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चोर ने लौटाई 14 मूर्तियाँ, लिखा – ‘नींद नहीं आ रही… आते हैं डरावने सपने’: मंदिर में कंडोम के कारण सिर पटक मरा था नवाज

उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले में चोरी का एक अनोखा मामला सामने आया है। सदर कोतवाली क्षेत्र के तरावा में स्थित प्राचीन बालाजी महाराज के मंदिर में 9 मई 2022 को चोरी हुई थी। जानकारी के मुताबिक चोरी हुई अष्ट धातु की 14 मूर्तियों को चोर रविवार (15 मई 2022) को एक चिट्ठी के साथ महंत के आवास के बाहर छोड़कर चले गए। एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि चोरों ने अपनी चिट्ठी में लिखा है:

“हमें रात में डरावने सपने आते हैं, हम सो नहीं पाते हैं। इसलिए हम मूर्तियाँ महंत के आ‍वास के बाहर रख कर जा रहे हैं।”

सदर कोतवाली कर्वी के प्रभारी निरीक्षक (SHO) राजीव कुमार सिंह ने सोमवार (16 मई 2022) को बताया, “नौ मई की रात को तरौंहा स्थित प्राचीन बालाजी मंदिर से अष्ट धातु की 16 मूर्तियाँ चोरी हो गई थीं, जिनकी कीमत करोड़ों रुपए है। इस सिलसिले में महंत रामबालक ने अज्ञात चोरों के खिलाफ एक FIR दर्ज करवाई थी।” सिंह के मुताबिक, चोरी की गई 16 में से 14 मूर्तियाँ रविवार को रहस्यमय तरीके से महंत रामबालक के आवास के बाहर एक बोरे से बरामद हुईं।

मूर्तियाँ चोरी, फिर रख गए वापस

बालाजी मंदिर से कुछ दिन पहले चोर 16 बेशकीमती मूर्तियाँ ले गए। इसको लेकर महंत ने तहरीर में बताया था कि करीब तीन सौ वर्ष पुरानी अतिप्राचीन मूर्तियाँ चोरी हुई हैं। इसमें एक मूर्ति अष्टधातु की, तीन मूर्तियाँ ताँबे की, चार मूर्तियाँ पीतल, छह मूर्तियाँ राधा कृष्ण और छह मूर्तियाँ शालिग्राम की थी। ये चाँदी के गहने पहने थे।  इस मामल में पुलिस ने चार संदिग्धों को पकड़ा था। लेकिन नटकीय ढंग से चोरों ने मूर्तियाँ लौटा दीं। पुलिस द्वारा आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

गौरतलब है कि इससे पहले 2019 में रामजन्मभूमि थाना क्षेत्र से ऐसी घटना सामने आई थी। यहाँ नजरबाग मोहल्ले में स्थित माधुरीकुंज से 140 साल पुरानी अष्टधातु से बनी भगवान राम की मूर्ति चोरी होने के ठीक 5वें दिन चोर ने वापस कर दी थी।

मूर्ति चुराने वाले चोर ने बताया था कि जब से उसने चोरी की, तब से उसके शरीर मे अजीब-सा दर्द शुरू हो गया। उसको घबराहट के साथ डरावने सपने आ रहे थे। वह मूर्ति को बहुत दिन तक अपने साथ रख नहीं पाया और खुद युगल माधुरी कुंज मंदिर में पहुँच मंदिर के पुजारी को भगवान राम की मूर्ति सौंप दी। मूर्ति सौंपने के बाद उसके शरीर का दर्द ठीक हो गया।

मंदिर में रखा कंडोम, दीवार पर सिर पटक मरा नवाज

2021 में कर्नाटक के मंगलुरू में स्वामी कोरगज्जा के मंदिर की दानपेटी से एक कंडोम निकला था। इसके तीन दिन बाद अचानक दूसरे समुदाय के दो लड़के मंदिर में आए और पुजारी के सामने माफी के लिए गिड़गिड़ाने लगे। उन दोनों ने पुजारी को बताया कि अपने साथी नवाज के साथ मिल कर उन्होंने ही कुछ दिन पहले मंदिर की दानपेटी में कंडोम डाला था।

दानपेटी में कंडोम डालने के बाद उसे एक दिन खून की उल्टियाँ हुईं और फिर पेचिश से उसके मल से खून निकला। अंत में वह अपने घर की दीवारों पर सिर मारते हुए मर गया। मरते समय उसने उन्हें बताया कि कोरगज्जा उन सब पर नाराज हैं। इसके बाद बाकी बचे हए अब्दुल रहीम और अब्दुल तौफीक ने अपनी जान जाने के डर से घबराकर पुजारी की शरण में जाकर माफी की भीख माँगी थी।

मथुरा के शाही ईदगाह में साक्ष्य मिटाए जाने की आशंका, मस्जिद को तुरंत सील करने के लिए नई याचिका दायर: ज्ञानवापी का दिया हवाला

ज्ञानवापी विवादित ढाँचे में शिवलिंग मिलने के बाद अब मथुरा के शाही ईदगाह मस्जिद को लेकर नई याचिका दायर हुई है, जिसमें इसे तत्काल सील करने की माँग की गई है। आशंका जताई गई है कि वहाँ सबूत मिटाए जा सकते हैं, ऐसे में उसे सील करने का आदेश देकर अदालत साक्ष्य की सुरक्षा सुनिश्चित करे। मुथरा सिविल जज सीनियर डिवीजन की कोर्ट में अधिवक्ता महेंद्र प्रताप सिंह ने ये याचिका दायर की है, जो लंबे समय से श्रीकृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति की लड़ाई लड़ रहे हैं।

