Home Blog Page 2191

‘हमारा मुल्क कंगाल हुआ तो तुम्हें छिपने की जगह नहीं मिलेगी’: डिप्रेशन को दूर करने में लगे Pak के वित्त मंत्री, लोगों ने कहा – गरीबों का पैसा लूटा, नहीं मिलेगा सुकून

पाकिस्तान के वित्त मंत्री इशाक डार ने सोमवार (5 दिसंबर, 2022) को ‘चिंता और डिप्रेशन’ को दूर करने के लिए एक इस्लामी ‘दुआ’ ट्वीट की थी। हालाँकि, उनके इस ट्वीट के बाद नेटिजन्स ने पाकिस्तान की बदहाल स्थिति और लचर अर्थव्यवस्था के लिए दोषी ठहराते हुए उन्हें ट्रोल किया है।

दरअसल, पाकिस्तान में महँगाई चरम पर है। वहीं, आए दिन पाकिस्तान अन्य देशों के आगे लोन के लिए भीख माँगता नजर आता है। ऐसे में, इशाक डार के इस कथित दुआ वाले ट्वीट को लेकर लोगों ने उन्हें निशाने में ले लिया। इशाक डार के इस ट्वीट पर रिप्लाई करते हुए, ‘@rabiddog93’ नामक ट्विटर यूजर ने पाकिस्तान के बढ़ते लोन और डिफॉल्टर घोषित होने की आशंका को लेकर कहा, “भाई डिफॉल्ट से बचने की भी दुआ बताओ।”

एक अन्य यूजर ‘@ButterflyMagick’ ने लिखा, “जाल तू, जलाल तू इशाक डार बला को टाल तू।”

एक अन्य ट्विटर यूजर ‘@aniquaibtisham’ ने कहा, “अल्लाह करे तुम पर से डिप्रेशन कभी खत्म न हो.. जितना पैसा लूटा है तुम लोगों ने गरीब आवाम का, इंशाअल्ला तुम लोगों को सुकून नसीब नहीं होगा। चलो अब बताओ इकॉनमी का क्या हाल किया है? लाओ इस मुल्क का लूटा हुआ पैसा…”

@BILALAH52343507 नामक ट्विटर यूजर ने कहा, “मैं लिखकर देता हूँ, ये आयत इसको पढ़ना भी नहीं आता होगा।”

@saleha34646112 ने इशाक डार को ट्रोल करते हुए लिखा, “आपको इसकी बहुत जरूरत है।”

एक अन्य यूजर ‘@JunaidK95200328’ ने कहा, “उस अर्थव्यवस्था का क्या बना दिया… आपको तो डॉलर 180 पर लाना था। ब्लूमबर्ग ने भी कहा है कि 95% डिफ़ॉल्ट के चांस हैं। डार साहब अगर मुल्क डिफॉलटर हुआ तो आपको छिपने की जगह नहीं मिलेगी।”

@Ayaan04912 ने ट्वीट कर कहा, “माशाअल्ला डार साहब सब कुछ चोरी करके लंदन ले गए हो और अब आवाम को दुआ पर लगा दिया। बहुत अच्छे।”

एक अन्य यूजर ‘@daoud_babar’ ने कहा, “अगर दुआ ही करनी थी तो लंदन में बैठकर कर लेते, यहाँ आकर मुल्क क्यों तबाह किया?”

@ikhan39 नामक ट्विटर यूजर ने लिखा, “पैसा लूट कर अब आवाम को दुआएँ बता रहा है। कोई बात नहीं, इधर भी जलील हो गए और आगे भी होगे इंशाल्ला”

इसी तरह कई अन्य यूजर्स ने भी पाकिस्तानी वित्त मंत्री को पाकिस्तान की खराब हालत को लेकर ट्रोल किया है। वास्तव में, पाकिस्तान अब ऐसी स्थिति में आ गया है जहाँ से वह कभी भी डिफॉल्ट घोषित हो सकता है।

जम्मू कश्मीर में पहली बार आतंकी के घर पर चला बुलडोजर, पुलवामा में जमींदोज किया गया जैश के आतंकवादी का मकान: 4 अन्य के पोस्टर जारी

जम्मू कश्मीर के पुलवामा में जैश-ए-मुहम्मद के एक आतंकी के घर पर बुलडोजर चलाया गया। आतंकी का घर पुलवामा के राजपोरा न्यू कॉलोनी में था, जिसे अब पूरी तरह जमींदोज कर दिया गया है।

मिली जानकारी के मुताबिक, आतंकी का नाम आशिक नेंगरू है, जिसने सरकारी जमीन पर कब्जा कर घर बनाया हुआ था। अब इस अवैध घर को मिट्टी में मिला दिया गया है। कार्रवाई के दौरान जम्मू-कश्मीर पुलिस की टीम और पुलवामा जिले के कई सरकारी अधिकारी मौके पर मौजूद रहे। आतंकी के खिलाफ हुई कार्रवाई की जो तस्वीरें सामने आई हैं, उनमें साफ देखा जा सकता है कि दो मंजिला मकान पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया गया है। कहा जा रहा है कि यह पहली मौका है जब जम्मू-कश्मीर में अधिकारियों ने किसी आतंकवादी के घर पर बुलडोजर चलवाया है।

बता दें कि आतंकी आशिक नेंगरू जम्मू-कश्मीर में आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के नए चेहरे के तौर पर उभर कर सामने आया है। नेंगरू सुरक्षा बलों की हिट लिस्ट में भी शामिल है। सुरक्षा एजेंसियों की मानें तो आशिक नेंगरू फिलहाल POK में डेरा डाले हुए है। जम्मू-कश्मीर में हुई कई आतंकी घटनाओं में नाम आने के बाद मोदी सरकार ने जैश कमांडर आशिक नेंगरू को आतंकवादी करार दिया था।

गृह मंत्रालय के मुताबिक, नेंगरू पाकिस्तानी आतंकियों को जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ करने में सहायता करता रहा है। ऐसा माना जाता है कि उसने जैश-ए-मोहम्मद मुख्य सरगना मौलाना मसूद अजहर के भतीजे इदरीस को जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ कराने में मदद की थी। नेंगरू फरवरी 2020 में ही लापता हो गया था, जब एनआईए की ओर से उसे पूछताछ के लिए तलब किया गया था।

