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बिहार के गया में देवताओं की मूर्तियाँ तोड़ी, पुजारी का भी सुराग नहीं: सीता कुंड के सामने स्थित पंचदेव मंदिर बना निशाना, भारी पुलिस बल तैनात

बिहार के गया में पंचदेव मंदिर में देवताओं की मूर्तियाँ खंडित कर दी गई है। मंदिर के पुजारी को अगवा करने की बात भी कही जा रही है। घटना 25 अक्टूबर 2022 के रात की है। 26 अक्टूबर की सुबह लोगों को इसकी जानकारी मिली। श्रद्धालुओं का आक्रोश देखते हुए भारी पुलिस बल की तैनाती की गई है।

पुलिस की टीमें अपहृत पुजारी को खोजने में लगी हुई हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मामला गया के मुफस्सिल थानाक्षेत्र का है। यहाँ बाईपास रोड पर जूना अखाड़े का पंचदेव मंदिर है। यह मंदिर फल्गु नदी के तट पर स्थित सीता कुंड के सामने ही है।

26 अक्टूबर की सुबह जब श्रद्धालु पंचदेव मंदिर में आए तो उन्हें सभी मूर्तियाँ क्षतिग्रस्त हालत में मिलीं। किसी मूर्ति का हाथ क्षतिग्रस्त था तो किसी का सिर। स्थानीय लोगों ने पुजारी तीर्थानंद की तलाश की तो उनका भी पता नहीं चला। मामले की जानकारी होने पर हिन्दू संगठनों के लोग भी मंदिर पहुँचे।

हालत तनावपूर्ण होते देख मंदिर और आसपास भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया। मंदिर के पुजारी के मोबाइल से उनकी लोकेशन का पता लगाने का प्रयास हुआ। लेकिन पुलिस को कोई सफलता नहीं मिली। एसपी मनीष कुमार के हवाले से आज तक ने बताया है कि आसपास के सीसीटीवी की जॉंच हो रही है। टेक्निकल टीम और डॉग स्क्वायड के किसी निष्कर्ष पर पहुँचने के बाद ही इस संबंध में कुछ कहा जा सकता है। एसपी ने आरोपितों को जल्द पकड़ने का भरोसा दिलाया है।

इस घटना के पीछे भूमाफियाओं का हाथ होने की आशंका जताई जा रही है। पंचदेव धाम के संस्थापक सदस्य बीगन विश्वकर्मा के अनुसार तीन साल पहले भी मंदिर के आसपास भूमाफियाओं ने कब्जे के दौरान हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया था।

स्थानीय भाजपा नेता मुन्ना सिंह ने भी इसके पीछे भूमाफियाओं का हाथ होने का अंदेशा जताया है। उन्होंने बताया कि भूमाफिया सरकारी जमीनों के अवैध कागज बनवाकर धड़ल्ले से बेच रहे हैं। स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत से यहाँ कई अवैध निर्माण हुए हैं। उनके अनुसार कुछ दिन पहले ही मंदिर के पास एक स्थानीय व्यक्ति को गोली भी मारी गई थी।

हिजाब की आग में जल रहे ईरान में ISIS का हमला: शिया दरगाह पर बंदूकधारियों ने बरसाई गोलियाँ, 15 मरे-40 घायल

हिजाब विरोधी प्रदर्शनों के बीच ईरान की एक शिया दरगाह में बंदूकधारियों ने गोलियाँ बरसाई। हमले में 15 लोगों की मौत हो गई। 40 जख्मी है। आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (ISIS) ने हमले की जिम्मेदारी ली है।

हमला बुधवार (26 अक्टूबर 2022) को दक्षिणी ईरान के शिराज में स्थित शाह चेराघ दरगाह पर हुआ। इस्लामिक स्टेट ने टेलीग्राम चैनल के जरिए हमले की जिम्मेदारी लेते हुए कहा है, “हमले में कम से कम से कम 20 शिया मारे गए और दर्जनों घायल हो गए।” वहीं, स्थानीय मीडिया के मुताबिक, इस हमले में 15 लोगों की मौत हुई है।

ईरान की सरकारी न्यूज एजेंसी ईरना ने न्याय विभाग के हवाले से कहा कि तीन हथियारबंद आतंकवादी स्थानीय समय के अनुसार शाम 5:45 बजे दरगाह में घुसे थे। रिपोर्ट्स के अनुसार, दरगाह में घुसते ही हथियारबंद आतंकियों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। प्रवर्तन एजेंसियों ने दो आतंकवादियों को पकड़ लिया, जबकि तीसरे की तलाश जारी है। स्थानीय मीडिया ने बताया कि हमलावर ईरानी नागरिक नहीं हैं।

इस्लामिक स्टेट पहले भी शिया मस्जिद और दरगाहों पर हमले कर चुका है। आतंकियों ने 2017 में ईरानी संसद की इमारत और देश के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह खोमैनी के मकबरे को निशाना बनाया था। ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी ने कहा कि वे इस हमले की साजिश रचने वालों को छोड़ेंगे नहीं।

गौरतलब है कि इस्लामी मुल्क ईरान में हिजाब के खिलाफ महिलाएँ महीने भर से अधिक समय से सड़कों उतर कर प्रदर्शन (Anti-Hijab Protest) कर रही हैं। इनमें स्कूल छात्राओं की भी बड़ी संख्या है। इन प्रदर्शनों में भाग लेने वाली छात्र-छात्राओं को पुलिस हिरासत में लेकर मानसिक अस्पतालों में भेज रही है।

महसा अमीनी की हत्या के बाद से महिलाएँ सड़कों पर उतर कर विरोध कर रही हैं। वे हिजाब फेंककर, जलाकर और अपने बालों को काटकर हिजाब के लिए इस्लामी सरकार का विरोध कर रही हैं। प्रदर्शनकारियों ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खुमेनाई की तस्वीरें भी जलाईं। इन प्रदर्शनकारी महिलाओं को देश-दुनिया से भर से भारी समर्थन मिल रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक सितंबर 2022 में पुलिस द्वारा मारी गई महसा अमीनी की मौत के बाद से शुरू हुए विरोध प्रदर्शन से 3 अक्टूबर के बीच ईरान के सुरक्षा बलों ने 144 लोगों की हत्या कर दी है। इनमें महिला, पुरुष और बच्चे शामिल हैं। हालाँकि, मृतकों की वास्तविक संख्या इनसे कहीं अधिक बताई जा रही है।

ओडिशा से बंगाल जा रहा था तेल टैंकर, झारखंड में तलाशी हुई तो ठूँसे मिले गौवंश: 2 की हो चुकी थी मौत, शेख मेराज गिरफ्तार

