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हिंदू महासम्मेलन में पहली बार ईसाई संगठन CASA लेगा हिस्सा: पढ़ें कैसे केरल में ‘लव जिहाद’ से चल रही है लड़ाई

केरल के तिरुवनंतपुरम में शुक्रवार (29 अप्रैल, 2022) को आयोजित 10वें अनंतपुरी हिंदू महासम्मेलन में पहली बार क्रिश्चियन एसोसिएशन और अलायंस फॉर सोशल एक्शन (CASA) नाम के संगठन भाग लेंगे।

बुधवार (25 अप्रैल) को केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान द्वारा उद्घाटन और हिंदू धर्म परिषद द्वारा आयोजित इस 5 दिवसीय कार्यक्रम में पहली बार एक ईसाई समूह की उपस्थिति होने जा रही है। बता दें कि समूह ‘लव जिहाद, लैंड जिहाद और हलाल अर्थव्यवस्था’ पर चर्चा का एक हिस्सा है।

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, हिंदू धर्म के अध्यक्ष एम गोपाल ने टिप्पणी की, “पहले भी इस कार्यक्रम में ईसाई शामिल होते थे। लेकिन यह पहली बार है जब कोई ईसाई संगठन इस कार्यक्रम में शामिल हो रहा है। केरल की वर्तमान स्थिति की माँग है कि हिंदुओं और ईसाइयों को एक साथ खड़ा होना चाहिए।”

लव जिहाद का विरोध

उन्होंने आगे कहा, “लव जिहाद और लैंड जिहाद जैसे सामान्य मुद्दे हैं जिनका दोनों समुदाय सामना कर रहे हैं। दोनों समुदाय समान संकट की स्थिति का सामना कर रहे हैं। इस्लामिक आतंकवाद से दोनों समुदायों को सामना करना पड़ रहा है। वामपंथी और इस्लामी इतिहासकारों ने राज्य के इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश किया है। हम इतिहास को सही परिप्रेक्ष्य में रखना चाहते हैं। कॉन्क्लेव उस दिशा में प्रयास किया जाएगा।”

बता दें कि हिंदू संगठनों के साथ कासा का जुड़ाव 2009 से है, जब इसने विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के साथ हाथ मिलाया था ताकि इस्लामवादियों द्वारा प्यार के बहाने हिंदू, ईसाई लड़कियों को लुभाने के प्रयासों को विफल किया जा सके।

इस मामले के बारे में बोलते हुए, तत्कालीन कासा पदाधिकारी केएस सैमसन ने ‘लव जिहाद’ के खतरे से निपटने के लिए विहिप के साथ सहयोग करने की कसम खाई थी। रिपोर्ट में कहा गया है, “सैमसन ने कहा कि कुछ दिन पहले, कासा को एक हिंदू के बारे में पता चला था। एक ईसाई पैरिश में परिवार जहाँ एक स्कूल जाने वाली लड़की पीड़ित थी। हमने तुरंत इसे विहिप के पास भेज दिया, उन्होंने कहा, भगवा संगठन को जोड़ने से उन्हें कई मामलों में मदद मिली है।”

हाल ही में क्रिश्चियन एसोसिएशन और अलायंस फॉर सोशल एक्शन ने कोझीकोड जिले के कोडेंचेरी गाँव में लव जिहाद के एक कथित मामले के खिलाफ समर्थन जुटाया था।

मामला शेजिन नाम के एक मुस्लिम व्यक्ति का है, जिसने ज्योत्सना मैरी जोसेफ नाम की एक ईसाई महिला को भगाकर निकाह कर ली थी। सऊदी अरब में नर्स का काम करने वाली ज्योत्सना एक और शख्स से सगाई करने केरल पहुंचीं थी। हालाँकि, वह शेजिन के साथ भाग गई।

मैरी जोसेफ के माता-पिता ने कोडनचेरी पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि उनकी बेटी लापता है। पुलिस ने शेजिन के खिलाफ कार्रवाई नहीं की तो परिजन और स्थानीय लोगों ने थाने की ओर मार्च किया।

उन्होंने आरोप लगाया कि निकाह ‘लव जिहाद’ था। हालाँकि, ज्योत्सना ने दावा किया कि उसने अपनी मर्जी से शादी की है। इस बीच, उसके परिवार ने आरोप लगाया कि ज्योत्सना दबाव में थी और दंपति को माकपा नेताओं का समर्थन प्राप्त था। द न्यूज मिनट की एक रिपोर्ट के अनुसार, कासा के नेतृत्व में ईसाई समूहों ने ज्योत्सना को बचाने के लिए विरोध मार्च, रैलियाँ और अभियान चलाया।

कासा द्वारा उठाए गए एक्शन

News9 के साथ एक साक्षात्कार में, CASA के सह-संस्थापक केविन पीटर ने बताया, “हमने राज्य में 200 से अधिक ‘लव जिहाद’ मामलों में हस्तक्षेप किया है और लगभग 90 लड़कियों को बचाने में सफलता पाई हैं। हम ‘लव जिहाद’ मामलों की पहचान करने और स्थानीय पुजारियों को सतर्क करने के लिए पंजीकरण विभाग की वेबसाइट पर विवरण भी देखते हैं।”

“उनकी मदद से, हम उनके परिवारों से मिलते हैं और लड़कियों को बचाते हैं। मेरी समझ से 10 में से 8 मामलों में लड़कियों को अपने फैसले पर पछतावा होता है। साथ ही, माता-पिता को अक्सर बहिष्कार और अपमान का सामना करना पड़ता है। हजारों में केवल एक बिंदु संपत (निमिशा फातिमा की माँ जो आईएसआईएस में शामिल हो गई) या अशोकन (हादिया के पिता जिन्होंने शेफिन जहाँ से शादी की) है।

जिस हनुमान चालीसा के लिए माता-पिता पर लगा राष्ट्रद्रोह, 8 साल की आरोही राणा ने किया उसका पाठ: कहा- भगवान से मम्मी-पापा की जल्द रिहाई की प्रार्थना की

महाराष्ट्र में हनुमान चालीसा पर विवाद के बीच 8 साल की आरोही राणा ने इसका पाठ किया है। आरोही अमरावती की निर्दलीय सांसद नवनीत राणा और विधायक रवि राणा की बेटी हैं। राणा दंपती अभी जेल में हैं। दोनों को मातोश्री के बाहर हनुमान चालीसा का पाठ करने की घोषणा के बाद धार्मिक सद्भाव बिगाड़ने समेत कई आरोपों में गिरफ्तार किया गया था।

