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‘संजय राउत भ$^% है’: शिवसेना में हुई फूट पर बोले शिंदे समर्थक, महिलाओं ने भी बकी गाली, देखें वीडियो

महाराष्ट्र में शिवसेना के दो गुट बँटने के बाद अब सोशल मीडिया पर हिंसा की खबरें आने लगी हैं। इसी बीच जहाँ उद्धव सरकार के समर्थन में खड़े शिवसैनिक एकनाथ शिंदे को सारी फूट के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, वहीं शिंदे का गुट इस पूरे राजनीतिक घमासान की वजह संजय राउत को मान रहा है। कहा जा रहा है कि एनसीपी-कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन करके शिवसेना की विचारधारा के साथ खिलवाड़ हुआ।

एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुई है जिसमें शिंदे गुट के समर्थक संजय राउत को गाली देते नजर आ रहे हैं। रिपोर्टर उनसे पूछता है कि संजय राउत तो एकनाथ शिंदे के बागी होने पर उन्हें गद्दार बोल रहे हैं। इस पर शिंदे का समर्थक कहता है कि ये कहना पूर्ण रूप से गलत है क्योंकि एकनाथ शिंदे ने अभी तक शिवसेना को नहीं छोड़ा है।

पीछे से एक अन्य समर्थक कहता है कि आज जो कुछ भी हो रहा है उसकी वजह संजय राउत ही हैं। उन्हीं की वजह से शिवसेना में इतनी बड़ी फूट हो गई है। इसी बीच एक अन्य व्यक्ति भीड़ से माइक की ओर आगे आता है और कहता है- “संजय राउत गद्दार है, भ$^% है।”

रिपोर्टर उन्हें कहता है कि वो अपशब्दों का इस्तेमाल न करें। लेकिन तभी एक महिला आगे आती है। रिपोर्टर पूछता है- “आप लोग शिवसैनिक हैं?” इस पर महिला कहती है- “हम लोग बालासाहेब के शिवसैनिक हैं…संजय राउत गद्दारी कर रहे हैं, इसलिए ये माहौल हो रहा है। संजय राउत भ$^% है।”

बता दें कि एक ओर जहाँ महाराष्ट्र में शिवसैनिक दो गुटों में बँट गए हैं। शिंदे गुट में शामिल बागी विधायकों में से एक दीपक केसरकर ने बालासाहेब के नाम पर नई पार्टी बनाने की भी बात कही है। इस गुट ने शुरू से ही इस बात को कहा है कि वो बालासाहेब के शिवसैनिक हैं और उनकी विचारधारा को आगे लेकर जाएँगे, जबकि उद्धव गुट ने कहा है कि बागी विधायकों को जो करना है करें लेकिन बालासाहेब के नाम का इस्तेमाल न करें।

डिस्क्लेमर: ऑपइंडिया की संपादकीय नीति किसी भी अभद्र भाषा का समर्थन नहीं करती है।

गर्भवती का भ्रूण आग में फेंकने से लेकर चूल्हे से गोधरा ट्रेन में आग तक: गुजरात दंगों पर वो 5 झूठ, जो नरेंद्र मोदी और हिन्दुओं को फँसाने के लिए फैलाए गए

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (24 जून, 2022) को बड़ा फैसला लेते हुए 2002 के गुजरात दंगों में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को एसआईटी के द्वारा दी गई क्लीन चिट को बरकरार रखा। कोर्ट ने ये फैसला 28 फरवरी 2002 को अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसाइटी में हिंसा के दौरान मारे गए कॉन्ग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी की विधवा जकिया जाफरी की याचिका पर सुनवाई करते हुए ये फैसला सुनाया। इस याचिका में मामले की जाँच के लिए गठित एसआईटी द्वारा पीएम मोदी और 62 अन्य को क्लीन चिट दिए जाने को चुनौती दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस अपील को ही अयोग्य करार दिया। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस एएम खानविलकर की अध्यक्षता वाली बेंच ने गुजरात दंगों में साजिश के आरोपों को खारिज कर दिया। कोर्ट के इस फैसले के साथ ही गोधरा में ट्रेन जलाए जाने और उसके बाद भड़के दंगे की आँच में सियासी रोटियाँ सेंकने की कोशिश करने वालों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। याचिका दायर करने वालों का आरोप था कि गुजरात के तत्कालीन सीएम रहे नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में साजिश के तहत इस घटना को अंजाम दिया गया था।

गोधरा के दंगों के मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही पीएम मोदी को क्लीन चिट दे दी थी। हालाँकि, उनके विरोधी काल्पनिक कहानियाँ गढ़ने से बाज नहीं आ रहे। ऐसे में इन दुष्प्रचारों को खारिज करना भी जरूरी था। फिर भी गोधरा ट्रेन जलने की घटना और उसके बाद हुए दंगों के बारे में गलत सूचनाओं, अफवाहों, और फर्जी खबरों से अपने करियर को गढ़ने की कोशिश करने वाले दुष्प्रचारकों के उन मिथकों का जिक्र भी जरूरी है। इसी तरह से यहाँ ऐसे कई मिथक हैं, जो कि गोधरा में एक ट्रेन के डिब्बे में महिलाओं और बच्चों सहित 59 हिंदुओं को जिंदा जलाने की घटना के बाद पैदा हुए।

मिथक 1: गर्भवती कौसर बानो का बलात्कार और पेट से भ्रूण बाहर निकालना

गुजरात दंगों के बाद कई लेफ्ट लिबरल मीडिया ने बड़े पैमाने पर ये खबर फैलाई कि एक गर्भवती मुस्लिम महिला का हिन्दुओं की भीड़ ने पहले बलात्कार किया और फिर तलवार से उसके पेट को फाड़कर उसके भ्रूण को बाहर निकाल लिया और उसे आग में फेंक दिया।

कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि वो कौसर बानो की भाभी सायरा बानो थी। सायरा बानो ने दावा किया, “उन्होंने मेरी भाभी की बहन कौसर बानो के साथ जो किया वह भयानक और जघन्य था। वह नौ माह की गर्भवती थी। उन्होंने उसका पेट काट दिया, उसके भ्रूण को तलवार से निकाल लिया और उसे धधकती आग में फेंक दिया। फिर उन्होंने उसे भी जला दिया।” कई कहानियाँ ऐसी भी हैं कि भ्रूण को तलवार से मार दिया गया था, जबकि कुछ में भ्रूण को तलवार की नोक पर घुमाया गया और फिर आग में फेंक दिया गया।

