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पूछताछ के नाम पर पत्रकार अमन चोपड़ा को प्रताड़ित करती रही राजस्थान पुलिस: 6 घंटे तक खाने और चाय पीने का भी मौका नहीं दिया

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (CM Ashok Gehlot) के नेतृत्व वाली राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार (Rajasthan Government) ‘न्यूज़ 18’ के पत्रकार अमन चोपड़ा (Aman Chopra) के पीछे पड़ी हुई है। दो मामलों में हाईकोर्ट द्वरा गिरफ्तारी पर स्टे लगाने के बाद राजस्थान ने डूंगरपुर में दर्ज एक केस में चोपड़ा को पूछताछ के नाम राजस्थान पुलिस उन्हें तरह-तरह से प्रताड़ित कर रही है।

News18 के अनुसार, अमन चोपड़ा को प्रताड़ित करने के लिए राजस्थान पुलिस उन्हें सुबह से शाम तक थाने में बैठाए रही। इस दौरान न ही उन्हें खाने के लिए कुछ दिया गया और ना ही चाय आदि ही दी गई। इस दौरान उनसे अनर्गल सवाल पूछकर उनका समय खराब किया जाता रहा और मानसिक और शारीरिक तौर पर प्रताड़ित किया जाता रहा है।

पूछताछ के नाम पर राजस्थान पुलिस उन्हें झूटे मनी ट्रेल (अवैध लेनदेन) के मामले में फँसाने की कोशिश कर रही है। लाइव डिबेट से जुड़े मामले में पुलिस अमन चोपड़ा से सवाल कर रही है कि उनके खाते ये पैसे क्यों आए, कहाँ से आए, किसने भेजे, क्यों भेजे आदि-आदि।

राजस्थान पुलिस के सवालों से स्पष्ट है कि वह राजनीति साधने की कोशिश कर रही है। राजस्थान पुलिस ने अमन चोपड़ा से पूछ रही है कि जिस लाइव डिबेट को उन्होंने प्रसारित किया वो किसके कहने पर किया, इसे किसने लिखा, इसकी स्क्रिप्ट कहाँ से आई, इसके पीछे कौन है आदि-आदि।

हालाँकि, इस मामले में लाइव डिबेट की पूरी सीडी कोर्ट को सौंप दी गई थी। कोर्ट ने भी माना कि यह लाइव डिबेट है, लेकिन पुलिस ने कोर्ट को बताया कि वह चोपड़ा से पूछताछ करना चाहती है और इसके लिए उसने समय में दिया। हालाँकि, सुबह 11 बजे से शाम 5 तक राजस्थान पुलिस उन्हें तरह-तरह से प्रताड़ित करती रही।

इसके पहले राजस्थान पुलिस उनके अपार्टमेंट में घुस गई थी और अमन चोपड़ा के फ्लैट के दरवाजे पर वॉरंट चिपका दिया। इसके साथ ही पुलिस उनके दरवाजे पर कुर्सी डाल कर बैठी रही थी, ताकि उन्हें गिरफ्तार किया जा सके। इस संबंध में उसने नोएडा पुलिस से पहले इजाजत नहीं ली थी।

अब कर्नाटक के जामिया मस्जिद पर उठे सवाल, बोले हिन्दू संगठन- टीपू सुल्तान ने तोड़ा था हनुमान मंदिर, दीवार-खम्भे बताते हैं सच्चाई

वाराणसी के ज्ञानवापी विवादित ढाँचे (Varanasi Gyanvapi Controversial Structure) के मंदिर होने के पुख्ता सबूत मिलने के बाद कर्नाटक (Kanataka) में इस्लामी शासक टीपू सुल्तान (Tipu Sultan) द्वारा बनवाई गई मस्जिद में पूजा-अर्चना करने की अनुमति हिंदू संगठनों ने माँगी है। इन संगठनों का कहना है कि विजयनगर साम्राज्य के श्रीरंगपट्टन किले (Srirangapatna Fort) में मौजूद जामिया मस्जिद (Jamia Masjid), जिसे मस्जिद अल-्अला (Masjid Al-Ala) भी कहा जाता है, एक हनुमान मंदिर है। इसकी दीवारों और खंभों से यह स्पष्ट है।

नरेंद्र मोदी विचार मंच के नेताओं का कहना है कि प्रदेश की राजधानी बेंगलुरु से 120 किलोमीटर दूर श्रीरंगपट्टन के किले में स्थित पूजा-अर्चना की माँग को लेकर मांड्या जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर इसमें पूजा करने और परिसर में स्थित तालाब में स्नान करने की अनुमति माँगी है। मंच के राज्य सचिव सीटी मंजूनाथ ने कहा कि यह हनुमान मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई है।

संगठन के लोगों का दावा है कि इस हनुमान मंदिर का नाम आंजनेय मंदिर था। उन्होंने यह भी दावा किया कि इस बात के ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद हैं कि विजयनगर साम्राज्य पर कब्जा करने के बाद मंदिर को मस्जिद में बदलने को लेकर टीपू सुल्तान ने फारस के राजा खलीफ को पत्र लिखा था। संगठन के लोगों ने पुरातत्व विभाग (ASI) से आग्रह किया कि वह इन दस्तावेजों पर विचार कर मामले की जाँच करे। बता दें कि यह किला इसकी इमारतें ASI के अधीन हैं।

वहीं, काली मठ के ऋषि कुमार स्वामी नाम के एक व्यक्ति का दावा है कि साल 1784 में हनुमान मंदिर को ध्वस्त करने के बाद टीपू सुल्तान द्वारा मस्जिद का निर्माण कराया था। उन्होंने कहा कि यह साबित करने के लिए मस्जिद में शिलालेख मौजूद है। मस्जिद के अंदर तत्कालीन होयसला साम्राज्य का प्रतीक है। बता दें कि मस्जिद गिराने की धमकी के आरोप में स्वामी गिरफ्तार भी हो चुके हैं। फिलहाल वे जमानत पर बाहर हैं। वहीं, पूजा की इजाजत माँगने के बाद मस्जिद कमिटी ने सुरक्षा की माँग की है।

