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‘सतलुज’ में जसवंत सिंह खालड़ा हैं, लेकिन पंजाब में बस से उतारकर मार डाले गए हिंदू यात्री कहाँ हैं? खालिस्तानी आतंकवाद के नैरेटिव से मिटा दिए गए 1800 पुलिसकर्मियों का कत्ल-पत्रकारों की निर्मम हत्या

दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’ को ओटीटी प्लेटफॉर्म Zee5 पर रिलीज करने और फिर हटाए जाने के बाद पंजाब में आतंकवाद (इंसर्जेंसी) के सबसे भयावह दौर पर एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई है। हमेशा की तरह इस बार भी दो तरह के नैरेटिव सामने आए हैं।

पहला वह, जिसमें पंजाब में आतंकवाद के दौरान मारे गए सभी पीड़ितों, चाहे वे सिख हों या हिंदू, की बात होती है। दूसरा वह, जिसमें खालिस्तान समर्थक संगठन और उनके समर्थक इस पूरे दौर को अपने अलगाववादी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। दुर्भाग्य यह है कि अब पहला पक्ष लगातार कमजोर पड़ता जा रहा है।

फिल्म का मूल नाम ‘घल्लूघारा’ था, जिसका अर्थ नरसंहार या जनसंहार होता है। बाद में इसका नाम बदलकर ‘पंजाब 95’ रखा गया और अंततः इसे ‘सतलुज’ नाम से रिलीज किया गया। फिल्म जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और पंजाब में आतंकवाद विरोधी अभियान के दौरान कथित फर्जी मुठभेड़ों, लापता लोगों तथा गुप्त अंतिम संस्कारों की उनकी जाँच पर आधारित है।

भारत में फिल्म हटाए जाने के बाद सिख संगठनों और स्थानीय कार्यकर्ताओं ने गाँवों तथा गुरुद्वारों में इसके सामुदायिक प्रदर्शन शुरू कर दिए। इसे पुलिस की कथित बर्बरता और उस दौर में पीड़ित परिवारों की पीड़ा की दबाई गई कहानी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। समाचार एजेंसी एसोसिएटिड प्रेस के अनुसार इन प्रदर्शनों ने बुजुर्गों की आँखें नम कर दीं, जबकि युवा पीढ़ी पहली बार उस दौर को समझने की कोशिश कर रही है, जिसके बारे में उन्होंने केवल बिखरी हुई कहानियाँ सुनी थीं।

गौरतलब हो कि अवैध हत्याओं की कहानियों के अगर कहीं सबूत हैं तो उन्हें बताना जरूरी है। खालड़ा का अपहरण और हत्या अपराध था और इस मामले में पुलिसकर्मी दोषी भी दहराया गया। कोई भी इस तरह की घटना को नजरअंदाज करने को नहीं कहता, लेकिन ‘सतलुज’ में ये दिखाया गया है कि कैसे इतिहास की कहानी पूरा सच नहीं बताती।

फिल्म की कहानी क्या छोड़ देती है?

फिल्म पंजाब आतंकवाद की कहानी को लगभग पूरी तरह पुलिस कार्रवाई से जोड़कर दिखाती है। इसमें ऐसा चित्रण किया गया है मानो पुलिस अधिकारियों ने संदिग्ध आतंकवादियों और आम नागरिकों की हत्या की हो, जबकि खालिस्तानी आतंकवाद को बिना उसका नाम लिए प्रतिरोध आंदोलन जैसा रूप दिया गया है। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल थी।

यह वही दौर था जब खालिस्तानी आतंकवादी बसें और ट्रेनें रोकते थे, यात्रियों की पहचान पूछते थे और केवल हिंदू होने के कारण उन्हें गोली मार देते थे। जो सिख नेता शांति की बात करते थे, उनकी हत्या कर दी जाती थी। जो पत्रकार आतंकवादियों की भाषा बोलने से इनकार करते थे, उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाता था। सुरक्षित सरकारी परिसरों के भीतर पुलिस अधिकारियों पर बम हमले होते थे। सड़कों पर घात लगाकर पुलिसकर्मियों की हत्या की जाती थी और यहाँ तक कि धार्मिक स्थलों के बाहर भी उन्हें निशाना बनाया जाता था।

इन पीड़ितों की कहानी किसी फिल्म का हिस्सा नहीं बनती। उनके लिए कहीं सामुदायिक प्रदर्शन नहीं होते। उनके अधूरे सपनों पर लंबी बहस नहीं चलती। वे केवल पुराने अखबारों के आँकड़ों में सिमटकर रह गए हैं। यदि आज भी उनका जिक्र होता है तो अखबार के किसी छोटे-से कोने में, जिसे अधिकांश लोग पढ़े बिना आगे बढ़ जाते हैं।

इसी खाली जगह को भरने की कोशिश OpIndia कर रहा है।

इतिहास का वह हिस्सा जो अक्सर छूट जाता है

पंजाब आतंकवाद पर लोकप्रिय चर्चाएँ प्रायः ऑपरेशन ब्लू स्टार से शुरू होती हैं। इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद हुए सिख विरोधी दंगों का जिक्र होता है और फिर पूरा ध्यान पुलिस की आतंकवाद विरोधी कार्रवाई पर केंद्रित हो जाता है।

इन तीनों विषयों की गंभीर समीक्षा होनी चाहिए। इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद सिखों के खिलाफ हुई हिंसा भारतीय लोकतंत्र पर एक कलंक थी। इसी तरह यदि पुलिस द्वारा गैरकानूनी हत्याओं के आरोप लगे हैं तो केवल इसलिए उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि पंजाब आतंकवाद से जूझ रहा था। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब पूरी कहानी यहीं से शुरू कर दी जाती है।

पंजाब में आतंकवाद की शुरुआत पुलिस कार्रवाई से नहीं हुई थी। जब तक सुरक्षा बलों ने व्यापक अभियान शुरू किया, तब तक खालिस्तानी आतंकवाद राज्य को गहरे जख्म दे चुका था।

वह भी एक पंजाब था, जहाँ बसों और ट्रेनों में आतंकवादी यात्रियों की पहचान पूछकर तय करते थे कि कौन जिंदा रहेगा और कौन मारा जाएगा।

वह भी एक पंजाब था, जहाँ बाजारों में हिंदू दुकानदारों को निशाना बनाकर गोलियाँ चलाई जाती थीं।

वह भी एक पंजाब था, जहाँ शांति की कोशिश करने वाले सिख नेताओं को गद्दार घोषित कर मौत के घाट उतार दिया जाता था।

वह भी एक पंजाब था, जहाँ अखबारों के दफ्तर पुलिस सुरक्षा में चलते थे क्योंकि संपादक, संवाददाता, एजेंट, वितरक और यहाँ तक कि अखबार बेचने वाले हॉकर तक आतंकवादियों की हिट लिस्ट में शामिल थे।

और वह भी एक पंजाब था, जहाँ हर सुबह ड्यूटी पर निकलने वाले पुलिसकर्मी के परिवार को यह नहीं पता होता था कि वह शाम तक जीवित लौटेगा या नहीं।

आतंकवाद के शिकार कौन थे?

पंजाब आतंकवाद के पीड़ित केवल हिंदू नहीं थे और केवल सिख भी नहीं थे।

इनमें आम नागरिक थे, नेता थे, पत्रकार थे, पुलिस अधिकारी थे, सरकारी कर्मचारी थे और वे ग्रामीण भी थे जिन पर केवल इतना संदेह था कि उन्होंने सरकार की मदद की है।

इन सभी को जोड़ने वाली एक ही बात थी- या तो उन्हें उनकी पहचान के कारण चुना गया, या वे खालिस्तानी आतंकवाद की राह में बाधा बन गए।

ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले ही शुरू हो चुका था आतंक

आज भी बड़ी संख्या में लोग मानते हैं कि पंजाब में हिंसा की शुरुआत ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ (जिसे स्वर्ण मंदिर में भारतीय सैनिकों द्वारा चलाया गया था) के बाद हुई। जबकि तथ्य इसके बिल्कुल उलट हैं। अलगाववाद का विरोध करने वाले लाला जगत नारायण की 1981 में हत्या कर दी गई थी।

अक्टूबर 1983 में धिलवां के पास आतंकवादियों ने एक बस रोककर छह हिंदू यात्रियों को अलग किया और उन्हें गोली मार दी। अगले ही महीने कपूरथला में इसी तरह एक और बस पर हमला हुआ, जिसमें चार हिंदुओं की हत्या कर दी गई। अप्रैल 1983 में डीआईजी अवतार सिंह अटवाल की स्वर्ण मंदिर के बाहर हत्या कर दी गई। 1984 तक पुलिसकर्मियों और पत्रकारों पर लगातार हमले जारी रहे।

ये घटनाएँ स्पष्ट करती हैं कि ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले ही पंजाब में आतंकवाद पूरी तरह जड़ें जमा चुका था।

हालाँकि यह केवल एक संक्षिप्त झलक है। उस दौर में आतंकवाद जिस भयावह स्तर तक फैल चुका था, उसे कुछ घटनाओं में समेट पाना संभव नहीं।

जब पहचान पूछकर हिंदुओं को मौत के घाट उतारा गया

पंजाब में आतंकवाद के दौरान हुए नरसंहारों की सूची इतनी लंबी है कि उसका हर अध्याय इतिहास में अलग स्थान पाने का हकदार है।

30 नवंबर 1986 को होशियारपुर जिले के खूदा के पास हथियारबंद खालिस्तानी आतंकवादियों ने एक बस रोक दी। उन्होंने यात्रियों की पहचान पूछी और सभी हिंदू यात्रियों को नीचे उतरने का आदेश दिया। जैसे ही वे बस से नीचे उतरे, आतंकवादियों ने उन पर अंधाधुंध गोलियाँ बरसा दीं।

इस हमले में 24 हिंदुओं की मौके पर ही हत्या कर दी गई, जबकि सात अन्य गंभीर रूप से घायल हुए।

Los Angeles Times की रिपोर्ट के अनुसार, आतंकवादियों ने पहले हिंदू यात्रियों को बाकी लोगों से अलग किया और फिर उन्हें निशाना बनाया। अखबार ने इसी वर्ष मुक्तसर के निकट हुई एक और घटना का भी उल्लेख किया, जिसमें पहले सिख यात्रियों को सुरक्षित जाने दिया गया और फिर बस में बचे यात्रियों का सामूहिक नरसंहार कर दिया गया।

ये वे लोग नहीं थे जो आतंकवादियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई मुठभेड़ में मारे गए हों। ये किसी गोलीबारी के बीच फंसे निर्दोष नागरिक भी नहीं थे। इन लोगों को केवल उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर चुना गया, अलग किया गया और योजनाबद्ध तरीके से मौत के घाट उतार दिया गया।

आरएसएस शाखा पर हमला और दहशत फैलाने की साजिश

जून 1989 में मोगा के नेहरू पार्क में चल रही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की प्रातः शाखा पर आतंकवादियों ने हमला कर दिया। हथियारबंद हमलावरों ने स्वयंसेवकों पर गोलियाँ बरसाईं। इतना ही नहीं, उन्होंने घटनास्थल पर पहले से बम भी लगा रखे थे। जब पुलिस और राहत दल घायलों की मदद के लिए पहुँचे तो विस्फोट हुए और हताहतों की संख्या और बढ़ गई।

उस समय खालिस्तानी आतंकवादियों की यही कार्यप्रणाली बन चुकी थी। पहले गोलीबारी करना और फिर बचाव कार्य शुरू होने पर बम विस्फोट कर अधिक से अधिक लोगों को निशाना बनाना।

समकालीन रिपोर्टों के अनुसार इस हमले में कम से कम 24 लोगों की मौत हुई। तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री ने इसे सांप्रदायिक तनाव भड़काने की सुनियोजित कोशिश बताया था। वास्तव में ऐसे अधिकांश हमलों का उद्देश्य यही था।

बसों, ट्रेनों, बाजारों और सार्वजनिक स्थलों पर हिंदुओं को निशाना बनाकर खालिस्तानी संगठन पंजाब के हिंदू समाज में भय पैदा करना चाहते थे। साथ ही वे यह भी चाहते थे कि पंजाब के बाहर सिखों के खिलाफ प्रतिशोधात्मक हिंसा भड़के, जिससे सांप्रदायिक विभाजन और गहरा हो तथा अलगाववादी राजनीति को नई ऊर्जा मिले।

इसलिए ये हत्याएँ केवल गुस्से या प्रतिशोध की घटनाएँ नहीं थीं। ये एक सुनियोजित राजनीतिक और जनसांख्यिकीय रणनीति का हिस्सा थीं।

यदि पंजाब में हुए बड़े आतंकी हमलों की सूची देखी जाए तो धिलवां, मुक्तसर, होशियारपुर, लालरू, फतेहाबाद, अबोहर, मोगा और पंजाब की ट्रेनों में हुए नरसंहार कोई अलग-अलग घटनाएँ नहीं थीं। इन सभी में एक समान पैटर्न दिखाई देता है- पहले हिंदू यात्रियों की पहचान करना, फिर उन्हें अलग करना और उसके बाद उनकी हत्या कर देना।

आज जब पंजाब उग्रवाद की कहानी दोबारा सुनाई जाती है तो बस या ट्रेन से नीचे उतारे गए उन हिंदू यात्रियों का जिक्र अक्सर गायब होता है। आतंकवादी को राजनीतिक संदर्भ मिल जाता है, पुलिस को कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है, लेकिन निर्दोष यात्री केवल एक संख्या बनकर रह जाता है।

खालिस्तान का विरोध करने वाले सिख भी आतंकवादियों के निशाने पर थे

खालिस्तानी आतंकवाद कोई हिंदू और सिख के बीच हुआ संघर्ष नहीं था। इसे इस प्रकार प्रस्तुत करना इतिहास के साथ अन्याय होगा।

यदि ऐसा किया जाता है तो उन हजारों सिखों के साथ भी अन्याय होगा जिन्हें केवल इसलिए मार दिया गया क्योंकि उन्होंने अलगाववाद का विरोध किया, सरकार का साथ दिया या आतंकवादियों के आदेश मानने से इनकार कर दिया।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण संत हरचंद सिंह लोंगोवाल हैं। तत्कालीन शिरोमणि अकाली दल अध्यक्ष लोंगोवाल ने 24 जुलाई 1985 को प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ पंजाब समझौते (Punjab Accord) पर हस्ताक्षर किए थे। इसका उद्देश्य राजनीतिक विवादों का समाधान निकालना और पंजाब को सामान्य लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर वापस ले जाना था। लेकिन यह पहल खालिस्तानी आतंकवादियों को स्वीकार नहीं थी।

समझौते के एक महीने से भी कम समय बाद, 20 अगस्त 1985 को शेरपुर स्थित एक गुरुद्वारे में सभा को संबोधित करते समय लोंगोवाल की गोली मारकर हत्या कर दी गई।

आज चार दशक बाद भी पंजाब की विभिन्न राजनीतिक पार्टियाँ उन्हें शांति और सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक नेता के रूप में याद करती हैं।

लोंगोवाल की हत्या ने स्पष्ट कर दिया कि सशस्त्र अलगाववादी आंदोलन किसी भी सिख नेता को नहीं बख्शेगा, चाहे वह सिख हितों की बात ही क्यों न करता हो। यदि उसने आतंकवाद का समर्थन नहीं किया या भारत के भीतर समाधान तलाशने की कोशिश की, तो उसकी हत्या तय थी।

