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जिन्होंने दलित युवक को जनेऊ पहना बनाया था ‘ब्राह्मण’, उस महाकवि के नाम पर BHU में ‘चेयर’: PM मोदी की घोषणा के मायने

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार (11 सितंबर, 2021) को ‘बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU)’ में तमिल महाकवि सुब्रमण्य भारती के नाम पर ‘चेयर’ के स्थापना की घोषणा की। महिला उत्थान व दलितों को हिन्दू धर्म में जोड़ने के लिए जाने जाने वाले सुब्रमण्य भारती महान विद्वान, दार्शनिक व स्वतंत्राता सेनानी थे। उनकी 100वीं जयंती पर पीएम मोदी ने ये घोषणा की। अब BHU में तमिल अध्ययन पर ‘सुब्रह्मण्य भारती चेयर’ की स्थापना होगी।

BHU के कला संकाय में इसे लगाया जाएगा। याद हो कि स्वतंत्रता दिवस के दिन राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुब्रमण्य भारती की एक कविता सुनाई थी। उन्हें ‘महाकवि भारतियार’ के रूप में भी जाना जाता है। 11 दिसंबर, 1882 को तमिलनाडु के एक गाँव एट्टयपुरम् में एक तमिल ब्राह्मण परिवार में जन्मे महाकवि भारतियार अपनी कविताओं के जरिए राष्ट्रभक्ति की अलख जगाते थे।

वो उत्तर व दक्षिण भारत की एकता की वकालत करते थे। साथ ही महिलाओं व दलितों के उत्थान में लगे रहते थे। इस तरह, वो एक समाज सुधारक भी थे। बतौर पत्रकार भी उन्होंने अपनी लेखन कला का उपयोग किया। कई लोगों को उन्होंने देश के लिए लड़ने हेतु प्रेरित किया। वो कई दिनों तक काशी/वाराणसी में रहे थे, जहाँ उन्होंने हिन्दू अध्यात्म व राष्ट्रप्रेम की भावना अपने मन में जगाई। 1900 तक वो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कूद गए थे।

वो कॉन्ग्रेस की जनसभाओं में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे। 1907 में सूरत में ऐतिहासिक कॉन्ग्रेस सम्मलेन हुआ, जिसके वो गवाह रहे। इसके बाद पार्टी ‘गरम दल’ व ‘नरम दल’ में बँट गई थी। जोशीले सुब्रमण्य भारती ने ‘गरम दल’ को चुना। ‘स्वदेश गीतांजल’, ‘पांचाली सप्तम’ व ‘जन्मभूमि’ के रचयिता महाकवि भारतियार बच्चों के लिए विद्यालय, कल-कारखानों के लिए औजार और अख़बार छापने के लिए कागज़ की ज़रूरत पर बल देते थे।

साथ ही वो हिंदी, बंगाली, संस्कृत व अंग्रेजी में भी सिद्धहस्त थे। उनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने एक दलित युवक का भी उपनयन संस्कार करा कर उसे ‘ब्राह्मण’ बनाया था। वो धर्मग्रंथों की शिक्षा के हिमायती थे, लेकिन बिना किसी छेड़छाड़ व भेदभाव के। उन्हें कुल 14 भाषाएँ आती थीं, जिनमें 3 विदेशी थीं। अंग्रेजों ने जब उन पर शिकंजा कसा तो वो पुडुचेरी चले गए और वहीं से पत्रिका छापने लगे। वहाँ उस समय फ़्रांस का शासन था।

वो ‘बाल विवाह’ के सख्त खिलाफ थे। मात्र 38 वर्ष की आयु में 1921 में उनका निधन हो गया था। उनकी पत्नी चेलम्मा से उनकी दो बेटियाँ थीं। उनके निधन के समय दोनों बेटियों की उम्र मात्र 16 व 12 वर्ष थी। उनकी पत्नी ने उनके निधन के बाद उनकी कई रचनाओं को प्रकाशित किया और अपने पति की जीवनी भी लिखी। वाराणसी से उनका खास जुड़ाव था, क्योंकि उनकी शुरुआती शिक्षा-दीक्षा यहीं हुई थी।

‘जान से मारने मारने की धमकी देता है मुस्लिम समुदाय, जारी करता है फतवा’: ब्रा फ्लॉन्ट करने वाली अभिनेत्री का खुलासा

पिछले कुछ दिनों में उर्फी जावेद सोशल मीडिया सेंसेशन बन चुकी है। कभी वे अपने विवादित बयानों की वजह से चर्चा में रहती हैं, तो कभी उनके ड्रेसिंग सेंस लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लेते हैं।  

उर्फी हाल ही में बिग बॉस ओटीटी हाउस से बाहर आई हैं। बाहर निकलते ही सोशल मीडिया सेंसेशन बनने को लेकर उर्फी कहती हैं, “मैं बहुत अमेजिंग हूँ। बिग बॉस ने भले ही मेरी इस क्वालिटी को नहीं देखी हो लेकिन दुनियावाले जान गए हैं कि मैं बहुत ही एंटरटेनिंग हूँ। अब तो यह बिग बॉस का लॉस है। हालाँकि दुनियावाले समझ गए हैं और मेरे लिए ये बहुत अच्छा है।”

हाल ही में उर्फी ने आज तक से बात करते हुए बताया कि मुस्लिम होने की वजह से मुस्लिम उन्हें टारगेट करते हैं, गाली देते हैं, जान से मारने की धमकी देते हैं और फतवा भी जारी करते हैं। वो कहती हैं कि उन्हें अक्सर उनकी ड्रेस को लेकर बुर्का और हिजाब पहनने की नसीहतें दी जाती है। हालाँकि इससे उनको कोई फर्क नहीं पड़ता है। वो कहती हैं कि फतवा जारी करना है तो कर दें, वो ऐसे ही कपड़ें पहनेंगी।

वो कहती हैं कि कमेंट करके उन्हें रेप और जान से मारने की धमकी दी जाती है, जबकि उन्होंने किसी का कोई नुकसान नही किया। मुस्लिम समुदाय की उनसे नाराजगी पर उर्फी कहती है कि पूरी कम्यूनिटी ही उनसे खफा है। उनसे धर्म बदल लेने के लिए कहा जाता है।

उर्फी ने कहा, “मुस्लिम औरतों को लेकर एक इमेज है कि उन्हें हिजाब में होना चाहिए। वे लोग जब मुझे बिकनी पहनते हुए देखते हैं, तो उन्हें काफी दिक्कत होती है। पूरी कम्यूनिटी मुझसे खफा रहती है। मैं मुस्लिम हूँ और मुझे गर्व है। मैं लड़की हूँ और अपनी मर्जी से जीती हूँ, तो क्या मैं अपना धर्म बदल लूँ। लोग मुझे कहते रहते हैं कि धर्म बदल लो। चाहे कुछ भी हो जाए, मैं नहीं बदलने वाली धर्म। मैं वैसे भी धर्म से ज्यादा इंसानियत पर यकीन रखती हूँ।”

