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घरों पर चाँद-तारे वाले हरे झंडे, मस्जिद-मदरसे, कारोबार में भी दखल: मुस्लिम आबादी बढ़ने के साथ ही नेपाल में कपिलवस्तु के ‘कृष्णा नगर’ पर गाढ़ा हुआ इस्लामी रंग – OpIndia Ground Report

हाल में कई रिपोर्टें आई हैं जो बताती हैं कि नेपाल से लगी भारत की सीमा पर तेजी से डेमोग्राफी में बदलाव हो रहा है। मस्जिद-मदरसों की संख्या लगातार बढ़ रही है। जमीनी हालात का जायजा लेने के लिए 20 से 27 अगस्त 2022 तक ऑपइंडिया की टीम ने भारत से लगे नेपाल के इलाकों का दौरा किया। हमने जो कुछ देखा, वह सिलसिलेवार तरीके से आपको बता रहे हैं। इस कड़ी की दूसरी रिपोर्ट:

उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थ नगर जिले से भी नेपाल की सीमा लगती है। आप बढ़नी बॉर्डर से नेपाल के कपिलवस्तु जिले में प्रवेश करते हैं। यह भारत-नेपाल की व्यस्तत्म सीमाओं में से एक है।

यह रिपोर्ट एक सीरीज के तौर पर है। इस पूरी सीरीज को एक साथ पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

कपिलवस्तु की गिनती नेपाल के उन जिलों में होती है, जहाँ मुस्लिम आबादी अच्छी-खासी है। 2011 की जनगणना के अनुसार जिले की कुल जनसंख्या का 18% मुस्लिम हैं। यहाँ अंतरराष्ट्रीय सीमा पर ही आपको मस्जिद और मदरसे भी दिखने लगते हैं।

नेपाल में प्रवेश करते ही मस्जिद-मदरसा

बढ़नी बॉर्डर से नेपाल में प्रवेश करने के बाद कपिलवस्तु जिले का कृष्णा नगर शुरू हो जाता है। यहाँ सीमा से लगा ही एक मार्केट है। मार्केट के ग्राउंड फ्लोर पर डॉक्टर सईद अहमद की क्लिनिक से लेकर फैजल प्रिंटिंग, इमरान मोबाइल जैसी कई दुकानें हैं। दूसरे तल पर अल हलाल पब्लिक सेकेंडरी स्कूल चलता है। जो बोर्ड लगा है उसके अनुसार यह इंग्लिश मीडियम का स्कूल है। दूसरे तल पर मस्जिद है, जिसकी गुंबद भारत की सीमा से भी दिखाई देती है।

सीमा पर मौजूद मस्जिद

इसी मस्जिद से सटा तीन मंजिला मदरसा भी है। मदरसे का नाम ‘दारुल सलाम’ है। स्थानीय लोगों ने बताया कि मदरसे में नेपाल के अलग-अलग हिस्सों के तालिब (छात्र) हैं। इनके अलावा पश्चिम बंगाल और कश्मीर से भी लोग आकर दीनी तालीम हासिल कर रहे हैं।

मदरसा दारुल सलाम

बाजार में तमाम दुकानें मुस्लिमों की

मदरसा दारुल सलाम से एक गली कृष्णा नगर मुख्य बाजार की तरफ जाती है। इस रास्ते में अधिकतर दुकानें मुस्लिमों की है। बाजार में बुर्के वाली महिलाओं का खरीददारी करते दिखना सामान्य है। मर्दों की वेशभूषा पर भी इस्लामी असर दिखता है। कई घरों के ऊपर इस्लामी झंडे भी लगे हैं।

बाजार में खरीददारी करती महिलाएँ और घर पर लगा इस्लामी झंडा

सऊदी अरब जैसी मस्जिद

कृष्णानगर बाजार से करीब 1 किलोमीटर आगे बढ़ने पर एक और बड़ी मस्जिद और उसी से सटा हुआ मदरसा है। मस्जिद का ऊपरी हिस्सा सऊदी अरब में बनी मस्जिद अल नवाबी से मिलता-जुलता है। इस मस्जिद का नाम मदीना मस्जिद है। स्थानीय मुस्लिमों की मानें तो यह करीब 70 साल पुरानी मस्जिद है।

कपिलवस्तु की मदीना मस्जिद

मदीना मस्जिद के ठीक सामने एक बड़ा मदरसा सड़क के उस साइड है। इस मदरसे का नाम ‘जामिया उम्मे सलमा’ है। आसपास के लोगों ने बताया कि यहाँ भारत से भी सैकड़ों लड़के तालीम लेने आते हैं। किराने का दुकान चलाने वाले एक मुस्लिम बुजुर्ग ने बताया कि मदीना मस्जिद सुन्नी जमात की है, जबकि बॉर्डर पर दिखी मस्जिद अहले हदीस वालों की है।

मदरसा जामिया उम्मे सलमा

मदरसे से ठीक बगल में एक खंडहरनुमा मकान है। मकान देखने पर किसी पुराने मंदिर जैसा लग रहा था। लेकिन इस मकान के बारे में आसपास के लोग हमें कोई जानकारी नहीं दे सके। मदरसे के पास आरिफ खान की कोल्डड्रिंक की दुकान है। वे खुद को इलाके का भावी विधायक बताते हैं।

खुद को भावी विधायक बताने वाले आरिफ खान

विभिन्न पार्टियों में कई मुस्लिम नेता

ऑपइंडिया की टीम को कृष्णा नगर में कई राजनैतिक दलों के पोस्टर लगे दिखाई दिए। पोस्टरों से सभी राजनैतिक दलों में मुस्लिमों की अच्छी-खासी नुमाइंदगी का पता चलता है। इंतखाब अहमद खान, मिर्जा राशिद बेग, अकरम पठान जैसे नाम पोस्टरों पर भरे पड़े थे।

मुख्य हाईवे पर भी मुस्लिमों की दुकानें

एक हाईवे भारत के बढ़नी बॉर्डर को नेपाल की राजधानी काठमांडू से जोड़ता है। इस हाईवे के दोनों तरफ मुस्लिम समुदाय के लोगों की कई दुकानें हैं। चाहे वह फारुख की चिकन शॉप हो या चाँद का गैरेज… मुस्लिम नाम वाले व्यवसायिक प्रतिष्ठान भरे पड़े हैं। कृष्णा नगर में राजनीतिक तौर पर सक्रिय दीपेंद्र ने बताया कि चैपुरवा, लक्ष्मीनगर, भिलमी, बरगदी, क़ुदरबेटवा और जावाभारी जैसे कई इलाके कपिलवस्तु जिले में मुस्लिम बहुल हैं।

पढ़ें पहली रिपोर्ट: कभी था हिंदू बहुल गाँव, अब स्वस्तिक चिह्न वाले घर पर 786 का निशान: भारत के उस पार भी डेमोग्राफी चेंज, नेपाल में घुसते ही मस्जिद, मदरसा और इस्लाम – OpIndia Ground Report

‘पार्टी में होती है गाँधी परिवार की पूजा, जरूरत पड़ने पर नेता साथ नहीं देते’ : गुजरात में युवा कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष ने दिया इस्तीफा, बताया- ₹1.7 करोड़ के बदले मिला था पद

गुजरात में राहुल गाँधी के दौरे से 24 घंटे पहले कॉन्ग्रेस को झटका मिला है। वहाँ युवा कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष विश्वनाथ सिंह वाघेला ने कॉन्ग्रेस से इस्तीफा दिया है। मुमकिन है कि अब वाघेला बीजेपी को ज्वाइन करें।

इस्तीफा देने के साथ वाघेला ने कॉन्ग्रेस पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि इस पार्टी में गाँधी परिवार की पूजा होती है। इनके मुख्य कार्यालयों में नेहरू, इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, सोनिया गाँधी की तस्वीरें हैं।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार वघाले ने अपने इस्तीफे के साथ बताया कि उन्हें धीरे-धीरे एहसास हुआ कि पार्टी की मूल विचारधारा का तो अब गला घोंटा जा चुका है। वाघेला ने यहाँ तक दावा किया कि उन्हें कॉन्ग्रेस ने उन्हें पैसों के बदले अध्यक्ष पद दिया था। उन्होंने कहा, “मेरे समूह ने युवा कॉन्ग्रेस चुनाव में पार्टी को 1 करोड़ 70 लाख रुपए दिए थे। इन्हीं पैसों के बदले कॉन्ग्रेस ने मुझे यह पद दिया था।”

विश्वनाथ ने कॉन्ग्रेस पर गुस्सा जाहिर करते हुए कहा, “जब भी युवाओं को जरूरत होती है तो कॉन्ग्रेस के नेता कभी मौजूद नहीं होते। युवा ब्रिगेड को पार्टी के नेताओं की गुटबाजी और पार्टी सिस्टम से घृणा होने लगी है। देश के युवा कॉन्ग्रेस पार्टी में इसका भविष्य नहीं देखते हैं। यहाँ ईमानदार कार्यकर्ताओं का अपमान होता है।”

गौरतलब है कि राहुल गाँधी कल गुजरात दौरे पर अहमदाबाद पहुँचने वाले हैं। ऐसे में विश्वनाथ वाघेला का इस्तीफा पार्टी के लिए झटका है। वाघेला ने बताया कि उन्होंने इतिहास पढ़ पढ़कर कॉन्ग्रेस को ज्वाइन किया लेकिन यहाँ उन्होंने पाया कि स्वतंत्रता दिलाने वाले नेताओं की कॉन्ग्रेस कार्यालयों में तस्वीर नहीं है। वहाँ एक ही परिवार की भक्ति की जाती है। उन्होंने बताया कि वो तंग आकर ये पार्टी छोड़ रहे हैं। हार्दिक पटेल ने भी इन्हीं कारणों से पार्टी छोड़ी थी। वह बोले कि पार्टी के वरिष्ठ नेता जानते हैं कि इस पार्टी के युवा कार्यकर्ता क्यों पार्टी छोड़ रहे हैं।

निकाह के 8 साल बाद सलमान को नजमा लगने लगी ‘मोटी’ : पीटकर बोला- ‘अब तुम्हारे साथ नहीं रहना…तलाक-तलाक-तलाक’

उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले से तीन तलाक का मामला सामने आया है। यहाँ पति ने अपनी पत्नी को सिर्फ इसलिए तलाक दे दिया है क्योंकि उसका वजन बढ़ गया था और वह उसे मोटी लगने लगी थी। महिला ने अपने पति पर मारपीट करने और मोटी होने के कारण तलाक देने आरोप लगाते हुए स्थानीय लिसाड़ी गेट थाने में शिकायत दर्ज कराई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह पूरा मामला मेरठ जिले के लिसाड़ी गेट थाना अंतर्गत जाकिर कॉलोनी का है। यहाँ रहने वाली नजमा बेगम का निकाह करीब आठ साल पहले फतेहपुर निवासी मोहम्मद सलमान के साथ हुआ था। नजमा और सलामन का 7 साल का एक बेटा भी है।