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, कर्नाटक के पूर्व मंत्री केएस ईश्वरप्पा (KS Eshwarappa) ने दावा किया था कि मुस्लिम नेताओं ने भी स्वीकार किया है कि मस्जिद से पहले वहाँ एक मंदिर था और मुगल शासन के दौरान लगभग 36,000 मंदिरों को तोड़ा या क्षतिग्रस्त किया गया था। उन्होंने कहा था, “हम बिना कोई परेशानी पैदा किए सुप्रीम कोर्ट के नियम के मुताबिक सभी मंदिरों को दोबारा हासिल करेंगे।”

जहाँ मिला शिवलिंग उसी वजूखाने में हाथ-पैर धोते थे नमाजी, ‘मछलियाँ मर जाएँगी’ कह कर सर्वे रोकना चाहते थे मौलवी

वाराणसी में विवादित ज्ञानवापी में सर्वे के दौरान शिवलिंग के उस स्थान से मिलने का दावा किया जा रहा है जहाँ पर नमाज़ से पहले वज़ू किया जाता था। मिली जानकारी के मुताबिक शिवलिंग ज्ञानवापी के तालाबनुमा कुएँ में मिला है। इस जगह को वज़ूखाना कहा जाता था। इस तालाब के पानी को पम्प से खाली करवाया गया जिसके बाद उसमें शिवलिंग दिखाई दिया। बताया जा रहा है कि इस तालाब का पानी न निकालने के लिए मुस्लिम पक्ष की तरफ से तमाम तरह की दलीलें भी दी गईं।

मेजर सुरेंद्र पुनिया के मुताबिक, “नमाज़ पढ़ने वाले जानते थे कि तालाब में शिवलिंग हैं। इसीलिए तो मौलवी लोग तालाब के पानी को निकालने का विरोध कर रहे थे। वो कह रहे थे कि ‘मछलियाँ’ मर जाएँगी। पर सर्वे टीम ने पानी को बाहर निकाला तो 12 फिट 8 इंच का शिवलिंग निकला।”

शिवलिंग मिलने के बाद सीनियर डिवीजन सिविल जज रवि कुमार दिवाकर ने विवादित ज्ञानवापी ढाँचे को सील करने के आदेश दिए। अपने आदेश में उन्होंने लिखा कि शिवलिंग एक ठोस प्रमाण है। इसी के साथ उन्होंने CRPF को ज्ञानवापी परिसर को अपनी सुरक्षा में लेने का आदेश देते हुए मुस्लिमों के उसमें घुसने पर रोक लगा दी।

क्या होता है वज़ूखाना

वज़ूखाना वो जगह है जहाँ नमाज़ी नमाज़ से पहले अपने हाथों और पैरों को साफ़ करते हैं। इस्लामी मान्यताओं के मुताबिक ऐसा इबादत से पहले साफ-सफाई के लिए किया जाता है। वज़ूखाना मूलतः 2 शब्दों से मिल कर बना है। पहला वज़ू जिसका अर्थ होता है शरीर के अंगों को साफ़ करना और दूसरा खाना जिसका मतलब उस जगह से है जहाँ वज़ू किया जाता है।

ज्ञानवापी की सच्चाई सामने आने पर कट्टरपंथियों को ‘बाबरी 2.0’ का डर: कह रहे – कोर्ट भी मिला हुआ है, धोखे से रख दी हिन्दू प्रतिमा

काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में स्थित ज्ञानवापी विवादित ढाँचे की सच्चाई क्या सामने आई, पूरा का पूरा लिबरल और कट्टर इस्लामी गिरोह एकदम से बौखला सा गया है। बता दें कि जिस ज्ञानवापी को ‘मस्जिद’ बता कर मुस्लिम वहाँ नमाज पढ़ते आ रहे थे और जिस वजूखाने में साढ़े तीन सदी से हाथ-पाँव धो रहे थे, वहीं पर शिवलिंग मिला है। अदालत की निगरानी में हुई प्रक्रिया में सच्चाई सामने आने के बावजूद इस्लामी गिरोह इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं है।

अमित कुमार नाम के एक लिबरल ने हिन्दुओं को यथास्थिति बनाए रखने के लिए कहा। दरअसल, ‘C Voter’ के संस्थापक यशवंत देशमुख ने लिखा था, “सदियों से जो भी ज्ञानवापी में जाते होंगे, लाज़िम है उनको साफ़ दिखता होगा वो ज़बरदस्ती तोड़े गए मंदिर में खड़े हैं। लाज़िम है उनको पता होगा उस जगह के क्या मायने हैं। लाज़िम है वो अन्याय अत्याचार के उस अध्याय को जानते होंगे। क्या एक बार भी उनके दिल में गंगा-जमनी टीस नहीं उठी?”

