देशभर में ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आजीविका की सुरक्षा को लेकर एक ऐतिहासिक बदलाव लागू हो गया है। दो दशक पुराने महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा MGNREGA, 2005) की जगह पर केंद्र सरकार का नया कानून ‘विकसित भारत – रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) गारंटी अधिनियम’ यानी ‘वीबी-जी राम जी एक्ट’ (VB-G RAM G Act, 2025) 1 जुलाई 2026 से लागू हो चुका है।
इस कानून के लागू होने के साथ ही देश के ग्रामीण विकास के ढाँचे में आमूल-चूल परिवर्तन होने जा रहा है। सरकार जहाँ इसे ‘विकसित भारत @2047’ के विजन को पूरा करने और ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने वाला एक क्रांतिकारी कदम बता रही है तो वहीं कॉन्ग्रेस ने इस बदलाव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कॉन्ग्रेस पुराना मनरेगा बंद किए जाने का रोना रो रही है।
कॉन्ग्रेस ने क्या कहा?
कॉन्ग्रेस के लोकसभा सांसद सप्तगिरि उलाका ने बुधवार (1 जुलाई 2014) को प्रेस कॉन्फ्रेस कर कहा कि आज एक बहुत दुखद दिन है, क्योंकि मोदी सरकार ने मनरेगा योजना को खत्म कर दिया है। कॉन्ग्रेस सांसद ने कहा, “मनरेगा को खत्म कर सरकार ने देश के तमाम गरीबों को एक झटका दिया है, क्योंकि ये ‘मांग आधारित’ रोजगार देने वाली योजना थी।”
उन्होंने कहा, “सप्लाई बेस मॉडल में केंद्र सरकार पहले एडवांस में फंड बजट आवंटित करती है और लेबर बजट मंजूर करती है। इसके तहत राज्य सरकार को पैसा और प्रशासनिक क्षमता को मैच करना पड़ेगा जिससे काम हो पाए। मनरेगा में कितने लोगों ने रोजगार माँगा है, उसके आधार पर पैसा आवंटित किया जाता था लेकिन अब VB GRAM G में एक बजट दिया जाएगा जिसमें काम खत्म करना होगा।”
सप्लाई बेस मॉडल में केंद्र सरकार पहले एडवांस में फंड बजट आवंटित करती है और लेबर बजट मंजूर करती है।
इसके तहत, राज्य सरकार को funds और administrative capacity को match करना पड़ेगा, ताकि काम हो पाए।
मनरेगा में कितने लोगों ने रोजगार मांगा है, उसके आधार पर पैसा आवंटित किया जाता था,… pic.twitter.com/EQenswpnKF
इस अधिनियम के देश भर में लागू होने से पहले केंद्रीय ग्रामीण विकास और कृषि व किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसे ऐतिहासिक दिन बताया है। उन्होंने कहा कि कोई भी पात्र ग्रामीण श्रमिक एक भी दिन काम से वंचित न रहे, यह सरकार की प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के साथ मिलकर अधिनियम के सुचारु क्रियान्वयन के लिए सभी प्रशासनिक, वित्तीय और तकनीकी तैयारियाँ पूरी कर ली हैं।
चौहान ने कहा, “पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध करा दिए गए हैं, पूरी व्यवस्था तैयार है और चल रहे सभी कार्य बिना किसी बाधा के जारी रहेंगे। रोजगार की गारंटी को 125 दिनों तक बढ़ाने से ग्रामीण परिवारों की आजीविका और मजबूत होगी, टिकाऊ सामुदायिक परिसंपत्तियों का निर्माण होगा तथा विकसित भारत के लक्ष्य को गति मिलेगी।”
इस एक्ट के ठीक से क्रियान्वयन के लिए केंद्र सरकार ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को ₹95,692.31 करोड़ की अंतरिम राशि पहले ही आवंटित कर दी है। इससे अधिनियम लागू होने के पहले दिन से ही रोजगार उपलब्ध कराने, समय पर मजदूरी का भुगतान सुनिश्चित करने और विकास कार्यों को बिना किसी बाधा के जारी रखने में मदद मिलेगी।
सरकार ने नए ढाँचे में सीमलेस ट्रांजिशन सुनिश्चित किया है। पहले से चल रहे सभी कार्य जारी रहेंगे और जिन श्रमिकों का ई-केवाईसी पूरा हो चुका है, उनके मौजूदा जॉब कार्ड ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्ड जारी होने तक मान्य रहेंगे ताकि रोजगार और मजदूरी भुगतान में किसी प्रकार की रुकावट न आए।
मनरेगा VS वीबी जी राम जी: कौन जनता का हितैषी?
विपक्ष द्वारा फैलाए जा रहे बेरोजगारी के इस नैरेटिव की जब तथ्यों के साथ पड़ताल की जाती है, तो तस्वीर पूरी तरह बदली हुई नजर आती है। असल में ‘जी राम जी बिल’ के तहत ग्रामीण रोजगार की गारंटी को खत्म नहीं किया गया है बल्कि इसके दायरे और सामर्थ्य को काफी बढ़ा दिया गया है।
मनरेगा के तहत एक वित्तीय वर्ष में प्रति ग्रामीण परिवार को केवल 100 दिनों के कुशल/अकुशल रोजगार की कानूनी गारंटी मिलती थी लेकिन नए ‘वीबी-जी राम जी एक्ट’ ने इस वैधानिक गारंटी को बढ़ाकर 125 दिन कर दिया है। यानी ग्रामीण परिवारों को अब पहले की तुलना में 25 दिन अधिक सुनिश्चित रोजगार और आय की सुरक्षा मिलेगी।
एक और सबसे महत्वपूर्ण तथ्य जो विपक्ष के दावों को खारिज करता है, वह है दैनिक मजदूरी दरों में की गई ऐतिहासिक वृद्धि। इस नए कानून के लागू होने के साथ ही केंद्र सरकार ने संशोधित मजदूरी दरों को अधिसूचित कर दिया है, जिसके तहत देश का राष्ट्रीय औसत वेतन बढ़कर 327.4 रुपए प्रति दिन हो गया है। अलग-अलग राज्यों के लिए यह दर 300 रुपए से लेकर 409 रुपए प्रति दिन (सिक्किम के कुछ हिस्सों में 450 रुपए) के बीच तय की गई है।
अगर गाँव का कोई पात्र मजदूर काम के लिए आवेदन करता है और उसे काम नहीं मिलता, तो कानून के तहत उसे बेरोजगारी भत्ता देना जरूरी है। यही बात इस योजना को कानूनी मजबूती देती है।
क्यों मनरेगा की जगह जरूरी थी VB-G RAM G?
साल 2005 में जब मनरेगा बना था, तब ग्रामीण भारत की आर्थिक स्थिति अलग थी। समय बदला तो देश में एक ऐसी योजना की जरूरत थी जो केवल ‘गड्ढे खोदने और भरने’ तक सीमित न रहकर ग्रामीण संपत्तियों का आधुनिकीकरण कर सके।
‘जी राम जी बिल’ इसी सोच के साथ देश में 4 मुख्य प्राथमिक कार्यक्षेत्रों (प्रायोरिटी वर्टिकल्स) पर केंद्रित है। इसमें पहला है जल सुरक्षा, जिसके तहत तालाबों का जीर्णोद्धार और भूजल रीचार्जिंग पर काम होगा। दूसरा मुख्य ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर, तीसरा आजीविका से जुड़ी संपत्तियाँ और चौथा चरम मौसमी घटनाओं (क्लाइमेट चेंज) के प्रभावों को कम करने वाले विशेष कार्य हैं।
देशव्यापी स्तर पर इसके लागू होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक बड़ा संरचनात्मक सुधार देखने को मिलेगा। पहले मनरेगा में यह शिकायत आम थी कि बुवाई और कटाई के मुख्य सीजन में जब किसानों को खेतों के लिए मजदूरों की भारी जरूरत होती थी, तब सरकारी कामों के कारण खेतों में लेबर शॉर्टेज (मजदूरों की कमी) हो जाती थी और कृषि मजदूरी में बेवजह की महँगाई आ जाती थी।
इस समस्या का समाधान करते हुए नए कानून की धारा 6 में यह प्रावधान किया गया है कि राज्य सरकारें मुख्य कृषि सीजन के दौरान इस योजना को अधिकतम 60 दिनों के लिए निलंबित या पॉज कर सकती हैं। इससे किसानों को खेती के समय आसानी से श्रमिक उपलब्ध होंगे, जिससे देश के कृषि उत्पादन और किसानों की आय में सीधे तौर पर बढ़ोतरी होगी।
इसके अलावा, योजना में पारदर्शिता लाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन का इस्तेमाल अनिवार्य किया गया है ताकि मनरेगा के दौर में होने वाले फर्जीवाड़े, घोस्ट बेनेफिशियरी (फर्जी श्रमिक) और करोड़ों रुपयों के फंड मिसएप्रोप्रिएशन (वित्तीय अनियमितताओं) को पूरी तरह से रोका जा सके। डिजिटल अटेंडेंस और सीधे बैंक खातों में आधार-लिंक्ड भुगतान प्रणाली से मजदूरी की चोरी रुकना देश के करोड़ों ईमानदार श्रमिकों के हित में है।
UP को VB-G RAM G से होंगे क्या फायदे?
VB-G RAM G कानून का उत्तर प्रदेश के लिए बड़ा फायदा इसलिए है, क्योंकि राज्य की बड़ी आबादी गाँवों में रहती है। 2011 की जनगणना के मुताबिक, यूपी की 77.73% आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है। ऐसे में ग्रामीण रोजगार से जुड़ा कोई भी कानून सीधे करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी और आजीविका के लिए फायदे वाला होता है।
मजदूरों की कमाई बढ़ेगी
इस कानून से उत्तर प्रदेश के ग्रामीण मजदूरों की दैनिक कमाई बढ़ेगी। नए प्रावधानों के तहत यूपी में मजदूरों को ₹300 प्रति दिन की न्यूनतम मजदूरी मिलेगी। साथ ही पुराने मनरेगा में जहाँ 100 दिन का रोजगार मिलता था, वहीं अब 125 दिन का सुनिश्चित रोजगार दिया जाएगा। इससे ग्रामीण परिवारों की सालाना आय बढ़ेगी और गाँवों में आर्थिक मजबूती आएगी।
बुंदेलखंड जैसे सूखे इलाकों को राहत
उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड जैसे पठारी और सूखे इलाकों में पानी की समस्या लंबे समय से बनी हुई है। VB-G RAM G कानून में जल सुरक्षा को पहली प्राथमिकता दी गई है। इसके तहत गाँवों में तालाबों को गहरा करने, नए चेकडैम बनाने और वर्षा जल संचयन जैसे काम वैज्ञानिक तरीके से किए जाएँगे। इससे सूखे क्षेत्रों में भूजल स्तर सुधारने में मदद मिलेगी।
UP को सबसे ज्यादा आवंटन
इस योजना के तहत उत्तर प्रदेश को सबसे बड़ा अंतरिम आवंटन मिला है। रिपोर्ट के अनुसार केंद्र ने VB-G RAM G के लिए ₹95,692.31 करोड़ की अंतरिम राशि रखी है जिसमें यूपी को सबसे ज्यादा ₹9,721.48 करोड़ मिले हैं। इससे राज्य में मजदूरी भुगतान, नए काम शुरू करने और पुराने ग्रामीण विकास कार्यों को बिना रुकावट आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।
कुल मिलाकर VB-G RAM G कानून को ग्रामीण भारत और खासकर उत्तर प्रदेश के लिए एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा सकता है। इस कानून से गाँवों में रहने वाले गरीब और श्रमिक परिवारों को ज्यादा दिनों का रोजगार, बेहतर मजदूरी और समय पर भुगतान मिलने की उम्मीद है। साथ ही जल सुरक्षा, ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर और आजीविका से जुड़े कामों पर जोर देने से गाँवों में स्थायी विकास की राह मजबूत होगी।
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और ग्रामीण आबादी वाले राज्य के लिए यह कानून सिर्फ रोजगार देने वाली योजना नहीं बल्कि गाँवों को आत्मनिर्भर बनाने का अवसर भी साबित हो सकता है। बुंदेलखंड जैसे सूखे इलाकों में पानी से जुड़े काम, मजदूरों की बढ़ी हुई कमाई और सबसे बड़े आवंटन के कारण यूपी को इसका सीधा लाभ मिलेगा।
बंगाल विधानसभा में सोमवार (29 जून 2026) को OBC से जुड़े दो संशोधन बिल ध्वनिमत मत से पास किए गए। ये बिल हैं – पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग (संशोधन) बिल, 2026 और पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा) संशोधन बिल, 2026।
दरअसल इन विधेयकों के जरिए राज्य के ओबीसी आरक्षण के ढाँचे को पूरी तरह से बदल दिया गया है। कलकत्ता उच्च न्यायालय के मई 2024 टीएमसी सरकार को आदेश दिया था, जिसे अब विधेयक में शामिल किया गया है। इसमें टीएमसी के कार्यकाल में जोड़ी गई 77 मुस्लिम जातियों समेत कुल 113 समुदायों को आरक्षण सूची से बाहर कर दिया गया है, साथ ही ओबीसी आरक्षण को 17 % से घटाकर 7 % कर दिया गया है। दरअसल कोलकाता हाईकोर्ट ने 2011 के बाद ओबीसी सूची में किए गए विस्तार और 17 फीसदी तक के कोटे को रद्द कर दिया था।
विधानसभा में बिल पेश करते हुए पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री गौरीशंकर घोष ने कहा कि पूर्व टीएमसी सरकार ने बगैर सर्वे किए मुस्लिमों को फायदा पहुँचाने के लिए ओबीसी सूची में मुस्लिम समुदाय को शामिल कर लिया था, इसलिए इसे कोलकाता हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया। उन्होंने कहा कि सर्वे के आधार पर 66 समुदायों को ओबीसी कटेगरी में बरकरार रखा गया है।
ममता बनर्जी सरकार का फॉर्मूला रद्द
तृणमूल सरकार के कार्यकाल के दौरान OBC को दो कटैगरी में बांटा गया था। OBC ‘A’ और OBC’B’ कैटेगरी बनी थी। अब इसे हटा दिया गया है और OBC कटेगरी बन गई है। इसमें OBC ‘A’ कैटेगरी में शामिल 65 समुदायों को शामिल किया गया है। अब 2010 से पहले शामिल 66 जातियाँ ही आरक्षण की पात्र होंगी। इस तरह से एक नया आरक्षण का ढाँचा बनाने का रास्ता साफ हो गया है।
2012 के आरक्षण कानून में कई अहम बदलाव किए जा रहे हैं। इस कानून का नाम बदलकर ‘पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (पदों में आरक्षण) अधिनियम, 2012’ किया जा रहा है।
अब OBC का दर्जा ‘पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम, 1993’ के आधार पर तय किया जाएगा। इसका मतलब है कि OBC सूची में समुदायों को शामिल करने या हटाने में आयोग की भूमिका और भी अहम होगी।
संशोधन के तहत, राज्य सरकार पिछड़ा वर्ग आयोग से सलाह लेकर OBC आरक्षण का प्रतिशत तय करेगी। जरूरत पड़ने पर, सरकारी गजट नोटिफिकेशन के जरिए आरक्षण की दर बढ़ाई जा सकती है। हालाँकि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और OBC को मिलाकर कुल आरक्षण किसी भी हाल में 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं हो सकती। इसके अलावा आयोग की सिफारिशों के आधार पर OBC समुदायों को उनकी सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति के अनुसार कई समूहों में बांटा जा सकता है, जिससे हर कैटेगरी के लिए अलग-अलग आरक्षण दरें तय की जा सकेंगी।
पिछड़ा वर्ग आयोग में बड़े बदलाव
एक और संशोधन बिल पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग के ढांचे में बदलाव लाता है। नई व्यवस्था के तहत, आयोग में एक अध्यक्ष, तीन सदस्य और एक सदस्य-सचिव होंगे। सदस्य-सचिव के तौर पर ऐसे सरकारी अधिकारी को नियुक्त किया जाएगा जिसने कम से कम तीन साल तक अतिरिक्त सचिव के रूप में काम किया हो।
आयोग की जिम्मेदारियों का भी विस्तार किया गया है। किसी व्यक्ति या समुदाय को ‘पिछड़ा वर्ग’ के रूप में मान्यता देने, सूची में शामिल करने या सूची से हटाने से पहले, आयोग एक विस्तृत सर्वेक्षण करेगा और राज्य सरकार को अपनी सिफारिशें सौंपेगा। असल में, भविष्य में OBC सूची तैयार करने के लिए आयोग की राय ही मुख्य आधार होगी।
बंगाल के मंत्री ने कहा कि पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग को टीएमसी सरकार ने दरकिनार कर दिया था और फर्जी ओबीसी जातियाँ बना दी थी। नई सरकार इन्हें खत्म कर रही है और अब ओबीसी समुदाय की सामाजिक आर्थिक स्थिति का आकलन भी किया जाएगा।
सरकार का कहना है कि इस संशोधन से OBC आरक्षण व्यवस्था अधिक पारदर्शी, कानूनी रूप से सही और सुव्यवस्थित होगी। इसके अलावा, नए कानून को लागू करने से सरकार पर कोई अतिरिक्त वित्तीय बोझ नहीं पड़ेगा।
सरकार ने इस संशोधन बिल के जरिए पूर्ववर्ती ममता सरकार के मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति पर बड़ा प्रहार किया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बिल को लेकर कहा कि यह कदम तुष्टिकरण की राजनीति को खत्म कर संवैधानिक न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में अहम कदम है। सरकार ने कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश का पालन किया है और पुरानी दोषपूर्ण ओबीसी सूची को रद्द कर दिया है।
पूर्व की टीएमसी सरकार ने जो ओबीसी आरक्षण बढ़ा कर 17 फीसदी किया था, जिसे अब पहले की तरह 7 फीसदी कर दिया गया है। साथ ही बगैर सर्वे के ओबीसी श्रेणी में शामिल किए गए जातियों को हटा दिया है।
बंगाल के आमूलचूल परिवर्तन में ये बिल अहम भूमिका निभाएगा। दरअसल ओबीसी के तहत मुस्लिम जातियों को शामिल कर वोट बैंक बनाने की नीति के दम पर ममता बनर्जी चुनाव दर चुनाव जीतती रहीं। संविधान में धर्म आधारित आरक्षण की व्यवस्था नहीं होने के बावजूद मुस्लिमों को जातियों के नाम पर आरक्षण दिया गया। अब शुभेंदु सरकार ने इस आरक्षण को खत्म कर और कोलकता हाईकोर्ट के आदेश को संशोधन बिल में शामिल कर राज्य में आरक्षण के नए ढाँचे के निर्माण का रास्ता बना दिया है।
गुजरात हाई कोर्ट (HC) में एक ऐसा मामला सामने आया जिसमें एक युवक को यह साबित करने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा कि वह किसी महिला का पति है ही नहीं, जबकि उस महिला के पास एक विवाह प्रमाणपत्र मौजूद था। जस्टिस इलेश जे वोरा और जस्टिस आरटी वच्छानी की बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए ऐसा फैसला सुनाया जो हिंदू विवाह अधिनियम की मूल भावना को बहुत साफ शब्दों में समझाता है।
पूरा मामला शुरू होता है कौशल प्रमोदभाई सोनार नाम के एक युवक से, जो पढ़ाई और नौकरी के सिलसिले में ब्रिटेन में रहते हैं। उनके सामने एक दिन ऐसी परिस्थिति आई जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। खुशी संजय शाह नाम की महिला, जो अहमदाबाद में रहती है, अचानक कौशल के माता-पति के पास पहुँची और एक विवाद प्रमाणपत्र दिखाकर यह दावा किया कि वह कौशल की कानूनी रूप से पत्नी है। कौशल के लिए यह खबर किसी झटके से कम नहीं थी क्योंकि उन्होंने न तो कभी इस महिला से कोई विवाह किया था, न कोई हिंदू रीति रिवाज या फेरे लिए थे और न ही कभी पति-पत्नी की तरह साथ रहे।
कौशल ने कोर्ट को बताया कि वह पहले खुशी के पिता की कंपनी में नौकरी करते थे और वहीं उनसे उनका हस्ताक्षर धोखे से करवाया गया। कौशल का आरोप था कि उन्हें प्रमोशन का लालच देकर या नौकरी से निकाल देने की धमकी देकर, बिना उनकी मर्जी के, कुछ विवाह से जुड़े कागजों पर हस्ताक्षर करवा लिए गए। यानी उनकी सहमति के बिना ही उनके हस्ताक्षर लेकर एक ऐसा दस्तावेज तैयार कर लिया गया जो आगे चलकर विवाह प्रमाणपत्र में बदल गया।
कौशल की फैमिली कोर्ट में याचिका हुई खारिज
इसके बाद कौशल ने हिंदू अधिनियम की धारा 5, 7 और 12 के तहत अहमादाबाद के फैमिली कोर्ट में एक याचिका दाखिल की, जिसमें उन्होंने यह घोषणा माँगी कि दोनों के बीच की तथाकथित शादी शुरू से ही अवैध और शून्य मानी जाए। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि खुद खुशी ने फैमिली कोर्ट में दिए गए अपने लिखित बयान में यह साफ-साफ मान लिया कि दोनों के बीच कोई रीति-रिवाज या रस्में हुई ही नहीं थीं और कोई भी वैध विवाह संपन्न नहीं हुआ था।