नेंगरू का बड़ा भाई अब्बास अहमद नेंगरू भी जैश ए मोहम्मद का एक एक्टिव आतंकवादी था, जिसे सिक्योरिटी फोर्सेस ने 2014 में ही ढेर कर दिया गया था। पुलिस के मुताबिक, उसका दूसरा भाई मंजूर अहमद नेंगरू इसी साल सितंबर में एक बगीचे में मृत पाया गया था। चौथा भाई रियाज भी आतंकी हमले के एक मामले में जेल में कैद है।

दूसरी तरफ ‘राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA)’ ने पुलवामा में एक बार फिर चार आतंकियों के पोस्टर जारी किए हैं। इन पर 10-10 लाख रुपए का इनाम घोषित किया गया है। सूत्रों के मुताबिक, चारों आतंकियों की बड़े स्तर पर तलाश की जा रही है। कहा जा रहा है कि जिन आतंकियों पर इनाम की घोषणा की गई थी, उनमें से तीन पाकिस्तान में हैं जबकि एक बासित अहमद डार कश्मीर में टीआरएफ की कमान संभाल रहा है।

एनआईए को इन आतंकियों की तलाश 18 नवंबर, 2021 को दर्ज एक मामले में है। जिसमें हिंसक गतिविधियाँ में शामिल होने, युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और आतंकवाद में भर्ती करने के लिए रची गई साजिश शामिल है।

‘दोस्तों को बुलाता, मुझसे सेक्स करवाता’ : कर्नाटक में नशेड़ी जॉन पर इंजीनियर पत्नी ने लगाया आरोप, बोली- ‘वो मेरी अश्लील Video देख खुश होता था’

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में में एक महिला ने अपने पति पर अपने दोस्तों के साथ सोने पर मजबूर करने का आरोप लगाया है। पीड़िता के मुताबिक इस दौरान उसका पति जॉन सेक्स की वीडियो भी बनाता था। आरोप है कि मना करने पर पीड़िता की पिटाई होती थी। महिला ने अपने पति पर नशेड़ी होने का भी आरोप लगा है। पुलिस ने केस दर्ज कर के आरोपित पति को गिरफ्तार कर लिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मामला थानिसांद्रा मेन रोड के सम्पीगेहल्ली क्षेत्र का है। आरोप लगाने वाली 34 वर्षीय महिला पेशे से सॉफ्टवेयर इंजिनियर है। उसका पति जॉन भी इसी पद पर है। दोनों की शादी अप्रैल 2011 में हुई थी। दोनों के एक बेटा भी है। महिला का आरोप है कि उसका पति अक्सर अपने घर दोस्तों को बुलाता और उनके साथ उसे सेक्स करने पर मजबूर करता है। इतना ही नहीं, इस दौरान वो सेक्स की वीडियो भी बनाता और उन अश्लील वीडियोज को देख कर बाद में खुश होता। पीड़िता ने बताया है कि शादी के बाद ऐसा कई बार हो चुका है।

पीड़िता ने अपनी शिकायत में यह भी बताया है कि जब भी वो अपने पति की इन हरकतों का विरोध करती थी तो उसकी बुरी तरह से पिटाई होती है। साथ ही उसकी अश्लील वीडियो भी सोशल मीडिया पर अपलोड करने की धमकी दी जाती थी। शिकायत में आगे बताया गया है कि आरोपित पति ने पीड़िता की बहन के साथ भी जबरन शारीरिक संबंध बनाए। महिला ने अपने पति को न सिर्फ शराब बल्कि ड्रग्स का भी आदी बताया है।

पुलिस को दिए प्रार्थना पत्र में महिला ने आगे बताया है कि आए दिन की प्रताड़ना से एक बार उसने अपने पति से तलाक लेने का फैसला कर लिया था लेकिन फोटो वायरल होने की धमकी से वो डर गई थी। आरोपित गाँजा पीने का भी शौक़ीन बताया जा रहा है। कहा जा रहा है कि उसने घर में गाँजे के पेड़ उगा रखे थे। पुलिस ने उसके घर से गमले में उगे गाँजे के 2 पेड़ भी बरामद किए हैं।

भूपेंद्र पटेल चुने गए भाजपा विधायक दल के नेता, राज्यपाल से मिल कर पेश किया दावा: मंत्रिमंडल पर मंथन के लिए पहुँचे दिल्ली, 12 को शपथ

गुजरात में प्रचंड बहुमत हासिल करने के बाद भूपेंद्र पटेल (Bhupendr Patel) ने राजभवन जाकर राज्यपाल से मुलाकात की और एक बार फिर सरकार बनाने का दावा पेश किया। राज्यपाल आचार्य देवव्रत से मुलाकात के बाद भूपेंद्र पटेल गुजरात बीजेपी के अध्यक्ष सीआर पाटिल (CR Patil) के साथ दिल्ली के लिए रवाना हो गए।

गुजरात के कार्यवाहक मुख्यमंत्री पटेल और प्रदेश अध्यक्ष पाटिल दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) और गृहमंत्री अमित शाह (Amit shah) से मुलाकात करेंगे। माना जा रहा है कि इस दौरान राज्य में मंत्रिमंडल को लेकर दोनों नेताओं से चर्चा की जाएगी।

शनिवार (10 दिसंबर 2022) को दिल्ली रवाना होने से पहले गुजरात के प्रदेश कार्यालय में नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक हुई। इस बैठक में पटेल को विधायक दल का सर्वसम्मति से नेता चुना गया। इस बैठक में केंद्रीय पर्यवेक्षक के तौर रक्षामंत्री राजनाथ सिंह (Rajnath Singh), बीएस येदियुरप्पा (BS Yediyurappa और अर्जुन मुंडा (Arjun Munda) मौजूद रहे।

बैठक के बाद प्रदेश के कार्यवाहक मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने कहा कि गुजरात के लोगों ने एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विश्वास जताया है। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा एक बार फिर राज्य की जनता के हित में काम करेगी।

भूपेंद्र पटेल राज्य में दूसरी बार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेंगे। इस पद के लिए चुने जाने के बाद वे सोमवार (12 दिसंबर 2022) को शपथ ग्रहण करेंगे। इस दौरान उनके मंत्रिमंडल के सदस्य भी शपथ लेंगे। शपथ ग्रहण के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सहित केंद्र के सभी वरिष्ठ साथी और भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के भी शामिल रहने की उम्मीद है।

