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यीशु के नाम पर शैतानों को भगाने का खेल: नडियाद के ईसाई समूह ने गोधरा में कराया धर्मांतरण, वायरल वीडियो से खुली पोल

गुजरात के पंचमहल के गोधरा से जबरन धर्म परिवर्तन का मामला सामने आया है। मामले की जानकारी रखने वाले एक सूत्र ने बताया, गोधरा के भुरवाव इलाके में रहने वाले सिंधी समुदाय के एक व्यक्ति की तबीयत ठीक नहीं थी, वह कुछ महीने पहले नडियाद के कुछ ईसाई पादरियों के संपर्क में आया था। वे नडियाद से आए और उनके कुछ अनुष्ठान करने के बाद, वह आदमी बेहतर महसूस करने लगा।

अनुष्ठान का वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था। ऐसा कहा जाता था कि उसका धर्म परिवर्तन नहीं हुआ था, उन्होंने धर्मांतरण से पहले की रस्में पूरी की थीं। ऐसा ही एक और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें एक आदमी को फर्श पर लेटा हुआ और जोर-जोर से साँस लेते देखा जा सकता है। उसके पास खड़े लोग ‘हालेलुया’ बोल रहे हैं, जबकि एक आदमी ‘शोर न करने’ के लिए एक अदृश्य शक्ति को निर्देश दे रहा है और कह रहा है, ”उसे छोड़ दो यीशु के नाम के रूप में मेरे जीसस ने इसे हरा दिया है।” वह आदमी फिर से उठता है और काँपने लगता है, जबकि दूसरा आदमी कहता है कि वह काँपते हुए आदमी पर यीशु का नाम लेकर हाथ फेर रहा है। उनके आसपास हर कोई ‘आमीन’ कह रहा है।

एक अन्य वीडियो में वही आदमी कुर्सी पर बैठा हुआ जोर से काँप रहा है। काँपते हुए वह कुर्सी से फर्श पर गिर जाता है। इसके बाद दूसरा आदमी फिर से उस आदमी को छूता है और यीशु के नाम पर यीशु के पास वापस जाने के लिए जो कुछ भी है उसे ‘निर्देश’ दे रहा है और फिर वह इस कृत्य को ‘हालेलुया’ कहकर समाप्त करता है।

इसी घटना का एक और ऐसा ही वीडियो सामने आया है, जिसमें एक और आदमी प्लास्टिक के बड़े से टब में थूकता हुआ दिखाई देता है, जब वही आदमी ‘यीशु के नाम पर’ एक अदृश्य व्यक्ति को उसके शरीर से बाहर आने के लिए कहता है।

घटना का वीडियो वायरल होने के बाद पड़ोसी सतर्क हो गए और उन्होंने अपने आसपास होने वाली संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखना शुरू कर दिया था। इसलिए जब ईसाइयों का वही समूह नडियाद से दोबारा आया तो पड़ोसियों को घर में हो रही संदिग्ध गतिविधियों पर शक हुआ और उन्होंने इसकी सूचना पुलिस को दी। सूचना पाकर मौके पर पहुँची पुलिस ईसाइयों के समूह को अपने साथ ले गई और आगे की जाँच में जुट गई। हालाँकि, इस संबंध में कोई मामला दर्ज नहीं किया गया था।

घर के मालिक का कहना है कि वे सभी जन्मदिन की पार्टी में शामिल होने के लिए आए थे। वहीं, स्थानीय विश्व हिंदू परिषद के नेता ने आरोप लगाया है कि एक व्यक्ति जिसका नाम स्टिवन मैकवान (Stivan Macwan) है, वह सोशल मीडिया के माध्यम से जबरन धर्म परिवर्तन करवाता है। नव गुजरात टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, विहिप नेता इमेश पारिख ने आरोप लगाया है कि ईसाई मिशनरी पहले दाहोद रोड क्षेत्र के पास आदिवासियों के जबरन धर्म परिवर्तन मामले में शामिल थे। अधिकारियों को इसके बारे में सूचित किया गया था, इसके बावजूद उन्होंने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की।

स्थानीय मीडिया हाउस Vadpad टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार, सिंधी समुदाय ने पुलिस को एक ज्ञापन सौंपा है। उनका कहना है कि भुरवाव क्षेत्र में एक शिव शक्ति सोसायटी है। प्रतीक खिमानी नाम का एक शख्स वहाँ रहता है। दो साल पहले वह कथित तौर पर नडियाद में ‘सेव द सोल रिस्टोरेशन रिवाइवल’ के संपर्क में आया था, जिसका मुखिया स्टीफन मैकवान है। मैकवान कथित तौर पर ईसाई मिशनरी का काम करने और धर्म परिवर्तन का प्रचार करने में शामिल है।

सितंबर 2021 में मैकवान गोधरा में खिमानी के घर आया था, जहाँ उन्होंने किसी को ईसाई धर्म में कन्वर्ट करने के लिए विभिन्न अनुष्ठान किए थे। अनुष्ठान की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी, तब जाकर सिंधी समुदाय के प्रमुख सदस्यों को इसके बारे में पता चला था।