उसने यह भी कबूल किया कि दोनों के बीच पति-पत्नी जैसा कोई संबंध नहीं है। इस स्वीकृति के आधार पर कौशल ने कोर्ट में एक आवेदन दिया की इसी स्वीकृति के आधार पर फैसला सुना दिया जाए, जिससे पूरी सुनवाई की जरूरत ही न पड़े।
लेकिन फैमिली कोर्ट ने 13 नवंबर 2025 के अपने आदेश में यह कहते हुए इस आवेदन को खारिज कर दिया कि पंजीकृत विवाह प्रमाणपत्र होने से एक वैध विवाह की धारणा बनती है और इसीलिए पूरे मामले की विस्तार से सुनवाई जरूरी है। इसी के साथ पूरी याचिका भी खारिज कर दी गई। इस आदेश से निराश होकर कौशल ने हाई कोर्ट का रुख किया।
कौशल ने हाई कोर्ट में ‘केवल प्रमाणपत्र से विवाह वैध नहीं होने’ की दी दलील
कौशल के वकील राहिल पी जैन ने हाई कोर्ट में दलील दी कि जब खुद पत्नी ने ही अपने लिखित बयान में साफतौर से यह मान लिया है कि कोई भी रीति रिवाज हुए ही नहीं और कोई वैध विवाह संपन्न ही नहीं हुआ तो फिर लंबी सुनवाई कराने की कोई जरूरत ही नहीं बनती। उनका कहना था कि जब जरूरी रस्में हुई ही न हों और खुद दूसरे पक्ष ने यह बात लिखित रूप में स्वीकार कर ली हो तो केवल विवाह प्रमाणपत्र का होना किसी विवाह को वैध नहीं बना देता।
वहीं खुशी की तरफ से वकील अनुराग आर राठौर ने भी कोर्ट में यह स्वीकार किया कि पंजीकरण के अलावा यह साबित करने के लिए कोई और पु्ख्ता रिकॉर्ड पर नहीं है कि विवाह वास्तव में संपन्न हुआ था। उन्होंने कोर्ट से उचित आदेश पारित करने का अनुरोध किया।
हाई कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम के धारा 7 और 8 के हवाले से सुनाया फैसला
हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद अपना फैसला सुनाया। फैसले में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 का विस्तार से जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि इस धारा के अनुसार हिंदू विवाह उन प्रथागत रीति रिवाजों के अनुसार संपन्न किया जा सकता है जो किसी भी पक्ष में प्रचलित हों और जहाँ इन रीति रिवाजों में ‘सप्तपदी’ शामिल हो यानी पवित्र अग्नि के सामने वर-वधू का सात फेरे लेना, वहाँ विवाह सातवाँ फेरा पूरा होते ही विवाह संपन्न और कानूनी रूप से वैध माना जाता है।
कोर्ट ने यह भी कहा, “जब तक विवाह आवश्यक प्रधागत रीति-रिवाजों के साथ संपन्न नहीं किया जाता, तब तक इसे अधिनियम के तहत संपन्न विवाह नहीं माना जा सकता।”
इसके साथ ही कोर्ट ने धारा 8 की भी व्याख्या की, जो विवाह के पंजीकरण से जुड़ी है। बेंच ने साफ कहा कि पंजीकरण का उद्देश्य केवल यह होता है कि पहले से वैध रूप से संपन्न हुए विवाह का सबूत आसानी से मिल सके। पंजीकरण अपने आप में किसी विवाह को वैध नहीं बना सकता, अगर धारा 7 के तहत आवश्यक रस्में पहले से पूरी नहीं हुई हों। यानी अगर वास्तव में विवाह हुआ ही नहीं है, तो कोई भी पंजीकरण या प्रमाणपत्र दोनों पक्षों को पति-पत्नी का कानूनी दर्जा नहीं दे सकता।
कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि फैमिली कोर्ट ने एक बड़ी चूक की, क्योंकि उसने यह जाँचे बिना ही कि विवाह वास्तव में संपन्न भी हुआ था या नहीं, सीधे यह मान लिया कि पंजीकरण से ऐसी धारणा बन जाती है जिसे केवल पूरी सुनवाई से ही तोड़ा जा सकता है। बेंच ने कहा, “जब उत्तरदाता ने खुद यह स्वीकार कर लिया है कि आवश्यक विवाह रस्में कभी संपन्न नहीं हुईं, तो पक्षों को लंबी और थकाऊ सुनवाई में डालने का कोई औचित्य या उपयोगी उद्देश्य नहीं रह जाता।”
हाई कोर्ट ने फैसले में हिंदू विवाह के महत्व पर डाली नजर
फैसले में हाई कोर्ट ने हिंदू विवाह के सामाजिक और आध्यात्मिक महत्व पर भी विस्तार से टिप्पणी की। बेंच ने ऋग्वेद का हवाला देते हुए सप्तपदी की रस्म का उल्लेख किया, जिसमें सातवाँ फेरा पूरा होने के बाद वर-वधू से कहता है कि सात फेरों के साथ हम मित्र बन गए हैं और यह मित्रता कभी न टूटे।
कोर्ट ने कहा कि हिंदू परंपरा में पत्नी को अर्धांगिनी माना जाता है, यानी पति का आधा हिस्सा, लेकिन साथ ही उसे अपनी अलग पहचान वाली और विवाह में बराबरी की भागीदार भी माना जाता है। हिंदू कानून के अनुसार विवाह एक संस्कार है और यह किसी नए परिवार की नींव रखता है।
बेंच ने अपने फैसले में युवाओं को एक तरह से सीख भी दी। कोर्ट ने कहा, “विवाह केवल गीत संगीत या खान पान का अवसर नहीं है, विवाह कोई व्यापारिक सौदा नहीं है।” कोर्ट ने कहा कि विवाह एक गंभीर और बुनियादी कायक्रम है जिसके माध्यम से एक पुरुष और महिला भविष्य में परिवार बनाने के उद्देश्य से पति-पत्नी के संबंध में बंधते हैं, और परिवार ही भारतीय समाज की सबसे बुनियादी इकाई है।
कोर्ट ने कहा कि विवाह इसलिए पवित्र माना जाता है क्योंकि यह दो व्यक्तियों के बीच एक जीवनभर चलने वाला, सम्मानजनक, बराबरी वाला और सहमति से बना स्वस्थ संबंध बनाता है और इसे मोक्ष प्राप्ति से जुड़ा हुआ अवसर भी माना जाता है, खासकर जब निर्धारित रीति-रिवाज पूरी विधि से संपन्न किए जाएँ।
लेकिन मौजूदा मामले में जब खुशी ने ही अपने लिखित बयान में मान लिया कि कोई रस्में हुई ही नहीं और कोई वैध विवाह संपन्न ही नहीं हुआ, तो कोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह को जो आध्यात्मिक, सामाजिक और कानूनी दर्ज मिलता है, वह इस मामले में कभी अस्तित्व में आया ही नहीं। इसलिए दोनों के बीच का संबंध कभी भी पति-पत्नी का कानूनी दर्जा हासिल नहीं कर पाया।
इन सभी बातों का ध्यान रखते हुए आखिर में हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के 13 नवंबर 2025 के आदेश को रद्द करते हुए अपील स्वीकार कर ली। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कौशल और खुशी के बीच की कथित शादी शुरू से ही ‘शून्य और अमान्य’ घोषित की जाती है, क्योंकि इस तथाकथित विवाह से कोई भी अधिकार या दायित्व उत्पन्न नहीं होता। साथ ही कोर्ट ने कौशल को यह आजादी भी दी कि वह विवाह पंजीकरण और विवाह प्रमाणपत्र को रद्द करवाने के लिए संबंधित प्राधिकरण के समक्ष उचित कदम उठा सकते हैं।
क्या है सप्तपदी? जिसने कौशल की नैया पार लगाई
इस पूरे मामले का फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम में शामिल सप्तपदी का जिक्र किया, उसे समझना भी उतना ही जरूरी है क्योंकि यही वह रस्म है जो कौशल के बचाव में आकर उसके हित में फैसला सुनाने को कोर्ट को मजबूर किया। दरअसल सप्तपदी हिंदू विवाह की सबसे महत्वपूर्ण रस्मों में से एक मानी जाती है और इसे विवाह के संपन्न होने का आधार माना गया है। यह असल में पवित्र अग्नि के चारों ओर सात फेरे लगाने की प्रक्रिया है और इन सातों फेरों को सात ऐसे वचनों का प्रतीक माना जाता है जो वर और वधू आपस में एक दूसरे को देते हैं।
इस रस्म में वर और वधू को अग्नि के सामने खड़ा किया जाता है। वर-वधू के दाहिने हाथ को अपने बाएँ हाथ में पकड़ता है और फिर दोनों एक दूसरे के सामने खड़े होकर अग्नि के चारों ओर सात फेरे लगाते हैं। हर एक फेरे के दौरान वर और वधू एक दूसरे को एक वचन देते हैं और सातवें फेरे के बाद दोनों अग्नि के चारों ओर साथ खड़े हो जाते हैं, जिसके साथ ही विवाह पूर्ण माना जाता है।
सप्तपदी के सात वचन
पहला वचन: मैं तुम्हें अपना पति/पत्नी मानता/मानती हूँ। दूसरा वचन: मैं तुम्हें अपना जीवनसाथी मानता/मानती हूँ। तीसरा वचन: मैं तुम्हारी खुशी के लिए जीने का वादा करता/करती हूँ। चौथा वचन: मैं तुम्हारी इच्छाओं का सम्मान करने का वादा करता/करती हूँ। पाँचवाँ वचन: मैं तुम्हारी रक्षा करने का वादा करता/करती हूँ। छठा वचन: मैं तुम्हें अपना जीवन भर प्यार करने का वादा करता/करती हूँ। सातवाँ वचन: मैं तुम्हारे साथ बुरे और अच्छे समय में रहने का वादा करता/करती हूँ।
निष्कर्ष: कोर्ट ने इसी सप्तपदी के आधार पर सुनाया फैसला
यही वजह है कि सप्तपदी को केवल एक रस्म नहीं बल्कि हिंदू विवाह की आत्मा माना जाता है। यह वह क्षण होता है जब वर और वधू अपने वचनों को दोहराते हुए यह प्रतिबद्धता जताते हैं कि वे अपना पूरा जीवन एक साथ बिताएँगे। कोर्ट ने अपने फैसले में इसी बात पर जोर दिया कि जब तक यह रस्म और इसके जैसी अन्य प्रथागत रीति रिवाज पूरी विधि से संपन्न नहीं होतीं, तब तक हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 के तहत विवाह को संपन्न विवाह नहीं माना जा सकता।
यही कारण था कि बेंच ने ऋग्वेद का हवाला देते हुए यह भी बताया कि सातवाँ फेरा पूरा होने के बाद वर वधू से कहता है कि सात फेरों के साथ हम मित्र बन गए हैं और यह मित्रता कभी न टूटे। कोर्ट ने इसी बुनियाद पर यह स्पष्ट किया कि मौजूदा मामले में जब खुद खुशी ने ही मान लिया कि कोई रस्में हुई ही नहीं, तो सप्तपदी जैसी कोई भी अनिवार्य प्रक्रिया कभी संपन्न ही नहीं हुई, और इसीलिए दोनों के बीच कानूनन कोई वैध विवाह अस्तित्व में आया ही नहीं। यही वह कड़ी थी जिसने आखिरकार कौशल के पक्ष में फैसला जाने का रास्ता साफ किया।
चीन का एक भगोड़ा अरबपति गुओ वेनगुई (जिसे हो वान क्वोक, गुओ माइल्स, माइल्स क्वोक और “ब्रदर सेवन” जैसे कई नामों से जाना जाता है) कई सालों तक पश्चिमी मीडिया के बीच एक नायक और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के विरोधी बागी के रूप में ऐश की जिंदगी जी रहा था। गुओ वेनगुई ने पश्चिम में इस दावे के दम पर अपने लाखों समर्थक बना लिए थे कि ‘चीनी सरकार मेरे पीछे पड़ी है’। लेकिन आखिरकार अमेरिकी फेडरल कोर्ट ने उसे अपने ही समर्थकों से 1 अरब डॉलर (करीब 83 अरब रुपए) से ज्यादा की धोखाधड़ी का दोषी पाया। 29 जून 2026 को फेडरल कोर्ट ने गुओ वेनगुई को 30 साल जेल की सजा सुनाई।
धोखाधड़ी के आरोप और गुओ वेनगुई का चीन से पलायन
गुओ वेनगुई चीन में एक रियल एस्टेट डेवलपर (जमीन-जायदाद के कारोबारी) के रूप में उभरा था। खबरों के मुताबिक, 2014 की हुन चीन के अमीरों की लिस्ट में वह 74वें नंबर पर था और उसकी संपत्ति लगभग 2.6 अरब डॉलर आँकी गई थी। जब चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ा अभियान शुरू किया, तो वेनगुई चीन छोड़कर भाग गया।
इस अभियान में वेनगुई के साथी, जिनमें पूर्व खुफिया अधिकारी मा जियान भी शामिल थे, निशाने पर आए। गुओ वेनगुई उर्फ गुओ माइल्स ने चीनी अधिकारियों की इस कार्रवाई को एक राजनीतिक साजिश बताया। उसने दावा किया कि चीनी सरकार के बड़े भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने के कारण उसे निशाना बनाया जा रहा है।
भागने के शुरुआती सालों में चीनी अधिकारियों ने उसे भगोड़ा घोषित कर दिया और उसके खिलाफ इंटरपोल नोटिस भी जारी कराया। चीन सरकार ने उस पर रिश्वतखोरी, मनी लॉन्ड्रिंग, अपनी पूर्व सहायक के साथ बलात्कार, अपहरण और अन्य गंभीर अपराधों के आरोप लगाए थे।
हांगकांग समेत कई जगहों पर वेनगुई की संपत्तियाँ सील कर दी गईं। चीन ने अमेरिका से इस जालसाज को वापस सौंपने की माँग भी की थी।
चीन में धोखेबाज, पश्चिम में बागी: बिकाऊ मीडिया की मदद से कैसे बनाई ‘एक्टिविस्ट’ की छवि
खुद को देश से बाहर रखने के दौरान गुओ वेनगुई ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के एक बड़े आलोचक के रूप में खुद को नए सिरे से पेश किया। वेनगुई ने अमेरिका सरकार की फंडिंग से चलने वाले वॉयस ऑफ अमेरिका (VoA), बीबीसी, न्यूयॉर्क टाइम्स, फाइनेंशियल टाइम्स और फोर्ब्स सहित कई बड़े पश्चिमी मीडिया घरानों को इंटरव्यू दिए। वह कई ऑडियो पॉडकास्ट में भी शामिल हुआ।
अमेरिकी मीडिया एक्जीक्यूटिव, इन्वेस्टमेंट बैंकर और व्हाइट हाउस के पूर्व रणनीतिकार स्टीव बैनन के साथ मिलकर गुओ वेनगुई ने ‘जीटीवी’ (GTV) नाम की एक मीडिया कंपनी बनाई।
साल 2018 में, स्टीव बैनन और गुओ वेनगुई ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का विरोध करने के लिए एक गैर-लाभकारी संस्था (NGO) की स्थापना की, जिसका नाम उसने ‘रूल ऑफ लॉ सोसाइटी’ (Rule of Law Society) रखा। शुरुआत में इस संस्था को गुओ वेनगुई की तरफ से 100 मिलियन डॉलर देने का वादा किया गया था।
हालाँकि जब इस संस्था के पैसों की जाँच शुरू हुई और दस्तावेज देने से इनकार किया गया, तो स्टीव बैनन ने 2021 में ‘रूल ऑफ लॉ सोसाइटी’ के बोर्ड से इस्तीफा दे दिया।
इस जोड़ी ने साल 2020 में एक लग्जरी नाव (याट) से ‘न्यू फेडरल स्टेट ऑफ चाइना’ की घोषणा की और गुओ ने दावा किया कि वह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को उखाड़ फेंकेगा। गुओ के मीडिया वेंचर्स पर कोविड की शुरुआत और अमेरिकी राजनीति को लेकर झूठी खबरें फैलाने के आरोप भी लगे और आलोचना हुई।
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को निशाना बनाने वाले अपने इस ‘एक्टिविज्म’ और मीडिया इंटरव्यूज के जरिए गुओ वेनगुई ने विदेशों में रहने वाले चीनियों और कम्युनिस्ट पार्टी के विरोधियों के बीच अपने कट्टर समर्थक तैयार कर लिए। वेनगुई ने अपने इस फर्जी एक्टिविज्म को ‘लोकतंत्र और चीनी तानाशाही के खिलाफ एक धर्मयुद्ध’ के रूप में पेश किया।
जनवरी 2025 में इस 1 अरब डॉलर के घोटाले में भूमिका के लिए गुओ की सहयोगी यवेट वांग को भी 10 साल जेल की सजा सुनाई गई थी।
अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते तनाव के दौरान, पश्चिमी मीडिया और मशहूर हस्तियों ने गुओ वेनगुई को एक हीरो की तरह पेश किया। आखिरकार अमेरिकी प्रोपेगैंडा को मजबूत करने के लिए ‘चीनी सरकार की प्रताड़ना’ का शिकार बने एक चीनी अरबपति से बेहतर और क्या हो सकता था। अमेरिका में गुओ के आगे बढ़ने की वजह चीन विरोधी आवाजों को मिलने वाला खुला समर्थन था, शायद इसी वजह से शुरुआत में उसके पुराने रिकॉर्ड की जांच नहीं की गई।
चूँकि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी विरोधियों की आवाज दबाने के लिए जानी जाती है, इसलिए पश्चिम के लोगों को वेनगुई की मनगढ़ंत कहानी बिल्कुल सच लगी।
गुओ वेनगुई उर्फ माइल्स गुओ ने हजारों फॉलोअर्स को कैसे ठगा, अमेरिकी अधिकारियों ने किया खुलासा
गुओ वेनगुई को मार्च 2023 में अमेरिकी न्याय विभाग ने इंटरनेट पर अपने हजारों फॉलोअर्स से 1 अरब डॉलर की ठगी करने की बड़ी साजिश के आरोप में गिरफ्तार किया था। यह धोखाधड़ी जीटीवी (GTV) के प्राइवेट शेयर, लोन, जी|क्लब्स (G|CLUBS) की मेंबरशिप, हिमालय फार्म और ‘हिमालय कॉइन/एक्सचेंज’ नाम की क्रिप्टोकरेंसी के जरिए की गई थी।
सरकारी वकीलों ने आरोप लगाया कि गुओ वेनगुई उर्फ माइल्स गुओ ने अपने चीन विरोधी ‘आंदोलन’ से जुड़े निवेशों पर भारी मुनाफे का वादा किया था। इसके बाद उसने इन पैसों में से करोड़ों डॉलर अपनी निजी विलासिता पर उड़ा दिए। उसने 50,000 वर्ग फुट का एक महल जैसा बंगला, एक फेरारी, 4.4 मिलियन डॉलर की बुगाटी स्पोर्ट्स कार, 37 मिलियन डॉलर की एक लग्जरी नाव (याट) और बेहद महँगे गद्दे खरीदे।
गुओ ने लंदन में रहने वाले अपने बिजनेस पार्टनर किम मिंग जे के साथ मिलकर हेज फंड में निवेश किया, 10 लाख डॉलर के कालीन और 1,40,000 डॉलर का पियानो खरीदने जैसी फिजूलखर्ची की।
अमेरिकी अधिकारियों ने इसे ‘अफ़िनिटी फ्रॉड’ (भरोसे की धोखाधड़ी) कहा, क्योंकि गुओ ने अपनी चीन विरोधी छवि का इस्तेमाल करके अपने फॉलोअर्स के भरोसे का गलत फायदा उठाया था।
गुओ की हरकतों की जाँच से पता चला कि उसने चुराए गए करोड़ों डॉलर की मनी लॉन्ड्रिंग की ताकि अपनी इस अवैध साजिश को छुपा सके और धोखाधड़ी का धंधा चालू रख सके।
साल 2021 में माइल्स गुओ उर्फ हान वो क्वोक ने अवैध रूप से फंड जुटाने के एक मामले में सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) के साथ 539 मिलियन डॉलर का समझौता किया था।
जुलाई 2024 में गुओ को जालसाजी की साजिश, ऑनलाइन धोखाधड़ी, सिक्योरिटीज धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग समेत 12 में से 9 मामलों में दोषी ठहराया गया।
आखिरकार 29 जून 2026 को गुओ वेनगुई उर्फ हान वो क्वोक को 30 साल जेल की सजा सुनाई गई और 889 मिलियन डॉलर जब्त करने का आदेश दिया गया। फैसला सुनाते समय फेडरल जज ने कहा कि गुओ वेनगुई ने उन लोगों को अपना शिकार बनाया जो चीन में लोकतंत्र चाहते थे।
मुकदमे के दौरान भी गुओ वेनगुई खुद को पीड़ित बताता रहा और उसके बचे हुए समर्थकों का दावा है कि अमेरिकी आरोप चीनी सरकार के इशारे पर लगाए गए हैं ताकि उसकी आवाज दबाई जा सके। हालाँकि वकीलों ने गुओ के इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि उनके द्वारा पेश किए गए सबूत उसके फॉलोअर्स के साथ की गई वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़े हैं, न कि किसी मनगढ़ंत राजनीतिक आरोपों से।
गुओ वेनगुई चीन में अपने कथित घोटाले की कानूनी आँच से बचकर अमेरिका भागा, पश्चिमी मीडिया की मदद से खुद को हीरो साबित करने की कहानी रची, प्रताड़ना का रोना रोया, अपनी इस ‘हीरो’ वाली कहानी को बेचकर पैसे कमाए, लोगों का ध्यान और फॉलोअर्स खींचे, और फिर उसी मंच और फॉलोअर्स के भरोसे का इस्तेमाल एक बहुत बड़े घोटाले के लिए किया।
यह याद रखना भी दिलचस्प है कि गुओ वेनगुई ने अगस्त 2019 में भविष्यवाणी की थी कि अलीबाबा के संस्थापक जैक मा या तो जेल जाएँगे या मारे जाएँगे, क्योंकि चीनी सरकार जैक मा के ‘एएनटी ग्रुप’ (ANT Group) को ‘वापस लेना यानी हड़पना’ चाहती है।
झूठी प्रताड़ना की कहानी गढ़ना, विदेश में नापसंद की जाने वाली सरकार या विचारधारा पर हमला करके फॉलोअर्स जुटाना, लोगों को ठगना और जब जवाबदेही की बारी आए तो किसी तानाशाह या फासीवादी शासन द्वारा ‘राजनीति से प्रेरित प्रताड़ना’ का रोना रोना—गुओ वेनगुई का यह मामला वॉशिंगटन पोस्ट की कॉलमनिस्ट राणा अय्यूब की याद दिलाता है।
राणा अय्यूब: भारत की गुओ वेनगुई?