गौरतलब है कि उर्फी जावेद को हाल ही में मुंबई एयरपोर्ट पर ब्रा फ्लॉन्ट करने पर जमकर ट्रोल किया गया था। नेटिजन्स ने उर्फी के फैशन सेंस और स्टाइल पर सवाल उठाते हुए इसे पब्लिसिटी स्टंट बताया था। जिसके बाद उर्फी ने अपनी सफाई देते हुए कहा था, ”अगर मुझे पब्लिसिटी ही चाहिए होती तो मैं एयरपोर्ट पर बिना कपड़ों के जाती।” साथ ही उन्होंने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि लोग उनके बारे में बात करने की बजाए उनके आउटफिट्स के बारे में ही बात करते हैं। सोशल मीडिया पर खासा एक्टिव रहने वाली उर्फी ने इंस्टाग्राम पर अपनी एयरपोर्ट वाली फोटो शेयर की थी। इसमें उर्फी की जैकेट फ्रंट से इतनी छोटी थी कि उनकी ब्रा फ्लॉन्ट हो रही थी। इसको लेकर ट्रोलर्स ने सोशल मीडिया पर उनका काफी मजाक भी उड़ाया था।

राम का जन्मस्थान बताया अयोध्या तो मालिनी अवस्थी को नहीं गाने दिया भजन: UPA के जमाने में दूरदर्शन की कहानी

भारत के 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही कॉन्ग्रेस पार्टी ने उन राजनीतिक नीतियों का पूर्णतया पालन किया है जो हिंदू बहुसंख्यक समुदाय के हितों के विपरीत हैं। जवाहरलाल नेहरू द्वारा पवित्र सोमनाथ मंदिर को उसके अतीत के गौरव को बहाल करने से इनकार करने से लेकर अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की उनकी अटूट प्रथा तक, भगवान राम के अस्तित्व पर सवाल उठाने और ‘भगवा आतंक’ के काल्पनिक निर्माण को गढ़ने तक, कॉन्ग्रेस का हिंदुओं को कमजोर करने और उन्हें दोयम दर्जा देने का पुराना इतिहास रहा है।

हिंदुओं के खिलाफ कॉन्ग्रेस के एक और घृणा के बारे में प्रसिद्ध लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने हाल ही में एक समाचार शो में खुलासा किया। उन्होंने बताया कि उन्हें 2005 में सार्वजनिक प्रसारक दूरदर्शन पर एक धार्मिक भजन गाने से रोक दिया गया था क्योंकि इसमें कहा गया था कि भगवान राम का जन्म अयोध्या में हुआ था।

पद्मश्री पुरस्कार विजेता मालिनी अवस्थी ने कहा, “एक समय था जब मुझे सार्वजनिक प्रसारक दूरदर्शन के लिए गाने के लिए नियुक्त किया गया था। मैंने उन्हें भगवान राम के जन्म पर एक भजन गाने की पेशकश की थी। शुरू में, वे इसके लिए सहमत हुए लेकिन जब मैंने शुरू किया, तो इसमें एक श्लोक शामिल था जिसमें अयोध्या में भगवान राम के जन्म का उल्लेख था। अचानक, वे आए और मुझसे कहा कि यह ऑन एयर नहीं हो सकता और मुझसे दूसरा भजन गाने के लिए कहा।”

अवस्थी ने न्यूज नेशन पर एक कार्यक्रम के दौरान बताया, “चूँकि मैं स्वभाव से थोड़ी चिंतनशील हूँ, मैंने उनसे पूछा कि इसमें क्या समस्या है। उन्होंने कहा कि इसमें भगवान राम का जन्म अयोध्या में होना बताया गया है। सनातन धर्म का अनुयायी होने के नाते, यह मेरे लिए अस्वीकार्य था। हमने वर्षों से अयोध्या में भगवान राम के जन्म का जश्न मनाया है। मैंने उनसे कहा कि यदि आप सत्य को नकारना चाहते हैं तो मैं कोई अन्य भजन रिकॉर्ड नहीं कर पाऊँगी।”

यह ध्यान देने योग्य है कि कॉन्ग्रेस पर लंबे समय से राज्य के प्रसारकों का उपयोग अपना एजेंडा निर्धारित करने और एक खास नैरेटिव शेयर करने का आरोप लगाया जाता रहा है, जिसने लगभग हमेशा हिंदुओं के हितों के खिलाफ काम किया है। इसने कलाकारों को अपने एजेंडे के हिसाब से परफॉर्मेंस देने के लिए मजबूर किया। भारत के इतिहास में अग्रणी संगीतकारों में से एक, पंडित हृदयनाथ को स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर द्वारा लिखी गई एक कविता गाने के लिए कॉन्ग्रेस के वर्षों के दौरान ऑल इंडिया रेडियो से बर्खास्त कर दिया गया था।

कॉन्ग्रेस शासन में ऑल इंडिया रेडियो ने पंडित हृदयनाथ को बर्खास्त कर दिया

हृदयनाथ और उनकी बहनें, लता मंगेशकर और उषा मंगेशकर, वीर सावरकर द्वारा लिखी गई कविताओं पर आधारित धुनों की रचना के लिए जाने जाते थे। हालाँकि, यह कॉन्ग्रेस पार्टी को रास नहीं आया, जिसने स्वतंत्रता सेनानी को खलनायक बनाने वाले नैरेटिव का निर्माण किया था। परिणामस्वरूप, कॉन्ग्रेस शासन के तहत ऑल इंडिया रेडियो ने वीर सावरकर की कविताओं पर उनकी संगीत रचना के लिए हृदयनाथ मंगेशकर को निकाल दिया।

कुछ सालों बाद, एबीपी माझा के साथ एक साक्षात्कार में, हृदयनाथ मंगेशकर ने स्वीकार किया कि कैसे उन्हें ऑल इंडिया रेडियो से निकाल दिया गया था क्योंकि उन्होंने वीर सावरकर द्वारा लिखित एक कविता की रचना करने का विकल्प चुना था।

