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दूसरे लोगों के साथ सोने को कहता था, नहीं मानी तो इमरान ने फोन पर ही गालियाँ बकते हुए दिया तीन तलाक: निकाह के बाद करता था अप्राकृतिक सेक्स

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद से तीन तलाक का एक मामला सामने आया है। यहाँ की रहने वाली एक विशेष समुदाय की महिला को उसके पति ने बेंगलुरु फोन करके तीन तलाक दे दिया है। महिला ने अपनी शिकायत जिले के नागफनी थाना क्षेत्र में दर्ज कराई और अपनी आपबीती सुनाई। पीड़िता ने अपने शौहर के साथ-साथ उसके परिवार वालों पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं।

दैनिक जागरण’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, पीड़ित महिला यूपी के मुरादाबाद जनपद की रहने वाली है। पीड़िता ने थाने में अपने पति, सास और ननद पर दहेज उत्पीड़न के साथ-साथ कई गंभीर आरोप भी लगाए हैं। महिला के मुताबिक, उसकी शादी बेंगलुरु निवासी ऑटो पार्ट्स व्यापारी के साथ 22 नवंबर, 2019 को हुई थी। आरोप है कि निकाह के बाद से ही इमरान ने बीवी के साथ अप्राकृतिक सेक्स करना शुरू कर दिया था।

ये है पूरा मामला

महिला ने आरोप लगाया कि शादी के बाद से ही पति, सास और ननद दहेज में 10 लाख रुपए नहीं देने पर तंग करने लगे थे। पीड़ित महिला ने पति पर आरोप लगाते हुए बताया कि वह उसे दूसरे व्यक्तियों के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए कई बार दबाव भी बना चुका है। जब इन सब अत्याचारों का महिला ने विरोध किया तो उसके पति ने उसके साथ मारपीट कर उसे अपने घर से निकाल दिया।

इस घटना के बाद महिला अपने मायके मुरादाबाद आ गई। महिला के मुताबिक, हाल ही में 31 अगस्त, 2022 की मध्यरात्रि में उसके पति ने उसे 2 बार फोन किया। पहली फोन कॉल में उसने महिला को गालियाँ बकी, वहीं दूसरी कॉल में उसने महिला को तलाक-तलाक-तलाक बोलकर तीन तलाक दे दिया। पुलिस के मुताबिक, इस मामले में सभी आरोपित बेंगलुरु में रहते हैं, उन्हें जल्द ही पूछताछ के लिए बुला लिया जाएगा।

पीलीभीत जिले में भी महिला को दिया तीन तलाक

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले से भी हाल ही में एक तीन तलाक का मामला सामने आया था। इस केस में पीड़िता उम्र मात्र 19 साल ही बताई जा रही है। वहीं पीड़ित युवती ने पुलिस को बताया कि उसके पति ने अप्रैल में उसके साथ मारपीट की और तीन तलाक दे दिया, यह कहते हुए कि उसने थाली में ठंडी सब्जी परोसी है।

पीड़ित युवती के पति का नाम सलमान बताया जा रहा है और उसने 12 अप्रैल 2022 को तीन तलाक देकर अपनी पत्नी से रिश्ता खत्म कर दिया था। ये शादी 23 मई, 2021 को हुई थी। महिला ने आरोप लगाया है कि दहेज न देने पर ससुराल वालों ने उसे अपने साथ ले जाने से इनकार कर दिया था, लेकिन बाद दहेज देकर उन्हें मना लिया गया। बाद में उन्होंने फिर से महिला को परेशान करना शुरू कर दिया और आखिर में उसे तीन तलाक देकर घर से भी निकाल दिया।

बंगाल में गो-तस्करी में माफिया से लेकर पुलिस तक शामिल: रिपोर्ट में दावा, गायों की गर्दन को केले के तने में बाँध नदी के जरिए भेजा जा रहा बांग्लादेश

पश्चिम बंगाल से सटी सीमा के जरिए बांग्लादेश में गायों की तस्करी के मामले अक्सर सामने आते रहते हैं। तस्करी के लिए सबसे आसान और अमानवीय तरीका है गायों के पैरों को बाँधने के बाद उसके सिर को केले के तने से बाँधकर नदी में छोड़ देना। बंगाल के तस्कर गायों को बांग्लादेश भेजने के लिए यही तरीका अपनाते हैं।

तस्कर आमतौर पर गायों की तस्करी के लिए कोडवर्ड का प्रयोग करते हैं। भारत में जो गाय 30 हजार में खरीदी गई, उसे बांग्लादेश में डेढ़ लाख रुपए तक में बेच दिया जाता है। ईद जैसे मौकों पर इनकी कीमतों में और भी वृद्धि हो जाती है।

इतना ही तस्करी के इस खेल में आम अपराधी से लेकर बड़े तस्कर तक शामिल होते हैं। वहीं, राज्य के राजनीतिक दलों का इन्हें भरपूर संरक्षण मिला होता है। इस कारण पुलिस ने इनके खिलाफ कुछ नहीं कर पाती है और वह भी इनका हिस्सा बनकर कमाई पर ध्यान देती है। मवेशियों से लदे वाहनों से रिश्वत लेकर पुलिस उन्हें सुरक्षित आगे जाने देती है।  

पश्चिम बंगाल में गायों की तस्करी का सबसे बड़ा सरगना मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के अनुब्रत मंडल को माना जाता है। बाहुबली अनुब्रत बीरभूम जिले के TMC के नेता और ममता बनर्जी के बेहद करीबी हैं। तस्करी के आरोपों में सीबीआई ने उन्हें पिछले महीने गिरफ्तार किया है।

दैनिक भास्कर की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक, मुर्शिदाबाद जिले में बॉर्डर के पास बसा जालंगी गाँव पशु तस्करी के बड़ों अड्डों में से एक है। इस गाँव की बांग्लादेश से दूरी 5 किलोमीटर से भी कम है। यह गाँव पद्मा नदी के किनारे बसा है। पद्मा नदी बांग्लादेश और मुर्शिदाबाद में बहती है।

यहाँ पर तस्कर किसानों से गायों को खरीद कर लाते हैं और सैकड़ों-हजारों के समूह में उन्हें नदी में धकेल देते हैं। इस दौरान बॉर्डर पर तैनात जवान भी चाहकर कुछ नहीं कर पाता, क्योंकि वे गिनती में एक-दो होते हैं और हथियारों से लैस तस्कर सैकड़ों की तदाद में होते हैं।

जब मवेशियों को नदी में छोड़ दिया जाता है तो बांग्लादेश में नदी किनारे खड़े तस्कर उसे निकाल लेते हैं। गायों पर बनाए गए विभिन्न निशानों के आधार पर वे अपने साथ ले जाते हैं। इस काम में कस्टम के अधिकारी भी मिले होते हैं।

