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‘ईरान युद्ध के डर से नहीं रुका स्टारलिंक का भारत आना’: स्पेसएक्स VP लॉरेन ड्रायर ने ब्लूमबर्ग के दावों को किया खारिज, बोलीं- सरकार से बातचीत जारी; जानिए भारत सरकार का जवाब

स्पेसएक्स की स्टारलिंक बिजनेस ऑपरेशंस की वाइस प्रेसिडेंट लॉरेन ड्रायर (Lauren Dreyer) ने ब्लूमबर्ग (Bloomberg) के दावे को सिरे से खारिज कर दिया है। ब्लूमबर्ग ने कहा था कि ईरान युद्ध से जुड़ी सुरक्षा चिंता के कारण भारत में स्टारलिंक का लॉन्च रुक गया है।

लॉरेन ड्रायर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर पोस्ट करके इस रिपोर्ट को ‘भ्रामक’ और ‘अज्ञात स्रोतों के नाम पर किया गया निराधार दावा’ करार दिया। उनके अनुसार, लॉन्च में देरी की खबरें पूरी तरह से गलत हैं और उनकी कंपनी के भारत सरकार के साथ सार्थक चर्चा चल रही है।

ड्रायर ने बताया कि स्टारलिंक ने आवश्यक नियामक और अनुपालन प्रक्रियाओं (regulatory and compliance processes) को पूरी पारदर्शिता के साथ पूरा किया है। भारत सरकार के साथ पूरी जिम्मेदार के साथ काम किया है। उन्होंने आगे कहा कि स्टारलिंक ने देश के लिए एक ‘खास डिप्लॉयमेंट मॉडल’ तैयार किया है, जो देश की संप्रभुता को ध्यान में रखते हुए टेक्नोलॉजी, रेगुलेटरी और सुरक्षा जरूरतों को पूरा करेगा।

ड्रायर ने कहा कि कंपनी को सरकार से देश के दूरदराज और कम सेवा वाले क्षेत्रों में कनेक्टिविटी को आगे बढ़ाने के लिए काफी उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिल रही है। हम भारत के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं और सरकार के साथ मिलकर जल्द ही देश में स्टारलिंक की सेवाएँ शुरू करने के लिए काम कर रहे हैं।

मामले से जुड़े जानकारों का भी कहना है कि ईरान युद्ध जैसी कोई बात नहीं है और केवल तकनीकी मंजूरी तथा स्पेक्ट्रम आवंटन से जुड़े तकनीकी मुद्दे विचाराधीन हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के एक सूत्र ने भी कहा, “हाँ, क्योंकि तकनीकी मंजूरी और स्पेक्ट्रम के आवंटन को लेकर एक मसला है। बाकी सब ठीक है। मुझे नहीं लगता कि ईरान युद्ध की वजह से कोई चिंता की बात है।”

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में क्या है?

9 जून (मंगलवार) को ब्लूमबर्ग ने “Starlink India Launch Hits Security Roadblock Before SpaceX IPO” (SpaceX IPO से पहले Starlink के भारत में लॉन्च में सुरक्षा संबंधी अड़चन) नाम से एक लेख छापा। इसमें दावा किया गया कि मामले की जानकारी रखने वाले लोगों के अनुसार, भारत ने एलन मस्क की स्पेस-बेस्ड इंटरनेट सर्विस Starlink को कमर्शियल ऑपरेशन शुरू करने की मंजूरी देने की प्रक्रिया को रोक दिया है। इसकी वजह ईरान युद्ध में इसके सैटेलाइट टर्मिनल का इस्तेमाल है।

लेख में अंदरूनी सूत्रों का हवाला देते हुए कहा गया कि Starlink को ऑपरेशन शुरू करने के लिए जो आखिरी मंजूरी चाहिए थी, उन्हें गृह मंत्रालय के तहत आने वाली सुरक्षा एजेंसियों ने रोक दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मिडिल ईस्ट में संकट के दौरान स्टारलिंक टर्मिनल का इस्तेमाल किया गया था, जबकि ईरानी क्षेत्र में इस सर्विस का लाइसेंस नहीं था, इसलिए भारत को भू-राजनीतिक तनाव के समय अमेरिका स्थित ऑपरेटर को नियंत्रित करने को लेकर चिंता है।

ब्लूमबर्ग ने बताया, “यह झटका ऐसे समय में लगा है जब SpaceX इतिहास का सबसे बड़ा IPO लाने की तैयारी कर रहा है। 12 जून 2026 को Nasdaq पर लिस्टिंग के जरिए 1.75 ट्रिलियन डॉलर के वैल्यूएशन का लक्ष्य है। कंपनी के मुख्य रेवेन्यू इंजन के तौर पर Starlink उस वैल्यूएशन के लिए अहम है।”

इसमें यह भी कहा गया है कि चीन ने इस सर्विस तक पहुँच को असल में रोक दिया है, जबकि दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले देश और इंटरनेट के सबसे बड़े बाजार भारत तक अब पहुँच नहीं हो पा रही है। आर्टिकल में यह भी बताया गया है कि किसी भी कमर्शियल लॉन्च (चाहे वह स्टारलिंक का हो या किसी और का) के लिए जरूरी सैटेलाइट-स्पेक्ट्रम प्राइस प्लान, इस गतिरोध की वजह से रुका हुआ है।

सूत्रों के हवाले से यह भी कहा गया है कि भारत के टेलीकम्युनिकेशन विभाग ने इसका फ्रेमवर्क तो तैयार कर लिया है, लेकिन मंजूरी के लिए इसे अभी तक यूनियन कैबिनेट के पास नहीं भेजा गया है।

ब्लूमबर्ग ने कहा, “स्टारलिंक को भारत में लगभग एक साल पहले ‘ग्लोबल मोबाइल पर्सनल कम्युनिकेशन बाय सैटेलाइट’ लाइसेंस मिला था। इससे उसे समझौता करने और ऑपरेशन की तैयारी करने की इजाजत मिली, लेकिन यह लाइसेंस एक बड़ी रेगुलेटरी प्रक्रिया का सिर्फ एक पड़ाव था, जो अब रुक गई है।”

इसमें बताया गया कि स्टारलिंक ने पिछले साल सिक्योरिटी से जुड़े डेमो दिखाए थे, जिनकी जाँच एक स्पेशल सिक्योरिटी पैनल और टेलीकॉम अधिकारियों ने की थी। आर्टिकल में कहा गया है कि तब से भारतीय अधिकारियों ने और पूछताछ की है और नियमों का ज्यादा सख्ती से पालन करने की माँग की है।

ब्लूमबर्ग के अनुसार, स्टारलिंक की सिक्योरिटी मंजूरी तब तक पेंडिंग रहेगी, जब तक वह यह साफ नहीं कर देती कि अपनी ग्लोबल पहुँच और अमेरिकी मालिकाना हक के बावजूद, वह भारतीय सिक्योरिटी नियमों का पालन कैसे सुनिश्चित करेगी। खासकर जियोपॉलिटिकल तनाव की वजह से पड़ने वाले दबाव के वक्त क्या करेगी।

आर्टिकल में लिखा है, “यह जाँच सिर्फ स्टारलिंक तक सीमित नहीं है। लोगों ने बताया कि ईरान संघर्ष के बाद भारतीय अधिकारियों ने सैटेलाइट-कम्युनिकेशन सेक्टर के प्रति ज्यादा सतर्कता बरती है। यह चिंता जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता के बीच विदेशी नियंत्रण वाले कम्युनिकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भरता को लेकर व्यापक बेचैनी को दिखाती है।”

इसमें बताया गया है कि स्टारलिंक भारतीय अधिकारियों के साथ लगातार बातचीत कर रही है, हलफनामे दे रही है और यह दिखा रही है कि वह क्षेत्रीय डेटा स्टोरेज मानकों का पालन करती है। कंपनी ने जमीनी स्तर पर इंफ्रास्ट्रक्चर भी बनाया है, जिसमें मुंबई में एक हब और भारत में लगभग दस गेटवे शामिल हैं।

कंपनी के सीनियर अधिकारी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए मंत्रियों और सरकारी अधिकारियों से नियमित रूप से मिलते रहे हैं। हालाँकि, ब्लूमबर्ग ने सूत्रों के हवाले से कहा है कि भारत अभी स्टारलिंक को मंजूरी देने में हिचकिचा रहा है, जब तक कि उसके सिक्योरिटी से जुड़े मुद्दों को सुलझा नहीं लिया जाता।

ब्लूमबर्ग के दावों का खंडन

ब्लूमबर्ग के दावों को स्टारलिंक और केंद्र सरकार ने सिरे से खारिज कर दिया है। हालाँकि यह कोई अकेली घटना नहीं है। हाल ही में इस मीडिया प्लेटफॉर्म को तब शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी जब उसने RBI को लेकर कहा था कि उसने विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने के लिए 12 अरब डॉलर का सोना बेचा। बाद में ब्लूमबर्ग ने उस मनगढ़ंत लेख के लिए माफी माँगी।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

भारत के विकास को नई दिशा, नई गति और नया विश्वास मिला: PM मोदी को CM योगी का पत्र, 12 साल की उपलब्धियों का किया उल्लेख

आदरणीय प्रधानमंत्री जी,

राष्ट्रसेवा, सुशासन एवं जनकल्याण को समर्पित आपके 12 वर्षों के सफलतम कार्यकाल पर आपको समस्त प्रदेशवासियों की ओर से अनंत शुभकामनाएँ। आपके यशस्वी नेतृत्व में उत्तर प्रदेश आस्था और अर्थव्यवस्था का अद्भुत संगम बन कर उभरा है। अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि पर रामलला का विराजमान होना, काशी विश्वनाथ धाम के सफल पुनरुद्धार आदि के साथ ही “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” के आपके मूल मंत्र ने विगत 12 वर्षों में भारत के विकास को नई दिशा, नई गति और नया विश्वास प्रदान किया है। राष्ट्र ने सेवा, सुरक्षा, सुशासन और समृद्धि के नए प्रतिमान स्थापित किए हैं।

इसी प्रेरणा से उत्तर प्रदेश भी जनकल्याण, सुशासन और समावेशी विकास के क्षेत्र में अभूतपूर्व उपलब्धियाँ अर्जित करते हुए ‘विकसित भारत’ के संकल्प को साकार करने में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।
आपके प्रेरक नेतृत्व में संचालित जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ उत्तर प्रदेश के करोड़ों नागरिकों तक पहुँचा है।

स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत प्रदेश में लगभग 3 करोड़ से अधिक शौचालयों का निर्माण हुआ जबकि प्रधानमंत्री आवास योजना के माध्यम से लगभग 65 लाख परिवारों को पक्का आवास उपलब्ध कराया गया। आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत लगभग 10 करोड़ पात्र नागरिकों को स्वास्थ्य सुरक्षा कवच प्राप्त हुआ। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना एवं राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के माध्यम से लगभग 15 करोड़ लोगों को निःशुल्क राशन उपलब्ध कराया जा रहा है।

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना से 1.86 करोड़ महिलाओं को धुएँ से मुक्ति मिली, जबकि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के माध्यम से प्रदेश के 3 करोड़ से अधिक किसानों को प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता प्राप्त हुई। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, सॉयल हेल्थ कार्ड, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना तथा अन्य किसान हितैषी कार्यक्रमों ने कृषि उत्पादन, उत्पादकता और किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

आपके मार्गदर्शन में उत्तर प्रदेश ने रोजगार और कौशल विकास के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। मिशन रोजगार के अंतर्गत 9 लाख से अधिक युवाओं को पारदर्शी एवं निष्पक्ष प्रक्रिया के माध्यम से सरकारी सेवाओं में नियुक्ति प्रदान की गई है। वहीं कौशल विकास कार्यक्रमों के माध्यम से 25 लाख युवाओं को उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रशिक्षण एवं प्लेसमेंट उपलब्ध कराए गए हैं। निवेश आधारित औद्योगिक विकास, एमएसएमई, ओडीओपी, स्टार्टअप तथा स्वरोजगार योजनाओं के माध्यम से प्रदेश में 3 करोड़ से अधिक रोजगार एवं स्वरोजगार के अवसर सृजित हुए हैं, जिससे युवा शक्ति प्रदेश की विकास यात्रा की प्रमुख भागीदार बनी है।

आपके दूरदर्शी नेतृत्व में उत्तर प्रदेश आधुनिक आधारभूत संरचना के क्षेत्र में भी देश का अग्रणी राज्य बनकर उभरा है। दिल्ली-मेरठ 12-लेन एक्सप्रेसवे, दिल्ली-मेरठ नमो भारत (RRTS), देश का प्रथम इनलैंड वाटरवे, उत्तर प्रदेश से होकर गुजरने वाले ईस्टर्न और वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, वंदे भारत एवं नमो भारत जैसी आधुनिक रेल सेवाओं ने प्रदेश की कनेक्टिविटी को नई ऊँचाइयाँ प्रदान की हैं। आज उत्तर प्रदेश अपनी विश्वस्तरीय एक्सप्रेस-वे श्रृंखला के कारण देशभर में ‘एक्सप्रेस-वे प्रदेश’ के रूप में स्थापित हो चुका है।