आरोही ने अपने अमरावती स्थित अपने घर में हनुमान चालीसा का पाठ किया। पाठ में बड़ी संख्या में राणा दंपती के समर्थक भी शामिल हुए। आरोही ने न्यूज एजेंसी ANI से इस बारे में बात करते हुए कहा, “मैं भगवान से प्रार्थना करती हूँ कि मेरे मम्मी-पापा जल्द ही रिहा हो जाएँ।”

सांसद नवनीत राणा और उनके विधायक पति रवि राणा अभी मुंबई की जेल में बंद हैं। उनकी जमानत याचिका पर मुंबई की सेशंस कोर्ट में 29 अप्रैल को सुनवाई होगी। राणा दंपती ने पिछले हफ्ते सीएम उद्धव ठाकरे के मुंबई स्थित आवास ‘मातोश्री’ के बाहर हनुमान चालीसा पढ़ने का ऐलान किया था। इसके बाद शिवसेना समर्थकों ने राणा दंपती के घर के बाहर हंगामा भी किया था। बाद में मुंबई पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन पर शांति भंग करने, दो समुदायों में वैमनस्य फैलाने व राष्ट्रद्रोह की धाराएँ लगाई गई हैं।

हिरासत में रहने के दौरान नवनीत राणा ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखकर थाने में दुर्व्यवहार करने व पीने का पानी तक नहीं देने व शौचालय नहीं जाने देने जैसे आरोप लगाए थे। इसके बाद गृह मंत्रालय ने महाराष्ट्र सरकार से सांसद नवनीत राणा की गिरफ्तारी और खार थाने में अमानवीय व्यवहार के आरोपों के बारे में एक तथ्यात्मक रिपोर्ट माँगी थी। वहीं, लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने विशेषाधिकार और आचार समिति को राणा की शिकायत जाँच के लिए कहा था।

‘मस्जिदों से कंकड़ भी हटाकर देखे, पता चल जाएगा’: मुस्लिमों ने कॉन्ग्रेस नेता पर कराई FIR, कहा- अलवर में मंदिर गिराकर माहौल बिगाड़ना चाहती

राजस्थान के अलवर (Alwar, Rajasthan) में मंदिर तोड़ने के मामले में भड़काऊ भाषण देने को लेकर मुस्लिमों के एक समूह ने कॉन्ग्रेस के जिलाध्यक्ष योगेश मिश्रा के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। शिकायतकर्ता का नाम साहून है। शिकायत में कहा गया है कि अलवर में मंदिर गिराए जाने की घटना के पीछे कॉन्ग्रेस का हाथ है और इसका मुस्लिमों से कोई लेना-देना नहीं है। आरोप में यह भी कहा गया है कि कॉन्ग्रेस नेता मिश्रा घटनाक्रम से वाकिफ़ थे और वह मंदिर का दौरा कर चुके थे। शिकायत में मंदिर गिराए जाने की घटना को कॉन्ग्रेस द्वारा साम्प्रदायिक तनाव बढ़ाने की साजिश बताया गया है।

रिपब्लिक वर्ल्ड से बात करते हुए मुस्लिम युवक ने कहा, “राजगढ़ में मंदिर गिराए जाने के लिए पूरी तरह से कॉन्ग्रेस जिम्मेदार है। इसके पीछे कॉन्ग्रेस के एक विधायक का हाथ है। इस मामले से हम मुस्लिमों का कोई वास्ता नहीं है। यह कॉन्ग्रेस सरकार के प्रशासनिक अधिकारियों की हरकत है।” इसी दौरान एक अन्य मुस्लिम युवक ने कहा, “अलवर हमेशा शांति और भाईचारे के लिए जाना जाता रहा है। यहाँ कभी दंगा-फसाद नहीं हुआ। वो इसीलिए परेशान हैं कि यहाँ ऐसा हो क्यों नहीं रहा? उन्हें दंगों के बिना राजनैतिक फायदा कैसे मिलेगा? उनकी जरूरत किसी को भी नहीं है। यह सब इसीलिए हो रहा है।”

शिकायतकर्ता साहून पहले कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता थे। राजगढ़ में मंदिर गिराए जाने की घटना के बाद उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। साहून ने कहा, “कॉन्ग्रेस के जिलाध्यक्ष योगेश मिश्रा ने एक असंवैधानिक बयान दिया है। अपने बयान से उन्होंने लोगों को भड़काया है। उन्होंने कहा कि मस्जिद से दो कंकड़ भी नहीं हटाकर देखे, पता लग जाएगा। अगर इसके बाद किसी धर्मस्थल पर कोई विवाद हुआ तो उसका जिम्मेदार कौन होगा?”

साहून की शिकायत पर अलवर के सदर थाना प्रभारी ने कहा, “मिली शिकायत की जाँच की जाएगी। जाँच के निष्कर्ष के आधार पर आगे की कार्रवाई होगी।” योगेश मिश्रा का भड़काऊ बयान वाला वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ था। उस वीडियो में उनके बयान के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी के बाकी कार्यकर्ता उनका माईक छीनने का प्रयास करते दिखे थे।

कॉन्ग्रेस जिलाध्यक्ष ने अपने बयान पर दुःख प्रकट किया

विरोध बढ़ता देख कॉन्ग्रेस नेता योगेश मिश्रा ने अपने बयान पर दुःख प्रकट किया है। अपने फेसबुक पेज पर एक वीडियो जारी करते हुए उन्होंने कहा, “मैं ब्राह्मण कुल में जन्मा एक हिन्दू हूँ और मुझे मेरे धर्म पर आघात बर्दाश्त नहीं है। फिर भी अगर मेरे शब्दों से किसी को पीड़ा पहुँची हो तो मैं उस पर दुःख प्रकट करता हूँ।” मिश्रा ने इस बयान में मंदिर गिराए जाने का दोषी भाजपा को बताया है।

‘ब्राह्मणों तेरी कब्र खुदेगी’: BHU में इफ्तार पार्टी के बाद कैंपस में लिखे मिले नफरती नारे, भड़के छात्रों ने VC का पुतला फूँका

BHU के महिला महाविद्यालय में बुधवार (27 अप्रैल, 2022) को रोजा इफ्तार पार्टी को लेकर परिसर में विरोध शुरू हो गया है। कल शाम को जैसे ही इफ्तार की तस्वीरें सामने आईं छात्रों ने कुलपति प्रो सुधीर जैन के खिलाफ नारेबाजी की और प्रतीकात्मक पुतला लेकर जुलूस निकालते हुए कुलपति आवास पर पहुँचकर पुतला दहन भी किया।

