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6 साल की बच्ची से जिसने किया रेप, उसके पास ही पीड़िता और उसकी माँ को छोड़ा: लेफ्ट शासन वाले केरल में पुलिस का कमाल

47 दिन बाद जेल से बाहर आने के बाद मलयाली महिला ने बुधवार (1 दिसंबर 2021) को आरोप लगाया कि तिरुवंतपुरम (केरल) की मलयंकीजू पुलिस ने उसके पति से उसे और उसकी रेप पीड़िता 6 साल की बेटी को बचाने के लिए एक्शन लेने की बजाय, उसे ही गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने महिला को हत्या के प्रयास में जेल में बंद किया था।

मलयाली महिला मुंबई में रहती है। एशियानेट न्यूज से बात करते हुए महिला ने अपनी आपबीती सुनाई। पीड़िता ने बताया कि इसी साल 15 जुलाई को वायुसेना के एक अधिकारी के साथ उसने मंदिर में शादी की थी। महिला की यह दूसरी शादी थी। आरोप है कि महिला की शादी के दो दिन बाद 17 जुलाई को उसके दूसरे पति ने उसकी 6 साल की बेटी के साथ रेप किया। वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपित ने उससे उसका फोन छीनकर उन दोनों को घर में बंद कर दिया। महिला ने आरोप लगाया, “उसने मुझे और मेरी बेटी को हत्या की धमकी दी थी। एक बार मैंने पड़ोसियों से बात करने की कोशिश की थी तो उसने हमें धमकी दी।”

हालाँकि, अगस्त के अंत में वायुसेना के अधिकारी ने महिला के खिलाफ सोना चुराने और 16 साल के बेटे के अपहरण की कोशिश के आरोप में शिकायत दर्ज कराई थी। तफ्तीश के लिए पुलिस उसके घर गई तो महिला ने बेटी के साथ रेप किए जाने और घर में ही कैद करने की बात बताई। महिला ने कहा, “उस दिन पुलिस हमें वहीं छोड़ गई और अगले दिन मैं किसी तरह थाने पहुँची और शिकायत दर्ज कराई।” पुलिस ने मेडिकल जाँच भी करवाई थी, जिसमें बच्ची के साथ रेप की पुष्टि हुई थी। इसके बाद पीड़िता ने जिलाधिकारी के समक्ष बयान भी दिया।

महिला ने कहा, “मैंने उनसे कहा कि मैं उसके घर वापस जाने से डर रही हूँ, लेकिन पुलिस ने हमें फिर से वहीं छोड़ दिया।” उस रात उसने हमारे साथ झगड़ा किया और मारपीट करने की कोशिश की। इसमें वो घायल हो गया। घायल होने के बाद वायुसेना के अधिकारी ने अगले दिन ही महिला के खिलाफ हत्या की कोशिश का केस दर्ज कराया, जिसके बाद उसे 2 सितंबर को जेल भेज दिया गया। हालाँकि, आरोपित अधिकारी को भी पॉक्सो एक्ट में गिरफ्तार किया गया था, लेकिन वह 14 दिन में ही जमानत पर छूट गया।

महिला ने अपने पति पर उसे फँसाने के लिए खुद को घायल करने का आरोप लगाया है। साथ ही कहा है कि अगर पुलिस उस रात उसे वहाँ नहीं छोड़ती तो वो नहीं फँसती।

‘आपने घबराना नहीं’: इमरान सरकार ने तीन महीने से नहीं दी सैलरी, देखिए सर्बिया में पाकिस्तानी दूतावास ने कैसे कसा तंज

पाकिस्तान में बदहाली, भुखमरी और दिवालियापन इस कदर बढ़ गया है कि अब उसके दूतावास भी उसके खिलाफ आवाज उठाने लगे हैं। इसी क्रम में सर्बिया की राजधानी बेलग्रेड स्थित पाकिस्तानी दूतावास ने 3 महीने से सैलरी नहीं मिलने के कारण अब पाक सरकार के खिलाफ अपनी नाराजगी व्यक्त की है। दूतावास ने ट्विटर पर पाकिस्तानी सरकार को फटकार लगाई और नकदी के संकट से जूझ रही इमरान खान सरकार पर तंज कसने के लिए इमरान खान के ‘आप ने घबराना नहीं है’ का रैप शेयर किया।

सर्बिया में पाकिस्तानी दूतावास ने आर्टिस्ट साद अलवी द्वारा गाए गए गाने को शेयर किया, जिसमें दिवालिया होने के बावजूद अपने देश के लोगों को झूठी उम्मीदें देने के लिए इमरान खान का मजाक उड़ाया गया है। सर्बिया में पाकिस्तानी दूतावास ने ट्वीट किया, “महंगाई पिछले सभी रिकॉर्ड को तोड़ रही है, @ImranKhanPTI आप कब तक उम्मीद करते हैं कि हम सरकारी अधिकारी चुप रहेंगे और आपके लिए काम करते रहेंगे। पिछले 3 महीनों से फीस जमा नहीं करने के कारण, हमारे बच्चों को स्कूल से बाहर कर दिया गया है। क्या यह #नयापाकिस्तान है?”

पाकिस्तान के सर्बिया स्थित दूतावास के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

सर्बिया में पाकिस्तानी एम्बेसी ने जिस 0.56 मिनट के गीत को पोस्ट किया था, उसे साद अलावी ने कम्पोज किया था। इस रैप में प्रधानमंत्री इमरान खान के प्रसिद्ध ‘आप ने घबराना नहीं है’ भाषण को म्यूजिकल तरीके से पेश किया है। रैप गाने की शुरुआत पाकिस्तान के पीएम के द्वारा राष्ट्र को संबोधित करते हुए होती है, जिसमें वो कहते हैं, “आपने, सबसे पहले, घबराना नहीं है”। इमरान खान ने ये भाषण पिछले साल मार्च में उस वक्त दिया था, जब पूरी दुनिया में कोरोना वायरस का संक्रमण फैल रहा था।

इसमें मिक्सिंग करने के लिए अलावी ने पाकिस्तान में महंगाई पर तंज कसते कुछ आकर्षक गीत भी जोड़े। गाने में साबुन, गेहूँ और दवा जैसी जरूरी चीजों से लेकर शिक्षा तक अलवी ने पीएम का मजाक उड़ाया और लोगों से नहीं घबराने की अपील की। मार्च में रिलीज हुआ यह गाना लोगों के बीच हिट हो गया था।