यही खतरा आम सिखों पर भी मंडरा रहा था। जो ग्रामीण पुलिस को सूचना देते थे, उन्हें मार दिया जाता था।जिस परिवार का कोई सदस्य पुलिस में भर्ती हो जाता था, पूरा परिवार आतंकवादियों के निशाने पर आ जाता था। चुनाव लड़ने या लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने वाले राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी जाती थी।जो पत्रकार खालिस्तान का विरोध करते थे या आतंकवादियों के दावों पर सवाल उठाते थे, उन्हें भी मौत के घाट उतार दिया जाता था।

इसलिए यह समझना बेहद आवश्यक है कि खालिस्तानी आतंकवाद की आलोचना करना सिख समुदाय की आलोचना नहीं है।

दरअसल जो लोग ‘सिख’ और ‘खालिस्तानी’ को एक ही मान लेते हैं, वे सबसे पहले उन्हीं सिखों के बलिदान को मिटा देते हैं जिन्हें खालिस्तानी आतंकवादियों ने मार डाला था।

आज भी जब अलग खालिस्तान की माँग उठती है, तब अधिकांश सिख स्वयं को उस विचारधारा का समर्थक नहीं मानते।

पत्रकारों को चुप कराने के लिए चलाई गई खूनी मुहिम

पंजाब में आतंकवाद केवल आम नागरिकों या पुलिस तक सीमित नहीं था। मीडिया भी आतंकवादियों के प्रमुख निशाने पर था। इसकी शुरुआत 1981 में हुई, जब हिंद समाचार समूह के संस्थापक और पंजाब केसरी के संपादक लाला जगत नारायण की हत्या कर दी गई।

वे खालिस्तानी आतंकवाद के सबसे मुखर आलोचकों में थे और लगातार अलगाववाद के खिलाफ लिख रहे थे।उनकी हत्या के बाद भी आतंकवादियों का अभियान नहीं रुका। मई 1984 में उनके पुत्र और उत्तराधिकारी रोमेश चंद्र की भी हत्या कर दी गई। लेकिन यह केवल दो व्यक्तियों तक सीमित नहीं था।

संपादक, संवाददाता, समाचार एजेंट, अखबार वितरक, हॉकर- जो भी स्वतंत्र पत्रकारिता से जुड़ा था, वह आतंकवादियों की हिट लिस्ट में था।

उद्देश्य स्पष्ट था। यदि संपादक की हत्या से अखबार बंद नहीं होता, तो उसके पूरे वितरण तंत्र को आतंकित कर दिया जाए।

पत्रकारों की हत्या किसी एक अखबार या किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं थी। जो सिख लेखक, वामपंथी कार्यकर्ता या बुद्धिजीवी खालिस्तानी आतंकवाद का विरोध करते थे, वे भी आतंकवादियों के निशाने पर थे।

इसका सबसे भयावह उदाहरण ऑल इंडिया रेडियो के स्टेशन निदेशक एम.एल. मंचंदा का है। मई 1992 में उनका अपहरण कर लिया गया। आतंकवादी संगठन बब्बर खालसा ने मांग की कि ऑल इंडिया रेडियो अपने प्रसारणों की भाषा और शब्दावली आतंकवादियों की इच्छा के अनुसार बदले।

जब सरकार ने यह माँग अस्वीकार कर दी, तो मंचंदा का सिर धड़ से अलग कर दिया गया। बाद में उनका शव अलग-अलग हिस्सों में बरामद हुआ। Committee to Protect Journalists के अनुसार यह हत्या प्रसारकों पर आतंकवादियों द्वारा अपनी तथाकथित आचार संहिता थोपने की कोशिश का हिस्सा थी।

यह केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी। यह पूरे मीडिया जगत को संदेश था कि अब आतंकवादी तय करेंगे कि कौन-सी भाषा बोली जाएगी, समाचार कैसे लिखे जाएँगे और कौन-सा राजनीतिक शब्द स्वीकार्य होगा।

पत्रकारों की हत्या यह भी साबित करती है कि खालिस्तानी संगठन केवल राज्य के खिलाफ हथियारबंद संघर्ष नहीं कर रहे थे। वे उन निहत्थे नागरिकों को भी मारने को तैयार थे जो उनकी विचारधारा और प्रचार का विरोध करते थे।

एक पत्रकार के हाथ में बंदूक होना जरूरी नहीं था। उसका एक लेख ही उसे आतंकवादियों का दुश्मन बना देने के लिए पर्याप्त था।

करीब 1,800 पुलिसकर्मियों ने भी दी थी जान

पंजाब उग्रवाद के अंतिम वर्षों में पंजाब पुलिस की कठोर कार्रवाई पर अक्सर लंबी बहस होती है। लेकिन जिन पुलिसकर्मियों ने इस आतंकवाद से लड़ते हुए अपनी जान गंवाई, उनकी कहानी शायद ही कभी उतनी प्रमुखता से सामने आती है।

पंजाब पुलिस के व्यापक रूप से उद्धृत आँकड़ों के अनुसार आतंकवाद के दौर में 1,784 पुलिस अधिकारी और जवान बलिगान हुए।

2016 में पंजाब पुलिस ने इन शहीदों का व्यक्तिगत रिकॉर्ड तैयार करने की पहल शुरू की। हिंदुस्तान टाइम्स से बातचीत में एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्वीकार किया था कि इतने बड़े बलिदान के बावजूद उनकी कहानियों का कोई व्यवस्थित दस्तावेज उपलब्ध नहीं था।

यह संख्या अपने आप में चौंकाने वाली है, लेकिन केवल आँकड़ा देखने से उस दौर की भयावहता का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

स्वर्ण मंदिर के बाहर डीआईजी की हत्या

25 अप्रैल 1983 को पंजाब पुलिस के डीआईजी अवतार सिंह अटवाल स्वर्ण मंदिर में मत्था टेकने गए थे। जब वे दर्शन कर बाहर निकले, तभी आतंकवादियों ने उन्हें गोली मार दी

समकालीन रिपोर्टों के अनुसार उनका शव लंबे समय तक मंदिर परिसर के बाहर पड़ा रहा, क्योंकि मौजूद लोग भय के कारण उसके पास जाने का साहस नहीं जुटा सके।

उस समय इस घटना को केवल एक हत्या नहीं माना गया था। इसे इस रूप में देखा गया कि राज्य की सत्ता बढ़ते आतंकवाद के सामने असहाय दिखाई देने लगी थी। बाद के वर्षों में कई अधिकारियों ने स्वीकार किया कि इस घटना का पंजाब पुलिस के मनोबल पर गहरा असर पड़ा।

ध्यान देने वाली बात यह है कि अटवाल किसी अभियान का नेतृत्व नहीं कर रहे थे। वे किसी मुठभेड़ में भी शामिल नहीं थे। वे केवल गुरुद्वारे में मत्था टेककर बाहर निकले थे।

पुलिस मुख्यालय भी सुरक्षित नहीं था

जनवरी 1990 में जालंधर स्थित पंजाब आर्म्ड पुलिस (PAP) मुख्यालय में कमांडेंट गोबिंद राम के कार्यालय के भीतर बम विस्फोट हुआ। इस हमले में गोबिंद राम सहित चार पुलिसकर्मी मारे गए।

ऐसी घटनाएँ अपवाद नहीं थीं। कई अधिकारियों की उनके घरों के बाहर हत्या कर दी गई। कई रास्ते में घात लगाकर मारे गए। गश्त के दौरान पुलिस दलों पर हमले हुए। पुलिस चौकियों और थानों को निशाना बनाया गया। वरिष्ठ अधिकारियों के साथ उनके गार्ड और ड्राइवर भी मारे गए।

स्थानीय स्तर पर भर्ती किए गए स्पेशल पुलिस ऑफिसर (SPO) भी इसलिए मारे गए क्योंकि उन्होंने नियमित पुलिस बल की मदद की थी।

आतंकवादी केवल पुलिसकर्मियों तक सीमित नहीं रहे। वे उनके परिवारों को भी धमकाते थे।

संदेश साफ था- यदि कोई पुलिस में शामिल होगा तो मौत केवल उसकी नहीं, उसके पूरे परिवार की भी हो सकती है।

ऐसे माहौल को समझे बिना पंजाब पुलिस की बाद की कार्यप्रणाली का निष्पक्ष मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।

पुलिस की कार्रवाई इतनी कठोर क्यों हुई?

इन तथ्यों का अर्थ यह नहीं है कि पुलिस द्वारा किए गए हर कदम का बचाव किया जाए। यदि किसी निर्दोष व्यक्ति की हत्या हुई, फर्जी मुठभेड़ हुई, गैरकानूनी हिरासत, यातना या गुप्त अंतिम संस्कार हुए, तो उनकी जाँच सबूतों के आधार पर होनी चाहिए।

जसवंत सिंह खालड़ा हत्याकांड में पुलिस अधिकारियों को सजा मिलना भी यही दिखाता है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है।

लेकिन एक दूसरी सच्चाई भी है। पुलिस ने कठोर कार्रवाई अचानक करनी नहीं शुरू की। 1980 के दशक के अंतिम वर्षों और 1990 के दशक की शुरुआत तक पंजाब पुलिस सामान्य कानून-व्यवस्था की चुनौती का सामना नहीं कर रही थी।

उसके अधिकारी व्यवस्थित तरीके से मारे जा रहे थे। मुखबिरों और गवाहों को चुन-चुनकर खत्म किया जा रहा था। आतंकवादियों के पास आधुनिक हथियार, विस्फोटक, सुरक्षित ठिकाने और सीमा पार से समर्थन उपलब्ध था। सरकारी अधिकारियों पर सुरक्षित परिसरों के भीतर भी हमले हो रहे थे।

आतंकवादी यह भी जानते थे कि कुछ प्रतीकात्मक हत्याएँ पूरे राज्य के मनोबल को तोड़ सकती हैं। स्वर्ण मंदिर के बाहर एक डीआईजी की हत्या केवल एक अधिकारी की हत्या नहीं थी। यह हर पुलिसकर्मी के लिए संदेश था कि आतंकवादी वहाँ भी हमला कर सकते हैं, जहाँ राज्य जवाब देने से हिचकिचाता है।

एक पत्रकार की हत्या केवल एक आवाज़ को बंद करना नहीं था। यह पूरे मीडिया जगत को डराने का प्रयास था।

बस से हिंदू यात्रियों को अलग कर गोली मारना केवल कुछ लोगों की हत्या नहीं थी। यह पूरे समाज में भय और सांप्रदायिक तनाव फैलाने की रणनीति थी।

इन्हीं परिस्थितियों में पंजाब पुलिस ने आक्रामक आतंकवाद-रोधी रणनीति अपनाई- खुफिया नेटवर्क मजबूत किए गए, लगातार अभियान चलाए गए और आतंकवादी संगठनों का पीछा तब तक किया गया जब तक उनकी परिचालन क्षमता लगभग समाप्त नहीं हो गई।

इस अभियान ने आतंकवाद को तो तोड़ा, लेकिन इसके साथ-साथ पुलिस पर गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोप भी लगे।

दोनों तथ्य एक साथ सही हो सकते हैं। पुलिस की कार्रवाई कठोर इसलिए हुई क्योंकि वह जिस हिंसा का सामना कर रही थी, लेकिन वह भी असाधारण रूप से क्रूर थी।

इस क्रम को समझाना पुलिस के हर कदम का समर्थन करना नहीं है। लेकिन यदि पहली सच्चाई को पूरी तरह हटा दिया जाए और केवल दूसरी को दोहराया जाए, तो वह इतिहास नहीं, बल्कि पक्षधरता बन जाती है।

कैसे ‘चुनिंदा स्मृति’ इतिहास बदल देती है

सबसे प्रभावी प्रचार हमेशा झूठ गढ़कर नहीं किया जाता। कई बार केवल कुछ घटनाओं को चुन लिया जाता है और बाकी को भुला दिया जाता है।

आतंकवादी को एक बेटे, भाई, श्रद्धालु या अन्याय के शिकार व्यक्ति के रूप में दिखाया जाता है। उसकी शिकायतों को विस्तार से समझाया जाता है। उसके भाषण उद्धृत किए जाते हैं। उसकी तस्वीरें संरक्षित रहती हैं।

लेकिन पीड़ित? उसे केवल इतना कहा जाता है—”24 लोग मारे गए”, “38 लोगों की जान गई” या “15 लोग हताहत हुए।”

यह तरीका केवल खालिस्तानी प्रचार तक सीमित नहीं है। इस्लामी आतंकवाद के कई नैरेटिव में भी यही पैटर्न दिखाई देता है। आतंकवादी के कट्टरपंथी बनने की प्रक्रिया पर लंबी चर्चा होती है। उसकी विचारधारा को ‘गुस्सा’, ‘हाशिए पर धकेले जाने’ या ‘प्रतिरोध’ जैसे शब्दों में प्रस्तुत किया जाता है।

सुरक्षा बलों की प्रतिक्रिया कहानी का केंद्र बन जाती है। जबकि बम धमाकों, गोलीबारी या सांप्रदायिक नरसंहारों में मारे गए निर्दोष लोग केवल शुरुआती पैराग्राफ तक सीमित रह जाते हैं। धीरे-धीरे आतंकवादी की पूरी जीवनी तैयार हो जाती है। लेकिन पीड़ित के हिस्से केवल एक संख्या बचती है।

चुनिंदा इतिहास का एक और तरीका है- राज्य की हर कार्रवाई को सामूहिक उत्पीड़न का प्रमाण मान लेना और आतंकवादी हिंसा को ऐसी प्रतिक्रिया बताना, जिसे ‘संदर्भ’ देकर समझाया जाना चाहिए।

इससे नैतिक क्रम उलट जाता है। आतंक समझने योग्य बन जाता है। जबकि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई ही सबसे बड़ा अपराध दिखाई देने लगती है।

पंजाब का इतिहास इस तरह की एकांगी व्याख्या से कहीं अधिक जटिल है। 1984 के सिख विरोधी दंगों को खालिस्तानी आतंकवाद के आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता। इसी प्रकार पुलिस ज्यादतियों का हवाला देकर खालिस्तानी नरसंहारों को भी नहीं भुलाया जा सकता।

जसवंत सिंह खालरा की हत्या इसलिए उचित नहीं हो जाती कि आतंकवादियों ने पुलिसवालों की हत्या की थी।और पुलिसकर्मियों की शहादत इसलिए महत्वहीन नहीं हो जाती कि कुछ अधिकारियों पर अपराध के आरोप लगे।

ईमानदारी से इतिहास में इन सभी सच्चाइयों के लिए जगह होनी चाहिए।

एक चुनिंदा फिल्म पूरा इतिहास नहीं हो सकती

‘सतलुज’ को अपने दृष्टिकोण से कहानी कहने की पूरी कलात्मक स्वतंत्रता है। यदि उसके निर्माता जसवंत सिंह खालरा, कथित पुलिस अत्याचारों और लापता लोगों के परिवारों पर केंद्रित रहना चाहते हैं, तो यह उनका अधिकार है।

लेकिन कलात्मक स्वतंत्रता किसी अधूरी कहानी को पूरा इतिहास नहीं बना देती। बस से नीचे उतारकर गोली मारा गया हिंदू यात्री भी पंजाब के इतिहास का हिस्सा है। शांति की कोशिश करने वाला वह सिख नेता भी उसी इतिहास का हिस्सा है जिसकी हत्या कर दी गई।

आतंकवाद का विरोध करने वाला वह संपादक भी पंजाब की स्मृति में दर्ज होना चाहिए जिसे इसलिए मार दिया गया क्योंकि उसने कलम नहीं झुकाई। और वह सिपाही भी, जिसका नाम आज केवल किसी पुलिस स्मारक पर दर्ज है।

