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GAGAN की मदद से इंडिगो का विमान उदयपुर एयरपोर्ट पर उतरा: जानिए क्या है भारत का स्वदेशी सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम और यह कैसे काम करता है?

प्लेन की उड़ान का सबसे जरूरी हिस्सा टेक-ऑफ और लैंडिंग होता है। ज्यादातर हादसे इन्हीं दो प्रक्रियाओं के दौरान होते हैं। प्लेन लैंडिंग करते समय जिस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हैं, उसे इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम (ILS) कहते हैं। यह एक सटीक रेडियो नेविगेशन सिस्टम है, जो विमानों को खराब मौसम, घने कोहरे या रात के समय रनवे पर सुरक्षित उतरने में मार्गदर्शन करती है।

भारत में उड़ने वाले प्लेन हर दिन इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते रहे हैं, लेकिन 27 जून, 2026 को एक अलग घटना हुई। उदयपुर एयरपोर्ट पर पहुँची इंडिगो की एक फ्लाइट ने लैंडिंग के लिए इस इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम की जगह भारत के स्वदेशी सैटेलाइट-बेस्ड नेविगेशन सिस्टम यानी GAGAN का इस्तेमाल किया। (GPS बेस्ड GEO ऑगमेंटेड नेविगेशन)। इस सिस्टम को भारत के इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइज़ेशन यानी ISRO और एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने मिलकर बनाया है।

पहले GAGAN सिस्टम को छोटे एयरक्राफ्ट के साथ टेस्ट किया गया था, लेकिन अब इंडिगो के कमर्शियल एयरक्राफ्ट ने GAGAN का इस्तेमाल करके सफलतापूर्वक लैंडिंग की है। यह एविएशन के क्षेत्र में ऐतिहासिक है। इससे पता चलता है कि भारत के पास अब स्वदेशी सैटेलाइट-बेस्ड सिस्टम की मदद से ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर हुए बिना कमर्शियल एयरक्राफ्ट को सफलतापूर्वक लैंड कराने की क्षमता है।

इसमें कोई शक नहीं कि लैंडिंग किसी भी एयरक्राफ्ट के लिए जरूरी है। आमतौर पर पायलट दूर से ही रनवे को देख सकते हैं और उसी हिसाब से सफलतापूर्वक लैंड कर सकते हैं। लेकिन बारिश के मौसम में, कोहरे या बादलों में, या अक्सर रात में, पायलट को बाहर से मदद की जरूरत होती है। दशकों से इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम यह काम कर रहा है।

यह सिस्टम जमीन पर लगे रेडियो एंटेना और दूसरे उपकरण की मदद से पायलट को बताता रहता है कि उसका एयरक्राफ्ट रनवे की लाइन में है या नहीं। वह यह भी बताता है कि एयरक्राफ्ट रनवे पर बहुत तेजी से आ रहा है या बहुत धीरे, या उसकी स्पीड बहुत धीमी है या बहुत तेज। इसके आधार पर पायलट एयरक्राफ्ट को बाएँ-दाएँ, ऊपर-नीचे, ज्यादा स्पीड या कम स्पीड कर लैंड कर सकता है।

इसके लिए एयरक्राफ्ट को रनवे से लगातार रेडियो सिग्नल मिलते रहते हैं। अगर विजिबिलिटी बहुत कम हो, तो अब मॉडर्न एयरक्राफ्ट में ऐसी सुविधा है जो ऑटोमैटिक लैंडिंग भी कर सकती है और उसके लिए भी ILS काम आता है। ILS की कमी यह है कि हर रनवे पर यह सिस्टम होना जरूरी है और रेडियो ट्रांसमीटर लगाना, उसे लगातार मेंटेन करना और लगातार बदलाव करना इसके लिए बेहद जरूरी है। इसलिए कुछ छोटे एयरपोर्ट पर या तो यह सिस्टम होता ही नहीं है या कुछ ही रनवे पर रखा जाता है।

भारत एविएशन नेटवर्क पर तेजी से काम कर रहा है और रीजनल कनेक्टिविटी पर जोर दिया जा रहा है। ऐसे में इन लिमिटेशन पर काम करना जरूरी है, इसीलिए GAGAN बनाया गया था।

GAGAN क्या है?

GAGAN सिस्टम को एविएशन की भाषा में LPV (लोकलाइजर परफॉर्मेंस विद वर्टिकल गाइडेंस) कहा जाता है। यह ILS की तरह ही काम करता है, लेकिन फर्क यह है कि यह जमीन पर लगे रेडियो एंटीना पर निर्भर नहीं करता, बल्कि सैटेलाइट पर निर्भर करता है। आसान शब्दों में – रनवे से एयरक्राफ्ट को गाइड करने के बजाय, यह काम सैटेलाइट की मदद से होता है। इसके लिए जमीन पर एंटीना या सिस्टम की जरूरत नहीं होती।

यहाँ एक सवाल उठता है कि अगर एयरक्राफ्ट पहले से ही GPS का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो सैटेलाइट-बेस्ड सिस्टम की क्या जरूरत है?

यह सच है कि हर एयरक्राफ्ट नेविगेशन के लिए GPS का इस्तेमाल करता है, लेकिन सटीक लैंडिंग के लिए नॉर्मल GPS काफी नहीं है। हम अपने मोबाइल फोन में भी GPS का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन उसकी लोकेशन कुछ मीटर तक गलत होती है। यह सही लोकेशन नहीं दिखाता है। हालाँकि यह सिस्टम कार चलाने के लिए सही है, लेकिन एयरक्राफ्ट में 2-5 मीटर की सटीकता की ही जरूरत नहीं होती उसे लैंड करने से कुछ किलोमीटर पहले से ही बहुत सटीक जानकारी होना जरूरी है, वह थोड़ा भी नहीं भटक सकता।

GPS सैटेलाइट पृथ्वी से हजारों किलोमीटर दूर काम करते हैं। उनके सिग्नल हम तक पहुँचने से पहले पृथ्वी के कई स्तर वाले वातावरण से गुजरते हैं। वातावरण के आयनोस्फीयर में कुछ इलेक्ट्रिकल पार्टिकल GPS सिग्नल की स्पीड और दिशा को थोड़ा बदल देते हैं, जिससे हम तक पहुँचने वाली जानकारी में थोड़ी गलती हो जाती है।

भारत के मामले में यह समस्या थोड़ी ज्यादा है, क्योंकि हम पृथ्वी के उस हिस्से में हैं जहाँ आयनोस्फीयर सबसे ज्यादा एक्टिव है। यहाँ इलेक्ट्रिकली चार्ज्ड कण की मात्रा लगातार बदलती रहती है। कभी ये कण ज्यादा होते हैं, कभी कम। जैसा कि पहले बताया गया है, यह सिर्फ मोबाइल फोन या कार नेविगेशन के लिए ही प्रॉब्लम नहीं है, बल्कि किसी एयरक्राफ्ट की सटीक लैंडिंग के लिए भी रिस्क लेने जैसा है, इस रिस्क को खत्म कर GPS सिग्नल्स को सटीक बनाना का काम GAGAN करता है।

GAGAN कैसे काम करता है?

आइए समझते हैं कि GAGAN कोई GPS सिस्टम नहीं है। यह GPS पर ही रखे गए एक इंटेलिजेंट करेक्शन सिस्टम की तरह काम करता है। अगर हम स्मार्टफोन का उदाहरण लें, तो यह ‘ऑटोकरेक्ट’ जैसा है। GPS एक सिग्नल भेजता है, GAGAN सिर्फ यह देखता है कि यह जानकारी पूरी तरह सही है या नहीं। अगर कोई गलती मिलती है, तो यह सिग्नल के एयरक्राफ्ट तक पहुँचने से पहले उसे ठीक कर देता है। एक तरह से यह एक फैक्ट चेकर की भूमिका निभाता है। इसका काम सिग्नल भेजना नहीं है।

इस सिस्टम में 15 रेफरेंस स्टेशन अहम भूमिका निभाते हैं, जो पूरे भारत में अलग-अलग जगहों पर मौजूद हैं। इन स्टेशनों को GPS सिग्नल मिलते हैं। इन स्टेशनों की असली लोकेशन पहले से तय होती हैं और सेंटीमीटर लेवल तक सटीक होती हैं। इसलिए उन्हें अपनी लोकेशन के बारे में पहले से ही बहुत सटीक जानकारी होती है। इस दौरान, वे लगातार GPS सिग्नल से उनकी तुलना करते रहते हैं ताकि यह देखा जा सके कि GPS उनकी लोकेशन सही दिखा रहा है या नहीं। इसलिए यह जरूरी है कि GPS लोकेशन असली (पहले मापी गई) लोकेशन से मेल खाए।

अगर GPS में थोड़ा सा भी बदलाव दिखता है, तो GPS इसे गलती मान लेता है। यह काम सभी स्टेशन करते हैं। वहाँ से डेटा इकट्ठा होकर एक मास्टर कंट्रोल स्टेशन तक पहुँचता है। यहाँ का कंप्यूटर पूरे देश से मिले डेटा की समीक्षा करता है और यह पता लगाता है कि GPS सिग्नल में कितनी गलती है। इसके बाद इस गलती को ठीक करके एक करेक्शन डेटा तैयार किया जाता है।

हालाँकि यह करेक्शन डेटा सीधे एयरक्राफ्ट को नहीं भेजा जाता है। इसे सबसे पहले ISRO के GSAT-8 और GSAT-10 जैसे जियोस्टेशनरी सैटेलाइट को भेजा जाता है। ये सैटेलाइट धरती से करीब 36000 km की ऊँचाई पर एक ही जगह पर रहकर पूरे भारतीय इलाके को कवर करते हैं। यह सैटेलाइट करेक्शन डेटा एयरक्राफ्ट को भेजता है। फिर पायलट इसी डेटा के आधार पर लैंडिंग के लिए आगे बढ़ता है।

इसके अलावा GAGAN एक और काम भी करता है। यह लगातार चेक करता है कि GPS से आ रहे सिग्नल सही हैं या नहीं। अगर इसमें कोई गलती मिलती है, तो यह तुरंत एयरक्राफ्ट को चेतावनी देता है कि इस समय इस जानकारी पर भरोसा नहीं किया जा सकता, इस सिस्टम को ‘इंटीग्रिटी मॉनिटरिंग’ कहते हैं। इसे एक सेफ्टी फीचर के तौर पर रखा गया है।

ISRO की मदद से देश में ही बनाए गए इस सिस्टम की मदद से एयरक्राफ्ट ज्यादा आसानी से सही और सुरक्षित तरीके से लैंड कर पाएँगे और इससे एयर ट्रैफिक मैनेजमेंट भी आसान हो जाएगा। पिछले दस सालों में भारत में सैकड़ों एयरपोर्ट जोड़े गए हैं। लेकिन सरकार भी जानती है कि सिर्फ एयरपोर्ट बनाने से काम नहीं चलता। एविएशन इंडस्ट्री के डेवलपमेंट के लिए ऐसी सभी चीजें जरूरी हैं। नए भारत में इन सभी पर काम चल रहा है।

(यह लेख मूलरूप से गुजराती में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

₹3000000 तक के इलेक्ट्रिक वाहनों को रजिस्ट्रेशन में छूट, पुरानी गाड़ियों की स्क्रैपिंग पर ₹1 लाख तक का प्रोत्साहन: जानिए नई EV पॉलिसी से रेखा सरकार कैसे लगाएगी वायु प्रदूषण पर लगाम

दिल्ली सरकार ने नई EV पॉलिसी 2026–2030 को मंजूरी दे दी है। इसके तहत इलेक्ट्रिक वाहनों की खरीद में बंपर छूट के साथ सब्सिडी दी जाएगी। 30 लाख तक की इलेक्ट्रिक वाहनों पर कोई रोड टैक्स नहीं लगेगा। यहाँ तक कि रजिस्ट्रेशन फीस भी नहीं देना होगा। 1 जुलाई 2026 से ये पॉलिसी लागू हो जाएगी और 31 मार्च 2030 तक रहेगी।

इसका मकसद राजधानी में वायु प्रदूषण कम करना, पेट्रोल-डीजल वाहनों पर निर्भरता घटाना और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना है। रेखा गुप्ता सरकार का कहना है कि अगले चार वर्षों में इस पर लगभग ₹15,000 करोड़ खर्च किए जाएँगे।

इलेक्ट्रिक वाहनों पर टैक्स में बड़ी राहत

₹30 लाख तक की इलेक्ट्रिक कारों पर रोड टैक्स और रजिस्ट्रेशन शुल्क में 100% छूट दी गई है। इससे EV खरीदने की शुरुआती लागत कम हो जाएगी। नई नीति के तहत जनवरी 2027 में सिर्फ ई-ऑटो का रजिस्ट्रेशन होगी जबकि अप्रैल 2028 से दोपहिया वाहनों का रजिस्ट्रेशन किया जाएगा। इलेक्ट्रिक टू व्हीलर के खरीदारों को पहले साल ₹30,000, दूसरे साल ₹20,000 और तीसरे साल ₹10,000 की सब्सिडी मिलेगी।

स्क्रैपेज (पुरानी गाड़ी हटाने) पर प्रोत्साहन

पुरानी BS-IV या उससे पुराने वाहन को स्क्रैप कर नया EV खरीदने को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने वाहनों की खरीद में छूट दी है। कार के लिए अधिकतम ₹100000 तक का स्क्रैपेज इंसेंटिव दिया जा रहा है।

दोपहिया और तिपहिया वाहनों के लिए भी अलग-अलग प्रोत्साहन राशि का ऐलान किया गया है। इसमें दो पहिया वाहनों के लिए ₹10000, तिपहिया वाहनों के लिए ₹25000, चार पहिया वाहनों के लिए ₹100000, N1 ट्रक के लिए ₹50000 और ग्रामीण सेवा वाहन के लिए ₹15000 इंसेंटिव की घोषणा की गई है।

इलेक्ट्रिक ऑटो और थ्री व्हीलर को लेकर बदलाव

1 जनवरी 2027 से दिल्ली में नए रजिस्ट्रेशन केवल इलेक्ट्रिक ऑटो के होंगे। CNG और पेट्रोल ऑटो के नए रजिस्ट्रेशन बंद कर दिए जाएँगे। नई EV पॉलिसी के मुताबिक, खरीदारों को पहले साल ₹50,000, दूसरे साल ₹40,000 और तीसरे साल ₹30,000 की सब्सिडी दी जाएगी। अधिकारियों ने साफ कहा है कि हाइब्रिड वाहनों के लिए कोई सब्सिडी नहीं मिलेगी। यह पॉलिसी पूरी तरह से जीरो इमिशन वाहनों के लिए है।

दिल्ली की नई नीति के तहत चरणबद्ध तरीके से प्लान लागू होंगे। इसमें 1 जनवरी 2027 से केवल इलेक्ट्रिक ऑटो रिक्शा का ही रजिस्ट्रेशन होगा। जबकि 1 अप्रैल 2028 से नए पेट्रोल या CNG दोपहिया वाहनों का रजिस्ट्रेशन बंद होगा। इसके बाद केवल इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों का नया रजिस्ट्रेशन होगा।

चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार

सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन बढ़ाए जाएँगे। बैटरी स्वैपिंग और चार्जिंग नेटवर्क को मजबूत किया जाएगा। स्कूलों और कई व्यावसायिक वाहनों के लिए चरणबद्ध तरीके से EV अपनाने के लक्ष्य तय किए गए हैं। कैबिनेट के फैसले की जानकारी देते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि यह एक ऐतिहासिक दिन है और राज्य को पॉलिसी से ₹15,000 करोड़ के निवेश की उम्मीद है।

लोगों को कैसे फायदा होगा?

EV खरीदने पर लागत कम हो जाएगी। लोगों को रोड टैक्स और रजिस्ट्रेशन शुल्क में बचत होगी। पुरानी गाड़ी स्क्रैप करने पर अतिरिक्त रकम मिलेगा। वैसे भी इलेक्ट्रिक वाहन को चलाने की लागत पेट्रोल-डीजल की तुलना में काफी कम होती है। इससे शहर को वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण से मुक्ति मिलने की उम्मीद है। चार्जिंग स्टेशन बढ़ने से EV इस्तेमाल करना आसान होगा।

30 लाख की कार पर 5 लाग की बचत

दिल्ली में फिलहाल रोड टैक्स की बात करें तो ₹6 लाख तक की पेट्रोल कार पर 4 फीसदी, ₹10 लाख तक की कार पर 7 फीसदी और ₹10 लाख से ऊपर की कार पर 10 फीसदी रोड टैक्स लिया जाता है। ऐसे में अब दिल्ली के लोगों को ₹30 लाख तक की इलेक्ट्रिक कार खरीदने पर ₹3 लाख रोड टैक्स और रजिस्ट्रेशन फीस, ₹1लाख पुरानी कार की स्क्रैप और ₹1लाख की सब्सिडी यानी कुल मिलाकर ₹5 लाख तक की बचत हो जाएगी।

नई EV पॉलिसी क्यों लाई गई?

