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‘सिंगल लाइफ कचरा छानने जैसा’: स्वरा भास्कर बोलीं- शाहरुख और आदित्य चोपड़ा ने मेरी लव लाइफ बर्बाद कर दी

हिंदू विरोधी बयानों के लिए कुख्यात बॉलीवुड अभिनेत्री स्वरा भास्कर (Swara Bhaskar) का कहना है कि सिंगल लाइफ कचरा छानने जैसा है। उन्होंने आरोप लगाया कि अभिनेता शाहरुख खान (Shah Rukh Khan) और फिल्म निर्माता आदित्य चोपड़ा (Aditya Chopra) ने उनकी लव लाइफ को बर्बाद कर दिया।

स्वरा ने कहा कि राज-सिमरन की जोड़ी में शाहरुख खान और काजोल की मुख्य भूमिका वाली फिल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे को आदित्य चोपड़ा ने अपने निर्देशन में पहली फिल्म बनाई थी। इस फिल्म ने उन्हें रोमांस का एक अलग विचार दिया, जो बाद में गलत साबित हुआ।

मिडडे से बात करते हुए स्वरा ने कहा, “मैं अपनी लव लाइफ को बर्बाद करने के लिए आदित्य चोपड़ा सर और शाहरुख खान को जिम्मेदार ठहराती हूँ। क्योंकि, मैंने छोटी सी उम्र में दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे देखी थी और तब से मैं उस राज की तलाश कर रही हूँ, जो शाहरुख की तरह दिखता है। मुझे यह महसूस करने में कई साल लग गए कि राज मौजूद नहीं है। मुझे नहीं लगता कि मैं रिश्तों के मामले में बहुत अच्छा हूँ।”

दरअसल, स्वरा ने अपनी आगामी फिल्म ‘जहाँ चार यार’ के प्रचार के दौरान एक साक्षात्कार में स्वरा ने यह बात कही है। स्वरा ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में प्यार और शादी को लेकर उनके सपने कैसे बदल गए हैं। यह फिल्म महिलाओं की दोस्ती पर आधारित है। इसमें स्वरा के साथ पूजा चोपड़ा, शिखा तलसानिया और मेहर विज मुख्य भूमिका में हैं।

फिल्म के प्रोमोशन के दौरान पूजा चोपड़ा ने कहा, “स्वरा सिंगल हैं और डेट पर जाने के लिए तैयार हैं।” इसके बाद स्वरा ने कहा, “मैं कर चुकी हूँ दोस्तों। अब नहीं कर सकती। मेरे पास अब एनर्जी नहीं है। सिंगल लाइफ कठिन है और कचरा छानने जैसा है।”

यह फिल्म 16 सितंबर को रिलीज होने वाली है। स्वरा की आखिरी वीरे दी वेडिंग (2018) भी महिला मित्रता पर आधारित थी। स्वरा की अगली फिल्म ‘मिसेज फलानी’ भी पाइपलाइन में हैं। वह फिल्म में नौ भूमिकाएँ निभाएँगी, जो नौ शॉर्ट स्टोरीज का कलेक्शन है।

पटना में RJD के पूर्व MLC अनवर अहमद ने भीड़ के साथ थाने को घेरा, बेटे ने अपराधी को नहीं छोड़ने पर DySP की वर्दी उतरवाने की दी धमकी

नीतीश कुमार भाजपा को छोड़कर महागठबंधन के साथ जब सरकार बनाए तो बिहार में जंगलराज की वापसी के कयास लगाए जाने लगे थे। अब इसके सबूत भी मिलने लगे हैं। राजधानी पटना में राजद के पूर्व MLC अनवर अहमद के बेटे अशफर अहमद ने एक डीएसपी के साथ बदतमीजी की और वर्दी उतरवा लेने की धमकी दी।

दरअसल, अनवर अहमद के बेटे और पूर्व वार्ड पार्षद अशफर अहमद पुलिस पर हमला करने के आरोपित दुकानदार सरफराज को छुड़वाने के लिए शुक्रवार (9 सितंबर 2022) को पीरबहोर थाना पहुँचा था। वहाँ अहमद ने राजद सरकार का धौंस देते हुए जमकर हंगामा किया।

इतना ही नहीं, उसने पुलिस वालों के सामने टाउन DySP अशोक प्रसाद सिंह के साथ बदतमीजी के साथ जमकर बदतमीजी की और वर्दी उतरवा लेने की धमकी दी। इसके बाद पुलिस ने अशफर को हिरासत में ले लिया। इसके बाद बेटे की तरह ही बाप अनवर अहमद भी सैकड़ों समर्थकों के साथ पहुँचकर थाने को घेर लिया और बेटे को छोड़ने का दबाव डालने लगे।

पूर्व MLC अनवर अहमद के साथ पहुँचे सैकड़ों लोगों ने पीरबहोर थाने के सामने अशोक राजपथ को जाम कर दिया। हालात को देखते हुए भारी संख्या में पुलिस बल को बुलाना पड़ा। देर रात तक राजद नेता के समर्थक हंगामा करते रहे और राजद नेता के बेटे को छोड़ने की माँग करते रहे।

पटना के SSP डॉ मानवजीत सिंह ढिल्लों ने बताया कि अशफर अहमद पर डीएसपी से बदतमीजी का आरोप है। अशफर और दुकानदार सरफराज पर केस दर्ज कर गिरफ्तार कर लिया गया है। उधर राजद नेता अनवर अहमद को देर रात तक थाने पर रोक कर रखा गया था।

कहा जा रहा है कि पुलिस पर हमला करने के आरोप में पुलिस दुकानदार सरफराज को हिरासत में लेकर पूछताछ कर रही थी। इसी दौरान राजद नेता का बेटा थाने पहुँचकर उसे छोड़ने का दबाव डालने लगा। इस पर पुलिस ने कहा कि पूछताछ हो जाने के बाद उसे छोड़ दिया जाएगा।

इसके बाद अशफर अहमद वहाँ से चला गया और अपने समर्थकों को लेकर वापस थाने पहुँचा और हंगामा करने लगा। जब डीएसपी ने रोकने की कोशिश की तो वह बदतमीजी करने लगा और वर्दी उतरवाने की धमकी देने लगा। इसके बाद पुलिसवालों ने उसे पकड़कर थाने में बैठा लिया।

इधर बेटे को बचाने पहुँचे पूर्व MLC पर भी कार्रवाई की जा सकती है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, पहले भी अनवर अहमद पर पुलिस के साथ उलझने को लेकर पीरबहोर थाने में केस दर्ज किया गया था।

पीरबहोर थाने के एसएचओ ने बताया कि पटना में कुछ दिन पहले एक वीडियो वायरल हुआ था। इसको लेकर पुलिस छानबीन करने पटना मार्केट के मीना बाजार गई थी। वहाँ मस्जिद के पास पुलिस को देखकर चार लोग भागने लगे थे। इनमें से दो लोगों को पुलिस ने पकड़ लिया था।

इसी दौरान स्थानीय लोगों ने पुलिस टीम पर हमला कर पकड़े गए लोगों को छुड़ा लिया था और पुलिसवालों को सड़कों पर दौड़ा-दौड़ा कर पीटा था। सिपाही को पीटने वाले सरफराज को टीम ने बाद में पकड़ लिया और पूछताछ के लिए थाने लेकर आई थी।

200 सालों की क्रूरता, 3.5 करोड़ भारतीयों की मौतें और ₹358191000 करोड़ की लूट: भारत से माफ़ी माँगेंगे ब्रिटेन के नए राजाजी? लौटाएँगे कोहिनूर?