स्मार्ट सिटी मिशन, आधुनिक हवाई अड्डों, मेट्रो परियोजनाओं, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क तथा औद्योगिक कॉरिडोर के विकास ने निवेश, व्यापार, पर्यटन और औद्योगिक गतिविधियों को नई गति प्रदान करते हुए प्रदेश की अर्थव्यवस्था को नई ऊँचाई दी है। आपकी प्रेरणा से उत्तर प्रदेश में रूल ऑफ लॉ की स्थापना हुई है। आज प्रदेश माफिया-मुक्त, दंगा-मुक्त और भयमुक्त वातावरण की पहचान बना चुका है। व्यापारी, निवेशक, उद्योगपति तथा मातृशक्ति स्वयं को सुरक्षित अनुभव कर रहे हैं। बेहतर कानून-व्यवस्था और निवेश-अनुकूल वातावरण ने उत्तर प्रदेश को देश के सबसे आकर्षक निवेश गंतव्यों में स्थापित किया है।

इन प्रयासों का परिणाम है कि आज उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था वर्ष 2017 की तुलना में लगभग तीन गुना हो चुकी है। प्रति व्यक्ति आय में लगभग तीन गुना वृद्धि हुई है तथा बेरोजगारी दर लगभग 18 प्रतिशत से घटकर लगभग 3 प्रतिशत के स्तर पर आ गई है। उत्तर प्रदेश आज वन ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के लक्ष्य की ओर तीव्र गति से अग्रसर है तथा ‘विकसित भारत’ के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।

आज इस गौरवपूर्ण अवसर पर हम पुनः यह विश्वास व्यक्त करते हैं कि उत्तर प्रदेश आपके प्रेरक नेतृत्व एवं सतत मार्गदर्शन में ‘विकसित भारत’ के संकल्प के अनुरूप ‘विकसित उत्तर प्रदेश’ के निर्माण हेतु पूर्ण समर्पण और प्रतिबद्धता के साथ कार्य करता रहेगा तथा राष्ट्र निर्माण में अपना सर्वोत्तम योगदान देता रहेगा।

FIFA 2026: समय के खिलाफ आखिरी मुकाबला, जब दुनिया एक गेंद के पीछे चल पड़ती है

कुछ आयोजनों का कैलेंडर में आना केवल तारीखों का बदलना नहीं होता। वे ऋतुओं की तरह आते हैं और फुटबॉल विश्व कप उनमें सबसे बड़ी ऋतु है। 11 जून 2026 से अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको की धरती पर एक बार फिर वही मौसम उतरने वाला है, जिसमें करोड़ों लोग अपने-अपने देशों की सीमाओं से निकलकर एक गोल गेंद के नागरिक बन जाते हैं।

इस बार मंच और भी विशाल है। 48 टीमें। 104 मैच। तीन मेजबान देश। लेकिन सच पूछिए तो विश्व कप कभी आँकड़ों का उत्सव नहीं रहा। विश्व कप दरअसल स्मृतियों का उत्सव है। किसी को याद होगा कि कैसे कतर की उस सुनहरी रात में लियोनेल मेसी ने ट्रॉफी को अपने होंठों से लगाया था। वह केवल एक खिलाड़ी नहीं था जो कप को चूम रहा था, वह एक अधूरी पीढ़ी थी जो अपने सबसे सुंदर सपने को छू रही थी।

किसी को याद होगा कि कैसे किलियन एम्बाप्पे हारकर भी विजेता की तरह मैदान छोड़ रहे थे। किसी को याद होगा कि मोरक्को ने दुनिया को बताया था कि चमत्कार केवल परीकथाओं में नहीं होते। और किसी को शायद आज भी वह तस्वीर याद होगी जिसमें क्रिस्टियानो रोनाल्डो अकेले सुरंग की ओर बढ़ रहे थे, जैसे समय स्वयं उन्हें धीरे-धीरे विदा कह रहा हो। विश्व कप यही करता है। गोल से ज़्यादा यादें बनाता है।

अमेरिका इस बार केवल मेजबान नहीं है। यह उस देश की मेजबानी है जिसने दशकों तक दुनिया को हॉलीवुड, एनबीए और सुपर बाउल दिए लेकिन फुटबॉल को कभी अपने सांस्कृतिक सिंहासन का हिस्सा नहीं बनाया। अब वही अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े खेल आयोजन का केंद्र बनने जा रहा है।

लॉस एंजेलिस की रोशनी, न्यूयॉर्क की बेचैनी, डलास की गर्मी, मेक्सिको सिटी का शोर और टोरंटो की बहुभाषी भीड़… पूरा उत्तरी अमेरिका अगले एक महीने तक एक विशाल स्टेडियम में बदल जाएगा। और फिर शुरू होगा वह अनुष्ठान जो हर चार साल में दुनिया को कुछ समय के लिए युद्धों, चुनावों, आर्थिक संकटों और वैचारिक लड़ाइयों से ऊपर उठा देता है।

दर्शक फिर इंतजार कर रहे हैं। अर्जेंटीना के प्रशंसक मेसी को आखिरी बार विश्व कप में देखने के लिए तैयार बैठे हैं। 39 वर्ष की आयु में शायद यह उनका अंतिम नृत्य हो। शायद आखिरी बार हम उन्हें नीली-सफेद जर्सी में कप्तान की पट्टी बाँधे देखेंगे। शायद आखिरी बार किसी कॉर्नर फ्लैग के पास खड़े होकर वे दुनिया को यह याद दिलाएँगे कि प्रतिभा उम्र से बड़ी होती है।

दूसरी तरफ रोनाल्डो हैं। 41 वर्ष। छठा विश्व कप। समय के साथ लड़ता हुआ एक मनुष्य। फुटबॉल इतिहास में शायद ही कोई खिलाड़ी अपनी महत्वाकांक्षा को इतने लंबे समय तक जीवित रख पाया हो।

यह विश्व कप उनके लिए केवल एक टूर्नामेंट नहीं, इस विरासत का अंतिम अध्याय भी हो सकता है। लेकिन विश्व कप केवल विदाई का मंच नहीं होता। यह आगमन का भी मंच है। कहीं लामिन यामाल अपने समय की घोषणा करने को तैयार हैं। कहीं एरलिंग हालैंड पहली बार विश्व कप के बड़े रंगमंच पर अपने गोलों की भूख लेकर उतरेंगे।

कहीं जूड बेलिंघम, मुसियाला, पेड्री और अर्दा गुलर जैसी नई पीढ़ी दुनिया से कहेगी, कि ‘अब कहानी केवल मेसी और रोनाल्डो की नहीं रही।’ हर विश्व कप एक पीढ़ी को विदा करता है और दूसरी को जन्म देता है।

और फिर वे टीमें हैं जिनका इंतज़ार पूरी दुनिया कर रही है।

  • स्पेन अपनी तकनीकी कविता लेकर उतरेगा।
  • फ्रांस अपनी गति और शक्ति के साथ।
  • ब्राजील अपनी शाश्वत सांबा आत्मा के साथ।
  • इंग्लैंड अपनी उम्मीदों और पुराने अभिशापों के साथ।
  • अर्जेंटीना अपने गौरव की रक्षा करने के लिए।
  • पुर्तगाल अपने महानतम खिलाड़ी के लिए।
  • मोरक्को फिर साबित करना चाहेगा कि पिछली बार का सफर दुर्घटना नहीं था।
  • और नॉर्वे… शायद हालैंड के साथ अपनी नई कथा लिखना चाहेगा।

फिर उद्घाटन समारोह, रोशनी। संगीत होगा और कैमरे होंगे। दुनिया के सबसे बड़े कलाकार। और उन सबके बीच लाखों दर्शकों की धड़कनें होंगी जो अपने-अपने शहरों में रात भर जागने वाले हैं। दिल्ली से लेकर ढाका तक। ब्यूनस आयर्स से लेकर कासाब्लांका तक। लिस्बन से लेकर सियोल तक। कहीं कोई बच्चे की तरह जर्सी पहन रहा होगा। कहीं कोई पुराने विश्व कप की तस्वीरें देख रहा होगा। कहीं कोई मेसी की आखिरी जादूगरी की प्रतीक्षा कर रहा होगा। कहीं कोई रोनाल्डो के आखिरी गोल का सपना देख रहा होगा।

और यही विश्व कप की सबसे सुंदर बात है। यह हमें याद दिलाता है कि मनुष्य केवल राजनीति, धर्म, अर्थव्यवस्था और संघर्षों का प्राणी नहीं है। हम सभी के भीतर अब भी एक शिशु जीवित है। एक शिशु जो एक गेंद को उड़ते हुए देखकर अपनी साँस रोक लेता है। जो अंतिम मिनट के गोल पर अजनबियों को गले लगा लेता है। जो हारने पर रो पड़ता है। और जीतने पर पूरी रात नहीं सोता। 11 जून से वही बच्चा फिर जागने वाला है।

दुनिया फिर से एक गेंद के पीछे चल पड़ेगी। और अगले कुछ सप्ताहों तक पृथ्वी का सबसे बड़ा धर्म न राष्ट्रवाद होगा, न विचारधारा। वह होगा, फुटबॉल।

‘₹370 वसूल लूँगा’ कहने वाले की हेकड़ी निकली: कॉमेडी शो में महिलाओं पर अश्लील कमेंट करने वाले हिमांशु जांगरा को कंपनी ने नौकरी से निकाला, दी सख्त नसीहत

गुरुग्राम के युवक हिमांशु जांगरा को स्टैंड-अप कॉमेडियन प्रणीत मोरे के शो में महिलाओं पर अश्लील टिप्पणी करने की वजह से नौकरी से हाथ धोना पड़ा। लड़के ने शो के दौरान कहा था कि ‘370 रुपये की बिरयानी खिलाई है, वसूल तो करूँगा…’ इस दौरान महिलाओं के लिए अश्लील बातें कही।

इस पर गुरुग्राम स्थित सोशल मीडिया और ब्रांडिंग फर्म स्टारविक डिजाइन ने हिमांशु जांगरा के खिलाफ एक्शन लेते हुए उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया। दरअसल महिलाओं पर की गई घटिया जोक सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ। इस दौरान यूजर्स ने उसे जमकर भला-बुरा कहा।

वीडियो के खिलाफ ऑनलाइन गुस्सा और कंपनी को भेजे गए मैसेज, ईमेल और कॉल को देखते हुए कंपनी ने उसे निकालने की घोषणा की। स्टारविक डिजाइन के संस्थापक विवेक विश्वकर्मा ने कहा कि विवाद ने कार्यस्थल और कंपनी की प्रतिष्ठा को प्रभावित करना शुरू कर दिया है।

उन्होंने कहा, “कार्यस्थल के बाहर जो कुछ हुआ है, उसका असर अब कार्यस्थल पर भी पड़ रहा है। कंपनी, हमारी टीम, हमारे ग्राहकों और यहाँ के वातावरण के प्रति मेरी जिम्मेदारी है। इसीलिए हमने हिमांशु से अलग होने का फैसला किया है।”

हिमांशु की इंस्टाग्राम ID पर पुराना कॉन्टेंट भी बेहद खराब है। मामला बढ़ने पर प्रणीत मोरे और हिमांशु ने माफी माँग ली।

यह विवाद कॉमेडियन प्रणित मोरे के एक लाइव शो के दौरान शुरू हुआ। जांगरा ने कॉमेडियन से बातचीत करते हुए एक महिला को खाने पर ले जाने और बदले में कुछ उम्मीद करने के बारे में बात की।

उन्होंने कहा कि जब महिला ने खाना खाने के बाद उन्हें घर छोड़ने के लिए कहा तो उन्हें आश्चर्य हुआ। चिकन बिरयानी पर खर्च किए गए 370 रुपये का जिक्र करते हुए जांगरा ने कहा कि वह खर्च की गई रकम महिला से शारीरिक तौर पर ‘वसूलेंगे’। इस टिप्पणी की सोशल मीडिया पर जबरदस्त आलोचना हुई।

हालाँकि विरोध के बाद जांगरा ने माफी माँगी और अपना सोशल मीडिया अकाउंट निष्क्रिय कर दिया। लेकिन वायरल वीडियो पर यूजर्स का गुस्सा फूट पड़ा जिसको देखते हुए उसे बर्खास्त कर दिया गया। विश्वकर्मा ने कहा कि ये टिप्पणियाँ आपत्तिजनक थीं और कंपनी के मूल्यों के खिलाफ थी।

उन्होंने कहा, “आपमें से कई लोगों की तरह, मैंने भी ऑनलाइन प्रसारित हो रहे उन वीडियो क्लिप्स को देखा। उन क्लिप्स में दिखाए गए बयान आपत्तिजनक हैं। मैं उनसे सहमत नहीं हूँ। हमारी कंपनी ऐसे विचारों का समर्थन नहीं करती और निश्चित रूप से उन्हें युवाओं के लिए खराब मैसेज है और उन्हें इससे दूर रहना चाहिए।”

