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‘लाल सिंह चड्ढा फ्लॉप हुई तो दिल टूट जाएगा’: ‘PK की मासूमियत’ याद दिला कर आमिर खान ने खेला इमोशनल कार्ड, कहा – मैं टेंशन में हूँ

बॉलीवुड एक्टर आमिर खान की फिल्म ‘लाल सिंह चड्ढा’ कई अलग वजहों से विवादों में हैं। कई लोग फिल्म को बायकॉट करने की माँग कर रहे हैं तो कई लोगों ने फिल्म में आमिर खान की एक्टिंग को ‘पीके’ जैसी बताई है। इसके अलावा, फिल्म में आमिर खान के पंजाबी एक्सेंट पर भी सवाल उठे। 

पंजाबी अभिनेत्री सरगुन मेहता को लाल सिंह चड्ढा के ट्रेलर में आमिर खान की पंजाबी भाषा कुछ खास पसंद नहीं आई। सरगुन का कहना था कि आमिर अपने एक्सेंट को और ज्यादा बेहतर कर सकते थे। अब पत्रकारों से बात करते हुए आमिर खान ने सरगुन मेहता की बातों पर प्रतिक्रिया दी है।

अभिनेता ने कहा, “वो ट्रेलर में आधा दिखता है ना? ट्रेलर सिर्फ 2 मिनट का है और हमारी फिल्म 2.30 घंटे की है। बेहतर होगा कि अगर आप पूरी फिल्म देखने के बाद इन बातों पर जज करें। अगर मैं ठेठ पंजाबी बोलूँगा तो बाकी लोगों को कुछ समझ नहीं आएगा। आपको समझ आ जाएगा। आप फिल्म देख लीजिए… मुझे उम्मीद है कि आप निराश नहीं होंगे।”

वहीं हाल ही में करण जौहर के शो ‘कॉफी विद करण’ में पहुँचे आमिर खान ने इस बात को कबूल किया कि वह ‘लाल सिंह चड्ढा’ को लेकर वह काफी सीरियस हैं। इसके अलावा उन्होंने यह भी माना कि वह इस फिल्म को लेकर तनाव में हैं। इंटरव्यू के दौरान करण जौहर ने उनसे पूछा, “क्या आप तनाव में हैं?” जिस पर आमिर ने जवाब दिया, “बेशक मैं तनाव में हूँ, कैसे सवाल पूछ रहा है यार।” आमिर की प्रतिक्रिया सुनकर करीना हैरान रह गईं और कहा, “क्या आप? लेकिन आप बहुत कॉन्फिडेंट हैं?” उन्होंने कहा, “हम एक्साइटेड हैं कि हमने एक अच्छी फिल्म बनाई है, लेकिन अगर फिल्म लोगों को पसंद नहीं आई, बहुत दिल टूट जाएगा।”

इसके बाद करण जौहर ने शो में ये भी दावा किया कि साउथ फिल्मों के सामने हिंदी फिल्मों का चार्म फीका पड़ने का कारण आमिर खान हैं। अपनी बात पर जोर डालते हुए करण ने आमिर खान की ‘दिल चाहता है’, ‘लगान’, ‘रंग दे बसंती’ और ‘तारे जमीं पर’ जैसी फिल्मों का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि आमिर ने इन फिल्मों से मिले रिसपॉन्स के बाद कुछ टारगेटेड ऑडियंस के लिए फिल्में बनाना शुरू कर दिया। हालाँकि आमिर खान ने करण जौहर की इस बात को पूरी तरह से गलत बताया।

इससे पहले आमिर ने लाल सिंह चड्ढा और पीके के एक जैसी फिल्मों की बात पर सफाई देते हुए कहा था, “मुझे लगता है कि आप सभी को फिल्म देखनी चाहिए और फिर फैसला करना चाहिए। मैं आपको बताता हूँ कि क्यों आपको दोनों फिल्में एक जैसी लग रही है, क्योंकि लाल और पीके के बीच एक समानता है और वह है मासूमियत। लाल मासूम है और पीके भी। यह एक बहुत ही मजबूत गुण है जो उन दोनों के पास है। तो, ट्रेलर में आप शायद वो अंतर नहीं देख पाएँगे जो आप पूरे परफॉर्मेंस में देखेंगे। तो जब आप लाल का पूरा परफॉर्मेंस देखेंगे तो मैं उम्मीद करता हूँ कि दोनो किरदार आपको बहुत मासूम लगेंगे लेकिन वो आपको अलग किरदार लगेगा। वो आपको पीके नहीं लगेगा, मेरे हिसाब से।”

उल्लेखनीय है कि आमिर खान अपनी फिल्म ‘लाल सिंह चड्ढा’ को हिट कराने के लिए हर जतन कर रहे हैं। इसी कड़ी में पिछले दिनों फिल्म की एक झाँकी जारी की गई। इस वीडियो में उन्हें करीना कपूर के साथ गोलगप्पे खाते हुए, फिर सेना का प्रशिक्षण लेते हुए दिखाया गया था। इस दौरान उन्हें बंदूक के साथ भी दिखाया गया। इसमें आमिर खान कह रहे होते हैं कि उनकी माँ उन्हें सेना में भेजना चाहती हैं, लेकिन उन्हें लोगों को मारना अच्छा नहीं लगता।

बता दें कि हाल ही करीना कपूर ने ‘लाल सिंह चड्ढा’ के बॉयकॉट की अपील को लेकर अकड़ दिखाई थी। उन्होंने बायकॉट की अपील को ‘कैंसल कल्चर’ बताते हुए कहा कि आज लोगों की विभिन्न प्लेटफॉर्म्स तक पहुँच है, इसीलिए वो हर चीज पर राय दे रहे हैं। पहले करीना कपूर ने कहा था कि लोग फिल्म न देखें, उनसे किसी ने जबरदस्ती थोड़े की है। फिर बाद में उन्होंने कहा, “हर कोई आजकल अपने विचार रखना चाहता है। आजकल अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स हैं और हर कोई के पास कोई न कोई राय है। इसीलिए, अगर आज आपको रहना है तो कुछ चीजों को नजरअंदाज करना सीखना होगा।”

‘हिन्दुओं को सौंपी जाए शाही ईदगाह ढाँचे वाली जमीन’: HC ने इस याचिका को स्वीकारने पर लगाई रोक, सुन्नी वक्फ बोर्ड ने दी थी चुनौती

श्रीकृष्ण जन्मस्थान और शाही ईदगाह विवाद (Sri Krishna Janmabhoomi Shahi Idgah) के मामले में मथुरा सिविल कोर्ट में चल रही सुनवाई पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रोक लगा दी है। कोर्ट ने 8 हफ्ते के लिए सुनवाई पर रोक लगाई है। जिला जज ने 19 मई, 2022 को शाही ईदगाह विवादित ढाँचा हिंदुओं को सौंपे जाने की माँग वाली याचिका पर सिविल कोर्ट में सुनवाई करने का आदेश जारी किया था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जिला जज के इस आदेश को यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने इस मामले में जिला जज द्वारा दिए गए आदेश को पलट दिया है। मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस सलिल कुमार राय की सिंगल बेंच ने सभी पक्षकारों को नोटिस जारी कर 8 हफ्ते में जवाब दाखिल करने को कहा है। अब 8 हफ्ते बाद होगी इस मामले में सुनवाई होगी।

दरअसल, यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। बोर्ड ने तर्क दिया कि मथुरा कोर्ट का आदेश बिना अधिकार क्षेत्र के पारित किया गया था, क्योंकि रिवीजन का मूल्यांकन 25,00,000 रुपए से अधिक था। इसलिए जिला जज के पास रिवीजन पर सुनवाई का आर्थिक क्षेत्राधिकार नहीं है। वहीं, अदालत ने सिर्फ वाद संख्या 176/2020 की सुनवाई पर ही रोक लगाई है। 

मालूम हो कि भगवान श्रीकृष्ण विराजमान को वादी बनाकर 13.37 एकड़ जमीन पर दावा पेश करने वाली सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रंजना अग्निहोत्री के केस को जिला जज राजीव भारती की अदालत ने 19 मई 2022 को सुनवाई योग्य मानते हुए दर्ज कर लिया था। करीब दो वर्ष की लंबी अदालती प्रक्रिया के बाद उनकी याचिका को अदालत ने दर्ज करने संबंधी निर्णय दिया। अदालत के फैसले पर अधिवक्ता रंजना ने कहा था कि यह भगवान श्रीकृष्ण विराजमान की जीत है।

गौरतलब है कि रंजना अग्निहोत्री ने 25 सितंबर 2020 को श्रीकृष्ण जन्मस्थान की 13.37 एकड़ जमीन पर दावा पेश किया था, जिसमें उन्होंने वर्ष 1973 में श्रीकृष्ण जन्मस्थान ट्रस्ट और शाही ईदगाह के बीच हुए समझौते को गलत बताकर इसे रद्द करने की माँग की थी। उनकी याचिका में बताया गया है कि 20 जुलाई 1973 में श्रीकृष्ण जन्मस्थान ट्रस्ट और शाही मस्जिद इंतजामिया कमेटी के मध्य बीच समझौता हुआ था, जिसके तहत परिसर की जमीन को ईदगाह इंतजामिया कमेटी को दे दिया गया। बाद में समझौते की डिक्री (न्यायिक निर्णय) 7 नवंबर 1974 को हुई।