इस पर अमित कुमार नाम के यूजर ने लिखा कि इतिहास में युद्धों का समय था और स्पेन में सभी मस्जिदों को चर्चा बना दिया गया, तुर्की में सभी चर्च मस्जिद में तब्दील कर दिए गए और इजरायल में सभी सिनेगॉग (यहूदी मंदिर) चर्च बना दिए गए। उसने सलाह दी कि या तो भारतीय इससे आगे बढ़ें, या फिर नागरिक अशांति और प्रतिबंधों का सामना करें। इस पर यशवंत देशमुख ने जवाब दिया कि इतिहास का भान होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि किसी भी शांतिपूर्ण समझौते के लिए सच्चाई का सामना आना ज़रूरी है, इतिहास हमें यही सिखाता है। उन्होंने कहा कि इतिहास चाहे कितना भी असुविधाजनक हो, उसे छिपा या दबा देना या फिर ऐसा कह देना एकदम से ये हुआ ही नहीं था – इससे सिर्फ और सिर्फ हमारी खामियाँ ही उजागर होंगी। इस पर नजीब नाम के यूजर ने उन्हें ‘सँपोला’ बताते हुए दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि बाबरी के राम जन्मभूमि होने के कोई सबूत नहीं हैं, लेकिन इसके बावजूद मस्जिद को ध्वस्त कर के बहुसंख्यकों को सौंप दिया गया।

समीउल्लाह खान ने ऐलान किया कि मुस्लिम समुदाय फिर से ‘भव्य’ बाबरी ‘मस्जिद’ का निर्माण कराएगा और ‘ज्ञानवापी मस्जिद’ को भी फिर से खोलेगा, जिसे दुनिया भी देखेगी। उसने दोनों ढाँचों की तस्वीरें भी शेयर की।

इसी तरह नवाजिश निहाल नाम के यूजर ने लिखा, “उन्होंने तो कहा था कि बाबरी उन्हें दे दो, इससे वो संतुष्ट हो जाएँगे।” हालाँकि, लोगों ने उसे जवाब दिया कि हिन्दुओं को कुछ भी माँग कर नहीं मिला है, बल्कि कानूनी प्रक्रिया अपना कर और अत्याचार सह कर उन्हें ये हासिल हुआ है।

फैज़ान नाम के एक एक मुस्लिम कट्टरपंथी ने दावा किया कि हिन्दू अब ‘बाबरी 2.0’ की तैयारी कर रहे हैं। उसने दावा किया कि बाबरी में हिन्दू प्रतिमा रख दी गई थी और अब ज्ञानवापी के लिए भी यही मॉडल अपनाया जा रहा है। उसने उन ‘वोकिया’ मुस्लिमों को शर्म करने की सलाह दी, जो कथित तौर पर सेक्युलरिज्म के लिए बाबरी हिन्दुओं को दे देने की सलाह दे रहे थे।

एक अन्य मुस्लिम यूजर ने अपने ही समाज के लोगों को गाली देते हुए कहा कि जो शांति की बातें करते हुए बाबरी हिन्दुओं को दे देने की बातें कर रहे थे, उनका सिर अब शर्म से झुक जाना चाहिए।

अनीस अहमद ने भी अदालत के उस आदेश पर नाराजगी व्यक्त की, जिसमें शिवलिंग वाली जगह को सील कर के वहाँ लोगों की आवाजाही को प्रतिबंधित कर दिया गया है। उसने दावा किया कि न्यायपालिका और प्रशासन ने मिल कर ऐसे ही बाबरी में नमाज रुकवाई थी। उसने ये भी कहा कि ज्ञानवापी के लिए चरण दर चरण की योजना तैयार की गई है।

हबीब उर रहमान नाम के ट्विटर यूजर ने लिखा, “बाबरी मस्जिद अंत नहीं था, बल्कि ये आतंकवाद की शुरुआत थी। अदालत द्वारा जगह को सील करने का आदेश देना पक्षपात है। ये वजूखाना का तालाब है, शिवलिंग नहीं है। ज्ञानवापी एक मस्जिद है और ये हमेशा एक मस्जिद ही रहेगा।”

AIMIM के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने भी इस खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “बाबरी मस्जिद में दिसंबर 1949 में जो हुआ था, उसे ठीक उसी तरह से दोहराया जा रहा है। अदालत का आदेश मस्जिद की मजहबी प्रकृति को बदलने वाला है। ये 1991 के धार्मिक स्थल कानून का उल्लंघन है। ये मेरा डर था और अब ये सत्य होता दिख रहा है। ये मस्जिद था और क़यामत तक ज्ञानवापी मस्जिद ही रहेगा।”

वहीं प्रोपेगंडा पत्रकार और कोविड के नाम पर चंदा जमा कर पचाने की आरोपित राना अय्यूब ने कहा, “उन लिबरल पत्रकारों आवाज़ लगाइए, जिन्होंने बाबरी पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया था और ये कहा था कि ये घृणा की राजनीति का अंत है। तुमलोग सच में इतने नौसिखिए नहीं हो कि शुरुआत को अंत समझ लो। ये सब तुम्हारे कारण हो रहा है मौकापरस्तों और धर्मांधों।”

इसी तरह ‘The Wire’ की आरफा खानुम शेरवानी ने लिखा, “इस रात की सुबह नहीं! 1991 के धर्मस्थल कानून स्पष्ट रूप से हर धर्मस्थल को आज़ादी के वक्त की यथास्थिति में बनाए रखने को कहता है। मौजूदा पीढ़ी पर अत्याचार करने के लिए इतिहास को माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए। इस कानून का उल्लंघन करने वाली याचिकाओं को अदालतें स्वीकार ही क्यों करती हैं?”