वहीं, विश्वकर्मा ने कहा कि कार्यस्थल पर जांगरा के आचरण पर कभी कोई सवाल नहीं उठाया गया। उन्होंने महिला सदस्यों सहित सभी कर्मचारियों से बात की है। ज्यादातर ने जांगरा को पेशेवर और मेहनती और सम्मानित व्यक्ति बताया।

कंपनी ने यह भी तर्क दिया कि यद्यपि लोगों को उनके कार्यों के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, फिर भी उन्हें अपनी गलतियों से सीखने का अवसर दिया जाना चाहिए।

कंपनी का मानना है, “एक व्यक्ति भयानक गलती कर सकता है। व्यक्ति को उसके परिणामों का सामना करना चाहिए, लेकिन उम्मीद है कि हम कभी भी ऐसा समाज नहीं बनने देंगे, जो यह मानता हो कि लोग सीख नहीं सकते, आत्मचिंतन नहीं कर सकते, माफी नहीं माँग सकते या बदल नहीं सकते।”

कंपनी का मानना है कि यह विवाद हिमांशु जांगरा के साथ लंबे समय तक बने रहेंगे और वह इस घटना से सबक लेंगे।

पश्चिम बंगाल में CBI को जाँच की खूली छूट, BJP सरकार ने दिया ‘जनरल कंसेंट’: 8 साल पहले ममता बनर्जी ने लिया था वापस, जानिए सबकुछ

पश्चिम बंगाल में ममता काल के भ्रष्टाचार को खत्म करने की दिशा में अहम कदम उठाया गया है। 8 जून 2026 को पश्चिम बंगाल की बीजेपी सरकार ने CBI के लिए ‘सामान्य सहमति’ (General Consent) बहाल कर दी। राज्य ने दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना (DSPE) अधिनियम 1946 की धारा 6 के तहत यह अधिसूचना जारी की है, जिससे सीबीआई केंद्र सरकार के कर्मचारियों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के मामलों की राज्य में बिना किसी बाधा के जाँच कर सकेगी।

यह अधिसूचना जारी होने के बाद से सीबीआई को केंद्रीय मामलों की जाँच के लिए हर बार राज्य सरकार की विशेष अनुमति लेने की आवश्यकता समाप्त हो गई। हालाँकि राज्य सरकार के कर्मचारियों से जुड़े मामलों में जाँच शुरू करने से पहले राज्य की लिखित अनुमति लेना अनिवार्य है। यह निर्णय करीब 8 साल बाद लिया गया है, क्योंकि नवंबर 2018 में तत्कालीन टीएमसी सरकार ने केंद्रीय एजेंसियों के कथित दुरुपयोग का हवाला देते हुए ‘सामान्य सहमति’ वापस ले ली थी।

8 साल बाद बहाल हुई ‘जनरल कंसेंट’

सामान्य स्वीकृति की बहाली से सीबीआई को पश्चिम बंगाल में केंद्र सरकार के कर्मचारियों, केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (सीपीएसयू) के साथ-साथ निजी व्यक्तियों के अपराध की जाँच सीबीआई कर सकेगी। इसके लिए हर मामले को लेकर अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होगी।

पश्चिम बंगाल सरकार के गृह एवं पर्वतीय मामलों के विभाग द्वारा जारी अधिसूचना के मुताबिक, दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (DSPE) एक्ट, 1946 के सेक्शन 6 के तहत, पश्चिम बंगाल सरकार “सेंट्रल गवर्नमेंट, सेंट्रल पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स और प्राइवेट लोगों (चाहे वे अलग-अलग काम कर रहे हों या सेंट्रल गवर्नमेंट और सेंट्रल गवर्नमेंट अंडरटेकिंग्स के कर्मचारियों के साथ मिलकर काम कर रहे हों) के अपराधों की जाँच के लिए राज्य में दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (CBI) के सदस्यों की शक्तियों और अधिकार क्षेत्र को बढ़ाने के लिए अपनी सहमति देती है।”

हालाँकि अधिसूचना में एक शर्त का उल्लेख किया गया है। जनरल कंसेंट बहाल होने के बावजूद, पश्चिम बंगाल राज्य के लोक सेवकों के खिलाफ जाँच के लिए अभी भी राज्य की अनुमति आवश्यक है।

अधिसूचना में कहा गया है, “पश्चिम बंगाल राज्य सरकार के नियंत्रण में आने वाले लोक सेवकों से संबंधित मामलों में राज्य सरकार की लिखित अनुमति के बिना ऐसी कोई जाँच नहीं की जाएगी। राज्य सरकार द्वारा अन्य किसी भी अपराध के लिए पहले दी गई सभी सामान्य सहमति और मामले-दर-मामले आधार पर दी गई सहमति भी लागू रहेगी।”

‘जनरल कंसेंट’ बहाल करने का मकसद टीएमसी काल के कई घोटालों में अधिकारियों पर मुकदमा चलाने के लिए सीबीआई को खास स्वीकृति देने के तुरंत बाद लिया गया। ये स्वीकृति शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार ने दी है।

सीबीआई के लिए राज्य सरकार की जनरल कंसेंट बहाल होने से केंद्रीय जाँच एजेंसी लंबित मामलों पर कार्रवाई में तेजी ला पाएगी, जवाबदेही में सुधार होगा और केंद्र-राज्य संबंधों को मजबूत करने में मदद मिलेगी।

ममता बनर्जी ने 2018 में सीबीआई के लिए ‘जनरल कंसेंट’ क्यों रद्द की?

नवंबर 2018 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी सरकार ने ‘जनरल कंसेंट’ वापस ले लिया था। ममता सरकार का दावा था कि सीबीआई- ईडी सहित अन्य केंद्रीय जाँच एजेंसियों को भाजपा सरकार विपक्षी दलों वाली राज्य सरकार के खिलाफ ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ के लिए ‘हथियार’ के रूप में इस्तेमाल कर रही है।

भ्रष्टाचार और लचर कानून व्यवस्था वाली टीएमसी सरकार, अपने नेताओं पर एक के बाद एक घोटाले के खुलासे को लेकर हो रहे एक्शन से परेशान थी। केन्द्रीय एजेंसियों के कसते शिकंजे पर लगाम लगाने के लिए टीएमसी सरकार ने यह कदम उठाया था। उस वक्त कोयला घोटाला, पशु तस्करी घोटाला, शिक्षकों की भर्ती घोटाला, सहकारी समिति घोटाला, नगरपालिकाओं में नौकरी के बदले नकद घोटाला, शारदा चिट फंड घोटाला और दूसरे भ्रष्टाचार के मामले सामने आए थे, जिस पर एक्शन हो रहा था।

ममता बनर्जी ने मुख्यमंत्री के रूप में मिली ताकत का दुरुपयोग किया। उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपित अपनी पार्टी नेताओं को बचाने के लिए सीबीआई सहित दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान के सदस्यों की जनरल कंसेंट वापस ले ली। यह मूल रूप से केंद्रीय जाँच एजेंसियों द्वारा की जा रही जाँच में राजनीतिक हस्तक्षेप का एक उदाहरण था, जिसे ‘फेडरलिज्म पर हमले’ के आड़ में छिपाया जा रहा था।

जनरल कंसेंट वापस ले लिए जाने के बाद, सीबीआई को बार-बार मामले-दर-मामले अनुमति लेनी पड़ी, जिससे कई मामलों में कार्रवाई में देरी हुई। यहाँ तक ​​कि टीएमसी सरकार ने सीबीआई के अधिकार क्षेत्र को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में ममता सरकार के अलावा, मेघालय, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, मिजोरम, कर्नाटक, झारखंड, महाराष्ट्र, पंजाब और केरल में भी हाल ही में ‘जनरल कंसेंट’ वापस लेने के मामले सामने आए हैं। इन राज्यों में सामान्य स्वीकृति रद्द करने की अधिसूचनाएँ तब जारी की गईं जब विपक्षी दल सत्ता में थे।

पश्चिम बंगाल ने आंध्र प्रदेश के तुरंत बाद 2018 में सीबीआई को दी गई सहमति वापस ले ली। कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली छत्तीसगढ़ सरकार ने जनवरी 2019 में ऐसा ही किया। कॉन्ग्रेस शासित राजस्थान सरकार ने जुलाई 2020 में ‘जनरल कंसेंट’ रद्द कर दी। आम आदमी पार्टी शासित पंजाब ने नवंबर 2020 में ऐसा किया। शिवसेना-कॉन्ग्रेस-एनसीपी सरकार ने अक्टूबर 2020 में ऐसा ही किया। कॉन्ग्रेस शासित कर्नाटक ने सितंबर 2024 में ‘जनरल कंसेंट’ वापस ले ली ।

लगभग सभी मामलों में, सीबीआई को दी गई ‘जनरल कंसेंट’ ठीक उसी समय वापस ले ली गई, जब एजेंसी इन राज्यों में घोटालों और अन्य अनियमितताओं की जाँच कर रही थी।

शुभेंदु अधिकारी सरकार टीएमसी काल की व्यवस्थागत खामियों को ठीक करने में जुटी

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी एक के बाद एक ऐसे कदम उठा रहे हैं, जिनका उद्देश्य जवाबदेही बहाल करना और टीएमसी काल के दौरान हुए व्यवस्थागत भ्रष्टाचार को दूर करना है। इस साल मई में, भाजपा सरकार ने शिक्षक भर्ती घोटाला, नगर निगम भर्ती घोटाला और सहकारी घोटाला मामलों में अभियोजन की अनुमति दी , जिसकी जाँच में ममता सरकार बाधा बनी।

6 जून 2026 को, मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने 2019 में सीएए विरोधी दंगों की जाँच का आदेश दिया। ये दंगे मुस्लिम भीड़ ने किए गए थे और राज्य में भारतीय रेलवे को करीब 93 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था।

मुख्यमंत्री अधिकारी ने डीजीपी सिद्ध नाथ गुप्ता के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल पुलिस को नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ 2019 के विरोध प्रदर्शनों के दौरान आगजनी, तोड़फोड़ और सार्वजनिक संपत्ति, विशेष रूप से रेलवे संपत्तियों को नुकसान पहुँचाने की सभी शिकायतों की समीक्षा करने और जाँच करने का निर्देश दिया।

पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार ने संस्थागत भ्रष्टाचार और महिलाओं के खिलाफ अत्याचारों की जाँच के लिए 18 मई को सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों से मिलकर दो जाँच आयोगों का गठन किया । इन जाँच आयोगों ने 1 जून 2026 से अपना काम शुरू किया।

इससे पहले मुख्यमंत्री अधिकारी ने 2024 के आरजी कर मेडिकल कॉलेज बलात्कार और हत्या मामले में लापरवाही बरतने के आरोप में तीन आईपीएस अधिकारियों को निलंबित कर दिया था।

पुलिस और नौकरशाही के राजनीतिकरण से लेकर, जड़ जमा चुके भ्रष्टाचार के नेटवर्क और कैडर आधारित राजनीति तक, शुभेंदु सरकार टीएमसी शासन के कुकर्मों की जाँच और निवारण के लिए कदम उठा रही है। ‘जनरल कंसेंट’ की बहाली इस दिशा में एक और सकारात्मक कदम है।

(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

MOU के बाद भी सुस्ती में रहा तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश ने फुर्ती से पकड़े मझगाँव डॉक के ₹29000 करोड़: समझिए कैसे चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व में NDA सरकार ला रही बड़े निवेश

आंध्र प्रदेश देश में निवेश के सबसे बड़े केंद्र के रूप में उभर रहा है। तमिलनाडु की द्रमुक सरकार के ढुलमुल रवैए का फायदा उठाते हुए अब मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की अगुवाई वाली एनडीए सरकार ने एक और बड़ा दाँव मारा है। यह रफ्तार आगे भी जारी रहने वाली है क्योंकि सरकारी जहाज बनाने वाली कंपनी मझगांव डॉक लिमिटेड (MDL) तिरुपति जिले के दुगराजपटनम में आंध्र प्रदेश के प्रस्तावित मेगा शिपबिल्डिंग क्लस्टर में 29,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का निवेश कर रही है।

मझगांव डॉक लिमिटेड (MDL) नाम की यह बड़ी डिफेंस पीएसयू (PSU) आंध्र प्रदेश के शिपबिल्डिंग प्रोजेक्ट में मुख्य निवेशक बनने के लिए तैयार है, जिसका लक्ष्य 1.2 मिलियन टन सालाना क्षमता का है। इस मेगा प्रोजेक्ट में राज्य सरकार और विशाखापत्तनम पोर्ट अथॉरिटी जमीन और समुद्री बुनियादी ढाँचे के लिए 5,289 करोड़ रुपए का योगदान देंगे, जबकि मुख्य निवेशक MDL इसमें 23,964 करोड़ रुपए का निवेश करेगा।

मझगांव डॉक लिमिटेड के प्रतिनिधि जल्द ही इस जगह की संभावनाओं का आकलन करने के लिए आंध्र प्रदेश का दौरा कर सकते हैं।

