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‘बैन किया फिर भी अवॉर्ड के लिए बार-बार करते हैं कॉल’: कंगना रनौत को फिल्मफेयर ने ‘नॉमिनेशन’ से निकाला, हिरोइन ने कहा- केस करूँगी

अभिनेत्री कंगना रनौत (Kangana Ranaut) और फिल्मफेयर के बीच ठन गई है। कंगना के आरोपों के बाद फिल्मफेयर (Filmfare) ने उन्हें अवॉर्ड नॉमिनेशन से बाहर कर दिया है। जवाब में अभिनेत्री ने कहा है कि वे चुप नहीं बैठेंगी और फिल्मफेयर पर केस करेंगी।

कंगना रनौत ने कहा था कि इनकार किए जाने के बाद भी फिल्मफेयर की तरफ से कॉल कर उन्हें अवॉर्ड लेने के लिए बुलाया जा रहा है। उन्होंने रविवार (21 अगस्त 2022) को इंस्टाग्राम स्टोरी में लिखा, “मैं 2014 से फिल्मफेयर जैसी अनैतिक, भ्रष्ट और पूरी तरह से अनुचित प्रथाओं से दूर हूँ। लेकिन इस साल अवॉर्ड इवेंट में भाग लेने के लिए मुझे उनके फोन आ रहे हैं। वे मुझे ‘थलाइवी (Thalaiva)’ के लिए अवॉर्ड देना चाहते हैं।”

उन्होंने आगे लिखा है, “मैं यह जानकर हैरान हूँ कि फिल्मफेयर की तरफ से मुझे अब भी नॉमिनेट किया जा रहा है। लेकिन इस तरह की भ्रष्ट प्रथाओं को प्रोत्साहित करना मेरी गरिमा और काम की गरिमा के खिलाफ है।”

कंगना रनौत की इंस्टाग्राम स्टोरी का स्क्रीनशॉट

इसके जवाब में फिल्मफेयर ने एक बयान जारी किया है। इसमें कहा है, “फिल्मफेयर अवार्ड्स को लेकर कंगना की गई गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणियों को देखते हुए हम फिल्म थलाइवी के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के तौर पर उनका नॉमिनेशन वापस ले रहे हैं।” बयान में कहा गया है, “फिल्मफेयर इंडस्ट्री के कलाकारों को 60 साल से मंच दे रहा। टैलेंट का सम्मान करता आया है। इसमें पूरी पारदर्शिता बरती जाती है। फिल्मफेयर के एग्जीक्यूटिव एडिटर ने परंपरा के अनुसार कंगना को नॉमिनेशन के बारे में सूचित किया था।”

साथ ही फिल्मफेयर का कहना है कि कंगना को किसी अवॉर्ड के लिए चुने जाने या कार्यक्रम में परफॉर्म करने के लिए नहीं कहा गया था। बयान के साथ वह संदेश भी साझा किया गया है जो कथित तौर पर कंगना को भेजा गया था। इसमें नॉमिनेशन की बधाई देते हुए उनसे कार्यक्रम में भाग लेने का आग्रह किया गया है।

इसके बाद कंगना ने एक अन्य इंस्टाग्राम स्टोरी में कहा, “फिल्मफेयर ने आखिरकार सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के रूप में मेरा नॉमिनेशन वापस ले लिया है। मैं उन सभी का धन्यवाद करती हूँ जिन्होंने भ्रष्ट सिस्टम के खिलाफ इस लड़ाई में मेरा समर्थन किया है। मेरा प्रयास इन अनैतिक प्रथाओं को समाप्त करने और इस तरह के दुर्भावनापूर्ण अवॉर्ड शो को रोकने के लिए है। अदालत में मिलते हैं फिल्म फेयर।”

शिक्षा वाला ‘हैंडसम’, शराब भी देखता है: अरविंद केजरीवाल को डिप्टी के लिए चाहिए ‘भारत रत्न’, खुद को यूनेस्को से धरोहर भी घोषित करवा सकते हैं

दिल्ली की राजनीति गर्म है। स्वास्थ्य मंत्री मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में जेल में है। ये अलग बात है कि अपनी ही सरकार के अस्पताल में वो बीमारी के बहाने मौज काट रहा है। तो अब उप-मुख्यमंत्री (जो शिक्षा एवं आबकारी विभाग भी सँभालते हैं) मनीष सिसोदिया को ‘भारत रत्न’ देने की माँग मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कर डाली है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि प्रशांत भूषण, कुमार विश्वास, आशुतोष और योगेंद्र यादव जैसों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाने वाले ‘सड़जी’ अपने डिप्टी का बचाव नहीं, उन्हें ट्रोल कर रहे हैं।

अरविंद केजरीवाल के मुखारविंद से ताज़ा वाणी यह निकली है कि आज़ादी के बाद जो कोई नहीं कर पाया, वैसा काम मनीष सिसोदिया ने कर दिया है। उन्होंने पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था उन्हें ही सौंप देने की वकालत करते हुए कह दिया कि ऐसे व्यक्ति को तो ‘भारत रत्न’ मिलना चाहिए। केजरीवाल की बात सही है। NYT में किसी के बारे में खबर छप जाए, उसके बाद उस व्यक्ति के लिए तो ‘भारत रत्न’ जैस अवॉर्ड भी छोटा है। है न? गनीमत है कि अरविंद केजरीवाल ने खुद को UNESCO का धरोहर घोषित करने और और मनीष सिसोदिया को नोबेल देने की माँग नहीं की।

मनीष सिसोदिया को ‘भारत रत्न’ मिलना चाहिए, क्योंकि दिल्ली के सरकारी स्कूलों की खबर अमेरिका में छपवाने की कला सबके पास थोड़े ही न है? उन्हें ‘भारत रत्न’ इसीलिए भी मिलना चाहिए, क्योंकि उनमें विज्ञापन को खबर में बदल देने की अद्भुत क्षमता है। आप दुनिया भर की केमिस्ट्री की पुस्तकें उठा लीजिए, ऐसा ‘रिएक्शन’ कहीं नहीं मिलेगा। दिल्ली से विज्ञापन चलता है, वो अमेरिका में खबर बन कर निकलता है। बीच में कोई चमचा पत्रकार कैटेलिस्ट का काम करता है।

लेकिन, यहाँ एक पेंच है। मनीष सिसोदिया को ‘भारत रत्न’ मिलना चाहिए, लेकिन उनसे बड़े-बड़े धुरंधर पहले से बैठे हुए हैं। जब मनीष सिसोदिया को ये अवॉर्ड मिल जाएगा, तो क्या इस क्षेत्र में उनसे भी बड़े-बड़े महारथी मुलायम सिंह और लालू यादव जैसों के लिए ये बेइज्जती वाली बात नहीं होगी? वरिष्ठों का ये अनादर नहीं कहा जाएगा? सिसोदिया के तो अभी 7 साल हुए हैं सत्ता में, यहाँ तो दशकों सत्ता भोग कर एक से एक घोटाले करने वाले बैठे हुए हैं।