हालाँकि, साल 2018 के बाद और अनुब्रत मंडल की गिरफ्तारी के बाद तस्करी में काफी गिरावट आई है। लेकिन तस्कर अब गायों के बजाय बछड़ों पर नजर गड़ाए हैं। वहीं, स्थानीय एजेंसियों का भी मानना है कि मवेशियों की तस्करी में गिरावट आई, लेकिन ड्रग्स की तस्करी में बढ़ोत्तरी हुई है।

केरल सरकार ने शूटिंग की नहीं दी अनुमति, सेंसर बोर्ड ने कई सीन काट डाले: मोपला नरसंहार पर फिल्म बनाने वाले निर्देशक ने बताई पूरी कहानी, मिल रही धमकियाँ

साल 1921 में मालाबार में मोपला मुस्लिमों द्वारा हिंदुओं का नरसंहार किया जाना भारत के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक है। एक अनुमान के अनुसार, मालाबार नरसंहार में मोपला मुस्लिमों ने 10,000 से अधिक हिंदुओं का नरसंहार किया था। यह नरसंहार मोहनदास करमचंद गाँधी द्वारा शुरू किए गए खिलाफत आंदोलन का प्रत्यक्ष परिणाम था। इस नरसंहार के बाद हमलावरों को ही पीड़ित के रूप में दिखाया गया। साथ ही, हिन्दुओं पर हुए अत्याचार और नरसंहार को पूरी तरह से छिपाने का प्रयास किया गया।

इस नरसंहार के बाद से वामपंथियों ने यह दिखाने का प्रयास किया है कि मालाबार नरसंहार एक ‘किसान विद्रोह’ था, जहाँ गरीब मुस्लिम अपने अधिकारों की माँग करते हुए हिन्दू जमींदारों के खिलाफ खड़े हुए थे। वामपंथी यह कहते रहे हैं कि यह नरसंहार सांप्रदायिक नफरत के कारण नहीं हुआ था। बल्कि, मुसलमानों द्वारा सामना किए गए उत्पीड़न का परिणाम था।

वास्तव में, वामपंथियों ने हमेशा ही सच को छिपाने का प्रयास किया है। इस मामले में भी कुछ ऐसा ही है क्योंकि सच्चाई कुछ और है। दीवान बहादुर सी. गोपालन नायर द्वारा लिखित पुस्तक ‘द मोपला रिबेलियन 1921’ में, उन्होंने बताया है कि मोपला नरसंहार से पहले भी कई बार मुस्लिमों ने धार्मिक उन्माद के चलते हिन्दुओं की हत्याएँ की थीं। सी. गोपालन नायर ने पुस्तक में बताया है कि कैसे मुस्लिम कभी-कभी अपने “हाल इलकम” (धार्मिक उन्माद) में चले जाते हैं और न केवल हिंदुओं की हत्या करते थे, बल्कि उनके मंदिरों को भी अपवित्र करते थे।

उस समय, मिस्टर टीएल स्ट्रेंज को मालाबार में स्पेशल कमिश्नर के रूप में भेजा गया था। स्ट्रेंज को मालाबार सिर्फ इसलिए भेजा गया था क्योंकि वह मुस्लिमों द्वारा उन्मादी हिंसा के पीछे के कारणों का पता लगा सकें। 1852 की अपनी एक रिपोर्ट में, स्ट्रेंज ने इस थ्योरी को साफ तौर से खारिज कर दिया था कि हिंदुओं के खिलाफ मुस्लिमों द्वारा किए गए अपराध ‘किसान विद्रोह’ के परिणाम थे। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि हिन्दू जमींदारों ने किसानों के साथ अच्छा व्यवहार किया और हिंदुओं के खिलाफ हिंसा इस्लामी नफरत का ही परिणाम थी।

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि हिंदुओं के मालाबार नरसंहार के बारे में वामपंथियों द्वारा सेट किए गए नैरेटिव को जिसने भी तोड़ने का प्रयास किया है, उसे भारी विरोध का सामना करना पड़ा है। इसलिए, ऐसी आशंका पहले से ही जताई जा रही थी कि रामसिम्हा (जिन्हें पहले अली अकबर के नाम से जाना जाता था) की आगामी फिल्म को इसी तरह के विरोध का सामना करना पड़ेगा।

उम्मीद के मुताबिक ही, गत 27 जून को खबर सामने आई कि केरल के सेंसर बोर्ड ने फिल्म निर्माता अली अकबर उर्फ ​​​​रामसिम्हा की आगामी मलयालम फिल्म ‘पुझा मुथल पूझा वरे’ को एक सार्टिफिकेट देने से इनकार कर दिया है। इस फिल्म की कहानी, मालाबार में हुए हिन्दुओं के नरसंहार के इर्द-गिर्द घूमती है। 

ऐसा माना जाता है कि रामसिम्हा की फिल्म को सार्टिफिकेट मिलना इतना कठिन नहीं था। लेकिन, जब बार-बार इस्लामवादियों के आचरण से परेशान होकर (खासतौर से सीडीएस विपिन रावत के निधन पर कट्टर मुस्लिमों के जश्न मनाने के बाद) उन्होंने हिन्दू धर्म अपना लिया था, तबसे कई चीजें उनके लिए समस्याजनक हो चुकी हैं।

रामसिम्हा का कहना है, “हिंदुओं के मालाबार नरसंहार पर एक फिल्म रिलीज हो रही थी जिसमें हत्यारों का महिमामंडन किया गया था। फिल्म ‘वरियमकुन्नन’ वरियमकुनाथ कुन्हमेद हाजी और अली मुसलियार के जीवन पर आधारित थी। 1920 के दशक की शुरुआत में केरल में हजारों हिंदुओं का नरसंहार करने के लिए जिहादी जिम्मेदार हैं। जब इस फिल्म की घोषणा की गई, तो कई लोगों ने मुझसे एक ऐसी फिल्म बनाने के लिए संपर्क किया, जो हिंदू समुदाय के साथ हुई सच्चाई का प्रतिनिधित्व करती हो। तभी मैंने इस फिल्म को बनाने का फैसला किया।”

रामसिम्हन की यह फिल्म पूरी तरह से क्राउड फंडिंग पर आधारित है। रामसिम्हा कहते हैं, “लोगों ने मुझे इस फिल्म को बनाने के लिए पैसे दिए थे। मैंने लोगों के योगदान से ही 1.4 करोड़ रुपये इकट्ठे किए।”

यहाँ, यह बताना जरूरी है कि मलयालम निर्देशक आशिक अबू ने विवादास्पद मलयालम अभिनेता पृथ्वीराज सुकुमारन को अपनी पीरियड फिल्म ‘वरियमकुन्नन’ के लिए कास्ट किया था। हालाँकि, हंगामे के बाद यह खबर सामने आई कि अब यह फिल्म ठंडे बस्ते में चली गई है। जून 2020 में, विवादास्पद मलयाली अभिनेता पृथ्वीराज सुकुमारन ने नई फिल्म की घोषणा करते हुए फेसबुक पर एक पोस्ट किया था, जिसमें उन्होंने जिहादियों की तारीफ की थी।

