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जुमे की नमाज पढ़ेंगे, होली का DJ बंद करो… रंग खेल रहे लोगों पर छतों से पत्थरबाजी: अब तक 3 को धर चुकी है UP पुलिस

होली में DJ बज रहा था। लोग मस्ती में झूम रहे थे। तभी कुछ कट्टरपंथी मानसिकता के लोगों ने पथराव कर दिया। और यह हुआ उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले में। पथराव के कारण आदेश और बंटी नाम के 2 लोगों के घायल होने की सूचना है।

विवाद जुमे की नमाज के समय होली में बज रहे DJ को बंद करवाने की जिद के बाद शुरू हुआ। पुलिस ने इस मामले में अब तक 3 आरोपितों को गिरफ्तार किया है। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस फुटेज के आधार पर पुलिस बाकी आरोपितों को चिन्हित कर के उनकी तलाश कर रही है। घटना 18 मार्च (शुक्रवार) की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मामला अमरोहा कोतवाली क्षेत्र के मोहल्ला छंगा दरवाजा का है। आबादी के हिसाब से यह इलाका मिश्रित क्षेत्र माना जाता है। यहीं पर हिन्दू समुदाय का एक मंदिर और धर्मशाला है। कुछ ही दूरी पर एक मस्जिद है। होली के दिन दोपहर में लगभग डेढ़ बजे अबीर-गुलाल खेल रहे हिन्दू समाज के लोग DJ पर डांस भी कर रहे थे। इसी दौरान जुमे की नमाज के लिए पहुँचे नमाजियों ने DJ बंद करने को कहा।

होली खेल रहे लोगों ने DJ बंद करने से मना किया तो मामला वाद-विवाद तक पहुँच गया। कुछ ही देर बाद दोनों पक्षों में झड़प शुरू हो गई। इस दौरान एक पक्ष छतों पर चढ़ कर पत्थरबाजी करने लगा। पथराव में होली खेल रहे 2 युवक घायल हो गए।

पत्थरबाजी की इस घटना का वीडियो किसी ने बना कर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। कुछ ही देर में पुलिस ने पहुँच कर हालात को संभाला। मौके पर भारी फ़ोर्स की तैनाती कर दी गई है। घटनास्थल पर फिलहाल शांति है। इसी घटना का बता कर वायरल हो रहे एक अन्य वीडियो में छतों के साथ गलियों में भी पथराव होता देखा जा सकता है।

पथराव में घायल हुए युवक की पत्नी के मुताबिक, “DJ पर गाना चल रहा था – आएँगे तो योगी ही। तभी पीछे से सारे मुसलमान लोग आ गए। फिर इनके खून ही खून हो गया। इन्होंने (मुस्लिमों) ने खूब पथराव किया। हमारे घर तक पत्थर चले हैं।”

PM मोदी 6% और आगे, विश्व के लोकप्रिय नेता में टॉप पर: बांग्लादेशियों को बचाने के लिए शेख हसीना ने दिया धन्यवाद

युद्धग्रस्त यूक्रेन (Russia-Ukraine War) से भारतीय छात्र-छात्राओं को बचाने के साथ बांग्लादेशी वहाँ से नागरिकों को निकालने पर बांग्लादेशी की प्रधानमंत्री शेख हसीना (Bangladesh PM Sheikh Hasina) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) को एक बार फिर आभार जताया है। हसीना ने इसे भारत-बांग्लादेश के स्थायी संबंधों का परिचायक बताया है।

हसीना ने 15 मार्च को पीएम मोदी को लिखे पत्र में कहा, “मैं यूक्रेन के सूमी में फँसे भारतीयों के साथ कुछ बांग्लादेशी नागरिकों को बचाने और वहाँ से निकालने में खुले दिल से मदद के लिए आपको और आपकी सरकार को हृदय से आभार व्यक्त करती हूँ। यह सहायता दोनों देशों के बीच स्थायी और अद्वितीय संबंधों की परिचायक है” 

हसीना ने पत्र में होली की बधाई देते हुए पीएम मोदी के अच्छे स्वास्थ्य की कामना की। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश और भारत दोनों हमेशा एक-दूसरे के साथ खड़े रहेंगे और लोगों की सामूहिक आकांक्षाओं को साकार करने के लिए मिलकर काम करेंगे। हसीना ने 9 मार्च को भी प्रधानमंत्री मोदी को धन्यवाद दिया था।

दरअसल, यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन गंगा शुरू किया था और 18,000 से अधिक अपने नागरिकों को वहाँ से बाहर निकाला था। इस दौरान भारत ने अपने पड़ोसी देशों नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान के नागरिकों को भी निकाला। अपने ऑपरेशन के दौरान भारत ने बांग्लादेश के 9 नागरिकों को यूक्रेन से रेस्क्यू किया था।

भारत सरकार द्वारा रेस्क्यू किए जाने के बाद यूक्रेन में फँसी पाकिस्तान की छात्रा आसमां शफीक ने भारत सरकार और पीएम मोदी की तारीफ की थी। आसमा ने कहा था, “मैं कीव में भारतीय दूतावास को धन्यवाद करती हूँ। भारतीय दूतावास ने कठिन स्थिति में भी हमारा सपोर्ट किया है। मैं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी धन्यवाद देती हूँ। उम्मीद है कि हम लोग भारतीय दूतावास की वजह से सुरक्षित घर पहुँच जाएँगे।”

28 फरवरी 2022 को प्रधानमंत्री कार्यालय कहा था कि भारत अपने नागरिकों को निकालते समय यूक्रेन में फँसे अपने पड़ोसी देशों के नागरिकों की भी मदद करेगा। ये पहली बार नहीं है जब भारत किसी विपत्ति में अन्य मुल्कों के नागरिकों के काम आ रहा हो। साल 2015 में युद्धग्रस्त यमन से अपने नागरिकों को निकालने के दौरान भी भारत ने अन्य देशों के 1947 लोगों को बचाया था।

वैश्विक नेता के रूप में उभरे पीएम मोदी

अपने लोगों के प्रति समर्पण और पड़ोसियों के प्रति सद्भाव के कारण प्रधानमंत्री मोदी एक मजबूत वैश्विक नेता के रूप में उभरे हैं। पीएम मोदी की यह छवि दिन-ब-दिन और सशक्त होती जा रही है। आज पीएम मोदी विश्व के तमाम बड़े नेताओं को पीछे छोड़ते हुए सबसे लोकप्रिय नेता बने हुए हैं।

पिछले साल नवंबर में मॉर्निंग कंसल्ट की ओर से जारी ग्लोबल लीडर अप्रूवल रेटिंग में पीएम मोदी 70 फीसदी अप्रूवल के साथ शीर्ष पर थे। पीएम मोदी को दुनिया भर में वयस्कों के बीच सबसे ज्यादा रेटिंग मिली है। यह डेटा साल 2019 से जुटाया हुआ है। इस साल जनवरी में पीएम मोदी की अप्रूवल रेट बढ़कर 71 फीसदी पर पहुँच गया। सबसे नवीनतम सर्वे में पीएम मोदी की अप्रूवल रेटिंग 77 प्रतिशत पहुँच गई है।

