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‘अखंड भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्ना, देश की आज़ादी में बड़ी भूमिका’: JDU नेता खालिद अनवर के बयान से भड़की भाजपा

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के बाद बिहार में जदयू के नेता खालिद अनवर भी जिन्ना का यशगान करते हुए नजर आए। समाचार एजेंसी एएनआई से खालिद अनवर ने कहा, ”मोहम्मद अली जिन्ना अखंड भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी थे। देश की आजादी में जिन्ना की बड़ी भूमिका थी। कॉन्ग्रेस की फूट डालो राज करो की राजनीति के कारण भारत का विभाजन हुआ।” इतना ही नहीं खालिद अनवर ने जिन्ना की तुलना राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी से भी कर डाली। उन्होंने कहा कि हम महात्मा गाँधी का सम्मान करते हैं, लेकिन किसी अन्य स्वतंत्रता सेनानी का अपमान नहीं करना चाहते।”

अनवर के मोहम्मद अली जिन्ना को देश का बड़ा स्वतंत्रता सेनानी बताए जाने पर नीतीश सरकार में सहयोगी पार्टी बीजेपी ने उन पर पलटवार किया है। बीजेपी ने कहा कि जिन्हें जिन्ना से प्रेम है वो पाकिस्तान में जाकर रह सकते हैं। नीतीश मंत्रिमंडल में बीजेपी कोटे के मंत्री सम्राट चौधरी ने कहा, ”अगर आज भी कोई जिन्ना को पसंद कर रहा है तो उनके लिए पाकिस्तान के दरवाजे खुले हैं, उनका स्वागत वहीं हो सकता है। हिन्दुस्तान में ऐसे लोगों के लिए कोई जगह नहीं है।”

इसके अलावा राष्ट्रीय जनता दल के नेता और राज्यसभा सदस्य मनोज झा ने भी जिन्ना पर बहस को ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ और ‘इतिहास के बारे में ज्ञान की कमी’ का प्रतिबिंब बताया और कहा कि ऐसा लोगों का ध्यान आम मुद्दों से भटकाने के लिए लाया गया है। दरअसल, पूर्व कानून मंत्री सलमान खुर्शीद की किताब पर उठे विवाद के संदर्भ में खालिद अनवर ने शुक्रवार (12 नवंबर) को यह बात कही। उन्होंने यह भी कहा कि खुर्शीद की किताब में भगवा आतंकवाद की बात कही गई है। यह सही नहीं है। आतंक को कोई रंग देना कि यह भगवा आतंकवाद है या हरा, सही नहीं है।

हालाँकि, यह पहली बार नहीं है, जब किसी राजनीतिक दल के नेता का जिन्ना प्रेम जागा हो। इससे पहले अखिलेश यादव, ओमप्रकाश राजभर और रामगोविंद चौधरी भी जिन्ना को लेकर सबके सामने अपना प्रेम जता चुके हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष राम गोविंद चौधरी ने मोहम्मद अली जिन्ना को राष्ट्र के स्वतंत्रता संग्राम में प्रथम पंक्ति का नेता बताया था। उन्होंने कहा कि मोहम्मद अली जिन्ना देश की आज़ादी की लड़ाई में भागी थे और उन नेताओं में वो प्रथम पंक्ति में थे। इससे पहले अखिलेश यादव और राजभर ने जिन्ना की तारीफ की थी। ओमप्रकाश राजभर ने अपने नए ‘पार्टनर’ (अखिलेश यादव) के नक्शे कदम पर चलते हुए जिन्ना की तारीफ में कसीदे पढ़ते हुए कहा था, ”अगर मोहम्मद अली जिन्ना को भारत का पहला प्रधानमंत्री बना दिया गया होता तो देश का बँटवारा नहीं होता।”

बलूचिस्तान की महिला को लोगों के सामने नंगा नचाया, सस्पेंड हुई पुलिस इंस्पेक्टर शबाना: पूछताछ के दौरान उतार लिए थे कपड़े

पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में पुलिस की अमानवीयता इस समय सुर्खियां बनी हुई है। यहाँ पर हिरासत में ली गई एक महिला को नग्न हो कर डाँस करने पर मजबूर किया गया है। इस अमानवीयता का आरोप एक महिला पुलिस इंस्पेक्टर पर लगा है। जाँच के बाद आरोपित महिला इंस्पेक्टर को बर्खास्त कर दिया गया है। यह बर्खास्तगी 11 नवम्बर 2021 (गुरुवार) को की गई है।

बर्खास्त महिला पुलिस इंस्पेक्टर का नाम शबाना इरशाद है। शबाना के अमानवीय कृत्य की जाँच क़्वेटा की एडिशनल SP परी गुल को सौंपी गई थी। उन्होंने अपनी जाँच में शबाना को दोषी पाया और उनकी बर्खास्तगी की संस्तुति की। परी गुल की रिपोर्ट के आधार पर इंस्पेक्टर शबाना को DIG क़्वेटा मुहम्मद अज़हर अकरम ने बर्खास्त कर दिया। जाँच अधिकारी एडिशनल SP परी गुल ने जाँच रिपोर्ट को अपने ट्विटर हैंडल पर शेयर करते हुए लिखा है कि न्याय की जीत होनी चाहिए।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार जिन्ना टाउनशिप में एक बच्चे की हत्या के सिलसिले में महिला को पूछताछ के लिए बुलाया गया था। जाँच में पाया गया कि पुलिस हिरासत में इंस्पेक्टर शबाना ने महिला को निर्वस्त्र किया। इसी के साथ पीड़िता को बिना कपड़ों के नाचने पर मजबूर किया गया। DIG मोहम्मद अज़हर अकरम ने महिला इंस्पेक्टर शबाना के इस कृत्य पर नाराजगी जताई है। उनके अनुसार यह अधिकारों का दुरूपयोग है। बताया जा रहा है कि जब महिला को नग्न नृत्य करने पर मजबूर किया गया तब वहाँ पर और भी लोग मौजूद थे।

एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार आरोपित महिला इंस्पेक्टर ने अपने बचाव में कुछ नहीं कहा। सुरक्षा के दृष्टिकोण से जेल में महिला कैदियों से पूछताछ के लिए महिला पुलिस अधिकारी की ही नियुक्ति की गई थी। यहाँ गौरतलब है कि बलूचिस्तान के निवासी पाकिस्तान की पुलिस और फ़ौज पर आए दिन अमानवीयता का आरोप लगाया करते हैं।

हिन्दू लड़की को भगा ले गया शरीकुर्रहमान, नाम बदल फेसबुक से की थी दोस्ती: पीड़िता ने दर्ज कराया जबरन निकाह और धर्मांतरण का मामला

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर से धर्मांतरण के बाद निकाह के प्रयास का ​मामला सामने आया है। फतेहपुर के खखरेरू थाना क्षेत्र के कोट निवासी शरीकुर्रहमान ने कुछ दिनों पहले नाम बदलकर एक युवती से दोस्ती की फिर उसे भगाकर अपने गाँव ले गया। इसके बाद उसने युवती का धर्मांतरण कर उससे निकाह करने की कोशिश की। पुलिस ने आरोपित के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है। बताया जा रहा है कि पुलिस ने पश्चिम बंगाल की रहने वाली युवती के परिवार को सूचना देने के साथ युवक के किसी नेटवर्क से जुड़े होने आशंका पर जाँच शुरू कर दी है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, शरीकुर्रहमान जिस युवती को अपने साथ गाँव लेकर आया था। उसके पहनावे से लोगों को शक हुआ कि वह किसी दूसरे धर्म की है। शुक्रवार (12 नवंबर 2021) को शरीकुर्रहमान युवती से निकाह करने जा रहा था, लेकिन उसके ऐसा करने से पहले ही गाँव वालों ने एसपी को सूचना दे दी।

इसके बाद पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दोनों को निकाह से पहले ही हिरासत में लिया। पूछताछ में युवती ने पुलिस को अपना हिंदू नाम बताया और कहा कि वह पश्चिम बंगाल के जनपद नार्थ चौबीस परगना थाना खरदह की रहने वाली है। शरीकुर्रहमान से उसकी दोस्ती फेसबुक से हुई थी। तब उसने अपना दूसरा नाम बताया था। इसके बाद दोनों में नजदीकियाँ बढ़ीं और उन्होंने शादी करने का फैसला किया। इसके बाद वह भागकर युवक के साथ उसके गाँव चली आई। यहाँ पहुँचने पर उसे पता चला कि युवक हिंदू नहीं, बल्कि मुस्लिम है।

पुलिस ने बताया कि युवक धर्म परिवर्तन कराकर युवती से निकाह की कोशिश कर रहा था। युवती की शिकायत पर शरीकुर्रहमान के खिलाफ जाति-धर्म छिपा भगाकर लाने और धर्मांतरण करा जबरन निकाह की कोशिश करने का मुकदमा दर्ज किया गया है। युवती को उसके परिजनों को सौंप दिया जाएगा।

गाँधी की हत्या के बाद गुंडों ने हमला किया तो अकेले लाठी लेकर भिड़ गई थीं वीर सावरकर की पत्नी यमुनाबाई: कहानी ‘त्या तिघी’ में से एक की

महान स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर के बारे में तो हम सब जानते हैं, लेकिन उनकी पत्नी यमुनाबाई भी एक सच्ची देशभक्त थीं। पति कालापानी की सज़ा काट रहे थे, इलाज के बिना छोटे से बच्चे की मौत हो गई थी और रोज अंग्रेज परेशान करते रहते थे। ऐसी स्त्री किन कष्टों से गुजर रही होगी, आप खुद ही सोचिए। लेकिन, फिर भी उन्होंने महिलाओं में देश के लिए स्वाभिमान जगाने का अभियान चलाया। वीर सावरकर की माँ का कम उम्र में ही देहांत हो गया था।

परिवार में एक महिला की ज़रूरत महसूस हुई तो मात्र 11 वर्षों की उम्र में ही विनायक दामोदर के बड़े भाई गणेश सावरकर का विवाह यशोदाबाई से कर दिया गया। उन्हें प्यार से येसुवाहिनी भी कहते थे। पिता की भी मृत्यु हो चुकी थी। ऐसे में दबे भाई ने छोटों को पढ़ाने का जिम्मा उठाया। भाभी ने वीर सावरकर को मैट्रिक पास कराने के लिए अपने गहने तक बेच दिए थे। आगे की पढ़ाई के लिए धन नहीं था, ऐसे में जवाहर रियासत के दीवान भाऊराव चिपलूनकर आगे आए।