‘लड़के हैं, गलती हो जाती है’ – एक वीभत्स बलात्कार की घटना के बाद इस तरह का बयान देने वाले मुलायम सिंह यादव, जिनका घर व्हाइट हाउस से भी ज्यादा व्हाइट है, उन्हें क्यों ‘भारत रत्न’ से महरूम रखा जाए?ये ये कोई बयान थोड़े ही न है, ये तो एक ‘सामाजिक सिद्धांत’ है जिसका प्रतिपादन उन्होंने किया है। वैसे भी मुलायम सिंह क्या बोलते हैं इसे समझ लेना ही अपने-आप में बड़ी बात है। वो एन्क्रिप्टेड भाषा में बोलते हैं, ऐसे ‘वैज्ञानिक’ को क्यों न मनीष सिसोदिया से पहले तरजीह दी जाए।

या फिर बिहार वाले ‘चारा चोर’ लालू यादव को क्यों छोड़ दिया जाए? लोग चावल-दाल खाते हैं, उन्होंने तो पशुओं का चारा खा कर इतिहास रच रखा है। अभिनेत्री के गाल जैसी सड़क बनाने जैसा वादा कोई साधारण व्यक्ति कर सकता है क्या? जिस स्कूटर पर 3 आदमी भी ठीक से नहीं बैठ सकते, ऐसे ही स्कूटर पर 400 साँड दिल्ली-हरियाणा से बिहार ढोए गए थे। सैकड़ों टन चारा भी स्कूटर से ही ढोया गया। ऐसा कमाल दिखाने वाले लालू यादव को क्यों न मिले देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान?

और मनीष सिसोदिया की उपलब्धियाँ अभी हैं ही क्या? दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था अभी पूरी तरह बर्बाद थोड़े न हुई है, जैसा उत्तर प्रदेश और बिहार में क्रमशः मुलायम और लालू ने किया था। अभी तो और प्रगति करनी है सिसोदिया को। अभी तो दिल्ली के 1027 में से मात्र 824 ही स्कूलों के पास प्रधानाध्यापक नहीं हैं, क्या इसे अब 100% सफलता कहा जा सकता है? अभी तो NCPCR को हाइजीन और सुरक्षा से जुड़ी समस्याएँ ही मिली हैं सिर्फ दिल्ली के स्कूलों में, क्या इसमें और सुधार कर के सारे स्कूलों को गंदगी का भण्डार नहीं बनाना पड़ेगा?

मनीष सिसोदिया सचमुच ‘हजारों में अकेला’ हैं। शायद एकमात्र ऐसा व्यक्ति, जो शिक्षा के साथ-साथ शराब भी देखता है। फ़िलहाल तो दिल्ली के सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी के 527, गणित के 148, हिंदी के 332, राजनीतिक विज्ञान के 313, होम साइंस के 694, इतिहास के 372, और सोसियोलॉजी के 133, यानी कुल मिला कर शिक्षकों के 4154 पद ही खाली हैं, इन्हें बढ़ाना पड़ेगा या नहीं (मार्च 2022 के आँकड़े)? बिना बढ़ाए कैसे मनीष सिसोदिया मुलायम-लालू से आगे निकलेंगे?

वैसे अरविंद केजरीवाल इससे पहले सत्येंद्र जैन के लिए भी ‘पद्म विभूषण’ की माँग कर चुके हैं। ऐसे में तो सारे नागरिक सम्मानों में दिल्ली के मंत्रियों के लिए आरक्षण होना चाहिए। या फिर अरविंद केजरीवाल से ये सवाल भी पूछा जा सकता है कि अगर मनीष सिसोदिया ‘भारत रत्न’ के योग्य हैं तो उन्हें सम्मानित करने की शुरुआत खुद अरविंद केजरीवाल अपनी CM वाली कुर्सी उन्हें देकर क्यों नहीं कर रहे? ‘क्रांतिकारी’ पत्रकारों को ‘हैंडसम’ को सीएम बनाने के लिए अभियान शुरू करना चाहिए। फ़िलहाल डर ये है कि केजरीवाल कल को खुद को ‘भगवान’ ही न घोषित कर डालें, अब यही बाकी है बस।

‘पाकिस्तान की बुराई वाली फिल्में पसंद नहीं’: क्या सच में सलमान खान ने ऐसा कहा? – व्हाट्सएप्प पर वायरल है यह खबर

सोशल मीडिया पर बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान को लेकर एक मैसेज वायरल हो रहा है। मैसेज के साथ-साथ एक स्क्रीनशॉट भी वायरल हो रहा है, जो प्रतीत होता है कि सलमान खान के इंटरव्यू का है। इसका शीर्षक है – ‘वे फ़िल्में मुझे पसंद नहीं, जिनमें पाकिस्तान को बुरा कहा जाता है’। ये किसी अख़बार की कटिंग की तस्वीर लगती है। साथ में सीढ़ियों पर शर्ट-जीन्स में बैठे सलमान खान की तस्वीर भी लगी हुई है।

बॉलीवुड का तो काफी पहले से हिन्दू विरोधी रवैया रहा है, लेकिन हाल के दिनों में रणबीर कपूर की ‘शमशेरा’ और आमिर खान की ‘लाल सिंह चड्ढा’ जैसी बड़ी फिल्मों के फ्लॉप होने के बाद ऐसा लग रहा है कि हिन्दू अब अपनी भावनाएँ आहत होते हुए नहीं देखेंगे और अपने देवी-देवताओं व संस्कृति का मजाक बर्दाश्त नहीं करेंगे। तीनों खान बॉयकॉट के निशाने पर हैं। सलमान खान फ़िलहाल ‘भाईजान’ की शूटिंग में व्यस्त हैं। टाइगर सीरीज की तीसरी फिल्म भी आ रही है।

सोशल मीडिया पर सलमान खान को लेकर वायरल हो रहा ये मैसेज

आइए, अब हम आपको बताते हैं कि इसकी सच्चाई क्या है। असल में इस वायरल खबर में देखने पर ही पता चल जाता है कि ये इंटरव्यू कब का है। इसमें स्पष्ट रूप से तारीख़ 21 जुलाई, 2015 लिखा हुआ है। हालाँकि, छोटे-छोटे अक्षरों में हने के कारण उस पर ध्यान नहीं जाता। अतः, ये इंटरव्यू 7 साल पुराना है। याद कीजिए, सलमान खान की फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ इस इंटरव्यू के 4 दिन पहले ही रिलीज हुई थी, 17 जुलाई को।