BHU में कुलपति का पुतला फूँकते छात्र

हालाँकि, यह पहली बार नहीं है, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में चार्ज लेने के बाद से ही चर्चा में चल रहे कुलपति प्रोफेसर सुधीर कुमार जैन ने ऑफिसियल अकाउंट से इफ्तार की सूचना देकर ही बड़े विवाद को हवा दे दी थी। शाम में रोजा इफ्तार का आयोजन हुआ। इसमें कुलपति, रेक्टर प्रो. वीके शुक्ला सहित महिला महाविद्यालय के रोजेदार शिक्षक, शिक्षिकाओं व छात्राओं ने अपना रोजा खोला। छात्रों ने ऑपइंडिया से बात करते हुए बताया कि वहाँ डा. मो. अफजल हुसैन के नेतृत्व में रोजा और रमजान पर एक चर्चा भी हुई। इसकी जानकारी होने पर छात्रों का बड़ा समूह आक्रोशित हो गया।

बता दें कि रोजा इफ्तार के बाद जहाँ कुलपति ने छात्राओं संग सेल्फी ली। वहीं कार्यक्रम में VC और रेक्टर के अलावा डॉ. अफजल हुसैन, प्रो. नीलम अत्रि, कार्यवाहक प्रधानाचार्य प्रो. रीता सिंह, छात्र अधिष्ठाता प्रो. केके सिंह, चीफ प्रॉक्टर प्रो. बीसी कापड़ी, डॉ. दिव्या कुशवाहा भी मौजूद रहे।

इफ्तार से आक्रोशित छात्रों ने ऑपइंडिया से बात करते हुए बताया, “BHU में लंबे समय से रोजा इफ्तार जैसा कोई आयोजन नहीं हो रहा था। अचानक कुलपति का BHU को जामिया बनाना उचित नहीं है।” शोध छात्र पतंजलि पांडेय ने वीसी पर आरोप लगाया है कि वह छात्रों के हितों और विश्वविद्यालय की परंपरा की अनदेखी करते हैं। इस तरह से परिसर में इफ्तार पार्टी का आयोजन निंदनीय है।” छात्रों ने इस तरह की पहल को मुस्लिम तुष्टिकरण कहा।

वहीं छात्रों यह भी बताया कि कल इफ्तार पार्टी के बाद कैंपस में जगह-जगह दीवारों पर हिन्दू विरोधी ग्राफिटी बनाई गई है। BHU के छात्रों ने कुछ तस्वीरें भी भेजी हैं, जिनपर हिन्दू विरोधी नारे लिखे हैं, “कश्मीर तो बस झाँकी है, पूरा भारत बाकी है।’, ब्राह्मणों तेरी कब्र खुदेगी BHU की धरती पर।”

दीवारों पर लिखे गए नफरती नारे

कुलपति के इफ्तार पार्टी जैसे कदम का विरोध करने वाले छात्रों ने कहा, “पूर्व वीसी गिरीश चंद त्रिपाठी ने अपने कार्यकाल में नवरात्रि के समय फलाहार की परंपरा शुरू की थी। उस की परंपरा को खत्म करके इफ्तार की नई परंपरा शुरू की जा रही है, जो हमें अस्वीकार्य है। अगर कुलपति को को इफ्तार करना है तो वह एएमयू या जामिया जा सकते हैं यहाँ उनकी आवश्यकता नहीं है।”

विरोध प्रदर्शन करने वाले छात्रों ने ऑपइंडिया को बताया कि BHU में आज तक कभी भी इस तरह से इफ्तार पार्टी का आयोजन नहीं हुआ है। इस बार इस आयोजन के लिए महिला महाविद्यालय को चुना गया ताकि छात्र विरोध करने महिला महाविद्यालय में न जा सकें। यह एक गलत परंपरा डाली जा रही है जिसका छात्र विरोध करेंगे। आगे इस मुद्दे पर आंदोलन तय है।

वहीं बीएचयू के जनसंपर्क अधिकारी डॉ. राजेश सिंह ने ऑपइंडिया को बताया को बताया कहा कि महिला महाविद्यालय में रोजा इफ्तार की परंपरा रही है। इसमें कुलपति समेत अन्य अधिकारी शामिल होते हैं। इसी के तहत बुधवार को आयोजन किया गया। उन्होंने बताया कि दो साल से कोरोना की वजह से विश्वविद्यालय बंद होने से इफ्तार का आयोजन नहीं हुआ था। इसलिए इस वर्ष हुआ अब इस पर किसी प्रकार का विवाद नहीं होना चाहिए।

खुले में नहाती दिखी पूनम पांडे, मुनव्वर फारूकी बोला- …जो चाहिए था वो मिल गया: LockUpp में पहले उतारी थी कैमरे के सामने कपड़े

ओटीटी पर चल रहा एकता कपूर का रियलिटी शो लॉकअप (LockUpp) अब अपने फाइनल पड़ाव में है। कंगना रनौत इसे होस्ट कर रही हैं। इस शो के पहले सीजन को जीतने के लिए सभी कंटेस्टेंट्स के बीच होड़ लगी हुई है। शो को जीतने और लाइमलाइट में आने के लिए सभी प्रतिभागी हर हथकंडा अपना रहे हैं। इसी कड़ी में अभिनेत्री पूनम पांडे ने खुले में नहाने का काम किया है।

दरअसल लॉकअप के लेटेस्ट एपिसोड में शिवम शर्मा यार्ड एरिया में सबके सामने नहाने लगे। इस दौरान वह शर्टलेस थे, लेकिन उन्होंने अपना ट्राउजर पहना हुआ था। उनके नहाने को पूनम पांडे, सायशा शिंदा और पायल रोहतगी देख रही थीं। तीनों तेज-तेज से चिल्ला रही थीं कि शिवम को अपना ट्राउजर भी उतारना चाहिए। जिसके बाद वह इन तीनों की बात मानते हुए ट्राउजर भी उतार देते हैं और सिर्फ अंडरविअर पहनकर नहाने लगते हैं।

शिवम को ऐसा करते देख पूनम पांडे भी सबके सामने यार्ड एरिया में नहाने का फैसला करती है। यह बात वह सायशा शिंदे और पायल रोहतगी से कहती हैं। साथ ही वह यह भी कहती हैं कि वह ऐसा सिर्फ दर्शकों के लिए कर रही हैं। सायशा और प्रिंस सभी को आकर बताते हैं कि पूनम पांडे ने यार्ड एरिया में नहाने का फैसला किया। इस पर प्रिंस कहते हैं, “इसलिए मैं बाहर नहीं जा रहा हूँ।” हिंदूफोबिक कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी कहता है, “मैं भी नहीं जा रहा हूँ क्योंकि मैं रमजान कर रहा हूँ।”