दिल्ली दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में एक मानी जाती है। खासकर सर्दियों में तो शहर के दमघोंटू हवा में दिल्ली वासियों का जीना मुहाल हो जाता है। सरकार का कहना है कि वाहनों से निकलने वाला धुआँ प्रदूषण का बड़ा कारण है।

गौरतलब है कि दिसंबर 2025 में सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, सर्दियों में पीएम 2.5 स्तर पर था। इसमें वाहनों के इमिशन की हिस्सेदारी करीब 46-53 फीसदी थी।

दिल्ली में हर साल करीब 5 लाख पेट्रोल-डीजल के वाहन बिकते हैं, जबकि मात्र 70 हजार इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री होती है। परिवहन विभाग का मानना है कि नई नीति से लाखों वाहन इलेक्ट्रिक में बदल जाएँगे या सड़क से बाहर होंगे। इससे वायु प्रदूषण कम करने में मदद मिलेगी। इतना ही नहीं, लोगों को जाम से भी निजात मिलेगी।

ई-वाहनों का नया बाजार तैयार होगा। कई नामी गिरामी कंपनियों ने इलेक्ट्रिक कारों, ऑटो, छोटे व्यावसायिक वाहनों को बाजार में उतार दिया है। कई कंपनियाँ अपने प्रोडक्ट लेकर बाजार में उतरने की तैयारी कर रही हैं। इन्हें दिल्ली की EV नीति से काफी फायदा होगा। चार्जिंग स्टेशन में बढोतरी से काफी फायदा होगा।

पेट्रोल-डीजल की खपत पर भी इसका असर पड़ेगा। जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटेगी और इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग और रोजगार को बढ़ावा मिलेगा। हाल ही में कई कंपनियों ने ई- मॉडल पेश किए हैं। 32 हजार चार्जिंग स्टेशन बनाए जाने से इन्हें फायदा होगा और रोजगार के मौके बढ़ेंगे।

दिल्ली में दूसरे राज्यों की तुलना में सब्सिडी ज्यादा है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश समेत कई राज्यों ने अपनी वाहन नीति घोषित कर दी है। पेट्रोल-डीजल के वाहनों को हतोत्साहित किया गया है और इलेक्ट्रिक वाहनों में सब्सिडी दी गई है।

EV पॉलिसी 2020 और EV पॉलिसी 2026 में अंतर

2020 EV पॉलिसी में पूरा जोर सब्सिडी और स्वैच्छिक EV अपनाने पर था जबकि अब प्रोत्साहन के साथ कई क्षेत्रों में अनिवार्य बदलाव की समय-सीमा तय की गई है। 2020 में EV खरीद पर सब्सिडी और रोड टैक्स में छूट दी गई थी, लेकिन अब स्क्रैपेज, इंसेंटिव और रजिस्ट्रेशन फ्री जैसी आकर्षक छूट दी गई है। दमघोंटू हवा से दिल्ली को मुक्त कराने के लिए अब रेखा सरकार की प्रतिबद्धता दिख रही है।

पहले पेट्रोल के दोपहिया वाहनों और CNG ऑटो पर कोई तय प्रतिबंध नहीं था, लेकिन अब 2027 से नए इलेक्ट्रिक ऑटो और 2028 से नए इलेक्ट्रिक दोपहिया अनिवार्य किए गए हैं। पहले चार्जिंग नेटवर्क विकसित करने पर जोर था, लेकिन अब चार्जिंग नेटवर्क के साथ बड़े पैमाने पर फ्लीट विद्युतीकरण और नियामकीय बदलाव शामिल किए गए हैं।

3 साल तक दिल्ली के बाहर नहीं बेचे जा सकते ई-वाहन

नई ईवी नीति का मकसद दिल्ली को देश का अग्रणी EV शहर बनाना है। ई-वाहन खरीदते समय सब्सिडी और स्क्रेपिंग पॉलिसी का फायदा सिर्फ दिल्लावालों को मिलेगा। वाहन खरीदते समय वोटर आई कार्ड, आधार कार्ड दिखाना होगा। दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता के मुताबिक, इन वाहनों को 3 साल तक दिल्ली से बाहर नहीं बेचा जा सकता है। परिवहन विभाग एनओसी इससे पहले जारी नहीं करेगा।

परिवहन कमिश्नर निहारिका राय के मुताबिक, सब्सिडी, स्क्रैप और दूसरी प्रोत्साहन राशि ग्राहक के बैंक अकाउंट में डीबीटी के माध्यम से सीधा भेजी जाएगी। सब्सिडी पाने वाले को इसके लिए ईवी पोर्टल पर अप्लाई करना होगा। इसके लिए नया ईवी पोर्टल तैयार किया गया है, जिसे 1 जुलाई 2026 को लॉन्च किया जा रहा है। ग्राहक को अप्लाई करने के 60 दिनों के भीतर रकम मिल जाएगी।

दिल्ली सरकार चाहती है कि ये वाहन दिल्ली में ही चलाए जाएँ, ताकि दिल्ली को प्रदूषण से राहत मिल सके। जानकारों के मुताबिक, दिल्ली से सभी पेट्रोल- डीजल वाहनों के आवागमन को रोक दिया जाए और ई-वाहनों को ही जाने दिया जाए, तो दिल्ली का प्रदूषण आधा हो जाएगा। दरअसल सीएनजी वाहनों में भी कुछ हद तक धुआँ निकलता है, लेकिन इलेक्ट्रिक वाहन पूरी तरह इससे मुक्त होते हैं। दरअसल ये फैसला दिल्ली को स्वच्छ बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।

अब शुरू हुई असली विश्व कप की कहानी… जहाँ हर हार आखिरी होगी

अल-नीनो को चकमा देते हुए मॉनसून अंततः भारत में दस्तक दे चुका है। चाय-पकौड़ों का मौसम आने लगा है। इधर कई राज्यों में बरसात होने लगी है। वहीं, अमेरिकी महाद्वीप में गोलों की बौछार जारी है। बरसात के चलते गोवा में मछली पकड़ने पर रोक लगने लगी है। मछुआरे अपनी नावें तटों पर बांध चुके हैं। तमाम छोटे-बड़े बारों में बीयर लिए दिन भर की थकान मिटाते लोग हैं। उनके बीच चर्चा का विषय है – फीफा विश्व कप। वहीं, केरल में लोगों ने सड़कों पर मेसी, नेमार व रोनाल्डो के आदमकद पोस्टर लगाए हैं। चारों तरफ विभिन्न टीमों की जर्सियां पहने लोग हैं। लोगों ने अपने वाहनों व मकानों को अपनी पसंदीदा टीम के रंग में रंग लिया है। क्या बच्चे, क्या बुजुर्ग; फीफा फीवर सभी के सिर चढ़कर बोल रहा है।

गुजरे दो हफ्तों में हर तरफ बस फीफा विश्व कप के ही किस्से गूंज रहे हैं। जैसे-जैसे विश्व कप आगे बढ़ता जा रहा है, माहौल और भी मजेदार होता जा रहा है। पहले तो हमें ग्रुप चरण के अंतिम छह मुकाबले देखने को मिले। फिर, बीती रात, Round of 32 का पहला मुकाबला खेला गया।

ग्रुप एल के अंतिम दो मैच खेले जाने थे। पहले मैच में इंग्लैंड ने ज्यूड बेलिंघम व हैरी केन के गोलों की मदद से पनामा को 2-0 से हराया। अगला मुकाबला फिलाडेल्फिया में क्रोएशिया व घाना के मध्य खेला जाना था। इस शानदार मैच में 2-1 से क्रोएशियाई टीम की जीत होती है। इन परिणामों के आधार पर इंग्लैंड, क्रोएशिया व घाना अगले दौर में जगह बनाने में सफल हो जाते हैं।

वहीं, ग्रुप के के अंतिम दो मैच भी खेले गए। पहले मैच में मियामी के मैदान में पुर्तगाल की टीम का सामना कोलंबिया से था। यहां, सभी को चौंकाते हुए कोलंबिया ने पुर्तगाल के खिलाफ काफी बढ़िया फुटबॉल खेली। हालांकि मैच ड्रॉ रहा, परन्तु कोलंबिया इस मुकाबले में लगभग हर मामले में पुर्तगाल पर भारी नजर आया। पुर्तगाली टीम, जो टूर्नामेंट की शुरुआत से पहले जीत की प्रबल दावेदार मानी जा रही थी, अब तक आशा के अनुरूप प्रदर्शन करती नजर आई नहीं है। उन्हें ट्रॉफी जीतने के लिए आगे काफी मशक्कत करनी होगी। गौरतलब है कि अपने ग्रुप में पुर्तगाली टीम, कोलंबिया के ठीक पीछे, दूसरे स्थान पर रही। इस ग्रुप का अगला मैच DR CONGO व उज़्बेकिस्तान के बीच खेला गया। यहां योआन विस्सा के दो बेहतरीन गोलों की बदौलत DR CONGO, मैच में वापसी करते हुए, उज़्बेकिस्तान को 3-1 से हरा कर अगले दौर में जगह बनाने में सफल रहा। इस ग्रुप से कोलंबिया, पुर्तगाल व DR CONGO अगले दौर में जगह बनाने में सफल रहे।

अंततः, ग्रुप जे के दो अंतिम मैच खेले गए। इस ग्रुप के पहले मैच में अल्जीरिया का सामना ऑस्ट्रिया से था। यह बेहद ही हाई वोल्टेज ड्रामा वाला मैच रहा, जिसमें नब्बे मिनटों में दोनों टीमों द्वारा कुल छह गोल दागे गए। यह मैच 3-3 से ड्रॉ रहा। आगे, अगले मैच में, डल्लास स्टेडियम में अर्जेंटीना की टीम जॉर्डन के खिलाफ मैदान में उतरी। क्योंकि अर्जेंटीना पहले ही अगले दौर में जगह बना चुकी है, इसलिए इस मैच में कोच लियोनेल स्कालोनी ने अपनी स्टार्टिंग लाइन-अप में सात-आठ परिवर्तन किए थे। लियोनेल मेसी को भी मैच के शुरू होते वक्त बेंच पर ही रखा गया था। इसके बावजूद अर्जेंटीना यह मैच 3-1 से जीत गया। लियोनेल मेसी विश्व कप में लगातार सात मैचों में गोल करने वाले इकलौते खिलाड़ी बन गए। इस शानदार जीत के संग पिछले विश्व कप की विजेता अर्जेंटीनी टीम ने भी अगले दौर में जगह बना ली। इस ग्रुप से अर्जेंटीना, ऑस्ट्रिया व अल्जीरिया अगले दौर में जगह बनाने में सफल रहे।

गौरतलब है कि अफ्रीकी महाद्वीप की दस में से नौ टीमें Round of 32 में जगह बनाने में सफल रहीं। ग्रुप स्टेज में एक ओर कई मुकाबले ड्रॉ होते दिखे तो वहीं दूसरी ओर कई हाई स्कोरिंग मुकाबले भी हुए। इस टूर्नामेंट की अब तक की खासियत यह रही कि कमोबेश छोटी टीमों ने अपने खेल के बूते तमाम खेलप्रेमियों का दिल जीत लिया। कई नए और अपेक्षाकृत कम चर्चित खिलाड़ियों ने भी अपने शानदार प्रदर्शन से सबका ध्यान अपनी ओर खींचा। इक्वाडोर का जर्मनी को हरा देना। Cape Verde का एक कठिन ग्रुप से भी अगले दौर में जगह बना लेना। यह सब लंबे समय तक याद रखा जाएगा।

आगे, आज रात (भारतीय समयानुसार रात साढ़े बारह बजे) Round of 32 का पहला मुकाबला खेला गया। लॉस एंजिलिस स्टेडियम में मेजबान राष्ट्रों में शुमार कनाडा का मुकाबला था दक्षिण अफ्रीका की टीम से। इस मैच में गेंद ज्यादातर अपने पास रखते हुए भी दक्षिण अफ्रीका कुछ खास कर न सकी। उन्होंने कनाडा के गोलपोस्ट पर छह बार आक्रमण किया, लेकिन केवल दो ही प्रयास निशाने पर रहे और दोनों को कीपर ने शानदार तरीके से रोक दिया। कनाडाई टीम ने आक्रामक फुटबॉल खेलते हुए चौदह दफा विरोधी गोलपोस्ट पर शॉट लगाए, जिनमें से सात निशाने पर रहे। लेकिन नब्बे मिनटों में भी कोई टीम गोल नहीं कर सकी थी। कनाडा ने मैच की शुरुआत से ही कई बार गोल करने के अवसर बनाए, मगर दक्षिण अफ्रीकी कप्तान, जो कि टीम के गोलकीपर हैं, ने कई शानदार बचाव करते हुए अपनी टीम को मैच में बनाए रखा। दूसरे हाफ में उन्होंने एक शानदार वन-ऑन-वन सेव भी किया। उनकी रक्षापंक्ति ने भी आज काफी बढ़िया रक्षात्मक खेल दिखाया।

एक वक्त तो ऐसा प्रतीत हो रहा था कि नॉकआउट चरण का पहला ही मैच एक्स्ट्रा टाइम तक चला जाएगा। सभी की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। लेकिन तभी, मैच के 90+2 मिनट पर कनाडा की टीम मैदान की दाईं दिशा से गेंद को लेकर आगे बढ़ती दिखी। अंदर की दिशा में एक क्रॉस डाला गया जिस पर एक दफा फिर दक्षिण अफ्रीका ने अच्छा बचाव किया। गेंद दक्षिण अफ्रीकी “डी” के बाहर की ओर गई। लेकिन तभी, कनाडाई मिडफील्डर स्टीफन एस्ताक्वियो ने मौका पाते ही एक जोरदार राइट फुटर किक लगा कर गेंद को गोलपोस्ट के भीतर भेज दिया।

इस गोल के साथ लॉस एंजिलिस से लेकर ओटावा तक खुशियों की लहर सी दौड़ गई। कनाडाई समर्थकों की खुशी का ठिकाना न रहा। कनाडा यह मैच 1-0 से जीत कर अगले दौर में चली गई। यह पहली दफा है जब कनाडा ने नॉकआउट चरण का मैच जीत लिया है। दक्षिण अफ्रीका की टीम अच्छा खेल दिखा कर भी आज टूर्नामेंट से वापसी करने को मजबूर हो गई।

अब, आज, भारतीय समयानुसार रात साढ़े दस बजे, Round of 32 का अगला मैच खेला जाएगा। आज ह्यूस्टन स्टेडियम में अपनी पारंपरिक पीली जर्सी पहने सेलेकाओ के खिलाड़ी समुराई ब्लूज़ से दो-दो हाथ करते नजर आएंगे। मकसद होगा यह मैच जीत कर सफलतापूर्वक अगले दौर में जगह बनाना। दोनों ही टीमें आज रात मैदान में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देंगी।

एकतरफ पांच बार की विजेता ब्राजील है, जो सदैव खिताब के दावेदारों में शामिल होती है, वहीं दूसरी ओर जापान रूपी एशियाई तूफान होगा, जिसको आप हल्के में लेने की भूल नहीं कर सकते। जापान की टीम एक बार फिर चाहेगी कि दाईची कमाडा व अयासे ऊएडा, जो अब तक टूर्नामेंट में उनके टॉप स्कोरर रहे हैं, जल्द से जल्द उन्हें इस मैच में जरूरी बढ़त दिला दें ताकि ब्राजील पर दबाव बनाया जा सके। लेकिन विनीसीयस व माथियूस कुन्हा भी गजब फॉर्म में हैं। सो, ब्राजील भी चाहेगा कि तुरंत गोल कर के मैच को अपनी दिशा में मोड़ लिया जाए। यह एक ऐसा मुकाबला होगा जिसमें अंतिम व्हिस्ल बजने तक रोमांच अपने चरम पर रहने की पूरी उम्मीद है। यहां अंतिम व्हिस्ल बजने तक एक घमासान युद्ध होगा। मनोरंजन होना गारंटीड है।

आगे, आज रात भारतीय समयानुसार रात दो बजे, जर्मनी अपने नॉकआउट चरण का पहला मैच खेलने पेराग्वे के विरुद्ध बोस्टन स्टेडियम में उतरेगी। सन् 2014 में जर्मनी ने अर्जेंटीना को हराकर ट्रॉफी जीती थी। उसके बाद यह पहली दफा होगा कि जर्मन टीम नॉकआउट चरण का कोई मैच खेलेगी। पेराग्वे अपने इतिहास में कुल पांच बार नॉकआउट चरण में पहुंचा है, परन्तु अब तक वह नॉकआउट चरण में गोल स्कोर करने में नाकाम रहे हैं। वह निश्चित ही आज रात इस दाग को मिटाने का प्रयास करेंगे। ग्रुप स्टेज के अंतिम मैच में मिली हार को भुलाकर जर्मनी, बोस्टन में खेले जाने वाले इस मैच में, एक बड़ी जीत से सभी को सचेत करना चाहेगी कि उन्हें हल्के में लेने की भूल न की जाए।

आगे, कल सवेरे भारतीय समयानुसार साढ़े छह बजे, नीदरलैंड्स का सामना होगा एटलस लायंस से। नीदरलैंड्स व मोरक्को दोनों ही टीमों ने ग्रुप चरण में अच्छे खेल का प्रदर्शन करते हुए अपने-अपने ग्रुप में सात-सात अंक हासिल किए थे। मोरक्को ने पिछली दफा बेल्जियम, स्पेन व पुर्तगाल को हराते हुए सेमीफाइनल तक का सफर तय किया था। वहीं, डच टीम भी इस दफा फिर अच्छी फुटबॉल खेलती नजर आई है। मेक्सिको में कल जरूर एक बेहद जबरदस्त मैच होना तय है।

इस दफा पहली बार टूर्नामेंट के इतिहास में, 48 टीमें होने के चलते, Round of 32 खेला जा रहा है। और, इस राउंड में कई रोचक मुकाबले खेले जाने वाले हैं। नीदरलैंड्स और मोरक्को के बीच होने वाला यह मुकाबला भी उन्हीं में से एक होगा। दोनों ही टीमें जीत के लिए लालायित हैं। दोनों ही टीमें अंतिम क्षणों तक जीत के लिए प्रयासरत रहेंगी। ब्राजील बनाम जापान के साथ-साथ फुटबॉल प्रेमियों की नजरें इस मुकाबले पर भी टिकी रहेंगी।

अब तो हर मैच ही रोचक होगा। अब तो हर मैच में कुछ भी हो सकता है। एक अच्छा दिन किसी भी टीम की किस्मत बना या बिगाड़ सकता है। अब, लगातार बेहतरीन फुटबॉल देखने को मिलेगी। बने रहिए साथ, क्योंकि……..the party has just begun!