झारखंड के पूर्वी सिंहभूम में एक तेल टैंकर की तलाशी के दौरान उसमें ठूँस-ठूँस कर भरे गौवंश मिले। भारत पेट्रोलियम लिखे इस टैंकर में 23 गौवंश थे। इनमें से दो की मौत हो गई थी। यह मोडिफाइड तेल टैंकर ओडिशा से पश्चिम बंगाल जा रहा था। पुलिस ने टैंकर के ड्राइवर शेख मेराज को गिरफ्तार कर लिया है।

इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है। टैंकर जब्त कर पुलिस ने जीवित गायें गौशाला को सौंप दी है। पूर्वी सिंहभूम जिला पुलिस ने यह कार्रवाई मंगलवार (25 अक्टूबर 2022) को की।

वायरल वीडियो में 2 लोग टैंकर में पीछे लगी सीढ़ियों के पास पिछला गेट खोलने का प्रयास कर रहे हैं। बाद में गेट खुलने के बाद अंदर से लकड़ी का एक चैंबर मिला, जिसे बाहर निकाला गया। इसके बाद टैंकर के किनारे बने खिड़कीनुमा झरोखों से अंदर गौवंश बेसुध हालत में दिखाई दे रहे हैं।

मामला थाना क्षेत्र बहरागोडा का है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक टैंकर का नंबर OR 11 D 6838 है। पुलिस द्वारा जामसोला के पास हो रही चेकिंग के दौरान इसे पकड़ा गया। इसे चला रहा ड्राइवर शेख मेराज ओडिशा के भद्रक का रहने वाला है। पूछताछ में उसने सहयोगी के तौर पर सुजीत मोहंती उर्फ बड़ा बाबू, अक्षय पैरीका के साथ टैंकर के मालिक का भी नाम बताया है। पुलिस ने ड्राइवर सहित इन सभी पर FIR दर्ज की है। झारखंड भाजपा नेता कुणाल सारंगी ने आरोप लगाया है कि गाय तस्करी को झारखंड सरकार का राजनैतिक संरक्षण प्राप्त है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक शेख मेराज टैंकर पश्चिम बंगाल ले जा रहा था। गौ तस्करी के लिए टैंकर को मोड़ीफाई किया गया था। अंदर हवा जाने का भी रास्ता नहीं था, जिसके चलते अधिकतर गायें बेसुध हो गईं थीं।

‘ग्लोबल मुस्लिम मीडिया पर्सन ऑफ द ईयर’: राना अय्यूब के लिए नाइजीरिया के अजीबोगरीब पोर्टल से आया अवॉर्ड, ‘द गार्जियन’ बना हिजाब का सबसे बड़ा ‘दोस्त

वित्तीय धोखाधड़ी की आरोपित और वॉशिंगटन पोस्ट (Washinton Post) की स्तंभकार राना अय्यूब (Rana Ayyub) पिछले कुछ दिनों से अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर ग्लोबल मुस्लिम मीडिया पर्सन ऑफ द ईयर अवॉर्ड से सम्मानित होने का दिखावा कर रही हैं।

सोशल मीडिया पर लोगों से बधाई मिलने के बाद उन्होंने इंस्टाग्राम पर एक और पोस्ट डाला।

उन्होंने इस अवॉर्ड को ट्विटर पर भी शेयर किया है और तब से बधाइयों का तांता लगा हुआ है।

हम भी इस पुरस्कार को लेकर बहुत उत्सुक हैं। आखिरकार, नाइजीरिया की ‘मुस्लिम न्यूज’ नाम की एक वेबसाइट की टीम ने उन्हें चुना है। यह वेबसाइट नाइजीरिया और दुनिया भर में मुस्लिम अचीवर्स और इवेंट्स का एक मुखपत्र है, जिसे मुख्यधारा की मीडिया में कभी जगह नहीं मिलती। वेबसाइट के अनुसार, राना ‘आवाज़हीनों की आवाज़’ हैं और ‘मुस्लिमों, विशेष रूप से उन लड़कियों के अधिकारों की वकालत करने में सबसे आगे रहे हैं, जिन्हें दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहे जाने वाले भारत के विभिन्न भागों में निर्मम हिजाब प्रतिबंध के कारण शिक्षा से वंचित’ कर दिया गया है।

वेबसाइट ने डिस्क्लेमर दिया है कि ‘हालाँकि अय्यूब हिजाब नहीं पहनती हैं, लेकिन अवॉर्ड के आयोजकों ने पत्रकार की उस दृढ़ता की प्रशंसा की है, जिसके तहत वह मानती हैं कि भारत में हर मुस्लिम लड़की को हिजाब पहनने का मौलिक अधिकार है और उस अधिकार की रक्षा की जानी चाहिए।”

वेबसाइट के प्रकाशक ने कहा कि अय्यूब आज हिजाब नहीं पहनती हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह एक दिन इसका इस्तेमाल नहीं करेंगी। उन्होंने कहा, “इस तथ्य के कारण सम्मानित किया कि वह एक मुस्लिम हैं और भारत में लाखों लड़कियों को मोदी के उत्पीड़न का सामना करने के लिए हिजाब पहनने के लिए बोलती हैं। यह एक महान बलिदान है जिसे स्वीकार किया जाना चाहिए”। प्रकाशक अल्हाजी अबूबकर ने आगे कहा, “शरिया के अनुसार हिजाब अनिवार्य है, लेकिन शिक्षा लागू होने से पहले आती है, खासकर मुस्लिम या शरीयत राज्य में।”

हिजाब की बात करें तो इसी वेबसाइट ने इस साल सितंबर में यह पता लगाने के लिए एक पोल चलाया था कि कौन सा ग्लोबल मीडिया हाउस सबसे ‘हिजाब फ्रेंडली’ मीडिया हाउस है। इसमें ब्रिटेन के गार्डियन को सबसे ‘हिजाब फ्रेंडली’ मीडिया हाउस बताया गया था।

पोल में लोगों से यह चुनने के लिए कहा गया कि कौन-सा मीडिया हाउस उन्हें इस्लाम और उसके मूल्यों को बढ़ावा देने की अनुमति देता है। वेबसाइट ने मीडिया हाउस के हिजाबी पत्रकारों के बारे में कहा, “अपने संगठनों की संपादकीय नीतियों में हस्तक्षेप नहीं होने के बावजूद, जब हिजाब जैसे मुद्दे की बता आती है तो वे हमेशा अपनी कहानियों में, प्रिंट और ऑनलाइन दोनों में, नैरेटिव पर जोर देते हैं।”