साल 2010 में आई एक रिपोर्ट में कौसर का पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर ने भ्रूण को बरकरार पाया। 2 मार्च 2002 को शव परीक्षण करने वाले डॉ जे एस कनोरिया ने विशेष अदालत में सहायक दस्तावेज पेश किए और कहा कि महिला के गर्भ में भ्रूण बरकरार था। भ्रूण का वजन 2500 ग्राम और लंबाई 45 सेमी थी।

इसके अलावा पोस्टमार्टम व गवाहों के जरिए ये भी पता चला कि कौसर बानो की मौत दम घुटने, डर और सदमे से हुई थी और उसके शरीर पर किसी भी तरह की बाहरी या अंदरूनी चोट का कोई निशान नहीं था। उसके शरीर पर किसी तलवार का निशान भी नहीं था। ये पोस्टमार्टम 1 मार्च 2002 को किया गया था। दंगों के दौरान कनोरिया दौरान सरकारी सिविल अस्पताल में कार्यरत थे और उन्होंने बयान दिया था कि पोस्टमॉर्टम के बाद कौसर बानो के भ्रूण को हटा दिया गया था। पोस्टमॉर्टम 1 मार्च 2002 को किया गया था।

मिथक नं 2: चूल्हे से साबरमती एक्सप्रेस में लगी आग

लिबरल्स हमेशा एक और मिथक फैलाते हैं, जिसमें दावे किए जाते हैं कि ‘आकस्मिक आग’ के कारण साबरमती एक्सप्रेस में आग लगी। हालाँकि, 27 फरवरी 2002 की गोधरा ट्रेन जलने की घटना की जाँच के लिए गुजरात सरकार द्वारा नियुक्त जाँच आयोग ‘नानावती-मेहता आयोग‘ ने इस दावे का खंडन किया था। आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है, “गवाह ने इस बात से इनकार किया है कि कोच में एक बर्तन में ज्वलनशील तरल पदार्थ गिरने से कोच में ऐसी आग लग सकती थी। गवाह ने अपने कार्यालय द्वारा उस कोच की जाँच के समय ली गई तस्वीरों को पेश किया था।”

इसके अलावा गोधरा के दंगों के बाद एफएसएल में वैज्ञानिक मुकेश जोशी 2002 में तीन बार गोधरा गए थे। उन्होंने देखा था, “कोच एस/6 के बाहरी हिस्से पर पत्थरों से टकराने के कारण उसके निशान पड़े हुए हैं। कोच एस/6 और एस/7 के बाहरी हिस्से में भी जलने के निशान थे।”

नानावटी-मेहता आयोग ने घटना के विभिन्न प्रत्यक्षदर्शियों से भी बात की थी। इसमें कईयों ने बताया कि जैसे ही ट्रेन चली भीड़ ने डिब्बे के बाईं ओर से पथराव शुरू कर दिया था। आयोग की रिपोर्ट में कहा गया था, “सज्जनलाल रानीवाल ने कहा है कि जैसे ही ट्रेन प्लेटफॉर्म से बाहर निकली, बाईं ओर खड़ी भीड़ ने उस पर पथराव करना शुरू कर दिया। इसके चलते उन्हें उनके डिब्बे की खिड़कियों के दरवाजे और शटर बंद करने के लिए कहा गया था। अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो सज्जनलाल के ऐसा कहने का और कोई कारण नहीं होता। वो तब तक खिड़कियाँ तब तक बंद नहीं करते, जब तक कि उसे ऐसा करने के लिए मजबूर न किया गया हो।”

आयोग ने आगे कहा, “यात्रियों ने यह भी कहा है कि चूँकि ट्रेन के बाईं ओर के लोगों ने ट्रेन पर पत्थर फेंकना शुरू कर दिया था, इसलिए उन्हें अपने कोच की खिड़कियाँ बंद करने की जरूरत थी। कुछ गवाहों के मुताबिक, ट्रेन पर फेंके गए पत्थरों के कारण एक या दो खिड़कियों के शीशे भी टूटे थे। इसी कारण कोच में यात्रियों को उस तरफ की खिड़कियों के टिन/धातु के शटर बंद करने जरूरत थी। हरिप्रसाद ने कहा था कि जिस समय ट्रेन स्टेशन से बाहर निकली, उसी समय से ट्रेन पर पथराव शुरू हो गया था और इस वजह से यात्रियों ने अपने कोच की खिड़कियाँ बंद कर दी थीं। उनके साक्ष्य पर संदेह का कोई कारण नहीं है।”

मिथक नंबर 3: शॉर्ट सर्किट से ट्रेन में आग

साबरमती एक्सप्रेस में आग को लेकर मुकुल सिन्हा के जन संघर्ष मंच ने एक और शिगूफा छोड़ा था, जिसमें साजिश की थ्योरी को ‘शॉर्ट सर्किट’ करार दिया गया था। हालाँकि, नानावती-मेहता आयोग का यह कहना था, “शॉर्ट सर्किट जन संघर्ष मंच द्वारा प्रचारित एक और संभावना है। कोच में शॉर्ट सर्किट होने की संभावना को दर्शाने के लिए कोई सबूत नहीं दिया गया है और आयोग के समक्ष कोई सामग्री पेश नहीं की गई है। इस संभावना के समर्थन में कारण यह बताया गया है कि पहले कोच में धुआँ था और कुछ देर बाद आग की लपटें दिखाई दीं। आयोग की जाँच में कोच एस/6 के एक भी यात्री से यह नहीं पूछा गया कि क्या कोच में शॉर्ट-सर्किट जैसा कुछ हुआ है।”

इसके अलावा रिपोर्ट में कहा गया है, “आयोग द्वारा निरीक्षण के दौरान पक्षकारों की ओर से उपस्थित अधिवक्ताओं की उपस्थिति में यह देखा गया कि बिजली के तार कोच के ऊपरी हिस्सों में थे। अगर शॉर्ट सर्किट की वजह से आग लगती तो उस जगह बैठे यात्रियों को सबसे पहले इसका पता चलता। ऐसे में नीचे की बैठे यात्री खुद को बचाने के लिए ऊपर की बर्थ पर नहीं चढ़ते। उल्टे जो लोग ऊपर की बर्थ पर बैठे थे, वे फौरन नीचे आ जाते। यात्रियों ने तुरंत चारों दरवाजों से कोच छोड़ दिया होता और इतने लोगों की जान नहीं जाती।”

