो अन्य विशेषज्ञ शामिल हैं। इन दो विशेषज्ञों का चयन प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मिलकर करेंगे। इसमें यह भी प्रावधान है कि ये दो विशेषज्ञ हर तीन साल पर बदलते रहेंगे।

इसके साथ ही साल 2014 में संविधान संशोधन करके केंद्र सरकार ने जजों की नियुक्ति के मामले में बड़ा बदलाव किया। इस संशोधन में संसद को यह अधिकार दिया गया कि भविष्य में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति से जुड़े नियमों को बना सकता है और जरूरत पड़ी तो उसमें बदलाव भी कर सकता है।

केंद्र सरकार द्वारा इस कानून को बनाने के बाद साल 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्युडिशियल अप्वाइंटमेंट्स कमीशन अधिनियम को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इसे ‘संविधान के आधारभूत ढाँचे से छेड़छाड़’ बताते हुए रद्द कर दिया। बता दें कि संविधान में सुप्रीम कोर्ट को मौलिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में बताया गया है, जबकि देश में कानून बनाने का अधिकार सरकार और संसद के पास ही है।

कॉलेजियम पर भाई-भतीजावाद और गुटबाजी का आरोप

कॉलेजियम सिस्टम पर जजों की नियुक्ति के मामले में अक्सर भाई-भतीजावाद का आरोप लगता है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में भयानक भाई-भतीजावाद और जातिवाद का आरोप लगता है। इतना ही नहीं इस प्रक्रिया में गुटबाजी के कारण केसों के प्रभावित होने के आरोप लगते हैं।

न्यायपालिका में ‘अंकल कल्चर’ कहते है। इसके तहत अधिकांश ऐसे जजों को ही चुना जाता है, जिनके परिवार से कोई जज रह चुका होता है या जिनकी न्यायपालिका में ऊँचे पदों पर जान-पहचान है। कहा जाता है कि देश की न्यायिक व्यवस्था सिर्फ 300 परिवारों के इर्द-गिर्द घुमती है।

यह भी कहा जाता है कि कॉलेजियम सिस्टम के कारण जजों के बीच आपसी पॉलिटिक्स और गुटबाजी होती रहती है। इसके कारण जज फैसला लिखने से ज्यादा ध्यान इस बात पर लगाते हैं कि कौन जज बने। इससे न्यायिक व्यवस्था प्रभावित होती है। बताते चलें कि इस समय देश में लगभग 5 करोड़ केस विभिन्न न्यायालयों में पेंडिंग हैं।

कानून मंत्री कॉलेजिम सिस्टम पर वार

सरकार के इस कानून को नकारने के बाद सुप्रीम कोर्ट और केंद्र के बीच तानातानी बढ़ गई। केंद्रीय कानून और न्याय मंत्री किरेन रिजिजू ने अक्टूबर 2022 को कहा कि देश के लोग कॉलेजियम सिस्टम से खुश नहीं हैं और संविधान की भावना के मुताबिक जजों की नियुक्ति करना सरकार का काम है। केंद्र ने तो यहाँ तक कह दिया कि जज इस सिस्टम के जरिए अधिकतर समय राजनीति और गुटबाजी में व्यस्त रहते हैं।

उन्होंने कहा था कि आधे समय न्यायाधीश नियुक्तियों को तय करने में व्यस्त होते हैं, जिसके कारण उनका जो प्राथमिक काम न्याय प्रदान करना होता है, वह प्रभावित होता है। उन्होंने कहा कि संविधान में पूरी तरह स्पष्टता है कि भारत के राष्ट्रपति न्यायाधीशों की नियुक्ति करेंगे। इसका मतलब है कि कानून मंत्रालय भारत के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से न्यायाधीशों की नियुक्ति करेगा। 

25 नवंबर 2022 को केंद्रीय क़ानून मंत्री किरेन रिजिजू ने कॉलेजियम द्वारा जजों की नियुक्ति को ‘संविधान से परे’ और एलियन बता दिया। उन्होंने कहा कि कॉलेजियम प्रणाली में कई खामियाँ हैं और लोग आवाज उठा रहे हैं कि यह पारदर्शी नहीं है और ना ही इसमें जवाबदेही है। 