नजमा बेगम ने आरोप लगाया है कि उसके शौहर सलमान ने पहले उसे घर से निकाल दिया था। इसके बाद अब उसके साथ मारपीट कर तीन बार तलाक बोलकर तलाक दे दिया है। साथ ही तलाक का नोटिस देने की बात भी कही जा रही है।

पीड़िता नजमा ने अपने शौहर मोहम्मद सलमान पर आरोप लगाते हुए कहा है कि उसके पति ने सिर्फ इसलिए तलाक दिया क्योंकि निकाह के बाद उसका वजन बढ़ गया है और वह मोटी हो गई है। नजमा ने कहा है कि उसका शौहर कहता है, “तुम मोटी हो गई हो, इसलिए अब मैं तुम्हारे साथ नहीं रहना चाहता।” हालाँकि, नजमा बेगम अपने शौहर के साथ ही रहना चाहती है।

बताया जा रहा है कि नजमा की शिकायत के बाद पुलिस ने आरोपित सलमान के खिलाफ मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 3/4 और आईपीसी की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है।

पहले की मारपीट फिर दिया तीन तलाक

इस मामले में पुलिस का कहना है, महिला ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि 28 अगस्त को सलमान 5 लोगों के साथ उसके अम्मी-अब्बू के घर गया और वहाँ उसकी पिटाई की। इसके बाद तीन तलाक देकर चला गया। कोतवाली मेरठ अंचल अधिकारी अरविंद कुमार चौरसिया ने कहा है कि शिकायत के आधार पर मामले की जाँच की जा रही है, आरोपित जल्द ही पुलिस की गिरफ्त में होगा।

दहेज में भैंस न लाने पर दिया तीन तलाक

बता दें, पिछले महीने भी उत्तर प्रदेश के बदांयू से ऐसा ही मामला सामने आया था। बदायूं में निकाह के 4 साल बाद एक महिला को दहेज में भैंस न लाने के कारण शौहर द्वारा तीन तलाक दे दिया गया था। इस मामले में पीड़िता ने शौहर और उसके घरवालों पर मारपीट कर घर से बाहर करने और तीन तलाक का आरोप लगाया था। पीड़िता की शिकायत के बाद, पुलिस ने शौहर सहित 4 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था।

TATA ग्रुप के पूर्व अध्यक्ष साइरस मिस्त्री की पालघर में मौत, अहमदाबाद से लौटते वक्त मर्सिडीज का हुआ एक्सिडेंट

टाटा ग्रुप (Tata Group) के पूर्व चेयरमैन साइरस मिस्त्री (Cyrus Mistry) का रविवार (4 सितंबर 2022) को एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। दुर्घटना मुंबई से सटे पालघर जिले के मुंबई-अहमदाबाद हाईवे पर हुआ। इस हादसे में उनके ड्राइवर की भी मौत हो गई है। हादसे के बाद कार के परखच्चे उड़ गए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, मिस्त्री अपनी मर्सिडीज कार से जा रहे थे। इस दौरान उनकी गाड़ी रोड के डिवाइडर से टकरा गई। इस हादसे में कार में सवार कुल चार लोगों में से मिस्त्री सहित दो लोगों की मौत हो गई। वहीं दो लोग घायल बताए जा रहे हैं। हादसे के बाद मिस्त्री को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

पालघर के SP बालासाहेब पाटिल के अनुसार, “मिस्त्री MH-47-AB-6705 नंबर की कार में सवार थे। दुर्घटना दोपहर करीब 3:30 बजे अहमदाबाद से मुंबई के रास्ते में सूर्या नदी के पुल पर हुआ। हादसे में दो लोगों की मौत हो गई है, जबकि बाकी दो लोग घायल हो गए।”

कौन थे साइरस मिस्त्री

दिसंबर 2012 में रतन टाटा द्वारा टाटा सन्स के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्ति लेने के बाद साइरस मिस्त्री को अध्यक्ष बनाया गया था। हालाँकि, चार साल के अंदर ही अक्टूबर 2016 में उन्हें पद से हटना पड़ा था। उनकी जगह रतन टाटा को अंतरिम चेयरमैन बनाया गया था।

इस विवाद के बढ़ने के बाद तब टाटा सन्स ने कहा था कि साइरस मिस्त्री के कामकाज का तरीका टाटा सन्स के कामकाज के तरीके से मेल नहीं खा रहा था। इसलिए उन्हें हटाना पड़ा। बता दें कि टाटा ग्रुप के 150 साल से भी ज्यादा समय के इतिहास में साइरस मिस्त्री छठे और सबसे युवा ग्रुप चेयरमैन थे।

साइरस मिस्री का पूरा नाम साइरस पालोनजी मिस्त्री है। 4 जुलाई 1968 को जन्मे साइरस मिस्री शापूरजी पालोनजी ग्रुप के प्रमुख पालोनजी मिस्त्री के छोटे बेटे थे। साइरस ने मुंबई के कैथेड्रल एंड जॉन कॉनन स्कूल से पढ़ाई की। इसके बाद वे सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए लंदन चले गए थे। वहाँ उन्होंने लंदन बिजनेस स्कूल से मैनेजमेंट में मास्टर की डिग्री भी ली थी।

विदेश से डिग्री लेकर लौटे साइरस मिस्त्री ने साल 1991 में फैमिली बिजनेस को जॉइन किया था। साल 1994 में उन्हें शापूरजी पालोनजी ग्रुप का निदेशक नियुक्त किया गया। उनके निर्देशन में कंपनी ने भारत का सबसे ऊँचा आवासीय टावर, सबसे लंबा रेलवे पुल और सबसे बड़े पोर्ट का निर्माण किया। पालोनजी ग्रुप कपड़े से लेकर रियल एस्टेट, हॉस्पिटलिटी, कंस्ट्रक्शन, बिजनेस ऑटोमेशन आदि कई क्षेत्रों में कारोबार करती है।

पिता पालोनजी मिस्त्री का दो महीना पहले हुआ था निधन

साइरस के पिता पालोनजी मिस्त्री साल 2006 में टाटा ग्रुप के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर से रिटायर हुए थे। इसके बाद साइरस मिस्त्री उनकी जगह पर शामिल हुए थे। साइरस के पिता पालोनजी मिस्त्री टाटा ग्रुप के सबसे बड़े शेयर होल्डर में से एक थे। अब भी मिस्त्री परिवार के पास टाटा ऐंड सन्स में 18.4% की हिस्सेदारी है और इस समूह के दूसरे सबसे बड़े शेयर होल्डर हैं। टाटा ट्रस्ट के पास टाटा सन्स के सबसे अधिक शेयर हैं।

साइरस के पिता पालोनजी मिस्त्री का इसी साल 28 जून को निधन हो गया था। वे 93 साल के थे। अब साइरस के निधन के बाद उनके परिवार में उनकी माँ पाट्सी पेरिन डुबास, बड़े भाई शापूर मिस्त्री और दो बहनें लैला मिस्त्री एवं अलू मिस्त्री रह गई हैं। उनकी एक बहन की शादी रतन टाटा के सौतेले भाई नोएल टाटा से हुई है।

राजनीति से लेकर उद्योग जगत की हस्तियों ने जताया शोक

साइरस मिस्त्री की आकस्मिक निधन पर देश भर में मातम फैल गया है। उनकी मौत पर महाराष्ट्र के मुख्यनाथ शिंदे और भाजपा नेता नितिन गडकरी सहित तमाम दलों के नेताओं एवं उद्योगपतियों ने अपना दुख प्रकट किया है और उन्हें श्रद्धांजलि दी है। शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले ने भी ट्वीट कर दुख जताया है। 

लीटर में खरीदते-बेचते हैं राहुल गाँधी आटा: दे रहे थे महंगाई पर ज्ञान, फिसल गई जुबान- आई मीम्स की बाढ़

महंगाई और बेरोजगारी को लेकर केंद्र की भाजपा सरकार के खिलाफ कॉन्ग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गाँधी द्वारा निकाली गई हल्ला बोल रैली की चर्चा हो रही है। इस रैली के मुद्दों की नहीं, राहुल गाँधी के उस बयान की चर्चा हो रही है, जिसमें उन्होंने कहा कि आजकल आटा 22 रुपए लीटर हो गया है।

राहुल गाँधी की इस बयान को लेकर सोशल मीडिया पर उनका खूब उपहास उड़ाया जा रहा है। दरअसल हल्ला बोल रैली में राहुल गाँधी ने कहा दिया कि 2014 में आटा 22 रुपए लीटर था, अब आटा 40 रुपए लीटर हो गया है। बता दें कि आटा को लीटर में नहीं, किलोग्राम में मापा जाता है।

दरअसल, प्रधानमंत्रियों के परिवार में जन्मे राहुल गाँधी 50 साल के अपने जीवन में कभी किराना स्टोर देखा होगा, ये भी विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता। संभवत: इसी कारण से आटा और तेल के मापन में वे अंतर नहीं कर पाए। दरअसल, आटा ठोस पदार्थ होने के कारण ग्राम और किलोग्राम में मापा जाता है न कि लीटर में। तरल पदार्थों की मापन इकाई लीटर है।

वास्तव में राहुल गाँधी जो स्क्रिप्ट पढ़ कर रैली में बोल रहे थे। हो सकता है कि जिस व्यक्ति ने इस स्क्रिप्ट को लिखी है, उसने इसे ‘किलो’ के बजाय ‘लीटर’ लिख दिया हो। ये भी हो सकता है कि तेल और पेट्रोल की बात करते-करते राहुल गाँधी आटा को भी लीटर में बोल दिए हों और यह उनके जुबान फिसलने के कारण के कारण हुआ हो। खैर जो फिर हुआ है, इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर मीम की बाढ़ आ गई है।

नेटिज़न्स ने मज़ाक उड़ाया कि कैसे कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता और नेता अब आटा लेने के लिए बोतलों के साथ खड़े होंगे, क्योंकि राहुल गाँधी के अनुसार यह अब लीटर में उपलब्ध है।

राहुल गाँधी की इस छोटी सी चूक से पार्टी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों की जान सांसत में है। उन्हें लग रहा है कि भाजपा इस मौके का भी इस्तेमाल कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी का मजाक उड़ाने के लिए करने से नहीं चूकेगी।