राष्ट्रीय हितों की अनदेखी, मुस्लिम तुष्टिकरण पर जोर: गाँधी परिवार की चाहत- इजरायल को छोड़ फिलिस्तीन का समर्थन करे मोदी सरकार, अखबारी लेख में सोनिया ने की बैटिंग

भारत की विदेश नीति को लेकर एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है, जब कॉन्ग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने तीखा हस्तक्षेप किया। शनिवार (27 जून 2026) को द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अपने एक लेख में वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता ने नरेंद्र मोदी सरकार पर जोरदार हमला बोला।

उन्होंने पश्चिम एशिया में जारी मानवीय संकट पर सरकार के रुख की आलोचना करते हुए कहा कि इजरायल द्वारा किए जा रहे ‘गाजा नरसंहार’ पर उसकी ‘पत्थर जैसी चुप्पी’ और निष्क्रियता न केवल नैतिक रूप से निंदनीय है, बल्कि राष्ट्रीय हित के दृष्टिकोण से भी समझ से परे है।

उन्होंने दावा किया कि अपनी ऐतिहासिक जियोपॉलिटिकल नीतियों से हटकर भारत ने फिलिस्तीन, ईरान और व्यापक पश्चिम एशियाई क्षेत्र में अपने लंबे समय से चले आ रहे सहयोगियों को खुद से दूर कर लिया है।

उनका तर्क था कि इस कूटनीतिक तौर पर पीछे हटने के कारण से भारत वैश्विक जनमत से भी दूर हो गया है, जबकि पाकिस्तान ने इस खाली जगह का फायदा उठाकर खुद को एक मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है।

उनका मानना है कि ऐतिहासिक रूप से क्षेत्र के सभी प्रमुख पक्षों के साथ भारत के मैत्रीपूर्ण संबंधों को देखते हुए यह भूमिका स्वाभाविक रूप से भारत की होनी चाहिए थी।

अपने संपादकीय में गाँधी ने विशेष रूप से प्रधानमंत्री के कूटनीतिक कार्यक्रम को निशाना बनाते हुए कहा कि ईरान को लेकर अमेरिका-इजरायल की संयुक्त सैन्य कार्रवाइयों से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इजरायल दौरा एक हैरान करने वाला रणनीतिक निर्णय था।

उन्होंने कहा कि भारतीय राष्ट्र की भावना यह माँग करती है कि वह उन फिलिस्तीनियों के पक्ष में आवाज उठाए, जिनके बच्चों को इतनी निर्ममता से निशाना बनाया गया है। अपने तर्कों को आधार देने के लिए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय निष्कर्षों का भी हवाला दिया।

उन्होंने लिखा कि सितंबर 2025 में संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जाँच आयोग ने निष्कर्ष निकाला था कि इज़रायली अधिकारी गाजा में नरसंहार कर रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि जून 2026 में इसी आयोग ने, जिसकी अध्यक्षता अब सेवानिवृत्त भारतीय न्यायविद न्यायमूर्ति एस मुरलीधर कर रहे हैं, उन निष्कर्षों को दोहराया और विशेष रूप से सबसे कम उम्र के नागरिकों पर पड़े भारी असर पर ध्यान केंद्रित किया।

लेख का स्क्रीनशॉट

संयुक्त राष्ट्र के निष्कर्षों का हवाला देते हुए गाँधी ने लिखा, “94 पन्नों की यह रिपोर्ट बेहद भयावह है, जिसमें गाजा में इजरायल द्वारा मचाई गई तबाही की भयावह तस्वीर और उसकी कार्रवाई के पीछे मौजूद नरसंहार की मंशा का विवरण दिया गया है। कम से कम 20,000 बच्चों की मौत हो चुकी है और 44000 अन्य बच्चे घायल हुए हैं, जिनमें से कई पूरी जिंदगी के लिए गंभीर रूप से प्रभावित हो गए हैं।”

उन्होंने दावा किया कि बच्चों को निशाना बनाना एक सोची-समझी रणनीति है। उन्होंने कहा, “मारे गए या घायल हुए लोगों में 27 प्रतिशत बच्चे हैं और कई लड़कों के सिर और गर्दन पर गोली लगने के निशान पाए गए। गाजा के 97 प्रतिशत स्कूल नष्ट कर दिए गए हैं।”

उन्होंने यह भी कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं के ढाँचे के नष्ट होने के कारण गर्भपात और प्रसव संबंधी जटिलताओं के मामलों में 300 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। हालाँकि गाँधी ने अक्टूबर 2023 में हमास द्वारा इजरायल पर किए गए हमले को कायरतापूर्ण, भयावह और पूरी तरह अस्वीकार्य हमला बताया, लेकिन उनका कहना था कि इसके बाद इजरायली सशस्त्र बलों की जवाबी कार्रवाई बेलगाम क्रूरता और बर्बरता से भरी रही है।

उन्होंने लिखा, “प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से लेकर उनके वरिष्ठ कैबिनेट सहयोगियों तक, इजरायल के कई वरिष्ठ नेताओं ने गाजा की पूर्ण घेराबंदी और पूरी तरह विनाश की माँग की है, फिलिस्तीनियों को जानव’ बताया है जिनका अस्तित्व में रहने का कोई अधिकार नहीं है और इजरायल की सफलता की परिभाषा लाखों लोगों के गाजा छोड़कर भाग जाने को बताया है।”

कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेताओं ने ओप-एड का किया समर्थन

सोनिया गाँधी के इन विचारों को कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेताओं का भी जल्द ही मजबूत समर्थन मिल गया। उन्होंने इस अवसर का इस्तेमाल भारत की वैश्विक कूटनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव की माँग उठाने के लिए किया।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस लेख को साझा करते हुए कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसे बेहद प्रभावशाली बताया और कहा कि यह लेख इस बात की “कड़ी याद दिलाता है कि हमारी मौजूदा विदेश नीति ने फिलिस्तीन, ईरान और व्यापक मध्य-पूर्व क्षेत्र में हमारे ऐतिहासिक सहयोगियों को हमसे दूर कर दिया है।”

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने भी इस संपादकीय को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा किया, ताकि इसका संदेश डिजिटल मंचों पर अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच सके।

उन्होंने लिखा, “अपने इस संपादकीय के माध्यम से कॉन्ग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गाँधी जी ने भारत से अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को फिर से स्थापित करने, मानवीय मूल्यों को कायम रखने और गाजा के मुद्दे पर नैतिक स्पष्टता के साथ अपनी आवाज उठाने का आह्वान किया है।”

वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेतृत्व द्वारा किए गए इस समन्वित अभियान से संकेत मिलता है कि कॉन्ग्रेस पार्टी पश्चिम एशिया को लेकर सरकार की नीति को राजनीतिक संघर्ष का एक प्रमुख मुद्दा बनाने की तैयारी में है।

इजराइल से भारत को गहरे रणनीतिक लाभ

अंतरराष्ट्रीय संबंधों का मार्गदर्शन वैचारिक भावुकता के बजाय ठोस राष्ट्रीय सुरक्षा हितों से होना चाहिए। पिछले तीन दशकों में भारत और इजरायल के बीच एक मजबूत साझेदारी विकसित हुई है।

हालाँकि भारत ने 1950 में इजरायल को मान्यता दे दी थी, लेकिन दोनों देशों के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध 1992 में स्थापित हुए। इसके बाद से रक्षा, प्रौद्योगिकी, कृषि, साइबर सुरक्षा और व्यापार जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के संबंधों का उल्लेखनीय विस्तार हुआ है।

वर्तमान सरकार के कार्यकाल में भारत, इजरायल से हथियार खरीदने वाला सबसे बड़ा देश बन गया है। वहीं दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 1992 में 20 करोड़ अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2024 तक 6 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गया।

इस आर्थिक और रक्षा साझेदारी को सितंबर 2025 में हस्ताक्षरित द्विपक्षीय निवेश संधि का भी समर्थन मिला, जिसने पेट्रोलियम, रसायन, इंजीनियरिंग उत्पादों और पॉलिश किए गए हीरों जैसे क्षेत्रों में व्यापार को और गति दी है।

सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि राष्ट्रीय संकट के गंभीर समय में, जब दुनिया की अन्य बड़ी शक्तियाँ तत्काल सहायता देने से हिचकिचा रही थीं, तब इजरायल ने लगातार एक भरोसेमंद और महत्वपूर्ण रक्षा साझेदार होने का प्रमाण दिया है।

इजरायल के साथ भारत के रक्षा संबंधों का इतिहास काफी पुराना है। इसकी शुरुआत 1962 से मानी जाती है, जब चीन के साथ युद्ध के दौरान इजरायल ने भारत को सैन्य सहायता प्रदान की थी।

इसके बाद 1999 में पाकिस्तान के साथ कारगिल युद्ध के दौरान इजरायल ने भारतीय वायुसेना (IAF) को सर्चर  मानव रहित हवाई वाहन (Unmanned Aerial Vehicle) और जगुआर तथा मिराज स्क्वाड्रनों के लिए निगरानी प्रणालियाँ उपलब्ध कराई थीं।

साल 2014 के बाद से भारत और इजरायल के बीच रक्षा संबंधों में और तेजी आई है। इजरायल के कुल हथियार निर्यात का लगभग 42.1 प्रतिशत हिस्सा भारत को जाता है, जबकि अज़रबैजान, वियतनाम और अमेरिका उसके अन्य प्रमुख रक्षा ग्राहक हैं।

भारत की इजरायल के साथ साझेदारी केवल रक्षा क्षेत्र तक सीमित नहीं है। हालाँकि भारत का निर्यात कुछ प्रमुख क्षेत्रों में केंद्रित है, जिनमें रत्न एवं आभूषण, विशेष रूप से कटे और पॉलिश किए गए हीरे शामिल हैं, जिन्हें इजरायल के बड़े हीरा व्यापार केंद्रों में भेजा जाता है।

इसके अलावा पेट्रोलियम उत्पाद, ऑर्गेनिक केमिकल्स, प्लास्टिक और इंजीनियरिंग उत्पाद भी भारत के प्रमुख निर्यात का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। हाल के वर्षों में इजरायल को भारत के निर्यात में तेज गिरावट दर्ज की गई है।

माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इजरायल दौरा विभिन्न रणनीतिक समझौतों और साझेदारियों के जरिए एक बार फिर दोनों देशों के बीच व्यापार और भारतीय निर्यात को गति दे सकता है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत-इजरायल पार्टनरशिप ने कैसे मदद की

इस रक्षा साझेदारी का व्यावहारिक महत्व ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पूरी तरह सामने आया। यह संघर्ष 22 अप्रैल 2025 को पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों द्वारा पहलगाम की बैसरन घाटी में किए गए घातक आतंकी हमले के बाद तेजी से बढ़ गया, जिसमें सीमा पार से आए आतंकियों ने 26 हिंदू पर्यटकों की हत्या कर दी थी।

इस उकसावे के जवाब में भारतीय सशस्त्र बलों ने ऑपरेशन सिंदूर नाम से एक सटीक और तीव्र जवाबी सैन्य कार्रवाई शुरू की, जिसका उद्देश्य पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (POK) में लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद द्वारा चलाए जा रहे आतंकी ढाँचे और लॉन्च पैड्स को नष्ट करना था।

7 मई को रात 1:05 बजे शुरू हुआ यह 23 मिनट का अभियान दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमले करने और संभावित जवाबी हमलों से भारतीय हवाई क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्वदेशी और रूसी प्रणालियों के साथ-साथ अत्याधुनिक इज़रायली तकनीक पर भी काफी हद तक निर्भर था। इस अभियान की सफलता सुनिश्चित करने में इजरायल के सैन्य उपकरणों ने निर्णायक भूमिका निभाई:

हारोप लोइटरिंग म्यूनिशन्स (Harop Loitering Munitions): भारतीय सशस्त्र बलों ने इजरायल में निर्मित हारोप कामिकाज़े ड्रोन तैनात किए, जिन्हें विशेष रूप से दुश्मन की वायु रक्षा प्रणालियों और रडार इकाइयों को नष्ट करने के लिए डिजाइन किया गया है।

ये ड्रोन लक्ष्य क्षेत्र के ऊपर नौ घंटे तक मंडराने में सक्षम हैं और 50 पाउंड के वारहेड से लैस होते हैं। उच्च स्तर की स्वायत्त क्षमता से युक्त इन ड्रोन ने ऑपरेशन के दौरान लाहौर में स्थित पाकिस्तान की एक महत्वपूर्ण वायु रक्षा सुविधा पर सफलतापूर्वक हमला कर उसे नष्ट कर दिया।

हेरॉन Mk2 यूएवी (Heron Mk2 UAVs): निगरानी और टोही अभियानों के लिए भारतीय वायुसेना ने हेरॉन Mk2 ड्रोन का इस्तेमाल किया, जो 35000 फीट तक की ऊँचाई पर उड़ान भर सकते हैं और 40 घंटे से अधिक समय तक लगातार हवा में रह सकते हैं।

अग्रिम सैन्य ठिकानों से संचालित इन लंबी अवधि तक उड़ान भरने वाले ड्रोन ने दुर्गम उत्तरी क्षेत्र में वास्तविक समय (रियल-टाइम) खुफिया जानकारी, लक्ष्य की पहचान (टारगेट एक्विजिशन) और हमले के बाद हुए नुकसान का आकलन (बैटल डैमेज असेसमेंट) उपलब्ध कराया। साथ ही ये पारंपरिक जमीनी विमानभेदी हथियारों की पहुँच से सुरक्षित दूरी पर रहकर अपना मिशन पूरा करते रहे।

स्काईस्ट्राइकर ड्रोन (SkyStriker Drones): इजरायल की एल्बिट सिक्योरिटी सिस्टम्स और भारत की बेंगलुरु स्थित अल्फा डिजाइन टेक्नोलॉजीज़ की साझेदारी में निर्मित इन शांत, विद्युत चालित (इलेक्ट्रिक प्रोपेल्ड) लोइटरिंग म्यूनिशन्स का इस्तेमाल गुप्त रूप से कम ऊँचाई पर सटीक हमले करने के लिए किया गया।

5 से 10 किलोग्राम तक के बम ले जाने में सक्षम इन ड्रोन ने उन परिस्थितियों में भी विशिष्ट सामरिक लक्ष्यों पर सफलतापूर्वक हमला किया, जहाँ GPS सिग्नल बाधित थे।

बराक-8 मिसाइल रक्षा प्रणाली (Barak 8 Missile Defence System): भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और इजरायल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज (IAI) द्वारा संयुक्त रूप से विकसित बराक-8 लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली ने देश की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जब पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई के तहत दिल्ली को निशाना बनाते हुए फतह-II बैलिस्टिक मिसाइल दागी, तब बराक-8 प्रणाली ने हरियाणा के सिरसा के ऊपर ही उस आने वाली मिसाइल को सफलतापूर्वक रोककर नष्ट कर दिया।

स्पाइस-2000 प्रिसिजन बम किट्स: भारतीय लड़ाकू विमानों ने इजरायल द्वारा विकसित स्पाइस-2000 गाइडेंस किट्स का इस्तेमाल कर सामान्य जनरल-पर्पज़ बमों को स्मार्ट, फायर-एंड-फॉरगेट (दागो और भूल जाओ) क्षमता वाले अत्यधिक सटीक स्टैंड-ऑफ हथियारों में बदल दिया।

उन्नत सीन-मैचिंग एल्गोरिदम की मदद से इन बमों ने आतंकी ठिकानों की इमारतों की छतों को बेहद सटीकता से भेदते हुए निशाना बनाया, जबकि आसपास के नागरिक इलाकों को होने वाले नुकसान को न्यूनतम रखा गया।

टेवर X95 असॉल्ट राइफल्स : जमीनी अभियानों के दौरान मरीन कमांडो (MARCOS) और गरुड़ कमांडो सहित भारतीय विशेष बलों की चुनिंदा इकाइयों को भारत में लाइसेंस के तहत निर्मित कॉम्पैक्ट, बुलपप डिजाइन वाली टेवर X95 असॉल्ट राइफलों से लैस किया गया था।

इन राइफलों ने नजदीकी दूरी पर चलाए गए सुरक्षा अभियानों (क्लोज-क्वार्टर्स ऑपरेशंस) के दौरान उच्च विश्वसनीयता और बेहतर गतिशीलता (मैन्युवरेबिलिटी) प्रदान की।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मिली निर्णायक सफलता, जिसमें लगभग 100 आतंकवादी मारे गए थे, जिनमें जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर के करीबी रिश्तेदार और शीर्ष कमांडर तथा लश्कर-ए-तैयबा के रणनीतिकार अबू जुंदाल भी शामिल थे, इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि इज़रायली रक्षा तकनीक भारत की सैन्य तैयारियों और परिचालन क्षमता का कितना महत्वपूर्ण और गहराई से जुड़ा हिस्सा बन चुकी है।

भारत की द्वि-राष्ट्र नीति और राष्ट्रीय हित

भारत आधिकारिक रूप से दो-राष्ट्र समाधान (टू-स्टेट सॉल्यूशन) का समर्थन करता है, जिसमें इजरायल और फिलिस्तीन दोनों को मान्यता देने तथा संवाद और कूटनीति के माध्यम से शांतिपूर्ण समाधान का पक्ष लिया जाता है।

इस दृष्टिकोण से भारतीय राज्य का प्राथमिक दायित्व अपने नागरिकों की सुरक्षा करना, अपनी सीमाओं की रक्षा करना और अपने आर्थिक हितों को सुरक्षित रखना है। दूरस्थ वैचारिक विवादों में गहराई से शामिल होने से कोई स्पष्ट रणनीतिक लाभ नहीं मिलता और इससे महत्वपूर्ण रक्षा आपूर्ति श्रृंखलाओं को रोकने का जोखिम भी पैदा हो सकता है।

भारत की लंबे समय से चली आ रही आधिकारिक कूटनीतिक नीति एक स्पष्ट और संतुलित दो-राष्ट्र नीति (Two-State Policy) रही है, जिसके तहत एक स्वतंत्र और व्यवहार्य फिलिस्तीन के साथ-साथ एक सुरक्षित और मान्यता प्राप्त इजरायल को औपचारिक मान्यता देने का समर्थन किया जाता है।

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस संतुलित कूटनीतिक रुख को बनाए रखने से आगे बढ़कर, क्षेत्र की आंतरिक राजनीतिक परिस्थितियाँ या सैन्य संघर्ष बाहरी मामले हैं। ऐसे में भारत पर इजरायल जैसे महत्वपूर्ण रक्षा साझेदार के खिलाफ आक्रामक और एकतरफा रुख अपनाने का दबाव बनाना देश की व्यावहारिक राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति और हितों को कमजोर करने वाला कदम माना जाता है।

कॉन्ग्रेस का मुस्लिम तुष्टीकरण का इतिहास रहा है जो देश के हितों को नजरअंदाज करता है

कॉन्ग्रेस का गाज़ा जैसे अंतरराष्ट्रीय संघर्षों पर अत्यधिक ध्यान वैश्विक रणनीति से अधिक उसकी लंबे समय से चली आ रही अल्पसंख्यक वोट-बैंक की राजनीति का परिणाम माना जाता है। आलोचकों का तर्क है कि इस राजनीतिक सोच के कारण पार्टी अक्सर राष्ट्रीय हितों के बजाय घरेलू चुनावी समीकरणों को प्राथमिकता देती है। यह आरोप स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों से ही कॉन्ग्रेस पर लगता रहा है।