ताइवान को घेर कर चीन ने शुरू किया अब तक का सबसे बड़ा सैन्य अभ्यास, लगातार हो रही फायरिंग: ताइवान ने कहा- हम युद्ध के लिए तैयार

अमेरिकी हाउस की स्पीकर नैंसी पेलोसी (US House Speaker Nancy Pelosi) के ताइवान (Taiwan) आने से चीन (China) बौखलाया हुआ है। इस यात्रा से चीन और ताइवान के बीच सैन्य संघर्ष की आशंका बढ़ गई है। चीन ने ताइवान के नजदीक सैन्य अभ्यास शुरू किया है।

गुरुवार (4 अगस्त 2022) को चीन की सरकारी मीडिया चैनल CCTV ने बताया कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने देश का ‘अब तक का सबसे बड़ा’ सैन्य अभ्यास शुरू किया। इस सैन्य में ताइवान के द्वीपों के चारों तरफ उसके क्षेत्र के नजदीक और हवाई क्षेत्रों लाइव फायरिंग की जा रही है।

अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसी AFP के अनुसार, ताइवान के रक्षा मंत्रालय का कहना है कि वह अभ्यास पर करीब से नज़र रख रहा है। उन्होंने कहा कि ताइवान किसी तरह का संघर्ष नहीं चाहता, लेकिन अगर जरूरी हुआ तो वह इसके लिए तैयार है। ताइवान ने युद्ध की तैयारी भी शुरू कर दी है।

यूरोपीय संघ के राजनयिक प्रमुख ने ताइवान के आसपास चीन के ‘आक्रामक’ अभ्यास की निंदा की है। वहीं, दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के विदेश मंत्रियों ने चीन से संयम बरतने का आग्रह किया है। उनका कहना है कि सैन्य अभ्यास की स्थिति ‘गलत अनुमान, गंभीर टकराव, खुले संघर्ष और प्रमुख शक्तियों के बीच अप्रत्याशित परिणाम’ पैदा कर सकती है।

ताइवान के एक अधिकारी ने AFP को बताया कि चीनी नौसेना के लगभग दस जहाजों ने दोनों देशों के क्षेत्रीय जल को विभाजित करने वाली अनौपचारिक रेखा मध्य रेखा को पार किया। इससे पहले कि वे ताइवान की क्षेत्र में घुसते देश की नौसेना ने उन्हें भगा दिया।

ताइवान ने यह भी कहा कि गुरुवार सुबह कई चीनी वायु सेना के विमानों ने कई बार मध्य रेखा को पार किया, जिसकी कारण ताइवान को जेट विमानों को भेजने और मिसाइल प्रणाली सिस्टम को तैनात करने के लिए मजबूर होना पड़ा। ताइवान का कहना है कि वह सैन्य गतिविधियों पर नजर बनाए हुए है।

इसके पहले चीन की आर्मी ने ताइवान को अपनी सैन्य ताकत दिखाने के लिए 20 से ज्यादा लड़ाकू विमानों को ताइवान की डिफेंस लाइन के पास भेजा और फिर उन्हें भेदते हुए एयर डिफेंस में घुस गए थे। इतना ही नहीं ताइवान सेना की मानें तो चीन ने KJ500 अवाक्स विमान और जेएफ16, जेएफ11, Y9 EW और Y8 ELINT विमान को तैनात किया हुआ था।

हालाँकि, अमेरिका के जो बाइडेन प्रशासन ने कहा है कि संयुक्त राज्य अमेरिका ‘वन चाइन पॉलिसी’ के लिए प्रतिबद्ध है। इसके साथ ही G7 देशों – कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका के विदेश मंत्रियों के साथ-साथ यूरोपीय संघ ने एक बयान में चीन से ताइवान के मामले को शांति से हल करने का आग्रह किया और चीन की “धमकी देने वाली कार्रवाइयों” पर चिंता व्यक्त की।

‘पुरुषों के खिलाफ हिंसा को दिया बढ़ावा’: आलिया भट्ट को लोगों ने बताया ‘भारत की एम्बर हर्ड’, ‘Darlings’ में पति को पीटती हुई आईं नजर

हाल ही में सोशल मीडिया पर बायकॉट लाल सिंह चड्ढा और बायकॉट रक्षाबंधन ट्रेंड कर रहा था। अब इस लिस्ट में आलिया भट्ट भी शामिल हो गई हैं। ट्विटर पर बायकॉट आलिया भट्ट ट्रेंड कर रहा है। बॉलीवुड एक्ट्रेस आलिया भट्ट इन दिनों नेटफ्लिक्स पर अपनी आने वाली फिल्म ‘डार्लिंग्स’ के प्रमोशन में जुटी हुई हैं। ये फिल्म 5 अगस्त को नेटफ्लिक्स पर रिलीज होने जा रही है।

फिल्म के रिलीज से एक दिन पहले ये ट्रेंड कर रहा है। आलिया को बायकॉट करने की माँग के पीछे का कारण बाकियों की तुलना में काफी अलग है। हाल ही में फिल्म का ट्रेलर रिलीज हुआ था, जिसमें वह अपने पति को मारते हुए नजर आ रही हैं। जिसके बाद उन पर घरेलू हिंसा का आरोप लगाकर बायकॉट की माँग की जा रही है।

ये है पूरा मामला

इस फिल्म के ट्रेलर में दिखाया गया है कि आलिया अपने पति विजय वर्मा को किडनैप करके उससे बदला लेती है। जो उन्होंने उसके साथ किया था। ट्रेलर में आलिया अपने पति को पैन से मारती नजर आ रही हैं, उनके चेहरे पर पानी फेंकती हैं और उनका चेहरा पानी के टैंक में डाल देती है। वह अपने पति के साथ ये सब करने का प्लान करती हैं, जैसे उन्होंने उनके साथ किया होता है।

इस फिल्म में शेफाली शाह, विजय वर्मा और रोशन मैथ्यू भी हैं। आलिया भट्ट इस फिल्म में घरेलू हिंसा की शिकार महिला बदरुनिसा शेख की भूमिका निभा रही हैं। पति की मारपीट सहने के बाद बदरुनिसा खुद उसे प्रताड़ित करने लग जाती है। फिल्म के ट्रेलर में भी कुछ ऐसा ही दिखाया गया है, जिसके बाद यूजर्स सोशल मीडिया पर बायकॉट आलिया भट्ट ट्रेंड करा रहे हैं। लोग बायकॉट आलिया भट्ट इसलिए ट्रेंड कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लग रहा है कि फिल्म में एक्ट्रेस पुरुषों के खिलाफ घरेलू हिंसा को सपोर्ट कर रही हैं। 

ट्रेंड हुआ #BoycottAliaBhatt

एक यूजर ने फिल्म का पोस्टर शेयर करते हुए लिखा, “नीचे दिए हुए पोस्टर देखकर, मैं सभी पुरुषों और महिलाओं से अपील करता हूँ कि वह आलिया भट्ट और डार्लिंग्स को बायकॉट करें।”

वहीं दूसरे यूजर ने लिखा, “लिंग की परवाह किए बिना सभी पीड़ितों पर विश्वास करें।”

कुछ यूजर्स ने तो आलिया भट्ट को भारत का एम्बर हर्ड तक बता दिया है। यूजर ने लिखा, “आलिया भट्ट और कुछ नहीं बल्कि भारत की एम्बर हर्ड है। वह पुरुषों पर घरेलू हिंसा को बढ़ावा देती है और उसका मजाक उड़ाती है।”

डार्लिंग्स की बात करें तो इस फिल्म में आलिया और विजय के साथ शेफाली शाह लीड रोल में नजर आने वाली हैं। इस फिल्म को आलिया भट्ट और शाहरुख खान के प्रोडक्शन हाउस रेड चिलीज ने मिलकर प्रोड्यूस किया है।

महाराष्ट्र ATS ने जुबैर को गिरफ्तार किया, टेरर फंडिंग का है मामला: दाऊद के भाई के संपर्क में था

महाराष्ट्र आतंकवाद विरोधी दस्ते (Maharashtra ATS) ने टेरर फंडिंग मामले में गुरुवार (4 अगस्त, 2022) को परवेज जुबैर (Parvez Zubair) नाम के संदिग्ध को गिरफ्तार किया है। ये गिरफ्तारी UAPA के तहत की गई है। परवेज डी कम्पनी (D Company) के लिए टेरर फंडिंग करते हुए लगातार दाऊद के भाई अनीस इब्राहिम के सम्पर्क में था। समाचार एजेंसी ANI के मुताबिक, परवेज जुबैर पाकिस्तान के असामाजिक तत्वों के संपर्क में भी था। वह लंबे समय से फरार था। उसे आज अदालत के सामने पेश किया जाएगा।

इससे पहले महाराष्ट्र ATS ने जून 2022 में जम्मू-कश्मीर से आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) के लिए फंड और भर्ती में सक्रिय भूमिका निभाने वाले युसूफ को गिरफ्तार किया था। आरोपित ने जुनैद मोहम्मद को फंड ट्रांसफर किया था। इसके बाद आरोपित यूसुफ को पुणे की अदालत में पेश किया गया था।

