अफगानिस्तान में तालिबान की बर्बरता पत्रकारों पर भी कम नहीं है। खबर है कि एतिलात्रोज़ (Etilaatroz) से जुड़े दो पत्रकार- तकी दरयाबी (Taqi Daryabi) और नेमातुल्लाह नक़दी (Nematullah Naqdi) को तालिबान ने बेरहमी से मारा है। दोनों पत्रकार महिलाओं का प्रदर्शन कवर करने मौके पर पहुँचे थे। इसी बीच तालिबानियों ने दोनों को पकड़ा और अंधाधुंध पीटा। पत्रकारों की पीठ पर केबल की तार और डंडों के निशान पाए गए हैं। दोनों का इलाज अस्पताल में चल रहा है।
اطلاعات روز: تقی دریابی و نعمتالله نقدی، دو گزارشگر روزنامه اطلاعات روز پس از بازداشت توسط طالبان، به شدت مورد لتوکوب قرار گرفتهاند. آثاری از شلاق و کیبل بر سر، صورت و بدن این دو گزارشگر اطلاعات روز به چشم میخورد. pic.twitter.com/0vuEwYW28b
रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों पत्रकार पश्चिमी काबुल के कार्ट-ए-चार (Kart-e-Char) इलाके में महिलाओं के उस प्रदर्शन को कवर करने पहुँचे थे जिसका मुद्दा नई सरकार में महिलाओं की भागीदारी न होने को लेकर था। इसी दौरान तालिबानियों ने पत्रकारों को पकड़ा और बंधक बनाकर उनसे मारपीट की। दोनों को 4 घंटे बाद छोड़ा गया। वहीं बाकी भी पत्रकार पकड़े गए थे उनको भी तालिबान ने बाद में रिहा कर दिया।
این گزارشگران میگویند که هر کدام آنان به اتاقهای جداگانه منتقل و سپس زیر ضربهی شلاق طالبان قرار گرفتهاند. تقی دریابی و نعمتالله نقدی برای درمان به شفاخانه منتقل شدهاند.
बता दें कि अफगानिस्तान में तालिबान की एंट्री के बाद मानवाधिकारों का उल्लंघन धड़ल्ले से हो रहा है। कई पत्रकार अब तक उनका निशाना बन चुके हैं। डीडब्ल्यू से जुड़ी एक पत्रकार की रिश्तेदार को कुछ समय पहले गोली मार दी गई थी। वजह यही थी कि तालिबानी उस पत्रकार को ढूँढ रहे थे। लेकिन न मिलने पर रिश्तेदार को मौत के घाट उतार दिया। जानकारी के मुताबिक, अब तक 3 DW पत्रकारों के घरों पर छापेमारी हो चुकी है। इसके अलावा जलालाबाद के प्रदर्शन में भी पत्रकार तालिबान के निशाने पर आए थे। फिर सीएनएन पत्रकारों पर भी तालिबान ने हमला किया था।
नए कृषि कानूनों के विरुद्ध चल रहे किसान आंदोलन के बीच मोदी सरकार ने किसानों को तोहफा दिया है। सरकार ने फैसला लिया है कि 2022-23 के लिए रबी की फसल में MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) में बढ़ोतरी होगी। मोदी सरकार ने गेहूँ, बार्ले, चना, मसूर, सरसों और सैफलॉवर का MSP बढ़ाया है।
पीएम मोदी ने इस बात की जानकारी देते हुए ट्वीट किया। उन्होंने कहा, “किसान भाइयों और बहनों के हित में सरकार ने आज एक और बड़ा निर्णय लेते हुए सभी रबी फसलों की MSP में बढ़ोतरी को मंजूरी दी है। इससे जहाँ अन्नदाताओं के लिए अधिकतम लाभकारी मूल्य सुनिश्चित होंगे, वहीं कई प्रकार की फसलों की बुआई के लिए भी उन्हें प्रोत्साहन मिलेगा।”
किसान भाइयों और बहनों के हित में सरकार ने आज एक और बड़ा निर्णय लेते हुए सभी रबी फसलों की MSP में बढ़ोतरी को मंजूरी दी है। इससे जहां अन्नदाताओं के लिए अधिकतम लाभकारी मूल्य सुनिश्चित होंगे, वहीं कई प्रकार की फसलों की बुआई के लिए भी उन्हें प्रोत्साहन मिलेगा।https://t.co/xsjC99rvQg
इसके बाद कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा, “कुछ लोग यह गलत सूचना फैलाने की कोशिश कर रहे हैं कि MSP (मिनिमम सपोर्ट प्राइस) बंद कर दिया जाएगा। इसके विपरीत कृषि कानूनों के लागू होने के बाद MSP पर फसलों की खरीद और MSP की दर लगातार बढ़ रही है।”
Some people are trying to spread misinformation that MSP (Minimum Support Price) will be stopped. On the contrary, the rate of MSP & procurement of crops on MSP are increasing continuously after the implementation of farm laws: Union Agriculture Minister Narendra Singh Tomar pic.twitter.com/3teoZbXONj