तमिलनाडु की सुस्ती बनी आंध्र प्रदेश के लिए मौका

आंध्र प्रदेश सरकार और MDL के बीच राज्य के प्रस्तावित शिपबिल्डिंग क्लस्टर में भारी निवेश को लेकर बातचीत शुरू होने से पहले इस डिफेंस पीएसयू ने तमिलनाडु की तत्कालीन द्रमुक (DMK) सरकार के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए थे।

सितंबर 2025 में MDL ने ‘मैरीटाइम अमृत काल विजन 2047’ के तहत थूथुकुडी में 15,000-18,000 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत से एक ग्रीनफील्ड शिपयार्ड बनाने के लिए तमिलनाडु सरकार के साथ समझौता किया था। हालाँकि द्रमुक सरकार ने इसमें ढुलमुल रवैया अपनाया और बाद में MDL के साथ तय प्रक्रिया को छोड़कर दक्षिण कोरिया की एचडी हुंडई हेवी इंडस्ट्रीज (HD Hyundai Heavy Industries) के साथ एक विशेष समझौता कर लिया।

MDL को तमिलनाडु सरकार से एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EoI) का इंतजार था, हालाँकि द्रमुक सरकार ने न तो प्रोजेक्ट शुरू करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया और न ही इस प्रस्ताव को सीधे तौर पर मना किया।

तमिलनाडु सरकार के इस कदम से MDL-थूथुकुडी प्रोजेक्ट अधर में लटक गया और भारत की एक प्रमुख डिफेंस पीएसयू किनारे हो गई। MDL ने आरोप लगाया कि द्रमुक सरकार द्वारा तय चयन प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और भारतीय शिपबिल्डिंग कंपनियों को प्रतिस्पर्धा करने का सही मौका नहीं दिया गया। पीएसयू ने पारदर्शिता और जिस तरह से तमिलनाडु सरकार ने एंकर शिपयार्ड का चयन किया, उस पर भी सवाल उठाए।

अब जब MDL के आंध्र प्रदेश में बड़ा निवेश करने की खबरें आ रही हैं, तो तमिलनाडु के कई लोग द्रमुक सरकार की आलोचना कर रहे हैं कि उनकी वजह से राज्य के हाथ से रक्षा क्षेत्र से जुड़ा एक महत्वपूर्ण निवेश निकल गया।

आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के बीच रक्षा, मैन्युफैक्चरिंग और बंदरगाह से जुड़े निवेश को लेकर लंबे समय से मुकाबला चल रहा है। दोनों राज्य निवेश को आकर्षित करने के लिए अपने तटीय इलाकों, कुशल कामगारों और रियायतों का इस्तेमाल करते हैं। तेलुगु देशम पार्टी (TDP) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) गठबंधन के शासन वाले आंध्र प्रदेश ने ‘बिजनेस करने की रफ्तार’ (speed of doing business) को लेकर बड़े स्तर पर मार्केटिंग की है, जिसमें जमीन की उपलब्धता, नीतिगत स्थिरता और राज्य व केंद्र दोनों जगह भाजपा की सरकार होने के कारण केंद्रीय समन्वय को प्रमुखता से दिखाया गया है।

चंद्रबाबू नायडू की NDA सरकार में आंध्र प्रदेश बना उद्योगों के लिए आकर्षक

बीते कुछ महीनों में तमिलनाडु और कॉन्ग्रेस शासित कर्नाटक से एनडीए शासित आंध्र प्रदेश में कई बड़े निवेशकों का ट्रांसफर देखा गया है।

अगस्त 2025 में तमिलनाडु की द्रमुक सरकार ने थूथुकुडी में दक्षिण कोरिया की ह्वासुंग फुटवियर (Hwaseung Footwear) द्वारा 1,720 करोड़ रुपये के नॉन-लेदर फुटवियर प्लांट की घोषणा की थी, जिससे 20,000 से अधिक नौकरियों का वादा किया गया था। हालाँकि तमिलनाडु सरकार की ओर से हुई देरी और लापरवाही के कारण ह्वासुंग को बेहतर विकल्पों की तलाश करनी पड़ी। नवंबर 2025 तक यह प्रोजेक्ट आंध्र प्रदेश के कुप्पम में शिफ्ट हो गया।

दक्षिण कोरियाई कंपनी ह्वासुंग ने एनडीए के नेतृत्व वाले राज्य आंध्र प्रदेश में 150 मिलियन डॉलर के निवेश के साथ अपना नॉन-लेदर स्पोर्ट्स शू मैन्युफैक्चरिंग हब स्थापित करने की घोषणा की। राज्य सरकार ने ह्वासुंग को 100 एकड़ जमीन आवंटित की। अब यह प्रोजेक्ट आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की विधानसभा सीट कुप्पम में आकार ले रहा है।

मई 2026 में तमिलनाडु के हाथ से प्रस्तावित एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) फ्लाइट टेस्टिंग और इंटीग्रेशन कॉम्प्लेक्स डिफेंस एयरोस्पेस प्रोजेक्ट भी निकल गया और यह आंध्र प्रदेश के पास चला गया। हालाँकि तमिलनाडु सरकार डीआरडीओ (DRDO) से जुड़े इस 15,000 करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट को हासिल करने की कोशिश में थी और उसने बेंगलुरु के एयरोस्पेस क्लस्टर के पास होसुर में जमीन और रनवे की पेशकश की थी। लेकिन आंध्र प्रदेश ने तेजी से मंजूरी देने और एक एकीकृत डिफेंस कॉरिडोर के विजन की पेशकश करके यह बाजी जीत ली।

यह प्रोजेक्ट आंध्र प्रदेश के पुट्टपार्थी में गया, और इस साल मई में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और मुख्यमंत्री नायडू ने 600 एकड़ की इस फैसिलिटी का शिलान्यास किया। इस पर केंद्र द्वारा पक्षपात करने के आरोप भी लगे, हालाँकि खबरों में कहा गया कि आंध्र प्रदेश को प्रोजेक्ट सौंपना विभिन्न राज्यों में रक्षा निर्माण क्षमताओं को बाँटने की रणनीति का हिस्सा था।

जहाँ तमिलनाडु ने होसुर में 100 एकड़ जमीन मुफ्त देने की पेशकश की थी, वहीं आंध्र प्रदेश ने पुट्टपार्थी में 650 एकड़ का एक बड़ा डेडिकेटेड हब ऑफर किया।

राज्यों के बीच यह मुकाबला सिर्फ आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार कर्नाटक तक भी है। जुलाई 2025 में कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार को तीन साल से चल रहे किसानों के लगातार विरोध प्रदर्शनों के कारण बेंगलुरु हवाई अड्डे के पास एक प्लान्ड एयरोस्पेस पार्क के लिए देवनहल्ली में कृषि भूमि का अधिग्रहण करने के प्रस्ताव को रद्द करना पड़ा था।

राज्य ने पहले इस एयरोस्पेस प्रोजेक्ट के लिए चन्नरायपटना और देवनहल्ली तालुक के आसपास के गाँवों में 1,777 एकड़ जमीन का अधिग्रहण करने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन किसानों ने पहले दिन से ही इस कदम का विरोध करते हुए दावा किया था कि यह जमीन उपजाऊ है और उनकी आजीविका का एकमात्र साधन है।

जब कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने इस प्रोजेक्ट को रद्द कर दिया, तो आंध्र प्रदेश ने तुरंत इस मौके का फायदा उठाया। राज्य के मानव संसाधन विकास मंत्री नारा लोकेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक खुला निमंत्रण देते हुए लिखा, ‘प्रिय एयरोस्पेस इंडस्ट्री, इसके (विरोध प्रदर्शन) बारे में सुनकर दुख हुआ। मेरे पास आपके लिए एक बेहतर विचार है। आप इसके बजाय आंध्र प्रदेश को क्यों नहीं देखते? हमारे पास आपके लिए एक आकर्षक एयरोस्पेस नीति है, जिसमें बेहतरीन प्रोत्साहन और 8000 एकड़ से अधिक तैयार जमीन (बेंगलुरु के ठीक बाहर) उपलब्ध है! उम्मीद है कि टेबल पर बैठकर बात करने के लिए आपसे जल्द ही मुलाकात होगी।”

साफ है कि आंध्र प्रदेश की एनडीए सरकार न केवल राज्य को मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट्स के लिए एक आदर्श जगह के रूप में पेश कर रही है, बल्कि तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे प्रतिस्पर्धी राज्यों में दिक्कतों का सामना कर रहे निवेशकों को भी आक्रामक रूप से अपने साथ जोड़ रही है।

टेक, डेटा सेंटर, एआई (AI) और एयरोस्पेस से लेकर आंध्र प्रदेश ने दूसरे राज्यों से निवेश हासिल किया है और वह इसका दावा करने से पीछे नहीं हटता।

साल 2025 में गूगल (Google) ने भारत के सबसे बड़े एआई और डेटा सेंटर्स में से एक के लिए विशाखापत्तनम में 15 बिलियन डॉलर या 1.25 लाख करोड़ रुपये के भारी-भरकम निवेश का ऐलान किया।

बेंगलुरु के पास आईटी की ताकत और बुनियादी ढाँचा होने के बावजूद गूगल द्वारा इस दौड़ में अपने प्रतिस्पर्धी कर्नाटक के बजाय आंध्र प्रदेश को चुनना कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार को रास नहीं आया। कर्नाटक के आईटी मंत्री प्रियांक खड़गे की X पर आंध्र प्रदेश के आईटी मंत्री नारा लोकेश के साथ तीखी बहस भी हुई थी।

आंध्र प्रदेश सरकार ने 22,000 करोड़ रुपए के बड़े प्रोत्साहन पैकेज की पेशकश करके गूगल का यह निवेश सुरक्षित किया। इस पैकेज में जमीन पर 25% की छूट, पानी के टैरिफ पर 25% की छूट, 100% मुफ्त बिजली ट्रांसमिशन के साथ-साथ स्टेट जीएसटी (SGST) की पूरी प्रतिपूर्ति शामिल थी।

आंध्र प्रदेश ने पिछले साल कर्नाटक की सरला एविएशन के 1,300 करोड़ रुपए के इलेक्ट्रिक एयर-टैक्सी मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट ‘स्काई फैक्ट्री‘ को भी अपने नाम कर लिया। यह प्रोजेक्ट आंध्र प्रदेश के अनंतपुरम जिले में विकसित किया जाएगा। कर्नाटक की एक कंपनी का अपने गृह राज्य को छोड़कर मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट के लिए दूसरे राज्य को चुनना कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा गया।

इसके अलावा आंध्र प्रदेश की ‘काम करने की रफ्तार’ का असर कॉन्ग्रेस शासित तेलंगाना पर भी पड़ा है। मार्च 2025 में हैदराबाद की प्रीमियर एनर्जीज (Premier Energies) ने घोषणा की कि वह तेलंगाना के सीतारामपुर से आंध्र प्रदेश के नायडूपेटा में अपना 1,700 करोड़ रुपये का प्रस्तावित 4 GW सोलर फोटोवोल्टिक सेल मैन्युफैक्चरिंग प्लांट शिफ्ट कर रही है। इस प्रोजेक्ट से करीब 3,500 नौकरियाँ पैदा होंगी।

प्रतिस्पर्धी राज्यों की तुलना में आगे निकलकर एक और प्रोजेक्ट को हासिल करने की जानकारी देते हुए आंध्र प्रदेश के आईटी मंत्री नारा लोकेश ने X पर लिखा, “एपी (AP) ने रिकॉर्ड समय में एपीआईआईसी (APIIC) के माध्यम से 269 एकड़ जमीन को तेजी से मंजूरी दी। ये बातचीत अक्टूबर 2024 में शुरू हुई थी और फरवरी 2025 तक जमीन आवंटित कर दी गई। यह जमीन बंदरगाहों के करीब है और सक्रिय प्रोत्साहनों से समर्थित है। यह आंध्र प्रदेश को एक अग्रणी सौर विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करता है, जिससे औद्योगिक विकास और राज्य की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, जिसकी क्षमता को 7 GW तक बढ़ाने की योजना है। आंध्र प्रदेश को भारत के दूसरे सबसे बड़े एकीकृत सौर सेल और मॉड्यूल निर्माता का एपी में स्वागत करते हुए गर्व हो रहा है – जो हमारे युवाओं के लिए बैकवर्ड इंटीग्रेशन और ग्रीन जॉब्स को बढ़ावा देगा।”

नारा लोकेश के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

यहाँ एक दिलचस्प बात यह है कि खबरों के मुताबिक आंध्र प्रदेश ने एनडीए शासन के दो सालों के भीतर लगभग 23 लाख करोड़ रुपए का निवेश आकर्षित किया है।

मुख्यमंत्री नायडू ने इस बारे में कहा, “कल्याण, विकास और सुशासन प्रदान करने के साथ-साथ एनडीए सरकार विशाखापत्तनम, अमरावती और तिरुपति क्षेत्रों का विकास कर रही है। रायलसीमा में रक्षा, ड्रोन, स्पेस, एयरोस्पेस और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्रों के उद्योग आ रहे हैं। एनडीए शासन के दौरान राज्य ने अब तक 23 लाख करोड़ रुपए का निवेश आकर्षित किया है। हम हर घर में सोलर रूफटॉप के जरिए बिजली पैदा करने का अवसर दे रहे हैं। रॉयल एनफील्ड तिरुपति में 18 महीनों में एक मोटरसाइकिल मैन्युफैक्चरिंग प्लांट स्थापित कर रही है।”

