Home Blog Page 2568

केरल में NEET परीक्षा में उतरवाए छात्राओं के अंडरगारमेंट्स, रोने लगी लड़कियाँ: परिजनों ने दर्ज कराया मामला

केरल के कोल्लम में मेडिकल प्रवेश परीक्षा- NEET 2022 के दौरान करीब 100 से अधिक छात्राओं को अपने ब्रा उतारने के लिए मजबूर किया गया। चेकिंग के नाम पर परीक्षा देने से पहले अपनी अंडरगारमेंट्स उतारने के लिए कहे जाने से छात्राओं को अपमान के साथ मानसिक तनाव और परेशानी का भी सामना करना पड़ा।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, केरल के कोल्लम में NEET एग्जाम सेंटर पर सख्ती के नाम पर छात्राओं के अंडरगारमेंट्स तक उतरवा दिए गए। इसको लेकर अब छात्राओं के परिजनों ने पुलिस में मामला दर्ज कराया है। जबकि कोल्लम के मोर्थम इंस्टीट्यूट ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नॉलेजी ने छात्राओं के आरोपों से इनकार किया है। वहीं परिजनों की शिकायत पर दर्ज एफआईआर के आधार पर पुलिस जाँच में जुट गई है। यह शिकायत कोट्टारक्का के पुलिस उपाधीक्षक के पास दर्ज कराई गई है।

इस मामले में दावा किया जा रहा कि ड्रेस कोड के अनुसार, छात्राओं को परीक्षा हॉल में प्रवेश करते समय कोई भी धातु की वस्तु या सामान पहनने की अनुमति नहीं है। इसे परीक्षा में धोखाधड़ी से बचने का उपाय बताया जा रहा है। जबकि एडवाइजरी बेल्ट के बारे में बात करती है और इसमें ब्रा जैसे अंडरगारमेंट्स का कोई भी उल्लेख नहीं है, जिसमें अंडरवायरिंग शामिल हो सकती है।

वहीं पुलिस में शिकायत दर्ज कराने के बाद एक छात्रा के पिता गोपकुमार सूरनाद ने TNM को बताया कि उन्होंने अपनी शिकायत में कहा है कि राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) द्वारा जारी आधिकारिक सूचना बुलेटिन में धातु के हुक वाली ब्रा पर किसी प्रतिबंध का उल्लेख नहीं है। उन्होंने कहा कि जब उनकी बेटी ने अपने इनरवियर को हटाने से इनकार कर दिया, तो उन्हें परीक्षा न देने के लिए कहा गया। मेरी बेटी लंबे समय से इस परीक्षा की तैयारी कर रही थी। लेकिन वह ठीक से परीक्षा भी नहीं लिख पा रही थी। वह दुखी होकर रोती हुई हमारे पास लौट आई। उन्होंने आगे बताया कि सेंटर पर अनिवार्य रूप से छात्राओं से अपने इनरवियर को हटाने के लिए कहा गया था। बच्चे बहुत असहज थे। उनमें से कई रो रहे थे। अगर ऐसा है तो वे फ्रिस्किंग के दौरान इनरवियर चेक कर सकते हैं। लेकिन उन्हें क्यों हटाएँ? NEET बुलेटिन में ऐसे कोई नियम नहीं हैं।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, छात्राओं ने बताया कि रविवार को जब वे परीक्षा देकर बाहर निकलीं तो उन्हें सारे अंडरगारमेंट्स डिब्बों में एक साथ फेंके हुए मिले। जबकि केरल के मार्थोमा इंस्टीट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी में स्थित अयूर चदायमंगलम केंद्र ने यह कहते हुए जिम्मेदारी लेने से इनकार किया है कि छात्राओं की तलाशी और बायोमेट्रिक जाँच बाहरी एजेंसियों द्वारा की गई थी।

गौरतलब है कि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) के अधिकारियों के अनुसार, मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट में रविवार को करीब 95 प्रतिशत उपस्थिति दर्ज की गई थी, जिसके लिए इस साल सबसे ज्यादा आवेदन आए थे। कुल 18,72,329 उम्मीदवारों ने मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET के लिए पंजीकरण कराया था, जिनमें से 10.64 लाख छात्राएँ थीं।

‘जजों की टिप्पणी के बाद मुझे और परिवार को मिल रही रेप-हत्या की धमकियाँ’: 9 FIR एक जगह ट्रांसफर कराने के लिए फिर सुप्रीम कोर्ट पहुँचीं नूपुर शर्मा

पैगंबर मुहम्मद के विरुद्ध टिप्पणी के आरोप में अपने खिलाफ दर्ज सारे FIR को एक जगह हस्तानांतरित करवाने के लिए नूपुर शर्मा एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुँची हैं। उन्होंने इस सम्बन्ध में एक नई याचिका दायर की है। साथ ही उन्होंने इस मामले में गिरफ़्तारी से अंतरिम राहत की भी गुहार लगाई है। बता दें कि पिछली बार जब वो यही याचिका लेकर आई थीं तो सुप्रीम कोर्ट के जजों जस्टिस सूर्यकान्त और जस्टिस जेबी पारदीवाला ने उन पर तल्ख़ टिप्पणी की थी।

इसके बाद 1 जुलाई, 2022 को उन्होंने अपनी इस याचिका को वापस ले लिया था। वैकेशन बेंच ने उनके बयान को पूरे देश में आग लगाने के लिए जिम्मेदार बताते हुए उन्हें राहत देने से इनकार कर दिया था, जिसे न्यायिक विशेषज्ञों ने न्यायपालिका के इतिहास पर एक काला धब्बा करार दिया था। नूपुर शर्मा के खिलाफ कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, असम और जम्मू कश्मीर में FIR दर्ज किए जा चुके हैं। नूपुर शर्मा पर कुल 9 FIR दर्ज हैं, जिन्हें वो दिल्ली ट्रांसफर करने की माँग कर रही हैं। उनका कहना है कि एक ही मामले में इतनी जगह कार्रवाई प्रताड़ना के समान है।