ये लोग ( ईसाई समुदाय) खिमानी के घर भी गए और उसे हिंदू धर्म छोड़ने के लिए हतोत्साहित किया। हालाँकि, खिमानी और उनका परिवार धर्म परिवर्तन के लिए काफी उत्सुक था। रिपोर्ट में कहा गया है कि सिंधी समुदाय के सदस्यों को बाद में पता चला कि ईसाई मिशनरी संगठन ने खिमानी को आर्थिक मदद प्रदान की थी। इसके अलावा, खिमानी के भाई नीलेश अस्वस्थ रहते थे, जिन्हें मैकवान और ईसाई समूह के अन्य सदस्यों ने यीशु की प्रार्थना और बाइबिल पढ़ने के लिए कहा था, जिससे उनकी सभी परेशानियाँ दूर हो सकें।

ज्ञापन में सिंधी समुदाय के सदस्यों ने कहा कि इस तरह मैकवान उनके समुदाय के लोगों को ईसाई धर्म का लालच देकर उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचा रहा है। उन्होंने पुलिस से इस तरह के जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ कार्रवाई करने की अपील की है। इस बीच इन सबकी जानकारी रखने वाले एक सूत्र ने कहा कि जब धर्म परिवर्तन नहीं हुआ था, वे सिंधी समुदाय के सदस्यों को पास के एक मंदिर में ले गए और एक पूजा की। इसके साथ ही उन्हें भरोसा दिलाया कि वे मुश्किल समय में उनका साथ देंगे, उन्हें अपना धर्म भी नहीं छोड़ना पड़ेगा। समुदाय के सदस्यों ने भी परिवार को हिंदू धर्म में रखने के लिए उनको समर्थन देने का आश्वासन दिया।

‘महिलाएँ सजावट की वस्तु नहीं’: 6 महिला सांसदों के साथ शशि थरूर की ‘सुबह-सुबह वाली’ सेल्फी, लोगों ने बताया सेक्सिज्म

कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर की 6 महिला सांसदों के साथ एक तस्वीर खूब वायरल हो रही है। इस तस्वीर को खुद शशि थरूर ने अपने ट्विटर पर शेयर किया है। यह तस्वीर संसद के शीतकालीन सत्र के पहले दिन का है। इस तस्वीर को लेकर लोगों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। खासतौर पर कई लोगों ने शशि थरूर की सोच पर सवाल उठा दिया है।

कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर ने तस्वीर को शेयर करते हुए कहा, “कौन कहता है कि लोकसभा काम करने के लिए आकर्षक जगह नहीं है? आज की सुबह मेरे छह साथी सांसदों के साथ।” इस तस्वीर में कॉन्ग्रेस सांसद परनीत कौर और जोथिमनी, टीएमसी सांसद नुसरत जहाँ और मिमी चक्रवर्ती, एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले, डीएमके सांसद थमिज़ाची थंगापांडियन मौजूद हैं।

कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर की इस तस्वीर की लोग खिंचाई कर रहे हैं। तस्वीर पर कमेंट करते हुए वकील करुणा नंदी ने कहा, “शशि थरूर ने चुने गए राजनेताओं को उनके लुक तक सीमित करने की कोशिश की और खुद को केंद्र में दिखाया है।”

शशि थरूर की तस्वीर पर एक ट्विटर यूजर मोनिका ने लिखा, “मुझे यकीन है कि इस खुलेआम सेक्सिज्म पर वामपंथी उदारवादियों की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आएगी, जैसी उत्तराखंड के सीएम तीरथ रावत के फटे जींस विवाद पर आई थी।”

वहीं ट्विटर यूजर विद्या ने कहा, “महिलाएँ लोकसभा को आकर्षक बनाने की सजावटी सामान नहीं हैं, वे सांसद हैं और आप अपमान कर रहे हैं।”

राष्‍ट्रीय महिला आयोग की चेयरपर्सन रेखा शर्मा ने लिखा, “आप संसद और राजनीति में उनके (महिला सांसदों) योगदान को आकर्षण की वस्तु बनाकर नीचा दिखा रहे हैं। संसद में महिलाओं को ऑब्जेक्टिफाई करना बंद करें।”

एक यूजर ने लिखा, “ज़िंदगी का असली मज़ा तू ही ले रहा है दोस्त।”

फरीदाबाद के तिगांव विधानसभा क्षेत्र से विधायक राजेश नागर ने कहा, “मिस्टर थरूर, लोकसभा महिलाओं के साथ सेल्फी लेने और उन्हें “आकर्षक” कहने के लिए नहीं, कानून बनाने के लिए है। आप भावी सांसदों के लिए गलत मिसाल कायम कर रहे हैं।”

सोशल मीडिया पर ट्रोल होने के बाद शशि थरूर ने सफाई देते हुए कहा, “सेल्‍फी मजाकिया अंदाज में ली गई थी और उन्‍होंने (महिला सांसदों) ने मुझसे उसी अंदाज में ट्वीट करने को कहा था। आई एम सॉरी अगर कुछ लोगों को बुरा लगा हो लेकिन मैं वर्कप्‍लेस पर ऐसे मेल-मिलाप के प्रदर्शन में शामिल होकर खुश था। बस इतनी सी बात है।”