70 वर्षों से ब्रिटेन की सर्वोच्च शासक रहीं महारानी एलिजाबेथ के निधन के बाद यूनाइटेड किंगडम सहित 14 अन्य कॉमनवेल्थ देशों को नया राजा मिला है। एलिजाबेथ के बेटे King Charles III नाम से गद्दी पर बैठेंगे और बकिंघम पैलेस की सर्वोच्च सत्ता होंगे। लेकिन, सवाल ये है कि क्या अब UK भारत को वो कोहिनूर हीरा लौटाएगा, जो वो यहाँ से लूट कर ले गया था? जो कभी महाराजा रणजीत सिंह की शान हुआ करता था, उस कोहिनूर की कीमत आज की तारीख़ में 8000 करोड़ रुपए से भी अधिक है।

लेकिन, यहाँ बात पैसे की नहीं है। भारत को कोहिनूर हीरा लौटते हुए अगर नए शासक King Charles III यहाँ अंग्रेजों द्वारा 200 वर्षों में मचाई गई तबाही के लिए माफ़ी माँगते हैं तो ये एक बड़ी बात होगी। लेकिन, क्या वो ऐसा करेंगे? इतिहास के लिए 75 वर्ष बहुत ज्यादा नहीं होते और भारत को आज़ाद हुए इतने ही साल हुए हैं। उसी साल महारानी एलिजाबेथ की शादी भी हुई थी। ऐसे में समय आ गया है जब ब्रिटेन भारत में किए गए अत्याचारों के लिए माफ़ी माँगे।

पहले सवाल यही उठ सकता है कि माफ़ी माँगने की ज़रूरत ही क्यों है? माफ़ी इसीलिए माँगनी है, क्योंकि अंग्रेजों के समय में 1.5-2 करोड़ के आसपास लोग भूख से मर गए। बंगाल 1943 में बंगाल में आया अकाल इसका एक उदाहरण है, जब अंग्रेजों ने लोगों को बचाने की बजाए अपना खजाना भरना ही उचित समझा। दूसरे विश्व युद्ध में अंग्रेजों की सेना में शामिल 54,000 भारतीयों को अपनी जान गँवानी पड़ी, इसीलिए अंग्रेजी मुल्क माफ़ी माँगे।

इंग्लैंड की सेना में उस युद्ध में लड़ने वाला हर छठा सैनिक भारतीय था, लगभग 13 लाख। उस युद्ध में अंग्रेजों ने न सिर्फ यहाँ के लोगों, बल्कि जानवरों से लेकर कपड़ों तक का इस्तेमाल किया। इंग्लैंड ने भारतीय कारीगरों और बुनकरों पर टैक्स लगाया। साथ ही उनके द्वारा बनाए गए कपड़ों को दुनिया भर में अपना उत्पाद बना कर बेचा और करोड़ों कमाए। नुकसान ये हुआ कि दुनिया भर को कपड़े देने वाले भारत को बाहर से कपड़े खरीदने पड़े।

आज का लिबरल गिरोह, यहाँ तक कि भारत का भी, ये अफवाह फैलाने में मगन रहता है कि हम भारतीयों को तो खाना-पीने और शौच तक करना नहीं आता था, सब अंग्रेजों ने सिखाया। हमें क्या आता था, ये हड़प्पा की खुदाई से दिख चुका है। अमेरिकी विशेषज्ञ जेटी संडरलैंड का कहना था कि एक सभ्य समाज के लिए जिन भी उत्पादों की ज़रूरत होती है, हाथों से या दिमाग से, वो सब भारत में बनते थे। उन्होंने बताया है कि यहाँ महान व्यापारी रहते थे, इंजीनियर थे, बैंकर थे।

जब 18वीं शताब्दी शुरू हुई थी, तब भारत विश्व की अर्थव्यवस्था का 23% हुआ करता था। उतना, जितना पूरे यूरोप को मिला कर होता था। जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ा, उस समय तक ये मात्र 3% हो चुका था। एक ‘सोने की चिड़िया’ के अंग्रेजों ने सारे पर कतर लिए। अब वहाँ के लोग एक माफ़ी और प्रतीक के रूप में कोहिनूर हीरा लौटाने की माँग तो कर ही सकते हैं? बंगाल प्रेसिडेंसी में पहली बार गवर्नर बना रॉबर्ट क्लाइव अपने साथ 369 करोड़ रुपए (आज की मुद्रा में) लेकर गया था, जिससे वो यूरोप के सबसे अमीर व्यक्तियों में से एक बन गया था।

अपनी पुस्तक ‘An Era of Darkness: The British Empire in India’ में शशि थरूर लिखते हैं कि 19वीं सदी के अंत तक ब्रिटेन के पास 3.5 लाख सैनिक थे, जिनमें से एक तिहाई का खर्च भारत के पैसों पर चलता था। लेखक मिन्हाज मर्चेंट ने एक बार आकलन किया था कि अंग्रेजों ने भारत से आज की मुद्रा में 3 ट्रिलियन डॉलर लूटे हैं। ये कितनी बड़ी रकम है, इसे इसी से समझिए कि आज पूरी UK की GDP 2.71 ट्रिलियन डॉलर है।

एक आँकड़ा कहता है कि ब्रिटिश राज भारत में 3.5 करोड़ों मौतों के लिए जिम्मेदार है। जलियाँवाला बाग़ जैसे नरसंहार का तो जिक्र यहाँ आवश्यक है, जिसमें अंग्रेजों की गोली से लगभग डेढ़ हजार लोग मारे गए थे। इसके लिए भी तो कम से कम माफ़ी बनती है। मृतकों में महिलाओं-बच्चों और बुजुर्ग भी थे। हिटलर ने भी 60 लाख यहूदियों की हत्या की थी, उस हिसाब से आप समझ जाइए कि अंग्रेजों ने भारत में कितना कहर बरपाया था।

यूके के नए राजा King Prince Charles III प्रिंस रहते 10 बार भारत आ चुके हैं। उन्होंने केरल स्थित कुमारकोम झील रिसॉर्ट में अपना 65वाँ जन्मदिन पत्नी के साथ मनाया था, ऐसे में उन्होंने भारत की स्थिति और गरीबी देखी है। अब वो 73 वर्ष की उम्र में राजा बने हैं, तो उन्हें भारतवासियों से एक माफ़ी तो माँगनी ही चाहिए – 3.5 करोड़ मौतों के लिए, 23879625 करोड़ रुपए (3 ट्रिलियन डॉलर, 10 सितंबर 2022 की मुद्रा विनिमय दर से) की लूट के लिए। असल में पूरी लूट का आँकड़ा तो इससे भी अधिक है।

