राजधानी दिल्ली के प्रेम नगर इलाके से गायब हुए 60 वर्षीय रिटायर्ड फौजी राजेन्द्र प्रसाद को पुलिस ने ढूँढ निकाला है। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच को वह सराय रोहिल्ला रेलवे स्टेशन के पास मिले।
राजेंद्र प्रसाद ने बताया कि उनका अपहरण नहीं हुआ था और वह स्वेच्छा से पंजाब चले गए थे। वहां ब्यास में राधा-स्वामी का सत्संग सुन उनका मन बदल गया और घर लौटने का विचार किया। उन्होंने कहा कि जब वह सराय रोहिल्ला रेलवे स्टेशन पर लौटे तो पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया।
पुलिस की जाँच में खुलासा हुआ है कि पूर्व फौजी राजेंद्र प्रसाद ने खुद पर कर्ज होने के कारण यह कहानी रची थी। उसने अपने फोन से ‘सर तन से जुदा, अजमेर वाया पाकिस्तान’ का वॉट्सऐप मैसेज और पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के झंडे व कुछ क्लिपिंग का फोटो लगा हुआ मैसेज घर पर भेजा था।
पूछताछ करने पर राजेंद्र ने बताया कि वह अपने परिवार और आर्थिक समस्याओं को लेकर तनाव में थे, इसलिए वह घर से दूर रहना चाहता थे। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उन्होंने खुद ही अपने फोन से अपने परिवार को धमकी भरे मैसेज भेजे थे।
दिल्ली पुलिस के विशेष पुलिस आयुक्त (अपराध शाखा) रविंद्र यादव ने बताया, ”मूलरूप से हरियाणा में रोहतक के गाँव बोहर निवासी राजेंद्र प्रसाद प्रेम नगर सुल्तानपुरी में परिवार के साथ रहते हैं। उनके तीन बच्चे हैं। वह सात नवंबर को अचानक गायब हो गए। उन्होंने अपने मोबाइल से परिजनों को मैसेज भेजा कि सर तन से जुदा, अजमेर वाया पाकिस्तान भेजा। साथ में प्रतिबंधित संगठन पीएफआई का झंडा डाला था।”
उनके परिजनों ने 7 नवंबर 2022 को शिकायत दर्ज कराई थी कि उनके ही नंबर से ‘सर तन से जुदा इन अजमेर वाया पाकिस्तान’ का मैसेज आया है। साथ ही प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) के झंडे की फोटो भेजी गई है। परिजनों का यह भी दावा है कि कुछ मुस्लिम कई दिनों से उनका पीछा कर रहे थे।
वहीं, पूर्व सैनिक की बेटी किरन ने दावा किया था कि कुछ मुस्लिम कई दिनों से उनके पिता का पीछा कर रहे थे। यह बात उनके पिता ने खुद घर में बताई थी। उन्होंने बताया था कि पीछा करने वाले मुस्लिम उन पर अपने संगठन में शामिल होने और धर्मांतरण का दबाव बना रहे हैं। हालाँकि संगठन का नाम उन्होंने नहीं बताया था। राजेंद्र प्रसाद की छोटी बेटी गुलशन ने बताया कि उसके पिता संविदा पर प्रेम नगर स्थित सर्वोदय कन्या विद्यालय में सिक्योरिटी गार्ड के पद पर तैनात हैं।
रिएलिटी शो बिग बॉस 16 (Bigg Boss 16) में ‘वीकेंड का वार’ में शिव ठाकरे (Shiv Thakare) और अर्चना गौतम (Archana Gautam) ने लड़ाई की सारी हदें पार कर दीं। एक मामूली टिश्यू पेपर से शुरू हुआ विवाद देखते ही देखते हाथापाई में बदल गया। इस दौरान अर्चना ने शिव ठाकरे का गला पकड़ लिया। इसके बाद उन्हें शो से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। सोशल मीडिया पर इस हाथापाई का वीडियो सामने आया है। वीडियो में आप देख सकते हैं कि कैसे अर्चना शिव के गले को पकड़कर उन्हें पीछे धकेल रही हैं, लेकिन शिव ने अपने आपको बचाने के लिए उन्हें छुआ भी नहीं।
SLOW MOTION CLIP
Eviction isn’t enough now We need A legal action against #ArchanaGautam for this crime
दरअसल, शो में एक टास्क के बाद अर्चना घरवालों के लिए आने वाले टिश्यू पेपर बॉक्स और चीनी जैसी चीजें छिपाने लगीं। इस पर टीना दत्ता (Tina Datta), शालिन भनोट (Shalin Bhanot) व अन्य ने आपत्ति जताई। जब वे उससे टिश्यू बॉक्स रखने के लिए कह रहे थे, तभी अर्चना ने लड़कियों को अपमानजनक और अश्लील टिप्पणियाँ कीं। इस पर अर्चना के पास खड़े शिव ने उनसे सवाल किया और उसे दोहराने के लिए कहा। अर्चना ने उसे इससे दूर रहने को कहा।
बदले में शिव ने इनडारेक्टली उसके राजनीतिक दल के नेता का नाम लेते हुए उसका मजाक उड़ाया। इससे अर्चना चिढ़ गई और उसने शिव की गर्दन पकड़ ली। निमृत (Nimrit Kaur Ahluwalia) को इस वक्त बीच बचाव करते हुए देखा गया। अर्चना शिव को धमकी देती रही। अर्चना ने शिव को फिर धमकाते हुए कहा, “गाड़ दूँगी तुझे यहाँ।”