चूँकि एक ही मामले में किसी को कानूनन अलग-अलग सज़ाएँ नहीं सुनाई जा सकतीं, इसीलिए वो इन FIR को किसी एक जगह हस्तानांतरण करने के लिए गुहार लेकर सुप्रीम कोर्ट के पास पहुँची थीं, लेकिन दोनों जजों ने कह दिया कि देश में जो कुछ भी हो रहा है, उसके लिए ‘सिर्फ और सिर्फ’ नूपुर शर्मा ही जिम्मेदार हैं। उनके बयान को गैर-जिम्मेदाराना और उन्हें दंभी बता दिया गया। नूपुर शर्मा ने नई याचिका में बताया है कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बाद उन्हें और उनके परिवार को बलात्कार और हत्या की धमकियाँ मिल रही हैं।

इस मामले की सुनवाई मंगलवार (19 जुलाई, 2022) को जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच ही करेगी। नूपुर शर्मा का समर्थन करने पर इस्लाम जिहादियों ने राजस्थान के उदयपुर में कन्हैया लाल का सिर कलम कर दिया और महाराष्ट्र के अमरावती में उमेश कोल्हे का गला रेत दिया। इसी तरह गुजरात में एक व्यापारी को धमकी मिली। उदयपुर और भीलवाड़ा में ऐसी कई धमकियाँ मिलीं। उदयपुर की घटना के कनेक्शन अजमेर स्थित ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के दरगाह से भी जुड़े हैं।

‘तुमने गुस्ताख़ के परिवार को पैसे दिए’: BJP सांसद किरोड़ी लाल मीणा को ‘कन्हैया लाल वाला हाल’ करने की धमकी, लिखा – अब तेरा नंबर

राजस्थान में भाजपा के राज्यसभा सांसद किरोड़ी लाल मीणा को कन्हैया लाल वाला हाल करने की धमकी मिली है। इसके बाद उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पत्र लिख कर इस पूरे मामले में जाँच की माँग की है। डॉ मीणा को मिले धमकी भरे पत्र में लिखा है, “जो हमारे पैगंबरों की गुस्ताखी करेगा, उसका हाल कन्हैया लाल जैसा ही होगा। जो गुस्ताखी करने वाले की मदद करेगा, चाहे वो कोई बड़ा नेता ही क्यों न हो – उसको हम सबक सिखा देंगे।”

धमकी वाले पत्र में आगे लिखा है, “इसीलिए, अब किरोड़ी लाल मीणा तेरा नंबर है क्योंकि तू खुद को हिंदूवादी नेता और हिन्दुओं का पैरोकार समझ कर हम मुस्लिमों के खिलाफ ज़हर उगलता रहता है। तुमने कुछ दिन पहले भी उदयपुर जाकर अपने तनख्वाह के पैसों से पैगंबर की गुस्ताखी करने वालों की मदद की है। ये तूने बहुत बड़ी गुस्ताखी की है। हम मुस्लिमों को तुमने कट्टर तालिबानी कहा है। इसीलिए, अब तेरा नंबर लेना ही पड़ेगा।”

डॉ किरोड़ी लाल मीणा ने इस धमकी भरे पत्र की समुचित जाँच करवा कर कार्रवाई की माँग करते हुए राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पत्र लिखा है। पंडारा रोड के AB-4 स्थित उनके निवास स्थान पर ये धमकी वाला पत्र मिला था। डाक से इस पत्र को भेजा गया। डॉ मीणा ने अशोक गहलोत को भेजे पत्र के साथ इसे भी सबूत के रूप में संलग्न किया। बता दें कि उदयपुर में नूपुर शर्मा का समर्थन करने पर कन्हैया लाल तेली का सिर कलम कर दिया गया था।

इसके बाद मृतक के परिवार से मिलने किरोड़ी लाल मीणा भी गए थे। वहाँ उन्होंने अपने एक महीने का वेतन पीड़ित परिवार को देने की घोषणा की थी। ये खबर मीडिया में भी प्रकाशित हुई थी। धमकी भरा पत्र भेजने वाले ने इस खबर की एक अख़बार की कटिंग भी साथ में लगाई है। डॉ मीणा ने इस पत्र को राजस्थान के पुलिस महानिदेशक (DGP) और दिल्ली के पुलिस आयुक्त को भी भेजा है। साथ ही राजस्थान गृह विभाग के अतिरिक्त सचिव को भी एक प्रति भेजी गई है।

बता दें कि 71 वर्षीय किरोड़ी लाल मीणा राजस्थान के वरिष्ठ नेताओं में से एक हैं, जो 5 बार विधायक और 2 बार लोकसभा सांसद रह चुके हैं। फ़िलहाल वो राज्यसभा सांसद हैं। उन्होंने 1985 में भाजपा के टिकट पर दौसा के महुवा विधानसभा क्षेत्र से जीत दर्ज की। फिर वो फिर वो 1998 में सवाई माधोपुर के बामनवास से जीते। फिर उन्होंने 2003 में सवाई माधोपुर से जीत दर्ज की। वो 2008 में करौली के टोडाभीम और 2013 में दौसा के लालसोट से जीते। वो 1989 में सवाई माधोपुर और 2009 में दौसा से सांसद भी बने।

दरभंगा में PFI के समर्थन में रैली, लहराए कट्टरपंथी इस्लामी संगठन के झंडे: फुलवारी शरीफ में पकड़े गए आतंकियों को अपना मेंबर मानने से किया इनकार