भाजपा की प्रचंड जीत और ऐतिहासिक उपलब्धि के बाद इस शपथ ग्रहण समारोह को भव्य बनाई जाएगी। इस शपथ ग्रहण समारोह में कई देशों के उच्चायुक्तों को भी आमंत्रित किया जा सकता है। इसके अलावा, विपक्षी दलों के नेताओं को भी आमंत्रण भेजा गया है।

गुजरात में बीजेपी (BJP) ने विधानसभा चुनावों में अब तक की रिकॉर्ड जीत हासिल की है। इसके पहले किसी भी पार्टी ने इतनी सीटें हासिल नहीं की थीं। 8 दिसंबर 2022 को आए नतीजों में भाजपा को 182 सीटों में से 156 सीटें मिलीं। वहीं, कॉन्ग्रेस (Congress) के खाते में 17 और आप (AAP) के खाते में 5 सीटें आईं। 4 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवार भी जीते हैं।

FBI के कहने पर ट्विटर अधिकारियों ने सस्पेंड किया था डोनाल्ड ट्रम्प का हैंडल: ‘ट्विटर फाइल्स 3’ में खुलासा – बायडेन के लिए हुए सनक भरे फैसले

दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति और माइक्रो ब्लॉगिंग साइट ट्विटर के मालिक एलन मस्क ने ‘ट्विटर फाइल्स 3.0’ शेयर किया है। इस ‘फाइल्स’ में बताया गया है कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ट्विटर अकाउंट को किस तरह सस्पेंड किया गया था और उनके ट्वीट्स को हटाने लिए अमेरिकी जाँच एजेंसी FBI द्वारा ट्विटर से अनुरोध किया गया था।

दरअसल, एलन मस्क इससे पहले ‘ट्विटर फाइल्स’ और ‘ट्विटर फाइल्स 2.0’ भी शेयर कर चुके हैं। इसमें उन्होंने बताया था कि न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित हंटर बाइडेन के लैपटॉप के बारे में कहानी को दबाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति के कार्यालय से ट्विटर को आदेश दिया गया था। इसके अलावा, यह भी सामने आया है कि ट्विटर के कर्मचारियों ने यूजर्स को सूचित किए बिना ही न केवल कुछ एकाउंट्स को बल्कि ट्रेंडिंग टॉपिक्स कम दिखे – इसके लिए एक ब्लैकलिस्ट का भी निर्माण किया था।

एलन मस्क ने स्वतंत्र पत्रकार मैट टैबी के इन्वेस्टिगेशन थ्रेड को रीट्वीट करते हुए ‘ट्विटर फाइल्स 3.0’ के बारे में पूरी जानकारी शेयर की है। अपने ट्वीट्स में मैट ने कहा, “6 जनवरी को कैपिटल में हुए दंगों और 8 जनवरी को ट्विटर से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को (ट्रंप के अकाउंट को सस्पेंड करना) हटाने के बीच क्या हुआ, इसकी कहानी दुनिया बहुत कुछ जानती है, लेकिन एलन मस्क का नया ट्विटर आपको यह दिखाएगा कि किस चीज का खुलासा नहीं किया गया है। 6 जनवरी से पहले के महीनों में ट्विटर के बड़े अधिकारियों ने नियमों का उल्लंघन करते हुए कंपनी की पॉलिसी में बड़ा बदलाव किया था। यह सब फेडरल एजेंसी के साथ हुई बातचीत के बाद किया गया।”

स्वतंत्र पत्रकार टैबी ने दावा किया कि जनवरी 2021 में ट्रम्प के फैसले के बारे में ट्विटर यूजर्स की राय कुछ भी हो सकती है। हालाँकि, उन्होंने ये भी कहा कि 6 जनवरी से 8 जनवरी के बीच ट्विटर में आंतरिक तौर पर हुई बातचीत का स्पष्ट और ऐतिहासिक महत्व है।

गौरतलब है कि जनवरी 2021 में ट्विटर ने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के ट्विटर अकाउंट पर बैन लगाने के बाद एक आधिकारिक ब्लॉगपोस्ट शेयर किया था। इसमें, ट्विटर की ओर से कहा गया था, “डोनाल्ड ट्रंप के अकाउंट से हाल ही में किए गए ट्वीट्स और इस बारे में पूरी बारीकी से समीक्षा के बाद उन्हें ट्विटर से बाहर किया जा रहा है। हमने हिंसा को और भड़काने के जोखिम के कारण उनके ट्विटर अकाउंट को स्थायी रूप से निलंबित (सस्पेंड) कर दिया है।”

मैट टैबी ने यह भी कहा, “ट्विटर के अधिकारियों ने डोनाल्ड ट्रंप के अकाउंट को सस्पेंड करने के बाद अपनी शक्ति को बढ़ाना शुरू कर दिया था।” इसका मतलब यह था कि ट्विटर के अधिकारी अमेरिका के अगले राष्ट्रपतियों और व्हाइट हाउस शायद जो बाइडेन पर भी बैन लगाने के लिए तैयार थे।

उन्होंने यह भी कहा है कि ट्विटर मॉडरेशन टीम ने चुनाव के दौरान बीते 4 से अधिक वर्षों के दौरान ट्रम्प और उनके समर्थकों द्वारा किए गए ट्वीट्स के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ट्विटर अकाउंट सस्पेंशन को सही ठहराया था। टैबी का दावा है कि “ट्विटर अधिकारियों के बीच हुई आंतरिक बातचीत अमेरिकी एजेंसियों के साथ उनके करीबी संबंधों को उजागर करते हैं।” इसके अलावा, विजया गाडगे (ट्विटर पर कानूनी, नीति की प्रमुख) और योएल रोथ (विश्वास और सुरक्षा के पूर्व वैश्विक प्रमुख) अपनी पसंद और सनक के हिसाब से फैसले ले रहे थे।

पत्रकार टैबी ने अपने ट्वीट्स में यह भी दावा किया है कि 8 अक्टूबर, 2020 को ट्विटर के अधिकारियों ने ‘us2020_xfn_enforcement’ नाम से एक चैनल बनाया था। इस चैनल में ट्विटर के अधिकारी चुनाव से संबंधित ट्वीट्स को हटाने और अकाउंट्स को सस्पेंड करने के लिए बातचीत करते थे। खासतौर से ‘हाई-प्रोफाइल’ अकाउंट्स को लेकर इसमें चर्चा होती थी।