उल्लेखनीय है कि पिछले महीने ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने इस देश में पैसे की कमी को स्वीकार किया था। उन्होंने कहा था कि उनके पास देश को चलाने के लिए पर्याप्त धन नहीं है, जिस कारण कर्ज लेना पड़ता है। उन्होंने ये बात इस्लाबाद में चीनी उद्योग के लिए फेडरल ब्यूरो ऑफ रेवेन्यू के ट्रैक एंड ट्रेस सिस्टम (टीटीएस) के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते कही थी।

गौरतलब है कि मौजूदा दौर में पाकिस्तान तमाम तरह की समस्याओं का सामना कर रहा है। वहाँ की अर्थव्यवस्था की हालत खस्ता है औऱ इस कारण से देश में खाद्य महंगाई बढ़ी है। वहीं दूसरी ओर विपक्ष की राजनीतिक एकता और लगातार गिरती साख इमरान खाने के सामने कई सारे संकट खड़े हैं। आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण बढ़ती महंगाई पर नियंत्रण करने के लिए सरकार के पास संसाधनों की कमी हो गई है।

हालात इतने बुरे हैं कि अब देश को आर्थिक संकट से उबारने के लिए पाकिस्तानी सेना के पास अपना रक्षा बजट कम करने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा है। हाल ही में एक आकलन किया गया था, जिसके मुताबिक पाकिस्तान को अगले दो वर्षों (2021-2023) में 51.6 बिलियन अमरीकी डॉलर (38,75,10,32,40,000 भारतीय रुपए) के बाहरी वित्तीय सहायता की आवश्यकता होगी।

कंगना की कार पर पंजाब में ‘किसानों’ ने किया हमला: अभिनेत्री ने शेयर किए डरावने पल, कहा- ‘पुलिस न हो तो मेरी लिंचिंग हो जाएगी’

अभिनेत्री कंगना रनौत के काफिले को आज पंजाब के कीरतपुर साहिब के बूंगा साहिब में किसानों ने घेर कर हमला कर दिया। भीड़ लगातार कंगना से किसानों से और महिलाओं से माफी माँगने की जिद पर अड़े हुए हैं। भीड़ जहाँ कंगना को घेरकर उनपर दबाव बनाने की कोशिश कर रही थी। वहीं कंगना ने भी सोशल मीडिया स्टोरी पर कई वीडियो क्लिप शेयर कर तथाकथित किसानों की हरकत को देश के सामने रखा है।

वहीं कंगना ने सोशल मीडिया पर कहा कि पंजाब में ‘किसानों’ ने उनकी कार पर हमला किया है। उन्होंने इंसटाग्राम के स्टोरी में वीडियो बयान जारी किया। उन्होंने कहा, ”हिमाचल से निकली हूँ। पंजाब में आते ही मॉब ने मुझे घेर लिया है। खुद को किसान कह रहे हैं। गालियाँ दे रहे हैं, जान से मारने की धमकी दे रहे हैं। इस देश में इस तरह का मॉब लिंचिंग हो रहा है। अगर हमारे साथ सुरक्षाबल नहीं हो तो क्या हालात होंगे?”

उन्होंने आगे कहा, “इनती सारी पुलिस है उसके बाद भी हमें निकलने नहीं दिया जा रहा है। क्या मैं कोई राजनीतिक व्यक्ति हूँ। बहुत सारे लोग मेरे खिलाफ राजनीति कर रहे हैं। उसी का ये नतीजा है। मॉब ने मुझे घेर लिया है। पुलिस न हो तो मेरी लिंचिंग हो जाएगी।”

कंगना रनोट ने सोशल मीडिया स्टोरी पर वीडियो क्लिप शेयर करते हुए लिखा है, “जैसे ही उन्होंने पंजाब में कदम रखा, भीड़ ने उन पर हमला कर दिया। वे लोग कह रहे हैं कि वे किसान हैं।” मीडिया रिपोर्ट में यह दावा किया जा रहा है कि कंगना को किसानों के गुस्से का शिकार इसलिए होना पड़ रहा है क्योंकि उन पर किसानों को खालिस्तानी आतंकवादी कहने का आरोप लगा है।

बता दें कि कंगना रनौत ने इंस्टाग्राम स्टोरी पर छोटे-छोटे क्लिप्स शेयर कर अपने मौजूदा हालात के बारे में जानकारी दी है। साथ ही उन्होंने कहा कि मुझे जान से मारने की धमकी दी जा रही है। यहाँ स्थिति अनबिलीविबल है। मुझे यकीन नहीं हो रहा कि इस देश में ऐसा हो रहा है।

मनाली से चंडीगढ़ आ रही थीं कंगना

गौरतलब है कि रोपड़ के पास बूंगा साहिब में कंगना की गाड़ी को रोका गया है। बताया जा रहा है कि कंगना को चंडीगढ़ एयरपोर्ट से मुंबई की फ़्लाइट पकड़नी है।

बीजेपी MLA निक्की हेम्ब्रम ने उठाई महुआ की बात, CM नीतीश कुमार बोले- आप इतनी सुंदर हैं…

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की एक टिप्पणी को लेकर विवाद उठ खड़ा हुआ है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार मुख्यमंत्री ने बीजेपी की महिला विधायक निक्की हेम्ब्रम से कहा कि ‘आप इतनी सुंदर हैं और आप इस तरह की बात कैसे कह सकती हैं’। बताया जा रहा है कि सोमवार (29 नवंबर 2021) को हुई एनडीए विधायक दल की बैठक के दौरान यह वाकया हुआ। बीजेपी विधायक ने महुआ चुनने पर लगी रोक को खत्म करने का मसला उठाया तो नीतीश कुमार ने कथित तौर पर य​ह टिप्पणी की।

कहा जा रहा है कि इसके बाद CM नीतीश कुमार की इस टिप्पणी पर दोनों पार्टियों के बीच विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गई है। बीजेपी विधायक निक्की हेम्ब्रम ने दैनिक भास्कर से बातचीत में सीएम नीतीश कुमार से स्थिति स्पष्ट करने की माँग की है। विधायक ने कहा, “CM बताएँ कि उन्होंने किस संदर्भ में इस तरह के शब्दों का प्रयोग किया है। क्योंकि, इससे हमारे सम्मान को ठेस पहुँची है।”

महिला आयोग की सदस्य रह चुकी हैं निक्की हेम्ब्रम

निक्की हेम्ब्रम राज्य महिला आयोग की सदस्य भी रह चुकी हैं। उन्होंने कहा मामले की जानकारी पार्टी के नेताओं को भी दी है। अब वो इस पर विचार करेंगे। निक्की हेम्ब्रम कटोरिया से विधायक हैं।

