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भारत-म्यांमार-थाईलैंड हाईवे चीन-पाकिस्तान के CPEC को देगा मात, लुक-ईस्ट नीति को मिलेगी मजबूती: जानें 24 साल के गतिरोध को कैसे तोड़ रही मोदी सरकार

दुनिया की सियासत आजकल इतनी तेज रफ्तार से भाग रही है कि पलक झपकते ही पुराने समीकरण ध्वस्त हो जाते हैं और नए गठजोड़ आकार ले लेते हैं। आज पूरी दुनिया का ध्यान मिडिल ईस्ट के तनाव, ईरान और इजरायल के बीच छिड़ी जंग और पश्चिमी देशों की अंदरूनी उठापटक पर टिका हुआ है। लेकिन इसी वैश्विक शोर-शराबे के बीच भारत के पूर्वी छोर पर एक ऐसी खामोश मगर बेहद आक्रामक और रणनीतिक बिसात बिछाई जा रही है, जो आने वाले समय में पूरे एशिया की भूगोल और अर्थव्यवस्था को हमेशा के लिए बदलकर रख देगी।

अभी कुछ दिन पहले ही म्यांमार के राष्ट्रपति अपने पहले आधिकारिक विदेश दौरे पर किसी और देश जाने के बजाय सीधे भारत की धरती पर कदम रखते हैं। नई दिल्ली के गलियारों में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और म्यांमार के शीर्ष नेतृत्व के बीच आमने-सामने की बातचीत हुई, तो कई ऐसे मुद्दों पर जमी हुई बर्फ पिघली जो सालों से ठंडे बस्ते में अटके पड़े थे। इस रणनीतिक और कूटनीतिक मुलाकात ने भारत की ‘लुक ईस्ट’ और ‘एक्ट ईस्ट’ पॉलिसी में एक नया बारूद भरने का काम किया है, जिसकी गूंज बीजिंग से लेकर इस्लामाबाद तक सुनाई दे रही है।

इस पूरी भू-राजनीतिक हलचल के केंद्र में एक ऐसा महा-प्रोजेक्ट है, जो चीन के सबसे महात्वाकांक्षी और प्रचारित प्रोजेक्ट यानी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के घमंड को चूर-चूर करने का दम रखता है। हम बात कर रहे हैं इंडिया-म्यांमार-थाईलैंड हाईवे की, जिसे संक्षेप में आईएमटी हाईवे भी कहा जाता है। यह सिर्फ कोलकाता से बैंकॉक को जोड़ने वाली कोई साधारण पक्की सड़क नहीं है, बल्कि यह भारत का वो ब्रह्मास्त्र है जो दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के विशाल बाजारों में भारत की आर्थिक धाक जमाने की नीव रखने जा रहा है।

क्या है IMT हाईवे और इसका पूरा मास्टरप्लान?

अगर आप भारत का नक्शा ध्यान से देखें, तो हमारे पूर्वोत्तर के राज्य चारों तरफ से जमीन से घिरे हुए हैं और उनके पास अपना कोई स्वतंत्र समुद्र तट नहीं है। अब तक की स्थिति यह रही है कि अगर पूर्वोत्तर के राज्यों से कोई सामान विदेश भेजना हो या देश के बाकी हिस्सों में लाना हो, तो उसे ‘चिकन नेक’ कहे जाने वाले बेहद संकरे सिलीगुड़ी कॉरिडोर से घुमाकर कोलकाता बंदरगाह तक लाना पड़ता है। इसके बाद ही उसे पानी के जहाज के जरिए दुनिया भर में भेजा जाता है, जिससे समय और पैसा दोनों पानी की तरह बहते हैं।

लेकिन प्रकृति ने भारत को पूर्व की तरफ एक और ऐसा रास्ता दिया है जो सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय बाजारों का द्वार खोलता है। मणिपुर की सीमा सीधे म्यांमार से लगती है और म्यांमार की भौगोलिक सीमाएँ आगे बढ़कर सीधे थाईलैंड को छूती हैं। भारत ने इसी भूगोल का रणनीतिक फायदा उठाने के लिए आज से लगभग चौबीस साल पहले यानी साल 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी प्लान तैयार किया था, जिसे आज हम कोलकाता-बैंकॉक एक्सप्रेसवे के नाम से भी जानते हैं।

कोलकाता से बैंकॉक का सफर कार से पूरा करने का रूट मैप

यह अंतरराष्ट्रीय हाईवे कुल 1,360 किलोमीटर लंबा है और इसका पूरा खाका इस तरह तैयार किया गया है कि यह भारत के पूर्वोत्तर को दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रवेश द्वार बना दे। यह पूरा रूट कोलकाता से शुरू होकर पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी, असम के गुवाहाटी और नागालैंड के कोहिमा शहर से गुजरता हुआ मणिपुर के सीमावर्ती और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कस्बे मोरेह तक पहुँचता है। भारत के अंदर-अंदर ही इस हाईवे की कनेक्टिविटी का दायरा लगभग 2,800 किलोमीटर तक फैल जाता है।

जैसे ही कोई वाहन मणिपुर के मोरेह की अंतरराष्ट्रीय सीमा को पार करता है, वह म्यांमार के तामू शहर में एंट्री कर जाता है। इसके बाद यह हाईवे म्यांमार के कालेवा, मांडले, और म्यावाडी जैसे प्रमुख व्यापारिक शहरों, दुर्गम पहाड़ों और घने जंगलों से गुजरता है। म्यांमार की सीमा खत्म होते ही यह सड़क सीधे थाईलैंड के माए सोट शहर में दाखिल होती है और वहां से थाईलैंड के बेहतरीन रोड नेटवर्क के जरिए सीधे राजधानी बैंकॉक को जोड़ देती है।

सबसे दिलचस्प और रणनीतिक बात यह है कि भारत का इरादा सिर्फ थाईलैंड की सीमा पर जाकर रुकने का बिल्कुल नहीं है। भारत सरकार की आने वाले समय की योजना इस हाईवे को और आगे विस्तार देने की है, जिसके तहत इसे कंबोडिया, लाओस और अंततः वियतनाम तक ले जाने का एक बड़ा मेगा प्लान तैयार किया जा चुका है। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि भविष्य में आप कोलकाता या गुवाहाटी से अपनी गाड़ी में बैठकर सीधे वियतनाम के समुद्र तट तक का सफर सड़क मार्ग से तय कर सकेंगे।

फोटो साभार: AI ChatGPT

चीन के CPEC को कैसे पटखनी देगा यह हाईवे?

जब भी दुनिया में कनेक्टिविटी, इंफ्रास्ट्रक्चर या नए व्यापारिक रास्तों की बात होती है, तो वैश्विक मीडिया में चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ और पाकिस्तान में बन रहे सीपीईसी का बहुत ढोल पीटा जाता है। चीन ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से जबरन रास्ता निकालकर अरब सागर के ग्वादर पोर्ट तक एक बड़ा कॉरिडोर खड़ा कर लिया है ताकि वह अपने शिनजियांग प्रांत को सीधे समुद्र से जोड़ सके। चीन इसी तर्ज पर म्यांमार और बांग्लादेश में भी भारी निवेश करके भारत को तीनों तरफ से घेरने की गहरी साजिश रच रहा था।

लेकिन भारत का यह त्रिपक्षीय हाईवे चीन के इसी चक्रव्यूह को तार-तार करने का सबसे अचूक और ठोस कूटनीतिक जवाब बनकर उभरा है। चीन का सीपीईसी प्रोजेक्ट पूरी तरह से कर्ज के बोझ और तानाशाही शर्तों पर टिका हुआ है, जिसने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह वेंटिलेटर पर ला खड़ा किया है। इसके विपरीत, भारत का यह हाईवे एक ‘साझा समृद्धि’ और समान विकास के मॉडल पर आधारित है, जहां भारत म्यांमार को वित्तीय और तकनीकी मदद दे रहा है, न कि उसे किसी कर्ज के जाल में फंसा रहा है।

इसके अलावा चीन का सीपीईसी जिस इलाके से गुजरता है, वह अत्यधिक अशांत, आतंकी हमलों से ग्रस्त और स्थानीय विद्रोह का सामना कर रहा है, जिससे उसका भविष्य हमेशा अधर में लटका रहता है। इसके उलट, भारत-म्यांमार-थाईलैंड रूट एक प्राकृतिक, ऐतिहासिक और बेहद सुरक्षित व्यापारिक गलियारा साबित होने जा रहा है। यह दक्षिण-पूर्व एशिया की लगभग सत्तर हजार करोड़ डॉलर की संयुक्त अर्थव्यवस्था को सीधे भारत के एक अरब से ज्यादा आबादी वाले विशाल बाजार से जोड़कर चीन के आर्थिक वर्चस्व को सीधी चुनौती देगा।

बांग्लादेश आउट… कैसे पलटी शतरंज की बाजी?

इस पूरे क्षेत्र की भू-राजनीति में एक बहुत बड़ा और अप्रत्याशित मोड़ बांग्लादेश को लेकर आया है, जिसने भारत की रणनीति को और अधिक आक्रामक बना दिया है। शेख हसीना के शासनकाल के दौरान बांग्लादेश इस पूरे कनेक्टिविटी प्लान में बहुत गहरी दिलचस्पी दिखा रहा था और चाहता था कि वह त्रिपुरा के रास्ते इस नेटवर्क का हिस्सा बन जाए ताकि ढाका का व्यापार भी बढ़ सके। लेकिन बांग्लादेश में अचानक हुए तख्तापलट के बाद वहां जो नई कार्यवाहक सरकार बनी है, उसके तेवर थोड़े बदले-बदले और असहयोग वाले नजर आ रहे हैं।

बांग्लादेश के कुछ नए रणनीतिकारों को शायद यह गलतफहमी हो गई थी कि भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के पास अंतरराष्ट्रीय व्यापार करने या समुद्र तक पहुँचने के लिए बांग्लादेश के अलावा कोई दूसरा भौगोलिक विकल्प ही नहीं है। वे इसी गुमान में बैठे थे कि भारत को अपनी जरूरतों के लिए हर हाल में उनके सामने झुकना ही पड़ेगा। लेकिन भारत ने म्यांमार के साथ अपनी बातचीत को तेज करके और इस हाईवे को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बनाकर बांग्लादेश की इस गलतफहमी को पूरी तरह दूर कर दिया है।

देसी अंदाज में कहें तों बांग्लादेश सोच रहा था कि उनके बिना भारत का पत्ता भी नहीं हिलेगा, लेकिन भारत ने पूरब से म्यांमार का पत्ता खोलकर बांग्लादेश का झुनझुना बजा दिया।

भारत की इस कूटनीतिक चाल ने साफ कर दिया है कि आधुनिक विदेश नीति में किसी एक रास्ते या किसी एक पड़ोसी पर पूरी तरह निर्भर रहना आत्मघाती हो सकता है। अगर बांग्लादेश की नई सरकार अपने रुख को लेकर संशय में है या भारत विरोधी ताकतों को बढ़ावा देती है, तो भारत के पास म्यांमार के रास्ते थाईलैंड और पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में सीधे दाखिल होने का एक परमानेंट और बेहद मजबूत विकल्प तैयार है। अब यह पूरी तरह बांग्लादेश को तय करना है कि वह इस महाद्वीपीय विकास की रफ्तार में शामिल होना चाहता है या किनारे बैठकर पछताना चाहता है।

आखिर क्यों लग रहे 26 साल? पेच कहाँ फंसा था?

अब स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि अगर इस हाईवे का खाका साल 2002 में ही खींच लिया गया था, तो इसे पूरा होने में आखिर ढाई दशक का लंबा वक्त क्यों लग गया। इस असाधारण देरी के पीछे कोई एक प्रशासनिक कारण नहीं था, बल्कि इसके पीछे म्यांमार की जटिल आंतरिक राजनीति, बेहद कठिन भूगोल और कई अंतरराष्ट्रीय रोड़े जिम्मेदार थे, जिन्होंने इस प्रोजेक्ट की रफ्तार पर बार-बार ब्रेक लगाने का काम किया।

म्यांमार का गृहयुद्ध और तख्तापलट: इस देरी की सबसे बड़ी और मुख्य वजह म्यांमार की आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता और वहां का गृहयुद्ध रहा है। साल 2021 में म्यांमार की सेना ने लोकतांत्रिक सरकार का तख्तापलट कर दिया, जिसके बाद म्यांमार के चिन और सागाइंग जैसे प्रांतों में सेना और स्थानीय अलग-अलग जातीय विद्रोही गुटों के बीच भयंकर सशस्त्र संघर्ष छिड़ गया। चूंकि इस हाईवे का एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा इन्हीं अशांत इलाकों से होकर गुजरता है, इसलिए वहां काम कर रहे इंजीनियरों और मजदूरों की सुरक्षा के चलते काम बार-बार ठप होता रहा।

खतरनाक पहाड़ी और जंगली रास्ता: म्यांमार का भूगोल भी इस प्रोजेक्ट के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती साबित हुआ। म्यांमार के हिस्से में आने वाला कालेवा से यागी तक का जो एक सौ बीस किलोमीटर का खंड है, वह बेहद ऊंचे पहाड़ों, घने जंगलों और भूस्खलन वाले क्षेत्रों से भरा हुआ है। ऐसे दुर्गम और टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर एक आधुनिक और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप पक्की सड़क का निर्माण करना दुनिया के बेहतरीन इंजीनियरों के लिए भी किसी बड़े इम्तिहान से कम नहीं था।

जर्जर बुनियादी ढाँचा: एक और बड़ी तकनीकी बाधा यह थी कि म्यांमार के इस रूट पर अंग्रेजों के जमाने के लगभग सत्तर पुराने और जर्जर लोहे के पुल थे, जो आज के भारी-भरकम ट्रकों और कंटेनरों का वजन संभालने में पूरी तरह अक्षम थे। भारत ने इस समस्या को भांपते हुए म्यांमार को करीब एक हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की वित्तीय मदद दी ताकि इन सभी पुराने पुलों को तोड़कर उनकी जगह आधुनिक कंक्रीट के मजबूत पुल बनाए जा सकें, जिससे व्यापार में कोई बाधा न आए।

अब कैसे आएगी प्रोजेक्ट में रफ्तार?

हालाँकि अब म्यांमार के हालात में धीरे-धीरे एक सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है और वहां का सैन्य नेतृत्व भी इस बात को समझ चुका है कि विकास के बिना सत्ता को संभालना नामुमकिन है। म्यांमार के राष्ट्रपति का अपने पहले विदेश दौरे के लिए भारत को चुनना और प्रधानमंत्री मोदी के साथ इस प्रोजेक्ट को फास्ट ट्रैक पर डालने का संकल्प लेना यह साबित करता है कि अब दोनों देश इस हाईवे को हर हाल में पूरा करने के लिए कटिबद्ध हैं। इस समय इस पूरे हाईवे का लगभग सत्तर प्रतिशत से ज्यादा काम मुकम्मल हो चुका है और बाकी बचे काम को निपटाकर इसे अगले दो से तीन साल के भीतर पूरी तरह चालू करने का लक्ष्य रखा गया है।

परदे के पीछे का खेल: जापान की एंट्री और भारत की ‘सॉफ्ट पावर’

इस पूरे खेल के पीछे एक और बहुत बड़ी वैश्विक महाशक्ति भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी है, और वह देश है जापान। जापान इस पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में भारत का सबसे भरोसेमंद और रणनीतिक पार्टनर बनकर उभरा है। जापान म्यांमार के भीतर कई बड़े रेलवे प्रोजेक्ट्स, पुलों के निर्माण और सड़कों के आधुनिकीकरण में भारी-भरकम निवेश कर रहा है, क्योंकि जापान का भी सीधा रणनीतिक मकसद हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की विस्तारवादी नीति और आर्थिक दादागिरी को मजबूती से रोकना है।

म्यांमार की मजबूरी और भारत की व्यावहारिक कूटनीति

दुनिया के कई पश्चिमी और यूरोपीय देशों ने म्यांमार में सैन्य शासन होने की वजह से उससे अपने सभी कूटनीतिक और व्यापारिक रिश्ते पूरी तरह तोड़ लिए हैं और उस पर कई तरह के कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं। लेकिन भारत ने यहां अपनी व्यावहारिक और यथार्थवादी कूटनीति का परिचय देते हुए म्यांमार की सरकार से बातचीत का रास्ता हमेशा खुला रखा। भारत इस बात को अच्छी तरह जानता है कि पड़ोसियों को बदला नहीं जा सकता और उनसे मुंह मोड़ना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घातक हो सकता है।

भारत के कूटनीतिक विचारकों का मानना है कि किसी देश से पूरी तरह संबंध तोड़ लेने से वहां कभी भी लोकतंत्र की बहाली नहीं होती, बल्कि ऐसा करने से वहां एक बड़ा राजनीतिक और आर्थिक शून्य पैदा हो जाता है। अगर भारत म्यांमार से दूरी बना लेता, तो चीन तुरंत उस खाली जगह पर कब्जा कर लेता और म्यांमार की जमीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ करने लगता। इसलिए भारत ने म्यांमार की सेना और वहां के स्थानीय विद्रोही गुटों के बीच एक बेहद बारीक और चतुर संतुलन बनाकर अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखा है।

कालादान मल्टीमॉडल प्रोजेक्ट से ‘चिकन नेक’ की टेंशन खत्म

इस हाईवे के समानांतर भारत म्यांमार के ही भीतर एक और अत्यंत महत्वपूर्ण और गेम-चेंजर प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है, जिसे कलादान मल्टीमॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट कहा जाता है। यह प्रोजेक्ट भी भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए एक जीवनरेखा साबित होने जा रहा है क्योंकि यह कोलकाता बंदरगाह को समुद्र के रास्ते म्यांमार के सितवे बंदरगाह से जोड़ता है। सितवे बंदरगाह को पूरी तरह भारत ने ही विकसित और फंड किया है ताकि चीन के बढ़ते समुद्री प्रभाव को बंगाल की खाड़ी में काउंटर किया जा सके।

सितवे बंदरगाह पर माल उतरने के बाद उसे कलादान नदी के जरिए अंतर्देशीय जलमार्ग से पलेटवा नामक स्थान तक ले जाया जाएगा, और फिर वहां से एक नए सड़क नेटवर्क के जरिए माल सीधे हमारे मिजोरम राज्य की सीमा में प्रवेश कर जाएगा। यह पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर नेटवर्क तैयार होने के बाद भारत की सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर निर्भरता हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी, और युद्ध जैसी किसी भी आपातकालीन स्थिति में भी हमारे पूर्वोत्तर राज्य पूरी तरह सुरक्षित और दुनिया से जुड़े रहेंगे।

इस हाईवे के पूरा होने से भारत के हाथ लगेगी कौन-कौन सी लॉटरी?