‘कोलंबिया यूनिवर्सिटी प्रेस’ द्वारा प्रकाशित अर्थशास्त्री उत्सा पटनायक के रिसर्च के अनुसार, सन् 1765 से लेकर 1938 तक अंग्रेजों ने भारत से 45 ट्रिलियन डॉलर (₹358191000 करोड़, 10 सितंबर 2022 की मुद्रा विनिमय दर से) की लूट को अंजाम दिया। ये बहुत बड़ा आँकड़ा है, जिसकी पुष्टि केंद्रीय विदेश मंत्री एस जयशंकर भी कर चुके हैं। ये ब्रिटेन की मौजूदा GDP से साढ़े 16 गुना ज्यादा है। असल में भारत से ही टैक्स लेकर अंग्रेज अपने लिए भारतीय सामान खरीदते थे। साथ ही उन्हें अपने इस्तेमाल में लाते थे, अन्य देशों में बेचते थे। ये एक तरह का बड़ा स्कैम था।

ब्रिटेन की ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ वैसे तो यहाँ मसलों का व्यापार करने आई थी, लेकिन 200 वर्षों में उन्होंने पूरे देश को लूट कर रख दिया। 1757 में प्लासी के युद्ध में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला की रॉबर्ट क्लाइव के हाथों हार के साथ ही अंग्रेजों ने भारत में राज करने की शुरुआत कर दी। इसके बाद 1764 ईस्वी में बक्सर में बंगाल के मीर कासिम, अवध के सुजाउद्दौला और मुग़ल बादशाह शाह आलम II की संयुक्त सेना को कैप्टन मुनरो के नेतृत्व में अंग्रेजों ने हराया। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को कुचलने के बाद वो भारत में सबसे बड़ी सत्ता बन गए।

हिन्दू महिला ने अस्पताल में बच्ची को जन्म दिया, डॉक्टर ने ₹12000 में मुस्लिम दंपति को बेच दिया शिशु: यूपी का अस्पताल सील

उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर से हैरान कर देने वाला एक मामला सामने आ है। यहाँ के एक प्राइवेट अस्पताल के डॉक्टर पर पैसों के लिए नवजात हिंदू बच्ची को बेचने का आरोप है। हिंदू संगठनों के विरोध के बाद प्रशासन भी सचेत हुआ और उस बच्ची को वापस उसकी जन्म देने वाली माँ को सौंपा गया। वहीं अस्पताल को भी सील कर दिया गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यूपी के शाहजहाँपुर के ‘नवजीवन अस्पताल’ के एक डॉक्टर पर आरोप है कि उसके एक नवजात हिंदू बच्ची को कुछ पैसों के लालच में आकर एक मुस्लिम परिवार को बेच दिया। जब इसकी भनक हिंदू संगठनों को पड़ी तो उन्होंने इसके खिलाफ हंगामा किया और फिर पुलिस ने मामले में दखल देते हुए मामले को शांत करवाया।

बताया जा रहा है कि नवजात बच्ची के पिता का नाम रमाकांत है और वो पहले से ही 5 बेटियों के पिता है। रमाकांत ने घटना की जानकारी देते हुए बताया कि डॉक्टर ने उनसे कहा कि तुम्हारी पूर्व में 5 बेटियाँ हैं तो तुम इस नवजात बच्ची का पालन पोषण कैसे कर पाओगे। बच्ची को उनसे माँगा और कहा इसके बदले इलाज के पैसे मत देना। इसके बाद उसने बच्ची को ले लिया।

इस बात की खबर लगने के बाद हिंदू संगठन के नेता राजेश अवस्थी ने अपने कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर अस्पताल के सामने विरोध प्रदर्शन किया। राजेश अवस्थी ने बताया कि डॉक्टर अशोक राठौर ने गरीब हिंदू दंपति की नवजात बच्ची को मुस्लिम समुदाय के दंपति से मोटी रकम लेकर बेच दिया।

हिंदू नेता के अनुसार, उन्होंने इस प्रकरण की जानकारी प्रशासन को दे दी हैं और उनसे डॉक्टर के खिलाफ कार्रवाई की माँग की है। वहीं इस मामले में SO रविंद्र सिंह ने बताया कि मामले कि जाँच की जा रही है। विरोध होने के बाद बच्चा वापस कर दिया गया है। उन्होंने बताया कि पूछताछ उस परिवार से भी होगी, जिसने बच्चे को गोद लिया था। इस घटना का आरोपित डॉक्टर फ़िलहाल फरार है।

मुंबई में पालतू कुत्ते ने डिलीवरी बॉय के प्राइवेट पार्ट को किया लहूलुहान: गाजियाबाद के लिफ्ट और पार्क में बच्चों को काट चुके हैं, लखनऊ में बुजुर्ग महिला को मार डाला था

देश के कई हिस्सों से पालतू कुत्तों के आतंक की खबरें सामने आ चुकी हैं। मुंबई में भी पालतू कुत्ते ने डिलीवरी बॉय के प्राइवेट पार्ट पर हमला कर घायल कर दिया था। यह घटना 29 अगस्त की बताई जा रही है, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह घटना मुंबई के पनवेल इलाके की है। जहाँ, इंडियाबुल्‍स कॉम्‍प्‍लेक्‍स में एक डिलीवरी बॉय डिलीवरी के बाद लिफ्ट से बाहर आ रहा था। लेकिन, जैसे ही उसने बाहर आने की कोशिश की वहाँ मौजूद एक पालतू कुत्ते ने डिलीवरी बॉय पर हमला कर दिया। इस हमले में उसके प्राइवेट पार्ट पर गहरा घाव हो गया। डिलीवरी बॉय का नाम नरेंद्र पेरियार बताया जा रहा है।

घायल डिलीवरी बॉय नरेंद्र पेरियार ने बताया, “मैं जैसे ही लिफ्ट से नीचे आया तो लिफ्ट के सामने एक कुत्ता खड़ा था, जिसे एक व्यक्ति ने चेन से पकड़ा हुआ था। इसके बाद उस व्यक्ति ने कुत्ते को लिफ्ट से थोड़ा दूर कर लिया। लेकिन, जैसे ही मैं लिफ्ट से बाहर निकला तो उस कुत्ते ने अचानक ही हमला कर दिया।”

नरेंद्र ने आगे बताया, “हमले के कराण मेरे प्राइवेट पार्ट से खून निकलने लगा, जिसके बाद मैं पार्किंग की ओर भागा और अपनी जान बचाई। वहाँ मौजूद कुछ लोगों ने मदद की और डॉक्टर के पास ले गए, जहाँ मुझे दवा और इंजेक्शन दिए गए हैं, साथ ही घावों का उपचार किया है। फिलहाल मैं ठीक हूँ।”

वहीं, डिलीवरी बॉय नरेंद्र पेरियार का इलाज करने वाले डॉक्‍टर्स का कहना है कि नरेंद्र का इलाज चल रहा है, उसे एंटी रेबीज इंजेक्‍शन दिया गया है। कुत्‍ते के काटने से जो घाव बने हैं, उन पर टाँके लगा दिए गए हैं।