पृथ्वीराज सुकुमारन ने फिल्म के पोस्टर को शेयर करते हुए कहा था, “वरियमकुनाथ एक ऐसे साम्राज्य के खिलाफ खड़े हुए, जिसने दुनिया के एक चौथाई हिस्से पर शासन किया।” कई लोगों ने इस फिल्म के खिलाफ आरोप लगाते हुए आपत्ति जताई थी कि फिल्म एक आतंकवादी को अंग्रेजों के खिलाफ “विद्रोह” करने वाले के रूप में दिखा कर उसे अपराध से मुक्त करने का प्रयास है।

रामसिम्हा (अली अकबर) ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा, “शुरू से ही केरल सेंसर बोर्ड में पार्वती नाम की एक क्षेत्रीय अधिकारी फिल्म के खिलाफ थी। रजिस्ट्रेशन होने के समय से ही, वह मेरे खिलाफ थी। सॉफ्टवेयर ई-प्रमाण में फिल्म को रजिस्टर करने में लगभग डेढ़ महीने का समय लगा। बार-बार यह कहा जाता रहा कि फिलहाल यह जाँच के दायरे में है। हालाँकि, जब मैंने कहा कि अब मैं हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाऊँगा, उन्होंने जल्द ही रजिस्ट्रेशन कर दिया। इसके बाद उन्होंने स्क्रीनिंग के लिए बुलाया। लेकिन, स्क्रीनिंग के बाद बिना बताए ही उन्होंने रिवीजन कमेटी, मुंबई को फिल्म का सुझाव भेज दिया।”

रामसिम्हा का कहना है कि जब वह मुंबई पहुँचे तो रिवीजन कमेटी में 9 लोगों की सुनवाई हो रही थी। रिवीजन कमेटी ने कहा कि फिल्म में थोड़ी सी भी हिंसा होने के कारण इसे जो सर्टिफिकेट दिया जाएगा वह A सर्टिफिकेट होगा। रिवीजन कमेटी ने कुछ मामूली कटौती का भी सुझाव दिया जिसे रामसिम्हा ने स्वीकार कर लिया।

रिवीजन कमेटी की इस मीटिंग के बाद, जब रामसिम्हा फिल्म में हुई कटिंग की लिस्ट मिलने का इंतजार कर रहे थे। इस दौरान, उन्हें केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) से नोटिस मिला कि रिवीजन कमेटी की एक और मीटिंग होनी है। इस नोटिस के बाद से रामसिम्हा थोड़े घबराए हुए थे क्योंकि उन्हें रिवीजन कमेटी की दूसरी मीटिंग का कारण समझ नहीं आया था। इसके बाद, रामसिम्हा के सूत्रों ने उन्हें बताया कि फिल्म को रिवीजन कमेटी की पहली टीम द्वारा पास किया गया था। लेकिन, उस कमेटी द्वारा कुछ ‘गलतियाँ’ हुईं हैं जिस कारण दूसरी मीटिंग हो रही है। रामसिम्हा कहते हैं, जब वे रिवीजन कमेटी की दूसरी मीटिंग में लिए पहुँचे तो पैनल में कोई भी मलयाली सदस्य नहीं था।

फिल्म में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) द्वारा सेंसर किए गए कुछ सीन्स में से एक वो सीन था जहाँ थुवूर के कुएँ में हुई घटना को दिखाया गया था। दरअसल, 25 सितंबर, 1921 को, उत्तरी केरल में थुवूर और करुवायकांडी के बीच बंजर पहाड़ी पर खिलाफत नेताओं में से एक, चंब्रासेरी इम्बिची कोइथंगल ने 4000 लोगों के साथ एक रैली की थी। इस रैली के दौरान, 40 से अधिक हिंदुओं को पकड़ लिया गया और उनके हाथ पीछे करके बाँध दिए गए थे। इसके बाद 40 में से 38 लोगों की हत्या कर दी गई थी। 38 में से 3 को गोली मार दी गई। जबकि, बाकी लोगों का सिर काटकर थुवूर कुएँ में फेंक दिया गया था।

थुवूर कुएँ की घटना के अलावा, ऐसे कई सीन थे जिन्हें सेंसर बोर्ड द्वारा काट दिया गया। रामसिम्हा ने उदहारण देते हुए ऑपइंडिया को बताया है, फिल्म में, एक संवाद था जो अल-दौला (इस्लामी राज्य) के बारे में बताता थ।, इस साम्राज्य को कुंजाहमद हाजी द्वारा मालाबार में स्थापित किया गया था। ऐसा बताया जाता है कि यह स्पष्ट रूप से एक ‘स्वतंत्र क्षेत्र’ था जिसे इस्लामवादियों ने स्थापित किया था और उन्होंने हिंदुओं पर जजिया भी लगाया था। 

सीबीएफसी की दूसरी मीटिंग में एक महिला (सेंसर बोर्ड की सदस्य) ने रामसिम्हा (अली अकबर) से शरीयत और इस्लाम के बारे में कुछ सवाल किए और फिर उस संवाद को पूरी तरह से कट कर दिया।

अकबर ने ऑपइंडिया को बताया कि 1921 में हिन्दुओं के नरसंहार के दौरान बड़े पैमाने पर हत्याएँ हुईं थीं। हिंदुओं का जबरन धर्मांतरण हुआ, हिंदुओं की आस्था का अपमान करने के लिए जानबूझकर गायों की हत्याएँ की गईं, कई हजार लोगों के सिर काट दिए गए और मंदिरों को धराशायी कर दिया गया। फिल्म में, ऐसे कई सीन थे जहाँ उन्होंने हिंदुओं के जबरन धर्मांतरण और इस्लामवादियों द्वारा मंदिरों को तोड़े जाने को प्रदर्शित किया था। इन सभी सीन को सेंसर बोर्ड ने भी अस्वीकार कर दिया। एक अन्य सीन में, गोहत्या दिखाए बिना, इस्लामवादियों द्वारा गायों का वध करने का संकेत दिया गया था, लेकिन उस सीन को भी हटा दिया गया।

ऐसे सीन के अलावा, ऑपइंडिया को बताया गया कि सेंसर बोर्ड ने अली अकबर (रामसिम्हा) से कहा था कि “अल्ला हु अकबर” और “नारा-ए-तकबीर” के नारे इतनी बार नहीं दिखाए जाएँ।

यह साफ था कि फिल्म में जिस तरह से कट लगाए जा रहे हैं, वह मोपला मुस्लिमों द्वारा हिंदुओं पर किए गए अत्याचार और नरसंहार का वास्तविक रूप सामने नहीं आने देना चाहते थे। रामसिम्हा को संदेह है कि सेंसर बोर्ड केरल की उस अधिकारी के प्रभाव में था। रामसिम्हा को लगता है वह अधिकारी एक कम्युनिस्ट है जो कि इस नरसंहार को लेकर कम्युनिस्टों द्वारा गढ़ी गई थ्योरी (जमीदारों के प्रति मुस्लिमों का विद्रोह) को टूटने नहीं देना चाहती थी इसलिए वह फिल्म के कई सीन कटवा रही थी। इस बात की पुष्टि ऐसे भी हो जाती है कि जब फिल्म में हिंदू राजाओं के परिवार को “देवता” के रूप में दिखाया तो तो सेंसर बोर्ड ने जोर देकर कहा कि उन्हें “जमींदारों” के रूप में ही दिखाया जाना चाहिए।