दुष्प्रचार फैलाने वाले जहाँ इसे आकस्मिक आग की घटना बताते हैं। वहीं जस्टिस नानावती-मेहता समिति की रिपोर्ट (पीडीएफ) ने स्पष्ट किया है कि गोधरा में किस साजिश के कारण 59 हिन्दुओं की मौत हुई। गोधरा रेलवे स्टेशन के ठीक बाद, ‘सिग्नल फलिया’ नामक एक सड़क और एक इलाका है। रिपोर्ट के मुताबिक, “यह पुलिया तक फैली हुई है और आगे ए केबिन की ओर जाती है। यह मुख्य रूप से घाँची मुस्लिमों का इलाका है।” यहाँ जब भी कोई ट्रेन आती, तो बहुत सारे अनधिकृत विक्रेता, मुख्य रूप से घाँची मुस्लिम प्लेटफॉर्म नाश्ता, कोल्ड ड्रिंक, बीड़ी आदि बेचते थे।

रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि ट्रेन सुबह 7: 43 बजे प्लेटफॉर्म पर करीब पाँच घंटे की देरी से पहुँची। वहाँ पर इसका केवल 5 मिनट स्टॉप था। सबूतों वाले हिस्से में रिपोर्ट में नरसंहार के एक दिन बाद 28 फरवरी 2002 की मीडिया रिपोर्टों का हवाला है। इसमें मुख्यधारा के मीडिया ने रिपोर्ट किया था कि एक भीड़ ने हिंदुओं को आग लगा दी थी। उन्होंने उल्लेख किया कि हिंदू कारसेवा से लौट रहे थे और भीड़ ने ट्रेन के डिब्बों में पेट्रोल डालकर आग लगा दी।

सिग्नल फलिया पर ट्रेन के रोके जाने को लेकर टाइम्स ऑफ इंडिया ने उल्लेख किया था कि सिग्नल फलिया पर किसी ने चेन खींची थी। ट्रेन के रुकते ही कोच एस 6 और एस 7 पर पथराव से इसकी खिड़कियाँ टूट गईं। इसके बाद पेट्रोल बम अंदर फेंक दिए गए। इंडियन एक्सप्रेस ने भी चश्मदीद गवाहों के बयान दिए कि कैसे भीड़ ने पथराव के बाद कोच को आग लगा दी थी।

मिथक नं 4: कारसेवकों उकसाने वाली मुस्लिम लड़की किडनैप करने की कोशिश

गुजरात दंगों पर चौथी काल्पनिक कहानी एक ‘हाथापाई’ नैरेटिव गढ़ा गया कि ‘कारसेवकों’ ने एक मुस्लिम लड़की का अपहरण करने की कोशिश की। हालाँकि, नानावती-मेहता आयोग ने इस परिकल्पना को खारिज करते हुए कहा कि कारसेवकों द्वारा एक मुस्लिम लड़की का अपहरण वास्तविकता से परे था। आयोग ने कहा, “इन सभी गवाहों और रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य सामग्रियों के साक्ष्य से यह स्पष्ट हो जाता है कि ट्रेन में भीड़भाड़ और ट्रेन के अंदर और बीच के स्टेशनों के प्लेटफार्मों पर कभी-कभार नारे लगाने के अलावा, रामसेवकों ने कुछ नहीं किया था और पहले कोई घटना नहीं हुई थी।”

आयोग के मुताबिक, हाथापाई के बाद मुस्लिम महिला के अपहरण के ‘प्रयास’ सही नहीं लगता। रिपोर्ट में कहा गया है, “अगर वे वास्तव में वडोदरा जाने के लिए स्टेशन गए होते, तो वे साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में सवार हो जाते, क्योंकि यह उन्हें पहले वडोदरा ले जाती, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया था। उनका अपहरण करने का कथित प्रयास उस समय किया गया, जब वे बुक स्टॉल के पास थे। इसका मतलब यह होगा कि वे लगभग प्लेटफॉर्म के ढके हुए हिस्से के बीच में थे और वे रेलवे ऑफिसों के काफी करीब थे।”

मुस्लिम महिला की गवाही को खारिज करते हुए आयोक कहता है, “सबूत बताते हैं कि स्टेशन पर कई लोग थे। वहाँ यात्रियों के अलावा कई मुस्लिम वेंडर भी थे। रेलवे कर्मचारी अपने कार्यालयों में मौजूद रहे। कुछ पुलिसकर्मी भी मौजूद थे। अगर वो अपने बचाव में चिल्लाई होती तो वो लोग तो जरूर सुनते जो उसके आसपास थे। लेकिन कोई भी उसके पक्ष का समर्थन करने के लिए आगे नहीं आया।”

आयोग की रिपोर्ट कहती है, “उसके (मुस्लिम महिला) सबूतों के अनुसार, वो बुकिंग क्लर्क के ऑफिस में गई, वहाँ क्या हुआ इसकी जानकारी उन्होंने किसी को नहीं दी। उस ऑफिस के अंदर उनके पास किसी भी चीज से डरने का कोई कारण नहीं था। बावजूद इसके मेमू ट्रेन का इंतजार करने की बजाय वो तुरंत संबंधियों के पास लौट आई। उनका यह स्पष्टीकरण कि वह बहुत डरी हुई थीं और उन्हें चक्कर आ रहा था और इसलिए उन्होंने उस दिन वडोदरा वापस नहीं जाने का फैसला किया था, सच नहीं लगता।”

मिथक संख्या 5: दागी आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट और नरेंद्र मोदी की मुलाकात

लिबरल मीडिया अक्सर एक और शिगूफा छोड़ता रहा है। वो ये कि पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट ने 27 फरवरी 2022 को सीएम नरेंद्र मोदी के साथ उनके घर पर मुलाकात की थी। इस बैठक में विशेष रूप से पीएम मोदी को गोधरा में ट्रेन जलाए जाने की घटना के मद्देनजर नरसंहार में शामिल होने के लिए फंसाने के लिए विशेष रूप से प्रकाश डाला गया था।

हालाँकि, नानावती-मेहता आयोग के मुताबिक, हिरासत में मौत के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट ने झूठ बोला था कि वो 27 फरवरी 2022 को नरेंद्र मोदी से मिला था। मोदी विरोधी लॉबी का फेस बने भट्ट ने 2011 में आरोप लगाया कि 2002 के गोधरा दंगों के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 फरवरी 2002 को अपने आवास पर एक बैठक बुलाई थी, ताकि हिन्दुओं को मुस्लिमों के खिलाफ गुस्सा जाहिर करने दिया जाए, जिससे राज्य में गोधरा जैसी घटना की पुनरावृत्ति न हो।