किरेन रिजीजू ने कहा, “भारत का संविधान जनता और सरकार के लिए ‘धार्मिक दस्तावेज’ है। कोई चीज जो संविधान से अलग है, उसे सिर्फ अदालत के कुछ जजों ने तय किए जाने के कारण आप कैसे माना सकता है कि उसका पूरा देश समर्थन करता है। आप बताएँ कि कॉलेजियम प्रणाली किस प्रावधान के तहत निर्धारित की गई है।”

केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने आगे कहा कि जिस प्रकार मीडिया पर निगरानी के लिए भारतीय प्रेस परिषद है, उसी प्रकार न्यायपालिका पर निगरानी की भी व्यवस्था होनी चाहिए। लोकतंत्र में कार्यपालिका और विधायिका पर निगरानी की व्यवस्था मौजूद है, लेकिन न्यायपालिका के भीतर ऐसा कोई तंत्र नहीं है।

उन्होंने कहा, “हमारे कार्यपालिका और विधायिका अपने दायरे में बिल्कुल बँधे हुए हैं। अगर वे इधर-उधर भटकते हैं तो न्यायपालिका उन्हें सुधारती है। समस्या यह है कि जब न्यायपालिका भटकती है तो उसको सुधारने का व्यवस्था नहीं है।” उन्होंने कहा था कि अगर न्यायपालिका यह काम खुद करे तो अच्छा है।

उप-राष्ट्रपति की कॉलेजियम और सुप्रीम कोर्ट पर तल्ख टिप्पणी

उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ भी कॉलेजियम सिस्टम पर चिंता जता चुके हैं। दिसंबर 2022 में उपराष्ट्रपति ने कहा कि संसद द्वारा बनाए गए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) अधिनियम को सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द करना एक गंभीर मुद्दा है। संसद अगर कोई कानून पारित करता है तो वह लोगों की इच्छा को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कभी किया हो ऐसा उदाहरण दुनिया में कहीं देखने को नहीं मिलता।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका द्वारा एक दूसरे के क्षेत्र में कोई भी घुसपैठ, चाहे वह कितनी भी सूक्ष्म क्यों न हो, शासन की गाड़ी को अस्थिर करने की क्षमता रखती है। उन्होंने कहा था कि अधिनियम पूरी लोकसभा और राज्यसभा में एकमत से पास हुआ था। केवल एक राज्यसभा सदस्य की अनुपस्थिति थी। संसद की एकजुटता के बाद अध्यादेश एक संवैधानिक प्रावधान में बदल गया था, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने संसद की भावना यानी लोगों की भावनाओं को दरकिनार कर उसे रद्द कर दिया।

कॉलेजियम छोड़ने को तैयार नहीं सुप्रीम कोर्ट

किरेन रिजेजू और उपराष्ट्रपति के बयान के बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को लेकर और सख्त हो गया। हाल में में कोर्ट ने कहा कि जब तक कॉलेजियम सिस्टम है, उसे सरकार को मानना पड़ेगा। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा था कि अगर उसे कॉलेजियम के खिलाफ कोई कानून पास करना है तो करे, लेकिन उसकी न्यायिक समीक्षा का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के ही पास है। यह सीधे शब्दों में धमकी थी।

कोर्ट ने केंद्र सरकार से यहाँ तक कह दिया कि वह अपने मंत्रियों को कॉलेजियम के खिलाफ सार्वजनिक रूप बोलने पर रोक लगाए। 8 दिसंबर 2022 को अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमानी से कहा कि सरकार उन्हीं कानूनी सिद्धांतों के तहत काम करे, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने तय किया है। जस्टिस संजय किशन कौल ने कॉलेजियम की तुलना संसद में बनाए गए कानून से की।

‘मानवीय सहायता’ पर UN में वोटिंग, भारत ने किया किनारा: कहा – आतंकी उठाते हैं गलत फायदा