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो वाराणसी के विवादित ज्ञानवापी ढाँचे से एक शिवलिंग मिला है, जो बेशकीमती पत्ना पत्थर का बना हुआ है। सर्वे में शामिल एक सूत्र के मुताबिक, “यह वही शिवलिंग है, जिसे अकबर के वित्त मंत्री टोडरमल ने बनारस के पंडित नारायण भट्ट के साथ मिलकर 1585 में स्थापित कराया था। इस शिवलिंग का रंग हरा है। इसके ऊपर का कुछ हिस्सा औरंगजेब की तबाही में क्षतिग्रस्त हो गया था। इस शिवलिंग का साइज करीब 2 मीटर है। यह देखने में काफी आकर्षक है। शिवलिंग श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित नंदी के सामने वाले ज्ञानवापी के हिस्से में है।

महेश बाबू की फिल्म के आगे रणवीर सिंह की ‘जयेशभाई जोरदार’ हुई फेल, 1 वीकेंड की कमाई में ₹150 करोड़ का फासला: रामगोपाल वर्मा ने फिर उड़ाया बॉलीवुड का मजाक

बॉलीवुड बनाम साउथ सिनेमा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। सोशल मीडिया पर खासा एक्टिव रहने वाले डायरेक्टर राम गोपाल वर्मा (Ram Gopal Varma) अक्सर बॉलीवुड की फिल्मों और इस इंडस्ट्री में काम करने वाले कलाकारों पर तंज कसते रहते हैं। इस बार भी निर्माता, निर्देशक ने अपने ट्विटर हैंडल पर हिंदी सिनेमा की बिग बजट फिल्मों के सामने दक्षिण भारतीय फिल्मों की सफलता पर तंज कसा है। उन्होंने ट्वीट किया, “पहला वीकेंड कलेक्शन। हिन्दी में रणवीर सिंह (Ranveer Singh) अभिनीत ‘जयेशभाई जोरदार’ (Jayeshbhai Jordaar) ने कमाए 11.75 करोड़ रुपए। वहीं, महेश बाबू (Mahesh Babu) अभिनीत फिल्म ‘सरकारू वारी पाटा’ (Sarkaru Vaari Paata) ने 135 करोड़ रुपए की कमाई की। “

डायरेक्टर के ट्वीट पर रिप्लाई करते हुए फिल्म क्रिटिक कमाल आर खान उर्फ केआरके (KRK) ने लिखा, “ये 11.75 करोड़ भी फेक हैं। रियल तो 10 करोड़ भी नहीं हैं। पब्लिक ने कुत्ता बना दिया इनको।”

बीते दिनों बॉक्स ऑफिस पर साउथ की फिल्मों को मिल रही कामयाबी से खुश वर्मा ने अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखा था, “जिस तरह दक्षिण की फिल्में सिनेमाघरों में कमाल कर रही हैं और उत्तर भारत की फिल्में नहीं चल पा रही हैं, उसे देखकर ऐसा लग रहा है कि बॉलीवुड अब जल्द ही सिर्फ ओटीटी के लिए फिल्में बनाना शुरू कर देगा।”

‘केजीएफ 2’ की सफलता पर बात करते हुए राम गोपाल वर्मा ने हाल ही में लिखा था, “यश स्टारर ‘केजीएफ चैप्टर 2’ की बॉक्स ऑफिस कलेक्शन अन्य सभी सितारों और स्टार निर्देशकों को खत्म करते जा रहा है।” राम गोपाल वर्मा ने ट्वीट किया था, “केजीएफ चैप्टर 2 एक आँधी की तरह है, जो सभी बड़ी फिल्मों के दिग्गजों को निगल रहा है।” इसके बाद निर्माता ने अपने दूसरे ट्वीट में लिखा, “केजीएफ 2 एक काले बादल की तरह है, जो दूसरी सभी बड़ी फिल्मों पर कहर बरपा रहा है। काले बादलों का जाल सभी कलाकारों और निर्देशकों को धीरे-धीरे खत्म कर रहा है।”

रिपोर्ट्स के मुताबिक, बॉलीवुड के हाथ इन दिनों केवल निराशा ही लग रही है। एक के बाद फिल्म बॉक्स आफिस पर फुस्स हो रही है। ईद के मौके पर रिलीज हुई ‘हीरोपंती 2’ और ‘रनवे 34 के बुरी तरह फ्लॉप होने के बाद रणवीर सिंह स्‍टारर ‘जयेशभाई जोरदार’ (Jayeshbhai Jordaar) ने भी बॉक्स आफिस पर दम तोड़ दिया है। दिव्‍यांग ठक्‍कर के डायरेक्‍शन में बनी इस फिल्‍म की हालत इतनी पस्‍त है कि यह पहले वीकेंड में 12 करोड़ रुपए भी नहीं कमा सकी है। वहीं महेश बाबू की फिल्म 1 वीकेंड में 160 करोड़ रुपए की कमाई कर चुकी है।

जम्मू-कश्मीर पुलिस ने बांदीपोरा में लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी मॉड्यूल का किया भंडाफोड़, पाकिस्तान से ट्रेंड आरिफ एजाज सहित 7 गिरफ्तार

जम्मू कश्मीर में सुरक्षाबलों के हाथ बड़ी कामयाबी लगी है। पुलिस ने सुरक्षाबलों के साथ मिलकर बांदीपोरा जिले में प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के एक आतंकी मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया। सुरक्षाबलों ने बांदीपोरा में सात आतंकियों और उनके सहयोगियों को गिरफ्तार किया है। 

इनके पास से आपत्तिजनक सामग्री, हथियार और गोला-बारूद, और चार दोपहिया सहित छह वाहन जब्त किए गए हैं। पुलिस ने जो हथियार और गोला-बारूद बरामद किया है, उनमें दो पिस्तौल, तीन पिस्टल मैगजीन, 25 पिस्टल राउंड और तीन हथगोले शामिल हैं।

गिरफ्तार किए गए आतंकवादियों में एक पाकिस्तान से ट्रेनिंग लेकर आए आतंकवादी के अलावा दो हाइब्रिड आतंकवादी और चार आतंकियों के सहयोगी शामिल हैं। पाकिस्तान से ट्रेनिंग लेकर आए आतंकवादी की पहचान नदिहाल के अनफॉल निवासी आरिफ एजाज शेहरी के रूप में हुई है। शेहरी 2018 में वाघा बॉर्डर के जरिए वैध वीजा पर पाकिस्तान गया था और अवैध हथियार ट्रेनिंग लेने के बाद वापस भारत में घुसपैठ कर गया था और बांदीपोरा में प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर के साथ सक्रिय रूप से काम करना शुरू कर दिया था।