महुआ के मुद्दे को उठा रही थीं बीजेपी विधायक

दरअसल शीतकालीन सत्र को लेकर सोमवार को एनडीए विधायक दल की बैठक बुलाई गई थी। जिसमें शराबबंदी समेत सभी मुद्दों पर चर्चा हो रही थी। इस दौरान BJP विधायक ने आदिवासियों से जुडे मुद्दे को उठाया और महुआ चुनने पर लगी रोक को हटाने की माँग की। बीजेपी विधायक ने बताया कि वो शराबबंदी की पक्षधर हैं। शराब की वजह से परिवार का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। लेकिन महुआ को शराब के संदर्भ में ही जोड़कर नहीं देखा जाए।

महिला विधायक ने कहा, “CM ने हमारी बात को सुना नहीं और यह कहते हुए चुप करा दिया कि आप इतनी सुंदर हैं और आप इस तरह की बात कैसे कह सकती हैं। यही नहीं CM नीतीश ने यह भी बोल दिया कि लगता है आप अपने क्षेत्र में जाती नहीं हैं, इसीलिए शायद आपको पता नहीं कि आदिवासियों के लिए हमारी सरकार ने कितना काम किया है।”

निक्की हेम्ब्रम ने एबीपी न्यूज को बताया वो आदिवासियों की समस्या से मुख्यमंत्री को अवगत करा रही थीं। उन्होंने कहा, “शराबबंदी कानून तो बनाई गई, लेकिन हमारे यहाँ महुआ लाइफलाइन है। लोग इधर जंगल में रहते हैं। विषम परिस्थिति में लोग महुआ बेचते हैं। आपने (मुख्यमंत्री) शराबबंदी की है कीजिए, लेकिन महुआ पर जो आपने रोक लगाई है कि पाँच किलो से ज्यादा महुआ आप घर में नहीं रख सकते हैं इस पर विचार कीजिए।” विधायक का कहना है कि नीतीश कुमार को उनका विचार गलत लगा क्योंकि उनके सोचने का तरीका अलग है।

एबीपी न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक इस पूरे मामले में एनडीए की बैठक में मौजूद कुछ विधायक और मंत्री ने ऑफ कैमरा बताया कि मुख्यमंत्री की मंशा गलत नहीं थी। उन्होंने समझाने के क्रम में ऐसा कहा। जिसे गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। ऑपइंडिया ने इस संबंध में विधायक निक्की हेम्ब्रम से उनके दूरभाष पर संपर्क करने की कोशिश की। लेकिन उन्होंने किसी कार्यक्रम में व्यस्त होने का हवाला देकर बात करने में असमर्थता जताई। उनकी प्रतिक्रिया मिलने के बाद हम इस खबर को अपडेट करेंगे।

सियासत होय जब ‘हिंसा’ की, उद्योग-धंधा कहाँ से होय: क्या अडानी-ममता मुलाकात से ही बदल जाएगा बंगाल में निवेश का माहौल

उद्योगपति गौतम अडानी और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुलाकात हुई है। इसको लेकर अडानी ने ट्वीट करते हुए कहा, “पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात कर ख़ुशी हुई। उनके साथ राज्य में निवेश की संभावनाओं पर विमर्श किया। मैं अप्रैल 2022 में बंगाल ग्लोबल बिज़नेस समिट में उपस्थिति रहने की आशा करता हूँ।” 

एक उद्योगपति के लिए किसी राज्य के मुख्यमंत्री के साथ मुलाकात कर उस राज्य में निवेश की संभावनाएँ तलाशने का काम आम बात है। पर जब मुलाकात पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उद्योगपति गौतम अडानी के बीच हो तो उसे आम कैसे कहा जा सकता है? कारण है; गौतम अडानी वही उद्योगपति हैं जिन्हें ममता बनर्जी पिछले कई वर्षों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का न केवल मित्र बताती रही हैं, बल्कि लगातार यह आरोप भी लगाती रही हैं कि प्रधानमंत्री मोदी जो भी करते हैं वो सब कुछ अडानी और अंबानी को फायदा पहुँचाने के लिए करते हैं। यह बात और है कि मुख्यमंत्री बनर्जी रिलायंस के अंबानी के साथ भी पहले मुलाकात कर चुकी हैं और उन्हें राज्य में निवेश के लिए आमंत्रित भी कर चुकी हैं।

प्रश्न उठता है कि अचानक ऐसा क्या बदला कि जिस अडानी और अंबानी पर ममता बनर्जी, उनके समर्थक और पूरा लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम वर्षों से भारत को खरीद लेने का आरोप लगाता रहा है, उन्हीं के साथ भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी को तथाकथित तौर पर हराने की क्षमता रखने वाली एकमात्र नेता ममता बनर्जी न केवल मुलाकात कर रही हैं बल्कि अपने राज्य में निवेश के लिए आमंत्रित भी कर रही हैं? अचानक क्या बदल गया कि जिन नरेंद्र मोदी को ममता बनर्जी अपना प्रधानमंत्री तक मानने से इनकार करती रहीं, उन्हीं नरेंद्र मोदी को अपने राज्य में इन्वेस्टमेंट समिट का उद्घाटन करने के लिए चार महीने पहले ही राजी कर लेती हैं?

इसे लेकर राजनीतिक के जानकारों द्वारा तरह-तरह की अटकलें लगाए जाने की संभावना है और ऐसा होगा भी। यह प्रश्न उठेगा कि बात-बात पर राजनीतिक मतभेदों को व्यक्तिगत बनाने वाली ममता बनर्जी में इतना तेज बदलाव क्यों और कैसे आया? हाल ही में अपने दिल्ली प्रवास के दौरान प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद बनर्जी का कहना था कि राजनीतिक दृष्टिकोण और मतभेद अपनी जगह पर केंद्र और राज्य सरकार को मिलकर काम करने की आवश्यकता है। यही बात प्रधानमंत्री मोदी न केवल हमेशा से कहते आए हैं बल्कि वे इसका अक्षरशः पालन भी करते रहे हैं। इसके ठीक उलट बनर्जी ने राजनीतिक मतभेदों को न केवल व्यक्तिगत बनाया, बल्कि केंद्र-राज्य संबंधों के मामले में उनका आचरण निम्नस्तरीय रहा है। कुछ महीने पहले की बात है जब पश्चिम बंगाल में आए तूफान के बाद प्रधानमंत्री ने राज्य का दौरा किया था तब उनके साथ मुख्यमंत्री बनर्जी और उनके सचिव ने जो व्यवहार किया था उसकी मिसाल स्वतंत्र भारत के इतिहास में नहीं मिलती। 