हिंदुओं को अमानवीय बनाने के लिए कॉन्ग्रेस की प्रवृत्ति

कॉन्ग्रेस का हिंदुओं के अमानवीयकरण का इतिहास रहा है। इसने साध्वी प्रज्ञा और यहाँ तक कि लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को झूठा फँसाकर ‘भगवा आतंक’ की कहानी गढ़ने के लिए आकाश-पाताल एक कर दिया था। कॉन्ग्रेस सांप्रदायिक हिंसा विधेयक पारित करना चाहती थी, जिसमें कहा गया था कि कोई भी सांप्रदायिक हिंसा होने पर केवल हिंदुओं को अपराधी माना जाएगा, मुस्लिमों को कभी नहीं। इस बिल का गठन उन लोगों ने किया था जो विभिन्न विदेशी वित्त पोषित गैर सरकारी संगठनों से जुड़े थे।

राहुल गाँधी ने काल्पनिक ‘भगवा आतंक’ को लश्कर-ए-तैयबा से ज्यादा खतरनाक माना, तो वहीं पी चिदंबरम और सुशील कुमार शिंदे ने बिना किसी सबूत या वजह के हिंदुओं को आतंकवादी कहा। कॉन्ग्रेसी नेता और पूर्व पीएम मनमोहन सिंह ने कहा था कि हमारे देश के संसाधनों पर मुसलमानों का पहला अधिकार है।

‘लानत है! अल्लाह हिदायत अता फरमाए.. सुम्मा अमीन!’: सारा अली खान ने की गणेश पूजा तो भड़के इस्लामी कट्टरपंथी

गणेश चतुर्थी के मौके पर गणपति बप्पा की पूजा करने पर बॉलीवुड अभिनेता सैफ अली खान का ​परिवार सोशल मीडिया पर ट्रोल हो रहा है। करीना, सैफ और बेटे तैमूर अली खान के बाद अब उनकी बेटी सारा अली खान नेटिजन्स के निशाने पर आ गई हैं। सोशल मीडिया पर ट्रोल्स ने सारा की पोस्ट पर लिखा, ”मुसलमान होते हुए ये सब छी, शर्म आनी चाहिए तुम्हे।” वहीं एक अन्य यूजर ने लिखा कि मुसलमान हो या हिंदू। क्या कभी एक हिंदू को मस्जिद में देखा है। ये लोग भगवान के आगे खड़े हैं तुम पर शर्म आती है।

खालिद नाम के एक यूजर ने लिखा, ”तुम्हारे पिता मु​सलमान हैं और तुम्हारा नाम सारा अली खान है। शर्म आती है तुम पर।” मोहसीन नाम के एक यूजर ने लिखा, ”अगर तुम्हे हिंदू बनना है तो कृपा करके अपना नाम बदल लो। अगर तुम्हारा मस्लिम नाम है और तुम इस्लाम मजहब को मानती हो तो, उसमें किसी भी मूर्ति, भगवान की पूजा करना, वेदों को पढ़ना सख्त मना है।”

दरअसल, ‘केदारनाथ’ फिल्म की एक्ट्रेस सारा अली खान ने शुक्रवार (10 सितंबर) को अपनी माँ अमृता सिं​ह के साथ गणेश चतुर्थी का त्योहार मनाया था। सारा और अमृता सिं​ह ने अपनी फोटो इंस्टाग्राम पर भी पोस्ट की थी, जिसमें दोनों भगवान गणेश के सामने हाथ जोड़े हुए दिखाई दे रही हैं। सारा ने कैप्शन में लिखा, “गणपति बप्पा मोरया।” इस पोस्ट को लेकर सारा को सोशल मीडिया पर ट्रोल किया जा रहा है।

गौरतलब है कि इससे पहले सारा अली खान के अब्बा सैफ अली खान, तैमूर अली खान और करीना कपूर खान को भी गणेश चतुर्थी पर पूजा करने पर जमकर ट्रोल किया गया। सोशल मीडिया पर ट्रोल्स उन्हें काफिर, ‘लानत है ऐसे मुसलमानों पर’ लिख रहे हैं। मोहम्मद अफताब आलम नाम के यूजर ने लिखा, ”लानत है, उस बच्चे का कोई कसूर नहीं है, उसे तो जैसी तालीम देंगे वो वैसा ही करेगा। लेकिन सैफ पर लानत है अल्लाह इन्हें हिदायत अता फरमाए आमीन सुम्मा आमीन।” इस पर रिप्लाई देते हुए एक यूजर ने लिखा, “उसको अच्छा तालीम देकर तालिबान बना देना चाहिए?”

पुणे और मुंबई के बाद अब महाराष्ट्र से रेप की एक और घटना: गर्भवती होने पर नाबालिग ने की आत्महत्या

महाराष्ट्र में महिलाओं के साथ अपराध घटनाएँ दिनोंदिन बढ़ती जा रही हैं। पुणे और मुंबई के बाद अब महाराष्ट्र के अमरावती में बलात्कार की घटना सामने आई है। 15 साल की एक नाबालिग के साथ रेप किया गया। नाबालिग ने इसका बाद आत्महत्या कर ली। येवडा पुलिस थाने के सब-इंस्पेक्टर दिलीप कुमार ने बताया कि FIR में आरोप लगाया गया था कि आरोपित ने 15 वर्षीय नाबालिग का रेप किया, जिससे वो गर्भवती हो गई थी।

ये घटना महाराष्ट्र के अमरावती के दरियापुर इलाके की है। रेप आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया है। उसे 15 सितंबर तक के लिए पुलिस रिमांड पर भेज दिया गया है। FIR के अनुसार, आरोपित ने कई बार मृतका के साथ बलात्कार किया था। गर्भवती होने के बाद पीड़िता ने फाँसी के फंदे से झूल कर आत्महत्या कर ली। केस दर्ज कर आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया है। उससे पूछताछ भी जारी है।

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में मृतका की उम्र 17 साल भी बताई जा रही है। आज ही ये खबर भी आई कि मुंबई की 30 साल की रेप पीड़िता ने तीन दिन बाद शनिवार (11 सितंबर) को इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। रेप पीड़िता का इलाज घाटकोपर के राजावाड़ी अस्पताल में चल रहा था। तीन दिनों से महिला की हालत बेहद नाजुक बनी हुई थी। मुंबई के साकीनाका इलाके के खैरानी रोड पर बलात्कार के बाद बेहोशी की हालत में मिली थी। रेप के बाद दरिंदों ने पीड़िता को रॉड से पीटा फिर उसे उसके प्राइवेट पार्ट में डाल दिया। 

बता दें कि इससे पहले पुणे में 14 साल की लड़की के साथ गैंगरेप के मामले में 13 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। सभी आरोपितों ने पीड़िता के साथ 5 अलग-अलग ठिकानों पर 48 घंटे के भीतर कई बार रेप किया। इसमें लड़की का दोस्त, क्लास 4 के 2 रेलवे कर्मचारी और 11 ऑटोरिक्शा वाले भी शामिल थे।