वहीं दो हाइब्रिड आतंकवादियों की पहचान रामपोरा निवासी एजाज अहमद रेशी और गुंडपोरा निवासी शारिक अहमद लोन के रूप में हुई है। गिरफ्तार आतंकवादियों को खास तौर पर बांदीपोरा जिले में पुलिस/सुरक्षा बलों और अन्य आसान ठिकानों पर हमले करने का काम सौंपा गया था।

इसके साथ ही गिरफ्तार किए गए चार आतंकी साथियों की पहचान बांदीपोरा निवासी रियाज अहमद मीर उर्फ मेठा सेहरी, तवहीदाबाद बाग निवासी मोहम्मद वजा उर्फ गुल बाब, चिट्टीबंडी अरागा निवासी मकसूद अहमद मलिक और तवहीदाबाद बाग निवासी शीमा शफी वजा के तौर पर हुई है।

शुरुआती जाँच से पता चला है कि गिरफ्तार आतंकियों के सहयोगी बांदीपोरा जिले में आतंकवादियों को पनाह देने, आतंकवादियों के परिवहन सहित रसद / सामग्री सहायता देने में शामिल थे। गिरफ्तार महिला आतंकवादी सहयोगी बांदीपोरा शहर में वाई-फाई हॉटस्पॉट, आवास और आतंकवादियों को फेरी लगाने में भी शामिल थी। मामले में संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज कर आगे की कार्रवाई की जा रही है।

काशी से 80km दूर दुनिया का सबसे पुराना मंदिर, औरंगजेब ने इसका भी करवाया था विध्वंस… होने लगी थी अनहोनी: जानिए इस रहस्यमयी मंदिर की कहानी

मुगल आक्रांता औरंगजेब के शासनकाल को भारत का सबसे क्रूर शासनकाल माना जाता है, जिसने देश भर में मंदिरों का विध्वंस उसका प्राथमिक उद्देश्य था। औरंगजेब ने वाराणसी के काशी विश्वेश्वर महादेव मंदिर को सिर्फ नहीं तोड़ा था, बल्कि बिहार के कैमूर में स्थित माता मुंडेश्वरी के मंदिर को भी तोड़ने की कोशिश की थी, हालाँकि, वहाँ के मूल मंदिर को तोड़ने में वह नाकाम रहा है। इस मंदिर का विश्व का सबसे पुराना कार्यरत मंदिर कहा जाता है, जिसकी वास्तुकला से लेकर इसके रहस्य तक अचंभित करने वाले हैं। इसके निर्माण से लेकर विध्वंस तक के बारे में कहानियाँ प्रचलित हैं।

कहा जाता है कि औरंगजेब को जब मुंडेश्वरी माता मंदिर के बारे में जानकारी मिली तो उसने इस मंदिर को भी ध्वस्त करने का फरमान जारी कर दिया। मुगल सैनिक पहाड़ की चोटी पर पहुँच कर मंदिरों का विध्वंस करने लगे। कहा जाता है कि जब मुगल सैनिक मुख्य मंदिर को तोड़ने लगे, लेकिन इसके पूर्ण विध्वंस से पहले ही उनके साथ अनहोनी होने लगी। इसके बाद इस मंदिर को अर्द्ध खंडित अवस्था में ही छोड़ दिया गया है। वहाँ खंडित मूर्तियों एवं विग्रहों के रूप में आज भी मौजूद हैं। हालाँकि, कुछ इतिहासकारों का इससे अलग मत है।

मंदिर की प्राचीनता

माता मुंडेश्वरी का मंदिर बिहार के जिला कैमूर में मुंडेश्वरी पहाड़ी पर 608 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। इस मंदिर को शिव-शक्ति मंदिर को मंदिर भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें माता शक्ति के अलावा भगवान शिव का अनोखा शिवलिंग है। मुंडेश्वरी मंदिर 51 शक्तिपीठों में शामिल है और दुनिया का सबसे कार्यरत प्राचीनतम मंदिर नाम इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संस्थान (ASI) ने दिया है। इसकी नींव रखने से लेकर आज तक पूजा जारी है।

मंदिर में मिले एक शिलालेख में कहा गया है कि सन 389 ईस्वी (उत्तर गुप्तकालीन) में भी यह मंदिर मौजूद था। इस मंदिर में कई शिलालेख ब्राह्मी लिपि में लिखे हैं। कुछ शिलालेखों के आधार ASI ने इस मंदिर का निर्माण काल 108 ईस्वी माना है।

मंदिर की प्राचीनता का आभास यहाँ मिले महाराजा दुत्तगामनी की मुद्रा से भी होता है। बौद्ध साहित्य के अनुसार, महाराजा दुत्तगामनी अनुराधापुर वंश का थे और ईसा पूर्व 101-77 में श्रीलंका पर शासन करते थे। इस मंदिर को शककालीन भी बताया जाता है। इसका जिक्र मार्कण्डेय पुराण में किया गया है। इसकी प्राचीनता को देखते हुए साल 1915 से ही यह ASI के संरक्षण में है।

इस मंदिर के कई शिलालेख पटना और कोलकाता के संग्रहालयों में रखे गए हैं। यह शिलालेख 349 ई. से 636 ई. के बीच के हैं। साल 1968 में ASI ने 97 दुर्लभ मूर्तियाँ पटना संग्रहालय और तीन मूर्तियों को कोलकाता संग्रहालय में रखवाया है। वर्ष 1812 ईस्वी से लेकर 1904 ईस्वी के बीच ब्रिटिश यात्री आर.एन.मार्टिन, फ्रांसिस बुकानन और ब्लॉक ने इस मंदिर का भ्रमण किया था। इस मंदिर का उल्लेख कनिंघम ने भी अपनी पुस्तक में किया है।