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से 3 सितंबर 2022 को पालतू कुत्तों के हमले के दो मामले सामने आए। पहला मामला पार्क का था, जहाँ घुमाने के लिए लाई लड़की के हाथ से छूटकर पालतू कुत्ते ने वहाँ खेल रहे बच्चे को काट लिया था। कुत्ते के इस हमले में 10 साल का मासूम बच्चा घायल हो गया था। उसके शरीर पर 150 टाँके लगे थे।

दूसरा मामला गाजियाबाद की एक सोसाइटी का है। सोसायटी की लिफ्ट में एक पालतू कुत्ते ने एक बच्चे को काट लिया था। इस घटना के सीसीटीवी में फुटेज सामने आया था कि कुत्ते के काटने के बाद पीड़ित बच्चा काफी देर तक लिफ्ट में ही रोता रहा, लेकिन कुत्ते की मालकिन चुपचाप खड़ी देखती रही थी।

इससे पहले जुलाई में भी ऐसी ही घटना उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सामने आयी थी। लखनऊ में एक जिम ट्रेनर के पालतू पिटबुल कुत्ते ने उसकी माँ को नोच कर मार डाला था। यह घटना पूरे देश में कुत्तों के पालने को लेकर सतर्कता बरतने की बात कही गई थी। लेकिन, इसके बाद भी कुत्तों के हमले वाली घटनाएँ आए दिन सामने आती रहती हैं।

हिन्दू लड़कियों से छेड़छाड़ के कारण पलायन को मजबूर अलीगढ़ के दलित, एक पीड़िता के पिता को चेन से पीटा: रिपोर्ट में दावा – लगे ‘मकान बिकाऊ हैं’ के पोस्टर

देश के कई इलाकों में जिहादी किस कदर हावी हैं, इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में हिन्दू परिवार मुस्लिमों के डर से घर छोड़ने को मजबूर हो गए हैं। यहाँ के कई घरों में ‘घर बिकाऊ है’ के पोस्टर भी लग चुके हैं। पीड़ित हिन्दुओं का कहना है कि मुस्लिम लड़के लड़कियों से छेड़छाड़ करते हैं और मना करने पर मारपीट करते हैं।

यह पूरा मामला अलीगढ़ जिले के मोरथल गाँव का है, जहाँ जिहादी मानसिकता से भरे हुए मुस्लिम लड़कों ने हिन्दू लड़कियों का जीना हराम कर दिया है। ‘टाइम्स नाउ नवभारत’ ने अपनी एक्सक्लुसिव रिपोर्ट में बताया है कि मुस्लिमों से परेशान होकर मोरथल गाँव के कई दलित परिवारों ने अपना घर छोड़कर पलायन करने की चेतावनी दी है। यही नहीं, जिन घरों में ‘यह मकान बिकाऊ है’ लिखा गया था, वहाँ काले रंग से पोत कर ढँकने का प्रयास किया गया है।

एक पीड़िता ने ‘टाइम्स नाउ’ से हुई बातचीत में बताया, “ये लोग (चार मुस्लिम युवक) मेरे साथ गाली-गलौच करने के अलावा जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर रहे थे। इतना ही नहीं, गंदे इशारे भी कर रहे थे। मैंने शाम को ये बात अपने पापा को बताई तो उन्होंने युवकों को डाँटा, जिसके बाद ये मुस्लिम लड़के मारने-पीटने पर उतारू हो गए। मेरे पिता को साइकिल की चैन से पीटा और मुझे घर के अंदर से खींचकर ले गए और गंदी-गंदी गालियाँ दी। ये सब लगातार बढ़ता जा रहा है।”

वहीं, एक अन्य शख्स ने आरोप लगाते हुए कहा है कि मुस्लिम समुदाय के युवक उसके मोहल्ले में आकर लड़कियों और महिलाओं के साथ गलत तरीके का व्यवहार करते हैं। बीते कुछ दिनों से मुस्लिमों का आतंक ज्यादा बढ़ गया है।

रिपोर्ट के अनुसार, रविवार (4 सितंबर, 2022) को जब एक बार फिर लड़कियों से छेड़खानी हुई तो यह मामला थाने तक पहुँचा। दलित समुदाय ने आरोप लगाया है कि पुलिस भी जाँच में सहयोग नहीं कर रही है। साथ ही ग्राम प्रधान भी इस मामले को लेकर दबाव बना रहा है और मुस्लिम पक्ष की ओर से समझौते की बात कर रहा है।

हालाँकि, इस मामले की सूचना मिलने के बाद पुलिस ने आरोपितों के खिलाफ केस दर्ज कर कार्रवाई का आश्वासन दिया है। साथ ही यह भी कहा है कि किसी को पलायन नहीं करने दिया जाएगा।

अजय देवगन बने ‘चित्रगुप्त’, अगल-बगल छोटे कपड़ों में लड़कियाँ: T-Series की नई फिल्म में हिन्दू धर्म का बनाया मजाक, देखें वीडियो

बॉलीवुड में हिंदू विरोधी मानसिकता और कंटेंट परोसने के कारण लोगों कुछ महीनों से रिलीज होने वाली फिल्मों का भारी विरोध जारी है। इस कारण कई बड़े बजट और नामी प्रोडक्शन हाउस की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर धाराशायी हो चुकी हैं। इसके बावजूद हिंदू देवी-देवताओं का मजाक बनाने का सिलसिला उर्दूवुड में रूक नहीं रहा है।

अजय देवगन की आगामी फिल्म Thank God का शुक्रवार (9 सितंबर 2022) ट्रेलर रिलीज हुआ। इसके एक सीन में अजय देवगन खुद को हिंदू देवता चित्रगुप्ता बता रहे हैं और सामने वाले के कर्मों के हिसाब-किताब की बात कर रहे हैं।

बता यहाँ तक तो ठीक है, लेकिन अंदाज में वो फिल्म में डायलॉग बोल रहे हैं, वह उनका मजाक उड़ाने जैसा है। इतना ही नहीं, जब अजय देवगन खुद चित्रगुप्त बता रहे होते हैं, उस समय उनके अगल-बगल अधनंगी लड़कियाँ खड़ी रहती हैं।

T-Series के बैनर तले इस फिल्म को इंद्र कुमार, अशोक ठकेरिया, आनंद पंडित, मकरंद अधिकारी, सुनील खेत्रपाल आदि नेे प्रोड्यूस किया है। फिल्म को डायरेक्ट इंद्र कुमार ने किया है। इस फिल्म को आकाश कौशिक और मधुर शर्मा ने लिखा है। वहीं, इसके गाने के बोल मनोज मुंतशिर, रश्मि-विराग, समीर आदि ने लिखा है। फिल्म 25 अक्टूबर को रिलीज होने वाली है।