हालाँकि, यह अनजान सा वेबसाइट नियमित रूप से अपडेट नहीं किया जाता है, क्योंकि उसके होम पेज के संपादकीय भाग को आखिरी बार जून 2020 में और उससे पहले नवंबर 2019 में अपडेट किया गया था। यह सामान्य नैरेटिव है कि मोदी फासीवादी हैं, आरएसएस अति-दक्षिणपंथी आतंकवादी समूह है और मुस्लिमों को भारत में कैसे सताया जाता है। यह वेबसाइट हिजाब पहनने वाली लड़कियों के प्रति बेहद जुनूनी है, क्योंकि इसके होम पेज पर कम से कम दो लेख हिजाब के बारे में हैं।

इस पर ईरान में हिजाब के खिलाफ प्रदर्शन कर रही महिलाओं के बारे में एक भी रिपोर्ट नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि अय्यूब के अलावा ‘हिजाब के रखवाला’ नामक किसी को इस बार नाइजीरियाई मुस्लिम पर्सनालिटी ऑफ द ईयर से सम्मानित किया गया। ये ‘हिजाब के रखवाले’ नाइजीरिया के 12 मुस्लिम थे, जिन्होंने नाइजीरिया के सुप्रीम कोर्ट में हिजाब के लिए लड़ाई लड़ी थी। 17 जून 2022 को नाइजीरिया के सुप्रीम कोर्ट ने लागोस पब्लिक स्कूलों में हिजाब के इस्तेमाल को बरकरार रखा। यह फैसला 9 साल की कानूनी लड़ाई के बाद आया है। अय्यूब को सम्मानित करने वाली इस वेबसाइट के प्रकाशक के अनुसार, यह निर्णय ‘हाल के दिनों में नाइजीरियाई मुस्लिम समुदाय द्वारा दर्ज की गई सबसे बड़ी उपलब्धि’ थी।

यूक्रेन से युद्ध के बीच रूस ने निकाला अपना सबसे बड़ा हथियार! पुतिन के सामने न्यूक्लियर ड्रिल शुरू, रूसी रक्षा मंत्री ने राजनाथ सिंह को मिलाया फोन

पिछले 8 महीने से रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध चल रहा है, लेकिन किसी भी पक्ष की तरफ परिणाम अब तक नहीं आया है। इसी बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक परमाणु ड्रिल का निरीक्षण किया है, जिसके बाद दुनिया भर में हलचल तेज़ हो गई है। रूस की ‘स्ट्रेटेजिक न्यूक्लियर फोर्सेज’ ने ये ड्रिल किया। सुदूर पूर्व और आर्कटिक की तरफ बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों को भी लॉन्च किया गया। अमेरिका को इस ड्रिल के बारे में ‘न्यू स्टार्ट आर्म्स ट्रीटी’ के तहत पहले ही सूचित कर दिया गया था।

हालाँकि, रूस का ये वार्षिक न्यूक्लियर ड्रिल था, लेकिन यूक्रेन युद्ध के बीच इसे आयोजित किए जाने से तनाव बढ़ गया है। रूस ने आरोप लगाया है कि यूक्रेन अब युद्ध में ‘डर्टी बम’ का इस्तेमाल कर रहा है। ये एक प्रकार का ऐसा बम होता है, जिसे विस्फोटकों के साथ रेडियोएक्टिव मैटेरियल्स मिला कर बनाया जाता है। हालाँकि, पश्चिमी देश इस आरोप को झूठा बता रहे हैं। वहीं यूक्रेन का कहना है कि इस दावे से लगता है कि रूस खुद ऐसी कोई तैयारी कर रहा है।

जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था, उससे 5 दिन पहले भी न्यूक्लियर ड्रिल हुआ था। उधर उत्तर-पश्चिमी यूरोप में NATO भी ‘Steadfast Noon’ नामक सैन्य अभ्यास कर रहा है। इसमें 14 देश शामिल हैं। दक्षिणी और पूर्वी यूक्रेन में रूस अभी भी जमा हुआ है। रूस के रक्षा मंत्री सर्गेई शोइगु ने कहा है कि ये ड्रिल इसीलिए किया गया, ताकि अगर दुश्मन परमाणु हमला करे तो हम पूरी ताकत से परमाणु हथियारों से जवाब दे सकें।

उधर रूसी रक्षा मंत्री ने भारत के अपने समकक्ष राजनाथ सिंह से भी फोन पर बात की है। राजनाथ सिंह ने दो टूक कहा है कि परमाणु हथियारों का इस्तेमाल किसी भी पक्ष द्वारा किसी भी कीमत पर नहीं किया जाना चाहिए और बातचीत के जरिए मामले को सुलझाना चाहिए। चूँकि यूक्रेन के पास परमाणु हथियार नहीं हैं, राजनाथ सिंह का ये सन्देश रूस और पश्चिमी देशों के लिए था। रूसी रक्षा मंत्री ने इस फोन कॉल पर ‘डर्टी बम’ की आशंका सहित युद्ध की अन्य स्थितियों के बारे में राजनाथ सिंह से बात की।

असम में मियाँ म्यूजियम के पीछे पूर्व AAP नेता! अलकायदा से भी जुड़े तार: पुलिस ने 3 को दबोचा, संग्रहालय को सील कर चुकी है सरमा सरकार

असम में सील किए गए ‘मियाँ संग्रहालय’ संग्रहालय ने ना सिर्फ भूमि और संपत्ति कानूनों का उल्लंघन किया है, बल्कि इससे जुड़े सदस्यों के लिंक आतंकी संगठनों से भी जुड़े मिले हैं। ‘असम मियाँ परिषद’ के अध्यक्ष और महासचिव सहित तीन लोगों को भारतीय उपमहाद्वीप में अल कायदा (AQIS) और अंसारुल बांग्ला टीम (ABT) के साथ लिंक के लिए गिरफ्तार किया गया है।

असम के गोलपारा जिले के दपकाभिता में प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत आवंटित एक घर में विवादास्पद ‘मियाँ संग्रहालय’ का खुलासा हुआ था। इसे 25 अक्टूबर 2022 को प्रशासन ने सील कर दिया था। इसके बाद मियाँ परिषद मामले का खुलासा हुआ है।

मियाँ परिषद के अध्यक्ष एम मोहर अली को गोलपाड़़ा जिले के दपकाभिता में संग्रहालय से पुलिस ने गिरफ्तार किया है। मोहर अली संग्रहालय को खोलने के लिए अपने दो नाबालिग बेटों के साथ धरने पर बैठा था। मोहर एक निलंबित सरकारी स्कूल शिक्षक है। वहीं, इसके महासचिव अब्दुल बातेन शेख को मंगलवार (25 अक्टूबर 2022) की रात को धुबरी जिले के आलमगंज स्थित उसके आवास से हिरासत में लिया गया।