$7000 करोड़ डॉलर की इकोनॉमी और नौकरियाँ: आर्थिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस रूट के पूरी तरह एक्टिव होते ही भारत और आसियान देशों के बीच व्यापार में 20 से 30 फीसदी का उछाल आएगा। इससे लगभग 2 करोड़ नए रोजगार पैदा होंगे और उत्तर-पूर्व के राज्यों में विकास की बाढ़ आ जाएगी। आर्थिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस रूट के पूरी तरह एक्टिव होते ही भारत और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बीच का द्विपक्षीय व्यापार कई गुना बढ़ जाएगा।

पूर्वोत्तर बनेगा ‘ग्लोबल ट्रेड हब’: मणिपुर, नागालैंड, मिजोरम और असम जैसे राज्य जो आजादी के बाद से भौगोलिक दूरी और बुनियादी ढाँचे की कमी के कारण देश की मुख्यधारा के आर्थिक विकास से थोड़े अलग-अलग से पड़े थे, वे अचानक से अंतरराष्ट्रीय व्यापार के सबसे बड़े और जीवंत हब बनकर उभरेंगे। इन राज्यों की सीमाओं पर बड़े-बड़े लॉजिस्टिक्स पार्क, अत्याधुनिक कोल्ड स्टोरेज, अंतरराष्ट्रीय होटल और मैन्युफैक्चरिंग फैक्ट्रियां स्थापित होंगी, जो वहां के युवाओं के पलायन को हमेशा के लिए रोक देंगी।

बौद्ध पर्यटन (Buddhist Tourism) को महा-बूस्ट: म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया, लाओस और वियतनाम… ये सभी मुख्य रूप से बौद्ध संस्कृति वाले देश हैं। इन देशों के करोड़ों लोग हर साल बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर जैसे पवित्र बौद्ध स्थलों के दर्शन करना चाहते हैं। इस हाईवे के बनने से बौद्ध सर्किट का ऐसा विकास होगा कि भारत के टूरिज्म सेक्टर की किस्मत बदल जाएगी। इस सड़क मार्ग के सुलभ होते ही इन देशों से लाखों की संख्या में तीर्थयात्री और पर्यटक सीधे अपनी गाड़ियों या बसों से भारत आ सकेंगे, जिससे हमारे सांस्कृतिक संबंध और मजबूत होंगे। खुद म्यांमार के राष्ट्रपति ने अपने इस दौरे में बोधगया जाकर इस बात के संकेत दे दिए हैं।

यूरोप जैसा सफर (IMT मोटर वाहन समझौता): वर्तमान में तीनों देश एक बेहद खास और ऐतिहासिक मोटर वाहन समझौते पर भी काम कर रहे हैं, जो इस हाईवे की सफलता की असली चाबी है। इस समझौते के लागू होते ही तीनों देशों के वाणिज्यिक और निजी वाहनों को सीमाओं पर किसी जटिल कागजी कार्रवाई, लंबी कस्टडी या बार-बार सामान उतारने की जरूरत नहीं पड़ेगी। गाड़ियां एक देश से दूसरे देश में इस तरह आ-जा सकेंगी जैसे यूरोपीय संघ के भीतर गाड़ियां बिना किसी बाधा के एक देश से दूसरे देश की सीमा पार कर जाती हैं।

पूरब का नया सुल्तान बनेगा भारत

देर से ही सही लेकिन भारत का यह पूर्वी कूटनीतिक दाँव अब पूरी तरह से सटीक और अचूक बैठ चुका है। म्यांमार के ऊँचे पहाड़ों को चीरकर, घने जंगलों के बीच से रास्ता बनाते हुए और चीन के तमाम मंसूबों को धूल चटाते हुए बन रहा यह हाईवे सिर्फ डामर और गिट्टी से बनी कोई सड़क नहीं है। यह नए भारत की उभरती हुई वैश्विक कूटनीति, उसके फौलादी इरादों और दुनिया की एक बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने की जिद का एक अटूट और जीता-जागता प्रतीक है।

बांग्लादेश अपनी राजनीतिक अस्थिरता और गलतफहमियों के दौर से गुजरता रहे या चीन अपनी तमाम आर्थिक और सैन्य ताकत के दम पर भारत को घेरने की साजिशें रचता रहे, भारत ने पूरब का वो अभेद्य रास्ता खोल दिया है जिसकी अंतिम मंजिल सीधे वैश्विक नेतृत्व की कुर्सी पर जाकर ही खत्म होती है। अब बस कुछ सालों का और इंतजार है, जिसके बाद इस ऐतिहासिक हाईवे पर भारत की प्रगति, समृद्धि और सामरिक शक्ति का पहिया पूरी दुनिया के सामने दहाड़ते हुए दौड़ने लगेगा।

हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन के विकिपीडिया पेज पर वामपंथियों का प्रोपेगेंडा: सामने आए Kautilya3, Shahinshah121 व TrangaBellam जैसे नाम, जानें इनका इतिहास

कई वर्षों से ऑपइंडिया यह बात उठाता रहा है कि खुद को ‘मुक्त ज्ञानकोश’ (free encyclopedia) कहने वाला विकिपीडिया न तो पूरी तरह निष्पक्ष है और न ही पूरी तरह स्वतंत्र। विकिपीडिया भारत और हिंदुओं के खिलाफ पक्षपात करने वाले संपादकों (Editors) को मंच देता है जो लोगों और संस्थाओं के बारे में भ्रामक और एकतरफा जानकारी डालते हैं। अब नैचुरल पॉइंट ऑफ व्यू (NPOV) मीडिया की नई शोध रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कुछ हिंदू विरोधी संपादक अमेरिका स्थित ‘हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन’ (HAF) के खिलाफ विकिपीडिया पर प्रोपेगेंडा फैला रहे हैं।

कुछ विकिपीडिया संपादकों ने हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन की कई गतिविधियों को ‘हिंदुत्व’ से जोड़ने की कोशिश की। इसका उद्देश्य यह नैरेटिव बनाना है कि HAF एक हिंदू समर्थक राजनीतिक एजेंडा को आगे बढ़ाने वाला संगठन है।

HAF के विकिपीडिया पेज के अनुसार, यह हिंदू अधिकार संगठन ‘हिंदू अधिकारों’ के नाम पर हिंदुत्व को नए रूप में प्रस्तुत कर रहा है। इसमें कहा गया है कि संगठन अमेरिका में हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों का मुद्दा उठाता है, योग जैसी हिंदू परंपराओं के सांस्कृतिक दुरुपयोग का विरोध करता है और ऐसे कानूनों का विरोध करता है जिनका इस्तेमाल कथित जातिगत भेदभाव के नाम पर हिंदुओं को निशाना बनाने के लिए किया जाता है।

विकिपीडिया पर HAF के पेज पर लिखा है, “यह संगठन दावा करता है कि उसका काम अमेरिका में हिंदुओं के अधिकारों की रक्षा करना, विदेशों में हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों की ओर ध्यान दिलाना, योग के सांस्कृतिक दुरुपयोग का विरोध करना और जाति आधारित भेदभाव को रोकने वाले कानूनों का विरोध करना है। हालाँकि, इन प्रयासों को हिंदुत्व को ‘हिंदू अधिकार’ के रूप में पेश करने की कोशिश माना जाता है ताकि इसे अमेरिका की मुख्यधारा की बहुसांस्कृतिक (Multiculturalism) राजनीति में आसानी से स्वीकार किया जा सके।”

3 जून को प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में एशले रिंड्सबर्ग के नेतृत्व वाले NPOV Media ने दावा किया कि कुछ गिने-चुने गुमनाम संपादकों ने HAF के विकिपीडिया पेज के 80% से अधिक हिस्से को नियंत्रित किया हुआ है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि HAF के विकिपीडिया पेज पर दिखाई देने वाली लगभग 80% पक्षपातपूर्ण जानकारी के पीछे केवल चार एडिटर्स की भूमिका है। ये एडिटर्स TrangaBellam, Kautilya3, Llightex और Shahinshah121 हैं। इसके अलावा Vanamonde93 नाम का एक हिंदू विरोधी एडिटर भी इन लोगों का समर्थन करता है।

NPOV की रिपोर्ट ‘Wikipedia’s India War’ में कहा गया है, “HAF की छवि बदलने की कोशिश 2021 की शुरुआत में शुरू हुई थी। उसी समय विकिपीडिया के कुछ अत्यधिक सक्रिय एडिटर्स ने HAF, उसके आलोचकों और उससे जुड़े संगठनों के चारों ओर आपस में जुड़े पृष्ठों का एक तंत्र तैयार करना शुरू किया। इनमें TrangaBellam, Kautilya3, Llightex और Shahinshah121 शामिल हैं। वहीं, वेबसाइट के सबसे प्रभावशाली प्रशासकों में शामिल Vanamonde93 कई बार ऐसे हस्तक्षेप करता दिखाई दिया जिससे इस समूह को लाभ होता नजर आया।”

यह भी याद रखने वाली बात है कि वर्ष 2021 में ही हिंदू विरोधी ‘इतिहासकार’ ऑड्रे ट्रुश्के (Audrey Truschke) ने HAF के खिलाफ बड़ा ऑनलाइन अभियान शुरू किया था। उन्होंने HAF पर अमेरिका में ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ को बढ़ावा देने का आरोप लगाया था। मई 2021 में HAF ने ट्रुश्के के खिलाफ मुकदमा भी दायर किया था।

इसी दौरान HAF के विकिपीडिया पृष्ठ पर कथित रूप से कई हिंदू विरोधी एडिटर्स द्वारा नकारात्मक और पक्षपातपूर्ण जानकारी जोड़ी जा रही थी। साथ ही संगठन के खिलाफ नए-नए लेख और सामग्री भी लगातार जोड़ी जा रही थी।

NPOV की रिसर्च में यह भी सामने आया है कि HAF द्वारा ऑड्रे ट्रुश्के, जॉर्ज सोरोस से फंडेड ‘हिंदूज फोर ह्यूमन राइट्स’ (Hindus for Human Rights) और इस्लामी संगठन इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल के खिलाफ मुकदमा दायर करने से लगभग दो महीने पहले ‘TrangaBellam’ ने ट्रुश्के का विकिपीडिया पेज बनाया था। आज भी उस पृष्ठ पर सबसे अधिक योगदान (57% से अधिक) उसी एडिटर का है।

एक ओर HAF के विकिपीडिया पेज पर संगठन के खिलाफ कथित रूप से पक्षपातपूर्ण जानकारी डाली जा रही थी तो वहीं दूसरी ओर ट्रुश्के के विकिपीडिया पेज पर उनके खुद को पीड़ित बताने वाले दावों को प्रमुखता दी जा रही थी। ट्रुश्के X पर अपने पोस्ट में लगातार यह दावा करती रही हैं कि उन्हें ‘हिंदू राष्ट्रवादियों’ से धमकियाँ मिल रही हैं।

दिलचस्प बात यह रही कि विकिपीडिया के संपादकों ने ट्रुश्के द्वारा लिखे गए वाशिंगटन पोस्ट के एक ओपिनियन पोस्ट को इस दावे के ‘स्रोत’ के रूप में इस्तेमाल किया कि ट्रुश्के को ‘हिंदुत्व से जुड़े लोगों’ द्वारा परेशान किया जा रहा था। दूसरा स्रोत ‘हिंदुत्व उत्पीड़न फील्ड मैनुअल’ था जिसे साउथ एशिया स्कॉलर एक्टिविस्ट कलेक्टिव (SASAC) ने तैयार किया था। इस ग्रुप के सह-संस्थापक खुद ट्रुश्के थीं।

यानी ट्रुश्के ने दावा किया कि HAF जैसे हिंदू अधिकार संगठनों द्वारा उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने अपने लेखों और ‘मैनुअल’ में भी यही बातें दोहराईं। इसके बाद विकिपीडिया संपादकों ने उन्हीं दावों को उठाकर उनके विकिपीडिया पेज पर जोड़ दिया। TrangaBellam और अन्य हिंदू विरोधी एडिटर्स ने मूल रूप से ऐसा माहौल तैयार किया कि पेज पढ़ने वाले लोग या तो इन दावों के स्रोत को नजरअंदाज कर दें या यह मान लें कि अगर ट्रुश्के कह रही हैं कि हिंदू उन्हें परेशान कर रहे हैं तो यह सच ही होगा।

NPOV रिपोर्ट के अनुसार, “कुछ ही हफ्तों में Truschke के विकिपीडिया पेज की शुरुआती पंक्तियों में ही लिखा गया कि ‘ट्रुश्के अक्सर हिंदुत्व समर्थकों द्वारा परेशान की जाती रही हैं जो उन पर हिंदू धर्म के प्रति पक्षपातपूर्ण सोच और आपत्तिजनक बयान देने का आरोप लगाते हैं जबकि विद्वान इन आरोपों को खारिज करते हैं।” विकिपीडिया पर ट्रुश्के को हिंदू ‘चरमपंथियों’ द्वारा परेशान किए जाने वाला विवरण 10 जुलाई 2021 को TrangaBellam द्वारा जोड़ा गया था।

रिपोर्ट में आगे बताया गया कि कुछ ही दिनों बाद TrangaBellam ने HAF के पेज पर अपना पहला और सबसे महत्वपूर्ण बदलाव किया। TrangaBellam ने दावा जोड़ा कि HAF द्वारा दायर मुकदमा अकादमिक स्वतंत्रता पर हमला था। इस एडिटर ने HAF के विकिपीडिया पेज पर HAF के खिलाफ कई दावे जोड़े और मंच के नियमों का उल्लंघन करते हुए Hindus for Human Rights की वेबसाइट का हवाला दिया जबकि यह संस्था HAF द्वारा दायर मुकदमे में पक्षकार थी।

TrangaBellam के अलावा Shahinshah121 नाम के एक एडिटर ने ट्रुश्के की नई SASAC वेबसाइट के कई लिंक जोड़े और HAF के पृष्ठ को संपादित करते हुए यह दावे भी जोड़े कि संगठन के कुछ सदस्यों में मुस्लिम विरोधी भावना मौजूद है। इससे पहले 8 जुलाई 2021 को Shahinshah121 ने ट्रुश्के के SASAC के लिए विकिपीडिया पेज बनाने की कोशिश की थी। यह प्रयास SASAC का डोमेन पंजीकृत होने के केवल दो दिन बाद किया गया था। Shahinshah121 ने ऐसे तीन और असफल प्रयास किए।

Shahinshah121 ने HAF के पेज पर 24 बदलाव किए और उसके बाद सबसे अधिक एडिटिड पेज ‘हिंदुत्व’ पर 6 बदलाव किए। इस संपादक के कुल बदलावों का लगभग आधा हिस्सा HAF के पेज पर था जबकि दूसरे नंबर पर ‘हिंदुत्व’ का पेज था। बाकी कामों में Shahinshah121 ने केवल एक-एक बदलाव किए। NPOV विश्लेषण के अनुसार, TrangaBellam, Shahinshah121 और इस समूह के अन्य एडिटर द्वारा किए गए बदलावों ने यह नैरेटिव स्थापित किया कि HAF, RSS से जुड़ा और BJP समर्थक ‘हिंदुत्ववादी चरमपंथी’ संगठन है जो खुद को केवल हिंदू अधिकारों के लिए काम करने वाला संगठन बताता है।

रिपोर्ट में 2025 की एक घटना का जिक्र करते हुए बताया गया कि विकिपीडिया एडिटर्स ने अस्पष्ट पत्रों और सामान्य समाचार रिपोर्टों के आधार पर यह संकेत देने की कोशिश की कि HAF अमेरिकी न्याय विभाग की निगरानी में था। HAF के विकिपीडिया पेज पर लिखा गया, ‘2025 में HAF का नाम न्याय विभाग में की गई एक शिकायत में शामिल किया गया, जिसमें आरोप लगाया गया कि HAF भारत की BJP के बिना पंजीकरण वाले विदेशी एजेंट की तरह काम करता है।”

हालाँकि, असल में खालिस्तान समर्थक ‘फ्रेमोंट गुरुद्वारा साहिब’ ने अमेरिकी न्याय विभाग के माध्यम से एक लॉ फर्म को एक पत्र भेजा था जिसमें ‘विदेशी एजेंट’ वाले दावे किए गए थे। इस घटना को मदर जोन्स, बाज न्यूज और ब्रिटेन के द गार्जियन जैसे प्रोपेगेंडा मीडिया संस्थानों ने भी प्रकाशित किया था।

Shahinshah121 ने इस घटना का जिक्र HAF के विकिपीडिया पेज पर किया लेकिन यह जानकारी नहीं जोड़ी कि अमेरिकी न्याय विभाग ने HAF के खिलाफ किसी जाँच की घोषणा नहीं की थी।

HAF के विकिपीडिया पेज को इस तरह बदलने वाला एक और प्रमुख हिंदू विरोधी एडिटर Kautilya 3 था, जिसने हिंदू अधिकार संगठन को एक भ्रामक राष्ट्रवादी चरमपंथी संगठन की तरह दिखाने के लिए कई महत्वपूर्ण बदलाव किए।

Kautilya3 द्वारा HAF के विकिपीडिया पेज पर लिखा गया, “इस संगठन की नींव हिंदू राष्ट्रवादी संगठन विश्व हिंदू परिषद अमेरिका और उसकी छात्र शाखा हिंदू छात्र परिषद से जुड़ी हुई हैं। इसके आलोचकों के अनुसार, HAF ने ‘हिंदू अधिकारों’ की भाषा में हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडे को दोबारा प्रस्तुत किया है ताकि वह अमेरिकी मुख्यधारा की राजनीति में आसानी से फिट हो सके।”

HAF पृष्ठ पर योगदान देने के अलावा Kautilya 3 ने ‘भारतीय अमेरिकी मुस्लिम परिषद’ के विकिपीडिया पेज पर 25.3% लेखन योगदान दिया है। इसके साथ ही, अमेरिका में जातिगत भेदभाव (caste discrimination in the US) वाले विकिपीडिया पृष्ठ का 41.4 प्रतिशत योगदान भी Kautilya 3 के पास है।

Kautilya 3 ब्रिटेन का विकिपीडिया एडिटर उदय रेड्डी है जिसके खिलाफ 2024 में मणिपुर पुलिस ने विभिन्न समुदायों के बीच दुश्मनी फैलाने और मैतेई समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने के आरोप में मामला दर्ज किया था।

2024 में ऑपइंडिया ने एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें बताया गया था कि विकिपीडिया विचारधारा मुक्त और समर्थित हस्तक्षेप से मुक्त ज्ञानकोश नहीं है जैसा कि विकिमीडिया फाउंडेशन का दावा है कि यह दुनिया भर में हजारों स्वतंत्र और उत्साही स्वयंसेवकों की सहायता सेवा है। ऑपइंडिया ने बताया था कि विकिपीडिया के ‘NPOV’ (तटस्थ दृष्टिकोण) दिशा-निर्देशों का मतलब यह नहीं है कि किसी भी लेख में हर तरह के विचारों को समान स्थान मिलेगा।

TrangaBellam, Shahinshah121 और Kautilya 3 के अलावा, हिंदू विरोधी विकिपीडिया एडिटर्स के इस समूह में Vanamonde93 नाम का एक एडिटर भी शामिल है। अन्य हिंदू विरोधी विकिपीडिया बदलावों के अलावा, इसने HAF के पेज पर भी महत्वपूर्ण बदलाव किए थे। खास बात यह है कि Vanamonde93 विकिपीडिया के उन केवल 32 प्रशासकों में शामिल है, जिनके पास एक साथ जाँचकर्ता (checkuser) और निरीक्षणकर्ता (oversighter) दोनों अधिकार मौजूद हैं।

NPOV रिपोर्ट के अनुसार, “16 सितंबर को Vanamonde93 ने एक ऐसा बदलाव किया जो देखने में छोटा था लेकिन उसका असर दूरगामी था। इस एडिटर ने पेज के एक सेक्शन का शीर्षक ‘Alleged Hindu Nationalist Ties’ (कथित हिंदू राष्ट्रवादी संबंध) से बदलकर केवल ‘Hindu nationalist ties’ (हिंदू राष्ट्रवादी संबंध) कर दिया। केवल एक मिनट में यह दावा आरोप से बदलकर स्थापित तथ्य की तरह दिखने लगा।”

साल 2018 में ट्रुश्के ने एक ट्वीट किया था जिसमें उन्होंने भगवान राम को ‘misogynist pig’ (स्त्री द्वेषी सुअर) कहा था। उन्होंने वाल्मीकि रामायण के एक हिस्से का अपने तरीके से अनुवाद करते हुए दावा किया था कि अग्निपरीक्षा वाले प्रसंग में माता सीता ने भगवान राम को ‘misogynist pig’ कहा था।

विवाद बढ़ने के बाद ट्रुश्के ने सफाई दी थी कि उन्होंने केवल बर्कले के संस्कृत विद्वान रॉबर्ट गोल्डमैन द्वारा किए गए अनुवाद का हवाला दिया था। हालाँकि, गोल्डमैन ने ट्रुश्के के इस वर्णन को खारिज करते हुए कड़ा बयान जारी किया था। उन्होंने कहा था, “ट्रुश्के ने ‘किसी भी तरह से हमारे अनुवाद का हवाला नहीं दिया’, और उनकी भाषा ‘अत्यंत अनुचित’ थी।”

सितंबर 2021 में Vanamonde93 ने इस विवाद से जुड़े हिस्से में बदलाव किया। NPOV रिपोर्ट के अनुसार, “उन्होंने गोल्डमैन की प्रतिक्रिया से जुड़े संदर्भ हटा दिए जिसमें ‘चौंकाने वाली और बेहद अनुचित’ भाषा वाला हिस्सा और पूरे विवाद का संदर्भ शामिल था। अपने बदलाव के सारांश में उसने लिखा:- ‘BLP में बिना स्रोत बताए विवादास्पद दावों के लिए यह स्रोत किसी भी तरह से स्वीकार्य कैसे हो सकता है’?”