भट्ट ने सुप्रीम कोर्ट को सौंपे गए एक हलफनामे में दावा किया था कि यह बैठक साबरमती एक्सप्रेस जलने की घटना के बाद हुई थी, जिसमें 59 अयोध्या कारसेवक मारे गए थे। उस कथित बैठक के समय भट्ट स्टेट इंटेलीजेंस के डिप्टी कमिश्नर थे। उन्होंने हलफनामे में आगे कहा कि बैठक में आठ शीर्ष पुलिस अधिकारी भी शामिल हुए थे। भट्ट ने यह भी आरोप लगाया कि दंगों की जाँच के लिए गठित एसआईटी गुजरात सरकार को बचाने की कोशिश कर रही है।

जबकि, नानावती-मेहता आयोग भट्ट के दावों का खंडन करता है। आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि उन्होंने (संजीव भट्ट) बैठक में अपनी उपस्थिति को साबित करने के लिए झूठे दस्तावेज़, एक फैक्स संदेश का इस्तेमाल किया। जस्टिस जीटी नानावती और अक्षय मेहता की रिपोर्ट के दूसरे हिस्से में कहा गया है, “सबूतों पर विचार करने पर यह स्पष्ट रूप से दिखता है कि 27 फरवरी 2002 को सीएम आवास पर हुई बैठक को लेकर भट्ट झूठ बोल रहे हैं। बैठक में उपस्थित होने के उनके द्वारा किए गए दावे झूठे प्रतीत होते हैं।”

रिपोर्ट में कहा गया है कि मुख्यमंत्री मोदी के बयानों के बारे में भट्ट के दावे उनके द्वारा बनाई गई एक कहानी थी। आयोग ने कहा कि फैक्स संदेश की प्रति, जिसका उपयोग कर भट्ट ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बैठक का दावा किया था, वास्तव में पीपी उपाध्याय द्वारा 2 मार्च 2002 को भेजी गई थी। ये पांडर्व पंचमहल की घटना को लेकर था।

झूठे साक्ष्य गढ़े, निर्दोष को फँसाने की कोशिश: तीस्ता सीतलवाड़ के साथ-साथ RB श्रीकुमार और संजीव भट्ट पर भी FIR, गुजरात दंगा मामला

गुजरात पुलिस ने रिटायर्ड IPS आरबी श्रीकुमार, संजीव भट्ट और NGO संचालक तीस्ता सीतलवाड़ के विरुद्ध विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया है। क्राइम ब्रांच के पुलिस इंस्पेक्टर ने ये मामला दर्ज कराया है। मुंबई के जुहू तारा रोड स्थित निरन्त में रहने वाली तीस्ता सीतलवाड़, गाँधीनगर के सेक्टर-8 स्थित श्री लक्ष्मीदीपम में रहने वाले आरबी श्रीकुमार और अहमदाबाद के सुशील नगर सोसाइटी में रहने वाले संजीव भट्ट का नाम इस FIR में है।

संजीव भट्ट फ़िलहाल पालनपुर जिला जेल में कैद हैं। राज्य सरकार का पक्ष रखते हुए दर्ज इस FIR में शुक्रवार (24 जून, 2022) को आए सुप्रीम कोर्ट का हवाला दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “मामले के अंत में हमें यह प्रतीत होता है कि गुजरात राज्य के असंतुष्ट अधिकारियों के साथ मिल कर कुछ लोगों ने सनसनी पैदा करने के संयुक्त प्रयास किए, जिसके तहत ऐसे ‘खुलासे’ किए गए, जिनकी असत्यता का उन्हें खुद भी भान था।”

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इन लोगों ने खुलासे की एक बृहद जाँच के बाद SIT ने पोल खोल दी। बता दें कि गुजरात दंगों में मारे गए सांसद एहसान जाफरी की पत्नी जाकिया जाफरी को चेहरा बना कर एक पूरा का पूरा गिरोह पिछले 2 दशक से इस मामले को हवा देने में लगा हुआ था। मुद्दे को गर्म रखने के लिए इन लोगों ने जानबूझ कर कुटिल चाल चली, जिससे इनकी मंशा पर सवाल खड़े होते हैं – ऐसा कहते हुए सर्वोच्च न्यायलय ने ऐसा करने वाले लोगों को जाँच के बाद न्याय के दायरे में लाने की सलाह दी।

सुप्रीम कोर्ट की सलाह के बाद गुजरात ATS ने दर्ज किया मामला

गुजरात दंगों को लेकर अफवाह फैलाने और झूठे खुलासे करने वाले इन तीनों के खिलाफ IPC की धारा-478, 471 (लोगों को भड़काने के लिए इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेजों का कपटपूर्ण इस्तेमाल), 194 (किसी को दोषी साबित करने के लिए झूठे साक्ष्य गढ़ना), 211 (किसी निर्दोष व्यक्ति को नुकसान पहुँचाने की मंशा से झूठे आरोप लगाना), 218 (लोक सेवकों द्वारा रिकार्ड्स को गलत तरीके से फ्रेम करना) और 120B के तहत मामला दर्ज किया गया है।

तीस्ता सीतलवाड़ और आरबी श्रीकुमार को आधिकारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया गया है। गुजरात पुलिस ने FIR में घटनाक्रम का विवरण देते हुए बताया है कि दंगों में कैसे पुलिस ने कानून सम्मत कार्रवाई और जाँच की। तीस्ता सीतलवाड़ को अब मुंबई से अहमदाबाद ले जाया जाएगा। सांताक्रुज पुलिस थाने में इसके लिए ज़रूरी प्रक्रिया पूरी की गई। तीस्ता सीतलवाड़ खुद के सामाजिक कार्यकर्ता होने का दावा करती हैं।

सोशल मीडिया पर फ़िज़ा खान को हुआ पाकिस्तानी दिलशाद से प्यार, पासपोर्ट बनवा घर छोड़ा: अटारी बॉर्डर पार करने से पहले पुलिस ने धरा

पंजाब में BSF और कस्टम विभाग ने अटारी बॉर्डर पर पाकिस्तानी बॉयफ्रेंड से मिलने जा रही एक लड़की को गिरफ्तार किया है। लड़की की उम्र 24 साल है और उसका नाम फ़िज़ा खान है। वह मध्य प्रदेश के रीवा की रहने वाली है और पाकिस्तान में दिलशाद नाम के अपने बॉय फ्रेंड के पास जाना चाहती थी। बताया जा रहा है कि दोनों का परिचय सोशल मीडिया पर हुआ था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक फ़िज़ा के पास पाकिस्तान जाने का वीजा था लेकिन कस्टम विभाग ने उसे एक लुकआउट नोटिस के चलते रोक लिया। यह लुकआउट नोटिस मध्य प्रदेश की रीवा पुलिस ने जारी किया था। नोटिस लड़की के परिवार वालों द्वारा पुलिस को दी गई शिकायत के बाद जारी हुआ था जिसमें उसके घर से जरूरी कागजात ले कर भाग जाने की शिकायत दर्ज करवाई गई थी।