इसके बाद सभी घरवाले शिव ठाकरे के समर्थन में आ गए। कुछ देर बाद शिव ठाकरे को कमरे के अंदर बुलाया गया और बिग बॉस (Bigg Boss) ने शुरू में उन पर उनकी (अर्चना) राजनीतिक पार्टी का हवाला देकर अर्चना को प्रताड़ित करने का आरोप लगाया। इसके बाद उन्होंने शिव से अर्चना को लेकर फैसला करने के लिए कहा। बिग बॉस ने अर्चना को शिव से बात करने और माफी माँगने का मौका भी दिया।
हालाँकि अर्चना माफी माँगने की बजाए अपना बचाव करती रहीं और खुद को सही ठहराती रहीं। इसके बाद बिग बॉस ने उसे घर से बेघर करने का फैसला किया, जिसके बाद वह रोने लगती हैं और हाथ जोड़ती हैं। वह शिव से अपने फैसले पर फिर से विचार करने का अनुरोध करती हैं।
अर्चना शिव से कहती हैं, “मैं यहाँ से नहीं जाना चाहती हूँ। आपको चोट पहुँचाने का मेरा कोई इरादा नहीं था। बस मुझे एक मौका दें। मैं अपने माता-पिता की कसम खाती हूँ कि मैं भविष्य में इसे नहीं दोहराऊँगी। मैंने कभी भी इस तरह किसी के सामने हाथ नहीं जोड़े हैं। मेरे माँ-बाप के सपने मत तोड़ो।”
शिव ने कहा कि घर के सभी सदस्यों को लगता है कि वह अक्सर अपनी हदें पार करती हैं, लेकिन उन्होंने हमेशा उन्हें माफ कर दिया है। इसके बाद वह सभी को गले लगाती हैं और बिग बॉस के घर से बाहर निकल जाती हैं।
उल्लेखनीय है अर्चना गौतम बिग बॉस में अपनी आवाज और हर मुद्दे पर बोलने के लिए भले ही अब जानी जाती हैं लेकिन मीडिया में वो चर्चा में यूपी चुनावों के बाद से हैं। दरअसल, कॉन्ग्रेस ने चुनावों के दौरान जो ‘लड़की हूँ लड़ सकती हूँ’ मुहिम के तहत महिलाओं को टिकटें दी थीं। उसमें हस्तिनामपुर सीट से अर्चना ही कॉन्ग्रेस की प्रत्याशी थीं। उन्हें मीडिया में ‘बिकिनी गर्ल’ के नाम से जाना गया था और जब नतीजे आए थे तो उन्हें मात्र 1519 वोट मिले थे।
कर्नाटक के बेंगलुरु में एक सरकारी स्कूल के 54 साल के शिक्षक को छात्राओं के यौन शोषण के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। उस पर शारीरिक शिक्षा की कक्षाओं और लंच ब्रेक के दौरान कम से कम 15 छात्राओं का यौन उत्पीड़न करने का आरोप है। वह छात्राओं को गलत तरीके से छूता था। उन्हें चूमता था।
आरोपित शिक्षक की पहचान अंजनप्पा हेब्बल के तौर पर हुई है। वह शारीरिक शिक्षा का टीचर है। वह छात्राओं का उत्पीड़न दो-तीन महीने से कर रहा था। यह मामला तब सामने आया जब कक्षा आठ और नौ की छात्राओं ने उसके व्यवहार को लेकर अपने माता-पिता से शिकायत की। माता-पिता ने इसके बारे में स्कूल के हेडमास्टर को बताया। उन्होंने जाँच की तो छात्राओं की शिकायत सही पाई गई। इसके बाद 8 नवंबर 2022 को इसकी सूचना पुलिस को दी गई। इसके बाद आरोपित शिक्षक को गिरफ्तार कर लिया गया।
आरोपित शिक्षक पर पॉक्सो एक्ट की धारा 8 (यौन उत्पीड़न के लिए तीन से पाँच साल की जेल की सजा) धारा 12 (तीन साल तक की जेल और बच्चे के यौन उत्पीड़न के लिए जुर्माना प्रदान करना) और धारा 354 (हमला) के साथ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की संबंधित धाराओं में मामला दर्ज किया गया है।
हेब्बल पुलिस निरीक्षक दिलीप कुमार केएच ने बताया कि कक्षा 8 और 9 की छत्राओं ने सबसे पहले अपने माता-पिता को शिक्षक के व्यवहार के बारे में सूचित किया था। उन्होंने प्रधानाध्यापक से संपर्क किया, जिसके बाद में मामले की जाँच शुरू हुई।
पुलिस अधिकारी ने कहा, “मामला सामने आने के बाद शिक्षक शुरुआत में फरार हो गया था। वह चार-पाँच दिनों से स्कूल नहीं आ रहा था। हमने उसका पता लगाया और उसे बुधवार को गिरफ्तार कर लिया। अब आने वाले दिनों में स्कूल के छात्रों और शिक्षकों से मामले भी इस संबंध में पूछताछ की जाएगी।”
दिल्ली के उपमुख्यमंत्री और शराब घोटाले के मुख्य आरोपित मनीष सिसोदिया को लेकर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बड़ा खुलासा किया है। ईडी ने गुरुवार (10 नवंबर 2022) को पीएमएलए (Prevention of Money Laundering Act) कोर्ट में दावा किया कि दिल्ली की आबकारी नीति के सार्वजनिक होने से काफी पहले कुछ शराब निर्माताओं को लीक कर दी गई थी। मनीष सिसोदिया समेत 34 वीआईपी लोगों ने डिजिटल साक्ष्य मिटाने के लिए 140 बार मोबाइल फोन बदले थे।