मुनव्वर फारुकी पर कुणाल कामरा ने दिया अजीबोगरीब बयान, सवाल पूछने पर ट्विटर यूजर के इनबॉक्स में घुस कर बकी गाली

तथाकथित कॉमेडियन कॉमेडियन कुणाल ने एक ट्विटर यूजर को गाली दी है। उन्होंने अपने साथी कॉमेडियन मुनव्वर फारुकी वाले बयान की आलोचना किए जाने पर ऐसा किया। एक पत्रकार ने उनसे इस सम्बन्ध में बयान माँगा था, जिसके जवाब में उन्होंने ये बयान जारी किया। हालाँकि, इस बयान में ये समझ में नहीं आया कि वो क्या बातें कर रहे हैं और क्या कहना चाहते हैं। उन्होंने दावा किया कि बढ़ते समय के साथ उन्हें हमेशा ये महसूस होता जा रहा है कि कॉमेडियंस को हँसी की ज्यादा से ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है।

कुणाल कामरा ने दावा किया कि कॉमेडियंस को स्वाभाविकता और अपने मनोवेग की कीमत चुकानी पड़ रही है। कुणाल कामरा ने दावा किया कि अब कॉमेडियंस अपने चुटकुलों को अपन वकीलों और लीगल टीम को दिखा रहे हैं, ताकि परफॉर्मेंस के दौरान उसके कारण उन्हें कानूनी दिक्कतों का सामना न करना पड़े। उन्होंने लिखा कि किसी भी कॉमेडियन द्वारा अपने मन की बात कहने से पहले काफी सोच-विचार करना पड़े तो उसका अर्थ है कि कला को एक धीमी मौत मारा जा रहा है।

कुणाल कामरा ने दावा किया कि हँसी सुंदर, ईमानदार और सहज होती है, ऐसे में एक कॉमेडियन जब इस पर विचार-विमर्श करने लगता है कि वो ऐसा क्या बोलेगा जिस पर लोग हँसने वाले हैं, फिर तो ऑडिएंस भी ये सोचने लगेंगे कि वो किन चीजों पर हँसें और किन पर नहीं। उन्होंने फिर एक कोट शेयर किया, जिसमें लिखा था कि अगर आप हँस रहे हैं तो आप न तो इतिहास में रह सकते हैं और न ही भविष्य में। उन्होंने दावा किया कि हँसी की अनंत और असामयिक सुंदरता को अपराध बताया जा रहा है, सज़ा दी जा रही है।

कुणाल कामरा ने लिखा कि अगर आप किसी कॉमेडियन के पास बयान के लिए जा रहे हैं और वो जोक मारने के भी प्रयास नहीं कर रहा, वो विचार कर के प्रतिक्रिया दे रहा है तो वो प्राकृतिक प्रतिक्रिया नहीं दे रहा। हालाँकि, उनके समर्थकों ने ही इस पर आपत्ति जतानी शुरू कर दी। किसी ने कहा कि उन्होंने अपने बयान में मुनव्वर फारुकी का नाम नहीं लिया तो किसी ने कहा कि उन्होंने मुस्लिमों के विरुद्ध हो रहे ‘व्यवस्थित अत्याचार’ पर चर्चा नहीं की। इसके बाद उन्होंने लोगों के इनबॉक्स में घुस कर भी रिप्लाइज दिए। एक को उन्होंने ‘वोकलेट कचरे का टुकड़ा’ बता दिया।

श्री करतारपुर साहिब में कपड़ों के ब्रांड के लिए फोटो शूट, पाकिस्तानी मॉडल ने सिर भी नहीं ढके थे: सिरसा ने कहा- ये बेअदबी बर्दाश्त नहीं

श्री करतारपुर साहिब गुरुद्वारा परिसर में कपड़ों के ब्रांड ‘मन्नत’ के लिए एक पाकिस्तानी मॉडल की फोटो शूट की तस्वीरें सामने आईं हैं। इसमें मॉडल ने सिर भी नहीं ढक रखे हैं। शिरोमणि अकाली दल (SAD) के नेता और दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा ने इसे बेअदबी बताते हुए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान से कार्रवाई की माँग की है। 

सिरसा ने नाराजगी व्यक्त करते हुए पूछा है कि क्या मॉडल पाकिस्तान में अपने मजहबी स्थल पर ऐसा कर सकती है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि गुरुद्वारा दरबार साहिब को पिकनिक स्पॉट बनाने के ट्रेंड पर तुरंत रोक लगे।

उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा, “श्री गुरु नानक देव जी के इस धार्मिक स्थान श्री करतारपुर साहिब में ऐसा ओछा व्यवहार ‘बेअदबी’ है। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थानों पर ओछा व्यवहार करने वालों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करे। हमें ये बेअदबी बिल्कुल बर्दाश्त नहीं।” इस ट्वीट में उन्होंने पाकिस्तान सरकार और प्रधानमंत्री इमरान खान को भी टैग किया है।