गौरतलब है कि महाराष्ट्र एटीएस ने 24 मई 2022 को पुणे से आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के लिए काम करने वाले जुनैद मोहम्मद को गिरफ्तार किया था। जुनैद पर लश्कर के लिए आतंकवादियों की भर्ती करने का आरोप था। वह युवाओं का ब्रेनवॉश कर उन्हें दहशतगर्दी के रास्ते पर ले जाता था। जुनैद जम्मू-कश्मीर में प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के सदस्यों के लगातार संपर्क में था। आरोपित अलग-अलग राज्यों के युवकों को लश्कर में भर्ती करने की कोशिश कर रहा था। जाँच एजेंसी ने उस पर यह भी आरोप लगाया था कि वह आतंकवाद की ट्रेनिंग दिलाने के लिए युवकों को जम्मू-कश्मीर ले जाने की कोशिश कर रहा था।

एटीएस ने जुनैद मोहम्मद समेत चार आरोपितों के खिलाफ आईपीसी और आईटी एक्ट की धाराओं 121 (ए), 153 (ए) और 116 के तहत प्राथमिकी दर्ज की है। बाद में एटीएस ने 2 जून को इसी मामले में एक और वांछित संदिग्ध 28 वर्षीय आफताब हुसैन शाह को गिरफ्तार किया था। शाह पर जुनैद मोहम्मद और विदेश में रहने वाले लश्कर के एक ऑपरेटिव के बीच की कड़ी होने का आरोप था।

रिप्लेसमेंट बन कर गए थे तेजस्विन, अब बने ऊँची कूद में कॉमनवेल्थ मेडल जीतने वाले पहले भारतीय: स्क्वैश में मेडल जीतने के बाद नम हुईं सौरव की ऑंखें

कॉमनवेल्थ गेम्स के 6ठें दिन भी भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन लाजवाब रहा। सौरव घोषाल और तेजस्विन शंकर ने अपने-अपने खेलों में मेडल जीतते हुए इतिहास रचा, वहीं वेटलिफ्टिंग में लवप्रीत और गुरदीप ने मेडल की संख्या बढ़ाई। इनके अलावा जुडोका तूलिका भी सिल्वर मेडल पर कब्जा करने में कामयाब रही। इन 5 मेडल के साथ भारत के पदकों की संख्या 18 हो गई है। कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 में भारत ने अभी तक 5 गोल्ड, 6 सिल्वर और 7 ब्रॉन्ज मेडल जीते हैं।

स्क्वैश में इतिहास रचने के बाद नम हुई सौरव घोषाल की आँखें

सौरव घोषाल ने पुरुष एकल स्क्वैश के कांस्य पदक के एकतरफा मुकाबले में इंग्लैंड के दुनिया के पूर्व नंबर एक खिलाड़ी जेम्स विल्सट्रॉप को सीधे गेम में 3-0 से हरा दिया। दुनिया के 15वें नंबर के खिलाड़ी घोषाल ने मेजबान देश के दुनिया के 24वें नंबर के खिलाड़ी के खिलाफ 11-6, 11-1, 11-4 से आसान जीत दर्ज की। सौरव ने यह मेडल जीत कर इतिहास रच दिया, क्योंकि यह पहली बार हुआ है जब स्क्वैश के सिंगल इवेंट में भारत ने कोई मेडल हासिल किया हो। इस ऐतिहासिक जीत के बाद 35 वर्षीय भारतीय खिलाड़ी की आँखें नम हो गई।

पहली बार सिंगल्स इवेंट में मेडल जीतने की खुशी 35 साल के सौरव के चेहरे पर साफ नजर आ रही थी। उनकी आँखों से खुशी के आँसू छलक उठे। सौरव ने सेमीफाइनल में न्यूजीलैंड के पॉल कोल को शिकस्त दी थी। इससे पहले, सौरव ने 2018 के गोल्ड कोस्ट कॉमनवेल्थ गेम्स में मिक्स्ड डबल्स इवेंट में सिल्वर मेडल जीता था। यह उनका कॉमनवेल्थ गेम्स में दूसरा पदक है।

आखिरी वक्त पर रिप्लेसमेंट के तौर पर आए तेजस्विन ने रचा इतिहास

सौरव के अलावा हाई जंप में तेजस्विन शंकर ने ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए राष्ट्रमंडल खेलों में पहला पदक जीता। एथलेटिक्स टीम में अंतिम क्षणों में शामिल तेजस्विन शंकर ने पुरुषों की ऊँची कूद में कांस्य जीता है। उन्होंने CWG में ऊँची कूद में मेडल जीतने वाले पहले भारतीय का गौरव हासिल किया है। तेजस्विन ने 2.22 मीटर की दूरी तय करके काउंटबैक में तीसरा स्थान हासिल किया।

तेजस्विन का ये मेडल न सिर्फ ऐतिहासिक है, बल्कि बेहद खास भी है, क्योंकि उन्हें पहले इन गेम्स के लिए चुना भी नहीं गया था। एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया ने CWG के लिए चुनी 36 सदस्यों वाली टीम में तेजस्विन को मौका नहीं दिया था, क्योंकि उन्होंने AFI के क्वालिफाइंग इवेंट में हिस्सा नहीं लिया था, लेकिन अमेरिका में कैंसस यूनिवर्सिटी के इवेंट में उन्होंने AFI द्वारा तय मार्क को हासिल किया था।

इसके बाद तेजस्विन ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। करीब एक महीने की लड़ाई के बाद शंकर कोर्ट से जीते। 22 जुलाई को, हाई कोर्ट ने AFI और भारतीय ओलिंपिक संघ को निर्देश दिए कि उन्हें शामिल किया जाए। कोर्ट का आदेश मानने के बाद भी समस्या खत्म नहीं हुई थी क्योंकि गेम्स की आयोजन समिति ने पहली बार में IOA के आग्रह को ठुकरा दिया था। हालाँकि, आखिरी वक्त में इसे स्वीकार कर लिया गया था। इसके बाद वीजा का मसला भी फँसा और आखिरकार 31 अगस्त के बाद ही वह बर्मिंघम रवाना हो सके।

जिसके बाद तेजस्विन शंकर को राष्ट्रमंडल खेल 2022 के लिए भारतीय स्क्वॉड में घायल रिले धावक अरोकिया राजीव के रिप्लेसमेंट के तौर पर शामिल किया गया था। वह गेम्स की ओपनिंग सेरेमनी में भी हिस्सा नहीं ले पाए थे, लेकिन पदक जीत कर इतिहास रच दिया।

‘टैलेंट की परवाह नहीं, वो देखते हैं कितना हैंडसम है’: बोले अन्नू कपूर – 40 साल बाद भी संघर्ष कर रहा, घर चलाने के लिए करनी पड़ती हैं ना पसंद आने वाली फ़िल्में भी

बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता अन्नू कपूर (Annu Kapoor) अमेजन प्राइम वीडियो की वेबसीरीज ‘क्रैश कोर्स’ को लेकर चर्चा में हैं। वह ‘क्रैश कोर्स’ में बिल्कुल नए अंदाज में दर्शकों के सामने आ रहे हैं। इसमें उन्होंने रतन राज जिंदल की भूमिका निभाई है। वेब सीरीज के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि अगर उन्होंने यह किरदार नहीं निभाया होता तो उन्हें इसका पछतावा होता। उन्होंने कहा “मैंने हमेशा विभिन्न प्रकार की भूमिकाएँ निभाने की कोशिश की और उस प्रक्रिया में मैंने ‘क्रैश कोर्स’ की पटकथा सुनी, जो मुझे हटकर लगी। मैंने इसे पढ़ते ही इसके लिए हाँ कर दी। मुझे लगता है कि अगर मैंने यह किरदार नहीं निभाया होता तो मुझे इसका पछतावा होता।”

इसके अलावा उन्होंने हिंदुस्तान टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा, “शुरुआत में मुझे कथित हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में घबराहट हुआ करती थी। मैंने पैसों के लिए ऐसे प्रोजेक्ट किए जो मुझे पसंद भी नहीं थे।” उन्होंने कहा कि वे टेलीविजन में काम नहीं करना चाहते थे, लेकिन पैसों के लिए उन्होंने न चाहते हुए भी उसमें काम किया। बॉलीवुड के सभी लोगों, आइकॉन को पैसे और एक्सपोजर के कारण यहाँ आना होगा। कई सितारे टेलीविजन पर आए और वे सभी ओटीटी पर भी आ रहे हैं।”

बॉलीवुड में 40 साल से अधिक समय से अन्नू कपूर सक्रिय हैं। उनके मुताबिक, “सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर आपको कोई न कोई प्रैंक, डांस या फिर लोगों का एंटरटेनमेंट करते हुए नजर आ जाएगा। इंस्टाग्राम पर आप देख सकते हैं कि कैसे ये लोगों का एंटरटेनमेंट करने के लिए डांस कर रहे होते हैं, क्योंकि इन्हें इसके लिए पैसे मिलते हैं। इसमें कुछ भी गलत नहीं है, जब तक आप किसी को बिना नुकसान पहुँचाए, चोरी किए या अपने देश को धोखा दिए बिना पैसा कमा रहे हैं। यह ठीक है, मैं भी पैसों के लिए काम करता हूँ, क्योंकि पैसा ही बोलता है।”