तो इस बदलाव का कारण क्या है? कुछ राजनीतिक पंडितों ने तो यहाँ तक कहना शुरू कर दिया है कि प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री बनर्जी के बीच कोई गुप्त समझौता हो गया है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि उस तथाकथित समझौते के बाद से ही ममता बनर्जी का कॉन्ग्रेस पर आक्रमण तीव्र हुआ है। इस तरह की बातें होंगी। अनुमान भी लगाए जाएँगे। किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की जल्दी में राजनीतिक पंडित अपनी परिकल्पना प्रतिपादित करेंगे। पर मुझे लगता है कि ममता बनर्जी को आखिर पश्चिम बंगाल की आर्थिक स्थिति की सच्चाई का सामना करना पड़ रहा है। ऐसा नहीं है कि उन्हें राज्य की आर्थिक स्थिति का एहसास पहले नहीं था। उन्हें इसका एहसास पहले से था पर एक राजनीतिक दृष्टिकोण रखने के बाद जैसे वामपंथी इस विषय पर कुछ करने की स्थिति में नहीं थे, उसी तरह ममता बनर्जी भी अधिक कुछ करने की स्थिति में नहीं हैं। उन्होंने शायद अब यह स्वीकार करना शुरू कर दिया है कि राज्य में जिस तरह का राजनीतिक वातावरण उन्होंने पिछले बारह-तेरह वर्षों में तैयार किया है, उसकी सहायता से चुनाव तो जीते जा सकते हैं पर एक समृद्ध राज्य नहीं बनाया जा सकता।

ऐसा प्रतीत होता है कि देर से ही सही, यह सच ममता बनर्जी की समझ में आने लगा है। वामपंथियों ने अपने तीन दशक से अधिक के शासनकाल में राज्य में उद्योगों की जो हालत की थी वह किसी से छिपा नहीं है। अपनी नीतियों के कारण राज्य से उद्योगों को बाहर करने के बावजूद वामपंथियों ने कृषि आधारित गँवई अर्थव्यवस्था के लिए कुछ इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा किया था ताकि उनका गँवई वोट बैंक उनके साथ रहे। ममता बनर्जी के आने के बाद उद्योगों में या उनमें निवेश को लेकर कोई बदलाव तो नहीं आया पर वाम सरकार का बनाया ये इंफ्रास्ट्रक्चर अब लगातार क्षतिग्रस्त हो रहा है। यह ममता बनर्जी के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। शायद यही कारण है कि वे अचानक नींद से जागी हैं और इस दिशा में कुछ प्रयास करते हुए दिखना चाहती हैं।

प्रश्न यह है कि इन प्रयासों का वांछित फल मिलेगा? यह ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर समय देगा पर प्रश्न महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि पिछले बारह-तेरह वर्षों में ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ने जिस राजनीतिक माहौल की सृष्टि की है वह रत्ती भर भी औद्योगिक निवेश के लिए सहायक नहीं है। चार दशक से अधिक समय से उद्योगों के राज्य से निकलकर बाहर चले जाने का परिणाम यह हुआ है कि राज्य की अफसरशाही और नौकरशाही को उद्योग और निवेश जैसे शब्द सुनने की आदत नहीं है। उन्हें उद्योगों के लिए अन्य राज्यों में बनाई जाने वाली योजनाओं और उनके क्रियान्वयन का अनुभव नहीं है। वे इस बात से वाकिफ नहीं हैं कि पिछले चार दशकों में भारत के अन्य राज्यों में क्या बदलाव हुए हैं और उन बदलाव को हासिल करने के लिए क्या-क्या करना पड़ता है। इसके ऊपर राज्य की वर्तमान राजनीति ने स्थिति और खराब कर दी है।

ऐसे में दो महत्वपूर्ण प्रश्न उठते हैं। पहला, ये कि जिस राजनीतिक वातावरण की सृष्टि पिछले लगभग डेढ़ दशक में हुई है उसे अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए तुरंत बदलना संभव है? दूसरा, यह कि क्या ममता बनर्जी सही समय पर जागी हैं?

राज्य में जिस राजनीतिक वातावरण की सृष्टि हुई है उसका एक नमूना विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद पूरे देश ने देखा। जो कुछ हुआ वह उस राजनीतिक विचारधारा द्वारा किया जाता है, जिसका लोकतांत्रिक राजनीति में विश्वास न के बराबर होता है। यह उस राजनीतिक दल द्वारा किया जाता है, जिसके नेतृत्व का एक समय के बाद उसी राजनीति पर से नियंत्रण जाता रहता है जिसे उस नेतृत्व ने खुद प्रोत्साहन दिया हो। ऐसे में राज्य की वर्तमान राजनीति निवेश के लिए तुरंत उचित वातावरण तैयार कर पाएगी, इसकी संभावना बहुत कम है। इसके ऊपर सबसे बड़ी बात यह है कि समस्या केवल राज्य के राजनीतिक वातावरण से ही नहीं, राज्य की ब्यूरोक्रेसी से भी है। दोनों में गंभीर सुधार की आवश्यकता है।

लोग कहेंगे कि ममता बनर्जी सही समय पर जागी हैं, पर लगता है उन्होंने देर कर दी है। ज्योति बसु के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद जब बुद्धदेब भट्टाचार्य राज्य के मुख्यमंत्री बने तब उन्हें भी अचानक उद्योगों की याद आई। मुख्य कारण था राज्य में व्याप्त बेरोजगारी और एक बड़े वर्क फोर्स द्वारा उठाया जा रहा सवाल। इसके अलावा एक और कारण था और वह था ममता बनर्जी और उनकी पार्टी द्वारा राज्य में राजनीतिक बदलाव लाने की मुहिम की शुरुआत। भट्टाचार्य अपने प्रयासों में कुछ हद तक सफल रहे थे और राज्य में आईटी सेक्टर में कुछ निवेश आया था। पर जब इन प्रयासों को अगले स्तर पर ले जाने का समय आया तब तक ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ने उनका ही नहीं, राज्य में उद्योगों को वापस लाने की कोशिशों का प्रचंड विरोध करना शुरू कर दिया था। नतीजा सबके सामने है। कुछ वैसी ही स्थिति आज बनी है और लगता है ममता बनर्जी इसलिए जागी हैं क्योंकि भाजपा ने उन्हें चुनौती देना आरंभ कर दिया है।

