पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के दूसरे चरण के लिए प्रचार का शोर सोमवार (27 अप्रैल 2026) की शाम थम गया। इस चरण में राज्य की महत्वपूर्ण सीटों पर मतदान होना है, जिसके नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएँगे। 2021 की तुलना में 2026 का यह चुनाव न केवल समीकरणों के लिहाज से अलग है, बल्कि बीजेपी की आक्रामकता और टीएमसी की रक्षात्मक मुद्रा ने इसे भारत के राजनीतिक इतिहास का सबसे दिलचस्प मुकाबला बना दिया है।
शोर-शराबे, तीखे नारों और भारी सुरक्षा के बीच बंगाल की राजनीति उस मुहाने पर खड़ी है, जहाँ से राज्य की दशा और दिशा दोनों तय होनी है। 2021 के चुनावों में ‘अबकी बार 200 पार’ का नारा देने वाली बीजेपी ने इस बार अपनी रणनीति में जमीन-आसमान का अंतर पैदा किया है। जहाँ 2021 में एक ‘हवा’ बनाने की कोशिश थी, वहीं 2026 में बीजेपी एक सोची-समझी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की तर्ज पर चुनावी मैदान में है।
चुनाव प्रचार का शोर थमने के बाद पर्दे के पीछे की उन रणनीतियों पर चर्चा शुरू हो चुकी होगी, जिन्होंने तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के अभेद्य किले में सेंध लगाने की कोशिश की है। आखिर साल 2021 से 2026 के बीच बीजेपी में क्या बदला? अमित शाह के 15 दिनों के प्रवास से लेकर पीएम मोदी की ’15 गारंटी’ तक और संदेशखाली से लेकर आरजी कर कांड के आक्रोश तक, यहाँ हर उस पहलू का विश्लेषण है जो इस चुनाव को भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे दिलचस्प मुकाबला बना रहा है।
साल 2021 से 2026 तक, बीजेपी के लिए क्या बदला?
साल 2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी एक ‘उभरती हुई शक्ति’ थी, जिसके पास उत्साह तो था लेकिन संगठन की वैसी गहराई नहीं थी जो टीएमसी के दशकों पुराने कैडर का मुकाबला कर सके। 2021 में बीजेपी का नारा ‘अबकी बार 200 पार’ एक मनोवैज्ञानिक युद्ध था, लेकिन 2026 में पार्टी ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ पर उतर आई है। पिछले पाँच वर्षों में बीजेपी ने बूथ स्तर पर अपने ‘पन्ना प्रमुखों’ की फौज खड़ी की है और टीएमसी के ‘सिंडिकेट राज’ के खिलाफ जमीनी स्तर पर प्रतिरोध तैयार किया है।
सबसे बड़ा बदलाव ‘साख’ का है। 2021 में बीजेपी को ‘बाहरी लोगों की पार्टी’ के रूप में पेश करने में ममता बनर्जी सफल रही थीं। लेकिन 2026 में, सुवेंदु अधिकारी जैसे स्थानीय चेहरों की मजबूती और मतुआ समुदाय के साथ-साथ उत्तर बंगाल में बढ़ते जनाधार ने बीजेपी को ‘बंगाल की अपनी पार्टी’ के रूप में स्थापित कर दिया है। अब बीजेपी केवल रैलियों की पार्टी नहीं रही, बल्कि वह हर पंचायत और हर ब्लॉक में टीएमसी को सीधी टक्कर दे रही है।
तीसरा मुख्य बदलाव विपक्ष की शून्यता है। 2021 तक वामदल और कॉन्ग्रेस के पास फिर भी कुछ उम्मीदें थीं, लेकिन 2026 तक आते-आते ये दल लगभग अप्रासंगिक हो चुके हैं। इसका सीधा लाभ बीजेपी को मिला है, क्योंकि जो मतदाता टीएमसी से नाराज है, उसके पास बीजेपी के अलावा कोई दूसरा व्यावहारिक विकल्प नहीं बचा है। राजनीति के इस ध्रुवीकरण ने बीजेपी को एक ‘प्राकृतिक विकल्प’ बना दिया है।
स्विंग वोटर का मनोविज्ञान, संदेशखाली से लेकर आरजी कर केस तक का प्रभाव
आम तौर पर चुनावों के समय दो तरह के मतदाता होते हैं। पहले वे जो विचारधारा या पार्टी के प्रति प्रतिबद्ध होते हैं (कैडर वोट), जो लगभग 20-30% होते हैं। लेकिन असली खेल शेष 70-80% ‘स्विंग वोटर्स’ का होता है। 2026 के चुनाव में यह स्विंग वोटर पूरी तरह से बदल चुका है। संदेशखाली में महिलाओं के साथ हुए अत्याचार और आरजी कर मेडिकल कॉलेज की हृदयविदारक घटना ने बंगाल के मध्यम वर्ग और ग्रामीण महिलाओं की आत्मा को झकझोर दिया है।