इस रेटिंग में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन छठे स्थान पर और फ्रांस के राष्ट्रपति मैंकों 7वें स्थान पर हैं।

‘विश्व शक्ति के रूप में भारत आगे बढ़ रहा है’: आरिफ मोहम्मद खान ने धर्मनिरपेक्षता, मुस्लिम असुरक्षा, ‘डरा हुआ’ नैरेटिव पर गल्फ न्यूज को दिया करारा जवाब

गल्फ न्यूज के साथ एक साक्षात्कार में, केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने आईडिया ऑफ़ इंडिया और धर्मनिरपेक्षता के भारतीय मत पर बात की। वरिष्ठ पत्रकार शीला भट्ट ने उनका साक्षात्कार लिया। चर्चा के प्रमुख बिंदुओं में धर्मनिरपेक्षता, सांप्रदायिकता, अल्पसंख्यक स्थिति और मुस्लिम असुरक्षा के सवाल शामिल थे।

एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में भारत

पिछले कुछ वर्षों से एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में भारत की छवि के बारे में पूछे जाने पर, खान ने जवाब दिया कि जो लोग भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि पर सवाल उठाते हैं, उन्हें पता नहीं है कि भारत क्या है। यह मत भूलो कि दुनिया भर में, समाज पिछले 150 वर्षों में ही बहुल होने लगे और विविधता को स्वीकार करने लगे। बहुलवाद और विविधता के प्रति सहिष्णुता की यह घटना भारत के लिए नई नहीं है।

उन्होंने कहा, “…हमारी सभ्यता की यात्रा विविधता और बहुलवाद की स्वीकृति के साथ शुरू हुई – प्रकृति के नियम के रूप में। भारत भारतीय सभ्यता की स्थापना के बाद से बहुलवादी रहा है… भारतीयों ने भारत में यहूदियों के आने से बहुत पहले और ईसाइयों के भारत आने से बहुत पहले बहुलतावाद अपनाया था… इसलिए भारतीय समाज में, भले ही आप बहुत प्रयास करें, विविधता और बहुलवाद की स्वीकृति इतनी गहराई से गुथी है कि कोई इसे अलग नहीं किया जा सकता।”

असुरक्षित अल्पसंख्यक

भारत में अल्पसंख्यकों के एक वर्ग में असुरक्षा के प्रश्न पर उन्होंने सबसे पहले “अल्पसंख्यक” शब्द का खंडन किया। उन्होंने कहा, “मैं अल्पसंख्यक शब्द का उपयोग नहीं करना चाहूँगा क्योंकि अंग्रेजों ने इसे पेश किया था। संवैधानिक व्यवस्था ऐसी थी कि ये शब्द गढ़े गए – बहुमत और अल्पसंख्यक।”

“अंग्रेजों ने भारत को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता देने से इनकार कर दिया, उन्होंने हमेशा कहा कि आप केवल अपने समुदाय की ओर से ही बोल सकते हैं। उन्हें लगा कि किसी को भी देश की ओर से बोलने का अधिकार नहीं है… उन्होंने कहा, “लेकिन जहाँ तक ​​भारत के संविधान का सवाल है, बिल्डिंग ब्लॉक, यूनिट ‘नागरिक’ है। यह समुदाय नहीं है।” आरिफ मोहम्मद खान ने स्पष्ट किया कि संविधान में समुदाय एक इकाई नहीं है और यह व्यक्ति के अधिकार को केवल अंतःकरण की स्वतंत्रता के अधिकार को मान्यता देता है।

2014 से हिंदू मुस्लिम संबंध

बाद में, शीला भट्ट ने सवाल किया कि क्या उनका मानना ​​है कि 2014 के बाद से हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक संबंधों में पर्याप्त बदलाव आया है। खान ने इस प्रश्न पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, “इतिहास में एक समय बताएँ जब यह विशेष वर्ग संदिग्ध महसूस नहीं करता था, असुरक्षित महसूस नहीं करता था। मुझे इतिहास में कभी भी समय दें। इस देश का बँटवारा क्यों किया गया?”

आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि चूँकि देश के अलग होने के मूल में असुरक्षा थी, इसलिए यह एक नया सवाल कैसे हो सकता है? और 2014 से डर या चिंता व्यक्त करने वाले इन लोगों ने पंडित जवाहर लाल नेहरू के बारे में वही चिंता कैसे व्यक्त नहीं की?

“एक निश्चित वर्ग है जो पीड़ित होने का दावा करता रहता है। यही मानसिकता बनी रहती है और विभाजन के बीज बोती है। मैं अपनी समस्याओं के लिए अंग्रेजों को दोष देने के लिए यह बयान नहीं दे रहा हूँ क्योंकि कोई आपका शोषण तभी कर सकता है जब आप शोषक हों।

भारत का भविष्य

भारत के भविष्य को लेकर अपनी चिंता के सवाल पर उन्होंने कहा, “मुझे भारत के भविष्य के बारे में कोई चिंता नहीं है। विश्व शक्ति के रूप में उभरने के लिए भारत बहुत प्रभावी ढंग से आगे बढ़ रहा है। और पूरी दुनिया भारत की क्षमता को पहचानने जा रही है।”

उन्होंने अंत में कहा, “…मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि हम पहले ही उस स्तर पर पहुँच चुके हैं लेकिन हर कोई भारत की क्षमता को पहचान रहा है, स्वीकार कर रहा है। आज विश्व की प्रमुख बहुराष्ट्रीय कंपनियों में भारतीय शीर्ष पर हैं। लोग भारतीयों पर भरोसा करते हैं।”

फिल्म के शुरू में दिखने वाले हिंदू लड़के ने ‘द कश्मीर फाइल्स’ देखने के बाद बताई असल जिंदगी की वो घटना: वीडियो वायरल

कश्मीर के हिंदू लड़के का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस वीडियो में कश्मीरी लड़का बता रहा है कि ‘द कश्मीर फाइल्स (The Kashmir Files)’ के शुरुआत में दिखाया गया दृश्य उसकी बपचन की याद को ताजा कर दिया। लड़का बता रहा है कि उसने एक बच्चे के रूप में कश्मीर में इस दृश्य को उसने अपनी आँखों से देखा था।

लड़का बताता है, “आपने देखा होगा कि फिल्म एक बच्चे के साथ खुलती है, है ना? एक बच्चा भीड़ द्वारा पकड़ा जाता है और मारा जाता है। वह बच्चा मैं था।” फिल्म के शुरुआती दृश्य में बाल कलाकार ‘पृथ्वीराज सरनाइक’ (जिन्होंने ‘शिव’ का किरदार निभाया है) को पाकिस्तान के खिलाफ भारत की जीत की जयकार करने पर इस्लामवादियों द्वारा हमला करते हुए दिखाया गया था।

भीड़ में शामिल एक महिला कहती है, “वह आप थे? हे भगवान।” तब लड़के ने कहा, “हाँ! उस समय मैं 10 साल का था।”

लड़के ने जोर देकर कहा, “उन्होंने (फिल्म निर्माताओं ने) अलग-अलग कहानियों को आपस में जोड़ दिया और एक कहानी बनाई, क्योंकि हर (बच्चे) पर कहानी बनाना संभव नहीं है?”