जैसा कि हम जानते हैं, ‘बजरंगी भाईजान’ ने भले ही दुनिया भर में 969 करोड़ रुपए (इसमें से 311 करोड़ रुपए चीन में) का कारोबार कर लिया हो, लेकिन इसमें पाकिस्तान का जम कर महिमामंडन किया गया था। तभी वहाँ फिल्म ने 54 करोड़ रुपए कमा डाले थे। फिल्म में पाकिस्तान के मौलवी को सबकी मदद करने वाला दिखाया गया है, वहाँ के एक पत्रकार को जान पर खेल कर एक हिन्दू की मदद करने वाला बताया गया है और साथ ही वहाँ की एक बच्ची को दिखाते हुए एक प्रकार की सहानुभूति पैदा करने की कोशिश की गई है।

चूँकि, पाकिस्तान में भी ये फिल्म रिलीज हुई थी, सलमान खान ने पाकिस्तान की तारीफ़ भी की। उक्त वायरल खबर ‘नवभारत टाइम्स (NBT)’ को दिए गए उनके इंटरव्यू का है, जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें पाकिस्तान के खिलाफ बोलने और इसे लेकर राजनीति करने वालों से चिढ़ है। उन्होंने कहा था कि पहले भारत के लोग पाकिस्तान जाते थे और उनकी मेजबानी की तारीफ़ करते थे, जिससे रिश्ते बढ़ते थे। अतः, ये खबर सच है लेकिन 7 साल पुरानी है।

सलमान खान ने तब ये भी कहा था कि अगर लड़ने का इतना ही शौक है तो नेता गोली खाएँ, जवानों को क्यों आगे किया जाता है? सलमान ने बताया था कि उन्हें ऐसी फ़िल्में बिलकुल ही पसंद नहीं हैं, जिनमें पाकिस्तान को बुरा दिखाया जाता है। उदाहरण देते हुए उन्होंने पूछा था कि क्या भारत के बारे में कोई कुछ बुरा बोले तो हमलोग सुन सकते हैं? याद कीजिए कि ‘बजरंगी भाईजान’ में सलमान खान का किरदार एक शाकाहारी हनुमान भक्त ब्राह्मण का होता है, लेकिन इसमें चिकन खाने की तारीफ में एक गाना भी ठूँस दिया गया था।

‘इमरान खान को छुआ तो इस्लामाबाद पर कब्जा करेंगे’ : पाकिस्तान में पूर्व PM पर ‘आतंकवाद’ की धारा में केस दर्ज, समर्थकों ने दी धमकी

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के ऊपर शनिवार (20 अगस्त 2022) को एक रैली के दौरान महिला जज और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को धमकाने का आरोप लगा है। पुलिस ने उनके विरुद्ध एंटी टेररिज्म एक्ट की धारा 7 के अंतर्गत केस दर्ज किया है। आतंकवाद से जुड़े केस में गिरफ्तारी न हो इसके लिए इमरान खान ने इस्लामाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। वहीं उनके समर्थकों ने उन्हें बचाने के लिए धरना देने का ऐलान किया है।

पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, याचिका में इमरान खान ने कहा है कि उनकी निडर आलोचना, भ्रष्टाचार और भ्रष्ट राजनेताओं के खिलाफ उठाई आवाज के कारण वो सत्ताधारी पार्टी के निशाने पर हैं। इसी दुर्भावनापूर्ण मकसद से उनके खिलाफ एक झूठी शिकायत को दर्ज किया गया है।

याचिका में बताया है कि सरकार ने इमरान खान को फर्जी केस मे गिरफ्तार करवाने के लिए हर हद्द पार कर दी है। इमरान की बेल याचिका के अनुसार, उनके ऊपर सरकार अब तक 17 एफआईआर दायर करवा चुकी है। इनमें हालिया तो राजनीति से प्रेरित है जिसमें उनको गलत मंशा से और फर्जी ढंग से फँसाया गया है।

याचिका में बेल की माँग करते हुए कहा गया कि इमरान किसी भी रूप में गवाहों को, सबूतों को नुकसान नहीं पहुँचाएँगे। उनका नाम अब तक कभी किसी अपराध में नहीं रहा। अगर इस मामले में भी सहयोग चाहिए होगा तो वह पूरा सहयोग देंगे।

इमरान ने महिला जज और पुलिस अधिकारियों को दी चेतावनी

बता दें कि इमरान खान के ऊपर एफआईआर इस्लामाबाद के थाना मरगला में हुई है। इसमें बताया गया कि इमरान ने इस्लामाबाद के आईजी, डीआईजी को धमकी देते हुए कहा था- “हम आपको नहीं छोड़ेंगे।” इसके अलावा महिला जज जेबा चौधरी को भी गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी गई थी।

इमरान ने उनको कहा था, “जेबा तैयार रहें, हम आपके खिलाफ कार्रवाई करेंगे।”

एफआईआर में इन्हीं बयानों को आधार बनाकर कहा गया कि इमरान ने पुलिस को आतंकित करने का प्रयास किया है और इसी वजह से उनके ऊपर एंटी टेररिज्म एक्ट के तहत केस दर्ज हुआ है। इस बीच पीटीआई के नेता इमरान के समर्थन में आ गए हैं। उन्होंने एफआईआर के विरोध में स्ट्राइक का ऐलान किया है। ट्विटर पर ट्रेंड चल रहा है। कहा जा रहा है कि अगर इमरान खान गिरफ्तार हुए तो ये रेडलाइन होगी। वो लोग सत्ताधारी पार्टी को हटाकर इस्लामाबाद पर कब्जा कर लेंगे। पुलिस को चेतावनी दी गई है कि वो इस राजनैतिक जंग में दूरी बनाए रखें।

क्या लोकसभा चुनाव में मोदी से मुकाबिल होंगे केजरीवाल: ‘मिशन 2024’ AAP का हसीन ख्वाब या विपक्षी गोलबंदी रोकने की BJP की चाल

आम आदमी पार्टी (AAP) तोड़कर भाजपा में आ जाओ, सारे ED/CBI के केस बंद करवा देंगे।

दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने यह दावा सोमवार (22 अगस्त 2022) को ट्वीट कर किया। वे दिल्ली के दारू घोटाले को लेकर इन दिनों चर्चा में है। सीबीआई की प्राथमिकी में मुख्य आरोपित हैं।