इस याचिका में माँग की गई है कि न सिर्फ शाही ईदगाह मस्जिद में सुरक्षा कड़ी की जाए, बल्कि अंदर आने-जाने पर भी रोक लगे और इसके लिए एक विशेष सुरक्षा अधिकारी की नियुक्ति की जाए। दरअसल, महेंद्र प्रताप का कहना है कि अगर श्रीकृष्ण जन्मभूमि के अवशेषों के साथ छेड़छाड़ की गई तो इस स्थल का चरित्र बदल जाएगा और फिर इसकी मुक्ति के लिए जो मामला न्यायालय में चल रहा है, उसका कोई आधार ही नहीं रह जाएगा।

बताया जा रहा है कि इस याचिका पर आज मंगलवार (17 मई, 2022) को सुनवाई की जा सकती है। याचिका में कहा गया है कि हिन्दू प्रतीक चिह्नों को नष्ट होने से बचाने के लिए मस्जिद को सील किया जाना आवश्यक है। माँग की गई है कि ज्ञानवापी की तर्ज पर यहाँ भी CRPF तैनात की जाए। याचिका के साथ वाराणसी कोर्ट के आदेश की प्रति भी सौंपी गई है, जिसमें शिवलिंग मिलने के बाद वजूखाने को सील कर कर के नमाज पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।

ज्ञानवापी मामले में हिन्दू पक्ष का कहना है कि अभी तो पूरे परिसर का सर्वेक्षण ही नहीं हो सका है। यहाँ पश्चिमी ओर 72 फीट की लंबाई, 30 फीट की चौड़ाई और 15 फीट की ऊँचाई में मलबा पड़ा है। उसके किनारे-किनारे 15 फीट की दीवार उठा दी गई है। दावा है कि कमीशन अभी वहाँ अपनी कार्यवाही नहीं कर पाया। वादी डॉ सोहनलाल आर्य ने इस मलबे को लेकर कहा, “मेरा मानना है कि यह वाद शृंगार गौरी से संबंधित है और पुराणों व विभिन्न प्रकरणों में उल्लिखित शृंगार गौरी स्थल तक कमीशन की कार्यवाही पूरी नहीं हुई है। इसलिए इसे दूसरे चरण में कराने के लिए अलग से प्रार्थना पत्र देंगे।”

हनुमान मूर्ति से लेकर गणेश मंदिर और परिक्रमा पथ से लेकर पुस्ती तक: 26 साल पहले भी हुआ था एक ज्ञानवापी सर्वे, जानें क्या-क्या मिला था

ज्ञानवापी में तीन दिन हुए सर्वे के बाद हिंदू पक्ष का दावा है कि विवादित ढाँचे में इंच-इंच पर उन्हें हिंदू प्रतीक मिले हैं। सर्वे अनुसार न केवल इस ढाँचे में खंभों पर भगवान की मूर्तियाँ दिखी हैं बल्कि संस्कृत के श्लोक से लेकर ऊँ का चिह्न और 12 फीट लंबा शिवलिंग भी वजूखाने में मिला है। ये सारे सबूत देखकर हिंदू पक्ष में खुशी की लहर है। हालाँकि, इस बीच ये जानना जरूरी है कि ये पहली बार नहीं है जब किसी सर्वे में ज्ञानवापी से हिंदू चिह्न मिले हों। ऐसा सर्वे 26 साल पहले 30 जुलाई 1996 में भी हुआ था। इस रिपोर्ट के मुताबिक ज्ञानवापी में 26 वर्ष पहले भी मंदिर अवशेष बरामद हुए थे। इस संबंध में रिपोर्ट वकील राजेश्वर सिंह द्वारा कोर्ट में दी गई थी।

ज्ञानवापी में 26 साल पहले हुआ सर्वे

इस रिपोर्ट को मीडिया चैनल एबीपी ने एक्सक्लूसिव दिखाया। शुरू करने से पहले बता दें कि 30 जुलाई 1996 को 1 दिन का सर्वे लॉर्ड विश्वेश्वर और अन्य वादीगण मामले में करवाया गया था। सर्वेक्षण के दौरान कोर्ट के कमिश्नर राजेश्वर सिंह थे और वादी सोमनाथ व्यास थे। इस रिपोर्ट में सामने आया था कि विवादित ढाँचे की दीवारों पर प्राचीन काल की पुस्ती देखी गई। ये पुस्ती प्राचीन मंदिर के अवशेष जैसी दिखाई दे रही थी। पुस्ती के पूरब में एक बड़ा चबूतरा है। वहीं पश्चिम में मंदिर के भग्नावेश मौजूद हैं। इसके अलावा मंदिर के जो टूटे-फूटे दरवाजे हैं उन्हें चुन कर बंद किया गया है। चबूतरे के पश्चिमी तरफ गणेश और शृंगार गौरी मंदिर है। परिक्रमा पथ वाले पत्थर जैसी एक ऊँची जगह भी परिसर में है। दक्षिण में एक विशाल चबूतरे के नीचे तहखाना है।

रिपोर्ट बताती है कि 1996 में हुए इस एक दिन के सर्वे में अधिकारी तहखानों में जा जाकर अपनी जाँच नहीं कर पाए थे। कहा जाता है कि प्रशासन ने उस समय उन्हें तहखाने में जाने के लिए चाभी नहीं दी थी। लेकिन रिपोर्ट ये बताती है कि इस तहखाने के गेट के सामने कूप, नंदी और गौरीशंकर महेश्वर हैं।