बिहार के दरभंगा में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) के समर्थन में सोमवार (18 जुलाई 2018) को रैली निकाली गई। पटना पुलिस के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन में कट्टरपंथी इस्लामी संगठन का झंडा भी लहराया गया। फुलवारी शरीफ में पकड़े गए आतंकियों से पल्ला झाड़ते हुए पुलिस पर मनगढ़ंत कहानी बनाने का आरोप लगाया। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि पीएफआई को बदनाम किया जा रहा है। अतहर परवेज और मोहम्मद जलालुद्दीन संगठन के सदस्य नहीं हैं।

पीएफआई के प्रदेश अध्यक्ष महबूब आलम ने आरोप लगाया है कि पुलिस ने 11 जुलाई को अतहर परवेज और मोहम्मद जलालुद्दीन को गिरफ्तार किया। फिर 3 दिनों के बाद दोनों को आतंकवाद से जोड़ दिया। महबूब आलम ने कहा कि अतहर परवेज और मोहम्मद जलालुद्दीन पीएफआई के सदस्य नहीं हैं, बल्कि ये दोनों एसडीपीआई के सदस्य हैं। पीएफआई पर हथियार चलाने की ट्रेनिंग देने का आरोप लगाना राजनीतिक षड्यंत्र का हिस्सा है। आलम ने यह भी कहा कि पीएफआई के सेव द रिपब्लिक-गणतंत्र बचाओ कार्यक्रम को प्रभावित करने के लिए पटना पुलिस ने पीएफआई के खिलाफ कार्रवाई की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों ने दरभंगा के उर्दू नीम चौक से नाका नंबर 5 तक रैली निकालकर प्रदर्शन किया। पटना पुलिस आरोप लगाते हुए कहा, “पुलिस मनगढ़ंत कहानी बना रही है। ​​​11 जुलाई को पुलिस ने 3 दिनों तक 2 लोगों को हिरासत में रखा। 13 जुलाई को दोनों का नाम आतंकवाद से जोड़ दिया। अतहर परहेज और जलालुद्दीन पॉपुलर फ्रंट के सदस्य नहीं है। पुलिस का आधार गलत है।”

फुलवारी शरीफ में पीएफआई के नेटवर्क के खुलासे के बाद पुलिस ने जिन 26 पर एफआईआर की थी उनमें से कुछ दरभंगा से भी है। बताया जा रहा है कि पुलिस ने अब तक छह संदिग्धों को गिरफ्तार किया है। 20 अन्य की तलाश में छापेमारी जारी है। गिरफ्तार किए गए संदिग्धों से पूछताछ में पता चला है कि वे 12 जुलाई को बिहार दौरे पर आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला करना चाहते थे। इसके लिए 15 दिन की ट्रेनिंग भी दी गई थी।

क्या है मामला

बिहार की पटना पुलिस ने फुलवारी शरीफ से आतंकी गतिविधियों में शामिल में मोहम्मद जलालुद्दीन और अतहर परवेज को गिरफ्तार किया था। दोनों मार्शल आर्ट्स सिखाने के नाम पर युवकों का ब्रेन वॉश कर रहे थे। उन्हें हथियार चलाना सिखा रहे थे। फुलवारी शरीफ के एएसपी मनीष कुमार सिन्हा ने इस संबंध में बताया था, “भारत विरोधी गतिविधि में संलिप्त दो लोगों को गिरफ्तार किया गया है। 2 माह से इनसे अलग-अलग जगह से लोग मिलने आते थे और अपनी टिकट व होटल की बुकिंग किसी और नाम से करते थे।”

पुलिस को इनके पास से 8 पन्नों का दस्तावेज मिला था। इसमें 2047 तक भारत को इस्लामी देश बनाने की साजिश दर्ज थी। इस दस्तावेज में लिखा था कि यदि 10 फीसद मुस्लिम आबादी पीएफआई के साथ आ जाए तो कायर बहुसंख्यकों को घुटने पर लाकर इस्लाम कबूल करवाया जाएगा। प्रधानमंत्री मोदी के पटना यात्रा को लेकर सतर्कता की वजह से इस देश विरोधी इस गतिविधि का खुलासा हुआ था।

बिहार में 15000 को आतंकी ट्रेनिंग, 12 जिलों में PFI ने बना रखे हैं टेरर सेंटर: ‘मिशन 2047’ में जुटे अतहर-अरमान ने उगले कई राज

पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (PFI) द्वारा पटना के फुलवारीशरीफ में रची गई आतंकी साजिश में रोज नए खुलासे हो रहे हैं। पटना पुलिस की पूछताछ संदिग्ध आतंकी अतहर परवेज और अरमान मलिक ने बिहार में 15 हजार से अधिक मुस्लिम युवाओं को आतंकी ट्रेनिंग दिए जाने का खुलासा किया है। इनसे ही आतंकी मरगूब ने आतंकी संगठन ‘गजवा-ए-हिंद’ के स्लीपर सेल बना रखे थे। जिसका मकसद 2023 में देश के खिलाफ जिहाद थी। वहीं अब आतंक की ट्रेनिंग पाए इन युवकों के स्‍लीपर सेल की शिनाख्‍त पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती है।

मीडिया रिपोर्ट में पुलिस के हवाले से बताया गया है कि दोनों संदिग्ध आतंकियों ने खुलासा किया है कि PFI द्वारा इन जिलों में शारीरिक शिक्षा के नाम पर मुस्लिम युवाओं को आतंक की ट्रेनिंग दी जा रही थी। बिहार में इन ठिकानों पर PFI अब तक 15000 से अधिक मुस्लिम युवाओं को अस्त्र-शस्त्र चलाने की ट्रेनिंग दे चुकी है। युवाओं को ट्रेनिंग देने के लिए राज्य में करीब 12 जिलों में ऑफिस खोला गया था। जबकि, पूर्णिया को PFI का हेड क्वार्टर बनाया गया था। देश विरोधी गतिविधियों की इस बड़ी साजिश की जाँच अब एनआइए (NIA) व प्रवर्तन निदेशालय (ED) कर सकते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, अब तक मिली जानकारी के अनुसार अतहर एवं अरमान मलिक ने पूछताछ में दक्षिण भारत के केरल और कर्नाटक से आने वाले आतंक के प्रशिक्षकों के नाम उजागर किए हैं। जो बिहार में मुस्लिम युवाओं को आतंकी प्रशिक्षण दे रहे थे। कहा जा रहा है कि दोनों आतंकियों ने PFI की आड़ में दो अन्य विंग और सिमी के पूर्व सदस्यों को संगठन में जोड़ने का उद्देश्य भी पुलिस को बताए हैं।