आरजी कर कांड ने विशेष रूप से शहरी और शिक्षित मतदाताओं को टीएमसी के खिलाफ खड़ा कर दिया है। जो महिलाएँ कभी ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाओं की वजह से ममता बनर्जी की मुरीद थीं, आज वे अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। संदेशखाली की घटना ने यह संदेश दिया कि स्थानीय स्तर पर टीएमसी के नेता ‘सामंत’ बन चुके हैं जो कानून से ऊपर हैं। इस आक्रोश ने उन मतदाताओं को बीजेपी की ओर धकेल दिया है जो पहले तटस्थ थे।
बीजेपी ने इस ‘भावना’ को कुशलता से वोट में बदलने का प्रयास किया है। पार्टी ने यह नैरेटिव सेट किया है कि यदि आप अपनी बहू-बेटियों की सुरक्षा चाहते हैं, तो ‘परिवर्तन’ अनिवार्य है। चूँकि वामदल और कॉन्ग्रेस इन मुद्दों पर केवल प्रतीकात्मक विरोध तक सीमित रहे, इसलिए जनता ने बीजेपी की आक्रामक सड़कों वाली लड़ाई को अधिक विश्वसनीय माना। यही कारण है कि यह विशाल ‘स्विंग वोटर’ इस बार बीजेपी के पक्ष में एक मूक क्रांति (Silent Revolution) की ओर बढ़ रहा है।
ममता सरकार के भ्रष्टाचार पर सीधा प्रहार
ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार इस चुनाव का सबसे बड़ा और ज्वलंत मुद्दा बनकर उभरा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने अपनी हर रैली में टीएमसी को ‘भ्रष्टाचार की जननी’ के रूप में चित्रित किया है। बीजेपी का आरोप है कि टीएमसी के शासन में ‘कट-मनी’ एक आधिकारिक कर बन चुका है। प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से शिक्षक भर्ती घोटाले (SSC Scam) और राशन घोटाले का जिक्र करते हुए कहा कि दीदी ने बंगाल के मेधावी युवाओं का भविष्य बेच दिया है।
अमित शाह ने भ्रष्टाचार के मुद्दे को तिजोरी से निकालकर जनता के बीच पहुँचाया। उन्होंने ईडी (ED) और सीबीआई (CBI) द्वारा जब्त किए गए नोटों के पहाड़ों का जिक्र करते हुए पूछा कि “क्या यह पैसा बंगाल की जनता का नहीं है?” बीजेपी ने डेटा साझा करते हुए बताया कि कैसे केंद्र सरकार द्वारा भेजी गई ‘अम्फान’ और ‘यस’ चक्रवात की राहत राशि टीएमसी के स्थानीय नेताओं की जेबों में चली गई। भ्रष्टाचार के इस मुद्दे ने टीएमसी के ‘ईमानदार छवि’ वाले दावों को तार-तार कर दिया है।
भ्रष्टाचार के इस चक्रव्यूह में बीजेपी ने सिंडिकेट राज को भी निशाना बनाया है। घर बनाने के लिए बालू-मिट्टी से लेकर सरकारी ठेकों तक, हर जगह टीएमसी के बिचौलियों का कब्जा होने की बात कही गई है। मोदी-शाह की जोड़ी ने यह वादा किया है कि बीजेपी की सरकार बनते ही एक विशेष कार्यबल (STF) गठित किया जाएगा जो इन भ्रष्ट नेताओं की संपत्तियों को कुर्क कर गरीबों में बाँटेगा। यह संदेश उन युवाओं के बीच बहुत प्रभावी रहा है जो बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं।
ममता बनर्जी को घेरने की ‘दोहरी चक्रव्यूह’ रणनीति
बीजेपी ने इस बार ममता बनर्जी को उनके ही घर में घेरने के लिए एक विशेष रणनीति अपनाई है। 2021 में नंदीग्राम की लड़ाई ने ममता को अपनी सीट बदलने पर मजबूर किया था, लेकिन 2026 में बीजेपी ने उन्हें दो ऐसी सीटों पर उलझा दिया है जहाँ से उनका जीतना साख का सवाल बन गया है। इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य यह है कि ममता बनर्जी पूरे बंगाल में चुनाव प्रचार करने के बजाय अपनी खुद की सीटों को बचाने में अधिक समय खर्च करें।