ममता बनर्जी का गौतम अडानी से मिलना और राज्य में निवेश की बात करना अपनी राजनीति में उनकी निराशा का परिचायक है। उनका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राज्य के इन्वेस्टमेंट समिट के उद्घाटन के लिए आमंत्रित करना भी यह साबित करता है कि वे जल्दी में हैं। अब इसे डेस्पेरशन कहें या राष्ट्रीय राजनीति में अपनी महत्वाकांक्षा को फलित होते हुए देखने की उनकी इच्छा, वे भले भूल जाएँ कि उन्होंने पहले क्या कहा और किया पर मोदी और भाजपा समर्थकों के लिए उनके राजनीतिक आचरण को भुलाना आसान न होगा। सत्ता में वापस आने के लिए उन्होंने जो राजनीतिक प्रपंच किए, अडानी, मोदी और गुजरात के प्रति उनका आचरण इतनी जल्दी भुला पाना लोगों के लिए संभव न होगा। प्रधानमंत्री मोदी के लिए सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास केवल एक नारा नहीं है, पर यह बात ममता बनर्जी समझेंगी और स्वीकार करेंगी, इसकी संभावना बहुत कम है। 

पाकिस्तानी मूल की ऑस्ट्रेलियाई सीनेटर मेहरीन फारुकी से मिलिए, सुनिए उनकी हिंदू घृणा- जानिए PM मोदी से उनको कितनी नफरत

पाकिस्तानी मूल की ऑस्ट्रेलियाई ग्रीन्स सीनेटर मेहरीन फारूकी ने ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन के अच्छे दोस्त PM नरेंद्र मोदी को घेरने के बहाने संघीय सीनेट में सभी सीमाओं को पार करते हुए घृणा के स्तर तक उतर आईं।

पाकिस्तान में पैदा हुई सीनेटर फारूकी ने पहले तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ पीएम मॉरिसन के सौहार्दपूर्ण कामकाजी संबंधों की तारीफ की और फिर जब बात भारतीय पीएम मोदी की आई तो दक्षिण पंथी नेता बताते हुए इधर-उधर की सुनी-सुनाई बातों का हवाला देकर लोकतान्त्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को ऑथॉरिटारियन सरकार अर्थात सत्तावादी प्रशासन बता डाला।

PM मोदी को यूँ खुलेआम सीनेट में बुरा बताने वाली इस सीनेटर की बात करें तो मेहरीन फारुकी का जन्म पाकिस्तान के लाहौर में हुआ था, वही पाकिस्तान जो हाल ही में धार्मिक अल्पसंख्यकों हिन्दुओं और ईसाईयों पर अत्याचार के लिए चर्चा में था। पाकिस्तान में लगातार हिंदू मंदिरों को नष्ट करने और नाबालिग सिख, ईसाई और हिंदू लड़कियों के अपहरण की घटनाएँ नियमित तौर पर खबरों में होती हैं। हालाँकि, सीनेटर फारूकी ने पाकिस्तान में हो रहे इन अत्याचारों का कोई उल्लेख नहीं किया।

गौरतलब है कि ऑस्ट्रेलिया में हिंदू समुदाय को बुरी तरह से निशाना बनाने वाली पहली ऑस्ट्रेलियाई ग्रीन पार्टी की नेता नहीं हैं। इस साल की शुरुआत में, एनएसडब्ल्यू के ग्रीन एमएलसी डेविड शूब्रिज ने भी हिंदूफोबिया को ग्रीन्स पार्टी का ट्रेडमार्क बना दिया था। जिस पर उन्हें ऑस्ट्रेलियाई हिंदू समुदाय से माफी माँगने के लिए भी कहा था।

वहीं अब सीनेटर फारूकी ने ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय हिंदू प्रवासियों पर हमला करते हुए इसे भारतीय राष्ट्रवाद पर हमले का नाम दे दिया। उन्होंने आगे हिन्दुओं के प्रति अपनी घृणा, हिंदूफोबिया को भारतीय पीएम मोदी की महज आलोचना में कहे शब्द बताकर खुद को पाक-साफ बताना चाहा। हालाँकि, ऑस्ट्रेलिया के हिन्दू समुदाय ने फारुखी को आड़े हाथों लिया है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सिडनी में एक हिंदू एक्टिविस्ट रवि सिंह धनखड़ ने फारुखी के बयान पर टिप्पणी करते हुए द ऑस्ट्रेलिया टुडे को बताया, “मेहरीन फारुकी उस विस्तृत ग्रीन्स योजना का हिस्सा हैं जो हिंदुओं और यहूदियों पर उनके ऐतिहासिक उत्पीड़न का विरोध करने से रोकने के लिए हमला करती है।”

फारूकी ने सीनेट में दिए अपने स्पीच में सिडनी में पिछले साल के अंत और इस साल की शुरुआत में घटी घटनाओं का भी जिक्र किया। जिसमें ऑस्ट्रेलिया में हिन्दू समुदाय को आतंकी संगठन बब्बर खालसा ने निशाना बनाया था। हालाँकि, फारुकी इसके लिए भी PM मोदी और हिन्दुओं को ही दोषी ठहराने की कोशिश की।

उन्होंने कहा, “इस साल, जब भारत में मोदी के कृषि कानूनों को लेकर जब विरोध तेज था, तब सिडनी के हैरिस पार्क में चार युवा सिख पुरुषों पर हमले सहित यहाँ समूहों के बीच हिंसा और तकरार की कई सार्वजनिक रूप से रिपोर्ट की गई घटनाएँ सामने आई हैं।” जबकि पूरा विश्व जानता है यह आधा सच है। जहाँ तीन खालिस्तानियों और एक हिन्दू के बीच हुई इस झड़प का मामला कोर्ट पहुँचा और एक्शन भी हुआ। वहीं फारुखी बड़ी चालाकी से इसका ठिकरा ऑस्ट्रेलियाई हिन्दू समुदाय पर फोड़कर खालिस्तानियों का बचाव कर रही थी।

जिस पर वहीं की एक एकेडमिशियन सारा गेट्स ने आड़े हाथों लेते हुए द ऑस्ट्रेलिया टुडे को बताया, “सिडनी में जो हुआ उसका ऑस्ट्रेलियाई समाज में कोई स्थान नहीं है, लेकिन सीनेटर मेहरीन फारुकी ने जानबूझकर आधा सच बताना चुना। उन्होंने कहा, तीन सिख युवकों और एक हिंदू युवक को सड़क पर लड़ाई के लिए अदालत का सामना करना पड़ा, हालाँकि, फारूकी उस घटना के लिए पूरे हिंदू समुदाय को बदनाम कर रही हैं।”

ग्रीन सीनेटर मेहरीन फारुकी की घृणित राजनीति पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए, गेट्स ने कहा कि सड़कों पर हिंदू प्रवासियों पर हमले और उनके व्यवसायों को निशाना बनाना ग्रीन्स की विभाजनकारी और घृणित राजनीति का प्रत्यक्ष परिणाम है।