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ट्वीट कर लिखा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में आज गेहूँ समेत रबी की कई फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 40 रुपए से लेकर 400 रुपए तक की वृद्धि की गई है। यह निर्णय प्रमाण है कि एमएसपी की व्यवस्था पर कोई आँच नहीं आने वाली बल्कि उसमें वृद्धि भी जारी रहेगी।
उन्होंने लिखा, “कृषि और किसान के कल्याण के प्रति प्रधानमंत्री मोदीजी की प्रतिबद्धता पूरी तरह स्पष्ट है। रबी की फसलों का MSP बढ़ाने का आज का निर्णय, किसानों की आमदनी में वृद्धि करेगा। इस कल्याणकारी निर्णय के लिए मैं प्रधानमंत्रीजी को बधाई और हार्दिक धन्यवाद देता हूँ।”
बता दें कि इस संबंध में जारी की गई प्रेस रिलीज के मुताबिक गेहूँ का एमएसपी 1975 रुपए से बढ़कर 2015 रुपए हो गया है, बार्ले का 1600 रुपए से बढ़कर 1635 रुपए, चना की 5100 रुपए से 5230 रुपए, सरसों की 4650 रुपए से 5050 रुपए, सैफलॉवर का 5327 रुपए से 5441 रुपए और मसूर की 5100 रुपए है।
उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई बैठक में केंद्र सरकार ने 2022-23 मार्केटिंग सीजन के लिए रबी फसलों का MSP बढ़ाने का फैसला लिया। प्रेस रिलीज के मुताबिक सबसे ज्यादा मसूर और सरसों के MSP में बढ़ोतरी हुई है। इसमें 400 रुपए का इजाफा किया गया है। इसके बाद चने के MSP में सबसे अधिक यानी 130 रुपए की बढ़ोतरी हुई, सैफलॉवर का MSP 114 रुपए बढ़ा है, वहीं गेहूँ और बार्ले का MSP क्रमश: 40 और 35 रुपए बढ़ा है।
भारतीय जनता पार्टी और मोदी सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने के लिए अखिल भारतीय कॉन्ग्रेस कमेटी (एआईसीसी) द्वारा एक ‘आंदोलन समिति’ का गठन किया गया था। अब कहा जा रहा है कि इस नए टूलकिट को लागू करने के लिए कॉन्ग्रेस सिविल सोसाइटी संगठनों, एक्टिविस्ट और बुद्धिजीवियों को अपने साथ जोड़ने की योजना बना रही है।
इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अपनी पार्टी को लामबंद करने के अलावा कॉन्ग्रेस पार्टी मोदी सरकार से परेशान भाजपा विरोधी सामाजिक कार्यकर्ताओं, गैर सरकारी संगठनों और बुद्धिजीवियों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश में है।
स्रोत के हवाले से दी गई जानकारी के मुताबिक, आंदोलन समिति के अध्यक्ष बनाए गए दिग्विजय सिंह संघ परिवार के विरोध में सिविल सोसाइटी संगठनों और कार्यकर्ताओं के साथ नेटवर्क के लिए जाने जाते हैं।
इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि सिंह ने पैनल के गठन के तुरंत बाद तीन कृषि विधेयकों का विरोध कर रहे कथित किसानों की जय-जयकार करते हुए ट्वीट किया था।
भीड़तंत्र का लाभ उठाएगा आंदोलन पैनल
कॉन्ग्रेस कमिटी के अंदर के सूत्रों ने विभिन्न मुद्दों पर नागरिकों को भड़काने के लिए लंबे समय से तैयार आंदोलन की रणनीति का संकेत दिया है। इसमें मुद्रीकरण (राष्ट्रीय/सार्वजनिक संपत्ति का), मुद्रास्फीति और बेरोजगारी शामिल है, जिसमें संघ परिवार के संगठनों को निशाना बनाए जाने की पूरी संभावना है।
अगले सप्ताह होने वाली आंदोलन समिति की बैठक में कॉन्ग्रेस किसानों के चल रहे विरोध प्रदर्शनों पर मुख्यरूप से अपना फोकस रखेगी। कॉन्ग्रेस पार्टी अपनी समान विचारधारा वाले 18 विपक्षी दलों के साथ मिलकर 20 से 30 सितंबर तक केंद्र के खिलाफ देशव्यापी विरोध का आह्वान कर सकती है। इस बीच 27 सितंबर को भारत बंद की भी योजना है।
कॉन्ग्रेस की उत्तर प्रदेश की महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा आंदोलन समिति की भी सदस्य हैं। यह आंदोलन समिति भाजपा शासन के खिलाफ असंतोष फैलाने की कवायद पर विचार कर सकती है। कॉन्ग्रेस को खुद उसके द्वारा शासित हर राज्य में खासी निराशा मिली है, जिससे पार्टी को भारी शर्मिंदगी उठानी पड़ी है। राष्ट्रीय विपक्ष के रूप में इसकी भूमिका के लिए भी इसकी कड़ी आलोचना की गई है।