सायशा उन्हें चिढ़ाती है और वे हँसने लगते हैं। बाद में, प्रिंस नरूला, मुनव्वर, अंजलि और सायशा को पूनम और उसकी हरकतों के बारे में बातचीत करते हुए देखा जाता है। मुनव्वर फारूकी ने पूनम पांडे के बारे में कहा, “उसके जाने के चांस बढ़ गए हैं। क्योंकि मेकर्स को जो चाहिए था मिल गया।” वहीं इस बारे में प्रिंस ने आगे कहा, “जो आदमी पूनम को देखना चाहते हैं, वह अंत तक उसके लिए वोट करेंगे। वे उसके लिए वोट करेंगे, क्योंकि वे देखना चाहते हैं कि पूनम अगली क्या चीज करेंगी।”

तब मुनव्वर मजाक उड़ाते हुए बोलते हैं, “अगर वो प्रॉमिस करे कि ऑडियंस उसे वोट देगी और बचाएगी तो वो हर गुरुवार और शुक्रवार के एपिसोड में अपनी टी-शर्ट उतारेगी, तो वो पक्का ये शो जीत जाएगी। मेकर्स उसे फिनाले से पहले ही विनर बना देंगे और ट्रॉफी दे देंगे। कहेंगे कि चलो बाकी लोगों को टाइम बर्बाद नहीं करते हैं। वे फिनाले से एक हफ्ते पहले ही पूनम को ट्रॉफी दे देंगे।”

बता दें कि जब पूनम नहा रही थी तो पायल रोहतगी को छोड़कर बाकी सभी लोग लॉकअप एरिया के अंदर बैठे थे। हालाँकि शो के निर्माताओं ने लॉकअप के अंदर पूनम के नहाते हुए फुटेज को प्रसारित नहीं किया है। लॉकअप में पूनम पांडे अपने खेल और रणनीति के अलावा बोल्डनेस की वजह से भी सुर्खियों में हैं। बीते दिनों उन्होंने दर्शकों और फैंस से लिए बीच शो में अपना टॉप कैमरे के सामने उतार दिया था। ऐसा पूनम पांडे ने ज्यादा वोट हासिल करने के लिए किया था। टॉपलेस होते हुए उनकी कई तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुई थीं।

उत्तर प्रदेश में धार्मिक स्थलों से हटे 11000 लाउडस्पीकर, 35000 की आवाज कम: CM योगी ने कहा- आस्था का सम्मान, पर दूसरों को परेशान न किया जाए

उत्तर प्रदेश के धार्मिक स्थलों से करीब 11,000 लाउडस्पीकर (Loudspeaker) हटाए गए हैं। साथ ही 35,000 से अधिक लाउडस्पीकर के एम्पलीफायर की आवाज धीमी कर दी गई है। पिछले चार दिन में यह कार्रवाई हुई है। राज्य सरकार ने सभी जिलों में 30 अप्रैल तक लाउडस्पीकर को लेकर यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानदंडों का पालन करने का आदेश दे रखा है। इसी को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया जा रहा है।

इसको लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बुधवार (27 अप्रैल 2022) को भी बैठक की। इस दौरान उन्होंने साफ कर दिया कि कानून-व्यवस्था को लेकर कोई लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। जहाँ जिसकी शिथिलता पाई जाएगी उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि आगामी पर्व व त्योहार के मद्देनजर विशेष सतर्कता बरतनी है। किसी को भी किसी भी प्रकार से उपद्रव आदि करने की इजाजत नहीं है। सीएम ने कहा कि आस्था का पूरा सम्मान है। इसमें सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं है, लेकिन इसका सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन कर दूसरों को परेशान न किया जाए। यह स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों से 3 मई को अक्षय तृतीया और ईद के दौरान अतिरिक्त सतर्कता बरतने का निर्देश दिया। इस दौरान उन्होंने लाउडस्पीकर को लेकर जारी निर्देश पर भी कड़ाई से पालन करने के लिए कहा।

जानकारी के मुताबिक लखनऊ से सबसे ज्यादा लाउडस्पीकर (2,395) हटाए गए हैं। आदेश का असर गोरखपुर (1,788), वाराणसी (1,366), मेरठ (1,204), प्रयागराज (1,172) और बरेली (1070) में भी देखने को मिला। लाउडस्पीकर की आवाज कम करने के मामले में भी लखनऊ सबसे ऊपर (7,397) है। लिस्ट में शामिल अन्य प्रमुख शहरों में बरेली (6,257), मेरठ (5,976), गोरखपुर (5561) और वाराणसी (2,417) हैं।

एडिशनल डायरेक्टर जनरल (कानून व्यवस्था) प्रशांत कुमार ने कहा, “धार्मिक स्थलों से लाउडस्पीकरों को हटाने और उनके आवाज को तय सीमा के भीतर निर्धारित करने के लिए राज्यव्यापी अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान में 10,923 लाउडस्पीकरों को हटा दिया गया है और 35,221 की आवाज को स्वीकार्य सीमा तक कम कर दिया गया है।” रिपब्लिक मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, “हम हाई कोर्ट का अनुसरण कर रहे हैं, जिसने लाउडस्पीकरों के लिए विशिष्ट डेसिबल निर्धारित किया है। इसको लेकर जिला प्रशासन को आदेश भेज दिया गया है। इसकी देखरेख के लिए एक कमेटी बनाई गई है। हम धर्मगुरुओं से भी बात कर रहे हैं क्योंकि ज्यादातर लाउडस्पीकर धार्मिक स्थलों पर लगे होते हैं। ड्राइव को सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है।”

बता दें कि पिछले हफ्ते, सीएम योगी ने राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति पर चर्चा करने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक की थी। इस दौरान सीएम ने अफसरों को निर्देश दिए थे कि धार्मिक जुलूस की अनुमति उन्हीं आयोजनों में दिए जाएंँ जो पारंपरिक हों। नए आयोजनों को अनवाश्यक रूप से अनुमति न दी जाए। दिशा-निर्देश में कहा गया था कि माइक का प्रयोग किया जा सकता है, लेकिन यह सुनिश्चित हो कि माइक की आवाज़ संबंधित परिसर से बाहर न जाए। इससे अन्य लोगों को कोई असुविधा नहीं हो। नए स्थलों पर माइक लगाने की अनुमति नहीं देने को कहा गया था।

गृह विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि निर्देश के बाद कई जिलों में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के धार्मिक नेताओं ने सर्वसम्मति से लाउडस्पीकर की आवाज कम करने पर सहमति व्यक्त की थी। सबसे पहले मथुरा में श्री कृष्ण जन्मभूमि मंदिर ट्रस्ट ने परिसर स्थित भागवत भवन से लाउडस्पीकर पर हर सुबह 5 बजे से एक घंटे के लिए आयोजित ‘मंगलचरण आरती’ को प्रसारित नहीं करने का निर्णय लिया