इसके अलावा टैबी ने दावा किया है कि ट्विटर के अधिकारी न केवल अमेरिकी जाँच एजेंसी एफबीआई और डीएचएस के लोगों के साथ साप्ताहिक मीटिंग कर रहे थे बल्कि राष्ट्रीय खुफिया एजेंसी (डीएनआई) ऑफिस के लोग भी इसमें शामिल थे। यही नहीं, ट्विटर के अधिकारियों ने एफबीआई अधिकारियों से मिलने के बाद न केवल एक्टिव हुए बल्कि डेमोक्रेटिक पार्टी (जो बाइडेन की पार्टी) के अधिकारियों द्वारा बताए गए ट्वीट्स की रीच को भी कम कर दिया था।

कुल मिलाकर देखें तो, ‘ट्विटर फाइल्स 3.0’ में मैट टैबी ने ट्वीट्स के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया है कि एफबीआई अधिकारियों और जो बाइडेन की पार्टी डेमोक्रेटिक के अधिकारियों के कहने पर न केवल डोनाल्ड ट्रंप का अकाउंट सस्पेंड किया गया। बल्कि, ट्रंप और उनके समर्थकों के ट्वीट्स को हटाया गया और उनकी रीच कम की गई।

‘बेटे ने बेसबॉल बैट से की TV अभिनेत्री वीणा कपूर की हत्या’ – मीडिया ने इस खबर को चलाया, अब वही हिरोइन जिंदा हो थाने पहुँचीं

टीवी और फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री वीणा कपूर की हत्या कर दी गई है। यह हत्या किसी और ने नहीं बल्कि वीणा कपूर (74 साल) के बेटे ने ही की है। – यह खबर मीडिया में चलाई गई। नई जानकारी के अनुसार यह खबर फर्जी निकली और एकसमान नाम होने के कारण मीडिया रिपोर्टिंग में गलती हुई।

इस मामले पर अभिनेत्री वीणा कपूर ने खुद समाने आकर कंफ्यूजन दूर किया है। उनके अनुसार किसी और वीणा कपूर की हत्या हुई है, जो अपने बेटे के साथ रहती थीं और ये भी (अभिनेत्री वीणा कपूर) अपने बेटे के साथ ही रहती हैं। इस कंफ्यूजन के कारण ही मीडिया रिपोर्टिंग में गड़बड़ी हुई।

पहले के मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जो खबर हमने पब्लिश की थी, उसे आप नीचे पढ़ सकते हैं।

वीणा कपूर की हत्या करने वाले बेटे का नाम सचिन कपूर है। कहा जा रहा है कि करोड़ों रुपए के फ्लैट को लेकर सचिन का उसकी माँ के साथ विवाद चल रहा था। जब वीणा कपूर ने बेटे की बात नहीं मानी, तो उसने उन्हें जान से मार डाला।

पुलिस के तरफ से दी गई जानकारी के मुताबिक वीणा कपूर के छोटे बेटे सचिन कपूर (43 साल) ने उनकी हत्या उसी फ्लैट में की जिसको लेकर विवाद चल रहा था। फ्लैट की कीमत 12 करोड़ बताई जा रही है। पुलिस के मुताबिक हत्यारे बेटे ने स्वीकार किया है कि उसने गुस्से में आकर अपनी माँ के सिर पर बेसबॉल बैट से हमला किया। हत्या करने के बाद आरोपित बेटे ने अपनी माँ की लाश को एक कार्टन में पैक किया और 90 किलोमीटर दूर रायगढ़ जिले के पास नदी में फेंक दिया। इस काम में हत्यारे बेटे ने घर के नौकर की सहायता भी ली थी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, वीणा कपूर का छोटा बेटा सचिन इन दिनों कोई काम नहीं कर रहा था। इसलिए वह अपनी माँ के पास जुहू के एक सोसाइटी में शिफ्ट हो गया था। अभिनेत्री का बड़ा बेटा यूएस में रहता है। बड़े बेटे को कॉल पर जवाब न मिलने के बाद उसे अपनी माँ की फिक्र हुई। इसके बाद उसने वॉचमैन को घर भेजकर माँ का हाल जानना चाहा। जब माँ की कोई जानकारी नहीं मिली तो उसने पुलिस को सूचना दी और माँ के गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवा दी।

पुलिस की जाँच के दौरान सच निकलकर सामने आ गया। पुलिस का कहना है कि सचिन ने हत्या की बात स्वीकार कर ली है।

अभिनेत्री की हत्या की खबर मिलने के बाद बॉलीवुड अभिनेत्री नीलू कोहली ने पोस्ट कर दुख जताया। अपने इंस्टाग्राम पर पोस्ट शेयर करते हुए नीलू कोहली ने लिखा- “वीणा जी आप इससे बेहतर डिजर्व करती थीं, मेरा दिल टूट गया है, आपके लिए यह लिखना, मैं क्या बोलूँ, आज मैं निशब्द हूँ, इतने साल के स्ट्रगल के बाद मैं उम्मीद करती हूँ कि आपको आखिरकार शांति मिली होगी।”

अपडेट: ऑपइंडिया ने भी मीडिया रिपोर्ट और बॉलीवुड अभिनेत्री नीलू कोहली के सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर टीवी और फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री वीणा कपूर की हत्या वाली खबर पब्लिश की थी। अब इस खबर को नई जानकारी के साथ अपडेट कर दिया गया है।

CM योगी पर टिप्पणी कर के फरार हुआ सपा नेता, अब यूपी पुलिस कुर्क करेगी संपत्ति: घर पर चस्पाया नोटिस, बेटी बोली – हमें प्रताड़ित किया जा रहा

योगी आदित्यनाथ पर अभद्र टिप्पणी करने के मामले में उत्तर प्रदेश की लखनऊ पुलिस ने फरार चल रहे सपा नेता अनुराग भदौरिया पर बड़ी कार्रवाई की है। हजरतगंज थाने की पुलिस ने उनके घर पर नोटिस चस्पा की है। इस नोटिस में एक तय समय दिया गया है। यह नोटिस शुक्रवार (9 दिसंबर 2022) को चस्पा हुई है।