आंदोलन से निकलकर नवंबर 2012 में आम आदमी पार्टी अस्तित्व में आई। 2014 के आम चुनावों तक लोकतांत्रिक सवालों को उठाती रही। पहली बार दिल्ली की सत्ता में भी इसके ही दम पर आई। लेकिन इसके बाद से वह वादे, दावे और फ्री फोकट की राजनीति में सिमटी हुई है। सीबीआई छापों और लगातार अनियमितताओं के सामने आने के बाद पार्टी के ओर से दावों की भरमार लग गई है। इनमें से एक दावा 2024 का चुनाव बीजेपी बनाम आप (BJPvsAAP) होने का भी है।

आप के दावों से इतर ‘द न्यू बीजेपी’ के लेखक प्रोफेसर नलिन मेहता का एक लेख टाइम्स ऑफ इंडिया में छपा है। इसमें उन्होंने 2047 तक भारतीय राजनीति में बीजेपी का दबदबा बने रहने का अनुमान लगाया है। बीजेपी को चुनौती देने की स्थिति में कॉन्ग्रेस के आने की उन्हें उम्मीद नहीं दिखती। उनका मानना है कि राष्ट्रीय स्तर पर यह जगह AAP ले सकती है।

बीजेपी और आप के बीच डील?

ऐसे में यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या 2024 के आम चुनावों को लेकर बीजेपी और आप के बीच पर्दे के पीछे कोई डील हुई है? बिहार में नीतीश कुमार ने पाला बदला है। ममता बनर्जी विपक्षी एकजुटता के प्रयास कर रही हैं। दक्षिण से इस बार तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर अचानक से विपक्षी गोलबंदी को लेकर मुखर हुए हैं। एनडीए को कई सहयोगी छोड़ चुके हैं। क्या इन कारणों ने बीजेपी को मजबूर किया है कि AAP को दृश्य में रखा जाए? इसके पीछे दो कारण बताए जाते हैं। पहला, चुनावों से पहले विपक्षी एकता को फुस्स कर देना। दूसरा, विपक्षी राजनीति के नाम पर फुटेज उस आम आदमी पार्टी के हिस्से में धकेलना जो दिल्ली और पंजाब के बाहर अब तक असर नहीं छोड़ पाई है।

राहुल गाँधी से भी पीछे अरविंद केजरीवाल

इंडिया टुडे और सी वोटर ने हाल ही में एक सर्वे किया है। इस सर्वे का सार यह है कि 2024 में भी केंद्र की सत्ता में बीजेपी की वापसी की राह मुश्किल नहीं दिखती। 53 फीसदी भारतीय आज भी चाहते हैं कि नरेंद्र मोदी फिर से प्रधानमंत्री बनकर लौटें। लेकिन इसी सर्वे से यह बात भी सामने आई है कि विपक्षी नेताओं में सबसे आगे राहुल गाँधी हैं। उन्हें 9 फीसदी भारतीय अगले प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाहते हैं। आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल केवल 7 फीसदी लोगों की पसंद हैं।

इस सर्वे से दो बातें स्पष्ट हैं। पहला, विपक्ष का कोई चेहरा दूर-दूर तक मोदी के पास भी नहीं दिखता। दूसरा, राष्ट्रीय स्तर पर केजरीवाल की साख राहुल गाँधी से भी कम है। जब मुकाबले में कोई चेहरा दूर-दूर तक दिखे ही नहीं तो फिर किसी चेहरे (वोटकटुवा) को प्लांट करने की बीजेपी की मजबूरी समझ नहीं आती। जाहिर है यह डील की जगह आम आदमी पार्टी के प्रोपेगेंडा का प्रलाप है।

AAP की औकात कितनी है?

हिमाचल प्रदेश और गुजरात में विधानसभा चुनाव होने हैं। मीडिया का एक वर्ग दोनों जगहों पर ‘आप’ का उभार बता रहा है। इस उभार की असलियत इन राज्यों में चुनाव होने और उनके नतीजे आने के बाद सामने आ जाएँगे। लेकिन दिल्ली और पंजाब को छोड़कर अब तक जिन राज्यों में चुनाव हुए हैं, कहीं ‘आप’ असर छोड़ने में सफल नहीं रही है। उत्तराखंड, गोवा जैसे कई राज्यों में चुनाव से पहले ‘आप’ के असर को उसी तरह प्रचारित किया गया था, जैसा अभी हिमाचल और गुजरात के मामले में देखने को मिल रहा है।

जब 2014 के आम चुनाव हुए थे तब AAP दूसरे राजनीतिक दलों से अलग दिखती थी। आरोपों से दामन दागदार नहीं था। पार्टी के भीतर की लड़ाई सामने नहीं आई थी। माहौल ऐसा बनाया जाता था कि भारतीय राजनीति के सारे हरिश्चंद्र आम आदमी पार्टी की छतरी तले ही खड़े हैं। उस साल आम चुनावों में खुद केजरीवाल मोदी को चुनौती देने बनारस चले गए थे। देश की कुछ सीटों पर ऐसे लोगों को चुनाव लड़ाया गया था, जिनकी अपने-अपने क्षेत्र में प्रतिष्ठा थी। जब नतीजे आए तो AAP को केवल पंजाब से चार सीटें मिली। केजरीवाल खुद हारे। उस दिल्ली में भी पार्टी का खाता नहीं खुला, जहाँ लोकसभा चुनावों से पहले हुए विधानसभा चुनाव में उसने शानदार प्रदर्शन किया था और 2014 के आम चुनावों के बाद हुए विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत हासिल की।

2019 के जब आम चुनाव हुए तो एक बार फिर दिल्ली की 7 में एक भी सीट आप के खाते में नहीं गई। पंजाब में उसकी सीटें घटकर 1 हो गई। उसे दिल्ली में 18 फीसदी ही वोट मिले। कॉन्ग्रेस को उससे ज्यादा वोट मिले थे।

लेकिन 2020 में दिल्ली में फिर से हुए विधानसभा चुनाव में AAP को जबर्दस्त जीत मिली। अब पंजाब में भी उसकी सरकार है। पार्टी गठन के बाद से यही दो राज्य हैं जहाँ आम आदमी पार्टी की राजनीतिक हैसियत है। इन दो राज्यों को मिलाकर लोकसभा की सीटें होती हैं- 20। जिस पार्टी की औकात ही लोकसभा चुनावों में 20 सीटों पर टक्कर देने की हो, उस पर भला बीजेपी जैसी पार्टी क्यों दॉंव लगाएगी जिसके लिए 2024 अभी से एक जीती हुई बाजी जैसी लग रही है? यह भी ध्यान रखने योग्य बात है कि सीटों के लिहाज से ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, स्टालिन, केसीआर, नवीन पटनायक, अखिलेश यादव जैसे कई क्षेत्रीय क्षत्रप हैं जिनकी औकात 20 से कहीं ज्यादा सीटों पर बीजेपी को चुनौती देने की है।

बीजेपी के मुकाबले कौन होगा?