इसके अलावा तीसरा आरोपित तनु धादुमिया है। आम आदमी पार्टी (AAP) का पूर्व नेता और अहोम रॉयल सोसाइटी का सदस्य तनु ने 23 अक्टूबर 2022 को संग्रहालय का उद्घाटन किया था। पुलिस ने डिब्रूगढ़ के कावामारी गाँव स्थित आवास से तनु को हिरासत में लिया है। उधर AAP का कहना है कि तनु को पार्टी से निकाल दिया गया है।

इन तीनों को हिरासत में लेने के बाद पूछताछ के बाद घोगरापार थाने में लाया गया है, जहाँ उनसे पूछताछ की जा रही है। तीनों पर आतंकवादी समूहों के साथ संबंधों के लिए गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।

हिरासत में लिए गए तीन लोगों के नाम हाल ही में गिरफ्तार किए गए कुछ कट्टरपंथियों से पूछताछ के दौरान सामने आए हैं। नलबाड़ी के पुलिस अधीक्षक फणींद्र कुमार नाथ ने कहा, ”इस महीने की शुरुआत में हमने तीन जिहादियों- जुबैर हुसैन, अबू रेहान और हाबेल अली को गिरफ्तार किया था, जिनके एक्यूआईएस और एबीटी से संबंध थे। वे सभी, जो अब भी हमारी हिरासत में हैं, ने पूछताछ के दौरान कहा था कि मिया संग्रहालय की स्थापना में उनका कुछ योगदान था।”

संग्रहालय को सील करने की कार्रवाई से एक दिन पहले मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने संग्रहालय की फंडिंग पर सवाल उठाया था। सरमा ने कहा था, “मुझे समझ में नहीं आता कि यह किस तरह का संग्रहालय है। संग्रहालय में उन्होंने जो हल रखा है, उसका उपयोग असमिया लोग करते हैं। यहाँ तक कि मछली पकड़ने के लिए उपयोग की जाने वाली वस्तुएँ भी असमिया समुदाय से हैं। ‘लुंगी’ को छोड़कर वहाँ रखी गई हर चीज असमिया लोगों की है। उन्हें यह साबित करना होगा कि नंगोल (हल) का उपयोग केवल मियाँ लोग करते हैं, अन्य नहीं। अन्यथा, मामला दर्ज किया जाएगा।”

सरमा ने कहा, “संग्रहालय में केवल पारंपरिक वस्तुएँ हैं जो पूरे असमिया समाज की संस्कृति को दर्शाती हैं न कि मियाँ समुदाय की। राज्य के बुद्धिजीवियों को इस पर विचार करना चाहिए। जब मैंने मियाँ शायरी के खिलाफ आवाज उठाई तो उन्होंने मुझे सांप्रदायिक कहा। अब मियाँ कविता, मियाँ स्कूल, मिया संग्रहालय यहाँ हैं… सरकार कार्यालय खुलने के बाद मामले पर कार्रवाई करेगी।”

इससे पहले, राज्य में भारतीय जनता पार्टी के विधायकों ने संग्रहालय खोलने वालों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की थी, जिन्होंने जिले में ‘प्रवासी मुसलमानों की संस्कृति’ को प्रदर्शित करने का दावा किया था। डिब्रूगढ़ के भाजपा विधायक प्रशांत फुकन संग्रहालय के खिलाफ आवाज उठाने वालों में सबसे पहले थे। उन्होंने कहा था, “मैं राज्य सरकार से इस संग्रहालय को बंद करवाने का अनुरोध करता हूँ।” भाजपा विधायक शिलादित्य देव ने भी संग्रहालय स्थापित करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की थी।

रिपोर्टों के अनुसार, ‘मियाँ‘ शब्द का इस्तेमाल उन मुस्लिमों के लिए किया जाता है जो बंगाल से माइग्रेट कर गए थे और 1890 के दशक के अंत में असम में बस गए। अंग्रेजों ने उन्हें कथित तौर पर व्यावसायिक खेती के लिए खरीदा था।

दिवाली पर दोस्त से मिलने जा रहे थे 2 हिन्दू युवक, फैजी ने साथियों संग कर दिया हमला: अस्पताल में भर्ती, सरिया और ईंट-पत्थर से किया वार कर लूटे रुपए-चेन

उत्‍तर प्रदेश के कन्नौज में दिवाली के मौके पर अपने दोस्‍त से म‍िलने जा रहे दो हिन्दू युवकों पर फैजी व उसके साथ‍ियों ने हमला कर द‍िया। दोनों युवक इस हमले में गंभीर रूप से घायल हो गए। दोनों को अस्‍पताल में भर्ती कराया गया है। यह घटना सदर कोतवाली क्षेत्र के चिरैयागंज मोहल्ला स्थित कांशीराम कॉलोनी में हुई। यहाँ रहने वाले दीपू के घर उसके कुछ दोस्त मिलने आए थे।

एक र‍िपोर्ट के मुताबिक, मंगलवार (25 अक्टूबर, 2022) की देर रात सदर कोतवाली क्षेत्र के मोहल्ला चिरैयागंज में काशीराम कॉलोनी में देर रात जमकर संघर्ष हो गया। चित्रांश और निखिल मिश्रा काशीराम कॉलोनी में अपने दोस्त दीपू के घर उससे मिलने गए थे। वहीं रहने वाले फैजी नामक युवक से किसी बात को लेकर उनकी बहस हो गई, इस पर फैजी ने अपने आठ-दस साथी बुला ल‍िया और उन्होंने सरिया और ईंट-पत्थर से उन पर हमला कर दिया। पुलिस ने मामले में चार लोगों को गिरफ्तार किया है ।

घटना की सूचना मिलते ही पुलिस एसपी कुँवर अनुपम सिंह फोर्स के साथ घटनास्थल पर पहुँचे। पुलिस के आने की भनक लगते ही हमलावर भाग गए। घटना को लेकर निखिल मिश्रा के पिता प्रेमचंद्र मिश्रा ने कोतवाली में तहरीर दी है जिसमे फैजी, नफीस खलीफा, सूफियान, हसनैन, इकराम, सद्दाम, अजहर के खिलाफ बेटे पर लाठी सरिया और तमंचे से हमला बोलने का आरोप लगाया है। मिश्रा ने अपनी शिकायत में कहा है कि हमलावरों ने गोली भी चलाई तथा निखिल पास से 6500 रुपए और सोने की चेन छीन ली तथा चित्रांश के पास से 2500 रुपए निकाल लिए।

वहीं एक पत्रकार हिमांशु द्विवेदी ने एक वीडियो ट्वीट कर कहा, “दोस्त के घर दिवाली मिलने जा रहे युवकों पर हमला। युवकों पर सम्प्रदाय विशेष के युवकों ने किया हमला। हमले में दो युवक बुरी तरह हुए घायल। सदर कोतवाली क्षेत्र के चिरैयागंज कांशीराम कालोनी का मामला।”