हाल ही में 23 फरवरी 2026 को Vanamonde93 ने HAF के पेज पर कई बदलाव किए। इस दौरान उसने HAF की कार्यकारी निदेशक सुहाग शुक्ला का वह सार्वजनिक बयान हटा दिया जो ट्रुश्के, H4HR और IAMC के खिलाफ मुकदमे को लेकर दिया गया था। बदलाव के लिए विकिपीडिया की प्राथमिक स्रोतों (primary sources) से जुड़ी नीति का हवाला दिया गया।

NPOV रिपोर्ट में कहा गया, “जनवरी 2021 में Kautilya3 ने इसी नियम का इस्तेमाल करते हुए HAF की सफाई को हटा दिया था। अपने ही मुकदमे पर HAF का खुद का बयान स्वीकार नहीं किया गया लेकिन मुकदमे को अकादमिक स्वतंत्रता पर हमला बताने वाले कार्यकर्ता स्रोत और राय लेख बने रहे।”

NPOV Media की रिपोर्ट में एक अन्य विकिपीडिया एडिटर Llightex की करतूतों का भी खुलासा हुआ है। Llightex ने सुनीता विश्वनाथ के नेतृत्व वाले हिंदू विरोधी संगठन, हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स (H4HR) का पेज बनाया था और पहले वहीं काम करता था। Llightex ने केवल H4HR का ही नहीं बल्कि IAMC के पेज को भी एडिट किया। HAF मुकदमे के दौरान सुनीता विश्वनाथ का अलग विकिपीडिया पेज भी बनाया गया। मुकदमा खत्म होने के बाद Llightex ने HAF के पृष्ठ में भी बदलाव किए जिससे हिंदू अधिकार संगठन को और अधिक नकारात्मक रूप में दिखाया गया।

HAF की कार्यकारी निदेशक ने विकिपीडिया पेज में बदलाव को बताया ‘अंदरूनी साजिश’

HAF की कार्यकारी निदेशक सुहाग शुक्ला ने HAF के विकिपीडिया पेज में की गई एडिटिंग और बदलावों को ‘अंदरूनी साजिश’ बताया है। NPOV Media की रिपोर्ट सामने आने के बाद प्रतिक्रिया देते हुए सुहाग शुक्ला ने कहा कि संगठन के विकिपीडिया पेज को खराब करने और उसकी पहचान बदलने का काम ‘भीतर’ से किया गया।

सुहाग शुक्ला ने X पर लिखा, “यह एक ‘अंदरूनी काम’ था। हमने पिछले 5 वर्षों से अपने विकिपिडया पृष्ठ को पूरी तरह खराब होते देखा है जिससे संगठन की असली पहचान ही बदल गई। एशले रिंड्सबर्ग और NPOV Media की यह जाँच उस चीज का पर्दाफाश करती है जो HAF पर 4 एडिटर्स के एक समूह द्वारा सुनियोजित हमला लगता है, जिनमें से दो का संबंध ट्रुश्के और ‘हिंदूज फोर ह्यूमन राइट्स’ जैसे संगठन से जुड़ा दिखाई देता है।”

HAF के विकिपीडिया पृष्ठ को खराब करने में चार एडिटर्स की भूमिका को लेकर शुक्ला ने लिखा, “Trangabellam, Kautilya3, Lightex और Shainshah121 HAF के विकिपीडिया पेज की 80% सामग्री के लिए जिम्मेदार हैं। ये लोग कौन हैं? Trangabellam ने ट्रुश्के का विकिपीडिया पृष्ठ बनाया, उसे प्रोटेक्ट किया और उसे आकार दिया जबकि HAF के पेज पर बिना प्रमाण वाले आरोप जोड़े। Lightex ने खुद स्वीकार किया कि वह पहले ‘हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स” के साथ काम कर चुका है, उस समूह का विकिपीडिया पृष्ठ बनाया (जो विकिपीडिया के अपने नियमों के खिलाफ था) और फिर HAF के पृष्ठ को बदलते हुए उसे ‘अति राष्ट्रवादी संगठन’के रूप में दिखाने की कोशिश की।”

शुक्ला ने आगे लिखा, “Shahinshah121 ने HAF के खिलाफ यह आरोप जोड़े कि यह ‘हिंदुत्व’ से जुड़ा है और ‘विदेशी एजेंट के रूप में काम करने के मामले में अमेरिकी न्याय विभाग की जाँच के दायरे में है।’ साथ ही, साउथ एशियन स्कॉलर्स कलेक्टिव बनने के कुछ ही घंटों के भीतर ट्रुश्के के इस समूह को बढ़ावा दिया गया। HAF पेज के दूसरे सबसे सक्रिय संपादक Kautilya3 ने उन सभी जानकारियों को हटा दिया जो आरोपों पर HAF का पक्ष दिखाती थीं जिनमें यह बात भी शामिल थी कि ‘HAF का विभिन्न विदेशी संगठनों से कोई संबंध नहीं है’। इसके बाद उसने जोड़ा कि ‘HAF ने अमेरिकी मुख्यधारा की राजनीति के अनुरूप खुद को ढालने के लिए हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडे को हिंदू अधिकारों की भाषा में दोबारा पेश किया है’।”

Wikipedia निष्पक्ष नहीं बल्कि पक्षपातपूर्ण है: OpIndia की रिसर्च में क्या सामने आया?

साल 2024 में ऑपइंडिया ने एक विस्तृत दस्तावेज जारी किया था जिसमें बताया गया था कि विकिपीडिया वैसा मुक्त और संपादकीय हस्तक्षेप से मुक्त ज्ञानकोश नहीं है, जैसा विकिमीडिया फाउंडेशन दावा करता है। विकिमीडिया फाउंडेशन का कहना रहा है कि विकिपीडिया दुनिया भर के हजारों निःशुल्क और उत्साही स्वयंसेवकों के योगदान से चलता है।

ऑपइंडिया की शोध रिपोर्ट में सामने आया कि विकिपीडिया की संरचना ही ऐसी है जिसमें कुछ गिने-चुने लोगों को अत्यधिक अधिकार दिए गए हैं। इन लोगों को ‘administrators’ कहा जाता है। पूरी दुनिया में केवल 435 सक्रिय administrators हैं जिनके पास एडिटर्स को प्रतिबंधित करने, स्रोतों को ब्लैकलिस्ट करने, योगदानकर्ताओं को रोकने और किसी लेख में क्या बदलाव किए जाएँ या हटाए जाएँ, यह तय करने की शक्ति होती है।

ऑपइंडिया द्वारा यह दस्तावेज जारी किए जाने के कुछ समय बाद फेसबुक ने भी इस रिपोर्ट को प्रतिबंधित कर दिया। फेसबुक पर पहले भी अमेरिका में चुनावी हस्तक्षेप और एक खास विचारधारा के राजनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के आरोप लगते रहे हैं।

विकिपीडिया एक ऐसा बिचौलिया होने का दावा करता है जो बिना किसी कंटेंट दखल और एडिटोरियल लाइन के लोगों की समझ पर निर्भर करता है, ‘भरोसेमंद सोर्स’ पर आधारित है और न्यूट्रल नज़रिया बनाए रखता है। हालांकि, यह सच से बहुत दूर है, जैसा कि ऑपइंडिया रिसर्च में साबित हुआ है। विकिपीडिया पब्लिशर्स के सभी स्टैंडर्ड को पूरा करता है। वे मौजूदा और ऐतिहासिक घटनाओं पर जानकारी इकट्ठा करते हैं, वे अपने एडिटर्स और एडमिनिस्ट्रेटर्स को पेमेंट करते हैं और इंटरनेट पर आम लोग उन्हें आसानी से एक्सेस कर सकते हैं।

ऑपइंडिया की एडिटर-इन-चीफ नूपुर जे शर्मा के द्वारा किए गए रिसर्च पेपर के नतीजों से पता चलता है कि भारत में ऑफिस या मौजूदगी न होने के बावजूद, विकिपीडिया देश में अपने बिजनेस और सोच के फायदे के लिए भारत विरोधी सोच वाली संस्थाओं और लोगों को फंडिंग कर रहा है और यहाँ तक ​​कि इस्लामिस्ट और खालिस्तानियों से भी जुड़ा है। विकिपीडिया न सिर्फ भारत से डोनेशन के रूप में फंड इकट्ठा करता है बल्कि भारत में लाखों डॉलर खर्च भी करता है और पूरी तरह से एकतरफा और सख्त एडिटोरियल लाइन पर चलता है जबकि यह सब एक बिचौलिया होने का दावा करता है पब्लिशर नहीं ताकि भारतीय कानून के सामने किसी भी जवाबदेही से बच सके।

विकिपीडिया को पब्लिशर घोषित करने के अलावा, ऑपइंडिया ने यह भी सिफारिश की कि विकिपीडिया के फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन की जाँच की जाए। ऑपइंडिया का ‘भारत पर विकिपीडिया का युद्ध’ (Wikipedia’s War on India) डोजियर यहाँ पढ़ा जा सकता है।

विकिपीडिया के सह-संस्थापक जिम्मी वेल्स ने एक बार कहा था कि विकिपीडिया का उद्देश्य ‘मानव ज्ञान के पूरे संग्रह को सभी लोगों के लिए उपलब्ध कराना’ है। लेकिन आज यह उद्देश्य शर्तों वाला दिखाई देता है क्योंकि ज्ञान को तभी जगह मिलती है, जब वह किसी खास राजनीतिक विचारधारा के अनुरूप हो। ‘Neutral Point of View’ यानी निष्पक्ष दृष्टिकोण का नियम भी कमजोर पड़ गया है क्योंकि निष्पक्षता अब इस बात पर निर्भर दिखती है कि चर्चा में किन स्रोतों को शामिल होने की अनुमति मिलती है।

जैसा कि ऑपइंडिया के डॉसियर में कहा गया, “यदि विश्वसनीय स्रोतों का समूह ही वैचारिक पक्षपात से प्रभावित हो, तो ‘न्यूट्रल पॉइंट ऑफ व्यू’ सिर्फ एक जरूरत रह जाती है जिसमें वामपंथी विचारधारा के अलग-अलग रूपों को प्रमुखता मिलती है।”

हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन के पेज से लेकर बंगाल फाइल्स, द कश्मीर फाइल्स, द केरल स्टोरी, धुरंधर, ऑपइंडिया और हाल में बने कॉकरोच जनता पार्टी जैसे ऑनलाइन अभियान तक विकिपीडिया ऐसे हिंदू विरोधी और भारत विरोधी इस्लामो-वामपंथी समूहों को मंच दे रहा है जो अपनी वैचारिक सोच के आधार पर व्यक्तियों और संस्थाओं के पेज बना रहे हैं, बदल रहे हैं या उन्हें एक खास रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं जबकि विकिपीडिया खुद को बिना संपादकीय हस्तक्षेप वाला ज्ञानकोश बताता है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

राहुल गाँधी जिस इमरजेंसी के नाम पर डरा रहे हैं, क्या भारत के मौजूदा हालात में वो संभव है? जानिए संवैधानिक प्रक्रिया और इमरजेंसी लागू करने के सभी रास्ते

बीते कुछ समय से देश की राजनीति में एक अजीब सा डर का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। कॉन्ग्रेस पार्टी और विशेषकर राहुल गाँधी लगातार जनता के बीच जाकर यह नैरेटिव सेट करने में जुटे हैं कि देश में ‘इमरजेंसी’ (आपातकाल) आने वाली है, लोकतंत्र खतरे में है और संविधान को कुचला जा रहा है।

राहुल गाँधी सार्वजनिक मंचों से, प्रेस कॉन्फ्रेंस में और अपनी रैलियों में बार-बार देश की जनता को यह कहकर डरा रहे हैं कि भारत एक बार फिर 1975 के काले दौर की तरफ बढ़ रहा है। लेकिन यहाँ सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह उठता है कि क्या सचमुच आज के भारत में इमरजेंसी लगाना संभव है? या फिर राहुल गाँधी और उनकी पार्टी सिर्फ एक कोरी अफवाह फैलाकर, देश के भीतर अशांति और अविश्वास का माहौल पैदा करना चाहती है?

जब हम भारतीय संविधान, वर्तमान आर्थिक स्थिति और देश की न्यायपालिका के कड़े नियमों को देखते हैं, तो राहुल गाँधी का यह दावा पूरी तरह से खोखला, अतार्किक और हास्यास्पद नजर आता है। आज के मजबूत और डिजिटल भारत में किसी भी सरकार के लिए मनमाने ढंग से आपातकाल लागू करना नामुमकिन है।

अगर ऐसा हो तो फिर राहुल गाँधी ऐसा क्यों कर रहे हैं? क्या वो देश की जनता को भड़काकर, विदेशी ताकतों के इशारे पर भारत को गृहयुद्ध की तरफ ढकेलने की साजिश रच रहे हैं? क्या अपने राजनीतिक फायदे के लिए देश में अराजकता फैलाना सीधे-सीधे देश के साथ गद्दारी नहीं है? आइए इस पूरे विषय को संवैधानिक प्रक्रिया, इतिहास और वर्तमान वैश्विक और राष्ट्रीय हालातों के चश्मे से विस्तार से समझते हैं।

कितने प्रकार की होती है इमरजेंसी और क्या हैं संवैधानिक रास्ते?

सबसे पहला और बुनियादी सवाल तो यह है कि राहुल गाँधी जिस इमरजेंसी का डर दिखा रहे हैं, वो आखिर कौन सी इमरजेंसी है? हमारे भारतीय संविधान में आपातकाल से जुड़े बेहद स्पष्ट और कड़े प्रावधान दिए गए हैं। अगर हम राज्यों में लगने वाले राष्ट्रपति शासन (स्टेट इमरजेंसी) को थोड़ी देर के लिए अलग रख दें, तो देश के स्तर पर मुख्य रूप से दो अलग-अलग प्रकार की इमरजेंसी का जिक्र संविधान में मिलता है। संविधान निर्माताओं ने इसके लिए बकायदा कानून तय किए हैं, जो इस प्रकार हैं:

आर्थिक आपातकाल (अनुच्छेद 360): संविधान की धारा यानी अनुच्छेद 360 के तहत देश में आर्थिक आपातकाल (Financial Emergency) लगाने का प्रावधान है। यह आपातकाल तब लगाया जाता है जब देश की वित्तीय स्थिरता, साख या आर्थिक ढांचा पूरी तरह से तबाह होने की कगार पर पहुँच जाए।

राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352): संविधान का अनुच्छेद 352 राष्ट्रीय आपातकाल (National Emergency) से जुड़ा है। यह आपातकाल बेहद असाधारण और गंभीर परिस्थितियों में ही लगाया जा सकता है। इसके तहत देश की सुरक्षा और संप्रभुता सर्वोपरि होती है।

इन दोनों धाराओं के अलावा राज्यों में संवैधानिक तंत्र विफल होने पर अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है, जिसे आम बोलचाल में स्टेट इमरजेंसी कहा जाता है। लेकिन राहुल गाँधी जिस देशव्यापी आपातकाल का हौव्वा खड़ा कर रहे हैं, उसके लिए केवल अनुच्छेद 352 या 360 का ही सहारा लिया जा सकता है।

अब चलिए देखते हैं कि क्या आज इन दोनों में से किसी भी धारा को लागू करने की 1% भी गुंजाइश देश में बची है?

क्या देश में आर्थिक इमरजेंसी संभव है?

आर्थिक आपातकाल यानी अनुच्छेद 360 को लागू करने के लिए देश की वित्तीय स्थिति का पूरी तरह से वेंटिलेटर पर होना जरूरी है। इसका इस्तेमाल तब किया जा सकता है जब देश की तिजोरी (ट्रेजरी) खाली हो जाए, सरकार के पास अपने कर्मचारियों को सैलरी देने के पैसे न बचें, देश में अनाज और भुखमरी का संकट आ जाए, या देश पूरी तरह दिवालिया हो जाए। ऐसी भयावह स्थिति में ही देश की रक्षा और संतुलन बनाए रखने के लिए ट्रेजरी पर बैन लगाया जाता है और राष्ट्रपति आर्थिक आपातकाल की घोषणा कर सकते हैं।

वैसे, फिलहाल भारत के इतिहास को उठाकर देखिए। भारत ने अपने जीवनकाल में बड़े से बड़े आर्थिक संकटों का सामना किया है। साल 1991 का वो दौर याद कीजिए, जब भारत की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि देश को अपना सोना तक विदेशी बैंकों में गिरवी रखना पड़ा था।

खाड़ी युद्ध (Gulf War) की वजह से दुनिया भर में तेल का संकट था, भारत को पेट्रोल-डीजल नहीं मिल पा रहा था, देश में विदेशी मुद्रा का भारी अकाल था और अनाज की किल्लत थी। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने भारत को आसानी से पैसा देने से मना कर दिया था। भारत की खराब से खराब और सबसे दयनीय हालत में भी देश के कर्णधारों ने कभी अनुच्छेद 360 यानी आर्थिक आपातकाल का इस्तेमाल नहीं किया।

आज जब हम 2026 के भारत को देखते हैं, तो स्थिति 1991 के बिल्कुल विपरीत और स्वर्णिम है। आज भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया के लिए एक मिसाल बनी हुई है। भारत पूरी दुनिया में इकलौता ऐसा देश बनकर उभरा है, जिसके पास ऐतिहासिक रूप से बेहद मजबूत और विशाल विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) मौजूद है। दुनिया की तमाम बड़ी और प्रतिष्ठित रेटिंग एजेंसियाँ, वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ चीख-चीखकर कह रहे हैं कि भारत में आर्थिक समस्या दूर-दूर तक नहीं दिखती। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है।

ऐसे दौर में राहुल गाँधी का यह कहना कि देश में आर्थिक तानाशाही या संकट आने वाला है, समझ से परे है। क्या आज देश में ट्रेजरी बैन होने जा रही है? क्या सरकारी कर्मचारियों की सैलरी रुकने वाली है? क्या देश में अनाज की कमी है? जवाब है- बिल्कुल नहीं। जब देश आर्थिक रूप से महाशक्ति बनने की राह पर है, तो आर्थिक आपातकाल का डर दिखाना देश की जनता की बुद्धिमत्ता का अपमान करना है।

अनुच्छेद 352: क्या कॉन्ग्रेस देश को गृहयुद्ध की तरफ ढकेल रही है?

अब बात करते हैं दूसरी बड़ी धारा की, जिसके दम पर देशव्यापी इमरजेंसी लगाई जा सकती है वह है अनुच्छेद 352। संविधान के अनुसार, राष्ट्रपति इस धारा का उपयोग केवल दो ही सूरतों में कर सकते हैं: या तो भारत पर किसी विदेशी शत्रु ने आक्रमण कर दिया हो (बाहरी युद्ध), या फिर देश के भीतर सशस्त्र विद्रोह यानी गृहयुद्ध (Civil War) जैसी स्थिति पैदा हो गई हो, जिससे देश की सुरक्षा पूरी तरह खतरे में आ गई हो।

यहाँ राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस से देश की जनता को बहुत सीधे और कड़े सवाल पूछने की जरूरत है। राहुल गाँधी जिस इमरजेंसी का जिक्र करके देश के युवाओं, अल्पसंख्यकों और आम नागरिकों को डरा रहे हैं, क्या उनके पास ऐसी कोई गुप्त सूचना है कि भारत पर कोई विदेशी ताकत हमला करने वाली है? क्या चीन या पाकिस्तान भारत पर कोई बड़ा आक्रमण करने जा रहे हैं, जिसकी जानकारी सिर्फ राहुल गाँधी को है? अगर नहीं, तो फिर वह किस आधार पर आपातकाल का भय पैदा कर रहे हैं?

अगर विदेशी आक्रमण की कोई आशंका नहीं है, तो इसका दूसरा सीधा और खतरनाक मतलब यह निकलता है कि क्या राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस खुद देश के भीतर गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं? क्या वे देश की जनता को भड़काकर, समाज में जाति, धर्म और वर्ग के नाम पर ऐसी नफरत फैलाना चाहते हैं जिससे कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो जाए? क्या वे चाहते हैं कि देश में दंगे हों, हिंसा हो और सरकार के हाथ से नियंत्रण पूरी तरह निकल जाए, ताकि सरकार मजबूर होकर आपातकाल की घोषणा कर दे?

अगर ऐसा है, तो यह बेहद गंभीर और चिंताजनक मामला है। जिस तरह हमारे पड़ोसी देशों जैसे बांग्लादेश, श्रीलंका या पाकिस्तान में जनता को उकसाकर, सड़कों पर हिंसा करवाकर तख्तापलट और अराजकता का माहौल पैदा किया गया, क्या ठीक वैसा ही टूलकिट भारत में भी लागू करने की कोशिश की जा रही है?