एक मजबूत राष्ट्रीय विपक्ष के रूप में खुद को पुनर्जीवित करने के लिए कॉन्ग्रेस पार्टी को आंदोलनकारियों, संदिग्ध गैर सरकारी संगठनों और पुराने कार्यकर्ताओं पर भरोसा करना पड़ रहा है। उत्तम कुमार रेड्डी, मनीष चतरथ, बीके हरिप्रसाद, रिपुन बोरा, उदित राज, रागिनी नायक और जुबेर खान जैसे कॉन्ग्रेस पार्टी के नेता पहले ही इस पैनल के तहत किसान आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए लगातार काम कर रहे हैं।
किसान आंदोलन पर कॉन्ग्रेस नेता रागिनी नायक ने किया री-ट्वीट
कॉन्ग्रेस-सोरोस-आंदोलनजीवी तिकड़ी
जॉर्ज सोरोस, एक हंगेरियन अमेरिकी व्यवसायी और एक स्व-घोषित फिलेंथ्रोपिस्ट और गैर-सरकारी संगठनों, मीडिया, बुद्धिजीवियों, आदि के द्वारा वित्त पोषित विभिन्न नेटवर्क का उपयोग करके भारत में उथल-पुथल पैदा करने में भूमिका के बारे में चिंता करनी चाहिए।
सोरोस ने विश्व स्तर पर हर ‘राष्ट्रवादी सरकार’ को खत्म करने की कसम खाई है, उसी ने भारत में अपना ‘लोकतंत्र की मौत का जाल’ बिछाया है।
मीडिया गिरोह
इंडियन एक्सप्रेस के रितु सरीन श्यामलाल यादव और पी वैद्यनाथन अय्यर जैसे पत्रकार, आईएनएस के पूर्व संपादक (अब जर्मन डायचे वेले के लिए काम करते हैं राकेश कलशियान), मुरली कृष्णन और एशियन एज के यूसुफ जमील, ये सभी इंटरनेशनल कमेटी ऑफ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स (ICIJ) के माध्यम से सोरोस मीडिया नेटवर्क के लिए काम करते हैं।
कॉन्ग्रेस के प्रमोटर अमर्त्य सेन के साथ जॉर्ज सोरोस के एनजीओ से जुड़े हैं। बता दें कि ये एनजीओ भारत में ‘पर्यावरण न्याय’ के लिए काम करता है। इन सब के अलावा हर्ष मंदर इकलौते ऐसे व्यक्ति हैं, जिसने हाल के दिनों में दूसरों की तुलना में देश की इमेज को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाया है। ओपन सोसायटी फाउंडेशन से जुड़े हर्ष मंदर के कॉन्ग्रेस पार्टी के साथ बहुत ही घनिष्ठ संबंध रहे हैं। दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगा भड़काने के मामले में, खासतौर पर साल 2019 में जामिया मिलिया इस्लामिया परिसर के आसपास की हिंसा के लिए जिम्मेदार हर्ष मंदर पिछले कुछ समय से जाँच के दायरे में हैं।
आंदोलनजीवी गैंग
इसके अलावा देश में किसानों के चल रहे विरोध प्रदर्शन में किसान नेता बने योगेंद्र यादव के भी कथित तौर पर सोरोस से लिंक हैं। 2006 में सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज में प्रोफेसर के रूप में यादव ने पहली बार भारत आने वाले सोरोस के सामने स्टेट ऑफ डेमोक्रेसी इन साउथ एशिया (एसडीएसए) पर स्टडी रिपोर्ट प्रस्तुत किया था।
सोरोस और उसका गिरोह भारत के संशोधित नागरिकता मानदंडों के भी गंभीर रूप से आलोचना करता है। सीएए विरोधी दंगों को भड़काने वाले इन मोदी विरोधी कार्यकर्ताओं में जॉन दयाल, उषा रामनाथन, उमर खालिद और तीस्ता सीतलवाड़ जैसे लोग भी शामिल हैं। कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाले राजीव गाँधी फाउंडेशन और सोरोस-वित्त पोषित संगठनों से इसके संबंध भी नए नहीं हैं।
नेटवर्क का पता लगाना
विपक्ष के रूप में कॉन्ग्रेस की भूमिका को बयाँ करने के लिए इतिहास में बहुत पीछे जाने की जरूरत नहीं है। सीएए के विरोध और अब किसान आंदोलन (विशेषकर पंजाब, एक कॉन्ग्रेस शासित राज्य) को पार्टी के अटूट समर्थन ने उनके टूलकिट को बेनकाब कर दिया है।
वैक्सीन की झिझक पैदा करने से लेकर मृतकों पर मुँह फेरने तक, जैसा कि राष्ट्र महामारी की तीसरी लहर के कगार पर है कुछ राज्यों में, कॉन्ग्रेस पार्टी ने केवल देश के संकट को बढ़ाया है।
पेगासस स्नूपगेट से लेकर गाजियाबाद के ‘जय श्री राम’ फर्जी अपराध सहित अपने नेटवर्क का इस्तेमाल कर कॉन्ग्रेस ने जो तमाशा करने की कोशिश की उन्हें भूलना नहीं चाहिए, जिस पर कॉन्ग्रेस के बड़े नेताओं ने ब्राउनी पॉइंट हासिल करने की कोशिश की थी।