बीजेपी के वरिष्ठ रणनीतिकारों का मानना है कि यदि मुख्यमंत्री को उनके अपने निर्वाचन क्षेत्र में ‘असुरक्षित’ महसूस कराया जाए, तो इसका मनोवैज्ञानिक असर पूरे राज्य के कार्यकर्ताओं पर पड़ता है। जब ममता बनर्जी एक ही क्षेत्र में बार-बार रैलियाँ करती हैं, तो बीजेपी इसे “ममता की घबराहट” के रूप में प्रचारित करती है। इससे न केवल टीएमसी का कैडर हतोत्साहित होता है, बल्कि निष्पक्ष मतदाताओं को भी लगता है कि राज्य में सत्ता परिवर्तन की लहर चल रही है।
इस ‘घेराबंदी’ की रणनीति के तहत बीजेपी ने उन सीटों पर भारी भरकम केंद्रीय मंत्रियों और अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों की फौज उतार दी है। इसका मकसद ममता बनर्जी को यह संदेश देना है कि इस बार लड़ाई केवल विपक्षी दल से नहीं, बल्कि एक संगठित राष्ट्रीय शक्ति से है। बीजेपी का मानना है कि यदि ममता बनर्जी अपनी सीट पर कम अंतर से भी जीतती हैं या कड़े मुकाबले में फंसती हैं, तो यह टीएमसी की नैतिक हार होगी, जिसका फायदा बीजेपी को बाकी के चरणों में मिलेगा।
टीएमसी की राजनीतिक हिंसा, ‘खेला’ बनाम ‘सुरक्षा’
बंगाल की राजनीति में हिंसा एक स्थायी तत्व रही है, लेकिन 2021 के बाद हुई चुनाव बाद की हिंसा (Post-poll violence) ने जनता के मन में गहरा डर पैदा किया था। बीजेपी ने 2026 के चुनाव में इस ‘डर’ को ही अपना हथियार बनाया है। पार्टी का आरोप है कि टीएमसी चुनाव नहीं लड़ती, बल्कि वह प्रशासनिक मशीनरी और अपने ‘गुंडों’ के दम पर चुनाव को ‘हाईजैक’ करती है। बीजेपी ने टीएमसी के ‘खेला होबे’ नारे को हिंसा का प्रतीक बताकर उसके खिलाफ शांति और सुरक्षा’ का विकल्प रखा है।
टीएमसी नेताओं की हिंसा का जिक्र करते हुए बीजेपी ने बताया कि कैसे विपक्षी कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जाता है, उनके घर जलाए जाते हैं और उन्हें आर्थिक रूप से सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। गृह मंत्री अमित शाह ने साफ कहा है कि “बंगाल में बम और बारूद का कारखाना नहीं, बल्कि उद्योगों का जाल बिछना चाहिए।” हिंसा के मुद्दे पर बीजेपी ने चुनाव आयोग पर भी दबाव बनाया कि संवेदनशील बूथों पर केवल केंद्रीय बलों की तैनाती की जाए, ताकि मतदाता निडर होकर वोट डाल सकें।
बाहरी बनाम भीतर की लड़ाई में बीजेपी की बदली हुई आक्रामक रणनीति
साल 2021 के चुनावों में बीजेपी का पूरा फोकस ‘बाहरी’ बनाम ‘भीतरी’ की लड़ाई को संभालने और एक लहर पैदा करने पर था। उस समय बीजेपी ने टीएमसी के बागियों पर अधिक भरोसा किया था, लेकिन 2026 में रणनीति पूरी तरह बदल चुकी है। अब बीजेपी ने अपने कैडर को तैयार किया है और ‘सॉफ्ट’ के बजाय ‘अनपोलोजेटिक’ (बिना किसी हिचक के) राजनीति का रास्ता चुना है। पार्टी ने इस बार यह समझ लिया है कि बंगाल में केवल जय श्री राम का नारा काफी नहीं है, बल्कि प्रशासनिक भ्रष्टाचार और स्थानीय आक्रोश को संगठन की शक्ति से जोड़ना होगा।
बीजेपी के प्रचार का तरीका अब केवल रैलियों तक सीमित नहीं है। अमित शाह और नितिन नबीन के नेतृत्व में इस बार बूथ स्तर पर ‘पन्ना प्रमुखों’ की सक्रियता 2021 के मुकाबले तीन गुना अधिक देखी जा रही है। 2021 में बीजेपी पर आरोप लगा था कि वह चुनाव के अंत में थक गई थी, लेकिन 2026 के दूसरे चरण तक आते-आते बीजेपी की ऊर्जा कम होने के बजाय बढ़ती दिख रही है। पार्टी ने इस बार टीएमसी के ‘खेला होबे’ का जवाब ‘सेवा और न्याय’ के नैरेटिव से दिया है।
तीसरा बड़ा बदलाव उम्मीदवारों के चयन में है। 2021 में जहाँ दलबदलुओं की भीड़ थी, वहीं 2026 में बीजेपी ने अपने पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं को तरजीह दी है। इससे पार्टी के भीतर का असंतोष कम हुआ है। साथ ही चुनाव प्रचार की भाषा में भी तीखापन बढ़ा है। अब बीजेपी रक्षात्मक नहीं है, बल्कि वह टीएमसी के गढ़ में घुसकर सवाल पूछ रही है। यह आक्रामकता केवल भाषणों में नहीं, बल्कि कानूनी लड़ाइयों और सड़क पर होने वाले प्रदर्शनों में भी साफ झलक रही है।