वह यहीं नहीं रुकते आगे कहते हैं, “मैं केवल पैसों के लिए काम करता हूँ। कई बार कंटेंट पसंद न आने पर भी मुझे कई प्रोजेक्ट करने पड़ते हैं। उन्होंने कहा, “मैं इन सबसे काफी आहत और निराश होता हूँ, लेकिन मैं क्या कर सकता हूँ? मुझे अपना घर भी चलाना है, अपने परिवार का पेट भी पालना है। मैं अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान या सलमान खान नहीं हूँ, मैं 40 साल बाद भी एक बहुत छोटा संघर्षशील अभिनेता हूँ। इस देश में, किसी को परवाह नहीं है कि आप कितने प्रतिभाशाली और अपने काम के प्रति समर्पित हैं, जब तक आप हैंडसम हैं और आपने बतौर हीरो एक-दो फिल्में की हैं। यह ठीक है।”

इन दिनों एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में बड़ा बदलाव देखने को मिला है, जहाँ स्टारडम सफलता की गारंटी नहीं है और कंटेंट ही किंग है। इसके जवाब में अन्नू ने कहा कि पहले भी ऐसा ही था, लेकिन लोगों को इसके बारे में पता नहीं चला, क्योंकि मीडिया आज की तरह पॉवरफुल नहीं था। हालाँकि, इस बात से वह सहमत नजर नहीं आए कि आजकल स्टारडम का कोई मतलब नहीं है।

करीना कपूर (Kareena Kapoor khan)के हालिया बयान, ‘अगर आप प्रतिभावान हैं तो आपको काम मिलता रहेगा’ इसके बारे में पूछे जाने पर दिग्गज अभिनेता ने कहा, “उन्होंने (सितारों ने) कमाया है, उन्होंने अपनी पारी खेली है और वे खेलेंगे। मेरा विश्वास करो, ये सभी ओटीटी चैनल करीना कपूर को लेना चाहेंगे। वे पहले करीना कपूर और मशहूर सितारों से संपर्क करेंगे। ये सेलिब्रिटी हैं और इन्हें दिखाकर मोटी कमाई की जा सकती हैं।”

बता दें कि ‘क्रैश कोर्स’ वेब सीरीज 5 अगस्त को OTT प्लेटफार्म अमेजन प्राइम वीडियो पर रिलीज की जाएगी। इसे विजय मौर्य ने डायरेक्ट किया है और मनीष हरिप्रसाद ने इसकी स्क्रिप्ट तैयार की है। ‘क्रैश कोर्स’ में अन्नू कपूर के अलावा भानु उदय, उदित अरोड़ा और प्रणय पचौरी भी मुख्य किरदार में हैं।

दुष्प्रचार के शिकार हैं स्वतंत्रता संग्राम में RSS के रोल को नकारने वाले, अंग्रेजों ने डॉ हेडगेवार को डाला था जेल में: कॉन्ग्रेस लाने वाली थी क्रांतिकारियों के लिए निंदा प्रस्ताव

कुछ समय पूर्व एक पत्रकार मिलने आए। बात-बात में उन्होंने पूछा कि स्वतंत्रता आंदोलन में RSS का सहभाग क्या था? शायद वे भी संघ के खिलाफ चलने वाले असत्य प्रचार के शिकार थे। मैंने उनसे प्रतिप्रश्न किया कि आप स्वतंत्रता आंदोलन किसको मानते हैं? वे इसके लिए तैयार नहीं थे। कुछ बोल ही नहीं सके। फिर धीरे से शंकित स्वर में उन्होंने कहा, “वही जो महात्मा गाँधी जी ने किया था।” मैंने पूछा क्या लाल, बाल, पाल त्रिमूर्ति का कोई योगदान नहीं था? क्या सुभाष बाबू की कोई भूमिका स्वतंत्रता आंदोलन में नहीं थी? वे चुप थे।

फिर मैंने पूछा कि गाँधी जी के नेतृत्व में कितने सत्याग्रह हुए? वे अनजान थे। मैंने कहा कि तीन हुए- 1921, 1930 और 1942। उन्हें जानकारी नहीं थी। मैंने कहा संघ संस्थापक डॉ हेडगेवार ने (उनकी मृत्यु 1940 में हुई थी) संघ की स्थापना से पहले (1921) और बाद के (1930) सत्याग्रह में भाग लिया था और उन्हें कारावास भी सहना पड़ा। यह घटना इसलिए कही कि एक योजनाबद्ध तरीके से आधा इतिहास बताने का एक प्रयास चल रहा है।

भारत के लोगों को ऐसा मानने के लिए बाध्य किया जा रहा है कि स्वतंत्रता केवल कॉन्ग्रेस के और 1942 के सत्याग्रह के कारण मिली है। और किसी ने कुछ नहीं किया। यह बात पूर्ण सत्य नहीं है। गाँधी जी ने सत्याग्रह के माध्यम से, चरखा और खादी के माध्यम से सर्व सामान्य जनता को स्वतंत्रता आंदोलन में सहभागी होने का एक सरल एवं सहज तरीका, साधन उपलब्ध कराया। लाखों की संख्या में लोग स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ सके, यह बात सत्य है। परन्तु सारा श्रेय एक ही आंदोलन या पार्टी को देना यह इतिहास से खिलवाड़ है, अन्य सभी के प्रयासों का अपमान है।

अब संघ की बात करनी है तो डॉ हेडगेवार से ही करनी पड़ेगी। केशव (हेडगेवार) का जन्म 1889 का है। नागपुर में स्वतंत्रता आंदोलन की चर्चा 1904-1905 से शुरू हुई। उसके पहले अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन का बहुत वातावरण नहीं था। फिर भी 1897 में रानी विक्टोरिया के राज्यारोहण के हीरक महोत्सव के निमित्त स्कूल में बाँटी गई मिठाई 8 साल के केशव ने ना खाकर कूड़े में फेंक दी। यह था उसका अंग्रेजों के गुलाम होने का गुस्सा और चिढ़।

1907 में रिस्ले सेक्युलर नाम से ‘वंदे मातरम्’ के सार्वजनिक उद्घोष पर पाबंदी का जो अन्यायपूर्ण आदेश घोषित हुआ था, उसके विरोध में केशव ने अपने नील सिटी विद्यालय में सरकारी निरीक्षक के सामने अपनी कक्षा के सभी विद्यार्थियों द्वारा ‘वन्दे मातरम्’ उद्घोष करवा कर विद्यालय के प्रशासन का रोष और उसकी सजा के नाते विद्यालय से निष्कासन भी मोल लिया था। डॉक्टरी पढ़ने के लिए मुंबई में सुविधा होने के बावजूद क्रांतिकारियों का केंद्र होने के नाते उन्होंने कलकत्ता को पसंद किया। वहाँ वे क्रांतिकारियों की शीर्षस्थ संस्था ‘अनुशीलन समिति’ के विश्वासपात्र सदस्य बने थे।

1916 में डॉक्टर बनकर वे नागपुर वापस आए। उस समय स्वतंत्रता आंदोलन के सभी मूर्धन्य नेता विवाहित थे, गृहस्थ थे। अपनी गृहस्थी के लिए आवश्यक अर्थार्जन का हरेक का कोई न कोई साधन था। इसके साथ-साथ वे स्वतंत्रता आंदोलन में अपना बहुमूल्य योगदान दे रहे थे। डॉक्टर हेडगेवार भी ऐसा ही सोच सकते थे। घर की परिस्थिति भी ऐसी ही थी। परन्तु उन्होंने डॉक्टरी एवं विवाह नहीं करने का निर्णय लिया। उनके मन में स्वतंत्रता प्राप्ति की इतनी तीव्रता और ‘अर्जेंसी’ थी कि उन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन का कोई विचार न करते हुए अपनी सारी शक्ति, समय और क्षमता राष्ट को अर्पित करते हुए स्वतंत्रता के लिए चलने वाले हर प्रकार के आंदोलन से अपने आपको जोड़ दिया।

लोकमान्य तिलक पर उनकी अनन्य श्रद्धा थी। तिलक के नेतृत्व में नागपुर में होने जा रहे 1920 के  कॉन्ग्रेस अधिवेशन की सारी व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी डॉ हर्डीकर और डॉ हेडगेवार को दी गई थी और उसके लिए उन्होंने 1200 स्वयंसेवकों की भर्ती करवाई थी। उस समय डॉ हेडगेवार कॉन्ग्रेस की नागपुर शहर इकाई के संयुक्त सचिव थे। उस अधिवेशन में पारित करने हेतु कॉन्ग्रेस की प्रस्ताव समिति के सामने डॉ हेडगेवार ने ऐसे प्रस्ताव का सुझाव रखा था कि कॉन्ग्रेस का उद्देश्य भारत को पूर्ण स्वतंत्र कर भारतीय गणतंत्र की स्थापना करना और विश्व को पूंजीवाद के चंगुल से मुक्त करना होना चाहिए।