सारा ने कहा, “ऑस्ट्रेलियाई संघीय सरकार से उन संगठनों को ट्रैक करने का आग्रह किया जो हिंदुओं के प्रति नफरत फैलाने के लिए विदेशों में स्थित प्रतिष्ठानों से प्रेरणा, वित्त पोषण और मार्गदर्शन लेते हैं। साथ ही सारा ने आगे अपनी बात रखते हुए कहा, “मैं राज्य और संघीय सरकारों और प्रधानमंत्री सहित लेबर और लिबरल पार्टी के सदस्यों से ग्रीन्स पार्टी के विभाजनकारी और घृणा से भरे एजेंडे के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करने का आह्वान करती हूँ।”

2 महिलाओं से गैंगरेप, 1 की हत्या: सेशन कोर्ट ने जिस रहीमुद्दीन को दी थी फाँसी की सजा उसे हाईकोर्ट ने बरी किया

बॉम्बे हाईकोर्ट ने साल 2012 में दो महिलाओं के साथ गैंगरेप करने और उनमें से एक की हत्या करने के मामले में सेशन कोर्ट द्वारा मौत की सजा पाए आरोपित रहीमुद्दीन मोहफुज शेख को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपित के खिलाफ सबूत पेश करने में असफल रहा। इसके बाद हाईकोर्ट ने आरोपित शेख को दी गई मौत की सजा को बरकरार रखने से इनकार करते हुए उसे रिहा करने का आदेश दे दिया। वहीं, इस मामले के दूसरे आरोपी को पहले ही नाबालिग घोषित किया जा चुका है।

अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष मामले को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है और पीड़िता की गवाही पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस साधना जाधव और पृथ्वीराज चव्हाण की खंडपीठ ने 25 नवंबर को इस पर आदेश देते हुए आरोपित शेख को बरी कर दिया। हालाँकि, फैसले की कॉपी 2 दिसंबर को सामने आई।

अभियोजन पक्ष का कहना है कि घटना के समय पीड़िता की आयु 19 साल थी और जिस महिला की हत्या की गई, वह 28 साल की थी। दोनों महिलाएँ कूड़ा बीनने का काम करती थीं। मई 2012 में आरोपितों ने रोजगार दिलाने की बात कहकर दोनों महिलाओं को नवी मुंबई ले गए। वहाँ आरोपितों ने शराब पी और महिलाओं को भी पिलाया। इसके बाद आरोपितों ने कथित तौर पर महिलाओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म और मारपीट की। इसमें एक महिला की मौत हो गई, जबकि दूसरी भागने में सफल रही। उसके बयान के आधार पर पुलिस ने दोनों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया।

अदालत ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि पीड़ितों को उनके साथ जाने के लिए मजबूर नहीं किया गया था और उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के आरोपित के साथ शराब का सेवन किया था। पीठ ने कहा कि पीड़िता के मेडिकल पेपर में भी लिखा है कि कथित हमले से पहले और घटना के दिन उसने अज्ञात दवाओं का सेवन किया था। अदालत ने आरोपित शेख के उस बयान पर भी गौर किया, जिसमें उसने कहा था कि पीड़िता वेश्यावृत्ति में लिप्त थी।

इस मामले में ठाणे की सेशन कोर्ट ने साल 2017 में आरोपित रहीमुद्दीन मोहफुज शेख को मौत की सजा सुनाई थी। वहीं, इस मामले के दूसरे आरोपी को नाबालिग बताया गया था।

गौरतलब है कि पिछले दिनों बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक आदेश में कहा था कि किसी नाबालिग के ब्रेस्ट को बिना ‘स्किन टू स्किन’ कॉन्टैक्ट के छूना POCSO एक्ट के तहत यौन शोषण की श्रेणी में नहीं आएगा, बल्कि IPC की धारा 354 के तहत छेड़छाड़ का अपराध माना जाएगा। हालाँकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्‍बे हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा था कि पॉक्‍सो एक्‍ट में स्‍किन टू स्किन टच जरूरी नहीं है।

कॉन्ग्रेस में खालिस्तान समर्थक सिंगर मूसेवाला: सिद्धू ने बताया ‘यूथ आइकॉन’, कैप्टन सरकार में हुआ था आर्म्स एक्ट का केस

खालिस्तान से हमदर्दी रखने वाले विवादित पंजाबी गायक सिद्धू मूसेवाला अब राजनीति करेंगे। पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू की मौजूदगी में मूसेवाला शुक्रवार (3 दिसंबर) को कॉन्ग्रेस में शामिल हो गए। पार्टी में शामिल होने के बाद मूसेवाला ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि वह ‘पंजाबियों की आवाज उठाने’ के लिए राजनीति में आए हैं।

सिद्धू मूसेवाला का असली नाम शुभदीप सिंह सिद्धू है और वह मानसा जिले के मूसा गाँव के रहने वाले हैं। मूसेवाला पर अपने गानों में हिंसा और बंदूक संस्कृति को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं। कैप्टन अमरिंदर सिंह के मुख्यमंत्री रहने के दौरान मूसेवाला पर आर्म्स एक्ट के तहत केस दर्ज हुआ था। इतना ही नहीं, कोरोना महामारी के दौरान फायरिंग रेंज में एके-47 से फायरिंग करते हुए उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुई थीं। इसके बाद मूसेवाला को एक अन्य मामले में आरोपित किया गया था। 

ध्यान रहे कि ये वहीं सिद्धू मूसेवाला वही शख्स हैं, जिन्होंने किसानों के उस विरोध प्रदर्शन का समर्थन किया था, जिसके कारण हिंसा की कई घटनाएँ हुई थीं। मूसेवाला खालिस्तान समर्थक और खालिस्तानी आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले के प्रशंसक हैं।

‘किसानों विरोध’ का खालिस्तानी चेहरा गणतंत्र दिवस पर उस वक्त खुलकर सामने आया था, जब खालिस्तान समर्थकों की भीड़ ने लाल किले पर सिख झंडा फहराया था। हालाँकि, कुछ लोगों का दावा है कि वह खालिस्तानी झंडा नहीं, बल्कि सिर्फ एक सिख झंडा था, लेकिन यहाँ ध्यान रखने वाली बात है कि यह झंडा पंजाबी सिंगर दीप सिद्धू और उसके लोगों ने लगाया था। दीप सिद्धू एक जाने-माने खालिस्तानी हैं।