उन्होंने अपनी बेटी यमुनाईबाई की शादी वीर सावरकर से करने और उनकी उच्च-शिक्षा का जिम्मा उठाने का प्रस्ताव दिया। चार भाई और सात बहनों में सबसे बड़ी यमुनाबाई सावरकर परिवार में मँझली बहू बन कर आईं। बता दें कि सबसे छोटे नारायण सावरकर की शादी शांतिबाई से हुई थी। कभी चाँदी की थाली में खाने वाली रईस घराने की यमुनाबाई ने ससुराल आते खुद को विपरीत माहौल में भी ढाल लिया। उन्हें सब प्यार से ‘माई’ बुलाते थे। सावरकर परिवार की इन तीनों महिलाओं पर ‘त्या तिघी’ नाम के नाटक का मंचन भी किया जाता है।

‘दैनिक जागरण’ में प्रकाशित यशा माथुर के लेख के अनुसार, ‘त्या तिघी’ में यमुनाबाई का किरदार निभाने वाली पुणे की अभिनेत्री अपर्णा सुरेंद्र चौथे बताती हैं कि माई ने पूरे संयुक्त परिवार को अपना लिया था। सावरकर जब लंदन में संघर्ष कर रहे थे, तब उन्होंने अपने बेटे को चेचक के कारण खो दिया था। पति को कालापानी ले जाए जाने से पहले मुंबई के डोंगरी जेल में वो उनसे मिली थीं। वीर सावरकर ने तब उनसे कहा था कि तिनके-तीलियाँ बटोर कर बच्चों के पालन-पोषण को कर्तव्य कहते हैं तो ये काम तो पशु-पक्षी भी कर लेते हैं।

वीर विनायक दामोदर सावरकर ने अपनी पत्नी से कहा था कि उन्होंने पूरे देश को ही अपना परिवार मान लिया है, इस पर गर्व कीजिए। उन्होंने कहा कि अगर मैं नहीं भी लौटा तो अगले जन्म में मिलेंगे। तब यमुनाबाई की उम्र मुश्किल से 25-26 वर्ष रही होगी। 1927 में महात्मा गाँधी अपनी पत्नी कस्तूरबा के साथ रत्नागिरी स्थित वीर सावरकर के आवास पर गए थे। 90 मिनट तक यमुनाबाई और कस्तूरबा रसोई में मिली थीं। धार्मिक महिला यमुनाबाई रोज पूजा-पाठ करती थीं।

एक और वाकया ये है कि जब महात्मा गाँधी की हत्या के बाद महाराष्ट्र में ब्राह्मणों का नरसंहार हुआ था, तब गुंडों ने सावरकर के घर पर भी हमला किया था। सबसे छोटे भाई नारायण सावरकर की तो ‘मॉब लिंचिंग’ कर दी गई थी। तब यमुनाबाई अकेले गुंडों से लाठी लेकर भिड़ गई थीं। इस तरह सावरकर परिवार की महिलाओं ने भी कष्ट सह कर अपने घर के पुरुषों की तरह देशसेवा में योगदान दिया। यमुनाबाई के पति दूर थे, बच्चे को खो दिया, लेकिन उनका हौंसला कम नहीं हुआ।

घर में फंदे से लटकता मिला वर्षा रघुवंशी का शव, 1 साल पहले अरमान से किया था निकाह: उलटा मृतका के परिजनों पर ही पत्थरबाजी

उत्तर प्रदेश के आगरा से दिलदहाने वाली खबर सामने आई है। शाहगंज में शुक्रवार (12 नवंबर 2021) को फईम उर्फ अरमान से निकाह करने वाली वर्षा रघुवंशी का शव घर में फाँसी के फंदे पर लटका हुआ मिला। इस घटना के बाद से युवती के परिजनों और हिंदू संगठनों में खासा रोष है। वहीं, चिल्लीपाड़ा निवासी फईम फरार बताया जा रहा है। दैनिक भास्कर के पत्रकार सचिन गुप्ता ने इसका वीडियो भी अपने ट्विटर हैंडल पर शेयर किया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के आगरा में वर्षा ने अरमान से एक साल पहले निकाह किया था। वर्षा की बॉडी अरमान के घर में लटकी हुई मिली है। खबर पाकर जब अरमान के घर पर वर्षा के परिजन और भाजपा के लोग पहुँचे तब स्थानीय लोगों ने उन पर पथराव करना शुरू कर दिया।। स्थिति बेकाबू होते देख बाजार बंद कर दिए गए हैं और पुलिस बल तैनात कर दिया है, जिससे स्थिति नियंत्रण में है।”

सोशल मीडिया पर यह खबर वायरल होने के बाद यूजर्स भी काफी आक्रोशित हैं। पत्रकार स्वाति गोयल ने ट्विटर पर लिखा, ”वर्षा ने एक साल पहले ही अरमान से निकाह किया था। उसने आत्महत्या कर ली है। इस मुद्दे पर हिंदू समूह आंदोलन कर रहे हैं। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए बलों को तैनात किया गया है।”

वहीं एक अन्य पत्रकार गौरव मिश्रा ने लिखा, ”फईम खान आगरा में गाड़ी का गैराज चलाता था। अलग-अलग स्थानों पर किराए पर रहता था। 1 साल पहले ही फईम खान ने वर्षा नाम के हिंदू लड़की से निकाह किया था। वर्षा की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई, जिसके बाद इलाके में तनाव बढ़ गया। शाहगंज थाने का हिंदू संगठनों ने घेराव किया है। घटना के बाद से फहीम खान फरार है।”