सम्पूर्ण स्वातंत्र्य का उनका सुझाव कॉन्ग्रेस ने 9 वर्ष बाद 1929 के लाहौर अधिवेशन में स्वीकृत किया। इससे आनंदित होकर डॉक्टर जी ने संघ की सभी शाखाओं में (संघ कार्य 1925 में प्रारंभ हो चुका था) 26 जनवरी, 1930 को कॉन्ग्रेस का अभिनंदन करने की सूचना दी थी। नागपुर तिलकवादियों का गढ़ था। 1 अगस्त, 1920 को लोकमान्य तिलक के देहावसान के कारण नागपुर के सभी तिलकवादियों में निराशा छा गई। बाद में महात्मा गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस का स्वतंत्रता आंदोलन चला।

असहयोग आंदोलन के समय, 1921 में, साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन के सामाजिक आधार को व्यापक करने की दृष्टि से, अंग्रेजों द्वारा तुर्किस्तान में खिलाफत को निरस्त करने से आहत मुस्लिम मन को अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन के साथ जोड़ने के उद्देश्य से महात्मा गाँधी ने खिलाफत का समर्थन किया। इस पर कॉन्ग्रेस के अनेक नेता तथा राष्ट्रवादी मुस्लिमों को आपत्ति थी। इसलिए, तिलकवादियों का गढ़ होने के कारण नागपुर में असहयोग आंदोलन बहुत प्रभावी नहीं रहा।

परन्तु डॉ हेडगेवार, डॉ चोलकर, समिमुल्ला खान आदि ने यह परिवेश बदल दिया। उन्होंने खिलाफत को राष्ट्रीय आन्दोलन से जोड़ने पर आपत्ति होते हुए भी उसे सार्वजनिक नहीं किया। इसी मापदंड के आधार पर साम्राज्यवाद का विरोध करने के लिए उन्होंने तन-मन-धन से आंदोलन में सहभाग लिया। व्यक्तिगत सामाजिक संबंधों से अलग हटकर उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रीय परिस्थिति का विश्लेषण किया और आसपास के राजनीतिक वातावरण एवं दबंग तिलकवादियों के दृष्टिकोण की चिंता नहीं की।

उन पर चले राजद्रोह के मुकदमे में उन्हें एक वर्ष का कारावास सहना पड़ा। वे 19 अगस्त, 1921 से 11 जुलाई, 1922 तक कारावास में रहे। वहाँ से छूटने के बाद 12 जुलाई को उनके सम्मान में नागपुर में एक सार्वजनिक सभा का आयोजन हुआ था। समारोह में प्रांतीय नेताओं के साथ-साथ कॉन्ग्रेस के अन्य राष्ट्रीय नेता हकीम अजमल खाँ, पंडित मोतीलाल नेहरू, राजगोपालाचारी, डॉ अंसारी, विट्ठल भाई पटेल आदि डॉ हेडगेवार का स्वागत करने के लिए उपस्थित थे।

स्वतंत्रता प्राप्ति का महत्व तथा प्राथमिकता को समझते हुए भी एक प्रश्न डॉ हेडगेवार को सतत् सताता रहता था कि, 7000 मील से दूर व्यापार करने आए मुट्ठी भर अंग्रेज, इस विशाल देश पर राज कैसे करने लगे? जरूर हममें कुछ दोष होंगे। उनके ध्यान में आया कि हमारा समाज आत्म-विस्मृत, जाति प्रान्त-भाषा-उपासना पद्धति आदि अनेक गुटों में बँटा हुआ, असंगठित और अनेक कुरीतियों से भरा पड़ा है जिसका लाभ लेकर अंग्रेज यहां राज कर सके।

स्वतंत्रता मिलने के बाद भी समाज ऐसा ही रहा तो कल फिर इतिहास दोहराया जाएगा। वे कहते थे कि ‘नागनाथ जाएगा तो साँपनाथ आएगा’। इसलिए इस अपने राष्ट्रीय समाज को आत्मगौरव युक्त, जागृत, संगठित करते हुए सभी दोष, कुरीतियों से मुक्त करना और राष्ट्रीय गुणों से युक्त करना अधिक मूलभूत आवश्यक कार्य है और यह कार्य राजनीति से अलग, प्रसिद्धि से दूर, मौन रहकर सातत्यपूर्वक करने का है, ऐसा उन्हें प्रतीत हुआ।

उस हेतु 1925 में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। संघ स्थापना के पश्चात भी सभी राजनीतिक या सामाजिक नेताओं, आंदोलन  एवं गतिविधि के साथ उनके समान नजदीकी के और आत्मीय संबंध थे। 1930 में गाँधी के आह्वान पर सविनय अवज्ञा आंदोलन 6 अप्रैल को दांडी (गुजरात) में  नमक सत्याग्रह के नाम से शुरू हुआ। नवम्बर 1929 में ही संघचालकों की त्रिदिवसीय बैठक में इस आंदोलन को बिना शर्त समर्थन करने का निर्णय संघ में हुआ था।

संघ की नीति के अनुसार, डॉ हेडगेवार ने व्यक्तिगत तौर पर अन्य स्वयंसेवकों के साथ इस सत्याग्रह में भाग लेने का निर्णय लिया। और संघ कार्य अविरत चलता रहे इस हेतु उन्होंने सरसंघचालक पद का दायित्व अपने पुराने मित्र डॉ परांजपे को सौंप कर बाबासाहब आप्टे और बापू राव भेदी को शाखाओं के प्रवास की जिम्मेदारी दी। इस सत्याग्रह में उनके साथ प्रारंभ में 21 जुलाई, को 3-4 हजार लोग थे। वर्धा, यवतमाल होकर पुसद पहुँचते-पहुँचते सत्याग्रह स्थल पर 10,000 लोग इकट्ठे हुए। इस सत्याग्रह में उन्हें 9 महीने का कारावास हुआ।

वहाँ से छूटने के पश्चात् सरसंघचालक का दायित्व पुन: स्वीकार कर वे फिर से संघ कार्य में जुट गए। 1938 में भागानगर (हैदराबाद) में निजाम के द्वारा हिन्दुओं पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ हिन्दू महासभा और आर्य समाज के तत्वावधान में ‘भागानगर नि:शस्त्र प्रतिकार मंडल’  के नाम से सत्याग्रह का आह्वान हुआ उसमें सहभागी होने के लिए जिन स्वयंसेवकों ने अनुमति माँगी, उन्हें डॉक्टर ने सहर्ष अनुमति दी। जिन पर केवल संघ का प्रमुख दायित्व था उन्हें केवल संगठन के कार्य की दृष्टि से बाहर ही रहने के लिए कहा था।

उन्होंने स्पष्ट कहा था कि सत्याग्रह में जिन्हें भाग लेना है वे व्यक्ति के नाते अवश्य भाग ले सकते हैं। भागनगर सत्याग्रह के संचालकों के द्वारा प्रसिद्धि पत्रक में ‘संघ’ ने सहभाग लिया, ऐसा बार-बार आने पर डॉक्टर ने उन्हें पत्र लिखकर संघ का उल्लेख न करने की सूचना उनके प्रसिद्धि विभाग को देने को कहा था। राजकीय आंदोलन का तात्कालिक, नैमित्तिक व संघर्षमय स्वरूप और संघ का नित्य, अविरत (अखंड) व रचनात्मक स्वरूप इन दोनों की भिन्नता को समझ कर आंदोलन भी यशस्वी हो, परन्तु उस समय भी चिरंतन संघकार्य अबाधित रहे इस दूरदृष्टि से विचारपूर्वक यह नीति डॉक्टर ने अपनाई थी।

इसीलिए जंगल सत्याग्रह के समय भी सरसंघचालक का दायित्व डॉ परांजपे को सौंप कर व्यक्ति के नाते वे अनेक स्वयंसेवकों के साथ सत्याग्रह में सह्भागी हुए थे। 8 अगस्त, 1942 को मुंबई के गोवलिया टैंक मैदान पर कांग्रेस अधिवेशन में महात्मा गाँधी जी ने ‘अंग्रेज! भारत छोड़ो’ यह ऐतिहासिक घोषणा की। दूसरे दिन से ही देश में आंदोलन ने गति पकड़ी और जगह जगह आंदोलन के नेताओं की गिरफ्तारी शुरू हुई। विदर्भ में बावली (अमरावती), आष्टी (वर्धा) और चिमूर (चंद्रपुर) में विशेष आन्दोलन हुए। चिमूर के समाचार बर्लिन रेडियो पर भी प्रसारित हुए।

यहाँ के आन्दोलन का नेतृत्व कॉन्ग्रेस के उद्धवराव कोरेकर और संघ के अधिकारी दादा नाईक, बाबूराव बेगडे, अण्णाजी सिरास ने किया। इस आन्दोलन में अंग्रेज की गोली से एकमात्र मृत्यु बालाजी रायपुरकर इस संघ स्वयंसेवक की हुई। कांग्रेस, श्री तुकडो महाराज द्वारा स्थापित श्री गुरुदेव सेवा मंडल एवं संघ स्वयंसेवकों ने मिलकर 1943 का चिमूर का आन्दोलन और सत्याग्रह किया। इस संघर्ष में 125 सत्याग्रहियों पर मुकदमा चला और असंख्य स्वयंसेवकों को कारावास में रखा गया।