‘घुसपैठिया बनाम भारतीय’ को बनाया राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा
पश्चिम बंगाल में टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत मुस्लिम समर्थन रहा है, जो राज्य की आबादी का लगभग 27-30% है। हालाँकि पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा हमेशा से गरम रहा है, लेकिन 2026 में बीजेपी ने इसे ‘भारतीय बनाम बाहरी’ के एक नए फ्रेम में पेश किया है।
बीजेपी का सीधा आरोप है कि टीएमसी ने अपनी वोट बैंक की राजनीति के लिए राज्य की जनसांख्यिकी (Demography) को बदल दिया है। इस बार बीजेपी ने केवल ‘घुसपैठ’ की बात नहीं की, बल्कि आधार कार्ड के अवैध वितरण और मतदाता सूची में फर्जी नामों के शामिल होने को लेकर चुनाव आयोग में भी कड़ी घेराबंदी की है।
अमित शाह ने अपनी रैलियों में स्पष्ट रूप से कहा है कि घुसपैठ बंगाल के युवाओं के रोजगार और यहाँ के संसाधनों पर डाका डाल रही है। बीजेपी ने सीएए (CAA) के कार्यान्वयन को अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया है, जिससे मतुआ समुदाय जैसे शरणार्थी समूहों में उसकी पकड़ और मजबूत हुई है। इसके साथ ही, पार्टी ने यह नैरेटिव सेट किया है कि टीएमसी ‘घुसपैठियों की संरक्षक’ है, जबकि बीजेपी ‘धरती के पुत्रों’ की रक्षक है।
इस रणनीति का एक और पहलू ‘आंतरिक सुरक्षा’ से जुड़ा है। बीजेपी ने सीमावर्ती जिलों में बढ़ते अपराधों और तस्करी को सीधे तौर पर घुसपैठ से जोड़कर स्थानीय लोगों में असुरक्षा की भावना को संबोधित किया है। बीजेपी का तर्क है कि यदि बंगाल को ‘सोनार बांग्ला’ बनाना है, तो सबसे पहले इसकी सीमाओं को सुरक्षित करना होगा। यह मुद्दा विशेष रूप से उत्तर बंगाल और सीमावर्ती दक्षिण बंगाल में बीजेपी के पक्ष में ध्रुवीकरण करने में सहायक सिद्ध हो रहा है।
हालाँकि बीजेपी को भारी मात्रा में मुस्लिम वोट मिलने की उम्मीद नहीं है, लेकिन यदि वह टीएमसी के वोट बैंक में 5-10% की भी सेंध लगा पाती है या उन्हें वोट देने से रोक पाती है, तो यह बीजेपी के लिए बड़ी जीत होगी। यह रणनीति विशेष रूप से उन जिलों में महत्वपूर्ण है जहाँ मुस्लिम आबादी निर्णायक भूमिका में है।
अमित शाह का 15 दिवसीय ‘बंगाल डेरा’
2026 के चुनाव में सबसे चौंकाने वाली बात केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का बंगाल में लगातार 15 दिनों तक रुकना है। आमतौर पर राष्ट्रीय नेता रैलियाँ करके लौट जाते हैं, लेकिन शाह ने कोलकाता को अपना अस्थायी मुख्यालय बना लिया है। यह कदम दर्शाता है कि बीजेपी के लिए बंगाल की जीत कितनी महत्वपूर्ण है। शाह का यहाँ रुकना केवल प्रचार के लिए नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर फीडबैक लेने और रणनीति को वास्तविक समय (Real-time) में बदलने के लिए है।
अमित शाह की मौजूदगी ने स्थानीय कार्यकर्ताओं में एक नई ऊर्जा भर दी है। जब देश का गृह मंत्री स्वयं गलियों में पदयात्रा करता है और छोटे-छोटे समूहों के साथ बैठकें करता है, तो इसका संदेश बहुत गहरा जाता है। शाह ने इस दौरान उन ‘साइलेंट’ मतदाताओं से संपर्क साधने की कोशिश की है जो टीएमसी के डर से खुलकर सामने नहीं आते थे। उनके इस 15 दिवसीय प्रवास ने टीएमसी के उस तंत्र को चुनौती दी है जो प्रशासन के दम पर चुनावों को प्रभावित करने का आरोप झेलता रहा है।
शाह ने इस दौरान ‘डैमेज कंट्रोल’ पर भी ध्यान दिया है। यदि किसी क्षेत्र में टिकट वितरण को लेकर नाराजगी थी, तो उन्होंने स्वयं उसे सुलझाया। इसके अलावा, उन्होंने बंगाल के बुद्धिजीवियों और सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ बैठकें करके बीजेपी की छवि को ‘बंगाल विरोधी’ होने से बचाया है। शाह का यह ‘मैराथन प्रवास’ टीएमसी के लिए एक बड़ी सिरदर्दी बन गया है, क्योंकि उन्हें अब हर दिन शाह द्वारा उठाए गए नए मुद्दों का जवाब देना पड़ रहा है।