हालाँकि आंध्र प्रदेश की आक्रामक निवेश रणनीतियों से अन्य राज्य सरकारों का सतर्क होना स्वाभाविक है, लेकिन एनडीए शासित यह राज्य भारत की विकास गाथा में योगदान देने में जितना हो सके आगे रहना चाहता है। आंध्र प्रदेश सरकार वैश्विक और घरेलू कंपनियों को राज्य में अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स लगाने के लिए सिंगल-विंडो क्लीयरेंस, लैंड बैंक, सब्सिडी और केंद्रीय सहयोग का पूरा इस्तेमाल कर रही है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

पूरी तरह से ‘ड्राई स्टेट’ नहीं था लक्षद्वीप, 47 साल बाद सरकार ने बदले शराब के नियम: जानिए क्यों, कभी विकास परियोजनाओं के विरोध में खड़ा था इस्लामी-वामपंथी गैंग

भारत के सबसे छोटे केंद्रशासित प्रदेश लक्षद्वीप में 47 वर्षों बाद शराब नीति में बड़ा बदलाव किया गया है। केंद्र सरकार ने 1979 से लागू शराबबंदी कानून को समाप्त करते हुए नया आबकारी ढाँचा लागू कर दिया है। इसके साथ ही अब लक्षद्वीप में लाइसेंस प्राप्त प्रतिष्ठानों के माध्यम से शराब की नियंत्रित बिक्री का रास्ता खुल गया है।

पहली नजर में यह फैसला केवल शराब से जुड़ा प्रशासनिक निर्णय दिखाई दे सकता है, लेकिन यदि इसके पीछे के घटनाक्रम को देखा जाए तो यह कदम पर्यटन, निवेश, बुनियादी ढाँचे, राष्ट्रीय सुरक्षा और लक्षद्वीप के भविष्य के विकास मॉडल से जुड़ा हुआ नजर आता है।

पिछले कुछ वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार ने लक्षद्वीप को लेकर जिस प्रकार का दृष्टिकोण अपनाया है, उससे स्पष्ट है कि सरकार इस द्वीप समूह को केवल एक दूरस्थ केंद्रशासित प्रदेश के रूप में नहीं बल्कि भारत के भविष्य के प्रमुख समुद्री पर्यटन और सामरिक केंद्र के रूप में विकसित करना चाहती है।

शराब नीति में बदलाव उसी व्यापक रणनीति का एक हिस्सा माना जा रहा है। लक्षद्वीप 36 द्वीपों का समूह है, जिनमें से केवल 10 द्वीपों पर आबादी रहती है। अरब सागर में स्थित यह क्षेत्र भारत की समुद्री सुरक्षा, ब्लू इकोनॉमी, समुद्री व्यापार और पर्यटन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

प्राकृतिक सुंदरता के मामले में इसकी तुलना अक्सर मालदीव से की जाती है। इसके बावजूद दशकों तक यह क्षेत्र पर्यटन और निवेश के मामले में अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पाया।

नए कानून में क्या प्रावधान किए गए हैं?

5 जून 2026 को जारी अधिसूचना के माध्यम से 1979 का कानून समाप्त कर दिया गया और उसकी जगह लक्षद्वीप आबकारी विनियमन-2026 लागू किया गया। नए नियमों के तहत शराब के निर्माण, आयात, निर्यात, परिवहन, बिक्री, खरीद और उपभोग को लाइसेंस आधारित प्रणाली के माध्यम से नियंत्रित किया जाएगा।

सरकार ने साथ ही यह भी सुनिश्चित किया है कि शराब की उपलब्धता पूरी तरह अनियंत्रित न हो जाए। विदेशी शराब और IMFL पर 400 प्रतिशत तक एक्साइज ड्यूटी लगाई गई है। बीयर पर 200 प्रतिशत तथा वाइन पर 80 प्रतिशत कर लगाया गया है।

21 वर्ष से कम आयु के लोगों को शराब बेचना प्रतिबंधित रहेगा। इसके अलावा प्रशासक को विशेष अधिकार दिए गए हैं, जिनके तहत वह किसी भी द्वीप में शराब की बिक्री पर रोक लगा सकता है, खरीद की सीमा तय कर सकता है या आवश्यकता पड़ने पर पुनः प्रतिबंध लागू कर सकता है।

स्पष्ट रूप से सरकार का उद्देश्य शराब को बढ़ावा देना नहीं बल्कि पर्यटन क्षेत्र के लिए नियंत्रित और विनियमित व्यवस्था तैयार करना है।

1979 में शराबबंदी क्यों लागू की गई थी?

लक्षद्वीप में शराबबंदी का इतिहास 1979 से जुड़ा हुआ है। उस समय लक्षद्वीप निषेध विनियमन लागू किया गया था, जिसके तहत शराब के निर्माण, बिक्री और उपभोग पर व्यापक प्रतिबंध लगा दिया गया। इस निर्णय के पीछे सबसे बड़ा कारण वहाँ की मजहबी संरचना थी। 2011 की जनगणना के अनुसार, लक्षद्वीप की लगभग 97 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है।

यह देश का सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाला केंद्रशासित प्रदेश है। साथ ही यहाँ की लगभग 95 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जनजाति वर्ग में आती है। चूँकि इस्लाम में शराब के सेवन को निषिद्ध माना जाता है, इसलिए उस समय की सरकारों और प्रशासनों ने यह माना कि उनकी मजहबी परंपराओं के अनुरूप शराबबंदी लागू रहनी चाहिए।

धीरे-धीरे यह कानून लक्षद्वीप की पहचान का हिस्सा बन गया। कई स्थानीय संगठन, धार्मिक समूह और राजनीतिक दल भी इसका समर्थन करते रहे। उनका तर्क था कि शराब की उपलब्धता बढ़ने से सामाजिक समस्याएँ और अपराध बढ़ सकते हैं।

क्या लक्षद्वीप पूरी तरह ड्राई क्षेत्र था?

इस्लामी अक्सर लक्षद्वीप को पूर्ण शराबमुक्त क्षेत्र बताते रहे, लेकिन वास्तविकता थोड़ी अलग थी। प्रतिबंध लागू होने के बावजूद कुछ पर्यटन स्थलों और रिसॉर्ट्स को विशेष छूट प्राप्त थी। बंगाराम द्वीप जैसे पर्यटन केंद्रों में आने वाले विदेशी और भारतीय पर्यटकों के लिए शराब उपलब्ध कराई जाती थी।

कुछ सरकारी व्यवस्थाओं के तहत भी सीमित स्तर पर शराब की अनुमति थी। यानी स्थानीय के लिए शराबबंदी लागू थी, लेकिन पर्यटन उद्योग के लिए पहले से ही अपवाद मौजूद थे। इसी कारण वर्तमान नीति परिवर्तन को पूरी तरह नई व्यवस्था नहीं माना जा रहा। सरकार ने पहले से मौजूद सीमित छूट को अधिक पारदर्शी, व्यवस्थित और कानूनी ढाँचे में बदल दिया है।

2020 में प्रशासक प्रफुल्ल खोड़ा पटेल की नियुक्ति के बाद लक्षद्वीप में कई प्रशासनिक सुधारों की शुरुआत हुई। पर्यटन विकास, भूमि उपयोग, स्वास्थ्य सुविधाएँ, स्थानीय प्रशासन, मत्स्य उद्योग और निवेश से जुड़े अनेक प्रस्ताव सामने आए। इन्हीं सुधारों के दौरान शराब नीति में बदलाव की चर्चा भी शुरू हुई।

2021 में पर्यटन प्रतिष्ठानों तक शराब सेवा का विस्तार करने का प्रस्ताव सामने आया। इसके बाद 2023 में नया आबकारी मसौदा जारी किया गया। अंततः 2026 में यह नीति कानून का रूप ले सकी। यानी वर्तमान फैसला अचानक नहीं बल्कि छह वर्षों से चल रही प्रक्रिया का परिणाम है।

पर्यटन के लिए क्यों जरूरी है यह बदलाव?

मोदी सरकार के इस फैसले के पीछे सबसे बड़ा कारण पर्यटन को माना जा रहा है। लक्षद्वीप प्राकृतिक सुंदरता, समुद्री जैव विविधता, कोरल रीफ, स्कूबा डाइविंग, स्नॉर्कलिंग और समुद्री पर्यटन के लिए विश्वस्तरीय क्षमता रखता है। इसके बावजूद दशकों तक यहाँ पर्यटकों की संख्या बेहद सीमित रही।

सरकार का मानना है कि यदि लक्षद्वीप को मालदीव, मॉरीशस, सेशेल्स और अन्य अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थलों के समकक्ष खड़ा करना है तो पर्यटन क्षेत्र को आधुनिक सुविधाएँ प्रदान करनी होंगी। आज दुनिया के अधिकांश समुद्री पर्यटन केंद्रों में पर्यटकों के लिए नियंत्रित शराब व्यवस्था मौजूद है। होटल उद्योग और पर्यटन निवेशक भी इसी प्रकार के ढाँचे की अपेक्षा करते हैं।

केंद्र सरकार का तर्क है कि यदि लक्षद्वीप को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करना है तो उसे अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के अनुरूप तैयार करना होगा। हालाँकि फैसले के प्रस्ताव से लेकर फैसले पर मुहर लगाने तक इस्लामी-लेफ्ट लेबरल गैंग इसका विरोध ही करते रहे हैं। ये कोई नई बात भी नहीं है यहाँ की मुस्लिम बहुल आबादी विकास के मार्ग में हमेशा बाधा ही बनी है।

लक्ष्यदीप में विकास कार्यों का विरोध करते रहे हैं इस्लामी-लेफ्ट लिबरल गैंग

लक्षद्वीप में शराब नीति में बदलाव की प्रक्रिया 2020 में प्रशासक प्रफुल खोड़ा पटेल के कार्यभार संभालने के बाद तेज हुई। प्रशासन का मानना था कि यदि द्वीप समूह को बड़े पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करना है तो वहाँ पर्यटन उद्योग से जुड़े कुछ नियमों में बदलाव आवश्यक होंगे।

इसी सोच के तहत 2021 में आबादी वाले द्वीपों पर स्थित पर्यटन प्रतिष्ठानों में भी शराब परोसने का प्रस्ताव सामने आया। हालाँकि इस प्रस्ताव का स्थानीय वामपंथी दलों और मुस्लिम संगठनों ने विरोध किया। विरोध करने वालों का कहना था कि शराब की उपलब्धता बढ़ने से सामाजिक समस्याएँ बढ़ सकती हैं और द्वीपों की पारंपरिक जीवनशैली प्रभावित हो सकती है।

हालाँकि वर्ष 2023 में लक्षद्वीप के लिए नए आबकारी ढाँचे का मसौदा जारी किया गया, जिसमें लाइसेंस आधारित व्यवस्था का प्रस्ताव रखा गया था। इसके बाद फरवरी 2026 में चेतलात और बित्रा द्वीपों पर स्थित सरकारी विश्राम गृहों को ऐसे लाइसेंस प्राप्त परिसरों के रूप में अधिसूचित किया गया, जहाँ निर्धारित नियमों के तहत शराब परोसी जा सकती थी।

शराबबंदी को लेकर होने वाली चर्चा अक्सर मजहबी दृष्टिकोण से जुड़ी रही है, क्योंकि इस्लाम में शराब सेवन की मनाही है। हालाँकि केंद्र सरकार और प्रशासन का तर्क है कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में शराब की वैधता कोई नई बात नहीं है।

जम्मू-कश्मीर में वर्षों से शराब की बिक्री कानूनी है, जबकि मालदीव समेत कई मुस्लिम बहुल देशों में भी पर्यटन क्षेत्रों में नियंत्रित तरीके से शराब उपलब्ध कराई जाती है। केंद्र सरकार का मानना है कि पूरी तरह प्रतिबंध की बजाय कड़े नियंत्रण और सख्त नियमों वाली व्यवस्था पर्यटन उद्योग के लिए अधिक व्यावहारिक होगी।

सरकार के अनुसार, नए नियमों का उद्देश्य शराब को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि पर्यटन और आतिथ्य क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप विकसित करना है। प्रशासन का कहना है कि इस प्रक्रिया में सभी निर्णय नियंत्रित और विनियमित ढाँचे के भीतर ही लागू किए जाएँगे, फिर भी इसका विरोध जारी ही है।

पिछले कुछ वर्षों के दौरान लक्षद्वीप में केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित कई सुधारों और विकास परियोजनाओं का विरोध देखने को मिला है। प्रशासनिक सुधारों, भूमि उपयोग नीति, पर्यटन विस्तार, शराब नीति और रक्षा परियोजनाओं जैसे अनेक मुद्दों पर स्थानीय स्तर पर विरोध दर्ज किया गया। कई मामलों में कोर्टों का दरवाजा भी खटखटाया गया।