गोरखनाथ मंदिर ट्रस्ट ने भी कम कर दी लाउडस्पीकर की आवाज

बलरामपुर के शक्तिपीठ देवीपाटन तुलसीपुर मंदिर में चार में से तीन लाउडस्पीकर हटा दिए गए और एक की आवाज को कम कर दिया गया। मंदिर के महंत मिथिलेश नाथ ने सभी धर्मगुरुओं से इसका पालन करने की अपील की। गोरखपुर में गोरखनाथ मंदिर ट्रस्ट ने परिसर में लाउडस्पीकर की आवाज कम कर दी। इसके अलावा मंदिर के पास की सड़कों, इलाकों और सार्वजनिक स्थानों से लाउडस्पीकरों को हटा दिया गया। मेरठ में राजराजेश्वरी मंदिर में लाउडस्पीकर की आवाज कम की गई।

इसी तरह लखनऊ में ईदगाह के इमाम मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद कहा कि उन्होंने यहाँ की सभी मस्जिदों को लाउडस्पीकर की आवाज को सीमित करने का निर्देश दिया है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि आवाज परिसर से बाहर न जाए। उन्होंने कहा कि राज्य की राजधानी में सभी सुन्नी मस्जिदों को इसी तरह के निर्देश जारी किए गए हैं।

अंसार के करीबी जफर और बाबुद्दीन गिरफ्तार: जहाँगीरपुरी में शोभा यात्रा पर फेंके थे बोतल, लहराए थे तलवार

हनुमान जन्मोत्सव पर निकाली गई शोभायात्रा पर जहाँगीरपुरी में हुए हमले के सिलसिले में दिल्ली पुलिस ने दो और गिरफ्तारी की है। इनकी पहचान जफर और बाबुद्दीन के तौर पर हुई है। दोनों हिंसा के मुख्य आरोपित अंसार के करीबी बताए जा रहे हैं। पुलिस के अनुसार 16 अप्रैल 2022 को हुई हिंसा के दौरान जफर और बाबुद्दीन पर काँच की बोतलों से हमला करने और तलवारें लहराने का आरोप है।

आज तक की रिपोर्ट के मुताबिक गिरफ्तार दोनों आरोपित सगे भाई हैं। इन दोनों की हिंसा के मुख्य आरोपित अंसार से जान-पहचान है। दोनों को पुलिस ने CCTV फुटेज में देखा था। दोनों पत्थरबाजी में भी शामिल थे। अंसार ने भी पूछताछ में दोनों के बारे में बताया था।गिरफ्तारी के बाद क्राइम ब्रांच इनसे पूछताछ कर रही है।

हिंसा के बाद जफर और बाबुद्दीन फरार हो गए थे। इन्हे टेक्निकल सर्विलांस की मदद से पकड़ा गया है। इस मामले में अब तक कुल 31 गिरफ्तारी हुई है। इसमें से 3 नाबालिग भी हैं, जिन्हें बाल सुधार गृह भेजा गया है। इस मामले में अभी 5 अन्य आरोपित फरार हैं। दिल्ली की रोहिणी कोर्ट ने इन सभी के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया है। पुलिस के मुताबिक आरोपितों की धरपकड़ के लिए UP, बिहार और पश्चिम बंगाल में दबिश दी जा रही है।

PFI की भूमिका की भी हो रही जाँच

एक रिपोर्ट के मुताबिक जहाँगीरपुरी हिंसा में केंद्रीय एजेंसियाँ PFI (पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया) की भूमिका की जाँच कर रही हैं। हिंसा के दौरान PFI की छात्र शाखा से जुड़े लोग भीड़ में मौजूद बताए जा रहे हैं। जाँच एजेंसियों ने ऐसे 22 संदिग्ध मोबाइल नम्बरों की पहचान की है जो हिंसा से पहले उस क्षेत्र में सक्रिय थे। इन नंबरों में कुछ दिल्ली में फरवरी 2020 में हुए हिन्दू विरोधी दंगों के समय भी एक्टिव थे।

गौरतलब है कि 16 अप्रैल 2022 को हनुमान जन्मोत्सव के मौके पर हिंदुओं ने शोभा यात्रा निकाली थी। इस पर कट्टरपंथी मुस्लिमों ने हमला कर दिया था। शोभा यात्रा पर पथराव किया गया। काँच की बोतलों से हमला किया गया था। हिंसा में कई लोग बुरी तरह घायल हुए थे। दंगाइयों द्वारा चलाई गई गोली में एक पुलिसकर्मी भी घायल हो गया था।

तो ट्विटर के बाद कोक और मैकडॉनल्ड्स भी खरीद लेंगे एलन मस्क! ट्वीट कर बताया- कोका कोला खरीदने जा रहा हूँ, ताकि उसमें कोकीन डाल सकूँ

ट्विटर को खरीदने के बाद टेस्ला के सीईओ एलन मस्क (Elon Musk) सोशल मीडिया में छाए हुए हैं। वे खुद भी लगातार सक्रियता दिखा रहे हैं। इसी कड़ी में उनके एक ट्वीट ने हड़कंप मचा दिया। उन्होंने अगली बार कोका कोला (Coca-Cola) खरीदने की बात कही। इसके कुछ घंटे बाद उन्होंने एक स्क्रीनशॉट शेयर कर मैकडॉनल्ड्स (McDonald’s) के लिए भी इसी तरह का इशारा किया। हालाँकि उनके इन ट्वीट्स से यूजर्स कंफ्यूज हैं। अटकलें लग रही है कि मस्क मजाक कर रहे हैं या फिर भविष्य की योजनाओं को लेकर कोई इशारा कर रहे हैं। दिलचस्प यह है कि इन दो ट्वीट्स के बीच उन्होंने एक और ट्वीट किया जिसमें इस माइक्रोब्लॉगिंग साइट (Twitter) को मजेदार बनाने की बात कही।

मस्क ने ट्वीट करते हुए लिखा, “अब आगे मैं कोका कोला खरीदने जा रहा हूँ, ताकि उसमें कोकीन (cocaine) डाल सकूँ।” इस ट्वीट को खबर लिखे जाने तक लाखों लाइक मिल चुके थे। हजारों कमेंट्स आ चुके थे।

बता दें कि अमेरिका के जॉर्जिया में मई 1886 को कोला कोला की शुरुआत हुई। John Pemberton ने इसे शुरू किया। 1887 में 2300 डॉलर की कीमत में आसा ग्रिग्स कैंडलर ने इसे खरीद लिया था। आज 200 से ज्यादा देशों में कोका कोला की मौजूदगी है। दुनिया भर में करीब 900 से ज्यादा प्लांट हैं।