योगी-हिमंता और 6 मुख्यमंत्रियों का ‘हिंदुत्व मोर्चा’
बीजेपी ने इस बार अपने प्रचार को धार देने के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा सहित 6 राज्यों के मुख्यमंत्रियों को मैदान में उतारा है। योगी आदित्यनाथ की रैलियों में उमड़ने वाली भीड़ यह बताने के लिए काफी है कि बंगाल में ‘कठोर शासन’ और ‘हिंदुत्व’ के मॉडल की कितनी मांग है। हिमंता बिस्वा सरमा ने विशेष रूप से घुसपैठ और ‘मिया मुस्लिम’ की राजनीति पर टीएमसी को घेरा है, जो असम के अनुभवों से मेल खाता है।
योगी आदित्यनाथ ने अपने भाषणों में ‘एंटी-रोमियो स्क्वाड’ और ‘बुलडोजर मॉडल’ का जिक्र कर बंगाल की कानून-व्यवस्था पर सीधा प्रहार किया है। उनका संदेश साफ है- “जो उत्तर प्रदेश में हो सकता है, वह बंगाल में क्यों नहीं?” यह नैरेटिव उन मतदाताओं को आकर्षित कर रहा है जो राज्य में बढ़ती हिंसा और सिंडिकेट कल्चर से परेशान हैं। अन्य मुख्यमंत्रियों ने अपने राज्यों की विकास गाथाओं को बंगाल के सामने रखकर यह बताने की कोशिश की है कि बीजेपी शासित राज्य विकास की दौड़ में बंगाल से आगे निकल चुके हैं।
इन मुख्यमंत्रियों की तैनाती से बीजेपी ने एक और लक्ष्य साधा है, वो है ‘पैन-इंडिया’ (अखिल भारतीय) उपस्थिति का अहसास कराना। यह दिखाना कि बंगाल की लड़ाई में पूरा भारत बीजेपी के साथ खड़ा है। हिमंता बिस्वा सरमा का आक्रामक अंदाज टीएमसी के अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के दावों की हवा निकाल रहा है, जबकि योगी आदित्यनाथ का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बंगाल के पारंपरिक हिंदू मतदाताओं को एकजुट कर रहा है।
बिना झिझक हिंदुत्व, अमित शाह का ‘बाबरी’ वाला बयान
इस चुनाव में बीजेपी ने अपनी हिंदुत्ववादी छवि को छिपाने की कोशिश नहीं की है। अमित शाह का एक हालिया बयान चर्चा का विषय बना हुआ है जिसमें उन्होंने कहा कि “जब तक बीजेपी का एक भी कार्यकर्ता जीवित है, बंगाल में कोई बाबरी मस्जिद नहीं बनने दी जाएगी।” यहाँ ‘बाबरी मस्जिद’ एक रूपक (Metaphor) है, जिसका उपयोग शाह ने तुष्टिकरण और धार्मिक अतिक्रमण के खिलाफ एक मजबूत स्टैंड लेने के लिए किया है।
यह बयान सीधे तौर पर उन इलाकों को टारगेट करता है जहाँ हिंदुओं को अपनी धार्मिक पहचान और पूजा-पाठ में बाधा आने की शिकायत रहती है। 2021 में बीजेपी जहाँ ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बात अधिक कर रही थी, वहीं 2026 में वह ‘हिंदू हितों की रक्षा’ की बात अधिक मुखरता से कर रही है। अमित शाह के इस बयान ने ध्रुवीकरण को चरम पर पहुँचा दिया है, जिससे बीजेपी का कोर वोटर रिचार्ज हो गया है।
बीजेपी ने राम मंदिर निर्माण और कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाने जैसी उपलब्धियों को बंगाल के गाँव-गाँव तक पहुँचाया है। पार्टी का तर्क है कि यदि केंद्र में बीजेपी हिंदुओं के गौरव को वापस ला सकती है, तो वह बंगाल में भी दुर्गा पूजा और सरस्वती पूजा को ‘बिना किसी डर’ के आयोजित करने का वातावरण सुनिश्चित करेगी। यह आक्रामक हिंदुत्व ही है जो बीजेपी को टीएमसी के ‘इमाम भत्ता’ जैसे तुष्टिकरण के कदमों के खिलाफ एक मजबूत विकल्प के रूप में खड़ा करता है।
बीजेपी के 15 संकल्प: विकास का रोडमैप