अपने बचपन के इस घटना को याद करते हुए लड़के ने कहा, “मुझे याद है कि पाकिस्तान और भारत के बीच का मैच था और पाकिस्तान ने मैच जीत लिया था। मैं सड़कों से गुजर रहा था और भीड़ ने मुझे घेर लिया। जेब में कुछ पैसे थे। उन्होंने पटाखे खरीदने के लिए पैसे ले लिए।”

उस लड़के को सांत्वना दे रही एक महिला ने कहा, “जो वीभत्स घटना हुई है, उसे दिखाना संभव नहीं है। कश्मीरी पंडितों के साथ जो हुआ है, उसे चित्रित करने का यह शायद सबसे हल्का तरीका था। वास्तविक कहानियाँ कहीं अधिक भयावह हैं।”

1990 में हुए कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार को बताती है ‘कश्मीर फाइल्स’ फिल्म

‘द कश्मीर फाइल्स’ कश्मीरी पंडितों के साथ घटित सच्ची घटनाओं पर आधारित है। यह फिल्म दर्शकों को 1989 के दौर में ले जाती है, जब इस्लामिक जिहाद के बढ़ने के कारण कश्मीर में संघर्ष छिड़ गया था। इसके कारण अधिकांश हिंदुओं को घाटी से भागने के लिए मजबूर होना पड़ा।

एक अनुमान के मुताबिक, घाटी के कुल 1,40,000 कश्मीरी पंडित निवासियों में से लगभग 1,00,000 लोग 1990 के फरवरी और मार्च के बीच पलायन कर गए। उनमें से अधिकांश उसी साल घाटी को छोड़ दिया, जबकि उसके बाद भी यह सिलसिला जारी रहा। साल 2011 तक लगभग 3,000 कश्मीरी पंडित परिवार घाटी में बचे रह गए।

यह फिल्म कश्मीर से विस्थापित परिवारों के साक्षात्कार और वहाँ के हालात पर गहन रिसर्च करने के बाद बनाई गई है। यह फिल्म 11 मार्च को सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी।

‘कोलकाता के थिएटर में मुस्लिमों ने किया हंगामा, 15 मिनट तक रूकी द कश्मीर फाइल्स की स्क्रीनिंग’: जानिए क्या है वायरल वीडियो की सच्चाई

सोशल मीडिया पर कोलकाता में टालीगंज क्षेत्र में आने वाले नवीना सिनेमा हाल में 16 मार्च, 2022 (बुधवार) को द कश्मीर फाइल्स फिल्म के दौरान का बता कर एक वीडियो वायरल हो रहा है। इस घटना को ले कर तमाम तरह की बातें कही जा रही हैं। कुछ लोगों द्वारा बताया जा रहा है कि मुस्लिमों ने इस फिल्म के खिलाफ प्रदर्शन किया था। हालाँकि, थिएटर के मालिक ने इस बात से इनकार करते हुए कहा कि यह विवाद 2 लोगों द्वारा फोन पर ऊँची आवाज में बात करने के चलते हुआ है।

इंडिया TV के पत्रकार मनीष भट्टाचार्य द्वारा किए गए ट्वीट के मुताबिक, कुछ लोगों ने सिनेमा हाल के अंदर प्रदर्शन किया, इसके चलते फिल्म 15 मिनट रोकनी पड़ी। मनीष के मुताबिक बाद में प्रदर्शनकारियों को थिएटर के बाहर निकाला गया।

अलग – अलग लोगों के अलग – अलग बयान

जैसे ही वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वैसे ही इस मामले में अलग – अलग बयान आने लगे। ट्विटर यूजर @HindutvaTeam ने लिखा, “मुस्लिमों की भीड़ ने कोलकाता के नवीना सिनेमा हॉल में द कश्मीर फाइल्स फिल्म को जबरन रुकवा दिया। जब हिन्दुओं ने विरोध किया तब 30 मिनट बाद जा कर फिल्म शुरू हो पाई।”

वहीं सिर्फ न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक, “नवीना सिनेमा हॉल के स्टॉफ ने कहा कि कुछ मुस्लिमो ने हॉल के अंदर फिल्म के दौरान प्रदर्शन किया। पुलिस ने भी कहा कि फिल्म को झूठे तथ्यों पर आधारित बता कर नारेबाजी हुई। मौके पर 2 सम्प्रदायों के बीच तनाव फ़ैलने की आशंका हो गई। इसके चलते फिल्म को 15 मिनट के लिए रोक दिया गया।”

सिर्फ न्यूज़ के एडिटर का स्क्रीनशॉट (साभार ट्विटर)

पुलिस सूत्रों के आधार पर आज तक द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया, “मामला बुधवार (16 मार्च) का है। 3 व्यक्ति पहली लाइन में बैठे थे जिन्होंने सिनेमा हॉल में ही प्रदर्शन करना शुरू कर दिया। वो फिल्म को बैन करने की भी माँग कर रहे थे। इस बात को ले कर उन तीनों और बाकी दर्शकों में विवाद खड़ा हो गया। बाद में उन तीनों को थिएटर स्टॉफ ने बाहर निकाल दिया। इसके चलते लगभग 15 मिनट फिल्म को रोकना पड़ा था।”

आज तक द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

इसी प्रकरण में आनंद बाज़ार पत्रिका द्वारा थिएटर मालिक नवीन चोखानी को सम्पर्क किया। थिएटर मालिक ने सिनेमा हॉल में किसी भी प्रकार के प्रदर्शन, हंगामे से इंकार किया। नवीन चोखानी ने बताया, “फिल्म इसलिए रोकनी पड़ी क्योंकि हॉल में मौजूद 2 लोग लगातार फोन पर बातें कर रहे थे। उन्हें ऐसा करने से कई बार मना किया गया लेकिन वो नहीं माने। आख़िरकार उन दोनों को सिनेमा हॉल से बाहर करना पड़ा।”

आनंदबाजार पत्रिका रिपोर्ट स्क्रीनशॉट

वहीं ऑपइंडिया ने नवीन सिनेमा हॉल के मालिक को फोन मिलाया। फोन एक व्यक्ति ने उठाया जिसने अपनी पहचान बताने से मना कर दिया। उसने कहा, “उसे कुछ भी पता नहीं। जब ये घटना हुई तब वो मौके पर मौजूद नहीं था। इस बारे में किसी को कोई आईडिया नहीं है।”

गौरतलब है कि द कश्मीर फाइल्स आतंकवाद पीड़ित कश्मीरी पंडितों के जीवन पर आधारित है। यह लोगों को सन 1989 में कश्मीर के हालात से परिचित करवाती है। ये उस समय की कहानी है जब आतंकवाद से परेशान लाखों हिन्दुओं को कश्मीर छोड़ना पड़ा था।