आलोचकों के अनुसार, समान न्याय के बजाय राजनीतिक प्रभावों को प्राथमिकता देने की यह प्रवृत्ति स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के शासनकाल में भी दिखाई देती है। दिसंबर 1948 के ऐतिहासिक अभिलेख बताते हैं कि नेहरू ने 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे के दौरान कलकत्ता में हुई सांप्रदायिक हिंसा के प्रमुख जिम्मेदार नेताओं में गिने जाने वाले हुसैन शहीद सुहरावर्दी के विरुद्ध चल रहे 50 लाख रुपए के आयकर चोरी के मामले में व्यक्तिगत हस्तक्षेप किया था।

12 दिसंबर 1948 को तत्कालीन वित्त मंत्री जॉन मथाई को लिखे अपने आधिकारिक पत्र में नेहरू ने आयकर कार्रवाई को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि यदि सुहरावर्दी के खिलाफ कठोर वित्तीय कार्रवाई की गई, तो इसका भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के मुस्लिम नेताओं पर राजनीतिक प्रभाव पड़ सकता है। पत्र में उन्होंने लिखा:

“सुहरावर्दी के संबंध में जो भी कार्रवाई की जाएगी, उसके कुछ सार्वजनिक परिणाम होंगे। ऐसी हर कार्रवाई की प्रतिक्रिया भारत और पाकिस्तान दोनों में होगी।”

इसके बाद उन्होंने वित्त मंत्रालय से सुहरावर्दी की संपत्तियों की कुर्की की कार्रवाई रोकने का आग्रह किया।

आलोचकों के अनुसार, इस हस्तक्षेप के परिणामस्वरूप सुहरावर्दी भारत में अपनी व्यावसायिक संपत्तियाँ बेचने, बड़ी कर देनदारी से बचने और सुरक्षित रूप से पाकिस्तान जाने में सफल रहे, जहाँ बाद में वे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भी बने।

उनके आलोचक यह भी कहते हैं कि यह निर्णय उन लोगों के प्रति नरमी का उदाहरण था जिन्हें 1946 की सांप्रदायिक हिंसा में हजारों हिंदुओं की मौत के लिए जिम्मेदार माना जाता है।

UPA की विरासत और आधुनिक चुनावी माहौल

कॉन्ग्रेस का गाज़ा जैसे अंतरराष्ट्रीय संघर्षों पर अत्यधिक ध्यान वैश्विक रणनीति से अधिक उसकी लंबे समय से चली आ रही अल्पसंख्यक वोट-बैंक की राजनीति का परिणाम माना जाता है। आलोचकों का तर्क है कि इस राजनीतिक सोच के कारण पार्टी अक्सर राष्ट्रीय हितों के बजाय घरेलू चुनावी समीकरणों को प्राथमिकता देती है। यह आरोप स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों से ही कॉन्ग्रेस पर लगता रहा है।

आलोचकों के अनुसार, समान न्याय के बजाय राजनीतिक प्रभावों को प्राथमिकता देने की यह प्रवृत्ति स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के शासनकाल में भी दिखाई देती है।

दिसंबर 1948 के ऐतिहासिक अभिलेख बताते हैं कि नेहरू ने 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे के दौरान कलकत्ता में हुई सांप्रदायिक हिंसा के प्रमुख जिम्मेदार नेताओं में गिने जाने वाले हुसैन शहीद सुहरावर्दी के विरुद्ध चल रहे 50 लाख रुपए के आयकर चोरी के मामले में व्यक्तिगत हस्तक्षेप किया था।

12 दिसंबर 1948 को तत्कालीन वित्त मंत्री जॉन मथाई को लिखे अपने आधिकारिक पत्र में नेहरू ने आयकर कार्रवाई को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि यदि सुहरावर्दी के खिलाफ कठोर वित्तीय कार्रवाई की गई, तो इसका भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के मुस्लिम नेताओं पर राजनीतिक प्रभाव पड़ सकता है। पत्र में उन्होंने लिखा:

“सुहरावर्दी के संबंध में जो भी कार्रवाई की जाएगी, उसके कुछ सार्वजनिक परिणाम होंगे। ऐसी हर कार्रवाई की प्रतिक्रिया भारत और पाकिस्तान दोनों में होगी।”

इसके बाद उन्होंने वित्त मंत्रालय से सुहरावर्दी की संपत्तियों की कुर्की की कार्रवाई रोकने का आग्रह किया।

आलोचकों के अनुसार, इस हस्तक्षेप के परिणामस्वरूप सुहरावर्दी भारत में अपनी व्यावसायिक संपत्तियाँ बेचने, बड़ी कर देनदारी से बचने और सुरक्षित रूप से पाकिस्तान जाने में सफल रहे, जहाँ बाद में वे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भी बने।

उनके आलोचक यह भी कहते हैं कि यह निर्णय उन लोगों के प्रति नरमी का उदाहरण था जिन्हें 1946 की सांप्रदायिक हिंसा में हजारों हिंदुओं की मौत के लिए जिम्मेदार माना जाता है।

सोनिया गाँधी के फॉर्मूलों पर बीजेपी का पलटवार

सोनिया गाँधी के लेख के जवाब में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने तीखा पलटवार करते हुए कॉन्ग्रेस  नेतृत्व पर आरोप लगाया कि वह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों में भी घरेलू वोट-बैंक की राजनीति घुसाने का प्रयास कर रही है।

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कॉन्ग्रेस पर मानवीय संवेदनाओं को चुनिंदा तरीके से अपनाने का आरोप लगाया। मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा,

“सोनिया गाँधी गाजा के मुसलमानों के लिए आवाज उठाती हैं, रफाह पर ट्वीट करती हैं, लेकिन ढाका में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों पर पूरी तरह चुप रहती हैं। इससे साफ पता चलता है कि उनके लिए विदेश नीति भी वोट-बैंक की राजनीति के हिसाब से तय होती है।”

भाजपा का कहना है कि कॉन्ग्रेस और विपक्ष के ऐसे सार्वजनिक बयान राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित हैं। पार्टी के अनुसार, इन बयानों का मकसद जनता को गुमराह करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को कमजोर करना है। भाजपा का आरोप है कि विपक्ष देश के दीर्घकालिक रक्षा सहयोग, रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय हितों से ऊपर अल्पकालिक चुनावी लाभ को प्राथमिकता देता है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

जब भगवान पड़ते हैं बीमार… पुरी की जगन्नाथ परंपरा में 15 दिनों तक बंद हो जाते हैं मंदिर के द्वार: जानें भक्त-भगवान के इस अनूठे जीवंत रिश्ते की पूरी कथा

दुनिया के अधिकांश पंथों और धार्मिक परंपराओं में ईश्वर को सर्वशक्तिमान, अलिप्त, अचल और मानवीय सीमाओं से परे माना जाता है। वहाँ ईश्वर पूजा का केंद्र तो होता है लेकिन वह मनुष्य जैसा जीवन नहीं जीता। उसे भूख नहीं लगती, वह बीमार नहीं पड़ता, उसे विश्राम की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन सनातन परंपरा इस दृष्टि से अलग खड़ी दिखाई देती है।

यहाँ भगवान केवल पूजे नहीं जाते, उन्हें जिया जाता है। वे जन्म लेते हैं, बाल्यकाल बिताते हैं, मित्र बनते हैं, प्रेम करते हैं, विवाह करते हैं, युद्ध करते हैं, शोक करते हैं, विश्राम करते हैं और कुछ परंपराओं में तो वे बीमार भी पड़ते हैं। यही कारण है कि सनातन में मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं बल्कि भगवान का निवास माने जाते हैं और उनकी सेवा किसी मूर्ति की नहीं बल्कि एक जीवंत सत्ता की तरह की जाती है।

इसी जीवंत परंपरा का सबसे अद्भुत उदाहरण ओडिशा के पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा से पहले आने वाला वह 15 दिन का काल है, जब करोड़ों भक्तों के आराध्य भगवान जगन्नाथ स्वयं दर्शन देना बंद कर देते हैं। मंदिर के द्वार बंद हो जाते हैं और माना जाता है कि भगवान बीमार हैं।

लेकिन सवाल उठता है कि आखिर इन 15 दिनों में भगवान रहते कहाँ हैं और उनके साथ क्या होता है? इस प्रश्न का उत्तर हमें स्नानयात्रा, अनसर और जगन्नाथ परंपरा की उस अनूठी दुनिया में लेकर जाता है जहाँ भगवान और भक्त के बीच दूरी नहीं, बल्कि आत्मीयता है।

देव स्नान पूर्णिमा: जब भगवान स्वयं स्नान करने आते हैं बाहर

सनातन परंपरा में प्रत्येक मास की पूर्णिमा का महत्व माना गया है, लेकिन ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को विशेष रूप से देव स्नान पूर्णिमा कहा जाता है। पुरी में इसी दिन भगवान जगन्नाथ की प्रसिद्ध स्नान यात्रा आयोजित होती है। यह वह अवसर होता है जब भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को गर्भगृह से बाहर लाकर स्नान मंडप पर विराजमान किया जाता है।

स्नान मंडप पर विराजमान भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा (फोटो साभार: shreekhetra.com)

इस पूरे अनुष्ठान को ‘पहंडी विजय’ कहा जाता है। ढोल, मृदंग, शंखध्वनि और वैदिक मंत्रों के बीच देव विग्रहों को बाहर लाने का दृश्य लाखों श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत भावुक और दुर्लभ माना जाता है। इसके बाद शुरू होता है महास्नान। परंपरा के अनुसार, मंदिर परिसर के स्वर्णकूप से जल लाया जाता है और 108 कलशों से भगवानों का अभिषेक किया जाता है।

मान्यता के अनुसार, इनमें से 35 कलश भगवान जगन्नाथ, 33 बलभद्र, 22 देवी सुभद्रा और शेष 18 कलश सुदर्शन चक्र के लिए होते हैं। जल में चंदन, पुष्प, कपूर, केसर और सुगंधित द्रव्य मिलाकर उसे विशेष मंत्रों से अभिमंत्रित किया जाता है।

क्या है कथा और मान्यता?

भगवान जगन्नाथ के बीमार होने की परंपरा से जुड़ी एक अत्यंत रोचक और भावनात्मक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि पुरी में माधव दास नाम के एक महान भक्त रहते थे। उनका पूरा जीवन भगवान जगन्नाथ की भक्ति में समर्पित था और वे मंदिर के प्रसाद से ही अपना निर्वाह करते थे। एक बार माधव दास को तेज बुखार हो गया।

शरीर कमजोर होता गया, लेकिन उनकी भक्ति में कोई कमी नहीं आई। लोग उन्हें बार-बार वैद्य के पास जाकर इलाज कराने की सलाह देते, लेकिन उनका उत्तर हमेशा एक ही होता, “जब स्वयं मेरे प्रभु मेरा ध्यान रख रहे हैं, तो मुझे किसी और सहारे की आवश्यकता नहीं है।” धीरे-धीरे बीमारी इतनी बढ़ गई कि एक दिन वे अचेत होकर गिर पड़े।

मान्यता है कि उसी समय स्वयं भगवान जगन्नाथ उनके पास पहुँचे और उनकी सेवा करने लगे। उन्होंने उनकी देखभाल की, उन्हें संभाला और उनके कष्ट को कम किया। कुछ समय बाद जब माधव दास को होश आया और उन्होंने देखा कि उनकी सेवा कोई और नहीं बल्कि स्वयं भगवान कर रहे हैं, तो वे भावुक हो उठे।

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार: AI)

उन्होंने विनम्रता से पूछा, “प्रभु, आप मेरे लिए इतना कष्ट क्यों उठा रहे हैं?” तब भगवान जगन्नाथ ने कहा, “मैं अपने भक्तों का साथ कभी नहीं छोड़ता। लेकिन संसार का नियम है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है। तुम्हारी बीमारी अभी पंद्रह दिन और चलने वाली थी, इसलिए तुम्हारा दुख कम करने के लिए मैं उसे अपने ऊपर ले रहा हूँ।”

कहा जाता है कि यह घटना ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन हुई थी। तभी से यह मान्यता चली आ रही है कि इस दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को विशेष स्नान कराया जाता है, जिसके बाद वे अस्वस्थ हो जाते हैं। इसके बाद भगवान लगभग पंद्रह दिनों तक भक्तों को दर्शन नहीं देते और एकांत में विश्राम करते हैं।

हाथी बेश: जब भगवान धारण करते हैं गणेश स्वरूप

महास्नान के तुरंत बाद भगवानों का श्रृंगार किया जाता है। पहले उन्हें सादा बेश पहनाया जाता है और उसके बाद प्रसिद्ध ‘हाथी बेश’ या ‘गज वेश’ होता है। लोकमान्यता के अनुसार, महाराष्ट्र से आए गणपति उपासक विनायक भट्ट ने भगवान जगन्नाथ के गणेश स्वरूप के दर्शन की इच्छा व्यक्त की थी।

कहा जाता है कि उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने पुजारियों को स्वप्न में संकेत दिया और तब से महास्नान के बाद भगवान को गजानन स्वरूप में सजाने की परंपरा शुरू हुई। यह केवल श्रृंगार नहीं बल्कि सनातन की उस व्यापक दृष्टि का प्रतीक माना जाता है जिसमें विभिन्न देव रूप एक-दूसरे से अलग नहीं बल्कि एक ही दिव्य चेतना के विस्तार माने जाते हैं।

स्नान के बाद बीमार पड़ जाते हैं भगवान

यहीं से शुरू होता है जगन्नाथ परंपरा का सबसे रहस्यमय और भावनात्मक अध्याय। मान्यता है कि 108 कलशों से शीतल जल के महास्नान के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा को ज्वर हो जाता है। इसके बाद वे सार्वजनिक दर्शन देना बंद कर देते हैं। इसे ‘अनसर’ या ‘अनवसर’ काल कहा जाता है।

यह सुनने में आधुनिक संवेदनाओं से प्रतीकात्मक लग सकता है, लेकिन सनातन दर्शन में इसका गहरा अर्थ है। यहाँ भगवान सर्वशक्तिमान होते हुए भी अपने भक्तों के जीवन से अलग नहीं हैं। वे मनुष्य के अनुभवों को स्वीकार करते हैं। वे बताते हैं कि दिव्यता दूरी नहीं, निकटता का नाम है।

अनसर घर: आखिर इन 15 दिनों में भगवान रहते कहाँ हैं?

स्नान यात्रा के बाद तीनों देव विग्रहों को मंदिर परिसर के भीतर स्थित विशेष कक्ष में ले जाया जाता है जिसे ‘अनसर घर’ कहा जाता है। यहीं भगवान अगले लगभग 15 दिनों तक विश्राम करते हैं। इस दौरान मंदिर के सामान्य दर्शन बंद रहते हैं और केवल चुनिंदा सेवायतों को ही प्रवेश की अनुमति होती है।

विशेष रूप से दैतापति सेवक इस अवधि में भगवान की सेवा करते हैं। इस सेवा को ‘गुप्त सेवा’ या ‘गुप्त रीति’ भी कहा जाता है। इन दिनों भगवान को औषधीय पेय, जड़ी-बूटियों से बने विशेष भोग, दशमूल मोदक और फुलुरी तेल अर्पित किया जाता है। मान्यता यह है कि जैसे घर में कोई सदस्य बीमार हो तो उसकी देखभाल होती है, वैसे ही भगवान की भी होती है।

बंद दरवाजों के पीछे क्या होता है?