उन्होंने कहा, “पाकिस्तान स्थित गुरुद्वारा करतारपुर साहिब में आज बहुत ही दु:खदायी घटना हुई। एक मॉडल ने डांस करते हुए अपना वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर डाला। यह गुरु घर की बहुत बड़ी बेअदबी है, अपमान है। ये किसी भी सूरत में हम बर्दाश्त नहीं कर सकते।” उन्होंने उस घटना का भी हवाला दिया है जब मस्जिद में शूट को लेकर पाकिस्तानी अभिनेत्री सबा कमर पर एफआईआर दर्ज की गई थी। उसी तरह इस मामले में भी उन्होंने कार्रवाई की माँग करते हुए कहा कि वे हैरान हैं कि पाकिस्तान सरकार ने अब तक इसके ऊपर चुप्पी क्यों साध रखी है।

कपड़ों के ब्रांड मन्नत द्वारा अपलोड की गई तस्वीरों पर प्रतिक्रिया देते हुए, दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन समिति के पूर्व अध्यक्ष परमजीत सिंह सरना ने ज़ी न्यूज़ से कहा कि यह एक ‘अत्यधिक आपत्तिजनक’ कृत्य है जिसने सिख धार्मिक भावनाओं को ‘गंभीर रूप से आहत’ किया है।

बता दें कि मॉडल ने ऑनलाइन शॉप ‘मन्नत’ के लिए गुरुद्वारा साहिब के परिसर में फोटोशूट करवाया और दरबार साहिब की ओर पीठ कर नंगे सिर पोज दिए। मॉडल ने सिख परंपरा के मुताबिक सिर तक नहीं ढका था। ऑनलाइन स्टोर के मालिक ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर नंगे सिर वाली मॉडल की कई ‘आपत्तिजनक तस्वीरें’ पोस्ट की, जिसके वायरल होने पर बवाल मच गया। तस्वीरों में मॉडल ने लाल रंग का सूट पहने कैमरे के लिए बिना सिर ढके पोज देती हुई नजर आ रही है और उसके बैकग्राउंड में गुरुद्वारा दरबार साहिब है। सिख समुदाय ने मॉडल की इस हरकत पर आपत्ति जताई है। 

वाराणसी के लल्लापुरा में 6 साल की मासूम बच्ची से रेप, 27 साल के आरोपित निसार को खोज रही यूपी पुलिस

उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में 6 साल की एक नाबालिग बच्ची के साथ रेप का मामला प्रकाश में आया है। आरोपित का नाम निसार है जिसकी उम्र लगभग 27 साल है। पुलिस ने निसार पर पॉक्सो एक्ट व अन्य धाराओं में FIR दर्ज कर लिया है। घटना के बाद से आरोपित फरार है जिसकी तलाश की जा रही है। यह घटना रविवार (28 नवम्बर 2021) की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक घटना सिगरा के लल्लापुरा की है। मुहल्ले के ही एक सरकारी स्कूल में शादी थी। इसी शादी में 6 साल की बच्ची भी अपनी दादी के साथ गई थी। निसार ने बच्ची को घुमाने की बात कर के अपने साथ ले लिया। बाद में उसने एकांत में जा कर बच्ची के साथ दुष्कर्म किया। यह घटना दोपहर की है। बच्ची की तबियत काफी खराब हो गई थी तो उसने निसार द्वारा किए गए अमानवीय कृत्य की जानकारी परिवार वालों को दी। शाम को ही पीड़िता के परिजनों ने पुलिस में शिकायत की।

ADCP प्रबल प्रताप के साथ मौके पर पहुँचे पुलिस बल ने बच्ची के बयान दर्ज किए। आस-पास की CCTV फुटेज को खँगाला गया। शादी में मौजूद लोगों से पूछताछ के साथ अन्य फॉरेंसिक जाँच आदि करवाई जा रही है। एक स्थानीय पोर्टल की रिपोर्ट के अनुसार आरोपित निसार अपने घर पर ही बुनकर का काम करता है।

त्रिपुरा में ऐसे खिला कमल, मुरझा गया सारा प्रोपेगेंडा: जानिए बीजेपी की नॉर्थ-ईस्ट पॉलिटिक्स के लिए ये नतीजे कितने शुभ

त्रिपुरा निकाय चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने 334 में से 239 सीटों पर जीत दर्ज की है। अगरतला महानगर पालिका में पार्टी सभी 51 सीटों पर विजयी रही। भाजपा के 112 प्रत्याशी निर्विरोध चुने गए। पार्टी ने जिस तरह का प्रदर्शन किया, उसे असाधारण माना जा सकता है। चुनाव से पहले प्रदेश में बनाए गए राजनीतिक माहौल का चुनाव परिणाम पर असर न के बराबर रहा। परिणाम से साफ है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस ने पश्चिम बंगाल से नेताओं को भेज त्रिपुरा में जिस तरह का राजनीतिक माहौल को खड़ा करने का प्रयास किया, उसे स्थानीय लोगों में स्वीकृति नहीं मिली पाई। ऐसे में परिणाम के बाद अपने सदस्यों और नेताओं को बधाई देते हुए अभिषेक बनर्जी द्वारा जो कहा गया, वह आश्चर्यचकित नहीं करता।