Excise policy was leaked to liquor companies, Sisodia changed 140 phones to destroy evidence: ED https://t.co/cNAwtcvUhK
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जाँच एजेंसी ने दिल्ली की नई आबकारी नीति मामले में बुधवार (9 नवंबर 2022) देर रात दो शराब कारोबारियों को गिरफ्तार किया था। फ्रांस की शराब कंपनी पर्नोड रिकार्ड के दिल्ली क्षेत्रीय प्रमुख बिनॉय बाबू और अरबिंदो फार्मा लिमिटेड के पूर्णकालिक निदेशक पी सरथ चंद्र रेड्डी की गिरफ्तारी के बाद पीएमएलए कोर्ट में ईडी ने इस बात की जानकारी दी। ईडी ने दावा किया कि पूछताछ के दौरान आरोपितों ने खुलासा किया है कि चुनिंदा व्यापारिक समूहों को लाभ पहुँचाने के लिए शराब ठेकों के लिए 100 करोड़ रुपए का लेन-देन हुआ था।
एजेंसी ने कहा, “आबकारी घोटाले में शामिल वीआईपी लोगों ने डिजिटल साक्ष्य को नष्ट करने के इरादे से कुल 140 बार फोन (लगभग 1.20 करोड़ रुपए मूल्य के) बदले। इनमें मुख्य आरोपित, शराब कारोबारी, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और अन्य संदिग्ध हैं। फोन बदलने का समय बताता है कि ये ज्यादातर घोटाले के सामने आने के बाद बदले गए थे। हमारे पास इस बात को पुख्ता करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं कि आबकारी नीति पिछले साल 31 मई को कुछ शराब निर्माताओं के लिए लीक हुई थी, जबकि इसे दो महीने बाद 5 जुलाई, 2021 को सार्वजनिक किया गया था।”
बता दें कि दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार शराब घोटाले को लेकर चौतरफा घिरी हुई है। 30 अक्टूबर 2022 को बीजेपी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने ट्वीट कर दावा किया था कि आरटीआई से जानकारी मिली है कि दिल्ली सरकार की शराब नीति से सरकारी खजाने को करीब 2500 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है।
उन्होंने कहा था, “नई शराब नीति के तहत, दिल्ली सरकार ने 17 नवंबर 2021 से 31 अगस्त 2022 तक कुल 5,036 करोड़ रुपए कमाए, यानी प्रतिदिन 17.5 करोड़ रुपए की कमाई हुई। जबकि पुरानी शराब नीति के हिसाब से सितंबर 2022 में कुल 768 करोड़ रुपए कमाए यानी प्रतिदिन 25.6 करोड़ रुपए की कमाई हुई। इस तरह से हर दिन कम से कम 8 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है।”
बेल्जियम (Belgium) के ब्रसेल्स (Brussels) में रेलवे स्टेशन के बाहर एक पुलिस अधिकारी की चाकू मारकर हत्या कर दी गई। यह घटना गुरुवार (10 नवंबर 2022) शाम की है। बताया जा रहा है कि 29 वर्षीय हमलावर ने ‘अल्लाहू अकबर’ का नारा लगाते हुए पुलिसकर्मी को चाकू से मारा। पुलिस ने हमलावर को काबू करने के लिए उस पर गोली चलाई। घायल हमलावर को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। ब्रसेल्स में एक हफ्ते के भीतर इस तरह का यह दूसरा हमला है।
Just in: A police officer has been stabbed to death outside a train station in Brussels. The attacker was shouting ‘Allahu Akbar’ while stabbing the 29-year-old policeman. The police have neutralised the attacker. This is second such attack within a week in Brussels.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ब्रसेल्स-नॉर्थ जोन की पुलिस ब्रसेल्स के शैरबीक में रुए डी’एरशॉट (Rue d’Aerschot) पर गश्त पर थी। तभी गुरुवार शाम लगभग 7:15 बजे एक व्यक्ति अल्लाहू अकबर का नारा लगाते हुए गश्त करने वाले पुलिस अधिकारी पर हमला कर दिया। उसने पुलिसकर्मी की गर्दन पर चाकू से वार किया, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। लोक अभियोजक कार्यालय ने इसकी जाँच शुरू कर दी है।
वहीं, बेल्जियम के पुलिस अधिकारी इस घटना को आतंकवाद से जोड़कर देख रहे हैं। समाचार पत्र ले सोइर ने पुलिस के हवाले से कहा है, “हमले से पहले दोनों पुलिस अधिकारी गश्त पर थे। हमले के बाद एक अन्य गश्ती दल घटनास्थल पर पहुँचा और गोली चलाकर हमलावर को काबू में किया। अस्पताल ले जाने से पहले देखा गया कि हमलावर के पैर और पेट में गोली लगी है।”
Onze politiemensen riskeren dagelijks lijf en leden om onze samenleving veilig te houden. Dat blijkt helaas vandaag nog maar eens.