फोटोशूट के नाम पर रची हत्या की साजिश, गोवा में उसे मारने ही लाया था: सोनाली फोगाट के PA ने जुर्म कबूला, रिपोर्ट्स में दावा

सोनाली फोगाट मर्डर केस में नया खुलासा हुआ है। ताजा रिपोर्ट्स के अनुसार कहा जा रहा है कि फोगाट के पर्सनल असिस्टेंट ने स्वीकार कर लिया है कि वो फोगाट को मारने के इरादे से ही उन्हें गोवा लेकर आया था।

टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित खबर के अनुसार, सुधीर ने माना कि उसने सोनाली को मारने की साजिश रची थी और इसी उद्देश्य से वो फोगाट को गुरुग्राम से गोवा लाया था। पीए सांगवान के मुताबिक उसने फोटोशूट के नाम पर इस ट्रिप को ऑर्गनाइज किया ताकि फोगाट को मौत के घाट उतार सके।

पुलिस सूत्रों के हवाले से आई खबरों में कहा जा रहा है कि सोनाली को मारने की मंशा सुधीर की बहुत पहले से थी। गोवा में शूटिंग का सिर्फ बहाना था। यहाँ उसने खुद उनकी ड्रिंक में ड्रग्स मिलाए थे।

लंबी पड़ताल के बाद अब पुलिस ने बताया है कि उन्हें सुधीर के खिलाफ पुख्ता सबूत मिल गए हैं। ये सबूत सुधीर को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त हैं।

सोनाली फोगाट हत्याकांड

बता दें कि एक्ट्रेस सोनाली फोगाट की मृत्यु की खबर 23 अगस्त 2022 को आई थी। पहले मौत की वजह हार्ट अटैक को कहा गया। हालाँकि बाद में सोशल मीडिया पर वीडियोज आने के बाद इस केस में हत्या के एंगल से जाँच हुई और पीए सुधीर सांगवान और सुखविंदर सिंह नाम का शख्स गिरफ्तार हुआ।

वीडियोज में साफ दिख रहा था कि सोनाली को ड्रग्स देकर बेसुध किया गया। इसके बाद उन्हें वॉशरूम ले जाया गया और बाद में उनकी मौत की खबर बताई गई। पहले आरोपितों ने कहा कि सोनाली टॉयलेट में गिर गई थीं और दीवार से टकराने पर उनकी मृत्यु हुई।

हालाँकि परिजनों ने इस मामले में अलग खुलासे किए। किसी ने बताया कि सुधीर पहले सोनाली को ब्लैकमेल कर रहा था तो किसी ने बताया कि सुधीर ने एक्ट्रेस को अपने पिता से भी नहीं मिलने देता था और लंबे समय से उन्हें ड्रग दे रहा था। फोगाट की बेटी से जब पूछताछ हुई तो उन्होंने भी यही कहा कि उनकी माँ उन्हें कह कर गई थीं कि एक हफ्ते का फोटोशूट हैं जबकि हकीकत में रिजॉर्ट 2 दिन के लिए ही बुक था। सारे पहलुओं को देख इस मामले में सीबीआई जाँच की माँग उठी थी और पुलिस ने 5 आरोपितों को गिरफ्तार किया था।

‘ब्रह्मास्त्र की बिकीं 50000 टिकटें, रिलीज से पहले ₹1.88 करोड़ की कमाई’ : मीडिया ने फिल्म की प्री-बुकिंग के नाम पर फैलाया झूठ, नेटिजन्स ने खोली पोल

सोशल मीडिया पर चल रहे ‘ब्रह्मास्त्र’ फिल्म के बॉयकॉट के बीच ये दावा सामने आया है कि इस फिल्म के लिए एडवांस बुकिंग बहुत तेजी से हो रही है। खबरों में कहा जा रहा है कि फिल्म की हजारों टिकटें बिक गई हैं और ये फिल्म ब्लॉकबस्टर होने वाली है। हालाँकि सोशल मीडिया पर जिन लोगों ने इस फिल्म को बॉयकॉट करने का बीड़ा उठाया है उनका दावा है कि ये प्रीबुकिंग के दावे फर्जी हैं।

मीडिया में प्रीबुकिंग को लेकर दावा

ब्रह्मास्त्र, करण जौहर के धर्मा प्रोडक्शन के बैनर तले बनी हुई फिल्म है। इसमें रणबीर कपूर (Ranbir Kapoor) और आलिया भट्ट (Alia Bhatt) मुख्य भूमिका में नजर आएँगे। इस फिल्म को लेकर कई मीडिया हाउस दावा कर रहे हैं कि बायकॉट के बाद भी इसकी एडवांस बुकिंग उम्मीद से कहीं बेहतर हो रही है। साथ ही यह भी बताया जा रहा है कि ब्रह्मास्त्र के करीब 50000 टिकट एडवांस बुकिंग के दौरान ही बिक चुके हैं।

यही नहीं, ब्रह्मास्त्र (Brahmastra) को ब्लॉकबस्टर बताते हुए इस बात का दावा किया जा रहा है कि फिल्म ने सिर्फ एडवांस बुकिंग से ही 1.88 करोड़ रुपए से अधिक की कमाई की है। इन तमाम बातों के साथ इस बात का भी प्रचार किया जा रहा है कि ब्रह्मास्त्र की एडवांस बुकिंग बॉलीवुड के लिए बड़ी राहत है और यह फिल्म ब्लॉकबस्टर हो सकती है।

प्रीबुकिंग केवल प्रमोशनल स्टंट: बॉयकॉट करने वालों का दावा

हालाँकि, इस बारे में सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं कि मीडिया में ब्रह्मास्त्र को लेकर आ रहीं खबरें सिर्फ प्रमोशनल स्टंट है। साथ ही, अपने-अपने क्षेत्र के सिनेमाघरों के बुकिंग स्टेटस शेयर भी कर रहे हैं। इन बुकिंग स्टेटस को देखने से यह पता चलता है कि ब्रह्मास्त्र की एडवांस बुकिंग के लिए जिस तरह से मीडिया में दिखाया जा रहा है उससे ठीक उलट बुकिंग तो हो ही नहीं रही हैं। यानी कि, ब्रह्मास्त्र (#BoycottBrahmastra) पर भी बायकॉट का असर नजर आ रहा है।

गौरतलब है कि 9 सितंबर को रिलीज होने जा रही फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ का बायकॉट बड़े जोरों-शोरों से किया जा रहा है। इसके लिए, तमाम सोशल साइट्स पर #Boycott Brahmastra ट्रेंड चलाया जा रहा है। ब्रह्मास्त्र के बायकॉट का सबसे बड़ा कारण रणबीर कपूर हैं। रणबीर ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वह बीफ के बड़े शौकीन हैं। इसके अलावा इस फिल्म को लेकर ये खबर भी सामने आई थी कि पहले इस फिल्म का नाम ड्रैगन था, जिसे बाद में बदलते हुए ब्रह्मास्त्र किया गया है। साथ ही, रणबीर कपूर ‘शिव’ का नहीं बल्कि जलाल अल-दीन मुहम्मद रूमी का रोल निभाने वाले थे।

‘राज्य में मौलवी के वेश में छिपे हैं आतंकी’: असम के DGP ने इस्लामी संस्था के प्रमुखों से की मुलाकात, CM सरमा ने मदरसों पर हाल ही चलवाए थे बुलडोजर

बांग्लादेश की सीमा से सटे पूर्वोत्तर राज्य असम के पुलिस महानिदेशक ज्योति महंता (Assam DGP Jyoti Mahanta) ने राज्य के विभिन्न इस्लामी संस्थाओं के प्रमुखों से मुलाकात की और आतंकी मॉड्यूल के भंडाफोड़ में सहयोग करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि मौलवी के रूप में आतंकी राज्य में छिपे हैं और देश विरोधी गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं।

बात दें पिछले कुछ सप्ताहों में पुलिस ने अलकायदा भारतीय उपमहाद्वीप (AQIS) और अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (ABT) से जुड़े कई आतंकियों को गिरफ्तार किया था। ये आतंकियों मस्जिदों एवं मदरसों में इमाम या मौलवी के रूप में काम कर रहे थे।

सबसे हालिया गिरफ्तारी बुधवार (31 अगस्त 2022) को अजमल हुसैन नाम के आतंकी की हुई थी। उसे राजधानी गुवाहाटी से पुलिस ने गिरफ्तार किया था। अजमल एक मदरसे में मौलवी थी, लेकिन अलकायदा और अंसारुल्लाह बांग्ला टीम के लिए काम कर रहा था।

डीजीपी ने कहा कि राज्य में कुछ आतंकी मौलवी और इमाम के वेश के छिपे हुए हैं और अपनी देश विरोधी गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं। रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई की है, जिसमें अब तक 38 आतंकियों की गिरफ्तारी की गई है।

डीजीपी महंता ने कहा, “आज हमने राज्य के इस्लामी संस्थाओं के प्रमुखों से मुलाकात की। उनके सहयोग के बिना हम AQIS और ABT के मॉड्यूल का भंडाफोड़ नहीं कर सकते। हमने उनसे सहयोग और समर्थन माँगा है और उन्होंने भरोसा दिया है।”

गौरतलब है कि पिछले दिनों राज्य की हिमंता बिस्वा सरमा सरकार ने राज्य के तीन मदरसों को ध्वस्त कर दिया था। इन मदरसों का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों के केंद्र रूप में होता था। इन मदरसों से जुड़े कई मौलवियों को पुलिस ने गिरफ्तार किया था।

सीएम सरमा ने स्पष्ट रूप से कह दिया था कि राज्य के जिस भी संस्थानों में शिक्षा के नाम पर आतंकी और जेहादी गतिविधियों को अंजाम दिया जाएगा, उसे वे तोड़ देेंगे। उन्होंने इसके पहले कहा था कि कई मदरसे आतंक का हब बन गए हैं। वहाँ पढ़ाई के बदले आतंकियों की ट्रेनिंग होती है। 

मोपला हिंदू नरसंहार: कहीं गला काट कुएँ में फेंका, तो कभी हत्या के लिए उतार दी पूरे शरीर की चमड़ी – इतिहास जो भूला दिया गया

किसान विद्रोह, हिंदू जमींदारों के खिलाफ मुस्लिम मजदूरों का आंदोलन, अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र क्रांति से लेकर मालाबार या मोपला विद्रोह… ऐसे कई टर्म हम सभी ने इतिहास में पढ़े हैं। पढ़े हैं क्योंकि इतिहास की किताबों में यही लिखा गया है। सच्चाई जबकि कोसों दूर है, रक्तरंजित है।