पश्चिम बंगाल में भारी जीत के बाद पिछले कुछ महीनों से उत्तर-पूर्वी राज्यों में तृणमूल कॉन्ग्रेस की विस्तार की महत्वाकांक्षी योजना की काफी चर्चा रही है। इस प्रक्रिया में दल को त्रिपुरा में होने वाले निकाय चुनावों के रूप में पहला पड़ाव नजर आया था। यही कारण था कि दल के नेताओं ने राज्य के कई दौरे किए और काफी हद तक ऐसा माहौल बनाने की कोशिश जिसमें तृणमूल कॉन्ग्रेस द्वारा वहाँ उलटफेर की संभावना दिखाई दे। मीडिया में इस बात की चर्चा की गई कि भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगाड़ दी है। बांग्लादेश में हिंदुओं के विरुद्ध हुई हिंसा के विरोध में हिंदू संगठनों के प्रदर्शन को लेकर अफवाहें फैलाई गई। अंतिम दॉंव के रूप में तृणमूल कॉन्ग्रेस चुनावों को स्थगित करने के उद्देश्य से सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँच गई, पर चुनाव परिणाम आने के बाद फिलहाल राजनीतिक स्थिति स्पष्ट हो गई है।

ऐसे एकतरफा चुनाव परिणाम के क्या कारण हो सकते हैं? यह प्रश्न इसलिए और प्रासंगिक हो जाता है क्योंकि अगले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में वापस न आने के दावे किए जाने लगे थे। राज्य के मुख्यमंत्री बिप्लब देब शुरू से ही लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम के निशाने पर रहे हैं। शुरुआती दिनों में उनकी हर बात और हर बयान पर न केवल बहस का मुद्दा बनाया गया, बल्कि उन बयानों पर कई बार अफवाह और भ्रम भी फैलाया गया। समस्या यह थी कि इस इकोसिस्टम के लोगों को बिप्लब देब की राजनीति की समझ नहीं थी, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें अचानक त्रिपुरा की राजनीति में उतार दिया था। राज्य की उनकी समझ और लोगों के साथ उनके समीकरण की समझ त्रिपुरा के बाहर बैठे लोगों को नहीं थी।

डेमोग्राफी में बदलाव के विषय पर उत्तर-पूर्वी राज्यों में असम की तरह ही त्रिपुरा का भी एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य रहा है। लंबे समय तक चलने वाली वाम मोर्चे की सरकार ने त्रिपुरा को जिस स्तर का शासन और प्रशासन दिया उससे राज्य की जनता परेशान तो थी, लेकिन पश्चिम बंगाल की तरह उसके पास विकल्प दिखाई नहीं दे रहा था। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी के रूप में उसे जब विकल्प मिला तो जनता को वामपंथियों से छुटकारा मिला और वामपंथियों के शासन से तंग आ चुकी जनता को एक युवा मुख्यमंत्री में नई राजनीति की आशा दिखी। यही कारण है कि वर्तमान मुख्यमंत्री काफी लोकप्रिय हैं और जनता उन्हें मौके देने से पीछे नहीं हटना चाहती।

इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि वर्षों तक सत्तासीन रहे वामपंथियों के पास सरकारी योजनाओं की डिलीवरी की जो प्रशासनिक मशीनरी थी, उसे पूरी तरह से जंग लग गया था। स्थानीय लोगों का ऐसा मानना है कि वर्तमान सरकार आने के बाद केंद्र और राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही सरकारी योजनाओं का लाभ काफी हद तक जनता तक पहुँचता रहा है। त्रिपुरा जैसे छोटे राज्यों में यह सुनिश्चित करना अपने आप में बड़ा काम माना जाता है और वर्तमान मुख्यमंत्री को इस बात की समझ है कि छोटे-छोटे प्रयासों से यह काम किया जा सकता है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में पहले से चल रहे तरीकों में बदलाव लाने का प्रयास किया गया है और उसका असर भी दिखाई देता है। राज्य के कुछ कृषि उत्पादों के लिए नए बाज़ार खोजने की कोशिशों की पहचान स्थानीय लोगों द्वारा की गई है।

वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा उत्तर-पूर्वी राज्यों में विकास प्राथमिकता देने का असर बाकी राज्यों की तरह त्रिपुरा में भी दिखाई दे रहा है। राज्य के साथ देश के अन्य जगहों की कनेक्टिविटी सुलभ होने के साथ ही स्थानीय उत्पादों के लिए नए बाजार मिलने की संभावना बढ़ेगी। वर्तमान मुख्यमंत्री प्रयास करते हुए नज़र आते हैं और जनता के साथ उनके संबंध पहले से बढ़े हैं। लोगों की बात सुनने के लिए तैयार मुख्यमंत्री की उनकी छवि उनके राजनीतिक सफर का भविष्य उज्ज्वल करेगी। निकाय चुनावों के परिणाम से साफ़ है कि एक दल के तौर पर भाजपा राज्य में अपनी जड़ें जमा चुकी है और असम की तरह ही त्रिपुरा में भी लंबे समय तक सत्ता में रहने का प्रयास उत्तर-पूर्वी राज्यों को लेकर दल की योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