इन विरोध प्रदर्शनों के दौरान सिद्धू मूसेवाला जैसे सिंगरों ने खालिस्तानी विचारधारा को हवा देने में अहम भूमिका निभाई थी। किसान आंदोलन के दौरान सिद्धू मूसेवाला ने एक गाना गाया था, जिसके जरिए उसने आतंकी जरनैल सिंह भिंडरावाले की तारीफ की थी। गाना ‘पंजाब (मेरी मातृभूमि)’ शीर्षक के साथ शुरू होता है, जिसमें 1982 की सीन को दिखाया गया है, जिसमें खालिस्तानी नेता भरपुर सिंह बलबीर के साथ भिंडरावाले भी दिखाई देता है। अपने गाने में मूसेवाला ने अलगाववाद को खुलकर बढ़ावा दिया है। गाने में कहा गया है, ‘राज दी गल क्यूँ न करिए। अस्सी माला फड़ के हिंदुस्तान दे किसी मठ दे पुजारी नी बनना चौहंडे’ (स्व-शासन की बात क्यों नहीं करें? हमें सिर्फ माला पकड़कर हिंदुस्तान के किसी मठ में पुजारी नहीं बनना)।

इस वीडियो सॉन्ग को देखने पर पता चलता है कि गाने में कई सारी जगहों पर भिंडरावाले दिखाई देता है। एक बार अपने हाथ में एक तीर के साथ दिखाई देता है। गाने में कहा गया है, “ओह संता दे हाथन विच फडेया तीर दे वर्गा नी, ढके नाल जिहनु दब लोगे कश्मीर दे वर्गा नी’ प्ले (यह संतों के हाथ में तीर जैसा नहीं है। न ही यह कश्मीर जैसा है, जिसे तुम ताकत से दबा दोगे।)

इतना ही नहीं गाने में मूसेवाला ने ‘दिल्ली’ को भी धमकी दी। इसमें कहा गया है, ”मुड तो बड़े खिलाफ तू दिते ऑर्डर दिल्ली ए नी, ओह भूली ना मैनु वी लगदे बॉर्डर दिल्ली ए नी’। इसका मतलब है कि दिल्ली से जो तुम आदेश दे रहे हो, ये मत भूलो हम बॉर्डर स्टेट हैं।

खास बात ये है कि मूसेवाला को कॉन्ग्रेस में शामिल होने पर नवजोत सिंह सिद्धू ने यूथ आइकॉन बताते हुए उनका स्वागत किया। बहरहाल, मूसेवाला को कॉन्ग्रेस में शामिल कराने के बाद अब ये स्पष्ट हो गया है कि कॉन्ग्रेस ने अब अलगाववाद और आतंकवाद को भड़काने के लिए खुलकर सामने आ गई है। किसान आंदोलन के दौरान कॉन्ग्रेस ने खालिस्तानी भावनाओं को खूब भड़काया था। पार्टी के इस कदम से ऐसा प्रतीत होता है कि पंजाब में राजनीतिक सत्ता पाने के लिए कॉन्ग्रेस ने अलगाववाद को समर्थन देते रहने का फैसला किया है।

2 साल तक के बच्चों का यौन शोषण, बच्चियों के खरीदे अश्लील वीडियो: सब कुछ जानकर भी चुप रही CIA, ‘गोपनीयता’ बनी बहाना

अमेरिका की सीक्रेट सर्विस संस्था सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआईए) को पिछले 14 सालों में अपने कम-से-कम 10 कर्मचारियों द्वारा बच्चों के यौन शोषण से संबंधित मामलों की जानकारी मिली है। इनमें से सिर्फ एक व्यक्ति के खिलाफ अपराध का मुकदमा दर्ज किया किया, जबकि अन्य मामलों को आंतरिक जाँच के लिए सीईए को ही सौंप दिया गया। सीआईए ने अपने स्टाफ के खिलाफ कार्रवाई करने से इसलिए बचती रही कि उसे लगा कि संस्था की सीक्रेट बाहर आ जाएँगे। बजफीड के अनुसार, यौन शोषण के शिकार लोगों में 2 साल के शिशु से लेकर 6 साल के बच्चे तक शामिल हैं। वहीं, एक मामले में सीआईए अधिकारी ने छोटी बच्चियों के तीन अश्लील वीडियो को खरीदा था, जिसे बच्चियों की माँ ने ही बनाया था।

बजफीड ने सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम के तहत दायर 3 मुकदमों और 13 सार्वजनिक रिकॉर्ड तक पहुँच के आग्रह के माध्यम से यह जानकारी हासिल की। प्राप्त जानकारी से यह बात सामने आई कि सीआईए ने इन संवेदनशील मामलों को ‘आंतरिक रूप से’ सँभालने की माँग की थी, ताकि ये अपराधी नौकरी से बर्खास्तगी और सिक्योरिटी क्लियरेंस से बच सकें। एक मामले में एक कर्मचारी को 2 साल के बच्चे और 6 साल के बच्चे के साथ यौन संबंध का दोषी पाया गया था, जबकि एक अन्य मामले में सीआईए के एक अधिकारी ने युवा लड़कियों के 3 अश्लील वीडियो खरीदे थे, जिन्हें उनकी माँओं ने बनाया था। वहीं, एक कर्मचारी द्वारा नौकरी के दौरान 1400 से अधिक बाल यौन शोषण से जुड़ी तस्वीरों को देखने का पता चला।

बजफीड की न्यूज रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

बज़फीड न्यूज के अनुसार, जनवरी 2010 में सीआईए के कॉन्ट्रैक्टर ने एफबीआई के एक अंडरकवर से यौन संबंध की कोशिश की थी। इस कॉन्ट्रैक्टर ने बाल दुर्व्यवहार की तस्वीरों के प्रति अपने जुनून को स्वीकार किया था। उसने सीक्रेट एजेंसी के आईपी ऐड्रेस का उपयोग करके एक चैट रूम में प्रवेश किया था। जब महानिरीक्षक को कंप्यूटर की सामग्री की तलाशी के लिए वारंट मिला तो पता चला कि कंप्यूटर के हार्ड ड्राइव को हटा दिया गया था।

यौन दुराचार का आरोप लगाने वाली सीआईए की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट (साभार: बज़फीड न्यूज)

इसके अलावा, सीआईए के एक अन्य अधिकारी ने सरकारी लैपटॉप पर 10 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों की अश्लील तस्वीरें और वीडियो देखने की बात स्वीकार की। उसने पहली बार कॉलेज में बाल यौन शोषण की तस्वीरें देखने की बात कबूल की और अपने सीआईए में नौकरी के दौरान भी वह ऐसा करता रहा। अपने बचाव में कर्मचारी ने कहा था, “जब तक एजेंसी इन्फॉरमेशन सिक्योरिटी कोर्स नहीं किया, तब तक मुझे नहीं पता था कि चाइल्ड पोर्नोग्राफ़ी देखना एजेंसी की नीति का उल्लंघन है।”