फिल्म अपना पक्ष चुन सकती है। वह ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ और ‘कहानी कहने की आज़ादी’ का हवाला दे सकती है। लेकिन पत्रकारिता का दायित्व उन चेहरों को भी सामने लाना है, जो उस फ्रेम के बाहर छूट गए।

इसी उद्देश्य से OpIndia आने वाले दिनों में पंजाब आतंकवाद के उन भूले-बिसरे पीड़ितों की कहानियाँ आपके सामने लाएगा, जिनकी स्मृति धीरे-धीरे सार्वजनिक विमर्श से गायब होती जा रही है।

26 साल से जेल में बंद दारा सिंह होंगे रिहा: वकील का दावा, बताया- सुप्रीम कोर्ट ने 15 अगस्त तक जेल से छोड़ने का ओडिशा सरकार को दिया आदेश

ऑस्ट्रेलियाई पादरी ग्राहम स्टेंस हत्याकांड में करीब 26 साल से ओडिशा की जेल में बंद दारा सिंह रिहा होंगे? कई मीडिया रिपोर्टों में इस बात की संभावना जताई गई है। ओडिशा टीवी की रिपोर्ट में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने 15 अगस्त तक दारा सिंह को रिहा करने का आदेश दिया है। यह बात उनके बाद उनके वकील एपी सिंह ने कही है। हालाँकि इस संबंध जारी विस्तृत आदेश के दस्तावेज खबर लिखे जाने तक सार्वजनिक नहीं हुई थी।

इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, “हम इस मामले को 19 अगस्त तक के लिए स्थगित करना उचित समझते हैं। इस बीच, हम उम्मीद करते हैं कि समिति (समय पूर्व रिहाई पर) अपना निर्णय लेगी।” कोर्ट ने ओडिशा सरकार के वकील पीवी योगेश्वरन से दारा सिंह की समय पूर्व रिहाई को लेकर चल रही कार्यवाही की मौजूदा स्थिति के बारे में भी पूछा। मंगलवार (14 जुलाई) को हुई सुनवाई में सरकारी वकील योगेश्वरन ने अदालत को बताया कि रिहाई की समीक्षा करने वाली समिति को जिला अदालत से कुछ दस्तावेजों की आवश्यकता थी, जिन्हें जल्द ही व्यवस्थित कर समिति के पास भेज दिया जाएगा।

यह मामला साल 1999 का है, जब ओडिशा के मनोहरपुर में स्थानीय लोगों को कथित तौर पर ईसाई धर्म में परिवर्तित कराने के आरोप के बीच ऑस्ट्रेलियाई पादरी ग्राहम स्टेंस और उनके दो बेटों की जिंदा जलाकर हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड में दारा सिंह मुख्य आरोपित थे, जिन्हें साल 2000 में ओडिशा की तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान गिरफ्तार किया गया था। तब से लेकर अब तक वे जेल में ही हैं।

साल 2024 में दारा सिंह के परिवार से ऑपइंडिया की टीम ने मुलाकात की थी। उस समय ऑपइंडिया को पता चला कि दारा सिंह के माता-पिता की मृत्यु के समय भी उन्हें अंतिम संस्कार में शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई थी। अब सुप्रीम कोर्ट के इस रुख के बाद उनकी रिहाई की उम्मीदें काफी बढ़ गई हैं।

कैसे रवींद्र पाल बने दारा सिंह

दारा सिंह का मूल नाम रवींद्र कुमार पाल है। रवींद्र पाल के भाई अरविन्द पाल ने ऑपइंडिया को बताया कि उनका परिवार खानदानी तौर पर हिन्दू धर्म को समर्पित है। रवींद्र के पिता भी पूजा-पाठ करके ही अपनी दिनचर्या की शुरुआत करते थे। इंटरमीडियट की पढ़ाई के बाद रवींद्र पाल ने घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए नोएडा में नौकरी शुरू कर दी।

रवींद्र कुमार पाल भी जो काम करते थे, उसको सही समय से अपने अंजाम तक पहुँचाते थे। कर्मठता और लगन को देखते हुए कम्पनी के स्टाफ और अधिकारी रवींद्र कुमार पाल को दारा सिंह नाम से बुलाने लगे थे। उस समय देश में दारा सिंह नाम के एक पहलवान हुआ करते थे। उनकी चर्चा देश-विदेश में थी। इस तरह रवींद्र पाल का नाम दारा सिंह पड़ गया।

नोएडा से शिफ्ट हुए ओडिशा

अरविन्द कुमार पाल हमें आगे बताते हैं कि नोएडा में नौकरी करने के ही दौरान उन्हें ओडिशा का एक साथी मिला। उस साथी से दारा सिंह से इतनी अच्छी दोस्ती हो गई कि दोनों एक-दूसरे के घर आने-जाने लगे। दारा सिंह को ओडिशा पसंद आने लगा और वो कुछ दिनों बाद अपने साथी के साथ नोएडा की नौकरी छोड़ कर ओडिशा में बस गए।

ओडिशा में दारा सिंह ने क्योंझर जिले में प्राइवेट तौर पर बच्चों को पढ़ाने की नौकरी कर ली। वे बच्चों को हिंदी भाषा पढ़ाते थे और साथ ही उन्हें हिन्दू धर्म की अच्छाइयाँ बताते थे। यहाँ बताना जरूरी है कि रवींद्र कुमार पाल उर्फ दारा सिंह मूलत: उत्तर प्रदेश के औरैया के रहने वाले थे। हालाँकि, अब वे ओडिशा को अपनी कर्मभूमि बना लिया था।

ऐसे बजरंग दल से जुड़े दारा सिंह

दारा सिंह के परिजनों ने बताया कि उनके द्वारा स्कूल में की जाने वाली धर्म-चर्चा आसपास के गाँवों में फ़ैल गई। इस चर्चा से प्रभावित होकर कई अभिभावक भी दारा सिंह से हिन्दू धर्म के बारे में बातचीत करने लगे। थोड़े ही दिनों में दारा सिंह की ख्याति पूरे क्योंझर और मयूरभंज आदि जिलों में फ़ैल गई।

‘मुस्लिम होने के कारण फँसा ताहिर हुसैन’ : दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों के बाद बचाव में उतर गया था पूरा वामपंथी गैंग, पूछ रहे थे- अंकित शर्मा की हत्या को क्यों दे रहे हो तवज्जो

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों को 6 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन कुछ परिवारों के जख्म आज भी हरे हैं। उन्हीं में से एक परिवार आईबी अधिकारी अंकित शर्मा का है। 25 फरवरी 2020 को जब पूरा इलाका हिंसा और आगजनी की चपेट में था, तब अंकित शायद यह सोचकर घर से निकले थे कि आसपास के सभी लोग परिचित हैं, तो भला उनके साथ क्या होगा। लेकिन वे इस बात से अनजान थे कि उस उन्मादी इस्लामी कट्टरपंथियों भीड़ के लिए वे कोई पड़ोसी या आईबी अधिकारी नहीं, बल्कि सिर्फ एक हिंदू थे।

घर से निकलने के बाद अंकित शर्मा लापता हुए और अगले दिन उनकी लाश सीधे मस्जिद के पास एक नाले से अत्यंत क्षत-विक्षत स्थिति में बरामद हुई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने पूरी क्रूरता को उजागर कर दिया। मीडिया में छपी उनते हाथ की तस्वीर ने सबको दंग कर दिया। उनके शरीर पर 51 बार चाकुओं से वार किया गया था, उनके अंग छिन्न-भिन्न हो चुके थे और आंतें बाहर आ गई थीं। यह एक ऐसी बर्बरता थी जिसे याद कर आज भी रूह कांप जाती है।

13 जुलाई 2026 को दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत ने जब इस जघन्य हत्याकांड में शामिल आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को दोषी ठहराया है, ये माना है कि उस वीभत्सता के पीछे ताहिर हुसैन का ही हाथ था, तो ऐसे में उन वामपंथी-कट्टरपंथी गिद्धों की करतूत को याद करना जरूरी हो जाता है जिन्होंने बर्बर हत्या पर अपना नैरेटिव गढ़ा था और ताहिर हुसैन को बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, उसे मासूम-बेचारा दिखाया था।

ताहिर हुसैन को बचाने में एक्टिव था पूरा इकोसिस्टम

इस कुत्सित प्रयास में केवल सोशल मीडिया के कट्टरपंथी या वामपंथी यूजर्स ही शामिल नहीं थे, बल्कि राजनेता, कलाकार, पत्रकार और नामी मीडिया संस्थान भी संगठित रूप से सक्रिय थे।

अपने आपको पत्रकार कहने वाली राणा अय्यूब ने ताहिर हुसैन की गिरफ्तारी को सांप्रदायिक रंग देते हुए इस तरह पेश किया जैसे देश में मुस्लिमों को निशाना बनाया जा रहा हो और हिंदुओं को छोड़ा जा रहा है।

वहीं वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने बेशर्मी दिखाते हुए इस बात पर आपत्ति जताई थी कि अंकित शर्मा की हत्या को इतना महत्व क्यों दिया जा रहा है।

और, आरफा खानम शेरवानी ने तो दिल्ली पुलिस द्वारा वांछित ताहिर हुसैन का उस समय में इंटरव्यू लेकर उसे एक आरोपित के बजाय ‘पीड़ित’ के रूप में दिखाने का प्रयास किया था।

इसी तरह, AAP नेता अमानतुल्लाह खान जैसे राजनेताओं ने भी ‘मुस्लिम कार्ड’ खेलते हुए दावा किया कि ताहिर को सिर्फ उसके मजहब के कारण फँसाया जा रहा है। खुद ताहिर हुसैन ये बोलता हुआ मिला था कि अगर निष्पक्ष जाँच हुई तो वो निर्दोषी पाया जाएगा लेकिन अगर उसका ‘नाम’ देखा गया तो उसके साथ कुछ भी हो सकता है। ताहिर हुसैन को पीएफआई तक ने समर्थन दिया था।

साक्षी जोशी और विनोद कापरी जैसे लोगों ने तो ताहिर हुसैन द्वारा पुलिस को किए गए फोन कॉल्स को उसकी बेगुनाही का सबसे बड़ा प्रमाण बताया। जबकि पुलिस जाँच में यह तथ्य सामने आया कि वे कॉल्स खुद को कानूनी रूप से बचाने के लिए चली गई एक सोची-समझी चाल थे।

बॉलीवुड फिल्म निर्माता अनुराग कश्यप ने तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया। उन्होंने ताहिर हुसैन, उमर खालिद और खालिद सैफी के बचाव में तर्क दिया कि दंगों की साजिश की तारीखें और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा का समय मेल नहीं खाते।

जबकि, बाद में पुलिस जाँच में यह साफ हो गया कि यह साजिश बहुत पहले से और गहराई से रची गई थी।

इसी तरह जावेद अख्तर ने लिखा था, “कई मारे गए, कई सारे घायल हुए, कई घर जला दिए गए, कई दुकानें लूटी गईं। कई लोगों को नुक़सान हुआ लेकिन पुलिस ने केवल एक घर सील किया और उसके मालिक को ढूँढ रही है। संयोगवश उसका नाम ताहिर हुसैन है, दिल्ली पुलिस की कंसिस्टेंसी को सलाम है।”

बॉलीवुड गायक और म्यूजिक कंपोजर विशाल ददलानी ने भी ताहिर हुसैन को बेकसूर बताया। विशाल ने ट्विटर पर लिखा कि दंगो में शामिल कोई शख्स पुलिस को फोन क्यों करेगा।

इस पूरे मामले में डिजिटल और मुख्यधारा के मीडिया के एक वर्ग ने भी ताहिर को निर्दोष दिखाने में अपनी ओर से कसर नहीं छोड़ी थी। बढ़-चढ़कर ताहिर का पक्ष बताने की होड़ लगी थी।

द वायर जैसी प्रोपगेंडा साइट ने ने शुरुआत में ही ताहिर हुसैन के पक्ष को रखने के लिए एक पूरा शो समर्पित कर दिया था, जहाँ उसकी बातों को ही तवज्जो दी गई।

वहीं द लल्लनटॉप ने घटना के एक साल बाद एक- देहली नाम से वीडियो/डॉक्यूमेंट्री जारी की थी। इसमें नजर आई इंडिया टुडे की पत्रकार ने यह नैरेटिव गढ़ने का प्रयास किया गया कि अंकित शर्मा स्वयं भीड़ का हिस्सा थे और मुस्लिम इलाके की तरफ बढ़ रहे थे, जिससे पीड़ित को ही एक तरह से दोषी के रूप में कटघरे में खड़ा कर दिया गया था।

ताहिर को बचाने के लिए वामपंथियों ने नकारे सारे सबूत

गौरतलब हो कि दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों के बाद सबसे हैरानी की बात यह है कि ‘लिबरल और इस्लामी गिरोह’ द्वारा यह पूरा प्रोपेगैंडा तब चलाया जा रहा था, जब ताहिर हुसैन के घर की छत से भारी मात्रा में पत्थर, पेट्रोल बम और तेजाब की बोतलें बरामद हुई थीं, सोशल मीडया पर हर जगह उसके खुद छत पर होने के वीडियो वायरल थे, अंकित के परिजन रो-रोकर ताहिर को मुख्य साजिशकर्ता बता रहे थे, एक के बाद एक इस्लामी कट्टरपंथी गिरफ्तार हो रहे थे, ताहिर अपने कुकर्म स्वीकार रहा था या अदालत ये कह रही थी उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंदुओं पर हुए हमले एक सुनियोजित और गहरी साजिश का हिस्सा थे।

आज जब यह मामला न्याय की दहलीज पर है, ताहिर हुसैन को सजा मिलना शेष है, तब अपराधियों के साथ-साथ उनके इन पैरोकारों के चेहरों को भी याद रखना जरूरी है। यह इतिहास में दर्ज रहेगा कि कैसे एक निर्दोष युवक को 51 बार चाकुओं से गोदे जाने की क्रूरता को भुलाकर, इस वामपंथी गिरोह ने सिर्फ अपने राजनीतिक और वैचारिक एजेंडे के लिए एक दंगाई और हत्यारे के बचाव में एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था।

मोहम्मद अहद से लेकर सद्दाम तक: बिहार में एक्टिव आतंकवाद का ‘स्लीपर सेल’ क्या बताता है?