1996 में हिंदू पक्ष की बात कोर्ट में रखने वाले वकील विजय शंकर रस्तोगी ने एबीपी को बताया कि ये लॉर्ड विश्वेश्वर के नाम पर ये केस उस समय दर्ज किया गया था जब तत्कालीन सरकार ने चारों ओर बैरिकेडिंग करना शुरू कर  दिया था और मंदिर में भक्तों को परिक्रमा करने से रोका गया था, उस समय ये केस यूपी सरकार के विरुद्ध फाइल हुआ था। रस्तोगी ने बताया कि 1996 में उन्हें शिवलिंग के बारे में पता नहीं चल सका था क्योंकि कई जगह मस्जिद में जाने से उन्हें मनाही हो गई थी। ऐसे में इसका अवलोकन नहीं हो पाया था।

गौरतलब है कि न्यायालय में पेश रिपोर्ट बताती है कि 26 साल पहले भी विवादित ढाँचे के परिसर में भग्नावशेष मिलने के दावे के साथ परिसर के पूरब तट पर हनुमान प्रतिमा, गंगा व गंगेश्वर मंदिर की पुष्टि हुई थी। बाद में इसी रिपोर्ट के आधार पर वर्ष 2019 में कोर्ट ने एएसआई को रडार तकनीक से सर्वे का आदेश दिया था। लेकिन तब इस मामले में उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के आदेश पर रोक लगा दी थी। 

हनुमान जी की मूर्ति लगाने पर बवाल, उपद्रवियों ने किया पथराव: मध्य प्रदेश के नीमच में धारा 144 लागू

मध्य प्रदेश के नीमच में दो समुदायों के बीच तनाव की खबर सामने आ रही है। बताया जा रहा है कि नीमच में पुरानी कचहरी पर हनुमान जी की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा करने को लेकर दो पक्षों में विवाद हुआ। इसके बाद कुछ लोगों ने पथराव करना शुरू कर दिया। पुलिस को भीड़ पर काबू पाने के लिए आँसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। स्थिति को काबू करने के लिए इलाके में धारा 144 लागू कर दी गई है। 

नीमच के एसपी सूरज कुमार वर्मा ने बताया कि एक दरगाह के पास हनुमान जी की मूर्ति की स्थापना को लेकर दो पक्षों में कहासुनी हुई। इसे लेकर दोनों पक्षों में विवाद हो गया। सूचना पाकर मौके पर पुलिस ने पहुँच कर स्थिति पर काबू पाया। उन्होंने बताया कि दोनों पक्षों के बीच पथराव भी हुआ है। इसमें दो तीन बाइकों को नुकसान पहुँचा है। हालाँकि उनके अनुसार विवाद में कोई भी घायल नहीं हुआ है।

नीमच एसपी सूरज कुमार वर्मा ने बताया कि जहाँ विवाद हुआ, वहाँ हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग रहते हैं। विवाद के वक्त भीड़ हटाने के लिए आँसू गैस के गोले छोड़े गए। इसके बाद पुलिस ने गलियों में पेट्रोलिंग की और लोगों से घरों में रहने के लिए कहा गया है।

स्थानीय पुलिस ने लोगों से अफवाह पर ध्यान न देने के लिए भी कहा है। नीमच एसपी सूरज कुमार वर्मा ने बताया कि जो लोग अफवाह फैला रहे हैं, उनकी पहचान की जा रही है, उन पर कार्रवाई की जाएगी। हालाँकि, अभी तक विवाद को लेकर पलिस को किसी भी पक्ष की ओर से कोई शिकायत नहीं मिली है। 

नीमच एसपी सूरज कुमार वर्मा ने बताया कि विवाद की जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने दोनों पक्षों को समझाइश देने के लिए कंट्रोल रूम बुलाया था। इस बीच कुछ लोगों ने मौके पर पत्थरबाजी शुरू कर माहौल खराब करने की कोशिश की। जानकारी मिलते ही पुलिस बल भी मौके पर पहुँचा।

एसपी ने बताया कि फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है। ऐहतियात के तौर पर क्षेत्र में 5 थानों का पुलिस बल तैनात किया गया है। साथ ही रिजर्व पुलिस फोर्स भी लगाया गया है। घटनास्थल पर लगे प्रशासन और प्राइवेट कैमरे को खँगाला जा रहा है। अगर इसमें किसी को माहौल बिगाड़ने की कोशिश करते हुए पाया जाता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

रामनवमी के दौरान खरगोन में भी हुई थी हिंसा

इससे पहले मध्य प्रदेश के खरगोन में रामनवमी पर हिंसा हुई थी। यहाँ कथित तौर पर रामनवमी के जुलूस पर पथराव के बाद दो गुटों में विवाद हो गया था। इसके बाद खरगोन में कर्फ्यू लगाया गया था। साथ ही हिंसा के आरोपितों की अवैध संपत्तियों पर बुलडोजर भी चलाया गया था।

कानपुर वाला गुटखा खाकर करेंगे विज्ञापन, कमाएँगे पैसे… मीडिया को बोलेंगे कि बॉलीवुड अफोर्ड नहीं कर सकता: महेश बाबू को इसलिए पड़ रही गाली

तेलगू फिल्मों के सुपरस्टार एक्टर महेश बाबू को बॉलीवुड के खिलाफ बयान देना महँगा साबित हो रहा है। पिछले दिनों महेश बाबू ने कहा था कि बॉलीवुड उन्हें अफॉर्ड नहीं कर सकता। इसलिए वो यहाँ पर अपना समय बर्बाद नहीं करेंगे। उनके इस बयान पर उन्हें काफी ट्रोल किया गया। अब महेश बाबू एक बार फिर से सोशल मीडिया पर ट्रोल हो रहे हैं। इस बार ट्रोलिंग की वजह उनका तंबाकू उत्पाद के लिए विज्ञापन करना है। 