केरल हाई कोर्ट ने 28 मई, 2021 को लक्षद्वीप विकास प्राधिकरण विनियमन (एलडीएआर) 2021, असामाजिक गतिविधियों की रोकथाम अधिनियम (PASA) के मसौदे के कार्यान्वयन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। दरअसल लक्षद्वीप प्रशासन ने गोमांस प्रतिबंध सहित अन्य प्रशासनिक उपायों को पेश किया था।

इसके बाद केंद्र सरकार द्वारा लाए गए सुधारों के खिलाफ कॉन्ग्रेस नेता केपी नौशाद अली ने केरल हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। कॉन्ग्रेस नेता ने याचिका में दावा किया था कि प्रशासन इस नियम के जरिए अरब सागर में स्थिति इस द्वीप समूह की अनूठी संस्कृति और परंपरा को नष्ट करने की कोशिश कर रहा है।

कॉन्ग्रेस नेता की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने इसे नीतिगत मामला बताया और सभी हितधारकों से कोर्ट के साथ अपने विचार साझा करने को कहा। लक्षद्वीप के नए प्रशासक प्रफुल खोड़ा पटेल द्वारा नए सुधारों और नए नियमों को लाने का आदेश जारी करने के बाद से इस केंद्रशासित प्रदेश में सियासी भूचाल आ गया था।

लक्षद्वीप के प्रशासक प्रफुल खोड़ा द्वारा द्वारा किए जा रहे प्रशासनिक सुधारों का कॉन्ग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों ने कड़ा विरोध किया था।

उनका दावा था कि नए नियम द्वीप पर रहने वाली मुस्लिम आबादी की मजहबी भावनाओं को आहत करेंगे। लक्षद्वीप के सांसद मोहम्मद फैजल सहित विपक्षी दलों ने दावा किया था कि नए सुधारों का उद्देश्य द्वीपों की ‘अद्वितीय संस्कृति और परंपरा को नष्ट करना’ है। इसी प्रकार बित्रा द्वीप से जुड़ी योजनाओं और अन्य विकास परियोजनाओं पर भी विरोध सामने आया।

प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के बाद कैसे बदली तस्वीर?

जनवरी 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लक्षद्वीप दौरा इस पूरे अभियान का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। प्रधानमंत्री ने समुद्र तटों, समुद्री गतिविधियों और स्थानीय संस्कृति से जुड़ी तस्वीरें साझा कीं। इसके बाद देशभर में लक्षद्वीप को लेकर जबरदस्त उत्सुकता पैदा हुई। बड़ी संख्या में लोगों ने लक्षद्वीप को पर्यटन स्थल के रूप में देखना शुरू किया।

आँकड़े बताते हैं कि कुछ वर्षों में पर्यटकों की संख्या कई गुना बढ़ गई। RTI डाटा के मुताबिक, 2020 में जहाँ लक्षद्वीप में मात्र 3875 पर्यटक आए थे, वहीं 4 साल बाद यानी 2024 में यह संख्या बढ़कर 68328 हो गई। 2023 में यहाँ 46551 पर्यटक आए थे जो एक साल बाद 68328 हो गए यानी करीब 47 फीसदी का इजाफा हुआ।

यह लगभग 47 प्रतिशत की वृद्धि है। सबसे बड़ा उछाल प्रधानमंत्री मोदी के जनवरी 2024 के दौरे के बाद दर्ज किया गया। केंद्र सरकार ने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कई साल पहले से प्रयास शुरू कर दिए थे। केंद्र सरकार ने इसे संकेत के रूप में देखा कि यदि पर्याप्त सुविधाएँ विकसित की जाएँ तो लक्षद्वीप भारत का सबसे बड़ा समुद्री पर्यटन केंद्र बन सकता है।

नए फैसले पर क्या है सरकार का पक्ष?

बता दें कि लक्षद्वीप लंबे समय तक विकास की मुख्यधारा से दूर रहा। जब भी पर्यटन, निवेश, आधारभूत संरचना या प्रशासनिक सुधारों की बात होती है, तब इस्लामी और लेफ्ट लिबरल गैंग धार्मिक या राजनीतिक विवाद का विषय बनाने की कोशिश करते हैं।

सरकार का पक्ष यह है कि विकास और मजहबी पहचान को एक-दूसरे के विरोधी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यदि पर्यटन बढ़ेगा, निवेश आएगा, होटल उद्योग विकसित होगा और रोजगार के अवसर पैदा होंगे तो उसका लाभ सबसे अधिक स्थानीय युवाओं को ही मिलेगा।

केंद्र सरकार यह भी मानती है कि लक्षद्वीप को केवल उसकी मजहबी पहचान तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। यह भारत का एक रणनीतिक, आर्थिक और पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जिसे देश के अन्य विकसित क्षेत्रों के समान अवसर मिलने चाहिए।

इसी व्यापक सोच के तहत मोदी सरकार पर्यटन विस्तार, रक्षा अवसंरचना, प्रशासनिक सुधार और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रही है। 47 साल बाद शराब नीति में किया गया बदलाव भी इसी बड़ी विकास रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

CM योगी ने लॉन्च किया ‘प्रोजेक्ट गंगा’, UP सरकार के साथ काम करेगा हिंदूजा ग्रुप: 20 लाख घरों तक पहुँचेगा हाई-स्पीड इंटरनेट, जानें क्या है युवाओं-महिलाओं के रोजगार से जुड़ा ये मेगा प्लान

उत्तर प्रदेश के गाँवों को इंटरनेट से जोड़ने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ में ‘प्रोजेक्ट गंगा’ की शुरुआत की है। इस योजना के लिए UP सरकार और हिंदूजा ग्रुप की कंपनी के बीच एक बड़ा समझौता हुआ है। इसका मुख्य उद्देश्य शहरों की तरह गाँवों में भी बिना किसी रुकावट के हवा से तेज चलने वाला हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड इंटरनेट पहुँचाना है। इस डिजिटल प्रोजेक्ट के शुरू होने से अब उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले आम नागरिकों की जिंदगी पूरी तरह बदल जाएगी और उन्हें घर बैठे ही बेहतरीन इंटरनेट सुविधाएँ मिल सकेंगी।

क्या है प्रोजेक्ट गंगा और इसका मुख्य लक्ष्य

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार का ‘प्रोजेक्ट गंगा’ गाँवों और कस्बों तक तेज इंटरनेट पहुँचाने का एक बड़ा अभियान है। जिस तरह गंगा नदी करोड़ों लोगों को जीवन देती है, उसी तरह यह प्रोजेक्ट भी करोड़ों ग्रामीणों को डिजिटल दुनिया से जोड़कर उनके जीवन को आसान बनाएगा।

इस योजना के तहत राज्य सरकार ने अगले दो से तीन वर्षों के भीतर उत्तर प्रदेश के 20 लाख से अधिक ग्रामीण और अर्ध-शहरी घरों तक हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड इंटरनेट कनेक्शन पहुँचाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। यह योजना केवल इंटरनेट के तार बिछाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गाँवों के भीतर एक आत्मनिर्भर डिजिटल इकोसिस्टम तैयार करने की बड़ी कोशिश है।

इस इंटरनेट नेटवर्क के माध्यम से UP के सुदूर गाँवों तक टेलीमेडिसिन, ऑनलाइन शिक्षा (ई-एजुकेशन), ई-गवर्नेंस और ई-कॉमर्स जैसी अत्याधुनिक सेवाएँ बहुत ही आसानी से पहुँच सकेंगी। अब गाँवों के लोगों को छोटी-मोटी सरकारी सेवाओं, इलाज के परामर्श या अच्छी पढ़ाई के लिए बड़े शहरों की तरफ भागने की जरूरत नहीं पड़ेगी और वे अपने घर बैठे ही डिजिटल सेवाओं का लाभ उठा सकेंगे।

युवाओं और महिलाओं को मिलेंगे बंपर रोजगार

इस योजना की सबसे बड़ी और खास बात यह है कि इसके जरिए उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर नए रोजगार के अवसर पैदा होने जा रहे हैं। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, इस पूरे प्रोजेक्ट के क्रियान्वयन से राज्य में 1 लाख से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। यह प्रोजेक्ट UP के ग्रामीण युवाओं को उनके अपने ही गाँव और घर के आसपास तकनीकी क्षेत्र में काम करने और आगे बढ़ने का एक शानदार मौका प्रदान करेगा।

इसके साथ ही योगी सरकार ने इस प्रोजेक्ट के तहत महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए एक ऐतिहासिक निर्णय लिया है। इस पूरे अभियान में होने वाली कुल नियुक्तियों और सहभागिता में लगभग 50 फीसदी हिस्सेदारी महिलाओं के लिए पूरी तरह सुरक्षित की गई है। ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को इस डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़कर उन्हें सीधे तौर पर आत्मनिर्भर बनाया जाएगा। इससे गाँव की बेटियाँ और महिलाएँ खुद के पैरों पर खड़ी हो सकेंगी और डिजिटल साक्षरता के इस दौर में मुख्यधारा का हिस्सा बनेंगी।

डिजिटल सर्विस प्रोवाइडर बनकर कमाएँगे ग्रामीण युवा

प्रोजेक्ट गंगा के तहत न्याय पंचायत स्तर पर स्थानीय युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक विशेष रूपरेखा तैयार की गई है। इस योजना के अंतर्गत पूरे उत्तर प्रदेश में लगभग 8,000 से लेकर 10,000 स्थानीय युवाओं को ‘डिजिटल सर्विस प्रोवाइडर’ (DSPs) के रूप में विकसित और तैयार किया जाएगा। ये चयनित युवा अपने-अपने स्थानीय क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड और अन्य डिजिटल सेवाएँ आम जनता तक पहुँचाने का काम संभालेंगे।

इन चयनित युवाओं को पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाने के लिए हिंदूजा ग्रुप की कंपनी द्वारा विशेष और तकनीकी रूप से एडवांस ट्रेनिंग दी जाएगी। इसके बाद मुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना के माध्यम से इन युवाओं को अपना खुद का सेंटर स्थापित करने के लिए बिना गारंटी के आसान लोन भी दिलाया जाएगा। इसी सेंटर के माध्यम से गाँवों में ब्रॉडबैंड कनेक्शन देने, उसकी बिलिंग करने और ऑनलाइन सेवाओं को सुचारू रूप से संचालित करने का सारा काम किया जाएगा। यह स्थानीय स्तर पर युवाओं को बिजनेस मालिक बनने का मौका देगा।

बिना गारंटी के मिलेगा ₹5 लाख तक का लोन

उत्तर प्रदेश के वित्त और संसदीय कार्य मंत्री सुरेश कुमार खन्ना ने इस प्रोजेक्ट को लेकर सरकार की वित्तीय योजनाओं की जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार डिजिटल क्षेत्र में कदम रखने वाले इन युवा उद्यमियों को मजबूत वित्तीय सहायता देने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। सरकार की एक विशेष योजना के तहत राज्य के युवाओं को अपना खुद का डिजिटल व्यवसाय शुरू करने के लिए 5 लाख रुपए तक का ब्याज-मुक्त और कोलेटरल-फ्री (बिना किसी गारंटी के) लोन दिया जा रहा है।

इस बेहद कल्याणकारी लोन योजना का लाभ अब तक राज्य के 1 लाख से अधिक युवा उठा चुके हैं और वे अपना खुद का सफल रोजगार चला रहे हैं। अब ‘प्रोजेक्ट गंगा’ से जुड़ने वाले नए डिजिटल सर्विस प्रोवाइडर्स को भी इस ऋण योजना का सीधा लाभ दिया जाएगा। इसके जरिए युवाओं को अपना सेंटर शुरू करने में पैसों की कोई तंगी नहीं आएगी। उन्हें कंपनी की तरफ से आधुनिक नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर और बेहतरीन तकनीक का सपोर्ट भी मिलेगा, जिससे वे एक टिकाऊ और मजबूत बिजनेस मॉडल खड़ा कर सकेंगे।

एक्सप्रेसवे की तरह ही महत्वपूर्ण हैं डिजिटल हाईवे

स्टेट ट्रांसफॉर्मेशन कमीशन (STC) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) मनोज कुमार सिंह ने इस प्रोजेक्ट के महत्व को समझाते हुए एक बेहद जरूरी बात कही है। उन्होंने कहा कि आज के आधुनिक युग में जिस प्रकार जमीनी विकास के लिए बड़े-बड़े एक्सप्रेसवे जरूरी हैं, ठीक उसी प्रकार राज्य की तरक्की के लिए ‘डिजिटल हाईवे’ का निर्माण होना भी बेहद आवश्यक हो गया है। डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के मजबूत होने से ही गांवों और शहरों के बीच की दूरी को पूरी तरह खत्म किया जा सकता है।