उपरोक्त सभी घटनाओं ने भारत के विकास में बाधा उत्पन्न की या महामारी के खिलाफ लड़ाई को कमजोर करने की कोशिश की। ये एक अच्छी तरह से बुने हुए मकड़जाल की तरह लग रहा था, जो कि आंदोलनजीवी, बुद्धिजीवी और मीडिया के व्यापक नेटवर्क का उपयोग से गढ़ा गया है।
पहले से मौजूद नेटवर्क के साथ यह देखना दिलचस्प होगा कि कॉन्ग्रेस देश को पटरी से उतारने के लिए आगे अब इसका दुरुपयोग कैसे करती है।
अफगानिस्तान में तालिबान सरकार की घोषण के बाद कुछ कश्मीरी नेता अब तालिबान का गुणगान कर रहे हैं। फारूक अब्दुल्ला के बाद महबूबा मुफ्ती ने इस विषय पर बयान दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री ने कुलगाम में कहा कि तालिबान हकीकत बन कर सामने आ रहा है। ऐसे में अगर वो अपनी छवि को बदलेगा तो दुनिया के लिए मिसाल बन सकता है।
पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती कहती हैं, “तालिबान हकीकत बनकर उभरा है। अगर वे इस बार शासन करना चाहते हैं तो शरिया जो कहता है जिसमें, औरतों, बूढे, बच्चों के अधिकारी है और किस तरह शासन करना चाहिए। अगर वे इसपर अमल करना चाहते हैं तो मुझे लगता है वे(तालिबान) दुनिया के लिए मिसाल बन सकते हैं। अगर वो उस पर अमल करेंगे तभी दुनिया के देश हैं उनके साथ कारोबार कर सककते हैं।”
तालिबान हकीकत बनकर सामने आ रहा है। अगर वे इस बार शासन करना चाहते हैं तो शरिया जो कहता है जिसमें, औरतों, बूढे, बच्चों के अधिकारी है और किस तरह शासन करना चाहिए। अगर वे इसपर अमल करना चाहते हैं तो मुझे लगता है वे(तालिबान) दुनिया के लिए मिसाल बन सकते हैं: PDP अध्यक्षा महबूबा मुफ़्ती pic.twitter.com/nMNBNMLo03
आज तक की रिपोर्ट के मुताबिक मुफ्ती कहती हैं, “खुदा ना खास्ता अगर जो बीते सालों का वह अपना एक तरीका अपनाएँगे तो फिर सारी दुनिया के लिए ही नहीं अफगानिस्तान के लोगों के लिए भी मुश्किल हो जाएगी।”
उल्लेखनीय है कि इससे पहले तालिबान के पक्ष में फारूक अब्दुल्ला ने बयान दिया था। उन्होंने तालिबान का राग अलापते हुए कहा था, “मुझे उम्मीद है कि वे (तालिबान) इस्लामी सिद्धांतों का पालन करते हुए उस देश (अफगानिस्तान) में सुशासन देंगे और मानवाधिकारों का सम्मान भी करेंगे। उन्हें हर देश के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध विकसित करने का प्रयास भी करना चाहिए।”
बता दें कि महबूबा मुफ्ती और अब्दुल्ला जैसे नेताओं के मुँह से तालिबान के पक्ष में बयानबाजी सुनने के बाद सोशल मीडिया यूजर गुस्साए हुए हैं। एक यूजर लिखता है, “मैं भारत सरकार से अनुरोध करता हूँ कि इन्हें अफगानिस्तान भेजे ताकि तालिबानी शासन में ये चैन से जिएँ। 8 माह की गर्भवती औरत की हत्या देखने के बाद भी ये ऐसे बोल रही हैं। भगवान ऐसे लोगों से जम्मू-कश्मीर को बचाए।”
I plead govt of India to send her to Afghanistan so that she can live peacefully under Taliban’s.
Even after seeing mu r der of a 8 months pregnent women this lady is speaking in this manner. God save J&k from these kind of people
रूस के आपातकालीन मंत्री येवगेनी जिनिचेव की आर्कटिक क्षेत्र में एक सैन्य अभ्यास के दौरान कैमरामैन की जान बचाते समय मौत हो गई। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, रूस के राष्ट्रपति कार्यालय क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने मंत्री की मौत की पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि इस दुखद घटना के बारे में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को भी जानकारी दे दी गई है। उनके मृत शरीर को अब मॉस्को लाने की तैयारी की जा रही है।
Russian Emergency Minister Zinichev dies while saving a person's life during drills: Russian media