कोका-कोला वाले ट्वीट के तुरंत बाद एलन मस्क ने एक और ट्वीट किया और लिखा “आइए ट्विटर को अधिकतम मज़ेदार बनाएँ।”

कुछ ही देर में मैकडॉनल्ड को लेकर ट्वीट

कुछ ही देर बाद मस्क ने मैकडॉनल्ड खरीदने को लेकर एक स्क्रीनशॉट साझा करते हुए लिखा कि सुनो मैं चमत्कार नहीं कर सकता। स्क्रीनशॉट में लिखा था, “मैकडॉनल्ड भी खरीदूँगा ताकि सभी आइसक्रीम मशीन को फिक्स कर सकूँ।”

ट्विटर को 44 अरब डॉलर में खरीदा

बता दें कि एलन मस्क ने ट्विटर को 44 बिलियन डॉलर (लगभग 3368 अरब रुपए) में खरीद लिया है। अब Twitter का 100% स्टेक उनके पास है। ट्विटर डील के बाद उन्होंने कहा था कि बोलने की आजादी किसी भी लोकतंत्र के काम करने के लिए काफी जरूरी है। ट्विटर एक डिजिटस स्क्वायर है जहाँ पर मानवता के भविष्य पर चर्चा होती है। उन्होंने आगे लिखा था कि वे ट्विटर को और भी बेहतर नए फीचर्स के साथ लाना चाहते हैं। इसके लिए अल्गोरिदम को ओपन सोर्स रखकर लोगों में विश्वास बढ़ाना चाहते हैं।

पहले सिख परिवार को डरा-धमकाकर हासिल की गुरु की सराय, अब बना दी मस्जिद: हिंदू संगठनों का दावा, पंजाब के पटियाला में माहौल तनावपूर्ण

पंजाब के पटियाला में गुरु की सराय को मस्जिद में बदलने के आरोपों के बाद विवाद खड़ा हो गया है। हिन्दू पक्ष का आरोप है कि गुरु की सराय को मस्जिद का रूप दे दिया गया है। वहीं मुस्लिम पक्ष का कहना है कि इस जगह 75 साल पहले भी मस्जिद थी, जिसे केवल नया रूप दिया गया है।

न्यूज नेशन की रिपोर्ट के मुताबिक हिन्दू पक्ष का दावा है कि बँटवारे से पहले इस स्थान पर एक सिख परिवार रहता था। वही गुरु की सराय की देखरेख भी करता था। बाद में उसे डरा-धमकाकर मुस्लिमों ने उस जगह को हासिल कर लिया। कुछ समय बाद वहाँ मस्जिद बना दी गई। उस स्थान पर पहले सिखों का चिह्न था, जिसे हटा कर इस्लामी निशान लगा दिए गए। यह विवाद कोर्ट में भी गया जहाँ साल 2017 में मुस्लिम पक्ष ये साबित नहीं कर पाया कि यह स्थान उनका है। इसके बाद कोर्ट ने फैसला सिखों के पक्ष में सुनाया। हिन्दू संगठनों का आरोप है कि अब गुरु की सराय में नमाज़ भी पढ़ी जाती है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जिस स्थान पर विवाद हो रहा है वह पटियाला के गुजरांवाला मोहल्ले में मौजूद है। विश्व हिन्दू परिषद का दावा है कि गुरु की सराय को मस्जिद का रूप देने के लिए मुस्लिम पक्ष द्वारा किसी भी प्रकार की अनुमित नहीं ली गई है। VHP के इस दावे का गुजरांवाला मोहल्ले के स्थानीय निवासी और सिख समुदाय के कई लोग भी समर्थन कर रहे हैं। इन लोगों ने सराय को मस्जिद का रूप देने वालों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की है।

इस मामले में मुस्लिम पक्ष का नेतृत्व गुजरांवाला मस्जिद के अध्यक्ष अतर हुसैन कर रहे हैं। इस्लाम अली के साथ उन्होंने बयान जारी करते हुए कहा, “इस बाबत हमसे स्थानीय SDM ने दस्तावेज माँगे थे जो हमने जमा कर दिए हैं। इस मोहल्ले में पहले से ही मस्जिद बनी हुई थी। भारत विभाजन के बाद इस जगह पर रहने वाले कई लोग पाकिस्तान चले गए थे। लेकिन यहाँ मौजूद मुस्लिमों ने मस्जिद को धरोहर के रूप में सहेज कर रखा था। अब उसी मस्जिद को नया आकार दिया गया है।”

एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक SDM राजपुरा संजीव कुमार इस मामले की जाँच कर रहे हैं। उन्होंने दोनों पक्षों से उनके दावे सुने और साथ ही उनके द्वारा दिए गए कागजातों की जाँच भी की। इस मामले में निर्णय के लिए आने वाली 9 मई को उन्होंने दोनों पक्षों को एक बार फिर से कागजातों के साथ बुलाया है।

तालिबान समर्थक NGO ‘मुल्ला बोर्ड’, जिसके कारण राजीव गाँधी ने पलट दिया सुप्रीम कोर्ट का फैसला: UCC के है खिलाफ, कहा था – फिर मस्जिद बनेगा राम मंदिर

देश में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) की चर्चा होते ही एक बार फिर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (All India Muslim Persona Law Board- AIMPLB) विरोध में उतर आया है। खुद को मुस्लिमों का रहनुमा बताने वाला AIMPLB संविधान के इस विधान को ही असंवैधानिक बता रहा है। यह पहली बार नहीं है जब AIMPLB समान नागरिक संहिता का विरोध कर रहा है। इसके पहले राम जन्मभूमि, CAA-NRC, तीन तलाक कानून का खात्मा, हिजाब बैन, लाउडस्पीकर बैन सहित तमाम मामलों को मुस्लिमों से जोड़कर इसका विरोध करता रहा है। यहाँ तक आतंकी गतिविधियों में शामिल मुस्लिमों के बचाव में भी कई बार यह संगठन सामने आ चुका है।

उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद के अध्यक्ष डॉ. इफ्तिखार अहमद जावेद स्पष्ट कर चुके हैं कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड चंद लोगों द्वारा बनाया गया एक गिरोह है, जिसका उद्देश्य मुस्लिमों को भड़काना, उलझाना और उन्हें हाशिये पर धकेलना है। वहीं, उत्तर प्रदेश राज्य हज समिति के चेयरमैन मोहसिन रजा कहना है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का असली नाम ऑल इंडिया मुल्ला पर्सनल लॉ बोर्ड रख देना चाहिए।

क्या है मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB)