रामसिम्हा को इस फिल्म में हुए सभी कटों की पूरी सूची मिल चुकी है। उनका कहना है कि फिल्म में जिस तरह से कट लगाए गए हैं यदि फिल्म ठीक वैसे ही दिखाई गई तो इसका मतलब यह होगा कि मोपला मुस्लिमों ने हिन्दुओं पर अत्याचार तो किया, लेकिन यह फिल्म में दिखाया ही नहीं गया। सीधी बात यह है कि फिल्म में लगे कट्स इस वामपंथियों के “किसान विद्रोह” के नैरेटिव को और मजबूत कर देंगे। टीजी मोहनदास ने फिल्म में लगे अभी कट्स की पूरी सूची ट्विटर पर भी अपलोड की है।

रामसिम्हा ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा, “फिल्म में लगे कट के साथ फिल्म को दिखाना केवल कट्टर मुस्लिमों की भलाई होगी। मोपला मुस्लिमों द्वारा हिन्दुओं पर किए गए अत्याचार जैसा दिखाया जाना इस फिल्म में कुछ भी नहीं बचा है।”

उन्होंने, यह भी कहा कि फिल्म की वास्तविक कहानी और सार को बदलने के अलावा, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) ने अपनी रिवीजन कमेटी की बैठक के दौरान उन्हें फिल्म के डायरेक्टर के रूप में अपने मुस्लिम नाम अली अकबर का उपयोग करने के लिए मजबूर किया था।

ऑपइंडिया से हुई एक्सक्लुसिव बातचीत में रामसिम्हा ने कहा, “मुझे लगता है कि उन्हें यह समस्या है कि एक मुस्लिम व्यक्ति हिन्दू धर्म में परिवर्तित हो गया और हिंदुओं के मालाबार नरसंहार पर एक फिल्म बना रहा है। शायद वे नहीं चाहते कि समाज में ऐसा संदेश जाए।”

उन्होंने आगे कहा “इतने सारे लोग पेन नेम्स (उपनाम) का उपयोग करते हैं। इतने सारे कलाकार और टेक्नीशियन अलग-अलग नामों का उपयोग करते हैं। अगर मैं अली अकबर को निर्माता नाम के रूप में उपयोग करना चाहता हूँ लेकिन निर्देशक के रूप में मेरा हिन्दू नाम उपयोग करना चाहता हूँ तो उन्हें समस्या क्यों होनी चाहिए? उनसे फिल्म की समीक्षा करने की अपेक्षा की जाती है, न कि नामों पर निर्णय लेने के लिए।”  

इस बातचीत को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा, “मुझे संदेह है कि केरल सेंसर बोर्ड की पार्वती ने सीबीएफसी (केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड) की रिवीजन कमेटी से कहा था कि ये कटौती होनी चाहिए। मुझे पीएफआई जैसे इस्लामी संगठनों के भी कुछ दबाव का संदेह है। 

यह पूछे जाने पर कि, केरल सेंसर बोर्ड और रिवीजन कमेटी, दोनों ही केंद्र सरकार के अधीन हैं। ऐसे में उन्हें यह क्यों लगता है कि उनकी फिल्म के लिए दबाव डाला जा रहा है? रामसिम्हा ने कहा, “आपको ‘द कश्मीर फाइल्स’ के उस डॉयलॉग को याद रखना होगा – सरकार किसी की भी हो सकती है लेकिन सिस्टम अभी भी उनका है। साथ ही, मुझे लगता है कि केंद्र सरकार आर्थिक विकास में अधिक रुचि रखती है और इस प्रक्रिया में, वे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक मुद्दों की अनदेखी करते हैं।”

मोपला मुस्लिमों द्वारा किए गए हिन्दुओं के नरसंहार पर फिल्म बनाते समय रामसिम्हा के सामने आयीं कई समस्याएँ

रामसिम्हा ने ऑपइंडिया को बताया कि केवल सेंसर बोर्ड के कट्स ही फिल्म में बाधा नहीं बन रहे थे, बल्कि कई अन्य समस्याएँ भी सामने आईं। जैसे, वह फिल्म के हिंदी संस्करण के लिए एक नाम रजिस्टर करना चाहते थे। हालाँकि, वह भी बेहद मुश्किल साबित हुआ। रामसिम्हा इस फिल्म के हिंदी संस्करण का नाम, “1921: पूझा मुथल पूझा वरे” को पंजीकृत करना चाहते थे, जो “1921: नदी से नदी तक” का अनुवाद है। हालाँकि, जब उन्होंने यह नाम रजिस्टर कराने की कोशिश की तो वह पहले ही किसी और ने ले लिया था।

रामसिम्हा कहते हैं, “मैंने नाम के 20 अलग-अलग नामों रजिस्टर करने की कोशिश की, मालाबार नरसंहार से लेकर हर बदलाव के बारे में सोच सकते हैं। हालाँकि, सभी किसी और के द्वारा पहले ही रजिस्टर किए गए थे। मुझे यह ऐसा लग रहा था जैसे कोई यह चाहता हो कि मैं फिल्म के लिए हिन्दी नाम की तलाश न करूँ।” रामसिम्हा को लगता है कि कोई जानबूझकर फिल्म के सभी संभावित नाम रजिस्टर्ड करा रहा है, इसलिए वो कोई भी हिन्दी नाम रजिस्टर नहीं करा सके।

रामसिम्हा ने आगे कहा कि केरल पुलिस और केंद्रीय खुफिया अधिकारियों ने उनसे संपर्क किया है, उन्हें सूचित किया है कि वह गंभीर खतरे में हैं। उन्होंने बताया, “फिल्म के खबरों में आने के बाद, यहाँ यहां तक ​​कि जब मैं फिल्म की शूटिंग कर रहा था, तब भी धमकियाँ मिल रही थीं। केंद्रीय एजेंसियाँ ​​मेरे घर आईं और सुरक्षा के लिहाज से मुझे आठ कैमरे लगाने के लिए कहा था।”

रामसिम्हा ने कहा, “यहाँ तक ​​​​कि जब मैं फिल्म की शूटिंग कर रहा था, तब भी राज्य सरकार ने मुझे शूटिंग की अनुमति देने से इनकार करके फिल्म को रोकने की कोशिश की थी। राज्य की ओर से मुझे पब्लिक प्लेसों में शूटिंग की अनुमति नहीं दी गई, जिसके बाद मुझे निजी क्षेत्रों में जाकर फिल्म की शूटिंग करनी पड़ी।” 