झूठ के सहारे अब्बा को बचाने उतरे उमर, फारूक अब्दुल्ला के CM रहते घाटी में चरम पर पहुँचा था आतंक: अब कश्मीर फाइल्स पर निकाली भड़ास

कश्मीर में हिंदुओं के नरसंहार के एक छोटे से हिस्से पर बनी फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स (The Kashmir Files)’ ने सिर्फ बॉलीवुड गैंग को ही सकते नहीं डाला है, बल्कि उस दौर के राजनेताओं और उनके काले चेहरे को भी जनता के सामने ला दिया है। चेहरे की इस कालिख को पोछने की जुगत की जा रही है और फिल्म को ही बकवास, झूठ, प्रोपेगेंडा आदि ना जाने कितने नाम देकर इसे खारिज करने की कोशिश की जा रही है।

कश्मीर घाटी की सच्चाई लेकर सारे हिंदूविरोधी एक स्वर में बोल रहे हैं और सबकी भाषा लगभग एक जैसी है। चाहे वह बॉलीवुड हो, आतंकी हों, अलगावादी समर्थक हों, जेहादी हों या घृणा की राजनीति करने वाले राजनेता, सारे फिल्म के तथ्यों को झूठलाने पर तुले हैं या फिर उसका दोष जगमोहन या दिवंगत प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह (VP Singh) पर मढ़ने पर तुले हैं।

कश्मीर फाइल्स फिल्म को लेकर फारूक अब्दुल्ला (Farooq Abdullah) के बाद अब उनके बेटे उमर अब्दुल्ला (Omar Abdullah) बयान दिया है। उमर ने कहा, “द कश्मीर फाइल्स फिल्म में कई झूठी बातें दिखाई गई हैं। उस दौरान फारूक अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के सीएम नहीं थे। वहाँ राज्यपाल शासन था। देश में वीपी सिंह की सरकार थी, जिसे बीजेपी का समर्थन हासिल था।”

दो दिन पहले ही उमर के अब्बा और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे फारूक अब्दुल्ला ने परोक्ष रूप से इस मामले के लिए जगमोहन को दोषी ठहरा दिया था। उन्होंने कहा था, “मैं आज इस पूरे प्रकरण की जाँच की माँग करता हूँ। पता चलना चाहिए कि कश्मीरी पंडितों का पलायन कैसे हुआ? उनकी हत्याएँ क्यों हुई? यह किसकी साजिश थी? इसके लिए एक निष्पक्ष जाँच जरुरी है।”

फारूक ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज से इसकी जाँच कराई जानी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने जगमोहन की फाइल खोलने की भी माँग की। केंद्र सरकार को कश्मीरी पंडितों की कश्मीर में सम्मानजनक और सुरक्षित वापसी के लिए तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए।

कश्मीर की राजनीति में फारूक अब्दुल्ला की विरोधी पीडीपी की मुखिया और कश्मीरी नरसंहार के वक्त केंद्रीय गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी महबूबा मुफ्ती कश्मीरी हिंदुओं की बात पर फारूक के साथ खड़ी नजर आती हैं।

इधर फारूक ने कश्मीरी हिंदुओं के हालात के लिए तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन पर ठीकरा फोड़ा, उधर महबूबा ने शर्मिंदगी जाहिर करने के बजाय हिंदुओं की भावनाओं के साथ खेलने का केंद्र पर आरोप मढ़ दिया। महबूबा ने लिखा, “भारत सरकार जिस तरह कश्मीर फाइल्स को आक्रामक रूप से बढ़ावा दे रही है और कश्मीरी पंडितों के दर्द को हथियार बना रही है, उससे उनकी मंशा साफ हो जाती है। पुराने घावों को भरने और दो समुदायों के बीच अनुकूल माहौल बनाने के बजाय जानबूझकर खाई पैदा कर रही है।”

फारूक ने पाक ट्रेंड आतंकियों को छोड़ घाटी को सुलगाने में मदद की

लेकिन, जम्मू-कश्मीर के पुलिस महानिदेशक (DGP) रहे शेष पॉल वैद ने खुलासा किया कि पाकिस्तान ने प्रशिक्षण देने के बाद 70 आतंकियों वाले पहले जत्थे को जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद फैलाने के लिए भेजा था, उसे 1989 में तत्कालीन मुख्यमंत्री और इन्हीं उमर अब्दुल्ला के अब्बा फारूक अब्दुल्ला ने रिहा कर दिया था। ये आतंकी आगे चलकर अलग-अलग आतंकी संगठनों का नेतृत्व किया और घाटी में आतंकी और हिंदुओं के नरसंहार को अंजाम दिया।

अपने शासनकाल में जिन खूंखार आतंकियों को फारूक अब्दुल्ला ने छोड़ा था, उनमें से कुछ नाम हैं- त्रेहगाम का मोहम्मद अफजल शेख, रफीक अहमद अहंगर, मोहम्मद अयूब नजर, फारूक अहमद गनी, गुलाम मोहम्मद गुजरी, फारूक अहमद मलिक, नजीर अहमद शेख और गुलाम मोहीउदीन तेली।

पूर्व डीजीपी वैद ने कि फारूक ने स्पष्ट कहा कि अगर फारूक ने इन आतंकियों को छोड़ा था, इसका मतलब यह नहीं कि तत्कालीन केंद्र सरकार को इसकी जानकारी नहीं होगी। फारूक अब्दुल्ला ने जुलाई से दिसंबर 1989 के बीच इन आतंकियों को छोड़ा था और उस दौरान केंद्र में कॉन्ग्रेस की सरकार थी और राजीव गाँधी प्रधानमंत्री थे। राजीव गाँधी अक्टूबर 1984 से दिसंबर 1989 तक देश के प्रधानमंत्री थे।

उमर अब्दुल्ला का झूठ

उमर अब्दुल्ला ने कहा कि जब कश्मीरी हिंदुओं का नरसंहार और पलायन हुआ, तब उनके अब्बा मुख्यमंत्री नहीं थे। उमर का बयान पूरी तरह से झूठ पर आधारित है। फारूक अब्दुल्ला 7 नवंबर 1986 से 19 जनवरी 1990 तक जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री थे। 19 जनवरी कश्मीरी हिंदुओं के इतिहास का वही काला दिन है, जब घाटी के हर मस्जिद से इस्लाम अपनाकर मुस्लिम बनने या औरतों को घाटी में छोड़कर सारे हिंदू पुरुषों को कश्मीर के चले जाने का ऐलान किया गया था। इसके बाद नरसंहार अपने चरम पर पहुँच गया था।

इसके पहले 1989 में फारूक अब्दुल्ला आतंकियों को छोड़कर उन्हें प्रोत्साहित किया था और उन्होंने सबसे पहले संघ के नेता टीकाराम टपलू की हत्या 14 जुलाई 1989 को की थी। इसके बाद तो नरसंहार का चरम पर पहुँच गया था। ऐसा कोई दिन नहीं होता, जब घाटी में दो-चार हिंदुओं की हत्या और महिलाओं का बलात्कार कर उनकी लाशें सड़कों पर नहीं फेंक दी जाती।