गोधरा में हिंदुओं को जलाना Milli Gazette के लिए ‘जायज’, इसके फाउंडर जफरूल इस्लाम को केजरीवाल ने दिया था ओहदा

हिन्दू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाने वाले स्टैंडअप कॉमेडियन मुनव्वर फारुकी के बचाव में मीडिया का एक हिस्सा इतना पागल हो गया है कि अब गोधरा में रामभक्तों को ट्रेन में ज़िंदा जलाए जाने वाली घटना का भी समर्थन कर रहा है। ये करतूत ‘मिली गैजेट’ नाम के एक मीडिया संस्थान ने की है, जिसके संस्थापक डॉक्टर जफरुल इस्लाम खान दिल्ली सरकार की ‘दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग’ के अध्यक्ष रह चुके हैं। वो फ़िलहाल इस वेबसाइट के ‘संस्थापक संपादक’ के पद पर भी हैं।

असल में ये सब आनंद रंगनाथन के एक ट्वीट से शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने कहा कि इजरायल में यहूदी एक वेब सीरीज को काफी पसंद कर रहे हैं, जिसमें अडोल्फ हिटलर के ‘मानवीय पक्ष’ को दिखाया गया है। उसके ‘शाकाहार’ और ‘कुत्तों के प्रति प्यार’ को भी इसमें दर्शाया गया है। उन्होंने लिखा कि इस वेब सीरीज का नाम ‘The Empire’ रखा जाना था, लेकिन फिर किसी ने इसका नाम ‘The Reich’ रखना पसंद किया। उन्होंने लिखा कि अगर आप यहूदी हैं तो इस वेब सीरीज को ज़रूर देखें।

इसके बाद JNU के प्रोफेसर आनंद रंगनाथन ने लिखा, “मुनव्वर फारुकी के लिए 59 हिन्दू पुरुषों-महिलाओं-बच्चों-शिशुओं को को गोधरा में ज़िंदा जलाया जाना ऑशविच कैंप में नाजियों द्वारा यहूदियों के नरसंहार के समान ही है। अगर वो सोचते हैं कि ऐसी घटनाओं का अमानवीयकरण करना मजाक-मस्ती है, तो फिर आप एक मानसिक पागल हैं। आपको मेडिकल मदद की ज़रूरत है।” ज़फरुल इस्लाम द्वारा संचालित ‘मिली गैजेट’ ने इसी ट्वीट पर प्रतिक्रिया दी।

मीडिया संस्थान ने संवेदनहीनता का परिचय देते हुए लिखा, “क्या मुनव्वर फारुकी ने इस तरह की टिप्पणी की कि अगर उनकी कार के नीचे एक कुत्ता भी आ जाता है तो वो दुःखी हो जाते हैं। इससे ज्यादा अमानवीयकरण क्या हो सकता है? क्या गोधरा और ऑशविच समान हैं? वाऊ, यहूदी ट्रेन में ठेले वालों और लोगों पर हमले कर रहे थे। साथ ही वो रेलवे स्टेशनों पर हमले कर के एक धार्मिक इमारत को गिराए जाने का जश्न मना रहे थे?” लोगों ने ‘मिली गैजेट’ से पूछा कि क्या हिन्दुओं को ज़िंदा जलाया जाना उसके लिए एक दुःख भरी घटना नहीं है?

ज़फरुल इस्लाम हैं ‘मिली गैजेट’ के संस्थापक-संपादक

दिल्ली के पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा ने मीडिया संस्थान के बयान की आलोचना करते हुए लिखा, “59 मासूम, जिनसे 27 महिलाएं और 10 छोटे बच्चे थे, उनकी हत्या को सही साबित किया जा रहा हैं इस मिल्ली गैजेट का संपादक जफरुल इस्लाम जिसको दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष बनाया गया।” लोगों ने मीडिया संस्थान को हिन्दूफोबिक करार दिया। लोगों ने पूछा कि मुस्लिम भीड़ द्वारा हिन्दुओं को ज़िंदा जलाए जाने की घटना को वो जायज क्यों ठहरा रहा है?

गौरतलब है कि 28 अप्रैल को जफरुल इस्लाम ने ट्वीट कर कहा था कि कट्टर हिन्दुओं को शुक्र मनाना चाहिए कि भारत के समुदाय विशेष ने अरब जगत से कट्टर हिन्दुओं द्वारा हो रहे ‘घृणा के दुष्प्रचार, लिंचिंग और दंगों’ को लेकर कोई शिकायत नहीं की है और जिस दिन ऐसा हो जाएगा, उस दिन अरब के लोग एक आँधी लेकर आएँगे, एक तूफ़ान खड़ा कर देंगे। जफरुल खान के समर्थन में 8 मई को 20 मौलवियों और नेताओं ने एक संयुक्त बयान जारी करते हुए उनके खिलाफ दर्ज देशद्रोह के मुकदमे को वापस लेने की माँग की थी।