भारत भर में चले इस आंदोलन में स्थान-स्थान पर संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता, प्रचारक स्वयंप्रेरणा से कूद पड़े। अपने जिन कार्यकर्ताओं ने स्थान-स्थान पर अन्य स्वयंसेवकों को साथ लेकर इस आंदोलन में भाग लिया उनके कुछ नाम इस प्रकार हैं- राजस्थान में प्रचारक जयदेवजी पाठक, जो बाद में विद्या भारती में सक्रिय रहे। आर्वी (विदर्भ) में डॉ अण्णासाहब देशपांडे। जशपुर (छत्तीसगढ़) में रमाकांत केशव (बालासाहब) देशपांडे, जिन्होंने बाद में वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना की।

दिल्ली मेें श्री वसंतराव ओक जो बाद में दिल्ली के प्रान्त प्रचारक रहे। बिहार (पटना), में वहां के प्रसिद्ध वकील कृष्ण वल्लभप्रसाद नारायण सिंह (बबुआजी) जो बाद में बिहार के संघचालक रहे। दिल्ली में ही श्री चंद्रकांत भारद्वाज, जिनके पैर में गोली धँसी और जिसे निकाला नहीं जा सका। बाद में वे प्रसिद्ध कवि और अनेक संघ गीतों के रचनाकार हुए। पूर्वी उत्तर प्रदेश में माधवराव देवडे जो बाद में प्रान्त प्रचारक बने और इसी तरह उज्जैन (मध्य प्रदेश) में दत्तात्रेय गंगाधर (भैयाजी) कस्तूरे का अवदान है जो बाद में संघ प्रचारक हुए।

अंग्रेजों के दमन के साथ-साथ एक तरफ सत्याग्रह चल रहा था तो दूसरी तरफ अनेक आंदोलनकर्ता भूमिगत रहकर आंदोलन को गति और दिशा देने का कार्य कर रहे थे। ऐसे समय भूमिगत कार्यकर्ताओं को अपने घर में पनाह देना किसी खतरे से खाली नहीं था। 1942 के आंदोलन के समय भूमिगत आंदोलनकर्ता अरुणा आसफ अली दिल्ली के प्रान्त संघचालक लाला हंसराज गुप्त के घर रही थीं और महाराष्ट्र में सतारा के उग्र आन्दोलनकर्ता नाना पाटील को भूमिगत स्थिति में औंध के संघचालक पंडित सातवलेकर ने अपने घर में आश्रय दिया था। ऐसे असंख्य नाम और हो सकते हैं। उस समय इन सारी बातों का दस्तावेजीकरण (रिकार्ड) करने की कल्पना भी संभव नहीं थी।

डॉ हेडगेवार के जीवन का अध्ययन करने पर ध्यान में आता है कि बाल्यकाल से आखिरी साँस तक उनका जीवन केवल और केवल अपने देश और उसकी स्वतंत्रता इसके लिए ही था। उस हेतु उन्होंने समाज को दोषमुक्त, गुणवान एवं राष्ट्रीय विचारों से जाग्रत कर उसे संगठित करने का मार्ग चुना था। संघ की प्रतिज्ञा में भी 1947 तक संघ कार्य का उद्देश्य ‘हिन्दू राष्ट’ को स्वतंत्र करने के लिए’ ऐसा ही था। भारतीय राष्ट्रीय जीवन में ‘एक्सट्रीम पोजीशंस’ लेने की स्थिति दिखती थी।

डॉक्टर जी के समय भी समाज कांग्रेस-क्रांतिकारी, तिलक-गाँधी, हिंसा-अहिंसा, हिन्दू महासभा-कॉन्ग्रेस ऐसे द्वन्द्वों में उलझा हुआ था। एक दूसरे को मात करने का वातावरण बना था। कई बार तो आपसी भेद के चलते ऐसा बेसिर का विरोध करने लगते थे कि साम्राज्यवाद के विरोध में अंग्रेजों से लड़ने के बदले आपस में ही भिड़ते दिखते थे। 1921 में मध्य प्रान्त कॉन्ग्रेस की प्रांतीय बैठक में लोकनायक अणे की अध्यक्षता में क्रांतिकारियों की निंदा का प्रस्ताव आने वाला था।

डॉ हेडगेवार ने उन्हें समझाया कि क्रांतिकारियों के मार्ग पर आपका विश्वास भले ही ना हो पर उनकी देशभक्ति पर शंका नहीं करनी चाहिए। ऐसी स्थिति में डॉ जी का जीवन राजनीतिक दृष्टिकोण, दर्शन एवं नीतियाँ, तिलक-गांधी, गाँधी-अहिंसा, कॉन्ग्रेस-क्रांतिकारी, इन संकीर्ण विकल्पों के आधार पर निर्धारित नहीं थी। व्यक्ति अथवा विशिष्ट मार्ग से कहीं अधिक महत्वपूर्ण स्वातंत्र्य प्राप्ति का मूल ध्येय था। भारत को केवल राजनीतिक इकाई मानने वाला एक वर्ग हर प्रकार के श्रेय को अपने ही पल्ले में डालने पर उतारू दिखता है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए दूसरों ने कुछ नहीं किया, सारा का सारा श्रेय हमारा ही है ऐसा (‘प्रोेपगंडा’) एकतरफा प्रचार करने पर वह आमादा दिखता है। यह उचित नहीं है। सशस्त्र क्रांति से लेकर अहिंसक सत्याग्रह, सेना में विद्रोह, आजाद की हिन्द फौज इन सभी के प्रयासों का एकत्र परिणाम स्वतंत्रता प्राप्ति में हुआ है। इसमें द्वितीय महायुद्ध में जीतने के बाद भी इंग्लैंड की खराब हालत और अपने सभी उपनिवेशों पर शासन करने की असमर्थता और अनिच्छा के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। स्वतंत्रता के लिए भारत के समान दीर्घ संघर्ष नहीं हुआ, ऐसे उपनिवेशों को भी अंग्रेजों ने क्रमश: स्वतंत्र किया है।

1942 का सत्याग्रह, महात्मा गाँधी द्वारा किया हुआ आखिरी सत्याग्रह था और उसके पश्चात 1947 में देश स्वतंत्र हुआ, यह बात सत्य है। परन्तु इसलिए स्वतंत्रता केवल 1942 के आंदोलन के कारण ही मिली, और जो लोग उस आंदोलन में कारावास में रहे उनके ही प्रयास से भारत स्वतंत्र हुआ यह कहना हास्यास्पद, अनुचित और असत्य है। एक रूपक कथा है। एक किसान को बहुत भूख लगी। पत्नी खाना परोस रही थी और वह खाए जा रहा था। लेकिन, तृप्ति नहीं हो रही थी, दस रोटी खाने के बाद जब उसने ग्यारहवीं रोटी खाई तो उसे तृप्ति की अनुभूति हुई। उससे नाराज होकर वह पत्नी को डाँटने लगा कि यह ग्यारहवीं रोटी जिससे तृप्ति हुई, उसने पहले क्यों नहीं दी। इतनी सारी रोटियाँ खाने की मेहनत बच जाती और तृप्ति जल्दी अनुभूत होती। यह कहना हास्यास्पद ही है।

इसी तरह यह कहना कि केवल 1942 के आन्दोलन के कारण ही भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई, हास्यास्पद बात है। इसके बारे में अन्य इतिहासकार क्या कहते हैं जरा देखिए- भारत को आजाद करते समय ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने कहा था, ‘‘महात्मा गाँधी के अहिंसा आंदोलन का ब्रिटिश सरकार पर असर शून्य रहा है।’’ कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और पश्चिम बंगाल के कार्यकारी गवर्नर रहे पी़ एम़ चक्रवर्ती के शब्दों में, ‘‘जिन दिनों मैं कार्यकारी गवर्नर था, उन दिनों भारत दौरे पर आए लॉर्ड एटली, जिन्होंने अंग्रेजों को भारत से बाहर कर कोई औपचारिक आजादी नहीं दी थी, दो दिन के लिए गवर्नर निवास पर रुके थे। भारत से अंग्रेजी हुकूमत के चले जाने के असली कारणों पर मेरी उनके साथ लंबी बातचीत हुई थी। मैंने उनसे सीधा प्रश्न किया था कि चूंकि गाँधी जी का ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ तब तक हल्का पड़ चुका था और 1947 के दौरान अंग्रेजों को यहां से आनन-फानन में चले जाने की कोई मजबूरी भी नहीं थी, तब वह क्यों गए? इसके जवाब में एटली ने कई कारण गिनाए, जिनमें से सबसे प्रमुख था भारतीय सेना और नौसेना की ब्रिटिश राज के प्रति वफादारी का लगातार कम होते जाना। इसका मुख्य कारण नेताजी सुभाषचंद्र बोस की सैन्य गतिविधियाँ थीं। हमारी बातचीत के अंत में मैंने एटली से पूछा कि अंग्रेजी सरकार के भारत छोड़ जाने में गाँधी जी का कितना असर था। सवाल सुनकर एटली के होंठ व्यंग्यमिश्रित मुस्कान के साथ मुड़े और वह धीमे से बोले- न्यूनतम (मिनिमल)।’’ (रंजन बोरा, ‘सुभाषचंद्र बोस, द इंडियन नेशनल आर्मी, द वार ऑफ़ इंडियाज लिबरेशन’। जर्नल ऑफ़ हिस्टोरिकल रिव्यू, खंड 20,(2001), सं 1, संदर्भ 46)