दरअसल महेश बाबू पिछले साल एक पान मसाला के विज्ञापन का हिस्सा बने थे। उनके साथ इसमें बॉलीवुड एक्टर टाइगर श्रॉफ भी थे। नेटिजन्स ने अब महेश बाबू पर हमला बोलते हुए उसी विज्ञापन को फिर से वायरल करना शुरू कर दिया है। नेटिजन्स बुरी तरह उनकी खिंचाई कर रहे हैं।

महेश बाबू के इस वीडियो को शेयर करते हुए ट्विटर यूजर्स कर रहे हैं कि बॉलीवुड इन्हें अफॉर्ड नहीं कर सकता, लेकिन एक पान मसाला कंपनी इन्हें जरूर अफॉर्ड कर सकती है। एक अन्य व्यक्ति ने लिखा, “मुझे लगता है कि महेशबाबू जैसे TFI सितारों को ही पान मसाला उत्पाद बेचने की अनुमति है, जबकि बाकी को ऐसा करने के लिए गाली दी जाती है। बढ़िया डबल स्टैंडर्ड है।”

बता दें कि इसी पान मसाला का विज्ञापन पियर्स ब्रॉसनन और सैफ अली खान ने भी किया था। उस समय भी इस पर काफी बवाल हुआ था। हाल ही में बॉलीवुड के तीन स्टार्स पान मसाला का विज्ञापन करने को लेकर ट्रोल हुए हैं। अक्षय कुुमार, शाहरुख खान और अजय देवगन का एक विज्ञापन सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ था, जिसके लिए उन्हें फैंस के आलोचना का शिकार होना पड़ा। हालाँकि बाद में अक्षय कुमार ने माफी माँग ली थी।

पान बहार के यूट्यूब चैनल का स्क्रीनशॉट

गौरतलब है कि हाल में अपनी फिल्म की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में महेश बाबू से उनके हिंदी डेब्यू के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा था, “मुझे हिंदी में बहुत सारे ऑफर मिले, लेकिन मुझे नहीं लगता कि वे मुझे अफोर्ड कर सकते हैं। मैं ऐसी इंडस्ट्री में काम करने में अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहता जो मुझे अफोर्ड नहीं कर सकता। मुझे यहाँ साउथ में जो स्टारडम और सम्मान मिलता है, वह बहुत बड़ा है, इसलिए मैंने कभी भी अपनी इंडस्ट्री को छोड़कर किसी और इंडस्ट्री में जाने के बारे में नहीं सोचा।”

अपने बयान के लिए माँगी माफी 

बयान पर मचे बवाल के बाद उन्होंने कहा था, “मैंने हमेशा फिल्में करने और बड़ा बनने के बारे में सोचा है। मेरा सपना अब सच हो रहा है और मैं इससे ज्यादा खुश नहीं हो सकता।” हालाँकि बाद में एक्टर ने एक स्टेटमेंट जारी किया और बताया कि उनके बयान को गलत तरीके से दिखाया गया था। उन्होंने कहा कि वो सिनेमा से प्यार करते हैं और सभी भाषाओं का सम्मान करते हैं। उन्होंने कहा कि वह जिस फिल्म में काम कर रहे हैं, उसमें वह सहज महसूस कर रहे हैं।

पान मसाला और गुटखा बनाने वाली कंपनी पान बहार की शुरुआत कानपुर से हुई थी। अब इनकी कंपनी के साइट पर दिल्ली के नजफगढ़ में इनके ऑफिस का पता दिखा रहा है।

ज्ञानवापी की वो जगह, जहाँ नहीं हो सका सर्वे: 72*30*15 फीट है मलबा और 15 फीट की दीवार का घेरा, हिंदू पक्ष ने कहा- करवाएँगे जाँच

ज्ञानवापी विवादित ढाँचे का सर्वे 16 मई 2022 को खत्म होने के बाद आज (17 मई 2022) इस मामले पर कोर्ट में रिपोर्ट दी जानी है। इस बीच कोर्ट ने वजूखाने में नमाजियों को वजू करने से मना किया है और जो शिवलिंग वहाँ मिला है उसकी सुरक्षा सीआरपीएफ को दी गई है। अब कोर्ट के इसी फैसले पर मुस्लिम पक्ष नाराज है। उन्होंने शिवलिंग को फव्वारा बताया है और कोर्ट के फैसले को नाइंसाफी बताते हुए कहा है कि इस पूरे घटनाक्रम से सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने की साजिश रची जा रही है। वहीं हिंदू पक्ष ने सर्वे खत्म होने के बाद कहा है कि वो विवादित ढाँचे के शेष हिस्से में भी वीडियोग्राफी कराने के लिए अनुरोध करने वाले हैं।

सर्वे का अर्थ सांप्रदायिक उन्माद फैलाना: मुस्लिम पर्सनल बोर्ड

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव खालिद सैफुल्लाह ने बयान में कहा, “वो मस्जिद है, मस्जिद थी और मस्जिद रहेगी। इसको मंदिर करार देने की कोशिश सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने की एक साजिश है।” उन्होंने ज्ञानवापी पर मु्स्लिमों को अधिकार बताने के लिए इतिहास में कोर्ट द्वारा लिए गए फैसलों का जिक्र किया। फिर वाराणसी कोर्ट के उस फैसले की निंदा की जिसमें ज्ञानवापी में वीडियो बनाने की परमिशन दी गई। उनके मुताबिक जैसे ही याचिका आई थी उसे खारिज कर देना था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सिविल कोर्ट ने जो वजूखाने के हिस्से को बंद करने का हुक्म जारी किया है वह आदेश ज्यादती है और कानून का उल्लंघन भी। वह कहते हैं, “कोर्ट से ये उम्मीदें नहीं थी। उनके फैसलों ने इंसाफ के तकाजों को घायल कर दिया है, इसलिए सरकार को चाहिए कि तुरंत इस मामले में रोक लगाए।”