Mijn gedachten gaan uit naar de familie en vrienden van de overleden agent.
Ik hoop van harte dat het goed komt met zijn collega in het hospitaal
बेल्जियम के प्रधानमंत्री अलेक्जेंडर डे क्रू ने इस हमले पर दुख जताया है। उन्होंने ट्विटर पर लिखा, “हमारे पुलिसकर्मी देश के नागरिकों की सुरक्षा के लिए हर दिन अपनी जान जोखिम में डालते हैं। आज के हमले में एक पुलिस अधिकारी की मौत हो गई और दूसरा घायल हो गया।” उन्होंने आगे कहा, “मृतक अधिकारी के परिवार और दोस्तों के प्रति मेरी गहरी संवेदनाएँ हैं। उम्मीद है कि अस्पताल में भर्ती पुलिसकर्मी जल्द ठीक हो जाएगा।”
हमले से पहले दी थी धमकी
समाचार पत्र हेट लास्ट नीउव्स (Het Laatste Nieuws) ने बताया कि हमले से पहले हमलावर गुरुवार की सुबह एक पुलिस स्टेशन गया था और धमकी दी थी कि वह एक पुलिस अधिकारी को जान से मार डालेगा। एसीवी पुलिस ट्रेड यूनियन ने कहा कि उसे सूचना मिली थी कि एक व्यक्ति दिन में पहले पुलिस के पास गया था और हमले की धमकी दे रहा था, लेकिन उन अधिकारियों ने उसकी बात को गंभीरता से नहीं लिया और ना ही उसे गिरफ्तार किया।
बता दें कि बेल्जियम में पिछले एक दशक में कई आतंकी हमले हुए हैं। 2016 में हुए आत्मघाती बम विस्फोट में ब्रसेल्स मेट्रो और हवाई अड्डे पर 32 लोग मारे गए थे और सैकड़ों घायल हुए थे।
बाबर, हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ, औरंगजेब… इनके बारे में आपने अपनी इतिहास की किताबों में तसल्ली के साथ पढ़े होंगे। कहीं एक पूरा पन्ना इनकी बहादुरी को समर्पित देखा होगा तो कहीं पर पूरा अध्याय इन्हीं के महिमामंडन में लिखा दिखा होगा। इतिहास के नाम पर मजाल है कि भारत की उस संस्कृति सभ्यता का गुणगान मिल जाए, जिसे मुगल आक्रांताओं ने कदम रखते ही नष्ट करने का काम किया था। अगर आपको इनके बारे में पढ़ना है तो आपको पाठ्यक्रम से अतिरिक्त किताबों की ओर रुख करना होगा, क्योंकि सिलेबस में शामिल पुस्तकों में ये सब तब से गायब है, जब से भारत आजाद हुआ था और पहले शिक्षा मंत्री के तौर पर मौलाना अबुल कलाम आजाद को कमान मिली।
मुगलों के कुकर्मों को धोया, हिंदू इतिहास को छिपाया
1947 से लेकर 1958 यानी अपने इंतकाल तक मौलाना अबुल कलाम आजाद देश के शिक्षा मंत्री थे। उनके जन्मदिवस के मौके पर पूरा देश उनके नाम पर राष्ट्रीय शिक्षा दिवस मनाता है। उनके शिक्षा मंत्री बनने के बाद शिक्षा क्षेत्र में बदलावों की चर्चा करता है। लेकिन ये बात कम जगह पढ़ने को मिलती है कि ये बदलाव कैसे थे, किस दिशा में थे, किस तरीके से उन्होंने शिक्षा मंत्री होते ही मुगलों के कुकृत्यों को धो-पोंछने का काम शुरू कर दिया था और मुगलों की एक नई तस्वीर समाज में परोसी थी।
वह लगभग 11 साल शिक्षा मंत्री थे। उस दौरान उन्होंने इस क्षेत्र में ऐसे लोगों को दाखिल किया था जो या तो उसी समुदाय के थे या फिर उनका संबंध लेफ्ट विचारधारा से था। इनमें हुमायूं कबीर, एमसी छागला और फखरुद्दीन अली अहमद जैसे लोग थे। इन सबने मिलकर मुगलों को भारत के नायक के तौर पर उभारा। वहीं ये बातें गौण कर दी गईं कि मुगलों ने लगातार भारत की संस्कृति नष्ट करने के लिए हिंदुओं पर ताबड़तोड़ हमले किए, उनसे जजिया लिया, उनका धर्मांतरण करवाया, उनकी महिलाओं के साथ दुराचार किया, बच्चों को बाजारों में बेच डाला।