अनसर काल केवल विश्राम नहीं है, यह मंदिर की सबसे गोपनीय सेवाओं में से एक माना जाता है। इस दौरान भगवान के विग्रहों पर विशेष उपचारात्मक और सौंदर्य संबंधी सेवाएँ की जाती हैं। पारंपरिक रूप से देव विग्रहों के रंगों और स्वरूप की भी देखभाल की जाती है।

कुछ परंपराओं के अनुसार, इस अवधि में भगवान के विग्रहों का पुनः अलंकरण और नवीनीकरण भी किया जाता है, क्योंकि इस दौरान भगवान दर्शन नहीं देते, इसलिए मंदिर में उनके स्थान पर विशेष पटचित्र रूपों की पूजा होती है जिन्हें ‘अनसर पट्टी’ कहा जाता है। इसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के चित्र स्वरूप को पूजित किया जाता है।

यह व्यवस्था केवल धार्मिक नहीं बल्कि एक गहरे दार्शनिक विचार को भी व्यक्त करती है कि रूप बदल सकता है, उपस्थिति नहीं।

नवयौवन दर्शन: जब भगवान फिर लौटते हैं भक्तों के बीच

लगभग पंद्रह दिनों के विश्राम और उपचार के बाद भगवान पहली बार फिर दर्शन देते हैं। इस अवसर को ‘नवयौवन दर्शन’ कहा जाता है। मान्यता है कि अब भगवान पूर्णतः स्वस्थ होकर नए यौवन और नई ऊर्जा के साथ भक्तों के सामने आते हैं।

इसके अगले दिन भव्य रथयात्रा निकलती है, जिसमें भगवान स्वयं मंदिर से बाहर आकर जनता के बीच पहुँचते हैं। यह शायद दुनिया की उन दुर्लभ धार्मिक परंपराओं में से एक है जहाँ भक्त भगवान तक नहीं पहुँचते बल्कि भगवान स्वयं भक्तों तक आते हैं।

ओडिशा रथयात्रा (फोटो साभार: Brittanica)

सनातन की जीवंत ईश्वर परंपरा: ईश्वर और भक्त के रिश्ते का सबसे अनोखा दर्शन

जगन्नाथ की यह पूरी परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि सनातन के दर्शन को समझने की कुंजी है। सनातन में मूर्ति केवल प्रतीक नहीं है। ‘अर्चावतार’ की अवधारणा कहती है कि भगवान भक्त के प्रेम के लिए स्वयं को सुलभ बना लेते हैं।

इसलिए मंदिरों में भगवान को जगाया जाता है, स्नान कराया जाता है, वस्त्र पहनाए जाते हैं, भोजन कराया जाता है, विश्राम कराया जाता है और कभी-कभी उनकी चिकित्सा भी की जाती है। यह विचार कहता है कि ईश्वर दूर बैठा हुआ राजा नहीं, जीवन के हर अनुभव में सहभागी है।

शायद इसी वजह से जगन्नाथ परंपरा करोड़ों लोगों को यह अनुभव कराती है कि भगवान सर्वशक्तिमान होने के बावजूद इतने अपने हो सकते हैं कि साल में एक बार बीमार भी पड़ जाएँ और भक्त उनके ठीक होने का इंतजार करें।

दुनिया की अधिकांश धार्मिक परंपराओं और पंथों में ईश्वर को एक ऐसी सत्ता के रूप में देखा जाता है जो सर्वशक्तिमान है, पूर्ण है, समय और प्रकृति के नियमों से परे है। वह सृष्टि का निर्माता है लेकिन सृष्टि की सीमाओं से बंधा नहीं है। वह जन्म नहीं लेता, उसे भूख नहीं लगती, वह थकता नहीं, उसे विश्राम या उपचार की आवश्यकता नहीं होती।

वह मनुष्य को देखता है, उसका मार्गदर्शन करता है, लेकिन स्वयं मनुष्य के अनुभवों का हिस्सा नहीं बनता। इस दृष्टि में ईश्वर और मनुष्य के बीच एक निश्चित दूरी बनी रहती है। यानी कि श्रद्धा होती है, समर्पण होता है, लेकिन निकटता सीमित होती है। इसके विपरीत सनातन परंपरा ईश्वर के साथ संबंध की एक बिल्कुल अलग कल्पना प्रस्तुत करती है।

यहाँ भगवान केवल पूजे जाने वाले देव नहीं हैं, बल्कि जीवन के सहभागी हैं। वे इतने दूर नहीं हैं कि केवल ध्यान में महसूस किए जाएँ और इतने छोटे भी नहीं कि केवल एक प्रतिमा तक सीमित हो जाएँ। सनातन में भगवान स्वयं भक्त के संसार में उतरते हैं।

जगन्नाथ का संदेश: दिव्यता दूरी नहीं, अपनापन भी है

वे अवतार लेते हैं, जन्म लेते हैं, बचपन जीते हैं, माता-पिता का स्नेह पाते हैं, मित्र बनाते हैं, प्रेम करते हैं, विवाह करते हैं, युद्ध लड़ते हैं, वनवास जाते हैं, वियोग सहते हैं, शोक करते हैं और कभी-कभी तो मनुष्य की तरह थकते और विश्राम भी करते हैं।

इसीलिए श्रीराम केवल ईश्वर नहीं हैं, वे पुत्र भी हैं, शिष्य भी हैं, पति भी हैं और राजा भी। श्रीकृष्ण केवल विष्णु के अवतार नहीं हैं, वे यशोदा के लाडले बालक हैं, सुदामा के मित्र हैं, अर्जुन के सारथी हैं और गोपियों के प्रिय भी हैं। भगवान शिव केवल संहारक नहीं हैं, वे पिता हैं, पति हैं, तपस्वी हैं और परिवार के साथ कैलाश पर रहने वाले देव भी हैं।

यही वह भाव है जो सनातन को केवल दर्शन नहीं बल्कि संबंध का धर्म बनाता है। इसी परंपरा का शायद सबसे जीवंत और अद्भुत उदाहरण भगवान जगन्नाथ हैं। पुरी में भगवान को केवल प्रतिमा मानकर पूजा नहीं जाती, बल्कि उन्हें एक जीवित राजा, परिवार के सदस्य और स्वयं भगवान के रूप में सेवा दी जाती है।

उनका जागरण होता है, उन्हें स्नान कराया जाता है, भोजन कराया जाता है, वस्त्र बदले जाते हैं, विश्राम कराया जाता है और वर्ष में एक समय ऐसा भी आता है जब माना जाता है कि भगवान अस्वस्थ हो गए हैं। ज्येष्ठ पूर्णिमा पर होने वाले महास्नान के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को ज्वर हो जाता है।

इसके बाद वे सार्वजनिक दर्शन बंद कर देते हैं और लगभग पंद्रह दिनों तक अनसर गृह में विश्राम करते हैं। उन्हें औषधि दी जाती है, विशेष आहार दिया जाता है और सीमित सेवायत उनकी सेवा करते हैं। पहली नजर में यह एक धार्मिक कथा या अनुष्ठान लग सकता है, लेकिन इसके भीतर सनातन का बहुत गहरा दार्शनिक संदेश छिपा है।

यह परंपरा मानती है कि यदि भगवान केवल सर्वशक्तिमान रह जाएँ और मनुष्य के अनुभवों से कभी न गुजरें, तो भक्त उनके प्रति श्रद्धा तो रख सकता है, लेकिन अपनापन नहीं महसूस कर पाएगा। इसलिए भगवान स्वयं अपने भक्त के संसार में आते हैं। वे यह दिखाते हैं कि दिव्यता का अर्थ दूरी नहीं, निकटता भी हो सकता है।

जगन्नाथ का बीमार पड़ना वास्तव में भगवान की कमजोरी का नहीं, बल्कि भक्त के प्रति उनके स्नेह का प्रतीक माना जाता है। यह संदेश है कि जो ईश्वर पूरे जगत का पालन करता है, वही भक्त के प्रेम के लिए अपने आपको इतना सहज और मानवीय बना सकता है कि उसकी सेवा भी की जा सके।

शायद यही कारण है कि सनातन में भक्त केवल भगवान से प्रार्थना नहीं करता, वह उनकी देखभाल भी करता है।

PM मोदी की सेशेल्स यात्रा से भारत के UPI का वैश्विक विस्तार, बना दुनिया का 10वाँ देश: जानें दुनिया का सबसे बड़ा रियल-टाइम डिजिटल पेमेंट प्लेटफॉर्म कैसे बना रहा अपनी पहचान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सेशेल्स यात्रा के दौरान भारत और इस द्वीपीय देश के बीच कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) को लेकर हुए समझौते की रही।

इस समझौते के बाद सेशेल्स भी उन देशों की सूची में शामिल हो गया है, जहाँ भारत का डिजिटल भुगतान सिस्टम पहुँच रहा है और सेशेल्स दशवाँ ऐसा देश बन गया है जहाँ ये डिजिटल पेमेंट की सविधा पहुँच गई है।

इसे पहले नौ और देश है जहाँ UPI का इस्तेमाल हो रहा है जिनमें सिंगापुर, UAE, फ्रांस, मॉरीशस, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, कतर, कंबोडिया जैसे देश शामिल है। यह समझौता ऐसे समय हुआ है, जब यूपीआई ने अपने 10 साल पूरे किए हैं।

अप्रैल 2016 में शुरू हुआ यह प्लेटफॉर्म आज दुनिया का सबसे बड़ा रियल-टाइम डिजिटल पेमेंट सिस्टम बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) भी यूपीआई को ट्रांजैक्शन के लिहाज से दुनिया का सबसे बड़ा रियल-टाइम पेमेंट प्लेटफॉर्म मान चुका है। यह केवल एक पेमेंट सिस्टम का विस्तार नहीं, बल्कि भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को दुनिया तक पहुँचाने की बड़ी रणनीति का हिस्सा है।

भारत पहले ही आधार, डिजिलॉकर और UPI जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म कई देशों के साथ साझा करने के लिए सहयोग समझौते कर चुका है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर UPI क्या है, यह कैसे काम करता है, दुनिया के किन देशों तक पहुँच चुका है और भारत को इससे क्या फायदा होगा?

UPI क्या है और यह कैसे काम करता है?

यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) एक रियल-टाइम डिजिटल भुगतान प्रणाली है, जिसे नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने विकसित किया है। इसकी शुरुआत अप्रैल 2016 में हुई थी। इसका मकसद लोगों को मोबाइल के जरिए सीधे बैंक खाते से तुरंत पैसे भेजने और प्राप्त करने की सुविधा देना था।

UPI को 11 अप्रैल 2016 को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की निगरानी में नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने लॉन्च किया था। इसका उद्देश्य अलग-अलग बैंकों के खातों के बीच रियल टाइम डिजिटल भुगतान को आसान बनाना था।

UPI की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें बैंक खाते का नंबर या IFSC कोड याद रखने की जरूरत नहीं होती। उपयोगकर्ता केवल मोबाइल नंबर, क्यूआर कोड या वर्चुअल पेमेंट एड्रेस (VPA) के जरिए भुगतान कर सकता है।

पैसा कुछ ही सेकंड में एक बैंक खाते से दूसरे बैंक खाते में पहुँच जाता है। यही वजह है कि आज छोटे दुकानदार से लेकर बड़े कारोबारी तक UPI का इस्तेमाल कर रहे हैं।

2016 से अब तक कैसे बदला UPI का सफर?

UPI की शुरुआत अप्रैल 2016 में हुई थी, लेकिन आज जिस रूप में यह दिखाई देता है, वहाँ तक पहुँचने के लिए इसे कई चरणों में विकसित किया गया।

पहला चरण (2016): शुरुआत और बुनियाद तैयार करना

अप्रैल 2016 में जब UPI लॉन्च हुआ था, तब केवल 21 बैंक इससे जुड़े थे। पहले महीने पूरे नेटवर्क पर सिर्फ 373 ट्रांजैक्शन हुए थे। वित्त वर्ष 2016-17 में कुल करीब 2 करोड़ ट्रांजैक्शन हुए जिनकी कुल कीमत केवल 0.07 लाख करोड़ रुपए थी।

शुरुआत में इससे जुड़े कुछ ही बैंक थे और लोगों के लिए यह बिल्कुल नया सिस्टम था। उसी साल दिसंबर में BHIM ऐप लॉन्च किया गया, जिससे सरकार ने डिजिटल भुगतान को बढ़ावा दिया।

दूसरा चरण (2017-2019): बड़े ऐप्स की एंट्री और तेज विस्तार

इस दौरान फोनपे, गूगल पे और पेटीएम जैसे ऐप तेजी से लोकप्रिय हुए। लगभग सभी बड़े बैंक UPI नेटवर्क से जुड़ गए। क्यूआर कोड के जरिए भुगतान आसान हुआ और दुकानों, बाजारों व छोटे कारोबारियों तक UPI पहुँचने लगा।

तीसरा चरण (2020-2022): गाँवों और हर वर्ग तक पहुँच

कोरोना महामारी के दौरान संपर्क रहित भुगतान की माँग बढ़ी, जिससे UPI का इस्तेमाल रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया। गाँवों और छोटे शहरों में भी डिजिटल भुगतान तेजी से बढ़ा। फीचर फोन उपयोगकर्ताओं के लिए UPI 123PAY और छोटे ऑफलाइन भुगतान के लिए UPI Lite जैसी सुविधाएँ शुरू की गईं।

चौथा चरण (2022-2024): नई सेवाएँ और क्रेडिट सुविधा

इस दौरान UPI, ऑटोपे, UPI पर रुपे क्रेडिट कार्ड और UPI पर क्रेडिट लाइन जैसी सुविधाएँ शुरू हुईं। इससे लोग केवल भुगतान ही नहीं, बल्कि सब्सक्रिप्शन, ऑटोमैटिक पेमेंट और डिजिटल क्रेडिट जैसी सेवाओं का भी लाभ लेने लगे।

आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। मार्च 2026 तक यूपीआई नेटवर्क से 703 बैंक जुड़ चुके हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में यूपीआई के जरिए 24,162 करोड़ से अधिक ट्रांजैक्शन हुए, जिनकी कुल कीमत करीब 314 लाख करोड़ रुपये रही।

यानी 10 वर्षों में ट्रांजैक्शन की संख्या लगभग 12,000 गुना और कुल लेनदेन मूल्य 4,000 गुना से ज्यादा बढ़ चुका है। आज भारत के करीब 85 प्रतिशत डिजिटल भुगतान यूपीआई के जरिए होते हैं और रोजाना औसतन 66 करोड़ डिजिटल ट्रांजैक्शन इसी प्लेटफॉर्म पर किए जाते हैं।

पाँचवाँ चरण (2024 से आगे): दुनिया तक पहुँच और AI का दौर

अब UPI केवल भारत तक सीमित नहीं है। सिंगापुर, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मॉरीशस, UAE, कतर, फ्रांस, कंबोडिया और अब सेशेल्स जैसे देशों तक इसका विस्तार हो रहा है।

NPCI अब AI आधारित वॉयस पेमेंट, बहुभाषी समर्थन, धोखाधड़ी का पता लगाना और डिजिटल क्रेडिट पर काम कर रहा है। वर्तमान में UPI प्रतिदिन 75 करोड़ से अधिक ट्रांजैक्शन संभालता है और लक्ष्य इसे 1 अरब रुपए ट्रांजैक्शन तक पहुँचाने का है।

किन-किन देशों तक पहुँच चुका है भारत का UPI?

पिछले कुछ सालों में UPI भारत की सीमाओं से निकलकर वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रहा है। भारतीय पर्यटक और व्यापारी अब सिंगापुर, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मॉरीशस, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर, फ्रांस और कंबोडिया जैसे देशों में UPI के जरिए मर्चेंट पेमेंट कर सकते हैं। अब इस सूची में सेशेल्स भी जुड़ने जा रहा है।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुसार, दुनिया में होने वाले लगभग 49 प्रतिशत रियल-टाइम डिजिटल पेमेंट अब UPI नेटवर्क के जरिए होते हैं। यही वजह है कि कई देश भारत के डिजिटल भुगतान मॉडल में रुचि दिखा रहे हैं और कई अन्य देशों के साथ भी यूपीआई कनेक्टिविटी को लेकर बातचीत जारी है।

प्रधानमंत्री मोदी की सेशेल्स यात्रा के दौरान नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया इंटरनेशनल पेमेंट्स लिमिटेड (NIPL) और सेशेल्स के केंद्रीय बैंक के बीच समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हुए। इसका उद्देश्य सेशेल्स में UPI आधारित डिजिटल भुगतान व्यवस्था लागू करना और दोनों देशों के बीच डिजिटल भुगतान एवं फिनटेक सहयोग को मजबूत करना है।

भारत सरकार 20 से अधिक देशों के साथ आधार, डिजिलॉकर और UPI जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म साझा करने के लिए सहयोग समझौते कर चुकी है। इससे भारत का इंडिया स्टैक  मॉडल दुनिया में तेजी से पहचान बना रहा है।

विदेशों में UPI पहुँचने से भारत और लोगों को क्या फायदा होगा?

UPI का वैश्विक विस्तार सबसे पहले भारतीय पर्यटकों के लिए बड़ी राहत लेकर आएगा। विदेश यात्रा के दौरान उन्हें स्थानीय मुद्रा बदलने या अंतरराष्ट्रीय कार्ड पर निर्भर रहने की जरूरत कम होगी। अपने मोबाइल में मौजूद उसी UPI ऐप से भुगतान करना आसान हो जाएगा।

विदेशों में रहने वाले भारतीयों और कारोबारियों के लिए भी भुगतान और लेनदेन अधिक सरल और तेज होगा। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार, पर्यटन और फिनटेक क्षेत्र में सहयोग बढ़ेगा। डिजिटल भुगतान की लागत कम होगी और छोटे व्यवसायों के लिए भी अंतरराष्ट्रीय भुगतान पहले से अधिक आसान बन सकता है।

सेशेल्स जैसे पर्यटन आधारित देश के लिए भी यह समझौता महत्वपूर्ण है। हर साल करीब 15 हजार भारतीय वहाँ घूमने जाते हैं। भारतीयों को सेशेल्स जाने के लिए पहले से वीजा लेने की जरूरत नहीं होती, हालाँकि आगमन पर विजिटर परमिट लेना पड़ता है। ऐसे में UPI लागू होने से भारतीय पर्यटक वहाँ आसानी से डिजिटल भुगतान कर सकेंगे।

भारत पहले से सेशेल्स को दवाएँ, चावल, कपड़े, वाहन, मशीनरी और अन्य सामान निर्यात करता है। डिजिटल भुगतान व्यवस्था मजबूत होने से व्यापारिक संबंधों को भी नई गति मिल सकती है।

यही वजह है कि मोदी की यात्रा के दौरान UPI के अलावा स्वास्थ्य, कृषि, अंतरिक्ष, समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और 1250 करोड़ रुपए की लाइन ऑफ क्रेडिट सहित कई समझौते किए गए।

UPI का अंतरराष्ट्रीय विस्तार केवल भुगतान तक सीमित नहीं है। इससे भारत की डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को वैश्विक पहचान मिल रही है। भारतीय फिनटेक कंपनियों के लिए नए बाजार खुलेंगे, सीमा पार भुगतान आसान होगा और डिजिटल अर्थव्यवस्था में भारत की सॉफ्ट पावर भी मजबूत होगी।

AI के साथ UPI की अगली उड़ान कैसी होगी?