राणा अय्यूब को 2016 में खुद से प्रकाशित की गई किताब ‘गुजरात फाइल्स: एनाटॉमी ऑफ ए कवर-अप’ से काफी चर्चा मिली थी। उनका दावा था कि यह किताब 2010 में गुजरात के अधिकारियों की की गई अंडरकवर रिकॉर्डिंग्स पर आधारित है, जिसमें उन्होंने 2002 के गोधरा दंगों के बाद मामलों को दबाने और एनकाउंटर की बात ‘कबूल’ की थी।
अय्यूब की तत्कालीन कंपनी ‘तहलका’ ने कहानी अधूरी होने और अन्य संपादकीय कमियों का हवाला देते हुए इसे छापने से मना कर दिया था। हालाँकि वरिष्ठ पत्रकार मधु त्रेहान ने खुलासा किया था कि उन्होंने तहलका के मंच पर इन टेपों को चलाने का ऑफर दिया था, लेकिन राणा अय्यूब ने मना कर दिया था।
इस पत्रकार ने दंगों के इर्द-गिर्द अपनी पक्षपातपूर्ण और बेतुकी पत्रकारिता के जरिए खुद को ‘हिंदुत्ववादियों के अत्याचार के खिलाफ एक निडर आवाज’ के रूप में स्थापित कर लिया।
नरेंद्र मोदी के खिलाफ लंबे समय से एजेंडा चला रहीं राणा अय्यूब को तब बड़ा झटका लगा जब सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात दंगों पर लिखी उनकी इस तथाकथित ‘खोजी’ किताब को कूड़ेदान में डाल दिया।
अय्यूब की किताब में एक इशारा यह भी था कि गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के पूर्व गृह मंत्री हरेन पंड्या की हत्या की साजिश रची थी, जिनकी 26 मार्च 2003 को अहमदाबाद में मॉर्निंग वॉक के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
निचली अदालत ने हरेन पंड्या की हत्या में मुख्य आरोपी असगर अली समेत 12 मुस्लिम पुरुषों को दोषी पाया था। सीबीआई जाँच के मुताबिक, यह हत्या गुजरात दंगों का बदला लेने के लिए मुफ्ती सूफियान नाम के एक मुस्लिम मौलवी के इशारे पर की गई थी।
गुजरात हाईकोर्ट ने सीबीआई की ‘खराब जाँच’ का हवाला देते हुए इन लोगों को हत्या के आरोपों से बरी कर दिया था, लेकिन आपराधिक साजिश और हत्या के प्रयास के आरोप बरकरार रखे थे।
सीबीआई ने हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसने आखिरकार निचली अदालत के मूल फैसले को सही ठहराया।
अय्यूब के ‘मुस्लिम विक्टिमहुड’ (मुसलमानों को पीड़ित दिखाने) के एजेंडे को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी कार्यवाही में राणा अय्यूब की किताब ‘गुजरात फाइल्स’ पर विचार करने से साफ इनकार कर दिया। अदालत ने इस किताब को फटकारते हुए कहा कि यह सिर्फ अनुमानों, अटकलों और कयासों पर आधारित है।
असल में राणा अय्यूब की किताब के दावे इतने संदिग्ध हैं कि धुर-वामपंथी (लेफ्ट विंग) पब्लिकेशंस ने भी इसे छापने से मना कर दिया था, जिसके बाद आखिरकार अय्यूब को इसे खुद ही पब्लिश करना पड़ा। यह किताब एक कथित स्टिंग ऑपरेशन पर आधारित थी, लेकिन उन्होंने कभी भी इसके वीडियो जारी नहीं किए।
अपनी इस तथाकथित प्रसिद्धि के बाद से, राणा अय्यूब लगातार विदेशी वामपंथी मीडिया आउटलेट्स और सोशल मीडिया के जरिए भारत विरोधी और हिंदू विरोधी दुष्प्रचार में लगी रही हैं। सीएए विरोधी शाहीन बाग प्रदर्शन, 2020 के दिल्ली दंगे, कोविड महामारी के दौरान सरकार विरोधी दुष्प्रचार, हर मुद्दे में मुस्लिम उत्पीड़न का एंगल घुसाना, ‘भारतीय सेना कश्मीरी लड़कों को प्रताड़ित कर रही है’ जैसे झूठ फैलाना, 2015 में रानाघाट में एक नन के साथ हुए बलात्कार के लिए आरएसएस और ‘हिंदू आतंकवादियों’ को जिम्मेदार ठहराना राणा अय्यूब की ‘पत्रकारिता’ हमेशा एजेंडा और भाजपा-आरएसएस के विरोध पर टिकी रही है।
उनके इस दुष्प्रचार ने उन्हें वामपंथी और कुछ खास विचारधारा वाले हलकों में लोकप्रिय बना दिया। लेकिन जो बात राणा अय्यूब को गुओ वेनगुई के जैसा बनाती है, वह है कोविड के नाम पर चंदा जुटाने का कथित घोटाला, जिसे अंजाम देने का उन पर आरोप है।
जब भारत कोविड महामारी से जूझ रहा था, तब राणा अय्यूब ने ‘केटो’ (Ketto) प्लेटफॉर्म पर 3 क्राउडफंडिंग अभियानों के जरिए ₹2,69,50,695 की भारी-भरकम रकम जुटाई थी।
राणा को मिले हुए ₹2.69 करोड़ में से लगभग ₹80,49,856 विदेशी मुद्रा में प्राप्त हुए थे, जो फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) 2010 का सीधा उल्लंघन था।
दिलचस्प बात यह है कि राणा अय्यूब ने कोविड राहत कार्य के लिए मिलने वाले इस चंदे को अपने पिता मोहम्मद अय्यूब शेख के बैंक खाते में ₹1.60 करोड़ और अपनी बहन इफ्फत शेख के खाते में ₹37.15 लाख ट्रांसफर करवाए।
इसके बाद राणा अय्यूब ने अपने पिता के खाते से ₹84.40 लाख और अपनी बहन के खाते से ₹36.40 लाख अपने निजी बैंक खाते में ट्रांसफर कर लिए। कुल मिलाकर करीब ₹1,20,80,000 राणा अय्यूब के निजी खाते में भेजे गए।
हैरानी की बात यह है कि अप्रैल 2022 में उन्होंने इतनी बड़ी रकम के हेरफेर को ‘महज 20,000 डॉलर की छोटी सी रकम’ कहकर टालने की कोशिश की, जबकि असल में यह रकम ₹2.69 करोड़ (लगभग $3,14,500) थी।
जुलाई 2025 के अपने आदेश में इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) ने साफ कहा कि चंदे के तौर पर जुटाए गए पैसों में से करीब ₹2.4 करोड़ का अभियान के एक साल बाद भी कोई इस्तेमाल नहीं किया गया था।
अदालत ने कहा, “जिस खाते से करदाता या उसके परिवार के सदस्यों द्वारा पैसे निकाले गए, वह एक पर्सनल सेविंग अकाउंट (निजी बचत खाता) था। इसके अलावा, कोई राहत कार्य करने के बजाय, करदाता ने एक नया करंट अकाउंट खोला और अपने नाम पर फिक्स डिपॉजिट (FD) कर लिया और उसी सेविंग अकाउंट से अपने निजी खर्चे भी किए जिसमें चंदे का पैसा आया था।”
अय्यूब ने आयकर विभाग के सामने दावा किया था कि ₹2.69 करोड़ में से एक ‘छोटा हिस्सा (₹28 लाख)’ प्रवासी मजदूरों को घर भेजने, राशन खरीदने, इलाज, परिवहन और पश्चिम बंगाल के बाढ़ पीड़ितों के लिए तिरपाल खरीदने में खर्च किया गया था।
उन्होंने ₹19 लाख अपने ‘निजी खर्चों’ को पूरा करने में उड़ा दिए। यह भी सामने आया कि इस विवादित ‘पत्रकार’ ने कोविड राहत कार्य के लिए मिले पैसों में से ₹50 लाख की अपने नाम पर पर्सनल फिक्स डिपॉजिट (FD) करवा ली थी।
आयकर विभाग ने सवाल उठाया कि अगर अय्यूब की कोई गलत नीयत नहीं थी, तो उन्होंने अपने निजी नाम पर ₹50,00,000 की एफडी रसीदें क्यों खरीदीं?
जाँच में पता चला कि केटो पर पहले अभियान के जरिए राणा अय्यूब को मिले ₹1.23 करोड़ में से राहत कार्य के लिए सिर्फ ₹18 लाख का इस्तेमाल किया गया था। अपने बचाव में अय्यूब ने दावा किया कि बचे हुए पैसे ‘अस्पताल बनाने के लिए रिजर्व’ रखे गए थे।
इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल ने यह भी पाया कि राणा अय्यूब ने एफसीआरए (FCRA) 2010 का उल्लंघन किया है, क्योंकि वॉशिंगटन पोस्ट की यह ‘पत्रकार’ एफसीआरए की धारा 3(1)(h) के तहत विदेशी चंदा पाने की हकदार ही नहीं है।
अय्यूब ने समर्थकों, झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों और किसानों से कोविड राहत के नाम पर चैरिटी के लिए पैसे जुटाए, लेकिन चैरिटी के लिए इन पैसों के इस्तेमाल का कोई सबूत नहीं मिला। इस विवादित ‘पत्रकार’ ने दान का पैसा अपने रिश्तेदारों के बैंक खातों में जमा कराया और कथित सामाजिक कार्यों के लिए कोई अलग खाता तक नहीं रखा।
इससे पहले, फरवरी 2022 में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अय्यूब की ₹1.77 करोड़ की संपत्ति कुर्क की थी। वह जाहिर तौर पर अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार करती हैं और इसे अपनी आवाज दबाने के लिए राजनीति से प्रेरित उत्पीड़न बताती हैं।
चूंकि राणा अय्यूब की पत्रकारिता के नाम पर किए जाने वाले इस एक्टिविज्म और चंदे की धोखाधड़ी के आरोपों के कारण पश्चिमी वामपंथी मीडिया आउटलेट्स ने भी उनसे दूरी बना ली, फिर भी उन्हें विदेशी वामपंथी और कुछ राजनीतिक हलकों में नियोक्ता और समर्थक मिल गए, जो वैचारिक रूप से मोदी सरकार के विरोधी हैं।
अय्यूब को कई ‘प्रेस फ्रीडम अवॉर्ड’ मिले हैं और उन्हें ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’, ‘सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस’, ‘एमनेस्टी’ और संयुक्त राष्ट्र (UN) के दूतों जैसे संगठनों का समर्थन मिला है।
ठीक गुओ वेनगुई की तरह राणा अय्यूब को भी पश्चिम में सरकारों के खिलाफ खड़े होने वाले एक ‘निडर बागी’ के रूप में सराहा गया। उन्होंने भी रोना रोया कि ‘सच बोलने की वजह से सरकार मुझे प्रताड़ित कर रही है’। हालाँकि देर-सवेर असली सच्चाई सामने आ ही जाती है।
(ये रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
भारत से नफरत करने के अलावा पाकिस्तान को अब एक नया चस्का लग गया है। वह प्राचीन भारत के इतिहास को अपना बताने में जुट गया है। यह वही इतिहास है जो पूरी तरह से हिंदू धर्म और संस्कृति से जुड़ा हुआ है। हैरानी की बात यह है कि पाकिस्तान का जन्म ही इस्लाम से पहले के इतिहास (यानी हिंदू अतीत) को पूरी तरह नकारने के आधार पर हुआ था।
लेकिन अब वही पाकिस्तानी सरकार अपने फायदे के लिए उसी अतीत को जबरन अपनाने की कोशिश कर रही है। ऐसा करके वह दुनिया में खुद को जायज साबित करना चाहती है। वह एक ऐसा इतिहास दिखाना चाहती है, जिसका असलियत में कोई वजूद ही नहीं है।
‘तुर्की खून’ से लेकर ‘चाणक्य हमारे पूर्वज’ तक: पहचान के संकट में फँसा पाकिस्तान; अब भारतीय इतिहास पर जता रहा झूठा हक
पाकिस्तान इन दिनों अपनी पहचान के सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है। दशकों तक पाकिस्तानी खुद को अरब, तुर्क, फारसी या मध्य एशियाई देशों के वंशज बताते रहे। वे खुद को विदेशी और ‘शुद्ध’ मुस्लिम दिखाने की कोशिश करते थे।
साल 1977 से जनरल जिया-उल-हक का दौर शुरू हुआ। उनके शासनकाल में पाकिस्तान के इतिहास और संस्कृति को पूरी तरह बदलने का काम किया गया। जिया सरकार ने स्कूली किताबों (इस्लामियात और पाकिस्तान स्टडीज) के सिलेबस में बदलाव किए। इसका मकसद बच्चों के दिमाग में जबरन एक अरबी-इस्लामिक पहचान को बिठाना था।
असलियत यह है कि वहाँ के बहुसंख्यक मुसलमानों के पूर्वज हिंदू ही थे। लेकिन कट्टरपंथ के कारण वे अपने इसी हिंदू अतीत से नफरत करने लगे। उन्होंने उस इतिहास से अपना हर रिश्ता तोड़ने की पूरी कोशिश की। अब वही पाकिस्तान बिल्कुल अलग राग अलाप रहा है।
वह सिंधु घाटी सभ्यता, पाणिनी, चाणक्य और राजा पोरस पर अपना हक जता रहा है। वह इस पूरे इतिहास से ‘हिंदू’ शब्द को गायब कर देना चाहता है। ऐसा करके पाकिस्तान एक झूठी और बनावटी ‘प्राचीन पाकिस्तानी’ पहचान गढ़ने की हताश कोशिश कर रहा है।
पाकिस्तानी लोग सोशल मीडिया पर भी अजीबोगरीब और मजाकिया दावे कर रहे हैं। हाल ही में एक पाकिस्तानी एक्स (X) यूजर ने BBC हिंदी का एक वीडियो शेयर किया। इसमें एक पाकिस्तानी मुस्लिम प्रोफेसर संस्कृत पढ़ाते नजर आ रहे हैं। इस Video को शेयर करते हुए यूजर ने दावा कर दिया कि संस्कृत भारत की भाषा ही नहीं है। उसने लिखा कि पाणिनी ने संस्कृत को पाकिस्तान के गांधार में तैयार किया था। उसने यह बेतुका दावा भी किया कि भारतीय लोग संस्कृत और अंग्रेजी दोनों का गलत उच्चारण करते हैं।
गायत्री मंत्र न जानने वाले भी अब संस्कृत पर जता रहे हक: ‘साउथ एशिया’ के नाम पर भारत की हिंदू विरासत चुराने का नया खेल
पाकिस्तानी मुस्लिम बिना गलती किए गायत्री मंत्र का पाठ तक नहीं कर सकते। गूगल किए बिना तो उन्हें यह भी नहीं पता होगा कि यह मंत्र क्या है। इसके अलावा, इस्लाम से थोड़ा भी भटकने पर उन्हें ‘सर तन से जुदा’ होने का खौफ रहता है। लेकिन इसके बावजूद, एक पाकिस्तानी यूजर ने बड़े दुस्साहस के साथ दावा कर दिया कि संस्कृत भारत की भाषा नहीं है। उसका तर्क है कि पाणिनी ने संस्कृत को गांधार में तैयार किया था, जो अब उत्तर-पश्चिम पाकिस्तान में है।
इस तरह के दावों को देखकर किसी भी हिंदू या भारतीयों को एक साथ हँसी और गुस्सा दोनों आ सकते हैं। BBC के Video में दिख रहे प्रोफेसर डॉ राशिद शाहिद ने संस्कृत को ‘साउथ एशिया (दक्षिण एशिया) की साझी विरासत’ बताया है। भारतीय लोग अब बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि जब भी पाकिस्तानी- चाहे वे अच्छे इरादे वाले ही क्यों न दिखें, ‘साउथ एशिया’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो उसका असली मतलब क्या होता है।
साजिश बहुत सीधी है। इतिहास, संस्कृति या धर्म के लिहाज से जो कुछ भी हिंदू और भारतीय है, उस पर ‘साउथ एशिया’ का लेबल लगा दो। ऐसा करने के बाद, भारत और हिंदुओं से नफरत करने वाले पाकिस्तानी और कभी-कभी बांग्लादेशी मुस्लिम भी उस विरासत को आसानी से अपना बताकर हड़प लेते हैं।
‘पाणिनी को पाकिस्तानी’ बताने की बचकानी जिद: अष्टाध्यायी में लिखा था ‘भारत’ का नाम
पाकिस्तानी लोग आजकल प्राचीन भारत के इतिहास पर कुछ ज्यादा ही प्यार लुटा रहे हैं। लेकिन वे एक छोटी सी बात भूल जाते हैं। पाणिनी ने जब अपनी किताब ‘अष्टाध्यायी’ लिखी, उससे हजारों साल पहले ही संस्कृत में वेद लिखे जा चुके थे। शुरू में संस्कृत सिर्फ पूजा-पाठ और मंत्र बोलने की भाषा थी।
बाद में यह हिंदू धर्म और साहित्य की एक मजबूत भाषा बन गई। पाणिनी ने संस्कृत को नियम और सही ढांचा दिया, यह सच है। लेकिन सिर्फ इसलिए संस्कृत को पराया बता देना कि पाणिनी गांधार (जो अब पाकिस्तान में है) के रहने वाले थे, बिल्कुल बेवकूफी है। इंटरनेट पर एक पाकिस्तानी यूजर ने तो पाणिनी को ही पाकिस्तानी बता दिया।
पाकिस्तानी यूजर ने लिखा, “संस्कृत के सबसे महान ज्ञानी पाणिनी एक पाकिस्तानी थे। आज आप जिस संस्कृत पर इतराते हैं, उसे एक पाकिस्तानी ने ही ठीक किया था।” यह देखना वाकई मजेदार है कि जो पाकिस्तान अपने कानून के तहत किसी हिंदू को प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनने नहीं देता, वही आज एक हिंदू ब्राह्मण पाणिनी को अपना बताने के लिए मरा जा रहा है।
वह पाणिनी के नाम से ‘हिंदू’ और ‘भारतीय’ पहचान को गायब करना चाहता है। असल में पाकिस्तान की उम्र सिर्फ 78 साल है, इसलिए वह खुद को पुराना दिखाने के लिए ऐसी अजीब हरकतें कर रहा है। पाणिनी ने अपनी किताबों में भारत के कोने-कोने का जिक्र किया है। लेकिन पाकिस्तानियों की फूटी किस्मत देखिए, पाणिनी ने अपनी किसी भी किताब में ‘पाकिस्तान’ शब्द का नाम तक नहीं लिया।
पाणिनी ने उस समय के पूरे देश को ‘भारत’ कहा था। आज भी हमारा देश इसी नाम का इस्तेमाल करता है। सच तो यह है कि ‘भारत’ शब्द का पहला लिखित सबूत ही पाणिनी की किताब ‘अष्टाध्यायी’ के एक श्लोक ‘नद्व्यचःप्राच्यभरतेषु’ (4.2.113) में मिलता है। पाणिनी ने ‘पूर्वी भारत’ और ‘उत्तरी भारत’ की बात की थी, किसी ‘पूर्वी या उत्तरी पाकिस्तान’ की नहीं।
आपके मन में भी यह सवाल जरूर आया होगा कि क्या पाकिस्तानियों को खुद यह बात नहीं पता? वे अच्छी तरह जानते हैं कि ‘पाकिस्तान’ शब्द का कोई प्राचीन इतिहास नहीं है। यह नाम नया है। लेकिन सब कुछ जानते हुए भी वे इंटरनेट पर झूठ फैला रहे हैं।
जब पाकिस्तानी मुस्लिम सोशल मीडिया पर ‘पाणिनी एक पाकिस्तानी थे’ जैसा सफेद झूठ बेचते हैं, तो उनकी असलियत सामने लाना बहुत जरूरी हो जाता है। ऐसे में इतिहास के सही तथ्यों के साथ उनका थोड़ा मजाक उड़ाना और उन्हें आईना दिखाना बिल्कुल लाजिमी है।
त्रिपुंडधारी ब्राह्मण पाणिनी और चाणक्य को ‘पाकिस्तानी’ बताने की अजीब जिद
पाकिस्तानी यूजर ने पाणिनी का जो उदाहरण शेयर किया है, वह उनकी एक बहुत बड़ी कमजोरी को दिखाता है। पाकिस्तानी मुसलमानों की सोच में यही सबसे बड़ा खोट है। वे सोचते हैं कि आज के भूगोल के हिसाब से प्राचीन भारत के सभी ऐतिहासिक लोग, चाहे उनका धर्म कोई भी हो, ‘प्राचीन पाकिस्तानी’ बन जाते हैं।
माथे पर त्रिपुंड लगाने वाले एक हिंदू ब्राह्मण और संस्कृत के महाज्ञानी पाणिनी की मेज पर पाकिस्तान का ‘चांद-तारा’ वाला झंडा दिखाना बेहद अजीब और मजाकिया है। पाणिनी खुशनसीब थे कि वे उस दौर में पैदा हुए जब इस्लाम या पाकिस्तान जैसा कुछ था ही नहीं। पाकिस्तान खुद को ‘रियासत-ए-मदीना’ कहता है और काफिरों, खासकर मूर्तिपूजक हिंदुओं से नफरत करता है।