तो आखिर क्या है सच्चाई? कौन बताएगा रक्तरंजित इतिहास को? इन्हीं सवालों को जानने के लिए ऑपइंडिया ने मुलाकात की जे नंदकुमार से। RSS के विचारक, प्रज्ञा प्रवाह के भारतीय संयोजक जे नंदकुमार उसी राज्य से आते हैं, उस क्षेत्र को जानते-समझते हैं, जहाँ की यह वीभत्स घटना है।

मोपला हिंदू नरसंहार को गलत शब्दों में गढ़ कर इतिहास के साथ धोखा क्यों किया गया? वो कौन सी ताकतें थीं, जिन्होंने हजारों हिंदुओं के कत्लेआम पर आँखें मूँदी रखीं? इतने बड़े स्तर पर जो रक्तपात होता रहा, उसके पीछे के सामाजिक और राजनीतिक पहलूओं को ऑपइंडिया ने जानने की कोशिश की जे नंदकुमार से मिल कर। मोपला हिंदू नरसंहार से वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों को कैसे वाकिफ कराया जाए, इसके लिए क्या रोडमैप हो, क्या लक्ष्य हो, सरकार के स्तर पर क्या-क्या काम करने की जरूरत है, सब कुछ निकला इस बातचीत से, सवाल-जवाब के फॉर्मेट में।

सवाल: जिसे ‘मालाबार विद्रोह’ कह कर पढ़ाया जाता है, दरअसल उसकी आग 1921 से बहुत वर्षों पहले 1792 से ही शुरू हो गई थी। हजारों हिंदुओं का नरसंहार उसी शरीयत मानसिकता का नतीजा था। इतने लंबे कालखंड में हिंदुओं के प्रति नफरत की आग कैसे बढ़ती रही और फिर क्यों हुआ मोपला हिंदू नरसंहार? आखिर इतने लंबे समय तक हिंदू एकजुट होकर प्रतिकार क्यों नहीं कर पाए?

जवाब: 1921 के घोर नरसंहार का बैकग्राउंड अगर ठीक तरह से खोजा जाए तो 1792 से भी पीछे जाने की आवश्यकता है। मुख्यतः यह इस्लामी कट्टर मानसिकता है, जो अन्य धर्मों के लोगों के खिलाफ सोच रखती है। इसमें विशेषतः सुन्नी मुस्लिम लोग हिंदुओं के खिलाफ भी हैं, यहूदियों के खिलाफ भी, यहाँ तक की गैर-सुन्नी मुस्लिमों के खिलाफ भी और ईसाइयों के खिलाफ भी। इस नरसंहार के पीछे यह विचार एक मुख्य कारक तो है।

इसके साथ ही केरल में दो महत्वपूर्ण घटनाएँ भी कारक बनीं।
इनमें एक है:

यमन से कुछ मुस्लिम प्रचारकों का केरल आना। इनमें दो नाम बहुत महत्वपूर्ण हैं – (i) सईद अल्वी थंगई (Sayyid Alawi Thangal). यह आए 18वीं सदी की शुरुआत में। इनके पुत्र थे फज़ल पुकौया थंगई (Fazal Pookoya Thangal). इन दोनों नामों को जानना बहुत जरूरी है। वो इसलिए क्योंकि मालाबार क्षेत्र में बसी मुस्लिम आबादी को ज्यादा से ज्यादा कट्टरपंथी विचारधारा से जोड़ने में इन दोनों का बहुत योगदान रहा। इस्लामी कट्टर मानसिकता के बावजूद सईद अल्वी थंगई और फज़ल पुकौया थंगई के केरल आने से पहले हिंदू-मुस्लिम फसाद बहुत बड़े स्तर पर नहीं हुआ था। यमन से आए मुस्लिम प्रचारकों के बाद ही इस्लामी कट्टरपंथ अपने चरम पर पहुँचा।

दूसरा है:

1766 में हैदर अली (टीपू सुल्तान के अब्बा) का मालाबार पर आक्रमण करना। इस दौरान वहाँ बसे हिंदुओं के ऊपर बहुत ही क्रूर तरीके से आक्रमण किया गया। उनकी जमीन और संपत्तियाँ सब कब्जे में लिया था उन्होंने। हैदर अली के इस हमले से घबराए और बचे हुए हजारों नहीं बल्कि लाखों हिंदुओं का पलायन कोच्चि और त्रावणकोर की ओर हुआ। जमीन-जायदाद और यहाँ तक की मंदिरों का भी मोह त्याग कर इन हिंदुओं ने भाग कर अपनी जान बचाई। जब हैदर अली की मृत्यु हुई तो लोगों ने सोचा कि अब कुछ अच्छा होगा। लेकिन उनका बेटा टीपू सुल्तान अपने अब्बा हैदर अली का 10-गुणा क्रूर निकला।

टीपू सुल्तान ने वहाँ के टैक्स कलेक्शन सिस्टम तक को बदल दिया। वो लेकर आए मोपला कालमदार सिस्टम। इस कालमदार सिस्टम का अर्थ है – जो हिंदू लोग अपनी संपत्ति छोड़ गए, उन सारी संपत्तियों पर इन्होंने कब्जा कर लिया और मोपलाओं के बीच बाँट दिया। फिर इन्हीं संपत्तियों पर टैक्स कलेक्ट कर टीपू सुल्तान को भेजा जाता था।

हिंदुओं पर आक्रमण के पीछे इन दो कारकों के अलावा एक तीसरा भी पहलू है। इनका जिक्र इतिहास की किताबों में नहीं मिलेगा। मालाबार अपने टीक की लकड़ियों के लिए मशहूर रहा है। यहाँ का नीलंबूर टीक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फेमस है। मक्का में भी नीलंबूर टीक का प्रयोग किया गया है। टाइटैनिक के इंटीरियर डेकोरेशन में भी नीलंबूर टीक लगाया गया। उस समय की सबसे लग्जरी और सबसे महँगी कार रॉल्स रॉयस में भी नीलंबूर टीक लगाया जाता था। मालाबार पोर्ट से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीलंबूर टीक भेजा जाता था। इस पूरे व्यापार पर कब्जा करने के लिए भी टीपू सुल्तान ने आक्रमण किया था।

1792 आते-आते श्रीरंगपटनम श्रीरंगपट्टनम संधि हुई। एंग्लो-मैसूर तीसरा युद्ध समाप्त हो गया। इसके साथ ही मालाबार के ऊपर टीपू का कब्जा समाप्त हो गया। इसके बाद स्वाभाविक रूप में जो हिंदू त्रावणकोर या कोच्चि की तरफ भागे थे, वो मालाबार में वापस आने लगे। सब वापस आने की हिम्मत नहीं जुटा पाए लेकिन अधिकांश लोग वापस आए। इसके बाद इन सभी ने अपनी-अपनी संपत्तियों पर अपना हक जताया। यहीं से शुरू हुई एक नई सामाजिक समस्या। 1921 में हुआ मोपला हिंदू नरसंहार अपने आप में पहला नहीं था। 1792 में जो समस्या उपजी, उसको लेकर कम से कम 25 बड़े आक्रमण हिंदुओं पर किए गए। इसमें सबसे बड़ी बात यह रही कि हिंदुओं की संपत्ति पर कब्जा जमाने के लिए मुस्लिम सामंतों ने इस तरह के आक्रमण का नेतृत्व किया।

उस समय लकड़ी के जो 4-5 बड़े व्यापारी थे, उन सभी को अंग्रेजों ने उपाधि दी थी – खान बहादुर। मालाबर के क्षेत्र में यह उपाधि केवल मुस्लिमों को ही दिया गया और वो भी उनको, जो टीक की लकड़ी के बहुत बड़े व्यापारी थे। इन व्यापारियों को पहले हिंदू लोग टीक की लकड़ियाँ देते थे क्योंकि अधिकतर टीक के वन मंदिरों की संपत्ति थी। हैदर अली और टीपू सुल्तान के आक्रमणों के बाद हिंदुओं ने मुस्लिम व्यापारियों के साथ काम करना बंद कर दिया। यह सामाजिक समस्या भी एक कारण बना।

1766 से शुरू हुए हिंदुओं पर आक्रमण से लेकर 1921 का मोपला नरसंहार… आखिर इतने लंबे समय तक हिंदू एकजुट होकर प्रतिकार क्यों नहीं कर पाए? इस सवाल के पीछे मुख्यतः दो कारण हैं:

एक कारण – वहाँ के हिंदू संगठित नहीं थे। संगठित होने के लिए या इसके प्रयास के लिए कुछ होना चाहिए था लेकिन 19वीं शताब्दी के अंत आते-आते तक हिंदुओं में जाति प्रथा अपने चरम पर थी। इसी कारण से संगठनात्मक दृष्टि बन नहीं पाई।

दूसरा कारण – पहले के हिंदुओं के पास हथियार थे। केरल में तब कई सारे अखाड़े मतलब वहाँ की भाषा में कलरी थे। अंग्रेजों ने वहाँ के सभी कलरी पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसके कारण हिंदुओं के पास हथियार लेकर चलने की संभावना ही नहीं बची। इसी से जुड़ा एक तीसरा कारण भी है। मुस्लिम पहले से ही तैयार थे। इनकी एक तरह से मिलिट्री ट्रेनिंग भी शुरू हो गई थी। साथ ही उनके पास हथियार और बंदूकें भी थीं।

अंग्रेज भी मुस्लिमों के इस आक्रामक रवैये पर लगाम लगाने को बहुत इच्छुक नहीं थे। उनके लिए हिंदू-मुस्लिम लड़ रहा है तो फायदा होगा, वाली स्थिति थी। इस तरह हथियारों और बंदूकों से लैस संगठित मुस्लिम के सामने थे हथियार रहित हिंदू, सामाजिक स्तर पर बिखरे हुए हिंदू, असंगठित हिंदू। इन कारणों से हिंदुओं की ओर से संगठित प्रतिक्रिया नहीं देखने को मिली लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर यह हुआ, कई जगहों पर हुआ।

सवाल: जब मोपला हिंदू नरसंहार हुआ तब अंग्रेजों की सरकार थी। उनकी पुलिस-प्रशासन ने इस नरसंहार को कैसे देखा, किन उपायों से इस पर काबू पाया… यह उनकी समस्या थी। या काबू नहीं पाया तो इसके पीछे उनकी कूटनीति रही होगी। लेकिन उसी समय महात्मा गाँधी-नेहरू-पटेल-बोस वाली मजबूत कॉन्ग्रेस भारत की राजनीति में पकड़ बना चुकी थी। फिर ऐसा क्यों हुआ कि हिंदू नरसंहार को ‘स्वतंत्रता विद्रोह’ या ‘किसान विद्रोह’ के नाम से इतिहास में दर्ज किया गया? क्या कॉन्ग्रेस के गरम दल के नेताओं ने भी ‘हिंदू नरसंहार’ को लेकर कुछ नहीं लिखा, कोई लेटरबाजी नहीं की?