बिहार में हाल के दिनों में सुरक्षा एजेंसियों की मुस्तैदी से कई ऐसे चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं, जिन्होंने राज्य की सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया तंत्र को पूरी तरह अलर्ट पर डाल दिया है। केंद्रीय जाँच एजेंसी (NIA), स्पेशल टास्क फोर्स (STF) और बिहार पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में कटिहार से मोहम्मद अहद नाम के एक संदिग्ध युवक की गिरफ्तारी ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि सीमा पार बैठे भारत विरोधी तत्व लगातार देश को दहलाने की साजिश रच रहे हैं।

मोहम्मद अहद को पाकिस्तानी आतंकी संगठन का एक सक्रिय ‘स्लीपर सेल’ बताया जा रहा है, जो सोशल मीडिया के जरिए सीधे पाकिस्तानी नेटवर्क के संपर्क में था, लेकिन यह कोई इकलौता मामला नहीं है। पिछले कुछ महीनों के भीतर बिहार के अलग-अलग जिलों जैसे मधुबनी, मुंगेर और मुजफ्फरपुर से भी इसी तरह के संदिग्धों को दबोचा गया है।

पुलिस की गिरफ्त में मोहम्मद अहद (फोटो साभार: जागरण)

इन सभी मामलों की कड़ियों को आपस में जोड़ने पर एक बेहद खतरनाक और सुव्यवस्थित पैटर्न उभर कर सामने आता है। ये गिरफ्तारियाँ इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि बिहार आतंकियों के निशाने पर हैं, जहाँ वे स्थानीय युवाओं का ब्रेनवॉश कर एक बड़ा नेटवर्क खड़ा करने की साजिश रच रहे हैं।

गिरफ्तारियों में ‘कॉमन फैक्टर’ और पाकिस्तानी गैंगस्टर्स का कनेक्शन

अगर हम हाल के दिनों में बिहार से हुई तमाम गिरफ्तारियों का बारीकी से विश्लेषण करें, तो इन सब में कुछ बेहद खतरनाक और समान बातें देखने को मिलती हैं। सबसे बड़ी समानता यह है कि इन सभी संदिग्धों के तार सीधे तौर पर सीमा पार यानी पाकिस्तान में बैठे आकाओं से जुड़े हुए हैं।

चाहे वह कटिहार का मोहम्मद अहद हो, मुंगेर का मोहम्मद सद्दाम हो या फिर मुजफ्फरपुर से पकड़ा गया मोहम्मद अली, ये सभी लोग किसी न किसी रूप में पाकिस्तानी नेटवर्क के संपर्क में थे। कटिहार से पकड़े गए अहद के मामले में सुरक्षा एजेंसियों ने खुलासा किया कि वह पाकिस्तानी गैंगस्टर राणा हुसैन और शहजाद भट्टी के नेटवर्क से लगातार संपर्क में था।

मुंगेर से गिरफ्तार मोहम्मद सद्दाम के तार भी ‘राणा भाई’ गैंग से जुड़े पाए गए थे, जो सीमा पार के एक संदिग्ध नेटवर्क का संचालन करता था। यह इस बात का सबूत है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियाँ और आतंकी संगठन अब वहाँ के स्थानीय गैंगस्टर्स और अपराधियों के नेटवर्क का इस्तेमाल भारत में स्लीपर सेल बनाने और हथियारों की सप्लाई के लिए कर रहे हैं।

दूसरा सबसे बड़ा कॉमन फैक्टर इन सभी का डिजिटल कनेक्शन है। ये सभी संदिग्ध आम तौर पर समाज के बीच बेहद सामान्य जिंदगी जी रहे थे, लेकिन डिजिटल दुनिया में ये देश के खिलाफ एक अघोषित युद्ध लड़ रहे थे। वॉट्सएप, फेसबुक, टेलीग्राम और सिग्नल जैसे प्लेटफॉर्म्स के जरिए इन्हें सीमा पार से निर्देश मिल रहे थे।

इनका मुख्य काम बिहार के अन्य पिछड़े इलाकों के गरीब और कम पढ़े-लिखे युवाओं को ढूँढना, मजहबी आधार पर उनका ब्रेनवॉश करना और उन्हें भारत विरोधी गतिविधियों के लिए भड़काकर एक नया नेटवर्क तैयार करना था।

पिछले कुछ महीनों के प्रमुख मामले: बिहार में आतंकी नेटवर्क की सक्रियता

बिहार में पिछले एक-दो महीनों के भीतर सुरक्षा एजेंसियों ने ताबड़तोड़ कार्रवाइयाँ करते हुए कई बड़े मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया है। हाल ही में बिहार ATS और स्थानीय पुलिस ने एक बड़े कट्टरपंथी मॉड्यूल का भंडाफोड़ करते हुए मधुबनी जिले के पंडौल थाना क्षेत्र से 50 साल के मदरसा संचालक मौलाना इजहार-उल-हक को गिरफ्तार किया।

इजहार को एक पाकिस्तानी एजेंट बताया गया है जो बिहार में स्लीपर सेल तैयार करने और कट्टरपंथी मॉड्यूल की फंडिंग का काम संभाल रहा था। उसके पास से कई भड़काऊ वीडियो मिले, जिनमें भारत में शरीयत कानून लागू करने की बातें कही गई थीं। इस मॉड्यूल के तार पाँच राज्यों से जुड़े थे और इजहार की गिरफ्तारी इस सिलसिले में छठी बड़ी कामयाबी थी।

इसी तरह मुंगेर पुलिस ने तारापुर थाना क्षेत्र के मिलिक थानपुर गाँव में देर रात छापेमारी कर मोहम्मद सद्दाम नाम के युवक को गिरफ्तार किया। सद्दाम पिछले दो-तीन साल से मुंबई में रह रहा था और वहीं वह ‘राणा भाई’ नामक पाकिस्तानी नेटवर्क के संपर्क में आया था। मुंबई में जब सुरक्षा एजेंसियों की धर-पकड़ बढ़ी, तो वह भागकर मुंगेर आ गया।

पुलिस ने उसके पास से एक देसी पिस्तौल और मोबाइल बरामद किया है। वह अपने दो अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर किसी बड़ी आतंकी वारदात को अंजाम देने की फिराक में था। इसके अलावा 2 साल पहले गुजरात की सूरत स्पेशल ब्रांच की टीम ने बिहार पुलिस के सहयोग से मुजफ्फरपुर के सकरा थाना क्षेत्र से मोहम्मद अली को गिरफ्तार किया।

मोहम्मद अली पर भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा और हिंदू नेता उमेश्वर राणा को जान से मारने की धमकी देने और साजिश रचने का आरोप था। वह नेपाल में बैठकर इंटरनेट के माध्यम से आपत्तिजनक टिप्पणियाँ और साजिशें रचता था। उसका नेटवर्क सूरत के एक मौलाना और पाकिस्तान के कट्टरपंथी सदस्यों से जुड़ा हुआ था।

इसी तरह बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के बेतिया में पुलिस ने पाकिस्तान से जुड़े संदिग्ध वॉट्सऐप चैट के मामले में 25 वर्षीय खुर्शीद आलम को गिरफ्तार किया था। पुलिस के मुताबिक, आरोपित के मोबाइल फोन में पाकिस्तान के फोन नंबरों के साथ बातचीत और कई क्यूआर कोड मिलने के बाद यह कार्रवाई की गई थी।

बिहार के सीमावर्ती जिले मधुबनी में सुरक्षा एजेंसियों ने अंतरराष्ट्रीय जाली नोट नेटवर्क के शातिर अपराधी अबुल इनाम उर्फ लादेन को गिरफ्तार किया था। अबुल इनाम पर केवल जाली नोट चलाने का ही नहीं, बल्कि एक पाकिस्तानी नागरिक मोहम्मद मस्तान को सुरक्षित नेपाल के रास्ते भगाने का भी गंभीर आरोप था।

पुलिस के मुताबिक, लादेन इस गैंग का मुख्य लोकल ऑपरेटर था। वह सीमा पार से आने वाले संदिग्धों को पनाह और रास्ता मुहैया कराता था। आंध्र प्रदेश और दिल्ली पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में हुए अंतर-राज्यीय ऑपरेशन में 12 आतंकवादियों को गिरफ्तार किया गया था। इनमें बिहार के शादमान दिलकुश, अजमनुल्लाह खान भी शामिल थे।

पुलिस की छानबीन में इनके संबंध अल-कायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंट (AQIS) और ISIS से जुड़े सामने आए। जाँच में ये भी पता चला है कि ये आतंकी एक गेमिंग ऐप के जरिए विदेशी हैंडलरों के संपर्क में थे और इनके तार ISIS से संबंध रखने वाले Benex Com नामक एक समूह से भी जुड़े थे।

PFI का ‘मिशन 2047’: बिहार से ही खुला था देश को इस्लामिक मुल्क बनाने की साजिश का राज

बिहार का आतंकी कनेक्शन आज का नहीं है, बल्कि देश को हिला देने वाली कई बड़ी साजिशों के तार इसी राज्य से खुले हैं। इसका सबसे बड़ा और पुख्ता सबूत साल 2022 में तब मिला, जब पटना के फुलवारी शरीफ में पुलिस ने एक संदिग्ध नेटवर्क का भंडाफोड़ किया था।

इस छापेमारी के दौरान पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) से जुड़े दो मुख्य आरोपितों, अथर परवेज और मोहम्मद जलालुद्दीन को गिरफ्तार किया गया था। इनके पास से जो दस्तावेज बरामद हुए, उसने पूरे देश के सुरक्षा महकमे को हिलाकर रख दिया।

इस दस्तावेज का नाम ‘India Vision 2047’ था, जिसकी टैगलाइन ‘Towards Rule of Islam in India’ थी। इस गुप्त दस्तावेज में साल 2047 तक, यानी भारत की आजादी के 100 साल पूरे होने तक, भारत को एक पूर्ण इस्लामिक राष्ट्र में बदलने की एक बहुत ही खतरनाक और चरणबद्ध योजना तैयार की गई थी।

इस योजना के पहले चरण में देश के अलग-अलग मुस्लिम संप्रदायों को PFI के झंडे तले इकट्ठा करने और एक ऐसी कट्टरपंथी पहचान बनाने पर जोर था जो राष्ट्रीय पहचान से ऊपर हो। युवाओं को लाठी, रॉड, तलवार और अन्य हथियारों को चलाने का आक्रामक प्रशिक्षण देने की बात कही गई थी।

दूसरे चरण में अपने विरोधियों के मन में डर पैदा करने और अपनी ताकत दिखाने के लिए चुनिंदा हिंसा का सहारा लेने का प्रस्ताव था। जिन कार्यकर्ताओं में ज्यादा आक्रामकता दिखाई दे, उन्हें उन्नत हथियारों और विस्फोटकों का प्रशिक्षण देने की योजना थी।

सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि इस अंतिम हिंसक उद्देश्य को छुपाने के लिए कार्यकर्ताओं को भारतीय संविधान, राष्ट्रीय ध्वज और डॉ बीआर आंबेडकर जैसे प्रतीकों और शब्दों का इस्तेमाल करने का निर्देश दिया गया था ताकि वे कानून की नजरों से बच सकें।

इसके बाद तीसरे चरण में PFI अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के साथ राजनीतिक गठबंधन बनाना चाहता था ताकि बहुसंख्यक समाज को आपस में लड़ाया जा सके। संगठन का लक्ष्य खुद को अल्पसंख्यकों और वंचितों का एकमात्र मसीहा साबित करना था।

इसी चरण में भारी मात्रा में हथियार और विस्फोटक जमा करने और विरोधियों पर सुनियोजित हमले करने की बात भी शामिल थी। चौथे और आखिरी चरण में PFI ने खुद को देश के मुसलमानों का निर्विवाद नेता बनाने और राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता हथियाने की कल्पना की थी।

सत्ता के करीब पहुँचते ही अपने वफादार लोगों को कार्यपालिका, न्यायपालिका, पुलिस और सेना में भर्ती करने की योजना थी। इसके बाद मौजूदा लोकतांत्रिक संविधान को हटाकर देश में इस्लामिक संविधान लागू करने का अंतिम लक्ष्य था।

इसके लिए हर मुस्लिम परिवार से एक सदस्य की भर्ती और एक समर्पित सशस्त्र बल तैयार करने का खाका खींचा गया था, जो जरूरत पड़ने पर तुर्की जैसे विदेशी इस्लामिक मुल्कों की मदद से भारतीय राज्य के साथ अंतिम संघर्ष कर सके।

इस दस्तावेज के सामने आने के बाद ही केंद्र सरकार ने कड़ा रुख अपनाते हुए सितंबर 2022 में गैरकानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम के तहत PFI और उससे जुड़े 8 अन्य संगठनों पर 5 साल का प्रतिबंध लगा दिया था।

स्लीपर सेल के खुलासों और भंडाफोड़ के पुराने मामले

मध्य प्रदेश से गिरफ्तार इजहार उल हक ने पूछताछ में यह कबूला था कि उनके स्लीपर सेल पूरे देश में शांत बैठे हुए हैं, जो सिर्फ सही समय और ऊपर से मिलने वाले आदेश का इंतजार कर रहे हैं ताकि वे बाहर निकलकर बड़ी तबाही मचा सकें। स्लीपर सेल का यह खतरा कोई नया नहीं है। भारत में पिछले दो दशकों से यह पैटर्न लगातार देखा जा रहा है।

स्लीपर सेल ऐसे प्रशिक्षित आतंकवादी या समर्थक होते हैं जो किसी भी आम नागरिक की तरह समाज में रहते हैं और कोई नौकरी, दुकान या पढ़ाई करते हैं जिससे किसी को शक न हो। वे तब तक कोई संदिग्ध गतिविधि नहीं करते जब तक कि उन्हें आकाओं द्वारा किसी विशेष हमले को अंजाम देने का निर्देश न मिले।

2012 में मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल के समय भी देश के भीतर इंडियन मुजाहिदीन और सिमी जैसे संगठनों के स्लीपर सेल्स का एक बड़ा नेटवर्क सामने आया था।

उस दौरान दिल्ली, मुंबई, जयपुर, अहमदाबाद और बोधगया में हुए सिलसिलेवार धमाकों की जाँच में यह बात साफ हुई थी कि आतंकियों को स्थानीय स्तर पर इन्हीं स्लीपर सेल्स ने लॉजिस्टिक्स, रहने की जगह और रेकी करने में मदद पहुँचाई थी।

उस समय भी बिहार के दरभंगा और समस्तीपुर जैसे जिलों से कई संदिग्धों को गिरफ्तार किया गया था, जिसे सुरक्षा एजेंसियों ने दरभंगा मॉड्यूल का नाम दिया था। इसके बाद साल 2020 के दौरान देश में ISIS के कई डिजिटल मॉड्यूल्स का पता चला।

जाँच में सामने आया कि सीरिया और इराक में बैठे हैंडलर्स भारत के पढ़े-लिखे युवाओं को इंटरनेट के माध्यम से प्रभावित कर रहे थे और इस दौरान भी बिहार और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में छापेमारी कर ऐसे युवाओं को पकड़ा गया जो ऑनलाइन माध्यमों से कसम लेकर देश में अकेले दम पर हमला करने की फिराक में थे।

वहीं साल 2023 में भी NIA ने देश के कई राज्यों में एक साथ छापेमारी कर अल-कायदा और ISIS से प्रेरित मॉड्यूल्स का भंडाफोड़ किया था। इस दौरान भारी मात्रा में डिजिटल साक्ष्य, प्रतिबंधित साहित्य और हथियार बरामद किए गए थे, जिसमें बिहार से हुई कई गिरफ्तारियों ने यह साबित किया कि स्लीपर सेल्स का जाल समय के साथ और अधिक फैल चुका है।

डिजिटल प्लेटफॉर्म: आतंकियों का नया और सुरक्षित ‘हथियार’

आज के समय में आतंकवादियों को अपना नेटवर्क चलाने के लिए किसी गुप्त जगह पर आमने-सामने मिलने की जरूरत नहीं रह गई है। आधुनिक तकनीक और इंटरनेट ने उनके काम को बेहद आसान और सुरक्षित बना दिया है, यही कारण है कि अब सुरक्षा एजेंसियाँ आतंकवाद के इस नए रूप को डिजिटल जिहाद का नाम दे रही हैं।

टेलीग्राम, सिग्नल, थ्रेमा और वॉट्सएप जैसे एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स इन आतंकियों के सबसे बड़े मददगार बन गए हैं क्योंकि इन ऐप्स पर होने वाली बातचीत को आसानी से ट्रैक नहीं किया जा सकता, जिससे ये कानून और सुरक्षा एजेंसियों की नजरों से बचे रहते हैं। आतंकी इन प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल बहुत ही शातिराना तरीके से करते हैं।