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका और आयरलैंड की ओर से लाए गए एक प्रस्ताव से भारत ने दूरी बना ली है। इस प्रस्ताव में मानवीय सहायता को संयुक्त राष्ट्र के सभी तरह के प्रतिबंधों के दायरे से बाहर रखने की बात कही गई है। भारत ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा है कि मानवीय मदद का आतंकी संगठन गलत इस्तेमाल कर सकते हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुरक्षा परिषद में अमेरिका और आयरलैंड की ओर से लाए गए प्रस्ताव में उन संगठनों को मानवीय सहायता दिए जाने की बात की गई है जिनपर यूएन ने भी प्रतिबंध लगाए हैं। यदि ऐसा होता है तो पाकिस्तान स्थित आतंकवादी समूहों लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद सहित दुनिया भर में प्रतिबंधित आतंकी संस्थाओं को मानवीय सहायता की अनुमति मिल जाएगी।

भारत ने इस प्रस्ताव पर यह कहते हुए ऐतराज जताया कि भारत के पड़ोसी देश के अलावा ब्लैकलिस्ट किए गए आतंकवादी संगठन इस तरह की छूट का फायदा फंडिंग और सदस्यों की भर्ती के लिए उठा सकते हैं। भारत को छोड़कर सभी UNSC सदस्यों ने प्रस्ताव का समर्थन किया। 15 में से 14 देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया जबकि भारत अकेला देश था जिसने प्रस्ताव का विरोध करते हुए वोटिंग से दूरी बना ली। पंद्रह सदस्यीय सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता फिलहाल भारत के पास है।

प्रस्ताव पर अमेरिका ने जोर देकर कहा कि इस प्रस्ताव को अपनाए जाने के बाद अनगिनत जिंदगियों को बचाने में मदद मिलेगी। इस प्रस्ताव में कहा गया है कि किसी मानवीय सहायता के समय पर पहुँच सुनिश्चित करने के लिए फंड और अन्य वित्तीय संपत्तियों के अलावा वस्तुओं और सेवाओं का भुगतान आवश्यक है और यह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के लगाए गए प्रतिबंध समिति और फ्रीज संपत्ति का उल्लंघन नहीं माना जाएगा।

परिषद की अध्यक्ष और यूएन में भारत की स्थायी प्रतिनिधि रुचिरा कंबोज ने प्रस्ताव पर भारत की ओर से कहा कि इस तरह की मानवीय सहायता का फायदा आतंकवादी संगठन पहले भी उठाते रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे उदाहरणों के वजह से ही प्रस्ताव को लेकर हम चिंतित हैं, कंबोज ने पाकिस्तान और उसकी सरजमीं पर मौजूद आतंकी संगठनों का भी परोक्ष रूप से जिक्र किया।

रुचिरा कंबोज ने जमात-उद-दावा का उदाहरण देते हुए कहा, “हमारे पड़ोस में आतंकवादी समूहों के कई मामले सामने आए हैं, जिनमें इस परिषद द्वारा सूचीबद्ध आतंकवादी समूह भी शामिल हैं, जिन्होंने इन प्रतिबंधों से बचने के लिए खुद को मानवीय संगठनों और नागरिक समाज समूहों के तौर पर दिखा रहे हैं। जमात-उद-दावा खुद को मानवीय सहायता वाला संगठन कहता है, लेकिन यह लश्कर-ए-तैयबा के लिए एक सहायक संगठन के तौर पर काम करता है और फंड जुटाने में मदद करता है।”

रुचिरा कंबोज ने आगे कहा, जमात और लश्कर की ओर से संचालित संस्था ‘फलाह-ए-इंसानियत फाउंडेशन’ और जैश-ए-मोहम्मद की ओर से समर्थित संगठन अल-रहमत-ट्रस्ट भी पाकिस्तान में स्थित है। ये आतंकवादी संगठन धन जुटाने और लड़ाकों की भर्ती के लिए मानवीय सहायता की छत्रछाया का उपयोग करते हैं।” रुचिरा कंबोज ने कहा, “भारत 1267 (प्रतिबंध समिति) के तहत प्रतिबंधित ऐसे संगठनों को मानवीय सहायता प्रदान करते समय जरूरी सावधानी बरतने की अपील करता है।”

इतिहास का सबसे तेज़ दोहरा शतक, 24 साल के ईशान किशन ने तोड़ा गेल का रिकॉर्ड: बांग्लादेशी गेंदबाजों हुई ऐसी पिटाई, कोहली भी करने लगे भांगड़ा