वहीं रिमांड पर लिए गए दोनों संदिग्ध आतंकियों से PFI की फंडिंग को लेकर भी कई सवाल किए गए हैं। रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि, PFI के बैंक अकाउंट में करीब 90 लाख रुपए के ट्रांजेक्शन किए जाने का सबूत मिला है।

बता दें कि फुलवारी शरीफ के नया टोला से 11 जुलाई, 2022 को पटना पुलिस ने अतहर परवेज और जलालुद्दीन को और 14 जुलाई को अरमान मल्लिक को अपने कब्जे में लिया था। वे फुलवारीशरीफ में शारीरिक प्रशिक्षण की आड़ में आतंकी प्रशिक्षण देते तथा भारत को 2047 तक इस्लामिक राष्ट्र (गजवा-ए-हिन्द) बनाने की साजिश से जुड़े हैं। इसके बाद बिहार पुलिस की जाँच के दौरान इनके पूरे आतंकी मॉड्यूल का पर्दाफाश हो गया। रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में कुल 26 लोगों के खिलाफ एफआइआर दर्ज की गई है। आरोपितों में से 4 को गिरफ्तार भी किया जा चुका है। उनसे मिली जानकारियों के आधार पर आगे की जाँच चल रही है।

बिहार में रची जा रही थी इंडिया को खत्म करने की साजिश

बिहार पुलिस ने 14 जुलाई 2022 को 8 पन्नों वाले पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) के दस्तावेज को लेकर चौंकाने वाले खुलासे किए थे, जो भारत के ‘कायर हिंदुओं’ को सबक सिखाने की बात करता है। यह दस्तावेज आने वाले वर्षों के लिए पीएफआई के लक्ष्य के बारे में बताता है।

‘इंडिया विज़न 2047’ नाम के दस्तावेज़ को पीएफआई ने अपने कैडर के बीच आंतरिक रूप से वितरित किया है। उसका लक्ष्य ‘कायर हिंदुओं’ पर पूरी तरह से हावी होना और उन्हें अपने अधीन करना है। यह लक्ष्य तब ही प्राप्त किया जा सकता है, जब पीएफआई के पीछे 10 प्रतिशत मुस्लिम एकजुट हों।

वहीं आतंकी संगठन गजवा-ए-हिन्द से जुड़ा मरगूब ‘इंडिया खत्म हो जाएगा’ मुहिम का हिस्सा था। कहा जा रहा है कि पाकिस्‍तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ भी उसे सपोर्ट कर रही थी। वह ‘गजवा-ए-हिंद’ वाट्सऐप ग्रुप बनाकर पाकिस्तान के कई लोगों को ग्रुप से जोड़ चुका था। रिपोर्ट के अनुसार, उसके पास मिले मोबाइल से मशकूर नामक एक पाकिस्तानी का नंबर मिला है, जिसने चैटिंग में खुद को आइएसआइ का एजेंट बताया है।

गौरतलब है कि PFI के इस केस में अब तक कुल 4 संदिग्ध आतंकियों की गिरफ्तारी हुई है। जिसमें अतहर परवेज, मो. जलालुद्दीन, अरमान मलिक और फिर दरभंगा के रहने वाले और प्रतिबंधित आतंकी संगठन सिमी के पूर्व सदस्यों को जेल से छुड़ाने में मदद करने वाले नुरुद्दीन जंगी शामिल हैं।

बॉलीवुड में लगातार फ्लॉप हो रहे बायोपिक्स, अपने फायदे पर ज्यादा ध्यान दे रहे फिल्म निर्माता: तापसी के विवादों के कारण फ्लॉप हुई ‘शाबाश मिठू’?

बॉलीवुड में बायोपिक काफी वक्त से बनती आ रही हैं। बायोपिक (Biopic) का फॉर्मूला अपनाकर फिल्ममेकर्स मोटी कमाई करते रहे हैं। किसी मशहूर शख्सियत की बायोपिक बनाने में ज्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ती है। साथ ही पहले से ही जाना पहचाना चेहरा होने के कारण दर्शक उनसे जल्दी कनेक्ट कर जाते हैं और फिल्म को बिना किसी प्रचार के अटेंशन मिल जाती है। हालाँकि, इन सबके बावजूद बेहद कम ही बायोपिक हिट हुईं, लेकिन फ्लॉप होने वाली की कतार लंबी है।

हाल ही में भारतीय महिला क्रिकेट टीम की पूर्व कप्तान मिताली राज (Mithali Raj) के जीवन पर आधारित फिल्म डायरेक्टर श्रीजीत मुखर्जी की फिल्म ‘शाबाश मिठू’ रिलीज हुई। इस फिल्म में बॉलीवुड एक्ट्रेस तापसी पन्नू (Taapsee Pannu) लीड रोल में हैं। रिलीज ​के तीसरे दिन ही ‘शाबाश मिठू’ बॉक्स ऑफिस पर हाँफती नजर आई। हॉलीवुड फिल्म ‘थॉर: लव एंड थंडर’ ने दूसरे हफ्ते शानदार कमाई करते हुए तापसी पन्नू की फिल्म ‘शाबाश मिठू’ (Shabaash Mithu Biopic) का बॉक्स ऑफिस पर बुरा हाल कर दिया। इस फिल्म को दर्शक ही नहीं मिल रहे हैं। 30 करोड़ रुपए के बजट में बनी यह फिल्म तीन दिन में 2 करोड़ रुपए भी नहीं कमा सकी। इस तरह क्रिकेट पर बनी एक और फिल्म सुपरफ्लॉप की कैटेगरी में चली गई।