NPCI अब UPI के अगले चरण में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को बड़ी भूमिका देना चाहता है। NPCI के मुख्य कार्यकारी अधिकारी दिलीप अस्बे के अनुसार AI की मदद से नए उपयोगकर्ताओं को जोड़ना आसान होगा।

NPCI का लक्ष्य अगले चरण में और अधिक लोगों तथा व्यापारियों को UPI नेटवर्क से जोड़ना है। इसके लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित वॉयस पेमेंट, बहुभाषी सुविधा, धोखाधड़ी की पहचान और डिजिटल क्रेडिट जैसे फीचर्स पर काम चल रहा है। NPCI का लक्ष्य आने वाले वर्षों में यूपीआई को प्रतिदिन एक अरब ट्रांजैक्शन तक पहुँचाना है।

खासतौर पर वॉयस असिस्टेंट और बहुभाषी सुविधाओं के जरिए ऐसे लोग भी डिजिटल भुगतान से जुड़ सकेंगे जिन्हें अंग्रेजी या स्मार्टफोन का अधिक अनुभव नहीं है।

NPCI ने 2023 में वॉयस असिस्टेंट आधारित इंटरैक्टिव सिस्टम भी शुरू किया था। भविष्य में AI की मदद से डिजिटल लेनदेन में धोखाधड़ी की पहचान, फर्जी खातों पर नजर रखने और सुरक्षा को मजबूत करने की योजना है।

इतना ही नहीं, डिजिटल फुटप्रिंट के आधार पर AI भविष्य में छोटे कारोबारियों और ग्राहकों को डिजिटल क्रेडिट या लोन मंजूर करने में भी मदद कर सकता है।

NPCI का मानना है कि भारतीय बैंक और फिनटेक कंपनियाँ अपने डेटा के आधार पर छोटे और सटीक AI भाषा मॉडल विकसित कर सकती हैं। विवाद समाधान प्रणाली FIMI भी पहले से लाखों उपयोगकर्ताओं की मदद कर रही है। इन सभी पहलों का लक्ष्य UPI को अधिक सुरक्षित, आसान और दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल भुगतान नेटवर्क बनाना है।

सेशेल्स में UPI लागू करने का समझौता सिर्फ एक नए देश में भुगतान सुविधा शुरू करने तक सीमित नहीं है। यह भारत की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसके जरिए वह अपने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को वैश्विक स्तर पर स्थापित करना चाहता है।

जिस प्लेटफॉर्म ने 10 साल पहले केवल 21 बैंकों और कुछ सौ ट्रांजैक्शन के साथ शुरुआत की थी, वही आज दुनिया के लगभग आधे रियल-टाइम डिजिटल भुगतान का हिस्सा बन चुका है। यही वजह है कि अब भारत केवल डिजिटल भुगतान का उपभोक्ता नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध कराने वाला देश बनकर उभर रहा है।

सेशेल्स ने PM मोदी के लिए नहीं, बल्कि अपनी घरेलू राजनीति के चलते ‘बनाया’ नया अवॉर्ड: जानिए भारत में इस पर मचा बवाल क्यों है बेतुका

प्रधानमंत्री मोदी के सेशेल्स दौरे के दौरान उन्हें सर्वोच्च पर्यावरण सम्मान ‘Guardian of the Blue Horizon’ से नवाजा गया। इसको लेकर जबरदस्ती विवाद खड़े किए जा रहे हैं। दरअसल ये अवॉर्ड पहली बार सेशेल्स ने किसी राष्ट्राध्यक्ष को दिया है, लेकिन इसके पीछे की वजह उनकी घरेलू राजनीति है, न की पीएम मोदी।

ऑपइंडिया की पड़ताल में सामने आया है कि सेशल्स की राष्ट्रीय सम्मान देने के सिस्टम में बड़े बदलाव किए गए और वर्तमान सरकार ने पुरानी प्रणाली को निरस्त कर दिया। वहाँ की संसद में नया कानून पास हुआ। नए कानून के तहत पहली बार पर्यावरण से जुड़ा सबसे बड़ा सम्मान पीएम मोदी को दिया गया। भारत में लिबरल गैंग सोशल मीडिया पर प्रोपेगेंडा फैलाने में लगे हुए हैं।

पीएम मोदी को क्यों दिया सम्मान, सेशेल्स ने बताया

प्रधानमंत्री मोदी के सेशेल्स दौरे के दौरान उन्हें सर्वोच्च पर्यावरण सम्मान दिया गया। ये सम्मान प्राप्त करने वाले वे दुनिया के पहले व्यक्ति हैं, साथ ही यह भारतीय प्रधानमंत्री को दिया गया 34वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मान है।

सेशेल्स सरकार ने इस मौके पर कहा कि यह उपाधि पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता, सतत विकास, नीली अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने और छोटे द्वीप वाले देशों (एसआईडीएस) की आकांक्षाओं के लिए प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व को मान्यता देती है।

पीएम मोदी ने सेशेल्स के लोगों और सरकार को इसके लिए आभार जताया और जलवायु परिवर्तन की चुनौती से जूझ रहे सभी देशों को यह सम्मान समर्पित किया।

प्रधानमंत्री ने पर्यावरण संरक्षण के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए कहा कि देश पृथ्वी को अधिक हरित और टिकाऊ बनाने के लिए हर संभव प्रयास करने को तैयार है। उन्होंने मिशन लाइफ, एक पेड़ माँ के नाम, अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन, आपदा प्रतिरोधी अवसंरचना गठबंधन और अंतर्राष्ट्रीय बिग कैट गठबंधन जैसी पहलों को भारत के वैश्विक पर्यावरण प्रयासों का उदाहरण बताया।

भारत में पुरस्कार को ‘विवादित’ बनाने की कोशिश हुई

पीएम मोदी को मिले इस इंटरनेशनल सम्मान को लेकर भी भारत में जश्न मनाने के बजाए राजनीति की जा रही है। कई आलोचकों ने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के दौरान उन्हें सम्मानित करने के लिए यह सम्मान ‘विशेष तौर पर बनाया गया’ था, जिसका अर्थ है कि सेशेल्स सरकार ने भारतीय प्रधानमंत्री के लिए जल्दबाजी में एक नया पुरस्कार घोषित कर दिया।

खुद को ‘खोजी पत्रकार’ कहने वाले और प्रचार आउटलेट ऑल्ट न्यूज के संस्थापक मोहम्मद जुबैर ने X पर अपने ही देश के प्रधानमंत्री को मिले सम्मान की आलोचना की। उन्होंने एक पोस्ट को दोबारा शेयर किया, जिसमें कहा गया था कि ‘नया पुरस्कार’ एक घुमंतू अहंकारी व्यक्ति के अहंकार को संतुष्ट करने के लिए जल्दबाजी में बनाया गया था।

जुबैर ने कई पोस्ट साझा किए हैं जिनमें कथित प्रशस्ति पत्र दस्तावेज का उपयोग करते हुए प्रधानमंत्री मोदी को दिए गए राष्ट्रीय सम्मान की प्रामाणिकता पर सवाल उठाया गया है।

द हिंदू की राजनयिक मामलों की संपादक ने भी इस आलोचना का समर्थन करते हुए सवाल उठाया कि गलतियों वाले कथित प्रशस्ति पत्र को किसने तैयार किया था। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट भी साझा किया, जिसमें दावा किया गया था कि सेशेल्स ने प्रधानमंत्री मोदी के लिए राजकीय सम्मान बनाने के लिए चैटजीपीटी का इस्तेमाल किया था।

सोशल मीडिया पर ये प्रोपेगेंडा जल्दी ही फैल गया। कई लोगों ने कहा कि ये पुरस्कार पीएम मोदी की यात्रा को देखते हुए सेशेल्स ने शुरू किया है।

यह पुरस्कार हाल ही में क्यों शुरू किया गया?

यह सच है कि ‘गार्जियन ऑफ द ब्लू होराइजन’ का सम्मान हाल ही में स्थापित किया गया है, लेकिन इसके ‘सृजन’ का कारण पीएम मोदी नहीं हैं। दरअसल सेशल्स के राष्ट्रीय सम्मान की प्रक्रिया में बदलाव किया गया है।

सेशेल्स ने देश में असाधारण योगदान देने वाले लोगों को सम्मानित करने के लिए 2022 में राष्ट्रीय पुरस्कार अधिनियम लागू किया। इस कानून के तहत तीन राष्ट्रीय सम्मान शुरू किए गए। गणतंत्र पदक, सम्मान पदक और योग्यता पदक।

कानून लागू होने के बाद 2023 में पहला राष्ट्रीय पुरस्कार समारोह आयोजित किया गया, जिसमें सार्वजनिक सेवा, पर्यावरण कार्य, स्वास्थ्य सेवा, संस्कृति, शासन और वीरता के कार्यों के लिए जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े व्यक्तियों को सम्मानित किया गया ।

पुरस्कार प्राप्त करने वालों में राष्ट्रपति वेवेल रामकलवान शामिल थे, जिन्हें अधिनियम के प्रावधानों के तहत गणतंत्र पदक प्राप्त हुआ, पूर्व राष्ट्रपति सर जेम्स मैनचम, सेंट्रल बैंक की गवर्नर कैरोलिन एबेल, पर्यावरणविद् एंटोनियो कॉन्स्टेंस, गायक जो सैमी और कई अन्य लोग शामिल थे, जिन्होंने सेशेल्स में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।

उस समय राष्ट्रपति रामकलवान ने कहा था कि देश विदेशों में सम्मानित सेशेल्स वासियों को तो मान्यता देता रहा है, लेकिन अपने नागरिकों को सम्मानित करने के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी। इसलिए, इस कमी को पूरा करने और राष्ट्रीय उपलब्धियों को औपचारिक रूप से मनाने के लिए राष्ट्रीय पुरस्कारों की शुरुआत की गई।

राजनीतिक परिवर्तन के कारण पुरानी सम्मान प्रणाली को निरस्त कर दिया गया

दरअसल नई सम्मान प्रणाली घरेलू राजनीति में उलझ गई।
सरकार में बदलाव के बाद, राष्ट्रपति पैट्रिक हर्मिनी मंत्रिमंडल ने फरवरी में राष्ट्रीय पुरस्कार (निरसन) विधेयक, 2026 को मंजूरी दी । इसमें पहले से प्रदान किए गए सभी सम्मानों की वैधता को बरकरार रखते हुए राष्ट्रीय पुरस्कार अधिनियम को समाप्त करने का प्रस्ताव है।

सेशेल्स की राष्ट्रीय सभा ने गरमागरम बहस के बाद निरसन विधेयक पारित कर दिया। इस विधेयक को यूनाइटेड सेशेल्स (यूएस) पार्टी का समर्थन मिला, जबकि लिन्योन डेमोक्रेटिक सेशेल्वा (एलडीएस) ने इसका विरोध किया। इसके साथ ही राष्ट्रीय पुरस्कार समिति को भी भंग कर दिया गया, हालाँकि पहले से दिए गए सम्मान कानूनी रूप से वैध बने रहे। हालाँकि पूर्ववर्ती पुरस्कार व्यवस्था समाप्त हो गई और एक नई सम्मान प्रणाली का मार्ग प्रशस्त हुआ।

इसी के तहत ‘गार्जियन ऑफ द ब्लू होराइजन’ की शुरुआत की गई और प्रधानमंत्री मोदी को पर्यावरण संरक्षण में उनके योगदान और जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील द्वीपीय देशों के समर्थन के लिए यह सम्मान प्रदान किया गया।

पुरस्कार से कहीं बढ़कर, एक नई शुरुआत

इसलिए ये नहीं कहा जा सकता कि प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा को देखते हुए, उन्हें खुश करने के लिए सेशेल्स सरकार ने यह सम्मान अचानक ‘सृजित’ किया।

सेशेल्स में पहले से मौजूद नागरिक सम्मान प्रणाली राजनीतिक विवाद का विषय बन चुकी थी और बाद में इसे कानून के माध्यम से निरस्त कर दिया गया था। वर्तमान सरकार पुराने कानून के तहत दिए गए पुरस्कारों की वैधता को बरकरार रखते हुए देश की सम्मान प्रणाली का पुनर्गठन कर रही है।

‘गार्जियन ऑफ द ब्लू होराइजन’ सम्मान भी सेशेल्स के नए सम्मान प्रणाली का हिस्सा है।

उत्तराखंड में धमकियाँ देने वाले निहंग जसदीप सिंह की अश्लील तस्वीरें वायरल: ‘विक्की थॉमस सिंह’ नाम के एक दूसरे निहंग ने खोली पोल, कहा- ये धर्म के नाम पर धंधा करता है

उत्तराखंड के कर्णप्रयाग मारपीट मामले में लगातार धमकियाँ देने वाले निहंग जसदीप सिंह की सच्चाई सबके सामने आ गई है। निहंग जसदीप सिंह की कुछ अश्लील तस्वीरें सामने आई है, जिसमें वह एक दूसरे सिख के साथ हमबिस्तर है। इन तस्वीरों की खुद जसदीप सिंह भी पु्ष्टि कर चुके हैं और उन्होंने कहा कि वह उस समय नशे में थे।

दरअसल निहंग जसदीप सिंह की पोल खुद उन्हीं के एक साथी ‘विक्की सिंह थॉमस’ नाम के निहंग ने खोली है। विक्की थॉमस ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर 11 मिनट का एक वीडियो शेयर किया, जिसमें सारी बात खुलकर सामने आ गई। वीडियो में विक्की थॉमस ने कुछ तस्वीरें दिखाईं, जिसमें निहंग जसदीप सिंह बिना कपड़ों के एक अन्य सिख युवक के साथ आपत्तिजनक स्थिति में नजर आ रहा है।

जसदीप सिंह उसी सिख समूह में शामिल थे, जिन्होंने हाल ही में उत्तराखंड की सीमा पर गिरफ्तार किए गए चार निहंगो की रिहाई करते हुए हंगामा किया था।

जसदीप सिंह की तस्वीर दिखाते हुए विक्की थॉमस ने जसदीप सिंह के लिए कहा, “धर्म के नाम पर धंधा करता है। बहरूपिया है। धर्म के नाम पर फंडिंग आता है क्या बाहर से, कभी होंडा, कभी बोलेरो खरीदता है।” विक्की थॉमस ने जसदीप सिंह के साथ वीडियो कॉल की स्क्रीन रिकॉर्डिंग भी शेयर की। इसमें जसदीप सिंह मान रहा है कि तस्वीरों में दिख रहा सिख व्यक्ति वो ही है। दोनों के बीच बातचीत के कुछ अंश हैं:

विक्की: मेरे को बता, ये फोटो जो हैं, ये तू है कि नहीं? हां या न?
जसदीप: हाँ, यह मैं ही हूँ। मैं एग्री करता हूं।

विक्की: ओके।
जसदीप: देखो, जो गलतियाँ हुई हैं, मैं मानता हूँ, उन सब चीजों को और एक चीज और…
विक्की (बीच में टोकते हुए): गुनाह बोलते हैं इसको, गलती नहीं। गुनाह बोलते हैं इसको, क्योंकि जो तूने किया है न, वह तो इसके सामने एक परसेंट का भी नहीं है। बाणा धारण किया है तूने।
जसदीप: नहीं… विक्की भाई… देखो, मैं… आपकी पीठ सुनती है। हर एक को मैंने यही बोला कि जिस टाइम मैं अंदर था, उस टाइम मेरा साथ किसी ने नहीं दिया। उस टाइम विक्की भाई ने मेरे घर पर भी फोन कर ये चीज बोली। यहाँ तक कि मेरे साथ भी, जिस टाइम हमारे ऊपर केस हुआ, सब हुआ, तो मेरे पापा को भी ये बात बोली कि अंकल अगर आपको किसी चीज की जरूरत है, कुछ भी है, तो मैं इनके साथ हूँ, मैं खड़ा हुआ हूँ। कोई भी दिक्कत नहीं है। किसी भी चीज की जरूरत पड़े तो आप मुझे फोन करना, मैं हाजिर हूँ। और जब हमारे ऊपर, जिस टाइम ये बीता, जलालाबाद वाले केस की, आपसे बात भी हुई है। आपकी पीठ सुनती है, किसी से भी पूछ लेना, अगर मैंने किसी को न बोला हो कि, ‘हाँ भाई साहब…

विक्की (गुस्से में): मेरे को… तू जो सब… तेरे से, अभी के अभी, जिसके भी मोबाइल में ये फोटो रहेंगे, जिसके भी मोबाइल में, अभी के अभी डिलीट करवा।
जसदीप: मैं इसी करके, मैंने आपको बीच में बताया था न। मैंने देग बंद कर दिया था बिल्कुल ही। मैंने छोड़ दिया था।

विक्की: मेरे भाई देख, मैं अब भी देग पिया हुआ हूँ। तेरे को दिखाऊँ? रगड़ा अभी भी तैयार है मेरा, बेटा। मैं तेरे सामने पिया हुआ हूँ। देख, शक है, कभी ये चीज नहीं बोलना… ये… ये अपना… ये गलत काम करना। और ये बंदा कौन था, जो तेरे साथ है? ये बंदा कौन था? ये भी निहंग था?
जसदीप: हम्म… हम्म…

विक्की: ये कौन है? मेरे को ये बंदा चाहिए। तेरे सिर पर केश हैं महाराज के। तू गुरु का सिंह है। तू कभी कुछ भी करेगा, महाराज मेरे को देगा मेरे हाथ में। और एक बात, मेरे को चुकाने वाला वर्ल्ड में पैदा नहीं हुआ, या तो मैं मर जाऊँगा। मैं सच में जी रहा हूँ मरने के लिए, आज तेरे मुँह पर बोलता हूं। मेरे को कोई फर्क नहीं पड़ता।
जसदीप: विक्की भाई…

विक्की: मैं बोलता हूँ, तेरा इमेज है न, मेरे दिल में एक रोशनी की तरह था। तूने एक झटके में बुझा दिया रे। और आज मैं रोता क्यों हूं? मैं दर्द में हूँ, मैं टूटकर बोल रहा हूँ।

वीडियो में यह भी दिख रहा है कि विक्की थॉमस ने निहंग जसदीप सिंह को बातचीत के लिए बुलाया। थॉमस ने सवाल उठाया कि जसदीप सिंह की लग्जरी लाइफस्टाइल की फंडिंग कौन करता है? आखिर में विक्की थॉमस ने जसदीप सिंह से गुरू महाराज के 5 ककार त्यागने को कहा लेकिन जसदीप ने ऐसा किए बिना वहाँ से उठकर चला गया।

कौन है विक्की थॉमस?

विक्की थॉमस को अब ‘निहंग विक्की सिंह थॉमस’ नाम से जाना जाता है। विक्की ने 2020 में ईसाई धर्म छोड़कर सिख धर्म अपनाया है और निहंग बाना धारण किया। लेकिन विक्की ने अपना पुराना सरनेम थॉमस नहीं बदला। विक्की थॉमस खुद को राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता बताते हैं।

हालाँकि इन्हीं कारणों से विक्की थॉमस अक्सर विवादों में भी रहते हैं। वह साल 2020-21 में किसान आंदोलन में पहली बार चर्चा में आए थे। वह 2021 में दिल्ली के लाल किले में हुई हिंसा में भी शामिल था।

इसके बाद जनवरी 2023 में गोल्डन टेंपल परिसर के पास निहंगों के दो गुटों में हुई हिंसक झड़प में भी विक्की थॉमस का नाम सामने आया था, जिसमें उन्होंने बीच-बचाव का दावा किया था। इसके बाद 2024 में विक्की थॉमस तब विवादों में आए जब उन्होंने कंगना रनौत को फिल्म इमरजेंसी को लेकर जान से मारने की धमकियाँ दी थीं।

कुछ वर्षों पहलें विक्की थॉमस ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी के साथ कथित तौर पर रिलेशनशिप में थे। एक वीडियो में वह लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी के साथ अपना जन्मदिन मनाते दिख रहे हैं। वीडियो में विक्की थॉमस को लक्ष्मी नारायण का पति बताया गया है। हालाँकि, वीडियो में विक्की थॉमस में निहंग चोला नहीं धारण कर रखा है। फिलहाल लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी भारत के पहले किन्नर अखाड़े के महामंडलेश्वर हैं।

इसके अलावा विक्की थॉमस का कॉन्ग्रेस कनेक्शन भी है। सोशल मीडिया पर सामने आए कुछ फोटो में विक्की थॉमस को कथित तौर पर सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी समेत कई कॉन्ग्रेस नेताओं के साथ देखा जा सकता है।

कौन हैं निहंग जसदीप सिंह?