मंदिर की वास्तुकला

पत्थरों से बना यह मंदिर दुर्लभ अष्टकोणीय वास्तुकला के आधार पर बना है। यह बिहार में मंदिर वास्तुकला की नागर शैली का सबसे पहला नमूना है। इसके चारों तरफ दरवाजे या खिड़कियाँ हैं और दीवारों में स्वागत के लिए छोटी-छोटी मूर्तियाँ अंकित की गई हैं। मंदिर की दीवारों को कल मूर्तियों और कलाकृतियों से सजाया गया है। प्रवेशद्वार पर द्वारपाल, गंगा और यमुना की आकृतियाँ अंकित हैं। जो यह बताती हैं कि जब मंदिर का वैभव रहा होगा तो तब यह कैसा दिखता होगा।

मंदिर के शिखर को टावर को नष्ट कर दिया गया है। कहा जाता है कि इसे औरंगजेब ने नष्ट करवाने की कोशिश की थी। हालांकि, बिहार राज्य धार्मिक न्याय परिषद के अध्यक्ष आचार्य ‘किशोर कुणाल’ का मानना है कि मुंडेश्वरी मंदिर को किसी आक्रमणकारियों ने नहीं तोड़ा है बल्कि प्राकृतिक आपदा, बरसात, तूफान आंधी-पानी से इसका नुकसान हुआ है। कुछ इतिहाकारों का यह भी कहना है कि यह पहले से ही भग्नावेष में पड़ा था, संभवत: इसीलिए इस पर किसी मुस्लिम आक्रांता की नजर नहीं पड़ी। बाद में सरकार ने मंदिर का पुनरुर्द्धार कराते हुए इस पर छत का निर्माण कराया है। मंदिर के गर्भगृह में भैसे की करते सवारी करती देवी मुंडेश्वरी और पंचमुखी शिवलिंग हैं। इसके अलावा यहाँ दो असामान्य आकार के दो पत्थर भी हैं, जिनकी लोग पूजा करते हैं।

इसके अलावा, इस मंदिर में भगवान गणेश, भगवान सूर्य और भगवान विष्णु सहित कई देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ हैं। पत्थर के बने मंदिर का बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त होकर चारों तरफ फैला हुआ है। यह भी कहा जाता है कि पहाड़ी पर मंदिरों का समूह था, जिसमें से अकेला यही मंदिर बचा है और बाकी अन्य मंदिरों को तोड़ दिया गया है।

माता मुंडेश्वरी

माना जाता है कि शुंभ और निशुंभ दानव को सेनापति चंड और मुंड थे। ये दोनों असुर इलाके में लोगों को प्रताड़ित करते थे। इसके बाद लोगों ने माता शक्ति से प्रार्थना की और उनकी पुकार सुनकर माता भवानी पृथ्वी पर आकर इनका वध किया था। कहा जाता है कि देवी से युद्ध करते हुए मुंड इस पहाड़ी पर छिप गया था, लेकिन माता ने उसका वध कर दिया। इसलिए उनका नाम मुंडेश्वरी पड़ा। यहाँ माता मुंडेश्वरी प्राचीन प्रत्थरों की आकृति में वाराही के रूप में मौजूद हैं और उनका वाहन महिष है।

गर्भगृह में पंचमुखी शिवलिंग

मंदिर के गर्भगृह में एक पंचमुखी शिवलिंग है। इसके बारे में बेहद रहस्यमयी कहनी है। कहा जाता है कि यह शिवलिंग सूर्य की स्थिति के अनुसार अपना रंग बदलता रहता है। यह शिवलिंग दिन में कम से कम तीन अपना रंग बदलता है। ऐसी मान्यता है कि इसका मूर्ति का रंग सुबह, दोपहर और शाम को अलग-अलग दिखाई देता है। शिवलिंग का रंग कब बदल जाता है, किसी को पता भी नहीं चलता।

बलि देने के बाद जी उठता है बकरा

इस मंदिर की एक और रहस्यमयी बात है, जो दर्शक देखते और बताते हैं। कहा जाता है कि इस मंदिर में सात्विक बलि दी जाती है, यानि बिना जान लिए ही देवी माँ को बलि दी जाती है। कहा जाता है कि देवी माँ को अर्पित करने के लिए जब मंदिर में बकरा लाया जात है तो मंदिर का पुजारी देवी माँ की चरणों से चावल के कुछ अंश लेकर बकरे पर फेंकता है। इसके बाद बकरा वहीं गिरकर मृतप्राय जैसा हो जाता है। हालांकि, वह कुछ देर बाद स्वयं खड़ा हो जाता है और मान लिया जाता है कि बलि दे दी गई। इस मंदिर की यह सात्विक बलि सबसे रहस्यमयी बातों में से एक है।

ज्ञानवापी सर्वे के बाद ओवैसी ने मुस्लिम भीड़ को भड़काया: ‘नारा-ए-तकबीर’ के नारे लगवाकर कहा- ‘मस्जिद थी, है और रहेगी…इंशाल्लाह’

वाराणसी के ज्ञानवापी विवादित ढाँचे में शिवलिंग मिलने के दावे के बाद AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा, “ज्ञानवापी मस्जिद थी और इंशाअल्लाह कयामत तक ज्ञानवापी मस्जिद ही रहेगी। जब 19-20-21 साल का था तो बाबरी मस्जिद को हमसे छीन लिया गया, लेकिन अब फिर से 20-21 साल की उम्र के बच्चों के सामने ज्ञानवापी मस्जिद को नहीं खोएँगे।”