बीजेपी ने इस चुनाव के लिए एक विस्तृत घोषणापत्र जारी किया है जिसे ’15 संकल्प’ का नाम दिया गया है। इसमें राज्य की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने और उद्योग-धंधों को पुनर्जीवित करने का वादा किया गया है। 2021 के मुकाबले यह संकल्प पत्र अधिक शोध-आधारित और बंगाल की विशिष्ट समस्याओं (जैसे जूट उद्योग का पतन, चाय बागान श्रमिकों की समस्या) को संबोधित करने वाला है।
प्रमुख संकल्पों में राज्य कर्मचारियों के लिए 7वें वेतन आयोग को तुरंत लागू करना, किसानों को पीएम किसान सम्मान निधि के बकाया के साथ अतिरिक्त लाभ देना और ‘सिंडिकेट राज’ को खत्म करने के लिए एक विशेष टास्क फोर्स का गठन शामिल है। बीजेपी ने वादा किया है कि वह बंगाल को फिर से विनिर्माण (Manufacturing) का केंद्र बनाएगी ताकि यहाँ के युवाओं को काम के लिए बेंगलुरु या पुणे न जाना पड़े।
इसके साथ ही बीजेपी ने आयुष्मान भारत योजना को राज्य में लागू करने का संकल्प लिया है, जिसे ममता सरकार ने अब तक रोक रखा था। इन 15 संकल्पों के माध्यम से बीजेपी ने यह दिखाने की कोशिश की है कि उसके पास केवल ‘नारे’ नहीं, बल्कि बंगाल के पुनर्निर्माण का एक ठोस ‘ब्लूप्रिंट’ भी है। यह विकासवादी चेहरा उन मध्यमवर्गीय और शहरी मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए है जो राजनीति में बदलाव के साथ-साथ स्थिरता भी चाहते हैं।
पीएम मोदी की 15 गारंटी में ‘आधी आबादी’ पर फोकस
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बार बंगाल की महिलाओं (जिन्हें टीएमसी का पारंपरिक समर्थक माना जाता है) के लिए ’15 गारंटी’ की घोषणा की है। ममता बनर्जी की ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना (जिसमें महिलाओं को आर्थिक सहायता दी जाती है) का मुकाबला करने के लिए मोदी ने इस राशि को बढ़ाकर 3000 रुपए करने और सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 33% आरक्षण देने की गारंटी दी है।
पीएम मोदी ने अपनी रैलियों में “मेरी माताओं और बहनों” को संबोधित करते हुए यह याद दिलाया है कि केंद्र की उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत मिशन और मुफ्त राशन का सबसे अधिक लाभ उन्हें ही मिला है। मोदी की गारंटी का मतलब है – भरोसा। बीजेपी का मानना है कि बंगाल की महिलाएँ अब केवल नकद सहायता से संतुष्ट नहीं हैं, बल्कि वे अपने बच्चों के लिए सुरक्षा और रोजगार भी चाहती हैं।
इस बार ‘साइलेंट वोटर’ यानी महिलाओं का रुझान बीजेपी की ओर बढ़ा है। इसके पीछे का एक बड़ा कारण राशन वितरण में भ्रष्टाचार और स्थानीय टीएमसी नेताओं का व्यवहार भी है। मोदी ने महिलाओं के सशक्तिकरण को अपनी प्राथमिकता बताकर ममता बनर्जी के ‘महिला मुख्यमंत्री’ होने के भावनात्मक लाभ को कम करने का प्रयास किया है। अगर इस चुनाव में महिला मतदाताओं का 10-15% हिस्सा भी बीजेपी की ओर झुकता है, तो नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं।
आरजी कर कांड के बाद से महिला सुरक्षा का मुद्दा
अगस्त 2024 में कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में हुई वीभत्स घटना ने पूरे बंगाल को हिलाकर रख दिया था। 2026 के चुनाव में यह मुद्दा एक बड़ा चुनावी हथियार बनकर उभरा है। बीजेपी ने इसे केवल एक अपराध के रूप में नहीं, बल्कि ‘सिस्टम की विफलता’ और ‘अपराधियों के संरक्षण’ के रूप में पेश किया है। इस कांड के बाद हुए बड़े-बड़े नागरिक प्रदर्शनों और ‘रेक्लेम द नाइट’ जैसे अभियानों ने टीएमसी सरकार की छवि को गहरा नुकसान पहुँचाया है।
बीजेपी का आरोप है कि ममता सरकार ने सबूतों को मिटाने और दोषियों को बचाने की कोशिश की। रैलियों में आरजी कर की पीड़िता का जिक्र कर बीजेपी महिला मतदाताओं को यह एहसास करा रही है कि “दीदी के राज में कोई सुरक्षित नहीं है।” यह मुद्दा शहरी और शिक्षित क्षेत्रों में टीएमसी के लिए बड़ी चुनौती बन गया है, जहाँ लोग शासन में जवाबदेही और सुरक्षा की माँग कर रहे हैं।