जैसे टेलीग्राम और सिग्नल पर वे सीक्रेट चैट का उपयोग करते हैं, जहाँ संदेश अपने आप नष्ट हो जाते हैं और बिना नंबर दिखाए बड़े-बड़े ग्रुप्स का संचालन किया जाता है। वहीं फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भड़काऊ और प्रोपेगैंडा वीडियो शेयर करके समाज से असंतुष्ट युवाओं की पहचान की जाती है।

इन सब के साथ डार्क वेब और वीपीएन तकनीक का सहारा लेकर वे अपनी पहचान पूरी तरह छुपा लेते हैं और विदेशी आकाओं से बात करने के साथ-साथ क्रिप्टोकरेंसी के जरिए फंड ट्रांसफर का काम भी करते हैं। इन डिजिटल टूल्स की वजह से भारत के भोले-भाले युवाओं को निशाना बनाना बहुत आसान हो गया है।

पाकिस्तानी हैंडलर्स सोशल मीडिया पर लगातार नजर रखते हैं कि कौन से युवा देश की नीतियों या धार्मिक\मजहबी मुद्दों पर ज्यादा आक्रामक या असंतुष्ट हैं और फिर उन्हें निशाना बनाया जाता है। शुरुआत में उन्हें धार्मिक साहित्यों और वीडियो के जरिए जोड़ा जाता है और धीरे-धीरे उनके मन में देश के प्रति नफरत का बीज बो दिया जाता है।

उन्हें यह विश्वास दिलाया जाता है कि उनके साथ अन्याय हो रहा है और इसका एकमात्र उपाय व्यवस्था के खिलाफ खड़ा होना है। जब युवा पूरी तरह उनके मानसिक नियंत्रण में आ जाता है, तब उसे टेलीग्राम या सिग्नल के किसी गुप्त ग्रुप में शामिल कर लिया जाता है, जहाँ उसे हथियार चलाने, प्रोपेगैंडा फैलाने या स्लीपर सेल के रूप में काम करने के निर्देश दिए जाते हैं।

कटिहार के मोहम्मद अहद और मुंगेर के सद्दाम के मोबाइल से मिले पाकिस्तानी नंबर और चैट इसी डिजिटल ब्रेनवाशिंग की कहानी बयां करते हैं। बिहार में लगातार मिल रहे स्लीपर सेल्स के सुराग यह दिखाते हैं कि देश के सामने आंतरिक सुरक्षा की चुनौती कितनी गंभीर है, हालाँकि सुरक्षा एजेंसियाँ एक-एक कर इनका सफाया कर रही हैं।

लाहौर में 79 साल बाद खुला ऐतिहासिक गुरुद्वारा, दिखावे के बीच पाकिस्तान में जमीनी हकीकत जस की तस: समझें ये विरासत संरक्षण के नाम पर सॉफ्ट पावर चमकाने की क्यों है कोशिश

आजकल ऐसा दिखाया जा रहा है कि पाकिस्तान इन दिनों सभ्यतागत चीजों की तरफ बढ़ रहा है। हालाँकि जमीन पर ऐसा कुछ है नहीं लेकिन अपने यहाँ का लेफ्ट लिबरल मीडिया खबरों के जरिए पाकिस्तान को बड़ा ग्लैमराइज कर रहा है कि वो अब सिख विरासतों को संजोने और उनके जीर्णोद्धार का काम कर रहा है।

द वायर की ये खबर आप देखिए। लाहौर में 79 साल बाद खुला पातशाही छेंवी गुरुद्वारा। लाहौर-कसूर रोड पर मौजूद इस गुरुद्वारे का संबंध सिखों के छठे गुरु गुरु हरगोबिंद साहिब जी से है।

इस गुरुद्वारे का निर्माण 1923 में हुआ था। तब ये काफी बड़े क्षेत्र में फैला हुआ था। यहाँ पर लंगर की व्यवस्था होती थी, उस वक्त यहाँ पर एक बड़ा सरोवर भी था और श्रद्धालुओं के ठहरने की व्यवस्था भी थी।

अब पार्टिशन के बाद जो अन्य गुरुद्वारों या मंदिरों के साथ हुआ उसी दर्द से ये गुरुद्वारा भी गुजरा। बँटवारे की हिंसा में ये गुरुद्वारा बुरी तरह प्रभावित हुआ। सिख समुदाय के लोग भी पाकिस्तान से भारत आ गए और गुरुद्वारा वीरान हो गया। इसके सरोवर को मिट्टी से भर दिया गया। जमीन पर कब्जा कर लिया गया और गुरुद्वारे के भीतर एक पीर की मजार तक बना दी गई।

ये सब किसने किया होगा? शायद मुझे ये सब बताने की जरूरत नहीं है, आप खुद इतने समझदार हैं ये समझने के लिए कि पाकिस्तान के मुसलमानों ने ये सब कारनामे किए।

लेकिन ये सब छुप जाएगा उस हेंडिग के पीछे कि पाकिस्तान में गुरुद्वारे का जीर्णोद्धार या 79 साल बाद खुला। दरअसल, इसे पाकिस्तान की छवि सुधार कार्यों में दिखाने की कोशिश की जा रही है और ये ऐसे मौकों पर हो रही है, जब इधर पंजाब में असेंबली इलेक्शन होने हैं। और जब सतलुज फिल्म पर एक तरह की टशन देखने को मिल रही है कि इस फिल्म ने खालिस्तानी नैरेटिव को एकतरफा दिखाया है और सिक्के के दूसरे पहलू को छुआ तक नहीं है और इवन पाकिस्तान ने जो खालिस्तान आंदोलन को उस वक्त फ्यूल दिया, उसकी भी कोई चर्चा इस फिल्म में देखने को नहीं मिलती है।

हैरानी की बात तो ये है कि पाकिस्तान में सतुलज फिल्म के रिलीज की माँगें उठ रही हैं। फिल्म को बिना देखे ही वो इसकी जमकर तारीफ भी कर रहे हैं और अपनी सरकार से माँग कर रहे हैं कि वो सभी सिनेमाघरों में इस फिल्म को रिलीज करें।

ये वही पाकिस्तानी हैं, जो धुरंधर का विरोध कर रहे थे, उसे प्रॉपगेंडा फिल्म बता रहे थे। तब पाकिस्तान में धुरंधर पर आधिकारिक तौर से बैन लगा दिया गया था क्योंकि उसमें पाकिस्तान एक्सपोज हो रहा था और इस फिल्म में चूँकि पाकिस्तान का कहीं कोई निशान नहीं है तो उसे अपने यहाँ रिलीज करने की माँग कर रहे हैं।

ऐसे समय में जब पाकिस्तान में 79 साल बाद एक ऐतिहासिक गुरुद्वारे का जीर्णोद्धार कर उसे खोला गया और दूसरी ओर सतलुज जैसी फिल्म को वहाँ से सार्वजनिक समर्थन मिल रहा है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह सिर्फ अलग-अलग घटनाएँ हैं या फिर पाकिस्तान सिख पहचान और पंजाब से जुड़े मुद्दों को अपनी सॉफ्ट पावर और नैरेटिव बिल्डिंग के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है और इसे भारत का लेफ्ट लिबरल मीडिया ग्लैमराइज कर रहा है।

जबकि पाकिस्तान का सच तो इससे बिलकुल अलग है। अगर पाकिस्तान को इतनी चिंता होती है या सिख विरासतों को संजोने का उसका सच में मन होता तो वो गुरुद्वारों को क्यों तोड़ता? अभी हाल ही में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में 125 साल पुराने एक ऐतिहासिक गुरुद्वारे का ढहा दिया गया। ये खबर कोई बहुत पुरानी नहीं है पिछले महीने जून की खबर है।

पाकिस्तान में ढहाए गए गुरुद्वारे की तस्वीर, फोटो साभार: ndtvimg

अगर पाकिस्तान वास्तव में सिख विरासत के संरक्षण को लेकर गंभीर है तो एक सवाल उसके अपने इतिहास से भी जुड़ता है। 1947 के बँटवारे के बाद पाकिस्तान में मौजूद सैकड़ों छोटे-बड़े ऐतिहासिक गुरुद्वारे धीरे-धीरे लोगों की यादों से ही गायब हो गए।

आज स्थिति ये है कि अमेरिका में रहने वाले रिसर्चर तरुणजीत सिंह बुटालिया को 1884 और 1947 से पहले पब्लिश्ड गुरमुखी पुस्तकों की मदद से इन भूले-बिसरे गुरुद्वारों की दोबारा खोज करनी पड़ रही है। इन पुस्तकों में पाकिस्तान में मौजूद करीब 250 ऐतिहासिक सिख स्थलों का उल्लेख मिलता है। इनमें से कई गुरुद्वारे खंडहर बन चुके हैं, कई पर मुसलमानों ने कब्जा कर लिया, कुछ स्कूलों या दूसरी इमारतों में बदल गए और कई पूरी तरह मिट चुके हैं। सिर्फ लाहौर जिले में दर्ज 38 ऐतिहासिक सिख स्थलों में से आज केवल 5 ही गुरुद्वारों के रूप में सक्रिय हैं, जबकि बाकी या तो जर्जर हैं, अतिक्रमण का शिकार हैं या उनका अस्तित्व ही समाप्त हो चुका है।

अमेरिका में रहने वाले रिसर्चर तरुणजीत सिंह बुटालिया

ऐसे में अगर आज पाकिस्तान 79 साल बाद किसी एक ऐतिहासिक गुरुद्वारे को बड़े स्तर पर खोलता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह वास्तव में दशकों से उपेक्षित पूरी विरासत को पुनर्जीवित करने की शुरुआत है या फिर कुछ चुनिंदा प्रतीकों के जरिए अपनी एक नई छवि गढ़ने की कोशिश।

पाकिस्तान वो देश है जहाँ विभाजन के बाद हिंदू और सिख आबादी लगातार घटती गई। यही वो देश है जहाँ दशकों तक हजारों मंदिरों और गुरुद्वारों को ध्वस्त कर दिया गया। यही वो देश है जो भारत में लगातार आतंकी हमले करवाता रहा है, खालिस्तानी आतंकियों और जिहादी संगठनों को अपने देश में सुरक्षित पनाह देता रहा है। लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिदीन जैसे जिहादी गिरोहों के नाम पूरी दुनिया में पाकिस्तान के साथ जुड़ते रहे हैं।

अब इसी पाकिस्तान की तरफ से लगातार सिख विरासत को लेकर नई-नई पहलें देखने को मिल रही हैं। पहले करतारपुर कॉरिडोर। फिर ननकाना साहिब के विकास की बातें। अब 79 साल बाद गुरुद्वारा पटशाही छठवीं का दोबारा खुलना। क्या यह सिर्फ धार्मिक संरक्षण है? या सिख समुदाय के बीच अपनी छवि बेहतर बनाने की एक सॉफ्ट पावर रणनीति?

यहीं एक और सवाल खड़ा होता है। क्या पाकिस्तान भारत के आंतरिक मामलों को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है?

इतिहास बताता है कि पाकिस्तान ने कई बार धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों का इस्तेमाल अपनी विदेश नीति किया है।

अब सवाल उठता है कि क्या पाकिस्तान में बचे हुए मुट्ठीभर हिंदू और सिख पूरी तरह सुरक्षित हैं? क्या जबरन धर्मांतरण के मामलों पर स्थिति बदल गई है? क्या उनकी बेटियों का जबरन मुसलमानों द्वारा उठाया जाना रुक गया है? क्या वहाँ के सभी ऐतिहासिक मंदिर और गुरुद्वारे भी उसी गंभीरता से संरक्षित किए जा रहे हैं?

और सबसे बड़ा सवाल कि क्या पाकिस्तान ने आतंकवाद और कट्टरपंथ की अपनी पुरानी आदत को पूरी तरह छोड़ दिया है?

जब तक इन सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं मिलते, तब तक किसी एक गुरुद्वारे के खुलने को पाकिस्तान की नई सोच का प्रमाण मान लेना सबसे बड़ी गलतफहमी होगी।

धार्मिक विरासत का संरक्षण निश्चित रूप से अच्छी बात है। लेकिन किसी भी देश की असली पहचान उसके स्मारकों से नहीं, बल्कि उसके वर्तमान व्यवहार और नीतियों से तय होती है।

पाकिस्तान को अगर सिख सिविलाइजेशन की जरा भी चिंता होती तो वहाँ महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा तीन-तीन बार नहीं टूटती। महाराज रणजीत सिंह जो सिख साम्राज्य के संस्थापक थे, जिनका शासन अफगानिस्तान से लेकर दिल्ली की सीमा तक फैला हुआ था। उस महान शासक की एक कांस्य प्रतिमा लाहौर किले में मौजूद है।

इस पर अब तक तीन बार हमला हो चुका है। 2019 में जैसे ही जम्मू-कश्मीर से धारा 370 का खात्मा हुआ तो उधर पाकिस्तान में महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा तोड़ दी गई। साल 2021 में तो महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा गायब हो गई और केवल घोड़ा शेष रहा।

सवाल ये भी है कि पाकिस्तान के सरकारी दफ्तरों में या फिर नेताओं के ऑफिसों में भगत सिंह की कितनी तस्वीरें हैं? पाकिस्तान के मदरसों या स्कूलों के सिलेबस से भगत सिंह क्यों गायब हैं? अगर आप सिख पहचान को ओन करना चाहते हैं तो ये उस पहचान के एक बड़े नायक हैं जो पाकिस्तान में गायब हैं और केवल ये नहीं ऐसे कई आजादी के नायक हैं जिनका जिक्र तक पाकिस्तान में नहीं होता है लेकिन वहाँ पर जिहादियों की तस्वीरों की भरमार जरूर है।

आपने कितनी बार भगत सिंह की जन्मतिथि या पुण्यतिथि को सेलिब्रेट किया है? कभी नहीं, तो फिर ये सेलेक्टिव ओनरशिप क्यों है? ये समझना हम सबके लिए बहुत जरूरी है ताकि हम पाकिस्तान और अपने यहाँ की वामपंथी मीडिया के झाँसे में ना फँसें।

एमबाप्पे VS यमाल: FIFA World Cup के सेमीफाइनल में मजबूत फ्रेंच अटैक का मुकाबला शानदार स्पेनिश डिफेंस से, लगातार तीसरी बार फाइनल में एंट्री के लिए उतरेंगे ‘लेस ब्लूज’

पिछले दो दशकों तक हमने फुटबॉल में दो बहुत बड़े खिलाड़ियों को खेलते देखा। आठ बार के ‘बैलॉं-दी-ओर’ विजेता लियोनेल आंद्रेस मेस्सी और मिस्टर चैंपियन्स लीग क्रिस्टियानो रोनाल्डो। इन दोनों ही खिलाड़ियों की प्रतिद्वंद्विता ने दो दशक से थोड़ा और ज्यादा समय तक हमें इस खेल से बाँधे रखा। लेकिन अब जब यह दोनों ही खिलाड़ी अपने फुटबॉल करियर का सूर्यास्त देख रहे हैं तो स्वाभाविक है कि फुटबॉल जगत अगली प्रतिद्वंद्विता खोजेगा।

ऐसे में नजर आकर टिकती है फ्रेंच सितारे किलिएन एमबाप्पे और युवा स्पेनिश सनसनी लामीन यमाल पर। दोनों ही दो ऐसे क्लबों के लिए फुटबॉल खेलते हैं जिनकी आपसी रंजिश जगजाहिर है। और हाल के वर्षों में तो यह दोनों ही सितारे अपनी अपनी राष्ट्रीय टीमों के लिए खेलते हुए कई बड़े मंचों पर टकरा भी चुके हैं।