संवैधानिक अधिकारों की आड़ में संविधान का विरोध करने वाला ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड है क्या, इसे भी जानना आवश्यक है। खुद को संवैधानिक संस्था मान बैठा AIMPLB दरअसल, एक स्वयंसेवी संस्था (NGO) है। इसकी स्थापना साल 1972 में की गई थी। AIMPLB की वेबसाइट के अनुसार, 27-28 दिसंबर 1972 को मुंबई में हुए इसके अधिवेशन में इस संस्था के उद्देश्य को निर्धारित किया गया था। अगर इसके उद्देश्यों को गौर करें तो सीधा समझ में आता है कि इसका मकसद इस्लामिक शासन को स्थापित करने के उद्देश्य के साथ इसकी स्थापना की गई थी। इस संस्था से मुस्लिमों के तीनों ही कट्टरवादी विचारधारा देवबंद, नदवा और बरेलवी जुड़े हुए हैं। आइए इसके कुछ उद्देश्यों को देखते हैं।

  1. भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ की रक्षा के लिए और शरीयत अधिनियम को बनाए रखने और लागू करने के लिए प्रभावी कदम उठाना।
  2. किसी भी राज्य विधानमंडल या संसद में पारित ऐसे सभी कानूनों को रद्द करने के लिए प्रयास करना और अदालतों द्वारा दिए ऐसे फैसले जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप या उसके समानांतर चल सकते हैं, उसमें यह देखना कि मुस्लिमों को ऐसे कानूनों के दायरे से छूट दी गई है।
  3. मुस्लिमों के बीच शरिया कानूनों और शिक्षाओं के बारे में जागरूकता और उस उद्देश्य के लिए साहित्य प्रकाशित और प्रसारित करना।
  4. शरिया द्वारा निर्धारित मुस्लिमों के व्यक्तिगत कानूनों को लोकप्रिय बनाने के लिए और मुस्लिमों द्वारा उनके कार्यान्वयन और पालन के लिए एक व्यापक ढाँचा तैयार करना।
  5. मुस्लिम पर्सनल लॉ की सुरक्षा के लिए जरूरत पड़ने पर एक ‘एक्शन कमेटी’ का गठन करना, जिसके माध्यम से बोर्ड के फैसलों को लागू करने के लिए संगठित देशव्यापी अभियान चलाना।
  6. राज्य या केंद्रीय विधानों और विधेयकों तथा सरकारी एवं अर्ध सरकारी सरकारी निकायों द्वारा बनाए गए नियमों पर उलेमा और कानूनविदों की एक समिति के माध्यम से लगातार निगरानी रखना कि क्या ये किसी भी तरह से मुस्लिम पर्सनल लॉ को प्रभावित करते हैं।
  7. मुस्लिमों की विभिन्न वर्गों और विचारधाराओं के बीच भाईचारे और आपसी सहयोग बढ़ाना।
  8. शरीयत के आलोक में भारत में लागू ‘मोहम्मडन कानून’ की जाँच करना और नए मुद्दों को ध्यान में रखते हुए इस्लामी न्यायशास्त्र के विभिन्न स्कूलों के विश्लेषणात्मक अध्ययन की व्यवस्था करना और कुरान और सुन्नत पर आधारित उनके उचित समाधान की तलाश करना, शरिया और इस्लामी न्यायशास्त्र के जानकार लोगों के मार्गदर्शन में शरीयत के सिद्धांतों का पालन करना।

उपरोक्त सभी लक्ष्य एवं उद्देश्य AIMPLB के हैं। इसमें कहीं भी भारतीय कानून को मानने, उससे लोगों को परिचित कराने, दूसरे वर्ग के साथ सामंजस्य बैठाने और विभिन्न संप्रदायों को बीच भाईचारा और राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने के लिए किसी भी तरह के प्रयास की बात कही गई है। इसका पूरा फोकस भारतीय कानून को शरीयत कानून के हिसाब से ढलवाने पर उसके लिए जरूरत पड़ी तो देशव्यापी संगठित अभियान चलाने की बता कही गई है।

समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद AIMPLB का अस्तित्व

भारत में मुस्लिमों के उनके सिविल मामलों में शरिया कानून अपनाने की छूट ही मुस्लिम समाज को भारत की मुख्यधारा से अलग रखा है। इसमें मुल्ले-मौलाना और AIMPLB द्वारा शरिया कानून के दायरे में नए माँगों को लेकर मुस्लिम समाज को भड़काने की कोशिश की जाती है। इस कारण मुस्लिम समाज का अन्य संप्रदायों के साथ दूरी बढ़ती जाती है। इसका उदाहरण तीन तलाक और CAA जैसे कानूनों में देखने को मिल चुका है। CAA कानून भारतीय मुस्लिमों से संबंधित नहीं होने के बावजूद इसका डर दिखाकर भड़काया गया, जिसका परिणाम कई जगह दंगों के रूप में आया।

अगर समान नागरिक संहिता लागू हो जाता है तो AIMPLB संगठन का सारा लक्ष्य और उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा और इस संस्था की कोई अहमियत नहीं रह जाएगी। ऊपर दिए गए उद्देश्यों में इसका लक्ष्य स्पष्ट है कि भारत में मुस्लिमों को शरिया कानून अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना और ऐसे कानूनों को बनाने से सरकार को रोकना है, जिससे मुस्लिमों का पर्सनल कानून प्रभावित हो।

AIMPB के विरोध के कारण राजीव गाँधी ने सुप्रीमो कोर्ट के निर्णय को बदल दिया था

शाहबानो प्रकरण में राजीव गाँधी सरकार द्वारा AIMPLB के सामने झुकने के बाद मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की अहमियत इतनी बढ़ गई कि राजनेता इसके खिलाफ बयान देने से बचने लगे। इसका परिणाम यह हुआ देश की आम जनता इसे अल्पसंख्यक आयोग की तरह एक संवैधानिक संस्था ही मान बैठी।

साल 1985 में मध्य प्रदेश के इंदौर की रहने वाली 66 साल की पाँच बच्चों की माँ शाहबानो ने पति द्वारा तीन तलाक देकर घर से निकाले जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो के हक में फैसला सुनाते हुए उसके पति को हर्जाना देने का आदेश दिया। इसके बाद AIMPLB ने नेतृत्व में मुल्ले-मौलवियों ने बवाल कर दिया और इसे मुस्लिमों के शरिया कानून में दखल बताते हुए हंगामा मचा दिया।