लेकिन चूंकि उनके पास जिहादी आतंकियों के अलावा अपना कोई ऐतिहासिक हीरो नहीं है, इसलिए वे प्राचीन भारत के हिंदुओं को जबरन ‘पाकिस्तानी’ बनाने में जुटे हैं। पाणिनी की लिखी ‘अष्टाध्यायी’ वेदों के छह अंगों (वेदांग) में से एक है। वेद हिंदू सनातन धर्म के सबसे पवित्र ग्रंथ हैं। इतिहास में इस्लामिक आक्रमणकारियों ने इन्हें पूरी तरह मिटाने और नष्ट करने की बहुत कोशिश की।
हालाँकि, समय से परे मौजूद इन वेदों को खत्म करना नामुमकिन है। भारतीय हिंदू हस्तियों को जबरन पाकिस्तानी बताने का यह मजाक यहीं नहीं रुका। अब वे महान राजनीतिक रणनीतिकार और चंद्रगुप्त मौर्य के गुरु, आचार्य चाणक्य के पीछे भी पड़ गए हैं। इसी सिलसिले में एक पाकिस्तानी एक्स (X) यूजर ने लिखा, “महान चाणक्य ने पाकिस्तान की तक्षशिला यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की थी। वहाँ मिले ज्ञान ने ही उन्हें इतिहास का सबसे बड़ा रणनीतिकार बनाया, जिससे उन्होंने चंद्रगुप्त मौर्य को मौर्य साम्राज्य खड़ा करने में मदद की। आज भी उनके विचार राजनीति और शासन को प्रभावित करते हैं।”
अब कुछ पाकिस्तानी यूजर इस हद तक नासमझी दिखा रहे हैं कि वे ईसा पूर्व चौथी सदी की ‘तक्षशिला’ को ‘पाकिस्तानी यूनिवर्सिटी’ बता रहे हैं, जबकि उस दौर में न तो इस्लाम मजहब था और न ही पाकिस्तान नाम का कोई मुल्क।
हद तो तब हो गई जब इंटरनेट पर एक यूजर ने बिना किसी ऐतिहासिक सबूत के पंजाब के महान राजा पोरस (राजा पुरुषोत्तम) को जबरन एक बौद्ध राजा घोषित कर दिया और सोशल मीडिया पर इस सफेद झूठ को सच साबित करने की बचकानी जिद पर अड़ गया।
राजा पुरुषोत्तम (राजा पोरस) एक महान प्राचीन भारतीय राजा थे। उन्होंने झेलम (वितस्ता) और चिनाब (असीकनी) नदियों के बीच के इलाके पर राज किया था। उन्होंने ईसा पूर्व 326 में झेलम नदी के किनारे सिकंदर के बढ़ते कदमों को रोक दिया था। हालाँकि राजा पोरस के धर्म को लेकर बहुत ज्यादा विवरण नहीं मिलते। लेकिन सभी इतिहासकार मानते हैं कि वे वैदिक धर्म यानि हिंदू धर्म के अनुयायी थे।
गंगा घाटी से नफरत और पाकिस्तान का अधूरा ज्ञान
भारत के गंगा मैदानी इलाके से नफरत करने वाले पाकिस्तानियों ने तुरंत राजा पोरस को ‘बौद्ध’ घोषित कर दिया। वे यह भूल गए कि बौद्ध धर्म की शुरुआत भी भारत के इसी पूर्वी गंगा मैदान (बिहार-यूपी) से हुई थी। वे इस बात को नहीं जानते या जानबूझकर नजरअंदाज करते हैं कि बौद्ध धर्म सम्राट अशोक के काल के बाद ही उत्तर-पश्चिम (आज के पाकिस्तान वाले इलाके) में ठीक से फैला था। लेकिन पाकिस्तानी तो मनगढ़ंत प्रोपेगेंडा चलाने में माहिर हैं। उनके लिए इतिहास के तथ्य मायने नहीं रखते, बल्कि उनका झूठा नैरेटिव सबसे ऊपर रहता है।
सोशल मीडिया पर ऐसे झूठे दावों की बाढ़ आई हुई है। पाकिस्तान की प्रोपेगेंडा विंग (ISPR) के बॉट्स मिलकर एक सोची-समझी साजिश चला रहे हैं। इनका मकसद प्राचीन भारत के हिंदू इतिहास को चुराकर एक नकली ‘प्राचीन पाकिस्तान’ की विरासत तैयार करना है। खुद को दूसरों से बेहतर दिखाने के लिए पाकिस्तानी अब एक नया पैंतरा अपना रहे हैं। वे ‘सिंधु घाटी बनाम गंगा घाटी’ का एक फर्जी विवाद पैदा कर रहे हैं।
वे गंगा घाटी के इतिहास और संस्कृति को सिंधु घाटी से कमतर या घटिया दिखाने की कोशिश में जुटे हैं। वे जानबूझकर ‘हम बेहतर और तुम खराब’ की सोच फैला रहे हैं। ऐसा करके वे सिंधु घाटी सभ्यता पर अपना झूठा हक जताना चाहते हैं। इस साजिश के जरिए वे ‘अखंड प्राचीन भारत’ के ऐतिहासिक और भौगोलिक वजूद को ही मिटाना चाहते हैं। इस दिशा में उनका पहला कदम भारतीय उपमहाद्वीप (Indian Subcontinent) की जगह जबरन ‘साउथ एशिया’ शब्द को बढ़ावा देना था।
इतिहास को अपनाने से लेकर चुराने तक का खेल: पाकिस्तान ने सिंधु घाटी सभ्यता पर क्यों बढ़ा लालच?
यह बेहद अजीब और चौंकाने वाला है। साल 1947 में पाकिस्तान ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ (टू-नेशन थ्योरी) के आधार पर बना था। तब कहा गया था कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग देश हैं और वे कभी साथ नहीं रह सकते। लेकिन आज वही पाकिस्तानी लोग प्राचीन भारत के हिंदुओं और उनके महान कामों पर अपना हक जताने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। उनका तर्क है कि ये हस्तियाँ जिस जगह पैदा हुईं या जहाँ उन्होंने काम किया, वह इलाका अब आधुनिक पाकिस्तान में आता है, इसलिए वे ‘प्राचीन पाकिस्तानी’ थे।
आइए कुछ सच बिल्कुल साफ-साफ समझ लेते हैं। यह सच है कि सिंधु घाटी सभ्यता (सिंधु-सरस्वती सभ्यता) के कुछ बड़े मुख्य हिस्से जैसे हड़प्पा और मोहनजोदड़ो आज के पाकिस्तान में हैं। तक्षशिला और पाणिनी का जन्मस्थान (अटक का शालातुला) भी वहीं है। लेकिन कड़वा सच यह है कि पाकिस्तान इन ऐतिहासिक जगहों की ठीक से देखभाल नहीं करता है। इसके उलट, भारत में सिंधु घाटी सभ्यता की 2,000 से ज्यादा जगहें हैं और भारत सरकार उन्हें बहुत अच्छे से संभालकर रखती है। एक मजेदार तथ्य यह भी है कि इस प्राचीन सभ्यता की लगभग 60% जगहें आज के भारत में ही मौजूद हैं।
भारतीय लोगों या भारत सरकार ने इस भौगोलिक सच से कभी इनकार नहीं किया है। लेकिन पाकिस्तानियों की चालाकी यह है कि वे इन जगहों को जबरन एक नकली ‘प्राचीन पाकिस्तान’ के रूप में दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। पाकिस्तानी लोग अक्सर ऐसे इतिहासकारों का सहारा लेते हैं जो कट्टरपंथी सोच के हैं। वे इन लोगों की मदद से सिंधु घाटी सभ्यता से हिंदू धर्म के गहरे जुड़ाव को पूरी तरह मिटाना चाहते हैं।
पाकिस्तान का अकेला मकसद यही है कि किसी भी तरह भारत को उसकी पुरानी जड़ों से अलग कर दिया जाए। वे यह साबित करना चाहते हैं कि भारत की सभ्यता कहीं और से उधार ली गई है, ताकि भारतीयों के मन में अपनी संस्कृति को लेकर हीनभावना पैदा हो सके। इसी साल (2026) मई में भारत के संस्कृति मंत्रालय ने हमारी अटूट सभ्यता का एक बड़ा सबूत दुनिया के सामने रखा।
मंत्रालय ने ‘पशुपति सील’ (मोहर) का जिक्र किया। यह मोहर अखंड भारत के समय मोहनजोदड़ो में मिली थी। पत्थर से बनी यह मोहर करीब 4,300 साल पुरानी है। इसमें एक योगी की मूर्ति है जो योग मुद्रा (मूलबंधासन) में बैठी है। इसे भगवान शिव का ‘पशुपति’ रूप माना जाता है, जिनके चारों तरफ जानवर मौजूद हैं।
संस्कृति मंत्रालय ने साफ शब्दों में कहा, “भले ही ये प्राचीन जगहें आज की नई सीमाओं के पार चली गई हों, लेकिन भारत आज भी इस विरासत का असली और जिंदा रखवाला है। पशुपति सील में दिखने वाली योग मुद्रा, भगवान शिव का प्रतीक और आध्यात्मिक सोच आज भी भारत के मंदिरों, रोज की पूजा-पाठ और योग परंपराओं में पूरी तरह जिंदा है। वैदिक काल से लेकर आज के आधुनिक भारत तक, हमारी सभ्यता की यह कड़ी कभी नहीं टूटी। यह हमारे विचारों, रीति-रिवाजों और हमारी आत्मा में गहराई से बसी हुई है।”
भारत के संस्कृति मंत्रालय के बयान के तुरंत बाद, देश-विदेश का एक खास वामपंथी और कट्टरपंथी बुद्धिजीवियों का गुट (कैबाल) मैदान में कूद पड़ा। इस पूरे गैंग का एक ही मकसद था, किसी भी तरह सिंधु घाटी सभ्यता से वैदिक हिंदू धर्म के जुड़ाव को पूरी तरह नकार दिया जाए।
भारत से नफरत करने वाली और क्रूर मुगल शासक औरंगजेब की प्रशंसक ऑड्रे ट्रुशके ने इस मामले पर सोशल मीडिया पर जहर उगला। उसने लिखा, “यह भगवान शिव की मूर्ति नहीं है। इसकी जगह यह एक यूरेशियन देवता (पशुओं के भगवान) को दिखाने वाले प्रोटो-एलामाइट प्रतीकों से प्रभावित कोई आकृति हो सकती है।”
इस वामपंथी गुट ने इतिहास के स्थापित सच को झुठलाने के लिए तुरंत अपनी पूरी ताकत झोंक दी। वे यह मानने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं कि मोहनजोदड़ो में मिली पशुपति सील का संबंध सीधे तौर पर सनातन धर्म और भगवान शिव से है।
इतिहासकार जॉन मार्शल को भी नकारने लगा पाकिस्तान: वामपंथियों के सहारे भारत विरोधी प्रोपेगेंडा
ऑड्रे ट्रुशके के इसी बेतुके दावे का सहारा लेकर कई पाकिस्तानी यूजर्स भारत के संस्कृति मंत्रालय के पोस्ट पर आकर रोना रोने लगे। वे ब्रिटिश इतिहासकार सर जॉन मार्शल को भी गलत बताने लगे। जॉन मार्शल ने साल 1931 में अपनी किताब ‘मोहनजो-दड़ो एंड द इंडस सिविलाइजेशन’ में साफ लिखा था कि पशुपति सील असल में ऐतिहासिक भगवान शिव का ही शुरुआती रूप है।
सिंधु घाटी सभ्यता के कई बड़े और मुख्य हिस्से जैसे कालीबंगा (राजस्थान), बनावली और राखीगढ़ी (हरियाणा), धोलावीरा और लोथल (गुजरात) आज के भारत में मौजूद हैं। ये सभी जगहें घग्गर-हकरा नदी तंत्र, यानी पौराणिक सरस्वती नदी के किनारे बसी हुई थीं। इससे साफ पता चलता है कि इस पूरी सभ्यता के विकास में एक बहुत बड़ी नदी का सहारा था। यही वजह है कि इतिहासकार इसे ‘सिंधु-सरस्वती सभ्यता’ भी कहते हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पूर्व महानिदेशक और मशहूर पुरातत्वविद् ब्रज बासी लाल (BB लाल) ने भी एक अहम बात बताई थी। उन्होंने सबूतों के साथ कहा था कि हड़प्पा संस्कृति की ज्यादातर जगहें सिंधु नदी के पास नहीं, बल्कि सरस्वती नदी के रास्ते पर बसी थीं। इससे साबित होता है कि सरस्वती नदी ही इस सभ्यता का मुख्य केंद्र थी। इसके अलावा, राजस्थान के कालीबंगा में हुई खुदाई के दौरान प्राचीन वैदिक यज्ञ वेदियाँ, हवन कुंड और यूप (यज्ञ स्तंभ) मिले हैं। ये चीजें साफ इशारा करती हैं कि वैदिक संस्कृति और सिंधु घाटी सभ्यता के बीच एक अटूट धार्मिक और सांस्कृतिक रिश्ता था।
भारत और विदेशों के कुछ पक्षपाती इतिहासकारों ने जानबूझकर सरस्वती नदी को ‘काल्पनिक’ (एक मिथक) बताकर खारिज कर दिया। पुख्ता रिसर्च और नई खोजों के बावजूद उन्होंने ऐसा किया। उनका एकमात्र मकसद हिंदू धर्मग्रंथों, खासकर वेदों को ऐतिहासिक रूप से सच्चा और भरोसेमंद मानने से रोकना था।
इतिहासकारों के इस पक्षपात का पूरा फायदा पाकिस्तान उठा रहा है। कुछ पाकिस्तानी हर कीमत पर तथ्यों को झुठलाने में लगे हैं। वे सिंधु-सरस्वती सभ्यता के अवशेषों में साफ दिखने वाली हिंदू और वैदिक संस्कृति की कड़ियों को तोड़ना चाहते हैं। हालाँकि, वैज्ञानिक खोजों ने उनका झूठ पकड़ लिया है। हाल ही में राजस्थान के डीग जिले के बहज गाँव में जमीन से 23 मीटर नीचे एक प्राचीन नदी का रास्ता (पैलियोचैनल) दबा हुआ मिला है, जो इस सभ्यता के सच को साबित करता है।
बात सिर्फ ‘पाकिस्तान’ नाम की नहीं है। साल 1947 से पहले दुनिया के नक्शे पर पाकिस्तान नाम का कोई राजनीतिक वजूद था ही नहीं। इसलिए, ‘प्राचीन पाकिस्तान’ जैसी किसी भी चीज के होने का तो सवाल ही नहीं उठता। इसके लिए सही शब्द सिर्फ ‘प्राचीन भारत’ या प्राचीन अखंड भारत का इतिहास ही है। भारतीय इतिहासकार आज के पाकिस्तान में मौजूद सिंधु घाटी सभ्यता के हिस्सों को प्राचीन भारतीय इतिहास का ही भाग मानते हैं। पाकिस्तान चाहे कितना भी मनगढ़ंत प्रोपेगेंडा कर ले, या एक ही झूठ को बार-बार सच बताने की हिटलर के मंत्री गोएबल्स जैसी चालें चल ले, इतिहास का सच कभी नहीं बदलेगा।
सिर्फ 93 साल पुराना है ‘पाकिस्तान’ शब्द का इतिहास
भले ही द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (टू-नेशन थ्योरी) की जड़ें 19वीं सदी में सर सैयद अहमद खान के विचारों में मिलती हैं, जिन्होंने मुसलमानों के लिए अलग मुल्क की वकालत की थी। लेकिन ‘पाकिस्तान’ शब्द पहली बार साल 1933 में चौधरी रहमत अली खान ने गढ़ा था। उन्होंने इस नाम को पाँच इलाकों को मिलाकर एक शॉर्ट फॉर्म (अक्रोनिम) के रूप में बनाया था। इसमें ‘P’ का मतलब पंजाब, ‘A’ का अफगानिया (खैबर पख्तूनख्वा), ‘K’ का कश्मीर, ‘S’ का सिंध और ‘tan’ का मतलब बलूचिस्तान था।
आज के पाकिस्तानी तर्क देते हैं कि चूंकि पाकिस्तान के नाम में इन पाँचों क्षेत्रों के नाम शामिल थे, इसलिए इन इलाकों का ‘प्राचीन’ इतिहास स्वाभाविक रूप से पाकिस्तान का ही है। ऐसा कहते हुए वे बड़ी चालाकी से इस सच को छुपा जाते हैं कि चौधरी रहमत अली का पाकिस्तान किसी धर्मनिरपेक्ष देश की सोच नहीं था। वे तो केवल और केवल मुसलमानों के लिए एक अलग, स्वतंत्र और संप्रभु मुल्क बनाना चाहते थे।
पिछले 70 से ज्यादा सालों से पाकिस्तान के स्कूलों के सिलेबस, वहाँ के नेताओं के भाषणों, मीडिया और यहाँ तक कि मनोरंजन उद्योग में भी हमेशा इस्लामिक आक्रमणों का गुणगान किया गया। वहाँ की आम मुस्लिम जनता को झूठा दिलासा दिया गया कि वे तुर्क, अरब या अन्य ‘लड़ाकू नस्लों’ के वंशज हैं और उनका हिंदुओं से कोई लेना-देना नहीं है। जबकि असलियत यह है कि एक अदद DNA टेस्ट ही उन्हें उनके इस ‘असहज’ कर देने वाले सच से रूबरू करा सकता है कि उनके पूर्वज हिंदू ही थे। वे आज भी 8वीं शताब्दी में मोहम्मद बिन कासिम द्वारा सिंध पर किए गए हमले को पाकिस्तानी मुसलमानों के लिए एक महान और जश्न मनाने वाला ऐतिहासिक पल बताते हैं।
असल में, पाकिस्तान के स्कूलों की इतिहास की किताबों और वहाँ के देशभक्ति के गानों में हिंदू राजाओं को हमेशा विलेन की तरह दिखाया जाता है। ‘आओ बच्चों सैर कराएँ तुमको पाकिस्तान की’ जैसे मशहूर गानों में सिंध के हिंदू राजा दाहिर की छवि को बेहद खराब करके पेश किया गया है। इसके उलट, वे मोहम्मद बिन कासिम के क्रूर हमले को पाकिस्तान के इतिहास की एक शानदार शुरुआत बताते हैं। वे ऐसा दिखाते हैं जैसे बिन कासिम के आने से ही वहाँ सभ्यता की शुरुआत हुई थी।
पाकिस्तानी सरकार और वहाँ की आम जनता हिंदुओं से नफरत के चलते मोहम्मद घोरी और सोमनाथ मंदिर को तोड़ने वाले ‘बुतशिकन’ (मूर्तियाँ तोड़ने वाले) महमूद गजनवी जैसे जिहादी हमलावरों का खूब गुणगान करती है। हिंदुओं के प्रति यह नफरत उनकी धार्मिक और राजनीतिक सोच में बहुत गहराई तक धँसी हुई है। यही वजह है कि मुसलमानों के लिए एक अलग मुल्क (पाकिस्तान) लेने, वहाँ के हिंदू अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करने और अनगिनत मंदिरों को तोड़ने के बाद भी उनकी नफरत शांत नहीं हुई है। वे आज भी उस हिंदू धर्म से नफरत करते हैं, जिसे कभी उनके खुद के पूर्वज मानते थे।
पाकिस्तान का दोहरापन देखिए, एक तरफ तो वे पाणिनी, आचार्य चाणक्य और राजा पोरस जैसी प्राचीन हिंदू सनातन हस्तियों पर अपना हक जताते हैं। दूसरी तरफ, वे अपनी मिसाइलों के नाम गजनवी, घोरी और अब्दाली जैसे क्रूर इस्लामिक आक्रमणकारियों के नाम पर रखते हैं। ये वही हमलावर थे जिन्होंने भारतीय जमीनों को बेरहमी से लूटा और उजाड़ा। उन्होंने उस इलाके की धन-दौलत भी लूटी जो आज पाकिस्तान का हिस्सा है। इन लुटेरों ने आज के भारतीयों और पाकिस्तानियों के सांझे हिंदू, बौद्ध, सिख और जैन पूर्वजों पर भयंकर जुल्म ढाए थे, उनका कत्लेआम किया था।
आखिर पाकिस्तानी मुसलमान बिना उसकी ‘हिंदू पहचान’ को स्वीकार किए अपने पुराने हिंदू इतिहास को अपना कैसे कह सकते हैं? विदेशी हमलावरों के खिलाफ भारत की रक्षा करने वाले राजा पोरस (राजा पुरुषोत्तम) उनके हीरो कैसे हो सकते हैं? खासकर तब, जब उनके असली हीरो घोरी और गजनवी जैसे विदेशी इस्लामिक हमलावर हैं, जिन्होंने उनके ही हिंदू पूर्वजों पर जुल्म ढाए थे।
लंबे समय तक पाकिस्तानियों ने अपने इस्लाम-पूर्व के इतिहास को छोटा दिखाया और उसे नकारा। वे खुद को समाज में ऊँचा दिखाने के लिए झूठा दावा करते रहे कि वे अरब, तुर्क या फारसी नस्ल के हैं। वे यह मानने से भागते रहे कि उनके पूर्वज हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख थे। आज भी कई पाकिस्तानी खुद को ‘मुस्लिम राजपूत’ कहते हैं, क्योंकि उनके पूर्वज हिंदू क्षत्रिय राजपूत थे। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि बिना कुलदेवी की पूजा के कोई राजपूत कैसे हो सकता है?