वहीं घटना के बाद समाज कल्याण राज्य मंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) असीम अरुण ने हमले में घायल चित्रांश और न‍िख‍िल के घर जाकर उनसे मुलाकात की। उन्होंने ट्वीट कर कहा, “चिरैयागंज में अराजक तत्वों द्वारा किये गए हमले में घायल चित्रांश एवं निखिल के घर जाकर उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली और SP को आरोपितों के खिलाफ कठोर कार्यवाही करने को निर्देशित किया, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।”

पुलिस अधीक्षक कुँवर अनुपम सिंह ने बताया कि चिरैयागंज में हुई घटना में चार लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जबकि एक युवक को हिरासत में लिया गया है। उससे पूछताछ की जा रही है।

18 सालों में 1 रुपए के नोट से ₹500 तक पहुँच गए गाँधी, जानें उससे पहले रहती थी किसकी तस्वीर: लक्ष्मी-गणेश पर चर्चा के बीच भारतीय करेंसी का इतिहास

दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल (Delhi CM & AAP Chief Arvind Kejriwal) ने भारतीय करेंसी पर एक तरफ महात्मा गाँधी और दूसरी तरफ देवी लक्ष्मी और भगवान गणेश की तस्वीर छापने की माँग करके राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया है। उन्होंने कहा कि देश तभी समृद्ध होगा, जब देवी-देवताओं का आशीर्वाद मिलेगा।

करेंसी नोट की चर्चा होने के बाद अब लोगों में जिज्ञासा हो रही है कि महात्मा गाँधी की तस्वीर नोटों पर कब से क्यों छप रहे हैं। क्या शुरू से ही महात्मा गाँधी की तस्वीर नोटों पर थी? दरअसल, नोटों पर महात्मा गाँधी की तस्वीर पहली बार उनकी 100वीं जयंती पर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने सन 1969 में छापा था। यह नोट 1 रुपए का था। इस तस्वीर में महात्मा गाँधी को वर्धा (महाराष्ट्र) के सेवाग्राम आश्रम में बैठे हुए दिखाया गया था।

इसके बाद सन 1987 में 500 रुपए के नोट को महात्मा गाँधी की तस्वीर के साथ दोबारा जारी की गई। इसके बाद सन 1996 में RBI ने 100 रुपए के साथ-साथ 10 रुपए के नोटों की सीरीज को महात्मा गाँधी की तस्वीर के साथ जारी किया। इस साल से छपने वाले लगभग हर नोट पर महात्मा गाँधी की तस्वीर छपने लगी।

हालाँकि, इसके बीच सन 1980 में जो नए नोट जारी किए थे, उसमें भारत के विभिन्न प्रतीकों को दर्शाया गया था। ये प्रतीक भारत की प्रगति को दर्शा रहे थे। उस समय 1 रुपए के नोट पर ऑयल रिंग, 2 रुपए के नोट पर आर्यभट्ट, 5 रुपए के नोट पर किसान एवं ट्रैक्टर, 10 रुपए के नोट पर राष्ट्रीय पक्षी मोर और 20 रुपए के नोट पर कोणार्क के सूर्य मंदिर को दर्शाया गया था।

महात्मा गाँधी की तस्वीर से पहले की करेंसी

देश में मुद्रा छापने का काम भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) करता है। ब्रिटिश इंडिया सरकार ने इस बैंक की स्थापना 1 अप्रैल 1935 को किया था। शुरू में RBI का मुख्यालय कोलकाता में था। हालाँकि, 1937 में स्थानांतरित होकर हमेशा के लिए मुंबई चला गया। निजी स्वामित्व वाला यह बैंक साल 1949 में राष्ट्रीयकरण के बाद पूर्णत: सरकारी स्वामित्व वाला हो गया।

RBI ने पहली बार सन 1938 में 5 रुपए का नोट जारी किया था। इस नोट पर ब्रिटेन के राजा जॉर्ज VI की तस्वीर थी। इसके बाद इसी तरह के 10 रुपए, 100 रुपए, 1000 रुपए और 10,000 रुपए का नोट जारी किया था। इन नोटों पर उस RBI के दूसरे गवर्नर जेम्स टेलर के हस्ताक्षर थे। जॉर्ज की तस्वीर वाले ये नोट अगले 11 साल तक यानी 1948 तक चलन में रहे।

सन 1947 में देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद भारतीय करेंसी को नए सिरे से डिजाइन किया गया। साल 1949 में नए नोटों पर ब्रिटिश राजा जॉर्ज VI की तस्वीर को हटा दिया गया। भारतीय नोटों पर जॉर्ज की तस्वीर की जगह पर राष्ट्रीय चिह्न सारनाथ के अशोक स्तंभ को लगाया गया।

साल 1954 में RBI ने तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर की तस्वीर के साथ 1,000 रुपए का नोट छापा। इसके साथ ही 5,000 रुपए के नोटों पर गेटवे ऑफ इंडिया की तस्वीर और 10,000 रुपए के नोट पर अशोक स्तंभ की तस्वीर जारी की गई थी। सन 1978 में उच्च मूल्य वाले नोटों को छापना बंद कर दिया गया।

महात्मा गाँधी की तस्वीर पर RBI का तर्क

सन 1996 के बाद से लगभग हर भारतीय नोट पर महात्मा गाँधी की तस्वीर छपने लगी। इसके पीछे RBI ने तर्क दिया था कि महात्मा गाँधी की तस्वीर से पहले जितने प्रतीकों का इस्तेमाल नोटों पर किया जाता रहा है, उनका आसानी से नकल किया जा सकता था।

RBI ने कहा कि इन प्रतीकों का इसलिए नकल आसान है, क्योंकि ये निर्जीव वस्तुएँ हैं। इसके विपरीत, मानव चेहरे की नकल करना मुश्किल है। बता दें कि भारतीय नोटों पर महात्मा गाँधी की जो तस्वीर इस्तेमाल की जाती है, वह कैरिकेचर नहीं है।

महात्मा गाँधी के साथ ब्रिटिश राजनेता लॉर्ड फ्रेडरिक विलियम पेथिक-लॉरेंस (फोटो साभार: विकिमिडिया)

सन 1946 में तत्कालीन वायसराय के निवास स्थान यानी आज के राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली के बाहर महात्मा गाँधी की तस्वीर ली गई थी। इस तस्वीर में महात्मा गाँधी मुस्कुरा रहे हैं। तस्वीर में महात्मा गाँधी के साथ एक और व्यक्ति खड़ा है, जिसका नाम लॉर्ड फ्रेडरिक विलियम पेथिक-लॉरेंस है। फ्रेडरिक ब्रिटेन के राजनेता थे। इसी तस्वीर को क्रॉप करके भारतीय नोटों पर छापा जाता है।