‘शाबाश मिठू’ फिल्म की स्क्रिप्ट, डायरेक्शन, बैकग्राउंड म्यूजिक से लेकर गाने दर्शकों को ये सब रास नहीं आए। तापसी पन्नू की बॉडी लैंग्वेज में ना कोई नयापन दिखता है और ना ही उनके चेहरे के हाव भाव इस तरह के है ​कि उन्हें एक पल के लिए मिताली राज समझा जा सके। दरअसल, हिंदी में बायोपिक बनाते हुए डायरेक्टर अपने कलाकारों का चयन ठीक से नहीं कर पाने के कारण उन्हें मूल शख्सियत से जैसे अलग ही कर देते हैं। इसके अलावा देश और दर्शकों के बीच अपनी विवादित छवि को लेकर जाने जाने वाले कलाकार को दिग्गज खिलाड़ी की भूमिका निभाने के लिए चुनना भी एक बड़ा फैक्टर है।

यह ज्यादातार सभी लोग जानते हैं कि ‘मुल्क’ फिल्म की अभिनेत्री शाहीन बाग, किसान आंदोलन के अलावा कई मुद्दों को लेकर पीएम मोदी पर हमला कर चुकी हैं। तापसी श्रमिकों के विषय को स्टैच्यू ऑफ यूनिटी से तुलना कर सरदार पटेल की प्रतिमा को अनुपयोगी सिद्ध करने की कोशिश भी कर चुकी हैं। इसके अलावा दर्शकों को अपमानित करने और हिंदी भाषा को तवज्जो ना देने के कारण भी उनकी सोशल मीडिया पर भी काफी आलोचना हुई है। फिल्म क्रिटिक अजय ब्रह्मात्मज ने साल 2019 में ट्वीट कर तापसी को इसको लिए लताड़ा था।

उन्होंने लिखा था, “फिल्में हिंदी की, निर्देशक और कलाकार हिंदी फिल्मों के, भारत के अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में शामिल हुए हिंदी फिल्मों की बदौलत… लेकिन संदेश देना हो कि बातचीत करनी हो या टिप्पणी करनी हो यह सब कुछ अंग्रेजी में होगा। क्यों?” इसके अलावा भी कई ऐसे फैक्टर्स हैं, जिससे बायोपिक फ्लॉप हो जाती हैं।

हॉलीवुड और साउथ फिल्मों की तुलना में बॉलीवुड फिल्ममेकर्स के लिए एक अच्छी स्क्रिप्ट ढूँढना बहुत बड़ी चुनौती है। भारत में क्रिकेट बहुत लोकप्रिय खेल है और यहाँ क्रिकेट खेलने और देखने वालों की संख्या सबसे अधिक है। इसलिए बीते कुछ ​समय से हिंदी सिनेमा में क्रिकेटर्स के जीवन पर आधारित फिल्में बनाना का रास्ता चुना गया, क्योंकि जिस शख्स पर बायोपिक बन रही होती है उसके बारे में पहले से ही बहुत लिखा पढ़ा जा चुका होता है। ऐसे में बायोपिक बनाने में ना तो कोई खास मेहनत करनी पड़ती और लॉस की संभावना भी कम होती है। इसके अलावा फिल्ममेकर्स किक्रेट प्रेमियों और जिस शख्स पर बायोपिक बन रही है उसके चाहने वालों को सिनेमाघरों तक खींच लाने में कामयाब रहते हैं।

लेकिन अब लगता है हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का ये फॉर्मूला भी दर्शकों के गले नहीं उतर रहा है। दर्शक बायोपिक को सिरे से नकार रहे हैं और साउथ और हॉलीवुड फिल्में को ज्यादा पसंद कर रहे हैं। सुशांत सिंह राजपूत की फिल्म ‘धोनी अनटोल्ड स्टोरी’ को छोड़ दिया जाए तो किक्रेट पर बनी ज्यादातर फिल्में फ्लॉप रही हैं। 1983 विश्वकप में भारत को मिली एतिहासिक जीत पर बनी फिल्म 83, अजहर, सचिन: अ बिलियन ड्रीम्स को भी बड़े पर्दे पर सफलता नहीं मिली है।

इसके बाद भी बॉलीवुड में इस तरह के कंटेट पर फिल्में बनना जारी, जबकि इन फिल्मों ने बता दिया है कि बायोपिक से फिल्में हिट नहीं होती हैं। बायोपिक के केस में कई चीजें आसान हो जाती हैं, लेकिन फिल्ममेकर्स को फिल्म को हमेशा के लिए यूनिक और ऐतिहासिक बनाने के लिए कलाकार के चयन से लेकर इसकी बारिकियों पर पूरी मेहनत करनी चाहिए। ताकि दर्शकों को भी ये ना लगे कि उन्होंने अपने ढाई घंटे केवल मैच की हाई लाइट्स देखने में ही बर्बाद कर दिए।

कॉन्ग्रेस और सपा के विधायकों ने की क्रॉस वोटिंग, द्रौपदी मुर्मू के लिए डाला वोट: शिवपाल यादव और ओमप्रकाश राजभर भी अखिलेश यादव से छिटके

राष्ट्रपति चुनाव में क्रॉस वोटिंग के मामले सामने आए हैं। ओडिशा के कॉन्ग्रेस विधायक मोहम्मद मोकीम ने राजग की तरफ से उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू के पक्ष में वोट डाला। बता दें कि द्रौपदी मुर्मू ओडिशा की ही रहने वाली हैं और राज्य में मंत्री भी रही हैं। उन्होंने कहा कि वो भले ही कॉन्ग्रेस MLA हैं, लेकिन ये उनका निजी निर्णय है। उन्होंने कहा कि वो अपनी मिट्टी के लिए कुछ करना चाहते थे, इसीलिए उन्होंने अपने दिल की सुन कर ये फैसला लिया।