रूसी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, येवगेनी जिनिचेव की ड्यूटी के दौरान दुखद मृत्यु हो गई है। इस दुर्घटना के समय वे आर्कटिक क्षेत्र को आपात स्थिति से बचाने के लिए कई विभागों के साथ सैन्य अभ्यास कर रहे थे। जिनिचेव सैन्य अभ्यास के दौरान शूटिंग कर रहे कैमरामैन को पानी में गिरने से बचाने का प्रयास कर रहे थे, तभी उनका पैर फिसला और चट्टान से सिर टकराने के कारण उन्हें गंभीर चोट लगी और अस्पताल लेकर जाते समय उन्होंने दम तोड़ दिया। इस हादसे में कैमरामैन की भी मौत हो गई है।
प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार, रूस के आपातकालीन मंत्री येवगेनी जिनिचेव एक चट्टान के किनारे खड़े थे। तभी एक कैमरामैन फिसलकर गिर गया। उसे बचाने के लिए जिनिचेव ने उस चट्टान से नीचे पानी में छलांग लगा दी। इस दौरान वे एक दूसरी चट्टान से टकरा गए और उनके सिर में गंभीर चोट लग गई। वे दोनों अस्पताल में भर्ती थे लेकिन एक आपातकालीन सेवा हेलीकॉप्टर में उनकी मृत्यु हो गई।
रूसी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जिनिचेव साल 2018 से आपात मामलों से जुड़े मंत्रालय का नेतृत्व कर रहे थे। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1980 के दशक के आखिर से केजीबी अफसर के तौर पर की थी। वह सोवियत संघ के विघटन से पहले संघीय सुरक्षा एजेंसी (एफएसबी) में सेवाएँ दे चुके हैं। जिनिचेव का जन्म 1966 में लेनिनग्राद (अब सेंट पीटर्सबर्ग) में हुआ था। विभिन्न पदों पर रहते हुए जिनिचेव ने राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ कई विदेश यात्राएँ भी की।
अफगानिस्तान में तालिबान एक बार दोबारा से शरीया कानून लागू करके हर उस इमारत को तहस-नहस कर रहा है जो उनके हिसाब से इस्लाम के खिलाफ खड़ी हुई है। 90 के दशक में भी ऐसी तमाम तस्वीरें देखने को मिली थी। साल 2001 में तो तालिबान ने बमियान के बुद्ध को नष्ट कर दिया था जबकि वह केवल चट्टान और चूने पत्थर से निर्मित विशाल मूर्तियाँ थी। तालिबान की इस हरकत का विरोध विश्व भर में हुआ था। हालाँकि जाकिर नाईक जैसे कट्टरपंथी विचारधारा के लोग कई साल बाद तक इस कृत्य को जगह-जगह जस्टिफाई करते रहे।
साल 2016 में spiritual door नाम के यूट्यूब पर डाली गई जाकिर नाईक की एक वीडियो में देख सकते हैं कि कैसे जाकिर नाईक अपने फॉलोवर्स को समझा रहा है कि अफगानिस्तान में बुद्ध की मूर्ति को नष्ट करना उचित था। वह बताता है, “बुद्ध की मूर्तियों को नष्ट करके, तालिबान बौद्धों को शिक्षित कर रहे थे कि मूर्ति पूजा गलत थी। तुलनात्मक धर्म के छात्र के रूप में, मुझे पता है कि कोई भी बौद्ध ग्रंथ मूर्ति पूजा के बारे में बात नहीं करता है।”
इस वीडियो में जाकिर नाईक का एक फॉलोवर उनसे पूछता है कि तालिबान ने बुद्ध की मूर्ति को गैर इस्लामी बताते हुए नष्ट कर दिया। वो जानना चाहता है कि ये सच में गैर इस्लामी था या नहीं। इस पर नाईक खड़ा होता है और बताता है कि उससे ऐसा सवाल पहले भी किया गया है। वह कहता है, “तुलनात्मक अध्य्यन का छात्र होने के नाते मैं जो कहता हूँ वो ये कि तालिबान ने जो किया वो बौद्धों को शिक्षित करने के लिए था।”
सवाल का जवाब देने की बजाय नाईक अपने ज्ञान का बखान करता है और कहता है कि उसने बौद्ध ग्रंथों को पढ़ा है और ये बात बुद्ध ने कहीं भी नहीं लिखी कि मेरी मूर्ति बनाओ। ये सब बाद में हुआ अपनी वीडियो में नाईक ने खुद को और तालिबानी विचारधारा को सही साबित करने के लिए बुद्ध की तुलना ड्रग्स और भारत सरकार की तुलना तालिबान से करते हुए समझाया कि जब उससे किसी ने कहा कि बुद्ध की मूर्ति नष्ट करके सैंकड़ों लोगों को आहत किया गया है, तो उसने कहा,
“अगर भारत सरकार किसी व्यक्ति को 10 करोड़ के ड्रग्स के साथ पकड़ेगी तो सरकार क्या करेगी? इस पर पत्रकार ने कहा वह उसे जला देगी। इस पर मैंने कहा कि तुम जानते हो लाखों लोगों के लिए ड्रग ही भगवान है। तब क्या तुम सरकार के साथ रहोगे या फिर ये सोचोगे कि सरकार ने तो लाखों नशेड़ियों के विरुद्ध फैसला ले लिया?”