₹10 लाख लेकर तस्करों को भगाने का आरोप, अपनी शादी में जमकर नाची बर्खास्त SHO: खोजती रही राजस्थान पुलिस

राजस्थान के सिरोही जिले में 10 लाख रुपए लेकर तस्करों को भगाने के आरोप में बर्खास्त एसएचओ सीमा जाखड़ पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है। इसी बीच उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया है। बताया जा रहा है कि वायरल वीडियो उनकी शादी का है। हैरानी की बात तो यह है कि राजस्थान पुलिस को भी इसकी कानों कान खबर नहीं हुई।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, शादी का निमंत्रण कार्ड भी सामने आया है। रविवार (28 नवंबर 2021) को SHO सीमा जाखड़ ने सुखराम कालीराणा के साथ सात फेरे लिए। जोधपुर के मंडोर रोड क्षेत्र के किशोरबाग में निजी गार्डन में दोनों का विवाह संपन्न हुआ। विवाह के दौरान बड़ी संख्या में मेहमान भी शामिल हुए थे।

शहर के किशोर बाग स्थित एक विवाह स्थल पर चल रहे कार्यक्रम में सीमा जाखड़ शनिवार रात अपने परिवार वालों के साथ डांस करती नजर आई थीं। बताया गया था कि सिरोही पुलिस सीमा की तलाश में यहाँ भी आई थी, लेकिन वह उन्हें नहीं मिली, जबकि वह बीते कुछ दिनों से उसी विवाह स्थल पर रस्में निभा रहीं थी। सीमा जाखड़ के खिलाफ भले ही विभागीय कार्रवाई हुई है, लेकिन उसके घर और ससुराल में खुशी का माहौल है। 

बता दें कि बरलूट थाने में जो एफआईआर सीमा जाखड़ ने तस्करों के फरार होने की दर्ज कराई थी, उसमें वही आरोपित हैं। जाँच में यह साबित होने के बाद 26 नवंबर को ही जोधपुर के विद्यानगर की रहने वाली सीमा जाखड़ के साथ 3 अन्य कॉन्स्टेबलों सुरेश विश्नोई, हनुमान विश्नोई और ओम प्रकाश विश्नोई को भी बर्खास्त कर दिया गया था। मामले की जाँच कर रहे सिरोही के स्वरूपगंज थाना अधिकारी हरि सिंह राजपुरोहित ने बताया कि सभी आरोपित अभी फरार हैं। उनकी तलाश की जा रही है। डीएसपी मदन सिंह ने भी फरार होने की पुष्टि की है।

‘कॉन्ग्रेस में अब योग्य लोगों को नहीं मिल रहा स्थान, पार्टी से दूर हो रहा मुसलमान’: उपेक्षित महसूस कर रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री के रहमान खान

पूर्व केंद्रीय मंत्री और कॉन्ग्रेस पार्टी के सीनियर नेता के. रहमान खान ने अपनी ही पार्टी पर मुस्लिमों को नजरअंदाज़ करने का आरोप लगाया है। उन्होंने बताया कि अब कॉन्ग्रेस में मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व पहले जैसा नहीं रहा। इसीलिए देश के सबसे पुराने दल को मुस्लिम अपना नहीं मान पा रहे। इसी के साथ उन्होंने पार्टी में मौजूद मुस्लिम पदाधिकरियों की क़ाबलियत पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। यह बात उन्होंने PTI भाषा को दिए एक इंटरव्यू में कही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक के.रहमान खान ने कहा है कि कॉन्ग्रेस में अब योग्य लोगों को स्थान नहीं मिल रहा। ऑल इंडिया कॉन्ग्रेस कमेटी में कितने मुस्लिम प्रतिनिधि हैं? ये स्वीकार करना होगा कि पार्टी के संगठन के ढाँचे में बदलाव बहुत जरूरी है। देश के 20 करोड़ मुस्लिमों को अपना राजनैतिक नेतृत्व पाने की आशा कॉन्ग्रेस से ही होती है। इसके बाद भी पार्टी ने योग्य मुस्लिम चेहरों को वरीयता नहीं दी। किसी को पार्टी में लाने से पहले समाज में उसका कद देखना चाहिए।

कॉन्ग्रेस में कोई मुस्लिम चेहरा भी उभर कर आगे नहीं आ पाया। कॉन्ग्रेस की छवि मुस्लिम पार्टी की बनती जा रही थी जिस से हिन्दू उस से दूर होने लगा था। इसी वजह से अब कॉन्ग्रेस खुल कर मुस्लिमों के पक्ष में बोल भी नहीं पाती। इसे पार्टी का अपने सिद्धांतों से समझौता ही कहा जाएगा।

रहमान ने आगे कहा कि 70 सालों तक कॉन्ग्रेस के साथ खड़े अल्पसंख्यकों ने कई बार सरकार बनवाई। लेकिन अब मुस्लिमों को पार्टी के खुद से दूर जाने का शक होने लगा है। इसी शक के चलते ओवैसी जैसे नेता उभर कर सामने आ रहे हैं। मुसलमान अपनी सुरक्षा चाहता है। जब उसकी इन जरूरतों पर पार्टी खामोश रहती है तब टकराव पैदा होता है। मुसलामानों के मुद्दे पर अब लम्बे समय तक उनसे वोट लेने वाली सपा, बसपा जैसी पार्टियाँ भी बैकफुट पर हैं।