उमर अब्दुल्ला का यह यह कहना कि उनके अब्बा उस समय मुख्यमंत्री नहीं थे, अपने अब्बा के खूनी चेहरे को ढँकने की कोशिश है। 7 नवंबर 1986 को फारूक अब्दुल्ला के मुख्यमंत्री के बाद घाटी के हवाएँ पूरी तरह बदलनी शुरू हो गई थीं। हिंदुओं को शक की नजरों से देखा जाने लगा था, हमले आम बात हो गए थे। मुख्यमंत्री बनने के दौरान हिंदुओं की हत्या की छिटपुट घटनाएँ फारूक के पद त्याग करते समय पूरे नरसंहार में बदल चुकी थीं।

इसके पहले 1984 में इसकी नींव रख दी जा चुकी थी। 1984 में फारूक को हटाकर गुल शाह को इंदिरा गाँधी ने जम्मू-कश्मीर का सीएम बनवाया था। शाह ने जम्मू के न्यू सिविल सेक्रेटेरिएट एरिया के एक प्राचीन मन्दिर परिसर के भीतर मस्जिद बनाने की अनुमति दे दी, ताकि मुस्लिम कर्मचारी नमाज पढ़ सकें। इस फैसले का जम्मू में विरोध हुआ और दंगे भड़क गए और इसका असर घाटी में खूब हुआ। इसके बाद 18 अप्रैल 1986 को शारजाह में खेला गया भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच में पाकिस्तान की जीत के साथ। पाकिस्तान की जीत के बाद पाकिस्तान के साथ-साथ घाटी में बड़े पैमाने पर जश्न मनाए गए और हिंदुओं पर हमले किए गए।

साल 2017 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीर के युवाओं से पर्यटन और आतंकवाद में एक चुनने की बता कहते हुए पत्थरबाजी छोड़ने की अपील की थी, तब भी फारूक ने युवाओं को उकसाया था। फारूक अब्दुल्ला ने कहा था कि कश्मीर के युवा पर्यटन के लिए नहीं, अपने देश के लिए लड़ रहे हैं। यह उनके देश के लिए लड़ाई है। जाहिर तक फारूक का आतंकियों और आतंकवाद से मोह ना छूटा है और माया टूटी है। अपने अब्बा का बचाव कर उमर अपना दीन निभा रहे हैं।

जब जुमे पर कश्मीर में इस्लामी फतह की थी प्लानिंग, लेकिन जगमोहन ने कर दिया नेस्तनाबूद: वो तारीख जिसकी कहानी नहीं सुनाई जाती

जम्मू कश्मीर में इस्लामी आतंक को कैसे खाद-पानी मिला, कैसे हिंदुओं के नरसंहार को अंजाम दिया गया, इसके कई पन्ने विवेक अग्निहोत्री की फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ ने खोल दिए हैं। इसके बाद से कॉन्ग्रेस और कश्मीर की पारिवारिक पार्टियाँ (नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी) अपने पाप छिपाने के लिए पूरे विवाद में जगमोहन का नाम घसीट रही है। वैसे यह पहली बार नहीं है जब कश्मीर के इस्लामी आतंकियों के बचाव और हिंदुओं पर हुई ज्यादती पर पर्दा डालने के लिए इन लोगों ने जगमोहन का नाम घसीटा है। हम आपको बता चुके हैं बाद में बीजेपी में शामिल हुए जगमोहन (वाजपेयी सरकार में मंत्री भी रहे), कभी नेहरू-गाँधी परिवार के कितने करीबी थे। उन्हें जम्मू-कश्मीर पहली पार कॉन्ग्रेस ने ही भेजा था। हम यह भी बता चुके हैं कि क्यों कश्मीर से अपना घर छोड़कर भागने को मजबूर किए गए हिंदू जगमोहन को आज भी अपना मसीहा मानते हैं।

कड़क नौकरशाह जगमोहन का पूरा नाम जगमोहन मल्होत्रा था। वे अब इस दुनिया में नहीं हैं। 2021 की मई में उनका देहांत हो गया था। लेकिन, कश्मीर के अनुभवों को लेकर उन्होंने काफी कुछ लिखा है। कश्मीर पर उन्होंने चर्चित किताबें भी लिखी हैं। इन किताबों में जो कुछ दर्ज हैं वे बताते हैं कि 19 जनवरी 1990 (यह तारीख कश्मीरी पंडितों के पलायन को लेकर चर्चित है) के बाद की 26 जनवरी को लेकर भी इस्लामी आतंकियों ने तगड़ी प्लानिंग की थी। उनके मंसूबों को विफल कर जगमोहन ने कश्मीर को कैसे बचाया था, यह जानने से पहले उनके एक पत्र के कुछ अंश पढ़िए;

आदरणीय राष्ट्रपति जी,
ठीक दस दिन पहले मैंने अपना कार्यभार संभाला था। तब से अब तक मैं एक छोटी रिपोर्ट लिखने के लिए दस मिनट का समय भी ​नहीं निकाल सका। स्थिति इतनी गंभीर और संकटपूर्ण थी।
… यह वाकई चमत्कार था कि 26 जनवरी को काश्मीर बचा लिया गया और हम राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय शर्मिंदगी उठाने से बच गए। इस दिन की कहानी लम्बी है और यह बाद में पूरे ब्यौरे के साथ बताई जानी चाहिए।
… मैंने 26 जनवरी को हुई घटनाओं में अपनी भूमिका पूरी तरह अदा की है और मुझे इसका गर्व है। लेकिन अपना काम जारी रखना मेरे लिए कठिन हो जाएगा यदि यह प्रभाव बना रहा कि जनता में मुझे पूरा समर्थन नहीं प्राप्त है। पहले से ही मुझे एक टूटा और बिखरा प्रशासन मिला है। यदि कमांडर पर ही हर रोज छिप कर वार किया जाए तो सफलता का क्या अवसर रह जाता है इसकी कल्पना की जा सकती है।
… कामचलाऊ समाधानों या सुगम रास्तों का सहारा लेना आत्मघाती नहीं तो गलत जरूर होगा। विष महत्वपूर्ण अंशों तक पहुॅंच चुका है। जब तक कि उसे पूरी तरह समाप्त नहीं किया जाता, हम एक संकटपूर्ण स्थिति से दूसरी में ही लड़खड़ाते रहेंगे।
आपका
-जगमोहन

1990 के जनवरी के आखिरी दिनों में जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन द्वारा राष्ट्रपति को लिखे इस पत्र की चुनिंदा पंक्तियों को पढ़कर, आपको उस समय के हालात का अंदाजा लग गया होगा। श्रीनगर से लेकर दिल्ली की सियासत का अहसास भी हो रहा होगा। यह भी समझ गए होंगे कि 1990 की वह 26 जनवरी भारत के लिए कितनी महत्वपूर्ण थी। पत्र में जगमोहन जिस चीज को चमत्कार बता रहे हैं, आखिर वे परिस्थितियाँ क्या थी? ये जानने से पहले इस पर नजर डालते हैं कि दूसरी बार जगमोहन को किन परिस्थितियों में राज्यपाल बनाकर जम्मू-कश्मीर भेजा गया था।