जैसे ‘मुस्लिम राजपूत’ शब्द अपने आप में ही उल्टा और बेतुका है, ठीक वैसे ही ‘प्राचीन पाकिस्तान’ कहना भी पूरी तरह से बेतुका और मजाक है।
पाकिस्तान के इस्लामिक जनरलों ने वहाँ की मुस्लिम बहुसंख्यक आबादी को कट्टर बनाने के लिए हर मुमकिन पैंतरा चला। उन्होंने देश का पूरी तरह इस्लामीकरण कर दिया। वहीं दूसरी तरफ, हिंदू और बाकी गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों का जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया।
सालों से पाकिस्तानी मुसलमान उस संस्कृति से दूरी बनाते आए हैं जिसे वे हिकारत से ‘हिंदूआना संस्कृति’ कहते हैं। स्कूल की किताबों से लेकर, नेताओं के भाषणों और टीवी सीरियलों तक, पाकिस्तान का एक बड़ा हिस्सा हर उस चीज को ‘हिंदूआना’ कहकर खारिज कर देता है जो इस्लामिक नहीं है। उनकी नजर में जो इस्लामिक नहीं, वो खराब है।
साड़ी पर पाबंदी से लेकर ‘ताजमहल’ पर दावे तक: अपनी पहचान के संकट से जूझ रहा पाकिस्तान
मजेदार बात यह है कि हाल के सालों में पाकिस्तानियों ने ‘साड़ी’ को फिर से अपनाना शुरू कर दिया है। साड़ी एक ऐसा हिंदू पहनावा है जिसे भारत के धार्मिक बँटवारे से बहुत पहले से महिलाएँ पहनती आ रही हैं। लेकिन जिया-उल-हक के तानाशाही शासन के दौरान पाकिस्तान में साड़ियों पर एक अघोषित पाबंदी लगा दी गई थी। उस समय मुस्लिम महिलाओं को साड़ी पहनने से रोका जाता था, क्योंकि इसे विशुद्ध रूप से भारतीय और हिंदू संस्कृति से जुड़ा पहनावा माना जाता था।
ये वही पाकिस्तानी हैं जो भारत के ‘ताजमहल’ पर भी अपना हक जताता है। उनका तर्क है कि मुसलमान होने के नाते वे मुगलों की ‘विरासत’ के असली वारिस या रखवाले हैं। उनमें से बहुत से लोग तो आज भी इसी मुगालते में जीते हैं कि उनके पूर्वज मुगल थे। इसी वजह से वे सोशल मीडिया पर ‘हमने हिंदुओं पर 800 साल राज किया है’ जैसा बेहद झूठा और हास्यास्पद दावा करते फिरते हैं।
पाकिस्तानी लोग आज दोहरी चाल चल रहे हैं। वे भौगोलिक आँकड़ों को तोड़-मरोड़कर प्राचीन भारत के महान हिंदुओं पर अपना हक जताना चाहते हैं। साथ ही, वे मध्यकालीन भारत के क्रूर इस्लामिक लुटेरों का भी गुणगान करते हैं ताकि वे अपनी जबरन थोपी गई मुस्लिम पहचान को सही ठहरा सकें। यह सब कुछ वे सिर्फ इसलिए कर रहे हैं ताकि दुनिया के सामने पाकिस्तान को एक ‘ऐतिहासिक सभ्यता वाला देश’ (सिविलाइजेशनल स्टेट) साबित कर सकें।
पाकिस्तान ने यह पैंतरा असल में इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान की किताब से सीखा है। ईरान के मुल्ला शासन ने शुरुआती तीन दशकों तक अपने प्राचीन राजा सायरस (Cyrus) को कभी याद नहीं किया। लेकिन जब उनके देश पर वजूद का संकट मंडराने लगा, तो उन्हें अचानक अपनी इस्लाम से पहले की प्राचीन विरासत याद आ गई और वे उसका गुणगान करने लगे। आज पाकिस्तान भी ठीक उसी तरह अपने वजूद के संकट से बचने के लिए भारत के प्राचीन इतिहास को चुराने की कोशिश कर रहा है।
यह बात और भी ज्यादा मजेदार हो जाती है जब भारतीय हिंदू पूरी दुनिया के सामने प्राचीन भारतीय सभ्यता के असली रखवाले होने का दावा करते हैं। इस पर पाकिस्तानी मुसलमान अचानक भड़क जाते हैं और गुस्सा दिखाने लगते हैं। भारत का यह दावा पूरी तरह सही है, चाहे उस प्राचीन सभ्यता के अवशेष आज की किसी भी भौगोलिक सीमा के अंदर क्यों न आते हों।
अचानक पाकिस्तान को संस्कृत, पाणिनी, सिंधु घाटी सभ्यता और वैदिक सनातन सभ्यता से जुड़ी हर चीज से प्यार हो गया है। वे इसे गले लगाना चाहते हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं कि यह भारत के हिंदू ही हैं और कुछ हद तक पाकिस्तान और बांग्लादेश के बचे हुए हिंदू, जिन्होंने इस भाषा, सभ्यता, धर्म, संस्कृति और ग्रंथों की परंपरा को हजारों साल से जिंदा रखा है। हिंदुओं के लिए संस्कृत एक ‘देवभाषा’ यानी देवताओं की भाषा है। हिंदू शुरू से भारत को अपनी मातृभूमि मानकर पूजते आए हैं, जबकि इस्लाम में ऐसी कोई सोच मौजूद ही नहीं है।
अगर सिर्फ आज के भूगोल या जमीन के टुकड़े के आधार पर ही इतिहास के हर हीरो या जगह पर हक जताया जा सकता है, तो पाकिस्तानियों को सबसे पहले अपने हिंदू पूर्वजों को स्वीकार करना चाहिए। उन्हें गजनवी और घोरी जैसे क्रूर लुटेरों की तारीफ करना तुरंत बंद कर देना चाहिए, जिन्होंने उनके ही हिंदू पूर्वजों पर जुल्म किए और उन्हें जबरन मुसलमान बनाया। इस सोच का आखिरी और स्वाभाविक नतीजा तो यही होगा कि वे अपनी ऐतिहासिक गलती को सुधारें और वापस अपने मूल हिंदू धर्म में लौट आएँ।
प्राचीन भारतीय इतिहास पर हिंदुओं का यह दावा भाषा, पवित्र ग्रंथों, दर्शन और पुरातत्व के मजबूत सबूतों पर टिका है। यह एक ऐसी अटूट सभ्यता है जो हजारों सालों से लगातार चली आ रही है। यह इतिहास सिर्फ आज के भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार दूर अफगानिस्तान तक फैला हुआ है।
आतंक की छवि सुधारने और वजूद बचाने के लिए पाकिस्तान की नई चाल
पाकिस्तान इस समय जो कुछ भी कर रहा है, वह इतिहास का एक चुनिंदा इस्तेमाल है। वह सिर्फ राष्ट्रीय गर्व के लिए इस्लाम से पहले के इतिहास को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। लेकिन वह अपनी उस बुनियादी सोच को नहीं छोड़ रहा जो नफरत भरे द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (टू-नेशन थ्योरी) पर टिकी है। इसी सोच के तहत बँटवारे को सही ठहराने के लिए कभी हिंदू इतिहास को पूरी तरह नकार दिया गया था।
पिछले कुछ दशकों में पाकिस्तान ने दुनिया भर में इस्लामिक आतंकवाद के गढ़ के रूप में बदनामी कमाई है। आप किसी भी जिहादी आतंकी संगठन का नाम लीजिए, उसका पाकिस्तान से कनेक्शन अपने आप सामने आ जाएगा। पाकिस्तान के सरकारी संरक्षण में चलने वाले इस आतंकवाद ने देश की छवि को पूरी दुनिया में बर्बाद कर दिया है। अब अपनी इस साख को सुधारने के लिए यह इस्लामिक देश मोहनजोदड़ो, तक्षशिला और सिंधु घाटी सभ्यता का सहारा ले रहा है। वह इनके जरिए दुनिया में अपनी ‘सॉफ्ट पावर’ बढ़ाना चाहता है, राष्ट्रीय गर्व दिखाना चाहता है और विदेशी पर्यटकों को लुभाना चाहता है।
‘प्राचीन पाकिस्तान’ का यह पूरा मनगढ़ंत नाटक सिर्फ इसलिए रचा जा रहा है ताकि एक कड़वे सच का मुकाबला किया जा सके। दुनिया भर में यह माना जाता है कि ‘पाकिस्तान एक अप्राकृतिक और बनावटी देश है।’ इसी हकीकत को झुठलाने के लिए वे भारत के प्राचीन इतिहास को अपना बता रहे हैं।
आज पाकिस्तान के भीतर ही बलूच, पश्तून, सिंधी और कई अन्य जातीय समूह पंजाब के दबदबे वाले पाकिस्तान से आजादी माँग रहे हैं। देश अंदर से पूरी तरह टूट रहा है। ऐसे में कट्टर इस्लामिक नैरेटिव या खुद को ‘शुद्ध अरबी खून’ बताने वाले झूठे दावे भी देश को एक रखने में नाकाम साबित हो रहे हैं। यही वजह है कि अब वे अपनी एकता बनाए रखने के लिए प्राचीन भारत के इतिहास को चुराने की कोशिश कर रहे हैं।
वसंत पंचमी से माँ सरस्वती का नाम हटाने वाला मुल्क कैसे बनेगा सेक्युलर?
जिस मुल्क की सत्ता आसिम मुनीर जैसे मदरसा-छाप जनरल के हाथों में हो, जो हर भाषण में पाकिस्तानियों को द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (टू-नेशन थ्योरी) न भूलने की नसीहत देता है, वहाँ बदलाव की उम्मीद करना ही बेकार है। वहाँ इतिहास या संस्कृति को इस्लाम से अलग दिखाने की कोई भी कोशिश सिर्फ दिखावा, भ्रष्ट और स्वार्थ से भरी हुई है।
इसी साल (2026) फरवरी में जब पूरी दुनिया के हिंदुओं ने पतंगबाजी का त्योहार ‘वसंत पंचमी’ मनाया, तो पाकिस्तान ने भी इस त्योहार को ‘बसंत’ के नाम से दोबारा शुरू किया। वहाँ के नेताओं ने इसे दुनिया के सामने आजादी और सहनशीलता के सबूत के रूप में पेश किया। लेकिन कट्टरपंथियों के डर या अपनी खुद की खराब सोच की वजह से उन्होंने इस त्योहार से हिंदू धर्म और माँ सरस्वती की पूजा को पूरी तरह अलग कर दिया। उन्होंने वसंत पंचमी को सिर्फ एक ‘सांस्कृतिक’ या ‘क्षेत्रीय’ त्योहार बताकर पेश किया।
इस साल की शुरुआत में पाकिस्तान की पंजाब सरकार ने लाहौर के कुछ इलाकों के पुराने हिंदू और सिख नाम वापस रखने का प्रस्ताव दिया था। इसके तहत ‘इस्लामपुरा’ का नाम बदलकर फिर से ‘कृष्ण नगर’ और ‘बाबरी मस्जिद चौक’ का नाम ‘जैन मंदिर चौक‘ किया जाना था। इस फैसले पर वहाँ की सरकार और सोशल मीडिया पर कई पाकिस्तानी ढिंढोरा पीटने लगे। वे कहने लगे कि ‘एक तरफ भारत सांप्रदायिकता में डूब रहा है, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान धर्मनिरपेक्षता और सहनशीलता की मिसाल बन रहा है।’ लेकिन जैसे ही इस्लामिक चरमपंथी संगठनों ने इसका थोड़ा सा भी विरोध किया, सरकार तुरंत डरकर पीछे हट गई।
जो मुल्क अपने शहरों के हिंदू इतिहास से जुड़े पुराने नाम तक वापस रखने की हिम्मत नहीं जुटा सका, वह आज प्राचीन भारत के पूरे हिंदू इतिहास पर अपना हक जताना चाहता है। यह पाकिस्तान के खोखले दावों और उनकी लाचारी को पूरी तरह बेनकाब करता है।
ऑपरेशन सिंदूर में पिटने के बाद अब प्रोपेगेंडा के सहारे भारत को घेरने की फिराक में पाकिस्तान
ये सारे सोची-समझी कोशिशें, खासकर सिंधु घाटी सभ्यता पर हक जताना और ‘प्राचीन पाकिस्तान’ का हौव्वा खड़ा करना, असल में सिंधु जल समझौते (IWT) से जुड़े हुए हैं। पिछले साल पहलगाम में पाकिस्तान समर्थित इस्लामिक आतंकी हमले के जवाब में भारत सरकार ने इस सिंधु जल समझौते को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है।
इस समझौते को बचाने के लिए पाकिस्तान दुनिया के हर अंतरराष्ट्रीय मंच का दरवाजा खटखटा चुका है। उसने भारत को ‘युद्ध’ की धमकियाँ तक दीं और फिर भारत से इस समझौते को दोबारा शुरू करने की भीख भी माँगी। लेकिन मोदी सरकार ने बिल्कुल साफ कर दिया है कि जब तक पाकिस्तान भारत के खिलाफ इस्लामिक आतंकवाद को बढ़ावा देना और जिहादियों को पालना पूरी तरह बंद नहीं करता, तब तक यह समझौता रद्दी के डिब्बे में ही रहेगा।
पाकिस्तानी नेतृत्व अच्छे से जानता है कि वे सैन्य ताकत के दम पर भारत को कभी नहीं हरा सकते। खासकर ‘ऑपरेशन सिंदूर‘ में भारत से बुरी तरह पिटने के बाद वे सीधे मुकाबले की हिम्मत नहीं खो चुके हैं। इसलिए अब पाकिस्तान अपने सबसे पुराने और पसंदीदा हथियार यानी ‘प्रोपेगेंडा और नैरेटिव’ के खेल पर उतर आया है।
यह असल में दुनिया के सामने रोना रोने और भारत के खिलाफ दूसरे देशों का समर्थन जुटाने की एक लंबी प्लानिंग है। पाकिस्तान भविष्य में वैश्विक मंचों पर यह तर्क देना चाहता है कि सिंधु नदी का सीधा संबंध सिंधु घाटी सभ्यता से है। चूंकि सिंधु घाटी सभ्यता पाकिस्तान की ऐतिहासिक विरासत है, इसलिए भारत का उसे इस नदी के पानी से महरुम करना कानूनी और नैतिक रूप से बिल्कुल गलत है। इसी झूठे नैरेटिव को सेट करने के लिए वे आज इतिहास चुराने की कोशिश कर रहे हैं।
‘अगर पाकिस्तानी इस्लाम छोड़ेंगे तो वे भारतीय बन जाएँगे’: पहचान के सबसे बड़े संकट से जूझ रहा पड़ोसी मुल्क
अगर पाकिस्तान पूरी तरह से अपनी इस्लामिक कट्टरपंथी सोच और घमंड को छोड़ दे, तो वह ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान’ नहीं रह जाएगा। तब उसे भारत के हिंदू इतिहास को चुराने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी, बल्कि वह सीधे अपनी पुरानी हिंदू जड़ों में वापस लौट आएगा। आज प्राचीन सभ्यता की इस अटूट कड़ी और पाकिस्तान के बीच केवल एक ही दीवार खड़ी है और वह है उनकी जबरन थोपी गई इस्लामिक पहचान।
लेकिन पाकिस्तान का जिहादी सैन्य नेतृत्व वहाँ की आम जनता को कभी भी अपने इस्लाम-पूर्व के इतिहास और असली पहचान को अपनाने नहीं देगा। इसके पीछे एक मशहूर कहावत है, “अगर तुर्क लोग इस्लाम छोड़ दें, तब भी वे तुर्क ही रहेंगे; अगर अरब लोग इस्लाम छोड़ दें, तब भी वे अरब ही रहेंगे; लेकिन अगर पाकिस्तानी इस्लाम छोड़ देंगे, तो वे वापस भारतीय बन जाएँगे।”
यही वजह है कि पाकिस्तानी लोग आज भी उसी जिहादी इस्लामिक सोच से चिपके हुए हैं, जिसने कभी उनके इस इलाके के हिंदू इतिहास को मिटाने और उसे विलेन दिखाने का काम किया था। लेकिन अब वे अपनी ही बात से पलटकर उसी इतिहास का चुनिंदा हिस्सा चुराने की कोशिश कर रहे हैं।
पाकिस्तानी समाज का दोहरापन यहीं नहीं रुकता। वे अपनी शादियों में हिंदू रीति-रिवाजों की नकल करते हैं और भारत के क्लासिकल डांस फॉर्म्स को भी अपनाते हैं। इसके बाद वे पूरे भारतीय उपमहाद्वीप (Indian Subcontinent) के हिंदू इतिहास को ‘साउथ एशिया’ का नाम देकर नया रूप देना चाहते हैं। हकीकत यह है कि केवल 78 साल पुराने इस मुल्क (पाकिस्तान) का अपना खुद का इतिहास और संस्कृति सिर्फ इस्लामिक आतंकवाद, कज़िन-मैरिज (भाई-बहनों में शादी) पर बने टीवी सीरियलों और जिहादी मानसिकता के इर्द-गिर्द ही सिमट कर रह गई है।
(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
गुजरात हाई कोर्ट ने गोमांस के साथ पकड़े गए आरोपित की जमानत याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि आरोपित पर पहले से ही इस तरह के आठ मामले दर्ज हैं और पिछले मामलों में जमानत मिलने के बावजूद वह बार-बार ऐसे अपराध करता रहा है, इसलिए उसे रिहा नहीं किया जा सकता।
इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि हिंदू धर्म में गाय को पवित्र माना जाता है और गुजरात सरकार ने इसकी सुरक्षा के लिए सख्त कानून बनाए हैं। आरोपित की पहचान मोहम्मद आरिफ अब्दुल रजाक के रूप में हुई है। उसके खिलाफ दिसंबर 2025 में गोधरा पुलिस थाने में मामला दर्ज किया गया था।
3 जनवरी 2025 को उसे न्यायिक हिरासत में भेजा गया था और तभी से वह जेल में बंद है। आरिफ के खिलाफ गोधरा टाउन बी पुलिस थाने में गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम, 2011 की धारा 5(1), 6(b), 8(2), 8(4) और 10 के साथ-साथ भारतीय न्याय संहिता की धारा 325 और गुजरात पुलिस एक्ट की धारा 119 के तहत FIR दर्ज की गई है।
क्या है पूरा मामला?