फिल्म का ट्रेलर रिलीज के साथ ही सोशल मीडिया पर इसकी आलोचना शुरू हो गई है। सोशल मीडिया यूजर्स फिल्म में देवी-देवताओं का मजाक उड़ाने के लिए फिल्म के संवाद लेखक और डायरेक्टर-प्रोड्यूसर को जमकर कोस रहे हैं। लोग इस फिल्म के साथ-साथ बॉलीवुड का बॉयकाट करने की अपील कर रहे हैं।

sudhirshiv567 नाम के एक ट्विटर हैंडल ने ट्रेलर के एक हिस्से को ट्विटर पर साझा करते हुए लिखा, “क्या बॉलीवुड के लिए हिंदू देवता मज़ाक, अश्लीलता के लिए हैं? Thank God में अजय देवगन भगवान चित्रगुप्त बने हैं, जिनके पीछे कम कपड़े पहने लड़कियाँ हैं। वह वासना, घटिया जोक्स पर चर्चा कर रहे हैं। क्या हिंदू देव मसखरे होते हैं? #BoycottbollywoodCompletely”

वहीं, gemsofbollywood नाम के ट्विटर हैंडल ने लिखा, “ये नहीं सुधरेंगे। #Urduwood का सर्वनाश करके ही छोड़ेंगे ये भस्मासुर। दो चार संवाद जन्नत और वहाँ के हूर समुदाय पर भी मार देते। सनातन धर्म से इतनी घृणा कहाँ से लाते हैं? चित्रगुप्त की पूजा होती है, विशेषतः कायस्थ समाज में। निर्देशक इंद्र ईरानी तथा टी सीरीज का और एक कचरा।”

एक अन्य ट्विटर यूजर ने लिखा, “ऐसा लगता है कि वे जानबूझकर हिंदुओं की भावनाओं का मजाक उड़ाने की कोशिश कर रहे हैं। मौजूदा हालात में ऐसी फिल्म को रिलीज करने का क्या मतलब है? माफी भूल जाओ, वे और भी खराब हो गए।”

बता दें कि बॉलीवुड के इस रवैए को लेकर लगभग एक साल से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का सोशल मीडिया पर बॉयकाट अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान का ये परिणाम हुआ कि पिछले एक साल में रिलीज हुई सारी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुँह गिर गईं। इसमें ‘कश्मीर फाइल्स’ और ‘रॉकेट्री द नंबी इफेक्ट’ ही अपवाद हैं, क्योंकि यूजर्स ने इन्हें जबरदस्त तरीके से प्रमोट किया था।

बॉयकाट अभियान के कारण जो फिल्में बॉक्स ऑफिस पर नाकाम हुईं, उनमें आमिर खान और करीना कपूर अभिनीत लाल सिंह चड्ढा, शाहरुख खान अभिनीत पठान, अक्षय कुमार की सम्राट पृथ्वीराज और रक्षाबंधन, आलिया भट्ट की गंगूबाई काठियावाड़ी, रणवीर कपूर की शमशेरा, तापसी पन्नू की दोबारा और धाकड़ प्रमुख हैं।

रिलीज के कुछ ही घंटों बाद HD में लीक हुई फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’, टेलीग्राम-टॉरेंट से धड़ल्ले से डाउनलोड कर रहे लोग: समीक्षक भी नकार चुके हैं

रणबीर कपूर और आलिया भट्ट की फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ को एक ओर तगड़ा झटका लगा है। फिल्म रिलीज के पहले ही दिन ऑनलाइन लीक हो चुकी है। फिल्म शुक्रवार (9 सितंबर 2022) को रिलीज हुई और रिलीज के कुछ ही घंटों के बाद ये इंटरनेट पर लीक हो गई है। फिल्म में रणबीर कपूर और आलिया भट्ट पहली बार एक-साथ स्क्रीन शेयर कर रहे हैं।

एबीपी न्यूज की एक रिपोर्ट के मुताबिक। फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ तमिलरॉकर्स (Tamilrockers), मूवी रूल्स (Movierulz), फिल्मी जिला (Filmyzilla), 123 मूवीस (123movies), टेलीग्राम (Telegram) और टोरेंट साइट्स (Torrent Sites) जैसे प्लेटफॉर्म्स पर HD क्वालिटी में उपलब्ध है। इस फिल्म का भी पायरेसी का शिकार हो जाना निर्माताओं के लिए किसी बड़ी मुसीबत से कम नहीं है।

बताया जा रहा है कि इन तमाम वेबसाइट्स पर इस फिल्म से पहले हाल ही में रणबीर की ‘शमशेरा’, आमिर खान की ‘लाल सिंह चड्ढा’, अक्षय कुमार की ‘रक्षा बंधन’ और विजय देवरकोंडा की ‘लाइगर ‘जैसी कई बड़ी-बड़ी फिल्में भी लीक हुई थी। लीक होने के कारण भी इन तमाम मेगा बजट वाली फिल्मों को भारी नुकसान का भी सामना करना पड़ा था।

यदि ‘ब्रह्मास्त्र’ की बात करें तो इस फिल्म का बजट 410 करोड़ रुपए बताया जा रहा है, ऐसे में फिल्म निर्माताओं को भारी-भरकम नुकसान हो सकता है। बता दें बड़े बजट के साथ-साथ इस फिल्म को पूरा होने में भी लगभग 10 साल का समय लग गया। फिल्म निर्देशक आयान मुखर्जी का ये ड्रीम प्रोजेक्ट माना जाता है।

गौरतलब है कि फिल्म रिलीज से पहले भी कई बड़े विवादों के बीच फँसी हुई थी। इसमें सबसे बड़ा रोल बॉयकोट ट्रेंड ने निभाया। इसी क्रम में हाल ही में रणबीर कपूर, आलिया भट्ट और निर्देशक आयान मुखर्जी उज्जैन पहुँचे तो उनका हिंदू संगठनों ने भी खूब विरोध किया। इसके बाद फिल्म आखिरकार 9 सितंबर को बड़े पर्दे पर उतरीं तो उसे फिल्म समीक्षकों का भी अच्छा रिस्पॉन्स नहीं मिला।

आपको बताते चलें कि फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ में रणबीर कपूर (Ranbir Kapoor), आलिया भट्ट (Alia Bhatt) के अलावा अभिनेता अमिताभ बच्चन, मौनी रॉय, नागार्जुन और सौरभ गुर्जर जैसे नामी चेहरे भी दिखाई दे रहे हैं। इन सब के अलावा फिल्म में अभिनेता शाहरुख खान का भी कैमियो है। फिल्म के निर्माता करण जौहर हैं। अब इस फिल्म के लीक होने की खबर आग की तरह सोशल मीडिया पर फैल चुकी है।

हनुमान गढ़ी की जमीन पर कब्जा, झारखंडी मंदिर सरोवर में ताजिया: नेपाल सीमा पर बढ़ती मुस्लिम आबादी, असर UP के बलरामपुर में – OpIndia Ground Report

हाल में कई रिपोर्टें आई हैं जो बताती हैं कि नेपाल-भारत सीमा पर तेजी से डेमोग्राफी में बदलाव हो रहा है। मस्जिद-मदरसों की संख्या लगातार बढ़ रही है। जमीनी हालात का जायजा लेने के लिए 20 से 27 अगस्त 2022 तक ऑपइंडिया की टीम ने सीमा से सटे इलाकों का दौरा किया। हमने जो कुछ देखा, वह सिलसिलेवार तरीके से आपको बता रहे हैं। इस कड़ी की सातवीं रिपोर्ट:

भारत नेपाल सीमा पर उत्तर प्रदेश का जिला बलरामपुर मौजूद है। इसी जिले की जरवा सीमा से हम नेपाल के दांग जिले में प्रवेश किए थे। इस जिले में श्रावस्ती रोड पर नेपाल सीमा की रखवाली करने वाली पैरामिलिट्री SSB (सशस्त्र सीमा बल) का बेस कैम्प है। सबसे पहले हमने इस जिले के शहरी क्षेत्रों की जानकारी जुटाई।

यह रिपोर्ट एक सीरीज के तौर पर है। इस पूरी सीरीज को एक साथ पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

शहर में घुसते ही मस्जिदें

गोंडा रोड से आते हुए जब हम बलरामपुर शहर में घुसे, तब हमें चीनी मिल दूर से दिखी। यह क्षेत्र भगवतीगंज इलाके में आता है, जहाँ हमें सड़क पर ही मस्जिदें दिखाई देने लगीं। इसी इलाके के रहने वाले नीरज तिवारी ने हमें बताया कि शहर में कई इलाके मुस्लिम बाहुल्य हैं, जिसमें सबसे ज्यादा चर्चित नाम बलुहा मोहल्ले का है। गौरतलब है कि बलुआ मोहल्ले में ही सितम्बर 2020 में अकरम नाम के व्यक्ति के घर में हुए ब्लास्ट में एक मकान जमींदोज हो गया था और जन-धन की हानि हुई थी।

भगवती गंज इलाके में बनी मस्जिद

अभी हम भगवतीगंज इलाके में ही थे और अधिकतम 500 मीटर ही आगे बढ़े होंगे कि हमें दूसरी मस्जिद सड़क के किनारे दिखाई दी। इस मस्जिद से थोड़ी ही दूर पर पुलिस चौकी भगवतीगंज है। यहाँ से पास ही श्रीदत्त गंज बाजर जाने के लिए सड़क गई है।

भगवतीगंज इलाके की दूसरी मस्जिद

हनुमान गढ़ी मंदिर पर अवैध कब्ज़ा

ऑपइंडिया की टीम बलरामपुर शहर के ठीक मध्य में मौजूद हनुमान गढ़ी मंदिर पहुँची। इस मंदिर के महंत महेंद्र दास जी महराज हैं, जो अयोध्या के प्रसिद्ध संत कमलनयन दास जी महराज के उत्तराधिकारी हैं। यह मंदिर सीधे अयोध्या की छोटी छावनी नाम के धर्मस्थल से संबंधित है।

हमने यहाँ के प्रबंधक नरेश सिंह से बात की तो उन्होंने बताया कि कभी इस मंदिर की जमीनों पर मुस्लिमों का अवैध अतिक्रमण हुआ करता था, जो अभी भी है लेकिन पहले के मुकाबले काफी कम। नरेश सिंह ने यह भी कहा कि मंदिर से ठीक सटी 2 दुकानें अभी भी मुस्लिमों की हैं, जिस पर कोर्ट में मुकदमा लंबित है। इसमें से एक का नाम बदरुद्दीन है और दूसरा काजू होटल वाला है।

हनुमान गढ़ी मंदिर बलरामपुर

मंदिर में फेंकी जाती थीं हड्डियाँ

बलरामपुर के सामाजिक कार्यकर्ता पवन शुक्ला ने हमें बताया कि योगी सरकार आने के बाद और मंदिर के महंत के संघर्ष के चलते मुख्य शहर में अवैध कब्ज़े की शिकार कई जमीनें वापस मिल चुकी हैं। पवन शुक्ला ने यह भी कहा कि कभी पूर्व सांसद मुन्नन खां ने इस मंदिर के मुख्य गेट पर अजमेरी होटल नाम से दुकान खुलवाई थी और बाद में वहाँ अपना ऑफिस बनवा लिया था।

पवन शुक्ला के मुताबिक तब मंदिर के अंदर अजमेरी होटल में बनने वाले नॉनवेज की हड्डियाँ फेंकी जाती थीं। पवन शुक्ला के मुताबिक अब काफी कुछ बदलाव आया है।

मंदिर के इस हिस्से पर अभी भी अवैध कब्ज़े का आरोप

मंदिर के महंत शासन से माँग चुके हैं सुरक्षा

हनुमान गढ़ी मंदिर के महंत महेंद्र दास जी महराज शासन को कई बार अपनी सुरक्षा बढ़ाने का पत्र भेज चुके हैं। हमें मंदिर के मुख्य गेट पर होमगार्ड के 2 जवान भी तैनात मिले। मंदिर के लगभग 1 किलोमीटर परिधि में लगभग आधे दर्जन मस्जिदें और मदरसे हैं।

हनुमान गढ़ी मंदिर की दूसरी तरफ मंदिर की ही एक धर्मशाला भी है। मंदिर के प्रबंधक नरेश सिंह के मुताबिक कभी उस धर्मशाला के भी एक हिस्से पर कुछ मुस्लिमों का कब्ज़ा था, जिसे हटवाने के लिए लम्बी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी थी।

झारखंडी मंदिर के सरोवर में कर्बला

वीर विनय चौराहा बलरामपुर से जैसे ही हम SSB कैम्प जाने वाली रोड पर आगे बढ़े, वैसे ही रेलवे लाइन पार करते ही हमें सड़क के बगल में झारखंडी मंदिर दिखा। इस मंदिर से ठीक सटा एक बड़ा तालाब है जिसे स्थानीय लोगों ने झरखंडी सरोवर बताया।

झारखंडी मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ दिखाई दी। यहाँ मुख्य रूप से महादेव शिव की पूजा की जाती है। हमें झारखंडी सरोवर के पास हरे रंग के झंडे लगे दिखाई दिए।

झारखंडी सरोवर और वहाँ लहराते हरे झड़े

ऑपइंडिया से बात करते हुए स्थानीय सामाजिक कायर्कता पवन शुक्ला ने बताया कि सभी कागजों में यह जगह झारखंडी सरोवर के तौर पर दर्ज है लेकिन यहाँ कर्बला बना दिया गया है। पवन शुक्ल के मुताबिक हर साल यहाँ ताजिए दफन किए जाते हैं। शुक्ला के अनुसार ऐसा क्यों और किसके आदेश से हो रहा है, ये उन्हें भी नहीं मालूम। बलरामपुर के ही रहने वाले ओमकार तिवारी के मुताबिक सरकारों के हिसाब से कुछ लोगों ने अपने प्रभुत्व को कायम रखा।

अन्य मार्गों पर भी मस्जिदें

झारखंडी मंदिर रेलवे स्टेशन से महज कुछ ही दूरी पर स्थित है। बलरामपुर शहर में तुलसीपुर रोड पर भी हमें मुस्लिम समुदाय के लोगों की कार मैकेनिक आदि की कई दुकानें और मस्जिदें दिखाई दीं। SSB कैम्प से 2 किलोमीटर की परिधि में भी हमें लगभग आधे दर्जन मस्जिदों की मीनारें दिखाई दीं।