उन्हें मिल रही धमकियों के बारे में रामसिम्हा कहते हैं, “कट्टरपंथी इस्लामवादियों ने फिल्म में काम करने वाले कलाकारों को भी धमकी दी थी, उन्हें फिल्म के साथ अपना जुड़ाव खत्म करने के लिए कहा था। रामसिम्हा आगे कहते हैं, “जिस दिन उन्हें (इस्लामवादियों को) मौका मिलेगा, वे मुझे खत्म कर देंगे, सुरक्षा के लिए सिर्फ मेरे कृष्ण हैं।”

बता दें, रामसिम्हा को पहले अली अकबर के नाम से जाना जाता था। लेकिन, उन्होंने हिन्दू धर्म अपनाने के साथ ही अपना नाम रामसिम्हा रख लिया है। रामसिम्हा ने अब सीबीएफसी (केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड) द्वारा उनकी फिल्म पर की गई कटिंग को लेकर न्याय की गुहार लगाने के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया है।

जुमे पर मस्जिद उड़ाने की धमकी देने वाला निकला मोहम्मद समद, यूपी पुलिस ने किया गिरफ्तार: मौलवी को गोली मारने की भी दी थी धमकी

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में जामा मस्जिद को बम से उड़ाने और इमाम को गोली मारने की धमकी देने के मामले में पुलिस ने मोहम्मद समद नाम के व्यक्ति को गिरफ्तार किया है। मोहम्मद समद पर आरोप है कि उसने 7 सितम्बर, 2022 (बुधवार) को मस्जिद की दीवार पर धमकी भरे पोस्टर चिपकाए थे। समद ने पुलिस के आगे अपना गुनाह कबूल भी कर लिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मामला किला थानाक्षेत्र का है। यहाँ की जामा मस्जिद के आगे 7 सितम्बर 2022 को मस्जिद की दीवारों पर एक पोस्टर चिपका था, जिसमें लिखा था, “किसी भी जुमे को मस्जिद में बम रखा जाएगा। इस इमाम को निकाला जाए। मस्जिद से दूर रहे खुर्शीद आलम। खुर्शीद आलम को निकाला जाए। नहीं निकला तो गोली पड़ेगी।” पुलिस ने उसी दिन केस दर्ज कर के मामले की जाँच शुरू कर दी।

समद द्वारा चिपकाया गया पोस्टर

पुलिस ने जाँच के बाद इस हरकत का आरोपित मोहम्मद समद को पाया। पुलिस के आगे समद ने अपने कृत्य को स्वीकार किया। पुलिस ने समद का वीडियो भी जारी किया है, जिसमें वो कह रहा कि उसने शरारत में पोस्टर चिपका दिया और दुबारा ऐसी गलती नहीं करेगा। वीडियो में समद ये मान रहा है कि वो जामा मस्जिद के इमाम को निकलवाना चाह रहा था। समद ने इमाम से अपनी नाराजगी की वजह उनके द्वारा DJ न प्रयोग करने की सलाह को बताया।

बरेली पुलिस के मुताबिक, 7 सितंबर, 2022 को सुबह 6 बजे जामा मस्जिद की दीवार पर चस्पाए धमकी भरे पत्र में इमाम खुर्शीद आलम को गोली मारने की बात कही गई थी। इस मामले की जाँच करते हुए नसीम अहमद के 25 वर्षीय बेटे मोहम्मद समद को हिरासत में लिया गया। पुलिस के मुताबिक, समद ने क्षेत्र के सम्मानित व्यक्तियों के आगे पर्चा लगाना कबूल किया है। पुलिस के अनुसार, मस्जिद के इमाम मुफ्ती खुर्शीद आलम ने ईद मीलाद उन-नबी पर निकलने वाले जुलूस में डीजे न बजाने की अपील की थी, जिस से समद नाराज था। पुलिस के अनुसार, मामले में आगे की कार्रवाई की जा रही है।

इमाम खुर्शीद के मुताबिक, वो 2013 से जामा मस्जिद में इमामत करते थे और उनकी किसी से कोई रंजिश नहीं थी। धमकी के बाद उन्होंने इसे किसी की शरारत बताया था और पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की बात भी कही थी।

‘नागिन’ वाली हिरोइन हुई पाकिस्तानी क्रिकेटर की फैन: लोग बोले – एक और गई, इससे पहले उर्वशी रौतेला का आया था रोमांटिक रील

बॉलीवुड एक्ट्रेस उर्वशी रौतेला के बाद सुरभि ज्योति ने पाकिस्तान के युवा तेज गेंदबाज नसीम शाह (Naseem Shah) की तारीफ की है। भारतीय अदाकारा सुरभि ज्योति (Surbhi Jyoti) ने बुधवार (7 सितंबर, 2022) की रात एशिया कप 2022 में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच खेले गए मैच में नसीम की जमकर तारीफ की। ज्योति ने ट्विटर पर क्रिकेटर का जिक्र करते हुए कहा, “पाकिस्तान को निश्चित रूप से एक हीरा मिला है।”

दरअसल, आखिरी ओवर में नसीम शाह के दो छक्कों की वजह से पाकिस्तान एशिया कप 2022 के फाइनल में पहुँच गया। इसको लेकर ‘नागिन’ टीवी शो की एक्ट्रेस अपनी खुशी नहीं रोक पाई और सोशल मीडिया पर पाकिस्तानी क्रिकेटर की तारीफों के पुल बाँधने लगीं। हालाँकि यूजर्स को उनका यह अंदाज पसंद नहीं आया और उन्होंने सुरभि को टैग करते हुए 7 सितंबर की रात एशिया कप 2022 में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के खिलाड़ियों में हुई भिडंत का वीडियो शेयर कर दिया।

नौबत यहाँ तक आ गई थी कि अंपायर्स और अन्य खिलाड़ियों को बीच-बचाव के लिए आना पड़ा। यह हंगामा 130 रन के लक्ष्य का पीछा कर रही पाकिस्तानी टीम की पारी के 19वें ओवर की 5वीं गेंद पर हुआ। इस ओवर की चौथी गेंद पर आसिफ अली ने छक्का जड़ दिया। इसके बाद अगली ही गेंद पर फरीद अहमद ने आसिफ अली को आउट कर दिया। पवेलियन लौटने से पहले फरीद और आसिफ के बीच कहासुनी शुरू हो गई।

एक और यूजर ने कहा- उर्वशी के बाद एक और।

वहीं, पाकिस्तानी यूजर्स ज्योति की तारीफ करते हुए दिखाई दिए। एक पाकिस्तानी फैन ने एक्ट्रेस के लिए लिखा, “आखिरकार एक अच्छा भारतीय जो बोल्ड और सुंदर है, प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की प्रशंसा करने से नहीं डरता।”

बता दें कि इससे पहले बॉलीवुड एक्ट्रेस उर्वशी रौतेला (Urvashi Rautela) ने पाकिस्तानी क्रिकेटर नसीम शाह के संग अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर एक वीडियो शेयर किया था, जिसको लेकर नेटिजन्स ने उन्हें खरी-खोटी सुनाई थी। वीडियो में पाकिस्तानी गेंदबाज नसीम शाह के साथ उर्वशी की कुछ झलकियाँ दिखाई गई हैं।