लेकिन मंगलवार (14 जुलाई 206) की रात एकबार फिर टक्कर होगी किलिएन एमबाप्पे और युवा स्पेनिश सनसनी लामीन यमाल की। क्योंकि टक्कर होगी फ्रांस व स्पेन की टीमों की।

डलास स्टेडियम में भारतीय समयानुसार रात 12.30 बजे बेहद घातक फ्रेंच जहाज़ी बेड़ा स्पेनिश बंदरगाहों को जीत कर उन्हें कब्जाने की मंशा से इस जंग में उतरेगा। मौका है फीफा विश्व कप के पहले सेमीफाइनल का। यह निश्चित रूप से एक ब्लॉकबस्टर मैच होने जा रहा है।

अब विश्व कप की ट्रॉफी मात्र दो जीत की दूरी पर है। दोनों ही टीमें मैदान में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देंगी। दोनों ही कैसे भी यह मुकाबला जीतने की मंशा मन में लिए मैदान पर उतरेंगी। फ्रांस 1998 और 2018 में दो बार विश्व कप का खिताब जीत चुका है। वह पिछले संस्करण में भी फाइनल मैच का हिस्सा थे। वहीं 2010 में विश्व कप विजेता रही स्पेन मौजूदा यूरो विजेता है। वह अपनी जर्सी में एक और सितारा जड़ कर सदैव के लिए इतिहास में अमर हो जाने के लिए लालायित है।

मंगलवार की रात फाइनल का टिकट पाने के लिए जबरदस्त अटैकिंग फुटबॉल खेल रही और इस टूर्नामेंट की सबसे संतुलित टीम फ्रांस का सामना होगा उनके हालिया वर्षों के चिर प्रतिद्वंद्वी स्पेन से। स्पेन की रक्षापंक्ति ने पूरे टूर्नामेंट में अबतक मात्र एक गोल खाया है। लेकिन वो गोल दागने के लिए भी संघर्षरत नजर आए हैं। वहीं लेस ब्ल्यूज़ तो बेहद घातक तरीके से मैदान के हर छोर से अटैक करते नजर आए हैं।

डलास स्टेडियम में मजबूत अटैकिंग फोर्स एक बेहद मजबूत रक्षापंक्ति की परीक्षा लेती दिखेगी। कई पुराने हिसाब भी चुकता किए जाने हैं। यह बेहद शानदार मैच रहने वाला है।

फ्रेंच कोच दीदीएर देशां शायद अपनी टीम को 4-2-3-1 की फॉर्मेशन में मैदान पर उतारें। अटैकिंग लाइन में घातक फॉर्म में चल रहे एमबाप्पे, डेंबेले और युवा सनसनी देसिरे दोउ रहेंगे। मिडफील्ड का जिम्मा संभालेंगे अब तक टूर्नामेंट में सबसे ज्यादा असिस्ट दे चुके माइकल ओलीस। उनके संग आद्रियन राबियो और मानू कोने होंगे। रक्षापंक्ति में सलिबा संग उपामेकानो, जूल्स कूंदे और लुका डीने मौजूद रहेंगे। लेस ब्ल्यूज़ की बेंच पर चेर्की, माटेटा, थुर्रम, देसिरे दोऊ जैसे अटैकर्स हैं जो बेंच से आकर भी कुछ ही पलों में मैच का रुख बदलने का माद्दा रखते हैं। यह उन्हें बेहद ही घातक बना देता है।

ऐसा प्रतीत होता है कि यह फ्रेंच टीम विश्व कप का खिताब जीतने के मकसद से ही इस टूर्नामेंट में उतरी है और इनके विजय-रथ को रोकने का दुस्साहस शायद ही कोई टीम कर सकेगी। अभी तक के इनके तमाम मैच तो यही दर्शाते हैं। आप जब उन्हें खेलते हुए देखते हैं तो कुछ भी कमी आपको नजर नहीं आती।

वहीं कोच लुई डे ला फुएन्ते के स्पेन की बात करें तो उनकी फॉरवर्ड लाइन का मिडफील्ड द्वारा प्रदान किए जा रहे मौकों को गोल में न बदल पाना एक बड़ा चिंता का विषय रहा है।

मिडफील्ड में रोड्री के संग फैबियान रुईज़ ऐर दानी ओल्मो मौजूद रहेंगे। आगे अटैकिंग लाइन में सेंट्रल फॉरवर्ड ओयारजाबाल का साथ देने के लिए विंगर्स के रूप में एलेक्स बाएना और लामीन यमाल को मैदान पर उतारा जाना तय है, जबकि नीको, फेरां तोरे, गावी, मिकेल मेरीनो, विक्टर मुनोज़, पेड्री जैसे मजबूत खिलाड़ी बेंच पर मौजूद रहेंगे। चोट से उबर रहे नीको को हमने पुर्तगाल के खिलाफ मैच में कुछ पलों के लिए मैदान पर देखा था। अगर उनको मैच की शुरुआत से मैदान पर उतारा जाता है तो स्पेन की अटैकिंग लाइन को जबरदस्त धार मिल जाएगी।

पाउ कुबार्सी और आयम्रिक लापोर्त के नेतृत्व में स्पेनिश डिफेंस पर बड़ी जिम्मेदारी होगी फ्रेंच अटैक को काबू में रखने की। उन्हें मैच में बने रहने के लिए डेंबेले, एमबाप्पे, देसिरे दोउ और माइकल ओलीस़ की चौकड़ी पर 90 मिनट तक लगाम लगाए रखनी होगी। और इसमें निश्चित ही उन्हें अपने मिडफील्ड का सहयोग भी चाहिए होगा।

अगर फिर एक बार ओयारजाबाल खामोश रह जाते हैं तो कोच लुई डे ला फुएन्ते अपने डैगर मिकेल मेरीनो की ओर एकबार फिर बड़ी उम्मीदों से देख रहे होंगे।

मंगलवार की रात दो अलग विचारधाराओं की भी टक्कर होगी। बेखौफ फ्रेंच अटैक स्पैनिश मिडफील्ड के संपूर्ण नियंत्रण से टकराएगा।

स्पेन अगर अपने मिशन में असफल रहती है तो ‘लेस ब्लूज’ पश्चिमी जर्मनी के पश्चात लगातार तीन बार विश्व कप के फाइनल खेलने वाली पहली टीम बन जाएगी। यह पिछले डेढ़ दशक में वैश्विक मंच पर उनके दबदबे को भी दर्शाता है।

जुलाई माह की इस गर्म रात में आपको बस इतना करना है कि या तो किसी कैफे में या घर पर ही अपना पसंददीदा पेय पदार्थ और पसंदीदा चिप्स लिए इस मैच पर नजरें गड़ाए रखनी हैं और फुटबॉल की खबरों हेतु हमारे साथ बने रहना है।

एक फुटबॉल फैन के लिए ऐसा जादू फिर न जाने कब हो।

सपा कार्यकर्ताओं को राम मंदिर-पौधरोपण का मुद्दा देकर खुद विदेश घूमने निकले अखिलेश जी: क्या UP चुनाव के लिए यही है आपकी राजनीति?

कहते हैं, “नेतृत्व की असली पहचान चुनावी मंच पर नहीं, मुश्किल समय में होती है।” जब जनता सवाल पूछ रही हो, सरकार फैसले ले रही हो और राजनीति अपने सबसे गर्म दौर में हो, तब यह भी देखा जाता है कि नेता मैदान में खड़ा है या हजारों किलोमीटर दूर बैठकर सोशल मीडिया से राजनीति कर रहा है।

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार इस समय राम मंदिर चढ़ावा विवाद पर जाँच कर रही है, पौधरोपण अभियान को लेकर बडे़ स्तर पर सक्रिय है। ऐसे वक्त में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव विदेश दौरे पर हैं। ऑपइंडिया को मिली जानकारी के अनुसार, अखिलेश यादव निजी दौरे पर अमेरिका गए हैं, और वहाँ से लंदन की यात्रा कर वापस भारत लौटेंगे।

ये वही अखिलेश यादव हैं, जो अपनी विदेश यात्रा के ठीक एक दिन पहले अपनी राजनीति चमकाने के लिए मेरठ में दलित छात्रा ललिता गौतम से मिलते हैं। उससे पहले योगी सरकार के पौधरोपण अभियान को ‘भ्रष्टाचार’ बता देते हैं और अपने हिस्से का जनता को बरगलाकर खुद गर्मियों की छुट्टियाँ मनाने विदेश चले जाते हैं।

हजारों किलोमीटर दूर से सोशल मीडिया पर राजनीति कर रहे अखिलेश यादव

दिलचस्प बात यह है कि विदेश जाने से पहले अखिलेश यादव अपनी सोशल मीडिया टीम को ठीक ढंग से समझाकर गए हैं। तभी तो उत्तर प्रदेश से हजारों किलोमीटर दूर पहुँचने के बाद भी अखिलेश यादव के सोशल मीडिया पोस्ट बंद नहीं हो रहे हैं। उनकी टीम योगी सरकार को घेरते हुए हर घंटे पोस्ट शेयर कर रही है।

अखिलेश यादव की ताजा पोस्ट भी योगी सरकार के बड़े पौधरोपण अभियान को निशाना बनाने वाली है। इस पोस्ट में उन्होंने अपना पुराना आरोप दोहराते हुए पूरे अभियान को ‘भ्रष्टारोपण’ अभियान बताया। इसके साथ उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मंच पर पौधरोपण करते हुए एक वीडियो भी साझा किया।

इतना ही नहीं, पर्यावरण संरक्षण और हरियाली बढ़ाने जैसे अभियान पर राजनीतिक हमला करते हुए उन्होंने इसे ‘एनकाउंटर’ तक कह दिया।

पहले भी राजनीति छोड़ विदेश घूमने गए समाजवादी पार्टी के मुखिया

यह पहली बार नहीं है, जब उत्तर प्रदेश की राजनीति छोड़ अचानक अखिलेश यादव विदेश घूमने निकल गए हों। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई मौके आए, जब प्रदेश की राजनीति गरमाई हुई थी, लेकिन समाजवादी पार्टी के मुखिया विदेश यात्रा पर रहे। पार्टी ने हर बार इन दौरों को निजी बताया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इनकी टाइमिंग पर चर्चा जरूर हुई।

जून 2018 में अखिलेश यादव परिवार के साथ एक विदेशी छुट्टी पर रवाना हुए थे। उस समय समाजवादी पार्टी उपचुनावों में मिली सफलता के बाद विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिश कर रही थी। वहीं, लखनऊ के सरकारी बंगले को खाली करने और उसमें नुकसान के आरोपों को लेकर भी उनकी राजनीति के केंद्र में चर्चा हो रही थी। ऐसे समय में उनके विदेश जाने को लेकर सवाल भी उठे थे।

और 2020 में जब हाथरस कांड पूरे देश की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ था। कॉन्ग्रेस से लेकर विपक्षी दलों के नेता लगातार हाथरस पहुँच रहे थे। लेकिन उस समय अखिलेश यादव विदेश में थे।

2025 में संसद के बजट सत्र के आसपास भी अखिलेश यादव परिवार के साथ लंदन टूर पर गए थे। तब तक 2024 लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में मजबूत वापसी कर चुकी थी और अखिलेश यादव राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के प्रमुख चेहरों में शामिल हो चुके थे। इस समय जब देश में राजनीति करनी चाहिए थी, तब वह जश्न मनाने विदेश में थे।

यानी न तो अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी को मजबूत करने पर ध्यान दिया, न प्रदेश में किसी मुद्दे पर सक्रियता से भाग लिया और न ही खुद पर आए आरोपों का जवाब देने की उन्हें फुरसत मिली क्योंकि समाजवादी पार्टी के मुखिया विदेश घूमने में व्यस्त थे।

विदेश रवाना होने से पहले अखिलेश यादव का जनता को बरगलाने का ढोंग

अब बात करें कि 2026 की अमेरिका के लिए विदेश यात्रा रवाना होने से ठीक पहले अखिलेश यादव क्या कर रहे थे? तो अखिलेश लगातार योगी सरकार को अलग-अलग मुद्दों पर घेर रहे थे। इनमें प्रमुख तौर पर राम मंदिर चढ़ावा विवाद को लेकर लगाए गए आरोप हैं, और यह भी सच है कि सबसे पहले इस विवाद को सामने लाने वाली भी समाजवादी पार्टी ही है।

फिलहाल अखिलेश यादव योगी सरकार के पौधरोपण अभियान को निशाना साध रहे हैं, जिसके तहत यूपी सरकार ने 40 करोड़ से ज्यादा पौधरोपण का रिकॉर्ड बना लिया है। लेकिन अखिलेश यादव को इसमें भी ‘भ्रष्टाचार’ नजर आ रहा है।

यह केवल अखिलेश यादव के ताजा आरोप हैं, जिनके माध्यम से वह जनता के मन में योगी सरकार के लिए जहर घोल रहे थे। प्रेस कॉन्फ्रेंस करके लगातार नए-नए आरोप योगी सरकार पर मढ़ रहे थे, जिससे लगने भी लगा था कि अखिलेश यादव को वाकई में उत्तर प्रदेश की राजनीति में दिलचस्पी है। लेकिन इतने में ही वो ट्रिप पर विदेश निकल लिए। अब जनता यह पूछ रही है कि अखिलेश जी ने जो भी मुद्दे उठाए थे, उनका करना क्या है क्योंकि जनता ने तो उन्हें सीरियस ले लिया था। पर कहाँ पता था कि यह सब अखिलेश यादव के जनता को बरगलाने के पैतरें थे।

अखिलेश, तेजस्वी, राहुल… सब विदेश में बैठकर चमका रहे राजनीति

एक तरफ अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों में सत्ता हथियाने का ख्वाब बुन रहे हैं, दूसरी तरफ हर जरूरी मौकों पर विदेश यात्राएँ पर घूमने निकल पड़ते हैं। उन्होंने राम मंदिर चंदा चोरी के नाम पर हिंदुओं को जगाने का ढोंग कर, दलित छात्रा की हत्या पर अपने मतलब की राजनीति कर और पौधरोपण जैसे पॉजिटिव काम को भ्रष्टाचार बताकर, अपने समर्थकों को झुनझुना थमा दिया है और अब उनके समर्थक पूछ रहे हैं कि इसे बजाना कैसे हैं?