अगस्त 2009 में सीआईए के एक कर्मचारी ने 2 और 6 साल की उम्र के दो बच्चों के साथ यौन संपर्क करने की बात कबूल की। उसने एजेंसी में अपने कार्यकाल के दौरान सेक्सुअल फोटो को डाउनलोड करने की बात स्वीकार की। जब सीआईए महानिरीक्षक ने जाँच शुरू की तो पता चला कि उसके पास बाल यौन शोषण से संबंधित 63 वीडियो थे। आरोपित अधिकारी ने सामग्री को डाउनलोड करने और वितरित करने के लिए सरकारी वाईफाई का इस्तेमाल किया।

बजफीड न्यूज द्वारा प्रकाशित सीआईए की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

बज़फीड न्यूज ने पाया कि इन अपराधों में संलिप्तता के बावजूद सीआईए के केवल एक कर्मचारी को यौन अपराधों के लिए आरोपित किया गया। उक्त अधिकारी पर पहले से ही गोपनीय सूचनाओं के गलत संचालन के लिए जाँच की जा रही थी। उनमें से 5 दागी अधिकारियों/ठेकेदारों ने इस्तीफा दे दिया था या उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था, जबकि चार अन्य आरोपियों को गोपनीय सूचनाओं की जाँच के लिए जिम्मेवार सुरक्षा कार्यालय में भेजा दिया गया था।

इस मामले से संबंधित अब तक लगभग 3,000 पेज जारी किए गए हैं। इनमें 2004 से 2019 तक की घटनाओं को शामिल किया गया है। बजफीड ने पाया कि यौन अपराधों के साक्ष्य मिलने के बाद भी संघीय अभियोजकों द्वारा इन पर कोई आरोप दायर नहीं किए गए। इसके साथ ही सीआईए ने अपनी रिपोर्ट में बड़े पैमाने पर संशोधन करते हुए आरोपी अधिकारियों और कॉन्ट्रैक्टरों के नाम और उनके रोजगार के विवरण छिपा दिए थे। केंद्रीय जांच एजेंसी ने इसके बारे में जानकारी देने से बचने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा, गोपनीयता एवं संघीय कानूनों का हवाला दिया था। बज़फीड न्यूज की रिपोर्ट में यूएस अटॉर्नी की भूमिका पर भी सवाल उठाया है, जिन्होंने सबूतों के बावजूद आरोप नहीं लगाया।

‘ज्यादा गोश्त खाकर माथा गर्म मत करो, उस पर बर्फ डालो, गुटखा खाकर मुँह बंद रखो’: मुस्लिमों से महाराष्ट्र के मंत्री

महाराष्ट्र की उद्धव सरकार में मंत्री जितेंद्र आव्हाड मुस्लिमों को लेकर दिए अपने एक बयान को लेकर चर्चा में हैं। एनसीपी नेता ने ​मुंबई से सटे भिवंडी में पत्रकारों से बात करते हुए हाल ही में रजा एकेडमी के महाराष्ट्र बंद के दौरान हुए हंगामे के संदर्भ में मुस्लिमों को नसीहत दी। त्रिपुरा पर फेक न्यूज की आड़ लेकर मुस्लिमों ने राज्य के कई शहरों में हिंसा की थी।

आव्हाड ने मुस्लिमों से कहा कि ज्यादा गोश्त खाकर वे माथा गर्म न करें, क्योंकि विरोधी उन्हें उत्तेजित करना चाहते हैं। साथ ही उन्हें गुटखा खाकर मुँह बंद रखने की सलाह भी दी। गौरतलब है कि महाराष्ट्र में गुटखा की बिक्री प्रतिबंधित है। उन्होंने कहा, “मैं सभी मुस्लिम भाइयों से अपील करना चाहता हूँ। ज्यादा गोश्त खाकर माथा मत गर्म करो। बिल्कुल शांति से काम लो। वो (विरोधी पार्टी के लोग) चाहते ही हैं कि तुम्हारा सिर गर्म हो जाए। सिर पर बर्फ रखो और मुँह में पान, सुपारी, रजनीगंधा, जो खाना हो खाओ, लेकिन सिर पर बर्फ, मुँह को ताला। कुछ नहीं होगा।”

इस दौरान महाराष्ट्र प्रदेश एनसीपी अध्यक्ष जयंत पाटिल भी मौजूद थे। भिवंडी में पार्टी कार्यालय का उद्घाटन करने दोनों नेता एक साथ पहुँचे थे। आव्हाड के इस बयान पर महाराष्ट्र बीजेपी की नेता चित्रा वाघ ने आपत्ति जताते हुए राज्य के उपमुख्यमंत्री अजित पवार को स्पष्टीकरण देने के लिए कहा है। उन्होंने कहा कि राज्य में पान मसाला, गुटखा जैसी चीजों पर प्रतिबंध है। लेकिन, सरकार के एक मंत्री ऐसा बयान दे रहे हैं जो इनकी बिक्री को प्रोत्साहित करने वाले हैं। वहीं समाजवादी पार्टी के विधायक अबु आसिम आजमी ने भी आव्हाड को तत्काल मंत्रिमंडल से हटाने की माँग की है। उनका आरोप है कि वह इस तरह का बयान देकर मुस्लिमों को गलत रास्ते पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं।

गौरतलब है कि त्रिपुरा की कथित हिंसा के विरोध में महाराष्ट्र के नांदेड़, अमरावती और मालेगाँव में 12 नवंबर 2021) मुस्लिम संगठनों ने जमकर विरोध किया। जबरन दुकानें बंद करवाई गईं और पुलिस पर भी पथराव हुआ। अमरावती से एक वीडियो सामने आई थी। इसमें मुस्लिम समूहों के कुछ लोग चौक पर खड़े होकर तिरंगा लेकर नारेबाजी कर रहे थे। उस समय महाराष्ट्र के गृहमंत्री दिलीप वालसे पाटिल ने कहा था, “पूरे राज्य भर के मुस्लिमों ने आज त्रिपुरा में हुई हिंसा के विरोध में मार्च किया। इस दौरान नांदेड़, मालेगाँव और अमरावती समेत कई जगहों पर हिंसा हुई। मैं हर हिंदू और मुस्लिम से शांति कायम करने की अपील करता हूँ।”