अब सवाल है कि यदि AAP का दावा प्रोपेगेंडा भर है तो बीजेपी के मुकाबले 2024 में कौन होगा। जाहिर है राष्ट्रीय स्तर पर आज भी मामला बीजेपी बनाम कॉन्ग्रेस ही है। लेकिन कॉन्ग्रेस में अब अकेले बीजेपी को चुनौती देने की ताकत नहीं बची है। लिहाजा कुछ ‘वरिष्ठ पत्रकार’ जिनकी दुकानदारी कॉन्ग्रेस के करीब होने के ही नाम पर चलती है, वे निजी बातचीतों में दावा करते हैं कि सोनिया गाँधी प्रधानमंत्री के चेहरे के तौर पर किसी क्षेत्रीय नेता को आगे कर सकती हैं। नीतीश कुमार की पलटी को भी इससे जोड़कर देखा जा रहा। यह भी कहा जाता है कि ममता बनर्जी के चेहरा बनने के प्रयासों को कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का समर्थन नहीं है। यानी, 2024 से पहले विपक्ष एक मंच पर आ भी पाएगा या नहीं, यह फिलहाल तय नहीं है।

हालाँकि यह स्पष्ट है कि विपक्षी गोलबंदी की पूरी योजना में केजरीवाल को चेहरा बनाने का कोई सीन नहीं है। इसके उलट AAP और उसके नेता को विपक्षी गोलबंदी की राह में एक रोड़े की तरह देखा जा रहा है। मनीष सिसोदिया के घर पर छापे के बाद कॉन्ग्रेस का प्रदर्शन इसका ही हिस्सा है। कॉन्ग्रेस के सहयोगी राजद के सांसद मनोज झा ने तो यहाँ तक कह दिया था कि AAP के खिलाफ केंद्रीय एजेंसियों के इस्तेमाल की विपक्षी नेताओं ने निंदा की है। लेकिन एजेंसियों का यही दुरुपयोग जब विपक्ष के अन्य नेताओं के खिलाफ होता है तो आम आदमी पार्टी चुप रहती है।

दावों के पीछे AAP की क्या चाल?

AAP की राजनीतिक हैसियत, संगठन का विस्तार और मजबूती ऐसी नहीं है कि वह राष्ट्रीय स्तर पर 2024 के लिए बीजेपी की किसी ‘छिपी योजना’ का हिस्सा बनने के योग्य हो। फौरी तौर पर आम आदमी पार्टी का यह दावा अपनी सरकार की कारगुजारियों को दबाने और खुद को पीड़ित दिखाने का प्रयास लगता है। साथ ही यह पार्टी के तौर पर विस्तार की AAP की लंबी रणनीति का भी हिस्सा हो सकता है। राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की सबसे महत्वपूर्ण पार्टी कॉन्ग्रेस की जगह लेकर ही बनी जा सकती है। इसके लिए कॉन्ग्रेस को कमतर, उसके नेता को नकारा बताते रहना जरूरी है। आम आदमी पार्टी दावों के जरिए उसी रास्ते पर चलती दिख रही। यदि वह ऐसा करने में कामयाब रही तो कुछ दशकों के बाद उस स्थिति में हो सकती है, जहाँ उसके होने का अनुमान नलिन मेहता ने लगाया है।

भारत सरकार के बड़े नेता की हत्या की साजिश का पर्दाफाश, रूस में धराया ISIS आतंकी: तुर्की में हुई थी ट्रेनिंग, करने वाला था आत्मघाती हमला

रूस ने एक आत्मघाती हमलावर को दबोचा है, जो भारत आकर आतंकी हमला करने की फिराक में था। गिरफ्तार आतंकवादी का ताल्लुक खूँखार आतंकी संगठन ISIS से है। जानकारी मिली है कि उक्त आतंकी भारत सरकार में शामिल किसी नेता की हत्या के लिए साजिश रच रहा था। रूस की ‘फ़ेडरल सिक्योरिटी सर्विस फॉर रुस्सियन फेडरेशन (FSB)’ ने इस सम्बन्ध में जानकारी दी है। रूस फ़िलहाल अपने पड़ोसी यूक्रेन के साथ युद्ध में व्यस्त है, जो लंबा खिंचता जा रहा है।

कई देशों की तरह रूस में भी ISIS पर प्रतिबंध है। रूस की संस्था ने बताया कि उक्त आतंकी मध्य एशिया के एक देश का रहने वाला है, जो भारत के सत्ताधारी के एक नेता की हत्या के लिए भारत जा रहा था। उसने आत्मघाती हमले के जरिए इस हत्याकांड को अंजाम देने की साजिश रची थी। इस प्रक्रिया के तहत उसे खुद के शरीर में भी विस्फोटक फिट करना था। उक्त आतंकी की ट्रेनिंग तुर्की में हुई थी, जो भारत विरोधी गतिविधियों का लगातार गढ़ बना हुआ है।

ISIS ने उसकी भर्ती ‘सुसाइड बॉम्बर’ के रूप में की थी। तुर्की की राजधानी इस्ताम्बुल में इस साजिश को लेकर कई बार आतंकियों के साथ व्यक्तिगत बैठकें भी हुई थीं। साथ ही वो टेलीग्राम एप के जरिए अपने आकाओं से जुड़ा हुआ था। उसने ISIS के आमिर नाम के आतंकी आका के प्रति वफादारी की कसम खाई थी। इसके बाद उसे रूस जाने का आदेश मिला। साजिश थी कि वहाँ कागजी कार्यवाही पूरी कर के वो भारत आता और हाई प्रोफाइल हत्याकांड को अंजाम देता।

तुर्की आजकल कट्टर इस्लामी गतिविधियों का गढ़ बन गया है और वहाँ के राष्ट्रपति रजब तैयब इरदुगान भी खलीफा बनने की चाहत में कश्मीर पर पाकिस्तान समर्थक बयान देते रहते हैं। उनकी पत्नी से बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान ने भी मुलाकात की थी। भाजपा से निलंबित की जा चुकीं नूपुर शर्मा पर पैगंबर मुहम्मद पर टिप्पणी का आरोप लगने के बाद उनकी हत्या के लिए भी अलकायदा मुस्लिमों को उकसा चुका है नूपुर शर्मा की हत्या की साजिश रचने वाले भी गिरफ्तार हुए हैं।

कभी ‘किसान’-कभी मुसलमान, जिंदगी दिल्ली-NCR वालों की करते हलकानः विरोध-प्रदर्शन के नाम पर शाहीनबाग से शुरू हुई अराजकता का अंत कहाँ