रावण को सीता से ‘प्यार’, राम गलत कर के भी पूजे जाते हैं क्योंकि ‘भगवान’ थे: यही संदेश दे रही ‘रावण लीला’, अब रामायण का अपमान

नकारात्मकता के कई वेश होते हैं। कई परतें होती हैं। कई हथकंडे होते हैं। दुष्टता और क्रूरता की एक खासियत ये होती है कि ये हमेशा कुछ मजबूत तर्कों का आवरण ओढ़ कर आती है। नतीजा ये होता है कि नकारात्मकता काफी लुभावनी हो जाती है और सत्य बेचारा अकेला पड़ा होता है। यही कारण है कि ‘रावण’ जैसे किरदारों का गुणगान करने वाले आज भी मिलते हैं। लोगों को अर्जुन नहीं, कर्ण में देवता दिखने लगता है। प्रतीक गाँधी की अगली फिल्म में कुछ यही सब है।

आपने हर्षद मेहता की कहानी पर बनी वेब सीरीज देखी होगी? हंसल मेहता ने इसका निर्देशन किया था। इसमें 90 के दशक में दुनिया का सबसे बड़ा बैंक फ्रॉड करने वाले हर्षल मेहता की खबर दिखाई गई थी, जिनकी असामयिक मौत के बाद कई किस्से चल पड़े थे। रंक से राजा तक की ये कहानी लोगों को पसंद आई। गुजरात के सूरत में पले-बढ़े अभिनेता प्रतीक गाँधी ने किरदार भी जीवंत कर दिया था।

प्रतीक गाँधी के पास सिनेमा के साथ-साथ थिएटर का भी अच्छा अनुभव है और यही चीज उन्हें किरदारों में घुसने में सहायक सिद्ध होती है। उनकी नई फिल्म ‘रावण लीला’ में भी रामायण के मंचन में वो रावण बने सीखते हैं और बड़ी ही संजीदगी से संवाद अदायगी करते हैं। मासूम से दिखने वाले प्रतीक गाँधी ही हैं ये, ऐसा लगता नहीं। फिल्म एक गाँव में उनकी ही प्रेम कहानी और इस नाटक के मंचन के इर्दगिर्द घूमती रहती है।

दशहरा का त्यौहार आने वाला है और इस दौरान गाँव-गाँव में रामलीला का मंचन होगा। हम जो रामायण पढ़ते-सुनते हैं, उसमें तुलसीदास के रामचरितमानस की छाप होती है। ठीक उसी तरह, जैसे दक्षिण में कदम्ब रामायण और बंगाल में कृत्तिवासी रामायण लोकप्रिय है। कृत्तिवासी ओझा की इस रचन पर ही कवि निराला ने ‘राम की शक्ति पूजा’ लिखी थी। मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने रावण वध से पहले माँ दुर्गा की आराधना की थी।

‘शिव तांडव’ की रचना का क्रेडिट सामान्यतः रावण को ही दिया जाता है और कहा जाता है कि वो एक बड़ा शिव भक्त था। संगीत व वेदों में उसे सिद्धहस्तता प्राप्त थी, अतः वो विद्वान भी था। लेकिन, एक स्त्री पर बुरी नजर डालने के कारण उसका अंत हुआ। इससे पहले भी वो कई स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार कर चुका था। यही कारण है कि स्वर्ग के देवताओं व ग्रहों तक को जीत लेने वाले रावण का अंत इस तरह से हुआ।

लेकिन, आजकल समस्या तब पैदा होने लगती है जब रावण को ‘महान’ दिखाने के चक्कर में भगवान श्रीराम के किरदार से खेल दिया जाता है और उन्हें नीचा दिखाया जाता है। इस फिल्म में भगवाधारियों को भी गुंडा ही प्रदर्शित किया गया है। ‘नाटक’ के नाम पर नया नैरेटिव देने के चक्कर में गाँवों-कस्बों की रामलीला को कहीं ये फ़िल्में बर्बाद न कर दें, यही डर है। इसमें कॉमेडी व रोमांस का तड़का डाल कर बॉलीवुड का फॉर्मूला तैयार कर लिया जाता है।

प्रतीक गाँधी की ‘रावण लीला’ का ट्रेलर

इन चीजों को अक्सर ‘आर्टिस्टिक लिबरटी’, अर्थात कला के आधार पर निर्देशक द्वारा ली गई स्वतंत्रता के रूप में दिखाया जाता है। लेकिन, जिस चीज से आस्था जुड़ी होती है लोगों की, उसे छूने से पहले तथ्यों को खँगाल लेना ज़रूरी है, अध्ययन आवश्यक है। ये काम आज के निर्माता-निर्देशक नहीं करते। फिल्म के ट्रेलर को देख कर सहज ही अंदाज़ा लग जाता है कि इसमें ‘रावण’ और ‘सीता’ की प्रेम कहानी दिखाई गई है।

अर्थात, रावण व सीता का किरदार निभाने वाले अभिनेता-अभिनेत्री अपने निजी जीवन में एक-दूसरे से प्यार करने लगते हैं। इसका असर यदा-कदा ‘रामलीला’ के मंचन के दौरान उनके दृश्यों पर भी पड़ता है। वैसे, ये ट्रेंड नया नहीं है। नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी और पंकज कपूर अभिनीत ‘जाने भी दो यारों’ के अंतिम दृश्य में भी रामायण व महाभारत का मजाक बनाया गया है। दूसरे मजहबों के साथ इसका एक प्रतिशत भी ‘लिबर्टी’ लेने पर इनके खिलाफ देश भर में ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगने लगेंगे।

निजी ज़िंदगी में रावण का किरदार निभाने वाला अभिनेता राम का पात्र अदा करने वाले से पूछता है कि तुमने भी तो सूर्पनखा का अपमान किया, नाक काटी (जो लक्ष्मण ने किया था), इसकी प्रतिक्रिया में रावण ने राम की स्त्री का अपमान किया और उसके ही परिजन ‘शहीद’ होते गए। सवाल ये है कि फिर भी दुनिया राम को सही क्यों मानती है? यहाँ ‘राम’ जवाब देते हैं – ‘क्योंकि मैं भगवान हूँ।’

यानी, ये फिल्म एक तरह से सिर्फ ये प्रस्तुत करना चाह रही है कि रावण एकदम सही था और राम ने सब कुछ गलत किया, लेकिन दुनिया में आज राम की पूजा होती है और रावण को जलाया जाता है तो इसका कारण सिर्फ यही है कि राम भगवान थे। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण शुरू हुआ है और 400 वर्ष पुरानी लड़ाई का अंत हुआ है, देश की राजनीति में भी राम मुद्दा बने हुए हैं, ऐसे में ये फिल्म संदिग्ध एहसास देती है।