बताया जा रहा है कि फ़िज़ा खान की दोस्ती सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के रहने वाले दिलशाद से कुछ समय पहले हुई थी। तब से वह अपने घर वालों से खुद को पाकिस्तान भेजने के लिए कहती थी। हालाँकि फ़िज़ा के घर वाले इसके लिए तैयार नहीं थे। इस बीच फ़िज़ा ने पाकिस्तानी दिलशाद से बातें जारी रखीं और अपना पासपोर्ट व वीजा भी बनवा लिया।

14 जून 2022 को फ़िज़ा अचानक ही अपने घर से पासपोर्ट के साथ गायब हो गई। घर वालों को पहले से ही उनके पाकिस्तान जाने की कोशिश करने का का शक था। उन्होंने इसकी शिकायत स्थानीय पुलिस से की। पुलिस ने फ़ौरन ही फ़िज़ा का लुकआउट नोटिस जारी कर दिया। आखिरकार फ़िज़ा अमृतसर के अटारी बॉर्डर पर कस्टम विभाग वालों को मिल गईं। उन्होंने फ़िज़ा को अमृतसर पुलिस को सौंप दिया। अमृतसर पुलिस ने फ़िज़ा की गिरफ्तारी की सूचना रीवा पुलिस को भेजी।

फ़िलहाल रीवा पुलिस अमृतसर पहुँच चुकी है और फ़िज़ा को ट्रांजिट रिमांड पर लेने की प्रक्रिया जारी है। अमृतसर ग्रामीण के SHO करमपाल सिंह के बताया कि फ़िज़ा को रीवा पुलिस को सौंप दिया गया है और SDM के यहाँ से ट्रांजिट रिमांड हासिल कर के फ़िज़ा को रीवा ले जाया जाएगा।

तीस्ता सीतलवाड़ को ATS ने घर से उठाया, देखें वीडियो: SC ने कहा था- इनके खिलाफ होनी चाहिए जाँच

गुजरात दंगों में तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद आज (25 जून 2022) गुजरात एटीएस टीम ने तीस्ता को उनके घर से गिरफ्तार कर लिया। उनके ऊपर दंगों के दौरान गुजरात की छवि खराब करने का आरोप है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, तीस्ता के खिलाफ यह कार्रवाई आईपीसी की धारा 498 के तहत दर्ज एफआईआर पर हुई। उन्हें लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि गुजरात दंगों से जुड़े मामले में उनकी भूमिका पर और छानबीन की जरूरत है। अब शनिवार को गुजरात एटीएस की टीम उन्हें संता क्रूज पुलिस थाने लेकर गई है। वहाँ से उन्हें अहमदाबाद ले जाया जाएगा।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने भी फैसला पढ़कर तीस्ता का जिक्र किया था। अपने हाल में दिए इंटरव्यू में कहा था कि तीस्ता सीतलवाड़ की एनजीओ ने गुजरात दंगों में फर्जी जानकारी फैलाने का काम किया था।

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को जाकिया जाफरी की याचिका को खारिज किया था। इस याचिका में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एसआईटी ने जो पीएम मोदी समेत 55 नेताओं को क्लिन चिट दी थी उस पर सवाल उठाए गए थे। कोर्ट ने कहा था कि तीस्ता इस मामले में शुरू से घुसी रहीं और जाफरी की भावनाओं का इस्तेमाल अपने स्वार्थ के लिए किया।

कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए ये भी कहा था कि जो लोग कानून से खिलवाड़ करते हैं उनके खिलाफ एक्शन लिया जाना चाहिए। इसी दौरान उन्होंने तीस्ता का नाम भी लिया था।

तीस्ता को लेकर मालूम हो कि ये वही कथित सामाजिक कार्यकर्ता हैं जिनके ऊपर आरोप था कि इन्होंने 2002 के दंगा पीड़ितों की मदद के लिए इन्होंने अपने एनजीओ के जरिए पैसा इकट्ठा किया। लेकिन बाद में अपनी सुविधाओं और खर्चे की पूर्ति के लिए उसका इस्तेमाल कर लिया। ये आरोप उस दौरान प्रकाश में आया था, जब गुलबर्ग हाउसिंग सोसायटी के एक निवासी ने इस मामले में शिकायत की थी।

इंस्टा पर गॉगल्स वाला मॉडल, असल में क़तर में मजदूर: नाबालिग का अपहरण कर भाग रहा इजराइल धराया, गेम खेल-खेल कर बिछाया था जाल

राजस्थान में दौसा जिला पुलिस ने 13 साल की नाबालिग लड़की का अपहरण करने के आरोप में 25 वर्षीय इजरायल को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने बिहार से लड़की को भी सकुशल बरामद कर लिया है। आरोपित लड़की को नेपाल ले जाने की फिराक में था। इजरायल की लड़की से दोस्ती ऑनलाइन गेम खेलने के दौरान हुई थी। वह लड़की से मिलने खाड़ी देश कतर से आया था। अपहरण की शिकायत 19 जून 2022 (रविवार) को दर्ज करवाई गई थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आरोपित इजरायल नेपाल का निवासी है। वह क़तर में मजदूरी करता है। इसी दौरान एक ऑनलाइन गेम कहते हुए उसकी दोस्ती राजस्थान के दौसा जिले की एक नाबालिग लड़की से हो जाती है। इजरायल ने अपनी सोशल प्रोफ़ाइल पर अपनी फोटो के बजाय किसी मॉडल की फोटो लगा रखी थी। इजरायल 18 जून को फ्लाइट पकड़ कर कतर से दिल्ली आया। दिल्ली से वो लड़की को अपने साथ ले जाने के लिए दौसा पहुँच गया।

इजरायल के दौसा पहुँचने के बाद लड़की उस से मिलने कुरकुरे खरीदने के बहाने निकली। वहाँ से इजरायल ने उसका अपहरण कर लिया और अपने साथ बिहार के रास्ते नेपाल ले जाने की कोशिश करने लगा। उसने दिल्ली से बिहार जाने का रास्ता चुना। इस बीच लड़की के परिजनों ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई। पुलिस की जाँच में सामने आया कि लड़की ने अपहरण होने के दिन अपने इंस्टाग्राम हैंडल से क़तर के किसी व्यक्ति से बात की थी।