राहुल गाँधी अक्सर विदेशी दौरों पर जाकर भारत के लोकतंत्र को कमतर आँकते हैं और विदेशी ताकतों से हस्तक्षेप की गुहार लगाते दिखते हैं। देश में झूठ का ऐसा नैरेटिव फैलाना जो लोगों को सरकार और संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ हिंसक होने के लिए उकसाए, देशद्रोह की श्रेणी में आता है। अगर कॉन्ग्रेस और उनके नेता जानबूझकर देश को गृहयुद्ध की आग में झोंकने की कोशिश कर रहे हैं, तो वक्त आ गया है कि उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए और उनकी गद्दारी का पर्दाफाश किया जाए।

साल 1978 का संविधान संशोधन: अब मनमानी मुमकिन नहीं

राहुल गाँधी शायद यह भूल जाते हैं कि आज का भारत 1975 का भारत नहीं है, जब उनकी दादी इंदिरा गाँधी ने आधी रात को बिना कैबिनेट की लिखित मंजूरी के सिर्फ अपनी सत्ता बचाने के लिए पूरे देश को जेलखाना बना दिया था। 1975 में इंदिरा गाँधी ने आंतरिक अशांति के नाम पर जो आपातकाल लगाया था, उसकी कड़वी यादें आज भी देश के जेहन में ताजा हैं। लेकिन उस काले दौर के बाद देश के संविधान को और अधिक अभेद्य और मजबूत बनाया गया।

साल 1978 में संविधान में 44वाँ संशोधन (44th Constitutional Amendment) किया गया। इस संशोधन ने सरकार की मनमानी शक्तियों पर हमेशा के लिए लगाम लगा दी। इस कानून के तहत यह अनिवार्य कर दिया गया कि-

  • आपातकाल लगाने के लिए केवल प्रधानमंत्री की सलाह काफी नहीं होगी, बल्कि पूरी कैबिनेट की ‘लिखित मंजूरी’ राष्ट्रपति को देनी होगी।
  • ‘आंतरिक अशांति’ शब्द को हटाकर उसकी जगह ‘सशस्त्र विद्रोह’ (Armed Rebellion) शब्द जोड़ा गया, ताकि कोई भी सरकार राजनीतिक विरोध को दबाने के लिए इमरजेंसी न लगा सके।
  • सबसे महत्वपूर्ण बात अगर सरकार संसद से आपातकाल को मंजूरी दिलवा भी देती है, तो भी हमारी न्यायपालिका यानी सुप्रीम कोर्ट के पास उसका ज्यूडिशियल रिव्यू (Judicial Review – न्यायिक पुनरावलोकन) करने का पूरा अधिकार होगा।

इंदिरा गाँधी के समय न्यायपालिका के हाथ बंधे हुए थे, लेकिन आज ऐसा नहीं है। अगर आज की तारीख में कोई भी सरकार मनमाने ढंग से आर्थिक या राष्ट्रीय आपातकाल लगाने की हिमाकत करती है, तो न्यायपालिका तुरंत उसका रिव्यू करेगी। कोर्ट में सरकार को देश के सारे आर्थिक आँकड़े, खुफिया रिपोर्ट और पुख्ता सबूत सामने रखने होंगे कि आपातकाल क्यों लगाया गया।

चूँकि आज देश में आपातकाल लगाने की 0.1% आशंका या आधार भी मौजूद नहीं है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ऐसी किसी भी कोशिश को एक मिनट में असंवैधानिक घोषित कर खारिज कर देगा। आज के समय में देश में आपातकाल लगाना कानूनी और संवैधानिक रूप से लगभग असंभव हो चुका है।

अनुच्छेद 356 का इतिहास और कॉन्ग्रेस का दोहरा चरित्र

आपातकाल और लोकतंत्र की दुहाई देने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी का अपना इतिहास लोकतांत्रिक मूल्यों का गला घोटने से भरा पड़ा है। अतीत में केंद्र की कॉन्ग्रेस सरकारों ने संविधान की धारा 356 (राष्ट्रपति शासन) का सबसे ज्यादा और सबसे गंदे तरीके से दुरुपयोग किया। जब भी केंद्र में कॉन्ग्रेस की सरकार होती थी और किसी राज्य में विपक्षी दल की सरकार बनती थी, तो गवर्नर के माध्यम से बहुत ही आसानी से चुनी हुई राज्य सरकारों को गिरा दिया जाता था और वहाँ इमरजेंसी (राष्ट्रपति शासन) थोप दी जाती थी।

इतिहास गवाह है कि कॉन्ग्रेस ने देश भर में करीब 90 से 100 बार अलग-अलग राज्यों की चुनी हुई लोकप्रिय सरकारों को ताश के पत्तों की तरह बिखेर दिया। अकेले इंदिरा गाँधी के कार्यकाल में दर्जनों बार इस धारा का दुरुपयोग हुआ। लेकिन आज के दौर में क्या यह संभव है?

एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994): इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद अब अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग भी पूरी तरह से बंद हो चुका है। अब अगर केंद्र सरकार किसी एक राज्य में भी दुर्भावना से धारा 356 का इस्तेमाल करती है, तो ज्यूडिशियल रिव्यू के सामने केंद्र को मुँह की खानी पड़ती है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार अवैध रूप से गिराई गई राज्य सरकारों को दोबारा बहाल करके यह साबित किया है कि अब केंद्र की तानाशाही नहीं चलेगी।

जब आज एक छोटे से राज्य में भी धारा 356 लगाना इतना मुश्किल और कानूनी पेचीदगियों से भरा है, तो फिर राहुल गाँधी पूरे देश में धारा 352 और 360 के तहत बड़ी इमरजेंसी लगने का डर कैसे दिखा सकते हैं? यह जानते हुए भी कि कानूनी तौर पर यह असंभव है, वे लगातार झूठ क्यों बोल रहे हैं?

क्या राहुल गाँधी के खिलाफ कानूनी एक्शन का समय आ गया है?

पूरे मामले का लब्बोलुआब यह है कि संवैधानिक, आर्थिक और कानूनी रूप से आज के भारत में किसी भी प्रकार की इमरजेंसी का दूर-दूर तक कोई वजूद या अंदेशा नहीं है। भारत आर्थिक रूप से समृद्ध है, देश की सीमाएँ सुरक्षित हैं और न्यायपालिका पूरी तरह स्वतंत्र और सतर्क है। ऐसे में राहुल गाँधी का इमरजेंसी वाला राग सिर्फ और सिर्फ एक राजनीतिक एजेंडा है, जिसका मकसद देश के भीतर असंतोष पैदा करना और वैश्विक मंच पर भारत की छवि को खराब करना है।

राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस पार्टी अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को वापस पाने के लिए देश की जनता को एक काल्पनिक डर का शिकार बना रही है। जब आप बिना किसी ठोस आधार के जनता को लगातार यह विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि उनके अधिकार छीने जा रहे हैं, तो आप अनजाने में या जानबूझकर उन्हें अराजकता की तरफ धकेल रहे होते हैं। यह ठीक वैसा ही खतरनाक खेल है जैसा हमारे पड़ोसी देशों में देखा गया, जहाँ अफवाहों और प्रायोजित आंदोलनों के दम पर पूरे देश को बर्बाद कर दिया गया।

अपने ही देश की सेना, न्यायपालिका, चुनाव आयोग और संसद पर अविश्वास जताना और जनता को विद्रोह के लिए उकसाने का प्रयास करना देशहित के खिलाफ है। यदि राहुल गाँधी के पास अपने दावों को साबित करने के लिए कोई संवैधानिक या तार्किक आधार नहीं है, तो देश की सुरक्षा एजेंसियों और कानूनी संस्थाओं को इस गंभीर झूठ का संज्ञान लेना चाहिए।

देश को गुमराह करने, समाज को बाँटने और भारत को गृहयुद्ध की तरफ ढकेलने की इस खतरनाक राजनीतिक गद्दारी के खिलाफ अब सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी बेहद जरूरी है, ताकि भविष्य में कोई भी नेता अपने निजी स्वार्थ के लिए देश की शांति और सुरक्षा से खिलवाड़ न कर सके।

विवादों में ‘कॉकरोचों’ का 6 जून का प्रदर्शन, दिपके ने माना- ‘नहीं ली प्रोटेस्ट की परमिशन’: समझें- SC का फैसला, 7 दिन वाला नियम और पूरा कानूनी ढाँचा

दिल्ली के जंतर-मंतर पर 6 जून 2026 को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर सोशल मीडिया पर काफी चर्चा हो रही है। पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने अमेरिका से भारत लौटकर यहाँ प्रदर्शन करने की घोषणा की है।

लेकिन विवाद इस बात को लेकर खड़ा हो गया है कि प्रदर्शन की घोषणा के बावजूद पार्टी ने दिल्ली पुलिस को पहले से लिखित सूचना नहीं दी और न ही अनुमति लेने की प्रक्रिया पूरी की। CJP का कहना है कि जंतर-मंतर एक निश्चित विरोध स्थल है, इसलिए वहाँ प्रदर्शन के लिए अलग से अनुमति की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जारी एक वीडियो में समर्थकों से अपील की थी कि वे उनके भारत पहुँचने पर दिल्ली एयरपोर्ट पर जुटें और वहाँ से संसद मार्ग थाने तक मार्च करते हुए जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करें।

दिपके ने इसे ‘शांतिपूर्ण’ और ‘संवैधानिक’ विरोध बताया था। हालाँकि इसी घोषणा के साथ यह सवाल भी उठने लगा कि क्या प्रस्तावित प्रदर्शन के लिए कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया है और क्या दिल्ली पुलिस को इसकी पूर्व सूचना दी गई है।

यहीं से सवाल उठता है कि आखिर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने का वास्तविक नियम क्या है? क्या कोई भी संगठन सीधे पहुँचकर धरना या प्रदर्शन शुरू कर सकता है या फिर इसके लिए पहले से पुलिस की मंजूरी जरूरी होती है? इस पूरे विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट के फैसले और दिल्ली पुलिस के नियमों को समझना जरूरी हो जाता है।

जंतर-मंतर क्यों बना देश का प्रमुख प्रदर्शन स्थल?

दिल्ली का जंतर-मंतर कई दशकों से देशभर के आंदोलनों, धरनों और विरोध प्रदर्शनों का केंद्र रहा है। संसद और केंद्रीय मंत्रालयों के नजदीक होने के कारण विभिन्न संगठन अपनी माँगों को सरकार तक पहुँचाने के लिए यहाँ जुटते रहे हैं।

हालाँकि समय के साथ स्थानीय निवासियों ने शोर, यातायात बाधा और सुरक्षा संबंधी समस्याओं की शिकायतें उठाईं। इसके बाद राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने 2017 में यहाँ प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?

जुलाई 2018 में मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) के तहत नागरिकों का मौलिक अधिकार है। लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है और इस पर सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा तथा अन्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ, जुलाई 2018 के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला

यह मामला तब शुरू हुआ था जब 2017 में मजदूर किसान शक्ति संगठन ने दिल्ली पुलिस द्वारा धारा 144 के तहत लगाए गए प्रतिबंधों और NGT के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें जंतर-मंतर रोड पर प्रदर्शनों पर लगभग पूर्ण रोक लगा दी गई थी। स्थानीय निवासियों ने शोर, ट्रैफिक जाम और अन्य असुविधाओं की शिकायतें की थीं, जिसके बाद यह विवाद अदालत तक पहुँचा था।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। साथ ही यह भी कहा कि प्रदर्शनकारियों के अधिकार और स्थानीय लोगों के जीवन एवं शांति के अधिकार के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। अदालत ने दिल्ली पुलिस को प्रदर्शनों के लिए विस्तृत दिशानिर्देश तैयार करने का निर्देश दिया और यह भी कहा कि ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें प्रदर्शन से पहले पुलिस को लिखित रूप से सूचित किया जाए।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए क्या प्रक्रिया है?

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दिल्ली पुलिस ने 2018 में जंतर-मंतर और अन्य निर्धारित स्थानों पर प्रदर्शन के लिए दिशानिर्देश लागू किए।

इन दिशानिर्देशों के अनुसार:

  • प्रदर्शन या सार्वजनिक कार्यक्रम के लिए पहले से लिखित आवेदन देना होता है।
  • आवेदन नई दिल्ली जिला पुलिस के संबंधित अधिकारी को दिया जाता है।
  • प्रस्तावित कार्यक्रम से कम से कम 7 दिन पहले आवेदन देना आवश्यक होता है।
  • पुलिस, ट्रैफिक विभाग, विशेष शाखा और अन्य एजेंसियाँ सुरक्षा एवं कानून-व्यवस्था के पहलुओं की समीक्षा करती हैं।
  • स्थान की उपलब्धता और सुरक्षा मूल्यांकन के बाद ही अनुमति दी जाती है।
  • एक से अधिक आवेदन होने पर प्राथमिकता पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर तय की जा सकती है।
  • सुरक्षा कारणों, VIP मूवमेंट या अन्य आपात परिस्थितियों में अनुमति बाद में भी रद्द की जा सकती है।

दिल्ली पुलिस लंबे समय से यह कहती रही है कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए पूर्व अनुमति और पूर्व सूचना आवश्यक है। इसलिए पूर्व अनुमति की व्यवस्था कोई नया नियम नहीं बल्कि कई वर्षों से लागू कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है।

अभिजीत दिपके और आम आदमी पार्टी से जुड़ाव

अभिजीत दिपके का नाम पहले भी राजनीतिक अभियानों से जुड़ता रहा है। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार वह 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी (AAP) के सोशल मीडिया और डिजिटल प्रचार तंत्र से जुड़े रहे थे।

उन्हें उन लोगों में गिना जाता था जो सोशल मीडिया कंटेंट, मीम्स, वीडियो और डिजिटल कैंपेन तैयार करने में भूमिका निभाते थे। दिपके का नाम AAP की चुनावी वॉर-रूम और सोशल मीडिया समन्वय गतिविधियों से भी जोड़ा जाता रहा है।

इंटरव्यू में उन्होंने युवाओं और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं तक पहुँचने की रणनीतियों पर भी चर्चा की थी। सोशल मीडिया पर उनके राजनीतिक विचार भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं। यही कारण है कि आलोचकों का कहना है कि दिल्ली में प्रदर्शनों से जुड़े नियमों और अनुमति प्रक्रिया से दिपके पूरी तरह अनजान नहीं हो सकते।

दिलचस्प बात यह भी है कि वर्ष 2020 में AAP की नेता आतिशी समेत अन्य नेताओं ने प्रदर्शन संबंधी अनुमति के मुद्दे पर दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था। उस दौरान दिल्ली पुलिस ने अदालत में दाखिल हलफनामे में 2018 के उन्हीं दिशानिर्देशों का हवाला दिया था, जिनके तहत जंतर-मंतर समेत संवेदनशील स्थानों पर प्रदर्शन के लिए पूर्व लिखित आवेदन आवश्यक बताया गया था।

क्या कॉकरोच जनता पार्टी ने इन नियमों का पालन किया?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कॉकरोच जनता पार्टी ने 6 जून 2026 के प्रदर्शन की घोषणा तो कर दी लेकिन प्रदर्शन से पहले आवश्यक अनुमति लेने की प्रक्रिया पूरी नहीं की थी।

विवाद तब और बढ़ गया जब बुधवार (3 जून 2026) को पत्रकार अजीत अंजुम को दिए एक इंटरव्यू में अभिजीत दिपके ने स्वयं स्वीकार किया कि उन्होंने प्रदर्शन के लिए पुलिस से अनुमति नहीं ली है। जब उनसे पूछा गया कि क्या आवश्यक अनुमति प्राप्त कर ली गई है, तो उन्होंने सीधे ‘नहीं’ में जवाब दिया।

बातचीत के दौरान जब उन्हें बताया गया कि आयोजकों को आमतौर पर पहले से आवेदन देकर प्रतिभागियों की संख्या, समय और अन्य विवरण उपलब्ध कराने होते हैं, तब दिपके ने कहा कि वह प्रदर्शन वाले दिन ही पुलिस स्टेशन जाकर अनुमति माँगेंगे।

जब उनसे पूछा गया कि पहले से आवेदन क्यों नहीं किया गया, तो उनका जवाब था, “हम अपने तरीके से काम करना चाहते हैं और उसी पर कायम रहेंगे।” एक अन्य सवाल पर उन्होंने कहा कि यदि जरूरत पड़ी तो वह अनुमति मिलने तक पुलिस स्टेशन में इंतजार करेंगे।

इन बयानों के बाद सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई कि यदि प्रदर्शन को शांतिपूर्ण और संवैधानिक बताया जा रहा है, तो स्थापित कानूनी प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं किया जा रहा।

CJP प्रवक्ताओं ने भी उठाए अनुमति व्यवस्था पर सवाल

3 जून 2026 को आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में CJP के प्रवक्ताओं ने पूर्व अनुमति की आवश्यकता पर भी सवाल उठाए। पार्टी प्रवक्ता सौरव दास ने कहा कि यदि प्रदर्शन के लिए पहले से आवेदन करना पड़े, अनुमति न मिले और फिर अदालतों का दरवाजा खटखटाना पड़े, तो ऐसी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि जंतर-मंतर पर कुछ घंटों के लिए नारे लगाकर वापस लौट जाना लोकतांत्रिक विरोध की प्रभावी संस्कृति नहीं हो सकती। इन बयानों के बाद यह चर्चा और तेज हो गई कि पार्टी मौजूदा कानूनी ढाँचे के भीतर प्रदर्शन करना चाहती है या उसी ढाँचे को चुनौती देना उसकी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है।

क्या सिर्फ निश्चित विरोध स्थल होने से अनुमति की जरूरत खत्म हो जाती है?

नहीं। यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। जंतर-मंतर को प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थान माना जाता है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई भी संगठन बिना सूचना और बिना अनुमति के वहाँ कार्यक्रम कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं अपने फैसले में कहा था कि प्रदर्शन को नियंत्रित और विनियमित तरीके से आयोजित किया जाना चाहिए तथा पुलिस पूर्व अनुमति संबंधी व्यवस्था बना सकती है। यानी जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का अधिकार है लेकिन वह नियमों और प्रशासनिक प्रक्रिया के अधीन है।

अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी

लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन एक महत्वपूर्ण अधिकार है और सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे मौलिक अधिकार माना है। लेकिन अदालत ने साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि यह अधिकार असीमित नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा और आम लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए कुछ नियमों का पालन करना आवश्यक है।

कॉकरोच जनता पार्टी का मामला इसी वजह से चर्चा में है। सवाल उनके प्रदर्शन के मुद्दे से ज्यादा उस प्रक्रिया को लेकर उठ रहा है, जिसका पालन किसी भी संगठन को करना होता है।

‘पहले मंदिर में नमाज पढ़ेंगे, फिर कहेंगे मस्जिद थी’: बुलंदशहर से भोजशाला तक, हिंदू पवित्र स्थलों पर दावों का कट्टरपंथियों का पैटर्न और लिबरल गैंग के कुतर्कों की पड़ताल

भारत में हिंदुओं के धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों पर मुस्लिम समुदाय के कुछ तत्वों द्वारा नमाज पढ़ने और फिर धीरे-धीरे उन स्थानों पर अपना कब्जा करना एक चिंताजनक पैटर्न है। यह शुरुआत बहुत ही सामान्य और मामूली दिखती है। कभी हल्की बूंदाबांदी से बचने के लिए, तो कभी थकान मिटाने के बहाने किसी मंदिर के परिसर में कदम रखा जाता है। इसके बाद वहाँ चुपचाप नमाज या इबादत अदा की जाती है।

जैसे ही ये करतूत सोशल मीडिया पर आती है या स्थानीय हिंदू इसका विरोध करते हैं, वैसे ही देश का एक खास वर्ग, जिसे हम ‘लिबरल हिंदू’ कहते हैं, वह छाती पीटना शुरू कर देता है। ये लिबरल जोर-जोर से रोना रोते हैं कि ‘अगर किसी ने भगवान के घर में अल्लाह की इबादत कर भी ली, तो क्या पहाड़ टूट पड़ा? ईश्वर तो एक ही है।’

लेकिन इतिहास और वर्तमान की घटनाएँ चीख-चीखकर गवाही देती हैं कि यह कोई मासूम इबादत नहीं, बल्कि एक बेहद सोची-समझी क्रोनोलॉजी है। इन्हीं लिबरल हिंदुओं के कुतर्कों से ऐसी कट्टरपंथी सोच को सबसे ज्यादा बल मिलता है। इसके बाद मामला सिर्फ नमाज तक सीमित नहीं रहता। कुछ ही वर्षों में वह पूरा स्थल मलिहाबाद के कंस किले या धार की भोजशाला जैसे विवादों में फँस जाता है। अंत में स्थिति यह हो जाती है कि हिंदुओं को अपनी ही प्राचीन जगहों के लिए दशकों तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है।

सबसे विडंबना की बात तो यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में गाली भी वही हिंदू खाते हैं जो अपने संवैधानिक और धार्मिक अधिकारों की बात करते हैं। समाज का लिबरल ताना-बाना उन दंगाइयों से कभी सवाल नहीं पूछता जिन्होंने चुपके से या बलपूर्वक उस जगह पर कब्जा किया हो।

बुलंदशहर : हनुमान मंदिर में नमाज

इस पूरे विवाद को समझने के लिए सबसे पहले हमें उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर की ताजा घटना को देखना होगा। यहाँ एक प्राचीन हनुमान मंदिर परिसर को साजिश के तहत नमाज स्थल में बदलने की धृष्टता की गई। 31 मई को मकान निर्माण के दौरान मुस्लिम राजमिस्त्री असर मोहम्मद और उसके साथियों की नीयत अचानक बदल गई। दोपहर में जैसे ही मौका मिला, वे सीधे हनुमान मंदिर के भीतर घुस गए।

बूंदाबांदी का बहाना बनाया गया। मजबूरी का ढोंग रचा गया। इस पूरे मौके का फायदा उठाकर असर मोहम्मद ने पवित्र मंदिर परिसर के भीतर नमाज पढ़ डाली। उसका साथी नजर मोहम्मद इस पूरे दुस्साहस के दौरान सुरक्षा कवच बनकर वहीं मुस्तैद खड़ा रहा। यह साफ तौर पर हिंदुओं की धार्मिक सहिष्णुता की पीठ में छुरा घोंपने और आस्था के केंद्र पर कब्ज़े की आक्रामक शुरुआत थी।

Video Viral होते ही स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पुलिस प्रशासन भारी फोर्स को तुरंत मौके पर तैनात करना पड़ा। पुलिस ने इस साजिश को भांपते हुए त्वरित कार्रवाई की। मुख्य कट्टरपंथी असर मोहम्मद, नजर मोहम्मद और उन्हें सह देने वाले मकान मालिक राजकुमार के खिलाफ गंभीर धाराओं में FIR दर्ज की गई। मुख्य आरोपित असर मोहम्मद को तुरंत चालान कर सलाखों के पीछे धकेला गया।

लिबरल हिंदुओं के आत्मघाती तर्क: कट्टरपंथ को ऑक्सीजन देने वाली सोच

जब भी बुलंदशहर जैसी घटनाएँ देश के किसी कोने में होती हैं, तो सेक्युलर और लिबरल की फौज सोशल मीडिया पर सक्रिय हो जाती है। इनके तर्क इतने खोखले और आत्मघाती होते हैं कि वे सीधे तौर पर बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक चेतना को सुन्न कर देते हैं। आइए इन लिबरलों के प्रमुख तर्कों को समझते हैं।

‘ईश्वर और अल्लाह में कोई भेद नहीं है’: लिबरल हिंदुओं का सबसे पहला और पसंदीदा तर्क यही होता है। वे कहते हैं कि मंदिर भी भगवान का घर है, इसलिए वहाँ अगर किसी ने सच्चे दिल से अपने अल्लाह को याद कर लिया, तो इससे मंदिर अपवित्र नहीं हो जाता। वे इसे ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ का सबसे सुंदर उदाहरण बताकर पेश करने लगते हैं।

‘जगह की कमी या मजबूरी का बहाना’: बुलंदशहर मामले में भी यही तर्क दिया गया कि बाहर बारिश हो रही थी, इसलिए मुस्लिम मजदूर मंदिर के अंदर चले गए। लिबरल इस पर भावुक होकर लिखते हैं कि ‘क्या एक प्यासे को पानी और एक नमाजी को दो गज जमीन देना भी अपराध है?’ वे इसे पूरी तरह एक मानवीय दृष्टिकोण से जोड़कर असली खतरे से ध्यान भटका देते हैं।

विरोध करने वाले हिंदुओं को ‘कट्टरपंथी’ बताना: जो हिंदू समाज इस तरह की अनधिकृत नमाज का विरोध करता है और कानून की शरण लेता है, उसे ये लिबरल तुरंत ‘नफरती चिंटू’, ‘सांप्रदायिक’ या ‘कट्टरपंथी’ का टैग दे देते हैं। उनके अनुसार, विरोध करने वाले लोग देश का माहौल खराब कर रहे हैं, न कि वे लोग जो मंदिर की मर्यादा भंग कर रहे हैं।

इन्हीं आत्मघाती और कायरतापूर्ण तर्कों के कारण कब्जा करने वाली ताकतों के हौसले बुलंद होते हैं। वे जान जाते हैं कि हिंदू समाज का एक बड़ा हिस्सा खुद ही उनके इस अतिक्रमण का बचाव करने के लिए खड़ा हो जाएगा।

हमारा विरोध बेवजह नहीं: क्यों अब सचेत और आक्रामक होने लगा है हिंदू समाज?