19 जनवरी 1990, वह मनहूस रात जब घाटी के हर मस्जिद से एक ही आवाज आ रही थी कि हमें कश्मीर में हिंदू औरतें चाहिए, लेकिन बिना किसी हिंदू मर्द के। वो रात जब हिंदुओं को केवल तीन विकल्प दिए गए थे। पहला, कश्मीर छोड़कर भाग जाओ। दूसरा, धर्मांतरण कर लो। तीसरा, मारे जाओ। वो रात जिसने मानवीय इतिहास के सबसे बड़ी पलायन त्रासदियों में से एक का दरवाजा खोला। जिसके कारण करीब 4 लाख कश्मीरी हिंदू जान बचाने के लिए अपना घर, अपनी संपत्ति अपने ही देश में छोड़कर भागने को मजबूर हुए। वे आज भी जड़ों की ओर लौटने का इंतजार ही कर रहे हैं।

उसी शाम, यानी 19 जनवरी 1990 की शाम को ही जगमोहन ने राज्यपाल पद की शपथ ली थी। कश्मीर: समस्या और समाधान में जगमोहन लिखते हैं, “अचानक विमान झटके के साथ नीचे झुका। ऐसा बाहरी हवा में दबाव के अन्तर के कारण हुआ। सीमा सुरक्षा बल का वह छोटा से विमान उसे आसानी से झेल नहीं सकता था। पूरा विमान काँप उठा और उसके साथ मेरी विचारधारा भी। शायद इसने मुझे संस्मरण दिलाया कि मैं ऐसे राज्य में जा रहा हूँ जो अशांति और दहशत में फँसा है। यह 19 जनवरी 1990 की दोपहर थी। मैं विमान द्वारा दूसरी बार जम्मू-कश्मीर जा रहा था।”

ऐसे हालात में पहुॅंचे जगमोहन ने शाम में शपथ ली। जितने स्थान का प्रबंध किया गया था उससे कहीं अधिक लोग जुटे थे। लेकिन कॉन्ग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस ने इस शपथ ग्रहण समारोह का बहिष्कार किया था। बकौल जगमोहन, मैं उनका उद्देश्य समझ नहीं सका। यह घाटी को बचाने का समय था या मेरी परेशानियों में एक और अड़ॅंगा लगा राजनैतिक फायदा उठाने का? शपथ लेने के बाद जगमोहन अपने स्वभाव के विपरीत पहले से तैयार एक भाषण देते हैं। जिसका लबोलुबाब था- यह ‘गवर्नर रूल’ नहीं, ‘गवर्नर सर्विस’ है। एक नर्स की तरह मरीज को प्यार, दुलार और सेवा दी जाएगी ताकि वह स्वस्थ हो और शांति से रचनात्मक जीवन जी सके।

बावजूद इसके जो कुछ हुआ उसकी कहानी आज खुद कश्मीर हिंदू आगे आकर बता रहे है। जगमोहन ने भी लिखा है कि पहले ही दिन आतंकवादियों, पाकिस्तान समर्थित तत्वों, कट्टरपं​थी और सांप्रदायिक तत्वों तथा राजनीतिक और शासकीय निहित तत्वों ने अपने-अपने तरीके से उन्हें कमजोर और पंगु बनाने का निर्णय कर लिया था। लेकिन सिलसिला इसके बाद भी थमा नहीं। जगमोहन लिखते हैं कि मस्जिदों के लाउडस्पीकर से इस्लामी नारे सुनाई दे रहे थे। आसपास के गाँवों से लोग शहरों में इकट्ठा हो रहे थे। उन्हें लगता था कि आजादी बस आ ही चुकी है। कश्मीर में तियनमान स्क्वेयर और ब्लू स्टार दोहराने की बातें हो रही थीं। फिर धीरे-धीरे भयावह शांति छा गई। लेकिन, जगमोहन की असली चुनौती 26 जनवरी को इंतजार कर रही थी। अंतिम प्रहार उसी दिन होना था।

साजिश

उस साल की वह 26 जनवरी जुमे के दिन थी। ईदगाह पर 10 लाख लोगों को जुटाने की योजना बनाई गई थी। मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से लोगों को छोटे-छोटे समूह में ईदगाह पहुँचने को उकसाया जा रहा था। श्रीनगर के आसपास के गाँव, कस्बों से भी जुटान होना था। योजना थी कि जोशो-खरोश के साथ नमाज अता की जाएगी। आजादी के नारे लगाए जाएँगे। आतंकवादी हवा में गोलियाँ चलाएँगे। राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगा) जलाया जाएगा। इस्लामिक झंडा फहाराया जाएगा। विदेशी रिपोर्टर और फोटोग्राफर तस्वीरें लेने के लिए जमा रहेंगे। उससे पहले 25 की रात टोटल ब्लैक आउट की कॉल थी।

साभार: कश्मीर: समस्या और समाधान

उन्हें कामयाबी का पूरा गुमान था। वे जानते थे कि गणतंत्र दिवस होने के कारण आवाजाही पर कोई प्रतिबंध नहीं होगा। नेता और अधिकारी जम्मू में सलामी लेने में व्यस्त होंगे। स्थानीय अधिकारी कोई काम नहीं करेंगे। इस्लामी झंडा लहराते ही उनका सरेंडर करवाया जाएगा। तैयारियाँ पूरी थी और योजना पर गुप्त तरीके से अमल हो रहा था। उन्होंने अंतिम वक्त में हैरान कर देने के मंसूबे पाल रखे थे। 14 अगस्त, 1989 को वे इसका एक प्रयोग कर चुके थे। तब कुछ आतंकियों ने परेड की सलामी ली थी। पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस मनाया गया था। अखबारों में उस जश्न की ख़बरें और तस्वीरें छपी थीं। अगले दिन भारत के स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगे को सार्वजनिक रूप से जलाया गया था।

संदेश

26 जनवरी से दो दिन पहले अफवाह फैलाई गई कि अर्धसैनिक बलों ने कश्मीर आर्म्ड फोर्सेस के चार जवानों को मार गिराया है। ‘खून का बदला खून’ का आह्वान किया गया। 25 जनवरी की सुबह श्रीनगर में भारतीय वायुसेना के स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना और तीन अन्य अफसर की आतंकियों ने निर्मम हत्या कर दी। हत्या उस समय की गई जब वे ड्यूटी पर जाने के लिए गाड़ी का इंतजार कर रहे थे। आतंकियों ने संदेश दे दिया था।