शिक्षा मंत्री के तौर पर अबुल कलाम द्वारा किए बदलावों पर संबंधित सामग्री (तस्वीर साभार: freedomFirst.in/hindupost.in)
हिंदुओं को किया गया बदनाम
मौलाना अबुल कलाम द्वारा शिक्षा क्षेत्र में किए गए बदलावों के बारे में अपने freedomFirst.in पर पढ़ने को मिलता है जिसमें बताया गया है कि किस तरह से आजाद ने शिक्षा मंत्री बनने के साथ इतिहास में हस्तक्षेप किया और मुगलों की लूट मार समेत तमाम कृत्यों को बताने की जगह छिपाने का काम किया। साल 2020 में इस संबंध में आईपीएस नागेश्वर राव ने अपने ट्वीट में पूरा एक थ्रेड शेयर किया था।
उन्होंने अपने ट्वीट में साफ कहा था कि भारत के इतिहास को बड़ी सफाई से ‘विकृत’ किया गया जिसमें मौलाना अबुल कलाम समेत कई मुस्लिम और वामपंथी नेताओं का हाथ था। ये लोग शिक्षा मंत्री बनकर भारतीय मन-मस्तिष्क के प्रभारी बने बैठे थे। उस दौरान इन लोगों ने सुनिश्चित किया कि हिंदुओं को उनके ज्ञान से वंचित रखा जाए, हिंदू धर्म को अंधविश्वासों के संग्रह के रूप में सत्यापित किया जाए, शिक्षा पर इस्लाम और ईसाइयत का प्रभुत्व हो, हिंदू अपनी पहचान को लेकर शर्मिंदा हों आदि।
मौलाना आजाद और वामपंथियों ने मिटाया मुस्लिमों का खूनी इतिहास: IPS अफसर ने बताया कैसे हिंदू धर्म को दिखाया नीचा#Archiveshttps://t.co/mICGmuofJs
आज वही मौलाना अबुल कलाम आजाद देश के लिबरलों को सबसे उदारवादी लगते हैं। ये सवाल पूछा जाना कि आखिर क्यों उन्होंने हिंदुओं को उनका इतिहास पढ़ने से दूर रखा गया, सबको सुई की तरह चुभता है। लेकिन जो प्रश्न यहाँ उनके शिक्षा मंत्री बनने के बाद किए गए बदलावों से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है वो ये कि आखिर उनका शिक्षा मंत्री के तौर पर चुनाव किस बिनाह पर किया गया होगा?
पीर बनाना चाहते थे अब्बा
उनकी जीवनी अगर पढ़ी जाए तो पता चलेगा कि मौलाना अबुल कलाम का पृष्ठभूमि सेकुलर भारत के शिक्षा मंत्री के तौर पर कहीं भी फिट नहीं बैठती थी। उनका जन्म इस्लामी उलेमाओं के घर हुआ था। उनका परिवार बाबर के जमाने में अफगानिस्तान जा चुका था और उनके अब्बा 1857 में मक्का गए थे। वहीं अबुल कलाम का जन्म हुआ था। उन्होंने अपने अब्बा मोहम्मद खैरुद्दीन से उर्दू सीखी थी और अम्मी से अरबी की तालीम ली थी।
उनकी शिक्षा-दीक्षा के दौरान ये ध्यान दिया गया था कि वो इस्लाम के मद्देनजर ही हो। उनके अब्बा हमेशा से चाहते थे कि अबुल उनकी तरह इस्लाम के वाहक या पीर बनें। यही वजह थी कि उन्होंने अपने बच्चों की तालीम न केवल पारसी और अरबी में करवाई, बल्कि उन्हें कुरान, हदीस और शरिया को लेकर हर जानकारी दी। बाद में मौलाना अबुल 1890 में भारत के कलकत्ता आए। 1905 में अबुल कलाम को कायरो की अल अजहर इस्लामी यूमिवर्सिटी में भेजा गया। आगे जाकर उन्होंने 1920 में भारत में शुरू हुए खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया और बाद में जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में बनीं सरकार में शिक्षा मंत्री।
अब सोचिए, शुरुआत से लेकर अंत तक एक विचारधारा में पले-पोसे अबुल कलाम शिक्षा मंत्री बनने के बाद मुगलों के कृत्यों कों क्यों न छिपाने का काम करते। वो क्यों न टीपू सुल्तान और अलाउद्दीन खिलजी के बारे में बच्चों को पढ़वाते और क्यों न अकबर को महान बताते। वो आपको क्यों सम्राट पोरस और बप्पा रावल की शूरता की गाथा परोसते?