बता दें कि पुलिस ने मृतका के ससुराली पक्ष के तीन लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी है। दोनों ने प्रेम विवाह किया था, उस समय वर्षा के परिजनों ने काफी हंगामा भी किया था, लेकिन अरमान और वर्षा के बालिग होने के चलते कोई कार्रवाई नहीं हो पाई थी। निकाह के बाद दोनों में अक्सर विवाद होने लगा था। मृतका के भाई दुष्यंत कुमार के पास शुक्रवार शाम साढ़े छह बजे के पास फोन आया था कि उसकी बहन ने फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली है। दुष्यंत के अनुसार, जब वह अपने साथियों के साथ मौके पर गया और देखा तो उसे बहन की हत्या कर शव लटकाए जाने का शक हुआ। उसके विरोध करते ही ससुराल पक्ष उनसे गाली गलौच करने लगा और अचानक छतों से पथराव होने लगा। इस दौरान भाजपा नेता गौरव राजावत, गोविंद कुशवाह समेत तीन लोग चोटिल हो गए। सभी का निजी अस्पताल में इलाज चल रहा है।

जानिए कौन थीं गोंड रानी कमलापति, जिनके नाम पर होगा हबीबगंज रेलवे स्टेशन: ₹100 Cr की लागत, अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट जैसी सुविधाएँ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने मध्य प्रदेश स्थित हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम रानी कमलापति के नाम पर रखने का निर्णय लिया है। ये रेलवे स्टेशन अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है और इसका उद्घाटन सोमवार (15 नवंबर, 2021) को खुद पीएम मोदी करेंगे। भारत सरकार ने 100 करोड़ रुपए की लागत से इस रेलवे स्टेशन का पुनर्विकास कर के इसे अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस बनाया है। भगवान बिरसा मुंडा की जयंती के दिन इसका उद्घाटन होगा, जिसे केंद्र सरकार ने ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी किए गए पत्र में कहा गया है कि 16वीं शताब्दी में भोपाल क्षेत्र गोंड शासकों के अधीन था। गोंड राजा सूरज सिंह शाह के बेटे निजाम शाह से रानी कमलापति का विवाह हुआ था। उन्होंने अपने पूरे जीवनकाल में बड़ी बहादुरी से आक्रांताओं का सामना किया। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कहा है कि उनकी स्मृतियों को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए और उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए केंद्र सरकार ने ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के दिन स्टेशन के नामकरण का फैसला लिया है।

बता दें कि नाम बदलने का प्रस्ताव मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार ने ही केंद्र को भेजा था। राज्य सरकार के निवेदन पर ये निर्णय लिया गया। भोपाल की सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने भी यही माँग की थी। हबीबगंज का नाम हबीब मियाँ के नाम पर रखा गया था। इससे पहले इसके नाम शाहपुर था। कहा जाता है कि हबीब मियाँ ने 1979 में स्टेशन के लिए जमीन दी थी, जिस कारण उनके नाम पर इसे रखा गया था। आज के एमपी नगर का नाम तब गंज हुआ करता था

हबीब और गंज को जोड़ कर इसे हबीबगंज बना दिया गया था। रानी कमलापति रेलवे स्टेशन पर विश्व स्तरीय सुविधाएँ मिलेंगी। सार्वजनिक-निजी (PPP) साझेदारी के तहत ये देश का पहला मॉडल रेलवे स्टेशन है, जिसमें एक अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट जैसी सुविधाएँ मिलेंगी। बिना किसी भीड़भाड़ के ट्रेन पर चढ़ने और आने वाले यात्रियों के लिए स्टेशन से बाहर निकलने की व्यवस्था है। एस्केलेटर और लिफ्ट के अलावा 700 यात्रियों की क्षमता वाला कॉनकोर भी है। यहाँ यात्री बैठ कर ट्रेन का इंतजार कर सकेंगे।

पूरे स्टेशन पर अलग-अलग डिस्प्ले बोर्ड के माध्यम से ट्रेनों की आवाजाही की ताज़ा जानकारी दी जाएगी। यात्रियों के मनोरंजन की व्यवस्था भी है। काउंटर भी हाईटेक है, जहाँ आसानी से टिकट मिल जाएगा। रेस्टॉरेंट्स भी होंगे। वेटिंग रूम, रिटायरिंग रूम, डॉरमेट्री और वीआईपी लाउंज भी है। सुरक्षा के लिए 159 सीसीटीवी कमरे हैं। ये सौर ऊर्जा से संचालित स्टेशन होगा। आग लगने जैसी दुर्घटना के समय यात्रियों को सुरक्षित निकालने की व्यवस्था भी है। यहाँ 70-80 ट्रेनों का हॉल्ट होता है।

भोपाल से 50 किलोमीटर की दूरी पर ही गिन्नौर गढ़ नाम की एक रियासत थी, जहाँ की रानी कमलापति थीं। उनके पति निजाम शाह गौढ़ के राजा थे। रानी कमलापति की खूबसूरती को लेकर ‘ताल है तो भोपाल ताल और बाकी सब हैं तलैया। ‘रानी थी तो कमलापति और सब हैं गधाईयाँ…’ नामक कहावत काफी प्रचलित थी। निजाम शाह के भतीजे आलम शाह ने ही उन्हें खाने की दावत पर बुला आकर उनकी हत्या कर दी थी, क्योंकि वो उनके राज्य, संपत्ति और रानी की खूबसूरती से ईर्ष्या करता था।

उस समय बाड़ी नाम के राज्य पर आलम का शासन था। रानी कमलापति ने मोहम्मद नाम के एक व्यक्ति को हायर किया, जो पैसे लेकर लोगों की मदद करता था। उसे एक लाख रुपए देकर रानी ने आलम शाह से अपना बदला पूरा किया। आलम शाह मारा गया। हालाँकि, मोहम्मद को जब भोपाल का कुछ हिस्सा दे दिया गया था तो उसका रानी कमलापति के बेटे नवल शाह से युद्ध हुआ था। इस युद्ध में काफी खून बहा और नवल शाह को हार का सामना करना पड़ा।