जवाब: उस समय के इतिहास को देखें तो जो पक्के राष्ट्रवादी थे, वो सब जेल में थे। नेताजी सहित बहुत सारे लोग उस समय जेल में थे। फिर भी जब उनकी मुक्ति हुई तो लोगों ने आवाज उठाई। वीर सावरकर जी ने तो बहुत ही कड़े शब्दों में इसका विरोध किया था। ‘मोपला अर्थात मुझे इससे क्या’ नाम की एक पुस्तक भी सावरकर जी ने लिखी।

शुरुआत के समय में कॉन्ग्रेस के लीडर गाँधी जी के हाथ में थे। वो वीटो पावर बहुत जबरदस्त था। इसके अलावा मैं सिर्फ गाँधी जी की बात नहीं कर रहा हूँ लेकिन कुछ लोगों को भारत के स्वतंत्रता संग्राम को लेकर मोनोपोली या एकमात्र क्रेडिट जैसा चाहिए था। इससे पहले उनके पास इस तरह के नेतृत्व नहीं थे… लेकिन आगे चलकर ऐसा सिर्फ उनके पास ही हो, यह ऐसे लोगों की सोच थी। इसलिए पागलपन की हद तक भी ये लोग जाने के लिए तैयार थे। स्वतंत्रता संग्राम करने लिए मुस्लिमों को साथ लेकर चलने और इसे एक अच्छा मौका समझते हुए इन लोगों ने यह प्रारंभ किया।

पहले सवाल के जवाब में मैंने बताया था कि पूरा मालाबार एक अग्निपर्वत मतलब वॉलकैनो बन चुका था। वह फटने के लिए तैयार था। सामाजिक स्तर पर मुस्लिमों और हिंदुओं के बीच तनाव इतना था कि एक चिंगारी पर्याप्त थी। लेकिन खिलाफत के साथ खड़े होकर गाँधी जैसे बड़े नेता ने एक मशाल फेंक दिया केरल के मालाबर में। परिणाम हुआ इतने बड़े नरसंहार का होना।

इसके बाद बाबा साहब आंबेडकर और एनी बेसेंट जैसे बड़े नेताओं ने मोपला में हुए हिंदू नरसंहार पर वो सच्चाई बयाँ की, जिससे कॉन्ग्रेस बच रही थी। एनी बेसेंट का नाम इस रूप में उल्लेख करना चाहिए कि मालाबार में अगर कोई राष्ट्रीय नेता सबसे पहले पहुँचा तो वो एनी बेसेंट ही थीं। वहाँ पहुँच कर उन्होंने महात्मा गाँधी को बहुत ही कड़े शब्दों में एक पत्र लिखा।

एनी बेसेंट ने पत्र में बताया कि यहाँ जो नरसंहार हो रहा है, उसके चित्रण और वर्णन से मुझे बेहोशी आती है। सहन नहीं कर पा रही हूँ मैं। इसलिए गाँधी जी को यहाँ आने का आमंत्रण देती हूँ। जब वो आएँ तो साथ में अपने दो करीबी और मजबूत ‘रिश्तेदारों’ – मौलाना मोहम्मद अली और शौकत अली को भी साथ लाएँ और देखिए कि इधर क्या हो रहा है। पूर्ण-गर्भिणी माता के गर्भ को चीर कर उनके भ्रूण निकाल भाले पर टाँग दिया जाता था और यह कई जगहों पर किया जा रहा है। एनी बेसेंट ने वहाँ गहन सर्वे भी किया था।

बाबा साहब आंबेडकर ने बताया कि यह हिंदू-मुस्लिम दंगा नहीं है। इसे हिंदू-मुस्लिम दंगा कह भी नहीं सकते। उन्होंने इसके लिए एक शब्द का प्रयोग किया था – Bartholomew (इसका मतलब ईसाई धर्म के इतिहास से जुड़ा एक नरसंहार है)। यह कुछ ऐसा है कि एक समुदाय ने पूरी तैयारी करके उस दूसरे समुदाय पर हमला किया, जिसकी कोई तैयारी ही नहीं थी। यह हमला अचानक था और एकदम से नरसंहार कर दिया गया। मृतकों की संख्या किसी को पता नहीं। यह गिनती बहुत बड़ी होगी। हजारों की संख्या में हिंदू अपने घर-संपत्ति को छोड़ कर पड़ोसी गाँवों या जंगलों में भाग गए। बाबा साहब आंबेडकर ने सवालिया लहजे में पूछा कि जो स्थिति यहाँ की है, वैसे में महात्मा गाँधी क्यों नहीं इस विषय को देख रहे हैं?

एनी बेसेंट, बाबा साहब आंबेडकर और इन जैसे कई लोगों ने इस मामले पर आपत्ति जताई थी। विडंबना यह है कि तब के केरल के कॉन्ग्रेस नेताओं ने शुरुआत में जो गाँधीजी ने बताया, उसे वैसे ही मान कर चले। उनकी मानसिकता ही यही थी।

इसके पीछे एक और पृष्ठभूमि है। बंगाल विभाजन में अपनी कूटनीतिक विफलता यानी 1911 के बाद अंग्रजों ने बहुत ही शातिर ढंग से अपने प्यादों को सेट किया, जाल बिछाया। कॉन्ग्रेस उनके इसी जाल में फँस गई थी। उन्होंने कॉन्ग्रेस को “राष्ट्रीय स्तर की पार्टी नहीं” कहना शुरू किया। हिंदू पार्टी कहने लगे। “मुस्लिम प्रतिनिधित्व कॉन्ग्रेस में कहाँ” ऐसे सवाल किए जाने लगे। अंग्रजों ने यहाँ तक दाँव खेला कि अगर कॉन्ग्रेस में मुस्लिम प्रतिनिधित्व होगा तो वो भारत को स्वतंत्र घोषित कर ब्रिटेन जाने को तैयार हैं। इस तरह से उन्होंने कॉन्ग्रेस को घेरा।

नतीजा क्या हुआ? कॉन्ग्रेस ने यह दिखाना शुरू कर दिया कि उनके साथ मुस्लिम भी हैं… वो एक राष्ट्रीय स्तर की पार्टी हैं। यही वो कारण है कि खिलाफत जैसी खतरनाक साजिश को इन लोगों ने मिलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खड़ा करने की कोशिश की, इसे इंटरनेशनल मूवमेंट बनाने पर बल दिया।

इस सवाल का जो जवाब शुरू में मैंने दिया था, अब फिर से उस पर आते हैं। कॉन्ग्रेस के अंदर जितने महान नायक लोग थे, उनके जो गरम दल (कथित) के नेता लोग थे, उनमें से अधिकांश शुरुआत से ही जेलों में बंद थे। इस कारण से वो लोग इस मामले पर कुछ भी कह पाने की स्थिति में नहीं थे। कॉन्ग्रेस के ही एनी बेसेंट और बाबा साहब आंबेडकर ने आपत्ति जताई थी। इसी तरह और भी कई लोगों ने इस मामले पर आपत्ति जताई थी।

उस समय केरल के जो नेता थे – के दामोदरन, माधवन, केपी मेनन आदि जैसे लोगों ने कॉन्ग्रेस नेतृत्व को एक पत्र लिखा। इस पत्र में इन लोगों ने कहा कि कॉन्ग्रेस का रेजोल्यूशन अपने आप में गलत है। इन लोगों ने बताया कि खिलाफत के समर्थन में कॉन्ग्रेस ने जो रेजोल्यूशन लिया, वो केरल में किए गए संघर्ष को एक तरह से नजरअंदाज करना हुआ। मतलब यह है कि कॉन्ग्रेस के भीतर भी आपत्ति जताने वाले लोग थे।

सवाल: आपके जवाब से यह पहलू निकल कर आया कि कॉन्ग्रेस के अंदर से भी आवाज उठी थी। लेकिन जिस ढंग से इस नरसंहार को इतिहास में दर्ज किया जाना चाहिए था या आजादी के बाद कॉन्ग्रेसियों के द्वारा दर्ज करवाई जाती, वैसा किया नहीं गया। इन्हीं कॉन्ग्रेसी नेताओं से जुड़ा है अगला सवाल।
केरल के एक कवि थे कुमारन आसन (Kumaran Asan)। 16 जनवरी 1924 को हुई उनकी मौत पर आपने सवाल उठाए थे? उन्होंने अपनी कविता के जरिए हिन्दुओं के नरसंहार का खुलासा किया था। आखिर जब कवि या डॉक्टर-इंजीनियर जैसी आम जनता भी सच्चाई को देख पा रही थी, हिंदुओं के होते नरसंहार को समझ रही थी तो उस समय के कॉन्ग्रेसी नेतृत्व ने इससे मुँह क्यों मोड़ा? वो भी तब जबकि उनके ही बड़े-बड़े नाम (एनी बेसेंट, बाबा साहब आंबेडकर) से लेकर केरल के स्थानीय नेता लोग तक इस बात को लेकर कड़े शब्दों में आपत्ति जता चुके थे। क्या इसके पीछे यह समझा जाए कि सिर्फ और सिर्फ आजादी मिले और उस आजादी से मेरा नाम जुड़ जाए, इस स्वार्थ के लिए हिंदुओं के इतने बड़े नरसंहार को इन लोगों ने नजरअंदाज कर दिया?