अखिलेश यादव अकेले ऐसे नेता नहीं हैं, जिनकी विदेश यात्रा पर सवाल उठे हों। अलग-अलग समय पर अन्य विपक्षी नेता भी यही करते आए हैं। उदाहऱण के लिए, तेजस्वी यादव, जो फिलहाल यूरोप में है, वहीं बैठकर पटना के बंटी यादव हत्याकांड के पीड़ित परिवार से फोन पर बात कर लेते हैं। राहुल गाँधी भी तीन हफ्ते से यूरोप घूम रहे हैं, जिसके चलते कॉन्ग्रेस के खुद के ‘छात्रों की गूँज’ जैसे कार्यक्रम रद्द हो रहे हैं।

तो इसीलिए यह सोच-विचार करना जरूरी है कि किस नेता को असल में जनता के मुद्दों की फिक्र है और किसे नहीं है। जहाँ एक ओर योगी सरकार राम मंदिर चढ़ावे की निष्पक्ष जाँच कर रही है, ग्लोबल वॉर्मिंग को खत्म करने के लिए पौधरोपण कर रही है लेकिन दूसरी ओर देश का विपक्ष विदेश घूमने में व्यस्त है।

पहले बनी मस्जिद, फिर बढ़ी मुस्लिम आबादी और उसके बाद बदल गया हिंदू बहुल इलाके का नाम: पाटन में ‘झापटपरा’ हो गया ‘इस्लामपुरा’, पढ़ें ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट

गुजरात के पाटन जिले में एक हिंदू इलाके का नाम मुस्लिम आबादी ने ही बदल दिया। जानकारी के मुताबिक, पाटन जिले के हारीज वार्ड नंबर 4 के एक इलाके का नाम झापटपरा था, जिसे बदलकर अब ‘इस्लामपुरा’ कर दिया गया है। यहाँ तक कि स्थानीय लोगों के सरकारी दस्तावेजों में भी अब इलाके का नाम ‘इस्लामपुरा’ लिखा जा रहा है। इलाके में बदलती डेमोग्राफी (जनसांख्यिकी) की चिंता के बीच हाल ही में हिंदू संगठनों ने यह शिकायत उठाते हुए मामलातदार को आवेदन पत्र सौंपा था।

जाँच के लिए ऑपइंडिया जब मौके पर पहुँची, तो इस मामले में और भी जानकारियाँ सामने आईं। यह हकीकत भी बाहर आई कि इलाके में जैसे-जैसे मुस्लिम आबादी बढ़ी और डेमोग्राफी बदली, वैसे-वैसे नाम बदलना शुरू हुआ और सरकारी दस्तावेजों तक नया इस्लामी नाम पहुँच गया। स्थानीय हिंदू अब इस मामले में कार्रवाई की माँग कर रहे हैं। हिंदू संगठनों ने भी जाँच की माँग की है।

झापटपरा में 80 से लेकर 80 साल से रह रहे परिवारों ने ऑपइंडिया को बताया कि इलाके का नाम बरसों से ‘झापटपरा’ ही चला आ रहा है और पुराने दस्तावेजों में भी यही नाम देखने को मिलता है।

एक स्थानीय निवासी ने बताया, “हमारे बाप-दादाओं के समय से झापटपरा नाम चल रहा है। लेकिन अब दस्तावेजों में नाम बदल गया है। कोई नया दस्तावेज बनाने जाए, नया आधार कार्ड बनाए तो अब ‘इस्लामपुरा’ लिखा हुआ आता है। ऐसा क्यों हुआ, यह हमें नहीं पता।”

स्थानीय लोग कह रहे हैं कि उनके इलाके का एक ही नाम है और वह है झापटपरा। इस्लामपुरा नाम पहले कहीं था ही नहीं, लेकिन पिछले 10-12 सालों में जैसे ही मुस्लिम आबादी बढ़ी, वैसे ही यह नया नाम घुसा दिया गया।

मस्जिद बनते ही बढ़ने लगी आबादी, फंडिंग कहाँ से आई?

स्थानीय लोगों के अनुसार, साल 2011 में इलाके में मुस्लिम परिवारों के सिर्फ 20-25 घर थे। ये सभी मजदूरी का काम करते हैं। लेकिन कुछ समय पहले यहाँ एक मस्जिद का निर्माण किया गया। साथ ही एक मदरसा भी बना।

इलाके के हिंदुओं का एक सवाल यह भी है कि जो मस्जिद बनाई गई थी, उसके लिए इतनी फंडिंग कहाँ से आई। क्योंकि मस्जिद के निर्माण तक जितने परिवार रहते थे, उनमें से किसी की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वे लाखों रुपये इकट्ठे करके इतनी बड़ी इमारत बना सकें। स्थानीय लोगों और संगठनों को आशंका है कि मस्जिद निर्माण के लिए बाहर से भी फंडिंग आई हो सकती है।

इस मस्जिद के बनने के बाद धीरे-धीरे मुस्लिम घर बढ़ने लगे और आज लगभग 200 से 300 के करीब मुस्लिम परिवार इस इलाके में रहते हैं।

आबादी जैसे ही बढ़ी, वैसे ही मुस्लिमों ने पहले आपस में इलाके को ‘इस्लामपुरा’ कहना शुरू किया और उसके बाद सरकारी दस्तावेजों में भी यही लिखवाना शुरू कर दिया। इसके बाद स्थानीय हिंदुओं के दस्तावेजों में ही ‘झापटपरा’ की जगह ‘इस्लामपुरा’ ने ले ली। इसके अलावा इलाके की मौजूदा आबादी में से ज्यादातर लोगों के बाहरी राज्यों (गुजरात से बाहर के राज्यों) के होने की जानकारी मिली है।

पुराने दस्तावेजों और पालिका के रिकॉर्ड में चल रहा है ‘झापटपरा’

ऑपइंडिया ने स्थानीय लोगों के पास जाकर जब उनके सरकारी दस्तावेज देखे, तो पता चला कि 70-80 साल के बुजुर्गों के बरसों पहले बने दस्तावेजों में ‘झापटपरा’ लिखा हुआ था और ‘इस्लामपुरा’ का कहीं कोई जिक्र नहीं था। लेकिन बाद में जो दस्तावेज बने या अपडेट हुए, उनमें ‘इस्लामपुरा’ कर दिया गया और ‘झापटपरा’ गायब हो गया। एक नहीं बल्कि कई व्यक्तियों के दस्तावेजों में यही पैटर्न देखने को मिला है।

जबकि नगरपालिका के आधिकारिक दस्तावेजों में कहीं भी ‘इस्लामपुरा’ नहीं लिखा गया है और हर जगह ‘झापटपरा’ नाम ही चल रहा है।

इस दौरान मस्जिद के पास एक मुस्लिम व्यक्ति भी मिला। आबिद नाम का यह शख्स ऑपइंडिया से बातचीत में स्वीकार करता है कि इलाके का नाम झापटपरा है, लेकिन अब यह इस्लामपुरा के रूप में जाना जाता है। हालाँकि साथ ही वह कहता है कि उसे ज्यादा जानकारी नहीं है कि नाम किस तरह बदला, लेकिन इलाके में मुस्लिमों के रहने के कारण इसे ‘इस्लामपुरा’ के तौर पर जाना जाता है।

स्थानीय हिंदुओं का कहना है कि आपस में मुस्लिम चाहे किसी भी नाम से इलाके को पुकारते हों, उससे आधिकारिक तौर पर नाम नहीं बदल जाता और सरकारी दस्तावेजों में उसे नहीं लिखा जा सकता। वहीं एक व्यक्ति ने बताया कि उनके इलाके में पहले मुस्लिमों के कुछ ही घर थे, लेकिन अब वे बढ़ गए हैं। जिसके कारण हिंदू घर बेचकर जा रहे हैं। उन्होंने इलाके में ‘अशांत धारा’ (डिस्टर्बड एरिया एक्ट) लागू करने की भी माँग की।

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साजिश रचने वालों के खिलाफ की जाए कार्रवाई: विश्व हिंदू परिषद

इस पूरे मामले में हिंदू संगठनों ने कानूनी कार्रवाई की माँग की है। हारीज नगर विश्व हिंदू परिषद के मंत्री रवि प्रजापति ने कहा, “हमने एक हफ्ते पहले मामलातदार को आवेदन पत्र सौंपकर इलाके के सभी लोगों के दस्तावेजों में सुधार करके इलाके का नाम फिर से झापटपरा करने की माँग की है। साथ ही जिन अधिकारियों या स्थानीय मुस्लिमों ने साजिश के तहत इलाके का नाम बदलने की कोशिश की है, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। आवेदन पत्र में हमने भी ऐसी ही माँग की है।”

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

FIFA विश्वकप के बीच जानाें ब्राजील के महान फुटबॉलर ‘माने गारिंचा’ की कहानी, जिसने अपंगता को मात दे दुनिया को मुस्कुराना सिखाया: लोगों ने कहा – ‘पीपुल्स जॉय’

मैं कंडोलिया मैदान के पास एक दुकान से चाय लेकर पी रहा था। दुकान के चारों तरफ पाँच-दस मीटर तक अदरक इलायची की महक थी। मेरे सामने इक टूटी हुई कुर्सी पड़ी थी जिसने न जाने कितनी बरसातें और न जाने कितनी बर्फबारी झेली थी। मैं अपनी चाय लिए उस कुर्सी पर जाकर पसर गया। मौसम एकदम साफ था। हाँ, बारिश के बाद ठंड जरूर बड़ गई थी। जब ठंड के मारे सारा बदन काँप रहा हो तो अदरक इलायची की चाय से ज्यादा सुकून कुछ भी नहीं देता।

चारों तरफ खूबसूरत पहाड़ थे। पीछे कंडोलिया मंदिर की तरफ से चिड़ियों और मंदिर की घंटियों का कोरस साफ सुनाई दे रहा था। बगल से ही इक सर्पीली सड़क नीचे मुख्य बाजार की ओर जा रही थी। नीचे मुख्य बाजार की ओर देखने पर, कोटद्वार, श्रीनगर और रुद्रप्रयाग को जाने वाली बसें और मुसाफिर साफ दिख रहे थे।

सुबह के छह बज रहे थे। सब्जी वाले अपने ठेले लगाने लगे थे और घर घर अखबार डालने वाले अपनी एटलस साइकिल ले अपने मिशन पर निकल चुके थे। पिछली रात, यही कोई दो बजे के आसपास, पुलिस कॉलोनी की तरफ बाघ आया था। चाय की दुकान पर सब वही बात कर रहे थे।

“बल भैजी, मैंने तो ये बी सुना की ध्यानी मास्टर ने बाघ को खुला चैलेंज दे दिया की बेट्टे फिर नी आणा तू यहाँ बतारा हूँ हाँ।”

मैदान में अब फुटबॉल खेलने वाले बच्चों का जमावड़ा होने लगा था। कई नन्हें मैसी-नेमार कोच के आने से पहले मैदान में बॉल को लेकर हँसते-खेलते जादुई करतब कर रहे थे। कोच के आते ही उन्हें मैदान के चक्कर लगाने पड़ते हैं और फिर बोरिंग एक्सरसाइज करनी पड़ती है। यह मैं पिछली तीन सुबहों से रोज मुस्कुराते हुए देख रहा हूँ। हालाँकि मैं इस बात से पूर्णतः सहमत हूँ कि कोच साब की बोरिंग एक्सरसाइज से जिसने भी दिल लगा लिया, उसका जीवन संवर जाता है परन्तु मेरा यह भी मानना है कि यह हमारे भीतर छुपा जादू ही है जो हमारे जीवन में रंग भरता है।

हमारा संपूर्ण जीवन भी कंडोलिया मैदान में चल रहे फुटबॉल सा ही तो है। हमारे चारों तरफ नटखट चीड़-देवदार हैं जो हमें अपनी ओर बुला रहे होते हैं। चिड़ियों के मीठे गीत हैं। बर्फ़ से लकदक पहाड़ियाँ हैं, जिनसे कभी भी मन नहीं भरता। पास ही चाय की दुकान पर हैं हर ठंडी सुबह थड़क रहे रोचक किस्से कहानियाँ। लेकिन हम इन सब को पीछे छोड़ एक बोरिंग रुटीन को गले लगा लेते हैं।

मुझे बार बार पौड़ी लौटना बेहद पसंद है। मैं जब भी कभी शहरों की दौड़ भाग में खुद को खोता हुआ पाता हूँ तो पौड़ी का एक चक्कर लगा आता हूँ।

यहाँ आकर ठंडी सुबहों में कंडोलिया मैदान के पास चाय लिए बैठे दूर श्रीनगर-सुमाड़ी की दिशा में दिखते, मफलर पहने, शांत खड़े पहाड़ों और मैदान में खेलते नन्हें बच्चों को घंटो देखते रहता हूँ। ऐसा करते हुए पता ही नहीं चलता कब चेहरे से खो गई मुस्कान, इक रंगीन लिफाफे में, वापस अपने पते पर लौट आती है।

कुछ जगहें और कुछ लोग होते हैं ना, जो आपको कुछ पलों के लिए ही सही, आपकी सारी परेशानियों से दूर ले जाते हैं- कंडोलिया के इस मैदान से कुछ ऐसा ही रिश्ता है मेरा। खैर अब तो बरसों हो गए कंडोलिया का मैदान देखे। मगर क्या आप जानते हैं, कभी ब्राजील की भूमि में एक ऐसा खिलाड़ी भी हुआ था जिसे आम जनमानस ने ‘पीपुल्स जॉय’ कहा था। जब भी वह शख्स मैदान पर उतरता, तमाम लोग अपने दर्द भूल कर कुछ पल मुस्कुराने लगते थे। आज बात करते हैं ‘पीपुल्स जॉय’ की।

28 अक्टूबर, 1933 के दिन ब्राज़ील के रियो डी जनेरियो राज्य के सुदूर दक्षिण में स्थित एक छोटे से गांव पाऊ ग्रान्डे में जन्मा था एक लड़का: मैनुएल फ्रांसिस्को दोस सांतोस ।

बालक मैनुएल का जब जन्म हुआ तो उसकी बाईं टाँग उसकी दाईं टाँग से 6 सेमी बड़ी थी और उसकी बाईं टाँग बाहर की दिशा में तो दाईं टाँग अंदर की दिशा में मुड़ी हुई थी। इसके चलते डॉक्टरों को उस नन्हे बच्चे को पैदा होते ही अपंग घोषित कर देना पड़ा था।

क्यूँकि वह लड़का, जिसे सब माने-माने कहा करते, अपने हमउम्र बच्चों से कद काठी में छोटा था तो उसकी बहन ने उसका नाम गारिंचा (एक नन्हीं सी भूरी चिड़िया) रख दिया। और ऐसे मैनुएल हो गया माने गारिंचा।

गारिंचा सड़कों और गलियों में फुटबॉल खेलता था। वह रियो की सड़कों का राजकुमार था। उसको फुटबॉल का प्रोफेशनल खिलाड़ी कभी नहीं बनना था। वो तो ताउम्र यूँ ही रियो की सड़कों पर ड्रिब्लिंग करते रहना चाहता था।

आपको यह जानकर हैरानी होगी की जब गारिंचा ने अपना बोटाफोगो क्लब से एक खिलाड़ी के तौर पर आधिकारिक करार किया तो उनकी उम्र बीस वर्ष थी और वो न सिर्फ शादीशुदा थे बल्कि उनकी संतानें भी थीं। उन्होंने अपने पहले ही ट्रेनिंग सेशन में उन दिनों ब्राज़ीली डिफेंस की दीवार कहे जाने वाले ‘निल्टन सांतोस’ को अपनी बेमिसाल ड्रिब्लिंग के आगे लाचार कर दिया था। पूरा बोटाफोगो क्लब यह देखकर आश्चर्यचकित था।

वेल्स नैशनल टीम के मशहूर डिफेंडर मेल होपकिंस ने 1958 विश्व कप में ब्राज़ील के खिलाफ हुए मुकाबले के बाद कहा था,”गारिंचा हमारी टीम की डिफेंस के लिए पेले से ज्यादा खतरनाक था। उसका सामना करना किसी चक्रवात के दौरान सड़क पर निकलने जैसा था।”

गारिंचा, जिन्हें फ्रेंच अखबारों ने विश्व द्वारा देखा सबसे खतरनाक राइट विंगर घोषित किया था, ने ब्राज़ीली टीम के साथ लगातार दो विश्व-कप ट्रॉफियाँ जीतीं। 1958 और फिर 1962 के विश्व कप की जीत में गारिंचा की बड़ी भूमिका थी। 1962 के विश्व कप में अपने करिश्माई विज़न और जादुई ड्रिब्लिंग के दम पर सारी दुनिया को अपना दिवाना बना लेने वाले गारिंचा वह पहले खिलाड़ी बने जिन्होंने विश्व कप के एक ही संस्करण में गोल्डन बॉल, गोल्डन बूट और विश्व-कप का खिताब जीता।