साभार: कश्मीर: समस्या और समाधान

समर्पण

आतंकियों के हौसले बुलंद थे। उनके लिए आज़ादी बस कुछ घंटे दूर थी। उन्हें लग रहा था कि इस साजिश की भनक जगमोहन को नहीं लगेगी। लगी भी तो 10 लाख लोगों पर बल प्रयोग का जोखिम नहीं उठाया जाएगा। लेकिन, मजहबी उन्मादियों को घुटने पर लाने का प्लान पहले से तैयार था। उन्हें चौंकाते हुए जगमोहन ने 25 जनवरी की दोपहर ही कर्फ्यू लगा दिया। अपने कुछ विश्वस्त सहयोगियों को उसी शाम बता दिया कि वे सलामी लेने जम्मू नहीं जाएँगे। श्रीनगर में ही डेरा डाले रहेंगे। सभी सरकारी विभागों को आदेश दिए कि हर हाल में दफ्तरों में लाइटें जलनी चाहिए। हर हाल में स्ट्रीट लाइट ऑन रहनी चाहिए। इसके लिए पीडब्ल्यूडी और बिजली विभाग को विशेष आदेश दिए गए। शाम हुई तो बिजलियॉं जल उठीं। बकौल जगमोहन, आप इसे अथॉरिटी का सम्मान कहिए या डर, कर्मचारियों ने इसका पालन किया।

साभार: कश्मीर: समस्या और समाधान

इन लाइटों की रोशनी से जो गर्माहट पैदा हुई वह इस्लामिक आतंकवाद पर भारत की पहली मनोवैज्ञानिक जीत थी। इसने तय कर दिया कि जीतना भारत को ही है। कश्मीर को संविधान के आईन में ही चलना है, न कि किसी मजहबी उन्माद में जलना है।

(संदर्भ:My Frozen Turbulence In Kashmir, कश्मीर: समस्या और समाधान)

1 साल में 1.5 लाख लोगों की बची जान, वायु प्रदूषण से मौतों में 13% की कमी: PM मोदी की ‘उज्ज्वला’ का कमाल, रिसर्च से खुलासा

महिलाओं के स्वास्थ्य और हर घर तक गैस कनेक्शन पहुँचाने के लिए पिछले साल केंद्र की मोदी सरकार ने उज्जवला योजना (Ujjwala Yojna) 2.0 को लॉन्च किया था। सरकार के इस कार्यक्रम का यह असर देखने को मिल रहा है कि खाना पकाने के लिए LPG गैस के उपयोग के कारण साल 2019 में ही प्रदूषण से होने वाली मौतों में से 1.5 लाख लोगों की जान बचाई जा सकी है।

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के कारण उस वर्ष कम से कम 1.8 मिलियन टन पीएम 2.5 उत्सर्जन में कटौती का आकलन किया गया है।

पर्यावरण के क्षेत्र में लंबे वक्त से काम कर रहे अजय नागपुरे, रितेश पाटीदार और वंदना त्यागी लंबे वक्त से वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट (डब्ल्यूआरआई) इंडिया के लिए काम कर रहे हैं। ये स्टडी इन्हीं तीनों ने की है। नागपुरे आईआईटी रुड़की से पीएचडी किए हैं और पर्यावरण प्रदूषण पर 18 साल से काम कर रहे हैं। साल 2019 में भारत आने से पहले वो मिनेसोटा विश्वविद्यालय में ह्यूबर्ट हम्फ्रे स्कूल ऑफ पब्लिक अफेयर्स में सेंटर फॉर साइंस, टेक्नोलॉजी एंड एनवायरनमेंटल पॉलिसीज के साथ काम करते थे।

वंदना त्यागी भी एक पर्यावरण इंजीनियर हैं औऱ आईआईटी रुड़की में रिसर्च फेलो थीं। उसी संस्थान से 2017 में ग्रेजुएट हुए पाटीदार स्थाई स्वच्छ खाना पकाने के ऊर्जा समाधान, वायु प्रदूषण और संबंधित नीतियों पर शोध कर रहे हैं। इन रिसर्चर्स का मानना है कि उज्ज्वला योजना के जितने लाभ बताए जा रहे हैं असल में ये उससे कहीं अधिक हो सकते हैं।

द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत के दौरान नागपुरे ने कहा, “घरेलू खाना पकाने से बायोमास जलाने से वायु प्रदूषण में 30-40 प्रतिशत का योगदान हो सकता है। यहाँ लाभ का अनुमान केवल साल 2019 के लिए लगाया गया है। ऐसे ही लाभ बाद के सालों में भी हुए होंगे। हालाँकि, इसका पूरा डेटा अभी तक हमारे पास नहीं है। मैं कहूँगा कि उज्ज्वला योजना एयर क्वालिटी में सुधार औऱ वायु प्रदूषण से स्वास्थ्य जोखिमों को कम करने के लिए सबसे प्रभावी सरकारी योजना है।”

रिसर्च की मुख्य बातें

नागपुरे ने अपनी टीम के साथ उज्ज्वला योजना के कारण मौतों में आई कमी का आकलन करने के लिए ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज (GBD) स्टडी द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली कार्यप्रणाली को अपनाया, जिसे अक्टूबर 2020 में द लैंसेट में प्रकाशित किया गया था। जीबीडी की यह स्टडी यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन वाशिंगटन के सहयोग से की गई, जिसमें यह दावा किया गया था कि वायु प्रदूषण दुनिया का चौथा सबसे बड़ा हत्यारा है, जिसके कारण 2019 में लगभग 6.67 मिलियन मौतें हुई थी। उस स्टडी में यह भी पता चला था कि भारत में घरेलू वायु प्रदूषण के कारण ही 2019 में 6.1 लाख मौतें हुई थीं।

नागपुरे की टीम के रिसर्च के मुताबिक, बायोमास के माध्यमिक उपयोग ध्यान में रखा जाता है तो 2019 में इनडोर वायु प्रदूषण से संबंधित मौतें बढ़कर 10.2 लाख हो गईं। उज्ज्वला योजना न होती तो मरने वालों की संख्या 11.7 लाख तक हो सकती थी। ऐसे में उज्ज्वला के कारण घरेलू वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों में लगभग 13 प्रतिशत की कमी आई।

कब शुरू हुई उज्ज्वला योजना

गौरतलब है प्रधानमंत्री उज्जवला योजना की शुरुआत 2016 में की गई। इसका उद्देश्य देश की महिलाओं को खाना पकाने के पारंपरिक ईंधन से मुक्ति दिलाना था। इसमें शुरुआती तौर पर मार्च 2020 तक 8 करोड़ नए एलपीजी कनेक्शन देने का लक्ष्य रखा गया था। हालाँकि, समय से पहले सितंबर 2019 में ही इसे हासिल कर लिया गया। अध्ययन के मुताबिक, इस साल जनवरी तक इस योजना के तहत 9 करोड़ नए एलपीजी कनेक्शन शुरू किए गए थे। अब देश के 28 करोड़ से अधिक घरों में से 99.8 प्रतिशत के पास एलपीजी कनेक्शन है। 2015 में यह 61.9 फीसदी तक था।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सभी घर एलपीजी में शिफ्ट हो गए हैं। नागपुरे के अध्ययन में पाया गया कि 2019 में केवल 65 प्रतिशत परिवार प्राथमिक खाना पकाने के ईंधन के रूप में एलपीजी का उपयोग कर रहे थे। नागपुरे का कहना है कि उज्ज्वला योजना द्वारा प्रदान किए गए प्रोत्साहन के अभाव में, यह संख्या लगभग 47 प्रतिशत होती। इसके कारण राजस्थान, बिहार और उत्तर प्रदेश के गाँवों में स्वास्थ्य की स्थितियों में 50 फीसदी का सुधार हुआ है।