जवाब: जरूर। यह सब कुछ राजनीतिक प्रासंगिकता के लिए किया गया। कॉन्ग्रेस नेतृत्व और यहाँ तक की गाँधीजी ने भी 1921 के अगस्त-सितंबर आते-आते यह मान लिया कि यह क्या हुआ? उन्होंने लिखा है, “क्या हुआ है मेरे मुस्लिम बंधुओं को, या क्या वो पागल हो गए हैं?” इसका मतलब यह है कि गाँधीजी सहित कॉन्ग्रेस नेतृत्व को यह समझ में आ गया था कि बहुत बड़ी गलती हो गई है। इसके बावजूद इस गलती को बताने के लिए ये लोग तैयार नहीं थे।

मोपला हिंदू नरसंहार की शुरुआत से ही जो बौद्धिक लोग थे, वो परिस्थितियों को देख-समझ रहे थे। कवि कुमारन आसन (Kumaran Asan) इनमें से एक थे। केरल में इरवा समुदाय के श्री नारायण गुरुदेवन देव जी द्वारा एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन स्थापित किया गया था। नाम है – श्री नारायण धर्म परिपालन योग (Sree Narayan Dharma Paripalana Yogam, SNDP Yogam)। कवि कुमारन आसन इसके प्रथम और संस्थापक महासचिव भी थे। साथ ही वो पहले नामचीन शख्स थे, जो मोपला हिंदू नरसंहार को करीब से देखे, उस दर्द को महसूस किए।

मोपला हिंदू नरसंहार के समय संन्यासी श्री नारायण गुरु त्रावणकोर में थे। कवि कुमारन आसन भी त्रावणकोर में ही थे। श्री नारायण गुरु ने ही कुमारन आसन को मोपला जाकर स्थिति देखने को कहा था क्योंकि बहुत सारे हिंदू लोग पलायन करके त्रावणकोर की ओर आ रहे थे। इसके बाद कुमारन आसन तुरंत मालाबर गए। वहाँ की स्थिति देख कर उन्होंने एक कविता लिखी – दुरावस्था (poem Duravastha by Kumaran Asan)।

दुरावस्था नाम की यह कविता एक तरह से हिंदुओं के दुर्भाग्य और उनकी त्रासदी को बयाँ करती है। इस कविता का परिचय भी स्वयं कवि कुमारन आसन ने ही लिखा। इस परिचय में उन्होंने स्पष्ट किया कि मालाबार क्षेत्र के हिंदुओं के साथ जो भी घटित हुआ, वो भविष्य में किसी और हिंदू के साथ न हो… इसलिए यह कविता लिख रहा हूँ। मलयालम में लिखी इस कविता की दो लाइनें कुछ ऐसी हैं:

अम्मा मार इल्लै सहोदरी मार इल्लै
इम् मूर्खर किस्वर चिंद इल्लै

इसका हिंदी में अर्थ कुछ ऐसा है – “इन क्रूर मोहम्मद लोगों की माताएँ नहीं हैं क्या? बहनें नहीं हैं क्या?” इतना खुल कर उन्होंने हिंदुओं के हो रहे नरसंहार का जिक्र किया। इसलिए कवि कुमारन आसन पर आक्रमण शुरू से ही हो रहा था। त्रिवेंदरम शहर में अचानक एक कार एक्सीडेंट के रूप में भी हमला किया गया उन पर। वहाँ वो बच गए। बाद में जब एक नदी में बोट से जा रहे थे, तो वो बोट ही डूब गई।

इसे एक दुर्घटना बताया गया। कहा गया कि इस ‘दुर्घटना’ में उनकी मौत हो गई। इस पूरे प्रकरण में आपत्ति इसलिए जताई गई क्योंकि FIR रिपोर्ट के अनुसार बोट की जिस केबिन में कवि कुमारन आसन बैठे थे, उसके बाहर से दरवाजे में ताला लगा हुआ था। ‘दुर्घटना’ के एक दिन बाद उनकी लाश उसी केबिन में मिली, जिसके दरवाजे पर बाहर से ताला लगा हुआ था। ‘दुर्घटना’ के दिन कवि कुमारन आसन वाले बोट के आसपास 2-3 अनजान बोट चक्कर काट रहे थे।

जाहिर सी बात है कि इसके पीछे मुस्लिम आतंकियों का हाथ था। केरल की विशेष राजनीतिक-मजहबी परिस्थितियों में लेकिन तब से लेकर अब तक मुस्लिमों के खिलाफ कुछ बताने को लेकर कॉन्ग्रेस या वामपंथी लोगों की हिम्मत नहीं है। इसलिए सच को दबाया गया। राजनीतिक फायदे के लिए इन लोगों ने इस सच को दबा कर रखा। सच बताने के लिए ये लोग तैयार नहीं हैं।

सवाल: आपने अपने जवाब में बहुत अच्छे ढंग से गाँधीजी पर एक सवाल खड़ा किया। इसके बावजूद अगला सवाल फिर से गाँधीजी से ही संबंधित… क्योंकि एक बहुत ही चुभने वाली बात उन्होंने तब की थी। हिंदुओं का नरसंहार हो रहा था, खिलाफत की बात चल रही थी, इस्लामी राज्य की स्थापना के सपने देखे जा रहे थे… और इन सब के बीच गाँधीजी हिंदुओं को बिना प्रतिकार मरने की सीख दे रहे थे। इतने बड़े स्तर के नेता से कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वो इस ढंग का, जमीनी हकीकत से कट कर इस तरह का बयान दे?

जवाब: यह ठीक है कि गाँधीजी बड़े व्यक्ति थे। हम जैसे छोटे स्तर के व्यक्ति के लिए शायद उनके कहे का पूरा अर्थ समझ में नहीं आए। मेरे स्तर के आधार पर उनके कहे गए शब्दों (मोपला हिंदू नरसंहार के संदर्भ में) का लेकिन कोई स्पष्टीकरण नहीं हो सकता है। इसकी कोई व्याख्या हो ही नहीं सकती। ऐसा इसलिए क्योंकि हिंदुओं के लिए मरने का आह्वान करना और मुस्लिमों के अल-दौला [Al-Daula (Islamic State)] की स्थापना के लिए यह कहना कि अगर हिंदू मरना चाहिए तो मरना सही है।

मालाबार में मुस्लिमों ने अल-दौला की स्थापना की। उनके लिए अल-दौला का मतलब है – मुस्लिमों का पवित्र राज्य। गाँधीजी का यह कहना कि इसकी स्थापना के लिए अगर हिंदुओं को मरना चाहिए तो मरो। और यह भी कहना कि गाय के ऊपर उनकी भक्ति है लेकिन खिलाफत के लिए गाय की हत्या करनी है तो उस हत्या के अधिकार के लिए लड़ूँगा। इस सब बातों का अर्थ क्या है, समझ में नहीं आता है। इन सब से बीच-बीच में वो (गाँधीजी) यह भी कहते आ रहे थे कि वो सत्य के पुजारी हैं। ये कौन सा सत्य है? इसलिए कोई स्पष्टीकरण हो ही नहीं सकता है। उनकी कुछ बातों के बारे में स्पष्टीकरण देने जैसी कोई जानकारी है ही नहीं हमारे पास।

इतने जघन्य ढंग से हिंदुओं की हत्या हुई कि एनी बेसेंट ने स्वयं गाँधीजी को नरसंहार की जगह देखने के लिए बुलाया। एनी बेसेंट ने हाथ जोड़ कर, आँखों में आँसू लेकर गाँधीजी से आग्रह किया कि वो आएँ, अपने खास मित्रों को लेकर आएँ और देखें कि क्या हो रहा है, यहाँ के हिंदुओं के हालत क्या हैं। इस तरह से उन्होंने वहाँ के हालात का जिक्र किया था।

गाँधीजी लेकिन इन सब से परे उस समय जो कह रहे थे, वक्तव्य दे रहे थे… शायद उनके मन में किसी न किसी तरीके से भारत को आजाद कराने का ख्याल था। और इसके लिए कॉन्ग्रेस को एक सेकुलर नेशनलिस्ट पार्टी के तौर पर अंग्रेजों से सामने दर्ज करना या उभारना उनका मकसद रहा होगा। इस दिखावे के लिए सभी लोगों (सभी धर्मों के लोगों के साथ) को साथ में रखना और ले चलने का लक्ष्य उनका शायद रहा हो। इसके अलावा एक विषय पर जिद करके ठान लेना और उसे अंत तक ले जाना भी गाँधीजी का एक पहलू रहा है। नेताजी वाले विषय में भी यह देखा गया था। इसके अलावे बहुत सारे प्रकरण में भी उनका यह पहलू सामने आया था। फिलहाल इन विषयों पर चर्चा की जरूरत नहीं है। जिन बातों का जिक्र ऊपर किया, सवाल के संदर्भ में वो अपने आप में परिपूर्ण है।

सवाल: गाँधीजी वाले मुद्दे से आगे बढ़ते हैं। अब आते हैं इतिहास की ओर। मोपला हिंदू नरसंहार की बात विजुअल मीडिया के अभी के समय में की जाए तो थुवूर के कुएँ पर काटे गए हिंदुओं के बिना अधूरी होगी। इस घटना का जिक्र मालाबार के तब के डिप्टी कलेक्टर दीवान बहादुर सी गोपालन ने अपनी पुस्तक ‘द मोपला रिबेलियन, 1921’ में भी की है।
अब सवाल यह है कि इतने बड़े कालखंड में, इतने बड़े स्तर पर हिंदुओं का नरसंहार हुआ तो आखिर उसे किसी एक घटना (थुवूर के कुएँ पर काटे गए हिंदुओं) में समेटा कैसे जा सकता है? क्या यह इतिहास की बदकिस्मती है कि जहाँ हजारों हिंदुओं का नरसंहार हुआ, उससे संबंधित सिर्फ एक घटना का ही जिक्र आम लोग जान पाए? थुवूर के अलावे अन्य जगहों पर हिंदुओं के साथ जो बर्बरता हुई, क्या उसे भूला दिया गया? या बाकी जगहों पर हुई विभत्स घटनाओं का कोई रिकॉर्ड ही नहीं है, उन्हें इतिहास में दर्ज ही नहीं किया गया? आखिर यह साजिश किसने की? मोपला हिंदू नरसंहार अपने संपूर्ण रूप में इतिहास में दर्ज नहीं है तो क्यों नहीं है? क्या खेल रचा गया कि आम लोगों तक इन सारी घटनाओं की जानकारी ही नहीं है?