त्रिपुरा हिंसा के नाम पर महाराष्ट्र के 3 शहरों में मुस्लिम भीड़ का उपद्रव: पुलिस पर पथराव, दुकानों में तोड़फोड़, बच्चों को पीटा

त्रिपुरा में बीते दिनों हुई घटना के विरोध में महाराष्ट्र के नांदेड़, अमरावती और मालेगाँव में आज (नवंबर 12, 2021) मुस्लिम संगठनों ने जमकर विरोध किया। इस बीच जबरन दुकानें बंद करवाई गईं और पुलिस पर भी पथराव हुआ। अब पुलिस मौके पर पहुँचकर मामले की जाँच कर रही है

अमरावती से एक वीडियो सामने आई है। इस वीडियो में मुस्लिम समूहों के कुछ लोग चौक पर खड़े होकर तिरंगा लेकर नारेबाजी कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर घटना की वीडियो शेयर करते हुए महाराष्ट्र सरकार को कोसा जा रहा है। वीडियो में स्थानीय बता रहे हैं कि 200-250 लोग दुकानों में घुस आए थे और उनके साथ मारपीट कर रहे थे। तस्वीरों में जगह-जगह काँच बिखरे टूटे पड़े है। लोग डर से दुकानों के शटर बंद करके बैठे हैं। 

मीडिया और पुलिस के पहुँचने पर दुकानें खुली है। दुकान में भी काफी तोड़फोड़ हो रखी है। इसके अलावा जो सड़क पर ठेली लगी हुई थी उस पर भी समुदाय विशेष ने पत्थर फेंके। आजतक की रिपोर्ट के अनुसार, मालेगाँव में भी हिंसा की खबरें आई हैं। वहाँ भी दुकानों को नुकसान पहुँचाया गया और पुलिस से मुठभेड़ भी हुई। इन घटनाओं के बाद भाजपा नेता तुषार भारतीय ने प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ सख्त एक्शन की माँग की है। बताया जा रहा है कि महाराष्ट्र के नांदेड़, अमरावती और मालेगाँव समेत कई शहरों में हिंसा पर पुलिस ने काबू पा लिया है।

महाराष्ट्र के गृहमंत्री दिलीप वालसे पाटिल ने कहा, “पूरे राज्य भर के मुस्लिमों ने आज त्रिपुरा में हुई हिंसा के विरोध में मार्च किया। इस दौरान नांदेड़, मालेगाँव और अमरावती समेत कई जगहों पर हमला किया। मैं हर हिंदू और मुस्लिम से शांति कायम करने की अपील करता हूँ।”

उन्होंने बताया, “स्थिति अभी नियंत्रण में है। मैं खुद वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से बात करके इस मामले पर नजर बनाए हुए हूँ। अगर कोई दोषी पाया जाता है तो उसे नहीं छोड़ा जाएगा। हमें सामाजिक सौहार्द बनाए रखना है। मैं सबसे अपील करता हूँ। मैं पुलिस से भी अपील करता हूँ कि वो स्थिति को नियंत्रण में रखें और शांति बनाए रखें।”

वहीं नांदेड़ के एसपी प्रमोद कुमार ने कहा, “रजा अकादमी की तरफ से नांदेड़ में एक धरना आयोजित किया गया, इसमें सहभागी कुछ युवाओं ने पुलिस पर पथराव किया। पुलिस ने उचित बल का प्रयोग करते हुए उन्हें भगा दिया। शहर में 3-4 जगह ऐसी घटना हुई हैं। मामला दर्ज़ कर रहे हैं। अभी नांदेड़ में शांति है”

इस्लामी कमांडर कुंजली मरक्कर IV पर आधारित फिल्म के रिलीज होने से पहले विवाद: जानिये क्यों?

विवादास्पद मलयालम फिल्म ‘मरक्कर: अरबिकाडालिन्ते सिंघम’ (Marakkar: Arabikkadalinte Simham) इस साल 2 दिसंबर को सिनेमाघरों में दस्तक देने के लिए तैयार है। यह फिल्म कालीकट के ज़मोरिन (वंशानुगत शासक) के चौथे मुस्लिम नौसैनिक प्रमुख (कुंजली मरकर) मोहम्मद अली की ‘वीरता’ पर आधारित है। यह अब तक की सबसे महंगी मलयालम फिल्म है, जिसका निर्माण ₹100 करोड़ के बजट में किया गया है।

फिल्म को रिलीज होने में तकरीबन 3 सप्ताह बाकी है, मगर ‘महिमामंडन’ को लेकर इससे पहले ही फिल्म कुंजली मरक्कर IV विवादों में घिर गई है। कामथ (@durga_dasa) नाम के एक ट्विटर यूजर ने बताया कि फिल्म में कुंजली मरक्कर चतुर्थ का महिमामंडन किया गया है, जिसने ज़मोरिन को धोखा दिया और बीजापुर सुल्तान एवं अन्य इस्लामवादियों की मदद से मालाबार में इस्लामी शासन स्थापित करने की कोशिश की।