उन्होंने आगे बताया कि इस इंटरनेट क्रांति के आने से गाँवों में ऑनलाइन बिजनेस, डिजिटल स्किलिंग और कंटेंट क्रिएशन जैसे आधुनिक क्षेत्रों का बहुत तेजी से विस्तार होगा। जब गाँवों में तेज इंटरनेट मिलेगा, तो वहाँ के प्रतिभावान युवाओं को अपनी कला और हुनर को पूरी दुनिया के सामने दिखाने का एक बेहतरीन मंच मिलेगा। यह प्रोजेक्ट ग्रामीण इलाकों में ज्ञान और सूचना का एक नया सवेरा लेकर आएगा, जिससे पूरे राज्य के विकास को एक नई और तेज रफ्तार मिलेगी।

शुरुआती चरण में बॉर्डर वाले जिलों पर रहेगा विशेष जोर

योगी सरकार ने इस योजना को बहुत ही सुनियोजित तरीके से पूरे राज्य में लागू करने का फैसला किया है। ‘प्रोजेक्ट गंगा’ के शुरुआती चरण में उत्तर प्रदेश के उन सुदूर और पिछड़े इलाकों पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाएगा जो अंतरराष्ट्रीय या अंतरराज्यीय सीमाओं से सटे हुए हैं। सरकार की योजना के मुताबिक, सबसे पहले श्रावस्ती, बहराइच और बलरामपुर जैसे बॉर्डर वाले महत्वपूर्ण जिलों में इस हाई-स्पीड इंटरनेट नेटवर्क को पूरी तरह बिछाया जाएगा।

इन सीमावर्ती जिलों में डिजिटल कनेक्टिविटी मजबूत होने से वहाँ के लोगों को मुख्यधारा से जुड़ने में बहुत आसानी होगी और नए आर्थिक अवसर खुलेंगे। इन जिलों में प्रोजेक्ट को सफलतापूर्वक लागू करने के बाद, इसके अनुभवों के आधार पर बहुत तेजी से इस योजना का विस्तार पूरे उत्तर प्रदेश के सभी जिलों और गाँवों में कर दिया जाएगा। सरकार का लक्ष्य है कि राज्य का कोई भी कोना और कोई भी गाँव इस डिजिटल क्रांति की रोशनी से अछूता न रहे और हर घर तक विकास पहुँचे।

‘ब्रेकथ्रू ब्लास्ट’ से गूँजी दुनिया की सबसे ऊँची और सबसे लंबी सुरंग: जोजिला टनल से अब कश्मीर से लेह के बीच सालभर होगी आवाजाही, जानिए कैसे पाकिस्तान-चीन को काउंटर करने में मिलेगी मदद

13.153 किलोमीटर लंबी जोजिला टनल के आखिरी हिस्से के जुड़ने (ब्रेकथ्रू) के साथ ही भारत ने इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में नया इतिहास रच दिया है। (9 जून 2026) मंगलवार को ब्रेकथ्रू के मौके पर सड़क निर्माण और परिवहन मंत्री नितिन गडकरी मौजूद रहे। यह टनल कश्मीर और लद्दाख के बीच हर मौसम में कनेक्टिविटी देगा, चाहे भयानक बर्फबारी हो या बारिश हो, हमेशा आवाजाही होती रहेगी। इससे इलाके का विकास होगा और सीमा की सुरक्षा और मजबूत होगी।

11600 फीट से अधिक की ऊँचाई पर यह दुनिया की सबसे ऊँची सुरंग है, जिसमें एक ही मार्ग में आने-जाने की सुविधा होगी। यह क्षेत्र हर साल भीषण सर्दी के कारण कई महीनों तक कटा रहता है। इस दृष्टि से यह सुरंग रणनीतिक रूप से काफी अहम है।

यह पाकिस्तान और चीन के साथ लगी सीमा पर सैनिकों के आवाजाही को सुगम, तेज और सुरक्षित बनाएगी। 2020 में भारतीय सेना और चीनी सैनिकों के बीच गलवान में आमने-सामने की लड़ाई हुई थी। उस वक्त ऐसी सुरंग की जरूरत को महसूस किया गया और क्षेत्र में तेजी से बुनियादी ढाँचे के विकास को बढ़ावा दिया गया।

पहाड़ों के रास्ते कश्मीर और लद्दाख को जोड़ा गया

जम्मू और कश्मीर के सोनमर्ग के पास बाल्टल और लद्दाख के द्रास क्षेत्र में मीनामर्ग के बीच जोजिला सुरंग का निर्माण किया जा रहा है । इस परियोजना का उद्देश्य श्रीनगर-कारगिल-लेह राजमार्ग पर हर मौसम में कनेक्टिविटी को बनाए रखना है। यह कश्मीर और लद्दाख के बीच अहम रोड कनक्टिविटी भी है।

साल के करीब 4 महीने भारी हिमपात, बर्फीले तूफान और हिमस्खलन के कारण यह दर्रा बंद हो जाता है। इससे नागरिकों की आवाजाही, व्यापार, पर्यटन और आवश्यक वस्तुओं के परिवहन में बाधा उत्पन्न होती है।

इस सुरंग को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि मौसम की मार का असर आवाजाही पर न पड़े। सालभर सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित हो।

परियोजना के मुख्य सुरंग की लंबाई 13.153 किलोमीटर है। इसके अलावा सहायक सड़कों, पुलों और दूसरे बुनियादी ढाँचे को जोड़ने पर इसकी लंबाई करीब 30.9 किलोमीटर हो जाती है। इसमें 457 मीटर और 1953 मीटर लंबी नीलग्रार जुड़वां सुरंगें, 2.35 किलोमीटर में फैली सात कट-एंड-कवर संरचना, 450 मीटर लंबी स्नो गैलरी और 460 मीटर की तीन अहम पुल भी शामिल हैं।

पहाड़ों में इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना

जोजिला सुरंग महज एक सड़क परियोजना नहीं है। यह हिमालय में अब तक किए गए सबसे जटिल इंजीनियरिंग कारनामों में से एक है।

यह परियोजना मेघा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (एमईआईएल) ने राष्ट्रीय राजमार्ग और अवसंरचना विकास निगम लिमिटेड (एनएचआईडीसीएल) के साथ मिलकर कर रही है, जो दुर्गम भूभागों में राजमार्ग विकास के लिए केंद्र सरकार की विशेष एजेंसी है।

इसकी खासियत वेंटिलेशन और सुरक्षा तंत्र है। चूँकि यहाँ कोई अलग से बचाव सुरंग नहीं है, इसलिए इंजीनियरों ने वेंटिलेशन और आपातकालीन स्थिति में यहाँ पहुँचने के लिए तीन विशाल शाफ्ट का निर्माण किया है। सबसे बड़ा शाफ्ट पहाड़ में 474.3 मीटर की गहराई तक जाता है और वर्तमान में भारत का सबसे लंबा शाफ्ट है। अन्य दो शाफ्ट की लंबाई क्रमशः 367.38 मीटर और 213.5 मीटर है।

यह सुरंग न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग तरीका (NATM) का उपयोग करके बनाई गई है, जो हिमालय जैसे पर्वतीय क्षेत्र के लिए सबसे आधुनिक निर्माण तकनीक है। पारंपरिक सुरंग निर्माण के तरीकों से अलग, NATM इंजीनियरों को खुदाई, तत्काल मजबूती और भूवैज्ञानिक निगरानी के माध्यम से चट्टान की बदलती स्थितियों के अनुरूप लगातार ढलने की सुविधा प्रदान करती है।

यह तरीका काफी अहम रहा, क्योंकि जोजिला अलाइनमेंट के साथ की भूविज्ञान संरचना अत्यधिक अप्रत्याशित निकली। इंजीनियरों ने 13 किलोमीटर के इस भूभाग में चट्टान में 67 तरह के परिवर्तन दर्ज किए, जिसके कारण खुदाई और दूसरी रणनीतियों में बार-बार बदलाव करना पड़ा।

इस चुनौती को और भी जटिल बना रहा था यहाँ का जलवायु और मौसम। इस क्षेत्र में तापमान अक्सर -20 डिग्री सेल्सियस से नीचे चला जाता है और सर्दियों में -30 डिग्री सेल्सियस तक गिर सकता है। निर्माण दल वर्षों से भारी हिमपात, बर्फीले तूफान और कई हिमस्खलन जैसी घटनाओं के बीच काम करते रहे।

करीब 1200 से अधिक श्रमिकों ने निर्माण कार्य दिनरात जारी रखा। परियोजना को पूरा करने में 10 मिलियन से अधिक घंटे तक श्रमिकों ने काम किया।

सुरंग बुनियादी ढाँचे के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि क्यों है?

जोजिला सुरंग दुनिया के कुछ सबसे दुर्गम भूभागों में बने सुरंगों में एक है। यह परियोजना उन्नत सुरंग निर्माण तकनीक, इंजीनियरिंग विशेषज्ञता और पर्वतीय क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे के निर्माण की देश की बढ़ती क्षमता को प्रदर्शित करता है। हिमस्खलन-संभावित हिमालयी पहाड़ों के नीचे इतनी बड़ी सुरंग की सफल खुदाई को अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि माना जाता है।

इस सुरंग से आर्थिक लाभ भी मिलने की उम्मीद है। चालू होने के बाद, इससे बाल्टल और मीनामर्ग के बीच यात्रा का समय कम हो जाएगा। जोजिला दर्रे से होकर यात्रा करने में अब समय मात्र 15 मिनट लगेगा, जो पहले साढ़े तीन घंटे लगते थे।

पूरे साल अब कश्मीर और लद्दाख के बीच लोगों, सामान और सेवाओं की आवाजाही बनी रहेगी। सड़कों के बंद होने के कारण व्यवसाय ठप पड़ जाते थे, लेकिन अब दिक्कत नहीं होगी। सामानों के भंडारण करने की आवश्यकता नहीं होगी। किसानों, व्यापारियों को बाजारों तक पहुँच का लाभ मिलेगा।

पर्यटन के क्षेत्र को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। सोनमर्ग, द्रास, कारगिल, लेह जैसे पर्यटन स्थल अब केवल गर्मी में नहीं बल्कि पूरे साल पर्यटकों को आकर्षित करेंगे। इससे लोगों की आमदनी बढ़ेगी और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। पूरे साल स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और आवश्यक सेवाएँ लोगों को मिलती रहेगी।

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अहम सुरंग

श्रीनगर-लेह राजमार्ग भारतीय सशस्त्र बलों के लिए एक महत्वपूर्ण रसद गलियारा है। यह लद्दाख में सैनिकों, उपकरणों, ईंधन की आपूर्ति के लिए सबसे अहम मार्ग है, जो चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर तनाव के बाद और भी महत्वपूर्ण हो गया है।

हाल के वर्षों में, भारत ने लद्दाख के ज्यादा ऊँचाई वाले सीमावर्ती क्षेत्र में सैनिकों की आवाजाही को बढ़ाने के लिए बुनियादी ढाँचे को मजबूत किया है। जोजिला सुरंग इसी व्यापक प्रयास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

सैन्य विशेषज्ञों का मानना ​​है कि यह परियोजना जरूरत पड़ने पर सैनिकों और उपकरणों की तेजी से तैनाती की सुविधा देकर परिचालन लचीलेपन में काफी सुधार लाएगी। इससे मौसम के अनुकूल परिस्थितियों और अक्सर लंबे और जोखिम भरे वैकल्पिक मार्गों पर निर्भरता भी कम होगी।

चीन और पाकिस्तान के साथ भारत की सीमाओं पर बढ़ती सैन्य गतिविधियों के संदर्भ में इस सुरंग का रणनीतिक महत्व और भी बढ़ जाता है। विश्वसनीय, हर मौसम में काम करने वाली कनेक्टिविटी भारत की रसद संबंधी तैयारियों को मजबूत करती है और संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में मजबूत उपस्थिति बनाए रखने की उसकी क्षमता को बढ़ाती है।

इस तरह के बुनियादी ढाँचे की आवश्यकता 1999 के कारगिल युद्ध के समय महसूस किया गया। इसके बाद भारत-चीन सीमा पर तनाव और गलवान झड़प ने लद्दाख तक सड़क संपर्क की सोच को अमली जामा पहनाया।

ट्रंप को अमेरिका की ही अदालत ने दिया झटका, H-1B Visa पर 1 लाख डॉलर वसूलने के फैसले को ‘अवैध’ बता रद किया: जानिए इससे किसको होगा फायदा

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की सख्त अप्रवासन नीतियों को न्यायपालिका से एक और बड़ा झटका लगा है। मैसाचुसेट्स के एक फेडरल कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस बेहद विवादास्पद फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया है, जिसके तहत नए H-1B वीजा आवेदनों पर $100,000 (करीब 95 लाख रुपए) की भारी-भरकम सालाना फीस लगाने का ऐलान किया गया था। इस अदालती फैसले को अमेरिकी कंपनियों, विश्वविद्यालयों, अस्पतालों और विशेष रूप से भारतीय आईटी पेशेवरों के लिए एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक राहत माना जा रहा है।

बोस्टन के अमेरिकी जिला जज (US District Judge) लियो सोरोकिन ने सोमवार (8 जून, 2026) को इस नीति को पूरी तरह से ‘गैरकानूनी’ (Unlawful) करार देते हुए रद्द करने का आदेश दिया। कोर्ट ने अपने 42 पन्नों के फैसले में स्पष्ट किया कि व्हाइट हाउस के पास अमेरिकी संसद (कॉन्ग्रेस) की मंजूरी के बिना अपने स्तर पर इस तरह का कोई भी भारी टैक्स या फीस थोपने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है।

जज सोरोकिन ने अपने आदेश में क्या कहा?