मामले की जानकारी के अनुसार, 1 दिसंबर 2025 को गोधरा पुलिस को सूचना मिली थी कि गोमांस की तस्करी की जा रही है। इस सूचना के आधार पर पुलिस ने मोहम्मद के घर पर छापा मारा, जहाँ से 23 किलो गोमांस बरामद हुआ। मौके से आरोपित मोहम्मद को गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि अन्य आरोपित भागने में सफल हो गए।
जाँच में यह सामने आया कि मोहम्मद अपनी कार के जरिए गोमांस की तस्करी करता था और इसके लिए उसने कुछ अन्य लोगों को भी रखा हुआ था। हाई कोर्ट में आरोपित मोहम्मद आरिफ के वकील ने दलील दी कि वह 3 जनवरी से जेल में बंद है, जाँच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट भी दाखिल की जा चुकी है।
अब मामले में कुछ भी बरामद करने के लिए बाकी नहीं है और ट्रायल में काफी समय लग सकता है। साथ ही यह भी कहा गया कि आरोपित का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, लेकिन जब राज्य सरकार ने अपनी दलील रखी, तो बताया गया कि मोहम्मद आरिफ के खिलाफ इस तरह के आठ मामले पहले भी दर्ज हो चुके हैं।
हर बार वह जमानत पर बाहर आकर फिर से गोमांस की तस्करी में शामिल हो जाता था। सरकार ने इन सभी मामलों की सूची कोर्ट में पेश करते हुए कहा कि आरोपित की गतिविधियों से सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ सकता है और कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब हो सकती है। इसके अलावा जिन अन्य आरोपितों को मौके से पकड़ा जाना था, वे अभी फरार हैं।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री की जाँच करने के बाद कोर्ट ने जमानत याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया आरोपित के खिलाफ मामला बनता है। साथ ही कोर्ट ने यह भी माना कि आरोपित को पहले जमानत मिलने के बावजूद उसने उसकी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करते हुए फिर से ऐसे अपराध करना जारी रखा।
कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने इस मामले में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा, “संविधान कहता है कि हर नागरिक को पर्यावरण का संरक्षण करना चाहिए और अन्य जीवों के प्रति करुणा रखनी चाहिए। मूल अधिकार वैसे तो सीधे तौर पर लागू नहीं होते, लेकिन वे संविधान की मूल भावना और राज्य की मंशा को दर्शाते हैं।”
कोर्ट ने आगे कहा, “इन्हीं संवैधानिक निर्देशों को ध्यान में रखते हुए गुजरात सरकार ने पशु संरक्षण अधिनियम और पशुओं के प्रति क्रूरता रोकथाम अधिनियम बनाए हैं। गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम के तहत गाय और उसके वंश के वध पर प्रतिबंध लगाया गया है और उनके संरक्षण व सुरक्षा के लिए प्रावधान किए गए हैं।”
कोर्ट ने कहा, “प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि आरोपित बार-बार गोवंश की हत्या और उसके अवैध परिवहन से जुड़े मामलों में शामिल रहा है। इस तरह की गतिविधियाँ सार्वजनिक व्यवस्था और सांप्रदायिक सौहार्द पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती हैं।”
‘गाय हिंदुओं के लिए पवित्र है, इसकी हत्या धार्मिक भावनाओं को पहुँचा सकती है ठेस
कोर्ट ने कहा, “कोर्ट इस तथ्य को भी नजरअंदाज नहीं कर सकता कि भारतीय समाज के एक बड़े वर्ग, विशेषकर हिंदू और जैन समुदाय के लिए गाय पवित्र है और वे उसके संरक्षण को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं। ऐसे में बार-बार गोहत्या के मामलों में संलिप्तता लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचा सकती है और सामाजिक तनाव पैदा कर सकती है।”
कोर्ट ने आगे कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता जरूरी है और उसका महत्व भी है, लेकिन यह पूर्ण नहीं होती और इसके साथ समाज के व्यापक हितों को भी ध्यान में रखना होता है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता समाज के हितों पर हावी नहीं हो सकती। कोर्ट के लिए यह आवश्यक है कि आरोपित की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानून-व्यवस्था बनाए रखने से जुड़े सामाजिक हितों के बीच संतुलन बना रहे। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को मामले की सुनवाई तेजी से पूरी करने के निर्देश दिए हैं और अभियोजन पक्ष को भी कहा है कि वे जल्द से जल्द गवाहों की जाँच पूरी करें।
(मूल रुप से यह रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
यूरोप का नाम आते ही आम तौर पर बर्फ से ढके पहाड़, खूबसूरत शहर और सुहावना मौसम याद आता है। लेकिन इस समय महाद्वीप की तस्वीर बिल्कुल अलग है। फ्रांस से लेकर जर्मनी और स्पेन से लेकर ब्रिटेन तक, कई देश भीषण गर्मी की चपेट में हैं। हालात ऐसे हैं कि सोशल मीडिया पर सामने आ रहे वीडियो दुनिया भर का ध्यान खींच रहे हैं।
हालात इस कदर बदतर हो चुके हैं कि कई देशों से सड़कों और ट्रैफिक लाइटों के पिघलने के वीडियो सामने आ रहे हैं। लोग गर्मी से राहत पाने के लिए नदियों और झीलों का रुख कर रहे हैं। हीटवेव के बीच अतिरिक्त मौतों के आँकड़ों ने चिंता और बढ़ा दी है। इन तस्वीरों के बीच भारत में एक अलग बहस छिड़ गई है।
🇮🇹🇩🇪 Extreme heat in Europe
Europe is hit by a historic heatwave with temperatures nearing 40°C, triggering red alerts across Italy and Germany.
The extreme heat is melting traffic lights, warping roads, and damaging other infrastructure. pic.twitter.com/0e2cmyZFO4
सवाल उठ रहा है कि जब भारत के कई शहर हर साल 45 डिग्री या उससे ज्यादा तापमान का सामना करते हैं, तो यूरोप में 40 से 43 डिग्री सेल्सियस पर हालात इतने गंभीर क्यों दिखाई दे रहे हैं? क्या वहाँ की गर्मी अलग है, या फिर सिर्फ तापमान के आधार पर तुलना करना ही गलत है?
यही सवाल हमें उस फर्क तक ले जाता है, जो थर्मामीटर पर नहीं बल्कि भूगोल, शहरों की बनावट, घरों की डिजाइन और जलवायु के साथ समाज की तैयारी में छिपा है।
यूरोप में गर्मी का कहर
यूरोप में इस बार की गर्मी को सिर्फ एक सामान्य मौसमीय घटना नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे हाल के वर्षों की सबसे गंभीर और व्यापक हीटवेव घटनाओं में गिना जा रहा है। कई देशों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुँच गया और उसके साथ स्वास्थ्य, परिवहन और बुनियादी ढाँचे पर दबाव भी तेजी से बढ़ने लगा।
🚨 Europe is in the grip of a historic heatwave
– WHO links 1,300+ excess deaths to the extreme heat since 21 June
– Germany hit 41.7°C, Poland 40.5°C, and the Czech Republic 41.1°C
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, 21 जून के बाद से यूरोप में अत्यधिक गर्मी से जुड़ी 1300 से ज्यादा अतिरिक्त मौतें दर्ज की गई हैं। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि वास्तविक असर इससे बड़ा हो सकता है क्योंकि हीटवेव से जुड़ी मौतों का पूरा आँकड़ा अक्सर बाद में सामने आता है।
Europe is the fastest-warming continent on Earth, heating at twice the global average. Right now 150 million people are living under extreme heat, hundreds have died, schools are shut, grids are buckling.
Driven by climate change and global warming, the phenomenon of the…
— Tedros Adhanom Ghebreyesus (@DrTedros) June 28, 2026
कई देशों में तापमान ने पुराने रिकॉर्ड भी तोड़े। जर्मनी के कुछ हिस्सों में तापमान 41 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुँच गया और नए रिकॉर्ड दर्ज किए गए। मध्य यूरोप के कई क्षेत्रों में जून के आखिरी दिनों में ऐसी गर्मी देखी गई जो सामान्य मौसमीय पैटर्न से बाहर मानी जा रही है।
कुछ देशों में स्वास्थ्य सेवाओं को अतिरिक्त सतर्कता अपनानी पड़ी, स्कूलों और सार्वजनिक गतिविधियों पर असर पड़ा और ऊर्जा व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ा।
फ्रांस उन देशों में शामिल रहा जहाँ असर सबसे ज्यादा दिखाई दिया। वहाँ अपेक्षा से अधिक मौतों की रिपोर्ट की गई और स्वास्थ्य एजेंसियों ने बताया कि प्रभावित लोगों में बड़ी संख्या बुजुर्गों की थी। कई मौतें घरों के भीतर हुईं, जिसने एक और सवाल खड़ा किया कि क्या समस्या सिर्फ बाहर की धूप नहीं बल्कि रहने की व्यवस्था भी है?
इस गर्मी का असर सिर्फ लोगों तक सीमित नहीं रहा। सोशल मीडिया और स्थानीय रिपोर्टों में सड़कों, परिवहन सेवाओं और शहरी ढाँचे पर दबाव की तस्वीरें भी सामने आईं। इससे एक बात साफ हुई कि यूरोप की बड़ी चुनौती सिर्फ ऊँचा तापमान नहीं, बल्कि वह तैयारी है जो लंबे समय तक ठंडे मौसम के हिसाब से बनाई गई थी।
43°C पर इतना संकट क्यों?
डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, 43 डिग्री सेल्सियस तापमान अपने आप में हर जगह खतरनाक होता है, लेकिन इसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि मानव शरीर उसे किस तरह से प्रोसेस कर पा रहा है। सिर्फ तापमान का आँकड़ा यह नहीं बताता कि शरीर पर वास्तविक दबाव कितना है।
जनरल फिजिशियन और हीट-रिलेटेड बीमारियों पर काम करने वाले विशेषज्ञ बताते हैं कि मानव शरीर का तापमान नियंत्रित करने का सबसे बड़ा तरीका पसीना है। जब शरीर गर्म होता है तो पसीना निकलता है और उसके वाष्पीकरण से शरीर ठंडा होता है। लेकिन अगर बाहरी वातावरण इस प्रक्रिया में बाधा डालता है, तो शरीर खुद को ठंडा नहीं कर पाता।
विशेषज्ञों के अनुसार, तीन मुख्य स्थितियाँ इस प्रक्रिया को सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं, हवा की गति, नमी और लगातार बना रहने वाला तापमान। अगर हवा स्थिर हो, नमी अधिक हो, या रात में भी तापमान कम न हो, तो शरीर पर गर्मी का असर तेजी से बढ़ता है। ऐसे हालात में शरीर लगातार ‘हीट स्ट्रेस’ की स्थिति में बना रहता है।
डॉक्टर यह भी बताते हैं कि लगातार कई दिनों तक उच्च तापमान रहने पर शरीर की थर्मोरेगुलेशन क्षमता कमजोर पड़ने लगती है। इसका मतलब है कि शरीर धीरे-धीरे गर्मी से निपटने की अपनी क्षमता खोने लगता है। यही कारण है कि हीटवेव के दौरान अचानक थकान, चक्कर, डिहाइड्रेशन और गंभीर मामलों में हीट स्ट्रोक जैसी स्थितियाँ सामने आती हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, एक और महत्वपूर्ण कारक रात का तापमान है। अगर रात में पर्याप्त ठंडक नहीं मिलती, तो शरीर को रिकवरी का समय नहीं मिलता। यह लगातार तनाव जैसी स्थिति बनाता है, जो खासकर बुजुर्गों, बच्चों और पहले से बीमार लोगों के लिए ज्यादा खतरनाक होता है।
सूरज और भौगोलिक स्थिति का असर
यूरोप और भारत की गर्मी को समझने के लिए सिर्फ तापमान देखना काफी नहीं है। इसके पीछे भौगोलिक स्थिति और सूरज की भूमिका को समझना जरूरी है। यही वह हिस्सा है जो पहली नजर में दिखाई नहीं देता, लेकिन गर्मी के अनुभव को बहुत बदल देता है।
भारत भूमध्य रेखा के अपेक्षाकृत करीब स्थित है और यहाँ सालों से ऊँचा तापमान जीवन का सामान्य हिस्सा रहा है। दूसरी तरफ यूरोप काफी उत्तर में स्थित है। इसका मतलब यह नहीं कि वहाँ सूरज कम तेज होता है, बल्कि गर्मियों में सूरज का व्यवहार अलग हो जाता है। यूरोप के कई हिस्सों में गर्मियों के दौरान दिन बहुत लंबे हो जाते हैं।
कई देशों में 15 से 16 घंटे तक धूप बनी रहती है। यानी तापमान चाहे भारत के बराबर दिखे, लेकिन जमीन, सड़कें और इमारतें लंबे समय तक लगातार गर्मी सोखती रहती हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि यूरोप के शहरों में इस लंबे सोलर एक्सपोजर का असर देर शाम तक बना रहता है।
दिनभर धूप खाने वाली कंक्रीट, डामर और इमारतें रात में धीरे-धीरे वही गर्मी छोड़ती रहती हैं। नतीजा यह होता है कि रात में भी तापमान पर्याप्त नीचे नहीं गिरता और शरीर को रिकवरी का समय नहीं मिलता। यही वजह है कि कई लोग दिन की तुलना में रात की गर्मी को ज्यादा थकाने वाला अनुभव बताते हैं।
कुछ विशेषज्ञ बताते हैं कि भारत के कई हिस्सों में वातावरण में मौजूद धूल और अन्य सूक्ष्म कण सूरज की ऊर्जा को कुछ हद तक फैला देते हैं, जबकि यूरोप के कई क्षेत्रों में अपेक्षाकृत साफ आसमान और सीधी धूप गर्मी को ज्यादा तीखा महसूस करा सकती है। इसलिए सिर्फ तापमान देखकर यह मान लेना कि दोनों जगह असर समान होगा, पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।
लेकिन इस बार सिर्फ सूरज और लंबे दिन ही वजह नहीं थे। यूरोप के ऊपर बना एक विशेष मौसमीय पैटर्न भी गर्मी को असामान्य स्तर तक ले गया। इसे ओमेगा ब्लॉक कहा जाता है। ओमेगा ब्लॉक तब बनता है जब वायुमंडल में एक हाई-प्रेशर सिस्टम लंबे समय तक एक क्षेत्र पर टिक जाता है और उसके दोनों तरफ लो-प्रेशर सिस्टम बने रहते हैं।
मौसम के नक्शे पर इसकी आकृति ग्रीक अक्षर ‘Ω’ जैसी दिखाई देती है, इसलिए इसे ओमेगा ब्लॉक कहा जाता है। सामान्य स्थिति में तेज हवाएं और जेट स्ट्रीम मौसम को आगे बढ़ाती रहती हैं, लेकिन इस स्थिति में मौसम जैसे एक जगह अटक जाता है। यूरोप में इस बार यही हुआ।
हाई-प्रेशर सिस्टम लंबे समय तक बना रहा और मौसम बदलने वाली हवाएँ कमजोर पड़ गईं। इसके कारण अफ्रीका की तरफ से आने वाली गर्म और सूखी हवा यूरोप के ऊपर फँसती चली गई। ठंडी हवाओं और बादलों की एंट्री सीमित हो गई। यहीं से हीट डोम जैसी स्थिति बनने लगी।
जब ऊपर हाई-प्रेशर मौजूद रहता है तो गर्म हवा ऊपर उठकर बाहर नहीं निकल पाती। वह वापस नीचे दबती है और और ज्यादा गर्म हो जाती है। इससे जमीन और तेजी से गर्म होती जाती है। बादल कम होने की वजह से सूरज की सीधी ऊर्जा लगातार सतह तक पहुँचती रहती है।
इस पूरी प्रक्रिया ने मिलकर यूरोप में ऐसी गर्मी पैदा की जिसमें सिर्फ तापमान नहीं बढ़ा, बल्कि गर्मी लगातार जमा होती चली गई। कम हवा, लंबे दिन, लगातार धूप, गर्म सतहें और रुका हुआ मौसम, इन सबने मिलकर वही हालात बनाए जिनकी तस्वीरें इन दिनों पूरी दुनिया देख रही है।
घरों की बनावट बनी मुसीबत
यूरोप में इस बार की गर्मी को समझने के लिए सिर्फ बाहर का तापमान देखना काफी नहीं है। एक बड़ी वजह उन घरों और इमारतों की बनावट भी है, जिनमें लोग रहते हैं। यूरोप के ज्यादातर हिस्सों में लंबे समय तक सबसे बड़ी मौसमीय चुनौती ठंड रही है, इसलिए वहाँ घरों को इस तरह डिजाइन किया गया कि सर्दियों में अंदर की गर्मी बाहर न निकले।
इसी सोच के कारण कई घरों में मोटी दीवारें, मजबूत इंसुलेशन, छोटी खिड़कियाँ और सीमित क्रॉस-वेंटिलेशन रखा गया। ठंड के मौसम में यह व्यवस्था बेहद कारगर होती है क्योंकि इससे घर अपेक्षाकृत गर्म रहते हैं और ऊर्जा की बचत होती है। लेकिन जब वही ढाँचा लगातार कई दिनों तक 40 डिग्री से ऊपर तापमान झेलता है, तो यही डिजाइन समस्या बनने लगता है।
दिनभर धूप और गर्म हवा से गर्म हुई दीवारें, छतें और खिड़कियाँ घर के अंदर गर्मी जमा करने लगती हैं। रात होने के बाद भी यह गर्मी जल्दी बाहर नहीं निकलती। नतीजा यह होता है कि घरों का तापमान लगातार ऊँचा बना रहता है और लोगों को आराम नहीं मिल पाता।
विशेषज्ञ बताते हैं कि जब शरीर को रात में भी ठंडा होने का मौका नहीं मिलता तो उसका असर सीधे स्वास्थ्य पर पड़ता है। लगातार गर्म माहौल में रहने से डिहाइड्रेशन, थकान, हीट एक्सॉशन और हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। यही वजह है कि इस बार यूरोप में चर्चा सिर्फ बाहर की गर्मी की नहीं, बल्कि घरों के अंदर फँसी गर्मी की भी हुई।
AC और कूलिंग की चुनौती
यूरोप में गर्मी के इस संकट ने एक और ऐसी कमजोरी सामने ला दी जिस पर पहले बहुत कम ध्यान दिया जाता था- कूलिंग सिस्टम की कमी। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने सवाल उठाया कि जब तापमान इतना बढ़ गया तो लोग एयर कंडीशनर का इस्तेमाल क्यों नहीं कर रहे। लेकिन इसका जवाब यूरोप के मौसम और शहरी इतिहास में छिपा है।
यूरोप के ज्यादातर देशों में लंबे समय तक इतनी तेज और लगातार गर्मी सामान्य नहीं मानी जाती थी। इसलिए वहाँ घरों, अस्पतालों, स्कूलों और सार्वजनिक इमारतों में एयर कंडीशनिंग को जरूरी बुनियादी सुविधा की तरह विकसित नहीं किया गया। कई देशों में आज भी बड़ी संख्या में घर बिना एसी के हैं और लोग गर्मियों में प्राकृतिक वेंटिलेशन पर निर्भर रहते हैं।
लेकिन जब लगातार कई दिनों तक तापमान 40 डिग्री के आसपास बना रहे, रात में भी राहत न मिले और घर खुद गर्मी जमा करने लगें, तब सिर्फ खिड़कियाँ खोलना काफी नहीं होता। कई जगह लोगों ने पोर्टेबल कूलिंग यूनिट और अस्थायी इंतजामों का सहारा लेना शुरू किया। इसका असर स्वास्थ्य पर भी दिखाई दिया।
भारत और यूरोप की गर्मी में फर्क
भारत लंबे समय से गर्म जलवायु वाला देश रहा है। यहाँ के कई हिस्सों में ऊँचा तापमान सामान्य मौसमी अनुभव का हिस्सा है। इसी वजह से लोगों की दिनचर्या, रहने का तरीका और कई जगहों पर घरों की संरचना धीरे-धीरे गर्म मौसम के अनुसार विकसित हुई है।