कुंजली मरक्कर IV: हिंदू समूथिरियों के साथ विश्वासघात और पतन

स्वतंत्र में छपे एक रिसर्च आर्टिकल के अनुसार, ज़मोरिन (जिसे समुथिरी भी कहा जाता है) केरल के दक्षिणी मालाबार क्षेत्र में कालीकट साम्राज्य के वंशानुगत शासक थे। 16वीं शताब्दी के दौरान इस हिंदू सम्राट ने मुसलमानों को राज्य के भीतर पूर्ण स्वतंत्रता के साथ बसने और इस्लाम का प्रचार करने की अनुमति दी थी। समुथिरी ने मजबूत पुर्तगाली नौसेना के हमलों से बचने के लिए 1507 और 1600 के बीच राज्य में चार मुस्लिम नौसैनिक कमांडरों (जिन्हें कुंजली मरक्कर भी कहा जाता है) को नियुक्त किया था।

मलयालम फिल्म ‘मरक्कर: अरबिकाडालिन्ते सिंघम’ मोहम्मद अली की ‘वीरता’ पर आधारित है, जो 1595-1600 के बीच कुंजली मरक्कर IV थे। कुंजली मरक्कर दक्षिणी मालाबार क्षेत्र में उसके वीरता और ‘स्वतंत्रता सेनानी’ के रूप में जाना जाता है। हालाँकि लोगों को यह ज्ञात नहीं है कि उसने समुथिरी को धोखा दिया था। पुर्तगालियों को हराने के बाद कुंजली मरक्कर चतुर्थ अहंकारी हो गया और उसने खुद को मालाबार मुसलमानों का ‘स्वतंत्र शासक’ घोषित कर दिया।

इतिहासकार केवी कृष्णा अय्यर कहते हैं, “पहले का अंतर्निहित आत्मविश्वास और वफादारी ईर्ष्या, भय और अनिश्चितता के साथ धीरे-धीरे क्षीण हो गई थी। इसके अलावा, मोपला नायक का व्यवहार भी संकट पैदा करने वाला था। सफलता का नशा उसके सिर पर छा गया। वह खुद को मूरों का बादशाह और भारतीय समुद्रों का स्वामी बनने और कालीकट से जहाजों को रास्ता देने को लेकर विवेकहीन था। उसने ज़मोरिन के हाथियों में से एक की पूँछ काटने का भी दुस्साहस किया था। जब उससे इस बारे में पूछने के लिए नायर को भेजा गया तो उसने उसका अपमान कर जले पर नमक छिड़क दिया।”

स्वतंत्र में बताया गया है कि इस नौसैनिक कमांडर ने न केवल समुथिरी के अधिकार को चुनौती दी, बल्कि कालीकट साम्राज्य की प्रजा पर भी हमला किया था। मोहम्मद अली खुद को भारतीय समुद्र के भगवान और मोपलाओं का राजा मानता था। समुथिरी ने पुर्तगालियों के साथ एक संधि की और कुंजली मरक्कर चतुर्थ को हराया और मुस्लिम नौसैनिक कमांडरों की गाथा को यहीं समाप्त कर दिया। 500 साल बाद उसी मोहम्मद अली के विश्वासघात को आगामी फिल्म ‘मरक्कर: अरबिकाडालिन्ते सिंघम’ के रूप में सेलीब्रेट किया जा रहा है।

ट्विटर उपयोगकर्ता कामंथ (@durga_dasa) ने दीपा थॉमस का एक आर्टिकल साझा किया था, जिसमें यह सुझाव दिया गया था कि कुंजली मरक्कर IV देशभक्त या साम्राज्यवाद विरोधी नहीं था, जैसा कि मीडिया में प्रचारित किया गया था। दीपा थॉमस ने कहा था कि यह बताने के लिए पर्याप्त सबूत हैं कि मोहम्मद अली ने धर्म को देखते हुए हिंदू समुथिरी को धोखा दिया था।

कामथ ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि कैसे मलयाली निर्देशक प्रियदर्शन और अभिनेता मोहनलाल ने अपने हिंदू नायर वंश के संबंध में फिल्म ‘मरक्कर: अरबिकाडालिन्ते सिंघम’ बनाई थी, जिसे मालाबार इस्लामवादियों के हाथों नरसंहार का सामना करना पड़ा था।

कुंजली मरक्कर चतुर्थ के परिवार ने फिल्म के खिलाफ जताई थी आपत्ति

पिछले साल मार्च में इस्लामवादी कुंजली मरक्कर IV के एक वंशज ने मलयालम फिल्म की रिलीज को रोकने के लिए केरल उच्च न्यायालय का रुख किया था। याचिकाकर्ता मुफीदा अराफात मराक्कर ने फिल्म निर्माताओं पर इतिहास के विकृत संस्करण को चित्रित करने और मुस्लिम नौसेना कमांडर को ‘विकृत परिप्रेक्ष्य’ में पेश करने का आरोप लगाया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि 16वीं शताब्दी के इस इस्लामी कमांडर को एक रोमांटिक हीरो और ‘महिलाओं के साथ गाना गाने वाले डांसर के रूप में’ प्रस्तुत किया गया है। 

याचिका में कहा गया था, “फिल्म कुंजली मरक्कर में उनकी विकृत पोशाक को दिखाया गया है। वह एक धर्मपरायण मुस्लिम थे और उनका पहनावा अपने समय के मजहबी सिद्धांतों के अनुसार था। लीफलेट में उन्हें पगड़ी में भगवान गणपति की एक तस्वीर को दिखाया गया है। जैसा कि पुर्तगाली इतिहासकारों द्वारा बताया गया है, कुंजली मरक्कर और उनके 40 लेफ्टिनेंटों को पुर्तगालियों द्वारा ईसाई धर्म अपनाने पर क्षमा का वादा किया गया था, लेकिन उन्होंने धर्मांतरण के बजाय मृत्यु का विकल्प चुना। फिल्म में कल्पना को कुछ हद तक अनुमति दी जा सकती है, लेकिन मूल इतिहास को विकृत करने की नहीं।”

याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि मोहम्मद अली कुँवारा था और उसका कोई प्रेम प्रसंग नहीं था। उसने सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) पर बिना सोचे-समझे फिल्म को U/A सर्टिफिकेट देने का आरोप लगाया था।

‘हिंदुत्व=बोको हराम=ISIS’: संयोग नहीं सलमान खुर्शीद का प्रयोग, घूम-फिर कर मुस्लिम तुष्टिकरण की मूल कक्षा में लौटी कॉन्ग्रेस

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अब दूर नहीं रहे। जाहिर है विवाद भी अब नजदीक ही रहेंगे। आने वाले चुनाव कैसे लड़े जाएँगे, उसकी झलक लगभग चार महीनों से मिल रही थी पर अब सरगर्मियों ने गियर बदल लिया है। सरगर्मियों को दूसरे गियर में ले जाते हुए अखिलेश यादव ने देश की आज़ादी के लिए महात्मा गाँधी और जवाहरलाल नेहरू के साथ जिन्ना को क्रेडिट दिया। बाद में उनके सहयोगी ओम प्रकाश राजभर ने उनकी बात को आगे बढ़ाते हुए देश के विभाजन के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को जिम्मेदार बताते हुए जिन्ना की क्लीन चिट दे दी।

यह सब करने के बाद अखिलेश यादव ने अपने 400 सीटों वाली जीत पर सौवीं बार ठप्पा लगाया ही था कि कॉन्ग्रेस पार्टी की ओर से सलमान खुर्शीद ने माहौल पर कब्जा करने के चक्कर में हिंदुत्व, बोको हराम और ISIS को एक जैसा बता डाला। 

सलमान खुर्शीद ने जो कहा उस पर आश्चर्य व्यक्त करने का अभिनय तो किया जा सकता है पर आश्चर्य व्यक्त नहीं किया जा सकता। कम से कम वे, जिन्होंने खुर्शीद के राजनीतिक व्यक्तित्व और धार्मिक सोच को लंबे अरसे तक देखा है, उन्हें किसी तरह का आश्चर्य नहीं होना चाहिए। खुर्शीद के पिछले लगभग दस वर्षों के भी सार्वजनिक आचरण को याद किया जाए तो ऐसे कई मौके आए हैं जब उन्होंने अपने ज्ञान, शिक्षा वगैरह का लबादा उतार फेंका और कई बार इस धारणा को पुख्ता किया कि मॉडर्न, मॉडरेट और इंटेलेक्चुअल मुस्लिम नहीं होते। कोई आश्चर्य नहीं कि पिछले लगभग तीन दशकों में वैश्विक स्तर बनी इस धारणा का जो भारतीय स्वरूप है उसे पुख्ता करने में तमाम लोगों के साथ-साथ सलमान खुर्शीद का बड़ा योगदान रहा है।


पहले लिखी गई अपनी किताब में उन्होंने 1984 के सिख नरसंहार के बारे में क्या लिखा है, यह अधिकतर लोग पहले से जानते हैं। सरकार द्वारा प्रतिबंधित सिमी का मुक़दमा लड़ना हो, बाटला हाउस एनकाउंटर को फर्जी बताते हुए अपनी नेता सोनिया गाँधी के रोने की बात हो या कश्मीर से निकाले गए हिंदुओं की, खुर्शीद को कभी अपनी धार्मिक और राजनीतिक सोच के सार्वजनिक प्रदर्शन को लेकर किसी तरह का असमंजस नहीं रहा। ऐसे में उनका हिंदुत्व को बोको हराम या ISIS जैसा न केवल मानना बल्कि उसे सार्वजनिक तौर पर कहना उन्हें और उनकी सोच को पूरी तरह से प्रस्तुत करते हैं। साथ ही अन्य कॉन्ग्रेसी नेताओं द्वारा उनका समर्थन या विरोध न किया जाना भी यह बताता है कि इस तरह की सोच के सार्वजनिक प्रदर्शन का उद्देश्य क्या है।   


वैसे देखा जाए तो हाल के वर्षों में नेताओं की स्थाई सोच और उस सोच के सार्वजनिक प्रदर्शन में पहले से दिखने वाला अंतर लगातार घटता जा रहा है। इसका परिणाम यह है कि पिछले लगभग डेढ़ दशक में इसके कारण आई पारदर्शिता ने भारतीय राजनीति को नए तरह से देखने की सहूलियत दे दी है। लोग सीधे तौर पर देखने और दिखने लगे हैं। अखिलेश यादव या राजभर जिन्ना के बारे में क्या कहते हैं या खुर्शीद हिंदुत्व के बारे में क्या सोचते हैं, वह भारत भर के सामने है। ऐसे में इन नेताओं को इस बात का क्रेडिट मिलना चाहिए। जिस उद्देश्य के लिए वे ऐसा कह रहे हैं या कह रहे हैं, वह पूरा हो या न हो, पर इस प्रयास में ये लोग उस राजनीतिक ध्रुवीकरण को पुख्ता कर रहे हैं जिसका विरोध करने का अभिनय करते रहते हैं। 