इस घटना ने डॉक्टरों, छात्रों और बुद्धिजीवियों के एक बड़े वर्ग को सरकार के खिलाफ खड़ा कर दिया है। बीजेपी ने इस आक्रोश को चुनावी मोड में बदलते हुए वादा किया है कि वह राज्य में ‘फास्ट ट्रैक कोर्ट’ और महिला सुरक्षा के लिए ‘पैनिक बटन’ जैसी व्यवस्था लागू करेगी। आरजी कर कांड केवल एक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह टीएमसी के ‘कानून के शासन’ के दावों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न बन गया है।
संदेशखाली में हिंदू-मुस्लिम समीकरण और TMC के स्थानीय मुस्लिम नेताओं का अत्याचार
उत्तर 24 परगना का संदेशखाली इलाका 2026 के चुनाव का एक और केंद्र बिंदु है। यहाँ की महिलाओं द्वारा टीएमसी नेताओं (जैसे शाहजहाँ शेख) पर लगाए गए यौन उत्पीड़न और जमीन हड़पने के आरोपों ने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया था। बीजेपी ने इस मुद्दे को ‘हिंदू पीड़ित बनाम कट्टरपंथी मुस्लिम समर्थक’ के रूप में फ्रेम किया है। संदेशखाली की घटनाओं ने यह संदेश दिया कि टीएमसी के स्थानीय नेता किस हद तक निरंकुश हो चुके हैं। शेख शाहजहाँ के खिलाफ 700 मामले दर्ज हो चुके हैं।
संदेशखाली की लड़ाई ने हिंदू मतदाताओं के भीतर के उस डर को जगाया है जो लंबे समय से दबा हुआ था। बीजेपी ने यहाँ की पीड़ित महिलाओं को सम्मान देने और उन्हें इंसाफ दिलाने का वादा करके पूरे राज्य में एक संदेश भेजा है। यह मुद्दा केवल एक विधानसभा सीट तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने बंगाल के ग्रामीण इलाकों में टीएमसी के खिलाफ एक माहौल तैयार किया है।
बीजेपी का तर्क है कि संदेशखाली की घटना टीएमसी के ‘वोट बैंक’ मॉडल का नतीजा है, जहाँ अपराधियों को धर्म और राजनीति का संरक्षण मिलता है। इस नैरेटिव ने उन इलाकों में बीजेपी को फायदा पहुँचाया है जहाँ डेमोग्राफी तेजी से बदल रही है। संदेशखाली ने हिंदू समाज के विभिन्न वर्गों को, जाति से ऊपर उठकर, अपनी सुरक्षा के लिए एकजुट होने का एक साझा मंच प्रदान किया है।
TMC की राजनीतिक हिंसा यानी ‘बम और बारूद’ की राजनीति पर घेराबंदी
पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा एक दुखद वास्तविकता रही है, जिसे बीजेपी ने इस बार अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचाया है। बीजेपी नेतृत्व का आरोप है कि टीएमसी चुनाव जीतने के लिए लोकतांत्रिक तरीकों के बजाय ‘बम, गोली और डराने-धमकाने’ की राजनीति पर भरोसा करती है। संदेशखाली से लेकर वीरभूम तक, हिंसा के पैटर्न को बीजेपी ने ‘स्टेट स्पॉन्सर्ड’ (राज्य द्वारा प्रायोजित) बताया है। अमित शाह ने स्पष्ट कहा है कि बंगाल में ‘खेला होबे’ का असली अर्थ विपक्षी कार्यकर्ताओं की हत्या और उनके घरों को जलाना बन गया है।
दूसरे चरण के मतदान से पहले, बीजेपी ने उन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है जहाँ ‘बाहुबलियों’ का दबदबा है। पार्टी ने आरोप लगाया है कि टीएमसी के स्थानीय नेता मतदाताओं को डरा रहे हैं ताकि वे बूथ तक न पहुँचें। इस हिंसा के खिलाफ बीजेपी ने ‘सुरक्षा और लोकतंत्र की बहाली’ का नारा दिया है। पार्टी का तर्क है कि जब तक टीएमसी का ‘डर का साम्राज्य’ खत्म नहीं होगा, तब तक बंगाल में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं हैं। आरजी कर कांड के बाद पुलिस प्रशासन की भूमिका पर उठे सवालों ने बीजेपी के इस आरोप को और बल दिया है कि शासन और अपराधी अब एक ही सिक्के के दो पहलू बन चुके हैं।
मतदान का दूसरा चरण बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्यों?