दोपहर में काम कम करना, हल्के कपड़े पहनना, पानी और छाँव पर निर्भर रहना और गर्मी के हिसाब से जीवन को ढालना लंबे समय से यहाँ की सामाजिक आदतों का हिस्सा रहा है। दूसरी तरफ यूरोप में लंबे समय तक इतनी तीव्र गर्मी सामान्य नहीं रही। वहाँ के शहर, घर और सार्वजनिक ढाँचा ठंड से बचने के लिए विकसित हुए।
कई घरों में गर्मी रोककर रखने वाला इंसुलेशन है, एयर कंडीशनिंग सीमित है और लगातार ऊँचे तापमान के लिए तैयारी कम रही है। इस गर्मी के दौरान एक और अंतर साफ दिखा कि यूरोप में लंबे दिन, कम हवा और लगातार गर्म रातों ने शरीर को राहत नहीं दी। ऊपर से वहाँ बुजुर्ग आबादी का अनुपात भी ज्यादा है, जो गर्मी के प्रति अधिक संवेदनशील मानी जाती है।
यही वजह है कि भारत और यूरोप की गर्मी की तुलना सिर्फ थर्मामीटर से नहीं, बल्कि मौसम, इंफ्रास्ट्रक्चर और लोगों की तैयारी के आधार पर करनी चाहिए।
तापमान नहीं, परिस्थितियाँ तय करती हैं असर
यूरोप की इस भीषण गर्मी ने एक बात साफ कर दी है कि सिर्फ तापमान देखकर किसी हीटवेव की गंभीरता को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। असली असर उस पूरे सिस्टम पर निर्भर करता है जिसमें लोग रहते हैं, यानी मौसम, हवा, नमी, घरों की बनावट, शहरों की योजना और लोगों की तैयारी।
एक ही तापमान अलग-अलग जगहों पर अलग अनुभव दे सकता है, क्योंकि शरीर का गर्मी से सामना केवल थर्मामीटर की संख्या से नहीं होता। अगर रात में राहत न मिले, हवा न चले, घरों के अंदर गर्मी जमा होती रहे और शरीर को ठंडा होने का समय न मिले, तो वही तापमान ज्यादा खतरनाक बन जाता है।
यूरोप की मौजूदा स्थिति ने दिखाया कि जब कोई क्षेत्र लंबे समय तक ठंडे मौसम के हिसाब से विकसित हुआ हो और अचानक वहाँ लगातार तेज गर्मी आने लगे, तो उसका असर सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं रहता। वह स्वास्थ्य, इंफ्रास्ट्रक्चर और रोजमर्रा की जिंदगी को भी प्रभावित करता है।
इसीलिए विशेषज्ञ बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि गर्मी को समझने के लिए केवल डिग्री नहीं, बल्कि पूरी परिस्थितियों को देखना जरूरी है। यही वजह है कि इस बार की हीटवेव ने सिर्फ तापमान का रिकॉर्ड नहीं तोड़ा, बल्कि यह सवाल भी खड़ा किया कि बदलते मौसम के साथ दुनिया कितनी तैयार है।
पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मियांवाली जिले में पाँच प्रमुख कबीलों के बीच 11 साल से चल रहा खूनी संघर्ष आखिरकार समाप्त हो गया। रविवार (28 जून 2026) को एक सुलह समारोह के दौरान प्रतिद्वंद्वी परिवारों ने एक-दूसरे को गले लगाकर वर्षों पुरानी दुश्मनी खत्म करने की औपचारिक घोषणा की।
इस संघर्ष में अब तक 11 लोगों की मौत हो चुकी थी और 9 अन्य घायल हुए थे। यह झगड़ा कुंडी, कालो, बिखन खेल, हजारा खेल और यारो खेल कबीलों के बीच 2015 से लगातार हिंसा का कारण बना हुआ था।
2015 में शुरू हुआ था पहला बड़ा खूनी संघर्ष
इस लंबे विवाद की शुरुआत वर्ष 2015 में मियांवाली के वान भच्छरन थाना क्षेत्र में हुई थी, जब यारो खेल कबीले के दो भाइयों अशरफ खान और असगर खान समेत उनके सहयोगियों मोहम्मद जमान हजारा खेल और शेर अब्बास भट्टी की हत्या कर दी गई थी।
इसी हिंसा में कालो कबीले के मोहम्मद लतीफ की भी जान चली गई थी। इस घटना ने कबीलों के बीच तनाव को इतना बढ़ा दिया कि बदले की आग लगातार भड़कती रही और क्षेत्र में कई बार हिंसक झड़पें होती रहीं।
तीन साल बाद 2018 में मियांवाली सिटी थाना क्षेत्र में एक और बड़ा हमला हुआ, जब कालो और कुंडी कबीलों के लोग अदालत की सुनवाई में जा रहे थे, तभी घात लगाकर उन पर हमला कर दिया गया। इस हमले में अब्दुल वहीद कालो, मोहम्मद मेहरान कुंडी, मोहम्मद नोमान कुंडी और दो राहगीरों की मौत हो गई।
इसके बाद 2019 में कायदाबाद के पास हुई एक और घटना में अशरफ खान बिखन खेल की हत्या कर दी गई, जिसने दोनों पक्षों के बीच दुश्मनी को और गहरा कर दिया।
11 साल बाद खत्म हुआ लंबा संघर्ष
इस संघर्ष को समाप्त कराने में मियां रियाज मियाना, शौकत खान, सिब्तैन खान और इंस्पेक्टर इरफान गुज्जर की अहम भूमिका मानी जा रही है। लंबे संवाद और भरोसा बहाली की कोशिशों के बाद आखिरकार मियांवाली के नूर मार्केट में सुलह समारोह आयोजित किया गया।
इस कार्यक्रम में पंजाब के राज्यपाल सरदार सलीम हैदर खान समेत कई पूर्व सांसद, राजनीतिक नेता और स्थानीय लोग मौजूद रहे। समारोह के दौरान कबीलों के सदस्यों ने एक-दूसरे को गले लगाकर दुश्मनी खत्म करने की घोषणा की।
राज्यपाल ने इसे सामाजिक स्थिरता और शांति की दिशा में अहम कदम बताया। इसी मौके पर अकरम खान ने 12 मिलियन रुपए के किसास (खून बहा) को माफ करने की घोषणा करते हुए कहा कि उन्होंने यह फैसला अल्लाह की रजा के लिए लिया है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर राम मंदिर, सनातन और तुष्टिकरण का मुद्दा गरमा गया है। समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव द्वारा अयोध्या में राम मंदिर के दर्शन न करने और उसके बदले अन्य धार्मिक स्थलों का रुख करने को लेकर सियासी गलियारों में तीखी बहस छिड़ गई है।
उत्तर प्रदेश की सियासत में राम मंदिर और अयोध्या हमेशा से धुरी रहे हैं। दरअसल, अखिलेश यादव का राम मंदिर न जाना कोई सामान्य फैसला नहीं, बल्कि एक सोची-समझी चुनावी रणनीति का हिस्सा है। उनका असल मकसद बहुसंख्यक समाज के भीतर ही ‘हिंदू बनाम हिंदू’ की एक नई राजनीतिक रेखा खींचना और अपने पारंपरिक वोटरों को एकजुट रखना है।
इस राजनीतिक उठापटक के बीच, अखिलेश यादव द्वारा राम मंदिर न जाने के पीछे केदारेश्वर मंदिर के दर्शन को एक ढाल की तरह इस्तेमाल करने के मामले को अगर देखा जाए, तो यह साफ है कि उन्होंने अयोध्या की भव्यता से ध्यान भटकाने के लिए केदारेश्वर मंदिर जाने का सिर्फ एक तात्कालिक बहाना बनाया।
अखिलेश यादव ने रविवार (28 जून 2026) को कहा कि इटावा में बन रहे केदारेश्वर शिव मंदिर का काम पूरा होने के बाद वह अयोध्या में स्थित राम मंदिर के दर्शन करने के लिए जाएँगे।
हालाँकि बात सिर्फ इतनी सी नहीं है। इस बहानेबाजी के पीछे सपा का एक लंबा इतिहास, चुनावी मजबूरियाँ और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा उनके प्रोपेगेंडा को ध्वस्त किए जाने की पूरी कहानी छिपी है, जिसे विस्तार से समझना जरूरी है।
राम मंदिर से दूरी और ‘हिंदू बनाम हिंदू’ की नई सियासी जंग
अखिलेश यादव का राम मंदिर से दूरी बनाना और अन्य धार्मिक स्थलों का रुख करना उनके किसी व्यक्तिगत लगाव की कमी को नहीं, बल्कि उनकी सोची-समझी चुनावी महत्वाकांक्षा को दर्शाता है। आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए सपा एक ऐसी पिच तैयार करने की कोशिश कर रही है, जहाँ वह खुद को एक अलग तरह के हिंदू नैरेटिव के साथ पेश कर सके।
अखिलेश यादव भली-भांति जानते हैं कि आज के दौर में सनातन या राम मंदिर का सीधा विरोध करना उनके लिए राजनीतिक रूप से आत्मघाती साबित हो सकता है। इसलिए उन्होंने एक नई रणनीति अपनाई है, जो है हिंदुओं को ही आपस में लड़ाना।
चढ़ावा चोरी जैसे विवादित बयान देकर वह यह दिखाना चाहते हैं कि वे सनातन के विरोधी नहीं हैं, बल्कि मंदिर व्यवस्था या पुजारियों के एक वर्ग के खिलाफ हैं। इस प्रोपेगेंडा के जरिए वे भाजपा के ‘राष्ट्रवादी और सांस्कृतिक’ हिंदुत्व के समानांतर एक ऐसा वर्ग खड़ा करना चाहते हैं, जो आपस में ही बंटा रहे। यानी ‘हिंदू बनाम हिंदू’ की यह लड़ाई इसलिए लड़ी जा रही है ताकि बहुसंख्यक वोट बैंक में सेंध लगाई जा सके और साथ ही सपा का जो अपना पारंपरिक मुस्लिम-यादव (M-Y) समीकरण है, उसे यह संदेश दिया जा सके कि पार्टी अभी भी भाजपा के कोर एजेंडे के सामने पूरी तरह नतमस्तक नहीं हुई है। यह राजनीति पूरी तरह से वोट बैंक को साधने और सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए बुनी गई है।
सपा का ‘काला इतिहास’: 1990 का वो दौर जब सरयू का जल हुआ था लाल
अखिलेश यादव की आज की राजनीति को समझने के लिए उनकी पार्टी के उस अतीत को देखना होगा, जिसे भारतीय राजनीति का एक बेहद कड़वा और विवादित अध्याय माना जाता है। राम मंदिर निर्माण को लेकर समाजवादी पार्टी का इतिहास हमेशा से विरोधाभासों और विवादों से घिरा रहा है, जो आज भी समय-समय पर उनकी राजनीतिक कलई खोल देता है।
इतिहास गवाह है कि जब 1990 में अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था, तब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव थे। 30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 को अयोध्या में जो कुछ हुआ, उसकी गूँज आज भी हर सनातनी के दिल में दर्द पैदा करती है।
मुलायम सरकार के सख्त आदेश पर अयोध्या में जमा हुए निहत्थे और शांतिपूर्ण कारसेवकों पर पुलिस ने बेरहमी से गोलियाँ चला दी थीं। इस ऐतिहासिक और कड़वे सच से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता कि उस फायरिंग में दर्जनों रामभक्तों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी और कहा जाता है कि सरयू नदी का जल सनातनियों के खून से लाल हो गया था।
मुल्ला-मुलायम की मिली थी उपाधि
अयोध्या में हिंदुओं के नरसंहार की इस घटना के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति का रुख पूरी तरह बदल गया। मुलायम सिंह यादव की सरकार ने बाद में रामभक्तों पर गोलियाँ चलाने वाले पुलिसकर्मियों और अधिकारियों पर दर्ज मुकदमों को भी वापस ले लिया था। राजनीतिक गलियारों में यह साफ माना गया कि यह कदम एक खास समुदाय (मुस्लिमों) को खुश करने और अपना वोट बैंक पक्का करने के लिए उठाया गया था। इसी दौर में उन्हें ‘मुल्ला मुलायम’ की उपाधि तक दे दी गई थी।
आज जब अखिलेश यादव खुद को एक नए रूप में पेश करने की कोशिश करते हैं, तो उनकी पार्टी का यही इतिहास उनके दावों के आड़े आ जाता है। जनता के सामने यह विरोधाभास साफ दिखता है कि जिस मंदिर आंदोलन को कभी सपा ने पूरी ताकत से रोकने की कोशिश की, आज उसी मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा और दर्शन को लेकर वे असहज नजर आते हैं।
‘चढ़ावा चोरी’ का प्रोपेगेंडा और सीएम योगी की दो-टूक चुनौती
अखिलेश यादव ने हाल ही में धार्मिक स्थलों और आयोजनों में ‘चढ़ावे और प्रबंधन’ को लेकर सवाल उठाए थे। अखिलेश ने जानबूझकर ‘चढ़ावा चोरी’ का मुद्दा उछाला ताकि इसके जरिए वह हिंदू समाज और संतों के एक वर्ग को मंदिर प्रबंधन या सरकार के खिलाफ खड़ा कर सकें। यह भी ‘हिंदू बनाम हिंदू’ के उसी प्रोपेगेंडा का हिस्सा था, जिसके जरिए वे बहुसंख्यकों के बीच अविश्वास की भावना पैदा करना चाहते थे।
रामपुर में जनसभा को संबोधित करते हुए सीएम योगी ने कहा कि जो लोग ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने वालों पर लाठीचार्ज करवाते थे, वे आज राम भक्ति की वकालत कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जो लोग राम भक्तों पर गोलियाँ चलवाते थे, वे आज भगवान राम के प्रति भक्ति की बातें कर रहे हैं। सीएम योगी ने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी, जिसने 2017 से पहले भगवान राम और भगवान कृष्ण में विश्वास करने से इनकार कर दिया था, आज अयोध्या जाने के लिए उत्सुक है। सीएम योगी ने आगे कहा कि भगवान राम जानते हैं कि कौन सही है और कौन गलत।
सीएम योगी ने हनुमान का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि रामभक्ति हर प्रकार की बाधा को दूर करने का सामर्थ्य देती है। रामभक्ति ऐसे कालनेमियों को निपटाने में पूरी सहायक है। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी और कॉन्ग्रेस पहले भगवान राम और भगवान श्रीकृष्ण के अस्तित्व पर सवाल उठाती थीं, लेकिन आज अयोध्या जाने की होड़ लगी हुई है।
सीएम योगी ने अखिलेश को दी मथुरा की चुनौती
इससे पहले, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रविवार (28 जून 2026) को हाथरस में अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि अयोध्या को धार्मिक नगरी बनाने की बात करने वालों को पहले अपना इतिहास देखना चाहिए। जिनकी सरकार में रामभक्तों पर गोलियां चलीं, काँवड़ यात्रा पर रोक लगी और कृष्ण जन्माष्टमी जैसे धार्मिक आयोजनों तक को दबाने की कोशिश हुई। आज जब राम भक्तों के परिश्रम और पुरुषार्थ से प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में अयोध्या अब त्रेता युग का स्मरण करा रही है, तो इनके भी मुँह में पानी आने लग गया है। अब तैयारी करिये कि हम कृष्ण कन्हैया के लिए भी कुछ कर सकें।
उन्होंने आगे बोलते हुए कहा कि अखिलेश यादव अब मथुरा की बात करिए, अगर सचमुच अपने को धार्मिक कहलाने का प्रयास कर रहे हो तो मथुरा-वृंदावन, श्रीकृष्णजन्मभूमि पर खुलकर बोल दीजिए। उन्होंने कहा, “बोलिये कि राम जन्मभूमि मुक्ति के आंदोलन की तर्ज पर ही कृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति का भी अभियान चलना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि को भी सम्मान मिलना चाहिए। हमारी सरकार वहाँ श्रद्धालुओं को बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराने का कार्य कर रही है।”
दरअसल, अखिलेश ने कहा था कि वो अयोध्या को धार्मिक नगरी में बदलेंगे। इसी के बाद सीएम योगी ने उन पर पलटवार किया और कहा, “अखिलेश में हिम्मत नहीं है, क्यों कि मुल्ला और मोलबियों के सामने घुटने टेकने के सिवाय उनके पास कोई ऐसा एजेंडा नहीं जो प्रदेश के विकास के लिए हो। अयोध्या, मथुरा या काशी के उत्थान के लिए हो, उनकी पहचान को पौराणिक पहचान दिलाने के लिए हो।”
तुष्टिकरण बनाम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
अखिलेश यादव की मौजूदा राजनीतिक छटपटाहट यह साफ करती है कि वे एक तरफ अपने पारंपरिक मुस्लिम मतदाताओं को छिटकने नहीं देना चाहते, और दूसरी तरफ भाजपा के मजबूत हिंदू वोट बैंक में दरार डालना चाहते हैं। लेकिन राम मंदिर जैसे बेहद संवेदनशील और आस्था से जुड़े विषय पर इस तरह की बहानेबाजी और ‘हिंदू बनाम हिंदू’ की खाई पैदा करने की कोशिशें जनता की नजरों से छिपी नहीं हैं।
1990 के कारसेवक गोलीकांड का काला इतिहास और हाल के दिनों में तुष्टिकरण की राजनीति के जो सबूत (जैसे गंगा पर इफ्तार पार्टियां) सामने आए हैं, वे समाजवादी पार्टी की धर्मनिरपेक्षता के दावों की पोल खोलते हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सीधी चुनौतियों और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मजबूत नैरेटिव के सामने अखिलेश यादव का यह नया राजनीतिक प्रयोग फिलहाल पूरी तरह असफल होता दिखाई दे रहा है।
कुल मिलाकर देखें तो अखिलेश यादव की मौजूदा रणनीति पूरी तरह बेनकाब हो चुकी है। चूँतकि मतदाता अब तुष्टिकरण और छद्म धर्मनिरपेक्षता के खेल को अच्छी तरह समझने लगा है, ऐसे में अखिलेश यादव के लिए ‘हिंदू बनाम हिंदू’ का यह प्रोपेगेंडा उल्टा पड़ता दिखाई दे रहा है।
फुटबॉल में सबसे ख़तरनाक टीम वह नहीं होती जिसके पास सबसे बड़े सितारे हों। सबसे ख़तरनाक टीम वह होती है, जिसे हारने का डर नहीं होता। विश्व कप का इतिहास बार-बार यही सिखाता आया है कि नॉकआउट फुटबॉल में प्रतिष्ठा, इतिहास और ट्रॉफियाँ केवल कागज़ पर लिखी बातें हैं। मैदान पर अंततः वही टीम जीतती है जो अंतिम सीटी तक उम्मीद नहीं छोड़ती।
एक ऐतिहासिक जापानी एनीमे सीरीज़ है, Neon Genesis Evangelion। उसमें एक यादगार किरदार है मिसातो कात्सुरागी। इस सीरीज़ में वह कहती हैं, “Giving up halfway is worse than never trying at all.” अर्थात, बीच रास्ते हार मान लेना, कभी कोशिश ही न करने से भी अधिक बुरा है।
बीती रात और आज खेले गए फीफा विश्व कप के राउंड ऑफ 32 के मुकाबलों ने इस एक पंक्ति को बार-बार सच साबित किया। कहीं आख़िरी मिनट में वापसी हुई, कहीं इतिहास बदल गया और कहीं हारने वाली टीम भी पूरे विश्व का दिल जीतकर मैदान से बाहर निकली। फुटबॉल के लिहाज़ से यह सिर्फ़ एक नॉकआउट राउंड ना होकर साहस, धैर्य और उम्मीद का उत्सव था।
इस कहानी की शुरुआत होती है ह्यूस्टन से, जहाँ पाँच बार की विश्व विजेता ब्राज़ील के सामने थी एशिया की सबसे अनुशासित और निडर टीम- जापान।
सबसे पहले बीती रात ह्यूस्टन के स्टेडियम में ब्राज़ील का सामना एशियाई महाद्वीप के ‘जाएंट स्लेयर’ जापान से था। स्टेडियम में बड़ी संख्या में दर्शक मौजूद थे। पीली जर्सियाँ पहने ब्राज़ीलियाई समर्थक अपनी टीम का उत्साह बढ़ाने पहुँचे थे, जबकि जापान इतिहास रचने की उम्मीद के साथ मैदान में उतरा था।
मैच शुरू होते ही दोनों टीमों ने आक्रामक रुख अपनाया। दोनों की कोशिश थी कि शुरुआती बढ़त हासिल कर मुकाबले को अतिरिक्त समय या पेनाल्टी शूटआउट तक जाने से रोका जाए। पहले हाफ में जापान ने अपेक्षाकृत अधिक संगठित और आत्मविश्वास भरा खेल दिखाया। उसके खिलाड़ी लगातार ब्राज़ील पर दबाव बनाए रखते रहे।