अपनी पुस्तक ‘द इंडियाज स्ट्रगल’ में नेताजी ने लिखा है, “कॉन्ग्रेस और महात्मा जी को स्वयं अपने द्वारा प्रतिपादित योजना के प्रति स्पष्टता नहीं थी और भारत को उसकी स्वतंत्रता के अमूल्य लक्ष्य तक ले जाने से जुड़े अभियान के क्रमबद्ध चरणों से संबंधित कोई साफ विचार भी नहीं था।’’

रमेश चंद्र मजूमदार कहते हैं, “तीनों का एकजुट असर था जिसने भारत को आजाद कराया। इसमें भी विशेष रूप से आईएनए मुकदमे के दौरान सामने आए तथ्य और इस कारण भारत में उठी प्रतिक्रिया, जिसके कारण पहले से ही युद्ध में टूट चुकी ब्रिटिश सरकार को साफ हो गया था कि वह भारत पर शासन करने के लिए सिपाहियों की वफादारी पर निर्भर नहीं रह सकती। भारत से जाने के उनके निर्णय का यह संभवत: सबसे बड़ा कारण था।’’(मजूमदार, रमेश चंद्र, – थ्री फेजेज ऑफ़ इंडियाज स्ट्रगल फॉर फ्रीडम, बीवीएन बॉम्बे, इंडिया 1967, पृ़ 58-59)

यह सारा वृत्तांत पढ़ने के बाद, यह सोचना कि 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन का स्वतंत्रता प्राप्ति में कुछ भी योगदान नहीं है यह असत्य है। जेल में जाना यही देशभक्त होने का परिचायक है ऐसा मानना भी ठीक नहीं है। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय लोगों में, आंदोलन कर कारावास भोगने वाले, उनके परिवारों की देखभाल करने वाले, भूमिगत आंदोलन करने वाले, ऐसे भूमिगत आंदोलनकारियों को अपने घरों में पनाह देने वाले, विद्यालयों के द्वारा विद्यार्थियों में देशभक्ति का भाव जगाने वाले, स्वदेशी के द्वारा अंग्रेजों की आर्थिक नाकाबंदी करने वाले, स्वदेशी उद्योग के माध्यम से सशक्त भारतीय पर्याय देने वाले, लोककला, पत्रकारिता, कथा उपन्यास, नाटकादि के माध्यम से राष्ट्र जागरण करने वाले सभी का योगदान महत्व का है। 

भारत केवल एक राजनीतिक इकाई नहीं है। यह तो हजारों वर्षों के चिंतन के आधार पर निर्मित एक शाश्वत, समग्र, एकात्म जीवन दृष्टि पर आधारित एक सांस्कृतिक इकाई है। यह जीवन दृष्टि, संस्कृति ही आसेतु हिमाचल इस वैविध्यपूर्ण समाज को एकसूत्र में गूँथ कर एक विशिष्ट पहचान देती है। इसलिए, भारत के इतिहास में जब-जब सफल राजनीतिक परिवर्तन हुआ है, उसके पहले और उसके साथ-साथ एक सांस्कृतिक जागरण भारत की आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा हुआ दिखता है।

परिस्थिति जितनी अधिक विकट होती दिखती है उतनी ही ताकत के साथ यह आध्यात्मिक शक्ति भी भारत में सक्रिय हुई है, ऐसा दिखता है। इसीलिए मुगलों के शासन के साथ 12वीं शताब्दी से 16वीं शताब्दी तक सारे भारत में एक साथ भक्ति आंदोलन प्रस्फुटित हुआ दिखता है। उत्तर में स्वामी रामानंद से लेकर सुदूर दक्षिण में रामानुजाचार्य तक प्रत्येक प्रदेश में साधु, संत, संन्यासी ऐसे आध्यात्मिक महापुरुषों की एक अखंड परंपरा चल पड़ी है – ऐसा दिखता है।

अंग्रेजों की गुलामी के साथ-साथ स्वामी दयानंद सरस्वती, श्री रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद जैसे आध्यात्मिक नेतृत्व की परंपरा चल पड़ी दिखती है। भारत के इतिहास में सांस्कृतिक जागरण के बिना कोई भी राजनीतिक परिवर्तन सफल और स्थाई नहीं हुआ है। इसलिए सांस्कृतिक जागरण के कार्य का मूल्याकन राजनीति के मापदंड से नहीं होना चाहिए। मौन, शांत रीति से सतत चलने वाले आध्यात्मिक, सांस्कृतिक जागरण का महत्व भारत जैसे देश के लिए अधिक मायने रखता है, यह अधोरेखित होना चाहिए।

[लेखक डॉ मनमोहन वैद्य RSS के सह सर कार्यवाह (Joint General Secretary) हैं]

‘अल्लाहु अकबर’ के नारे के साथ भीड़ का हमला, ईसाई को मार डाला: बाइबिल को जला डाला, पादरी को लाठियों से पीटा

युगांडा में मुस्लिमों द्वारा ईसाई में परिवर्तित होने पर कट्टरपंथियों ने 10 जुलाई को हमला कर दिया। इसमें एक ईसाई की मौत हो गई। कट्टरपंथियों द्वारा किए गए हमले में रॉबर्ट ब्वेनजे के सिर पर गहरी चोट लगी और अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।

दरअसल रॉबर्ट ब्वेनजे 6 जुलाई को क्यंकवांजी जिले के सिरिमुला गाँव पहुँचे थे। यहाँ पर उन्होंने इस्लाम और ईसाई धर्म पर खुलकर बहस किया। इस दौरान एलीम पेंटेकोस्टल चर्च के सहायक पादरी एम्ब्रोस मुगीशा भी उनके साथ थे। ‘मॉर्निंग न्यूज स्टार’ से बात करते हुए 25 वर्षीय पादरी मुगीशा ने बताया कि बहस के बाद दो महिलाओं सहित आठ मुस्लिमों ने मसीह में विश्वास जताया।

उन्होंने कहा, “इससे मुस्लिम नाराज हो गए, लेकिन वे उस समय हम पर हमला नहीं कर पाए क्योंकि हमारे पास पुलिस की कड़ी सुरक्षा थी।” रिपोर्ट के मुताबिक, जैसे ही सहायक पादरी और ब्वेनजे वहाँ से लौटते वक्त दलदल पार कर रहे थे, तभी सिरिमुला गाँव के मुस्लिमों ने घात लगाकर उन पर हमला कर दिया।

पादरी मुगीशा ने मॉर्निंग स्टार न्यूज को बताया, “हमने देखा कि इस्लामिक पोशाक पहने हुए लोग अलग-अलग दिशाओं में झाड़ी से ‘अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर’ चिल्लाते हुए आ रहे हैं।” उन्होंने बताया कि हमलावरों में से दो की पहचान आशिरफू कसंबा और कबगाम्बे कादिरी के रूप में हुई। इन हमलावरों ने उनसे बाइबिल और अन्य किताबें भी छीन लिया।

पादरी मुगीशा ने कहा, “इसके बाद उन्होंने कुरान को अलग कर दिया और बाइबिल सहित बाकी किताबों को जला दिया। फिर हमें लाठियों से पीटा। मैंने आशिरफू कसंबा को पहचान लिया, जिसने मेरे सिर पर वार किया। मैं पानी में कूद गया और तैरकर दूसरी तरफ जाने में कामयाब हो गया।”

उन्होंने कहा कि राहगीरों ने उसे खून से लथपथ देखकर उन्हें बचाया। पादरी मुगीशा ने आगे कहा कि इस बीच हमलावरों ने ब्वेनजे पर हमला करना जारी रखा। इसके बाद हमलावर वहाँ से फरार हो गए। राहगीरों ने दोनों घायल ईसाइयों को प्राथमिक उपचार के लिए पास के क्लिनिक में ले गए और फिर बाद में किबोगा के एक अस्पताल में ले गए।

एलीम पेंटेकोस्टल चर्च के पादरी गॉडफ्रे सेसेमुजू ने कहा कि वह 10 जुलाई को अस्पताल में पादरी मुगीशा और ब्वेनजे से मिलने गए थे और उस रात लगभग 11 बजे ब्वेनजे की मृत्यु हो गई थी। ब्वेनजे 28 साल के थे। उन्होंने कहा, “ब्वेनजे की सिर में गहरी चोट लगने के कारण मौत हो गई। हमने उन्हें 12 जुलाई को दफना दिया।” पादरी सेसेमुजू ने मॉर्निंग स्टार न्यूज़ को बताया, “हमने किबोगा सेंट्रल पुलिस स्टेशन में घटना की सूचना दी।” उन्होंने कहा कि पुलिस ने कसंबा को गिरफ्तार कर लिया और उस पर हत्या के प्रयास का आरोप का मामला दर्ज किया।