भारत के युवा क्रिकेटर ईशान किशन ने आज (10 दिसंबर 2022) बांग्लादेश के खिलाफ एकदिवसीय मैच खेलते हुए जहूर अहमद चौधरी स्टेडियम में रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बनाए। उन्होंने मात्र 126 गेंदों में दोहरा शतक जड़ा और इसी के साथ वह बन गए दुनिया में सबसे तेज डबल सेंचुरी मारने वाले क्रिकेटर। ईशान किशन ने क्रिस गेल का रिकॉर्ड तोड़कर अपना नया रिकॉर्ड बनाया है।

इससे पहले विश्व में केवल 7 खिलाड़ी क्रिकेट जगत में दोहरे शतक के लिए जाने जाते थे। इनमें तीन भारतीय हैं- सचिन तेंदुलकर, रोहित शर्मा और वीरेंद्र सहवाग। अब इसी लिस्ट में ईशान किशन का नाम जुड़ गया है। 24 साल के इस खिलाड़ी ने किस ग्रेल को पछाड़ अपने नाम ये उपलब्धि की है। गेल ने जिम्बाब्वे के खिलाफ 138 गेंदों पर यह कारनामा किया था और किशन ने 126 गेंदों में बांग्लादेश के खिलाफ।

दिलचस्प बात यह है कि सबसे तेज दोहरा शतक मारने के अलावा ईशान ने कई और रिकॉर्ड बनाए हैं। इनमें एक रिकॉर्ड बांग्लादेश की पिच पर सबसे बड़ी पारी खेलने का है। इससे पहले ऑस्ट्रेलिया के शेन वॉटसन ने वहाँ 185 रन बनाए थे। अब किशन, वॉटसन से भी ऊपर आ चुके हैं। इस लिस्ट में तीसरा नाम विराट कोहली का है जिन्होंने बांग्लादेश की पिच पर 183 रन जड़े थे। इसके अलावा किशन की आज की पारी के बाद वह बांग्लादेश में शतक जमाने वाले 5वें भारतीय ओपनर बन गए हैं। उनसे पहले सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली, सहवाग और गौतम गंभीर ही ऐसा कारनामा कर पाए हैं।

बता दें कि ईशान की आज की पारी इतनी शानदारा रही कि उसे देखने के बाद पूर्व कप्तान विराट कोहली भी मैदान में भंगड़ा करते नजर आए। दोनों की साझेदारी के बूते भारत ने पहले 300 से ज्यादा रन बनाए और अब 5 विकट खोकर 382 रन बना चुका है। इसमें से जहाँ 210 रन अब तक अकेले ईशान के हैं।

ईशान के नाम जुड़ी यह उपलब्धि इसलिए भी इतनी यादगार है क्योंकि उन्हें भारतीय क्रिकेट टीम में अचानक मौका मिला। रोहित शर्मा के अंगूठे में आई चोट के बाद ईशान को टीम 11 में मौका मिला और उन्होंने इस अवसर का इस्तेमाल ऐसा किया कि इस समय उनके चर्चे हर जगह हैं। उन्होंने जिस तरह शिखर धवन के आउट होने के बाद पारी संभाली उसे देख लोग अभी से उन्हें 2023 में होने वाले वर्ल्ड कप में शामिल करने की अपील कर रहे हैं।

जब चाहकर भी मंदिर नहीं तोड़ पाया टीपू सुल्तान, शुरू कराई अपने सम्मान में ‘सलाम आरती’: BJP सरकार ने गुलामी वाले नामों को बदला

कर्नाटक में ‘सलाम आरती’ के रिवाज का नाम भारतीय जनता पार्टी अब ‘नमस्कारा’ करने जा रही है। कहा जाता है कि ये आरती टीपू सुल्तान के दौर में शुरू की गई थी। टीपू सुल्तान चाहता था कि मंदिर के पुजारी उसके ‘सम्मान’ में मंदिरों की आरती को करें। इसी के बाद कोल्लूर के मंदिरों मे ये रिवाज शुरू हुआ। बाद में उसकी मौत हो गई, लेकिन चलन खत्म नहीं हुआ। कुछ दिन पहले इस सलाम आरती का नाम बदलने की माँग उठी और अब खबर है कि ये नाम बदलकर ‘नमस्कार’ किया जा रहा है।