प्रतीक गाँधी की फिल्म ‘रावण लीला’ का टीजर

इस फिल्म के ट्रेलर में राम और रावण का किरदार निभाने वाले अभिनेताओं को एक ही महिला पर फिदा होते हुए दिखाया गया है और वो है सीता का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री। नाटक के रिहर्सल के समय सीता हरण का दृश्य फिल्माने के समय हँसी न आने वाले चुटकुले का भी प्रयोग किया गया है, जिसमें एक व्यक्ति कहता है – ‘तू लोटा लेकर जोर से बोलेगा – माते! घर में संडास है क्या? जोर की आई है।’

यानी, रामायण जैसे पवित्र ग्रन्थ व कथा का मंचन में भी संडास और मूत्रालयों को व्हाट्सएप्प चुटकुलों पर सवार कर के लाना एक मजबूरी है बॉलीवुड की हिन्दूफ़ोबिया को आगे बढ़ाने के लिए, वरना फिल्म कैसे चलेगी? आप सोचिए, क्या पैगंबर मुहम्मद या येशु मसीह की कहानियों में इस तरह की फूहड़ चीजें घुसने की हिमाकत कोई फ़िल्मकार कर सकता है? कभी नहीं। कुरान-बाइबिल के एक शब्द के भी अपमान की हिम्मत नहीं इनमें।

फिर रामायण ही क्यों? क्योंकि हिन्दू सहिष्णु हैं। ‘तांडव’ और ‘पाताल लोक’ जैसी वेब सीरीज में हिन्दू धर्म का जम कर मजाक बनाया जाता है। आमिर खान की ‘पीके’ में तो भगवान शिव को ही अपमानजनक अवस्था में दिखा दिया जाता है। अब रावण के महिमामंडन के चक्कर में ये दिखाया जा रहा है कि भगवान राम ने गलत कार्य किए और वो सिर्फ इसीलिए बच गए, क्योंकि वो भगवान थे। ये तो ट्रेलर है, 1 अक्टूबर को पूरी फिल्म आने के बाद ही पता चलेगा कि और क्या-क्या इसमें परोसा जा रहा है।

9/11 का वो दिन जब भारतीय सेना ने पाकिस्तानी टैंकों की कब्रगाह बनाई, लहराया था फिलोरा पर तिरंगा

आजादी के बाद वर्ष 1965 में भारत और पाकिस्‍तान के बीच जो कुछ भी हुआ, वह कई पीढ़‍ियों को आज भी याद है। दोनों देशों के बीच युद्ध ने दोनों देशों की दिशा और दशा बदल कर रख दी। भारतीय सेना जिस तरह से पाक सेना की धज्जियाँ उड़ा रही थी, अगर वही रफ्तार महज दो घंटे और बरकरार रहती तो भारत-पाक के नक्शे की तस्वीर ही कुछ और होती।

11 सितम्बर 1965। यह वह तारीख थी, जब प्रथम आर्मर्ड डिवीजन के तहत पूना हॉर्स रेजीमेंट के कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल एबी तारापोर के नेतृत्व में पूना हॉर्स रेजिमेंट को चविंडा की लड़ाई के दौरान सियालकोट सेक्टर में फिलोरा जीतने का आदेश मिला। तारापोर अपने साथियों के साथ आगे बढ़ ही रहे थे कि अचानक से विरोधियों ने वजीराली क्षेत्र के आस-पास धावा बोल दिया। पाकिस्तानी सेना अपने अमेरिकी पैटन टैंक के ज़रिए ज़बरदस्त हमला कर रही थी। 

1965 की भारत-पाक की लड़ाई में इनके नेतृत्व में भारतीय सेना की एक टुकड़ी ने पाकिस्तान के करीब 79 टैंक ध्वस्त कर दिए थे। भारत और पाक के बीच यह लड़ाई 7 से 11 सितंबर तक पाकिस्तान के फिलोरा गाँव में हुई थी। इस लड़ाई को भारतीय सेना के इतिहास में सबसे घातक लड़ाई माना जाता है।

11 सितंबर 1965 को उप महाद्वीप के दो नवगठित देश सन 1947 में अपनी स्थापना के बाद 18 वर्षों में दूसरी बार युद्ध लड़ रहे थे। फिलोरा की ऐतिहासिक लड़ाई में सियालकोट सेक्टर में भारतीय वन आर्मर्ड डिवीजन के अंदर फोर हॉर्स एक टैंक रेजिमेंट थी, जो आज अपनी गौरवशाली गाथा के लिए प्रसिद्ध है। इस रेजिमेंट ने दुश्मन के 79 टैंकों और 17 आरसीएल बंदूकों को नष्ट किया था। इस दौरान फोर हॉर्स कमांडेंट लेफ्टिनेंट कर्नल एमएम बक्शी ने पाकिस्तान के तीन टैंक बर्बाद किए थे। जाँबाज सिपाहियों ने दुश्मनों के इतने टैंक फोड़े कि रणभूमि में ही टैंकों की कब्रगाह बन गई।

रेजिमेंट के इन महान योद्धाओं की बदौलत ही पाकिस्तान को मुँह की खानी पड़ी थी। इस रेजिमेंट को भारतीय सेना के इतिहास में एक मात्र ऐसी रेजिमेंट होने का अनूठा गौरव प्राप्त है, जिसमें एक साथ दो सेना कमांडर हैं। लेफ्टिनेंट जनरल आरएम बोहरा (एमवीसी, एवीएसएम) जो पूर्व सेना कमांडर के रूप में सेवानिवृत्त हुए और लेफ्टिनेंट जनरल गुरिन्दर सिंह (पीवीएसएम, एवीएसएम) जिन्होंने उत्तरी सेना की कमांड सँभाली। अपने 164 वर्षों के गौरवशाली इतिहास के साथ, 4 हॉर्स अभी भी युद्ध की तैयारी और सैनिक कौशल के मानकों को बनाए रखती है।

भारत और पाक के बीच हुई इस जंग में टैंकों का प्रयोग सेकेंड वर्ल्ड वॉर के बाद सबसे ज्यादा हुआ था। पाकिस्तान के पास उस समय अमेरिका में बने कई बेहतरीन टैंक्स थे, जिनमें पैटन एम-47, एम-48 और एम-4 शैरमैन टैंक्स खास तौर पर शामिल थे। इन टैंक्स की वजह से पाकिस्तान ने शुरुआत में भारत पर हावी होने की कोशिशें की थीं। पाकिस्तानियों की ओर से हो रहे हमलों का भारतीय सेनाओं ने मुँहतोड़ जवाब दिया था।