दिल्ली में एक बार फिर से किसानों का आंदोलन शुरू हो गया है। जंतर-मंतर पर हुए महापंचायत में 60 से भी अधिक किसान संगठनों का जुटान हुआ। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान से किसानों को बुलाया गया है। परिणाम ये हुए कि गाजीपुर बॉर्डर, सिंघु बॉर्डर और टिकरी बॉर्डर पर बैठ कर एक बार फिर से वो दिल्ली को घेरने लगे हैं। जन्माष्टमी और वीकेंड की छुट्टियों के बाद लोग जब काम पर निकले तो उन्हें कठिन स्थितियों का सामना करना पड़ा।

दिल्ली-NCR में अधिकतर लोग ऐसे हैं, जो कामकाजी हैं और रोज सुबह काम पर जाते हैं, शाम को दफ्तर से लौटते हैं। बच्चें जिन स्कूलों में पढ़ते हैं, वहाँ भी वो स्कूल की गाड़ी से आते-जाते हैं। ऐसे में आप समझ सकते हैं कि रोजमर्रा के जीवन को लोगों को किस परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। किसान भी गाड़ियों में सवार होकर पहुँच रहे हैं, जिससे दिल्ली के विभिन्न इलाकों के लोग ट्रैफिक जाम की समस्या का सामना कर रहे हैं।

‘किसान महापंचायत’ की वजह से पुलिस को कई रूट्स को डायवर्ट करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। इन प्रदर्शनकारियों की माँगें क्या हैं, ये भी स्पष्ट नहीं है। लेकिन हाँ, दिल्ली के लोगों को ज़रूर परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। आंदोलन जितने दिन चलेगा, उतने दिन उन्हें दिक्कतें आती रहेंगी। अजीब बात ये है कि कोई पुलिस-प्रशासन अथवा सरकार इन लोगों की मदद करने की स्थिति में नहीं होगी। किसान भीड़तंत्र के सहारे सामानांतर व्यवस्था चलाते रहेंगे।

दिल्ली सरकार प्रदर्शनकारियों को देती है सुविधाएँ, केंद्र बना रहता है सुस्त: भुगतती है जनता

दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में AAP की सरकार है, जो इस तरह के प्रदर्शनकारियों को सारी सुविधाएँ मुहैया कराने के लिए कुख्यात है। इससे पहले जब लगभग एक साल तक दिल्ली की सीमाओं पर किसानों का जुटान हुआ था और लोगों की समस्याएँ सुनने वाला कोई नहीं था, तब यही केजरीवाल सरकार इन प्रदर्शनकारियों के लिए भोजन-पानी और शौचालय की व्यवस्था करने में लगी हुई थी। एम्बुलेंस से लेकर डॉक्टर्स तक, सबका इंतजाम दिल्ली सरकार ने किया।

वहीं केंद्र सरकार का रवैया भी इस मामले में सुस्त रहता है। क्योंकि अगर दिल्ली पुलिस बल प्रयोग करेगी तो दुनिया भर में तमाम लेख लिख कर उसे बदनाम किया जाएगा, इसीलिए वो भी सुस्त बनी रहती है। हमने शाहीन बाग़ आंदोलन के समय भी ऐसा ही देखा था। जब हजारों गाड़ियों का ट्रैफिक जाम लगा करता था, तब भी शाहीन बाग़ में CAA के विरोध में डटीं खातूनों को वहाँ से हटाने के लिए किसी प्रकार का प्रयास पुलिस-प्रशासन ने नहीं किया।

इससे बिगड़ा किसका? केंद्र सरकार को अंत में हार कर कृषि सुधार के लिए आए तीनों कानून वापस लेने पड़े। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी घोषणा की। वहीं CAA को लेकर अब तक नियम-कानून नहीं बनाए गए। केंद्र सरकार योजना लेकर आई, भीड़तंत्र ने दिल्ली को बंधक बना कर रखा, केंद्र सरकार झुक कर पलट गई। इस पूरी पटकथा में जो असली पीड़ित हैं, उनका तो कोई नाम तक नहीं लेता। वही लोग, जो दिल्ली में टैक्स देते हैं। जिनसे सरकारों को कमाई होती है।

शाहीन बाग़ के कारण हुआ नुकसान हम भूल गए?

हमारी याददाश्त खासी कमजोर है, तभी हम भूल जाते हैं कि जब कोरोना वायरस के खतरे से निपटने के लिए पूरा देश ‘जनता कर्फ्यू’ का पालन कर रहा था, तब शाहीन बाग़ में मुस्लिम महिलाएँ बैठी हुई थीं और संक्रमण के उस दौर में भी नियम-कानून की धज्जियाँ उड़ाई जा रही थीं। आम जनता को इस प्रदर्शन के खिलाफ सड़क पर उतरना पड़ा, लेकिन आम लोगों की सुनता कौन है। यहाँ जो जाति-मजहब के आधार पर भीड़ जुटा ले, सरकार और पुलिस-प्रशासन वहीं झुकता है।

उस इस्लामी प्रदर्शन के दौरान नोएडा और कालिंदी कुंज को जोड़ने वाली सड़क को जाम रखा गया था, कई महीनों तक। इससे अस्पताल जाने-आने वाले एम्बुलेंसों से लेकर रोजमर्रा के काम के लिए आवागमन करने वाले लोगों और स्कूली बच्चों तक को रोज कई घटों का अतिरिक्त सफर करना पड़ा। एम्बुलेंस के अस्पताल पहुँचने में देरी के कारण मौतों की भी खबर आई। पुलिस भी धरनास्थल के आसपास बैरिकेडिंग लगा देती है, जिससे आम लोग वहाँ से गुजर नहीं पाते। यही पुलिस अतिक्रमणकारियों के सामने हाथ खड़े कर देती है।

विरोध प्रदर्शन तो ‘किसान आंदोलन’ के विरुद्ध भी किया था स्थानीय लोगों ने सिंघु सीमा पर, लेकिन उनकी आवाज़ क्या सुनी किसी ने? गाँव वालों ने ‘सिंह बॉर्डर खाली करो’ का पोस्टर लेकर उन किसानों के खिलाफ विरोध जताया। बदले में किसानों ने भी आमने-सामने आकर नारेबाजी शुरू कर दी। अब आम आदमी अपना काम-धाम छोड़ कर इन नकली किसानों की तरह कहीं धरना नहीं दे सकता महीनों, इसीलिए शायद उसकी नहीं सुनी जाती।