विवादित ढाँच में पड़े मलबे की जाँच के लिए करेंगे माँग: हिन्दू पक्ष

ज्ञानवापी परिसर का सर्वे पूरा होने के बाद इस केस की वादी लक्ष्मी देवी के पति डॉ सोहनलाल आर्य ने मीडिया से बातचीत में कहा है कि अभी तो पूरे परिसर का सर्वेक्षण ही नहीं हो सका है। यहाँ पश्चिमी ओर 72 फीट की लंबाई, 30 फीट की चौड़ाई और 15 फीट की ऊँचाई में मलबा पड़ा है। उसके किनारे-किनारे 15 फीट की दीवार उठा दी गई है। कमीशन अभी वहाँ अपनी कार्यवाही नहीं कर पाया। लेकिन डॉ आर्य इस मलबे को लेकर कहते हैं, “मेरा मानना है कि यह वाद शृंगार गौरी से संबंधित है और पुराणों व विभिन्न प्रकरणों में उल्लिखित शृंगार गौरी स्थल तक कमीशन की कार्यवाही पूरी नहीं हुई है। इसलिए इसे दूसरे चरण में कराने के लिए अलग से प्रार्थना पत्र देंगे।”

कैसे नजर आया शिवलिंग

इस संबंध में हिंदू पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील विष्णु जैन ने कहा, “कल जब वहाँ पर सर्वे हो रहा था तो वहाँ पर एक वजू खाने के बीच में कुएँ जैसे दीवार देखी। हमने पानी को कम करने का आग्रह किया। उसके बाद जब कुएँ की दीवार के पास पहुँचे तो हमने देखा कि वहाँ एक ढाई से तीन फुट लंबा शिवलिंग है। हमने कोर्ट में एप्लीकेशन दी और हमारे द्वारा माँग की गई कि यह बहुत बड़ा सबूत है और इसे सुरक्षा प्रदान की जाए। न्यायालय ने CRPF के कमांडेंट से कहा कि वे वहाँ पर तैनात रहेंगे और सबूत को सुरक्षा प्रदान करेंगे”

उल्लेखनीय है कि कोर्ट के आदेश के बाद ज्ञानवापी में चले सर्वे के दौरान कमिश्नर की मौजूदगी में सभी सदस्यों ने अंदर वस्तुस्थिति को देखा और पाया कि वहाँ 8-10 मीटर चौड़ी गैलरी के बाहर लोहे की बैरिकेडिंग हो रखी है जबकि दूसरी ओर ईंट की करीब 15 फीट ऊँची दीवार बनी है। पश्चिम में एक बड़ा फाटक भी है जिसे ईंट-पत्थर से चुनवाकर बंद किया गया है। इसके अलावा जो कृत्रिम तालाब है। उसे लेकर भी सामने आया कि उसे तहखाने में लगे बड़े कूप से भरा जाता था जबकि पानी निकालने के लिए दर्जनों टोटियों की व्यवस्था थी।

मालूम हो कि इस पूरे मामले की रिपोर्ट (मई 17, 2022) आज अदालत में जाने वाली है। इस बीच मुस्लिम पक्ष भी सामाजिक सौहार्द की दलील लेकर सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा है। मामले की सुनवाई जस्टिस चंद्रचूड़ करने वाले हैं। हिंदू पक्ष परिसर में मिले शिवलिंग को देख जहाँ खुशियाँ मनाने में लगा है। वहीं मुस्लिम पक्ष ने कहा है वो फव्वारा है और हिंदू जबरन मस्जिद में भगवान की उपस्थिति का दावा ठोक रहे हैं। उनका कहना है कि वो एक मस्जिद खो चुके हैं और अब दूसरा किसी कीमत पर नहीं खोएँगे।

शिवलिंग मिलने के बाद मुस्लिम महिलाओं ने की पूजा, कहा- ‘हिन्दू भाइयों को सौंप दो ज्ञानवापी’, बोलीं याचिकाकर्ता सीता साहू- आखिरी दम तक लड़ूँगी

वाराणसी के ज्ञानवापी विवादित ढाँचे के अंदर शिवलिंग एवं हिंदू मंदिर के अन्य सबूत मिलने के बाद मुस्लिम महिलाओं ने खुशी जाहिर की और कहा कि अब इस स्थान को हिंदू भाइयों को खुशी-खुशी सौंप देना चाहिए। वहीं, माता श्रृंगार गौरी में प्रतिदिन पूजा की माँग को लेकर याचिका दाखिल करने वाली पाँच महिलाओं में से एक सीता साहू ने कहा कि वह अपने अंतिम साँस तक इस लड़ाई लड़ती रहेंगी।

ज्ञानवापी में सर्वे का काम जैसे ही समाप्त हुआ और परिसर में शिवलिंग मिलने की बात सामने आई, वैसे ही कुछ मुस्लिम महिलाओं ने इस पर खुशी जाहिर की। मुस्लिम महिला फाउंडेशन की सदस्या नजमा परवीन ने कहा कि काशी में भगवान शिव का मिलना ही अपने आपमें बहुत बड़ा सबूत है कि काशी बाबा विश्वनाथ की नगरी है। उन्होंने कहा कि इस अवसर पर हिंदू महिलाओं के साथ मिलकर मुस्लिम महिलाओं ने ढोल-नगाड़े बजाकर शिव तांडव स्तोत्र का पाठ किया।

इसके साथ ही परवीन ने मुस्लिमों से अपील है कि उस स्थान को तत्काल खाली कर देना चाहिए और उसे हिंदू भाइयों को सौंप देना चाहिए। उनका कहना है कि हर जगह अधिकार जमाना और संपत्ति हड़पना गलत है। उन्होंने कहा कि इस्लाम में कहा गया है कि जहाँ नमाज अता की जाए, वह जमीन और आसमान अपना होना चाहिए। कब्जे वाली जगह पर नमाज कबूल नहीं होती।