इधर पाकिस्तान की तरफ से की जा रही गोलाबारी में तारापोर बुरी तरह से घायल हो गए थे। साथियों समेत सीनियर्स ने उन्हें पीछे हटने की सलाह दी थी। मगर तारापोर नहीं माने। जख्मी हालत में भी वो लगातार मोर्चे पर अड़े रहे और वजीराली पर भारतीय तिंरगा फहरा दिया। चाविंडा उनका अगला लक्ष्य था। जिसे जीतने के लिए वह योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़े। दुश्मन सेना ने पूरी मज़बूती से उन्हें रोकने की कोशिश की। मगर वह कामयाब नहीं हुए। उन्हें पीछे हटना ही पड़ा।

लगातार मिलने वाली हार से विरोधी आग बबूला हो गया। उसने ज्यादा से ज्यादा अमेरिकी पैटन टैंकों को जंग के मैदान में उतार दिया। तारापोर ने इसके जवाब की पूरी तैयारी कर रखी थी। जैसे ही विरोधियों की तरफ़ से गोलाबारी शुरू की गई, भारतीय सैनिक उन पर टूट पड़े। एक-एक करके उन्होंने पाकिस्तानी सेना के टैंकों को नष्ट करना शुरू कर दिया। 

भारतीय सैना की 43 टैंकों की टुकड़ी तारापोर की मदद के लिए पहुँचती, इससे पहले ही उन्होंने दुश्मन के 69 टैंकों को नेस्तनाबूत कर दिया था। तारापोर आगे बढ़ते इससे पहले दुश्मन का एक गोला उनके ऊपर आकर गिरा और वह वीरगति को प्राप्त हो गए। दुश्मन की सेना ने भी वीर तारापोर की बहादुरी का सम्मान करते हुए उनके अंतिम संस्कार के वक्त फायरिंग रोक दी थी। अपने लीडर की मौत के बाद भी भारतीय जवानों ने दुश्मनों से जमकर लोहा लिया और अंतत: फिलोरा पर भारतीय तिरंगा लहराया दिया। मरणोपरांत उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था। वह छत्रपति शिवाजी महाराज के वंशज थे।

पाकिस्तानी हमलों को नाकाम करते भारतीय सेना ने पाकिस्तान के एक और शहर डोगराई पर भी कब्जा कर लिया था। पाकिस्तानी सेना को खदेड़ते-खदेड़ते भारतीय सेना एक के बाद एक पाकिस्तानी गाँवों और शहरों पर तिरंगा फहराती आगे बढ़ती हुई लाहौर तक जा पहुँची।

20 सितंबर 1965 को हमारी सेना लाहौर के इतने करीब पहुँच गई थी कि वहाँ से दागा टैंक का गोला सीधा लाहौर शहर में जा गिरता। तब तक घबराया पाकिस्तान लड़ाई बंद करवाने के लिए यूनाइटेड नेशन की शरण में पहुँच गया और भारतीय सेना को आगे न बढ़ने के आदेश मिल गए। जिसके बाद 23 सितंबर 1965 को सीजफायर घोषित हो गया। इस तरह पाकिस्तान ने लाहौर को बचा लिया। इस लड़ाई में इन्फेंट्री डिवीज़न की कमांड मेजर जनरल हरि कृष्ण सिबल के पास और आर्म्ड रेजिमेंट की कमांड लेफ्टिनेंट कर्नल अनंत सिंह पास रही।

उल्लेखनीय है कि जिस वक्त भारतीय सेना तेजी से आगे बढ़ रही थी, उस वक्त पाकिस्तान ने अमेरिका की शरण ले ली थी। गौर करने वाली बात यह है कि उस वक्त देश में भूखमरी बड़ी समस्या थी। उस दौर में अमेरिका से घटिया क्वालिटी का PL-48 गेहूँ आयात होता था। यह दिखने में लाल रंग का होता था, जिसे अमेरिका में जानवर भी नहीं खाते थे।

उस वक्त भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को अमेरिका से धमकी दी गई थी अगर युद्ध नहीं रुका तो गेहूँ का आयात बंद कर दिया जाएगा। जिसके बाद लाल बहादुर शास्त्री ने दो टूक कह दिया था बंद कर दीजिए गेहूँ देना। लाल बहादुर शास्त्री शास्त्री के इस दो टूक के बाद कुछ दिनों बाद अमेरिकी अधिकारियों ने बयान दिया कि अगर अमेरिका ने गेहूँ देना बंद कर दिया तो भारत के लोग भूखे मर जाएँगे। लेकिन PM शास्त्री ने इस बयान का और भी करारा जवाब अमेरिका को दिया था। उन्होंने कहा कि हम बिना गेहूँ के भूखे मरे या बहुत अधिक खा के मरे, आपको क्या तकलीफ। लाल बहादुर शास्त्री शास्त्री ने कहा कि हम भूखे मारना पसंद होगा बेशर्ते सड़ा हुआ गेहूँ खाकर, इसके साथ ही उन्होंने अमेरिका से गेहूँ लेने से भी साफ इनकार कर दिया था।

लेकिन जिस वक्त भारत-पाक का युद्ध चल रहा था उस वक्त देश में वित्तीय संकट था। उस वक्त PM शास्त्री ने दिल्ली के रामलीला मैदान में लाखों लोगों से अपील करते हुए कहा था, “एक तरफ पाकिस्तान से युद्ध चल रहा है। ऐसे हालातों मे देश को पैसे की बहुत जरूरत पड़ती है। मैं आप सब लोग से अपील करता हूँ कि आप लोग फालतू खर्चे बंद करें। जिससे कि घरेलू इनकम में बढ़ोतरी हो या सीधे देश की सेना को दान करें।” शास्त्री ने लोगों से हफ्ते में एक दिन व्रत भी रखने को कहा, यही नहीं उन्होंने खुद भी हर सोमवार को व्रत रखना शुरु कर दिया था। उनका कहना था कि ऐसा करने से गेहूँ की माँग में भी कमी आएगी।

इसी समय लाल बहादुर शास्त्री ने ‘जय जवान जय किसान’ का नारा दिया। लाल बहादुर शास्त्री के ‘जय जवान जय किसान’ के उद्घोष से जहाँ जवानों में उत्साह और जोश का संचार हुआ, वहीं आम जनता, किसानों, युवाओं, महिलाओं, यहाँ तक कि बच्चों ने भी युद्ध की गंभीरता को समझा और और अपना-अपना योगदान दिया। महिलाओं ने अपने गहने तक दान किए, लोगों ने उपवास किए और युद्ध के आर्थिक प्रबंधन में अपनी भागीदारी निभाई। वो कहते हैं न कि बूँद-बूँद से सागर भरता है, ठीक उसी तरह सबके सम्मिलित प्रयासों से भारत माता के कोष में युद्ध के लिए धन की कमी नहीं आई।