हिंदू समाज का यह विरोध किसी नफरत या बेवजह के डर पर आधारित नहीं है। इसके पीछे सैकड़ों वर्षों का कड़वा अनुभव और वर्तमान में लगातार सामने आ रहे धोखे हैं। हिंदू समाज अब अच्छी तरह समझ चुका है कि हर ऐसी ‘मासूम शुरुआत’ का अंत एक बहुत बड़े विवाद और उनके पवित्र स्थल के छिन जाने के रूप में होता है।

जब इतिहास में बार-बार एक ही तरह का धोखा हुआ हो, तो आने वाली पीढ़ियों का सचेत होना स्वाभाविक है। हिंदुओं ने देखा है कि कैसे उनके सीधेपन और उदारता का नाजायज फायदा उठाया गया। आज का हिंदू समाज यह भली-भांति जानता है कि यदि आज बुलंदशहर के हनुमान मंदिर में नमाज पढ़ने पर चुप्पी साध ली गई, तो कल उसी मंदिर के गर्भगृह पर दूसरा पक्ष अपना दावा ठोक देगा। यह डर काल्पनिक नहीं है, बल्कि इसके पीछे मलिहाबाद और धार जैसे दर्जनों जीवित और सुलगते हुए उदाहरण मौजूद हैं।

मलिहाबाद का कंस किला विवाद: तीन साल की ‘इबादत’ ने कैसे छीन लिया पासी समाज का हक

इस पूरी रणनीति का सबसे सटीक उदाहरण उत्तर प्रदेश के लखनऊ स्थित मलिहाबाद का है। यहाँ कांसमंडी इलाके में ऐतिहासिक ‘राजपासी राजा कंस का किला’ स्थित है। यह किला पासी समाज के गौरवशाली इतिहास का प्रतीक है और उनके लिए एक अत्यंत पवित्र एवं आस्था का केंद्र है। लेकिन यहाँ जो कुछ हुआ, वह आँखें खोलने वाला है।

लगभग तीन साल पहले, बहराइच जिले से मौलाना जमील अहमद नाम का एक व्यक्ति यहाँ आया और इस ऐतिहासिक किले के एक हिस्से में रहने लगा। शुरुआत में उसने बहुत ही सामान्य तरीके से किले के परिसर की सफाई करने की अनुमति माँगी। इसके बाद उसने वहाँ चुपचाप नमाज अदा करना शुरू कर दिया। स्थानीय हिंदुओं ने उदारता दिखाते हुए तब इसका विरोध नहीं किया। लेकिन धीरे-धीरे मौलाना जमील ने इस ऐतिहासिक धरोहर को पूरी तरह मुस्लिम गतिविधियों का केंद्र बना दिया।

28 मार्च 2026 को यह विवाद तब पूरी तरह फूट पड़ा जब ‘लाखन आर्मी’ नामक संगठन ने मलिहाबाद थाने में एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में बेहद चौंकाने वाले खुलासे किए गए। मौलाना जमील अहमद ने राजा कंस के किले पर अवैध तरीके से कब्जा कर लिया था और वहाँ ‘सुलेमानिया स्कूल’ नाम से एक अवैध मदरसा संचालित करना शुरू कर दिया था। इस मदरसे में नबीपनाह गाँव के करीब 20 हिंदू बच्चों को लाया जाता था। शिक्षा की आड़ में उन बच्चों का ब्रेनवॉश किया जा रहा था और उनका धर्म परिवर्तन कराने का एक बड़ा केंद्र विकसित किया जा रहा था। लाखन आर्मी ने पुलिस से इस अवैध कब्जे को तुरंत हटाने की माँग की।

इसके बाद स्थिति और खराब हो गई। 26 मई 2026 को कांसमंडी कला स्थल पर बने इस कथित विवादित ढांचे को लेकर तनाव इतना गहरा गया कि प्रशासन को भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा। पासी समाज ने बड़े मंगल के मौके पर इस कंस किले के परिसर में सुंदरकांड का पाठ करने का एलान किया था। लेकिन प्रशासन ने कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए हिंदुओं को सुंदरकांड पढ़ने की इजाजत नहीं दी। पासी समाज के अध्यक्ष को उनके घर में ही नजरबंद कर दिया गया और अन्य समर्थकों को किले के आसपास भी फटकने नहीं दिया गया।

यहाँ तक कि बकरीद की नमाज पर भी रोक लगानी पड़ी। पुलिस ने पासी समाज के 15 बड़े नेताओं को नोटिस थमाकर सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी। अब स्थिति यह है कि जिस पासी समाज का वह किला था, उसी समाज के लोगों को वहाँ जाने से रोका जा रहा है, और यह सब सिर्फ तीन साल पहले शुरू हुई एक ‘मासूम नमाज’ के कारण हुआ है।

धार का भोजशाला विवाद: खिलजी और दिलावर के आक्रमण से लेकर आज तक की कानूनी लड़ाई

ठीक ऐसा ही एक और ऐतिहासिक और दर्दनाक उदाहरण मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ‘भोजशाला’ का है। भोजशाला मूल रूप से 11वीं शताब्दी में राजा भोज द्वारा निर्मित एक अत्यंत भव्य और पवित्र वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर और एक महान संस्कृत विश्वविद्यालय था। यह सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए परम पूजनीय और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है।

लेकिन अलाउद्दीन खिलजी और दिलावर खान जैसे क्रूर मुस्लिम आक्रमणकारियों ने इस पवित्र परिसर को बेरहमी से रौंदा। उन्होंने मंदिर के वैभव को नष्ट करने का पूरा प्रयास किया, लेकिन वे इसके सनातन धार्मिक निशानों को पूरी तरह नहीं मिटा सके। बाद में मुस्लिम पक्ष ने इस पूरे परिसर पर अपना दावा ठोक दिया और इसे ‘कमाल मौलाना मस्जिद’ कहना शुरू कर दिया।

यह विवाद आधुनिक भारत में भी हिंदुओं के लिए नासूर बना रहा। 21 मई 2022 को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ द्वारा दायर एक महत्वपूर्ण याचिका को स्वीकार किया। इस याचिका में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के 7 अप्रैल 2003 के उस विवादित आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत ASI ने हर शुक्रवार को मुस्लिमों को इस प्राचीन मंदिर परिसर के भीतर नमाज पढ़ने की अनुमति दे दी थी।

हिंदू संगठनों ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कोर्ट के सामने पुख्ता ऐतिहासिक प्रमाण प्रस्तुत किए। हिंदुओं की माँग है कि भोजशाला परिसर में देवी सरस्वती की मूल मूर्ति को फिर से स्थापित किया जाए। साथ ही पूरे परिसर की आधुनिक वीडियोग्राफी कराई जाए और केंद्र सरकार से यहाँ बनी प्राचीन कलाकृतियों और मूर्तियों की ‘रेडियो कार्बन डेटिंग’ जाँच कराई जाए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। फिर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए भोजशाला को वाग्देवी मंदिर माना और हिंदुओं को पूजा करने का अधिकार मिला। लेकिन एक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद।

सीताराम गोयल का ऐतिहासिक दस्तावेज: मंदिरों को ध्वस्त कर बनाई गईं 1800 से अधिक मस्जिदें

यह तर्क कि ‘मुस्लिम शासकों या कट्टरपंथियों ने कभी मंदिरों पर कब्जा नहीं किया’, पूरी तरह से झूठा और इतिहास विरोधी है। साल 1990 में प्रख्यात इतिहासकार सीताराम गोयल ने अरुण शौरी, हर्ष नारायण, जय दुबाशी और राम स्वरूप जैसे विद्वानों के साथ मिलकर एक अत्यंत प्रामाणिक और शोध-आधारित किताब प्रकाशित की थी, जिसका नाम है-‘हिंदू टेंपल्स: व्हाट हैपन्ड टू देम’ (Hindu Temples: What Happened To Them)।

इस किताब के 2 सेक्शन में मुस्लिम आक्रमणकारियों और शासकों द्वारा किए गए ऐतिहासिक अत्याचारों का पूरा कच्चा चिट्ठा खोला गया। सीताराम गोयल ने देश भर में 1800 से अधिक ऐसे विशिष्ट स्थानों, मस्जिदों, मजारों और विवादित ढांचों की पहचान की, जिन्हें या तो सीधे तौर पर हिंदू, जैन और बौद्ध मंदिरों को ध्वस्त करके बनाया गया या फिर उन मंदिरों को तोड़ने के बाद निकले मलबे, खंभों और कलाकृतियों का इस्तेमाल करके खड़ा किया गया।

इस किताब के दूसरे भाग, ‘द इस्लामिक एविडेंस’ (The Islamic Evidence) में तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारों और मुगल काल के आधिकारिक दस्तावेजों का हवाला देते हुए इस बात के अकाट्य प्रमाण दिए गए हैं कि कैसे हिंदू आस्था के केंद्रों को मिटाकर उन पर इस्लामिक विजय के प्रतीक खड़े किए गए। इस किताब में दी गई राज्यवार सूची आज के हिंदुओं को जागरूक करने के लिए काफी है।

सीताराम गोयल की किताब के आँकड़े भारत के अलग-अलग राज्यों की एक कड़वी कहानी बयाँ करते हैं। सबसे पहले उत्तर प्रदेश की बात करते हैं। यहाँ ऐसी 299 जगहें हैं जहाँ मंदिरों को नुकसान पहुँचाया गया। वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद इसका बड़ा उदाहरण है। यह प्राचीन विश्वेश्वर मंदिर को तोड़कर बनी है। लखनऊ की टीले वाली मस्जिद भी पहले लक्ष्मण टीला मंदिर थी। मेरठ की जामी मस्जिद को एक बौद्ध विहार पर बनाया गया। अयोध्या का राम मंदिर विवाद भी इसी का हिस्सा रहा है।

उत्तर प्रदेश के इन विवादों पर बड़े बयान भी सामने आए। 31 जुलाई 2023 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साफ कहा था कि ज्ञानवापी को मस्जिद कहना गलत है। उसके भीतर आज भी त्रिशूल और हिंदू धर्म के निशान मौजूद हैं। ASI के सर्वे में वहाँ शिवलिंग भी मिला है। वहीं दूसरी तरफ 6 अगस्त 2020 को राम मंदिर भूमि पूजन के अगले ही दिन ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष साजिद रशीदी ने एक विवादित बयान दिया। उन्होंने धमकी दी थी कि मंदिर को दोबारा तोड़कर वहाँ फिर से बाबरी मस्जिद बनाई जाएगी। इसके लिए उन्होंने तुर्की के हागिया सोफिया का उदाहरण दिया था।

अब बात करते हैं दक्षिण और पश्चिम भारत के राज्यों की। कर्नाटक में ऐसी 192 जगहें हैं। वहाँ के प्राचीन हिंदू शहर बीदर और बीजापुर को पूरी तरह मुस्लिम राजधानियों में बदल दिया गया। वहाँ की सोला खंबा मस्जिद और जामी मस्जिद पूरी तरह हिंदू मंदिरों के मलबे से बनी हैं। तमिलनाडु में 175 ऐसी जगहें हैं। तिरुचिरापल्ली में नाथर शाह वाली की दरगाह एक शिव मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी। वहाँ मंदिर के पवित्र शिवलिंग का उपयोग दरगाह में दीपक रखने के आधार के रूप में किया गया।

गुजरात और राजस्थान में भी यही सब हुआ। गुजरात में ऐसी 170 जगहें हैं। प्राचीन मंदिरों को नष्ट करके अहमदाबाद शहर को मुस्लिम स्वरूप दिया गया। अहमद शाह की जामी मस्जिद इसका सीधा उदाहरण है। द्वारका और सोमनाथ में भी कई मस्जिदें मंदिर के स्थानों पर बनी हैं। राजस्थान में भी 170 ऐसी जगहें हैं। अजमेर को नष्ट करके वहाँ 1199 में ‘अढ़ाई-दिन-का-झोंपरा’ और मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह बनाई गई। जालोर की तोपखाना मस्जिद में पार्श्वनाथ जैन मंदिर के पत्थर और सामग्री लगी है।

मध्य भारत और बाकी राज्यों की स्थिति भी अलग नहीं है। मध्य प्रदेश में 151 ऐसी जगहें हैं। भोपाल की जामी मस्जिद प्राचीन सभामंडल मंदिर के स्थान पर बनी है। महाराष्ट्र में 143 जगहें हैं। मुंबई की प्रसिद्ध मैना हज्जम की मज़ार महालक्ष्मी मंदिर को तोड़कर बनी है। आंध्र प्रदेश में 142 जगहें हैं। वहाँ की जामी मस्जिद वेणुगोपालस्वामी मंदिर को नष्ट करके बनाई गई थी। पश्चिम बंगाल में 102 जगहें हैं जहाँ हिंदू राजधानी को नष्ट करके मुस्लिम शहर बसाए गए।

कम संख्या वाले राज्यों में भी यही तरीका अपनाया गया। बिहार में 77 जगहें हैं जहाँ जैन और हिंदू मंदिरों को मजार में बदला गया। हरियाणा में भी 77 जगहें हैं। हिसार का निर्माण फिरोज शाह तुगलक ने प्राचीन अग्रोहा शहर के मंदिरों के मलबे से किया था। दिल्ली में 72 ऐसी जगहें हैं। कुतुब मीनार परिसर और कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद को 27 भव्य हिंदू और जैन मंदिरों को तोड़कर बनाया गया। ओडिशा में 12 और पंजाब में 14 ऐसी जगहें हैं जहाँ मंदिरों के स्थान पर मस्जिदें बनीं। असम, केरल और लक्षद्वीप में 2-2 ऐसी जगहें हैं। लक्षद्वीप की स्थिति यह है कि आज वहाँ की आबादी लगभग 100 प्रतिशत मुस्लिम हो चुकी है। दीव और हिमाचल प्रदेश में भी 1-1 ऐसा ऐतिहासिक उदाहरण मिलता है जहाँ प्राचीन मंदिरों की सामग्री से मस्जिद या गेट बनाए गए।

भरूच की जामा मस्जिद का विवाद: इतिहास के पन्नों से निकलता सच

सीताराम गोयल की इसी किताब में दर्ज गुजरात के भरूच जिले की ‘जामा मस्जिद’ का मामला है। 7 जनवरी 2026 को भरूच शहर की यह ऐतिहासिक जामा मस्जिद फिर से विवादों में आई थी। ‘अखिल भारतीय संत समिति’ के संतों ने आरोप लगाया कि यह मस्जिद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में होने के बावजूद यहाँ धड़ल्ले से अवैध निर्माण किया जा रहा है और पुरातत्व विभाग के कड़े नियमों की सरेआम धज्जियाँ उड़ाई जा रही।

संतों ने इन गंभीर आरोपों के साथ मस्जिद के बाहर एक बड़ा धरना प्रदर्शन किया था। स्थिति इतनी तनावपूर्ण थी कि पुलिस और जिला प्रशासन को बीच-बचाव करने के लिए आना पड़ा। प्रशासन ने संतों को उचित कार्रवाई का भरोसा देते हुए दो महीने का समय माँगा, जिसके बाद संतों ने अपना धरना समाप्त किया।

इस धरने के बाद इतिहासकार सीताराम गोयल की किताब का वह हिस्सा दोबारा चर्चा में आया, जिसमें स्पष्ट लिखा था कि भरूच की इस जामा मस्जिद का निर्माण साल 1321 में वहाँ स्थित अत्यंत प्राचीन हिंदू और जैन मंदिरों को तोड़कर किया गया था। मस्जिद के भीतर आज भी जो खंभे और स्तंभ खड़े हैं, वे चीख-चीखकर अपने जैन और हिंदू मूल के होने की गवाही दे रहे हैं।

क्या मंशा सच में इबादत की होती है? मूर्तियों और मंदिरों पर हमलों का कड़वा सच

जो लिबरल और सेक्युलर बुद्धिजीवी यह दलील देते हैं कि ‘मुस्लिमों की मंशा केवल इबादत की होती है और वे हिंदू पूजा स्थलों को भी उसी सम्मान से देखते हैं’… उन्हें पिछले कुछ सालों में देश के विभिन्न हिस्सों में हुए इन हमलों और मूर्तियों के खंडित किए जाने की घटनाओं का जवाब देना चाहिए।

अहमदाबाद के पिराना मंदिर पर मुस्लिम भीड़ का हमला (8 मई 2024)- अहमदाबाद के पिराना स्थित ऐतिहासिक ‘प्रेरणा पीठ निष्कलंकी मंदिर’ पर अचानक एक हिंसक मुस्लिम भीड़ धावा बोल देती है। विश्व हिंदू परिषद इस हमला का Video भी जारी करती है। इस वीडियो में जालीदार टोपी पहने सैकड़ों मुस्लिम हाथों में लकड़ी और लोहे के डंडे लेकर मंदिर परिसर में घुसते है।

वहाँ कट्टरपंथी भीड़ तोड़फोड़ करती है। फिर इस जगह पर मुस्लिम पक्ष दावा करती है कि यहाँ पहले दरगाह थी, जबकि यहाँ हमेशा से हिंदुओं का मंदिर ही था। इस बात की अफवाह भी उठाई जाती है कि मंदिर प्रशासन ने वहाँ से कुछ प्राचीन कब्रें हटाई थी। इसके बाद स्थानीय मुस्लिमों की भीड़ जमा होकर हमला और हिंसा फैलाती है। इस हमले में भीड़ मंदिर के गर्भगृह के भीतर स्थापित हिंदू देवी-देवताओं की कई पवित्र मूर्तियों को तोड़ देती है।

मुरादाबाद में देवी की प्रतिमा को पैरों से ठोकर मारी (23 सितंबर 2023)- उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में घृणास्पद घटना होती है। गाँव के रहने वाले सुरेश कुमार 21 सितंबर को वहाँ बन रहे एक नए देवी मंदिर पर मजदूरी का काम करते हैं। शाम के समय वहाँ गफूर का बेटा सद्दाम अपने दो साथियों नियाज़ी और अबरार के साथ पहुँचता है। सद्दाम मंदिर के गेट और पाइप के बारे में पूछताछ कर विवाद शुरू करता है। जब सुरेश इसका विरोध करता है तो सद्दाम हिंदुओं को गंदी-गंदी गालियाँ बकना शुरू करता है।

इसके बाद सद्दाम निर्माणाधीन मंदिर के अंदर घुसकर वहाँ स्थापित की जाने वाली देवी की पवित्र मूर्ति पर अपने पैरों से ठोकर मारता है और धमकी देता है कि ‘इस मूर्ति को उठाकर अपने हिंदुओं के मोहल्ले में ले जाओ, वरना तुम्हारा अंजाम बहुत बुरा होगा।’ बाद में पुलिस सद्दाम को गिरफ्तार करती है।