वीडियो में आप देख सकते हैं कि उर्वशी और नसीम एक-दूसरे को देखकर ब्लश कर रहे हैं। लोगों ने पाया कि उर्वशी का यह वीडियो शेयर करना इस बात की ओर इशारा करता है कि वह क्रिकेटर के प्रति अट्रैक्ट हो रही हैं। यह वीडियो हाल में भारत बनाम पाकिस्तान मैच के दौरान का है।

3.20 km लंबा ‘कर्तव्य पथ’, 19 एकड़ में सरोवर, 4 लाख वर्ग मीटर हरियाली: ‘सेन्ट्रल विस्टा’ से बदला नजारा, सभी राज्यों के भोजन और उत्पाद भी बिकेंगे

‘सेंट्रल विस्टा’ प्रोजेक्ट के एक हिस्से का काम लगभग पूरा हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) आज गुरुवार (8 सितंबर 2022) को शाम 7 बजे कर्तव्य पथ का उद्घाटन और इंडिया गेट पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस की प्रतिमा का अनावरण करेंगे। इस दौरान बड़ी संख्या में लोगों के मौजूद रहने की संभावना है।

ग्रेनाइट से बनी नेताजी सुभाषचंद्र बोस की यह प्रतिमा 28 फुट ऊँची है। इसका कुल वजन 65 मीट्रिक टन है। बता दें कि 23 जनवरी को पराक्रम दिवस पर प्रधानमंत्री ने नेताजी की होलोग्राम प्रतिमा का अनावरण किया था। अब वहाँ इस प्रतिमा का अनावरण किया जाएगा।

राजपथ का ही नाम बदलकर ‘कर्तव्य पथ’ किया गया है। यह इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन को जोड़ता है। इस सड़क के दोनों तरफ लॉन को विकसित किया गया है। हरियाली के साथ-साथ पैदल चलने वालों के लिये 15.5 किलोमीटर लंबा लाल ग्रेनाइट पत्थरों से बना पैदल पथ इसकी खूबसूरती में चार चाँद लगाता है।

गौरतलब है कि देश की स्वतंत्रता से पहले राजपथ को किंग्स वे और जनपथ को क्वींस वे के नाम से जाना जाता था। आजादी के बाद क्वींस वे का नाम बदलकर जनपथ और किंग्स वे का नाम बदलकर राजपथ कर दिया गया था। अब इसे बदलकर कर्तव्य पथ कर दिया गया है।

करीब 3.20 किलोमीटर लंबे कर्तव्य पथ के बगल में करीब 19 एकड़ में सरोवर बना है। इसे पुनर्विकसित कर और भव्यता दी गई है। खूबसूरती और सहूलियत के लिए इस पर 16 पुल भी बनाए गए हैं। इसके अलावा यहाँ झरने भी विकसित किए गए हैं।

इसके साथ इस मार्ग के दोनों तरफ स्टॉल लगाने की व्यवस्था की गई है। यहाँ CPWD ने 5 वेडिंग जोन बनाए हैं और हर जोन के लिए 40 वेंडर तय किए गए हैं। यहाँ देश भर के विभिन्न राज्यों के पसंदीदा खाने से लेकर स्थानीय उत्पाद मिलेंगे।

यहाँ पार्किंग स्थल विकसित करने के साथ-साथ पैदल यात्रियों के लिए नए अंडरपास बनाए गए हैं। यहाँ 1,126 गाड़ियाँ पार्क की जा सकेंगी। वहीं, इंडिया गेट के पास पार्किंग में 35 बसें खड़ी हो सकेंगी। पूरे क्षेत्र में करीब 3.90 लाख वर्गमीटर में फैली हरियाली भी दर्शनीय है। शाम ढलने के बाद रौशनी में यहाँ का नजारा अद्भुत लगता है।

बता दें कि सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत भारत की नई संसद और उसके आसपास के इलाके के पुर्नविकास से संबंधित परियोजना को कहा गया है। इस प्रोजेक्ट में तमाम तरह की सुविधाओं और मॉर्डन इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास किया जा रहा है। संसद भवन से लेकर इंडिया गेट का पूरा इलाका पुनर्विकसित करने के साथ-साथ नया संसद भवन, प्रधानमंत्री आवास, प्रधानमंत्री कार्यालय और केंद्रीय सचिवालय बनाया जा रहा है।

‘ब्रह्मास्त्र’ की न हो नेगेटिव पब्लिसिटी, इसीलिए KRK को जेल में डलवाया? लोगों ने करण जौहर पर लगाए आरोप, ₹410 करोड़ लगे हैं दाँव पर

बॉलीवुड अभिनेता, निर्माता और फिल्म समीक्षक कमाल राशिद खान उर्फ केआरके (KRK) को मुंबई पुलिस ने हाल ही में एक पुराने मामले को लेकर गिरफ्तार कर लिया था। उनकी इतने समय बाद हुई गिरफ़्तारी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि उनकी गिरफ़्तारी के पीछे करण जौहर का हाथ भी हो सकता है, क्योंकि वे फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ का नेगेटिव रिव्यू नहीं होने देना चाहते। गुरुवार (8 सितंबर, 2022) को ही KRK को जमानत मिली है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, KRK को विदेश से आते ही मुंबई हवाई अड्डे पर ही गिरफ्तार कर लिया गया था। उन्हें 2020 के एक विवादित ट्वीट के कारण अरेस्ट किया गया था। इसके बाद KRK को बोरीवली अदालत ने 14 दिन तक हिरासत में रखने का फैसला सुनाया। इस बात की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है कि फिल्म समीक्षक को आखिर किस मामले में गिरफ्तार किया गया है।

अब खबर यह भी आ रही है कि उन्हें गुरुवार (8 सितंबर, 2022) को बेल मिल गई है। यह बेल उन्हें तब मिली है, जब इसके अगले ही दिन, यानी 9 सितंबर 2022 को यह फिल्म सिनेमा घरों में दस्तक दे रही है। केआरके के वकील अशोक सरावगी ने उनकी बेल की पुष्टि करते हुए कहा कि कमल आज यानी गुरुवार को ठाणे जेल से बाहर आ सकते हैं। उनकी रिहाई से उनके समर्थकों में खुशी कि लहर दौड़ पड़ी है।

वहीं सोशल मीडिया पर कुछ लोगों द्वारा उनकी गिरफ़्तारी का कारण रणबीर और आलिया की फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ को बताया जा रहा है। ट्विटर पर निखिल शर्मा नामक एक यूजर ने बॉयकोट ट्रेंड को लेकर लिखा, “वास्तव में ‘ब्रह्मास्त्र’ के एक अच्छी फिल्म होने का अनुमान है। बहिष्कार छोड़कर क्या लगता है? कैसी फिल्म होगी?” इसके जवाब में एक यूजर ने लिखा, “सुपरफ्लॉप! फिल्म पर यदि कॉन्फिडेंस होता तो बॉलीवुड माफिया वाले KRK को जेल में नहीं डलवाते।”