उन्होंने लोगों से अपील करते हुए कहा कि वे भी इस बात का निश्चय करें कि किसी मस्जिद को कभी खोएँगे नहीं। इसके बाद उन्होंने भीड़ से हाथ उठवाकर नारा-ए-तकबीर का नारा लगवाया। ओवैसी ने आगे कहा, “इनको पैगाम मिलना चाहिए। मस्जिद को अब हम नहीं खोएँगे। हम तुम्हारे हथकंडों को जान चुके हैं। अब हम उनके दोबारा नहीं डसने देंगे। मस्जिद है और रहेगी। ज्ञानवापी मस्जिद, मस्जिद थी और अल्लाह जब तक दुनिया को कायम रखेगा, मस्जिद रहेगी इंंशाल्लाह और हमारा काम यह है कि हम अपना काम आबाद रखें। हमारा पहला काम अपने मोहल्ले-गाँवों की मस्जिदों की हिफाजत करना है। अगर हम अपने मोहल्ले-गाँवों की मस्जिदों को आबाद रखेंगे, तो ये शैतानी ताकतें, जो ललचाई हुई नजरों से हमको अपने तहजीब से महरूम करना चाहती है, इनको पैगाम मिल जाएगा कि अब दोबारा भारत का मुसलमान मस्जिद खोने को तैयार नहीं है।”

वहीं, विश्व हिंदू परिषद के नेता विनोद बंसल ने ओवैसी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अब इन सबकी कयामत आने वाली है, ये खुद उसको आमंत्रित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सर्वे से पहले ये उसका विरोध कर रहे थे और बाधा ड़ाल रहे थे अब सब सच सामने आ गया तो ये हारे हुए कयामत की तरफ मुख कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि ओवैसी मस्जिद थी, मस्जिद है, मस्जिद रहेगी….इस तरह की बात कर रहे हैं, उसका क्या लाभ है।

उन्होंने कहा कि ओवैसी सांसद हैं और वे खुद को वकील बताते हैं फिर भी वे इस तरह मुस्लिमों को भड़काने का काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अब जब सच सामने आ गया है तो ओवैसी जैसे नेताओं के मुँह पर कालिख पुत गई है। उन्हें देश की जनता से माफी माँगनी चाहिए कि वे हिंदू समाज की आस्था को चोट पहुँचाने का काम कर रहे थे। इसके बजाय वे मुस्लिमों को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं।

वहीं, मस्जिद में शिवलिंग के दावे को लेकर ट्वीट करते हुए उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने खुशी जाहिर की है। उन्होंने कहा कि बुद्धि पूर्णिमा के अवसर पर ज्ञानवापी विवादित ढाँचे में बाबा महादेव के प्रकटीकरण ने देश की सनातन हिंदू परंपरा को एक पौराणिक संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि इस बात से उनकी तरह देश का हर शिव भक्त खुश है। सदियों से नंदी बाबा की प्रतीक्षा थी कि कब भोलेनाथ मिलेंगे और वो उनके दर्शन करेंगे। अब कोर्ट कमिश्नर के माध्यम से सर्वे हुआ और उसमें शिवलिंग मिलने के बाद सब स्पष्टता हो गई है। इससे वो बहुत खुश हैं और इस खुशी को शब्दों में बयाँ नहीं किया जा सकता।

गौरतलब है कि काशी विश्वनाथ मंदिर से सटी ज्ञानवापी मस्जिदविवादित ढाँचे में शिवलिंग होने का दावा अब हकीकत में बदल गया है। कोर्ट के आदेश के बाद चल रहे सर्वे के तीसरे दिन शिवलिंग मिलने का दावा किया गया है। हिंदू पक्ष के वकील विष्णु जैन ने कहा कि कुएँ के अंदर सर्वे के दौरान शिवलिंग मिला है। इसके बाद कोर्ट ने जिला प्रशासन को उस जगह को सील कर संरक्षित करने का आदेश दिया है।

हिन्दू लड़के से शादी के लिए बरेली की नाजिश बनीं निहारिका, अगस्त्य मुनि आश्रम में हुए फेरे: अब विवाह करवाने वाले महंत को सुरक्षा का खतरा

UP के बरेली जिले में एक मुस्लिम लड़की ने हिन्दू धर्म स्वीकार कर लिया है। नाज़िश नाम की मुस्लिम लड़की नीलेश नाम के हिन्दू लड़के से प्यार करती थी। अब दोनों ने शादी कर ली है। हालाँकि, इस रिश्ते से दोनों परिवार खुश नहीं थे इसलिए दोनों ने घर छोड़ कर अलग रहने का फैसला किया है। शादी के बाद नाजिश का नाम निहारिका हो गया है। यह शादी अगस्त मुनि आश्रम बरेली में 13 मई 2022 (शुक्रवार) को सम्पन्न हुई।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक नीलेश और नाजिश बचपन के साथी थी। दोनों ही बरेली के हाफिजगंज के रहने वाले थे। बड़े होने तक दोनों एक दूसरे से प्यार करने लगे थे। दोनों ने अपने घर शादी की इच्छा जताई तो दोनों परिवारों ने इस रिश्ते से इंकार कर दिया। नाजिश के घर वालों ने उस पर पाबंदियाँ भी लगानी शुरू कर दीं।

इस बीच नाजिश अपने परिवार के साथ 10 मई 2022 को एक शादी समारोह में गई। वहीं से वो मौका पा कर नीलेश के साथ चली गई। इस घटना के बाद नाजिश के घर वालों ने नीलेश के खिलाफ अपहरण की शिकायत दर्ज करवाई। कुछ समय बाद 13 मई को नीलेश और नाजिश अपने कागजातों के साथ बमनपुरी स्थित आर्य समाज के अगस्त्य मुनि आश्रम गए। वहाँ दोनों ने हिन्दू विधि-विधान से शादी करने की इच्छा जताई।