बिहार के दरभंगा में दुर्गा मंदिर पर पथराव (23 जुलाई 2023)- बिहार के दरभंगा में मोहर्रम का झंडा लगाने को लेकर दो समुदायों में विवाद होता है। कट्टरपंथियों की भीड़ जानबूझकर एक प्राचीन माँ दुर्गा मंदिर के ठीक सामने मोहर्रम का मजहबी झंडा लगाती है। मंदिर में मौजूद हिंदू श्रद्धालु जब इसका शांतिपूर्वक विरोध करते हैं तो कुछ मुस्लिम पक्ष के लोग मजहबी नारे लगाना शुरू करते हैं। देखते ही देखते इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ दुर्गा मंदिर को निशाना बनाते हुए पत्थरबाजी शुरू करती है। इस पथराव में दुर्गा माता का मंदिर पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाता है और कई श्रद्धालु इस हमले में घायल हो जाते है। पुलिस को स्थिति नियंत्रण में लेने के लिए भारी लाठीचार्ज करना पड़ा।

बरेली में काँवड़ियों पर मस्जिद से पथराव (23 जुलाई 2023)- उसी दिन बरेली जिले में पवित्र सावन महीने में अपनी धार्मिक यात्रा पर जा रहे काँवड़ यात्रियों के एक जत्था अचानक हमला करता है। ‘हिंदू जागरण मंच’ के अनुसार, जब काँवड़िए बालखंडी नाथ मंदिर के पास से गुजरते हैं तो वहाँ स्थित एक बड़ी मस्जिद के अंदर से काँवड़ियों पर पथराव किया जाता है। मस्जिद की छतों से बड़े-बड़े पत्थर फेंके जाते हैं, जिससे कई काँवड़िए लूल-लहान होते हैं। हमलावर जानबूझकर मस्जिद के भीतर से काँवड़ यात्रा को निशाना बनाते हैं।

दिल्ली के चाँदनी चौक में मंदिर के भीतर तोड़फोड़-आगजनी (2 जुलाई 2019)- दिल्ली के चाँदनी चौक इलाके में अचानक आधी रात को एक मामूली विवाद के बाद सैकड़ों इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ हंगामे पर उतर आती है। इस्लामी भीड़ चाँदनी चौक में स्थित एक प्राचीन हिंदू मंदिर का दरवाजा तोड़कर अंदर घुसती है। कट्टरपंथी मंदिर के अंदर स्थापित भगवान की पवित्र मूर्तियों को पूरी तरह नष्ट करते हैं।

मंदिर के पर्दों और धार्मिक सामग्रियों को आग के हवाले कर दिया। मूर्तियों की सुरक्षा के लिए लगाए गए मोटे कांच के शील्ड भी ईंटों से तोड़ देते हैं और पूरे मंदिर परिसर में जूते चप्पल और ईंटें फैला देते हैं। हमलावर लगातार ‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाह-हू-अकबर’ के मजहबी नारे लगाती है। पुलिस बल के हस्तक्षेप करने पर इस्लामी भीड़ पुलिसकर्मियों पर भी पथराव करती है।

इबादत के ढोंग में कब्जे की साजिश

इन सभी घटनाओं को देखकर एक बात तो साफ हो जाती है कि हिंदुओं के पवित्र स्थानों पर नमाज अदा करना कोई भूल नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा है। अगर इन लोगों के मन में अल्लाह की इबाबत ही करना होता, तो ये हिंदू मंदिरों पर कब्जा नहीं करते। साफ है कि इनका असली मकसद दूसरे धर्म के प्रतीकों को मिटाना है। वे इन पवित्र जगहों पर अपने मजहब का ठप्पा लगाना चाहते हैं। हमारे देश के लिबरल हिंदू इसे बहुत बड़ी उदारता समझते हैं। लेकिन कट्टरपंथी इसे हिंदुओं की कमजोरी और कायरता मानते हैं।

इतिहास गवाह है कि जो समाज जागरूक नहीं रहता, उसका अस्तित्व मिट जाता है। बुलंदशहर की घटना पर आज का हिंदू समाज तुरंत एक्शन ले रहा है। वे पुलिस में FIR दर्ज कराकर मामले को तुरंत खत्म करना चाहता है। आज की जरा सी लापरवाही कल एक बड़े विवाद को जन्म दे सकती है। पुराने मामलों में हमने मलिहाबाद और भोजशाला जैसी अंतहीन कानूनी लड़ाई देखी है, जिसमें अपनी ही जमीन पर हक साबित करने के लिए हिंदुओं की पीढ़ियाँ कोर्ट के चक्कर काटती रही हैं। इसलिए अब ऐसे मामलों पर विश्वास करने से अच्छा है कि तुरंत इनकी मंशा समझकर साजिश को खत्म किया जाए।

AC ब्लास्ट के बढ़ते मामलों के पीछे चीन का हाथ? जानिए कैसे घटिया गैस से बढ़ रहा घरों में विस्फोट का खतरा, भारत सरकार कर रही बैन लगाने पर विचार

गर्मी में AC (एसी) की खपत काफी बढ़ गई है। इस बीच कई जगहों पर एसी में धमाके की खबरे भी सामने आ रही हैं। इन धमाकों के पीछे कहीं न कही चीन का हाथ हो सकता है। ऐसा इसीलिए क्योंकि अब एसी में चायनीज गैसें भरी जा रही हैं। ये सस्ती होती हैं इसलिए मैकेनिक इसका इस्तेमाल धड़ल्ले से कर रहे हैं। घर के लोगों को पता भी नहीं होता कि उन्होंने एसी में जो गैस भरवाई है, वह उनके विनाश का कारण बन सकता है।

दरअसल आजकल एसी में R-32 गैस का इस्तेमाल किया जा रहा है। पहले R-22, R-410 जैसी गैंसें इस्तेमाल होती थी, जो कम ज्वलनशील (बहुत आसानी से आग पकड़ लेने वाली) थी। हालाँकि R- 32 पर्यावरण के ख्याल से बेहतर माना जाता है, लेकिन ये ज्वलनशील गैस है। ऐसी ही हालत R-152a को लेकर है। इस गैस का आयात बड़ी मात्रा में चीन से हो रहा है। अनुमान के मुताबिक, 2024 में अप्रैल के महीने तक करीब 5000 टन की भारी मात्रा इसका आयात हुआ था। ये सारे गैस मुख्य रूप से चीन से आते हैं। इससे एसी में ओवरहीटिंग की दिक्कत आती है।

सुरक्षित R-22 की बजाय सेकेंडरी रिफिलर R-152a को मिलाकर इस्तेमाल किया जा रहा है। ये काफी ज्वलनशील हैं। इसलिए एसी में इसके किसी भी तरह के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा हुआ है। यानी अकेले या मिश्रण के तौर पर R-152a का इस्तेमाल भारत में नहीं किया जा सकता। इसका इस्तेमाल हेयर स्प्रे और डिओडरेंट में किया जाता है। इतना ही नहीं ये पर्यावरण के दृष्टिकोण से भी काफी खतरनाक है। क्योंकि इसके जलने से कार्बन मोनोऑक्साइड और हाईड्रोजन फ्लोराइड जैसे गैस निकलते हैं। इसलिए R-152a जैसे रेफ्रिजिरेंट के इस्तेमाल की वजह से एसी में विस्फोट की घटनाएँ बढ़ गई हैं।

दिल्ली, नोएडा समेत कई जगहों पर एसी में हुआ धमाका

मई 2026 में दिल्ली में घटी घटनाओं ने इस ओर लोगों का ध्यान खींचा। दिल्ली के हौज खास में रिटायर IAS अधिकारी धनेन्द्र कुमार के घर में एसी में आग लग गई, जिसमें झुलसकर उनकी मौत हो गई। उनका बेटा भी इसकी वजह से गंभीर रूप से जल गया। ऐसे ही एक मामले में राजधानी के विवेक विहार में हुए एसी ब्लास्ट में एक ही परिवार के 5 लोगों की जान चली गई।

इसी तरह दिल्ली के शाहदरा इलाके में 3 मई 2026 को AC फटने से आग लग गई, जिसमें 9 लोगों की जान चली गई। ग्रेटर नोएडा में भी AC फटने की घटना से घर का पूरा सामान जल गया। अप्रैल में ग्रेटर नोएडा में ही AC फटने की 6 घटनाएँ हो चुकी हैं। इस मामले में अग्निशमन विभाग का कहना है कि एसी के गैस रिसाव के कारण ये हादसा हुआ। हो सकता है कि एसी में नकली रेफ्रिजरेंट गैसों का इस्तेमाल हुआ हो।

कैसे चायनीज गैस बनी संकट, सरकार ने उठाए कदम

इन हादसों ने हमें सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि आखिर किस तरह इससे बचा जाए। सरकार को इस चायनीज गैस R-152a के आयात पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की जरूरत है। वर्तमान में यह गैस सीधे तौर पर प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन भारत सरकार के विदेश व्यापार महानिदेशक ने इसके आयात को ‘प्रतिबंधित’ श्रेणी में रखा है। R-152a को आयात करने के लिए डीजीएफटी से वैध लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य है। सुरक्षा और दुरुपयोग को रोकने के लिए डीजीएफटी और सरकार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि आयात केवल ‘वास्तविक औद्योगिक उपयोग’ तक ही सीमित हो, ताकि यह गैस खुले बाजार में न बिके।

विशेषज्ञों और सुरक्षा एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि नकली या मिलावटी गैस बेची गई है, जो अत्यधिक ज्वलनशील कैमिकल (जैसे R40/मिथाइल क्लोराइड) पाए गए। ऐसी गैसें एसी के डिजाइन के अनुरूप नहीं होतीं। यदि सिस्टम में ऐसी गैस भर दी जाए जो मूल डिजाइन से अधिक ज्वलनशील हो, तो लीकेज की स्थिति में स्पार्क मिलने पर आग लग सकती है। इससे विस्फोट और कंप्रेसर फेल होने का खतरा भी बढ़ जाता है।

मिलावटी गैसों के खिलाफ भी कार्रवाई सरकार कर रही है। लोगों को भी इसको लेकर जागरुक करने की जरूरत है। भारत में बिकने वाले अधिकांश एसी और रेफ्रिजरेंट गैसों की सप्लाई चेन में चीन की अहम भूमिका है। चीन से नकली, मिलावटी और गलत लेबल लगी हुई या अवैध तरीके से आई खतरनाक गैस लोगों की जान पर बन आई है।

चीन ने मार दिए 10000+ लोग, भारत के वामपंथी करते रहे बचाव: पढ़ें- 37 साल पहले तियानमेन स्क्वायर के प्रदर्शन, सरकार की कार्रवाई और लेफ्ट के रुख की पूरी कहानी

4 जून 1989 का दिन था, चीन की राजधानी बीजिंग में तियानमेन स्क्वायर पर हजारों छात्र, मजदूर और आम नागरिक इकट्ठा हुए थे। ये लोग लोकतांत्रिक सुधार, भ्रष्टाचार पर लगाम और राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव की माँग कर रहे थे।

इन लोगों को उम्मीद थी कि कुछ बदलेगा लेकिन यह दिन इन हजारों लोगों का आखिरी दिन बन गया। कुछ ही घंटों बाद सड़कों पर टैंक उतर आए, गोलियाँ चलीं और आंदोलन का दमन कर दिया गया।

37 साल बाद भी यह सवाल दुनिया भर में पूछा जाता है कि आखिर तियानमेन स्क्वायर में हुआ क्या था? चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने इतना बड़ा कदम क्यों उठाया? उस समय चीन के वामपंथी नेताओं का क्या तर्क था? और सबसे महत्वपूर्ण, भारत के वामपंथी दलों ने इस घटना को किस नजर से देखा?

क्या था तियानमेन स्क्वायर प्रोटेस्ट आखिर क्यों हुआ था शुरू?

1980 के दशक में चीन आर्थिक सुधारों के दौर से गुजर रहा था। देंग शियाओपिंग के नेतृत्व में बाजार आधारित सुधार लागू किए जा रहे थे। इन सुधारों से अर्थव्यवस्था तो तेजी से बढ़ी लेकिन इसके साथ भ्रष्टाचार, महँगाई और असमानता भी बढ़ने लगी।

15 अप्रैल 1989 को चीन के पूर्व कम्युनिस्ट नेता हू याओबांग का निधन हो गया। हू याओबांग को सुधारवादी नेता माना जाता था और छात्रों के बीच उनकी अच्छी छवि थी। उनकी मौत के बाद हजारों छात्र उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए बीजिंग के तियानमेन स्क्वायर में जुटने लगे।

लोकतंत्र समर्थक मार्च तियानमेन स्क्वायर, बीजिंग, 4 मई, 1989 (फोटो साभार – AP)

धीरे-धीरे यह श्रद्धांजलि सभा एक बड़े राजनीतिक आंदोलन में बदल गई। छात्र सिर्फ शोक नहीं मना रहे थे, बल्कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई, प्रेस की अधिक स्वतंत्रता, राजनीतिक सुधार और सरकार में पारदर्शिता की माँग भी कर रहे थे।

कुछ ही हफ्तों में आंदोलन पूरे देश में फैल गया। बीजिंग के अलावा कई अन्य शहरों में भी प्रदर्शन होने लगे। लाखों लोग छात्रों के समर्थन में सड़कों पर उतर आए। यह कम्युनिस्ट चीन के इतिहास का सबसे बड़ा जन आंदोलन बन गया।

क्यों थे चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर मतभेद?

तियानमेन आंदोलन को लेकर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर एक जैसी सोच नहीं थी। पार्टी के कुछ नेता मानते थे कि छात्रों की माँगों को सुना जाना चाहिए और बातचीत के जरिए समाधान निकाला जा सकता है।

उस समय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव झाओ जियांग नरम रुख रखते थे। वे छात्रों के बीच गए और उनसे बातचीत की कोशिश भी की। उनका मानना था कि आंदोलन को बल प्रयोग से नहीं बल्कि राजनीतिक संवाद से समाप्त किया जाना चाहिए।

लेकिन पार्टी के दूसरे धड़े का मानना था कि यह आंदोलन सिर्फ सुधारों की माँग नहीं कर रहा बल्कि कम्युनिस्ट शासन को चुनौती देने की दिशा में बढ़ रहा है। उन्हें डर था कि अगर आंदोलन जारी रहा तो चीन में भी वही स्थिति पैदा हो सकती है जो उस समय सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के कई देशों में बन रही थी। आखिरकार कठोर रुख रखने वाले नेताओं का पक्ष भारी पड़ा और सरकार ने आंदोलन के खिलाफ सख्त कार्रवाई का फैसला कर लिया।

चीनी सरकार ने आंदोलन को कैसे किया खत्म?

20 मई 1989 को बीजिंग में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया। सेना को राजधानी में भेजा गया लेकिन शुरुआत में प्रदर्शनकारियों और स्थानीय लोगों ने सैनिकों को आगे बढ़ने से रोक दिया। हालात लगातार तनावपूर्ण होते गए। आखिरकार 3 और 4 जून 1989 की रात चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को तियानमेन स्क्वायर और उसके आसपास के इलाकों को खाली कराने का आदेश दिया गया।

टैंक और बख्तरबंद वाहन सड़कों पर उतरे। सैनिकों ने भीड़ को हटाने के लिए बल का इस्तेमाल किया। कई जगह गोलीबारी भी हुई। इसके बाद आंदोलन पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।

इस कार्रवाई में कितने लोग मारे गए, इसे लेकर आज भी विवाद बना हुआ है। चीन की सरकार संख्या को कम कर के बताती है, जबकि मानवाधिकार संगठनों, पत्रकारों और कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों का दावा है कि मरने वालों की संख्या सैकड़ों से लेकर हजारों तक हो सकती है। हालाँकि एक बात पर लगभग सभी सहमत हैं कि यह कार्रवाई बेहद हिंसक थी और उसने चीन के इतिहास पर स्थायी प्रभाव छोड़ा।

चीन ने 200 लोगों और कई सुरक्षाकर्मियों के मारे जाने का दावा किया था। वहीं ब्रिटिश सरकार के एक डॉक्यूमेंट में सामने आया था कि चीनी सेना की कार्रवाई में कम से कम 10,000 लोग मारे गए थे।

चीन के वामपंथियों और कम्युनिस्ट सरकार का क्या तर्क था?

पश्चिमी देशों और मानवाधिकार संगठनों ने इस कार्रवाई को लोकतंत्र समर्थक आंदोलन का दमन बताया लेकिन चीन की कम्युनिस्ट सरकार का नजरिया बिल्कुल अलग रहा।

सरकार ने आंदोलन के एक हिस्से को ‘काउंटर रिवोल्यूशनरी’ यानी क्रांति-विरोधी गतिविधि बताया। चीनी नेतृत्व का दावा था कि कुछ ताकतें देश में अस्थिरता पैदा करना चाहती थीं और कम्युनिस्ट शासन को कमजोर करने की कोशिश कर रही थीं।

देंग शियाओपिंग और उनके समर्थकों का मानना था कि अगर उस समय सख्त कदम नहीं उठाए जाते तो चीन भी सोवियत संघ की तरह राजनीतिक अराजकता और टुकड़ों में टूटने की ओर बढ़ सकता था। इसी वजह से चीनी कम्युनिस्ट पार्टी आज भी आधिकारिक रूप से यह मानती है कि 1989 में उठाया गया कदम देश की स्थिरता और विकास के लिए जरूरी था।

सालों बाद भी चीन के कई सरकारी नेता इसी तर्क को दोहराते रहे हैं। उनका कहना है कि उस समय लिए गए फैसलों की वजह से चीन राजनीतिक रूप से स्थिर रहा और दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सका।

तियानमेन स्क्वायर नरसंहार का जिक्र होते ही भारत में वामपंथी दलों की भूमिका और उनके रुख पर भी सवाल उठने लगते हैं। दुनिया भर में जहाँ लोकतंत्र समर्थक छात्र-युवाओं पर चीनी सेना की कार्रवाई की आलोचना हुई तो वहीं भारत के कई वामपंथी नेता और संगठन चीन की कम्युनिस्ट सरकार के बचाव में खड़े नजर आए।

सवालों के घेरे में भारतीय वामपंथी दलों का रवैया

वामपंथ के एक बड़े वर्ग ने चीन के आधिकारिक दावों को स्वीकार करते हुए सैन्य कार्रवाई को सही ठहराने की कोशिश की। उनका तर्क था कि चीन में राजनीतिक अस्थिरता और क्रांति के विरोध को रोकने के लिए कठोर कदम जरूरी थे। कई वामपंथी नेताओं ने पश्चिमी मीडिया पर घटना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आरोप भी लगाया।

आलोचकों का कहना है कि जो वामपंथी दल भारत में लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की बात करते हैं, वही चीन में छात्रों और नागरिकों के खिलाफ हुई सैन्य कार्रवाई पर अक्सर दोहरे मापदंड अपनाते दिखाई देते हैं। उनके अनुसार, वैचारिक नजदीकी के कारण कई वामपंथी नेता चीन की कम्युनिस्ट सरकार की आलोचना करने से बचते रहे हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया में 16 जून 1989 को प्रकाशित एक लेख के अनुसार, CPI(M) और CPI ने इस कार्रवाई की खुलकर निंदा नहीं की। इन दलों के नेताओं ने इसे चीन का आंतरिक मामला बताया। कुछ नेताओं ने यह भी कहा कि छात्रों का आंदोलन राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर रहा था, इसलिए चीनी सरकार की कार्रवाई को गलत नहीं माना जाना चाहिए।

इसका उदाहरण CPI(M) के वरिष्ठ नेता और केरल के मंत्री एम वी गोविंदन का बयान है। उन्होंने कहा था कि उनकी पार्टी यह नहीं मानती कि तियानमेन स्क्वायर आंदोलन को खून में डुबो दिया गया था।

16 जनवरी 1990 को टाइम्स ऑफ इंडिया के एक संपादकीय में कहा गया कि CPI(M) ने सार्वजनिक रूप से तियानआनमेन स्क्वायर में हुई कार्रवाई का बचाव किया था। CPI(M) के आधिकारिक मलयालम अखबार ‘देशाभिमानी‘ ने छात्र प्रदर्शनकारियों को उपद्रवी बताया था। अखबार में चीनी सरकार द्वारा की गई सैन्य कार्रवाई के समर्थन में भी बातें कही गई थीं।

7 नवंबर 1990 को लोकसभा में विजय कुमार मल्होत्रा ने आरोप लगाया था कि तियानआनमेन स्क्वायर में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन को टैंकों से कुचले जाने के बाद भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियों ने चीनी सरकार का समर्थन किया था।

राजनीतिक स्तर पर चीन के प्रति नरम रुख अपनाने वाले नेताओं की वजह से भारतीय वामपंथ की भूमिका लगातार विवादों और आलोचनाओं का विषय बनी रही। इसलिए तियानमेन स्क्वायर की चर्चा में भारतीय वामपंथी दलों को ले कर ये कहा जाता है कि उन्होंने लोकतांत्रिक अधिकारों की तुलना में वैचारिक प्रतिबद्धता को अधिक महत्व दिया।

टैंक मैन की तस्वीर कैसे बन गई प्रतिरोध का वैश्विक प्रतीक?