निहंग जसदीप सिंह ने अपनी पहचान एक धार्मिक नेता के रूप में बनाई है। खासतौर पर हाल ही में उत्तराखंड के चमोली जिले के कर्णप्रयाग में निहंग और स्थानीय लोगों के बीच हुई हिंसक झड़प को लेकर जसदीप सिंह ने मोर्चा खोला था। इस मामले में पुलिस ने 4 निहंगों को गिरफ्तार किया था।

गिरफ्तार निहंगों की रिहाई को लेकर जसदीप सिंह ने लगातार उत्तराखंड पुलिस और प्रशासन को धमकियाँ जारी की थीं। जसदीप सिंह ने 150 से अधिक निंहगों के जत्थे के साथ उत्तराखंड सीमा पर डेरा डाल दिया था और यह भी बताया गया कि गुरुद्वारे पर भी कब्जा किया गया था।

बाद में निहंगों को चमोली कोर्ट से जमानत मिलने के बाद जब जसदीप सिंह जत्थे के साथ 28 जून को पंजाब लौटे तो यहाँ मोहाली के गुरुद्वारे में एक स्वागत समारोह के दौरान उन पर हमला हुआ।

UPI के विस्तार से लेकर स्वास्थ्य-सुरक्षा-अंतरिक्ष सहयोग तक… जानिए PM मोदी के दौरे से भारत-सेशेल्स के बीच हुए कौन से 19 समझौते, क्या होगा इनका असर

सेशेल्स (Seychelles) की अपनी तीन दिवसीय राजकीय यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और सेशेल्स के राष्ट्रपति पैट्रिक हरमिनी ने द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊँचाई देने वाले 19 नतीजों से दोनों देशों के रिश्तों और और मजबूती मिलेगी। दरअसल ये केवल समझौते नहीं हैं, बल्कि रक्षा, समुद्री सुरक्षा, डिजिटल भुगतान, अंतरिक्ष, स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास सहयोग का व्यापक पैकेज हैं।

यह सार्थक कूटनीति का एक बेहतरीन उदाहरण है। इसमें सिर्फ बातें नहीं, बल्कि ठोस नतीजे हैं जो हिंद महासागर क्षेत्र में ‘नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ और भरोसेमंद विकास साझेदार के तौर पर भारत की भूमिका को मजबूत करते हैं।

रक्षा क्षेत्र में मदद और समुद्री सुरक्षा से लेकर स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, खाद्य सुरक्षा और अंतरिक्ष सहयोग तक हर नतीजा ‘आत्मनिर्भर भारत’ की हकीकत और ‘ग्लोबल साउथ’ के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दिखाता है।

प्रमुख समझौते और पहल

  1. भारत-सेशेल्स प्रत्यर्पण संधि- भारत और सेशेल्स ने प्रत्यर्पण संधि पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इससे दोनों देशों के बीच कानूनी और सुरक्षा सहयोग को गहरा करने और अंतरराष्ट्रीय अपराध से निपटने में मदद मिलेगी। यह समझौता दोनों देशों को एक-दूसरे के क्षेत्र से भागे हुए अपराधियों और भगोड़ों को वापस लाने के लिए एक मजबूत कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
  2. अंतरिक्ष सहयोग पर समझौता- अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग और अन्वेषण पर MoU हुआ। इससे भारतीय सैटेलाइट एप्लिकेशन का विस्तार होगा। ISRO को मजबूती मिलेगी और इसका वैश्विक मौजूदगी बढ़ेगी। कुल मिलाकर अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत को विश्वसनीय स्पेस पार्टनर मिल रहा है।
  3. सेशेल्स में UPI आधारित डिजिटल भुगतान लागू करने के लिए समझौता- अफ्रीकी देश सेशेल्स में भी अब यूपीआई चलेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा के दौरान दोनों देशों ने समझौते पर हस्ताक्षर किए। सेशेल्स में यूपीआई शुरू होने के बाद भारतीय पर्यटक, कारोबारी और प्रवासी समुदाय डिजिटल भुगतान आसानी से कर सकेंगे। फिलहाल दुनिया के नौ देशों में यूपीआई सर्विस मान्य है। इसको लेकर NPCI और सेंट्रल बैंक ऑफ सेशेल्स के बीच समझौता हुआ है।
  4. अम्ब्रेला लाइन ऑफ क्रेडिट समझौता- भारत और सेशेल्स ने विकास परियोजनाओं को समर्थन देने के लिए ₹1250 करोड़ (लगभग 125 मिलियन डॉलर) के अम्ब्रेला लाइन ऑफ क्रेडिट समझौते पर हस्ताक्षर किए है। यह समझौता आयात-निर्यात बैंक ऑफ इंडिया और सेशेल्स के वित्त मंत्रालय के बीच हुआ है, जिसका उद्देश्य बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य और रक्षा में द्विपक्षीय सहयोग को बढ़ावा देना है।
  5. विदेश सेवा क्षेत्र में हस्ताक्षर इसके अलावा विदेश सेवा संस्थानों के बीच एमओयू पर हस्ताक्षर हुए हैं। सुषमा स्वराज इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेन सर्विस (SSIFS) और सेशेल्स के विदेश मंत्रालय (MoFAD) के बीच यह समझौता हुआ। इससे दोनों देशों के बीच विनिर्माण और राजनयिक संबंधों को मजबूती मिलेगी।
  6. नाविकों के प्रशिक्षण को लेकर समझौता- सेशेल्स के झंडे तले आवाजाही करने वाले जहाजों पर भारतीयों को सेवा देने का मौका मिलेगा साथ ही नाविकों को प्रशिक्षण और सर्टिफिकेट को मान्यता देने को लेकर एमओयू पर हस्ताक्षर हुए हैं। इससे भारतीय नाविकों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और समुद्री क्षेत्र में भारत की वैश्विक भूमिका मजबूत होगी।
  7. सेशेल्स को मेड इन इंडिया जंगी जहाज भारत ने सौंपा- पीएम मोदी के दौरे के दौरान सेशेल्स को एक फास्ट पेट्रोल वेसल (गश्ती पोत) उपहार दिया है। पीएम मोदी ने सेशेल्स कोस्ट गार्ड को पूरी तरह भारत में निर्मित यानी ‘मेड इन इंडिया’ फास्ट पेट्रोल वेसल PS LESPWAR सौंप दिया है। इससे समुद्री सुरक्षा सहयोग मजबूत होगा, हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की भूमिका मजबूत होगी और भारतीय रक्षा विनिर्माण को बढ़ावा मिलेगा।

8.Laser Radial Class नौकाएँ और वाहन देना- भारत ने सेशेल्स डिफेंस फोर्स को 10 यूटिलिटी वाहन और 5 सेट लेजर रेडियल क्लास नौकाएँ दे रहा है। इससे भारत की विश्व कल्याण की सोच को मजबूती मिल रही है।

  1. डोर्नियर विमान का Glass Cockpit Upgrade कर रहा है। इससे रक्षा सहयोग गहरा होगा, सुरक्षा मजबूत होगी और भारत की ‘नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ की भूमिका और सशक्त होगी।
  2. सेशेल्स कोस्ट गार्ड के पोत PS Zoroaster का रीफिट पूरा किया गया है। इससे दोनों देशों के द्विपक्षीय सुरक्षा और रक्षा सहयोग मजबूत होगा तथा हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की विश्वसनीय भागीदार की भूमिका और सशक्त होगी।लेकिन भारत का बड़ा दिल सिर्फ यहीं तक नहीं रुका पीएम मोदी ने सेशेल्स को 6 आधुनिक एम्बुलेंस देने की भी घोषणा की।
  3. एम्बुलेंस का उपहार- सेशेल्स सरकार को 6 आधुनिक एंबुलेंस भारत देने जा रहा है। इससे भारत की भरोसेमंद मानवीय साझेदार की छवि मजबूत होगी और जनकल्याण के जरिए लोगों के बीच संबंध मजबूत होंगे।
  4. 500 मीट्रिक टन चावल की सहायता- भारत ने सेशेल्स की खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने के लिए 500 मीट्रिक टन चावल की सहायता प्रदान की है। यह मानवीय सहायता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा के दौरान सौंपी गई।
  5. 8500 मीट्रिक टन सीमेंट की सहायता- भारत सेशेल्स के इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने और विकास परियोजनाओं को गति देने के लिए 8500 मीट्रिक टन सीमेंट दे रहा है। दरअसल इस छोटे से देश की विकास परियोजनाओं से इससे मदद की जा रही है।
  6. स्मारक लोगो लॉन्च- भारत-सेशेल्स राजनयिक संबंधों के 50 वर्ष पूरे होने पर स्मारक लोगो लॉन्च किया है। इससे दोनों देशों के मजबूत होते रिश्ते और लोगों के संबंधों को दिखाता है। दरअसल भारत को हिन्द महासागर में एक अच्छा दोस्त मिला है।
  7. प्रोफेशनल एवं तकनीकी एजुकेशन सेंटर का वर्चुअल शिलान्यास- पीएम मोदी की यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच प्रोफेशनलों के आने-जाने और तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए वर्चुअल सेंटर का शिलान्यास किया गया। इससे दोनों देशों के बीच संस्थागत संबंध आगे और विकसित होंगे और लोगों के बीच सद्भाव बढ़ेगा।
  8. CDRI की सदस्यता- सेशेल्स ने ‘कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर’ (CDRI) का सदस्य बनने का फैसला किया है। यह भारत और सेशेल्स के बीच बढ़ते रणनीतिक संबंधों को दर्शाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सेशेल्स यात्रा के दौरान इस अहम निर्णय की घोषणा की गई। सेशेल्स जैसे छोटे द्वीपों वाले विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक खतरा है। CDRI का मुख्य उद्देश्य ऐसे ही कमजोर क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे को मजबूत बनाना है।
  9. 17.जनऔषधि योजना पर समझौता- भारत और सेशेल्स गणराज्य के स्वास्थ्य मंत्रालय के बीच जनऔषधि योजना (Janaushadhi Scheme) के तहत एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ है। इस समझौते पर मेसर्स एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड ने हस्ताक्षर किए। यह समझौता सेशेल्स में उच्च गुणवत्ता वाली और सस्ती भारतीय जेनेरिक दवाओं और चिकित्सा से जुड़ी सामग्री के निर्यात और उपलब्धता को सुगम बनाएगा। इससे वैश्विक फार्मा क्षेत्र में भारत की भूमिका मजबूत होगी।
  10. 18.नए राष्ट्रीय अस्पताल की तैयारी – भारत और सेशेल्स के बीच नए राष्ट्रीय अस्पताल के विकास और प्रारंभिक तैयारियों के लिए एक एमओयू पर हस्ताक्षर हुए हैं। यह स्वास्थ्य के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय सहयोग को बढ़ाने और आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के निर्माण की रूपरेखा तैयार करने की दिशा में अहम है। इससे सेशेल्स के नए राष्ट्रीय अस्पताल खोलने के लिए एक बुनियादी ढाँचा तैयार होगा। इससे स्वास्थ्य क्षेत्र में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ेगा और भारत की भरोसेमंद विकास साझेदार की भूमिका मजबूत होगी।
  11. 19.कृषि अनुसंधान और शिक्षा के क्षेत्र में समझौता- भारत सरकार और सेशेल्स के बीच कृषि अनुसंधान और शिक्षा के क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग के लिए एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इसके तहत 2026-2031 की कार्ययोजना बनाई गई है, जिसका उद्देश्य संयुक्त अनुसंधान, तकनीकी अध्ययन और क्षमता निर्माण को बढ़ावा देना है। यह समझौता भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और सेशेल्स सरकार के कृषि विभाग के बीच हुआ है।

      इन समझौतों से दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी और मजबूत होगी। हिंद महासागर में भारत की विश्वसनीय सुरक्षा साझेदार की भूमिका बढ़ेगी। डिजिटल और फिनटेक सहयोग नए स्तर पर पहुँचेगा। अंतरिक्ष, स्वास्थ्य, शिक्षा और ब्लू इकोनॉमी में दीर्घकालिक सहयोग विकसित होगा और 50 वर्षों पुराने भारत-सेशेल्स संबंधों को नई गति मिलेगी।

      पीएम मोदी ने सेशेल्स दौरे में दोनों देशों की 50 साल पुरानी दोस्ती का जिक्र किया और इसमें नए आयाम जोड़े। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हिंद महासागर हमारा साझा घर है। इसकी सुरक्षा, स्थिरता और समृद्धि हमारी साझा जिम्मेदारी है। भारत का लक्ष्य हिंद महासागर को ‘Ocean of Opportunity’यानी अवसरों का महासागर बनाना है।

      उन्होंने कहा कि भारत और सेशेल्स अजनबी नहीं, बल्कि पुराने मित्र हैं और दोनों देशों के बीच विश्वास, लोकतांत्रिक मूल्यों और लोगों के बीच गहरे संबंध इस साझेदारी की सबसे बड़ी ताकत हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारत का ‘महासागर’ (Mutual and Holistic Advancement for Security and Growth Across Regions) विजन सेशेल्स के साथ सहयोग का प्रमुख आधार बनेगा।

      यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी को सेशेल्स का सर्वोच्च पर्यावरण सम्मान ‘Guardian of the Blue Horizon’ भी प्रदान किया गया, जिसे उन्होंने जलवायु परिवर्तन से लड़ रहे सभी देशों को समर्पित किया।

      गुजरात के अमरेली में युवक को मारने वाले चार शेरों को उम्रकैद: जानिए कैसे किसी शेर को घोषित किया जाता है ‘आदमखोर’ और क्या होती है पूरी प्रक्रिया

      जंगल में कोई कोर्ट नहीं होती। वहाँ कोई जज नहीं होता, कोई सरकारी वकील नहीं होता और कोई गवाह भी नहीं होता। फिर भी जब जंगल का राजा कहलाने वाला शेर किसी इंसान को अपना शिकार बना लेता है, तो उसके खिलाफ भी एक ऐसी प्रक्रिया शुरू होती है जिसका अंत कई बार खुले जंगल से हमेशा के लिए विदाई में होता है।

      बाहर से देखने वालों को सिर्फ इतना दिखाई देता है कि चार शेरों को आजीवन कैद की सजा हुई, लेकिन इस एक वाक्य के पीछे सबूत, विज्ञान, वन्यजीव प्रबंधन और कई अधिकारियों के फैसलों की एक लंबी कड़ी छिपी होती है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।

      अमरेली जिले के राजुला तहसील के कोवाया गाँव में हुई घटना के बाद गुजरात ने भी ऐसा ही एक दुर्लभ फैसला देखा। उत्तराखंड के रहने वाले प्रकाश चंद्र रोजगार के लिए गुजरात आए थे। 15 जून 2026 की रात वह अपने रास्ते से गुजर रहे थे। पींगलेश्वर महादेव के पास अंधेरे में जो हुआ, उसने अगले दिन पूरे राज्य को झकझोर दिया।

      शेर के हमले में उनकी मौत हो गई और शेरों ने उनके शरीर को खा लिया। वन विभाग मौके पर पहुँचा और जाँच शुरू की गई। आसपास के इलाके से चार संदिग्ध शेरों को पकड़ा गया। उनके सैंपल जाँच के लिए भेजे गए और उसके बाद एक ऐसा फैसला लिया गया जो आमतौर पर बहुत कम मामलों में होता है।

      फैसला था कि चारों शेरों को ‘आदमखोर’ घोषित किया जाए और उन्हें पूरी जिंदगी के लिए जंगल से दूर रखा जाए। यह खबर जितनी बड़ी थी, उतना ही बड़ा एक सवाल भी सामने आया। आखिर किसी शेर को ‘आदमखोर’ कैसे घोषित किया जाता है? क्या सिर्फ इंसान पर हमला कर देने से कोई शेर सीधे ‘मैन-ईटर’ बन जाता है? या इसके पीछे भी कोई नियम, कोई तय प्रक्रिया और वैज्ञानिक जाँच होती है?

      तलाजा-महुवा और शेत्रुंजय रेंज के वन अधिकारियों से बातचीत में जो बात सामने आई, वह बताती है कि किसी भी शेर को ‘आदमखोर’ घोषित करना शायद वन विभाग के सबसे कठिन फैसलों में से एक होता है।

      किसी इंसान पर हमला करने का मतलब यह नहीं कि आप ‘नरभक्षी’ हैं?

      यहाँ से पूरी कहानी शुरू होती है। कई लोग मानते हैं कि अगर शेर ने इंसान पर हमला कर दिया तो मामला वहीं खत्म हो गया और अब उसे ‘मैन-ईटर’ मान लिया जाएगा। लेकिन वन विभाग के लिए सिर्फ इतना काफी नहीं होता। मान लीजिए कोई किसान रात में अपने खेत पर गया हो और झाड़ियों के पीछे बैठी शेरनी अचानक डरकर उस पर हमला कर दे।

      या कोई बूढ़ा शेर अपने शिकार के पास बैठा हो और इंसान गलती से उसके बहुत करीब पहुँच जाए। कई बार शेरनी अपने बच्चों के साथ होती है और उन्हें बचाने के लिए हमला कर देती है। इन सभी परिस्थितियों में हमला हो सकता है, इंसान की मौत भी हो सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता कि शेर ने इंसान को अपना भोजन मान लिया है।

      वन विभाग के सामने सबसे पहला सवाल यही होता है कि हमला आखिर हुआ क्यों? क्या यह आत्मरक्षा में किया गया हमला था? क्या यह अपने इलाके की सुरक्षा के लिए था? क्या इंसान अचानक बहुत करीब पहुँच गया था? या फिर शेर ने सच में इंसान को शिकार के तौर पर चुना था? इन सवालों के जवाब मिले बिना किसी भी शेर को ‘मैन-ईटर’ घोषित नहीं किया जाता।

      सबूत तय करते हैं शेर का भविष्य

      कोवाया घटना में भी वन विभाग ने पहले किसी शेर को पकड़ने की जल्दी नहीं दिखाई। पहले घटनास्थल का विवरण तैयार किया गया। शव कहाँ मिला? शरीर के किस हिस्से पर सबसे पहले हमला हुआ? शव को कितनी दूर तक घसीटा गया? शरीर के कौन-से हिस्से खाए गए? आसपास कितने पंजे के निशान थे? क्या यह एक शेर था या पूरा झुंड?