अगस्त्य मुनि आश्रम के महंत पंडित केके शंखधार ने दोनों के कागजात चेक किए। दोनों बालिग निकले। नाजिश ने उन्हें बताया कि वो हिन्दू धर्म में आस्था रखती है और उस पर किसी का कोई दबाव या जोर-जबरदस्ती नहीं है। उसने आगे का जीवन नीलेश के साथ बिताने की इच्छा जताई। इसके बाद दोनों की आश्रम में शादी हुई। इस शादी में हिन्दू संगठनों से जुड़े कई लोगों ने वर-वधू को आशीर्वाद दिया।

नव दम्पति को आशीर्वाद देते हिन्दू संगठन और सामाजिक संगठन से जुड़े लोग

शादी करवाने वाले महंत ने बताया अपनी सुरक्षा को खतरा

ऑपइंडिया ने यह शादी करवाने वाले महंत के के शंखधर से भी बात की। उन्होने बताया, “मैं ऐसी कई कानूनी वैध शादियाँ अब तक करवा चुका हूँ। लेकिन इसमें मैं चरमपंथी तत्वों के निशाने पर आ गया हूँ। मेरी सुरक्षा को खतरा है।”

‘तहखाना नहीं मंदिर का मंडपम कहिए, भव्य है पन्ना पत्थर का शिवलिंग’: सर्वे पर भड़की महबूबा मुफ्ती, बोलीं- ‘इनको मस्जिद में ही मिलते हैं भगवान’

जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती (Mehbooba Mufti) ने वाराणसी के विवादित ज्ञानवापी ढाँचे के सर्वे को लेकर केंद्र सरकार पर हमला बोला है। उन्होंने कहा, “इनको मस्जिद में ही भगवान मिलते हैं। क्या ज्ञानवापी के बाद ये सब कुछ बंद हो जाएगा। असली मुद्दों से ध्यान हटाने और लोगों को बाँटने के लिए बीजेपी इस तरह की राजनीति कर रही है।” उन्होंने आगे कहा, “जवाहर लाल नेहरू से लेकर डॉ. मनमोहन सिंह ने जो भी कुछ बनाया था, ये लोग उसे बेच रहे हैं। इन लोगों के पास अब बेचने को कुछ भी नहीं है। इसलिए ये लोग हिंदू-मुस्लिम के बीच नफरत पैदा कर रहे हैं।”

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) चीफ महबूबा मुफ्ती ने यह भी कहा, “आज ये मस्जिद, कल वो मस्जिद, मैं अपने मुस्लिम भाइयों से बोलती हूँ एक ही बार ये हमें मस्जिदों की लिस्ट बताएँ, जिस पर इनकी नजर है। मैं पहले भी कह चुकी हूँ कि हम जहाँ सजदा करेंगे, हमारा अल्लाह वहीं है। शर्त यह कि अगर किसी मस्जिद को कोर्ट के जरिए, या फिर किसी और तरह से यह साबित किया जाता है। हालाँकि, बाबरी मस्जिद में तो ऐसा कुछ भी साबित नहीं हुआ। तो क्या ये बीजेपी वाले हमें गारंटी देंगे कि जो उन्होंने एक साल में 2 करोड़ नौजवानों को नौकरियाँ देने का वादा किया है, उसे पूरा करेंगे। लेकिन ये तो ज्ञानवापी मस्जिद के पीछे पड़े हैं, क्या इसके बाद सब बंद हो जाएगा?”

वहीं, दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, वाराणसी के विवादित ज्ञानवापी ढाँचे से एक शिवलिंग मिला है, जो बेशकीमती पत्ना पत्थर का बना हुआ है। सर्वे में शामिल एक सूत्र के मुताबिक, “यह वही शिवलिंग है, जिसे अकबर के वित्त मंत्री टोडरमल ने बनारस के पंडित नारायण भट्ट के साथ मिलकर 1585 में स्थापित कराया था। इस शिवलिंग का रंग हरा है। इसके ऊपर का कुछ हिस्सा औरंगजेब की तबाही में क्षतिग्रस्त हो गया था।”

उन्होंने यह भी कहा, “इस शिवलिंग का साइज करीब 2 मीटर है। यह देखने में काफी आकर्षक है। शिवलिंग श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित नंदी के सामने वाले ज्ञानवापी के हिस्से में है। नंदी महाराज के सामने जो तहखाना है। उसी में अंदर मस्जिद के बीचों-बीच आज भी शिवलिंग दबा है। पन्ना पत्थर से बने इस विशालकाय शिवलिंग का रंग हरा है।”

रिपोर्ट के मुताबिक, श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत डॉ. कुलपति तिवारी ने बताया, “विवादित ज्ञानवापी ढाँचे में जिसे लोग तहखाना कह रहे हैं, वह असलियत में मंदिर मंडपम हैं। इन्हें तहखाना की बजाय मंडपम कहें तो बेहतर होगा।” डॉ. तिवारी ने बताया कि उनके परिवार के पंडित नारायण भट्ट ने पन्ना का शिवलिंग स्थापित कराया था। 90 के दशक में वाराणसी के डीएम रहे सौरभ चंद्र श्रीवास्तव ने तब मंडपम में ताला बंद कराया था, तो उस समय भी अंदर फोटोग्राफी हुई थी, जिसमें वह शामिल थे। उस समय देखा गया था कि अंदर नंदी के ठीक सामने ही शिवलिंग है।

1868 में रेव एमए शेरिंग द्वारा लिखित ‘द सेक्रेड सिटी ऑफ हिंदू’ किताब के मुताबिक, ज्ञानवापी ढाँचे के नीचे चारों कोनों पर चार मंडपम यानी मंदिर हैं। इनका नाम ज्ञान मंडपम, श्रृंगार मंडपम, ऐश्वर्य मंडपम और मुक्ति मंडपम है। विदेशी लेखक अल्टेकर ने इन चारों मंडपम का साइज 16-16 फीट बताया था और गोलंबर की ऊँचाई 128 फीट है।