आखिरकार AIMPLB के दबाव में तत्कालीन राजीव गाँधी की सरकार ने 1986 में संसद में कानून लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया। राजीव गाँधी द्वारा पास किए गए इस कानून को मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986 के नाम से जाना जाता है। तब राजीव गाँधी सरकार में मंत्री और अब केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने इस कदम का सख्त विरोध किया था। इस बड़ी जीत के बाद AIMPLB हर मामले में सामने आने लगा जो मुस्लिमों से संबंधित होता। चाहे वह आतंक से जुड़ा हुआ मसला क्यों ना हो।

आतंकियों के साथ AIMPLB

साल 2021 में जब तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा कर किया था, तब मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता मौलाना सज्जाद नोमानी ने इसका स्वागत किया था। नोमानी ने कहा था कि अफगानिस्तान पर तालिबानियों का कब्जा जायज है और हिंदुस्तान का मुस्लिम तालिबान को सलाम करता है।

यही जमीयत उलेमा ए हिंद के महासचिव AIMPLB के सदस्य मौलाना महमूद मदनी ने कहा था कि पुलिस निर्दोष मुस्लिमों को आतंकवाद में गिरफ्तार करती है। उन्होंने कहा था कि जब कोई वारदात होती है तो पुलिस पर दबाव होता है और उस दबाव को कम करने के लिए गर्दन के नाप का फंदा तलाश करती है।

ईशनिंदा कानून के पक्ष में AIMPLB

इस्लामिक देशों में अगर किसी कानून का सबसे अधिक दुरुपयोग होता है तो वह है ईशनिंदा कानून। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी भारत में ईशनिंदा कानून की लंबे समय से माँग करता है। भारत की आलोचना की परंपरा और संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की धज्जी उड़ाते हुए इस तरह की माँग इस्लामिक कानून को बढ़ावा देने और देश को इस्लामिक मुल्क में बदलने की दिशा में एक अगले कदम के रूप में है।

CAA-NRC विरोध में भूमिका

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने मुस्लिमों के खिलाफ बताया है। इस तरह के अफवाह के दिल्ली के शाहीन बाग, सीलमपुर सहित कई जगह महीनों सड़कों को जाम रखा गया और अंत में दिल्ली दंगों की आग में झुलस गया। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अब भी CAA को वापस करने की माँग करता रहता है।

उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री मोहसिन रजा ने कहा था कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और बाबरी एक्शन कमेटी के सदस्यों का आतंकी संगठनों के साथ कनेक्शन है। उन्होंने कहा था कि CAA के खिलाफ हुई हिंसा के लिए भी इसी दोनों संगठनों के लोग जिम्मेदार हैं। इन लोगों ने नागरिकता संशोधन कानून को लेकर हिंसा की साजिश रची।

बाबरी मस्जिद की पैरवी

रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद के शांतिपूर्ण समाधान में सबसे बड़ी बाधा मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ही बनकर सामने आया था। जब-जब अदालत से बाहर इस मामले की शांतिपूर्ण समझौते की बात हुई, तब-तब AIMLB ने इस इनकार करते हुए कह दिया मुस्लिम एक इंच भी जमीन छोड़ने को राजी नहीं हैं।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वकील डॉ. जफरयाब जिलानी इस मामले की अदालत में पैरवी करते थे। इसके साथ ही AIMPLB इस पूरे मामले की निगरानी करता था। कई ऐसे मौके आए जब जिलानी ने मामले को टालने के उद्देश्य से सबूतों को उलझाए रखा, ताकि मामला लटका रहे। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्पीडी सुनवाई की और अपना निर्णय भी दिया।

बोर्ड के जनरल सेक्रेटरी मौलाना वली रहमानी ने कहा था कि बाबरी मस्जिद कल भी थी, आज भी है और कल भी रहेगी। मस्जिद में मूर्तियाँ रख देने से या फिर पूजा-पाठ शुरू कर देने या एक लंबे अर्से तक नमाज पर प्रतिबंध लगा देने से मस्जिद की हैसियत खत्म नहीं हो जाती। 

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने फैसले के बाद कहा था, “सुप्रीम कोर्ट के फैसले और मस्जिद की जमीन पर मंदिर के तामीर होने से हरगिज निराश न हों मुस्लिम। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि खाना-ए-काबा एक लंबे अरसे तक शिर्क (मूर्तिपूजक) और बिदअत परस्ती का मरकज रहा है।”

बोर्ड ने तुर्की के हगिया सोफिया चर्च/मस्जिद का भी उदाहरण दिया था। हगिया सोफिया 6वीं शताब्दी में ईसाई राजा द्वारा बनाया गया एक चर्च था, जिसे मुस्लिम ऑटोमन साम्राज्य में मस्जिद में बदल दिया गया था। मुस्तफा कमाल पाशा ने जब 1923 में तुर्की की बागडोर संभाली तो उन्होंने साल 1934 में हागिया सोफिया को म्यूजियम बना दिया। अब तुर्की के राष्ट्रपति रेचप तैयब एर्दोआन ने इस मुस्लिमों का हक बताते हुए फिर से मस्जिद बना दिया। इसकी विश्व भर में आलोचना हुई, लेकिन AIMPLB ने इसे एक अयोध्या मंदिर के लिए उदाहरण के तौर पर इस्तेमाल किया।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद भी AIMPLB के सदस्य और लोकसभा सांसद एवं ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लीमीन के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद थी और रहेगी। उन्होंने ट्वीट कर कहा था, “बाबरी मस्जिद थी, है और रहेगी इंशाअल्लाह।”

हिजाब विवाद में भी कूदा AIMPLB

कर्नाटक में कट्टरपंथी पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) द्वारा खड़ा किए गए हिजाब विवाद में भी ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड खड़ा हो गया। कर्नाटक हाईकोर्ट ने हिजाब मामले में फैसला दिया कि जहाँ यूनिफॉर्म लागू है, वहाँ कक्षा में हिजाब पहनकर नहीं जाया जा सकता और यूनिफॉर्म कोड को मानना आवश्यक है।

हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ AIMPLB खड़ा हो गया और इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का कहना था कि हाईकोर्ट ने कुरान और हदीस की गलत व्याख्या की है।

इस तरह ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड उन तमाम मुद्दों में प्रत्यक्ष या परोक्ष शामिल दिखता है, जिसमें भारतीय कानून और संविधान का माखौल उड़ाने की कोशिश की जाती है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ये सब मुस्लिम हितों के नाम पर करता है, जबकि उसके इन कारस्तानियों की वजह से मुस्लिम समाज का अन्य समाजों के साथ दूरियाँ बढ़ती जाती हैं। हालाँकि, मुस्लिम समाज दिन-ब-दिन सजग होता जा रहा है और AIMPLB को अपना हितैषी के रूप में अस्वीकार करते हुए उसके खिलाफ मुखर होता दिख रहा है।