बंगाल चुनाव का दूसरा चरण बीजेपी और टीएमसी दोनों के लिए अग्निपरीक्षा है। इस चरण में जिन सीटों पर मतदान होना है, उनमें से कई ‘मुस्लिम बाहुल्य’ क्षेत्र हैं जैसे मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर। ऐतिहासिक रूप से ये इलाके टीएमसी और कांग्रेस के गढ़ रहे हैं। यहाँ बीजेपी के लिए जीत हासिल करना पहाड़ चढ़ने जैसा है, लेकिन इस बार समीकरण थोड़े अलग हैं।
इन क्षेत्रों में टीएमसी को इस बार ‘त्रिकोणीय’ और ‘चतुष्कोणीय’ मुकाबले का सामना करना पड़ रहा है। असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM और हुमायूँ कबीर जैसे नेताओं की सक्रियता ने मुस्लिम वोट बैंक में बिखराव की स्थिति पैदा कर दी है। इसके अलावा इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) भी अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। बीजेपी को उम्मीद है कि यदि मुस्लिम वोट बंटते हैं, तो वह ध्रुवीकरण के सहारे इन ‘अभेद्य’ सीटों पर भी कमल खिला सकती है।
दूसरा चरण इसलिए भी कठिन है क्योंकि यहाँ चुनावी हिंसा की संभावना सबसे अधिक रहती है। इन क्षेत्रों में बूथ कैप्चरिंग और डराने-धमकाने की खबरें अक्सर आती हैं। बीजेपी ने चुनाव आयोग से इन इलाकों में केंद्रीय सुरक्षा बलों की भारी तैनाती की माँग की है। बीजेपी जानती है कि यदि उसने दूसरे चरण के ‘मुस्लिम बेल्ट’ में अपनी स्थिति सुधार ली, तो आगे की राह बहुत आसान हो जाएगी।
ऑपइंडिया का विश्लेषण समझाता है बदलते हुए मुस्लिम वोटिंग के पैटर्न को
ऑपइंडिया के एक लेख में हमने एक महत्वपूर्ण पैटर्न की ओर इशारा किया है। पहले मुस्लिम वोट बैंक का एकमात्र लक्ष्य ‘बीजेपी को हराना’ होता था, जिसके लिए वे सबसे मजबूत गैर-बीजेपी पार्टी (अक्सर टीएमसी) को एकमुश्त वोट देते थे। लेकिन अब रुझान बदल रहा है। महाराष्ट्र और बिहार की तरह बंगाल में भी मुस्लिम मतदाता अब अपनी ‘स्वयं की पहचान’ वाली कट्टरपंथी इस्लामी पार्टियों (जैसे AIMIM या ISF) की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
इस बदलाव के दो मुख्य कारण हैं: पहला, टीएमसी द्वारा किए गए वादों और हकीकत के बीच का अंतर। दूसरा, मुस्लिम युवाओं के भीतर यह भावना कि मुख्यधारा की पार्टियाँ केवल उनका इस्तेमाल करती हैं और उन्हें वास्तविक नेतृत्व नहीं देतीं। यदि बंगाल के मुस्लिम मतदाता टीएमसी को छोड़कर ओवैसी या हुमायूँ कबीर की ओर झुकते हैं, तो यह सीधे तौर पर बीजेपी को फायदा पहुँचाएगा क्योंकि इससे टीएमसी का ‘विनिंग कॉम्बिनेशन’ टूट जाएगा।
बीजेपी इस बिखराव का चुपचाप इंतजार कर रही है। उसे पता है कि उसे इन वोटों को पाने की जरूरत नहीं है, बस इनका टीएमसी से दूर होना ही उसकी जीत का रास्ता साफ कर देगा। यह वही पैटर्न है जिसने यूपी में सपा-बसपा और बिहार में महागठबंधन को नुकसान पहुँचाया था। यदि दूसरे चरण में यह पैटर्न जमीन पर उतरता है, तो टीएमसी का सबसे मजबूत किला ढह सकता है।
फिलहाल नतीजों का इंतजार
बंगाल चुनाव 2026 का दूसरा चरण केवल सीटों का चुनाव नहीं है, बल्कि यह इस बात का फैसला करेगा कि बंगाल ‘तुष्टिकरण और हिंसा’ के रास्ते पर चलेगा या ‘विकास और सुरक्षा’ के। बीजेपी ने 2021 की गलतियों से सीखकर एक ऐसा ‘चक्रव्यूह’ रचा है जिसमें टीएमसी फंसी हुई नजर आ रही है।
वैसे भी पश्चिम बंगाल के इस महासमर का दूसरा चरण बीजेपी के लिए ‘करो या मरो’ की स्थिति है। जहाँ टीएमसी अपनी सत्ता बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है, वहीं बीजेपी एक नए, विकसित और सुरक्षित बंगाल का सपना दिखाकर लोगों को साथ जोड़ रही है। आरजी कर कांड का गुस्सा, संदेशखाली का दर्द और मोदी की गारंटी बनाम ममता की लक्ष्मी भंडार इन सबके बीच बंगाल का आम आदमी खड़ा है।
क्या अमित शाह का 15 दिन का संघर्ष रंग लाएगा? क्या योगी-हिमंता का हिंदुत्व मॉडल बंगालियों को पसंद आएगा? या फिर ममता बनर्जी एक बार फिर अपने ‘फाइटर’ अंदाज से सबको चौंका देंगी? इन सभी सवालों के जवाब 4 मई को ईवीएम खुलने के साथ मिलेंगे। लेकिन एक बात साफ है कि साल 2026 का यह चुनाव केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं, बल्कि बंगाल की आत्मा को फिर से परिभाषित करने की लड़ाई है।