नोटिस पर पेश होने की अंतिम तारीख 7 जनवरी 2023 पड़ी हुई है। मीडिया रिपोर्ट्स में मुताबिक, यदि तय सीमा के अंदर भदौरिया पेश नहीं हुए तो नोटिस पर कार्रवाई करते हुए उनकी संपत्ति कुर्क कर ली जाएगी। अनुराग भदौरिया की सास सुशीला सरोज ने पुलिस पर अपने परिवार को प्रताड़ित करने का आरोप लगाया है। सुशीला सरोज के मुताबिक, जिस घर पर नोटिस चस्पाई गई है वो घर अनुराग का है ही नहीं। उन्होंने आगे बताया कि नोटिस चिपकाने के पहले पुलिस ने उनसे बात तक नहीं की।

सुशीला सरोज ने अनुराग भदौरिया की तरफ से माफ़ी माँगते हुए खुद को भी गोरखपुर की बेटी बताया है। उन्होंने कहा कि उनका घर गोरखपुर मठ से बस 15 किलोमीर दूर है। पूर्वांचल के लोगों की अक्सर फिसलने की भी चर्चा सुशीला सरोज ने की। उन्होंने अपने दामाद को समाजवादी पार्टी का मेंबर होने के नाते परेशान करने का आरोप लगाया। अंत में अनुराग भदौरिया की सास ने न्याय न मिलने कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की बात कही है।

पुलिस द्वारा चस्पा की गई नोटिस में अनुराग पर FIR संख्या 395/22 के तहत IPC की धारा 153- A, 295- A, 298, 504 और 505 (2) का जिक्र है। यह नोटिस लखनऊ के इंदिरा नगर क्षेत्र के A ब्लॉक वाले मकान पर चस्पा हुई है। नोटिस में चीफ जुडिशियल मजिस्ट्रेट लखनऊ की मुहर भी लगी हुई है। चस्पा हुई नोटिस में यह भी बताया गया है कि पहले भेजी गई नोटिसों को अनुराग भदौरिया द्वारा रिसीव नहीं किया गया जिसके चलते यह कार्रवाई एक विकल्प के तौर पर की गई है।

अनुराग भदौरिया पर एक TV डिबेट के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनके दिवंगत गुरु महंत अवैद्यनाथ पर अपमानजनक टिप्पणी का आरोप है। यह केस एक भाजपा नेता की शिकायत पर दर्ज हुआ है।

देश में लोकतंत्र, लेकिन जनता को ‘कॉलेजियम सिस्टम’ के बारे में जानने का अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट के अड़ियल रुख से न्यायपालिका में खत्म हो जाएगी लोगों की आस्था

सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम सिस्टम (Supreme Court Collegium System) को लेकर केंद्र की मोदी सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच तल्खी बढ़ती जा रही है। एक तरफ सुप्रीम कोर्ट स्वघोषित ‘कॉलेजियम सिस्टम’ को ‘लॉ ऑफ लैंड’ बता रहा है तो दूसरी तरफ इसके बारे में देश की जनता को जानकारी देने से भी मना कर रहा है। इतना ही नहीं इसमें भाई-भतीजावाद और जातिवाद का ऐसा मिश्रण है कि न्यायिक क्षेत्र में इसे ‘अंकल कल्चर’ कहा जाने लगा है।

अन्य क्षेत्रों की तरह केंद्र की मोदी सरकार ने इसमें आवश्यक सुधार करने की कोशिश की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने खुद को सर्वोच्च ऑथरिटी बताते हुए संसद में बने इस कानून को ही खारिज कर दिया। इसके कारण देश की जनता में पहले से ही बैठी आशंका और मजबूत हो गई कि सुप्रीम कोर्ट आखिर कॉलेजियम में पारदर्शिता तक क्यों नहीं लाना चाहता है।

कॉलेजियम से संबंधित एक याचिका की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एमआर शाह और सीटी रविकुमार की पीठ ने हाल ही में कहा कि कॉलेजियम में क्या चर्चा होती है और किस आधार पर होती है, इसकी भी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती है। 9 दिसंबर 2022 को याचिका खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सूचना के अधिकार (RTI) कानून के तहत केवल अंतिम फैसले ही सार्वजनिक किए जा सकते हैं, न कि कॉलेजियम की बैठकों की चर्चा और जजों की नियुक्ति से संबंधित प्रक्रिया।

जिस व्यवस्था पर देश की जनता को सबसे अधिक भरोसा है, उसमें क्या हो रहा है और कैसे हो रहा है, इसकी जानकारी ही नहीं दी जा रही है। कॉलेजियम सिस्टम को लेकर सोशल मीडिया पर लोग अपनी-अपनी बातें रख रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट के इस रूख का विरोध कर रहे हैं। लोग तो यहाँ तक कह रहे हैं कि यह राजनीतिक तानाशाही और सैन्य तानाशाही की तरह ही यह एक तरह की न्यायिक तानाशाही है।

देश में जब राजतंत्र था, तब कोई भी व्यक्ति अपना मुद्दा लेकर राजदरबार में पहुँच सकता था और अपनी समस्या कह सकता था। हालाँकि, अब जबकि देश में लोकतंत्र है, तब न्यायिक व्यवस्था में पारदर्शिता लाने में सुप्रीम कोर्ट द्वारा कोई ठोस कदम उठाते हुए नहीं दिख रहा है। इसके कारण आधुनिक भारत की यह न्याय प्रणाली प्राचीन न्याय प्रणाली से भी पिछड़ती हुई दिख रही है।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एस अब्दुल नजीर ने दिसंबर 2021 में प्राचीन भारतीय न्याय प्रणाली की प्रशंसा की थी। उन्होंने कहा था कि भारत की प्राचीन कानूनी व्यवस्था में राजा को भी कानून के सामने झुकना पड़ता था। उनके परिजनों या यहाँ तक कि राजा के खिलाफ भी न्याय की माँग की जा सकती थी।

उन्होंने कहा था कि प्राचीन भारतीय न्याय व्यवस्था में न्याय माँगने की बात निहित थी, लेकिन इसके उलट ब्रिटिश न्याय व्यवस्था में न्याय की गुहार की जाती है, न्याय के लिए प्रार्थना की जाती है और जजों को ‘लॉर्डशिप’ या ‘लेडीशिप’ कहा जाता है। न्यायाधीश ने कहा कि न्याय कोई अनुग्रह नहीं है, यह जनता का अधिकार है और इसका सम्मान होना चाहिए।