टाइम्स नाऊ की रिपोर्ट के मुताबिक, ये रिवाज कोल्लूर के सुब्रमण्या में पुत्तुर के मंदिरों में किया जाता था। इसे बदलने की घोषणा कर्नाटक धर्मिका परिषद द्वारा की गई, जो हिंदू धार्मिक संस्थानों और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग के अंतर्गत आता है।

परिषद के सदस्य काशेकोडी सूर्यनारायण भट ने कहा कि पहले राज्य प्रशासन के भले के लिए इस रिवाज को किया जाता था, अब यह लोगों के कल्याण के लिए होगा। अनुष्ठान को ‘नमस्कार’ नाम दिया जाएगा।

हिंदू संगठनों के अनुसार, ‘सलाम आरती’ गुलामी का प्रतीक थी और वही वर्चस्व कायम करने के लिए इसका अभ्यास किया जाता था। इसलिए उन्होंने इस रिवाज को समाप्त करने की माँग की। इस बीच बुद्धिजीवियों ने कहा भी कि इस परंपरा को खत्म नहीं किया जाना चाहिए, ये हिंदू और मुस्लिमों के संबंध और उनके बीच सद्भाव को दर्शाती है। लेकिन अंतत: फैसला हिंदू संगठनों के पक्ष में हुआ।

याद दिला दें कि मेलकोटे चालुवनारायण मंदिर प्रशासन ने कर्नाटक मुजरई विभाग से इस सलाम आरती का नाम संध्या आरती करने की माँग की थी। इस संबंध में एक ज्ञापन भी सौंपा गया था

मूकाम्बिका मंदिर के पुजारी 2018 के बयान के अनुसार, सलाम आरती के पीछे कहानी है कि जब टीपू सुल्तान टीपू सुल्तान मैसूर क्षेत्र पर शासन कर रहा था, तब वह मंदिर को नष्ट करने के लिए आया था, लेकिन दैवीय शक्तियों के कारण प्रवेश नहीं कर सका। इसके बाद वह मंदिर में पूजा करने गया और तब से उस आरती को सलाम आरती कहा जाने लगा।

खालिस्तानी आतंकी पन्नू ने ली पंजाब के थाने पर रॉकेट हमले की जिम्मेदारी, ISI का भी हो सकता है हाथ! IB के अलर्ट के बावजूद लापरवाह रही पंजाब पुलिस

पंजाब में खालिस्तान लगातार पैर पसारता जा रहा है। यहाँ के तरनतारन जिले के थाने में रॉकेट लॉन्चर से हमला होने की घटना सामने आई है। इस हमले की जिम्मेदारी खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू (खालिस्तानी आतंकी संगठन सिख फॉर जस्टिस) ने ली है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह हमला तरनतारन जिले के सरहाली थाने में शुक्रवार (9 दिसंबर, 2022) को रात करीब 11:22 बजे किया गया है। कहा जा रहा है कि सरहाली में ही खालिस्तान समर्थक आतंकी हरविंदर सिंह उर्फ रिंदा का पैतृक घर है। बीते दिनों खबर आई थी कि रिंदा की पाकिस्तान में मौत हो गई है। रिंदा की मौत के बात हुए इस हमले को लेकर कहा जा रहा है कि खालिस्तानी आतंकियों ने यह हमला पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के निशाने पर किया है। माना जा रहा है कि ISI रिंदा के आतंक को कायम रखना चाहती है। इसलिए, उसने यह हमला करवाया है।

‘जी न्यूज’ की रिपोर्ट के अनुसार, इस हमले से पहले ही इंटेलीजेंस ब्यूरो (IB) ने हमले को लेकर अलर्ट जारी किया था। इस अलर्ट में कहा गया था कि आतंकवादी और गैंगस्टर पुलिस इंस्टॉलेशंस पर हमला कर सकते हैं। हालाँकि, इनपुट के बाद भी पंजाब पुलिस ने न तो सजगता बरती और ना ही कोई कार्रवाई की। इससे पंजाब सरकार और वहाँ की पुलिस के रवैये पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

इस हमले को लेकर पंजाब डीजीपी गौरव यादव ने कहा है कि इस साल करीब 200 ड्रोन क्रासिंग हुई हैं। बीते महीने भी कई ड्रोन को रोका गया है। साथ ही, हेरोइन और हथियार भी जब्त किए गए हैं। उन्होंने कहा, मेरा मानना है कि दुश्मन देश डरा हुआ है और ध्यान भटकाने के लिए रात में कायरतापूर्ण हमला कर रहा है।”