उधर उत्तर प्रदेश में भी समाजवादी पार्टी में फूट की खबर सामने आई है। पार्टी के विधायक शहजिल इस्लाम ने द्रौपदी मुर्मू को वोट दिया। बता दें कि कॉन्ग्रेस और सपा ने आधे-अधूरे विपक्ष की तरफ से यशवंत सिन्हा को राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया था। बरेली के भोजीपुरा से विधायक शहजिल इस्लाम ने इसके बाद ‘प्रगतिशील समाजवादी पार्टी’ के अध्यक्ष और सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल यादव से भी मुलाकात की।

खुद शिवपाल यादव ने द्रौपदी मुर्मू के पक्ष में मतदान किया। सपा गठबंधन में शामिल ओमप्रकाश राजभर की ‘सुहलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP)’ ने भी मुर्मू के ही समर्थन का ऐलान किया था। शिवपाल यादव ने पहले ही एक पत्र लिख कर अखिलेश यादव को कहा था कि सपा विधायकों को यशवंत सिन्हा को वोट नहीं देना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि यशवंत सिन्हा ने कभी सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव को ‘ISI एजेंट’ कहा था।

वहीं असम में AIUDF के नेता करीमुद्दीन ने कहा कि कॉन्ग्रेस क्रॉस वोटिंग कर रही है और ये आँकड़ा 20 से अधिक भी हो सकता है। वहीं कॉन्ग्रेस के एक अन्य बागी नेता कुलदीप बिश्नोई ‘ अंतरात्मा की आवाज़’ सुनते हुए द्रौपदी मुर्मू को वोट करने की बात कही। मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस में भी फूट की खबर सामने आ रही है, लेकिन पार्टी इसे नकार रही है। पश्चिम बंगाल में TMC का दावा है कि 9 भाजपा विधायकों ने यशवंत सिन्हा के लिए वोट डाला।

बात हो किसी का गला काट देने की तो क्या छूटेगी आपकी हँसी? कन्हैया लाल पर ‘खुशी’ नहीं छिपा पाए निजामुद्दीन दरगाह के दीवान, देखें Video

किसी इंसान का गला रेते जाने पर आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या होगी? आपकी इंसानियत जिंदा होगी तो आप यकीनन नहीं हँसेंगे। लेकिन, दिल्ली की हजरत निजामुद्दीन की दरगाह के दीवान अली मूसा निजामी कन्हैया लाल का जिक्र होते ही हँस पड़े।

उदयपुर में 28 जून 2022 को मोहम्मद रियाज और गौस मोहम्मद ने कन्हैया लाल का गला काट डाला था। निजामी ने भी इसे ‘गलत’ बताया। लेकिन मेरे लिए यह देखना आश्चर्यजनक था कि वे जवाब देने से पहले हँस पड़े। ये वही निजामी थे जो कुछ देर पहले ही मुझे बता रहे थे कि 84 साल की उम्र होने के कारण उन्हें जिंदगी का बड़ा तजुर्बा है। जो तबलीगी जमात की मरकज की आलोचना करते हुए खुद को उस सूफीवाद का पहरेदार बता रहे थे जो उनके शब्दों में अमन-मो​हब्बत बढ़ाता है। जिसका आकर्षण ऐसा है कि हिंदू, मुस्लिम, सिख- सारे कौम के लोग खिंचे चले आते हैं।

ऊपर के वीडियो में आप देख सकते हैं कि कैसे कन्हैया लाल का सवाल आते ही निजामी हँसने लगते हैं। फिर बताते हैं कि वह गलत है। जब हमने उनसे पूछा कि कन्हैया लाल की हत्या को जब वे गलत मानते हैं तो ‘सिर तन से जुदा’ के नारे लगने पर उन जैसे लोग आगे आकर इसकी निंदा क्यों नहीं करते? उन्होंने माना कि यह नारा लगाना भी गलत है। उन्होंने कहा, “ये सब नहीं करना चाहिए। क्यों माहौल खराब करते हो। अच्छा-खासा माहौल है।” अपनी दलीलों में वे कथित गंगा-जमुनी तहजीब का भी हवाला देने लगते हैं।

गौरतलब है कि कन्हैया लाल की हत्या के बाद अजमेर की ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह से जुड़े लोगों के वीडियो भी सामने आए थे। इस दरगाह के एक खादिम गौहर चिश्ती के कनेक्शन उदयपुर की निर्मम हत्या से भी सामने आए थे। मीडिया रिपोर्टों में बताया गया था कि कन्हैया लाल की हत्या के बाद हत्यारे शरण लेने के लिए गौहर चिश्ती के पास अजमेर ही आ रहे थे, लेकिन रास्ते में पकड़े गए।

गौर करने वाली बात यह है कि लिबरल गैंग आए दिन जिस गंगा-जमुनी तहजीब की दुहाई देता रहता है, जिन सूफियों को ‘संत’ बताया जाता है, उसके दो बड़े केंद्र अजमेर और निजामुद्दीन की दरगाह हैं। बावजूद नूपुर शर्मा पर भड़काऊ बातें, भारत को हिला देने की धमकी, कन्हैया लाल के हत्यारों से कनेक्शन, कन्हैया लाल के सवाल पर हँसी… ये सब बताते हैं कि तबलीगी जमात का मरकज और हजरत निजामुद्दीन की दरगाह एक ही गली में नहीं हैं, सोच के स्तर पर भी दोनों एक जैसे हैं। शायद यही कारण है कि जिस दरगाह को श्रद्धा का केंद्र बताया जाता है, वहाँ तक जाने के लिए आप जिस रास्ते से गुजरते हैं, उसके दोनों ओर गोश्त के बड़े-बड़े टुकड़े लटके नजर आते हैं और इन दुकानों के पास ही गुलाब की पत्तियाँ भी बिक रही होती है।