आम लोगों की कोई नहीं सुनता, जनता ही सहती है हजारों करोड़ रुपयों का नुकसान

अब कोई आम आदमी सारे काम छोड़ कर विरोध करने ही निकल पड़ेगा तो उसके परिवार का पेट कौन पालेगा? जब देश भर में कोरोना के नियम-कानूनों के तहत मास्क न पहनने वालों और मेडिकल दिशानिर्देशों का उल्लंघन उड़ाने वालों से जुरमाना वसूला जा रहा था और लॉकडाउन में बाहर निकलने वाले पुलिसिया कार्रवाई का सामना कर रहे थे, दिल्ली की सीमाओं पर हजारों प्रदर्शनकारी इन्हीं नियम-कानूनों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाते हुए बेख़ौफ़ बैठे हुए थे। उन्हें रोकने की हिम्मत किसी में नहीं थी।

इन आन्दोलनों से देश को जो वित्तीय घाटा होता है, उसकी यदा-कदा चर्चा भी हो जाती है तो लोगों की परेशानियों पर कोई बात नहीं करता। ‘किसान आंदोलन’ के कारण प्रतिदिन 3500 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ, ये अंदाज़ा ‘भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग मंडल एसोचैम (ASSOCHAM)’ ने लगाया था। कई राज्यों की अर्थव्यवस्थाएँ इससे प्रभावित हुई थीं। टेक्सटाइल्स, ऑटो कंपोनेंट, बाइसाइकल्स और स्पोर्ट उत्पादों जैसी इंडस्ट्री अपने निर्यात ऑर्डर को पूरा नहीं कर पाई और सप्लाई चेन पर आसान पड़ने के कारण खुदरा सब्जियों-फलों के दाम बढ़ गए। भुगता किसने फिर से? जनता।

ये आंदोलन भड़काऊ भासनों और कट्टरपंथ का अड्डा भी बनते हैं, जिसके कारण दंगे होते हैं और फिर आम जनता ही भुगतती है। शाहीन बाग़ आंदोलन के बाद दिल्ली में दंगे हुए और दर्जनों हिन्दू मारे गए, कई बेघर हुए। ‘किसान आंदोलन’ के दौरान वहाँ हत्याओं की खबरें आती रहीं। वहीं शाहीन बाग़ के कारण 250 दुकानें भी बंद रहीं। इलाके को 150 करोड़ रुपयों का अनुमानित घाटा सहना पड़ा। इस प्रदर्शन का असर 20 लाख लोगों पर पड़ा। फिर आंदोलन होंगे, फिर जनता परेशानी सहेगी, सरकार अड़ेगी और फिर पीछे हटेगी, जनता इन सबके बीच फिर पिसेगी।

गुलाम नबी की राह पर आनंद शर्मा भी: कहा- 51 साल से कॉन्ग्रेस में हूँ फिर भी हो रहा अपमान, सोनिया गाँधी के जवाब का आज भी इंतजार

हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले कॉन्ग्रेस को झटका देते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा ने रविवार (21 अगस्त 2022) को पार्टी की चुनाव संचालन समिति के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। आनंद शर्मा ने इस्तीफे की वजह लगातार हो रहे अपमान और बहिष्कार को बताया। आनंद शर्मा ने सोनिया गाँधी को इस्तीफा भेजने के बाद इसे लेकर एक के बाद एक, दो ट्वीट भी किए।

आनंद शर्मा ने ट्वीट कर कहा कि उन्होंने हिमाचल प्रदेश चुनाव के लिए कॉन्ग्रेस की संचालन समिति का अध्यक्ष पद भारी मन से छोड़ा है। स्वाभिमानी होने के कारण लगातार बहिष्कार और अपमान को देखते हुए उनके पास इस्तीफा देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि वह जीवनभर कॉन्ग्रेस सदस्य रहेंगे।

उन्होंने अपने इस्तीफे को लेकर हिंदुस्तान टाइम्स से बातचीत की। इस दौरान उन्होंने अपने अपमान और बहिष्कार को लेकर बात करते हुए कहा कि हिमाचल कॉन्ग्रेस के स्टीयरिंग कमेटी का प्रमुख बनाने के बावजूद आज तक उनकी भूमिका स्पष्ट नहीं की गई।

उन्होंने कहा कि बीते दिनों दिल्ली और शिमला में हिमाचल चुनाव को लेकर पार्टी की कोर ग्रुप की महत्वपूर्ण बैठकों हुईं। लेकिन उसे उनमें नहीं बुलाकर उनका अपमान किया गया जिससे उनके स्वाभिमान को ठेस पहुँची।

इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने 51 साल पहले पार्टी को ज्वाइन किया था और आज उन्हें सिर्फ इसलिए अपमानित किया जा रहा है, क्योंकि उन्होंने और गुलाम नबी आजाद ने G23 समिति के रूप में कुछ ऐसे मुद्दों को उठाया था जो कॉन्ग्रेस के नवीनीकरण और पुनरुद्धार के लिए जरूरी हैं। शर्मा ने कहा कि वह जमीन से जुड़े नेता हैं। उन्हें बदनाम किया जा रहा है।

यह पूछे जाने पर कि क्या अब तक किसी ने उनसे संपर्क किया? उन्होंने कहा, “नहीं, मुझसे कौन बात करेगा। मेरे जैसी वरिष्ठता वाले को अब तक कोई सम्मान नहीं दिया गया।” उन्होंने कहा कि अब तक पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने भी उनके पत्र का जवाब नहीं दिया है।

शर्मा ने कहा, “उनके पास मेरा लैटर है, मैं उनके जवाब का इंतजार कर रहा हूँ। मुझे यकीन है कि यह उनकी सूची में शामिल होगा। लेकिन यह दुखद है कि उन्होंने यह स्थिति तैयार होने दी। मैं उनका सम्मान करता हूँ।”

जब उनसे इसको लेकर सवाल किया गया कि कुछ कॉन्ग्रेसी का कहना है कि वह इसलिए नाराज हैं, क्योंकि उन्हें राज्यसभा में विस्तार नहीं मिला। इस पर शर्मा ने कहा कि यह बेहद अपमान की बात है कि इस बात को राज्यसभा से जोड़ा जा रहा है। उन्होंने चुनाव लड़कर इसे हासिल किया, न कि ये उन्हें किसी ने दिया।

गौरतलब है कि आनंद शर्मा का इस्तीफा जी-23 समूह के एक अन्य वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद द्वारा हाल ही में जम्मू-कश्मीर में अभियान समिति के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के तुरंत बाद आया है। गुलाम नबी आजाद और आनंद शर्मा दोनों जी-23 समूह के प्रमुख नेता हैं जो पार्टी नेतृत्व के फैसलों के आलोचक रहे हैं।

‘अब शुरू होगा अन्ना का दौर’: तेलंगाना आए अमित शाह से मिले RRR के स्टार, फैन्स बोले- ये शुरुआत है, जूनियर NTR होंगे अगले CM