आज उन्हीं के गढ़े सिलेबस की देन है कि भारतीय मूल्य कैसे इंसानियत के खिलाफ हैं, इस पर चर्चा होती है। लोग सती प्रथा के बारे तो जान जान जाते हैं लेकिन उन्हें तीन तलाक, हलाला जैसी कुरीतियों के बारे में पढ़ने के लिए दूसरे से ज्ञान लेने की जरूरत पड़ती है। युवा अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश के टुकड़े करने के नारे लगाते हैं, पर हिंदू नरसंहार पर चुप्पी साध लेते हैं।
गुरुवार (10 नवंबर 2022) को इंग्लैंड (England) के हाथों 10 विकेट से मिली हार के बाद भारत का टी-20 वर्ल्ड कप खेलने का सपना चकनाचूर हो गया। अब फाइनल मुकाबला इंग्लैंड और पाकिस्तान के बीच 13 नवंबर 2022 को खेला जाएगा। भारत की हार के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ (Pakistani PM Shahbaz Sharif) ने भारतीय टीम को ट्रोल करने की कोशिश की।
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की हरकत पर भारतीय फैन भड़क उठे। उन्होंने उल्टे प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को ही ट्रोल कर दिया। शरीफ ने भारतीय टीम पर तंज कसते हुए एक ट्वीट किया। इस ट्वीट में उन्होंने लिखा, “तो इस रविवार को 152/0 बनाम 170/0 है।”
बता दें कि भारत को T-20 वर्ल्ड कप 2022 के सेमीफाइनल में इंग्लैंड के हाथों 10 विकेट से हार का सामना करना है। ऐसे में इंग्लैंड का स्कोर 170/0 रहा। वहीं, पिछले T-20 वर्ल्ड कप में पाकिस्तान ने भारत को 10 विकेट से हराया था। उस वक्त पाकिस्तान का स्कोर 152/0 था।
शहबाज शरीफ के इस तंज पर भारतीय क्रिकेट प्रेमी भड़क गए। विजय कुमार राणा नाम के एक यूजर ने लिखा, “आप प्राइम मिनिस्टर हैं या पाकिस्तान के प्राइम कॉमेडियन?”
Are you Prime Minister of Pakistan or Prime Comedian?
पाकिस्तान से आकर दिल्ली में रह रहे हिंदुओं (Pakistani Hindu) की दयनीय स्थिति को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है। हाईकोर्ट ने दिल्ली में बिजली आपूर्ति करने वाली कंपनी टाटा पावर दिल्ली डिस्ट्रिब्यूशन लिमिटेड को 30 दिनों के भीतर विस्थापित हिंदुओं को बिजली कनेक्शन देने का आदेश दिया है।
जस्टिस सतीशचंद्र शर्मा और जस्टिस सुब्रह्मण्यम प्रसाद की खंडपीठ ने कहा कि इनका आधार कार्ड या दीर्घकालीन वीसा वहाँ रहने के लिए पर्याप्त आधार है। इस आधार पर वे बिजली कनेक्शन के लिए आवेदन कर सकते हैं।
इसके पहले कंपनी ने इन हिंदुओं से जमीन के मालिकाना हक का कागज माँगा था। पाकिस्तान से भागकर आए ये हिंदू वर्तमान रक्षा मंत्रालय की जमीन पर रह रहे हैं। ऐसे में केंद्र सरकार ने भी बिजली के लिए नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) जारी किया था। हालाँकि, कंपनी बिजली कनेक्शन देने से कतराती रही।
कोर्ट ने कहा कि जब संबंधित प्राधिकार ने बिजली देने की अनुमति दे दी है तो कंपनी के पास उस क्षेत्र के लोगों को बिजली कनेक्शन देने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है। उधर याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि सभी लोग बिजली का मीटर लगाने के लिए तैयार हैं, ताकि कंपनी को किसी तरह का नुकसान ना हो।
इस मामले में हरिओम नाम के एक व्यक्ति ने कोर्ट में PIL दाखिल की थी। याचिका में कहा गया था कि पाकिस्तान से आए लगभग 200 हिंदू परिवार उत्तरी दिल्ली के आदर्श नगर इलाके में कई वर्षों से रह रहे हैं। उन्हें आधार कार्ड जारी किए गए हैं और वे भारत सरकार द्वारा जारी दीर्घकालिक वीजा पर यहाँ रह रहे हैं।
याचिका में आगे कहा गया था कि क्षेत्र में छोटे बच्चे और महिलाएँ हैं और बिजली के अभाव में इन परिवारों को कठिनाइयों का सामना करते हुए जीवित रहना बहुत मुश्किल हो गया है। ऐसे में लोगों ने बिजली आपूर्ति के लिए टाटा पावर से संपर्क किया था, लेकिन उन्हें बताया गया कि उन्हें भूमि-स्वामी प्राधिकरण से NOC की आवश्यकता है।