जब वह खेल रहे होते थे तो स्टेडियम में मौजूद सभी दर्शकों की नजरें बस उन पर ही बनी रहती थीं। गेंद उनकी किसी माशूका की तरह बस उन्हीं के इर्दगिर्द मंडराती रहती।

वो अपना बॉडी पोस्चर यूँ बना लेते की लगता गेंद को फार-पोस्ट की ओर मारेंगे। विपक्षी डिफेंडर उस दिशा में कूद पड़ता और वो फेंट करके गेंद को नियर-पोस्ट की ओर बढ़ा देते।

विपक्षी टीम के पास उनकी कलाबाजियाँ देखने के अलावा कोई चारा नहीं होता था। उनके अंतिम मैच तक ऐसी कोई टीम नहीं थी जो उनका काट ढूँढ सकी हो। आप गूगल करेंगे तो आपको मालूम पड़ेगा की जबतक गारिंचा प्लेइंग इलेवन में रहे, ब्राज़ील ने सिर्फ एक बार ही कोई मैच हारा। यह ब्राज़ील के लिए उनका आखिरी मैच था। वो दो, तीन खिलाड़ियों नहीं बल्कि अकेले विपक्षियों की पूरी टीम को छका कर गोल स्कोर किया करते। और ऐसा वो लगभग हर मैच में करते। फुटबॉल के प्रशंसकों की एक बड़ी संख्या उन्हें पेले से बढ़कर मानती थी।

दो विश्वयुद्ध देख चुकी मायूस और उदास दुनिया में नन्हें गारिंचा लोगों को खुशियाँ देते थे। गेंद जब जब उनके पास आती, खेल प्रशंसक उत्साह से चीखने लगते। गारिंचा ने उनकी उदास शामों को खुशनुमा गीत दिए। एक अपंग लड़के गारिंचा की मैदान की दाईं फ्लैंक से लगातार विपक्षी खेमे में की गई ट्रेडमार्क घुसपैठों ने एकबार फिर आम नागरिकों को यकीन दिलाया था कि आम जिंदगी में भी चमत्कार होते हैं।

अमूमन जो लोग भूखमरी और गरीबी से जूझ रहे होते थे, वो मैच के बाद खुश होकर गारिंचा के नाम के नारे लगाते हुए घरों को लौटते। कई दफा तो गारिंचा अपनी ट्रेनिंग खत्म होते ही स्टेडियम परिसर की दीवार फांद बाहर चले जाते और सड़कों पर मजदूरों और फैक्ट्री वर्कर्स के संग घंटों लैटिन अमेरिकी संगीत का आनंद लेते और फुटबॉल खेलते रहते।

लोगों ने उन्हें यूँ ही नहीं ‘ऐलेग्रिया दो पोवो’ अर्थात पीपुल्स’ जॉय कहा था। वो वाकई सही मायनों में इस दुनिया में खुशियों का पैगाम लेकर आए थे।

यही इस खेल की खूबसूरती है। यह आम जनमानस की हथेलियों पर खुशियाँ धर देता है और उन्हें कुछ पल अपने तमाम दुख दर्द भूल कर मुस्कुराने की वजहें देता है।

पहले भरत तिवारी, अब बंटी यादव… बिहार पुलिस ये दाग अच्छे नहीं

साल 2026 की शुरुआत में बिहार के पुलिस महानिदेशक (DGP) विनय कुमार ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने बताया कि राज्य में हत्या, डकैती, बैंक लूट, दंगे जैसे बड़े अपराध कम हुए हैं। 2024 के मुकाबले 2025 में हत्या के मामलों में करीब 8.3% की कमी आने की बात कही।

आँकड़ों के अनुसार 2025 में बिहार में हत्या के कुल 2556 मामले दर्ज हुए। यानी, औसतन 7 हत्या रोज हुई। ऐसे में आप पूछ सकते हैं कि फिर भरत तिवारी या बंटी यादव की हत्या पर ही इतनी बात क्यों हो रही?

इसका जवाब आँकड़े नहीं देते। यह बिहार पुलिस के काम करने के तरीके में छिपा है। जब पटना रेलवे स्टेशन जैसी व्यस्त जगह पर किसी व्यक्ति के साथ मारपीट हो, उसका अपहरण कर लिया जाए, CCTV फुटेज में हमलावरों के चेहरे दिखे, फिर भी 5 दिन बाद उस व्यक्ति की मौका-ए-वारदात से 60 किमी दूर आधी गली हुई बॉडी मिले और इस बीच पुलिस केवल ‘तलाश रहे हैं’ जैसा रूटीन जवाब ही देती रही, तो यह आम लोगों के भीतर सुरक्षित होने के विश्वास को गहरे तक हिला देता है। विशेषकर, खतरे का यह संकेत उस राज्य के लिए और भी भयावह है, जिसने करीब ढाई दशक का जंगलराज भोगा हो।

क्या है बंटी यादव का मामला?

33 साल का बंटी यादव पटना के न्यू करबिगहिया इलाके का रहने वाला था। छोटी सी दुकान चलाकर अपने परिवार का गुजारा करता था। 6-7 जुलाई की दरमियानी रात उसे पटना रेलवे स्टेशन के बाहर से अगवा किया गया। उस समय वह एक दुकान में सामान खरीद रहा था। 11 जुलाई को मोकामा से सटे अथमलगोला थाना क्षेत्र के सूर्यपुरा गाँव में एक खेत में उसकी क्षत-विक्षत लाश मिली। पटना रेलवे स्टेशन से यह जगह करीब 60 किलोमीटर दूर है।

बंटी यादव का अपहरण होने से शव मिलने तक क्या-क्या हुआ?

वायरल सीसीटीवी फुटेज में कुछ लोग दुकान में घुसते हैं और पीछे से बंटी का कॉलर पकड़ते हैं। उसके साथ मारपीट करते हैं। उसे घसीटकर ले जाते हैं। इसके बाद उसे जबरन एक ऑटो में बिठाया जाता है। 11 जुलाई को शव मिलने के बाद बाढ़ के अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी रामकृष्णा ने बताया कि हाथ में पहने कड़े से परिजनों ने बंटी यादव की पहचान की। उसको अगवा किए जाने की शिकायत पटना के कोतवाली थाना में दर्ज कराई गई थी। उन्होंने बताया कि चार-पाँच दिन होने के कारण शव डिकम्पोज होना शुरू हो चुका था।

खबरों में पोस्टमार्टम रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि बंटी के शरीर पर 100 से अधिक चोट के निशान थे। कई हिस्सों पर डंडे और रॉड से पिटाई के कारण काले निशान पड़ गए थे। अपहरण के करीब 14 से 18 घंटे बाद उसकी मौत हुई थी।

यानी, हत्या से पहले उसे करीब 18 घंटे तक टॉर्चर किया गया। मौत होने तक बुरी तरह पीटा गया। आँख-नाक कूच दिया गया। बायाँ हाथ ठीक था। दाहिने हाथ की केवल हड्डियाँ बची थी। दाएँ हाथ पर टैटू था। पहचान न हो सके इसलिए नुकीले चीज से गोदकर उसे हटा दिया गया था। फिर सड़क से सटे सूर्यपुरा गाँव के एक खेत में शव को गाड़ दिया गया।

दैनिक भास्कर ने पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर अजय कुमार सिंह के हवाले से बताया है कि बंटी के शरीर में गोली या छर्रे नहीं मिले हैं। ईंट-पत्थर जैसी भारी चीजों से पीट-पीटकर उसकी हत्या की गई होगी। डॉक्टर सिंह ने यह भी बताया है कि बॉडी गलनी शुरू हो चुकी थी, इसके कारण कुछ चोटें किस तरह के हथियार से आईं हैं, इसकी पुष्टि नहीं की जा सकती।

क्यों की गई बंटी यादव की हत्या?

पीड़ित परिजनों के अनुसार बंटी यादव ने न्यू करबिगहिया इलाके में सेक्स रैकेट चलाने का विरोध किया था। कथित तौर पर यह सेक्स रैकेट रवीश कुमार उर्फ बिसिया चला रहा था। रवीश पर कई मामले दर्ज हैं और कुछ महीने पहले ही वह जेल से बाहर निकला था।

रिपोर्ट के अनुसार अपहरण की घटना से करीब 15 दिन पहले रवीश से बंटी का विवाद हुआ था। इस दौरान रवीश ने उसे धमकी भी दी थी। दावा किया जा रहा है कि इस विवाद के कारण अगवा कर उसे मार डाला गया।

हालाँकि इन दावों में कितनी सत्यता है यह पुलिस की जाँच और अदालत के अंतिम निष्कर्षों के बाद ही सत्यापित हो पाएगा। शव मिलने के बाद डीएसपी रामकृष्णा ने देह व्यापार का विरोध करने के कारण बंटी की हत्या किए जाने के सवाल पर कहा कि दूसरे थाना क्षेत्र से मामला जुड़ा होने के कारण उनके लिए इस पर कमेंट करना उचित नहीं होगा। घटना के सभी पहलुओं की गहन जाँच की जा रही है।

किन लोगों ने की बंटी यादव की हत्या?

अब तक सामने आई जानकारी के अनुसार किचर किन्नर के कहने पर रवीश ने बंटी की हत्या की पूरी प्लानिंग की। किचर के तीन साथियों को 15 जून को गिरफ्तार किया गया था। उसे संदेह था कि बंटी यादव की मुखबिरी पर इनलोगों की गिरफ्तारी हुई। उल्लेखनीय है कि रवीश के सेक्स रैकेट को चलाने में किन्नर सहयोग कर रहे थे।

6 जुलाई की रात बंटी को कॉल कर पटना रेलवे स्टेशन के पास बुलाया गया। बंटी पर हमला करने से पहले रवीश और उसके साथियों ने किचर के घर शराब पार्टी की। इसके बाद ये लोग बंटी के पास पहुँचे और मारपीट करते हुए उसे दुकान से उठा लिया।

7 जुलाई को बंटी के परिजनों ने नामजद एफआईआर करवाई। रितेश, रवीश के भाई बजरंगी और ऑटो ड्राइवर रोहित को गिरफ्तार कर लिया गया है। रवीश, किचर किन्नर, अजीतपाल एवं अन्य फरार हैं। पुलिस इन्हें जल्द गिरफ्तार करने का दावा कर रही है।

पटना में बंटी यादव की हत्या
पटना में बंटी यादव की हत्या

बंटी यादव की लाश कहाँ मिली?

अथमलगोला इलाके के फोरलेन से सटे सूर्यपुरा गाँव के खेत में बंटी यादव की लाश मिली। राम नाम का युवक खेत में भैंस चरा रहा था। उसकी नजर शव पर पड़ी। बॉडी को गड्ढा कर गाड़ दिया गया था। उसके ऊपर बालू और पत्ते डाल दिए गए थे। बारिश होने के कारण बालू और पत्ते हट गए और शव दिखने लगा। राम ने गाँव पहुँच लोगों को इसकी सूचना दी। इसके बाद पुलिस को जानकारी दी गई।

बिहार पुलिस पर क्यों उठ रहे सवाल?

बंटी यादव के परिजनों का कहना है कि अगवा करने की शिकायत के बाद भी पुलिस ने कुछ नहीं किया। दैनिक भास्कर को बंटी के भाई मुकुल ने बताया है कि डेड बॉडी खोजने का काम उनलोगों ने खुद किया। जो लोग अब तक गिरफ्तार हुए हैं, उन्हें भी पकड़कर पुलिस को देने का दावा भी उन्होंने किया। उनका कहना है कि पुलिस केवल इतना कहती रही कि हम तलाश कर रहे हैं, जबकि रवीश और उसके साथियों का आपराधिक रिकॉर्ड रहा है।

  • बंटी का जहाँ से अपहरण हुआ, वहाँ का सीसीटीवी वायरल है। इसमें उसके साथ मारपीट करने वालों का चेहरा भी दिख रहा है। लेकिन इनमें से एक को भी अपहरण की शिकायत मिलने के बाद पुलिस नहीं पकड़ सकी।
  • अपहरण के बाद बंटी को पहले ऑटो में बिठाया गया। फिर भूतनाथ रोड पर दूसरी गाड़ी ​में शिफ्ट किया गया। पुलिस इस गाड़ी की पहचान तक न कर सकी।
  • रवीश के साथ बंटी के विवाद, बंटी को धमकी देने की बात, बंटी के अपहरण के बाद भी पुलिस रवीश का पता नहीं लगा सकी।
  • अपहरण की जगह से करीब 60 किमी दूर बंटी का शव मिला। इस दौरान कई थाना क्षेत्रों और टोल प्लाजा से वह गाड़ी गुजरी जिसमें बंटी को ले जाया गया, पर कहीं कोई कार्रवाई नहीं हुई।

क्यों सामान्य घटना नहीं है अगवा कर बंटी यादव की हत्या करना?

पटना बिहार की राजधानी है। पटना रेलवे स्टेशन देश के बड़े रेलवे स्टेशनों में से एक है। इसके मुख्य द्वार के पास ही महावीर मंदिर है। इसी इलाके से बंटी यादव को अगवा किया गया।

वहीं करबिगहिया इस रेलवे स्टेशन का पिछला भाग है। यहीं से ट्रेनों से उतरने वाले यात्री बस स्टैंड के लिए जाते हैं। यानी यह ऐसा इलाका है, जहाँ हर समय आवाजाही बनी रहती है। जाहिर है यहाँ पुलिस का पूरा तंत्र सक्रिय रहता होगा। ऐसी जगह से किसी को अगवा किया जाए, वह घटना सीसीटीवी में दर्ज हो फिर भी पुलिस कुछ न कर पाए तो यह सामान्य बात नहीं है।

बंटी का शव मिलने के बाद स्थानीय लोगों ने भी यह बात उठाई है। उनका कहना है कि जब यहाँ के लोग सुरक्षित नहीं हैं तो बाहर से आने वाले यात्री कैसे सुरक्षित रह सकते हैं। साथ ही ऐसी जगह पर सेक्स रैकेट का चलना भी पुलिस पर सवाल उठाते हैं। बिहार के चर्चित यूट्यूबर और जनसुराज के नेता मनीष कश्यप भी अपने एक रिपोर्ट में इस इलाके में अवैध धंधों की बात मुखरता से उठाई है।

ऑपइंडिया की बात

बंटी यादव की हत्या और भरत तिवारी का एनकाउंटर, दोनों एक जैसे मामले नहीं हैं। एक में पुलिस अपनी निष्क्रियता से सवालों के घेरे में है तो दूसरे में सरेंडर करने के बावजूद एनकाउंटर करने के आरोपों से घिरी है।

फिर भी दोनों मामले एक ही जैसे खतरे का संकेत देते हैं। यह बताते हैं कि केवल अपराध की संख्या कम होने का नंबर सामने रखकर, पुलिस यह नहीं कह सकती कि उसकी पूरी प्रक्रिया चुस्त-दुरुस्त है। उसे बार-बार यह दिखाना होगा कि कि जब भी कोई नागरिक संकट में होगा तो पुलिस अपराधियों से कहीं अधिक तेजी से काम करेगी। वैसे भी कानून-व्यवस्था का असली पैमाना अपराध का ग्राफ नहीं, नागरिकों के भीतर सुरक्षित होने का विश्वास होता है।

यदि यह विश्वास टूटता है, तो केवल आँकड़ों से लोगों को सुरक्षा का एहसास नहीं दिलाया जा सकता।