(निजामुद्दीन की दरगाह पर आने वाले हिंदू 60% तक कम हो गए हैं, ग्राउंड रिपोर्ट इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ें)

सिखों में जट्ट-दलित विभाजन का फायदा उठा रहे मिशनरी, पंजाब में बढ़ रही ‘पगड़ी वाले ईसाइयों’ की संख्या: 8000 गाँवों में ईसाई समितियाँ, अकेले 2 जिलों में 600+ चर्च

पंजाब में ईसाई धर्मान्तरण एक बड़ी समस्या के रूप में उभरा है। पहले ज़्यादातर पंजाब के सीमावर्ती इलाकों से मिशनरियों द्वारा सिख युवकों को बहला-फुसलाकर या लालच देकर उनका धर्म बदलवाने की कोशिश की जा रही थी वहीं अब इनके निशाने पर पंजाब के समृद्ध इलाके भी हैं। सिखों को क्रिश्चियन बनाने का अभियान चलाया जा रहा है। ईसाई धर्मांतरण का यह अभियान खासकर पंजाब के उन इलाकों में चलाया जा रहा है जो पाकिस्तान बॉर्डर से जुड़े हुए हैं। बटाला, गुरदासपुर, जालंधर, लुधियाना, फतेहगढ़ चूड़ियाँ, डेरा बाबा नानक, मजीठा, अजनाला और अमृतसर के ग्रामीण इलाकों से ऐसी खबरें आई हैं।

न्यूज़ नेशन की रिपोर्ट के अनुसार, अकाल तख्त अब इस मामले में सीधा हस्तक्षेप करते हुए खुलकर बोला है कि ईसाई मिशनरियाँ सीमा पर स्थित गाँवों में सिखों का ईसाइयत में धर्मांतरण करा रही है। अकाल तख्त जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने बताया कि सीमा पर स्थित गाँवों में ईसाई मिशनरियाँ सिख परिवारों को पैसे का लालच देकर जबरन धर्म परिवर्तन करा रही हैं।

अकाल तख्त के जत्थेदार का कहना है कि निर्दोष सिखों को जबरन ईसाई धर्म कबूल करवाना सिख समुदाय के आंतरिक मामलों में सीधा हमला है और यह बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) को इस मामले में कई शिकायतें भी मिली हैं। एसजीपीसी ने इस मामलों को बेहद ही गंभीरता से लिया है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने भाई तारू सिंह के शहादत दिवस पर कहा, “पंजाब में धर्म परिवर्तन बड़े पैमाने पर हो रहा है। यह चिंता का कारण है। लोग, विशेष रूप से गाँवों में रहने वाले, आसान लक्ष्य हैं। वे क्षुद्र लालच के बदले अपना धर्म परिवर्तित करते हैं। भाई तारू सिंह कठिन समय का सामना करने के लिए दृढ़ रहे। उन्होंने मुगल साम्राज्य के दौरान अपने बाल काटने और इस्लाम में परिवर्तित होने के बजाय अपना सिर कटा दिया था।” उन्होंने कहा कि भाई तारू सिंह सिखों के रोल मॉडल होने चाहिए। लेकिन आज कई युवा सिख धर्म के रास्ते से भटक गए हैं।

बता दें कि पंजाब में धर्मान्तरण खासतौर से छोटी जातियों में देखने को मिल रहा है। खासतौर से दलित सिखों (मजहबी सिख) और वाल्मीकि हिंदू समुदायों से जुड़े तमाम छोटी जातियों ने एक सम्मानजनक जीवन और बेहतर शिक्षा के लालच में ईसाई धर्म को अपनाना शुरू कर दिया है। इसका एक प्रमुख कारण जट्ट सिखों का मजहबी सिखों को अपने बराबर न मानना भी है। जिसमें दलित सिख वहाँ दोयम दर्जे के ट्रीट होते हैं और उनके उत्पीड़न की खबरें आती रहती हैं। इसलिए मजहबी सिख और वाल्मीकि हिन्दुओं का ईसाई धर्म की तरफ झुकाव बढ़ रहा है और रही सही कसर उनके द्वारा इन्हें अच्छी ज़िन्दगी का लालच दिखाया जाना भी एक बड़ी वजह बनकर उभरा है।

यही वजह है कि आज पंजाब में ईसाई धर्म अपनाने वाले बढ़ रहे हैं, कुछ वैसी ही स्थिति तमिलनाडु जैसे दक्षिण के राज्यों ने 1980 और 1990 के दशक में हुआ करती थी। यहाँ तक कि पंजाब के गुरदासपुर के कई गाँवों की छतों पर छोटे-छोटे चर्च बन गए हैं।

न्यूज़ नेशन ने यूनाइटेड क्रिश्चियन फ्रंट के आँकड़ों के हिसाब से बताया है कि पंजाब के 12,000 गाँवों में से 8,000 गाँवों में ईसाई धर्म की मजहबी समितियाँ हैं। वहीं अमृतसर और गुरदासपुर जिलों में 4 ईसाई समुदायों के 600-700 चर्च हैं। इनमें से 60-70% चर्च पिछले 5 सालों में अस्तित्व में आए हैं।

पंजाब में धर्मान्तरण के कार्यशैली को देखा जाए तो ईसाई मिशनरियाँ बहुत ही चालाकी से धर्म परिवर्तन की साजिश को अंजाम दे रही हैं। इसके तहत पहली पीढ़ी के नए धर्मान्तरित होकर ईसाई बने पंजाबियों को उनकी सांस्कृतिक मान्यता और पहनावे और रहन-सहन से अलग नहीं किया जा रहा है।