भारतीय राजनीति का चरित्र ऐसा रहा है कि नेताओं की बातों और उनके कार्य को अधिकतर चुनावी राजनीति से जोड़ कर देखा जाता रहा है। चूँकि नेताओं द्वारा ये बातें चुनाव के आस-पास कही जा रही हैं इसलिए इन्हें चुनाव के परिप्रेक्ष्य में देखा और समझा जाएगा पर जहाँ तक स्थाई सोच के परिप्रेक्ष्य में देखने की बात है, इसके दीर्घकालिक परिणाम का अनुमान लगाना या समझना आम हिंदू के लिए असंभव नहीं है। पिछले गुजरात विधानसभा चुनाव के समय बनी राहुल गाँधी की नव हिंदू की छवि अब लगभग ख़त्म हो चुकी है। ऐसे में कॉन्ग्रेस घूम-फिर कर अपनी मूल कक्षा में जा पहुँची है। उसे पता चल चुका है कि आम हिंदू के मन में कॉन्ग्रेस की अच्छी छवि स्थापित करना मेहनत का काम है। हाँ, मुस्लिम तुष्टिकरण के अपने पुराने राजनीतिक दर्शन पर वापस जाकर वो जो कुछ करेगी उस पर हिंदू और हिंदू मतदाता की क्या राय है, यह आने वाले समय में पता चल जाएगा। 

यूपी समेत 4 राज्यों में खिलेगा ‘कमल’, कॉन्ग्रेस को गँवानी पड़ेगी पंजाब की सत्ता: चुनाव के ऐलान से पहले आया ABP-सी वोटर का सर्वे

साल 2022 में पाँच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों पर इस समय सबकी नजरें हैं। ऐसे में एबीपी न्यूज के सी वोटर ने जनता का रुख जानने के लिए इन पाँचों राज्यों (उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर, गोवा और पंजाब) में 1 लाख 7 हजार से अधिक लोगों पर सर्वे किया है। इस सर्वे में जो नतीजे निकल कर आए हैं वो कुछ लोगों की अपेक्षाओं से मेल खाते हैं वहीं कुछ के लिए ये संतोषजनक नहीं है।

सबसे ज्यादा नजरें इस बार उत्तरप्रदेश की योगी सरकार पर हैं। वहाँ कुल 403 विधानसभा सीटों पर वोट पड़ने हैं। कुछ लोग मान रहे हैं कि इस बार यूपी में बीजेपी दोबारा लौटकर रिकॉर्ड बनाएगी और कुछ को अखिलेश यादव के आने की उम्मीद है। ऐसे में एबीपी सी-वोटर सर्वे के अनुसार यूपी में भाजपा को 213 से 221 सीट मिलने का अनुमान है जबकि, अखिलेश यादव की सपा को 152-160 सीट मिल सकती हैं। इस सर्वे में मायावती की बसपा को 16-20 सीट मिलने की बात कही गई है और कॉन्ग्रेस के हिस्से 6-10 सीट आ सकती है। यूपी में बीजेपी का वोट शेयर सबसे आगे है। पार्टी को 41% वोट मिल सकते हैं। वहीं सपा 31%, बीएसपी 15%, कॉन्ग्रेस 9% और अन्य को 4% वोट मिलने का अनुमान है।

उत्तर प्रदेश में जहाँ भाजपा के साथ सपा की कड़ी टक्कर है। वहीं उत्तराखंड में बीजेपी के सामने कॉन्ग्रेस चुनौती है। सी वोटर सर्वे के अनुसार बीजेपी को प्रदेश में 41% वोट शेयर के साथ 36-40 सीट मिलेंगी जबकि कॉन्ग्रेस इस सर्वे में ज्यादा पीछे नहीं है वहाँ पार्टी को 36 % वोट शेयर के साथ 30-34 सीट मिलने का अनुमान है। आम आदमी पार्टी के खाते में 0-2 सीटें आ सकती हैं।

इसके बाद गोवा में सीधे-सीधे भाजपा के लौटने के आसार है। यदि इस सर्वेक्षण की मानें तो भारतीय जनता पार्टी के इर्द-गिर्द कोई पार्टी नहीं है। यहाँ भाजपा के खाते में 19-23 सीटें आती दिख रही हैं जबकि कॉन्ग्रेस 2-6 सीट पाकर सिमटती दिख रही है। AAP को यहाँ 3-7 सीट मिलेगी और अन्य के खाते में 8-12 सीटें आएँगी।

यूपी, उत्तराखंड और गोवा की तरह मणिपुर में भारतीय जनता पार्टी के लौटने के आसार हैं। सर्वे में 25-29 सीट बीजेपी के खाते में, 20-24 सीट कॉन्ग्रेस के हिस्से में वहीं एनपीएफ 4-7 वोट मिल सकते हैं। वोट शेयर की बात करें तो बीजेपी को 39फीसद वोट मिलेंगे, कॉन्ग्रेस को 33%,एनपीएफ को 9% और अन्य के हिस्से 19% वोट आएँगे।

इसके बाद पंजाब में न बीजेपी और न ही कॉन्ग्रेस के पास सत्ता आती दिख रही है बल्कि अनुमान है कि इस बार आम आदमी पार्टी बाजी मारेगी। कॉन्ग्रेस ने 2017 में वहाँ 70 सीट पर विजय प्राप्त की थी लेकिन अब 42 से 50 सीटों में वह सिमटते दिख रहे है। चुनाव में आम आदमी पार्टी को 47 से 53 सीट मिल सकती है और बीजेपी को यहाँ 16 से 24 सीट के बीच सीट पाकर ही संतोष करना पड़ेगा।