मैच के 29वें मिनट में 25 वर्षीय काएशू सानो ने शानदार गोल दागकर जापान को 1-0 की बढ़त दिला दी। यह जापान की राष्ट्रीय टीम के लिए उनका पहला अंतरराष्ट्रीय गोल था। विश्व कप के नॉकआउट मुकाबले में, वह भी ब्राज़ील जैसी दिग्गज टीम के खिलाफ, अपनी राष्ट्रीय टीम के लिए पहला गोल करना किसी भी खिलाड़ी के लिए अविस्मरणीय क्षण होता। गोल होते ही स्टेडियम में सनसनी फैल गई।
इसके बाद विनीसियस जूनियर और उनके साथी खिलाड़ियों ने लगातार बराबरी हासिल करने की कोशिश की, लेकिन जापान ने अनुशासित रक्षात्मक खेल का शानदार प्रदर्शन किया। गोलकीपर सुज़ुकी ने भी कई अहम बचाव करते हुए ब्राज़ील को निराश किया। पहले हाफ की समाप्ति तक स्कोर 1-0 से जापान के पक्ष में रहा। ब्राज़ीलियाई समर्थकों का पीला समंदर चिंता में डूबा दिखाई दे रहा था।
दूसरे हाफ की शुरुआत के साथ ही ब्राज़ील पूरी तरह बदली हुई टीम की तरह मैदान पर उतरा। खिलाड़ियों की ऊर्जा, आक्रामकता और प्रतिबद्धता पहले से कहीं अधिक दिखाई दे रही थी। इसका असर भी ज्यादा देर तक इंतज़ार नहीं करवाता।
अनुभवी मिडफील्डर कैसेमीरो ने जापानी रक्षा पंक्ति को चकमा देते हुए एक शानदार हेडर लगाया। गेंद सीधे जाल में समा गई और ब्राज़ील ने मुकाबले में 1-1 की बराबरी कर ली। पूरे स्टेडियम में फिर से जान लौट आई।
इसके बाद मुकाबला लगातार रोमांचक होता गया। ब्राज़ील ने आक्रमणों की रफ्तार और तेज कर दी, जबकि जापानी खिलाड़ी पूरे समर्पण के साथ रक्षा करते रहे। सुज़ुकी लगातार बेहतरीन बचाव करते हुए अपनी टीम को मुकाबले में बनाए हुए थे। समय बीतने के साथ ऐसा लगने लगा कि मैच अतिरिक्त समय में जाएगा।
लेकिन फुटबॉल का सबसे बड़ा आकर्षण यही है कि अंतिम सीटी बजने तक कुछ भी निश्चित नहीं होता। ब्राज़ील लगातार हमले कर रहा था। दाएँ फ्लैंक से आया एक आक्रमण जापानी रक्षा पंक्ति से टकराकर उछला और गेंद जर्सी नंबर 22 पहने गैब्रिएल मार्टिनेली के सामने आ गिरी। उनके सामने दो जापानी डिफेंडर मौजूद थे। मार्टिनेली ने एक पल भी गंवाए बिना शानदार नियंत्रण दिखाया और गोलकीपर को छकाते हुए गेंद को गोलपोस्ट के दाएँ कोने में पहुँचा दिया।
ह्यूस्टन का स्टेडियम खुशी से गूंज उठा। ब्राज़ीलियाई समर्थकों का उत्साह चरम पर था। कुछ ही मिनट बाद रेफरी ने अंतिम सीटी बजाई और ब्राज़ील ने 2-1 से मुकाबला जीतकर अगले दौर (राउंड ऑफ 16) में अपनी जगह पक्की कर ली।
उधर, जापानी खिलाड़ियों के चेहरों पर निराशा साफ झलक रही थी। कई खिलाड़ियों की आँखें नम थीं। उनके समर्थकों के लिए भी यह हार बेहद भावुक करने वाली थी। मैच समाप्त होते ही मुख्य कोच हाजिमे मोरियासु मैदान पर पहुँचे और अपने खिलाड़ियों को गले लगाकर उनके साहस, अनुशासन और जुझारूपन की सराहना की। स्टैंड्स में मौजूद जापानी समर्थकों ने तालियों की गड़गड़ाहट से अपनी टीम का उत्साह बढ़ाया। जवाब में खिलाड़ियों और कोचिंग स्टाफ ने झुककर अपने समर्थकों का अभिवादन किया।
दरअसल, जापान के लिए यह विश्व कप शुरू होने से पहले ही चुनौतियों से भर गया था। टूर्नामेंट से पहले उसके कई प्रमुख खिलाड़ी चोटों से जूझ रहे थे। काओरू मितोमा और ताकुमी मीनामिनो पहले ही बाहर हो चुके थे। टूर्नामेंट शुरू होने से लगभग एक सप्ताह पहले कप्तान वातारू एंडो भी चोटिल होकर पूरी प्रतियोगिता से बाहर हो गए। इसके बाद स्टार खिलाड़ी टाकेफुसा कुबो भी पहले ही मैच के दौरान चोटिल हो गए और आगे नहीं खेल सके।
इन तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद जापान ने जिस साहस, अनुशासन और सामूहिक खेल का प्रदर्शन किया, उसने दुनिया भर के फुटबॉल प्रेमियों का दिल जीत लिया। वे भले ही यह मुकाबला हारकर घर लौटेंगे, लेकिन अपने प्रदर्शन से उन्होंने सम्मान, प्रशंसा और असंख्य शुभकामनाएँ जरूर अर्जित कर ली हैं।
आज खेले गए राउंड ऑफ 32 के बाकी तीनों मुकाबले किसी बेहतरीन मलयाली क्राइम थ्रिलर से कम रोमांचक नहीं थे। ब्राज़ील को जापान के खिलाफ अंतिम क्षणों तक संघर्ष करना पड़ा, लेकिन वह तो मानो इस नाटकीय दिन की भूमिका भर थी। असली कहानी अभी बाकी थी।
अगला मुकाबला बोस्टन में खेला जाना था, जहाँ चार बार की विश्व विजेता और खिताब की प्रबल दावेदार जर्मनी का सामना दक्षिण अमेरिकी टीम पराग्वे से था।
मुख्य कोच जूलियन नागेल्समान ने अपनी टीम को 4-2-3-1 फॉर्मेशन में मैदान पर उतारा। पिछले मुकाबले में इक्वाडोर से मिली हार को पीछे छोड़ते हुए जर्मनी जीत के साथ क्वार्टर फाइनल में जगह बनाना चाहता था। दूसरी ओर पराग्वे की टीम पर किसी तरह का अतिरिक्त दबाव नहीं था। वह पूरे आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरी थी और जानती थी कि यदि उसने शुरुआती दबाव झेल लिया, तो जर्मनी की बेचैनी ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।
मैच की शुरुआत अपेक्षा के अनुरूप हुई। जर्मनी ने गेंद पर नियंत्रण बनाए रखा और लगातार छोटे-छोटे पासों के जरिए खेल को आगे बढ़ाने की कोशिश की। लेकिन उसके अधिकांश आक्रमण अंतिम तिहाई तक पहुँचते-पहुँचते बिखर जाते। पराग्वे ने अपनी रक्षापंक्ति को बेहद अनुशासित रखा और जर्मन खिलाड़ियों को खुलकर खेलने का अवसर नहीं दिया। जर्मनी के पास गेंद जरूर अधिक थी, लेकिन उसके खेल में वह धार दिखाई नहीं दे रही थी जिसकी उससे उम्मीद की जाती है। पेनाल्टी बॉक्स के आसपास पहुँचने के बाद भी निर्णायक पास और सटीक फिनिशिंग का अभाव साफ़ नज़र आ रहा था। दूसरी ओर पराग्वे हर अवसर का धैर्यपूर्वक इंतज़ार कर रहा था।
फिर आया मैच का 42वाँ मिनट।
पराग्वे को कॉर्नर किक मिली। गेंद बॉक्स के भीतर पहुँची और महज़ साढ़े पाँच फ़ुट लंबे 22 वर्षीय जूलियो इनसिसो ने ऊँची छलांग लगाते हुए शानदार हेडर लगाया। गेंद सीधे जाल में समा गई और पराग्वे ने 1-0 की अप्रत्याशित बढ़त हासिल कर ली।
गोल होते ही पराग्वे के खिलाड़ी खुशी से झूम उठे, जबकि जर्मन डगआउट में सन्नाटा पसर गया। स्टेडियम में मौजूद हजारों जर्मन समर्थक कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत हो गए। पहले हाफ की समाप्ति तक यही स्कोर बना रहा। हाफ टाइम के दौरान नागेल्समान अपने खिलाड़ियों से लंबी चर्चा करते दिखाई दिए। स्पष्ट था कि अब केवल गेंद पर कब्ज़ा बनाए रखना पर्याप्त नहीं होगा। जर्मनी को परिणाम चाहिए था।
दूसरे हाफ की शुरुआत के साथ ही जर्मन टीम ने अपने खेल की गति बढ़ा दी। लगातार दबाव का असर आखिरकार 56वें मिनट में दिखाई दिया। फ्लोरियन विर्ट्ज़ ने शानदार विज़न का परिचय देते हुए सटीक पास काई हावर्ट्ज़ तक पहुँचाया। हावर्ट्ज़ ने बिना कोई गलती किए गेंद को गोलपोस्ट के भीतर भेज दिया और जर्मनी ने मुकाबले में 1-1 की बराबरी कर ली।
इसके बाद ऐसा लगा कि अब मैच पूरी तरह जर्मनी की ओर झुक जाएगा। लेकिन पराग्वे ने हार नहीं मानी। उसकी पूरी टीम एकजुट होकर रक्षण करती रही। जर्मनी लगातार गोल की तलाश में आक्रमण करता रहा, लेकिन हर बार पराग्वे का कोई न कोई खिलाड़ी उसके सामने दीवार बनकर खड़ा हो गया। कई मौकों पर जर्मनी बेहद करीब पहुँचा, लेकिन अंतिम स्पर्श या तो चूक गया या फिर पराग्वे की रक्षापंक्ति ने खतरे को टाल दिया।
90 मिनट का निर्धारित समय समाप्त हुआ और स्कोर 1-1 पर बराबर रहा। मुकाबला अतिरिक्त समय में पहुँच गया। एक्स्ट्रा टाइम शुरू होते ही पराग्वे ने रणनीतिक बदलाव किया। अनुभवी मिडफील्डर मिगुएल अलमिरोन को बाहर बुलाकर एक अतिरिक्त डिफेंडर मैदान पर उतारा गया। संदेश बिल्कुल साफ़ था; अब हर हाल में मैच को पेनाल्टी शूटआउट तक ले जाना है।
दूसरी ओर जर्मनी किसी भी कीमत पर शूटआउट से बचना चाहता था।
जोशुआ किमिख, निक वोल्टेमाडे, फ्लोरियन विर्ट्ज़ और काई हावर्ट्ज़ लगातार अवसर बनाने की कोशिश करते रहे। गेंद बार-बार पराग्वे के पेनाल्टी क्षेत्र में पहुँचती, लेकिन हर बार कोई न कोई लाल-सफेद जर्सी उसके सामने आ खड़ी होती। पराग्वे का सामूहिक रक्षण पूरे मुकाबले में उसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा।
एक अवसर पर काई हावर्ट्ज़ ने फिर शानदार हेडर लगाया, लेकिन वह भी गोल में तब्दील नहीं हो सका। धीरे-धीरे अतिरिक्त समय भी समाप्ति की ओर बढ़ा। पूरे 120 मिनट बीत गए, लेकिन दोनों टीमें एक-दूसरे की बराबरी पर रहीं। अब फैसला पेनाल्टी शूटआउट से होना था।
पहली कुछ पेनाल्टियों के बाद मुकाबला बराबरी पर चलता रहा, लेकिन फिर दबाव ने जर्मनी का साथ छोड़ दिया। काई हावर्ट्ज़, निक वोल्टेमाडे और जोनाथन ताह अपनी-अपनी पेनाल्टी को गोल में तब्दील नहीं कर सके। दूसरी ओर पराग्वे ने संयम बनाए रखा और आखिरकार शूटआउट 4-3 से अपने नाम कर लिया।
अंतिम पेनाल्टी गोल में जाते ही पराग्वे के खिलाड़ी मैदान पर दौड़ पड़े। बेंच से पूरा कोचिंग स्टाफ खुशी में मैदान के भीतर आ गया। खिलाड़ियों की आँखों में अविश्वास और खुशी एक साथ दिखाई दे रही थी। उन्होंने विश्व फुटबॉल की सबसे सफल टीमों में से एक को विश्व कप से बाहर कर दिया था।
इसके साथ ही एक नया इतिहास भी दर्ज हुआ।
यह पहली बार था जब जर्मनी विश्व कप के किसी पेनाल्टी शूटआउट में पराजित हुआ। वर्षों तक शूटआउट में अजेय रहने वाली जर्मन टीम आखिरकार इस बार दबाव के आगे टिक नहीं सकी।
मैच के बाद सोशल मीडिया पर कुछ प्रशंसकों ने मज़ाकिया अंदाज़ में इसे ‘मेसुत ओज़िल का श्राप’ तक कहना शुरू कर दिया। हालांकि यह केवल प्रशंसकों की प्रतिक्रिया थी, लेकिन इतना तय है कि लगातार तीसरे विश्व कप में अपेक्षाकृत कमज़ोर मानी जा रही टीम के हाथों जर्मनी की विदाई उसके फुटबॉल ढाँचे पर गंभीर सवाल खड़े करेगी। कप्तान जोशुआ किमिख सहित कई वरिष्ठ खिलाड़ियों के लिए यह शायद विश्व कप का आख़िरी अध्याय साबित हो। आने वाले वर्षों में जर्मन फुटबॉल को बड़े बदलावों से गुजरना पड़ सकता है।
उधर, पराग्वे में जश्न का माहौल था। खिलाड़ियों ने अपने समर्थकों के साथ इस ऐतिहासिक जीत का भरपूर उत्सव मनाया। विश्व कप ने एक बार फिर साबित कर दिया कि नॉकआउट फुटबॉल में इतिहास, प्रतिष्ठा और पिछले रिकॉर्ड तभी तक मायने रखते हैं, जब तक रेफरी पहली सीटी नहीं बजाता।
अब बारी थी दिन के तीसरे और अंतिम मुकाबले की। मेक्सिको के नुएवो लिओन प्रांत के खूबसूरत स्टेडियम में नीदरलैंड्स और मोरक्को आमने-सामने थे। एक ओर युवा और अनुभवी खिलाड़ियों का संतुलित मिश्रण लिए टीम ओरांजे थी, तो दूसरी ओर वह मोरक्को, जिसने पिछले कुछ वर्षों में अपने जुझारू खेल से दुनिया भर के फुटबॉल प्रेमियों के दिलों में खास जगह बना ली थी। ‘एटलस लायंस’ के नाम से मशहूर यह टीम एक और बड़े उलटफेर के इरादे से मैदान में उतरी थी।
रेफरी की सीटी बजते ही मुकाबले की शुरुआत हुई। शुरुआती कुछ मिनटों में नीदरलैंड्स ने आक्रामक रुख अपनाया और मोरक्को के पाले में लगातार दबाव बनाने की कोशिश की। लेकिन जैसे-जैसे मैच आगे बढ़ा, मोरक्को ने लय पकड़नी शुरू कर दी। उसके खिलाड़ी आत्मविश्वास के साथ गेंद पर नियंत्रण बनाए रखने लगे और धीरे-धीरे खेल की रफ्तार अपनी शर्तों पर तय करने लगे।
पहले हाफ में दोनों टीमों ने कुछ अच्छे मौके बनाए, लेकिन कोई भी उन्हें गोल में तब्दील नहीं कर सका। मोरक्को का मिडफील्ड लगातार गेंद पर नियंत्रण बनाए हुए था, जबकि नीदरलैंड्स जवाबी हमलों के जरिए अवसर तलाश रहा था। निर्धारित 45 मिनट समाप्त होने तक स्कोर 0-0 ही रहा, लेकिन मैच का रोमांच लगातार बढ़ता जा रहा था।
दूसरे हाफ की शुरुआत के बाद भी मुकाबले का स्वरूप बहुत अधिक नहीं बदला। मोरक्को ने गेंद पर अपना प्रभाव बनाए रखा और लगातार डच रक्षा पंक्ति को परखता रहा। दूसरी ओर नीदरलैंड्स अपेक्षाकृत नीरस और बिखरा हुआ फुटबॉल खेलता दिखाई दिया। उसकी ओर से वह धार नज़र नहीं आ रही थी जिसने पूरे टूर्नामेंट में उसे खिताब का दावेदार बनाया था।
डच गोलकीपर ने हालांकि कुछ बेहद महत्वपूर्ण बचाव किए और अपनी टीम को मुकाबले में बनाए रखा। ऐसा लगने लगा था कि यदि किसी टीम को गोल मिलेगा तो वह मोरक्को होगी।
लेकिन फुटबॉल अक्सर वही कहानी लिखता है जिसकी सबसे कम उम्मीद होती है।
72वें मिनट में नीदरलैंड्स ने तेज़ जवाबी हमला बोला। गेंद को तेजी से आगे बढ़ाया गया और आखिरकार कोडी गाक्पो ने सटीक फिनिश करते हुए नीदरलैंड्स को 1-0 की बढ़त दिला दी।
गोल होते ही उनके साथी खिलाड़ी खुशी से उनकी ओर दौड़े, लेकिन गाक्पो की आँखों में मुस्कान नहीं थी। वह भावुक होकर मैदान पर रो पड़े। दरअसल, कुछ ही दिन पहले गाक्पो और उनकी साथी ने अपने अजन्मे शिशु को खो दिया था। उस निजी पीड़ा के बीच विश्व कप के मंच पर आया यह गोल उनके लिए केवल एक खेल उपलब्धि नहीं था, बल्कि गहरे व्यक्तिगत भावनाओं का विस्फोट भी था। उनके साथी खिलाड़ियों ने उन्हें घेर लिया और पूरे स्टेडियम में कुछ क्षणों के लिए एक अलग ही भावनात्मक वातावरण बन गया।
इसके बाद मुकाबला और तेज़ हो गया। मोरक्को ने बराबरी के लिए पूरी ताकत झोंक दी। लगातार हमले होने लगे और डच खिलाड़ी अपनी बढ़त बचाने में जुट गए। समय तेजी से बीत रहा था और ऐसा लगने लगा था कि नीदरलैंड्स किसी तरह यह मुकाबला जीत लेगा।
लेकिन फिर आया इंजरी टाइम।
90+1वें मिनट में मोरक्को ने शानदार मूव तैयार किया। तेज़ पासिंग के बाद गेंद डच पेनाल्टी बॉक्स में पहुँची और उसे गोल में बदल दिया गया। स्कोर 1-1 हो गया। पूरे स्टेडियम में मौजूद मोरक्को के समर्थक खुशी से झूम उठे, जबकि नीदरलैंड्स के खिलाड़ियों के चेहरे पर अविश्वास साफ दिखाई दे रहा था।
निर्धारित समय समाप्त हुआ और मुकाबला अतिरिक्त समय में चला गया।
एक्स्ट्रा टाइम में दोनों टीमों ने जीत हासिल करने की पूरी कोशिश की। मोरक्को का आत्मविश्वास बढ़ चुका था, जबकि नीदरलैंड्स लगातार दबाव में दिखाई दे रहा था। दोनों ओर से कुछ अवसर बने, लेकिन कोई भी निर्णायक साबित नहीं हुआ। 120 मिनट पूरे होने के बाद भी स्कोर 1-1 ही रहा और अब फैसला पेनाल्टी शूटआउट से होना था। शूटआउट शुरू हुआ। दोनों टीमों के खिलाड़ी बारी-बारी से पेनाल्टी लेने लगे। लेकिन इस बार मोरक्को के सबसे भरोसेमंद खिलाड़ी यासीन बोनू एक बार फिर दीवार बनकर खड़े हो गए। उनके शानदार बचावों ने नीदरलैंड्स की उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
आखिरकार मोरक्को ने पेनाल्टी शूटआउट 3-2 से जीत लिया और लगातार एक और यूरोपीय दिग्गज को विश्व कप से बाहर का रास्ता दिखा दिया।
कई लोग इसे दिन का एक और बड़ा उलटफेर कहेंगे, लेकिन जिसने पूरा मुकाबला देखा होगा, वह शायद इस निष्कर्ष से पूरी तरह सहमत न हो। मोरक्को ने अधिकांश समय खेल की गति नियंत्रित रखी, गेंद पर बेहतर पकड़ दिखाई और पूरे मुकाबले में कहीं अधिक आत्मविश्वास के साथ खेलता नज़र आया। उसके प्रदर्शन ने यह साबित कर दिया कि यह जीत किसी संयोग का परिणाम नहीं थी, बल्कि पूरे 120 मिनट के अनुशासित और धैर्यपूर्ण खेल का पुरस्कार थी। इस हार के साथ नीदरलैंड्स का विश्व कप अभियान समाप्त हो गया, जबकि मोरक्को लगातार दूसरी बार फुटबॉल जगत को यह याद दिलाने में सफल रहा कि अब उसे केवल ‘डार्क हॉर्स’ कहकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। खैर, अब नज़रें आज रात खेले जाने वाले मुकाबलों पर होंगी।
भारतीय समयानुसार रात साढ़े दस बजे डलास में कोटे डी आइवोर का सामना नॉर्वे से होगा। नॉर्वे के पास एरलिंग हालांड की अगुवाई में बेहद मजबूत आक्रमण है, जबकि कोटे डी आइवोर पूरे टूर्नामेंट में अपने जुझारूपन और आक्रामक तेवर से प्रभावित करता आया है। ऐसे में यह मुकाबला किसी भी दिशा में जा सकता है।
इसके बाद भारतीय समयानुसार रात ढाई बजे फ्रांस और स्वीडन आमने-सामने होंगे। न्यू जर्सी में खेले जाने वाले इस मुकाबले में दोनों टीमों के पास कई खतरनाक गोल स्कोरर मौजूद हैं। हालांकि फ्रांस का पलड़ा भारी माना जा रहा है। पिछले मुकाबले में उस्मान डेंबेले ने मात्र 32 मिनट के भीतर हैट्रिक लगाकर यह बता दिया था कि उन्हें थोड़ी-सी भी जगह देना किसी भी टीम के लिए कितना महंगा साबित हो सकता है। स्वीडन को यदि क्वार्टर फाइनल में पहुँचना है तो उसकी रक्षापंक्ति को पूरे मुकाबले में लगभग त्रुटिहीन प्रदर्शन करना होगा।
इसके बाद अपने घरेलू समर्थकों के बीच मेक्सिको का सामना उस इक्वाडोर से होगा जिसने पिछले दौर में जर्मनी जैसी दिग्गज टीम को बाहर का रास्ता दिखाकर पूरे फुटबॉल जगत को चौंका दिया था। भारतीय समयानुसार यह मुकाबला कल सुबह साढ़े छह बजे खेला जाएगा। इक्वाडोर ने पिछले दौर में अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं, जबकि मेक्सिको को घरेलू दर्शकों का भरपूर समर्थन मिलेगा। ऐसे में यह मुकाबला भी बेहद दिलचस्प रहने की पूरी उम्मीद है। अब तक इस विश्व कप ने एक बात पूरी तरह स्पष्ट कर दी है; यह बड़े नामों का नहीं, बल्कि बड़े जज़्बे का टूर्नामेंट बन चुका है।
इक्वाडोर, पराग्वे और मोरक्को जैसी टीमों ने दिखा दिया है कि यदि विश्वास, अनुशासन और साहस साथ हों तो फुटबॉल के सबसे मजबूत किले भी ढहाए जा सकते हैं। इन टीमों का प्रदर्शन काबो वर्दे जैसी अन्य उभरती टीमों के लिए भी प्रेरणा बनेगा कि विश्व कप में कोई भी मुकाबला पहले से तय नहीं होता। यही फुटबॉल की सबसे बड़ी खूबसूरती है।
यहाँ अंतिम सीटी बजने तक कुछ भी संभव है। वीवा ला फुटबॉल।