जवाब: थुवूर के कुएँ पर काटे गए हिंदुओं की जो घटना है, वो अपने आप में अकेला नहीं है। थुवूर के जैसी कम से कम 4-5 घटनाएँ (हिंदुओं को काट कर कुएँ में डालने की) हैं।

पुतुमना (Puthumana) करके एक एरिया है। यहाँ एक नंबूदरी परिवार है। इस परिवार के कुएँ के अंदर भी इतनी ही बड़ी संख्या में हिंदुओं को काट कर फेंक दिया गया है। इसी तरह से एक जगह पर हिंदुओं की त्वचा उतार कर उन्हें मारा गया। मल्लपुरम में एक जगह है – चंगुविट्टी (Changuvetty)। मालाबार एरिया के मलयालम भाषा-शैली में चंगु का मतलब है – गला। विट्टी का मतलब है – काटा। जहाँ हिंदुओं का गला काटा गया, उस जगह का नाम भी चंगुविट्टी – मतलब गला काटा। यह जगह अभी भी है।

मतलब रिकॉर्ड की नजर से देखें तो बहुत सारे हैं। सच हालाँकि यह भी है कि मोपला हिंदू नरसंहार को एक प्रतीक के रूप में थुवूर के कुएँ पर काटे गए हिंदुओं को दिखाया गया, उसका वर्णन किया गया। पिछले साल जब मोपला हिंदू नरसंहार का 100 साल हुआ तो दिल्ली में भी हिंदू संगठनों ने थुवूर के कुएँ वाली बर्बर घटना को ही प्रतीक के तौर पर पेश किया। हम लोग भी तब दिल्ली के हिंदू संगठनों के साथ थे। इसका मतलब लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है कि मोपलाओं ने हिंदुओं के साथ जो किया, वो सिर्फ और सिर्फ किसी थुवूर के कुएँ तक सीमित है।

यह 1766 के मैसूर आक्रमण से शुरू हुआ। इतने बड़े कालखंड में अगर आप देखेंगे तो उस पूरे क्षेत्र में जहाँ-जहाँ आक्रमण और आतंक हुए, जितनी भी हत्याएँ की गईं… उनमें एक-समानता देखने को मिलती है। ठीक वैसा ही अभी ISIS के हमलों में देखने को मिल रही है। वहाँ भी गला काट कर कुएँ में डालने का प्रयोग चल रहा है। केरल में तब ऐसा ही हुआ था।

थुवूर के कुएँ पर काटे गए हिंदुओं वाली घटना अकेली घटना नहीं है। कम से कम 4 जगहों पर जो इस जघन्य घटना को अंजाम दिया गया, उन सभी जगहों पर मैं खुद गया हूँ। आपको जान कर आश्चर्य होगा कि अभी भी उस क्षेत्र में कई ऐसे कुएँ हैं, जो मुस्लिमों के कब्जे में हैं। इन कुओं का इतिहास भी इतना ही रक्तरंजित रहा है। हिंदू अभी भी प्रयास कर रहे हैं कि इन कुओं को वापस लिया जाए, खरीदा जाए ताकि एक मेमोरियल या स्मृति-स्मारक के जैसा कुछ बनाया जा सके।

सवाल: अब इतिहास से निकल कर हम आते हैं वर्तमान समय की राजनीति पर। 1921 से लेकर अब तक अंग्रेज, आजादी, कॉन्ग्रेस, वामपंथी, भाजपा… सबकी सरकार देश ने देखी। केरल में भी सत्ता परिवर्तन होते रहे हैं। वामपंथियों की अलग-अलग धड़ें वहाँ भी हैं। फिर ऐसा क्या है कि मोपला हिन्दू नरसंहार को CM विजयन अभी भी कृषि विद्रोह ही बताते हैं?
क्या इसे हम राजनीतिक दृष्टि से स्टॉकहोम सिंड्रॉम की तरह देख सकते हैं? और इसके एक कदम आगे बढ़ कर सोचें तो क्या सामाजिक स्तर पर भी इस स्टॉकहोम सिंड्रॉम वाली बात हो गई है? क्योंकि समाज ही अंततः राजनीति का निर्माण करता है। तो क्या यह स्टॉकहोम सिंड्रॉम वहाँ के समाज में घर कर चुका है?

जवाब: सही में है। खास तौर पर वामपंथियों के अंदर में। शुरुआती दौर को देखें तो कम से कम 1940 तक… वामपंथी लोगों की लिखी किताबों (ईएमएस नंबूदरीपाद सहित लोगों की पुस्तकों में) में मोपला हिंदू नरसंहार को साफ-साफ मजहबी दंगे कहा गया है। ईएमएस नंबूदरीपाद ने अपनी आत्मकथा में उल्लेख किया है कि उनके भी घर पर हमले हुए थे। उन्होंने लिखा है कि कैसे उनके घर के एक मैनेजर (जोकि एक नायर थे) ने उनको और उनके एक परिवार वाले को पकड़ कर घर के पीछे के दरवाजे से भगाया। यहाँ तक लिखा है कि अगर उस मैनेजर ने दीवार फाँद कर उन दोनों को घर से नहीं निकाला होता तो दोनों जिंदा नहीं बचते।

ईएमएस नंबूदरीपाद के अलावे भी बाकी सभी वामपंथियों ने 1940 से पहले एक बार भी “किसान विद्रोह” जैसे शब्द का प्रयोग मोपला हिंदू नरसंहार के लिए नहीं किया है। सार्वजनिक तौर पर भले ही यह बात वो लोग बहुत कड़े शब्दों के साथ नहीं रखे लेकिन यह एक मजहबी दंगा था, इस पर सबका एक जैसा मत था। किसी ने भी इसे किसान आंदोलन या मजदूर-जमींदार संघर्ष का नाम नहीं दिया।

1940 के बाद लेकिन वामपंथियों की सोच इसको लेकर बदली। बंगाल की वामपंथी पार्टी ने मोपला हिंदू नरसंहार को लेकर एक पर्चा छपवाया। उस पर्चे में ‘मोपला विद्रोह’ शब्द का प्रयोग किया गया था। इसके पीछे इन लोगों ने अपनी वामपंथी सोच के तहत ‘मोपला विद्रोह’ को एक वर्ग-विद्रोह की संज्ञा दी, मजदूर-जमींदार संघर्ष का नाम दिया। शक्ति-संपत्ति से मजबूत लोगों के खिलाफ भूमिहीन लोगों की क्रांति इसे बताया गया। उस पर्चे में यही सिद्धांत गढ़ा गया था कि केरल में जो हुआ, वो एक वर्ग-विद्रोह था।

1940 के बाद इस वर्ग-विद्रोह सिद्धांत को इन वामपंथी लोगों ने और भी जोर से चलाया। इसके पीछे इनकी मंशा कुछ और नहीं बल्कि राजनीतिक शक्ति को लेकर थी। 1957 आते-आते ये वामपंथी लोग चुनाव में भाग लेने लगे। केरल में मुस्लिम वोट एकतरफा वोट-बैंक रहा है। इस बात को ध्यान रखिए कि इनका 1% वोट-बैंक भी अगर इधर से उधर हो गया तो केरल के चुनाव में बहुत बड़ा फर्क ला देता है।

केरल के चुनावी-समीकरण को आप किसी और राज्य से तुलना नहीं कर सकते हैं। इसका कारण है – अल्पसंख्यक वोट-बैंक का होना। इन अल्पसंख्यक वोट-बैंक में भी खासकर मुस्लिम वोट-बैंक का रोल वहाँ खासा मायने रखता है। इसी मुस्लिम वोट-बैंक को साथ में रखने के लिए वामपंथियों ने यह सिद्धांत गढ़ा। जो मुस्लिम आतंकी थे, उनको इन लोगों ने उच्च स्तर पर ले जाकर बिठा दिया। कहानी वही गढ़ी – इन लोगों ने संघर्ष किया और संघर्ष के पीछे का कारण था कि हिंदू लोगों ने इन लोगों को सताया, इन पर हमले किए और इन्होंने प्रतिक्रिया में संघर्ष का रास्ता चुना।

वामपंथियों ने इस झूठ को ऐसे गढ़ा। झूठ कैसे? क्योंकि मोपला हिंदू नरसंहार में जिन हिंदुओं को मारा गया, उनमें एक भी जमींदार ऐसे नहीं थे, जो बड़े जमींदार थे। मरे कौन? सामान्य मजदूरों को मारा गया। पिछड़े जाति के लोगों को मारा गया। सही में जो उस वक्त जमींदार थे, वो मुस्लिम जमींदार थे और उन लोगों ने ही मोपला हिंदू नरसंहार का प्लान किया।

लकड़ियों के बड़े-बड़े व्यापारी और जमींदार उस समय मुस्लिम लोग ही थे। कोयाप्पथोड (Koyappathod) नाम का एक परिवार है। अति-धनाढ्य परिवारों में से एक है। 1921 के अगस्त महीने के बाद गिरफ्तार किए गए लोगों में इस परिवार के नेता लोग भी थे। इसके अलावा एक और आश्चर्यजनक बात है। 1919 में ऑल इंडिया खिलाफत कमिटी का जिसने आयोजन किया था, वो उस समय के भारत का सबसे अमीर लकड़ी व्यापारी था। नाम था – जान मोहम्मद चौटानी (Mian Mohammad Jan Mohammad Chotani)। नीलंबूर टीक की लकड़ी के लिए ये लकड़ी व्यापारी सबसे ज्यादा केरल के ऊपर आश्रित थे।

एक उदाहरण और है। केरल में उस समय बहुत अधिक संपत्ति वाले ढेर सारे मुस्लिम परिवार थे। इनमें एक था – चोव्वाकरन मूसा (Chovvakkaran Moosa)। मूसा नाम से वो प्रसिद्ध थे, चोव्वा उनके जगह का नाम है। उस समय मक्का में भी इनके जमीन-जायदाद थे। उस समय सिर्फ तीन भारतीयों के जमीन-जायदाद मक्का में थे। एक – हैदराबाद के निजाम, दूसरे तमिलनाडु के आरकोट नवाब और तीसरे केरल के मालाबार के मूसा।

क्या मूसा गरीब थे? क्या वो किसान थे? क्या वो भूमिहीन थे? क्या उनके परिवार वालों पर आक्रमण हुए थे? मोपला हिंदू नरसंहार के पहले ही मूसा की मृत्यु हो चुकी थी लेकिन उनके परिवार वाले तो थे। मूसा के परिवार वालों पर किसी भी तरह का आक्रमण नहीं हुआ था। इसका मतलब क्या हुआ? सबसे बड़े व्यापारी और श्रीमंत लोग मुस्लिम थे, उन्हीं लोगों ने मोपला हिंदू नरसंहार की प्लानिंग की, आक्रमण किया। इसमें किसान-विद्रोह या वर्ग-विद्रोह जैसी कोई बात ही नहीं थी।

मोपला हिंदू नरसंहार में सबसे ज्यादा हत्या पिछड़े जाति वर्ग के हिंदुओं की हुई। सबसे पहला जो आक्रमण हुआ था, वो इल्वा (Ilhava) समुदाय के ऊपर हुआ था। इसके बाद बुनकरों की एक कॉलनी के ऊपर हमला किया गया था। आश्चर्य तो यह कि एक ऐसे क्षेत्र में भी हमला किया गया, जहाँ ईसाई समुदाय रहते थे। क्रिस्तु दास नाम के एक शिक्षक थे। तीन बेटे सहित उनकी भी हत्या कर दी गई थी।

जिस जगह इतना सब कुछ हुआ, वहाँ की घटनाओं को छिपाने के लिए बाद में झूठी कहानी गढ़ी गई। वामपंथ अपने आप में एक बहुत बड़ा झूठ है। इस तरह के झूठ वो गढ़ते हैं, बताते हैं और फिर इन्हीं झूठ के सहारे वो पनपते हैं… और चारों ओर प्रसारित भी करते हैं।