नोटों पर अन्य सेनानियों की तस्वीर की माँग

भारतीय नोटों पर महात्मा गाँधी की तस्वीर छापने के बाद अन्य स्वतंत्रता सेनानियों की तस्वीरें भी नोटों पर छापने की माँग उठी थी। साल 2014 में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने लोकसभा में कहा था, “RBI के एक पैनल ने बैंक नोटों पर किसी अन्य राष्ट्रीय नेता की तस्वीर को शामिल करने के खिलाफ यह कहते हुए निर्णय लिया है कि महात्मा गाँधी की तुलना में कोई अन्य व्यक्तित्व देश के लोकाचार का बेहतर प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है।”

दरअसल, अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को लेकर सबसे बड़ी समस्या ये आ रही थी, बैंक नोटों पर किसको शामिल किया जाए और किसे छोड़ा जाए। अगर किसी एक को शामिल किया जाता है तो दूसरे लोग दूसरे सेनानियों के लिए ऐसी ही माँग करेंगे। इस तरह विवादों से बचने के लिए महात्मा गाँधी को चुना गया।

मुस्लिम PM का रट्टा मारने वालो, आक्रांताओं को बाप मानना बंद करो… ब्रिटेन में कामगार बन कर गए थे हिन्दू, आज 51000 को देते हैं रोजगार: भारत में आक्रमण-धर्मांतरण करने कौन आया?

ऋषि सुनक जब से ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री बने हैं, भारत में लिबरल और सेक्युलर गिरोह का एक तबका ज्ञान बाँटने और नसीहतें देने पर फिर से उतर आया है। कॉन्ग्रेस को मुस्लिम प्रधानमंत्री चाहिए तो असदुद्दीन ओवैसी को एक हिजाबी महिला को प्रधानमंत्री के रूप में देखना है। जिस देश की सर्वोच्च पद पर एक जनजातीय समाज की महिला हैं, उस देश में इस तरह का प्रपंच चलाने वालों को इतिहास में भी झाँकना चाहिए।

क्योंकि वर्तमान में तो सबको दिख रहा है कि जहाँ भारत में मुस्लिम कट्टरपंथी ‘सर तन से जुदा’ का नारा लगा रहे हैं और हत्याएँ भी कर रहे हैं, वहीं ब्रिटेन में रह रहे हिन्दू या भारतीय समाज के लोग वहाँ की अर्थव्यवस्था में योगदान दे रहे हैं। ब्रिटेन में आज 8 लाख से भी अधिक हिन्दू हैं, जिनमें 70% अकेले गुजरात से हैं। इसके बाद पंजाब (15%) का नंबर आता है। आज UK में 190 से भी अधिक मंदिर हैं और वहाँ के सामाजिक कार्यों में भी ये रुचि लेते हैं।

ब्रिटेन में ईसाइयों और मुस्लिमों के बाद सबसे बड़ी जनसंख्या हिन्दुओं की ही है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भारतीय नागरिकों ने ब्रिटेन का रुख किया गया। भारतीय नागरिकों को ब्रिटेन ने अपनी सेना में रखा था, यहाँ की महिलाओं को ब्रिटिश अधिकारियों ने अपने घर में बच्चों के देखभाल के लिए रखा था। इससे पहले दादाभाई नैरोजी (1825-1917) जैसे विद्वान भी हुए, जो 20वीं सदी शुरू होने से पहले ही ब्रिटेन में सांसद के पद पर पहुँचे।

बाद में वो कॉन्ग्रेस पार्टी के अध्यक्ष भी रहे। 2002 के बाद से ब्रिटेन जाने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियरों में से दो तिहाई भारत से ही जा रहे हैं। अगर ब्रिटिश इंडियंस की बात करें तो जहाँ ये ब्रिटेन में 2% ही हैं, लेकिन वहाँ के डॉक्टरों में से 12% इसी समुदाय से हैं। चूँकि वहाँ रह रहे भारतीयों में से 85% हिन्दू ही हैं, इसीलिए स्वाभाविक है कि इनमें हिन्दुओं की जनसंख्या ज्यादा होगी। वहाँ के व्यापार का 4.4% हिस्सा हिन्दुओं के पास है और वो 51,000 लोगों को नौकरी देते हैं।

भारत में मुस्लिमों की बात करें तो स्थिति इसके एकदम उलट है। यहाँ अरब से इस्लामी आक्रांता आए, सूफी आए। एक ने तलवार के दम पर और एक ने चमत्कार के दम पर धर्मांतरण किया। भारत के अधिकतर मुस्लिम धर्मांतरित मुस्लिम हैं, जिनके पूर्वज पहले हिन्दू ही हुआ करते थे। लेकिन, कालांतर में ये अपने अरबी समाज से ज्यादा कट्टर होते चले गए। इसका एक परिणाम हमें देश का विभाजन और 20 लाख मौतों के रूप में देखने को मिला।

इसका परिणाम हमें जम्मू कश्मीर में देखने को मिला। इसका परिणाम हमें PFI जैसे संगठन के रूप में देखने को मिला, जो हजारों मुस्लिमों की भर्ती कर के भारत सरकार से युद्ध छेड़ने की तैयारी में था। 1926 में स्वामी श्रद्धानंद से लेकर 2022 में कन्हैया लाल तेली की हत्या तक, इस्लामी कट्टरपंथियों का रुख वही रहा है। और पीछे जाएँ तो अर्जन सिंह और तेग बहादुर जैस सिख गुरुओं की हत्याएँ याद आएँगी। भारतवर्ष पर अपने पहले ही आक्रमण में इस्लामी आक्रांताओं ने राजा दाहिर का सिर काट कर खलीफा को उपहार के रूप में भेजा था।

भारतीय ब्रिटेन में ऐसे नहीं घुसे थे। जब ईस्ट इंडिया कंपनी यहाँ ‘कारोबार’ करने आई थी, तब यहाँ वो कई भारतीयों को अपने साथ ले जाती थी। जहाज से ब्रिटेन जाने वाले ये भारतीय वहाँ से लौटने में अक्षम होते थे, इसीलिए उनमें से कई वहीं बस गए। भारतीय महिलाओं को बच्चों की देखभाल के लिए ब्रिटिश अधिकारी हायर करते थे (आया, नैनी, अम्मा इत्यादि) और यहाँ कार्यकाल पूरा हो जाने पर कइयों को अपने साथ ले जाते थे। नौकरों को लेकर भी ऐसा ही था।