इसका परिणाम यह सामने आया है कि बाहर से देखकर किसी भी सिख से ईसाई बने पंजाबी को पहचानना मुश्किल है कि वह सिख धर्म छोड़ चुका है। क्योंकि ईसाई मिशनरियों ने पहली पीढ़ी के लिए पगड़ी से लेकर टप्पे तक कई सांस्कृतिक प्रतीकों की छूट दे दी हैं। वहीं अधिकांश ईसाइयों की तरफ से चर्च के प्रति अपनी निष्ठा जताने के लिए उपनाम ‘मसीह’ का लगाया जाता है, लेकिन बहुत से सिख से ईसाई बने लोगों ने अपने पिछले नाम नहीं बदले हैं। हालाँकि, नाम न बदलने की एक बड़ी वजह दलितों को मिलने वाला आरक्षण भी है, जो कि धर्मांतरण करने की स्थिति में उन्हें नहीं मिल सकता है। यही वजह है कि धर्मान्तरित होने के बावजूद जनगणना में पंजाब की ईसाई आबादी का अधिकांश हिस्सा आँकड़ों में दर्ज नहीं हो पाता।

SGPC ने तैयार की रणनीति

गौरतलब है कि पंजाब में ईसाई धर्मान्तरण को लेकर सिख गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी एक्शन में नजर आ रही है। SGPC ने सिख से ईसाई धर्म परिवर्तन के मामले में कमेटियाँ तैयार की हैं। जो कट्टरपंथी धार्मिक संस्थाओं और ईसाई मिशनरियों के प्रति सख्त एक्शन लेंगी। वहीं एसजीपीसी द्वारा तैयार की प्रचार कमेटियाँ ईसाई धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए गाँवों में सिख धर्म का प्रचार करने में जुट गई हैं।

मुस्लिम भीड़ ने 70+ घर जलाए, 200+ हिन्दुओं से मारपीट, दहाड़ मार कर रोती महिलाएँ: बांग्लादेश में हिन्दुओं से लूटपाट और उपद्रव जारी

बांग्लादेश में 15 जुलाई 2022 (शुक्रवार) को जुमे की नमाज़ के बाद नरैल के लोहागारा में चरमपंथी इस्लामी भीड़ ने हिन्दुओं के घरों, मंदिर और दुकानों में तोड़फोड़ की थी। यह हमला एक फेसबुक पोस्ट का बहाना ले कर किया गया था जिसे लिखने का आरोप एक 18 साल के लड़के पर था। पुलिस ने भीड़ को काबू करने के लिए आँसू गैस के गोले छोड़े थे। लेकिन इसके बावजूद थोड़े समय की शांति के बाद हिन्दुओं के घरों और दुकानों को निशाना बनाना जारी रहा।

इस्कॉन मंदिर के प्रवक्ता राधा रमण दास ने हमले की वीडियो और तस्वीरें अपने ट्विटर हैंडल पर शेयर की हैं। उन्होंने लिखा, “नरैल लगातार 2 दिन तक जलाया गया। इन 2 दिनों में हिन्दुओं के 70 घरों को जला दिया गया और 200 से अधिक हिन्दुओं के साथ बेरहमी से मारपीट की गई है।” संयुक्त राष्ट्र और भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय को टैग करते हुए राधारमण दास ने हिन्दुओं के साथ हो रहे इस अत्याचार पर छाई चुप्पी पर भी सवाल खड़े किए।

राधारमण दास ने आगे लिखा, “बांग्लादेश के बहादुर हिन्दुओं ने धर्म परिवर्तन करने या घर छोड़ कर भाग जाने से इनकार कर दिया है। यहाँ के हिन्दुओं ने कई इस्लामी हमले झेले और अडिग रहे। हालाँकि इसके चलते उन्होंने अपने कई परिजनों और रिश्तेदारों को खो दिया। यहाँ का इस्कॉन मंदिर नरैल के हिन्दुओं के साथ खड़ा है।” इस वीडियो में राधा रमण ने एक ऐसे घर को दिखाया है जिसको पूरी तरह से तहस नहस कर दिया गया है। घर की छत तक को नोच लिया गया है।

टूटे फूटे घरों के आगे हिन्दू महिलाओं को दहाड़े मार कर रोते हुए वीडियो शेयर करते हुए राणा रमण दास ने लिखा, “कुछ मुस्लिमों ने खुद से ही हिन्दू नाम से एक फर्जी फेसबुक ID बनाई थी। उन्होंने ही उस पर आपत्तिजनक बातें लिख कर हिन्दुओं के घरों पर हमला कर दिया। हम ही उनके सबसे आसान शिकार हैं। वो हमें जब चाहें कत्ल करें और जब चाहें लूटें। हमारा दोष केवल इतना है कि हम हिन्दू हैं।” पिछले साल की याद दिलाते हुए उन्होंने बताया कि कैसे एक मुस्लिम लड़के ने ही कुरान को हनुमान जी के पास रख दिया था जिस से कई हिन्दुओ को कत्ल कर दिया गया था।

दीपाली रानी शाहा नाम की एक महिला को रोते हुए दिखाते हुए राणा रमण ने लिखा, “ये महिला पिछले शुक्रवार को कभी भूल नहीं पाएगी क्योकि उनके आगे ही उनके घर को लूट कर जला दिया गया। अब वो अपने घर की चौखट पर बैठ कर रो रहीं हैं।

राणा रमण ने यह इस्लामी हमला पुलिस के आगे होने के आरोप लगाया है। उन्होंने बताया, “हमले के दौरान पुलिस मौजूद थी। वो सिर्फ कुछ दूर से खड़े हो कर तमाशा देख रहे थे। इस हमले के बाद डर के मारे 108 घरों के हिन्दुओं के गाँव में सन्नाटा पसरा हुआ है। अधिकतर हिन्दू गाँव छोड़ कर भाग चुके हैं।”