डीजीपी ने यह भी कहा है कि प्रारंभिक जाँच में खुलासा हुआ है कि शुक्रवार रात करीब 11 बजकर 22 मिनट पर आरपीजी (RPG) का इस्तेमाल कर हाईवे से ग्रेनेड दागा गया था। यह ग्रेनेड सरहाली थाने के सुविधा केंद्र से टकराया। इस मामले में, UAPA की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है। सेना के दस्ते में शामिल फॉरेंसिक टीम भी जाँच में जुटी हुई हैं।

उन्होंने यह भी कहा है कि जाँच में पता चला है कि पाकिस्तान में मौजूद हैंडलर और ऑपरेटर यूरोप और उत्तरी अमेरिका में भी एक्टिव हैं। उनके लिंक की भी जाँच करने के साथ ही एसएफजे (खालिस्तानी आतंकी संगठन सिख फॉर जस्टिस) के दावे की भी जाँच कर रहे हैं। स्पष्ट संकेत हैं कि यह पड़ोसी देश की करतूत है। वह भारत को लगातार घाव देने की कोशिश कर रहा है।

इस हमले को लेकर भाजपा आम आदमी पार्टी सरकार पर हमलावर है। भाजपा नेता मनजिंदर सिंह सिरसा ने कहा है “गाँधी परिवार की तरह केजरीवाल भी पंजाब में अराजकता फैलाकर देश की सत्ता हथियाना चाहते है तरन तारन पुलिस स्टेशन पर आतंकी हमला प्रदेश की सुरक्षा को दरकिनार कर रही पंजाब की AAP सरकार की नाकामी का सबूत है। केजरीवाल के कठपुतली बनकर मुख्यमंत्री भगवंत मान पूरे देश की सुरक्षा को खतरे में डाल रहे है।”

मोहाली इंटेलिजेंस विभाग में भी हो चुका है ब्लास्ट

गौरतलब है कि इस साल मई में मोहाली पुलिस के इंटेलिजेंस विभाग में में भी एक विस्फोट हुआ था। यह ब्लास्ट कम क्षमता का था जिस से किसी के जान-माल का कोई नुकसान नहीं हुआ था। इस ब्लास्ट में भी रॉकेट लॉन्चर का प्रयोग हुआ था।

‘मुझे जानवर बहुत पसंद हैं’: पाकिस्तानी यूट्यूबर अज़लान शाह ने नई-नवेली बीवी को तोहफे में दिया गदहे का बच्चा

शादी के मौके पर दोस्तों और रिश्तेदारों की तरफ से दुल्हन को ढेरों तोहफे मिलते हैं। उनमें सबसे खास होता है वह तोहफा, जो दूल्हा अपनी दुल्हन को देता है। क्या आपने कभी किसी शादी में दुल्हन को तोहफे में गधा मिलते देखा है? यह कोई मजाक नहीं है, बल्कि ऐसा पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में हुआ है। दूल्हे का यह अजीब गिफ्ट देखकर हर कोई हैरान रह गया।

पाकिस्तानी यूट्यूबर अजलान शाह ने अपनी दुल्हन वरीशा को नायाब तोहफे के तौर पर गधे का बच्चा दिया है। उन्होंने इंस्टाग्राम पर तोहफे की तस्वीर शेयर करते हुए एक पोस्ट कर लिखा, “मैं हमेशा से जानता था कि वारिशा को गधे के बच्चे बहुत पसंद हैं, इसलिए ये मेरी तरफ से शादी का तोहफा है। उन्होंने आगे यह भी सफाई दी कि गधे के बच्चे को उसकी माँ से अलग से नहीं किया गया है, इसीलिए वो उसे भी साथ लाए हैं।