इसी सुराग पर आगे बढ़ते हुए पुलिस ने पाया कि कतर वाली वो ID भारत में एक्टिव थी। इंस्टाग्राम हैंडल पर चल रहे मोबाइल नंबर को ट्रेस किया गया तो दिल्ली से खरीदे गए एक और नंबर की जानकारी हुई। उस नए नंबर को पुलिस द्वारा ट्रेस किया गया तो वो दौसा के बांदीकुई में एक्टिव होना पाया गया। यही वो जगह थी जहाँ से लड़की का अपहरण हुआ था। बाद में वो नंबर दिल्ली से बिहार रूट पर दिखाई दिया। SP दौसा राजकुमार गुप्ता ने तुरंत पुलिस टीमों का गठन किया।

इसी नंबर का पीछा करते हुए राजस्थान पुलिस ने आरोपित इजरायल और पीड़िता को दरभंगा से कस्टडी में ले लिया। पुलिस का कहना है कि इजरायल लड़की को नेपाल के रास्ते क़तर ले जाने की फिराक में था। पुलिस ने इजरायल की 7 दिनों की कस्टडी रिमांड ली है। इस दौरान उस से पूछताछ की जा रही है।

‘कार का शीशा साफ करने वालों से सावधान, घड़ी के जरिए अकाउंट कर दे रहे खाली’: FASTag स्कैन से लूट, जानें खबर का सच

सोशल मीडिया पर ज्यादा लाइक, ज्यादा रीच की चाह के कारण अक्सर लोग अलग-अलग हथकंडे आजमाते है। इसी क्रम में वह मनगढ़ंत दावे करने से भी गुरेज नहीं करते और नतीजा ये होता है कि सामान्य यूजर उन दावों पर यकीन करने लगाता है। हाल में ऐसा ही एक दावा बकलोल वीडियो नाम के यूट्यूब चैनल से हुआ।

चैनल पर 23 जून को साझा की गई एक स्क्रिप्टिड वीडियो में दिखाया गया कि आजकल जो बच्चे गाड़ी साफ करने आते हैं उनके हाथ में एक घड़ी होती है, जिससे वह कार पर लगे FASTag को स्कैन करते हैं और मालिक के पेटीएम से सारा पैसा निकाल लेते हैं।

वीडियो में नजर आ रहा व्यक्ति एक बच्चे को गाड़ी साफ करते हुए दिखाता है और फिर अपना दावा करता है। वीडियो के टाइटल में लिखा गया- “अगर आपकी गाड़ी पे FASTag है तो वीडियो जरूर देखें।” इस वीडियो को 24 मिलियन लोग अब तक देख चुके है।

अब जाहिर है आज के समय में जिस तरह के साइबर क्राइम हो रहे हैं तो किसी को भी इस दावे पर यकीन हो जाए। लेकिन देखने वाली बात ये है कि एक तो इस वीडियो के कैप्शन में साफ तौर पर इसे स्क्रिप्टिड बताया गया है और दूसरा इसके वायरल होते ही पेटीएम से लेकर पीआईबी सबने ये जानकारी दी है कि किस तरह FASTag काम करता है।

पीआईबी ने जानकारी दी कि वीडियो में जैसा दावा है कि बच्चे के हाथ में बँधी घड़ी FASTag स्कैन करने के लिए है, वो दरअसल बिलकुल गलत है। इस तरह की ट्रांजैक्शन बिलकुल नहीं हो सकती है। हर टोल प्लाजा का अपना यूनिक कोड होता है।

इसके अलावा पेटीएम ने भी इस वायरल दावे को लेकर कहा है कि एनईटीसी की गाइडलाइंस के मुताबिक इस तरह कोई FASTag ट्रांजैक्शन नहीं हो सकती। यह सिर्फ ऑथराइज्ड मर्चेंट ही कर सकता है। पेटीएम ने कहा है कि उनका फास्टैग पूर्ण रूप से सुरक्षित है।

इसी तरह फास्टैग एनईटीसी ने अपने ट्वीट में बताया, “एनईटीसी फास्टैग ट्रांजेक्शन सिर्फ रजिस्टर्ड मर्चेंट के जरिए ही हो सकती हैं। ये मर्चेंट टोल प्लाजा और पार्किंग प्लाजा ऑपरेटर होते हैं। इन्हें NPCI पर उनकी जियो लोकेशन के हिसाब से रजिस्टर किया जाता है। कोई भी अनऑथराइज डिवाइस एनईटीसी फास्टैग ट्रांजेक्शन नहीं कर सकता है। यह पूरी तरह से सुरक्षित है।” यानी फास्टैग की तरफ से भी बकलोल वीडियो पर अपलोड वीडियो को फर्जी बताया गया है।

एकनाथ शिंदे के बेटे के ऑफिस में शिवसैनिकों की तोड़फोड़, संजय राउत बोले – अपने बाप के नाम पर वोट माँगो, शिवसेना के बाप के नाम पर नहीं

महाराष्ट्र (Maharashtra) में जारी सियासी घमासान के बीच मुंबई में उद्धव समर्थक शिवसैनिकों ने एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) के सांसद बेटे श्रीकांत शिंदे (Srikant Shinde) के ठाणे स्थित ऑफिस में तोड़फोड़ की है। हिंसा को देखते हुए मुंबई में धारा 144 लगा दी गई है। हालाँकि, बावजूद इसके उपद्रव है कि रुकने का नाम नहीं ले रहा है। इस बीच शिंदे ने एक बयान जारी कर कहा है कि अगर उनके परिवार को कुछ होता है तो इसके लिए उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे जिम्मेदार होंगे।

इस बीच उद्धव ठाकरे ने भी हाई लेवल बैठक में शिंदे पर निशाना साधते हुए कहा कि वो पहले नाथ थे, लेकिन अब दास हो गए हैं। उन्होंने कहा कि बालासाहब ठाकरे का नाम लेकर कोई भी बागी विधायक राजनीति नहीं कर पाएगा। वे सभी सुलग रहे बम पर बैठे हैं।

वहीं अब महाराष्ट्र के डिप्टी स्पीकर ने शिंदे गुट के 16 विधायकों पर एक्शन ले लिया है। डिप्टी स्पीकर ने इन विधायकों को अयोग्य करार देने का नोटिस जारी किया है। इसके अलावा जिन 16 विधायकों को अयोग्यता नोटिस जारी किया गया है, उन्हें सोमवार (27 जून) तक अपना लिखित जवाब दाखिल करना है। नोटिस में लिखा है कि विधायकों को दल-बदल कानून के आधार पर अयोग्यता से जुड़े मामले में अपने केस के समर्थन में दस्तावेजों को भी लाना होगा। इस अवधि में अगर कोई विधायक उपस्थित नहीं होता है तो यह मान लिया जाएगा कि आपको किसी भी तरह की आपत्ति नहीं है।