साउथ के मशहूर एक्टर्स में से एक जूनियर एनटीआर की हाल में हैदराबाद में गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात हुई। इसकी तस्वीरें अमित शाह ने अपने ट्विटर पर शेयर की। उन्होंने बताया कि जूनियर एनटीआर के साथ उनकी मुलाकात बहुत अच्छी रही।

शाह ने ट्वीट में लिखा, “एक बहुत ही प्रतिभाशाली अभिनेता और तेलुगु सिनेमा के रत्न, जूनियर एनटीआर के साथ हैदराबाद में अच्छी बातचीत हुई।”

जूनियर एनटीआर ने इस ट्वीट की प्रतिक्रिया में अमित शाह का धन्यवाद दिया और बताया कि उनको गृह मंत्री से मिलकर बहुत अच्छा लगा।

बता दें कि जूनियर एनटीआर साउथ के मशहूर हीरो में से एक हैं। उन्होंने हाल में आरआरआर जैसी सुपरहिट फिल्म दी है। इसके अलावा वह धार्मिक वेशभूषा के कारण भी चर्चा में रहते हैं। तेलंगाना चुनावों को नजदीक देख लोग अमित शाह के साथ उनकी तस्वीरों पर अलग-अलग प्रतिक्रिया दे रहे हैं। वही साझा तस्वीरों को धड़ाधड़ लाइक मिल रहे हैं। खबर लिखने तक शाह द्वारा शेयर तस्वीरों को 65 हजार से ज्यादा लोग लाइक कर चुके थे।

कुछ लोगों एनटीआर की सभ्यता देख उनकी तारीफ कर रहे हैं। उन्हें तेलुगु सिनेमा और भारतीय सिनेमा का सितारा कह रहे हैं। ‘जय NTR- जय NTR’ लिख रहे हैं। तो कुछ लोग इसे राजनीति से जोड़ देख रहे हैं।  यूजर हैरानी से पूछ रहे हैं, “क्या जूनियर एनटीआर के राजनीति में आने के कोई चांस हैं?”

अरुण सिंह कहते हैं, “अगले मुख्यमंत्री जूनियर एनटीआर”

एक यूजर कहता है, “भारतीय राजनीति का नया दौर शुरू होने जा रहा है।” वहीं कुछ इसे कह रहे हैं ‘अन्ना का दौर शुरू होने वाला है। ‘

एक यूजर कहता है, “ये तो बस शुरुआत है। ये आदमी हमारी उम्मीदों से भी ऊँची उड़ान को भरेगा।”

करण लिखते हैं, “एक शेर दूसरे शेर से मिल रहा है।”

उल्लेखनीय है कि जूनियर एनटीआर टीडीपी संस्थापक दिवंगत एनटी रामाराव के पोते हैं। आखिरी बार वह चुनावों के समय 2009 में सक्रिय देखे गए थे। इसके बाद उन्होंने राजनीति से दूरी बना ली। लेकिन अब अमित शाह और उनकी मुलाकात के बाद लोगों को लग रहा है कि आने वाले समय में वह बीजेपी का साथ देंगे।

UP में रोहिंग्या और उनके मददगारों की हो रही तलाश: रिपोर्ट में बताया- नकली दस्तावेजों से बने भारत के वोटर, ATS की पड़ताल से सामने आया फर्जीवाड़ा

बिहार की पटना पुलिस के बाद अब उत्तर प्रदेश ATS की लखनऊ यूनिट ने घुसपैठियों को लेकर अहम खुलासा किया है। एटीएस जाँच में रोहिंग्या मुस्लिमों का फर्जी मतदाता पहचान-पत्र बनवाने की बात सामने आई है। 

हिंदुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक रोहिंग्या मुस्लिमों ने फर्जी डॉक्यूमेंट्स के आधार पर वोटर कार्ड बनवा लिया है। इससे यह भारत के मतदाता बन गए हैं। इससे इनकी पहचान काफी मुश्किल हो गई है। इसका खुलासा तकरीबन एक साल पहले पकड़े गए रोहिंग्या से पूछताछ के दौरान हुआ। लखनऊ एटीएस ने इन घुसपैठियों के पास से भारत का फर्जी वोटर कार्ड बरामद किया था। इसके बाद अब प्रदेश भर में अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्या की तलाश की जा रही है। उनका रिकॉर्ड निकाला जा रहा है, ताकि इन घुसपैठियों और उनके मददगारों की पहचान की जा सके।

उल्लेखनीय है कि जून 2021 में रोहिंग्या मुस्लिमों को भारत लाने वाले गिरोह के मास्टरमाइंड नूर आलम को यूपी एटीएस ने साथी समेत गाजियाबाद के डासना से गिरफ्तार किया था। नूर आलम फर्जी दस्तावेजों पर रोहिंग्या को भारत लाता था। एटीएस ने आरोपितों के कब्जे से आधार कार्ड, पैन कार्ड, मोबाइल और 70 हजार रुपए बरामद किया था।

नूर आलम से पहले 6 जनवरी 2021 को एटीएस ने उसके साले अजीजुल्लाह को पकड़ा था। अजीज फर्जी दस्तावेजों के सहारे बीते 20 साल से भारत में रह रहा था। वहीं 28 फरवरी 2021 को मोहम्मद फारूक और हसन को अलीगढ़ से गिरफ्तार करने के बाद फारूक के भाई को 1 मार्च को उन्नाव से गिरफ्तार किया गया था। शाहिद को फर्जी भारतीय दस्तावेजों और 5 लाख रुपए के साथ पकड़ा गया था। मीडिया रिपोर्ट में बताया गया था कि इन घुसपैठियों को प्रतिबंधित सिमी समर्थित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) का संरक्षण प्राप्त है।

PFI की संलिप्तता हाल ही में बिहार से भी सामने आई है। पटना पुलिस की जाँच में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया द्वारा अपने संगठन में भर्ती करने के लिए रोहिंग्या मुस्लिमों और बांग्लादेशी घुसपैठियों का आधार कार्ड बनवाने की बात सामने आई थी। पटना पुलिस ने इस बात की भी आशंका जताई थी कि पीएफआई आधार कार्ड बनवाने के लिए फर्जी कागजात तैयार करवाने के साथ ही ऐसे तरीके अपना रहा है, जिससे घुसपैठियों की पहचान बेहद मुश्किल होगा। न्यूज़ 18 की रिपोर्ट में इस कड़ी में बिहार के सीमांचल क्षेत्र खासतौर से किशनगंज, दरभंगा, कटिहार, मधुबनी, सुपौल और पूर्णिया जिलों को टारगेट करने की बात कही गई थी।