पढ़ें पहली रिपोर्ट : कभी था हिंदू बहुल गाँव, अब स्वस्तिक चिह्न वाले घर पर 786 का निशान: भारत के उस पार भी डेमोग्राफी चेंज, नेपाल में घुसते ही मस्जिद, मदरसा और इस्लाम – OpIndia Ground Report

पढ़ें दूसरी रिपोर्ट : घरों पर चाँद-तारे वाले हरे झंडे, मस्जिद-मदरसे, कारोबार में भी दखल: मुस्लिम आबादी बढ़ने के साथ ही नेपाल में कपिलवस्तु के ‘कृष्णा नगर’ पर गाढ़ा हुआ इस्लामी रंग – OpIndia Ground Report

पढ़ें तीसरी रिपोर्ट : नेपाल में लव जिहाद: बढ़ती मुस्लिम आबादी और नेपाली लड़कियों से निकाह के खेल में ‘दिल्ली कनेक्शन’, तस्कर-गिरोह भारतीय सीमा पर खतरा – OpIndia Ground Report

पढ़ें चौथी रिपोर्ट : बौद्ध आस्था के केंद्र हों या तालाब… हर जगह मजार: श्रावस्ती में घरों की छत पर लहरा रहे इस्लामी झंडे, OpIndia Ground Report

पढ़ें पाँचवीं रिपोर्ट : महाराणा प्रताप के साथ लड़ी थारू जनजाति बहुल गाँव में 3 मस्जिद, 1 मदरसा: भारत-नेपाल सीमा पर बढ़ती मुस्लिम आबादी का ये है ‘पैटर्न’ – OpIndia Ground Report

पढ़ें छठी रिपोर्ट : बौद्ध-जैन मंदिरों के बीच दरगाह बनाई, जिस मजार को पुलिस ने किया ध्वस्त… वो फिर चकमकाई: नेपाल सीमा पर बढ़ती मुस्लिम आबादी – OpIndia Ground Report

वक्फ की संपत्ति अल्लाह की संपत्ति: जिसे अंग्रेजों ने कहा था ‘सबसे हानिकारक’… उसे कॉन्ग्रेसियों ने बनाया देश का तीसरा सबसे बड़ा जमीन मालिक

हाल ही में, कर्नाटक वक्फ बोर्ड ने बेंगलुरु के ईदगाह मैदान में गणेशोत्सव के लिए तय किए गए स्थान पर आपत्ति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। इसके बाद, सुप्रीम कोर्ट ने भी ईदगाह मैदान में गणेशोत्सव कार्यक्रम की अनुमति नहीं दी। इस मामले ने, एक कथित धर्मनिरपेक्ष देश में वक्फ की प्रचलित प्रथा और इसे लगातार बनाए रखने वाले वक्फ बोर्ड के कामकाज पर पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया है।

गौरतलब है, बृहत बेंगलुरु महानगर पालिका (बीबीएमपी) ने दावा किया था कि ईदगाह की जमीन सरकारी है और इसे किसी मुस्लिम संगठन को हस्तांतरित नहीं किया गया था। लेकिन, वक्फ बोर्ड ने दावा किया कि यह 1850 के दशक से ही वक्फ की संपत्ति है। साथ ही यह भी कहा कि एक बार जो संपत्ति वक्फ की हो गई, वह हमेशा के लिए वक्फ की ही रहेगी।

वक्फ बोर्ड के वकील दुष्यंत दवे ने कोर्ट में तर्क दिया था कि वक्फ अधिनियम एक अधिभावी कानून है, जिस पर कोई भी कानूनी प्रक्रिया नहीं हो सकती। इसलिए न्यायालय वक्फ संपत्ति पर आदेश पारित नहीं कर सकता है। इसके बाद, सुप्रीम कोर्ट ने गणेशोत्सव की अनुमति देने से इनकार करते हुए ईदगाह मैदान पर यथास्थिति रखने का आदेश दिया।

वक्फ क्या है?

आपके मन में यह सवाल जरूर उठ रहा होगा कि आखिर वक्फ है क्या? इस्लाम के अनुसार, वह संपत्ति जो केवल मजहबी या मजहब के उद्देश्यों के लिए उपलब्ध हो, वह वक्फ है। ऐसी संपत्ति का कोई अन्य उपयोग या बिक्री नहीं की जा सकती है। शरिया कानून के अनुसार, एक बार वक्फ की स्थापना हो जाने के बाद संपत्ति वक्फ को समर्पित कर दी जाती है। इसके बाद, यह हमेशा के लिए वक्फ संपत्ति के रूप में बनी रहती है। यही नहीं, शरिया के अनुसार, वक्फ संपत्ति स्थायी रूप से अल्लाह को समर्पित होती है।

आसान भाषा मे कहें तो ‘वक्फ’ वह व्यक्ति है, जो लाभार्थी के लिए वक्फ बनाता है। यानी कि वक्फ संपत्ति अल्लाह को दी जाती है। हालाँकि, अल्लाह भौतिक रूप से उपस्थित नहीं होता है, इसलिए वक्फ़ की संपत्ति की व्यवस्था या प्रबंधन करने के लिए एक व्यक्ति जिसे मुतवल्ली कहा जाता है, को नियुक्त किया जाता है।

भारत में वक्फ और वक्फ बोर्डों का इतिहास

भारत में, वक्फ का इतिहास दिल्ली सल्तनत के शुरुआती दिनों से ही माना जाता है। सुल्तान मुइज़ुद्दीन सैम घोर ने मुल्तान की जामा मस्जिद के पक्ष में दो गाँव समर्पित किए और इसका प्रशासन शेखुल इस्लाम को सौंप दिया। जैसे-जैसे दिल्ली सल्तनत और बाद में इस्लामी राजवंश भारत में फले-फूले, भारत में वक्फ संपत्तियों की संख्या बढ़ती चली गई।

19वीं शताब्दी के अंत में हालाँकि भारत में वक्फ की समाप्ति का भी एक मामला सामने आया था। उस दौरान, ब्रिटिश शासन के समय में लंदन की प्रिवी काउंसिल में एक वक्फ संपत्ति पर विवाद शुरू हुआ था। इस मामले की सुनवाई करने वाले चार ब्रिटिश न्यायाधीशों ने वक्फ को “सबसे खराब और सबसे हानिकारक” बताते हुए अमान्य घोषित कर दिया था।

भारत में इस निर्णय को स्वीकार नहीं किया गया और 1913 के मुसलमान वक्फ मान्यकरण अधिनियम ने भारत में वक्फ को बचा लिया था। इसके बाद से अब तक वक्फ पर अंकुश लगाने का कोई प्रयास नहीं किया गया है। यही कारण है, वक्फ बोर्ड अब सशस्त्र बलों और भारतीय रेलवे के बाद भारत में तीसरा सबसे बड़ा भूमि मालिक है।