नजमा परवीन ने कहा कि जो कट्‌टरपंथी मुस्लिमों को भड़का रहे हैं, उन्हें भी कठोर संदेश देने की जरूरत है। उन्हें ये बता देने की जरूरत है कि लोग अब जागरूक हो गए हैं और हिंदू-मुस्लिम के नाम पर अब किसी को भड़काया नहीं जा सकता है। उन्होंने कहा कि जहाँ शिवलिंग मिला है, वहाँ भव्य मंदिर बनना चाहिए।

उधर सीता साहू ने कहा कि जब उन्हें पता चला कि माता श्रृंगार गौरी में साल में सिर्फ एक दिन ही हिंदुओं को पूजा करने का अधिकार मिलता है तो उनका मन दुखी हो गया। उन्होंने कहा कि जहाँ पूजा होता था, वह माता श्रृंगार गौरी के मंदिर की चौखट थी, वह मंदिर नहीं था। उन्होंने कहा कि उन्हें पढ़ा और सुना था कि ज्ञानवापी परिसर में देवी-देवताओं के विग्रह मौजूद हैं। इसके अलावा, नंदी बाबा को भी मस्जिद की ओर ही मुँह करके विराजमान देखते थे तो अजीब लगती थी।

दैनिक भास्कर को साहू ने बताया, इस स्थिति को जानने के बाद उन लोगों ने आपस में विचार किया और कहा कि ज्ञानवापी परिसर की हकीकत का पता लगाया जाना चाहिए। इसके बाद वे लोग एडवोकेट हरिशंकर जैन से मिले और फिर विश्व वैदिक सनातन संघ के प्रमुख जितेंद्र सिंह बिसेन की अगुआई में इस लड़़ाई को शुरू किया। उन्होंने कहा कि वे इस लड़ाई को मरते दम तक लड़ती रहेंगी।

अभिनेत्री के घर पहुँची महाराष्ट्र पुलिस, लैपटॉप-फोन सहित कई उपकरण जब्त किए: पवार पर फेसबुक पोस्ट, एपिलेप्सी से रही हैं पीड़ित

राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) के प्रमुख शरद पवार (Sharad Pawar) के खिलाफ सोशल मीडिया पर पोस्ट करने को लेकर गिरफ्तार की गई मराठी अभिनेत्री केतकी चितले (Ketaki Chitale) का लैपटॉप, मोबाइल फोन जैसे कई इलेक्ट्रॉनिक सामान भी पुलिस ने जब्त कर लिए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सोमवार (16 मई 2022) को अभिनेत्री के साथ मुंबई पुलिस नवी मुंबई के कलंबोली में उनके घर पहुँची और उनका सारा सामान अपने कब्जे में ले लिया।

बताया जा रहा है कि ठाणे क्राइम ब्रांच और कलंबोली पुलिस स्टेशन की टीमों ने सोमवार दोपहर मराठी एक्ट्रेस केतकी चितले के एवलॉन आवास की तलाशी। इस दौरान उन्होंने कई इलेक्ट्रानिक उपकरण जब्त किए। एक्ट्रेस के खिलाफ पाँच जिलों में कुल छह मामले दर्ज किए गए हैं और वह 18 मई तक पुलिस हिरासत में हैं।

पुणे की रहने वाले 29 वर्षीय केतकी चितले खुद के एपिलेप्सी (मिर्गी) से पीड़ित होने का दावा करती हैं। इसके साथ ही वह अपने इंस्टाग्राम पर ‘एपिलेप्सी वॉरियर क्वीन’ के साथ इस बीमारी के बारे में जागरूकता बढ़ाने वाली एक एक्टिविस्ट के रूप में भी खुद को पेश करती हैं।

उल्लेखनीय है कि केतकी चितले ने अपने फेसबुक पोस्ट पर एक मराठी में लिखी कविता शेयर की थी। इसमें शरद पवार के लिए ‘नरक इंतजार कर रहा है’, ‘तुम ब्राम्हणों से नफरत करते हो’, ‘तुम्हारा मुँह टेढ़ा’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था। केतकी के पोस्ट को लेकर NCP ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई की माँग की थी। वहीं, स्वप्निल नेटके नाम के व्यक्ति ने ठाणे शहर के कलवा पुलिस स्टेशन में सेक्शन 153 और 505 के तहत मामला दर्ज कराया था। अपनी शिकायत में नेटके ने दावा किया था कि पवार के खिलाफ केतकी के आपत्तिजनक पोस्ट के कारण राज्य में दोनों राजनीतिक दलों के बीच संबंध और तनावपूर्ण हो सकते हैं। कलवा पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज करने के बाद केस को ठाणे क्राइम ब्रांच को दे दिया गया है।

गौरतलब है कि इससे पहले केतकी (29) के खिलाफ ठाणे, पुणे और धुले जिलों में ऑनलाइन एफआईआर रजिस्टर कराई गई थी। एक्ट्रेस को ठाणे की पुलिस ने ही गिरफ्तार किया था। हालाँकि, पवार पर कमेंट के मामले में गिरफ्तार होने वाली केतकी दूसरी शख्स हैं। हाल ही में आरएसएस के पूर्व कार्यकर्ता और नासिक के 21 साल के छात्र निखिल भामरे ने पवार का नाम लिए बिना ही एक ट्वीट किया था, जिसके बाद पुलिस ने उन्हें उठा लिया था। कथित तौर पर उसने लिखा था, “बारामती के गाँधी के लिए बारामती के नाथूराम गोडसे को बनाने का समय आ गया है।”