क्या है कॉलेजियम सिस्टम

कॉलेजियम सिस्टम सुप्रीम कोर्ट द्वारा खुद से विकसित किया हुआ एक सिस्टम है, जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति की जाती है। यह नियुक्ति फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के पाँच वरिष्ठ जजों की अनुशंसा पर ही की जाती है। हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति भी कॉलेजियम की सलाह पर होती है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, संबंधित हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस और उस राज्य के राज्यपाल शामिल होते हैं।

कॉलेजियम सिस्टम कोई संवैधानिक अवधारणा नहीं है, बल्कि यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने तीन फैसलों के आधार पर विकसित किया गया है। इसे ‘जजेस केस’ के नाम से जाना जाता है। पहला केस 1981, दूसरा 1993 और तीसरा 1998 के केस से जुड़ा है।

1981 के पहले केस को एसपी गुप्ता केस के नाम से भी जाना जाता है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जजों की नियुक्ति के लिए चीफ़ जस्टिस के पास एकाधिकार नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें सरकार की भी भूमिका होनी चाहिए। 1993 में दूसरे केस में 9 जजों की एक बेंच ने कहा कि जजों की नियुक्तियों में मुख्य न्यायाधीश की ‘राय’ को बाकी लोगों की राय के ऊपर तरजीह दी जाए। इस तरह 1998 के तीसरे केस में सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम का आकार बड़ा करते हुए इसे पाँच जजों का एक समूह बना दिया।

इन तीन केसों के आधार पर कॉलेजियम सिस्टम को विकसित किया गया और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के साथ-साथ चार अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों की राय को अनिवार्य बना दिया गया। इनकी राय के बिना सुप्रीम कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में किसी भी न्यायाधीश की नियुक्ति नहीं की जा सकती।

जजों की नियुक्ति को लेकर क्या कहता है संविधान

सारा काम इसी ‘राय’ को ‘सहमति’ बनाने को लेकर है। संविधान में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के वरिष्ठ जजों से विचार-विमर्श करके ही राष्ट्रपति करेंगे। संविधान के अनुच्छेद 124 में सुप्रीम कोर्ट और उसमें जजों की नियुक्ति और अनुच्छेद 217 में हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति से संबंधित प्रावधान है।

संविधान के अनुच्छेद 217 में कहा गया है कि राष्ट्रपति हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश, राज्य के राज्यपाल और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से विचार-विमर्श करने के बाद निर्णय लेंगे।

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने ‘जजेज केसेस’ में संविधान में उल्लेखित शब्द ‘कंसल्टेशन’ की व्याख्या करके ‘सहमति’ कर दी। यानी विचार-विमर्श को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की ‘सहमति’ के रूप में संदर्भित कर दिया।

मोदी सरकार का न्यायिक सुधार और सुप्रीम कोर्ट का अड़ंगा

साल 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद अन्य क्षेत्रों की तरह न्यायिक क्षेत्रों में भी सुधार करने की कोशिश की। मोदी सरकार ने साल 2014 में संविधान में 99वाँ संशोधन करके नेशनल ज्यूडिशियल अप्वाइंटमेंट कमीशन (NJAC) अधिनियम लेकर आई। इसमें सरकार ने कॉलेजियम की जगह जजों की नियुक्ति के लिए NJAC के प्रावधानों को शामिल किया था।

NJAC में 6 सदस्यों का प्रावधान किया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठ जज, केंद्रीय कानून मंत्री और दो अन्य विशेषज्ञ शामिल हैं। इन दो विशेषज्ञों का चयन प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मिलकर करेंगे। इसमें यह भी प्रावधान है कि ये दो विशेषज्ञ हर तीन साल पर बदलते रहेंगे।

इसके साथ ही साल 2014 में संविधान संशोधन करके केंद्र सरकार ने जजों की नियुक्ति के मामले में बड़ा बदलाव किया। इस संशोधन में संसद को यह अधिकार दिया गया कि भविष्य में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति से जुड़े नियमों को बना सकता है और जरूरत पड़ी तो उसमें बदलाव भी कर सकता है।

केंद्र सरकार द्वारा इस कानून को बनाने के बाद साल 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्युडिशियल अप्वाइंटमेंट्स कमीशन अधिनियम को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इसे ‘संविधान के आधारभूत ढाँचे से छेड़छाड़’ बताते हुए रद्द कर दिया। बता दें कि संविधान में सुप्रीम कोर्ट को मौलिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में बताया गया है, जबकि देश में कानून बनाने का अधिकार सरकार और संसद के पास ही है।

कॉलेजियम पर भाई-भतीजावाद और गुटबाजी का आरोप

कॉलेजियम सिस्टम पर जजों की नियुक्ति के मामले में अक्सर भाई-भतीजावाद का आरोप लगता है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में भयानक भाई-भतीजावाद और जातिवाद का आरोप लगता है। इतना ही नहीं इस प्रक्रिया में गुटबाजी के कारण केसों के प्रभावित होने के आरोप लगते हैं।

न्यायपालिका में ‘अंकल कल्चर’ कहते है। इसके तहत अधिकांश ऐसे जजों को ही चुना जाता है, जिनके परिवार से कोई जज रह चुका होता है या जिनकी न्यायपालिका में ऊँचे पदों पर जान-पहचान है। कहा जाता है कि देश की न्यायिक व्यवस्था सिर्फ 300 परिवारों के इर्द-गिर्द घुमती है।

यह भी कहा जाता है कि कॉलेजियम सिस्टम के कारण जजों के बीच आपसी पॉलिटिक्स और गुटबाजी होती रहती है। इसके कारण जज फैसला लिखने से ज्यादा ध्यान इस बात पर लगाते हैं कि कौन जज बने। इससे न्यायिक व्यवस्था प्रभावित होती है। बताते चलें कि इस समय देश में लगभग 5 करोड़ केस विभिन्न न्यायालयों में पेंडिंग हैं।

कानून मंत्री कॉलेजिम सिस्टम पर वार

सरकार के इस कानून को नकारने के बाद सुप्रीम कोर्ट और केंद्र के बीच तानातानी बढ़ गई। केंद्रीय कानून और न्याय मंत्री किरेन रिजिजू ने अक्टूबर 2022 को कहा कि देश के लोग कॉलेजियम सिस्टम से खुश नहीं हैं और संविधान की भावना के मुताबिक जजों की नियुक्ति करना सरकार का काम है। केंद्र ने तो यहाँ तक कह दिया कि जज इस सिस्टम के जरिए अधिकतर समय राजनीति और गुटबाजी में व्यस्त रहते हैं।