जहाँ का गुंडा था मुस्तफा, महिला पुलिस ने उसी इलाके से निकाली उसकी परेड: धक्का मारने के बाद नाबालिग लड़की के चेहरे पर मारे थे घूँसे

महाराष्ट्र के लातूर जिले में एक नाबालिग लड़की की पिटाई के मामले में सैयद गौस मुस्तफा को गिरफ्तार कर पुलिस ने उसकी परेड निकाली। गौस मुस्तफा एक कुख्यात हिस्ट्रीशीटर है। उस पर पहले से ही 18 केस दर्ज हैं। उसने लड़की पिटाई एक सामान्य विवाद पर की थी। घटना 14 मार्च (सोमवार) 2022 की है। महिला पुलिस अधिकारी ने पकड़ने के बाद उसकी सड़क पर परेड निकाली।

ABP माझा के मुताबिक मुस्तफा की उम्र 22 साल है। घटना के दिन पीड़िता लातूर शहर के एक स्कूल के पास कुछ खाने का सामान खरीदने गई थी। इसी दौरान मुस्तफा उधर से मोबाइल पर बात करते हुए गुजरा और लड़की को धक्का मार दिया। लड़की ने जब इसकी वजह पूछी तो वह उसे पीटने लगा। मुस्तफा ने लड़की के चेहरे पर कई घूँसे मारे जिससे वो घायल हो गई। बाद में उसने इसकी शिकायत विवेकानंद पुलिस थाने में की।

शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने आरोपित की तलाश शुरू की। इसी बीच पुलिस को मुस्तफा के लातूर के एक इलाके में होने की जानकारी मिली। पुलिस ने उसे हिरासत में लिया। उसे वाहन के बजाय सड़क मार्ग से परेड करवाते हुए पुलिस विवेकानंद थाने लेकर गई। इस दौरान एक महिला पुलिसकर्मी नेतृत्व कर रहीं थी।

पुलिस ने जैसे ही गौस मुस्तफा को हिरासत में लिया, वह दया की भीख माँगने लगा। उसको थाने उसी रास्ते से ले जाया गया जिस इलाके में वह लोगों को डराता-धमकाता था। जब उसकी परेड निकाली जा रही थी महिला पुलिसकर्मी उसे लगातार बेंत से मार भी रही थीं। मुस्तफा पर दर्ज अधिकतर मुकदमे विवेकानंद थाने से ही संबंधित हैं। API भाऊसाहेब खंडारे ने बताया कि आरोपित पर धारा 324 IPC के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। मामले में कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

‘रक्तपात, हिंसा और आतंकवाद से कश्मीर को भारत से अलग करना था मकसद’: कोर्ट ने यासीन मलिक समेत 15 के खिलाफ UAPA के तहत आरोप तय किए

साल 2017 के एक आतंकवादी एवं अलगाववादी गतिविधियों के मामले में जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) का मुखिया मोहम्मद यासीन मलिक (Mohammad Yasin Malik) के खिलाफ दिल्ली की एक अदालत ने बड़ी कार्रवाई की है। कोर्ट ने यासीन मलिक समेत 15 लोगों के खिलाफ गैर-कानूनी गतिविधि रोकथाम कानून (UAPA) के तहत आरोप तय किए हैं।

मामले की सुनवाई कर रहे विशेष अदालत के न्यायाधीश जस्टिस परवीन सिंह ने इसे ‘सुनियोजित साजिश’ करार दिया। जस्टिस सिंह के अनुसार, इस साजिश का मास्टरमाइंड सीमा पार पाकिस्तान में बैठे आईएसआई जैसों के हाथ में था। हर साजिशकर्ता मास्टरमाइंड के निर्देश पर काम कर रहा था और इनका अंतिम लक्ष्य कश्मीर में रक्तपात, हिंसा, तबाही और विनाश मचाकर उसे अलग करना था।

कोर्ट का कहना था कि शुरुआती तौर पर एक बड़ी आपराधिक साजिश के तहत बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, जिसके कारण हिंसा की घटनाएँ हुईं। अदालत ने ये भी कहा कि भारत से कश्मीर को अलग करने के मूल लक्ष्य को हासिल करने के लिए हिंसा की साजिश को रचा गया था। इसके साथ ही अदालत ने पाया कि ये घाटी में आतंकवाद को बढ़ावा देने में अहमद भूमिका निभाई। इसको देखते हुए कोर्ट ने यासीन मलिक सहित इसमें शामिल लोगों पर यूएपीए के तहत आरोप तय किए।

कोर्ट ने कहा, “तर्क दिया गया है कि गाँदीवादी तरीके से शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। जबकि, प्रथम दृष्टया सबूत कुछ और ही कहते हैं। विरोध न केवल हिंसक थे, उनका इरादा हिंसक होना था। इस प्रकार प्रथम दृष्टया इनकी योजना एडोल्फ हिटलर और नाजी पार्टी की असली सेना ब्राउनशर्ट्स के मार्च की तरह सीधी और स्पष्ट थी। इनका उद्देश्य सरकार को डराना और किसी विद्रोह की योजना से कम नहीं था।”

हुर्रियत कॉन्फ्रेंस ने अपने इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए आतंकी संगठनों के साथ साजिश रची थी। इसमें हाफिज मुहम्मद सईद, मोहम्मद यूसुफ शाह, आफताब अहमद शाह, अल्ताफ अहमद शाह, नईम खान, फारूक अहमद डार, राजा मेहराजुद्दीन कलवाल, बशीर अहमद भट, जहूर अहमद शाह वटाली, शब्बीर अहमद शाह, मसरत आलम, अब्दुल राशिद शेख और नवल किशोर कपूर शामिल हैं।

यासीन मलिक

गौरतलब है कि वो आतंकी है, कश्मीर में कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार में सीधे तौर पर शामिल था। वो जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट का अध्यक्ष और पाकिस्तान का पिट्ठू अलगाववादी नेता है। उस पर कश्मीर में आतंकवाद को समर्थन देने का आरोप है। साथ ही उसे भारत में टेरर फंडिंग समेत दूसरे अपराधों के मामले में हिरासत में भी लिया गया था। यासीन मलिक पर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण का भी आरोप है।

जनवरी 1990 में वायुसेना के 4 अधिकारियों की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी, जिसका आरोप यासीन मलिक पर ही है। यासीन मलिक ने जेकेएलएफ आतंकियों के साथ मिलकर भारतीय वायु सेना के चार जवानों में से एक स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना की हत्या कर दी थी।

ये जानते हुए भी कि घाटी में कश्मीरी पंडितों के नरसंहार में यासीन मलिक सीधे तौर पर शामिल था और उसके आतंकियों से संबंध हैं, पिछली सरकारों एवं मीडिया ने उसे हमेशा कश्मीरियों के तारणहार के रूप में पेश किया।