आगे वह कहता है, “भारत सरकार ने देखा कि चाहे ड्रग खत्म करने से लाखों लोगों को नुकसान होगा लेकिन चूँकि ड्रग से नुकसान होता है तो उन्होंने उसे जलाया। तुम वहाँ नहीं जा सकते न ही पूछ सकते कि ड्रग क्यों जलाया। इसी तरह अफगानिस्तान में वो मूर्ति उनकी प्रॉपर्टी है। अगर वो ऐसा कुछ दूसरे देश में आकर करते हैं तो हम आपत्ति जता सकते हैं। अपने देश में अपनी प्रॉपर्टी के साथ वो कुछ भी करें। चाहे तो रखें चाहे बर्बाद कर दें। हम आपत्ति नहीं जता सकते।” इसके बाद जाकिर भारत की तुलना अफगान से करता है और कहता है कि एयरपोर्ट के बाहर एक मूर्ति थी उसे भारत सरकार ने हटवाया क्योंकि कुछ लोगों ने आपत्ति जाहिर की थी। लेकिन तब किसी ने कुछ नहीं बोला और अफगानिस्तान की घटना पर निंदा होती है। ये सब वोट बैंक के कारण है।
Zakir Naik on Taliban destruction of Bamiyan Buddha Statue "By destroying Buddha statues, Talibans were educating the Buddhists that idol worship was wrong. As a student of comparative religion, I know that no Buddhist scriptures talks about idol worship"https://t.co/tBtwRVm8dJ
बता दें कि जाकिर नाईक की ये पुरानी वीडियो यूट्यूब पर मौजूद है और अफगानिस्तान में एक बार दोबारा तालिबान की सरकार बनने के बाद इस वीडियो को सोशल मीडिया पर शेयर किया जा रहा है। हाल में इस पुरानी वीडियो को गिरीश नामक सक्रिय ट्विटर यूजर ने शेयर किया था।
अगर आप वयस्क हैं, पहले से शादीशुदा भी हैं… तो भी किसी दूसरे/दूसरी के साथ live-in रिलेशन में रह सकते हैं। और अगर आप ऐसा करते हैं तो आप कोई अपराध नहीं कर रहे होते हैं। शादीशुदा होने के बावजूद भी live-in रिलेशन में रहने की यह समाज की परिभाषा नहीं है बल्कि पंजाब एवं हरियाणा हाइकोर्ट का फैसला है।
पंजाब एवं हरियाणा हाइकोर्ट ने विवाहेतर संबंधों पर अहम फैसला सुनाया है। पंजाब का एक प्रेमी जोड़ा अपनी सुरक्षा के लिए हाइकोर्ट तक पहुँचा था। यह फैसला इसी मामले में दिया गया। साथ ही याचिका दायर करने वाले प्रेमी जोड़े को सुरक्षा प्रदान करने का भी आदेश कोर्ट ने दिया।
Live-in रिलेशन और इलाहाबाद हाई कोर्ट
इस पूरे मामले में कानूनी दिक्कत यह थी कि शादीशुदा होने के बावजूद यह जोड़ा live-in रिलेशन में रह रहा था। और दूसरी दिक्कत थी पिछले महीने इलाहाबाद हाई कोर्ट का दिया एक फैसला।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले पर कहा था कि live-in रिलेशन में रह रहे ऐसे प्रेमी जोड़े को सुरक्षा नहीं दी जा सकती है, जिसमें कोई एक भी पहले से शादीशुदा हो। इसके पीछे इलाहाबाद हाई कोर्ट ने देश के सामाजिक ताने-बाने को तर्क में रखा था।
राजस्थान हाई कोर्ट ने भी पिछले महीने एक फैसला दिया था। फैसले का आधार वही – “इलाहाबाद हाई कोर्ट वाला देश का सामाजिक ताना-बाना” था। अपने फैसले में राजस्थान हाई कोर्ट ने शादीशुदा लेकिन live-in रिलेशन में रहने वाली महिला को सुरक्षा देने से इनकार कर दिया था।
इलाहाबाद हाई कोर्ट से असहमत
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई के दौरान कहा कि वह इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश का सम्मान करते हैं, लेकिन इससे सहमत नहीं हैं। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने अपने तर्क देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही IPC की धारा 497 (विवाहेतर संबंध अपराध) को असंवैधानिक करार दे चुका है। ऐसे में याचिका प्रेमी जोड़े को सुरक्षा देने से इनकार नहीं किया जा सकता है।
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के अनुसार सहमति से live-in रिलेशन में रहना (विवाहित होने के बावजूद ) किसी भी स्थिति में गैरकानूनी नहीं है। जज अमोल रतन सिंह के बेंच ने इस मामले में पंजाब सरकार को भी आदेश भेजा। खन्ना जिले के एसएसपी को आदेश दिया गया कि वह live-in रिलेशन में रहने वाले जोड़े की सुरक्षा सुनिश्चित करें।
क्या था मामला
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में जो याचिका दाखिल की गई थी, उसके अनुसार live-in रिलेशन में रहने वाले जोड़े में से एक शादीशुदा है। साथ ही उसके तलाक से जुड़ा मामला भी हाई कोर्ट में लंबित है। याचिका दाखिल करने वाले जोड़े में से एक ने बताया था कि उनकी पत्नी और उनके घरवालों से जान का खतरा है। आरोप यह भी लगाया था कि पत्नी की शिकायत के आधार पर पुलिस के द्वारा live-in रिलेशन में रहने वाले जोड़े को लगातार परेशान किया जा रहा था।