पिछले साल ऑपइंडिया ने इन हिंदू परिवारों की समस्याओं को लेकर एक ग्राउंड रिपोर्ट की थी। उसमें इनकी बिजली की समस्या को प्रमुखता से उठाया था। ये लोग बिजली, पानी, शौचालय जैसी कई बेसिक सुविधाओं के लिए साल 2013 से ही प्रयासरत हैं। हालाँकि, इन कैम्पों में प्रधानमंत्री स्वच्छता मिशन के तहत कुछ शौचालयों का निर्माण हुआ है, लेकिन बिजली की समस्या बनी हुई थी।
आज ही के दिन 10 नवंबर 1659 मराठा राजा छत्रपति शिवाजी महाराज और आदिलशाही सेनापति अफजल खान की सेनाओं के बीच महाराष्ट्र के सतारा शहर के पास प्रतापगढ़ की लड़ाई लड़ी गई थी। लड़ाई में मराठों की संख्या शिवाजी के पक्ष में नहीं थी, इसके बाद भी विजय मराठों की हुई थी और अंतत: मराठा साम्राज्य की स्थापना हुई थी।
10 नवंबर को छत्रपति शिवाजी महाराज ने जिस साहस और कूटनीतिक सूझबूझ का उदाहरण पेश किया था, जिस एक घटना ने मराठा साम्राज्य की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उस 10 नवंबर को “शिवप्रताप दिन (ShivpratapDin)” के तौर पर याद किया जाता है।
1657 में, मुगल सम्राट औरंगजेब ने दक्कन छोड़ने और उत्तर की ओर बढ़ने का फैसला किया था। वहीं शिवाजी ने अपने मराठा साम्राज्य का विस्तार करने के लिए कोंकण और अन्य आदिलशाही राज्यों पर जीत हासिल करना शुरू कर दिया।
बीजापुर सल्तनत में आदिलशाही वंश के सेनापति अफजल खान ने शिवाजी की सेना को रोकने के लिए खुद मोर्चा संभाला। उसने पहले शिवाजी के भाई, संभाजी शाहजी भोसले को विश्वासघात कर मार डाला था, जब वह केवल 33 वर्ष के थे। खान ने मंदिरों को नष्ट करना शुरू कर दिया था।
खान की रणनीति थी कि शिवाजी को पठार से हटाकर दक्कन के मैदानी इलाकों में लाया जाए। चट्टान क्षेत्र में शिवाजी अपनी रणनीति की वजह से अधिक मजबूत थे। खान 20,000 से अधिक आदिलशाही घुड़सवार सेना और 15,000 पैदल सेना के साथ शिवाजी से युद्ध लड़ने पहुँचे। वहीं शिवाजी महज 3000 पैदल सेना से लैस थे। खान और शिवाजी प्रतापगढ़ की तलहटी में मिले। शिवाजी ने खान के पास एक दूत भेजा कि वह युद्ध नहीं करना चाहते हैं और शांति चाहते हैं।
उन्होंने केवल 10 अंगरक्षकों के साथ निहत्थे मिलने का फैसला किया था, जो दो आदमियों से एक तीर की दूरी पर रहेंगे। एक विशाल कद काठी के व्यक्ति, खान ने शिवाजी को गले लगाया, लेकिन उसने विश्वासघात किया और उन्हें तलवार से मारने की कोशिश की। हालाँकि, शिवाजी भी सशस्त्र आए थे और, जिन्होंने एक बाघनख छुपाया हुआ था और उसी बाघनख से खान का पेट फाड़ मौत के नींद सुला दिया। खान ज्यादा सैनिकों के साथ आए थे, फिर भी मराठे विजयी हुए।
बाघनख
शिवाजी पर अफजल के अंगरक्षक सैय्यद बंदा ने हमला किया था, लेकिन उनके (शिवाजी) के भरोसेमंद अंगरक्षक जीवा महला ने शिवाजी की जान बचाते हुए उन्हें मार डाला था। शिवाजी के पराक्रम और साहस की ऐसी ही कई गाथा है कि पूरे भारत में उनका सम्मान किया जाता है।
हालाँकि अफजल खान की उचित अंत्येष्टि के अधिकार का सम्मान करते हुए उसे उसी स्थान पर दफना दिया गया और उसके ऊपर एक पत्थर रख दिया गया था।
दो दशक पहले तक किला परिसर में अफजल खान की कब्र पर किसी का ध्यान नहीं गया था। वर्ष 2000 के आसपास कुछ मुस्लिमों द्वारा कब्र पर दावा करने और उस पर मजार बनाने के फैसले के बाद इसे प्रमुखता मिली। धीरे-धीरे एक दशक में कब्र पर चारों तरफ से एक आर्केड के साथ एक स्थायी संरचना खड़ी कर दी गई। कहा जाता है कि एस्बेस्टस शीट्स की छत से ढके इंटीरियर में कमरे बने हैं और यहाँ घुमंतू मुस्लिम मौलानाओं को शरण दी जाती है।