उन्होंने कहा था कि आधे समय न्यायाधीश नियुक्तियों को तय करने में व्यस्त होते हैं, जिसके कारण उनका जो प्राथमिक काम न्याय प्रदान करना होता है, वह प्रभावित होता है। उन्होंने कहा कि संविधान में पूरी तरह स्पष्टता है कि भारत के राष्ट्रपति न्यायाधीशों की नियुक्ति करेंगे। इसका मतलब है कि कानून मंत्रालय भारत के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से न्यायाधीशों की नियुक्ति करेगा। 

25 नवंबर 2022 को केंद्रीय क़ानून मंत्री किरेन रिजिजू ने कॉलेजियम द्वारा जजों की नियुक्ति को ‘संविधान से परे’ और एलियन बता दिया। उन्होंने कहा कि कॉलेजियम प्रणाली में कई खामियाँ हैं और लोग आवाज उठा रहे हैं कि यह पारदर्शी नहीं है और ना ही इसमें जवाबदेही है। 

किरेन रिजीजू ने कहा, “भारत का संविधान जनता और सरकार के लिए ‘धार्मिक दस्तावेज’ है। कोई चीज जो संविधान से अलग है, उसे सिर्फ अदालत के कुछ जजों ने तय किए जाने के कारण आप कैसे माना सकता है कि उसका पूरा देश समर्थन करता है। आप बताएँ कि कॉलेजियम प्रणाली किस प्रावधान के तहत निर्धारित की गई है।”

केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने आगे कहा कि जिस प्रकार मीडिया पर निगरानी के लिए भारतीय प्रेस परिषद है, उसी प्रकार न्यायपालिका पर निगरानी की भी व्यवस्था होनी चाहिए। लोकतंत्र में कार्यपालिका और विधायिका पर निगरानी की व्यवस्था मौजूद है, लेकिन न्यायपालिका के भीतर ऐसा कोई तंत्र नहीं है।

उन्होंने कहा, “हमारे कार्यपालिका और विधायिका अपने दायरे में बिल्कुल बँधे हुए हैं। अगर वे इधर-उधर भटकते हैं तो न्यायपालिका उन्हें सुधारती है। समस्या यह है कि जब न्यायपालिका भटकती है तो उसको सुधारने का व्यवस्था नहीं है।” उन्होंने कहा था कि अगर न्यायपालिका यह काम खुद करे तो अच्छा है।

उप-राष्ट्रपति की कॉलेजियम और सुप्रीम कोर्ट पर तल्ख टिप्पणी

उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ भी कॉलेजियम सिस्टम पर चिंता जता चुके हैं। दिसंबर 2022 में उपराष्ट्रपति ने कहा कि संसद द्वारा बनाए गए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) अधिनियम को सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द करना एक गंभीर मुद्दा है। संसद अगर कोई कानून पारित करता है तो वह लोगों की इच्छा को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कभी किया हो ऐसा उदाहरण दुनिया में कहीं देखने को नहीं मिलता।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका द्वारा एक दूसरे के क्षेत्र में कोई भी घुसपैठ, चाहे वह कितनी भी सूक्ष्म क्यों न हो, शासन की गाड़ी को अस्थिर करने की क्षमता रखती है। उन्होंने कहा था कि अधिनियम पूरी लोकसभा और राज्यसभा में एकमत से पास हुआ था। केवल एक राज्यसभा सदस्य की अनुपस्थिति थी। संसद की एकजुटता के बाद अध्यादेश एक संवैधानिक प्रावधान में बदल गया था, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने संसद की भावना यानी लोगों की भावनाओं को दरकिनार कर उसे रद्द कर दिया।

कॉलेजियम छोड़ने को तैयार नहीं सुप्रीम कोर्ट

किरेन रिजेजू और उपराष्ट्रपति के बयान के बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को लेकर और सख्त हो गया। हाल में में कोर्ट ने कहा कि जब तक कॉलेजियम सिस्टम है, उसे सरकार को मानना पड़ेगा। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा था कि अगर उसे कॉलेजियम के खिलाफ कोई कानून पास करना है तो करे, लेकिन उसकी न्यायिक समीक्षा का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के ही पास है। यह सीधे शब्दों में धमकी थी।

कोर्ट ने केंद्र सरकार से यहाँ तक कह दिया कि वह अपने मंत्रियों को कॉलेजियम के खिलाफ सार्वजनिक रूप बोलने पर रोक लगाए। 8 दिसंबर 2022 को अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमानी से कहा कि सरकार उन्हीं कानूनी सिद्धांतों के तहत काम करे, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने तय किया है। जस्टिस संजय किशन कौल ने कॉलेजियम की तुलना संसद में बनाए गए कानून से की।

‘मानवीय सहायता’ पर UN में वोटिंग, भारत ने किया किनारा: कहा – आतंकी उठाते हैं गलत फायदा

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका और आयरलैंड की ओर से लाए गए एक प्रस्ताव से भारत ने दूरी बना ली है। इस प्रस्ताव में मानवीय सहायता को संयुक्त राष्ट्र के सभी तरह के प्रतिबंधों के दायरे से बाहर रखने की बात कही गई है। भारत ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा है कि मानवीय मदद का आतंकी संगठन गलत इस्तेमाल कर सकते हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुरक्षा परिषद में अमेरिका और आयरलैंड की ओर से लाए गए प्रस्ताव में उन संगठनों को मानवीय सहायता दिए जाने की बात की गई है जिनपर यूएन ने भी प्रतिबंध लगाए हैं। यदि ऐसा होता है तो पाकिस्तान स्थित आतंकवादी समूहों लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद सहित दुनिया भर में प्रतिबंधित आतंकी संस्थाओं को मानवीय सहायता की अनुमति मिल जाएगी।

भारत ने इस प्रस्ताव पर यह कहते हुए ऐतराज जताया कि भारत के पड़ोसी देश के अलावा ब्लैकलिस्ट किए गए आतंकवादी संगठन इस तरह की छूट का फायदा फंडिंग और सदस्यों की भर्ती के लिए उठा सकते हैं। भारत को छोड़कर सभी UNSC सदस्यों ने प्रस्ताव का समर्थन किया। 15 में से 14 देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया जबकि भारत अकेला देश था जिसने प्रस्ताव का विरोध करते हुए वोटिंग से दूरी बना ली। पंद्रह सदस्यीय सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता फिलहाल भारत के पास है।