रंग दे बसंती फिल्म के अभिनेता सिद्धार्थ ने बुधवार (8 सितंबर 2021) को तड़के ट्वीट कर भारतीय क्रिकेट टीम के पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि अब ये ‘विषाक्त’ हो गया है। दरअसल, आईपीएल के उद्भव से पहले क्रिकेट और एमएस धोनी व विराट कोहली जैसे क्रिकेटरों के बारे में बोल रहे थे।
My favourite cricketer since I was 14 and he 20 was Dravid. Followed him his whole career. First ball to last. I miss you so much Rahul Dravid. Can’t wait for you to come back to dignify Indian Cricket again. It’s coming. ❤️
एक्टर ने दो ट्वीट किए और दावा किया, “नई पीढ़ी की पूजा प्रशासनिक और पीआर शक्ति के साथ मिली जुली है। यह वह क्रिकेट नहीं है जिसकी उन्होंने ‘पूजा’ की और अब ‘विषाक्तता का राज’ है। बाद में उन्होंने कहा कि जब राहुल द्रविड़ ने क्रिकेट खेला तो उन्होंने उस समय को याद किया और कामना की कि वह वापस आएँ और भारतीय क्रिकेट को फिर से सम्मानित करें।”
फैंस ने दिया करारा जवाब
हालाँकि, भारतीय क्रिकेट, आईपीएल, एमएस धोनी, विराट कोहली और सामान्य तौर पर क्रिकेट प्रशंसक इस ट्वीट से बहुत खुश नहीं थे।
कुछ लोगों ने बताया कि वह अभिनेता जो प्रोडक्ट का विज्ञापन करते हैं और एक ही पीआर श्रेणी का हिस्सा हैं, इसलिए उन्हें खिलाड़ियों पर ताने नहीं मारने चाहिए।
tru ?? ye log ka moral supremacy kuch zyada hi chal raha
कुछ लोगों ने बताया कि किस तरह से सिद्धार्थ क्रिकेटरों के बारे में उदासीन हो रहे थे, जबकि वे भी इसी एडवर्टाइजिंग और पीआर खेल से जुड़े हैं।
In 2002, Indian players were earning 60% of their revenue from endorsements & 40% from Cricket match fees. These negotiations were getting played out before the 2002 Headingley Test. It’s better to know history before making Dravids & Tendulkars the Gods, which they were not
ट्विटर यूजर विजय अरुमुगम ने याद किया कि कैसे 2002 में द्रविड़, तेंदुलकर और अन्य क्रिकेटर आईसीसी के एंबुश मार्केटिंग क्लॉज से सहमत नहीं थे और राजस्व को जाने देने के मूड में नहीं थे। उन्होंने बताया कि कैसे 2002 में भारतीय क्रिकेटरों ने अपनी कमाई का लगभग 60% एंडोर्समेंट सौदों के जरिए हासिल किया था।
हालाँकि, जैसा कि उन्होंने इशारा किया यदि व्यक्ति ने अपनी आय हासिल करने में कुछ भी गलत नहीं किया है। तो इसमें कोई समस्या नहीं है।
The “era” before ipl was the time when fans burned stadium , blocked roads because their favourite cricketer was dropped , conducted mock funerals for cricketers. Anyone remember the 1996 World Cup semi final ? https://t.co/rHvoPPoa9j
आयशा मुखर्जी ने एक इंस्टाग्राम पोस्ट के जरिए भारत के स्टार क्रिकेटर शिखर धवन से तलाक लेने के बारे में बताया था। करीब नौ साल बाद दोनों की राहें जुदा होने की वजह अभी तक स्पष्ट नहीं है। पूरे मामले पर धवन की प्रतिक्रिया भी अब तक सामने नहीं आई है। इस बीच एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दोनों के संबंध बीते आठ महीने से बिगड़े हुए थे। लेकिन धवन नहीं चाहते थे कि शादी टूटे।
दैनिक भास्कर ने एक रिपोर्ट में दावा किया है कि शिखर के एक करीबी ने उन्हें नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया है कि दोनों के बीच बीते दिसंबर तक सब कुछ ठीक चल रहा था। लॉकडाउन की शुरुआत में शिखर ने आयशा के साथ फोटो और वीडियो शेयर कर भी लोगों को घर में रहने की सलाह दी थी। करीबी के अनुसार बीते सात-आठ महीने से दोनों के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था। हालाँकि इसकी वजह स्पष्ट नहीं है। रिपोर्ट में कहा गया है कि तलाक की पहल आयशा की ओर से की गई। इससे पहले शिखर ने शादी बचाने के प्रयास किए। बाद में वे भी तलाक के लिए राजी हो गए।