रहमान के मुताबिक अगर कॉन्ग्रेस फिर से मुस्लिम समाज को खुद से जोड़ना चाहती है तो उसे मुस्लिमों में भरोसा जगाना होगा। अपने आस-पास घूमने वालों को टिकट दे देने से कोई फर्क नहीं आने वाला। मेरा ही अनुभव कईयों के काम आएगा। मैं ओवैसी जैसे नेताओं की राजनीति से सहमत नहीं हूँ। मेरी प्रशांत किशोर से कोई मुलाक़ात नहीं है। मैंने सब कुछ कॉन्ग्रेस को दे दिया फिर भी उपेक्षित महसूस करता हूँ। हालाँकि, इसके बाद भी मैं हमेशा कॉन्ग्रेसी बना रहूँगा। मुझे कई मौके मिले लेकिन ये पार्टी मैं कभी नहीं छोड़ने वाला। फिर भी पार्टी के जिम्मेदार लोगों को विचार जरूर करना चाहिए कि लोग दूसरी पार्टियों में क्यों जा रहे हैं। के. रहमान खान राज्यसभा के पूर्व उपसभापति भी हैं।

स्कॉटलैंड में लड़कियों ने ‘जेंडर न्यूट्रल टॉयलेट्स’ के इस्तेमाल से किया इनकार: सेनेटरी पैड्स लहराते हैं लड़के, करते हैं छेड़छाड़

स्कॉटलैंड के एक सेकेंडरी स्कूल में लड़कियों ने ‘जेंडर न्यूट्रल टॉयलेट्स’ का प्रयोग करने से इनकार कर दिया है, क्योंकि उन्हें वहाँ लड़के परेशान करते हैं। उनका कहना है कि ‘जेंडर न्यूट्रल टॉयलेट्स’ में लड़के उनके साथ छेड़छाड़ करते हैं और और बर्बरता पर भी उतारू हो जाते हैं। बता दें कि उन टॉयलेट्स को ‘जेंडर न्यूट्रल’ कहते हैं, जिनमें लड़के और लड़की दोनों ही प्रयोग में ला सकते हैं। आमतौर पर पुरुषों एवं महिलाओं के लिए हर जगह अलग-अलग टॉयलेट्स ही रहते हैं।

यहाँ तक कि ‘जेंडर न्यूट्रल टॉयलेट्स’ में लड़के अक्सर सैनिटरी के लिए प्रयोग में लाने वाली वस्तुएँ हाथ में लेकर झंडे की तरह सार्वजनिक रूप से लहराते हुए नजर आते हैं, जिससे लड़कियाँ खासी असहज हो जाती हैं। साथ ही लड़के सेनेटरी बीन में पेशाब कर देते हैं। वो लड़कियों के सामने ही इस तरह की हरकतों को अंजाम देते हैं। एक अधिकारी ने बताया कि पिछले कई दिनों से लड़कियों ने इन टॉयलेट्स का प्रयोग करना बंद कर दिया है। वो शौच या यूरिनेटिंग के लिए इन सार्वजनिक शौचालयों का प्रयोग नहीं कर रही हैं।

लड़के अक्सर सैनिटरी पैड्स से भी खेलते हुए नजर आते हैं। बता दें कि अक्सर रुपए बचाने के लिए, समावेशी माहौल बनाने के लिए, विविधता को बढ़ावा देने की बातें कर के कई विद्यालयों, संस्थाओं और सार्वजनिक कारोबारों ने ‘जेंडर न्यूट्रल टॉयलेट्स’ बनाने शुरू कर दिए हैं। स्कॉटलैंड में यूनिसेक्स सैलूनों का चलन आजकल जम कर बढ़ रहा है और नए बनने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर में इसे बड़ी संख्या में देखने को मिलता है। सेकेंडरी स्कूल में इसके प्रयोगों के विरुद्ध बच्चों के अभिभावकों ने भी आवाज़ उठाया है।

हालाँकि, स्कॉटलैंड की जनसंख्या भी इस तरह के टॉयलेट्स के खिलाफ है। वहाँ की 56% जनसंख्या इसके खिलाफ हैं, वहीं 21% ने इसका समर्थन किया है। वहाँ के स्कूलों में 12 साल की बच्चियों और 18 साल के लड़कों को भी इन टॉयलेट्स का प्रयोग करने की अनुमति है। बता दें कि भारत में भी NCERT में जेंडर को लेकर की गई अजीबोगरीब बातों के बाद ‘राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग (NCPCR)’ ने संस्था के निदेशक को नोटिस भेजा था। ये शिकायत ‘इन्क्लूजन ऑफ ट्रांसजेंडर चिल्ड्रन इन स्कूल एजुकेशन: कन्सर्न्स एन्ड रोडमैप’ नामक चैप्टर को लेकर किया गया था।