भारत में तो मुस्लिम भी आक्रांता बन कर आए थे और ब्रिटिश भी बाद में कारोबारी से आक्रांता बन गए। लेकिन, आज ब्रिटेन हो या अरब, भारतीय हर जगह अपना परचम लहरा रहे हैं और वहाँ की अर्थव्यवस्था को चला रहे हैं। भारतीयों को अंग्रेजों ने अपने जहाजों और बंदरगाहों पर काम करने के लिए हायर किया था। यही कारण है कि ब्रिटेन के पोर्ट टाउन्स में ही सबसे पहले के ब्रिटिश इंडियंस मिलेंगे। 19वीं सदी खत्म होते-होते 40,000 भारतीय छात्र, राजनयिक, कारोबारी, विद्वान, सैनिक और जहाज पर काम करने वाले लोग यूके में बस चुके थे।

सन् 1931 के आँकड़े बताते हैं कि उस समय ब्रिटेन में 2000 भारतीय छात्र थे। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन में कामगारों की भारी कमी थी, ऐसे में उन्होंने रेलवे में भारत के मजदूरों और कर्मचारियों को हायर करना शुरू कर दिया। उन्हें यहाँ इस क्षेत्र में काम का अनुभव भी था। नॉर्थ-वेस्ट यूके में टेक्सटाइल सेक्टर में गुजरातियों का दबदबा बढ़ता चला गया। जब ‘नेशनल हेल्थ सर्विस’ का गठन हुआ तो यहाँ से कई मेडिकल प्रोफेशनल वहाँ गए।

केन्या, युगांडा और ज़ांज़ीबार से निकाले जाने के कारण 1960-70 के दशक में ईस्ट अफ्रीका में रह रहे कई भारतीय ब्रिटेन पहुँचे। इस तरह भारतीयों ने काम के लिए ब्रिटेन या किसी भी जगह को को केंद्र बनाया, आक्रमण या धर्मांतरण के लिए नहीं। आज कोरोना काल में ब्रिटेन में भारत के मंदिरों ने समाजसेवा और जागरूकता फैलाने का जो कार्य किया है, उसकी सराहना वहाँ के लोग भी करते हैं। यहाँ के मस्जिदों ने कोरोना काल में क्या किया, इसकी एक मिसाल दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित तबलीगी जमात के अड्डे से पता चल जाता है।

किस तरह जमातियों ने देश के अलग-अलग जगहों पर छिप कर कोरोना फैलाया और उन मुस्लिम बहुल इलाकों में जाने वाले पुलिसकर्मियों एवं मसिकल प्रोफेशनल्स पर हमले हुए, इसकी कई ख़बरें आपको मिल जाएँगी। जहाँ तक ऋषि सुनक की बात है, उनके पूर्वज भी ब्रिटेन आक्रमण या धर्मांतरण के लिए नहीं गए थे। जहाँ उनके पिता एक जनरल फिजिसियन थे, उनकी माँ सॉउथम्पटन में एक फार्मेसी चलाती थीं। पंजाबी मूल के उनके ग्रैंडपेरेंट्स 1960 के दशक में ईस्ट अफ्रीका से इंग्लैंड गए थे।

विंचेस्टर ऑक्सफ़ोर्ड में पढ़ाई करने वाले ऋषि सुनक शाकाहारी हैं, बीफ नहीं खाते हैं और शराब का सेवन भी नहीं करते हैं। उनके कामकाज वाली टेबल पर एक भगवान श्रीकृष्ण की छोटी सी प्रतिमा होती है। वो ब्रिटेन को अपना घर मानते हैं, लेकिन कहते हैं कि उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक जड़ें भारत की हैं। उनके दादा ने ‘वैदिक सोसाइटी हिन्दू मंदिर’ की स्थापना की, जहाँ वो अक्सर जाते हैं। सांसद बनने के बाद उन्होंने भगवद्गीता पर शपथ ली।

बतौर वित्त मंत्री No 11, Downing Street स्थित उनके सरकारी आवास में दीवाली के कार्यक्रम हुआ करते थे। उन्हें घर में रंगोली बनाते हुए और दीये जलाते हुए भी 2020 में देखा गया था। उनका कहना है कि जीवन में परिवार का बड़ा महत्व है और बच्चों में परिवार ही संस्कार देता है, ये उन्होंने काफी पहले ही सीख लिया था। उन्होंने मंदिर में जाकर अपने परिवार द्वारा खाना बनाने और भोजन लोगों में बाँटने की बात भी कही थी।

जो लोग भारत में मुस्लिम प्रधानमंत्री की बात करते हैं, क्या वो नहीं जानते कि ये एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है और यहाँ प्रधानमंत्री चुना जाता है, नियुक्त नहीं किया जाता। जिस हिजाब के कारण कर्नाटक में हिंसा हुई, उस हिजाब को पहनने वाली प्रधानमंत्री आखिर किसी को क्यों चाहिए? आक्रांताओं को अपना ‘बाप’ मानने वालों को देश क्यों स्वीकार करे? औरंगजेब और टीपू सुल्तान जैसों की इबादत करने वाले ये तो बताएँ कि क्या ब्रिटेन में बसे भारतीय वहाँ के दुश्मनों के गुण गाते हैं?

भारत में मुस्लिम आक्रांता और धर्मांतरण कराने वाले बन के आए और सैकड़ों वर्षों तक राज़ किया, फिर भी आज उन्हें सब्सिडी मिलती है। यहाँ तक कि हज भी वो सरकारी पैसे से करते रहे हैं। जब इस्लामी आक्रांताओं का राज़ था, हिन्दुओं को ‘जजिया’ टैक्स देना होता था। अपना तीर्थ घूमने के लिए भी टैक्स देना होता था। उनके 30,000 मंदिर ध्वस्त कर दिए गए। ब्रिटेन में भारतीयों ने चर्च ध्वस्त किए? टैक्स वसूला? सब्सिडी लिया? नहीं। वो वहाँ की अर्थव्यवस्था में योगदान दे रहे।

जो लोग मुस्लिम प्रधानमंत्री की बात कर रहे हैं, वो पहले कश्मीर में हिन्दू मुख्यमंत्री की बात करें। मक्का-मदीना में गैर-मुस्लिमों की एंट्री की बात करें। पंजाब में हिन्दू मुख्यमंत्री की बात करें। क्या इन्होंने कभी अरब देशों में हिन्दू शासक की वकालत की है? इन्हें हिजाबी पीएम तो चाहिए, लेकिन कोई मुस्लिम लड़की तिलक लगा ले तो ये उसे ‘मुर्तद’ बताते हुए शिर्क करने का आरोप लगाते हैं, इनसे ये बर्दाश्त नहीं होता। ब्रिटिश भारतीय समुदाय को लेकर ये भसड़ आपने कभी सुनी है?