सवाल: अगला और आखिरी सवाल आपके अभी तक के दिए सभी जवाबों में से है। आपके जवाब से निकल कर आया कि कॉन्ग्रेस के नेता सच्चाई से मुँह मोड़ रहे थे, वो भी तब जब उनके ही साथी नेता जमीनी सच्चाई की बर्बरता को बता रहे थे, आकर देखने की अपील कर रहे थे। आपके एक जवाब से यह भी साफ हुआ कि वामपंथी नेता हिंदू नरसंहार को वर्ग-संघर्ष या किसान-विद्रोह की झूठी संज्ञा दे रहे थे। आपके जवाब से यह भी स्पष्ट है कि मानसिकता के स्तर मुस्लिम किसी के साथ सौहार्द्र के साथ नहीं रह सकते, फिर चाहे वो हिंदू हो या ईसाई। इसके लिए आपने ईसाई परिवार के नरसंहार का उदाहरण भी दिया। मतलब मुस्लिम अपने वर्चस्व को स्थापित करने की मानसिकता को साथ लेकर चलते हैं।
अब सवाल यह है कि इन सारे जवाबों के बावजूद सही इतिहास अगर आम जनता अभी तक नहीं जान पाई है, तो क्या हम जैसे चंद लोग ही सिर्फ इस सच्चाई पर बातचीत करते रह जाएँगे? जबकि हकीकत में इन सारी घटनाओं को सूचिबद्ध किया जाना चाहिए, इतिहास चाहे वो कितना ही रक्तरंजित क्यों न हो, उसे पढ़ाया जाना चाहिए। ऐसे इतिहास को पढ़ा जाना चाहिए ताकि भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति नहीं हो। ऐसे में क्या आपको नहीं लगता है कि अब समय आ गया है कि इतिहास को देश की जनता ठीक वैसे ही पढ़े-देखे जैसा वो घटित हुआ है? और अगर ऐसा है तो क्या कोई कमिटी गठित की जानी चाहिए, जो मोपला हिन्दू नरसंहार के हर एक पहलू, हर एक घटना को रिकॉर्ड करे, उसे पाठ्य-पुस्तकों में जगह दिलवाए, इतिहास में दर्ज करे? पाठ्य-पुस्तकों में मोपला हिन्दू नरसंहार की बात इसलिए हो ताकि हर एक विद्यार्थी यह जान सके कि आखिर हुआ क्या था? ताकि यह किसी न्यूज डिस्कशन का हिस्सा भर बन कर न रह जाए? ऐसी कमिटी बनने की संभावना कितनी है और कितनी इसकी जरूरत है?

जवाब: जरूर। अब बहुत ही उचित समय है ऐसी कमिटी के बनने की। इस कमिटी में अच्छे इतिहासकार होने चाहिए। केरल के एक अच्छे इतिहासकार एमजीएस नारायण अभी भी हैं। सत्य के पक्ष में रहने वाले इतिहासकारों (निष्पक्ष कहना सही नहीं होगा) का इस कमिटी में होना आवश्यक है। अच्छे कानूनविदों की भी इस कमिटी में जगह होनी चाहिए। अच्छे शिक्षाविदों का होना भी जरूरी है।

साथ ही साथ सबसे जरूरी बात – मोपला हिन्दू नरसंहार में मार डाले गए लोगों के परिवार-बच्चे अभी भी जिंदा हैं, कइयों के तो पोते-पोतियों तक जिंदा हैं अभी भी। इनमें से कई बहुत अच्छे पढ़े-लिखे भी हैं। क्योंकि वो एक प्रकार से रिफ्यूजी बन कर त्रावणकोर गए। वहाँ जाकर उन्होंने त्रावणकोर राजा की सहायता से, वहाँ के हिंदू समाज की सहायता से और सबसे महत्वपूर्ण आर्य समाज की सहायता (केरल में आर्य समाज ने आकर बहुत ही अच्छे-अच्छे काम किए) से उन लोगों ने संघर्षों के साथ जीवन को आगे बढ़ाया, पढ़-लिख कर आगे बढ़े। तो ऐसे लोगों का भी स्थान उस कमिटी में होना चाहिए। खूब अच्छे ढंग से अध्ययन और सब तरह के डॉक्यूमेंट सामने लाने की आवश्यकता है।

मोपला हिन्दू नरसंहार के लिए कमिटी बनाने का प्रयास इसके 50 साल होने पर किया गया था। फिर जब 75 साल हुए 1996 में, तब भी यह प्रयास किया गया था। वर्तमान में भी कुछ लोग इसके लिए प्रयास कर रहे हैं। व्यक्तिगत स्तर या किसी संगठन के स्तर पर इसको लेकर प्रयास करने से ज्यादा मेरा निवेदन केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकार तक से है। इस मामले में दोनों सरकारों को हस्तक्षेप करना चाहिए। यही भविष्य के लिए सही होगा। आने वाली पीढ़ी जो सच को पढ़ना चाहेगी, उसके लिए सही होगा।

आपको आश्चर्य होगा यह जानकर कि मोपला हिन्दू नरसंहार में जिन मुस्लिम आक्रांताओं ने हिंदुओं के साथ रक्तपात किया, बर्बरता की, हत्याएँ कीं… उन्हीं के परिवार वालों (वंशजों) को अभी भी पेंशन इस नाम पर दी जा रही है कि वो तो स्वतंत्रता सेनानी थे। इस विडंबना को समझिए कि जिनके दादा-परदादा मार डाले गए, उनके वंशज निरीह होकर इनके ही हत्यारों के वंशजों को पेंशन लेते देख रहे हैं और कुछ कर नहीं पा रहे। इस ऐतिहासिक भूल को ठीक करना ही होगा।

1766 से लेकर 1921 तक का जो नरसंहार, मतलब हिंदुओं की जो हत्याएँ हुईं, उसको लेकर ‘मोपला नरसंहार’ या ‘हिंदू नरसंहार’ की संज्ञा के साथ घोषणा करने की आवश्यकता है। इस घोषणा से क्या होगा, वो एक दूसरा विषय है लेकिन इस घोषणा की आवश्यकता है। अभी तक मोपलाओं द्वारा की गई इस बर्बरता को नरसंहार माना ही नहीं गया है, घोषणा नहीं की गई है। होलोकॉस्ट मतलब यहूदियों का नरसंहार, रवांडा का नरसंहार, अर्मेनियाई नरसंहार… यह सबको मालूम है। इसी तरह मोपलाओं के द्वारा किए गए हिंदू नरसंहार के बारे में सबको पता चलना चाहिए। इसके लिए मोपला हिंदू नरसंहार की बात करते हुए एक केंद्र या एक स्मारक खड़ा किया जाना चाहिए।

मेरी यह सलाह है कि मोपला हिंदू नरसंहार की बात करते हुए जो केंद्र/स्मारक बने, वो मल्लपुरम जिले में बने। इनके अलावा मोपला हिंदू नरसंहार पर बनी कमिटी जो भी डॉक्यूमेंट रिकॉर्ड करे, उसे इतिहास की किताबों में जगह मिले। 1921 में सही मायने में क्या हुआ था, इसे जानने की जरूरत सबको है। अगर ऐसा नहीं होता है तो यह एक घोर पाप होगा। आने वाली पीढ़ी को झूठ बताना अपने आप में एक घोर पाप है।

अब वो वक्त आ गया है, जब मोपला हिंदू नरसंहार का सच सबको बताया जा सके, पढ़ाया जा सके। इसलिए केंद्र और राज्य सरकार से अपनी माँगों को मैं एक-एक कर फिर से दोहराता हूँ:

(i) मोपला हिंदू नरसंहार के सच को जानने के लिए एक कमिटी का गठन किया जाए।
(ii) कमिटी जिन-जिन घटनाओं को रिकॉर्ड करे, हर एक की अच्छी तरह से डॉक्यूमेंटेशन की जाए।
(iii) होलोकॉस्ट और दुनिया के तमाम नरसंहार की तर्ज पर मोपला हिंदू नरसंहार की संज्ञा देते हुए इसकी घोषणा करना।
(iv) मोपला हिंदू नरसंहार की बात करते हुए एक स्मारक बनाना चाहिए।
(v) कमिटी के अध्ययन और रिसर्च के बाद जो भी सच सामने आए, उस मोपला हिंदू नरसंहार की बातों को इतिहास के पाठ्य-पुस्तक में जगह मिले।

हैदराबाद: 14 साल के लड़के का मदरसे में यौन शोषण, शिकायत के बाद केयरटेकर कासिम गिरफ्तार

हैदराबाद के एक मदरसे से 14 साल के लड़के के यौन शोषण का मामला सामने आया है। पीड़ित बच्चे ने आरोप लगाया है कि मदरसे का केयरटेकर उसका लंबे समय से यौन शोषण कर रहा था। साथ में उसे धमकी देता था कि अगर उसने किसी को ये सब बताया तो अंजाम बुरा होगा।

बच्चा डर के कारण अब तक चुप रहा। लेकिन हाल में उसने इस संबंध में घर में परिजनों को बताया। बात पुलिस तक पहुँची। शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने केयरटेकर को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है।

मीडिया रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि आरोपित जब मदरसे के एक अन्य लड़के को भी उसी तरह धमकी दे रहा था तब पीड़ित ने सुन लिया था। इसके बाद, पीड़ित ने चुप न रहने की ठानी। घर आकर उसने अपने साथ हो रहे यौन शोषण के बारे में अपनी चाची को बताया। और फिर, चाची ने यह पूरा घटनाक्रम पीड़ित की माँ को बताया जो गल्फ कंट्री में काम करतीं हैं। इसके बाद थाने में शिकायत हुई।

इस केस में संतोष नगर पुलिस का कहना है, आरोपित कासिम पिछले दो महीने से लड़के का यौन शोषण कर रहा है। मदरसे में पीड़ित लड़के के अलावा कई अन्य छात्र भी रह रहे हैं। आरोपित लड़के को अपने कमरे में ले जाता था और उसके साथ मारपीट करता था।

रिपोर्ट के अनुसार पीड़ित की चाची की शिकायत के बाद संतोष नगर पुलिस ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO) अधिनियम के तहत मामला दर्ज करते हुए आरोपित कासिम को गिरफ्तार कर लिया है। वहीं, पीड़ित लड़के को मेडिकल जाँच के लिए सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

हैदराबाद में दक्षिण क्षेत्र के डीसीपी पी साई चैतन्य ने मदरसे में नाबालिग के साथ हुए यौन शोषण के मामले में बताते हुए कहा है, “आरोपित को गिरफ्तार कर पॉक्सो अदालत में पेश किया गया है। जहाँ से कोर्ट ने आरोपित को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है।”