तियानमेन स्क्वायर की चर्चा बिना ‘टैंक मैन‘ के अधूरी मानी जाती है। 5 जून 1989 को एक तस्वीर दुनिया भर में प्रकाशित हुई। तस्वीर में एक अकेला व्यक्ति हाथ में बैग लिए टैंकों के सामने खड़ा दिखाई देता है। वह टैंकों के रास्ते में खड़ा होकर उन्हें आगे बढ़ने से रोकने की कोशिश करता है।

फोटो साभार – गेटी इमेजेज

उस व्यक्ति की पहचान आज तक आधिकारिक रूप से नहीं हो सकी है। लेकिन उसकी तस्वीर दुनिया भर में साहस, प्रतिरोध और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रतीक के रूप में देखी जाती है। कई लोगों के लिए तियानमेन स्क्वायर की पूरी कहानी इसी तस्वीर में समा जाती है, एक तरफ राज्य की ताकत और दूसरी तरफ अकेला नागरिक।

37 साल बाद भी तियानमेन स्क्वायर दुनिया में चर्चा का विषय क्यों है?

तियानमेन स्क्वायर सिर्फ एक ऐतिहासिक घटना नहीं है। यह आज भी राजनीतिक बहस का हिस्सा है। चीन में इस विषय पर सार्वजनिक चर्चा बेहद सीमित है। इंटरनेट पर सेंसरशिप लागू रहती है और इस घटना की वर्षगाँठ पर सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी जाती है। कई बार स्मरण कार्यक्रमों और श्रद्धांजलि सभाओं पर भी प्रतिबंध लगाए गए हैं।

दूसरी तरफ मानवाधिकार संगठन लगातार इस घटना की निष्पक्ष जाँच, मृतकों की सही संख्या और जवाबदेही की माँग करते रहे हैं। इसी कारण हर साल 4 जून आते ही दुनिया भर में तियानमेन स्क्वायर की चर्चा फिर शुरू हो जाती है।

कभी था भू-माफियाओं का कब्जा, अब हिंदू शरणार्थियों को जमीन का अधिकार: पढ़ें- डिजिटलीकरण से भ्रष्टाचार पर रोक तक, योगी सरकार ने कैसे बदली UP की भूमि व्यवस्था

देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश ने दशकों तक भूमि प्रशासन की भयावह विफलताएँ देखी हैं। एक ओर ध्वस्त और रिश्वतखोरी से भरी भूमि राजस्व प्रणाली थी, तो दूसरी ओर भूमि माफियाओं का वर्चस्व और दशकों से भूमि के अभाव में जीवन जी रहे हिंदू शरणार्थियों की पीड़ा।

2017 में जब सरकार बदली तो यह व्यवस्था भी बदलने लगी, योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार ने सत्ता में आने के बाद इन तीनों मोर्चों पर एक साथ और निर्णायक रूप से काम किया है। इस रिपोर्ट में नीतियों और सुधारों को विस्तार से समझेंगे।

भूमि रिकॉर्ड और लेखपाल व्यवस्था की दुर्दशा

उत्तर प्रदेश की भूमि राजस्व व्यवस्था उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 पर आधारित है, जो पुराने UP Tenancy Act 1939 और UP Land Revenue Act 1901 और अन्य कानूनों की जगह बनाई गई है। इसमें नामांतरण (Property Mutation), विभाजन, सीमांकन (Demarcation) और राजस्व वसूली के प्रावधान हैं। लेकिन उस दौर में कानून की मंशा और जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का फर्क था।

जमीन के सबसे बुनियादी दस्तावेज खसरा और खतौनी मैनुअल रजिस्टरों में लेखपाल के हाथ में थे, जिनकी कोई डिजिटल कॉपी तक उपलब्ध नहीं होती थी। हर काम के लिए तहसील कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ते थे और हर चक्कर के साथ रिश्वत देना आम बात थी और आप लोगों में ये कइयों ने अनुभव भी किया होगा। फर्जी नामांतरण की भरमार थी और ‘बेनामी’ लेनदेन इतने सामान्य थे कि असली मालिक और कागजी मालिक अलग होना एक चलन बन चुका था।

भूमि माफिया और राजनीतिक संरक्षण

भूमि माफियाओं ने सरकारी जमीनों पर कब्जा कर रखा था और उन्हें खुले राजनीतिक संरक्षण का वरदान प्राप्त था। कोई कार्रवाई नहीं होती थी क्योंकि ऊपर से नीचे तक एक सुरक्षित तंत्र बना हुआ था। भूमि पंजीकरण में रिश्वत और स्टांप पेपर की कालाबाजारी आम बात थी। राजस्व न्यायालयों में लाखों मामले कई-कई वर्षों से लांबित थे क्योंकि सारी कार्रवाई मैनुअल रजिस्टरों पर निर्भर थी और वादियों को बार-बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते थे।

हिंदू शरणार्थियों की दयनीय स्थिति

1947 के बँटवारे से लेकर 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम तक और उसके बाद भी अलग-अलग समय में पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) से धार्मिक उत्पीड़न, दंगों और अस्थिरता के कारण भागे हजारों हिंदू परिवार उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में बस गए थे।

पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, बिजनौर और रामपुर जैसे जिलों में 1960 से 1975 के बीच बसे लगभग 10,000 परिवार दशकों से बिना किसी कानूनी भूमि-अधिकार के अस्थायी बस्तियों में रह रहे थे। मेरठ जिले में बंगाली हिंदू परिवार झील के लिए आरक्षित भूमि पर अस्थायी बस्ती में दशकों से रह रहे थे। इन परिवारों के पास न तो अपना घर बनाने का अधिकार था, न जमीन खरीदने की कानूनी स्थिति।

भूलेख पोर्टल और भूमि रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण

पहले जमीन से जुड़े कामों के लिए लोगों को लेखपाल पर काफी निर्भर रहना पड़ता था। पीढ़ियों तक लेखपाल ही जमीन के कागजात और रजिस्टरों का मुख्य जिम्मेदार माना जाता था। लेकिन 2025-26 आते-आते यह व्यवस्था डिजिटल हो गई। अब राज्य सरकार के आधिकारिक पोर्टल upbhulekh.gov.in पर कोई भी व्यक्ति घर बैठे अपनी जमीन का खसरा, खतौनी और भू-नक्शा आसानी से देख सकता है। इस बदलाव से करोड़ों किसानों और जमीन मालिकों को बार-बार लेखपाल के चक्कर लगाने और मनमानी का सामना करने से काफी राहत मिली है।

डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड्स मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम (DILRMP) के तहत 2024 तक देश के लगभग 98.5% ग्रामीण भूमि रिकॉर्ड डिजिटल किए जा चुके हैं। उत्तर प्रदेश के भूलेख पोर्टल पर अब ग्रामीण जमीन पर लिए गए बैंक लोन की जानकारी भी उपलब्ध है।

इसके साथ ही दो बड़े बदलाव और किए गए हैं- जमीन के रिकॉर्ड को सहमति के आधार पर आधार नंबर से जोड़ना और राजस्व न्यायालयों को कम्प्यूटरीकृत करके उन्हें भूमि रिकॉर्ड सिस्टम से जोड़ना। इन कदमों से फर्जी नामांतरण और एक ही जमीन पर दोहरे मालिकाना हक जैसे विवादों की संभावना लगभग खत्म हो गई है।

PM SVAMITVA: UP में 1 करोड़+ ‘घरौनी’

PM SVAMITVA योजना को ग्रामीण भारत में जमीन और संपत्ति से जुड़े सबसे बड़े बदलावों में से एक माना जाता है। इस योजना के तहत ड्रोन तकनीक की मदद से गाँवों के आबादी क्षेत्र का सर्वे किया जाता है और हर घर के लिए संपत्ति का आधिकारिक रिकॉर्ड यानी प्रॉपर्टी कार्ड या ‘घरौनी’ बनाई जाती है।

देशभर में अब तक 3.27 लाख से ज्यादा गाँवों का ड्रोन सर्वे पूरा हो चुका है। साथ ही 1.82 लाख से अधिक गाँवों के लिए 2.17 करोड़ संपत्ति कार्ड तैयार किए जा चुके हैं।

उत्तर प्रदेश में इस योजना को ‘घरौनी’ के नाम से जाना जाता है। पूरे देश में बनी करीब 2.23 करोड़ घरौनियों में से 1 करोड़ से ज्यादा सिर्फ उत्तर प्रदेश में हैं। इनमें से 78 लाख से अधिक कार्ड 56 हजार गाँवों में लोगों को बाँटे जा चुके हैं। 18 जनवरी 2025 को एक ही दिन में उत्तर प्रदेश के 29 हजार से ज्यादा गाँवों में 45.35 लाख घरौनियाँ वितरित की गई थीं।

इस कार्ड के जरिए ग्रामीण लोग अब अपनी संपत्ति के आधार पर बैंक से ऋण ले सकते हैं, जमीन से जुड़े विवाद कम होते हैं और गाँवों में संपत्ति कर तय करने में भी आसानी होती है। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि जिन ग्रामीण परिवारों के पास पीढ़ियों से जमीन पर रहने के बावजूद कोई पक्का कागज नहीं था, उन्हें पहली बार कानूनी पहचान और संपत्ति का आधिकारिक अधिकार मिल रहा है।

भू-माफिया टास्क फोर्स का गठन- 65000 एकड़ भूमि मुक्त

2017 में सत्ता में आते ही योगी सरकार ने एंटी भू माफिया टास्क फोर्स का गठन किया। CM योगी आदित्यनाथ खुद यह कह चुके हैं कि जब उन्होंने 2017 में सत्ता संभाली तो उत्तर प्रदेश में कोई लैंड बैंक उपलब्ध नहीं था क्योंकि बड़े भूखंड माफियाओं द्वारा अतिक्रमित थे। टास्क फोर्स ने अवैध अतिक्रमणकारियों की पहचान की और सार्वजनिक भूमि वापस ली।

CM योगी ने कुछ दिनों पहले एक कार्यक्रम के दौरान बताया था कि एंटी-लैंड माफिया टास्क फोर्स ने राजस्व विभाग की करीब 65,000 एकड़ भूमि अब तक मुक्त कराई है। इस जमीन का इस्तेमाल गरीबों के लिए आवास, बुनियादी ढाँचे और उद्योग के लिए आवंटित किया जा रहा है। मुक्त कराई गई भूमि पर खेल मैदान, युवा कल्याण और MGNREGA कार्यों को प्राथमिकता दी गई।

भूमि माफिया अभियान केवल राजस्व भूमि तक सीमित नहीं रहा। योगी सरकार के सत्ता में आते ही 2017-18 में ही 19 जिलों में 1,870.664 हेक्टेयर वन भूमि अतिक्रमण से मुक्त कराई गई, जिसका उपयोग वार्षिक वृक्षारोपण अभियान में किया गया। वन विभाग ने जिला स्तरीय भू-माफिया सेल के साथ समन्वय करते हुए यह कार्यवाही की।

संपत्ति पंजीकरण में सुधार: फर्जी रजिस्ट्री अब लगभग असंभव, लोगों को शुल्क में भी राहत

2026 तक उत्तर प्रदेश में संपत्ति रजिस्ट्री की व्यवस्था काफी डिजिटल और पारदर्शी हो गई है। अब IGRSUP पोर्टल पर स्टांप ड्यूटी भुगतान, संपत्ति खोज, रजिस्ट्री अपॉइंटमेंट और जरूरी दस्तावेज एक ही जगह मिल जाते हैं। 1 फरवरी 2026 से संपत्ति पंजीकरण में आधार आधारित पहचान और बायोमेट्रिक सत्यापन (फिंगरप्रिंट/आईरिस) अनिवार्य कर दिया गया है।

सरकार पंजीकरण में मदद के लिए ‘निबंधन मित्र’ नियुक्त करने और कई नए उप-पंजीयक कार्यालय खोलने की तैयारी कर रही है ताकि लोगों को आसानी हो। योगी सरकार ने रिश्तेदारों के बीच संपत्ति हस्तांतरण पर स्टांप ड्यूटी घटाकर सिर्फ ₹5,000 कर दी जिससे लाखों परिवारों को राहत मिली।

जुलाई 2025 में महिलाओं को 1 करोड़ रुपए तक की संपत्ति खरीदने पर 1% स्टांप ड्यूटी छूट देने का फैसला भी लिया गया। पहले यह छूट सिर्फ ₹10 लाख तक की संपत्ति पर (अधिकतम ₹10,000) थी। साथ ही सरकार ने बिना पंजीकृत संपत्तियों और बकाया स्टांप ड्यूटी की वसूली के लिए अभियान चलाया जिसमें करोड़ों रुपये की वसूली का लक्ष्य रखा गया।

1960 से 1975 के बीच पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में धार्मिक हिंसा और उत्पीड़न के कारण कई हिंदू परिवार अपना घर छोड़कर भारत आए और उत्तर प्रदेश के पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, बिजनौर और रामपुर जैसे जिलों में बस गए। इसके अलावा अलग-अलग समय पर पाकिस्तान से आए सिंधी और पंजाबी हिंदू, बांग्लादेश से आए हिंदू परिवार और हाल के वर्षों में तालिबान शासन के बाद अफगानिस्तान से आए हिंदू-सिख परिवार भी उत्तर प्रदेश में शरण लेकर बसे।

इनमें खासकर बंगाली हिंदू परिवार 1970 के आसपास पूर्वी पाकिस्तान से आए थे और मेरठ-हस्तिनापुर इलाके में वर्षों तक रह रहे थे लेकिन उनके पास स्थायी जमीन या कानूनी अधिकार नहीं थे।

साल 2021 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार ने इन बंगाली हिंदू परिवारों के पुनर्वास की दिशा में बड़ा फैसला लिया। 63 हिंदू बंगाली परिवारों के लिए कानपुर देहात के रसूलाबाद तहसील के ग्राम भँसाया में 121.41 हेक्टेयर जमीन पुनर्वास विभाग को दी गई ताकि इन परिवारों को बसाया जा सके। सरकार ने मुख्यमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत हर परिवार को मकान बनाने के लिए ₹1.20 लाख की मदद दी। साथ ही मनरेगा के तहत बस्ती के आसपास जमीन सुधार और सिंचाई जैसी सुविधाएँ देने की भी योजना बनाई गई।

इसके बाद जनवरी 2026 में उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने मेरठ जिले में दशकों से रह रहे 99 बंगाली हिंदू परिवारों के लिए एक और बड़ा पुनर्वास पैकेज मंजूर किया। ये परिवार मवाना तहसील के नंगला गुसाई गाँव में झील के लिए आरक्षित जमीन पर अस्थायी बस्ती बनाकर रह रहे थे। सरकार ने फैसला लिया कि इन्हें कानपुर देहात के रसूलाबाद क्षेत्र में स्थायी रूप से बसाया जाएगा ताकि उन्हें सुरक्षित और स्थायी जीवन मिल सके।

जुलाई 2025 में मुख्यमंत्री योगी ने एक उच्च स्तरीय बैठक में अधिकारियों को निर्देश दिया कि हिंदू शरणार्थियों को जमीन का मालिकाना हक दिया जाए। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ पुनर्वास नहीं बल्कि सामाजिक न्याय, मानवता और राष्ट्रीय जिम्मेदारी का मामला है। इसके तहत पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, बिजनौर और रामपुर में 1960-1975 के बीच बसे करीब 10 हजार परिवारों के जमीन संबंधी मामलों की जाँच के निर्देश दिए गए।

जिन परिवारों को पहले खेती या रहने की जमीन मिली थी, उनके अधिकारों को कानूनी रूप से मजबूत करने और जहाँ जमीन उपलब्ध नहीं है वहाँ दूसरी जमीन देने की बात कही गई। इस अभियान में 2,500 से ज्यादा बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थी परिवारों को कानूनी भूमि स्वामित्व देने की प्रक्रिया शामिल है।

अप्रैल 2026 में सीएम योगी ने पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) से विस्थापित कुल 331 हिंदू परिवारों को लखीमपुर खीरी जिले में पुनर्वासित किया था। इन 331 परिवारों का बँटवारा करने के लिए तहसील धौरहरा के गाँव सुतकुईया में 97 परिवार बसाए गए। तहसील गोला के ग्राम संख्या-3 में 37 परिवारों को जगह मिली। इसके अलावा तहसील मोहम्मदी के गाँव मोहनगंज (कॉलोनी) में 41 परिवारों की बसाहट की गई।

पीलीभीत जिले में लगभग 2,196 परिवार पूर्वी पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों के रूप में दर्ज हैं, जो 25 गाँवों में बसे हुए हैं। इन्हें 1960 के दशक में आवास और खेती के लिए जमीन दी गई थी, पर कानूनी मालिकाना हक नहीं मिला। रिकॉर्ड में कहीं जमीन वन विभाग के अधीन दर्ज हो गई, कहीं म्यूटेशन (नामांतरण) नहीं हुआ।

पीलीभीत के जिलाधिकारी ने बताया कि 2,196 में से 1,466 परिवारों की सत्यापन रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजी जा चुकी है और अंतिम दिशानिर्देश मिलते ही उन्हें कागज देने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। यह प्रक्रिया केवल पीलीभीत तक सीमित नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के उन सभी जिलों में लागू की जा रही है, जहाँ ऐसे शरणार्थी बसाए गए थे।

हिंदुओं को जमीन देने और उनके लिए पुनर्वास की व्यवस्था करने का सिलसिला लगातार जारी है। बीते 2 जून 2026 को ही सीएम योगी ने पाकिस्तान से विस्थापित 1645 परिवारों और पूर्व सैनिकों और लीजधारकों को भूमिधरी अधिकार पत्र वितरित किए।

चुनौतियाँ और भविष्य की राह

हालाँकि, इन सुधारों के बीच कुछ चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं। सबसे बड़ी समस्या डिजिटल व्यवस्था को लेकर है। ग्रामीण इलाकों के बुजुर्गों और कम पढ़े-लिखे या निरक्षर भूमि-मालिकों के लिए ऑनलाइन प्रणाली का इस्तेमाल करना आसान नहीं है। सरकार की ‘निबंधन मित्र’ योजना इसी परेशानी को कम करने के लिए लाई जा रही है, जिसमें प्रशिक्षित लोग दस्तावेज और पंजीकरण प्रक्रिया में मदद करेंगे लेकिन यह व्यवस्था अभी पूरी तरह लागू नहीं हुई है।

इसी तरह जमीन से जुड़े मामलों में डिजिटल पोर्टल आने के बावजूद लेखपाल की भूमिका पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। कई जगहों पर लोगों को अब भी जमीन से जुड़े कामों के लिए लेखपाल पर निर्भर रहना पड़ता है जिससे भ्रष्टाचार और मनमानी की शिकायतों की संभावना बनी रहती है।

दूसरी ओर, शरणार्थियों के पुनर्वास को लेकर भी कुछ परिवारों ने अपनी चिंता जताई। उनका कहना था कि उन्हें मेरठ जिले के भीतर ही बसाया जाए क्योंकि कानपुर देहात जैसे दूसरे जिलों में जाने से रोजगार, पुराने सामाजिक संबंध और रोजमर्रा के जीवन पर असर पड़ सकता है। इस दिशा में भी सरकार काम कर रही है।

इंडिया टुडे की जिस खबर को पढ़ लहालोट हो रही थी मोहम्मद जुबैर एंड वामपंथी गैंग, वो निकली फर्जी: UP में 5 दिन में नहीं हुई 8056 मौतें, जानिए क्या है सच्चाई

उत्तर प्रदेश में भीषण गर्मी को लेकर इंडिया टुडे ने फर्जी खबर चलाई है। खबर में दावा किया गया कि लू (हीटवेव) चलने के कारण राज्य में 5 दिन में 8,056 लोगों की मौत हो गई। इंडिया टुडे ने यह दावा केवल ‘फ्रंटियर्स इन एनवायरमेंटल हेल्थ’ के एक अध्ययन के आधार पर किया है। इस रिपोर्ट में लिए गए ‘आँकड़ों’ का कोई स्रोत नहीं है।

इंडिया टुडे ने यह रिपोर्ट ‘5 दिनों में 8056 मौतें: हीटवेव के दौरान उत्तर प्रदेश सबसे घातक राज्य बनकर उभरा है’ (8056 deaths in 5 days: UP emerges as India’s deadliest state during heatwaves) हेडलाइन के साथ प्रकाशित की थी। हालाँकि, अब इस रिपोर्ट को डिलीट कर दिया गया है।

(स्क्रीनशॉट साभार: X-IndiaToday)

इस हेडलाइन में साफ तौर पर उत्तर प्रदेश में 5 दिन में 8,056 मौत का आँकड़ा दिया जा रहा है। यह रिपोर्ट अध्ययन पर टिकी हुई है। अध्ययन का सोर्स विश्वसनीय है, लेकिन अध्ययन में भी सटीक आँकड़ा नहीं दिया गया है। क्योंकि हकीकत कुछ और है। इस रिपोर्ट से केवल लोगों के बीच भ्रम फैलाने का काम किया जा रहा है।

इंडिया टुडे ने किस आधार पर गढ़ी फर्जी खबर?