दरअसल, पिछले दिनों पाकिस्तानी यूट्यूबर अजलान शाह और वरीशा जावेद खान का निकाह हुआ था। निकाह के बाद दावत-ए-वलीमा (शादी की दावत) हुई। इस रिसेप्शन पार्टी में अजलान ने अपनी बीवी को गधे का बच्चा (बेबी डंकी) गिफ्ट किया। तस्वीरों के अलावा अजलान ने एक वीडियो भी शेयर किया है। वीडियो में अजलान ने अपने तोहफे के बारे में तफसील (विस्तार) से जानकारी दी है। अजलान कह रहे हैं, “सवाल यह है कि तोहफे में गधा ही क्यों? तो इसका जवाब यह है कि एक तो यह (गधे) आपको पसंद है और दूसरा यह कि दुनिया का सबसे मेहनती और प्यार करने वाला जानवर है।”

इस मौके पर दुल्हन भी पीछे नहीं रहीं। वरीशा कहती नजर आईं कि, “मैं तुम्हें गधा नहीं बनने दूँगी।” अजलान ने इस तोहफे के बारे में आगे कहा , “मुझे जानवर बहुत पसंद हैं, लोग चाहें जो भी कहें, गधा मेरा स्प्रिट एनिमल है, मुझे गधे से प्यार है, ये मेरी तरफ से वरीशा के लिए तोहफा है।”

इसके बाद अजलान हँसते हुए कहते हैं, “प्लीज इस बात का मजाक नहीं बनाना।” इस मौके पर अजलान शाह ने लोगों को यह भी बताया कि उन्होंने गधे के बच्चे को उसकी माँ से अलग नहीं किया है और वो भी उसके साथ आई है।

पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अज़लान और वरीशा की शादी में कई यूट्यूबर्स, टिकटॉकर्स और पाकिस्तानी हस्तियाँ मौजूद थीं। सोशल मीडिया पर यह वीडियो खूब वायरल हो रहा है। साथ ही इसे लेकर एक बहस भी छिड़ गई है। कुछ लोग अजलान के गिफ्ट की तारीफ कर रहे हैं तो कुछ नाराजगी भी जता रहे हैं।

रिपोर्ट्स की मानें तो पाकिस्तान में डॉक्टरों और इंजीनियर्स की तुलना में यूट्यूबर्स की शादी ज्यादा भव्य तरीके से आयोजित होती है। कारण यह है कि वहाँ डॉक्टरों और इंजीनियरों से ज्यादा कमाई यूट्यूबर्स की होती है। बताया जा रहा है कि अजलान और वरीशा की शादी भी पाकिस्तान की खर्चीली शादियों में शुमार थी।

‘कैश में दो पैसे – गालियाँ बकते हुए Ola ड्राइवर परवेज ने पीटा, हाथ में फ्रैक्चर-निकलने लगा खून’: मुंबई पुलिस ने दर्ज की FIR, वीडियो आया सामने

‘Square Feat India’ के संस्थापक व पत्रकार वरुण सिंह ने एक ओला बाईक ड्राइवर पर अपने साथ मारपीट का आरोप लगाया है। आरोपित ड्राइवर का नाम परवेज बताया जा रहा है। वरुण सिंह ने घटनाक्रम का वीडियो भी अपने ट्विटर हैंडल पर शेयर करते हुए मुंबई पुलिस से शिकायत की है। पुलिस ने FIR दर्ज कर के जाँच शुरू कर दी है। ओला कंपनी ने भी इस मामले में ड्राइवर के व्यवहार को गलत बताते वरुण से माफ़ी माँगी है। घटना शुक्रवार (9 दिसंबर, 2022) की है।

वरुण द्वारा शेयर किए गए एक वीडियो में ओला ड्राइवर परवेज उनकी वीडियो बना रहा है। 29 सेकेंड के उस वीडियो में वरुण ड्राइवर पर ओला मनी के बजाए कैश पेमेंट देने के लिए कहे जाने का आरोप लगा रहे हैं। वरुण ड्राइवर से ओला मनी से पेमेंट न किए जाने की वजह पूछ रहे हैं लेकिन ड्राइवर सिर्फ उनकी वीडियो बना रहा है। वीडियो में परवेज की स्कूटी भी दिखाई दे रही है।

वरुण का कहना है कि उन्होंने फीनिक्स मॉल से कहीं जाने के लिए ओला बुक की थी। इस दौरान परवेज ने कैश में जाने की बात कही तो उन्होंने उसका फोटो खींच लिया। अपने ट्वीट में वरुण ने बुकिंग लोकेशन भी शेयर की है। वरुण द्वारा बुक की गई गाडी का नंबर MH 03 CF 4420 है। उसके 84 रुपए भाड़ा दिखाई दे रहा है।