वास्तव में, वोट बैंक की राजनीति के चलते देश की आजादी से बाद से वक्फ को लगातार पोषण मिलता रहा है और यह साल दर साल मजबूत होता चला गया। नेहरू सरकार द्वारा पारित वक्फ अधिनियम 1954 ने वक्फों के केंद्रीयकरण की दिशा में एक रास्ता बनाया था। यही नही, भारत सरकार द्वारा 1954 के इसी वक्फ अधिनियम के तहत साल 1964 में सेंट्रल वक्फ काउंसिल ऑफ इंडिया की स्थापना की गई थी।

तत्कालीन भारत सरकार द्वारा स्थापित किया गया सेंट्रल वक्फ काउंसिल ऑफ इंडिया एक केंद्रीय संस्था है। यह संस्था विभिन्न राज्य के वक्फ बोर्डों के काम की देखरेख करता है, जो वक्फ की धारा 9 (1) के प्रावधानों के तहत स्थापित किए गए थे। 1954 वक्फ अधिनियम को साल 1995 में मुस्लिमों के लिए और भी अधिक अनुकूल बनाया गया। इसके बाद से यह एक अधिभावी कानून है और इस पर कोई विधायी शक्तियाँ काम नहीं कर सकती हैं। एडवोकेट दवे ने भी कोर्ट में यही तर्क दिया।

वक्फ अधिनियम 1995

22 नवंबर 1995 को वक्फ अधिनियम 1995 लागू किया गया। यह अधिनियम वक्फ परिषद, राज्य वक्फ बोर्डों और मुख्य कार्यकारी अधिकारी की शक्ति और कार्यों के साथ-साथ मुतवल्ली के कामकाज को भी देखता है।

यह अधिनियम एक वक्फ ट्रिब्यूनल की शक्ति और प्रतिबंधों का भी वर्णन करता है, जो अपने अधिकार क्षेत्र के तहत एक सिविल कोर्ट की तरह कार्य करता है। वक्फ ट्रिब्यूनल को एक सिविल कोर्ट माना जाता है और सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत एक सिविल कोर्ट द्वारा प्रयोग की जाने वाली सभी शक्तियों का उपयोग और कार्यों को करने की क्षमता रखता है।

वक्फ ट्रिब्यूनल ऐसा है कि इसका निर्णय अंतिम और सभी पक्षों पर बाध्यकारी होगा। इस अधिनियम के तहत अगर कोई भी मसला वक्फ ट्रिब्यूनल द्वारा निर्धारित किया जाना है तो वो विवाद या कानूनी कार्यवाही किसी दीवानी अदालत के अधीन नहीं जा सकती है। सीधे शब्दों में कहें तो वक्फ ट्रिब्यूनल के फैसले किसी भी सिविल कोर्ट से ऊपर हैं।

एक बार वक्फ की संपत्ति, हमेशा के लिए वक्फ की संपत्ति

वक्फ के मामले में संपत्ति का स्वामित्व वक्फ से अल्लाह को ट्रांसफर किया जाता है। और कोई भी संपत्ति अल्लाह से वापस नहीं ली जा सकती है। इसलिए एक बार संपत्ति वक्फ बन जाने के बाद, यह हमेशा वक्फ रहेगी और इसका मालिक अल्लाह होगा लेकिन उपयोग वक्फ बोर्ड करेगा।

ठीक ऐसा ही बेंगलुरु ईदगाह मैदान के मामले में भी देखा गया। भले ही सरकार के अनुसार किसी भी मुस्लिम संगठन को इस भूमि का मालिकाना हक नहीं दिया गया है। लेकिन, वक्फ का दावा है कि यह 1850 के दशक से वक्फ की संपत्ति थी, इसका मतलब है कि यह अब हमेशा के लिए वक्फ संपत्ति है।

(फोटो साभार: वक्फ वेबसाइट)

हाल ही में, गुजरात वक्फ बोर्ड ने सूरत नगर निगम की बिल्डिंग पर दावा पेश किया था, जो अब वक्फ की संपत्ति है क्योंकि इस बिल्डिंग से जुड़े किसी भी दस्तावेज को अपडेट नहीं किया गया था। वक्फ के अनुसार, मुगल काल के दौरान, सूरत नगर निगम की इमारत एक होटल थी और हज यात्रा के दौरान इस्तेमाल की जाती थी। ब्रिटिश शासन के दौरान संपत्ति तब ब्रिटिश साम्राज्य की थी। हालाँकि, जब साल 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिली, तब संपत्तियों को भारत सरकार को हस्तांतरित कर दिया गया था। लेकिन, जैसा कि ऊपर भी बताया गया है कि दस्तावेजों को अपडेट नहीं किया गया था, इसलिए यह सूरत नगर निगम की इमारत वक्फ बोर्ड के पास चली गई।

वक्फ बोर्ड सम्पत्ति पर दावा करने के मामले में कभी पीछे नहीं रहा। दिव्य भास्कर ने बताया था कि वक्फ बोर्ड ने देवभूमि द्वारका में दो द्वीपों के स्वामित्व पर दावा करते हुए गुजरात हाईकोर्ट में अपील की थी। इस पर हाई कोर्ट के जज ने हालाँकि सुनवाई करने से इनकार कर दिया था। साथ ही, कोर्ट ने वक्फ बोर्ड से अपनी याचिका को संशोधित करने के लिए भी कहा था।

वक्फ का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि यदि आपकी हाउसिंग सोसाइटी के किसी अपार्टमेंट का मालिक अपने अपार्टमेंट को वक्फ बोर्ड के नाम करता है तो वह अपार्टमेंट किसी भी दिन समाज के अन्य सदस्यों की इजाजत या बातचीत के बिना ही मस्जिद में बदल सकता है। कुछ ऐसा ही सूरत की शिव शक्ति सोसाइटी में हुआ था। वहाँ, एक प्लॉट के मालिक ने गुजरात वक्फ बोर्ड में अपना प्लॉट रजिस्टर कराया, जिससे वह मुसलमानों के लिए ‘पवित्र’ स्थान बन गया और लोग वहाँ नमाज पढ़ने लगे।

एक धर्मनिरपेक्ष देश में क्या कर रहा है वक्फ?

केवल एक मजहब की मजहबी संपत्तियों के लिए एक विशेष अधिनियम होना बेहद अजीब लगता है। साथ ही, तब जबकि देश को धर्मनिरपेक्ष देश कहा जाए और बाकी धर्मों की सम्पत्तियों के साथ भेदभाव हो। दरअसल, एडवोकेट अश्विनी कुमार उपाध्याय ने यही सवाल पूछते हुए फिलहाल दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है। वक्फ की संवैधानिक वैधता को लेकर इस याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस भी जारी किया है।

गौरतलब है कि इस्लामी देश तुर्की, लीबिया, मिस्र, सूडान, लेबनान, सीरिया, जॉर्डन, ट्यूनीशिया और इराक में वक्फ मौजूद नहीं है। लेकिन भारत में वोट-बैंक की राजनीति के चलते न केवल वक्फ बोर्ड सबसे बड़ा शहरी जमींदार है, बल्कि उसके पास कानूनी रूप से उनकी रक्षा करने वाला एक अधिनियम भी है।

इस लेख की मूल कॉपी OpIndia पर प्रकाशित हुई है। इसका अनुवाद आकाश शर्मा ‘नयन’ ने किया है।