अदालत ने अपने फैसले में साफ तौर पर कहा कि भले ही इस राशि को ‘नियामक भुगतान’ या ‘फीस’ का नाम दिया गया हो, लेकिन इसके पीछे का असल मकसद और इसका प्रभाव एक अनधिकृत टैक्स (Unauthorised Tax) की तरह है। जज सोरोकिन ने लिखा कि अमेरिकी संविधान के मुताबिक देश में किसी भी तरह का टैक्स लगाने का विशेष अधिकार सिर्फ और सिर्फ अमेरिकी कॉन्ग्रेस (संसद) के पास सुरक्षित है, राष्ट्रपति इसे अपनी मर्जी से अकेले लागू नहीं कर सकते।

इसके साथ ही अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि ट्रंप प्रशासन इस नीति को लागू करने से पहले देश के उन महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर पड़ने वाले असर का सही आकलन करने में विफल रहा जो पहले से ही श्रम की भारी कमी से जूझ रहे हैं। यह नियम देश के स्वास्थ्य क्षेत्र, उच्च शिक्षण संस्थानों और ग्रामीण इलाकों को बुरी तरह प्रभावित कर रहा था, जहाँ डॉक्टरों, नर्सों और योग्य शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए विदेशी पेशेवरों की मदद ली जाती है।

यह कानूनी चुनौती कैलिफोर्निया समेत 20 ऐसे अमेरिकी राज्यों के कड़े विरोध के बाद सामने आई थी, जहाँ डेमोक्रेटिक पार्टी के नेतृत्व वाली सरकारें हैं। इन राज्यों के अटॉर्नी जनरल ने अदालत में दलील दी थी कि राष्ट्रपति ने इस नीति के जरिए ‘इमिग्रेशन एंड नेशनलिटी एक्ट’ के तहत मिले अपने कानूनी दायरे का खुलेआम उल्लंघन किया है। उनका तर्क था कि इतनी भारी फीस से राज्य की अर्थव्यवस्थाओं, यूनिवर्सिटीज और स्टार्टअप्स को गंभीर नुकसान पहुँच रहा था।

ट्रंप सरकार का क्या था तर्क और फीस का पुराना ढाँचा?

डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले साल सितंबर 2025 में एक राष्ट्रपति उद्घोषणा (Presidential Proclamation) के जरिए इस $100,000 की भारी फीस की घोषणा की थी। यह उनकी ‘बाय अमेरिकन, हायर अमेरिकन’ नीति और कानूनी अप्रवासन पर कड़े प्रतिबंध लगाने के अभियान का हिस्सा था। ट्रंप प्रशासन का दावा था कि इस कड़े कदम से अमेरिकी कंपनियाँ विदेशों से सस्ते श्रम को बुलाने के बजाय स्थानीय अमेरिकी नागरिकों को नौकरियों पर रखने के लिए मजबूर होंगी और इस कार्यक्रम के दुरुपयोग पर रोक लगेगी।

इस नए नियम के आने से पहले का ढांचा बेहद अलग और किफायती था। अमेरिकी नियोक्ताओं (Employers) को एक सामान्य H-1B वीजा आवेदन के लिए सरकारी फाइलिंग फीस के रूप में आमतौर पर केवल $2,000 से $5,000 (लगभग 1.6 लाख से 4.2 लाख रुपये) के बीच ही भुगतान करना होता था। ट्रंप सरकार ने इसे अचानक 20 से 50 गुना तक बढ़ा दिया, जिससे छोटे और मध्यम आकार की कंपनियों के लिए विदेशी टैलेंट को काम पर रखना पूरी तरह से नामुमकिन हो गया था।

व्हाइट हाउस के अधिकारी और कॉमर्स सेक्रेटरी हावर्ड लुटनिक लगातार यह दलील दे रहे थे कि अगर बड़ी टेक कंपनियों को वास्तव में वैश्विक प्रतिभाओं की इतनी ही आवश्यकता है, तो वे इतनी कीमत चुकाने में सक्षम हैं। ट्रंप प्रशासन का आरोप था कि H-1B कार्यक्रम का बड़े पैमाने पर शोषण करके अमेरिकी कामगारों को कम वेतन वाले विदेशी कर्मचारियों से बदला जा रहा है, जिससे अमेरिकी नागरिकों के लिए रोजगार के बाजार में असमानता पैदा हो रही थी।

टेक कंपनियों और आईटी उद्योग पर अब क्या पड़ेगा फर्क?

फेडरल कोर्ट के इस फैसले से सिलिकॉन वैली और वैश्विक तकनीकी उद्योग ने राहत की सांस ली है। अमेज़न, माइक्रोसॉफ्ट, और मेटा जैसी दिग्गज अमेरिकी टेक कंपनियाँ हर साल हजारों की संख्या में कुशल पेशेवरों को H-1B वीजा के जरिए अपने साथ जोड़ती हैं। अकेले 2025 की पहली छमाही में ही अमेज़न के लिए 10,000 से अधिक और माइक्रोसॉफ्ट व मेटा के लिए 5-5 हजार से ज्यादा वीजा स्वीकृत किए गए थे। ऐसे में इस भारी फीस के हटने से इन कंपनियों पर पड़ने वाला अरबों डॉलर का वित्तीय बोझ टल गया है।

न्यायालय के इस आदेश से बाजार में अनिश्चितता का माहौल खत्म होगा और कुशल पेशेवरों की नियुक्ति की प्रक्रिया में एक बार फिर पारदर्शिता और स्थिरता आएगी। इमिग्रेशन एडवोकेसी ग्रुप (FWD.us) के अनुसार, इस अत्यधिक शुल्क ने अमेरिकी रोजगार और मजदूरी के विकास को गंभीर नुकसान पहुँचाया था। अब कंपनियों के लिए वैश्विक स्तर पर उपलब्ध बेहतरीन टैलेंट को बिना किसी भारी वित्तीय जुर्माने के अपने साथ जोड़ना और अमेरिकी नवाचार (Innovation) की रफ्तार को बनाए रखना संभव हो सकेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न केवल बड़ी कंपनियों, बल्कि अमेरिका के उन छोटे स्टार्टअप्स और अकादमिक संस्थानों के लिए जीवनदान साबित होगा, जो $100,000 की फीस का खर्च वहन करने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। स्टैनफोर्ड, यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन और यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा जैसे प्रमुख संस्थान जो हर साल सैकड़ों विदेशी शोधकर्ताओं और प्रोफेसरों को अपने यहाँ लाते हैं, अब बिना किसी आर्थिक संकट के अपनी रिसर्च को आगे बढ़ा सकेंगे।

अमेरिका में कंपनियों से अब तक कितनी हुई थी वसूली?

अदालत के दस्तावेजों और ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट से सामने आए आँकड़े यह बताते हैं कि ट्रंप प्रशासन की यह नीति कितनी व्यावहारिक रूप से विफल साबित हुई थी। $100,000 की भारी-भरकम राशि के डर से अमेरिकी नियोक्ताओं ने नए कर्मचारियों के लिए आवेदन करना लगभग बंद ही कर दिया था। भारी माँग वाले इस वीजा कार्यक्रम में आवेदन करने की दर ऐतिहासिक रूप से गिर गई थी।

आधिकारिक कोर्ट फाइलिंग के अनुसार, यह नियम लागू होने के बाद से लेकर मध्य फरवरी (2026) तक अमेरिकी नागरिकता और अप्रवासन सेवा (USCIS) को देश भर की कंपनियों से इस भारी फीस के रूप में केवल 85 भुगतान (85 Payments) ही प्राप्त हुए थे। इसका सीधा मतलब यह है कि अमेरिका ने कंपनियों से इस योजना के तहत केवल $8.5 मिलियन (लगभग 71 करोड़ रुपए) की ही कुल वसूली की थी, जो यह दिखाता है कि कंपनियों ने विदेशी पेशेवरों को बुलाने के बजाय अपने हाथ पूरी तरह पीछे खींच लिए थे।

यह मामूली संख्या साफ करती है कि इस नीति ने रोजगार बढ़ाने के बजाय योग्य श्रम की आवक को पूरी तरह से ठप कर दिया था। केवल कुछ बहुत ही संपन्न और बेहद जरूरी मामलों वाली कंपनियों ने ही यह भारी रकम चुकाई, जबकि बाकी सभी नियोक्ताओं ने अदालत के अंतिम फैसले का इंतजार करना या नई नियुक्तियों को टालना ही बेहतर समझा।

भारतीयों को इस फैसले से क्या होगा फायदा?

H-1B वीजा कार्यक्रम कुशल विदेशी पेशेवरों के लिए अमेरिका में काम करने का सबसे लोकप्रिय और महत्वपूर्ण जरिया है, जो विशेष रूप से टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, हेल्थकेयर और फाइनेंस जैसे क्षेत्रों के लिए जारी किया जाता है। अमेरिका हर साल कुल 65,000 सामान्य H-1B वीजा जारी करता है, जबकि अमेरिकी विश्वविद्यालयों से मास्टर या पीएचडी जैसी एडवांस डिग्री हासिल करने वाले छात्रों के लिए 20,000 का अतिरिक्त कोटा आरक्षित होता है।

इस पूरे कार्यक्रम में भारतीय प्रोफेशनल्स का दबदबा जगजाहिर है। हर साल जारी होने वाले कुल H-1B वीजा में से लगभग 70 फीसदी हिस्सा अकेले भारतीय नागरिकों के खाते में जाता है। यही वजह है कि ट्रंप के इस फैसले से भारत का आईटी सेक्टर और वहाँ जाने का सपना देख रहे हजारों युवा सबसे ज्यादा चिंतित थे।

फीस रद्द होने का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि भारतीय इंजीनियरों और टेक विशेषज्ञों के लिए अमेरिकी कंपनियों में नौकरी पाने के रास्ते में खड़ा हुआ सबसे बड़ा वित्तीय रोड़ा अब हट गया है।

वर्तमान में अमेरिका के भीतर लगभग 7,30,000 H-1B वीजा धारक रह रहे हैं, जिनके साथ उनके करीब 5,50,000 आश्रित (पति/पत्नी और बच्चे) भी वहाँ मौजूद हैं।

हालाँकि भारतीय पेशेवरों के लिए एक चिंता का विषय यह भी है कि अमेरिकी जाँच एजेंसियाँ भारत से गलत या फर्जी तरीकों से वीजा हासिल करके अमेरिका आने वाले कुछ संदिग्ध मामलों की कड़ाई से जाँच कर रही हैं। लेकिन वैध और उच्च कुशल भारतीय पेशेवरों के लिए फेडरल कोर्ट का यह फैसला उनकी नौकरी की सुरक्षा और नए अवसरों के लिहाज से एक बड़ी जीत है।

ट्रंप प्रशासन के पास अब भी कानूनी लड़ाई का रास्ता, फिलहाल वसूली रुकी

जज सोरोकिन के इस फैसले ने भले ही इस विवादास्पद फीस पर देशव्यापी रोक लगा दी हो, लेकिन इस मामले में कानूनी लड़ाई अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। इस नीति को लेकर अमेरिकी न्यायपालिका में एक दिलचस्प कानूनी विभाजन (Legal Split) की स्थिति बन गई है। इससे पहले वॉशिंगटन की एक अन्य फेडरल कोर्ट ने यूएस चैंबर ऑफ कॉमर्स द्वारा दायर एक अलग मुकदमे में ट्रंप सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया था, जिसे बाद में ऊपरी अदालत में चुनौती दी गई थी।

व्हाइट हाउस की प्रवक्ता टेलर रोजर्स ने अदालती आदेश पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि ट्रंप प्रशासन को पूरा भरोसा है कि ऊपरी अदालत में अपील करने पर इस फैसले को पलट दिया जाएगा। प्रशासन का तर्क है कि राष्ट्रपति के पास देश के हितों की रक्षा के लिए किसी भी श्रेणी के विदेशियों के प्रवेश को प्रतिबंधित करने का स्पष्ट संवैधानिक अधिकार है।

कानूनी विशेषज्ञों और अप्रवासन वकीलों (Immigration Lawyers) को पूरी उम्मीद है कि ट्रंप प्रशासन इस फैसले के खिलाफ ‘यूएस कोर्ट ऑफ अपील्स फॉर द फर्स्ट सर्किट’ का दरवाजा खटखटाएगा। सरकार कोर्ट से यह माँग भी कर सकती है कि जब तक यह मुकदमा उच्च न्यायालयों में लंबित है, तब तक इस फीस को अंतरिम रूप से लागू रहने की अनुमति दी जाए। ऐसे में आने वाले हफ्तों में यह मामला अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुँच सकता है, लेकिन फिलहाल के लिए कंपनियों को इस भारी टैक्स से पूरी तरह मुक्ति मिल गई है।