1:43 मिनट के एक अन्य वीडियो में वरुण ने आरोपित ड्राइवर परवेज पर 5 बार अपनी पिटाई का आरोप लगाया है। एक राहगीर महिला ने हस्तक्षेप की भी कोशिश की। वरुण ने वीडियो में कहा कि उनके हाथों में फैक्चर हो गया है और खून भी निकल रहा है। आस-पास के लोगों ने पुलिस को बुलाने की सलाह भी दी। इस पूरी वीडियो में परवेज लगातार बहस करता सुनाई दे रहा है। इस पूरी बहस में आरोपित परवेज वरुण सिंह से किसी को भी बुलाने और बिलकुल भी न डरने का ताव दे रहा है।

वरुण सिंह ने अपने अन्य ट्वीट में जानकारी दी है कि परवेज द्वारा किए गए हमले के बाद वो अस्पताल गए। वहाँ उन्होंने इलाज करवाने के बाद पुलिस स्टेशन का रुख किया। एक ट्वीट में उन्होंने जानकारी दी है कि उनका केस पुलिस ने दर्ज कर लिया। वरुण सिंह ने यह भी कहा कि उन पर ओला ड्राइवर परवेज उन पर गाली देने का आरोप लगा रहा था जो सरासर गलत है।

कश्मीरी पंडितों के नरसंहार की नहीं होगी जाँच: सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी याचिका, कहा- अब सबूत जुटाना मुश्किल

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने कश्मीर घाटी में 1990 के दशक में हुए हिंदुओं के नरसंहार की जाँच की CBI/NIA या फिर कोर्ट द्वारा नियुक्त एजेंसी से कराने की माँग वाली क्यूरेटिव पिटीशन को खारिज कर दिया। ‘रूट्स इन कश्मीर’ नाम की NGO द्वारा दायर याचिका में नए सिरे से प्राथमिकी दर्ज जाँच कराने की माँग की गई थी।

दरअसल, हिंदुओं के नरसंहार के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देश को लेकर अक्टूबर 2022 में पुनर्विचार याचिका दायर की गई थी। 24 जुलाई 2017 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए कहा था कि इतने सालों बाद इस केस में सबूत जुटाना मुश्किल है।

कोर्ट ने यह भी कहा था कि कश्मीरी पंडितों के साथ जो कुछ हुआ वो हृदय विदारक है, लेकिन 27 साल बीत जाने के बाद याचिका पर विचार करने से कोई उपयोगी उद्देश्य सामने नहीं आएगा। इसलिए इसकी जाँच का आदेश नहीं दिया जा सका।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनवाई से इनकार करने के बाद ‘रूट्स इन कश्मीर’ नाम की NGO ने क्यूरेटिव याचिका दाखिल की थी। याचिका में कहा गया था कि देरी को आधार बताकर याचिका खारिज करना ठीक नहीं है। सिख विरोधी दंगों की नए सिरे से हो रही जाँच का हवाला देते हुए याचिका में कहा गया कि इंसानियत के खिलाफ अपराध और नरसंहार जैसे मामलों में समय सीमा का नियम लागू नहीं होता।

याचिका में यह कहा गया कि न्यायालय यह मानने में विफल रहा कि 1989 और 1998 के बीच 700 से अधिक कश्मीरी पंडितों की हत्या कर दी गई। इससे जुड़े 200 से अधिक मामलों में प्राथमिकी दर्ज की गई, लेकिन एक भी प्राथमिकी में चार्जशीट नहीं दाखिल की गई या मामला दोषसिद्धि तक नहीं पहुँचा।

नए सिरे से प्राथमिकी दर्ज करने, फिर से जाँच करने और लंबित मामलों को तेजी से निपटाने की माँग वाली याचिका को खारिज करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस संजय किशन कौल और एस अब्दुल नज़ीर की पीठ ने कहा कि इसमें कोई मामला नहीं बनता।

पीठ ने कहा, “हमने क्यूरेटिव पिटीशन और इससे जुड़े दस्तावेजों को देखा। हमारी राय में रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा मामले में इस अदालत के फैसले में बताए गए मापदंडों के भीतर कोई मामला नहीं बनता है।”