      क्या आसपास कैमरा ट्रैप लगे थे? पिछले कुछ दिनों में उस क्षेत्र में शेरों की क्या-क्या गतिविधियाँ दर्ज की गईं?

      इन सभी सवालों के जवाब घटनास्थल से ही मिलते हैं। जंगल में हर जगह सीसीटीवी नहीं होता और चश्मदीद गवाह भी मुश्किल से ही मिलते हैं। वहाँ सिर्फ जानवरों के पैरों के निशान ही सब कुछ बयां करते हैं। जमीन पर बना हर निशान, झाड़ियों में फंसे बाल, शव की स्थिति और उसके आसपास का हर संकेत वन अधिकारियों के लिए सबूत बन जाता है।

      इसीलिए अधिकारी कहते हैं कि जंगल में जाँच-पड़ताल इंसानी दुनिया की जाँच-पड़ताल से अलग होती है। यहाँ आरोपित नहीं बोलता, सबूत बोलते हैं।

      संदिग्ध शेरों को पकड़ने के बाद ही शुरू होती है जाँच

      घटनास्थल से मिले शुरुआती सबूत जाँच को एक दिशा जरूर देते हैं, लेकिन वन विभाग के लिए सिर्फ इतना काफी नहीं होता। क्योंकि जंगल में कई बार एक ही इलाके में एक से ज्यादा शेर घूम रहे होते हैं। यह भी संभव होता है कि हमला किसी एक शेर ने किया हो और बाद में उसके साथ मौजूद दूसरे शेर भी शिकार के पास पहुँच गए हों।

      इसलिए अधिकारी बिना पूरी जाँच के किसी एक शेर को तुरंत दोषी नहीं मानते। जब शुरुआती जाँच किसी खास इलाके की तरफ इशारा करती है, तब संदिग्ध शेरों को ट्रैंक्विलाइजर गन की मदद से बेहोश करके सुरक्षित तरीके से पकड़ा जाता है। यह भी बेहद जोखिम भरा काम होता है। खुले जंगल में पूरी ताकत के साथ घूम रहे शेर को जिंदा पकड़ना आसान नहीं होता।

      इसके लिए पशु चिकित्सक, ट्रैकर और अनुभवी वनकर्मी कई घंटों तक उसकी गतिविधियों पर नजर रखते हैं। सही मौका मिलने पर ही ट्रैंक्विलाइजर डार्ट छोड़ा जाता है। दवा का असर होते ही पूरी टीम तेजी से उसके पास पहुँचती है, क्योंकि बेहोश हुए जानवर की हालत पर हर पल नजर रखना जरूरी होता है। कोवाया की घटना में भी ऐसा ही किया गया।

      हमले के बाद आसपास के इलाके से चार संदिग्ध शेरों को पकड़ा गया। बाहर से देखने वालों को लगा कि शायद अब फैसला हो गया है, लेकिन असल में फैसला अभी बहुत दूर था।

      चार शेरों में से असली हमलावर कौन? सबसे कठिन प्रश्न

      अमरेली के कोवाया मामले में भी वन विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि आखिर चारों शेरों को एक साथ कैसे पहचाना और पकड़ा जाए। क्योंकि जंगल में कोई शेर अपना नाम लिखकर नहीं घूमता और कोई भी अधिकारी सिर्फ अंदाज के आधार पर फैसला नहीं ले सकता।

      वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, इलाके में शेरों की गतिविधियाँ, घटनास्थल से मिले सबूत, पंजों के निशान, कैमरा ट्रैप में दर्ज तस्वीरें और लैब से मिलने वाली जाँच रिपोर्ट सभी को एक साथ जोड़कर पूरी तस्वीर तैयार की जाती है। इसके बाद तय किया जाता है कि किन शेरों को आगे की जाँच के लिए रखा जाएगा और किनका इस घटना से कोई संबंध नहीं है।

      कोवाया की घटना में भी यही प्रक्रिया अपनाई गई। चारों संदिग्ध शेरों को पकड़कर उनके सैंपल सासन में जाँच के लिए भेजे गए। इसके बाद जो रिपोर्ट सामने आई, उसने जाँच को नई दिशा दी और आगे का फैसला लेना संभव हो सका।

      प्रयोगशाला तक पहुँचता है सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य

      पकड़े गए शेरों से जरूरी सैंपल लिए जाते हैं और जाँच के लिए भेजे जाते हैं। यह जाँच सिर्फ इस सवाल का जवाब ढूँढने के लिए नहीं होती कि शेर ने इंसान का मांस खाया था या नहीं। जाँच का मकसद यह भी होता है कि घटनास्थल से मिले सबूत, शव की स्थिति, पंजों के निशान, शेरों की गतिविधियाँ और लैब से मिले नतीजे, क्या ये सभी एक ही दिशा की तरफ इशारा कर रहे हैं या नहीं।

      यहाँ अक्सर लोग एक आम गलती कर देते हैं। वे मान लेते हैं कि अगर किसी शेर के सैंपल में मानव अवशेष मिलने की पुष्टि हो गई तो मामला खत्म और वह ‘मैन-ईटर’ साबित हो गया। लेकिन वन विभाग की सोच इतनी सीधी नहीं होती।

      अधिकारी बताते हैं कि किसी जानवर का किसी मृत शरीर से मांस खाना और किसी जीवित इंसान को शिकार के रूप में चुनना, ये दोनों बातें एक जैसी नहीं होतीं। इसलिए हर सबूत को दूसरे सबूत से जोड़कर देखा जाता है। सिर्फ एक रिपोर्ट के आधार पर अंतिम फैसला नहीं लिया जाता।

      कोवाया मामले में भी अलग-अलग सबूत और लैब की रिपोर्ट एक-दूसरे की पुष्टि करते गए। इसके बाद ही आगे की प्रक्रिया शुरू की गई।

      सक्करबाग सिर्फ एक चिड़ियाघर नहीं, फैसले से पहले का आखिरी पड़ाव

      कई लोगों के लिए सक्करबाग सिर्फ जूनागढ़ का एक चिड़ियाघर है। लेकिन वन विभाग के लिए यह सिर्फ एक जू नहीं है। वर्षों से यहाँ ऐसे वन्यजीवों को रखा जाता है जिनके बारे में कोई विशेष फैसला लिया जाना बाकी होता है या जिन्हें लगातार निगरानी में रखने की जरूरत होती है। यहाँ लाए जाने के बाद पकड़े गए शेर की दोबारा विस्तार से मेडिकल जाँच की जाती है।

      उसके दाँतों की जाँच होती है। यह देखा जाता है कि उसका जबड़ा सही तरीके से काम कर रहा है या नहीं। आँखें, पैर, शरीर पर पुरानी चोटें, उम्र और उसकी पूरी शारीरिक स्थिति का आँकलन किया जाता है। इस जाँच के पीछे भी एक बड़ा कारण होता है।

      अगर कोई शेर बूढ़ा हो गया हो, उसके दाँत टूट गए हों या उसके शरीर में ऐसी चोट हो जिसकी वजह से वह प्राकृतिक शिकार नहीं कर पा रहा हो, तो उसके आसान शिकार की तरफ जाने की संभावना बढ़ जाती है। इसीलिए वन विभाग के लिए शेर की सेहत भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितना घटनास्थल से मिला कोई सबूत। लेकिन शरीर की जाँच से भी ज्यादा अहम होता है उसका व्यवहार।

      पाँच साल तक किया जा सकता है निरीक्षण लेकिन अमरेली का मामला अलग

      शेत्रुंजय विभाग के असिस्टेंट कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट (ACF) विरलसिंह चावड़ा ने बताया कि सामान्य परिस्थितियों में ऐसे शेरों के व्यवहार पर लंबे समय तक नजर रखी जाती है। कुछ मामलों में यह समय पांच साल तक भी पहुँच सकता है।

      इस दौरान विशेषज्ञ लगातार देखते हैं कि शेर का व्यवहार सामान्य है या नहीं, वह इंसानों के प्रति किसी असामान्य आकर्षण या आक्रामकता के संकेत तो नहीं दिखा रहा और समय के साथ उसके व्यवहार में कोई बदलाव आ रहा है या नहीं, लेकिन हर मामला इतना लंबा चले, ऐसा जरूरी नहीं होता।

      जाँच के दौरान मिले सभी सबूत इतने स्पष्ट हों कि वे एक ही निष्कर्ष की तरफ इशारा करें, तो फिर सालों तक इंतजार नहीं किया जाता। अधिकारियों के मुताबिक, अमरेली का कोवाया मामला ऐसा ही एक अपवाद था। जाँच, लैब रिपोर्ट और उपलब्ध सबूतों के आधार पर इस मामले में फैसला लेने की प्रक्रिया सामान्य मामलों की तुलना में काफी तेजी से पूरी की गई।

      इसी वजह से इस घटना ने पूरे राज्य का ध्यान खींचा। क्योंकि यहाँ सालों बाद नहीं, बल्कि कम समय में ही चारों शेरों को ‘मैन-ईटर’ घोषित कर दिया गया और फैसला लिया गया कि उन्हें अब दोबारा कभी जंगल में नहीं छोड़ा जाएगा।

      अंततः कौन लेता है ‘आजीवन कारावास’ का निर्णय?

      पूरी जाँच पूरी होने के बाद सबसे महत्वपूर्ण चरण आता है। बाहर से देखने वालों को लगता है कि लैब की रिपोर्ट आ गई तो फैसला भी हो गया। लेकिन असल में लैब रिपोर्ट पूरी प्रक्रिया का सिर्फ एक हिस्सा होती है। घटनास्थल से मिले सबूत, पंजों के निशान, शेरों की गतिविधियाँ, मेडिकल जाँच, उनके व्यवहार का आँकलन और लैब से मिले सभी नतीजों को एक साथ इकट्ठा करके वरिष्ठ अधिकारियों के सामने रखा जाता है।

      इसके बाद पूरी फाइल का विस्तार से अध्ययन किया जाता है और फिर अंतिम फैसला लिया जाता है। इस पूरे फैसले में सबसे बड़ा सवाल सिर्फ इतना होता है कि क्या इस जानवर को दोबारा खुले जंगल में भेजना सुरक्षित होगा या नहीं।

      ‘आदमखोर’ घोषित होने के बाद जंगल में नहीं लौटता शेर

      वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, इसके बाद संबंधित शेर को दोबारा जंगल में नहीं छोड़ा जाता। वरिष्ठ अधिकारियों के आदेश पर उसे सक्करबाग, किसी अधिकृत रेस्क्यू सेंटर या किसी अन्य चिड़ियाघर में भेज दिया जाता है, जहाँ वह अपना बाकी का पूरा जीवन बिताता है। यही वजह है कि लोग इसे ‘आजीवन कैद’ कहते हैं।

      यह नियम सिर्फ शेरों पर लागू नहीं होता। एक दिलचस्प बात यह भी है कि यह पूरी प्रक्रिया केवल गिर के शेरों तक सीमित नहीं है। अगर किसी बाघ, तेंदुए या किसी दूसरे बड़े मांसाहारी वन्यजीव के बारे में वैज्ञानिक जाँच में यह साबित हो जाए कि उसने इंसानों को शिकार के रूप में अपनाना शुरू कर दिया है, तो उसके साथ भी लगभग ऐसी ही प्रक्रिया अपनाई जाती है।

      क्योंकि वन विभाग के लिए सवाल यह नहीं होता कि जानवर कौन सा है। असली सवाल यह होता है कि क्या अब वह लगातार मानव जीवन के लिए खतरा बन गया है? अगर जवाब हाँ होता है, तो फिर वन्यजीव संरक्षण और इंसानों की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए उसे खुले जंगल से दूर रखने का फैसला लिया जाता है।

      ‘आजीवन कैद’ नहीं, सुरक्षा का फैसला: क्यों जंगल में वापस नहीं छोड़े जाते ‘मैन-ईटर’ शेर?

      कोवाया घटना के बाद सोशल मीडिया पर एक बात बहुत लिखी गई- ‘चार शेरों को आजीवन कैद।’ लेकिन इस शब्द का असली मतलब समझना भी उतना ही जरूरी है। इंसानों की अदालत में आजीवन कैद किसी अपराध की सजा होती है, लेकिन जंगल में ऐसा कोई नियम नहीं होता। यहाँ शेर ने कोई कानून नहीं तोड़ा होता।

      उसने जो किया, वह उसके स्वभाव, परिस्थितियों और उसकी प्राकृतिक प्रवृत्ति का हिस्सा होता है। वन विभाग भी उसे अपराधी की तरह नहीं देखता। वन विभाग के अधिकारी साफ कहते हैं कि यहाँ मकसद जानवर को सजा देना नहीं होता। क्योंकि शेर किसी कानून का उल्लंघन नहीं करता, वह अपने स्वभाव के अनुसार व्यवहार करता है।

      लेकिन जब वैज्ञानिक जाँच में यह सामने आता है कि कोई खास शेर इंसान को अब सिर्फ घुसपैठिया या खतरे के रूप में नहीं, बल्कि शिकार के रूप में देखने लगा है, तब उसे दोबारा खुले जंगल में छोड़ना भविष्य में किसी और हादसे का जोखिम लेना माना जाता है। इसी वजह से ऐसे फैसलों को वन्यजीव प्रबंधन की भाषा में सजा नहीं बल्कि सुरक्षा से जुड़ा फैसला माना जाता है।
      जब कोई जानवर इंसान को शिकार के रूप में अपनाने लगता है, तब मामला सिर्फ एक शेर तक सीमित नहीं रहता। सवाल यह बन जाता है कि अगर उसे फिर उसी इलाके में छोड़ा गया, तो क्या किसी और की जान खतरे में पड़ सकती है? इसीलिए ऐसे फैसलों को ‘सजा’ से ज्यादा ‘जोखिम प्रबंधन’ के रूप में समझना ज्यादा सही माना जाता है।

      ‘आजीवन कैद’ नहीं, जंगल से स्थायी विदाई: कोवाया घटना से मिला सबसे बड़ा सबक

      पूरी घटना का सबसे बड़ा सबक शायद यहीं छिपा है। आज गिर के शेर सिर्फ गिर नेशनल पार्क तक सीमित नहीं रह गए हैं। उनकी संख्या बढ़ी है और उनका इलाका भी पहले से बड़ा हुआ है। अमरेली, भावनगर, बोटाद, जूनागढ़ और गिर सोमनाथ के कई इलाकों में अब शेरों की मौजूदगी सामान्य बात बन गई है।

      यह वन्यजीव संरक्षण की एक बड़ी सफलता है। लेकिन इस सफलता के साथ नई जिम्मेदारियाँ भी आई हैं। जहाँ पहले जंगल था, वहाँ आज खेती है। जहाँ पहले शेरों के रास्ते थे, वहाँ अब गाँव हैं और जहाँ पहले सिर्फ जंगली जानवर घूमते थे, वहाँ अब रात में भी वाहन चलते हैं।

      इंसानों और शेरों, दोनों का दायरा बढ़ा है और शायद इसी वजह से दोनों के बीच की दूरी कम हुई है। ऐसे में हर हमला ‘आदमखोर’ होने का सबूत नहीं होता। लेकिन हर घटना यह जरूर याद दिलाती है कि अब गिर संरक्षण का मतलब सिर्फ शेरों की संख्या बढ़ाना नहीं है। उतना ही जरूरी यह भी है कि इंसानों और शेरों के बीच का संतुलन बना रहे।

      कोवाया घटना में जिन चार शेरों को जंगल से हटाया गया, उन्हें शायद अब कभी गिर के खुले जंगल में लौटने का मौका नहीं मिलेगा। उन्होंने शायद अपना आखिरी खुला सूर्योदय देख लिया है। अब उनका जीवन बाड़ों, एनक्लोजर और इंसानी निगरानी के बीच बीतेगा।

      लेकिन इस पूरी घटना का सबसे बड़ा सबक शायद शेरों के लिए नहीं, इंसानों के लिए है, क्योंकि यह घटना बताती है कि किसी भी शेर को एक दिन में ‘आदमखोर’ घोषित नहीं किया जाता। ऐसा फैसला भावनाओं या जल्दबाजी में नहीं लिया जाता।

      घटनास्थल से शुरू हुई जाँच पंजों के निशान, फॉरेंसिक सैंपल, मेडिकल जाँच, व्यवहार के अध्ययन और अधिकारियों के अंतिम मूल्यांकन तक पहुँचती है। जब यह सारी कड़ियाँ एक ही निष्कर्ष की तरफ इशारा करती हैं, तभी जंगल के राजा को खुले जंगल से हमेशा के लिए दूर करने का फैसला लिया जाता है।

      शायद इसलिए ‘आजीवन कैद’ से ज्यादा सही शब्द ‘स्थायी विदाई’ हो सकता है। क्योंकि यहाँ सजा किसी अपराधी को नहीं दी जाती। यहाँ एक ऐसा फैसला लिया जाता है जहाँ एक तरफ इंसानों की सुरक्षा होती है और दूसरी तरफ जंगल का राजा।

      वन विभाग के लिए सबसे मुश्किल काम शायद यही होता है कि किसी एक को चुनना नहीं, बल्कि दोनों को जितना संभव हो सके उतना सुरक्षित रखने का रास्ता तलाशना। और जब यह पूरी प्रक्रिया पूरी हो जाती है, तभी जंगल के राजा को अपने ही जंगल से हमेशा के लिए विदा लेना पड़ता है।

      (मूल रुप से यह रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)