प्रस्ताव पर अमेरिका ने जोर देकर कहा कि इस प्रस्ताव को अपनाए जाने के बाद अनगिनत जिंदगियों को बचाने में मदद मिलेगी। इस प्रस्ताव में कहा गया है कि किसी मानवीय सहायता के समय पर पहुँच सुनिश्चित करने के लिए फंड और अन्य वित्तीय संपत्तियों के अलावा वस्तुओं और सेवाओं का भुगतान आवश्यक है और यह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के लगाए गए प्रतिबंध समिति और फ्रीज संपत्ति का उल्लंघन नहीं माना जाएगा।

परिषद की अध्यक्ष और यूएन में भारत की स्थायी प्रतिनिधि रुचिरा कंबोज ने प्रस्ताव पर भारत की ओर से कहा कि इस तरह की मानवीय सहायता का फायदा आतंकवादी संगठन पहले भी उठाते रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे उदाहरणों के वजह से ही प्रस्ताव को लेकर हम चिंतित हैं, कंबोज ने पाकिस्तान और उसकी सरजमीं पर मौजूद आतंकी संगठनों का भी परोक्ष रूप से जिक्र किया।

रुचिरा कंबोज ने जमात-उद-दावा का उदाहरण देते हुए कहा, “हमारे पड़ोस में आतंकवादी समूहों के कई मामले सामने आए हैं, जिनमें इस परिषद द्वारा सूचीबद्ध आतंकवादी समूह भी शामिल हैं, जिन्होंने इन प्रतिबंधों से बचने के लिए खुद को मानवीय संगठनों और नागरिक समाज समूहों के तौर पर दिखा रहे हैं। जमात-उद-दावा खुद को मानवीय सहायता वाला संगठन कहता है, लेकिन यह लश्कर-ए-तैयबा के लिए एक सहायक संगठन के तौर पर काम करता है और फंड जुटाने में मदद करता है।”

रुचिरा कंबोज ने आगे कहा, जमात और लश्कर की ओर से संचालित संस्था ‘फलाह-ए-इंसानियत फाउंडेशन’ और जैश-ए-मोहम्मद की ओर से समर्थित संगठन अल-रहमत-ट्रस्ट भी पाकिस्तान में स्थित है। ये आतंकवादी संगठन धन जुटाने और लड़ाकों की भर्ती के लिए मानवीय सहायता की छत्रछाया का उपयोग करते हैं।” रुचिरा कंबोज ने कहा, “भारत 1267 (प्रतिबंध समिति) के तहत प्रतिबंधित ऐसे संगठनों को मानवीय सहायता प्रदान करते समय जरूरी सावधानी बरतने की अपील करता है।”

इतिहास का सबसे तेज़ दोहरा शतक, 24 साल के ईशान किशन ने तोड़ा गेल का रिकॉर्ड: बांग्लादेशी गेंदबाजों हुई ऐसी पिटाई, कोहली भी करने लगे भांगड़ा

भारत के युवा क्रिकेटर ईशान किशन ने आज (10 दिसंबर 2022) बांग्लादेश के खिलाफ एकदिवसीय मैच खेलते हुए जहूर अहमद चौधरी स्टेडियम में रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बनाए। उन्होंने मात्र 126 गेंदों में दोहरा शतक जड़ा और इसी के साथ वह बन गए दुनिया में सबसे तेज डबल सेंचुरी मारने वाले क्रिकेटर। ईशान किशन ने क्रिस गेल का रिकॉर्ड तोड़कर अपना नया रिकॉर्ड बनाया है।

इससे पहले विश्व में केवल 7 खिलाड़ी क्रिकेट जगत में दोहरे शतक के लिए जाने जाते थे। इनमें तीन भारतीय हैं- सचिन तेंदुलकर, रोहित शर्मा और वीरेंद्र सहवाग। अब इसी लिस्ट में ईशान किशन का नाम जुड़ गया है। 24 साल के इस खिलाड़ी ने किस ग्रेल को पछाड़ अपने नाम ये उपलब्धि की है। गेल ने जिम्बाब्वे के खिलाफ 138 गेंदों पर यह कारनामा किया था और किशन ने 126 गेंदों में बांग्लादेश के खिलाफ।

दिलचस्प बात यह है कि सबसे तेज दोहरा शतक मारने के अलावा ईशान ने कई और रिकॉर्ड बनाए हैं। इनमें एक रिकॉर्ड बांग्लादेश की पिच पर सबसे बड़ी पारी खेलने का है। इससे पहले ऑस्ट्रेलिया के शेन वॉटसन ने वहाँ 185 रन बनाए थे। अब किशन, वॉटसन से भी ऊपर आ चुके हैं। इस लिस्ट में तीसरा नाम विराट कोहली का है जिन्होंने बांग्लादेश की पिच पर 183 रन जड़े थे। इसके अलावा किशन की आज की पारी के बाद वह बांग्लादेश में शतक जमाने वाले 5वें भारतीय ओपनर बन गए हैं। उनसे पहले सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली, सहवाग और गौतम गंभीर ही ऐसा कारनामा कर पाए हैं।

बता दें कि ईशान की आज की पारी इतनी शानदारा रही कि उसे देखने के बाद पूर्व कप्तान विराट कोहली भी मैदान में भंगड़ा करते नजर आए। दोनों की साझेदारी के बूते भारत ने पहले 300 से ज्यादा रन बनाए और अब 5 विकट खोकर 382 रन बना चुका है। इसमें से जहाँ 210 रन अब तक अकेले ईशान के हैं।

ईशान के नाम जुड़ी यह उपलब्धि इसलिए भी इतनी यादगार है क्योंकि उन्हें भारतीय क्रिकेट टीम में अचानक मौका मिला। रोहित शर्मा के अंगूठे में आई चोट के बाद ईशान को टीम 11 में मौका मिला और उन्होंने इस अवसर का इस्तेमाल ऐसा किया कि इस समय उनके चर्चे हर जगह हैं। उन्होंने जिस तरह शिखर धवन के आउट होने के बाद पारी संभाली उसे देख लोग अभी से उन्हें 2023 में होने वाले वर्ल्ड कप में शामिल करने की अपील कर रहे हैं।