बाप पर उतरे राउत

उद्धव ठाकरे के साथ राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद संजय राउत ने बागी विधायकों को लेकर विवादित बयान दिया है। उन्होंने कहा, “शिवसेना समझौता नहीं करेगी। कोई राजनीतिक स्वार्थ के लिए बालासाहेब के नाम का इस्तेमाल नहीं कर सकता। जो लोग छोड़कर गए हैं, वे अपने बाप के नाम पर वोट माँगें, शिवसेना के नाम पर नहीं।”

इसी क्रम में बागी विधायकों को असम में वीआईपी ट्रीट दिए जाने के विपक्ष के आरोपों पर असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा, “गुवाहाटी में 200 होटल हैं और सभी में मेहमान हैं। अब असम में बाढ़ है तो क्या ये बोलकर मैं लोगों को होटल से भेज दूँ? असम के लोग उनका बिल नहीं दे रहे हैं बल्कि उनसे पैसा ले रहे हैं।”

उन्होंने आगे कहा कि इसमें हमारा फायदा हो रहा है। महाराष्ट्र में भाजपा उनका (शिवसेना के बागी विधायक) समर्थन करे या नहीं करे इसका मुझसे क्या लेना-देना। मैं तो बस इतना ही कहना चाहता हूँ कि अगर असम में कोई मेहमान आया है तो उसे सुरक्षा और सहुलियत मिलनी चाहिए।

नेपोटिज्म के कारण सर्जरी के पीछे भागते हैं नए कलाकार, ताकि करीना कपूर जैसों से न सुनना पड़े ‘काली बिल्ली’: सर्जरी से बिगड़ा चेहरा, कई मौतें भी

एक्टिंग की दुनिया में कलाकारों को उनके दमदार अभिनय से परे उनकी फिटनेस और खूबसूरती के दम पर आँका जाता रहा है। स्टार किड्स की तुलना में इंडस्ट्री में बाहर से आए कलाकार अपने अभिनय का लोहा मनवा चुके हैं, लेकिन अभिनय क्षमता होने के बावजूद कई बार उन्हें उनके रंग और शरीर को लेकर इस इंडस्ट्री से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। यही कारण है कि फिल्म जगत में अपना सिक्का जमाने के लिए बाहर से आया हर कलाकार जी-तोड़ मेहनत करता है। स्ट्रगल के साथ-साथ खुद को खूबसूरत, फिट दिखाना उनकी पहली प्राथमिकता बन जाती है। प्लास्टिक सर्जरी, खूबसूरत और फिट दिखने की चाह में कई अभिनेत्रियों का चेहरा बुरी तरह बिगड़ गया। वहीं कुछ कलाकारों को अपनी जान तक गँवानी पड़ी है।

हाल ही में कन्नड़ एक्ट्रेस स्वाति सतीश की शॉकिंग तस्वीर सामने आई है। इस तस्वीर में उनका दाहिनी तरफ का चेहरा बुरी तरह बिगड़ा हुआ नजर आ रहा है। दरअसल, एक्ट्रेस ने खूबसूरत दिखने के लिए रूट कैनाल सर्जरी करवाई थी। लेकिन, सर्जरी में लापरवाही के चलते एक्ट्रेस का चेहरा बिगड़ गया है। हालाँकि, यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जब प्लास्टिक सर्जरी, खूबसूरत दिखने और स्लीम दिखने की चाह में कई एक्ट्रेसेज का चेहरा बुरी तरह से बिगड़ गया।

बॉलीवुड एक्ट्रेस कोएना मित्रा ने साल 2011 में नाक की सर्जरी करवाई थी। सर्जरी से उनका चेहरा और करियर दोनों बर्बाद हो चुके हैं। इसके अलावा तमिल एक्ट्रेस रैजा विल्सन, आयशा टाकिया का चेहरा भी सर्जरी के कारण बिगड़ चुका है। वहीं, बंगाली एक्ट्रेस मिष्टी मुखर्जी और राकेश दीवाना को पतला दिखने की चाह में अपनी जान तक गँवानी पड़ी है। मिष्टी ने वजन घटाने के लिए कीटो डाइट ली थी, लेकिन इससे उनकी दोनों किडनी फेल हो गईं और उनका निधन हो गया। वहीं, राकेश ने वजन घटाने के लिए लिपोसक्शन सर्जरी करवाई थी, लेकिन इसके ठीक चार दिन बाद ही उनका निधन हो गया। इनके अलावा साउथ की पॉपुलर एक्ट्रेस आरती अग्रवाल की भी महज 31 साल की उम्र में लिपोसक्शन सर्जरी के दौरान मौत हो गई थी।

आरती का वजन काफी बढ़ गया था, जिससे उन्हें काम मिलने में दिक्कत हो रही थी। इसलिए, पतली दिखने के लिए वह अमेरिका के एक अस्पताल में लिपोसक्शन सर्जरी करवाने गई थीं।

फिल्म इंडस्ट्री में बाहर से आने वाले नए कलाकारों के लिए यहाँ अपने पैर जमाना बेहद मुश्किल होता है। फिल्म इंडस्ट्री में नेपोटिज्म सालों से चलता आ रहा है। यहाँ स्टार किड्स की तुलना में बाहर से आने वालों कलाकारों को अपनी काबिलियत साबित करने में सालों लग जाते हैं। कुछ तो एक या दो फिल्में करने के बाद ही इस इंडस्ट्री से तौबा कर लेते हैं। कुछ यहाँ हर कठिनाइयों को पार कर सुपरस्टार बन जाते हैं, वहीं कुछ कलाकार डिप्रेशन में भी चले जाते हैं। इसका एक बड़ा कारण है पर्दे के पीछे नए कलाकारों को हतोत्साहित करने वाले नेपोटिज्म कलाकार। वे उनके रंग और शरीर पर कमेंट करते हैं, जिसके चलते वह हीनभावना का शिकार हो जाते हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो करीना कपूर प्रिंयका चोपड़ा और बिपाशा बासु का उनके रंग और एक्सेंट को लेकर कई बार मजाक उड़ा चुकी हैं। करीना कपूर खान और बिपाशा बासु की कैटफाइट से पूरी इंडस्ट्री वाकिफ है। बिपाशा की फिल्म ‘अजनबी’ में करीना कपूर भी थीं। इस दौरान दोनों के बीच काफी कहासुनी हुई थी। उस वक्त करीना ने बिपाशा को काली बिल्ली तक कह दिया था। ऐतराज और डॉन जैसी सुपरहिट फिल्मों में एक साथ काम कर चुकी करीना प्रियंका चोपड़ा के अंग्रेजी एक्सेंट को लेकर उन पर कई बार तंज कस चुकी हैं।