वास्तव में 1965 का युद्ध सिर्फ सीमा पर ही नहीं जीता गया, बल्कि यह हर भारतवासी की जीत थी। यह कुशल नेतृत्व की जीत थी, यह नेतृत्व पर विश्वास की जीत थी। आक्रमणकारी हमें कमजोर समझ कर हम पर सुनियोजित और पूरी तैयारी के साथ हमला किया था, पर शायद उसे यह आभास नहीं था कि हालाँकि भारत कभी युद्ध का पक्षधर नहीं रहा है, पर समय गवाह है कि भारत ने हरेक आक्रमणकारी को अपने वीरता और पराक्रम से हराया है और हमारे वीर सैनिकों ने भारत की स्वतंत्रता और संप्रभुता को हमेशा अक्षुण्ण रखा है। इन वीर सपूतों की वीरगाथा को शब्दों में बाँधना उतना ही कठिन है, जितना बहते हुए पानी को मुट्ठी में बंद करना।

इजिप्ट में महिलाओं के ‘हाइमेन रिपेयर’ को लेकर फतवा: शरिया संस्था ने बताया कौन महिलाएँ करा सकती हैं ‘हाइमेन रिकंस्ट्रक्शन’

इजिप्ट में एक नया इस्लामी फतवा जारी कर के महिलाओं को उनका हाइमेन ‘रिपेयर’ करने की अनुमति दी गई है, जिस पर विवाद छिड़ गया है। सामाजिक कार्यकर्ताओं को आशंका है कि महिलाओं को विवाह पूर्व सेक्स के प्रति ललचाने के लिए ऐसा किया जा रहा है। इजिप्ट की सबसे बड़ी मजहबी संस्था ‘दर अल इफ्ता’ के ‘शरिया रिसर्च डिपार्टमेंट’ के निदेशक डॉक्टर अहमद मंदोह ने ये आदेश जारी किया।

उन्होंने कहा, “कुछ मामलों में पैचिंग की आवश्यकता होती है और ये वैध भी होता है। ये उन महिलाओं के लिए हैं, जिनका रेप हुआ है या फिर जो धोखा खाने के बाद पश्चाताप कर के फिर से रिश्ते बनाना चाहती हैं।” 30 अगस्त, 2021 को इस सम्बन्ध में फतवा जारी किया गया। इससे पहले 2015 में किए गए एक अध्ययन में कई पुरुषों से रिश्ते बनाने वाली महिलाओं को ‘हाइमेन रिपेयर’ की अनुमति का विरोध किया गया था।

इजिप्ट की सरकार का कहना है कि कुछ ऐसे मामले हैं, जिनमें शरिया के हिसाब से ‘हाइमेन रिपेयर’ की अनुमति नहीं है। लोगों ने पूछा था कि इस्लाम में ‘हाइमेन रिकंस्ट्रक्शन’ सर्जरी की अनुमति है या नहीं, जिसके जवाब में इजिप्ट की सर्वोच्च मजहबी संस्था ने ये फैसला सुनाया। लोगों का कहना है कि ‘Hymenoplasty’ से महिलाएँ शादी से पहले ज्यादा सेक्स करेंगी, क्योंकि शादी के समय उनके पास ‘क्विक फिक्स’ का तरीका होगा।

इजिप्ट के एग्जीक्यूटिव कानून के तहत ‘Hymenoplasty’ कराना या फिर करना, दोनों ही अवैध रहे हैं। इजिप्ट के प्राइवेट क्लीनिकों में इसके लिए व्यवस्था है, जिसका खर्च $1200 (88.23 हज़ार भारतीय रुपए) कम से कम आता है। इजिप्ट में ‘अक्षुण्ण हाइमेन’ को ‘शुद्धता और नैतिकता’ का प्रतीक माना जाता है। मुल्क में पिछले कुछ दिनों में उर्फी निकाह (गुप्त अपंजीकृत) में बढ़ोतरी हुई है, जिससे कई महिलाओं ने इस प्रक्रिया को अपनाया है।

ऐसे निक़ाहों में महिलाएँ अपना सब कुछ अपने पति को सौंप देती हैं, लेकिन पुरुष सिर्फ दोनों के हस्ताक्षर वाले दस्तावेज को फाड़ कर तलाक ले सकता है। निकाह का यही एकमात्र सबूत होता है। ऐसी स्थिति में लड़कियाँ ‘Hymenoplasty’ करा कर किसी अन्य रिश्ते में बँध जाती हैं। कई लोगों ने नए फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि ऐसा काफी पहले हो जाना चाहिए था। हाल ही में इजिप्ट के एक टीवी शो में बताया गया था कि हाइमेन व वर्जिनिटी का कोई लेनादेना नहीं है।

‘केजरीवाल जी मौज करा दी’ – दिल्ली में सड़कें बनी स्वीमिंग पूल, तेजिंदर बग्गा ने की रिवर राफ्टिंग, वीडियो हुआ वायरल

दिल्ली में शनिवार (11 सितंबर) सुबह से भारी बारिश के कारण कई इलाकों में जलभराव ने लोगों की मुसीबतें बढ़ा दी हैं। सड़कों पर वाहनों की रफ्तार थम गई है। इसी बीच बीजेपी के तेजिंदर सिंह बग्गा का सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में बग्गा रिवर राफ्टिंग करते हुए दिखाई दे रहे हैं।

दरअसल, बारिश के बाद दिल्ली भाजपा नेता तेजिंदर पाल सिंह बग्गा ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली के भजनपुरा में सड़क पर भरे पानी में रिवर राफ्टिंग करते हुए राजधानी की हालत के लिए केजरीवाल सरकार पर कटाक्ष किया है। वे कहते हैं, ”इस सीजन में मेरा बहुत मन था कि मैं ऋषिकेश में राफ्टिंग करने के लिए जाऊँ, लेकिन किसी कारणवश और लगातार लॉकडाउन के कारण मैं नहीं जा पाया। मैं दिल्ली के मुख्यमंत्री का धन्यवाद करता हूँ कि उन्होंने मॉनसून में इतना अच्छा प्रबंध किया है। केजरीवाल जी मौज करा दी। केजरीवाल जी ओ सर जी।”

बग्गा के ट्ववीट पर रिप्लाई करते हुए एक यूजर ने अरविंद केजरीवाल को टैग करते हुए लिखा, ”ऋषिकेश में तो इसके लिए पैसे देने पड़ते हैं, लेकिन दिल्ली में बोट राइड भी फ्री है और कितना करें।”