जहाँ तक भारत की बात है, खुद सोनिया गाँधी का इटली में जन्म हुआ था और वो 10 वर्षों तक रिमोट कंट्रोल से सत्ता चलाती रहीं। इस दौरान अल्पसंख्यक सिख समाज के मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहे। भारत में ज़ाकिर हुसैन, फखरुद्दीन, और अब्दुल कलाम के रूप में 3 मुस्लिम राष्ट्रपति हुए। ज्ञानी जैन सिंह राष्ट्रपति बने, जो सिख समाज के थे। सोनिया गाँधी रोमन कैथोलिक ईसाई समुदाय से हैं। ऐसे में भारत को ज्ञान की ज़रूरत ही नहीं है। भारत में पारसी समुदाय से भी 3 मुख्य न्यायाधीश रहे हैं।

यहाँ सबसे बड़ा सवाल तो ये उठता है कि जब बात अल्पसंख्यक की होती है तो सिर्फ मुस्लिमों की ही क्यों? सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और यहूदी प्रधानमंत्री की बात क्यों नहीं करते ये लोग? क्योंकि मुस्लिम आज मेजोरिटी हैं, माइनॉरिटी नहीं। जितनी यूके की पूरी जनसंख्या है, उससे तीन गुना ज्यादा तो भारत में सिर्फ मुस्लिम हैं। ऐसे में उनके तुष्टिकरण के लिए ऐसा किया जाता है। अब मुस्लिम प्रधानमंत्री का रट्टा मारने वाले ही बताएँ कि जब इस पर पर उन्हें मुस्लिम ही चाहिए तो वो बाकी के दिनों में सेक्युलरिज्म के झंडाबरदार क्यों बने रहते हैं?

इस साल 1.62 करोड़ पर्यटक पहुँचे जम्मू कश्मीर, 75 सालों में ये सबसे बड़ा आँकड़ा: अनुच्छेद-370 हटने के बाद बदलाव, पहली बार ठंड में भी खुले रहेंगे कई स्थल

कश्मीर को यूँ ही नहीं भारत का स्‍वर्ग कहा जाता है। वहाँ की छटा ही इतनी निराली है क‍ि जो भी एकबार वहाँ जाता है, मंत्रमुग्‍ध हो जाता है। कश्‍मीर निःसंदेह आज भी भारत में सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है और लगभग सभी यात्रियों की यात्रा की विश लिस्‍ट में यह शामिल होता है। धारा 370 हटने के बाद यहाँ यात्रियों की संख्या में भी जबरदस्त इजाफा हुआ है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, स्वतंत्र भारत के 75 सालों के इतिहास में पहली बार (वर्ष 2022) में जम्मू-कश्मीर में 1.62 करोड़ पर्यटक आए हैं।

केंद्र शासित प्रदेश में इस बढ़े हुए पर्यटन ने विभिन्न क्षेत्रों में सबसे बड़ा रोजगार पैदा किया है। इस प्रकार एक रचनात्मक दृष्टिकोण, परिवर्तनकारी पहल और अपने लोगों, संस्कृति और समाज के लिए जम्मू-कश्मीर को सशक्त बनाने से यहाँ चौतरफा विकास हो रहा है। केंद्र शासित प्रदेश में पर्यटन उद्योग को 786 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जिसमें पिछले कुछ महीनों में यह क्षेत्र अब तेजी से विकास कर रहा है।

हालाँकि, कड़ाके की ठंड और भारी बर्फबारी के कारण घाटी के अधिकांश हिस्से सर्दियों के दौरान बंद रहते हैं, जिससे यात्रा करना मुश्किल हो जाता है।कुछ लोकप्रिय पर्यटन स्थल जैसे करनाह, सोनमर्ग और गुरेज आमतौर पर कम दृश्यता और बर्फबारी के कारण पर्यटकों के लिए बंद रहते हैं। अब, 70 वर्षों के बाद, इलाके के पर्यटन क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए सभी तीन स्थान सर्दियों के महीनों में पर्यटकों के लिए खुले रहेंगे।

‘टाइम्‍स ट्रेवल’ की र‍िपोर्ट के मुताबिक, कथ‍ित तौर पर, सरकार, 70 वर्षों में पहली बार, उन स्थानों (करनाह, सोनमर्ग और गुरेज) पर एडवेंचर खेल और अन्य गतिविधियों को शुरू करने की योजना बना रही है, ताकि न केवल पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हो, बल्कि उनके अनुभव को भी बढ़ाया जा सके।

हाल ही में, इस मनोरम राज्य में शीतकालीन पर्यटन को बढ़ावा देने के प्रयास में, प्राधिकरण पर्यटकों के लिए नए वेंचर्स खोल रहे हैं। पिछले तीन वर्षों के दौरान, सरकार ने उत्तर में गुलमर्ग के प्रसिद्ध स्कीइंग गंतव्य से परे अन्य जगहों पर कश्‍मीर में शीतकालीन पर्यटन को बढ़ावा देने की पूरी कोशिश की है। सड़कों के अवरुद्ध होने के कारण दुर्गम रहने वाले बर्फीले क्षेत्रों में पर्यटन को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

रिपोर्ट की मानें तो नए प्रस्तावित स्की ढलानों को अच्छी कनेक्टिविटी के साथ बर्फीले क्षेत्रों में विकसित किया जाएगा। हालाँकि, गुलमर्ग शहर सर्दियों के दौरान पर्यटकों को आकर्षित करता रहा है, बाकी जगहों पर अपेक्षाकृत कम पर्यटक आते हैं। रिपोर्ट के अनुसार मध्य कश्मीर के बडगाम जिले में दूधपथरी सूची में नवीनतम होगा और दोनों गंतव्यों तक सड़क मार्ग से पहुँचा जा सकता है।

इस बीच, यह भी बताया गया है कि कनेक्टिविटी में सुधार के लिए जम्मू-कश्मीर में बर्फीले इलाकों में हेलीकॉप्टर सेवाएँ शुरू की जाएँगी। पर्यटक ज्यादातर गर्मी के महीनों के दौरान इस जगह की यात्रा करना पसंद करते हैं, लेक‍िन नई पहल से पर्यटक अब पूरे वर्ष जम्मू और कश्मीर के शानदार नजारों का लुफ्त उठा सकेंगे।

शीतकालीन पर्यटन को बढ़ावा देने से स्थानीय और पर्यटन पर निर्भर लोगों के लिए रोजगार के अधिक अवसर पैदा होंगे। इसके साथ ही कश्मीर को शीतकालीन पर्यटन स्थल के रूप नई पहचान म‍िलेगी।