पादरी सेसेमुजू ने कहा, “पुलिस अन्य हमलावरों की तलाश कर रही है। हमें अपने चर्च के सदस्यों और हमारे चर्च भवन की सुरक्षा के लिए प्रार्थनाओं की आवश्यकता है। इसके साथ ही हमें हमारे पादरी के लिए त्वरित चिकित्सा, रॉबर्ट ब्वेनजे की विधवा के लिए सपोर्ट और पादरी मुगीशा के लिए मेडिकल बिल सपोर्ट की जरूरत है।”

इधर पादरी मुगीशा ने बताया कि चर्च ने सहायक पादरी को सिरीमुला गाँव में एक चर्च स्थापित करने के लिए भेजा था। इसी बीच डिबेट और अभियानों के दौरान उन्हें मुस्लिमों से, विशेष रूप से कसंबा से धमकियाँ मिलनी शुरू हो गई थी। उन्होंने यह भी बताया कि अप्रैल में पादरी मुगीशा और ईसाई धर्म अपनाने वाले पाँच मुस्लिम क्षेत्र से भाग गए थे।

इसके बाद भी मुस्लिमों की तरफ से उन्हें धमकी भरे मैसेज आते रहे। इसमें कसंबा का भी मैसेज भी शामिल था। कसंबा ने मैसेज में लिखा था, “हम उन मुस्लिमों को वापस लाने के लिए कुछ दिन दे रहे हैं जिन्हें आपने ईसाई धर्म में परिवर्तित कर दिया है। हम जानते हैं कि आप उन्हें छिपा रहे हैं।”

48 वर्षीय पादरी ने यह भी बताया कि किबोगा जिले में 26 जून को, किंडेके गाँव के मुस्लिम कट्टरपंथियों ने पादरी बिंगाना जेम्स पर हमला किया था। रवोमुरिरो गाँव में उनके चर्च की इमारत को ध्वस्त कर दिया और उन्हें जान से मारने की धमकी दी थी।

पादरी जेम्स ने कहा कि उन्हें 23 जून की सुबह एक मुस्लिम का फोन आया, जिसने खुद को किंडेके का शेख मवेसिगे जाफरी बताया और कहा कि वे उन सात मुस्लिमों को वापस कर दें जो इस्लाम छोड़कर ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गए थे। जाफरी ने उनसे कहा, “इसलिए हम आपको दो दिनों के भीतर जगह छोड़ने की चेतावनी देते हैं, अगर आपने ऐसा नहीं किया तो हम आपके घर और चर्च को ध्वस्त कर देंगे।”

जेम्स ने कहा कि उन्होंने धमकी को गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन 26 जून की सुबह उन्हें अपने दरवाजे पर एक पत्र मिला जिसमें उन्हें रविवार की सेवाओं को बंद करने और चर्च को बंद करने का आदेश दिया गया था। उन्होंने कहा, “मैंने मना कर दिया, क्योंकि यीशु मसीह का प्रचार करना मेरी आस्था है, और इस क्षेत्र में गिरजाघर लगाना मेरा विजन है।” 

इसके बाद जब वह और उसकी मंडली उस दिन रविवार की प्रार्थना में थे, उन्होंने देखा कि जाफ़री के नेतृत्व में मुस्लिम युवकों के समूह ने उन पर अलग-अलग दिशाओं से क्लबों और लाठियों से घात लगाकर हमला किया।

पास्टर जेम्स ने मॉर्निंग स्टार न्यूज को बताया, “उन्होंने चार भाषाओं – अंग्रेजी, लुगांडा, स्वाहिली और अरबी में चिल्लाते हुए स्तनपान कराने वाली माताओं और युवाओं सहित हमें पीटना शुरू कर दिया और हमें सेवा बंद करने और तुरंत छोड़ने का आदेश दिया। इसके बाद उन्होंने इमारत को तोड़ना शुरू कर दिया।” उन्होंने बताया कि मार्च में भी रवेंटुहा गाँव के मुस्लिमों ने उसी चर्च की निर्माणाधीन इमारतों को ध्वस्त कर दिया था। उन्होंने स्थानीय नेताओं से इसकी शिकायत भी की थी, लेकिन उन्होंने इस पर ध्यान नहीं दिया।

गौरतलब है कि इससे पहले जनवरी 2021 में भी युगांडा में कट्टर इस्लामी भीड़ ने एक पादरी और उसकी पत्नी पर हमला किया था। भीड़ ने पूर्वी युगांडा के किबुकु जिले में नानकोडो उप-काउंटी में चर्च की इमारत के एक हिस्से को भी ध्वस्त कर दिया था। यह नृशंस हमला भी एक इमाम के ईसाई धर्म स्वीकार करने को लेकर हुआ। भीड़ में 8 लोग शामिल थे।

गैंगरेप के बाद जन्मा जो बच्चा, उसने 28 साल बाद माँ को दिलाया न्याय: नकी और गुड्डू हसन ने किया था सामूहिक बलात्कार, तब 12 साल की थी पीड़िता

उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर में 27 वर्षों के बाद गैंगरेप के आरोपित को धर-दबोचा गया है। सामूहिक बलात्कार के समय पीड़िता की उम्र मात्र 12 साल थी। 28 साल बाद यूपी पुलिस ने न सिर्फ प्राथमिकी दर्ज की, बल्कि आरोपित को भी गिरफ्तार कर के जेल भेजा। नगर पुलिस अधीक्षक संजय कुमार ने जानकारी दी कि 1994 में दो सगे भाइयों ने 12 साल की नाबालिग के साथ गैंगरेप किया था। उसके बाद पीड़िता ने एक बेटे को भी जन्म दिया।

जब बेटे ने अपनी माँ से पिता का नाम पूछा, तब उसे इस घटना की सच्चाई पता चली और उसने अपनी माँ को न्याय दिलाने के लिए कानून का सहारा लिया। 4 मार्च, 2021 को थाना सदर बाजार में इस मामले की FIR दर्ज की गई थी। दोनों आरोपितों में से एक गुड्डू हसन को गिरफ्तार कर लिया गया है, जबकि नकी हसन फरार चल रहा है। 48 वर्षीय मोहम्मद राज़ी उर्फ़ गुड्डू हसन हैदराबाद में रह रहा था। पुलिस ने बताया कि उसके भाई नकी हसन का लोकेशन ओडिशा में कहीं ट्रेस हुआ है।

पुलिस ने उसे भी जल्द गिरफ्तार कर लेने का आश्वासन दिया है। इंस्पेक्टर धर्मेंद्र गुप्ता ने कहा कि गिरफ्तार आरोपित ने अपना अपराध कबूल कर लिया है और उसने कहा कि उसे कभी इसकी उम्मीद नहीं थी कि इतने सालों बाद ये केस फिर से खुल जाएगा। महिला दोनों भाइयों और उनके परिवार की परिचित थी, जिसका उन्होंने कई बार गैंगरेप किया था। बेटे के जन्म के बाद उसे उसको छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था।

साथ ही धमकी दी गई थी कि अगर उसने FIR दर्ज कराया तो अच्छा नहीं होगा। लेकिन, फिर उसी बेटे ने बड़े होकर आरोपितों को ढूँढ निकालने के लिए प्रयास शुरू किया और कानूनी लड़ाई लड़ी। अदालत के आदेश पर FIR दर्ज हुई। शाहजहाँपुर के SSP एस आनंद ने बताया कि शिकायत पुष्ट लग रही थी, लेकिन आरोपितों के नाम-पता स्पष्ट नहीं थे। उन्होंने कहा कि चूँकि महिला ने बचपन में काफी कुछ झेला था, इसीलिए पुलिस ने न्याय दिलाने के लिए कोशिश शुरू की।

तत्पश्चात बृहद खोजबीन के बाद पता चला कि आरोपित शहर के हद्दाफ क्षेत्र में रह रहे हैं, लेकिन उन्होंने पीड़िता को पहचानने तक से इनकार कर दिया। इसके बाद जुलाई 2021 में DNA टेस्ट के लिए सैम्पल भेजा गया, जिसके परिणाम जुलाई 2022 में पॉजिटिव आए। मोहम्मद राज़ी उस लड़के का बायोलॉजिकल पिता निकला। लेकिन, तब तक दोनों भाई फरार हो चुके थे। पुलिस तलाशी में लगी। सर्विलांस टीम ने इसमें काफी मदद की। हैदराबाद के एक थर्मल पॉवर प्लांट में काम करता राज़ी फिर पकड़ा गया।

इस घटना का पता चलने के बाद पीड़िता के पति ने भी उसे छोड़ दिया था, जो गाजीपुर का रहने वाला है। गैंगरेप के बाद जो बच्चा हुआ था, उसे उधमपुर हरदोई में रहने वाले एक व्यक्ति को दे दिया गया था। महिला लखनऊ में रह रही थी। बेटे ने अपनी माँ को ढूँढ निकाला और पिता का नाम पूछने पर इस घटना की उसे जानकारी मिली। इस तरह लगभग 3 दशक बाद ये मामला खुला। नकी हसन की पुलिस को तलाश है।