एक अन्य यूजर ने करण जौहर पर आरोप लगाते हुए लिखा था, “एक ट्वीट के कारण केआरके पिछले एक सप्ताह से जेल में कैद हैं। फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ कि रिलीज के 7 या 10 दिनों के बाद उन्हें शायद बेल मिले! ये असली करण जौहर का मास्टरक्लास है।” हालाँकि, अब जब उन्हें जमानत मिल गई है तो लोगों में आगे ये भी आशंका है कि किसी तीसरे मामले में वो गिरफ्तार न कर लिए जाएँ।

रोनक पटेल नामक एक यूजर ने करण जौहर के एक वीडियो को शेयर करते हुए लिखा, “देखो माई बाप क्या बोल रहा हे और उसके खिलाफ जाओ तो KRK के जैसा हाल करता है सच्ची ना!”

ट्विटर पर विराज खन्ना ने लिखा, “हद है बॉलीवुड वालों, अपनी ताकत दिखाकर KRK को जेल में डाला है। अब तो उनका रिव्यू वाला वीडियो सुपर वायरल होगा”

पाकिस्तान के उप-कप्तान ने ही कह दिया – ‘हम बढ़िया टीम लेकिन चैम्पियन टीम नहीं’

पाकिस्तान क्रिकेट टीम के उप-कप्तान शादाब खान (Shadab Khan) ने कहा है कि पाकिस्तान की क्रिकेट टीम “अच्छी है, लेकिन एक चैंपियन टीम नहीं है।” उन्होंने कहा कि श्रीलंका के खिलाफ रविवार को एशिया कप फाइनल में दबाव को झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए।

दरअसल, बुधवार को अफगानिस्तान के खिलाफ पाकिस्तान को नसीम शाह की जरूरत थी, क्योंकि 20वें ओवर की शुरुआत में लगातार दो छक्के लगे। जीत के लिए 130 रनों का पीछा करते हुए शादाब खान ने एक विकेट लेने के साथ टीम में 36 रन का योगदान दिया था।

यह टूर्नामेंट ऑस्ट्रेलिया में अक्टूबर-नवंबर में होने वाले टी20 विश्व कप के लिए एक तरह से सचेत करने वाला है। शादाब खान ने पाकिस्तान की टीम को चेतावनी देते हुए कहा कि अभी बहुत काम करना बाकी है।

उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि एक अच्छी टीम को दबाव की स्थिति में इस तरह से पतन का सामना नहीं करना चाहिए, खासकर मैंने बकवास शॉट खेला। मैं अच्छी तरह से तैयार था और मुझे मैच खत्म करना चाहिए था।”

उन्होंने आगे कहा, “जैसा कि मैंने टूर्नामेंट की शुरुआत में कहा था, हम एक अच्छी टीम हैं लेकिन चैंपियन टीम नहीं हैं और यही बनना हमारा लक्ष्य है। उम्मीद है कि हम इस पर काम करेंगे और कोशिश करेंगे कि हम अपनी गलतियों को ना दोहराएँ।”

शादाब का कहना है कि पाकिस्तानी प्रबंधन ने गेंदबाजों को भी बल्लेबाजी करने के लिए प्रोत्साहित किया है, क्योंकि किसी को नहीं पता कि खेल में आगे क्या स्थिति आएगी। उन्होंने कहा, “हमारे गेंदबाजों में भी बल्ले से मैच खत्म करने की क्षमता है।”

बता दें कि पाकिस्तान ने अफगानिस्तान को एशिया कप के सुपर-4 के चौथे मुकाबले में मात दे दिया था। इस जीत के पीछे शादाब खान रहे। उनके शानदार प्रदर्शन के कारण पाकिस्तान यह मैच जीतने में सफल रहा।

पहले बल्लेबाजी करते हुए अफगानिस्तान ने पाकिस्तान की टीम को 130 रनों का लक्ष्य दिया था। इसे पाकिस्तानी टीम ने 9 विकेट में ही हासिल कर लिया। पाकिस्तानी टीम को जीत दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले शादाब खान को ‘प्लेयर ऑफ द मैच’ का खिताब मिला।

जिस आतंकी याकूब मेमन के कारण मुंबई ब्लास्ट में लोग मारे गए, उसकी कब्र बन गई ‘मजार’: शिकायत के बाद मुंबई पुलिस का एक्शन

मुंबई ब्लास्ट मामले में मृत्युदंड पाए आतंकी याकूब मेमन की कब्र को मज़ार की शक्ल दी गई है। टाइल्स-मार्बल्स लगा कर इसे सजा दिया गया है। उद्धव ठाकरे की सरकार पर इसका आरोप लग रहा है। याकूब की कब्र पर न सिर्फ टाइल्स लगा दी गई है बल्कि रोशनी के लिए लाइटें भी लगा दी गईं हैं।

भाजपा नेता राम कदम ने इस मुद्दे को उठाते हुए 7 सितम्बर 2022 (बुधवार) को याकूब मेमन की कब्र की तस्वीरें भी शेयर की हैं। यह शिकायत और फोटो वायरल होने के बाद मुंबई पुलिस ने याकूब की कब्र से लाईटिंग हटवा दी है।

इससे पहले भाजपा नेता राम कदम ने लिखा, “उधव ठाकरे मुख्यमंत्री थे। उस समय में मुंबई में पाकिस्तान के इशारे पर 1993 में बम कांड करने वाला खूँखार आतंकवादी याकूब मेमन की कब्र मज़ार में तब्दील हो गई है। यही है इनका मुंबई से प्यार और यही है इनकी देशभक्ति? उद्धव ठाकरे समेत राहुल गाँधी और शरद पवार इस कुकर्म को अनदेखा करने के लिए मुंबई की जनता से माफी माँगे। अब पेंग्विन सेना इसका जवाब दे।”

राम कदम द्वारा शेयर की गई तस्वीरों में जिस जगह को याकूब मेमन की कब्र कहा जा रहा है, वहाँ ताजे फूल चढ़ाए गए हैं। इसी के साथ चारों तरफ से हरे रंग की पक्की बॉउंड्री भी दिखाई दे रही है। भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा के नेता और महाराष्ट्र के भाजपा विधायक राम सतपुते ने इस कब्र को तत्काल खोदने की माँग की है। विधायक ने इस हरकत को 1993 मुंबई बम विस्फोट में जान गँवाने वालों के साथ विश्वासघात बताया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक याकूब मेमन को मुंबई के मरीन लाइंस में रेलवे स्टेशन के सामने 7 एकड़ में बने कब्रिस्तान में दफनाया गया था। याकूब को लगभग 5 साल पहले फाँसी दी गई थी। अब उसकी कब्र पर मार्बल लगा दिए गए हैं और आस-पास रोशनी का इंतज़ाम कर दिया गया है। जब इस बावत कब्रिस्तान के एक कर्मचारी से सवाल किया गया तो उसने कहा कि कब्रिस्तान के अंदर ऐसी कई कब्रें हैं, जिसके लिए उनके परिजन सालाना फीस भी अदा करते हैं।