यह बात सही है कि इंडिया टुडे ने अपनी इस रिपोर्ट को विश्वसनीय सोर्स के हवाले से प्रकाशित किया है। इसका सोर्स ‘फ्रंटियर्स’ है, जिसने पर्यावरण स्वास्थ्य पर अध्ययन के आधार पर भारत के 10 शहरों में लू के चलते ‘अनुमानित’ मौतों के बारे में बताया है, जो कि हेडलाइन से भी साफ है-भारत के जिलों में लू के कारण होने वाली अतिरिक्त मौतों का अनुमान।

इस रिपोर्ट में बताया गया कि अध्ययन के अनुसार, ‘अनुमान’ लगाया गया कि एक दिन की भीषण गर्मी से राष्ट्रीय स्तर पर लगभग 3,400 अतिरिक्त मौतें होती हैं, जबकि पाँच दिनों की लू से लगभग 30,000 मौतें होती हैं। इसमें उत्तर प्रदेश का ‘अनुमान’ लगाया गया कि राज्य में लू के दौरान पाँच दिनों में लगभग 8,100 अतिरिक्त मौते होती हैं। इसके अलावा अहमदाबाद, जयपुर और सूरत जैसे जिलों में इसे 250 से अधिक अतिरिक्त मौते बताई गईं।

(फोटो साभार: Frontiers)

यानी मौत की जो संख्या बताई जा रही है वह कहीं दर्ज नहीं है, यह केवल अनुमान है जो साल 2024 में भीषण गर्मी से हुई मौत के अध्ययन के आधार पर लिखे गए हैं। यहाँ सबसे अहम फर्क है कि वास्तव नें ‘मौत का आँकड़ा’ नहीं बताया जा रहा है बल्कि ‘अत्यधिक मृत्यु दर’ की बात हो रही है मतलब कि 5 दिन में कितनी अतिरिक्त मौत हो सकती हैं। यह अध्ययन रिपोर्ट में भी साफ लिया गया है।

रिपोर्ट में साफ लिखा गया है, “अत्यधिक मौतें और गर्मी से हुई मौतों के आधिकारिक आंकड़े अलग-अलग चीजें मापते हैं। अत्यधिक मौतें लू के दौरान सामान्य से ज्यादा हुईं सभी मौतों को गिनती हैं, चाहे मरने का कारण कुछ भी लिखा हो। वहीं गर्मी से हुई मौतों में सिर्फ वही मामले गिने जाते हैं जहाँ मौत दर्ज करते समय डॉक्टर ने साफ लिखा हो कि मौत गर्मी की वजह से हुई है। इसलिए ये दोनों आँकड़े सीधे तौर पर एक-दूसरे से तुलना करने लायक नहीं हैं।”

(फोटो साभार: Frontiers)

ऋचा चड्ढा से लेकर ‘फैक्टचेकर’ जुबैर ने भी फैलाई फर्जी खबर

इंडिया टुडे की इस फर्जी खबर को फैलाने में वाले ‘फैक्टचेकर’ जुबैर से लेकर भारतीय सेना को अपमानित करने वाली वामपंथी फिल्म एक्ट्रेस ऋचा चड्ढा का भी हाथ रहा। दोनों ने अपने ‘एक्स’ अकाउंट पर इंडिया टुडे की खबर को रीपोस्ट करते हुए उत्तर प्रदेश की सरकार पर सवाल उठाए।

(फोटो साभार: X-RichaChadha)

ऋचा चड्ढा ने लिखा, “क्या किसी ने इस बात पर चर्चा की कि सिर्फ एक राज्य में लू से 8000 से ज्यादा लोग मर गए हैं? ये न सामान्य है, न ही सही है। लोगों, जाग जाओ, वरना तुम्हारी जिंदगी भी बस एक आँकड़ा बनकर रह जाएगी।”

(फोटो साभार: X-zoo_bear)

इसके अलावा जुबैर ने इंडिया टुडे की हेडलाइन को लिखकर इसे रीपोस्ट किया था।

क्या है हकीकत?

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने भी इंडिया टुडे की रिपोर्ट का खंडन किया है। सरकार के आपदा प्रबंधन और राहत विभाग ने कहा कि पिछले 5 दिनों से उत्तर प्रदेश के किसी भी जिले में तापमान 42 डिग्री से ऊपर नहीं गया है।

उन्होंने यह भी बताया कि सिर्फ 5 जिलों में 28 मई 2026 को तापमान 45 डिग्री से ज्यादा रहा था और सबसे ज्यादा 47.5 डिग्री रिकॉर्ड हुआ था। रिपोर्ट को लेकर विभाग ने कहा कि यह गलत है और इसमें यह भी नहीं बताया गया कि डेटा कहाँ से लिया गया है।

‘फोर्स्ड लेबर’ के नाम पर भारत पर 12.5% टैरिफ का USTR प्रस्ताव: क्या सुप्रीम कोर्ट से झटका खाने के बाद ट्रंप खोज रहे नया रास्ता?

अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि (USTR) ने करीब 60 व्यापारिक साझेदार देशों पर नए टैरिफ (आयात शुल्क) लगाने का प्रस्ताव रखा है। इन देशों पर ‘जबरन मजदूरी’ (Forced Labour) जैसे कारणों का हवाला देते हुए शुल्क लगाने की बात कही गई है। USTR ने 3 जून को 98 पन्नों की एक रिपोर्ट जारी की जिसमें भारत, चीन, जापान, पाकिस्तान, दक्षिण कोरिया, ब्राजील और स्विट्जरलैंड समेत कई देशों पर 10% से 12.5% तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव दिया गया है।

रिपोर्ट में कनाडा, मैक्सिको, ताइवान और यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन) पर 10% टैरिफ लगाने की भी सिफारिश की गई है। आरोप है कि इन देशों ने जबरन मजदूरी से जुड़े सामानों के आयात पर प्रतिबंध को सही तरीके से लागू नहीं किया।

“जबरन मजदूरी से बने सामानों के आयात पर प्रतिबंध लगाने और उसे प्रभावी तरीके से लागू करने में विभिन्न देशों की विफलता से जुड़ी नीतियाँ, कार्य और प्रथाएँ” (Acts, Policies, and Practices of Various Economies Related to the Failure to Impose and Effectively Enforce a Prohibition on the Importation of Goods Produced with Forced Labor) शीर्षक वाली रिपोर्ट में USTR ने अपनी जाँच के निष्कर्षों को विस्तार से बताया है। यह जाँच अमेरिका के 1974 के व्यापार कानून (Trade Act of 1974) की धारा 301 (b)(1) के तहत अमेरिका के व्यापारिक साझेदार देशों के खिलाफ शुरू की गई थी।

गौरतलब है कि ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 302(b)(1)(A) अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि को यह अधिकार देती है कि वह किसी विदेशी देश की नीतियों, कार्यों या प्रथाओं की जाँच शुरू कर सके और यह तय कर सके कि वे धारा 301 के तहत कार्रवाई योग्य हैं या नहीं।

धारा 301 के तहत वे नीतियाँ और प्रथाएँ कार्रवाई योग्य मानी जाती हैं जो अमेरिकी व्यापार के लिए ‘अनुचित’ या ‘भेदभावपूर्ण’ हों और अमेरिकी कारोबार पर बोझ डालती हों या उसे सीमित करती हों।

‘भारत: जाँच के निष्कर्ष’ (India: Findings of Investigation) शीर्षक वाले हिस्से में USTR ने दावा किया है कि भारत जबरन मजदूरी से बने सामानों के आयात पर प्रतिबंध को प्रभावी तरीके से लागू करने में विफल रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया, “खंड III.A.7 और III.B.7 में USTR ने पाया कि भारत जबरन मजदूरी से बने सामानों के आयात पर प्रभावी प्रतिबंध लगाने और उसे लागू करने में असफल रहा है। खंड IV में हमने पाया कि ऐसा न करना अनुचित (Unreasonable) है। वहीं, खंड V में यह पाया गया कि जबरन मजदूरी से जुड़े आयात पर प्रभावी रोक न लगाने से अमेरिकी व्यापार (U.S. Commerce) पर बोझ पड़ता है या उस पर प्रतिबंधात्मक असर होता है।”

रिपोर्ट आगे कहती है, “उपरोक्त कारणों के आधार पर जाँच के नतीजे यह संकेत देते हैं कि जबरन मजदूरी से जुड़े आयात प्रतिबंध को लागू न करने से संबंधित भारत की नीतियाँ और प्रथाएँ अनुचित हैं और अमेरिकी व्यापार पर बोझ डालती हैं या उसे सीमित करती हैं।”

प्रस्तावित टैरिफ के दायरे की बात करें तो अगर 10% से 12.5% तक के ये शुल्क मंजूर हो जाते हैं, तो ये अमेरिका में आने वाले लगभग सभी आयातित सामानों पर लागू हो सकते हैं। हालाँकि, करीब 70 उत्पादों को इससे छूट देने का प्रस्ताव रखा गया है। इनमें विमान, बीफ, कॉफी समेत कुछ अन्य सामान शामिल हैं।

इसके अलावा, USTR ने कपड़ा और परिधान (टेक्सटाइल और अपैरल) क्षेत्र के लिए सीमित मात्रा में राहत देने हेतु एक कोटा व्यवस्था (Quota Mechanism) का भी प्रस्ताव रखा है, ताकि तय सीमा तक आयात पर कुछ राहत मिल सके।

फोटो साभार : संबंधित रजिस्ट्री नोटिस

हालाँकि, USTR की इस रिपोर्ट को लेकर भारत में बहस और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए हैं लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि फिलहाल यह सिर्फ एक प्रस्ताव है जिसे मंजूरी मिलेगी या नहीं, यह अभी तय नहीं है।

इसके बावजूद विपक्ष के कई नेताओं और उनसे जुड़े मीडिया वर्ग ने भारत पर नए टैरिफ लगाने के USTR के प्रस्ताव को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘विफलता’ के रूप में पेश करना शुरू कर दिया है। इस प्रस्ताव पर आम लोगों और संबंधित पक्षों की टिप्पणियाँ 6 जुलाई तक माँगी गई हैं जिसके बाद आगे का फैसला लिया जाएगा।

भारत के खिलाफ ट्रंप  की टैरिफ मुहिम, बिगड़ते रिश्ते और अमेरिकी अदालत का बड़ा झटका

अगस्त 2025 में ट्रंप प्रशासन ने भारतीय उत्पादों पर ‘रिसिप्रोकल टैरिफ’ लगाया था और बाद में उसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया था। रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत को ‘सजा’ देने के लिए यह अतिरिक्त टैरिफ लगाया गया था।

पहले भी रिपोर्ट्स में बताया गया था कि मई 2025 के भारत-पाकिस्तान संघर्ष को खत्म कराने का श्रेय ट्रंप को देने से भारत के इनकार ने अमेरिकी राष्ट्रपति को नाराज कर दिया था। इसके बाद उन्होंने भारत के खिलाफ टैरिफ और तीखे बयान देने शुरू कर दिए।

भारत और अमेरिका कभी भी बहुत घनिष्ठ मित्र नहीं रहे हैं। सच कहें तो अमेरिका किसी का स्थायी मित्र नहीं रहा। 1796 में अपने विदाई भाषण में राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन ने कहा था कि अमेरिका को दुनिया के किसी भी हिस्से के साथ स्थायी गठबंधन बनाने से बचना चाहिए।

अमेरिका ने कभी किसी देश के साथ स्थायी गठबंधन नहीं बनाया। हालाँकि, परिस्थितियों के अनुसार उसने विभिन्न देशों के साथ संबंध विकसित किए। 1971 के युद्ध के दौरान अमेरिका ने भारत के बजाय पाकिस्तान का समर्थन किया था।

भारत के सफल परमाणु परीक्षणों के बाद भी अमेरिका ने उस पर प्रतिबंध लगाए थे। लंबे समय तक अमेरिका भारत को कमजोर करने की कोशिश करता रहा। हालाँकि, पिछले दो दशकों में चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए अमेरिका ने भारत को अपने करीब लाने की कोशिश की।

यह प्रयास किसी प्रेम या पुराने व्यवहार पर पछतावे की वजह से नहीं था बल्कि चीन के मुकाबले एक लोकतांत्रिक शक्ति के रूप में भारत को साथ लाने की रणनीति थी।

फिर डोनाल्ड ट्रंप आए और उन्होंने भारत को अपने पाले में लाने के लिए अमेरिका द्वारा वर्षों से किए गए प्रयासों को नुकसान पहुँचाया। लगभग 3 वर्षों तक भारत ने रियायती रूसी तेल खरीदा, उसे रिफाइन किया और दुनिया के कई देशों तक पहुँचाकर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को बनाए रखने में मदद की जबकि रूस पर यूक्रेन युद्ध को लेकर प्रतिबंध लगे हुए थे।

उस समय अमेरिका भी भारत द्वारा रूसी तेल खरीदने के खिलाफ नहीं था। यहाँ तक कि मई 2025 के भारत-पाकिस्तान संघर्ष तक ट्रंप को भी इससे कोई बड़ी आपत्ति नहीं थी। लेकिन जब भारत ने ट्रंप की शांति दूत वाली छवि को स्वीकार नहीं किया तो अमेरिकी राष्ट्रपति ने पाकिस्तान के प्रति नरम और भारत के प्रति आक्रामक रुख अपनाना शुरू कर दिया।

ट्रंप का रवैया काफी विरोधाभासी रहा। एक तरफ वह प्रधानमंत्री मोदी को अपना अच्छा मित्र और पसंदीदा नेता बताते रहे तो वहीं दूसरी तरफ भारत को ‘डेड इकोनॉमी’  कहकर आलोचना करते रहे। उनके अधिकारी हॉवर्ड लुटनिक, पीटर नवारो और अन्य लोग लगातार भारत पर रूस के युद्ध प्रयासों को बढ़ावा देने का आरोप लगाते रहे।

इसी दौरान भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत भी जारी रही। लेकिन जब मोदी सरकार ने भारत के डेयरी क्षेत्र को अमेरिकी उत्पादों के लिए खोलने से इनकार कर दिया तो ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों की भारत-विरोधी बयानबाजी और तेज हो गई।

इस वर्ष फरवरी में अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बंद होने से ऊर्जा संकट पैदा हो गया। तब ट्रंप प्रशासन ने भारत को रूसी तेल खरीदने की कथित ‘अनुमति’ दी ताकि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बनी रहे और कीमतें नियंत्रण में रहें।

जबकि पहले भारत के इसी कदम की आलोचना की जाती थी। लेकिन जब दुनिया को ऊर्जा आपूर्ति बनाए रखने की जरूरत पड़ी और अमेरिका खुद वैश्विक आलोचना से बचना चाहता था, तब उसने भारत की ओर रुख किया।

हालाँकि, भारत ने साफ कर दिया कि वह अमेरिकी अनुमति हो या न हो, अपनी जरूरत के अनुसार रूसी तेल खरीदता रहेगा। इसके बावजूद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने हाल ही में कहा कि अमेरिका चाहता है कि भारत जैसे देशों को रूसी तेल खरीदने की जो छूट मिली है, उसे जल्द से जल्द समाप्त किया जाए।

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि ट्रंप एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी और भारत की तारीफ करते रहे और दूसरी तरफ भारत को लेकर नस्लीय टिप्पणियों को भी बढ़ावा देते रहे। हाल ही में उन्होंने एक अमेरिकी पॉडकास्टर द्वारा भारत के लिए इस्तेमाल किए गए ‘Hellhole’ (नरक) शब्द को भी अपने सोशल मीडिया पर शेयर किया था।

पिछले महीने दो दिन की भारत यात्रा पर आए मार्को रुबियो का काफी ठंडा स्वागत किया गया। भारतीय मीडिया ने उनसे भारत के खिलाफ बढ़ते नस्लवाद, रूसी तेल और पाकिस्तान के प्रति अमेरिका के बदले रुख को लेकर कई सवाल पूछे।

महीनों तक भारत पर रूसी तेल खरीदने को लेकर निशाना साधने के बाद रुबियो ने कहा कि यह मुद्दा कभी विशेष रूप से भारत के बारे में नहीं था। हालाँकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि यदि ऐसा था तो फिर चीन, जो रूसी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है, उसके बजाय भारत को बार-बार क्यों निशाना बनाया गया।

भारत पर सबसे ज्यादा दंडात्मक टैरिफ क्यों लगाए गए? क्या इसकी वजह यह है कि अमेरिका चीन के खिलाफ उतना कठोर कदम नहीं उठा सकता क्योंकि चीन के पास दुर्लभ खनिज तत्वों (Rare Earth Elements) पर मजबूत पकड़ है, जो सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए बेहद जरूरी हैं?

दुनिया ने देखा कि ट्रंप की हालिया चीन यात्रा कोई बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं कर सकी। चीन ने ताइवान मुद्दे पर अमेरिका को सीधे संघर्ष की चेतावनी तक दे दी थी। पूरे घटनाक्रम में अमेरिका का दोहरा रवैया और कमजोरी साफ दिखाई देती है।

जैसे-जैसे भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की बातचीत आगे बढ़ी, अमेरिका ने अधिकांश भारतीय उत्पादों पर प्रभावी टैरिफ दर घटाकर 18 प्रतिशत कर दी और रूसी तेल से जुड़े 25 प्रतिशत अतिरिक्त दंडात्मक टैरिफ को भी हटा दिया।

अमेरिका ने दावा किया कि भारत अमेरिकी ऊर्जा की खरीद बढ़ाने और रूस पर निर्भरता कम करने के लिए सहमत हो गया है। हालाँकि, भारत लगातार कहता रहा है कि वह अपनी जरूरतों के अनुसार रूसी तेल खरीदना जारी रखेगा और व्यवहार में उसने ऐसा किया भी है।

नई दिल्ली में रुबियो के साथ संयुक्त प्रेस वार्ता के दौरान विदेश मंत्री एस जयशंकर ने साफ कहा था कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न स्रोतों से आपूर्ति सुनिश्चित करता रहेगा। उन्होंने यह भी कहा था कि यदि ट्रंप प्रशासन ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति पर चलता है, तो भारत की विदेश नीति ‘इंडिया फर्स्ट’ है।

स्पष्ट रूप से अमेरिका इस बात से खुश नहीं दिखता कि भारत किसी दूसरे दर्जे के आश्रित देश की तरह व्यवहार करने के बजाय अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखे हुए है। कई विश्लेषकों का मानना है कि 70 उत्पादों को छूट देने वाला यह नया टैरिफ प्रस्ताव भारत के साथ चल रही व्यापार वार्ताओं के दौरान दबाव बनाने का एक तरीका हो सकता है।

फरवरी 2026 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के टैरिफ को अवैध बताते हुए रद्द कर दिया था। अदालत के इस फैसले ने दूसरे देशों पर दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले ट्रंप के सबसे बड़े हथियार को कमजोर कर दिया।

इसके बाद से ट्रंप प्रशासन नए रास्ते तलाश रहा था और अब जबरन मजदूरी के मुद्दे को आधार बनाकर टैरिफ लगाने की कोशिश करता दिखाई दे रहा है। मंजूरी मिले या न मिले, भारत के खिलाफ यह प्रस्ताव दोनों देशों के बीच बढ़ते अविश्वास को और गहरा ही करेगा।

भारत समेत दो दर्जन से ज्यादा देशों पर ‘जबरन मजदूरी’ के नाम पर टैरिफ लगाने का यह प्रस्ताव दिखाता है कि अमेरिका अभी भी इस सोच से पूरी तरह बाहर नहीं निकला है कि वह दुनिया का ठेकेदार है और बाकी देशों को अनुशासित करने का अधिकार उसी के पास है।

भारत की प्रतिक्रिया: प्रस्ताव अंतिम नहीं, बातचीत जारी

भारत ने इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि रिपोर्ट को लेकर राजनीतिक चर्चा भले हो रही हो लेकिन प्रस्तावित टैरिफ अभी अंतिम नहीं हैं। मिनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ने एक बयान में कहा, “रिपोर्ट के अनुसार प्रस्तावित टैरिफ अभी अंतिम नहीं हैं और इच्छुक पक्ष 22 जून 2026 तक सार्वजनिक सुनवाई में भाग लेने के लिए आवेदन कर सकते हैं। लिखित टिप्पणियाँ 6 जुलाई 2026 तक जमा की जा सकती हैं। सार्वजनिक सुनवाई 7 जुलाई 2026 को आयोजित होगी। प्राप्त टिप्पणियों और गवाही पर विचार करने के बाद ही USTR अंतिम फैसला करेगा।”

भारत ने सेक्शन 301 की प्रक्रिया के तहत अमेरिका के साथ औपचारिक रूप से बातचीत शुरू कर दी है और उम्मीद है कि वह बातचीत के दौरान अपना पक्ष रखेगा। इसी के साथ नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच व्यापक व्यापार समझौते को लेकर बातचीत भी जारी है, जिसकी घोषणा 2 फरवरी 2026 को की गई थी और जिसकी पुष्टि 7 फरवरी 2026 के संयुक्त बयान में भी की गई थी।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)