गौरव नाम के एक यूजर लिखते हैं, ”बिजली फ्री, पानी फ्री, रिवर राफ्टिंग फ्री… कभी कोई एंटरटेनमेंट ना हो तो शाहीन बाग में जेएनयू के लोगों का फ्री में प्ले और फ्री बिरयानी और कभी कभी दंगे हो जाते हैं, इसके अलावा और क्या चाहिए पब्लिक को।”

अंजू चोपड़ा नाम की यूजर सीएम केजरीवाल को टैग करते हुए लिखती हैं, ”अरविंद केजरीवाल जल्द ही एमसीडी को दोष देने वाले हैं और कहेंगे कि एमसीडी केंद्र के अंदर आती है, बस उनकी जिम्मेदारी यही खत्म हो जाएगी।”

वहीं, दिल्ली में एमसीडी सिविक सेंटर के पास बारिश के बाद सड़कें स्वीमिंग पूल में तब्दील हो गईं और बच्चे बरसात के पानी में जमकर मस्ती करते हुए दिखाई दे रहे हैं।

बता दें कि दिल्ली में आज बारिश ने 11 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। सुबह से लगातार तेज बारिश की वजह से दिल्ली एयरपोर्ट पर भी काफी ज्यादा पानी भर गया है। कई वीडियो में रनवे तक पर पानी भरा दिखाई दे रहा है।

‘तालिबानियों को मुझे जिंदा मत ले जाने देना, मेरे सिर में गोली मार देना’ – अफगान पॉप स्टार आर्यना सईद ने अपने मंगेतर से कहा था

तालिबान के चंगुल से बच निकलने में कामयाब रहीं अफगान पॉप स्टार आर्यना सईद फिर से सु​र्खियों में हैं। आर्यना सईद ने इस्तांबुल में न्यूज एजेंसी एएफपी से बातचीत में बताया कि वह काबुल से कैसे भागीं। उन्होंने बताया कि तालिबान के काबुल पर शासन होने के बाद वो भीड़भाड़ वाले हवाई अड्डे में घुस गई थीं। वहाँ उन्होंने अपने मंगेतर से कहा, “उन्हें मुझे जिंदा मत ले जाने देना। बस मुझे सिर में गोली मार देना।”

1.4 मिलियन (14 लाख) इंस्टाग्राम फॉलोअर्स और अक्सर अमेरिकी सुपरस्टार किम कार्दशियन से अपनी तुलना करने वाली आर्यना महिलाओं के अधिकारों और अपने विचारों के चलते शुरुआत से ही कट्टरपंथियों के निशाने पर रही हैं। 36 वर्षीय सिंगर व एक फेमस अफगान म्यूजिक टैलेंट शो ‘द वॉयस’ की पूर्व जज अपने शहर से बेहद प्यार करती थीं, इसके बावजूद उन्हें वहाँ से भागने को मजबूर होना पड़ा।

तालिबानियों ने 15 अगस्त को अफगानिस्तान का शासन अपने हाथों में लिया था। अमेरिकी सेना जो 20 सालों से अफगान सेना के साथ वहाँ के लोगों की रक्षा कर रही थी, उन्होंने उस दिन विदेशियों और कुछ अफगान नागरिकों को वहाँ से निकालने की बहुत कोशिश की, लेकिन विफल रही। अगले दिन पॉप स्टार ने दूसरी बार प्रयास किया।

उन्होंने अपने इस्तांबुल अपार्टमेंट में न्यूज एजेंसी एएफपी को बताया, ”मेरे मंगेतर और मैनेजर हसीब सईद दूसरी कार में वॉकी-टॉकी के जरिए मुझसे बात कर रहे थे। इस दौरान मैंने उनसे कहा कि अगर वो लोग मुझे जिंदा पकड़ कर ले जा रहे हों तो बस सिर में मुझे गोली मार देना।” उन्होंने कहा कि महिलाएँ वहाँ बेहोश हो रही थीं, मैं केवल इसी एक चीज से डरती थी। मैं मरने या किसी और भी चीज से नहीं डरती थी।

आर्यना जानती थीं कि वह जोखिम ले रही थीं, जब उन्होंने काबुल में अपना खुद का फैशन ब्रांड लॉन्च किया था। क्योंकि अमेरिकी सेना उस दौरान अपने वतन लौटने की तैयारी कर रही थी और तालिबान जुलाई में देश के एक के बाद एक बड़े हिस्से पर कब्जा करता जा रहा था।

उन्होंने उन पलों को याद करते हुए कहा, “मैं हमेशा से अपना बेहतर भविष्य देखना चाहती थी, इसलिए मैंने निवेश करने का फैसला किया।” उन्होंने कहा कि शायद सपने में भी नहीं सोचा था कि वह खुद को ऐसी परिस्थितियों से घिरा हुआ पाएँगी।

भागने वाले दिन के बारे में उन्होंने बताया कि भीड़ के बीच से उनके मंगेतर पहले गेट पर पहुँचे। लोग एक-दूसरे को धक्का दे रहे थे। इसमें बच्चे थे, छोटे बच्चे थे। महिलाएँ ऑक्सीजन और जगह की कमी के कारण बेहोश हो रही थीं। अमेरिकी सैनिकों ने शुरुआत में अमेरिकी नागरिकों को प्राथमिकता देते हुए उन्हें जाने देने से इनकार कर दिया, लेकिन एक अनुवादक ने हसीब को पहचान लिया और सैनिकों से कहा कि वह एक बड़े सितारे का मंगेतर है, जिसका जीवन संकट में है।

आर्यना का कहना है कि जिन महिलाओं को उन्होंने पीछे छोड़ दिया है, वे उन महिलाओं की तुलना में अधिक शिक्षित और जागरूक हैं, जिन्हें तालिबान ने आखिरी बार 1996-2001 में अफगानिस्तान पर शासन करने के दौरान स्कूल और अन्य काम से बाहर कर दिया था। उन्होंने कट्टरपंथी इस्लाम के बारे में कहा, ”अफगानिस्तान की महिलाएँ वो महिलाएँ नहीं हैं, जो 20 साल पहले थीं। वो इन्हें स्वीकार नहीं रहे हैं।”

आर्यना ने कहा, ”दुनिया भर की सरकारों को यह समझना चाहिए कि तालिबान आज भी वही है, जिन्होंने 11 सितंबर, 2001 के आतंकवादी हमलों से पहले शासन किया था। मुझे उम्मीद है कि दुनिया को एहसास होगा कि यह बदला हुआ या नया तालिबान नहीं है।” उन्होंने कहा, ”ये मेरे खून के प्यासे हैं।” बता दें कि आर्यना अगस्त 2021 में काबुल से रवाना हुए अमेरिकी कार्गो जेट में सवार होकर तुर्की की राजधानी इस्तांबुल पहुँची।