यह भी दावा किया जा रहा है कि तलाक के बावजूद शिखर धवन की कोशिश सब कुछ ठीक करने की है। यही कारण है कि अब तक उन्होंने इस मामले पर चुप्पी साध रखी है। आयशा के तलाक वाले पोस्ट के बाद शिखर ने इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट किया था जिसमें वह आईपीएल की जर्सी पहने नजर आ रहे हैं। पर इसमें तलाक को लेकर कुछ नहीं कहा था। इस पोस्ट में उन्होंने लिखा था, “किसी भी मुकाम को पाने के लिए पूरा जान, समझ, दिल लगता है। प्यार अपने काम के प्रति होनी चाहिए तभी बरकत आती है और खुशी भी मिलती है। अपने सपनों को हकीकत बनाने के लिए कड़ी मेहनत करते रहिए।”
इससे पहले आयशा ने एक लंबे और भावुक पोस्ट में लिखा था, “मैं समझती थी कि तलाक एक गंदा शब्द है, जब तक कि मैं 2 बार तलाकशुदा नहीं हो गई।” साथ ही उन्होंने अपने पहले तलाक के वक्त के अनुभवों को भी साझा किया था। उन्होंने लिखा, “पहली बार जब मैं तलाक से गुज़री तो मैं बहुत डर गई थी और मुझे लगा जैसे मैं असफल हो गई थी और उस दौरान कुछ गलत कर रही थी। मुझे लगा जैसे मैंने सभी को नीचा दिखाया है और यहाँ तक कि खुद को स्वार्थी भी महसूस किया है। मुझे लगा कि मैं अपने माता-पिता को निराश कर रही हूँ। मुझे यह भी लगा कि मैं अपने बच्चों को निराश कर रही हूँ। उस दौरान मुझे ऐसा लगता था कि मैंने भगवान का अपमान कर दिया है।”
गौरतलब है कि मेलबर्न में रहने वाली आयशा से शिखर की मुलाकात हरभजन सिंह ने करवाई थी। सोशल मीडिया से दोनों करीब आए और 2012 में शादी कर ली। यह आयशा की दूसरी शादी थी। पहली शादी से उनकी दो बेटी है। वहीं शिखर के साथ उनका सात साल का एक बेटा है।
राजस्थान के टोंक जिले के मालपुरा कस्बे में एक बार फिर हिंदू परिवार अपने मकान और दुकान बेचकर दूर जाने लगे हैं। मुस्लिम बहुल इलाके में रहने वाले हिंदुओं ने घरों के बाहर ‘पलायन’ का पोस्टर लगा कर अपना जीवन खतरे में बताया है। सामने आई तस्वीरों में देख सकते हैं कि हिंदुओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से मामले में हस्तक्षेप की माँग की है।
इस बाबत पीएम मोदी और सीएम गहलोत को पत्र भी लिखे गए हैं जिसमें बताया गया है कि असुरक्षा के कारण मजबूरी में इलाके के हिंदुओं को पलायन करना पड़ रहा है। दैनिक जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक, मंगलवार (सितंबर 7, 2021) को इन परिवारों के करीब 100 लोगों ने कस्बे में रैली निकालकर उपखंड अधिकारी को ज्ञापन दिया।
ज्ञापन में बताया गया कि इलाके में कैसे हिंदुओं के साथ मारपीट और महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार किया जाता है। इसके अलावा यह भी कहा गया कि 1992 के बाद मुस्लिम बस्ती के पास रहने वाले हिंदू समाज का असुरक्षा और डर के कारण धीरे-धीरे पलायन होता जा रहा है। लोग अपने मकान खाली कर दूसरों को बेच रहे हैं। कथिततौर पर मालपुरा में 600 से 800 हिंदुओं के मकान मुस्लिम समाज के लोगों ने खरीद लिए हैं। लोगों ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से सुरक्षा की माँग करते हुए न्याय की गुहार लगाई है।
6 सितंबर को रैली करके एसडीएम के पास पहुँचे हिंदू (साभार: टीवी9 भारतवर्ष)
इससे पहले एक और ज्ञापन सोमवार (6 सितंबर) को सौंपा गया था। इलाके के हिंदुओं का कहना है कि मुस्लिमों की आबादी लगातार बढ़ रही है, जिसके कारण हिंदुओं का रहना मुश्किल हो रहा है। क्षेत्र में जैन और गुर्जरों के मंदिर हैं, लेकिन मुस्लिमों की बढ़ती आबादी के कारण असुरक्षा है और इस कारण उन्हें बंद करना पड़ रहा है। मंदिरों के पास अवैध तरीके से मांस की दुकानें चलाई जा रही हैं जिस वजह से मंदिर की प्रतिमाओं को दूसरी जगह भेजा जा रहा है।
बता दें कि हिंदुओं द्वारा की गई इस रैली के बाद उपखंड प्रशासन ने कार्रवाई करने की बजाय इसे साम्प्रदायिक सौहार्द्र बिगाड़ने वाली करतूत बताया। उन्होंने हिंदू समुदाय के लोगों को अपने अपने घरों से इस तरह के पोस्टर हटाए की चेतावनी दी। इसके बाद पुलिसकर्मी पोस्टरों को हटाने के लिए कई बार घर पहुँचे, लेकिन लोगों के विरोध को देखते हुए वह ऐसा नहीं कर सके। एक स्थानीय नागरिक राधानकिशन ने बताया कि करीब 200 परिवार काफी समय से प्रशासन से सुरक्षा की माँग कर रहे हैं।
यहाँ ज्ञात रहे कि मालपुरा को साम्प्रदायिक दृष्टि से संवेदनशील इलाका माना जाता है। कई बार वहाँ इसी वजह से तनाव की स्थिति पैदा हुई है जिसमें 50 लोगों की जान भी गई। बताया जाता है कि सबसे बड़ा साम्प्रदायिक झगड़ा 1992 में हुआ था। दोनों पक्षों के 25 लोगों की मौत हुई थी, उसके बाद साल 2000 भी 13 लोग इन्हीं सबके चलते मरे थे।