यह अवैध निर्माण ‘हजरत मोहम्मद अफजल खान मेमोरियल ट्रस्ट’ के नाम से किया गया था और इसके तहत किले के लगभग 5,500 वर्ग फुट जगह पर कब्जा कर लिया था। इसके अलावा, वर्ष 2004 में विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने ASI नियंत्रित इस जगह की भूमि पर अवैध कब्जे के खिलाफ आपत्ति उठाई। VHP ने कहा कि अगर कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन किया जाएगा। इसके बाद महाबलेश्वर पुलिस ने किले और मकबरे के आसपास सुरक्षा बढ़ा दी थी।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने तब राज्य सरकार को अफजल खान की कब्र के आसपास अवैध निर्माण को हटाने का निर्देश दिया था। बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस एससी धर्माधिकारी ने कहा था, “अफजल खान की कब्र के आसपास के अतिक्रमण को हटा दें या वन अधिकारियों को स्थायी रूप से जंगल में भेज दें, अगर वे अपना कर्तव्य नहीं निभा सकते हैं।” सतारा जिले के किला प्रतापगढ़ की तलहटी में अफजल खान की कब्र में हाल के वर्षों में वास्तव में तेजी से बदलाव हो रहे थे। इस्लामवादियों ने इस स्थान पर मेलों का आयोजन भी शुरू कर दिया था।
ताजा जानकारी के अनुसार, महाराष्ट्र पुलिस ने गुरुवार (10 नवंबर 2022) को सतारा स्थित फोर्ट प्रतापगढ़ (महाबलेश्वर) में अफजल खान की कब्र के पास अवैध निर्माण को हटाने के लिए अभियान शुरू किया है। वहीं मनसे के प्रवक्ता गजानन काले ने अफजल खान को महिमा मंडित करने वालों पर बुलडोजर चलाने की माँग की है। उन्होंने कहा, ”अफजल खान की कब्र के सामने हुए अनधिकृत निर्माण को जैसे हटाया गया ठीक वैसे ही अफजल खान को महिमा मंडित करने वालों पर बुलडोजर भी चलाया जाए। अफजल खान की विचारधारा का अतिक्रमण हटेगा तो वह अच्छा दिन होगा। अगर एनसीपी के जितेंद्र आव्हाड इस कदम के खिलाफ अनशन पर बैठना चाहते हैं तो उन्हें अनशन पर बैठना चाहिए। सरकार को बधाई।”
अफझल खानाच्या कबरी समोरचे अनधिकृत बांधकाम हटवलं अगदी तसंच
अफजलखानाचे उद्दातीकरण करणाऱ्यांवरही बुलडोझर चालवला पाहिजे. अफजलखानच्या विचारधारेचे अतिक्रमण हटेल तो सुदिन असेल. या कारवाई विरोधात राष्ट्रवादीच्या जितेंद्र आव्हाड यांना उपोषणाला बसायचं असेल तर खुशाल बसावं. सरकारचे अभिनंदन
रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध (Russia-Ukrain War) के कारण जिन भारतीय छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हुई है, उनके लिए राहत की खबर आई है। यूक्रेन में मेडिकल की पढ़ाई करने वाले भारतीय छात्रों को रूस अपने यहाँ के कॉलेजों में पढ़ाई की सुविधा मुहैया कराएगा। रूस ने ऐसे छात्रों को अपना पाठ्यक्रम पूरा करने के लिए आमंत्रित किया है।
चेन्नई में रूस के महावाणिज्य दूत ओलेग अवदीव ने इसकी घोषणा करते हुए कहा, “यूक्रेन छोड़ने वाले भारतीय छात्र रूस में अपनी शिक्षा जारी रख सकते हैं, क्योंकि चिकित्सा पाठ्यक्रम लगभग समान है। वे लोगों की भाषा जानते हैं। उनमें से अधिकांश रूसी बोलते हैं। रूस में उनका स्वागत है।”
Indian students who left Ukraine can continue their education in Russia as medical syllabus is almost the same (as Ukraine). They know the language of people, as in Ukraine, most of them spoke Russian. They're most welcome in Russia: Oleg Avdeev, Consul Gen of Russia in Chennai pic.twitter.com/2O7CMTV5gg
बता दें कि युद्ध से पहले यूक्रेन में करीब 18000 भारतीय छात्र पढ़ाई करते थे। युद्ध शुरू होने के बाद भारत सरकार ने बचाव कार्य शुरू कर इन्हें भारत लाया था। इसके लिए केंद्र सरकार ने केंद्रीय मंत्रियों की टीमें भी गठित की गई थीं, जो यूक्रेन से सीमा साझा करने वाले देशों में जाकर यूक्रेन से छात्रों को भारत लाने में लगे हैं।
दरअसल भारत में डॉक्टर बनने की चाह रखने वाले स्टूडेंट के लिए भारत सरकार अखिल भारतीय स्तर पर हर साल NEET की परीक्षा आयोजित करती है। इसमें हर साल करीब 8 लाख छात्र इस परीक्षा को क्लियर कर पाते हैं। देश के मेडिकल कॉलेजों में करीब 90,000 सीटें हैं और इनमें से आधी सीटें सरकारी मेडिकल कॉलेजों में हैं।
ऐसे में सीटों की कमी बाकी के छात्र-छात्राओं को विदेशों का रुख करना पड़ता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के प्राइवेट सेक्टर के कॉलेजों में करीब 20 लाख रुपए प्रतिवर्ष का खर्च होता हैं। वहीं यूक्रेन में मेडिकल की पढ़ाई में हर साल करीब 10 लाख रुपए लगते हैं।