अम्बुजा और ACC में खरीदी बड़ी हिस्सेदारी, होल्सिम इंडिया से हुई ₹80000 करोड़ की डील: सीमेंट इंडस्ट्री का ‘किंग’ बन रहा अडानी समूह

जल्द ही देश की दो प्रमुख सीमेंट कम्पनियाँ अम्बुजा सीमेंट लिमिटेड और ACC लिमिटेड में बड़ी हिस्सेदारी अडानी ग्रुप की हो जाएगी। जहाँ सोमवार को बीएसई पर शुरुआती सौदों में अंबुजा सीमेंट्स और एसीसी के शेयरों में क्रमशः 3% और 7% की तेजी आई, वहीं गौतम अडानी के अडानी समूह ने रविवार (15 मई, 2022) को ही बता दिया था कि वह इन दोनों कंपनियों में स्विट्ज़रलैंड की कंपनी होल्सिम एजी की पूरी हिस्सेदारी खरीदेगी। यह देश के इंफ्रास्ट्रक्चर और मैटेरियल इंडस्ट्री का अबतक का सबसे बड़ा डील बताया जा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अडानी समूह ने स्विस निर्माण सामग्री निर्माता होल्सिम लिमिटेड की अंबुजा सीमेंट्स और एसीसी लिमिटेड में हिस्सेदारी को 10.5 अरब डॉलर (₹ 80,000 करोड़) में खरीदने के लिए सहमत हो गया है। बताया जा रहा है कि अडानी समूह विदेश में स्थित अपनी एक सब्सिडियरी के जरिए इस हिस्सेदारी को खरीद रही है।

रिपोर्ट के अनुसार स्विट्ज़रलैंड की कंपनी होल्सिम के पास अपनी सहयोगी कंपनी के जरिए अम्बुजा सीमेंट में 63.19% और ACC में 54.3% हिस्सेदारी है। वहीं इसमें 50.05% हिस्सेदारी अम्बुजा सीमेंट के जरिए लिया गया है। दोनों कंपनियों में होल्सिम की हिस्सेदारी खरीदने के लिए अडानी समूह 10.5 अरब डॉलर का भुगतान कर रही है।

इतने बड़े डील को देखते हुए कहा जा रहा है कि जहाँ अडानी समूह सीमेंट बिजिनेस में अपनी पकड़ बना रही है वहीं इस डील के साथ ही होल्सिम बिल्डिंग टेक्नोलॉजी पर फोकस करने की रणनीति पर काम कर रही है। कहा जा रहा है कि कंपनी सस्टेनेबल डेवेलपमेंट को ध्यान में रखते हुए भारत में अपने सीमेंट कारोबार को बेचना चाहती है।

रिपोर्ट के अनुसार यह भी दावा किया जा रहा है कि कंपनी ने इसी रणनीति के तहत सितम्बर 2021 में अपनी ब्राजीलियन यूनिट को 1 अरब डॉलर में बेचा था। इसके साथ ही होल्सिम कंपनी जिम्बाब्वे में भी अपने कारोबार को बेचने की तैयारी कर रही है।

गौरतलब है कि अम्बुजा सीमेंट भारत की एक लीडिंग सीमेंट कंपनी है। जिसकी स्थापना 1983 में की गई थी। वहीं ACC सीमेंट अम्बुजा की ही सब्सिडियरी कंपनी है।

जिसे पढ़ाया महिला सशक्तिकरण की मिसाल, उस रजिया सुल्ताना ने काशी में विश्वेश्वर मंदिर तोड़ बना दी मस्जिद: लोदी, तुगलक, खिलजी – सबने मचाई तबाही

काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में स्थित ज्ञानवापी विवादित ढाँचे के अंदर एक कुएँ से शिवलिंग मिला है, जिसे नमाजियों ने वजूखाना बना कर रख दिया था। अर्थात, वो वहाँ पर अपने हाथ-पाँव धो कर वर्षों से भोले बाबा को अपमानित कर रहे थे। संस्कृत में श्लोक से लेकर त्रिशूल और ॐ तक, ज्ञानवापी में अदालत के निर्देश पर हुए सर्वे में इतने सबूत मिले कि सब कुछ साफ़ हो गया। लेकिन, हमें फिर भी अपना इतिहास और इस मंदिर पर हुए हमलों को भूलना नहीं है।

पिछले लेख में हमने बताया था कि कैसे 10वीं और 11वीं शताब्दी में चन्द्रादित्य और गोविंदचंद्र जैसे प्रतापी गहड़वाल राजाओं ने शिव की नगरी की सुरक्षा की, लेकिन कन्नौज के शासक जयचंद की मृत्यु के बाद मुहम्मद गोरी और कुतुबुद्दीन ऐबक वहाँ टूट पड़ा और मंदिर को ध्वस्त कर दिया। पुनर्निर्माण शुरू हुआ तो ऐबक 4 साल बाद लौटा और काशी विश्वनाथ मंदिर सहित कई शिवालय ध्वस्त कर दिए। गुजरात के जैन मंत्री वास्तुपाल ने मंदिर को फिर से बनवाने के लिए तब 1 लाख रुपए भेजे थे।

अब थोड़ी आगे की बात कर लेते हैं। इल्तुतमिश की मौत होने के बाद उसकी बेटी रजिया सुल्ताना को दिल्ली की गद्दी मिली। उसे इतिहास में भले ही ‘बहादुर महिला’ बता कर पढ़ाया जाता रहा हो, लेकिन ये जानने लायक है कि उसने भी काशी में मंदिरों को ध्वस्त कर के विश्वनाथ मंदिर परिसर में ही एक मस्जिद बनवा दिया। ज्ञानवापी विवादित ढाँचे से 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ‘रजिया मस्जिद’ की जगह भी मंदिर ही हुआ करता था।