खालिस्तानी वाले 46% ट्वीट Pak से, ज़ुबैर के ट्वीट से ट्रेंड में आया कीवर्ड: शिकायत के बाद अब दे रहा सफाई, अर्शदीप पर प्रोपेगंडा की खुली पोल

भाजपा नेता मनजिंदर सिंह सिरसा ने हाल ही में भारतीय क्रिकेटर अर्शदीप सिंह को खालिस्तानी (Khalistani) कहने वालों का प्रचार करने वाले ऑल्ट न्यूज के सह-संस्थापक और कथित फैक्ट चेकर मोहम्मद जुबैर (Mohammed Zubair) के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। इसका विरोध करते हुए मोहम्मद जुबैर ने बुधवार (7 सितंबर, 2022) को अपने ट्विटर हैंडल पर लंबा चौड़ा पोस्ट लिखा। लेकिन, ट्विटर यूजर ‘द हॉक आई’ ने उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया।

फोटो साभार: ट्विटर

जुबैर ने दावा किया कि उसके खिलाफ ‘नफरत फैलाने’ के लिए प्राथमिकी दर्ज की गई थी। जुबैर ने सिरसा के आरोपों का जवाब देने की कोशिश करते हुए कहा कि अर्शदीप के कैच छोड़ने के एक घंटे बाद उन्होंने ट्वीट किया। उन्होंने ट्विटर हैंडल @MrSinha_ पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने भी ‘खालिस्तानी’ शब्द का इस्तेमाल किया। दिलचस्प बात यह है कि सिन्हा ने अर्शदीप को ‘खालिस्तानी’ कहा ही नहीं था।

फोटो साभार: ट्विटर

सिन्हा ने इस ओर इशारा किया था कि ‘किंग्स इलेवन पंजाब’ का ऑफिशियल हैंडल पाकिस्तानी टीम के लिए चीयर कर रहा था, लेकिन उन्होंने अर्शदीप को खालिस्तानी नहीं कहा था। ट्वीट के लिए एक वेब आर्काइव लिंक था, लेकिन आर्काइव लिंक में विशेष लिंक को आर्काइव नहीं किया गया था। सिन्हा ने जुबैर का भी जवाब दिया और कहा कि वह अर्शदीप का नहीं, बल्कि किंग्स इलेवन के ट्विटर हैंडल का जिक्र कर रहे हैं। जुबैर के झूठे ट्वीट के कारण सिन्हा ट्रोलिंग का शिकार हुए।

जुबैर ने आगे दावा किया कि भारतीयों और पाकिस्तानियों ने अर्शदीप को खालिस्तानी कहने के साथ उन्हें गालियाँ भी दीं। हालाँकि, हॉक आई ने इस बात को प्रमुखता से उठाया कि कैसे उसके (जुबैर) ट्वीट के बाद खालिस्तानी शब्द का प्रयोग हुआ। हैंडल ने तथ्यों के साथ अपनी बात रखते हुए जुबैर के ट्वीट को साझा किया और कहा, “आपके ट्वीट करने के 45 मिनट पहले ये कीवर्ड ट्रेंड नहीं कर रहा था। आप अपने कोलाज में राइट विंग हैंडल को कोट कर रहे हैं। Google ट्रेंड, विकीपीडिया पेज में परिवर्तन, पाकिस्तानियों और इसे शुरू करने वाले ‘Dunya Ch’ के डेटा को क्यों छोड़ रहे हैं?”

‘द हॉक आई (The Hawk Eye)’ ने ट्वीट के साथ कुछ स्क्रीनशॉट भी शेयर किए हैं। पहले स्क्रीनशॉट में साफ देखा जा सकता है कि जुबैर के ट्वीट से पहले खालिस्तानी शब्द का इस्तेमाल करते हुए 500 से कम ट्वीट किए गए थे। लेकिन उसके ट्वीट के एक घंटे के भीतर यह 1000 से अधिक हो गया और बढ़ता ही रहा। अगले दिन दोपहर में 3:30 बजे तक यह 16,000 से अधिक तक पहुँच गया। गूगल ट्रेंड्स मैप के मुताबिक खालिस्तानी शब्द के प्रचार-प्रसार के पूरे विवाद में पाकिस्तान का 46 फीसदी योगदान था। इसके अलावा यूएई का 20%, भारत का 17% और कतर का 7% था।

गौरतलब है कि पाकिस्तानी मूल के पत्रकार डब्ल्यूएस खान ने ट्वीट किया था कि कैच छूटने के महज 3 मिनट बाद ही अर्शदीप खालिस्तानी आंदोलन का हिस्सा हो सकते हैं। इसके अलावा पाकिस्तानी इन्फ्लुएंसर ओसामा जिसे ‘ashaqueens’ ट्विटर हैंडल से जाना जाता है, उसने कहा था कि अर्शदीप को खालिस्तानी आंदोलन का समर्थन करना चाहिए, क्योंकि वह कैच छोड़ने के बाद अब भारत नहीं जा सकता। कैच छूटने के 12 मिनट बाद ही ये ट्वीट किया गया था।

पूरे विवाद का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जुबैर ने जानबूझकर ‘खालिस्तानी’ शब्द को ही खोजा था। इस बात की पुष्टि उसके सभी स्क्रीनशॉट से होती है, जिसमें यह शब्द बोल्ड है। यह तभी होता है जब आप ट्विटर पर सर्च रिजल्ट से ट्वीट्स के स्क्रीनशॉट ले रहे होते हैं।

पाकिस्तान और अरब देशों से किए गए ट्वीट

पाकिस्तान के खिलाफ मैच में अर्शदीप ने 18वें ओवर की तीसरी गेंद में आसिफ अली का कैच छोड़ा था, जिसके बाद देखा गया कि अचानक उनको सोशल मीडिया पर ट्रोल किया जाने लगा। कुछ अकॉउंट्स से उन्हें देश विरोधी जैसे शब्द तक कहे गए। जो ट्वीट अर्शदीप को देशद्रोही आदि बताते हुए किए गए हैं, वो अधिकतर पाकिस्तान और अरब देशों के लोगों ने भारतीय बनकर किए थे।

विकिपीडिया पर भी अर्शदीप का डाटा बदला

पाकिस्तानियों ने केवल सोशल मीडिया पर ही अर्शदीप को खालिस्तानी दिखाने की कोशिश नहीं की। बल्कि उन्होंने विकिपीडिया पर भी अर्शदीप का डाटा बदल दिया था। उन्होंने जहाँ-जहाँ अर्शदीप के नाम के साथ भारतीय होना चाहिए वहाँ जानबूझकर खालिस्तान लिखा था।