खैर, ऐसा लगता है कि करीना कपूर को यह सब विरासत में मिला है। करीना के दादा और सुपरस्टार शशि कपूर भी अपने दौर में इंडस्ट्री में बाहर से आए कलाकारों का उनके रंग, शरीर को लेकर मजाक उड़ाया करते थे। लेखक यासिर उस्मान की किताब ‘रेखा कैसी पहेली जिंदगानी‘ के अनुक्रम 8 ‘मद्रासन’ में इसका जिक्र किया गया है। रेखा महज 14 से 15 साल की उम्र में एक्टिंग की दुनिया में आ गई थीं।

उस दौर में श्याम बेनेगल जैसे निर्देशक भी कैमरे के सामने उनके आत्मविश्वास को देखकर दंग रह गए थे, लेकिन शशि कपूर ने उन्हें देखते ही कहा, “ये साँवली, वजनदार (मोटी) और भद्दी एक्ट्रेस कैसे फिल्मों में कुछ कर पाएगी।” यही नहीं ‘सावन भादों’ की शूटिंग के दौरान रेखा को लेकर फिल्म यूनिट से जुड़े लोगों ने भद्दे मजाक किए थे। वह उनके लिए ‘काली कलूटी मद्रासन’ से ज्यादा कुछ नहीं थीं, जो किस्मत या यूँ कहें चालाकी से हीरोइन बन गई थीं।

इसके अलावा बॉलीवुड अभिनेत्रियों ने हमेशा साउथ की अभिनेत्रियों की बॉडी को लेकर उनका मजाक बनाया। ‘बिग बॉस’ की एक्स कंटेस्टेंट हिना खान ने वर्ष 2017 में अपने एक बयान में कहा था, “मुझे साउथ की फिल्मों के कई ऑफर आए थे, लेकिन मैंने इन ऑफर को इसलिए मना कर दिया, क्योंकि मुझे वजन बढ़ाने के लिए कहा गया था।” इसको लेकर साउथ की एक्ट्रेस हंसिका मोटवानी ने उन्हें करारा जवाब भी दिया था।

इस तरह कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जब नए कलाकारों पर स्टार किड्स ने प्रेशर बनाने की कोशिश की है। ऐसे में स्ट्रगल के साथ-साथ इन कलाकारों को अपने शरीर और रंग को लेकर काफी कुछ सुनना और सहना पड़ता है। आज इसकी वजह से कई अभिनेत्रियाँ अपना चेहरा बिगाड़ कर घर बैठ चुकी हैं। उन्हें कहीं भी काम नहीं मिल रहा है। उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं हैं, जो पैसे उन्होंने कमाए थे, उसे अपनी सर्जरी और खूबसूरत दिखने में बर्बाद कर दिए।

कुल मिलाकर, बॉलीवुड में आने वाले नए कलाकारों को इन घटनाओं से सबक लेते हुए अपनी एक्टिंग पर ध्यान देना चाहिए। फिल्म जगत में अपना सिक्का जमाने के लिए रंग, रूप नहीं बल्कि आपके अभिनय में दम होना चाहिए। कैमरे के सामने आपका आत्मविश्वास आपको इंडस्ट्री के कई दिग्गज सितारों से भी आगे ले जा सकता है। रेखा, विद्या बालन, जॉनी लीवर, राजपाल यादव, धनुष, रजनीकांत कई ऐसे कलाकार आपके सामने मौजूद हैं, जिन्हें इंडस्ट्री में उनके रंग, रूप की बजाय उनके दमदार अभिनय के लिए जाना जाता है। इसके अलावा कई बेहद खूबसूरत होने के बावजूद इंडस्ट्री में वो मुकाम हासिल नहीं कर पाए हैं, जो उन्हें मिलना चाहिए था।

‘बुड्ढे हो गए हो सर, घर बैठ चिल करो’ : बॉलीवुड में शाहरुख खान ने पूरे किए 30 साल, पठान का पोस्टर देख लोग बोले- ये फ्लॉप होगी

बॉलीवुड एक्टर शाहरुख खान (Shah Rukh Khan) ने अपनी आगामी फिल्म पठान (Pathan) के लुक को रिलीज कर दिया है। इसमें वो अपने हाथ में गन लिए खड़े नजर आ रहे हैं। शाहरुख खान के बॉलीवुड में 30 साल पूरे हो गए हैं। इस फिल्म में शाहरुख खान के अलावा जॉन अब्राहम और दीपिका पादुकोण भी नजर आने वाली हैं।

अपनी फिल्म के पोस्टर को ट्विटर पर शेयर कर अभिनेता ने लिखा, “30 साल और कोई गिनती नहीं….आपका प्यार और मुस्कान अनंत है। चलिए अब ‘पठान’ की बात करते हैं। यह फिल्म 25 जनवरी, 2023 को हिंदी, तमिल और तेलुगू भाषा में रिलीज हो रही है।”

एक्टर ने जो पोस्ट शेयर किया है, उसमें वो अपने हाथ में ताबीज बाँधे दिख रहे हैं। इसको लेकर भी सोशल मीडिया पर चर्चाएँ की जा रही हैं। इसी क्रम में शिवम शंकर त्रिपाठी नाम के ट्विटर यूजर ने एक्टर की पोस्ट पर कमेंट करते हुए उन्हें सलाह दी, “खुद देखिए अपनी फिल्म, पसंद आए तब रिलीज करना और अगर अच्छी ना लगे तो फिर से उसमें कुछ बदलाव करके फिर से रिलीज करो। समय लो, लेकिन प्रोडक्ट अच्छा दो, आपसे उम्मीदें हैं और हाँ अगर कोई फैसला लेने वाला न मिले तो मुझसे संपर्क करिए।”

इसी तरह से भरत चरन नाम के ट्विटर यूजर ने पठान के फर्स्ट लुक को देखने के बाद कहा, “लिख के ले लो ये फिल्म 100% फ्लॉप होने वाली है।”

पन्नी मी नाम के एक अन्य यूजर ने कहा, “सर, आप बुड्ढे हो गए हो, थोड़ा घर पर चिल करो।”

गौरतलब है कि शाहरुख खान की ये फिल्म अगले साल 25 जनवरी 2023 को रिलीज होगी। एक्टर के फिल्म इंडस्ट्री में 30 साल पूरे होने के मौके पर निर्देशक सिद्धार्थ आनंद ने कहा कि बॉलीवुड में शाहरुख खान के 30 साल भारतीय सिनेमा के इतिहास में अपने आप में सिनेमैटिक मोमेंट है। हम उनके लाखों फैंस के साथ इसे वैश्विक तौर पर सेलिब्रेट करना चाहते हैं।