इसके बाद सन् 1448 में मुहम्मद शाह तुगलक ने आसपास के छोटे-बड़े मंदिरों को भी ध्वस्त कर दिया और रजिया मस्जिद का और विस्तार किया। काशी के प्राचीन इतिहास को पढ़ें तो पता चलता है कि यहाँ कई पुष्कर थे, जिन्हें व्यवस्थित ढंग से तबाह कर के इस्लामी शासकों ने मस्जिद बनवाए। हालाँकि, उससे पहले 13वीं सदी में हिन्दुओं ने फिर से मंदिर को बना कर खड़ा कर दिया था। इसे हिन्दुओं की जिजीविषा कहें या फिर श्रद्धा, इतने अत्याचार और खून-खराबे के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी।

होयसल राजा नृसिंह तृतीया ने सन् 1279 में अपने राज्य के नागरिकों को तीर्थाटन के लिए काशी भेजा था, इसीलिए उस समय मंदिर पुनर्निर्मित हो गया रहा होगा। कर्नाटक के बेलूर और फिर हलेबीडू से शासन करने वाला ये कन्नड़ साम्राज्य दक्षिण भारत में कला, धर्म और आर्किटेक्चर के विकास के लिए जाना जाता है। अलाउद्दीन खिलजी (शासनकाल 1296-1316) के दौरान भी काशी में हिन्दुओं ने मंदिरों का पुनर्निर्माण जारी रखा।

इन्हीं मंदिरों में से एक था पद्मेश्वर मंदिर, जिसे काशी विश्वनाथ मंदिर के सामने ही बनवाया गया था। ऐसा विवरण मिलता है कि 14वीं शताब्दी के अंत तक वाराणसी पुनः अपने पुराने गौरव की तरफ लौटने लगा था। 200 वर्ष पूर्व ऐबक-गोरी के विध्वंस से लोग उबर चुके थे। बाहर से लोग भी यहाँ आकर बस रहे थे। बाद में गुरु नानक भी काशी की तीर्थयात्रा के लिए आए थे, लेकिन तुगलक के समय ही जैन आचार्य जिनप्रभ सूरी के भी काशी तीर्थाटन का विवरण मिलता है।

हालाँकि, 1296 ईस्वी में बने पद्मेश्वर मंदिर को भी 15वीं शताब्दी के मध्य में तोड़ डाला गया। पद्म नाम के एक साधु ने इसका निर्माण करवाया था। आप जानते हैं कि ये मंदिर अब कहाँ है? इसके ऊपर ही लाल दरवाजा मस्जिद बनवा दिया गया, जिसे आज भी शर्की सुल्तानों का भव्य आर्किटेक्चर बता कर प्रचारित किया जाता है। उससे पहले 1302 ईस्वी में विश्वेश्वर नाम के एक व्यक्ति ने मणिकर्णकेश्वर मंदिर की स्थापना की थी।

फिरोजशाह तुगलक से लेकर सिकंदर लोदी तक, कई इस्लामी सुल्तानों ने काशी में मंदिरों को बारम्बार ध्वस्त किया। 14वीं शताब्दी के अंत में और 15वीं शताब्दी की शुरुआत में रामानंद ने भी काशी में रह कर शिक्षा दी। एक वैष्णव संत को शिव की नगरी से प्रेम हो गया, यही तो हिन्दू धर्म है। रैदास यहीं पर रामानंद के शिष्य बने। संत कबीर का जन्म यहीं हुआ, इसी काल में। फिर गुरु नानक यहाँ पहुँचे। फिर सन् 1494 में आता है सिकंदर लोदी।

सिकंदर लोदी ने कबीर को भी प्रताड़ित किया। उसने काशी में कई ऐसे मंदिर तोड़े, जिनका अपने खून-पसीने से हिन्दुओं ने पुनर्निर्माण किया था। 16वीं शताब्दी का पहला क्वार्टर ख़त्म होने के बाद दिल्ली में मुगलों का शासन आरंभ हो गया और इसके साथ ही काशी में मंदिरों का निर्माण भी रुक गया। हालाँकि, अकबर के कालखंड में टोडरमल और मानसिंह जैसे राजाओं ने मुगलों का वफादार रहते हुए ही काशी में कई मंदिरों और घाटों का निर्माण करवाया।

1514-1594 के कालखंड में ही जगद्गुरु नारायण भट्ट हुए, जिन्होंने अपनी पुस्तक ‘त्रिस्थली’ में काशी के विश्वनाथ मंदिर के बारे में लिखा है। इसमें उन्होंने कहा है कि अगर म्लेच्छों ने शिवलिंग को हटा दिया है तो वो खाली जगह ही हमारे लिए पवित्र है और उसकी पूजा की जानी चाहिए, अथवा कोई और शिवलिंग स्थापित किया जाना चाहिए। उनके शुरुआती जीवनकाल में मंदिर नहीं बना था, इससे ये पता चलता है। तुगलक और लोदी के विध्वंस से वाराणसी नहीं उबरी थी।

वो नारायण भट्ट ही थे, जिनकी प्रेरणा से राजा टोडरमल ने काशी में पुनः भव्य विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था। आज जिस ज्ञानवापी विवादित ढाँचे को आप देख रहे हैं, उसे औरंगजेब ने इसी मंदिर को तोड़ कर इसके ऊपर बनवाया था। काशी की मुक्ति के प्रयास लगातार चलते रहे और यहाँ पूजा-पाठ भी नहीं रोका गया। बार-बार आक्रमण के बावजूद काशी में पुनर्निर्माण चलता रहा। आगे के लेख में हम अकबर और उसके आगे के कालखंड में काशी की हुई दुर्दशा की चर्चा करेंगे।